Invocation
ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः ठाकुर का वह जो फेमस सेइंग है और टीचिंग है ब्रह्मा और शक्ति भेद जब स्थिर होता है तब मैं उसको ब्रह्म कहता हूं और जब कार्य करता है तब मैं उसको शक्ति कहता हूं तो यह टीचिंग ठाकुर अपनी यह बात कथामृत में इतनी बार दोहराते हैं और जितनी भी बार मैं उसको पढ़ता हूं मैं उसके बारे में सोचता हूं कि अच्छा ऊपर ऊपर से देखते हैं तो ठाकुर का यह टीचिंग समझने में कोई बहुत मुश्किल नहीं है कि हां वैसे तो अद्वैत वेदांत की दृष्टि से देखें तो ब्रह्म सत्य और जगत मिथ्या किंतु ठाकुर कहते हैं कि वही ब्रह्म जब कार्य करता है तो शक्ति में परिणत होता है तो अभी यह बात अद्वैत वेदांत में बिल्कुल अस्वीकार्य है ऐसा नहीं है वह जो चंडाल की कहानी है कि जब शंकराचार्य उसको स्पर्श कर दिए तो उसने कहा कि आपके भीतर में जो ब्रह्मण है वही मेरे भीतर में है तो अभी सभी के भीतर में ब्रह्मण है यह बात तो अद्वैत वेदांत आसानी से एक्सेप्ट करता है और अद्वैत का अर्थ ही है कि दो नहीं एक ही है किंतु इसके पीछे का जदी ओवर ए लॉन्ग पीरियड ऑफ टाइम जो एक अजमन बिल्ड होता गया कि जगत को त्याग करके जगत जैसे कि मिथ्या है माया है या तो फिर अविद्या अज्ञान का बना हुआ है और फिर ब्राह्मण प्राप्ति के पीछे में ही जाना चाहिए ऐसा एक कल्चरल अजमन बन गया था क्योंकि शंकराचार्य का अद्वैत वेदांत मेनली यह मोनेस्ट्री कम्युनिटी के पास में ही सीमित रह गया और उसको वाइडर अपने जनसाधारण में गृहस्थ के बीच में इसका प्रचार नहीं हुआ गृहस्थ के बीच में या तो जनसाधारण में द्वैत या तो फिर विशिष्ट अद्वैत का ही ज्यादातर प्रचार हुआ है तो थिरी चाहे जो भी कहता हो अद्वैत वेदांत का उसका एक्चुअल इंप्लीमेंटेशन प्रैक्टिकली स्पीकिंग वह मोनेस्ट्री के पास में ही साधु सन्यासियों के पास तक ही सीमित रह गया और ऐसा मानने लगे लोग कि जगत उसका त्याग नहीं करेंगे तब तक हमको ब्रह्म प्राप्ति नहीं होगी तो अभी देखिए कि जब ठाकुर यह कहते हैं कि ब्रह्मा और शक्ति एक ही है एक दूसरे से अलग नहीं ही है जगत को मैं मिथ्या बोल कर के उड़ा क्यों दूंगा जैसे कि यह बेल का फल है बेल का फल यदि आप बेल के फल को किसको कहते हैं बेल का फल ऊपर में जो शेल है ऊपर में जो उसका आवरण है उसको हटा कर के उसका गर्भ भाग जो है उसी को क्या आप बेल का फल कहेंगे नहीं यदि ऐसा करेंगे तो ठाकुर कहते हैं कि ओजन कम पड़े जावे अर्थात कि वजन में वेट में वह कम हो जाएगा यदि आप बेल के फल का र का जो खाने वाला पदार्थ ही ग्रहण करेंगे और बाहर से उसको निकाल देंगे सब उसके ऊपर का आवरण तो उसका वेट कम हो जाएगा यानी कि ऊपर वाला जो आवरण है उस और उसको खाने वाला भीतर का पदार्थ है दोनों को एक साथ में गिनना चाहिए तभी उसका वजन ठीक-ठीक होगा तो यह ठाकुर की उपमा है कि यह ब्रह्मा और शक्ति अभेद है एक ही है जब स्थिर होता है तो उसको ब्रह्म कहते हैं जब कार्य करता है तो उसको शक्ति कहते हैं तो यह जो टीचिंग है ठाकुर का इसको मैं वैसे पढ़ता था बहुत बार पढ़ा हूं किंतु एक पता है ना एक इंटूटिव ग्रस्प आती है कभी-कभी आप किसी कांसेप्ट को किसी आइडियाज को पढ़ते तो है बहुत बार किंतु आप उसको इंटूटिव नहीं बना पाते हैं उसको आपको एकदम ठीक ठीक अपने दिमाग में बैठ जाए ऐसा नहीं होता है ऐसा बहुत बार होता है कि बहुत लंबे समय तक पढ़ने के बाद में एकाएक एक फ्लैश की तरह हुआ और फिर हमको पता चला अच्छा इस आइडिया का यह अर्थ है तो पिछले दो-तीन दिनों से मैं यह जो वर्ल्ड मॉडल डेवलप किए हैं एक तो मटेरियल िक स्पिरिचुअल और सुपर स्पिरिचुअल यह तीन वर्ल्ड मॉडल डेवलप करके इसके बारे में मैं जो सोच रहा था और यह जो ठाकुर का वर्ल्ड मॉडल है कि पहले तो नेती नेती करके ब्रह्म प्राप्ति करनी है फिर ब्रह्म प्राप्ति करके देखेंगे कि जिस चीज का ब्रह्मण बना हुआ है या तो ब्रह्मण इट सेल्फ ब्रह्मण का कोई यह नहीं होता इंग्रेडिएंट्स अ ब्रह्मण इट सेल्फ इज अ थिंग तो ब्रह्मण जो है वही ब्रह्मण आखिर में इस जगत में परिणत हुआ है अपनी लोअर लेवल दृष्टि से हमको ऐसा दिखता है निर्विकल्प समाधि में चले जाएंगे पता चलेगा सब कुछ ब्राह्मण है थोड़ा सा एक स्टेप नीचे आएंगे जैसे ठाकुर कहते हैं ना सारेगामा पादा नि नी नी पर आप ज्यादा नहीं रह सकते नी जो सूर है वह बड़ा ही तीव्र है तीक्षण है और व सूर आप लंबा समय तक नहीं गा पाएंगे इसलिए एक दो सूर आपको नीचे आकर के गान करना होगा तो जब आप इस जगत के लेवल पर वापस आए आ जाएंगे तो पता चलेगा कि जो कुछ भी है सब वही ब्रह्मण का बना हुआ है इसके बाद में अर्थात कि इति इति वही ब्राह्मण यह जगत है ऐसा करके वापस आए फिर पूरे जगत के प्रति करुणा और दया प्रेम का प्रवाह अपना रहेगा हम जो कुछ भी करेंगे वह बाय डिफॉल्ट लोक कल्याण के लिए हो जाएगा हमको कॉन्शियसली सोचने की भी जरूरत नहीं है कि हम लोगों का कल्याण कर रहे हैं और इसी थिरी को स्वामी जी ने अडॉप्ट किया आत्मन मोक्षार्थम जगत हिताय च अर्थात कि आत्म का मोक्ष प्राप्त करने के लिए आत्म साक्षात्कार प्राप्त करने के लिए अद्वैत वेदांत एक ऐसा चीज है कि अपने शब्द कभी-कभी सामान्य शब्दों