Transcript
ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणी अवतार वरिष्ठा राम कृष्णाय ते नमः तो राजयोग हमारा जो चल रहा था स्वामी विवेकानंद रचित राजयोग का थर्ड चैप्टर प्राण वह हो गया है समाप्त के राजयोग का ही मैं एक समरी ले लेता हूं कि अभी तक हमने क्या देखा देखिए कि स्वामी विवेकानंद का जो पूरा कंप्लीट वर्क्स है उसमें राजयोग का टॉपिक और उसमें भी देखिए कि जो लोग राजयोग सिखाते भी है ना वोह लोग पतंजलि योग सूत्र सिखाते हैं तो अभी पतंजलि योग सूत्र में क्या है वैसे तो वह है बड़ा ही ट्रेडिशनल टेक्स्ट और उसके ऊपर में काफी सारी टिकाए भी लिखी गई है उसमें से व्यास टीका जो है वो बड़ी कहेंगे कि बड़ी ऑथेंटिक मानी जाती है और हमारे आधुनिक युग में हरिहरानंद अरण्य करके एक स्वामी जी है अपने ऑर्डर के नहीं है बाहर के हैं उन्होंने काफी अच्छा उसके ऊपर में संशोधन करके लिखा है जिसको कि हम लोग ट्रेनिंग सेंटर में भी पढ़ते थे और अभी भी जब भी ट्रेनिंग सेंटर के बाद में यदि आपको राजयोग का पतंजलि योग सूत्र पढ़ना है तो व्यास भाष्य और हरिहरानंद अरण्य की टीका उसके ऊपर में उसकी एक्सप्लेनेशन इसके साथ में पढ़ा जाता है तो यह जिस तरह से वेदांत ट्रेडिशनल है जिस तरह से भक्ति शास्त्र ट्रेडिशनल है वैसे ही पतंजलि योग सूत्र भी एक ट्रेडिशनल टेक्स्ट मानी जाती है किंतु हमने देखा कि इस चैप्टर में स्वामी जी हमको जो एक फ्रेमवर्क देते हैं प्राण और आकाश की व्हिच इज अ यूनिक फ्रेमवर्क अभी ऐसा नहीं है कि इस तरह का और किसी शास्त्र में नहीं है ठाकुर की तरह ही अभी ठाकुर जब कहेंगे कि ब्रह्म और शक्ति अभेद और ठाकुर के जद दो फंडामेंटल टीचिंग्स देखे तो कौन से हैं एक तो है कि ब्रह्म और शक्ति अभेद जद स्थिर रहता है स्थिर रहते हैं तो मैं उनको ब्रह्मण कहता हूं और यदि वह कार्य करते हैं तो मैं उनको शक्ति कहता हूं तो स्थिर अचल और सक्रिय अचल निष्क्रिय और सक्रिय दो एस्पेक्ट है एक ही रियलिटी के यदि यह मिट्टी है तो मिट्टी को जमीन पर पड़ी हुई है तो सिर्फ मिट्टी कहेंगे किंतु यह जो पोटर है कुम्हार है वह जद मिट्टी को फिर वह अपने वो चक्र होता है ना कुम्हार का उसके ऊपर में रख कर के एक के बाद एक डिफरेंट तरह के बर्तन बनाएगा तो उसको आप कहेंगे किसी को कहेंगे पात्र किसी को कहेंगे ग्लास किसी को कहेंगे खड़ा इस तरह से डिफरेंट डिफरेंट नाम देंगे किंतु वो वो अल्टीमेटली तो है एक ही चीज मिट्टी तो यहां पर भी देखिए कि जब ठाकुर कहते हैं कि जब निष्क्रिय है तो ब्रह्मण है सक्रिय है तो शक्ति है किंतु यहां पर देखिए कि ठाकुर जब सक्रिय और निष्क्रिय के बारे में कहते हैं ठाकुर इस तरह से नहीं कहते कि कहीं पर अज्ञान का आवरण है हां अज्ञान के आवरण के बारे में ठाकुर ने कहा है दो तीन उन्होंने उदाहरण दिए