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Swami Vivekananda's Kali the Mother ·

Kali the Mother: Readings from Swami Vivekananda's Poem 25 oct 2024

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ओम स्थापक च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठा राम कृष्णाय ते [प्रशंसा] नमः मां काली और स्वामी विवेकानंद ने मां काली के ऊपर में जो कविता लिखी का द मदर उसका चिंतन हम कर रहे थे उसके बाद में मैंने सोचा कि बहुत ज्यादा फिलोसोफी हो जाती है तो कुछ दिनों तक हम स्मृति कथाएं चलाते हैं तो अभी रामलाल दादा की स्मृति कथा समाप्त हुई और अगले सप्ताह काली पूजा भी है थर्सडे को है आई थिंक थर्सडे रात को है तो यह काली पूजा का या तो फिर य काली तत्व क्या है इसके बारे में और थोड़ी सी चर्चा विचारणा हम लोग कर लेते हैं है सबसे पहले तो हमने देखा कि किस तरह से यह मां काली का रुद्र स्वरूप बाकी सब धर्म से हमारे हिंदू धर्म में जो एक यूनिकनेक्ट है उसमें से दो सबसे बड़ी यदि कही जाए तो एक तो है कि अद्वैत वेदांत दूसरा है कि यह कराल रूपी मां काली की उपासना यह दोनों हमारे हिंदू धर्म में है और इसके बारे में बाद में हमने स्वामी जी की जो कविता है काली ध मधर उसका भी पाठ किया और उसमें हमने देखा कि स्वामी जी किस तरह से मृत्यु रूपा काली की कल्पना करते हैं किस तरह से यह चाहे महामारी हो ना कि चाहे युद्ध हो ना कि चाहे कोई भी प्राकृतिक दुर्घटनाएं हो किस तरह से मां काली का यह एक मेनिफेस्टेशन है और हमको यदि प्रश्न होगा कि क्यों इस तरह से ईश्वर अपने संतानों को कष्ट देते हैं बहुत बार जैसे एक पॉपुलर कल्चर है ना पॉपुलर कल्चर में जो कहानियां सब लिखी जाती है बहुत सारे लोग जनरली ईश्वर तत्व के बारे में चिंता करते हैं तो जो नास्तिक लोग होते हैं वह लोग हमेशा एक आर्गुमेंट देते हैं कि हम लोग नास्तिक क्यों हो गए क्यों क्योंकि हमने देखा कि ईश्वर को दयामय कहते हैं हम शास्त्र में कहते हैं खास करके यह मैं विदेशियों की बातें कर रहा हूं ईश्वर को तो दयामय कहते हैं किंतु यही दयामय इतनी क्रूर सृष्टि की रचना क्यों करते हैं जहां पर जब भी चाहे इनोसेंट लोग जो है विधवा है जो है अनाथ बच्चे जो है इनको इतना कष्ट मिलता है और खास करके जो वेस्टर्न यूरोप का जो इतिहास वेस्टर्न यूरोप ही नहीं वेस्टर्न सिविलाइजेशन ए सच का इतिहास आप खुल के देखेंगे हर सदी में कोई ना कोई महायुद्ध हुआ है या तो कोई ना कोई महामारी आई है बहुत सारे लोगों की हत्या हो गई है वो चाहे नेपोलियनिक वॉर्स हो ना कि फिर रेवोल्यूशन यह जो अमेरिका में वॉर ऑफ रेवोल्यूशन हो ना कि ये सोवियत यूनियन का ये सिविल वॉर हो ना कि फर्स्ट वर्ल्ड वॉर ना सेकंड वर्ल्ड वॉर ये कुछ भी हो हमेशा बड़े पैमाने पे नर हत्या होती आ रही उन्होंने देखी है तो वे लोग कहते हैं कि यदि हमको यह कहा गया है कि यह फादर इन हेवन यदि इतने दयामय है तो फिर अपने संतानों को इतना कष्ट क्यों देते हैं अर्थात कि यह ईश्वर की दयामय कल्पना झूठ मूठ की है सब बेत की बातें हैं हमको ईश्वर पर विश्वास ही नहीं है इस तरह से कई लोग आर्गुमेंट देते हैं अपने सिनेमा में भी आप देखेंगे नवल कथाओं में भी आप देखेंगे ऐसे पात्र होंगे नास्तिक पात्रों की रचना करते हैं आजकल क्या है लोगों को इस तरह के स्ट्रांग मेन जो होते हैं उनको देखना उनके बारे में पढ़ना लोगों को बड़ा अच्छा लगता है कि चलो मैं अपनी जो इच्छाएं अपने कमजोर देह या तो फिर कमजोर मन की वजह से जिसको मैं नहीं पूर्ण कर पाया तो यह जो स्ट्रांग मैन है वह यदि उसको पूर्ण करते हैं तो उसको देख कर के तो एटलीस्ट मुझे आश्चर्य होगा मने आनंद होगा तो यह लोग जो होते हैं हमेशा कहते रहते हैं कि मुझे भगवान पर विश्वास नहीं है क्योंकि भगवान ने एक अन्याय मय सृष्टि की रचना की है मैंने स्वामी जी खुद कहते हैं मैं यदि सृष्टि की रचना करता ठाकुर को एक बार कहते हैं जबकि उनकी बुद्धि थोड़ी अपरिपक्व थी उस समय की बात है यदि मैं सृष्टि की रचना करता तो मैं ईश्वर से अच्छी सृष्टि की रचना कर देता क्यों क्योंकि ईश्वर ने कैसी सृष्टि की रचना की है यहां पर कुछ लोग हैं जो अमीर है जिनके पास में दुनिया भर की धन संपत्ति दौलत वैभव सब कुछ है और इतने सारे लोग गरीब हैं ना ही खाने को मिलता है ना ही उनके पास में रहने को कोई घर है यहीं पे मैं यहां पे अपना एक विवेकानंद इंस्टिट्यूट ऑफ एक्सीलेंस है तो वहां से मैं आना जाना करता हूं क्योंकि वहां पर शाम को मुझे क्लास लेने होते हैं तो मैं जब भी आता हूं जाता हूं तो फुटपाथ पर देखता हूं कि एक गरीब परिवार वहां पर रहता है तो छोटे-छोटे दो बच्चे हैं उ उम्र मुश्किल से तीन-चार साल की होगी अभी तीन-चार साल और एक बहुत ही छोटा बच्चा है उसकी उम्र शायद एकाद साल की होगी अभी एक साल का बच्चा तीन चार साल का बच्चा बिना किसी कपड़े पहने वहीं पर फुट पाट पर रहते हैं लोगों को यदि दया आएगी तो उसको यदि कुछ पैसा वगैरह देंगे तो उसकी मां को तो मां उसको खिलाएगी यह किस तरह का जीवन है ऑन दी अदर हैंड सामने में ही ये बीच है बीच पे देखिए कि बड़ी-बड़ी बड़ी गाड़ियां पड़ी रहती है कितने ही धनी लोग वहां पर आनंद मनाने के लिए वहां पर आते हैं तो यह दो कंट्रास्ट में प्रतिदिन देखता हूं यहां पर यह गरीब भूखा परिवार इसके पास पास में बच्चों को पहनाने के लिए वस्त्र भी नहीं यहां पर सामने में ही बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमते फिरते धनी लोग तो हमको यह प्रश्न अवश्य होगा कि इस तरह की अन्याय मय सृष्टि की रचना ईश्वर ने क्यों की यदि आप खासकर के ऐसा कहते हैं जैसे कि वेस्टर्न थियोलॉजी में कहा जाता है ईश्वर दयामय है हम लोग वेदांत में और एक स्टेप आगे बढ़ करर के कहते हैं ईश्वर ही सब कुछ हुए हैं पशु पक्षी अश्व हस्ती मनुष्य जो कुछ भी देखो सभी के भीतर में वही आत्मन ही छलक रहा है यदि हम यहां तक यदि जाए तो हमको तो यह प्रश्न होना होगा कि ईश्वर ने अपने को गरीब क्यों बनाया कभी और कभी अपने को धनी क्यों बनाया ईश्वर की क्या मतलब वो क्या बोलेंगे मेंटल बैलेंस वो ठीक-ठाक था कि नहीं जब वह सृष्टि की रचना कर रहे थे तो इस तरह के प्रश्न होना स्वाभाविक है और इस प्रश्नों का उत्तर है कि सृष्टि स्थिति प्रलय यह तीन ही एक ही ईश्वर के भीतर में वर्तमान है और यह प्रलय का जो खास करके जो मेनिफेस्टेशन है वो भगवान शिव और मां काली के के भीतर में हमको विशेष रूप से दिखाई देता है प्रलय क्यों तो प्रलय के बारे में या तो दुख कष्ट के बारे में बहुत सारा चिंतन