से दिन प्रतिदिन की जो अपनी वोकेबुलेरियो जाता है क्योंकि जगत जो है सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट में बना बटा हुआ है हम जो कुछ भी बोलते हैं करते हैं तो मैं ये लिख रहा हूं या तो मैं खाना खा रहा हूं या तो फिर मैं कहीं पे प्रवास पर जा रहा हूं यानी कि कोई भी क्रिया कोई भी ऑब्जेक्ट के साथ में मेरा संपर्क होता है जबकि अद्वैत वेदांत कहता है आत्मन मैं खुद हूं मेरा सही स्वरूप है आत्मन इज माय सब्जेक्ट तो हाउ यू डील विद सब्जेक्ट इट सेल्फ मैं अपने साथ में कैसे डील करूंगा मैं अपने साथ में किस तरह से वार्तालाप करूंगा या व्यवहार करूंगा व वोकैबुलरी डिफरेंट है कि मुझे पेन लेकर के अपने हाथ में उठा कर के लिख खना है इस कंप्यूटर पर मुझे टाइप करना है सो बोथ टाइप ऑफ वोकेबुलेरियो हूं ही बस उसका साक्षात्कार कर लेना है कि मैं उसको हमको जान लेना है कि मेरा सही स्वरूप क्या है तो उसके लिए जो चार ट्रेडिशनल साधनाएं बताई गई है कर्म योग ज्ञान योग भक्ति योग और राजयोग उसका तो अनुष्ठान करे ही साथ में यह जगत कल्याण के लिए जगत कल्याण शब्द भी वैसे ठीक नहीं है किंतु जैसे स्वामी जी का असली प्रॉपर वर्ड होगा शिव ज्ञाने जीव सेवा तो यह दूसरे लोगों के भीतर में वही आत्मन ब्रह्मण या भगवान शिव बसे हुए हैं जिनकी पूजा या तो फिर जिनकी उपासना हम अपने हृदय में या तो मंदिर में जाकर करते हैं तो वह दोनों पैरेलल चलना चाहिए यह ठाकुर का जो मुख्य उपदेश है उसके ऊपर में से स्वामी जी ने यह डिराइवर किया है ठाकुर यह नहीं कहते कि हम लोग सब समय निर्विकल्प समाधि में बुंद हो कर के रहे क्योंकि फिर वह तो जगत को डिनायर जैसा हो गया बेल जो है बेल का फल उसका बाह्य आवरण हमने हटा दिया भीतर का जो गर्भ है वह हमने ले लिया ऐसा नहीं बाह्य आवरण भी भीतर का गर्भ भी दोनों हमको रखना है तो ठाकुर कहते हैं कि निर्विकल्प समाधि में सब समय नहीं रह कर के एक स्टेप नीचे आकर के भक्ति भक्त को लेकर के रहना है ठाकुर का जो फेमस स्टेटमेंट है चीनी होते चाहि ना मा चीनी खेते चाई मैं शुगर होना नहीं चाहता शुगर खाना चाहता हूं मैं जद चीनी हो जाऊंगा यानी कि मैं अद्वैत रूप में अद्वैत भाव में ईश्वर के साथ में आत्मन के साथ में एकाकार हो जाऊंगा तो फिर यह जो सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट भक्ति भक्त को लेकर के रहने का जो आनंद है वो मैं गवा बैठूंगा हां हालांकि ब्रह्म में एकाकार होने का वो अपना एक आनंद अलग है ब्रह्मण का स्वरूप जैसे वर्णित किया गया है सत चित आनंद तो ब्रह्म ब्रह्म आनंद ब्रह्मानंद उसका अपना एक आनंद है किंतु भक्ति भक्त को लेकर के रहना उसका भी एक आनंद है तो ठाकुर कहते हैं कि एक स्टेप नीचे आकर के पहले निर्विकल्प समाधि प्राप्त करके फिर एक स्टेप नीचे आकर के ब्रह्मण को इन सभी लोगों के भीतर में दर्शन कीजिए सभी के साथ में आनंद से भक्ति पूर्ण व्यवहार करके रहिए तो यह जो ठाकुर की फिलोसोफी है उसी को स्वामी जी ने राजसिक और तामसिक साधकों के लिए इस तरह से एडेप्ट किया है ठाकुर जो कहते हैं कि पहले सब छोड़ करर के नेती नेती यानी कि मैं यह जीव जगत ईश्वर जीव जगत या तो फिर पंच ज्ञानेंद्रिय पंच कर्मेंद्रिय कुछ नहीं हूं मेरी कामना वासनाओं के जितने भी विषय हैं सभी को मैं त्याग कर दूंगा वो प्रचंड त्याग की प्रक्रिया है व धीरे-धीरे करके सब त्याग करके आप ईश्वर प्राप्त करेंगे वह तो बड़ा ही उच्च साधक होगा उसी के लिए वह संभव है सात्विक साधक के लिए ही वह संभव है उच्च अधिकारी जिसको कहते हैं किंतु जो मंद या मध्यम अधिकारी है तामसिक और राजसिक जिनका स्वभाव है उनके लिए ठाकुर की यह थिरी किस तरह से अप्लाई होगी तो स्वामी जी कहते हैं कि उसी थिरी को एक स्टेज यदि नीचे ले आए जाए कि नेती नेती वाला फेज में से ईश्वर आराधना ले ले और इती इती वाले फेज में से लोगों के साथ में हम ईश्वर लोगों के भीतर में वही ईश्वर है इस तरह से उनकी सेवा करें तो यह एक स्टेप लोवर जो लोग है उन लोगों के लिए स्वामी जी ने इस तरह से ठाकुर की थिरी को एडेप्ट किया है आत्मन मोक्षार्थम जगत हिताय च तो अभी हम उस दिन यह सब चर्चा कर रहे थे अभी दो-तीन दिन पहले ही कल कल ही कल ही मेरे माइंड में सडन यह फ्लैश हुआ कि यह जो ठाकुर यह जो थिरी है ठाकुर की नेती नेती फिर ईश्वर प्राप्ति ब्रह्मज्ञान और फिर इति इती यह तो मुझे एकदम ठीक-ठीक समझ में आ गई है किंतु वह जो सेकंड थियर है या तो फिर ठाकुर का सेकंड टीचिंग है कि ब्रह्मा और शक्ति एक है अभेद है स्थिर है तो ब्रह्म कहता हूं चलित है कार्य करता है तो मैं उसको शक्ति क कहता हूं यह मुझे अभी भी एक इंटूटिव ग्रस्प नहीं आ रही थी तो अभी कल ही एकदम सडन फ्लश हुआ मुझे लगा कि देखिए ठाकुर यह जो कहते हैं कि नेती नेती और इति इति पहले तो ईश्वर प्राप्ति उसके बाद में देखो कि जगत ही ईश्वर मय है तो अर्थात कि यह जो थिरी है कि ब्रह्मा और शक्ति एक उसी थिरी का यह प्रैक्टिकल स्वरूप है क्योंकि यदि ब्रह्मण और शक्ति या तो फिर ब्र मन और जीव और जगत यह तीनों एक नहीं होते तब तक तो यह बात सही नहीं होती कि आप इति इती करके इस जगत में वापस आइए अदर वाइज यदि हम एक