हैं एक तो उदाहरण है कि जब अपने कमरे में बैठे थे तो एक वस्त्र पास में पड़ा हुआ था तो ठाकुर कहते हैं कि देखो यह वस्त्र मैं अपने मुंह पर ले आऊंगा तो आप मुझे नहीं देख पाएंगे यदि किंतु मैं इसको हटा देता हूं तो आप मुझे स्पष्ट देख पाएंगे इसी तरह से उन्होंने राम लक्ष्मण और सीता का उदाहरण दिया था वन में से जा रहे हैं तीनों सर्वप्रथम है राम फिर है मां सीता और आखिर में है लक्ष्मण तो जब तक मां सीता बीच में है तब तक लक्ष्मण भगवान राम का दर्शन नहीं कर पाते जब वह मां सीता को प्रार्थना करेंगे कि आप रास्ता छोड़िए मुझे भगवान का दर्शन करना है तब कहीं जाकर के वह उनके दर्शन कर पाएंगे सो देखिए कि यह ट्रेडिशनल वेदांत जो है वह कहता है कि ब्रह्मण और यह जगत जीव जगत ईश्वर इन तीनों के बीच में मने चारों के बीच में मने दो रियालिटी है एक तो है कि ब्रह्मण है दूसरा है कि जीव जगत ईश्वर है तो इन दोन दोनों के बीच में अविद्या या अज्ञान का एक पर्दा आता है यदि आप वेदांत फिलोसोफी को उसमें डीप में जाएंगे तो कहेंगे कि व्यष्टि अज्ञान और समष्टि अज्ञान इस तरह से दो तरह के अज्ञान है समष्टि अज्ञान अर्थात कि कॉस्मिक लेवल इग्नोर अब यह कॉस्मिक लेवल इग्नोर में क्या होता है ब्रह्मण एक है उसके ऊपर में यह समष्टि अज्ञान का आवरण आता है तो फिर आप कहेंगे इसमें से हम को दूसरी ओर में ईश्वर दिखाई देता है हम लोग जब स्कूल में पढ़ रहे थे साइंस का क्लास होता था तो हमने एक एक्सपेरिमेंट किया था प्रिज्म का प्रिज्म अर्थात कि ये ट्रायंगुलर एक ग्लास होता है जिसमें से एक ओर से आप सूरज का प्रकाश डालिए तो जैसे ही एक ओर से सूरज का प्रकाश आता है तो प्रिज्म के दूसरे कोने से आपको यह सूरज का जो प्रकाश है वह सात व रंग है जो इंद्रधनुष के रेनबो के उसमें वह विभाजित हुआ दिखेगा अर्थात कि इसका अर्थ क्या है सातों कलरों से यह सूरज का प्रकाश बना है हालांकि यह जो सात कलर है इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेज के जो डिफरेंट फ्रीक्वेंसी उसमें और भी बहुत कुछ है उसमें इंफ्रारेड भी है अल्ट्रावायलेट भी है रेडियो वेव्स भी है एक्सरे भी है वगैरह वगैरह किंतु विजुअली हमको प्रकाश की किरण सूरज की किरण जो जनरली सफेद दिखती है प्रिज्म के एक एक साइड में से दूसरी साइड में जब जाएगी तो स्प्लिट हो जाएगी विघटित हो जाएगी सात कलर में तो यहां पर भी यह अविद्या या तो अज्ञान का आवरण जब ब्रह्मण के ऊपर में आता है तो दो तरह से आवरण होता है एक तो समष्टि अज्ञान दूसरा है व्यष्टि अज्ञान समष्टि अज्ञान अर्थात कि कॉस्मिक इग्नोर उसमें उसकी माने ये दोनों को हम प्रिज्म की उपमा दे तो मन का प्रकाश एक कोने से जाएगा तो दूसरे कोने से हमको ईश्वर दिखाई देंगे और जिसको व्यष्टि अज्ञान कहते हैं या तो फिर यह इंडिविजुअल