हम हिंदू धर्म की व्यू पॉइंट से कर सकते हैं किंतु खास करके हमको यह जो जानने की आवश्यकता है वह है कि यदि जगत में कष्ट नहीं होता महामारी नहीं होती युद्ध विप्लव नहीं होते तो फिर हमको इस जगत के में से छुड़ाने वाला और कोई नहीं होता हमको यदि सब समय नजर के सामने दिखता है कि हां यदि मैं आध्यात्मिक आराधना उपासना में आगे नहीं बढूंगा तो कल का दिन ऐसा आएगा कि इस काल चक्र रूपी इस चक्की में मैं भी पीस जाऊं यह माने हमको सब समय अलर्ट रखने के लिए यह सब है ये तो एक प्रश्न का ये एक उत्तर है दूसरा है कि जैसे कि हमने ऑलरेडी इसको डिस्कस किया कि ईश्वर ही सब कुछ हुए हैं ईश्वर ने ही अपने को अमीर बनाया है धनी बनाया है ईश्वर ने ही अपने को गरीब बनाया है कातर बनाया है कोई भोगी है कोई योगी है तो कोई रोगी है य भोगी रोगी या तो योगी यह तीन ही ईश्वर ही हुए हैं हमको ठीक करना है कि हमको क्या होना है हम रोगी होंगे ना कि भोगी होंगे ना कि योगी होंगे तो यह सृष्टि का चक्र एक कैलिडोस्कोप रूपी यह जगत जिसमें सब तरह के रंग सब तरह के भाव अपनी नजर के सामने हमको दिखते हैं हमको यह ठीक करना है कि इसमें से कौन सा भाव हमको लेना है यहां पे मैं बीच के ऊपर में मॉर्निंग वक करने के लिए जाता हूं जब सूरज उगता है तो आकाश में बादल जैसे कि कितने कलर के बादलों के रंग दिखते हैं सप्तरंग के बादल जैसे कि आकाश में सूर्योदय के समय दिखते हैं तो यह जो सप्तरंगी बादल जो हमको वहां पर आकाश में दिखते हैं सूर्योदय के समय वैसी ही यह सृष्टि है यह सृष्टि का पूरा नजारा कहीं पे वह महामारी है कहीं पर मृत्यु का नंगा नाच चल रहा है तो कहीं पे भोगवा में लोग डूबे हुए हैं और कहीं पर यह सबसे उर्ध्व कोई भिक्खू है जो कि आनंद में मग्न समाधि में बैठा हुआ है यह जो बुद्धिस्ट एक शास्त्र है धम्म पद उसको कहते हैं जैसे कि हमारे लिए गीता का प्राधान्य है जैसे कि क्रिश्चियनिटी में बाइबल का प्राधान्य है वैसे ही बुद्धिज्म में धम्म पद रूपी पुस्तक का प्राधान्य है जिसमें कि भगवान बुद्ध के बहुत सारे अ वाणी बहुत सारी वाणि हों का संग्रह उसमें है बड़ी इंपॉर्टेंट तो मैं उस समय बेलूरमठ में था ट्रेनिंग सेंटर में वहां की लाइब्रेरी में सचित्र धम्म पद बोलकर के एक मैंने पुस्तक देखा अभी धम्मपद पाली शब्द है उसका संस्कृत करेंगे तो होगा धर्म पद धर्म के ऊपर में रचित पद पद अर्थात की स्टंस तो एक सचित्र पुस्तक देखा मैंने उसका नाम था सचित्र धम्म पद तो मैंने सोचा कि देखा जाए तो मैंने खोल के देखा इतना मोटा पुस्तक था और मैंने कितने रुपए उसको पुस्तक को छापने में लगे होंगे मैंने आप अनुमान करके उसको चित्र का जो स्टैंडर्ड और क्वालिटी था पेपर का क्वालिटी मैं तो पब्लिकेशन में था बाद में और यह किताब मुझे हमेशा मुझे मेरे माइंड में थी कि इस तरह की किताब धम्मपद जैसी अपने ठाकुर के कथामृत के ऊपर में बनानी है मैं नहीं बना पाया अनफॉर्चूनेटली राजकोट में और भी बहुत सारे प्रायोरिटी थी किंतु यह कित में हमेशा याद रखूंगा इतनी बड़ी किताब थी और प्रत्येक किताब में क्या था पता है एक एक पद है और उस पद के ऊपर में सचित्र चित्र बनाए हुए हैं और जो चित्र बनाने वाला जो चित्रकार होगा उसने भी जैसे कि भगवान बुद्ध की वाणी को आत्मसात कर लिया हो इस तरह का एक चित्रकार था तो उसमें जो ऐसे बहुत सारे पद है इस किताब में कि भगवान बुद्ध कहते हैं कि देखो चारों ओर यह जो समाज है समाज में सब कुछ चल रहा है कोई है कि नृत्य कीत कीर्तन में मग्न है कोई है कि अपना भोग विलास में मग्न है कहां पर शादी हो रही है कहां पर चीता जल रही है कहां पर राजा अपने महल में भोग विलास कर रहे हैं और इन सबके उर्ध्व में भिक्खू है जो कि दिव्यानंद में मस्त निर्वाण के आनंद में व साधन राज्य में डूबा हुआ है तो यह चित्र ऐसे बहुत सारे पद है वैराग्य प्रकट करने वाले वैराग्य का महिमा गुणगान करने वाले और प्रत्येक पद के ऊपर में जो चित्र उस चित्रकार ने बनाए थे अद्भुत कि एक पहाड़ के ऊपर में भिक्खू बैठा है और पहाड़ के नीचे में सब कुछ यह जगत का भोग विलास सब चल रहा है और किंतु देखिए कि जो चित्रकार का सही सही ये जो पावर था जो लोग भोग विलास भी कर रहे हैं उनके चेहरे पर मायूसी का आभास था और यह जो भिक्खू जैसे कि फटे कपड़े पहन कर के और एकदम उसके पास में कुछ नहीं है और वो वहां पर निर्माण में मस्त होकर बैठा है उसके चेहरे पर जो दिव्य उल्लास माने यह भी तो एक टेक्निक है आप यदि भोग विलास का चित्र बनाना चाहेंगे किंतु यह आध्यात्मिक दृष्टि से तो भोग विलास से उनको सही सही आनंद नहीं मिल रहा है यह आपको दिखाना होगा और जो भिक्खू जो समाधि में डूबा हुआ है उसके चेहरे पर जो आनंद है वह भी आपको प्रदर्शित करना होगा तो इतना सुंदर रूप से ऐसे कितने चित्र थे उसमें तो मैं सब समय लाइब्रेरी में जाता था धम्मपद पुस्तक मैंने पढ़ा है भगवान बुद्ध की वाणी का मैंने अभ्यास भी किया है किंतु यह जो सचित्र पिक्टोरियल धम्मपद में सब समय खोल कर के देखता रहता था वह भगवान बुद्ध की वाणी को पढ़ने के लिए नहीं वह पढ़ लेंगे उसमें कोई दिक्कत नहीं किंतु यह जो चित्र है वो चित्र ही ऐसे वैराग्य उद्दीपक थे कि उसका आनंद प्राप्त करने के लिए मैं वहां पर बैठा रहता था और बेलूरमठ की ये जो लाइब्रेरी जिसके बारे में मैं बता रहा हूं यह आपको शायद पता होगा बेलूरमठ में एक ट्रेनिंग सेंटर होता है तो अभी एक ट्रेनिंग सेंटर वहां पे था बाद में ऐसा हुआ कि धीरे-धीरे करके ब्रह्मचार्य की संख्या बढ़ती गई तो एक नया बड़ी साइज का बड़ा सुंदर ट्रेनिंग सेंटर बनाया गया और फिर वह ट्रेनिंग सेंटर वहां पर शिफ्ट हो गया तो अभी जो पुराना ट्रेनिंग सेंटर है वहां पे ग्राउंड फ्लोर पे यह लाइब्रेरी बनी हुई है तो अभी देखिए कि वहां पे दो-तीन चीजें हैं वहां पे जो लाइब्रेरी की खिड़की के सामने ही देखेंगे तो बड़ा सुंदर एक गार्डन था अभी तो वहां पे एक बड़ा कन्वेंशन हॉल बन गया है किंतु मैं जब जिस समय बेलूरमठ में था वहां पे लाइब्रेरी की खिड़की के पास में ही बड़ा गार्डन था तो मैंने अपनी एक पर्सनल जगह फिक्स करके रखी थी मैं जब ट्रेनिंग सेंटर में था उस समय में भी और जबकि मैं मेरा पोस्टिंग बेलूर मठ में था 4 साल के लिए तो उस समय में भी मैं हमेशा यह लाइब्रेरी में जाऊंगा मेरी फिक्स जगह प ही बैठूंगा वहां पर पास में ही खिड़की है खिड़की में से सुंदर गार्डन दिख रहा है पास में एक जलाशय है जलाशय दिख रहा है और सुंदर बड़ा सा गार्डन था और फिर यहां पर मैं लाइब्रेरी में बैठूंगा कोई भी किताब पढ़ता रहूंगा कभी-कभी खिड़की