खास तरह का ऑर्थोडॉक्स इंटरप्रिटेशन लेंगे अद्वैत वेदांत का अद्वैत वेदांत के भी वैसे बहुत सारे इंटरप्रिटेशन है यदि हम ये इंटरप्रिटेशन को लेंगे कि अद्वैत ज्ञान प्राप्त होने के साथ में ही अपनी यात्रा का अंत आ गया अद्वैत ज्ञान ही इस जगत में सर्वश्रेष्ठ है उसके बाद में फिर और कुछ नहीं है तो वहां पर क्या होगा पता है ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है और जगत में यदि आप लोगों के ऊपर में दया करते हैं लोगों के साथ में लोगों की सेवा भी करते हैं जदी तो अपने चरित्र की शुद्धता के लिए अपना जो यह जो सालों सालों का जन्म जन्मांतर का यह जो कर्म का बोझा हम बह के आ रहे हैं वो चरित्र को शुद्ध करने के लिए हम यह सब लोगों का लोगों की सेवा करते हैं या लोगों पर उपकार करते हैं एक बार यदि मुझे ब्रह्म प्राप्ति हो गई तो फिर मुझे वह सब करने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि ब्रह्म साक्षात्कार ही ब्रह्म ज्ञान ही जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है वो एक इंटरप्रिटेशन हुआ अद्वैत वेदांत का किंतु यहां पर देखिए कि उस इंटरप्रिटेशन में और ठाकुर का जो है इंटरप्रिटेशन इन दोनों में किस तरह का कंट्रास्ट है ठाकुर यह कहते हैं ठाकुर और स्वामी जी दोनों कि आप लोगों की जद सेवा करते हैं उनके भीतर में ईश्वर को देख कर के वह सिर्फ आपकी चित्त शुद्धि के लिए नहीं करते यह सही सही सेवा हुई यह सिर्फ एक मींस टू द एंड नहीं है जैसे कि मेरे पैर में एक कांटा लगा है तो मैं दूसरे कांटे से उस कांटे को निकाल लूंगा फिर दोनों कांटों को फेंक दूंगा यानी कि मैंने दुष्कर कर्म करके मेरे सर के ऊपर में पाप का बोझा पड़ा है तो मैं सत्कर्म करके पाप के बोझे को काट दूंगा और फिर पाप और पुण्य वहीं पर पड़ा रहा मैंने ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर लिया सिर्फ यह एक यह सिर्फ ठीक नहीं आपको यह कहना चाहिए कि जो मींस है इट इट सेल्फ इज द एंड यानी कि मैं लोगों की सेवा कर रहा हूं उनके भीतर में ईश्वर को दर्शन करके दिस इज इक्विवेलेंट टू मैं मंदिर में भगवान की पूजा कर रहा हूं क्योंकि प्रतिमा के भीतर में भी वही ईश्वर है और दरिद्र नारायण चंडाल नारायण रोगी नारायण उनके भीतर में भी वही ईश्वर है मंदिर में पूजा करके जो ईश्वर प्राप्ति होगी वही ईश्वर प्राप्ति मुझे रोगी नारायण की सेवा करके भी होगी दरिद्र नारायण की सेवा करके भी होगी क्योंकि ऐसा नहीं है कि ईश्वर सिर्फ प्रतिमा में है और मनुष्य के भीतर में नहीं है ईश्वर सब जगह पर है और ईश्वर या तो फिर ब्रह्मण जब स्थिर हो जाते हैं तो उनको आत्मन या ब्रह्मण कहा जाता है और चलित होते हैं कार्य करते हैं तो ईश्वर जीव जगत में रूपांतरित होते हैं यानी कि यह दोनों पाथ जो है इति इति और नेति नेति यह दोनों एक दूसरे के कंप्लीमेंट है और ऐसा जैसे कि और तो एक तरह का इंटरप्रिटेशन है स्पिरिचुअल लाइफ का कि ईश्वर प्राप्ति के लिए आपको सब कुछ त्याग करना है और यदि उसके लिए आपको चित्त शुद्धि के लिए जो सेवा करनी पड़े लोगों को जो सहाय करनी पड़े वह सहाय कीजिए किंतु चित्त शुद्धि के अलावा लोगों की सेवा करना किसी काम का नहीं यह इंटरप्रिटेशन और ठाकुर का इंटरप्रिटेशन देखिए कि कितना उसमें कंट्रास्ट है तो अभी तक ठाकुर के दो मुख्य टीचिंग थे कि ब्रह्मा और शक्ति अभेद स्थिर होते हैं तो ब्रह्मण है चलित होते हैं कर्म करते हैं तो शक्ति है यह एक मुख्य टीचिंग और सेकंड मतलब ठाकुर का वेदांत
Vedanta according to Sri Ramakrishna
ठाकुर किस तरह से वेदांत समझाते हैं यदि इसको नाम देना है तो श्री राम कृष्ण वेदांत ऐसा एक नाम दे सकते हैं प्रोविजनली या तो फिर बेटर नाम रहेगा वेदांता अकॉर्डिंग टू श्री राम कृष्ण श्री राम कृष्ण की दृष्टि से वेदांत तो ये क्या होगा श्री राम कृष्ण की दृष्टि से वेदांत उसका प्रथम पॉइंट है कि ब्रह्म और शक्ति अभेद जो एक वेद अद्वैत वेदांत का एक इंटरप्रिटेशन है जो कि हमको कहता है कि ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या उसके अगेंस्ट में या तो फिर उसके साथ में कंट्रास्ट करके देखिए कि ठाकुर कहते हैं कि ब्रह्मा और शक्ति अभेद स्थिर होते हैं तो ब्रह्मण है कार्य करते हैं तो शक्ति है फिर ट्रेडिशनल अद्वैत वेदांत का जो एक इंटरप्रेट है कि सब कुछ त्याग करके सिर्फ ईश्वर प्राप्ति के लिए ब्रह्म ज्ञान के लिए आराधना उपासना करनी चाहिए यहां पर ठाकुर का इंटरप्रिटेशन है कि हां यह बात ठीक है कि आप उपासना कीजिए ब्रह्म प्राप्ति कीजिए किंतु उसके निर्विकल्प समाधि पर प्राप्त कीजिए किंतु उसके बाद में भी उसके परे भी एक जगत है उसके बाद में भी एक स्टेज है व स्टेज है कि इति इती करके इस जगत में आइए और सबको कुछ ईश्वर मय निहार सब कुछ ईश्वर का ही बना हुआ है इस तरह से आप दर्शन कीजिए आपका जीवन आप जो कुछ भी करेंगे अपने जीवन में वह लोक कल्याण के लिए ही होगा यह दो हो गए कंट्रास्ट इसके बाद में तीसरा यदि पॉइंट हम ऐड करें इसमें स्वामी विवेकानंद का आत्मन मोक्षार्थम जगत हिताय च तो यह पॉइंट जो है स्वामी जी का वो ट्र एडिशनल या तो फिर एक खास तरह के इंटरप्रिटेशन अद्वैत वेदांत के उसमें से यह पॉइंट कभी नहीं आता कि लोगों को आप जयदिश करके तो यह इंटरप्रिटेशन स्वामी जी का वह अपने ट्रेडिशनल वेदांत में से कभी नहीं आएगा ठाकुर की थिरी में से ही यह इंटरप्रिटेशन आएगा तो देखिए कि किस तरह से