लेवल पर जो इग्नोर है उसमें से एक कोने में से यदि ईश्वर का ब्रह्मण का प्रकाश जाएगा तो दूसरी ओर से हमको यह जीव है जितने भी जीव है यह सब हमको दिखाई देंगे मैं हूं आप है यह पृथ्वी की पॉपुलेशन है 700 करोड़ की इसके अलावा भी यह पशु पक्षी पेड़ पौधे सबके भीतर में तो एक तरह का चैतन्य है तो इंडिविजुअल लेवल जो चैतन्य है वह हमको यह व्यष्टि अज्ञान के माध्यम से दिखता है तो यह हो गया अपना अद्वैत वेदांत और अद्वैत वेदांत में भी बहुत सारे लोग कहेंगे कि आवरण अर्थात क्या ब्रह्मण के ऊपर में आवरण होना यानी कि सही सही में एक्स्ट्रा और कुछ उसके ऊपर में आता है नहीं यह जो आवरण की जो उपमा ज यहां पर ठाकुर भी देते हैं और यहां पर भी हमको वेदांत में इस तरह से समझाई जाती है वह एक उपमा मात्र है सही सही में देखें तो ठाकुर ने जिस तरह से कहा कि यदि स्थिर है तो ब्रह्मण है चलित है तो शक्ति है यानी कि ऐसा कभी ना हो जाए कि जगत में दो चीजें हैं एक तो ब्रह्मण है दूसरा अज्ञान है ब्रह्मण के ऊपर में अज्ञान रूपी प्रिज्म या तो अज्ञान रूपी एक गिलास रखेंगे तो दूसरी ओ से और ही कुछ दिखाई देगा यह जदी आप सर्कस वगैरह में जाएंगे म्यूजियम वगैरह में वहां पर डिस्टोर्टेड मिरर्स होते हैं यानी कि एक मिरर में एक तरह का आईना होता है डिफरेंट डिफरेंट कलर के एक आईने में देखेंगे तो आप बिल्कुल दुबले पतले दिखेंगे दूसरे आईने में दिखेंगे तो आप एकदम मोटे सोटे दिखेंगे क्यों क्योंकि आईना जो है वह फ्लैट नहीं है वो कॉन्वेक्स है यानी कि वह थोड़ा सा उसको शेप दे दिया गया है जिसकी वजह से आपका जो प्रतिबिंब है वह पूरा सा डिस्टोर्ट विकृत होक के दिखेगा छोटे बच्चे जब इस तरह से आईने में अपना चेहरा विकृत हुआ देखते हैं तो उनको बड़ा हंसी आता है बड़ा आनंद आता है तो यहां पर भी ऐसा नहीं है कि एक आईना है जिसके भीतर में से ब्रह्मण का प्रकाश हमको डिस्टोर्ट होकर के यह जीव जगत ईश्वर के रूप में दिखता है यह एक्चुअली है माने उपमा देने के लिए इस तरह से समझाया गया है एक आवरण की उपमा यदि सही सही में देखें तो ठाकुर जिस तरह से कहते हैं जो फंडामेंटल प्रिंसिपल है कि स्थिर है तो ब्रह्मण है चलित है तो शक्ति है यानी कि यदि ये अभी जैसे अद्वैत वेदांत में भी यह मिट्टी और यह घड़े की उपमा दी गई है सोना है और गहना है सोने को अपने गहने में परिवर्तित कर दिया जैसे कि एक नेकलेस के रूप में एक हार के रूप में तो क्या हम ऐसा कहेंगे कि सोने के ऊपर में एक माया का आवरण आ गया है एक डिस्टोर्टेड मिरर में उसको रखा है तो सोना हमको सोने का जो बिस्किट होता है वह सोने का बिस्किट हमको ना कि इस तरह से हर के रूप में या नेकलेस के रूप में या चूड़ियों के रूप में दिखता है नहीं वो उसको शेप दिया गया है इसके लिए वह इस तरह से दिखता है