में से बाहर गार्डन को देखूंगा कभी-कभी किताब पढ़ूंगा और था भी ऐसा कि बहुत कम लोग उस समय लाइब्रेरी में आते थे यह जो बड़ा सा कमरा था रीडिंग रूम उसमें प्रायः में अकेला ही बैठा हुआ होता था ऐसा बहुत दिन गए हैं मेरे ट्रेनिंग सेंटर में भी और बाद में भी तो बहुत बार में यह पिक्टोरियल बुक खोल कर के उसमें यह चित्र देखता रहता और इतना आनंद आता कि देखिए कि यह एक वैराग्य उद्दीपन कैसे करता है तो यह जदी प्रश्न हो कि जगत में इस तरह से ईश्वर ने कष्ट क्यों रखा है तो दो चीज हमको ख्याल में रखनी है हमको नास्तिक नहीं हो जाना है झूठ मूठ का आर्गुमेंट देक के वो रिचार्ड डोकीन वगैरह चार-पांच लोग हैं जो कि बड़े फेमस थेट है आजकल के जमाने में और उनके कोई कोई बड़े ट्रेडिशनल होते थे शास्त्र को छोड़कर के एक स्टेप आगे नहीं लेना है जो शास्त्र में लिखा गया है वही फाइनल वर्ड है वही आखिरी आदेश है उसके बाद में और कुछ नहीं ज्यादा से ज्यादा ठाकुर महा स्वामी जी को आप ले सकते हैं तो उनका क्लास करने का भी एक आनंद होता था क्योंकि जो अपनी भारतीय परंपरा को अपनी ट्रेडीशन को संपूर्ण रूप से जी जान से समर्पित है उनका उनकी वाणी सुनना वो भी एक बड़ा आनंद का बात है और खास करके जो हम ब्रह्मचार्य के सामने वे लोग जितना मुक्त होकर के बात कर सकते हैं उतना वो जाहिर में पब्लिक के सामने नहीं कर सकते मैं मुझे याद है सर्वप्रिया अंद जी महाराज जो कि आज इतने फेमस है तो हमारे आचार्य हुआ करते थे और उनके क्लास कोई भी मिस नहीं करेगा इतना सुंदर उनका क्लास होता था विद्वत्ता से भरपूर इतने एग्जांपल्स देते थे और चेहरे पर आनंद होने से हमको भी आनंद आता है कि चलो महाराज भी खुश है तो हम भी खुश है और फिर बाद में जब मेरा पोस्टिंग हुआ उसके बाद में तो उस समय यह मोबाइल वगैरह तो इतना था नहीं बाद बाद में जब मैं राजकोट गया मोबाइल आया मेरे हाथ में मैं रैंडम सर्च कर रहा था youtube0 तो लिख कर के एकाएक देखा कि सर्वप्रिया अंद जी का प्रवचन है तो मैं तो इतना खुश हो गया मैंने कहा अरे वाह चलो फिर से महाराज को सुनने को मिलेगा बोलकर के मैं प्रवचन और कर दिया सुन रहा हूं सुन रहा हूं किंतु थोड़ी देर के बाद में बिल्कुल डिस पॉइंट हो गया क्यों क्योंकि महाराज में जो स्पार्क हमको ट्रेनिंग सेंटर में दिखा था वो यहां पर नहीं दिख रहा है मैंने सोचा कि ऐसा तो क्या हो गया महाराज अमेरिका चले गए हैं तो क्या वह फिर यहां पर वो अमेरिका की सभ्यता के साथ में मिलकर के जो भी हो क्या कुछ मतलब इतना जो अच्छे से बोल रहे थे इंडिया में वहां प क्यों नहीं बोल रहे किंतु धीरे-धीरे करके मैंने जब बाकी प्रवचन भी सुने पता चला कि जब हम साधु ब्रह्मचार्य के सामने जितना मुक्त रूप से वो आत्मा की महिमा का वर्णन या तो फिर यह वैराग्य का वर्णन जितना मुक्त रूप से वह कर सकते थे उतना वह जाहिर में आम जनता के सामने खास करके गृहस्थ ऑडियंस के सामने इतना नहीं करते नहीं कर सकते कि नहीं करना चाहते वह जो भी हो वो उनका चॉइस है किंतु वो जो वैराग्य दीपक वैराग्य की महिमा वाला जो सब लेक्चर हमने बेलूरमठ में अटेंड किए थे ट्रेनिंग सेंटर में वह यहां पे हमको नहीं मिलते सो दैट इज वन डिफरेंस किंतु जब यह मृत्यु रूपा काली की बात आती है तो सन्यास हो ना कि गृहस्थ हो यह सब कंसीडरेशन दूर हो जाता है मृत्यु अवश्यंभावी है मृत्यु नजर के सामने है इसका एक ही उपाय है एक ही सॉल्यूशन है वह है वैराग्य यदि जीवन में वैराग्य नहीं होगा तो उस जीवन का ज्यादा कोई अर्थ नहीं है यह भोग विलास के चक्र में पड़कर के जन्म मृत्यु जरा व्याधि के चक्र में पिसते ही जाएंगे पिसते ही जाएंगे जब तक वैराग्य का उदय नहीं होगा तब तक हमको इस चक्र में पीसते जाना है तो व्हाई कैन नॉट वी मेक स्मार्ट चॉइस अपने जीवन में ऐसा नहीं है कि मैं गृहस्थ हूं तो अभी वैराग्य का अधिकारी नहीं हूं या तो फिर यदि मुझे वैराग्य के रास्ते पर आगे बढ़ना है त्याग का रास्ता अब मुझ मुझे अपनाना है तो मेरा गृहस्थ आश्रम मेरे लिए भार स्वरूप है ऐसा भी नहीं है अपने शास्त्र में तो बड़ा ही सुंदर वर्णन कर ही दिया गया है कि आप एक हाथ से ईश्वर को पकड़ के रहिए और एक हाथ से संसार का कर्म करिए उसमें कुछ भी गलत नहीं है बस वही बात है कि जैसे ठाकुर कहते हैं मने वने और कोण बीच-बीच में अपने मन के एकांत में जाकर के या तो अपने घर में किसी एक कोने में एक रूम में अकेले बैठ कर के या तो फिर बीच-बीच में यह रिट्रीट में जाकर के जैसे यह अद्वैता आश्रम की ओर से आजकल वो हिमालय में मायावती में रिट्रीट होती है हर साल तो यह मन वन और कोण यानी कॉर्नर ये तीन जगह पे बीच-बीच में जाकर के हमको रिट्रीट में जाकर के संसार को भूल जाना है और ईश्वर के भीतर में मग्न हो जाना है ईश्वरीय आनंद में साधन भजन में और यह कथामृत जैसे सत ग्रंथ के पाठ में अभी देखिए कुछ दिनों से मैं अ यहां पे ज्यादा कुछ काम नहीं है तो मैं अपने रूम में ही ज्यादातर दिन बिताता हूं राजकोट में तो ऐसा होता था कि सुबह को 7:00 बजे में ऑफिस आता था तो शाम को 7:00 बजे जाना होता था अपने कमरे में वापस और दोपहर में एक दो घंटा खाने का और विश्राम बस इतना ही दिन भर अदर वाइज मैं ऑफिस में बैठा रहता था अभी यहां पे ऐसा है कि काम इतना ज्यादा कुछ है नहीं और फिर मेरा खुद का जो है प्रॉब्लम कि मुझे लैंग्वेज नहीं आती तो जो काम भी है मेरा यहां पर उसमें भी मैं बहुत ज्यादा डीप में नहीं जा पाऊंगा क्योंकि यहां तो तेलुगु में लोग बात करते हैं और तेलुगु सीखना तो असंभव जैसा है अभी इस जन्म में मेरा नागपुर में मेरा पोस्टिंग था महाराष्ट्र में तो वहां थोड़ी बहुत मराठी मैंने आयत त कर ली थी क्योंकि मराठी हिंदी गुजराती यह सब कोई बहुत डिफरेंट ल वेजस नहीं है थोड़ा सा ध्यान देकर सुनेंगे तो समझ में तो पूरा आ जाता था एक दो एक साल रहने के बाद में पूरा पूरा समझ लेता था वही है कि बोल नहीं पाता था यहां पर समझना बोलना तो छोड़ ही दीजिए समझना भी असंभव जैसा है इतनी डिफरेंट ये लैंग्वेज है तो ऑलरेडी मेरे सर पर ऐसा कोई टेंशन नहीं है कर्म का या ऐसा कुछ तो मैं बहुत ज्यादा समय अपने कमरे में बिताता हूं तो सब समय मेरा यह जो स्वाध्याय है या लेखन है यह चलता रहता है है तो देखिए कि अभी मेरे भीतर में कर्म का एक था एक रजस जैसा था मैंने घर इसलिए छोड़ा था क्योंकि मैं चाहता था कि मैं गांव में जाकर के गांववासियों की सेवा करूं ऐसा मैं जब स्कूल में पढ़ता था उस समय में स्कूल के लिए जाता था तो देखता था पास में एक मैदान आता है वहां पर बहुत सारे गरीब लोग रहते