problem with traditional religious outlook that god is not part of this world
जिसको हमने नाम दिया है तीन वर्ल्ड मॉडल्स का उसमें मटेरियल वर्ल्ड मॉडल तो खैर ईश्वर है ही नहीं ऐसा ही मान लेते हैं लोग या तो फिर लिप सर्विस देते हैं किंतु जीवन को ट्रांसफॉर्म नहीं कर पाते किंतु ये जो स्पिरिचुअलिटी के जो दो मॉडल है ट्रेडिशनल स्पिरिचुअलिटी और ठाकुर की स्पिरिचुअलिटी अकॉर्डिंग टू श्री राम कृष्णा या तो सुपर स्पिरिचुअलिटी इन दोनों के बीच में किस तरह से कंट्रास्ट होता है अच्छा यह कंट्रास्ट होने के बाद में हम कुछ और उसका हम अपना पॉइंट ऑफ व्यू थोड़ा सा ब्रॉड करते हैं थोड़ा सा इन जनरल लिटरेचर और हिस्ट्री के प्रति हम थोड़ा सा नजर डालते हैं तो पता है एक चीज हमको क्या बार-बार स्ट्राइक होता है कि यह जो ट्रेडिशनल इंटरप्रिटेशन है स्पिरिचुअलिटी का या वेदांत का या तो फिर रिलीजियस लाइफ का कि ईश्वर सिर्फ प्रतिमा में है उसके बाहर में नहीं है तो इस तरह यह देखने के बाद में यह समझने के बाद में लोग कि तरह से बिहेव करते हैं ऐसे बहुत सारे उदाहरण है कि जैसे कि कोई चंडाल है उस समय उस समय तो अपना भारत इस तरह की जाति नाती में बटा हुआ था तो जो लोगों को हम लोग अपने से निम्न कक्षा का गिनते थे वे लोग यदि मंदिर में भी नहीं जा पाएंगे मंदिर में जाने पर भी उनका प्रतिबंध है या तो फिर किसी ने मंदिर में जाकर के यदि कुछ अपनी अपेक्षा अनुसार वर्तन नहीं किया तो उसके साथ में इमीडिएट हमने झगड़ा करना शुरू कर दिया या तो फिर उसके साथ में हमने मारामारी भी शुरू कर दी धर्म के नाम पर लोगों के बीच में जो झगड़ा होता है कि मेरा धर्म सही है मेरे ईश्वर श्रेष्ठ है तुम्हारा धर्म गलत तुम्हारे ईश्वर निम्न कक्षा के है हमारे ईश्वर से यह जो सब कुछ होता है उसके पीछे में प्रॉब्लम क्या है हम लोग देखते हैं कि मेरे ईश्वर है सिर्फ प्रतिमा के भीतर में है सिर्फ यह धार्मिक जगह पर ही सीमित है एक किताब के भीतर में ही वह सीमित है एक ही प्रोफेट के द्वारा जो कहा गया है वही सत्य है और बाकी जितने भी लोग हैं जितनी भी जगह है धार्मिक जगह है जितनी भी धार्मिक किताबें हैं जितने भी साधक है सब गलत है ऐसा हम क्यों सोचते हैं क्योंकि हमको लगता है कि इसके बाहर में ईश्वर नहीं है जबकि ईश्वर सब जगह पर है यदि आप धर्म का नाम ले करके दूसरों के ऊपर में अत्याचार करते हैं तो आप धर्म को ठीक-ठीक समझे ही नहीं है ऐसा आपने कैसे सोच लिया कि इस किताब में ही धर्म है और किताब का जो अनुसरण नहीं करता किताब को जो स्वीकार नहीं करता उसका उसकी हत्या किया जाए या तो फिर उसके ऊपर में दमन किया जाए उसका शोषण किया जाए यानी कि आपकी दृष्टि एक तरह से सीमित हो गई यदि ठाकुर का इंटरप्रिटेशन हम एक्सेप्ट करते हैं तो आप धर्म के नाम पे किसी पर अत्याचार कभी भी नहीं कर पाएंगे आप कभी भी यह नहीं कह पाएंगे कि हां धर्म सिर्फ कथामृत के भीतर में ही है और जो कथामृत को फॉलो नहीं करता वह सब अधार्वा ठाकुर जो कि कथामृत के भीतर में है वही ठाकुर जो कि हमारे मंदिर में विराजमान है वही ठाकुर जो कि हमारे भक्तों के हृदय में विराजमान है वही ठाकुर ठाकुर का विरोध करने वाले भी यदि कोई होंगे तो उन्हीं के हृदय में भी वही विराजमान है वही ठाकुर जो ठाकुर को एक्सेप्ट नहीं करते हैं या तो फिर पीछे-पीछे उनकी निंदा करते हैं और निंदा करने वाले लोगों की कमी नहीं है उनके हृदय में भी वही ठाकुर है आप उनकी ओर घृणा की दृष्टि से देख ही नहीं सकते
god is in everyone, but we must fight against tamas
अच्छा इसका अर्थ यह नहीं है कि हम अनाचार होने दे अपने मंदिर में कोई आकर के कुछ गड़बड़ करना चाहे या तो फिर ठाकुर की यदि कोई निंदा करें हम चुपचाप सुन ले इस तरह से हम करना चाहे तो ऐसा नहीं है कि सबको सब लाइसेंस है जो चाहे वह करें उसका डट कर के मुकाबला करना होगा किंतु उसके प्रति घृणा का भाव नहीं रखना है यह कोर टीचिंग है अपना श्रीमद् भगवत गीता का शत्रुओं का वध भी करना है और शत्रुओं के प्रति शत्रु भी नहीं रखना है इस तरह से वध करना है कि वध करने वाले तो ईश्वर ही है हम लोग तो सिर्फ निमित्त मात्र है निमित्त मातरम भव सव्य साचीन जैसे कि भगवान कृष्ण ने अर्जुन को कहा मैं यदि मेरे गुरु महाराज की कोई निंदा करता है तो मुझे उसको उत्तर देना होगा किंतु इसलिए नहीं कि उसके भीतर में कोई शैतान बैठा हुआ है या तो फिर मुझे उसके ऊपर में बहुत सारा गुस्सा आ गया है कि इस तरह के व्यक्ति को मैं घृणा करता हूं इसलिए नहीं इसलिए क्योंकि यह जगत में जब हम रहेंगे तो जगत के कुछ रूल्स एंड रेगुलेशंस फॉलो करने पड़ेंगे हमारे गुरु महाराज है हमारा मंदिर है हमारा आश्रम है उसकी रक्षा करना अपना धर्म है तो अपने धर्म को निभाने के लिए मैं उसका मुकाबला करूंगा किंतु उसके प्रति मैं शत्रु नहीं रखूंगा इसके प्रति मैं घृणा या गुस्सा पोषण नहीं करूंगा यह क्लियर