यदि समुंदर के ऊपर में आप लहरें देखेंगे तो क्या आप ऐसा कहेंगे कि अज्ञान का एक आवरण है उसकी वजह से समुंदर हमको लहरों के रूप में दिख रहा है नहीं वही समुंदर है यदि शांत है तो स्थिर धीर प्रशांत समुंदर दिखेगा यदि उसके ऊपर में लहरें जा रही है तो हमको लहरें दिखेगी लहरें देखने के लिए हमको समुंदर के ऊपर में और कोई आवरण या और कोई एक्स्ट्रा एलिमेंट की जरूरत नहीं पड़ती समुंदर ही अपने को लहरों में कन्वर्ट करता है या तो लहरों के रूप में अपने को रीशेप कर करता है ये तो यदि सही शब्द यूज किया जाए तो वो है रीशेप रदर देन की दिस एनवेलपिंग और दिस कवरिंग इंग्लिश में यदि हमको ठीक-ठीक शब्द खोजना है तो तो यदि मान लीजिए कि इस तरह से ईश्वर या तो फिर ब्रह्मण रीशेप होता है तो फिर दूसरा एक प्रश्न होगा कि ब्रह्मण रीशेप होता ही क्यों है ऐसा जरूरत क्यों पड़ गई ब्रह्मण को कि अपना स्वरूप बदलने की एक चीज दूसरा कि जद स्थिर अटल अचल निष्क्रिय जिनका स्वरूप है वह कार्य क्यों करता है यदि कर्म या तो कार्य तो उसमें होगा जहां पर सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट स्प्लिट बनती है जो कि प्योर सब्जेक्ट है प्योर सब्जेक्ट को कार्य या कर्म करने की आवश्यकता कहां आन पड़ी तो यहां पर इस तरह से है कि यह कर्म होता है वह एक इंडिविजुअल या तो फिर हम लोगों की दृष्टि में हमारे लिए जब तक हम लोग अविद्या अज्ञान में है तब बत तक हमको ब्रह्म कर्म करता सा दिखाई देता है किंतु सही सही हम सब्जेक्टिव रियलिटी यानी कि ब्रह्मण में चले जाए तो हमको किसी भी तरह का कर्म नहीं दिखेगा यानी कि इस तरह से देखिए यदि आप डॉक्टर के वहां पर गए होंगे या तो फिर इस तरह से एक ग्लास होता है एक ओर से डॉक्टर जो है वहां पर वह पेशेंट जहां पर बैठे हुए हैं उनको देख पाता है किंतु जहां पर पेशेंट बैठे हुए हैं वे लोग डॉक्टर को नहीं देख पाएंगे क्यों क्योंकि यह वन वे मिरर है मैं जब छोटा था हमारे घर के पास में एक एक छोटा सा एक डिस्पेंसरी था तो वहां पर मैं जाया करता था जब बीमार हो गया तो फिर या घर में से कोई बीमार हो जाते हैं तो वहां पर हम जाते थे तो जहां पर हम लोग बाहर में बैठते थे वहां पे ग्लास रहता था इसी तरह का तो मैं ऐसा ग्लास में से देखने का प्रयास करता था दिख कुछ नहीं रहा है भीतर में क्या है किंतु जैसे ही डॉक्टर की केबिन में जाएंगे तो इमीडिएट आपको दिखेगा कि बाहर में उसी ग्लास के माध्यम से कि बाहर में सब उस बेंच के ऊपर में पेशेंट बैठे हुए हैं तो ये हो गया वन वे मिरर तो वैसे ही यदि आप ब्रह्मण की ओर से देखेंगे तो आपको कुछ नहीं दिखेगा बाहर में क्यों क्योंकि ब्रह्मण इज ओनली वन रियलिटी किंतु यदि हम अपनी दृष्टि से देखेंगे तो हमको फिर ये जीव जगत ईश्वर सब कुछ दिखेगा तो अभी प्रश्न होगा कि