हैं तो उनके बच्चों को देखता था भूखे नंगे बच्चे बेचारे तो मुझे लगता था क्यों नहीं मैं इनके लिए कुछ ना कुछ करके जाऊं तो वह एक भाव से मैंने यह यात्रा प्रारंभ की थी बाद में मैं राची में गया राची में अपना ट्राइबल डेवलपमेंट सेंटर है तो मैंने वहां पर भी बहुत काम किया और फिर वह काम जद समाप्त हो गया तो संघ ने मुझे जब साहित्य के क्षेत्र में लगाया तो वहां पर भी मैंने जी जान से अपना जी जान लगा कर के कर्म किया किंतु अभी ऐसी मेरे मन की अवस्था है कि बस अभी कर्म बहुत हो गया जित ना रजस मेरे भीतर में था सब जैसे कि वर्कआउट हो गया जब मैं रांची में था तो यही मेरा रूटीन था सुबह को 7:00 बजे मैं वहां से गाड़ी में से निकलता था आश्रम में साथ में तीन-चार वॉलंटस वहां के रहते थे लोकल ट्राइबल पीपल तो उनके साथ में निकलता था फिर एक रूट हम ठीक कर लेते थे इस रास्ते से जाएंगे उस रास्ते में जितने भी गांव है हमने ऑलमोस्ट 75 विलेजेस अडॉप्ट किए थे और फिर वहां पर अपना दिव्या न बोलकर के कृषि विज्ञान केंद्र है आश्रम में ही वहां से बहुत सारे प्रोजेक्ट चलते थे जैसे कि सेल्फ हेल्प ग्रुप है न कि ऊंच नस्ल का ये जो पशुपालन है न कि फिर यह अच्छी किस्म के खेती है न कि ये फ्लोरीकल्चर है न कि बी कीपिंग है ना कि गमछा बनाना कोटेज इंडस्ट्री है जिसमें गमछा बनाने की ट्रेनिंग अगरबत्ती बनाने की ट्रेनिंग ये बहुत सारे प्रोजेक्ट हमारे चलते थे हेल्थ एक बहुत बड़ा एक सेपरेट प्रोजेक्ट होता था हेल्थ के रिलेटेड वैक्सीनेशन होती थी मोबाइल डिस्पेंसरी होती थी बहुत कुछ होता था तो एक दिन ठीक कर देते थे कि इस रूट पे जाएंगे इस रूट पे सात आठ विलेजेस आते हैं उस सात आठ विलेज में अपनी कौन सी एक्टिविटी चल रही है उस एक्टिविटी रिलेटेड रिसोर्स पर्सन दिव्या यान में कौन है उनको साथ में बिठा दिया गाड़ी में और निकल पड़े बस रास्ते से जाएंगे एक के बाद एक विलेज में एक विलेज में गए वहां पर हो सकता है सेल्फ हेल्प ग्रुप चल रहे हैं तो अपना सेल्फ हेल्प ग्रुप वाला रिसोर्स पर्सन उनके साथ में बात करेगा फिर वहीं पे खेती में वो फ्लोरीकल्चर फ्लोरीकल्चर अर्थात कि फूल उगाना वहां पे मैरेज वगैरह में फूलों का बहुत जरूर होता है तो उसका बड़ा मार्केट है मुझे पता नहीं था वहां पे जाके यह सब पता चला तो फ्लोरीकल्चर का जो एक्सपर्ट होगा वह खेत में जाकर के वह किसान से बात करेगा फिर वह जो अकाउंटेंट होगा तो अपना यहां पे एक लोकल बॉडी बनाया हुआ था विवेकानंद सेवा संघ बोल कर के उसके अकाउंट वगैरह वो सब देखे सुपरविजन करेगा और इंस्पेक्शन करेगा ऐसा एक ही गांव में चार पांच रिसोर्स पर्सन अपने काम में लग जाते थे और मैं घूमते घूमते देखता रहता था ओवरऑल सुपरविजन करता रहता था फिर उस काम गांव में काम खत्म हुआ चलो नेक्स्ट विलेज चलो नेक्स्ट उसके बाद में दोपहर को 121 बजे जहां प भी जगह मिली कभी खेत में ना कि कभी किसी किसान की झोपड़ी में ना कि कभी किसी जंगल में जहां पे भी नदी के किनारे जगह मिली बैठ कर के खाना खा लिया टिफिन वगैरह लेकर आते थे गांव वाले भी अपने कुछ कुछ तैयार रखते थे तो फिर वहां पर खाना खाकर फिर निकल पड़े तो रात को कभी-कभी आते-आते 9:00 बज जाते 10:00 बज जाते आश्रम में पूरे दो ढाई साल तक कंटीन्यूअस मेरा यह रूटीन रहा था तो वह मेरे भीतर में एक था रजस कि कार्य करना है कर्म करना है स्वामी जी ने कहा है कि और खास करके व गांधी जी ने जैसे कहा था कि पढ़े लिखे लड़कों को गांव में जाना चाहिए गांव में जाकर कर्म करना चाहिए तो यह सब मेरे माइंड में था स्वामी जी गांधी जी वगैरह वगैरह तो सब एक साथ में वर्कआउट हो गया अभी ऐसा परिस्थिति है कि मुझे कर्म के मैंने कर्म में जाने की मेरी बिल्कुल कोई भी इच्छा नहीं है यहां पर भी जितने काम होते हैं तो मैं दूर ही रहता हूं बड़े महाराज जद बोलेंगे तुम इसको करो तो उसको करूंगा अदर वाइज सामने जाकर के मैं नहीं बोलूंगा यह काम मुझे दे दो वो मुझे दे दो जैसा मैं पहले किया करता था अभी यह सब चीजों से पूरा में दूर हो गया हूं तो देखिए कि यह जो वैराग्य का रास्ता है इस रास्ते पे हमको चलना है और वैराग्य का सबसे बड़ा उद्दीपक कौन है वह है यह मृत्यु अभी देखिए कि दो बात है कि काम ही नहीं करना सिर्फ यह सब आध्यात्मिक बातें करनी वह भी ठीक नहीं है क्यों क्योंकि हमारे भीतर में तमस और रजस है इन दोनों को हमको वर्कआउट करना होगा जब तक यह वर्कआउट नहीं होगा तब तक सत्व के रास्ते पे आप आगे नहीं बढ़ पाएंगे तो यह जो देखिए कि हमने यह कहा ना कि मां काली के भीतर में तीन तत्व इकट्ठा है एक तो है शक्ति तत्व दूसरा है यह रुद्र तत्व तीसरा है यह मातृ तत्व ये तीनों का इस तरह से एक एक संयोग या तो फिर यह कहेंगे कि त्रिवेणी रूपी संगम माहाकाली के भीतर में क्यों है तो यह शक्ति तत्व भी इसलिए है यदि आप शक्ति अर्थात की कर्म इस जगत में सात्विक कर्म आप नहीं करेंगे इस तरह का कर्म कि जो कि अपने चित्त को शुद्ध करें इस तरह का कर्म यदि आप नहीं करेंगे तो फिर आपके मन में वैराग्य का उद्दीपन होगा भी नहीं झूठ मुटका बैठ कर के मैं वैरागी हूं मैं वैरागी हूं पेट वैरागी जिसको कहते हैं ना स्वामी जी वहां हिमालय से कहीं पर जा रहे थे देखा कि एक साधु अपने सर पर कंबल डाल कर के न खर्राटे बुला रहा है तो स्वामी जी ने कहा खड़े करो इसको और इसके कंधे प लंगल डालो लंगल अर्थात कि हल हल जो देगा तब कहीं जाकर के उसका तमस जाएगा तब कहीं जाकर के वो बैठ कर के जब ध्यान कर पाएगा तो ऐसा भी नहीं है कि झूठ मुठ का तमस में डूब कर के वैराग्य का नाम लेकर के हम यह सब करें एक तो है शक्ति आराधना शक्ति आराधना का अर्थ है कि सात्विक कर्म अपना जो धर्म है वो धर्म तो आपको निभाना ही पड़ेगा देखिए कि यह जो वो जो महाराज है सुधीर महाराज अद्वैता आश्रम के अध्यक्ष उनका एक क्लिप अभी जैसे अपने ग्रुप में शेयर किया था तो उसमें महाराज जी क्या कहते हैं कि शक्ति की आराधना अर्थात कि दुश्मनों का संहार दुश्मनों पर विजय प्राप्त करना यह अहिंसा अहिंसा बोल कर के यदि हम बैठे रहेंगे और दुश्मन आ कर के हमारे संतानों की हत्या करेंगे अपनी स्त्रियों पर अत्याचार करेंगे तो थोड़ी ना वह अहिंसा का ठीक-ठीक पालन हुआ वो तो कायर मने वो कायरता हो गई एक्चुअली गांधी जी भी यही कहते हैं कि कायरता और अहिंसा में बड़ा डिफरेंस है किंतु क्या है गांधी जी को बहुत ज्यादा मिस इंटर किया गया है तो जो भी है यहां पर यह जो वीर भाव का जो प्रदर्शन है धर्म युद्ध है वह तो हमको युद्ध करना ही करना है अदर वाइज भगवान कृष्ण अर्जुन को क्यों कहेंगे