डिस्टिंक्शन हमको ठाकुर का यह ब्रह्मा सत्य ब्रह्मा और शक्ति अभेद यह कोर टीचिंग जो है ठाकुर का इससे यह जानने को मिलता है अभी ऐसा नहीं है कि यह कोई यूनिक टीचिंग है गीता पढ़कर देखेंगे या तो फिर उपनिषद पढ़कर देखेंगे तो यही बात बार-बार दोहराई गई है जो कहते हैं ना कि वह वो जो पुरुष सुक्त पुरुष सुक्तम है वगैरह कि सर्वत्र पाणी पाद तत् सर्व शि शिरो मुख सब तरह ईश्वर के हाथ और पैर है सब तरह उनका मुह है तो अ यह भगवान कृष्ण का विश्वरूप स्वरूप यह सभी वही इंडिकेट करता है कि ईश्वर जगत में ओत प्रोत हुए हैं किंतु वही बात है कि एक समय ऐसा आया कि जब हमारे समाज ने हमारे समाज की अधोगति प्रारंभ हुई पिछले 1000 साल में हमने ऐसा मानना शुरू कर दिया कि ईश्वर सिर्फ मंदिर में है और इस मंदिर में हमारे से जो विधर्मी है हमारे से अलग नाथ के हैं जात के हैं अलग कम्युनिटी के हैं अलग देश के हैं उनको इस मंदिर में प्रवेश नहीं और उनको जब तक वह हमारे ईश्वर को नहीं स्वीकारते तब तक हम उसको भी नहीं स्वीकारें यह एक नैरो दृष्टिकोण पिछले कुछ-कुछ सालों से कुछ 100 कुछ 500 हजार साल से यह दृष्टिकोण हमारे भीतर में आया है वरना वेद उपनिषद श्रीमद् भगवत गीता और श्री श्री रामकृष्ण कथामृत कथामृत के भीतर में यह बात बहुत ही स्पष्ट तरीके से कही गई है जो कि वेद में शायद इंगित स्वरूप होगी या तो पुराणों में इंगित स्वरूप जो होगा हमारे कथामृत में एकदम स्पष्ट तरीके से कहा गया और इसके बाद में यदि स्वामी विवेकानंद तक आए तो तो फिर इस बात का ही जयघोष किया गया है कि मंदिर में जाकर के पजा पाठ करने की बजह दरिद्र नारायण चंडाल नारायण की सेवा करते हो वो तुम्हारे लिए ईश्वर प्राप्ति का बेटर रास्ता है क्योंकि तुम ईश्वर सीधी ईश्वर की सेवा करते हो वहां पर तो प्रतिमा में ईश्वर का आरोप करना पड़ेगा अपनी कल्पना की दृष्टि से या श्रद्धा की दृष्टि से उसमें ईश्वर को देखना पड़ेगा चंडाल नारायण या दरिद्र नारायण के भीतर में ईश्वर का दर्शन करना कंपैरेटिव इजी है ईश्वर की सेवा करना यानी कि ईश्वर सीधा उस भोग नैवेद्य उपासना को ग्रहण करते हैं यह स्वामी विवेकानंद नंद का टीचिंग है सो दे यह जो ब्रह्म शक्ति
Practival application of Brahma - shakti - abhed
अभेद यह बात में जो बार-बार सोच रहा था इसके ऊपर में क्या इंटरप्रिटेशन होगा वह मैं कर रहा था और यह क्लियर नहीं हो रहा था तो अभी कल ही एकदम एक फ्लश की तरह एकदम क्लियर हो गया कि हां यह ठाकुर का दूसरा टीचिंग है नेती नेती और इति इति इसके साथ में अभिन्न रूप से ये दोनों जुड़े हुए हैं एक है साइंस एक है टेक्नोलॉजी जैसे साइंस और टेक्नोलॉजी में डिफरेंस क्या है प पले तो थिरी डेवलप की जाती है साइंस में और फिर उस थिरी के आधार पर वह टेक्नोलॉजी इंजीनियरिंग के माध्यम से खोजी जाती है अभी हमको पता चला कि सॉलिड स्टेट फिजिक्स क्या है इलेक्ट्रॉन क्या है प्रोटॉन क्या है अभी यह थिरी समझ कर के साइंस की हमने यह ट्रांजिस्टर है या तो फिर यह माइक्रोप्रोसेसर है इंजीनियर लोगों ने बना दिया वो हो गई टेक्नोलॉजी तो यहां पे भी थिरी है कि ब्रह्म और शक्ति अभेद स्थिर है तो ब्रह्मा कार्य करती है तो शक्ति तो उसका जो प्रैक्टिकल एप्लीकेशन है इंजी रिंग या टेक्नोलॉजी वो यह है दो एप्लीकेशन एक तो नेती नेती इती इती दूसरा स्वामी जी का कि आत्मन मोक्षार्थम जगत हिताय च सो यह एक मेरा थोड़ा सा आईडिया क्लियर हुआ अच्छा
Why Swamiji criticizes his opponents in My Plan of Campaign lecture
इसके साथ में देखिए कि अभी यह जो हम यहां पे डिस्कस कर रहे थे यह पूरा सप्ताह स्वामी विवेकानंद का माय प्लान ऑफ कैंपेन प्रवचन है जो कि उन्होंने चेन्नई में दिया था व डिस्कस करने वाले हैं अभी तक हम जिस टॉपिक तक पहुंचे हैं उसमें क्या है कि किस तरह से स्वामी जी हमको समझाते हैं कि हमको बताते हैं स्वामी जी ने कभी भी किसी की निंदा नहीं की है किसी के प्रति कटु वाक्य नहीं कहा है किंतु इस माय प्लान ऑफ कैंपेन जो लेक्चर है वह यूनिक किस तरह से है उसका एक मैंने स्पेशल एस्पेक्ट क्या है जो कि और किसी लेक्चर में आपको कभी नहीं देखने को मिलेगा वोह है कि स्वामी जी ने अमेरिका जाकर के वेदांत प्रचार के लिए जो कार्य किया उस कार्य में बाधा देने वाले लोगों ने किस तरह से उनके पीछे में लग कर के किस तरह से उनके मार्ग में विघ्न खड़े किए उस सबका आलेखन स्वामी जी इस प्रवचन के प्रारंभ में करते हैं तो अभी देखिए यह प्रश्न अपने मन में सहज रूप से खड़ा होगा कि क्यों स्वामी जी ऐसा कहते हैं स्वामी जी तो अपने हृदय में सभी को क्षमा देकर के यह सब भूल जा सकते थे जैसे कि ठाकुर ने खुद ने वो ब्रह्मचारी और साप की ये जो कहानी है उसके माध्यम से किया है ब्रह्मचारी ने साप को मंत्र दिया कहा कि तुम किसी की हत्या मत करना आज से और साब भी एकदम ठंडा होकर के मंत्र जप कर रहा है उस समय गांव वालों ने आकर के पीट दिया और फिर कुछ समय बाद में ब्रह्मचारी वो सांप के पास में वापस आए देखा सांप लहूलुहान होकर के पड़ा हुआ है तो पूछा कि अरे यह क्या हुआ तो सांप ने कहा कि लोगों ने मेरी पीटाई की है क्योंकि मैं पहले उनको बड़ा