जदी जो एक ही है वो कार्य कैसे करेगा कार्य करेगा तभी तो उसके ऊपर में यह जीव जगत रूपी यह सब उपाधि है या ऑब्जेक्ट्स है वह सब आएंगे तो क्या है ना कि यह पूरा आर्गुमेंट है ना सर्कल में हो जाता है आप कहेंगे ब्रह्मण यदि कार्य नहीं करता तो फिर यह फिर हमको यह मैं कहां से आया राइट मेरा जो इंडिविजुअल अस्तित्व है मेरे भीतर में जो सूक्ष्म शरीर है सूक्ष्म शरीर के भीतर में मन बुद्धि चित्त अहंकार है यह मेरा स्थूल शरीर इसी जन्म में यहीं पर रह जाएगा जब मेरा देहांत होगा मृत्यु होगी तो मैं स्थूल शरीर को त्याग करके यह सूक्ष्म शरीर के माध्यम से दूसरा स्थूल शरीर ग्रहण करूंगा तो अभी स्थूल शरीर के बारे में यदि हम थोड़ा सा सोचना बंद करें सिर्फ मेरे सूक्ष्म शरीर के बारे में भी मैं यदि सोचूं तो भी तो यह प्रश्न होता है कि मेरा सूक्ष्म शरीर आपके सूक्ष्म शरीर से भिन्न है तभी तो आप हम अपने अपने कर्म के जो यह फ्लो है प्रवाह है उसको फॉलो कर पा रहे हैं तो फिर यह सभी का कर्म का प्रवाह विभिन्न है सभी के कर्म प्रवाह हों का बैलेंस लेखा जोखा पॉजिटिव नेगेटिव मेंटेन करने के लिए सभी के भीतर में विभिन्न इंडिविजुअल जीव है सूक्ष्म शरीर है तो फिर यह सूक्ष्म शरीर आया कहां से यदि ब्राह्मण के ऊपर में आवरण नहीं होता तो यह तो तब तक तो यह सेपरेट नहीं होता तो यह क्या है कि यह पूरा एक सर्कुलर आर्गुमेंट हो जाता है आप यदि हमारी दृष्टि से देखेंगे तो हमको ब्रह्मण के ऊपर में एक आवरण सा दिखना चाहिए तभी तो यह आवरण है बोलकर के ही हम ब्राह्मण को नहीं देख पा रहे हैं हम सिर्फ अपने को ही देखते हैं जैसे कि मैं डॉक्टर की केबिन में यदि मैं भीतर में बैठा हूं तो डॉक्टर के वहां पे मुझे सब कुछ दिखाई देता है माने ये डिफरेंट डिफरेंट पेशेंट है रास्ते में क्या-क्या व्हीकल आते हैं जाते हैं सब कुछ देखता है किंतु मैं बाहर में हूं तो बाहर में मुझे कुछ नहीं दिखेगा भीतर में इस काच में से तो वैसे ही जद यह बाहर अर्थात कि ब्राह्मण और भीतर अर्थात कि जीव हमारी दृष्टि से जगत को देखना तो एक्चुअली जो कॉम्प्लिकेटेड आर्गुमेंट यहां पर है वह है कि जयदिश के ब्रह्मण के ऊपर में आवरण नहीं होता तो जीव नहीं बनता यदि जीव बना है हमको ब्रह्मण नहीं दिख रहा है उसका अर्थ ही है कि एक तरह का आवरण है किंतु दूसरी ही क्षण पे यह लोग अद्वैत वेदांती कहते हैं कि यह जो आवरण या अज्ञान का कांसेप्ट है वह एक प्रिमिटिव कांसेप्ट है ठीक-ठीक यदि आपको देखना है तो ब्रह्मण स्थिर है या तो सक्रिय है इस तरह से देखना है किंतु प्योर अद्वैद वेदांत की दृष्टि से ब्रह्मण के ऊपर में किसी भी तरह की उपाधि नहीं हो सकती किसी भी तरह का गुणधर्म नहीं हो सकता तो स्थिर ब्र मन जो कि प्योर सब्जेक्ट है उसके ऊपर में कर्म या कार्य आया कहां से यदि