तुम जाओ युद्ध करो देखिए कि अपना धर्मशास्त्र कितना प्रैक्टिकल है यह जो बाकी जद धर्मशास्त्र में अभी बुद्ध के धम्म पद हमने पढ़ा धम्म पद में बार-बार यह जो वैराग्य के बारे में कहा जा रहा है अभी देखिए कि मैं चित्र को देखता भी था और मुझे बड़ा आनंद भी आता था किंतु वह आनंद मुझे कब आता था पता है जद मैं जद अपने घर से सीधा यह ट्रेनिंग सेंटर में पहुंच गया होता तो मैं वहां पर कभी टिक नहीं पाता क्योंकि मैंने ऐसा हुआ भी मैं जब वहां पर जॉइन करने के लिए गया मेरे मन में यह सब था कि गांव में जाकर काम करना है ट्राइबल डेवलपमेंट करना है यह वो और वहां पर जाकर देखा कि यहां पर तो बैठ कर के जब ध्यान होता है शास्त्र चर्चा होती है पूजा पाठ होता है और ऑफिस में बैठक आपको अकाउंट वगैरह या तो डाटा एंट्री जैसा कुछ करना है छोटा-मोटा मैं बड़ा ही परेशान हो गया मैंने कहा भी इस तरह से तो स्वामी जी का मेरा अंडरस्टैंडिंग नहीं है स्वामी जी तो कहते हैं कि कितना बड़ा-बड़ा काम करने का गरीब लोगों की सेवा करने की क्या यह सब स्वामी जी कहते और यहां पर तो बड़ा ही मने एक क्या कहेंगे एक तामसिक लग रहा है मुझे यहां का जीवन तो उस समय मुझे वह सब तामसिक लगता था किंतु मैं जब रांची में गया मुझे मौका दिया गया ठीक है तुम जाओ रांची में जाकर के सेवा करो आश्रम में रह कर के तो वो मैंने की और वापस आया तब मैं कहीं जाकर ट्रेनिंग सेंटर में शांति से रह पाया था तो देखिए कि वैराग्य उद्दीपक शास्त्र तो है बुद्धिज्म वगैरह बहुत सारे धर्म के किंतु प्रैक्टिलिटी उसमें नहीं है प्रैक्टिलिटी अपने हिंदू धर्म में है हिंदू धर्म कहता है कि सत्व के साथ में रजस और तमस भी हमारे भीतर में है और रजस और तमस को जद य आप वर्कआउट नहीं करेंगे तो वैराग्य के सत्व के रास्ते पर जाने के लिए आप एलिजिबल नहीं होंगे यह एलिजिबिलिटी या तो फिर यह लाकात जिसको कहते हैं वह डेवलप करने के लिए सबसे पहले तो तमस और रजस को आपको वर्कआउट कर देना पड़ेगा यह काशीपुर में ही ठाकुर का आखिरी समय था उस समय ठाकुर सभी भक्त उनके सामने त्यागी गृहस्थ सब बैठे हुए थे तो उस समय ठाकुर के कहते हैं कि देखो किसी किसी के मन में ऐसा था कि वह संसार करें स्त्री सह स्त्री संग करें वह सब वासना एं अभी सबकी समाप्त हो गई है अभी यहां पर जो भी है सब त्यागी है कोई बाहर से त्यागी है यानी कि भीतर से बाहर से दोनों तरह से त्यागी है कोई कोई भीतर से त्यागी है और जब ठाकुर यह कह रहे थे तब मास्टर महाशय लिखते हैं कि राखल और मास्टर महाशय दोनों इस बात को सुनकर के थोड़ा सा हंसे क्यों हंसे क्योंकि दोनों के मन में यह इच्छा थी स्त्री संग करने की राखल अर्थात की स्वामी ब्रह्मानंद उनको ठाकुर ने घर भेजा उनकी पत्नी थी उनका एक लड़का भी हुआ बाद में वह फिर ठाकुर के पास वापस आए और जब वापस आए तो संपूर्ण रूप से ठाकुर को समर्पित हो गए थे ठाकुर उसी समय कहते हैं कि देखो राखल जब पहले था तो मैं बड़ा डर डर करके व रहता था कि मैं किसी को और कुछ अभी तो ठाकुर के केस पास में प्रसाद वगैरह आता है तो ठाकुर यदि किसी को प्रसाद देंगे तो राखल के डर के मारे में कहता था राखल को पहले तुम खाओ बाद में सबको देना क्यों क्योंकि राखल का ठाकुर के ऊपर में एक अधिकारत्ती राखल का ये राजा महाराज का थोड़ा बहुत हो गया था कि राजा महाराज क्यों मेरे साथ में ठाकुर क्यों मेरे साथ में ही बात नहीं करते बाकी सबके साथ में क्यों करते हैं बाकी सबको छोड़ो मैं तो उनका मानस पुत्र हूं मैं तो उनका संतान हो मेरे ही साथ में बात करनी चाहिए ऐसा एक अधिकारत्ती जितने जिन-जिन लोगों का ठाकुर के ऊपर में इस तरह से अधिकारी तो आया है उन सबको वहां से जाना पड़ा है वह चाहे भैरवी ब्राह्मणी हो ना कि वह चाहे हृदय हो ना कि आखिर में यह राजा महाराज हो राजा महाराज को भी वहां से जाना पड़ा ठाकुर ने कहा मैंने उसको वृंदावन भेजा फिर उसकी अकल ठिकाने आई फिर वह स्त्री के साथ में भी रहा और फिर अभी यहां पर आया है अभी संपूर्ण रूप से त्यागी संपूर्ण रूप से ठाकुर को समर्पित है तो वो वर्कआउट आपको अपनी सिस्टम में से करना होगा इसीलिए यह शक्ति आराधना क्यों यदि जगत में कोई भी कार्य करना है तो आपको शक्ति की आराधना करके वह कार्य करना है जिससे कि धर्म के आधार पर वह कार्य हो अधर्म के आधार पर यह ना हो कहा जाता है कि भगवान राम ने भी जगदंबा की आराधना की थी रावण के साथ में युद्ध करने से पहले तो यह जो पूरा एक कांसेप्ट है स्वामी जी एक पैसेज में बड़ा ही सुंदर रूप से उसका डिस्कशन करते हैं वह पैसेज में थोड़ा सा स्वामी जी के कंप्लीट वर्क में से पढ़ता हूं स्वामी जी क्या कहते हैं काली वरशिप इज नॉट ए नेसेसरी स्टेप इन एनी रिलीजन काली वरशिप अर्थात की मां काली की आराधना किसी धर्म का आवश्यक अंग नहीं है द उपनिषद टीचर्स ऑल रीज ऑफ रिलीजन धर्म में जो कुछ भी है वह सब कुछ उपनिषद के द्वारा ही हमको सिखा दिया गया है बट काली वरशिप इज माय स्पेशल फेड काली वरशिप मेरा एक हॉबी है फेड अर्थात कि मेरा एक शौक है मेरा एक विशेष शौक है यू नेवर हर्ड मी प्रीच इट और रीड ऑफ माय प्रीचिंग इट इन इंडिया आप कभी भी मेरे मुंह से मां काली की उपासना के बारे में कभी कुछ सुनेंगे नहीं ना ही आप कभी यह पढ़ेंगे कि भारत में मैंने माहाकाली की उपासना के बारे में कुछ कहा है या माहाकाली की उपासना का प्रचलन किया है आई ओनली प्रीच व्हाट इज गुड फॉर यूनिवर्सल ह्यूमैनिटी मैं वही सिखाता हूं जो कि जन साधारण के लिए फायदेमंद है व्हाट इज गुड फॉर यूनिवर्सल ह्यूमैनिटी सबके लिए जो अच्छा है वही मैं सिखाता हूं और सबके लिए अच्छा क्या है य जो उपनिषद में सिखाया हुआ अद्वैत वेदांत किंतु महाकाली की जो वरशिप है मैं मेरा एक विशेष उसके प्रति मेरा आकर्षण है इफ देयर इज एनी क्यूरियस मेथड व्हिच अप्लाइज एंटायस इट अ सीक्रेट एंड देर इट एंड्स जद कोई एक विशेष मेथड होगी विशेष उपासना होगी जो कि सिर्फ मुझे जो कि सिर्फ मेरे लिए ही वह है तो मैं उसको संपूर्ण रूप से सीक्रेट रखता हूं गोपनीय रखता हूं और वह बात वहीं पर समाप्त हो जाती आई मस्ट नॉट एक्सप्लेन टू यू व्ट काली वरशिप इज एज आई नेवर टोट इट टू एनीबडी मैं आपको माहाकाली की उपासना क्या है वह नहीं सिखाऊंगा क्यों क्योंकि मैंने उसको और किसी को भी सिखाया नहीं है रिलीजन इज दैट व्हिच डज नॉट डिपेंड अपॉन बुक्स और टीचर्स और प्रोफेट्स और सेवियर्स धर्म वो है जो कि कोई भी किताब कोई भी शिक्षक कोई भी आचार्य कोई भी प्रोफेट या तो किसी भी अवतार के ऊपर में डिपेंडेंट नहीं है वही सही सही धर्म है एंड दैट