दस्ता था मैं बड़ा त्रास देता था अभी मैं चुपचाप बैठा हूं तो उनको मौका मिल गया है बदला लेने का तो ब्रह्मचारी ने इमीडिएट कहा कि मैंने तुमको सामने दने से मना किया था फोस करने को तो मना नहीं किया था अपनी रक्षा ना करो ऐसा तो नहीं कहा था अपनी रक्षा तो करनी ही चाहिए अभी जैसे ही ठाकुर यह कहानी कहते हैं साथ-साथ में ही कहते हैं कि साधु को किंतु आत्म रक्षा करने के लिए फोस भी नहीं करना है तो यह बात ठाकुर जब हमको कहते हैं तो स्वामी जी यहां पर अपने सामने उनके कार्य में विघ्न डालने वाले उनके विरोधियों का प्रतिवाद स्टेज के ऊपर से क्यों करते हैं आपस आपस में अपने मित्रों को अपने शिष्यों को समझा दिया होता तो वह भी चल जाता एक पब्लिक स्टेज से वोह ए अनाउंसमेंट क्यों करते हैं यह प्रश्न हमारे मन में हो सकता है और इसका उत्तर आप इस तरह से देखिए मने दोनों तरीके से पहले तो ठाकुर ने यह भी कहा है कि अपनी आत्मरक्षा साधु को नहीं करनी है गृहस्थ भले आत्मरक्षा करें साधु को नहीं करनी है वह एक प्रिंसिपल है दूसरा प्रिंसिपल कि वही कि ब्रह्म शक्ति और ब्रह्मा दोनों अभेद अर्थात कि जिस श्री रामकृष्ण देव की स्थापना वह आत्माराम का कौटा जिसके भीतर में ठाकुर के अस्थि है और जिनकी पूजा वराह नगर मठ में और उस समय जब स्वामी जी अमेरिका से वापस आए थे यह प्रवचन दे रहे थे उस समय वही आत्माराम कोटा की पूजा आत्माराम की पूजा वो आलम बाजार मठ में हुआ करती थी तो ठाकुर वही कि आलम बाजार मठ में रखे हुए वोह जो उनके अस्थि है उसी में है और यह जिनकी अभी यह स्वामी जी प्रतिवाद करते हैं थियोसोफिकल सोसाइटी वाले ना कि फिर ये क्रिश्चियन मिशनरीज ना कि ये ब्रह्म समाज वाला मजूमदार उनके भीतर में वो ठाकुर नहीं है दोनों तरह से ठाकुर का जो टीचिंग है उसका विरोध करते हुए या तो फिर उसकी अवगणना करते हुए से स्वामी विवेकानंद हमको दिखते हैं तो इसका क्या उत्तर होना चाहिए तो एक्चुअली देखिए कि जहां तक हमारी व्यक्तिगत साधना का प्रश्न है हमको सही सही में किसी भी तरह का प्रतिकार नहीं करना चाहिए यदि हम साधु हैं और यदि गृहस्थ है तो प्रतिकार ही करना चाहिए लोगों के ऊपर में प्रति आक्रमण नहीं करना चाहिए तो यह कांसेप्ट क्लियर है और यदि प्रतिकार भी करते हैं तो यह समझना है कि उनके भीतर में भी वही ठाकुर है अभी जैसे कि वह साधु की कहानी ठाकुर कहते हैं कि एक साधु रास्ते से जा रहा था एक शिष्य एक शिष्य जा रहा था रास्ते से एक साधक एक देखा कि सभी लोग बोलते हैं एक हाथी आ रहा है पागल हाथी है वो सब लोग रास्ता छोड़ दो तो यह शिष्य सोच रहा है कि मेरे गुरु ने तो कहा है सभी के भीतर में नारायण का दर्शन करना है तो ये हाथी के भीतर में भी नारायण है तो ठीक है वो रास्ते के बीच में खड़ा रह गया और हस्ती रूपी नारायण का स्तव करने लगा यहां पे यह पागल हाथी आया और उस लड़के को उठा कर के पटक दिया कहीं पे साइड पे अभी यह बेचारा बेहोश हो गया इजा भी हुई जब होश में आया तो उसके गुरु ने पूछा कि अरे पगले पागल हथियार था तू सामने क्यों खड़ा था तो बोला यह शिष्य ने कि आप ही ने तो कहा है कि सभी के भीतर में नारायण का दर्शन करना है तो फिर गुरु ने क्या कहा कि यदि सभी के भीतर में तुम नारायण का दर्शन करते हो तो महावत नारायण जो है उसकी बात क्यों नहीं सुनी कि यह पागल हथ ही है रास्ते से चले जाओ तो यदि सभी के भीतर में नारायण का दर्शन करना है तो यह कॉन्फ्लेट होगा कि वो डॉक्टर बेरोज वह भी नारायण है यह मजूमदार वह भी नारायण है नाउ द डेविल इज गोइंग टू डाई ऐसा जिस लोगों ने लिखा था यह थियोसोफिकल सोसाइटी वाले किसी ने कि अभी यह स्वामी जी उसको शैतान के स्वरूप में देखते थे यह शैतान का अभी मृत्यु होने वाला है ऐसा बोलकर के जो खुश हो रहे थे उसके भीतर में भी तो नारायण है उसके सामने भी आपको किसी भी तरह का प्रतिकार नहीं करना है थिरी तो यही हुई अदर वाइज आप देखिए कि हम लोगों के लेवल पे तो ठीक है चलो कि हम लोग कथामृत पढ़ कर के लीला प्रसंग पढ़ कर के मां की बातें पढ़ कर के स्वामी जी को पढ़ कर के भी जो चाहे स्वच्छंद आचरण करते हैं व करते हैं उसमें कुछ आप कर नहीं सकते हैं क्योंकि आदर्श को फॉलो करने की अपनी कैपेसिटी बड़ी ही लिमिटेड है किंतु स्वामी जी को जब हम इस तरह से करते हुए देखते हैं कि हाईएस्ट आइडियल जो है उसको स्वामी जी क्यों नहीं फॉलो कर रहे तो फिर हमारे मन में एक तरह से ग्लानि भी प्रकट होगी दूसरा हमको आनंद भी आएगा कि मैं यह जो कथामृत में कहे हुए आदेश है ठाकुर के उसका पालन नहीं कर पा रहा हूं तो कोई बहुत बाड़ी बड़ी बात नहीं है स्वामी जी भी नहीं करते थे बोल कर के हम अपने ही मन में एक के बाद एक एक्सक्यूज खड़ा करना शुरू करते हैं तो यहां पर इस तरह से स्वामी जी का इंटरप्रिटेशन करना है स्वामी जी ने जो प्रतिकार किया इन लोगों का जो लोग उनके कार्य में बाधा स्वरूप थे प्रवचन में जाहिर स्टेज के ऊपर में से उन्होंने प्रतिकार किया इसके पीछे का इंटरप्रिटेशन इस तरह से करना है कि यहां पर स्वामी जी सिर्फ अपनी रक्षा के लिए यह सब नहीं कर रहे थे हिंदू धर्म का पुनः जागरण होने वाला था और हिंदू धर्म की यह 1000 साल की अंधेरी