कर्म या कार्य हुआ तभी तो कहीं जाकर के यह जो विभिन्न सृष्टि है उसकी रचना हुई है यानी कि सूरज का यह प्रकाश है उसके सामने एक प्रिज्म रखेंगे तभी आपको सूरज का प्रकाश विभिन्न रंगों में विघटित हुआ दिखाई देगा जब तक यह प्रिज्म नहीं है तब तक सूरज सूरज ही है तो जब तक आप यह कहेंगे कि हां प्रिज्म के वजह से यह विघटन दिखता है तो तो प्रश्न होगा तो प्रिज्म इज समथिंग अदर देन सन कारण कि यदि प्रिज्म नहीं होगा तो हम भी नहीं होते हम है इसका अर्थ ही है कि यहां पर ब्रह्मण के अलावा और एक रियलिटी है तो और यदि प्योर अद्वैत विधान की दृष्टि से कहेंगे तो कहेंगे कि यह प्रिज्म भी नहीं है यह क्या है एक बड़ा ही सर्कुलर आर्गुमेंट है जिसका कि कोई नहीं है जिसको कहते हैं ना कि चिकन या एग पहले क्या आया अंडे में से मुर्गी होती है मुर्गी में से अंडा होता है तो सबसे पहले क्या आया मुर्गी आई जिसके भीतर में से अंडा आया था ना कि सबसे पहले अंडा आया कि जिसमें से मुर्गी आई थी देयर इज नो सच सॉल्यूशन टू दिस सर्कुलर आर्गुमेंट मैं फिर से इस आर्गुमेंट को सराइज कर देता हूं मैं हूं इस इमीडिएट जैसे ही मैं मेरी चेतना के माध्यम से मैं अपने को सोचता हूं मैं इंडिविजुअल है मेरा अस्तित्व साथ में ही ब्रह्मण और माया ऐसे दो अस्तित्व होने चाहिए यदि ब्रह्मण और माया दो नहीं होते तो मैं नहीं होता यह ऐसा है कि मेरा जन्म हुआ है अर्थात कि पिताजी और माताजी दोनों है यह दोनों में से सिर्फ एक ही होते तो मेरा जन्म ही नहीं होता तो यहां पर भी जैसे ही मैं यह सोचता हूं कि मैं हूं उसका अर्थ ही है कि ब्राह्मण के ऊपर में या तो ब्राह्मण कर्म करके या तो फिर ब्राह्मण के ऊपर में एक आवरण सा होकर के इसका ट इज समथिंग एक्सटर्नल टू ब्रह्मण व है बोलकर के मैं हूं और ब्रह्मण इट सेल्फ कहता है कि मेरे अलावा और कुछ भी नहीं है सो व्हाट इज दैट रियलिटी यह जो कंफ्लेक्स सॉल्व करने के लिए पूरा अद्वैत वेदांत बना है अद्वैत वेदांत कहता है कि ना ही मैं हूं ना ही माया है सर्फ ब्रह्मण ही है किंतु फिर मेरा जो अस्तित्व है इस चीज को आप किस तरह से प्रूव करेंगे तो सही में यह जो सर्कुलर आर्गुमेंट है इसका सॉल्यूशन इतना इजी नहीं है या तो फिर कहेंगे कि हम जो अपना जो मन है अपनी बुद्धि है इसके माध्यम से हम इसका सॉल्यूशन नहीं ले आ पाएंगे जिस क्षण हम ब्रह्मण में स्थित हो जाएंगे उसी क्षण यह जो पैराडॉक्स जो है कि ब्रह्मण एक और हमको कर्म करता सा दिखाई देता है एक दृष्ट माने एक फिलोसोफी के अनुसार दूसरी फिलोसोफी के अनुसार कर्म ब्राह्मण के ऊपर में एक माया का आवरण है ऐसा कुछ दिखाई देता है उसकी वजह से सृष्टि हुई है और दूसरा कांसेप्ट है कि ब्राह्मण के ऊपर में ना ही माया का आवरण है ना ही ब्रह्म किसी तरह का कर्म करता है ना ही उसके