व्हिच डज नॉट मेक अस डिपेंडेंट इन दिस और इन एनी अदर लाइव्स अपॉन अदर्स और धर्म वही है जो कि हमको और किसी व्यक्ति के ऊपर में डिपेंडेंट नहीं करवाता आधारित नहीं करवाता इन दिस सेंस अद्वैत जम ऑफ द उपनिषद इज द ओनली रिलीजन इस अर्थ में देखें तो उपनिषदों के द्वारा सिखाया गया अद्वैत वेदांत ही सर्वश्रेष्ठ रिलीजन है बट सेवियर्स बुक्स प्रोफेट सेरेमोनियल्स एटस हैव देयर प्लेसेस परंतु यह जो अवतार है किताबें है संत है विधि विधान पूजा वगैरा है पूजा पाठ इन सबका भी एक स्थान है समाज के भीतर में हमारे लिए धे में हेल्प मेनी एस काली वरशिप हेल्प्स मी इन माय सेक्युलर वर्क यह विधि विधान पूजा पाठ वगैरह बहुत सारे लोगों के लिए उपयोगी फल परसु साबित हो सकते हैं जैसे कि माहाकाली की उपासना मेरे लिए फायदेमंद साबित हुई है दे आर वेलकम और इसके लिए वह उनका भले ही वह हमारे साथ में रहे देखिए इस पैसेज में स्वामी जी किस तरह से काली पूजा के बार में कहते हैं कि काली पूजा मैंने किसी को सिखाई नहीं है या तो फिर मैं सिखाने वाला भी नहीं हूं क्यों क्योंकि सही सही धर्म वही है जो कि हमको किसी के ऊपर में डिपेंडेंट ना बना दे हमको एडिक्टिव ना बना दे वरना जद यह पूजा पाठ है या तो फिर यह अवतार है ना कि यह किताबें है सद ग्रंथ है एक बार यदि हम उसका पाठ प्रारंभ करेंगे तो हम एडिक्टिव हो जाएंगे फिर आंख बंद करके अकेले बैठने का और साथ में कुछ ना हो ना ही यह ईश्वर की मूर्ति अपने सामने हो ना ही यह कथामृत अपने पास में हो ना ही यह ठाकुर की यह जो स्मृति कथाए जिसका हम पाठ करते आ रहे हैं चिंतन करते आ रहे हैं इतने दिनों तक वो भी अपने साथ में ना हो संपूर्ण रूप से नि संग जैसे कि स्वामी जी परिव्राजक के रूप में पूरे भारत में घूमे थे बस पहनने के वस्त्र है और हाथ में एक यष्टि है वो जहां पर भी खाना मिला खा लिया जहां पे भी पीने को मिला पानी वह पी लिया गाछ तले के नीचे में पेड़ के नीचे में बैठ कर के रात बिता दी यह जो संपूर्ण रूप से ईश्वर पर निर्भर होकर के रहना जो है जीवन वही सही सही आध्यात्मिक जीवन है ईश्वर के अलावा या तो अपने जो आध्यात्मिक आदर्श है इसके अलावा और किसी भी व्यक्ति के ऊपर में किसी भी चीज के ऊपर में आप डिपेंडेंट हो गए तो वो एडिक्शन है आपको एक समय तक आपको साथ में रहेगा किंतु वहां से जो अल्टीमेट लीप है अद्वैत वेदांत में उसको मैं भीतर में आपको प्रवेश नहीं करने देगा जैसे कि कल हमने डिस्कस किया था कि जब ठाकुर के सामने वेदांत साधना के समय मां काली की मूर्ति आ गई तो ठाकुर ने यह ज्ञान असी से ज्ञान रूपी खड़ग से उसको भी छेदन कर दिया उसका भी दो उसके भी दो टुकड़े कर दिए तब कहीं जाकर के ज्ञान मार्ग के भीतर में उनका मन हूहू करके ऊपर उठ कर के अद्वैत अनुभव के भीतर में निर्विकल्प समाधि में स्थित हो गया तो यदि आध्यात्मिक जीवन की सर्वोच्च अनुभूति निर्विकल्प समाधि और उसके भी बाद की जो बात है एक बार निर्विकल्प समाधि प्राप्त करने के बाद में यह जगत पूरा ईश्वर वही ब्रह्मण का बना हुआ है यह अनुभूति लेकर के आनंदमय होकर के जगत में वापस आना और जगत में रहना बिना किसी तरह के वो ना ही हमारे भीतर में कामना हो ना ही कोई वासना हो संपूर्ण रूप से आनंद में इस जगत में रहना परमहंस की अवस्था में इस जगत में रहना वो उससे भी उच्च अवस्था है किंतु यह दो अवस्था कब होगी निर्विकल्प समाधि कब प्राप्त होगी निर्विकल्प समाधि में से वापस आकर के संपूर्ण आनंद में मग्न होकर के जगत को ईश्वर के रूप में देख कर के हम जगत में कब रह पाएंगे जीवन मुक्त या तो फिर परमहंस के रूप में कब रह पाएंगे वो तभी होगा जब भी यह सब चीजों के ऊपर में से अपना डिपेंडेंस चला जाए शुरुआत भले चाहे इनको साथ में लेकर के करना है कथामृत का पाठ हम दैनंदिन भले ही करें ठाकुर की पूजा आराधना मंदिर में जाना सत्संग अटेंड करना यह सब हम प्रतिदिन भले ही करें किंतु एक समय आएगा ऐसा नहीं है कि इन सब चीजों से संपूर्ण रूप से मुक्त हो जाना है किंतु जैसे ठाकुर कहते हैं ना कि हमको बीच-बीच में कहीं रिट्रीट प चले जाना है बिना किसी संग के बिना किसी आधार के इस रिट्रीट में रहना है देखना है अपने को टेस्ट करना है कि मेरे पास में कोई भी संबल नहीं है मेरे पास में कोई भी सहारा नहीं है तो भी मैं क्या इस तरह से संपूर्ण ईश्वर मय होकर के संपूर्ण आत्मज्ञान के यह उच्च आयाम को स्थिर होकर के मैं रह पाऊंगा कि भी नहीं यह हमको उस समय टेस्ट करना है तो यह हो गया कि अल्टीमेट यह आपका धर्म अद्वैत वेदा किंतु साथ-साथ में ही स्वामी जी क्या कहते हैं काली वशिप इज माय स्पेशल फेड काली पूजा काली की उपासना मेरा एक विशेष रूप से होबी है ना कि मेरा एक विशेष रूप से शौक है क्यों क्योंकि स्वामी जी कहते हैं कि यदि शक्ति की उपासना करनी है तो वह मेरा जो सेकुलर वर्क है उसमें वह बड़ा ही हेल्पफुल है ध मे हेल्प मेनी एस काली वरशिप हेल्प्स मी इन माय सेकुलर वर्क काली वरशिप मुझे अपने सेकुलर कर्म में हेल्प करती है किस तरह से जैसे यह आत्मन मोक्षार्थम जगत हिताय च यदि जगत का हित करना है तो आपको मां काली की उपासना के साथ में ही करना है क्यों क्योंकि जगत का हित करते-करते यह हम बहुत सारी चीजों में फंस जाए ऐसा हो सकता है जैसे कि मैं राची के दिनों का ही एक उदाहरण दूं वहां पर हमारे साथ में एक डॉक्टर थे मैं मैं जब राची गया था था उस समय तो यह डॉक्टर ने हमारा साथ छोड़ दिया था किंतु मैंने बाकी सब हमारे वॉलेटिवृपालेम समर्पित किया ऐसा बहुत लोगों से मैंने सुन के रखा था तो मैं बड़ा ही इंप्रेस था और एक दिन क्या हुआ कि गवर्नमेंट का एक वैक्सीनेशन का प्रोजेक्ट चल रहा था तो सभी जितने भी एनजीओस थे उस एरिया के उन सबको हमको एक जगह पर गवर्नमेंट ऑफिस में बुलाया गया था और वहां पर हमारे साथ में चर्चा विचारणा करके वह सब काम का डिस्ट्रीब्यूशन करने वाले थे तो मैं वहां पर जाकर के बैठा था रामकृष्ण मिशन को रिप्रेजेंटेटिव होकर के और एक आदमी आया एक व्यक्ति और आकर के मेरे साथ में बोलने लगा कि क्या महाराज जी कैसे हैं तो मैंने सोचा कि ये एनजीओ वाले तो आपस आपस में पहचानते ही होंगे इस तरह से बार-बार तो साथ में काम करना होता है तो मैंने कहा अच्छा ठीक है आपका नाम क्या है तो उसने उसका नाम बताया तो मैंने कहा अरे मैं तो आपको पहचानता हूं आपकी बड़ी प्रशंसा सुनी है बोलकर के मैं तो एकदम खुश खुश होकर के उसके साथ में बात कर रहा हूं तो उसका थोड़ा देखा कि थोड़ा सा जैसे कि नाराज हो गया है इस तरह से फिर मैं मुझे कहने लगा आपके वो जो महाराज है वह बिल्कुल