रात है उसके पीछे कारण भूत जितने भी फैक्टर्स थे उसमें यह कुछ अंधश्रद्धा है भी थी यह कु रिवाज भी थे ये कुरीतियां भी थी उसमें यह कु रिवाज कुरीतिया या तो फिर कहेंगे कि मिस इंटरप्रिटेशन धर्म का ये ये जो सोसाइटीज थी थियोसोफिकल सोसाइटी वह एक तरह की अंधश्रद्धा के ऊपर में बनी हुई थी कि हां यह तिबेट में महात्मा है और यह महात्मा सुपर पावरफुल है और वह जो चाहे कर सकते हैं इस तरह की अंधश्रद्धा पे यह थियोसोफिकल सोसाइटी बनी हुई थी ये जो ब्रह्म समाज है वो था तो रिफॉर्म सोसाइटी किंतु धर्म के मिस इंटरप्रिटेशन के के ऊपर में बना हुआ था वे लोग सोचते थे कि समाज में यदि हम ठीक-ठीक यह सब कर पाए जो कुरीतियां हटा पाए विधवा विवाह वापस ले आ पाए स्त्रियों की विवाह की उम्र बढ़ा दे यह सब करें समाज में सुधार लाए तो धर्म में भी सुधार आ जाएगा यह उन लोगों का उल्टा तरीका था धर्म को देखने का जबकि स्वामी जी का मानना था धर्म में सुधार लाओ तो बाकी सब चीजें सामाजिक सब कुछ अपने आप में सामाजिक धर आर्थिक राजनीतिक सब कुछ अपने अपने आप में सॉल्व हो जाएगा स्वामी जी जैसे कहते हैं ना कि अमेरिका और या ये तो पश्चिम और यह भारत इन दोनों की जो एटीट्यूड या तो पॉइंट ऑफ व्यू है बड़ा ही डिफरेंट है भारत में सब कुछ धर्म के आधार पर बना हुआ है यदि यहां पर आपको राजनीतिक रिफॉर्म भी लाने है तो आपको लोगों को समझाना पड़ेगा कि यह राजनीतिक रिफॉर्म से उनके धर्म में किस तरह से सहायता होती है और अमेरिका में यदि आपको सही धर्म का पालन करवाना है लोगों से तो यह कहना पड़ेगा कि आप आप यह धर्म का नए धर्म का वेदांत का पालन कीजिए इससे आपकी पॉलिटिकल सिचुएशन इंप्रूव हो जाएगी यानी उनकी पॉलिटिकल दृष्टि है उनकी इकोनॉमिकल दृष्टि है अपनी रिलीजियस दृष्टि है तो स्वामी जी का मानना था कि यह चाहे थियोसोफिकल सोसाइटी हो ना कि चाहे यह ब्राह्मण समाज हो यह सभी लोग या तो अंधश्रद्धा प खड़े हैं या तो फिर धर्म के मिस इंटरप्रिटेशन पर खड़े हैं और यह लोग यदि यह क्लेम करना शुरू कर दे कि स्वामी जी जो कर रहे हैं वह ठीक नहीं है वह गलत है या तो फिर व उनको जो सफलता प्राप्त हुई है इसके पीछे हमारा बहुत बड़ा हाथ है तो होगा क्या कि यह हिंदू धर्म का पुनः जागरण जो हो रहा था उस समय 1000 साल की नींद के बाद से यह भारत माता फिर से जागृत हो रही थी उसमें उसके फाउंडेशन में ही कहीं पर एक बड़ा ही सीरियस मिस इंटरप्रिटेशन लग जाता हमेशा भारत की आने वाली नई पीढ़ी यही सोचती रहती कि स्वामी जी की सफलता के पीछे ठाकुर के आशीर्वाद नहीं किंतु यह थियोसोफिकल सोसाइटी ने उनको जो यह लिख करके दिया लेटर ऑफ इंट्रोडक्शन वो ज्यादा मैंने हेल्पफुल हो गया ऐसा कुछ गड़बड़ हम ना सोच ले इसलिए स्वामी जी को मंच के ऊपर में से इनका प्रतिकार प्रतिवाद करना पड़ा था वोह उन्होंने सिर्फ अपनी रक्षा के लिए नहीं किया था पूरे हिंदू धर्म की रक्षा करने के लिए किया था और यह
व्यष्टि धर्म - समष्टि धर्म
भी एक बड़ा ही इंटरेस्टिंग पॉइंट है क्या इंडिविजुअल रिलीजन या तो फिर यह व्यक्तिगत धर्म और यह समष्टि धर्म क्या यह अलग-अलग है यह एक बड़ा ही इंटरेस्टिंग सब्जेक्ट है क्योंकि गांधी जी ने यह जो सत्य और अहिंसा का जो कार्यक्रम पूरा प्रारंभ किया था उस समय बहुत सारे लोग यह सोचने वाले थे कि भले चाहे सत्य अहिंसा अस्ते अपरिग्रह ब्रह्मचर्य जो कि वह अपने जीवन में पालन करना चाहते हैं वह इंडिविजुअल एक साधक के लिए वह ठीक है किंतु देश की जो पॉलिटिकल और फॉरेन पॉलिसी है उसमें यह पंचशील जिसको हम कहते हैं वह ठीक नहीं रहेगा देश की रक्षा करने के लिए तो शत्रुओं का आक्रमण होता है तो शत्रुओं का विनाश करना ही पड़ेगा उस समय यदि हम यह सोच करके बैठे रहेंगे कि उनके भीतर में भी वही ईश्वर है वही ब्रह्मण है तो नहीं चलेगा तो यह एक बड़ा ही ओपन डिबेट का क्वेश्चन है और स्वामी जी ने खुद ने यहां पर प्रूव किया है कि इंडिविजुअल जो मोरालिटी है इंडिविजुअल जो प्रिसेप्ट्स है और यदि कलेक्टिव प्रिसेप्ट्स की बात की जाए तो इन दोनों में हमको किस तरह का डिफरेंस तो करना ही पड़ेगा इसीलिए यह जो अपने धर्मस्थल अपनी धर्म या तो फिर अपने धर्म के जो सिंबल है उसकी रक्षा करनी उस समय लोगों के भीतर में ईश्वर है यह नहीं सोचना यह यह कलेक्टिव रिलीजन जो है समष्टि धर्म उसके बेस के ऊपर में है गीता में देखिए कि दोनों तरह के धर्म हमको बताए गए हैं एक तो व्यष्टि धर्म है एक समष्टि धर्म है मैं इंडिविजुअली मुझे किस अह पाथ फॉलो करना है कौन से रूल्स रेगुलेशन फॉलो करने हैं वह भी है और एज ए पार्ट ऑफ ए कलेक्टिव यदि मेरे ऊपर मैं राजा हूं यह पूरे राज्य का जिम्मा मेरे सर के ऊपर में है मैं अपने व्यक्तिगत जीवन में अच्छा हूं ना कि बुरा हूं मुझे यदि राज्य चलाना है तो सबके भीतर में मुझे न्याय बांटना होगा यदि यह अभी जिस तरह से हम कहते हैं रोगी नारायण जिस तरह से हम कहते हैं चंडाल नारायण तो फिर उनकी हमको पूजा करनी है तो फिर जद यह जद कहेंगे अपराधी नारायण तो अपराधी के भीतर में देखिए कि दो तरह से हमको देखना होगा यदि मैं इंडिविजुअली अपराधी को देखता हूं या तो मैं कहूंगा अपराधी नारायण उसके भीतर में भी वही ईश्वर है इसलिए मुझे उसकी निंदा नहीं करनी उसके प्रति घृणा नहीं करनी उसके प्रति द्वेष भाव नहीं रखना उसके साथ में शत्रुता नहीं करनी किंतु यदि समष्टि दृष्टि से मैं देखता हूं तो वह है तो अपराधी आखिर में समाज का उसने कुछ तो बुरा किया है तो फिर उसको दंड देना मेरा कर्तव्य है तो माने रोगी नारायण चंडाल नारायण दरिद्र नारायण उसके प्रति क्या कर्तव्य है वह तो बड़ा ही क्लियर है व्यष्टि लेवल पे भी समष्टि लेवल भी इंडिविजुअल मेरा जो धर्म है वह वही कहता है जो कि कलेक्टिव धर्म कहता है किंतु अपराधी नारायण है या तो फिर यह शत्रु नारायण है दूसरे देश के शत्रु हमारे पर आक्रमण करते हैं तो उसके प्रति क्या हमारा एटिट्यूड रहना चाहिए उसके प्रति हमारा क्या व्यवहार रहना चाहिए वो गीता में बड़ा स्पष्ट रूप से बताया है कि नारायण के रूप में हमको उनके प्रति बिकॉज कि उनके भीतर में नारायण है उनके प्रति द्वेष नहीं रखना है और बिकॉज कि अपने देश की समाज की परिवार की रक्षा करना अपना जिम्मा है तो उनका मुकाबला भी करना है तो देखिए कि यह धर्म जो है उसको आप कितना विभिन्न रूप से इंटरप्रेट कर पाते हैं कितनी विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न एस्पेक्ट में उसको देख पाते हैं तो यहां
Swamiji follows Samashti Dharma in criticizing his opponents
पे स्वामी जी ने इन लोगों का जो मुकाबला किया इन लोगों का प्रतिवाद किया वो समष्टि धर्म उन्होंने फॉलो किया है स्वामी जी सिर्फ अपने बारे में नहीं सोचते हैं स्वामी जी पूरे भारत देश के पूरे हिंदू धर्म के बारे में सोचते हैं भारत का उत्थान होने वाला है हिंदू धर्म का पुनः जागरण होने वाला है और इस उत्थान में इस पुनः जागरण में किसी भी तरह की शंका संदेह उसकी जड़ में ना रह जाए इसके लिए इनका मुकाबला करना है तो एक दो सेंटेंस में यहां पर पढ़ लेता हूं अ जो हमने अभी तक पढ़ा है माय प्लान ऑफ कैंपेन उस प्रवचन में से ठाक स्वामी जी कहते हैं कि देयर आई वाज विद द लास्ट फ्यू डॉलर्स इन माय पॉकेट आई सेंट अ वायर टू माय फ्रेंड्स इन मद्रास दिस केम टू बी नोन टू द थियोसॉफिस्ट एंड वन ऑफ देम रोट नाउ द डेविल इज गोइंग टू डाई गॉड ब्लेस अस ऑल स्वामी जी अमेरिका में थे उनके पास में कुछ ही डॉलर बचे थे पतले वस्त्र थे शीत की सीजन में शीत की ऋतु में वह काम नहीं करने वाले थे स्वामी जी ने पत्र लिखा सहाय के लिए यह इन लोगों के जानने में आया और वे लोग बड़े ही खुश हो गए और आपस में कहने लगे कि नाउ द डेविल इज गोइंग टू डाई अब यह शैतान मर जाएगा ईश्वर की हम पर कृपा होगी तो स्वामी जी कहते हैं कि आजकल यह लोग जो प्रचार कर रहे हैं कि स्वामी जी अमेरिका में सक्सेस हुए उसके पीछे हमारा हाथ है तो क्या ऐसा करके उन लोगों ने मेरी सहाय की थी इज दिस द पेविंग द वे फॉर मी क्या इस तरह से मेरा रास्ता उन्होंने उन्मुक्त किया था बिल्कुल नहीं तो यह जो पूरा बैकग्राउंड हमने आज थोड़ा सा डिस्कस कर लिया कल से लेकर के अभी यह माय प्लान ऑफ कैंपेन पूरा प्रवचन हम एक के बाद एक स्टेप बाय स्टेप आगे देखेंगे आज यही त ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु
प्रश्न: अपने घरों में परिवारजनों से संघर्ष होने से क्या करे
देखो जद बाड़ी सब झगड़ा होय तो अमा देर तो मायर कथाया मायर बाड़ी ते केमन लो सेही पागली मामी शही पागली राधु से नलिनी सेही माकू और मायर भरा तो सई केवन चलन तो मायर जीवने मा की कोरे संसारे थके लेन सेटा से मायर कथा गुलो आदर पखे सब के बेसी शिखा प्रद हा यह बात भी सही है कि मां जिस तरह से संसार में रही थी उस तरह से हम किस तरह से रह पाएंगे किंतु देखिए कि ऐसा तो नहीं है कि मां जिस तरह से रही थी पहले ही दिन हम उस तरह से कर पाएंगे मां को आदर्श के रूप में रख कर के धीरे-धीरे करके अपना बिहेवियर परिवर्तन करना है आज मेरे मेरा किसी के साथ में झगड़ा हो गया तो मैंने सामने उसके साथ में झगड़ लिया यह पहली बार होगा दूसरी बार हमको यह देखना है कि देखिए कि उसका भी तो एक पॉइंट ऑफ व्यू है जो कि मुझे समझना चाहिए और उस पॉइंट ऑफ व्यू को मुझे रिस्पेक्ट करना चाहिए और फिर मेरा अहित भी ना हो और उसका पॉइंट ऑफ व्यू भी मैं रिस्पेक्ट करूं यह क्योंकि बहुत बार हम लोग क्या है ना सोचते हैं मैं ही सही हूं बाकी सब गलत है तो यह भी तो ठीक नहीं है सभी का अपना-अपना एक पॉइंट ऑफ व्यू है तो दूसरों का पॉइंट ऑफ व्यू क्या है मेरा पॉइंट ऑफ व्यू क्या है दोनों में किस तरह से समाधान किया जाए यह सोचना है नेक्स्ट टाइम जब झगड़ा होगा तो हम इतना तीव्र प्रतिवाद नहीं करेंगे थोड़ा सा उसको समझा करके कह पाएंगे यानी कि क्या है ये लाइफ टाइम की जर्नी है ऐसा कोई नहीं कहता कि प्रतिकार मत करो या प्रतिवाद मत करो ठाकुर ने तो बड़ा स्पष्ट कहा है कि प्रतिकार करना ही है जब तक हम गृहस्थ है किंतु वहां पर रुक नहीं जाना है अपनी यह जो आध्यात्मिक जर्नी इतनी लंबी है कि धीरे-धीरे करके हमको यह समझ डेवलप करती जानी है कि किस तरह से हाउ कैन आई डू बेटर नेक्स्ट टाइम नेक्स्ट टाइम मैं इससे अच्छा कैसे कर सकता हूं एक जन्म में शायद नहीं होगा दो-तीन जन्म किंतु इसको करते जाना है