किसी काम के नहीं है यह वोह संघ की साधुओं की निंदा करना उसने चालू कर दिया तो मैं तो इतना आश्चर्य चकित हो गया मैंने कहा भाई हमारे यहां पर आश्रम में मैं जितने लोगों के साथ बात करता हूं तुम्हारी प्रशंसा ही करते हो और तुम हो कि य साधुओं की निंदा करते हो तुमने क्या सीखा त्याग करके आश्रम में रह के तो मुझे बोलता है मेरा उस महाराज के साथ में झगड़ा हो गया इसलिए मैं छोड़ के चला गया अभी देखिए आपके वहां पर मुझे कुछ मिलता भी नहीं था पांच 5000 10000 ऐसा कुछ देते थे यहां पे इन लोगों ने दूसरे एनजीओ में जाकर के मैंने जॉइन कर लिया है तो मैं अभी इनका डायरेक्टर हो गया हूं और मुझे इतना रुपया देते हैं तो मैंने कहा हे राम कहां से आसमान से गिरा खजूर पे अटका ऐसी इसकी अवस्था है यदि उसको पैसा ही कमाना था तो सीधा वह कॉलेज में से अपना प्रैक्टिस चालू कर देता इतना लाखों लाखों रुपया कमा लेता अभी व है कि 10 12 हज के लिए एक छोटी-मोटी डायरेक्टरशिप के लिए छोटे-मोटे एनजीओ में वो अपना जीवन तो उसने डाल दिया पता नहीं अभी कि मैंने यहां पर आकर गलती कर दिया यह सब बोल रहा है और ऊपर में से पैसा भी नहीं मिला छोटी-मोटी डायरेक्टरशिप लेक के बैठ गया है ऊपर से साधुओं की निंदा करता है क्या यह जीवन का अर्थ रहा तो देखिए कि आपको यदि सेवा भी करनी है यदि जगत के कोई कार्य भी करना है तो शक्ति की आराधना के साथ में करना है वहां अदर वाइज कहां पे पैर फिसल गया और गिर गए सर के मैंने अपने चेहरे के बल पे और फिर पता नहीं जीवन पूरा नष्ट हो जाएगा इ तो नष्ट ततो भ्रष्ट माया मिली न राम दोनों तरह का हो जाएगा नाही धन वैभव मिला ना ही ईश्वरीय कोई आध्यात्मिक बेनिफिट हमको मिला एक दोनों ओर से रिग्रेट हमारे जीवन में आके रह गई तो यदि आपको कोई भी सेवा कार्य करना है जगत का कोई भी कार्य करना है तो मां काली की उपासना आवश्यक है वो हमको गलत रास्ते पर जाने से वो हमको रोकेगी हमेशा देखिए कि यह रुद्र तत्व और शक्ति तत्व दोनों साथ-साथ में है एक और तो वह रुद्र तत्व है कि हमको बताता है कि मृत्यु अव शंभावी है वैराग्य को पकड़ के रखो दूसरा कि यदि कर्म भी करना है तो शक्ति की आराधना करके कर्म करो जिससे कि कर्म में कहीं हम गिर ना जाए फिसल ना जाए और तीसरा है मातृ तत्व मातृ तत्व क्यों जिस दिन हमारी आंख खुल गई कि हां ईश्वर ही सत्य है जगत अनित्य है उस समय जयदिश प्रारंभ करेंगे तो बालक भाव और यह मातृ भाव इसी भाव को लेकर के ही तो ठाकुर साधना में सिद्ध हुए तो आध्यात्मिक जगत में भी यदि आगे बढ़ना है तो मातृ भाव से माहाकाली की उपासना करनी है जगत का कर्म करना है कोई भी तो शक्ति की आराधना करके कर्म का प्रारंभ करना है और वैराग्य का उद्दीपन लाना है तो यह मृत्यु रूपा काली तो हमेशा उपस्थित है सब समय महामारी विश्वयुद्ध यह वह उस सब से हमको समझा देती है कि जगत में यदि बहुत ज्यादा डूब जाओगे तो आखिर में तो हमको लाथ ही खानी है माने कर्म कर दो उसका कोई प्रश्न ही नहीं है रजस और तमस को वर्कआउट कर दो किंतु आखिर में तो वैराग्य और त्याग के रास्ते पर आगे बढ़ना ही हो तो आज यही तक अभी कल तो छुट्टी है अब मिलेंगे मंडे को ओम शांति शांति शांति हरि ओम तस्त श्री राम कृष्णर्पण मस्तु किंतु प्रारंभ जो है वो कर्तृत्व भावना से ही होगा अब मैं सेवा कर रहा हूं यह भाव नहीं होगा तो मैं फिर सेवा भी नहीं कर पाऊंगा क्योंकि क्या है कि जीवन का प्रारंभ है ना रजस और तमस से ही होता है सत्व तो जर्नी है तो जैसे स्वामी जी ने खुद ने अ जब आखिरी आखिरी जो पत्र लिखे थे उन्होंने जोसेफाइन मैक्लाउड को लिखे हुए पत्र में वगैरह में उन्होंने कहा है कि अभी मेरे जो काम करने की जो इच्छा थी सब चली गई है अब जैसे कि मैं फिर से वही नरेण हो गया हूं जो कि पंचवटी के तले में बैठ करर के श्री राम कृष्ण की बातें मंत्र मुग्ध होकर के सुना करता था तो व एक कर्तृत्व की भावना थी कि मैं जगत का कुछ कल्याण करूं बोलकर के उन्होंने यह सब किया था बाद में निश्चय शक्ति साधना क्या है कि इट्स अ जर्नी कि इवेंचर हंकार की ओर ले जाएगी किंतु प्रारंभ में ही जद निरह काता होगी व तमस ही है वह सत्व नहीं है सो दिस वी हैव टू अंडरस्टैंड कि रजस एंड तमस आर एसेंशियल पार्ट ऑफ लाइफ मने इसको एक्सेप्ट नहीं करना फिर वह अपनी आंखों में धूल झोंकने के बराबर यदि कोई कहेगा कि मेरे में अहंकार है ही नहीं वह तो झुठ मुटका हो गया अहंकार को वर्क आउट करना है अहंकार के बिना तो कैसे जगत चलेगा जैसे जद आप वीडियो गे खेलते हैं तो बात सिर्फ यह नहीं है कि वीडियो गेम खेलना उसमें वह लेवल होते हैं फर्स्ट लेवल सेकंड लेवल थर्ड लेवल तो लेवल को आपको पार करना है जैसे परीक्षा देते हैं पढ़ाई करते हैं तो बात सिर्फ यह नहीं है कि पढ़ाई करना है हमको ईयर एंड में परीक्षा देकर के नेक्स्ट स्टैंडर्ड में नेक्स्ट कक्षा में ऊपर में जाना है तो बात सिर्फ यह नहीं है कि कर्म करना है कर्म का एक कंक्लूजन आना है कर्म को करके समाप्त करना है आप यदि लाखों साल तक कर्म करते भी रहे तो हो सकता है कि कर्म का कंक्लूजन ना आए जैसे कोई कोई लड़के होते हैं परीक्षा दे एक ही क्लास में तीन-चार साल बिता देते हैं मैं पढ़ता था तो नाइंथ या एथ स्टैंडर्ड में एक लड़का था हमारे से दो-तीन साल बड़ा था उम्र में बोलते हैं कि न साल से परीक्षा देकर के फेल ही होता रहा है तो आखिर में इसको निकाल दिया था स्कूल में से तो वो परीक्षा पास करके यानी कि जो कर्म करते हैं कर्म का एक कंक्लूजन लाना है उसका एक परि समाप्ति होना है उसका एक जैसे कि वो मैच्योर होती है ना एफडी और उसका आपको मिलता है य तो इस तरह से स मैच्योर होकर के उसका बेनिफिट लेना है सिर्फ कर्म करना नहीं है सो वई कि यह दो अप्रोच है इसमें डिफरेंस क्या है पहला वाला अप्रोच आप जद करेंगे कि कैसे भी करके संसार का कर्म समाप्त करके मैं चला जाऊं यहां से तो हो सकता है कि उस समय हम कर्म में जो डालना है हमको मन प्राण डाल कर के जो उसको एक कंक्लूजन की ओर ले जाना है वह नहीं ले जा कर के ऊपर ऊपर से ही तमस के भीतर में ही रहे क्योंकि कर्म के साथ में यदि इसका करें रिलेशन तो परीक्षा पास करनी है स्कूल में यहां पे रजस और तमस को वर्कआउट करना है यदि रजस और तमस को वर्कआउट करके सत्व के लेवल पर नहीं गए तो कर्म करने का कोई अर्थ ही नहीं है बहुत सारे लोग ज्यादातर लोग कर्म तो करते ही रहेंगे किंतु रजस तमस वर्कआउट नहीं होगा सत्व में वह ग्रेजुएशन नहीं करें फिर वे लोग कहेंगे कि बहुत 10 साल कर्म कर दिया अभी मैं त्याग करता हूं तो रजस तमस तो वैसे का वैसा ही है आपने क्या त्याग किया तो स्वामी जी जब यह प्रशंसा करते हैं कर्म की ट व्हाट डज दैट मीन स्वामी जी को पढ़ेंगे तो उत्साह में आकर के जैसे मैं खुद का उदाहरण मन प्राण डाल दिए मन प्राण डाल कर के कर्म किया फिर आखिर में मुझे लगा कि नहीं यह हो गया अभी मतलब भीतर में से एक आ गया कि हो गया इसको छोड़ो अभी तो क्या है कि वो वर्कआउट कर देना वो वीडियो गेम का लेवल क्रॉस कर देना है परीक्षा पास करके ग्रेजुएट हो जाना है वह तभी होगा जब भी हम मन प्राण सब बिना संदेह के लगा देंगे जब तक मन के भीतर में यह रहेगा नहीं नहीं कैसे भी करके इसको खत्म करो फिर मुझे और कहीं पर जाना है तो हो सकता है कि हमारा रजस तमस वर्कआउट ना हो कर्मनाशा नदी तार भीतर झाप लेही बांची ना कर्मनाशा नदी है उसके भीतर में जंप लगाने से ही बच गया फिर कहते हैं आमी मोली ले खुची बे जंजाल यदि मेरा अहम नाश हो गया तो जंजाल ही मिट जाए किंतु वो अहम नाश सिर्फ बोलने से नहीं होगा ऊपर ऊपर से तैरने से नहीं होगा आपको डुबकी लगानी पड़ेगी मैंने स्वामी जी है ना साइकोलॉजी बड़ा समझते थे पता है कि भारत में इतना तमस है कि बोलेंगे दोनों एक साथ-साथ में करो थोड़ा यह करो थोड़ा वो करो तो इन लोगों का होने वाला नहीं है डूब जाओ इसमें जी झान लगा दो इस जन्म में मुझे मुक्ति चाहिए ही नहीं हजार जन्म तक मैं बस जगत कल्याण ही करता रहूंगा बोल कर के ऐसा स्ट्रांग डोज दिया है कि फिर हम लोग उसको वर्कआउट करके ही छोड़ेंगे हां वो जो नारियल जो होता है ना नारियल वो जब मैच्योर हो जाता है उम्र बढ़ जाती है उसकी तो भीतर का वो अपने से सेपरेट हो जाता है उसको जोर करके सेपरेट नहीं करना पड़ता है जोर का वैराग्य है किसी काम का नहीं है ये ठाकुर के पास में ही देखिए वह जो पहली दूसरे ही दर्शन में वोह कहते हैं ना उसका भाई यहां पर आया था उसके बीवी बच्चों को घर पर रख के आया है तो मैंने कहा डांटा उसको जाओ घर जाओ बीवी बच्चों की संभाल रखो क्यों उसको ऐसा कहा और क्यों मास्टर महाशय को कहते हैं कि तुम यहां पे आके रहो क्रिसमस के दिनों के दरमियान मास्टर महाशय वहां प आकर के रहे थे तो मास्टर महाशय को सामने से बुलाया आक के रहो और उसको कहा जाओ तुम घर जाओ क्यों क्योंकि वो वैराग्य की मने वो कर्मा के किस लेवल पे है कर्मा वर्कआउट हो गया है सत्व रूपी सूर्योदय होने ही वाला है तब वो आमंत्रण करते हैं अदर वाइज तुम जाओ घर जाओ वर्क आउट कर दो इसको इसीलिए तो शक्ति की आराधना स्वामी जी ने क्या कहा मैं काली वरशिप इज बेनिफिशियल टू मी इन माय सेकुलर वर्क क्योंकि देखिए ये खतरा तो देह धारण करके ही तो खतरा है ना पंच महाभूत फाद ब्रह्म पड़े का दे पंच महाभूत के इस चक्कर में पड़ने से ब्रह्म भी रोने लगता है तो स्वामी जी तो कौन है तो शक्ति की आराधना इसलिए जब कर्म करते हैं तो शक्ति की आराधना साथ में रखनी है जिससे कि विवेक वैराग्य बैकग्राउंड में जगे रहे दो तरह से है कर्म एक जैसे आपने कहा कि ऊपर ऊपर से कर्म करना है किंतु मन वैराग्य की ओर जाता है उससे प्रॉब्लम ये है कि कर्म वर्कआउट नहीं होगा दूसरा है कि कर्मों में ऐसे डूब गए कि फई उसी के चक्रवत में पड़कर के खत्म हो गए तो शक्ति आराधना जो है वो बैकग्राउंड में विवेक वैराग्य को जागृत करके रखता है बहुत ज्यादा भीतर में जैसे मेरे ही साथ में एक समय मैंने ऐसा सोचा था कि मैं इतना कर्म करना चाहता था और फिर बाहर से तो मैं ब्रह्मचारी के वस्त्र पहनता था आश्रम में रहता था तो दिन भर तो मैं गांव में रहता था रात को तो मुझे आश्रम में ही सोना है यह पक्का नियम है साधुओं को रात को आश्रम में ही सोना है भले चाहे ऑफिशियल साधु हो कि अनऑफिशियल साधु तो मैंने ऐसा सोचा था कि यह रिस्ट्रिक्शन मेरे पे है तो बेटर है कि मैं आश्रम को ही छोड़ दूं गांव में ही जाक के रहूं बस यह थोड़ा बहुत रिश्ता है संघ के साथ में इसको भी मैं काट दूं तो ऐसा मैंने बड़ा सीरियसली सोच के रखा था और यदि मैं ऐसा करता तो वापस कभी नहीं आ पाता क्योंकि एक बार बाहर रहना शुरू किया फिर यह लोग मुझे कभी भी वापस नहीं लेंगे यह पक्का पता था मुझे तो यह जो बॉर्डरलाइन की परिस्थिति थी कि मैं जाऊं छोड़ के जाऊं और वह एक कदम ले लिया तो फिर वापस कभी नहीं आता तो देखिए कि उस समय क्या था कि मैं बंगाली में ऑलरेडी सीखा हुआ था बेलूर मठ में तो मैं बंगाली किताबें पढ़नी शुरू कर दी थी ये लीला प्रसंग है वगैरह वगैरह तो उसमें से जो थोड़ा बहुत जो विवेक जागृत था मेरे मन में उससे मुझे लगा कि देखिए कि मैं जद बाहर में जाकर रहूंगा ना तो ये मेरा वांच वगैरह सब अटक जाएगा क्योंकि मैं बहुत ही ज्यादा फिर इवॉल्व हो जाऊंगा तो एटलीस्ट मैं रात को आश्रम में आता हूं तो रात में जो पढ़ाई लिखाई करता हूं वह तो एक मेरा एक सिंबल है व भी तो मुझे चाहिए बोलक के मैं वो एक लाइन क्रॉस नहीं की बॉर्डर लाइन तो फिर मेरे लिए वापस आने का रास्ता खुला रहा तो यह शक्ति की आराधना यानी कि नॉट लिटरली मां काली की आराधना किंतु यह जो भी उपासना तत्व है ईश्वर श्री राम कृष्ण देव हो स्वामी जी हो मां हो ना कि कोई भी अपने इष्ट हो कोई भी तरह की उपासना आराधना हमको वह बॉर्डर लाइन क्रॉस करने से रोकती है किसी के लिए अपने लिए मां शारदा है अपने को काली तक जाने की जरूरत नहीं [हंसी] है जी जान से काम करो किंतु साथ में इसको जागृत करके रखो इससे क्या होगा बॉर्डर लाइन नहीं क्रॉस करने देगा और जब वर्क आउट हो जाएगा अपना कर्मा तो फट करके हमको यह वापस खींच लेगा मुझे याद है वो दिन कि मैं एकदम बॉर्डर लाइन प था आखिरी आखिरी दिनों में मैंने ऐसा सोच लिया था कि बहुत हो गया अभी छोड़ के जाना है क्योंकि कर्म हो गया समाप्त किंतु अभी क्या करूंगा अ साधु होना तो संभव नहीं मैं तो स संघ छोड़ के बैठा हूं मैं रात को वहां पे था अपना एक यह है बहुत बड़ा फार्म है ट्राइबल एरिया में रात को 10 बजे मुझे फोन आया कि तुमको बेलर मठ बुला रहा है अभी का अभी आ जाओ मैं इतना आ चकित हो गया था कैसे ये हो गया बाद में मुझे पता चला कि बाकी जो साधु थे हमारे सीनियर वो बैकग्राउंड में सब ऑब्जर्वेशन कर रहे थे और नजर रख रहे थे तो उ उनको जैसा लगा कि इसका हो गया है तो उसको बुला लो वापिस आई डन नो एट दैट टाइम उ मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ था किंतु देखिए कि यह जो मैंने एक बंगाली सीख कर के यह स्मृति कथाएं पढ़ते रहना जो मैंने चालू रखा था दैट वाज कि उसने मुझे बचा लिया आखिरी दिनों में नहीं व प्योर आनंद से मैं पढ़ रहा था आनंद आ रहा था तो पढ़ रहा था उस समय ऐसा और कुछ नहीं था