ऊपर में किसी तरह की क्रिया होती है यह जो पैराडॉक्स है इट कैन बी रिजॉल्वड ओनली व्हेन वी आर एस्टाब्लिशड इनटू ब्रह्मज्ञान इट सेल्फ जब हम ब्रह्मज्ञान में स्थित हो जाएंगे तब यह पैराडॉक्स का हमको उत्तर मिल जाएगा यह जो म जन बुद्धिज्म में वह क्वान बोल कर के एक पजल दी जाती है एक शिष्य को अब यह टीचर कहता है कि यू आर ऑलरेडी एस्टाब्लिशड इन एनलाइन मेंट जस्ट यू डू नॉट नो दैट यू आर इनलाइटेंड सो यदि यह तुमको पजल दी गई है यह पजल के ऊपर में सोचो जिस क्षण तुमको पता चलेगा कि यह पजल किसी कार्य मतलब यह पजल जो है ना इसका कोई उत्तर ही नहीं है और उत्तर होता भी नहीं है क्योंकि यह पैराडॉक्स कभी भी रिजॉल्व नहीं होते य य हैव टू ट्रांस दैट सिचुएशन जैसे कि एक हाथ से बचती हुई ताली ब टीचर कहेगा एक हाथ से बचती हुई ताली का किस तरह का आवाज होता है तुम मुझे बताओ तो नेचुरली है कि एक हाथ से ताली कैसे बजाएंगे इसका आवाज कैसे आएगा इस पैराडॉक्स पे आप जितना सोचेंगे उतना ही आप उलझते जाएंगे एक समय ऐसा आएगा कि आपका मन वहीं पे स्थिर हो जाएगा और जैसे ही मन स्थिर हो गया वैसे ही ये पैराडॉक्स रिजॉल्व हो गया ऐसा नहीं है कि इस प्रश्न का उत्तर मिला बात यह कि आपने इस सिचुएशन को ही ट्रांजेंडर दिया जब तक मेरे मन के भीतर में एक डाउट है जब तक मैं माया के आवरण में बंधा हुआ हूं जब तक मैं कर्म के पाश में बंधा हुआ हूं तब तक मुझे किसी भी तरह का फंडामेंटल पैराडॉक्स है जीवन का उसका उत्तर नहीं मिलेगा इस तरह के बहुत सारे पैराडॉक्स है यदि इस जगत में दुख क्यों है यह एक पैराडॉक्स है हालांकि हमको पता है कि स्वामी जी कहते हैं कि सुख और दुख हमको अल्टीमेटली ईश्वर की ओर ले जाते हैं यदि सुख ही होगा दुख नहीं होगा तो कोई भी इस जगत में ईश्वर प्राप्ति के लिए प्रयास नहीं करेगा तो वह तो एक इजी है पैराडॉक्स सॉल्व करने के लिए किंतु यह जो ब्रह्मण रूपी जो पैराडॉक्स है उसका सॉल्यूशन इतना इजी नहीं है वी विल हैव टू ट्रांस द कंडीशन इन व्हिच वी आर राइट नाउ और यह हमको ठाकुर के दूसरे टीचिंग की ओर ले जाता है ठाकुर कहते हैं कि सर्वप्रथम नेति नेति करके इस जगत का त्याग कीजिए तब हम कहीं जाकर के ब्रह्म ज्ञान में स्थित होंगे जैसे ही ब्रह्म ज्ञान में स्थित होंगे यह जितना भी पैराडॉक्स है यह जितना भी विरोधाभास है इ जगत में जितनी वासना एं है तृष्णा है तृष्णा बुद्धि शब्द है तो ये हालांकि संस्कृत के आधार पर ही लिया गया है ये जितनी कामना वासना या तृष्णा यह जितनी भी है वह सब कुछ रिजॉल्व हो जाएगी कर्म का यह जो फेरा है वह कट जाएगा हमने देखा कि कर्म और ज्ञान इन दोनों के बीच में क्या डिफरेंस है बहुत बार जो भगवान स्वामी विवेकानंद को फॉलो करते हैं उन लोगों को उन लोगों के मन में यह प्रश्न एक होता है एक संदेह होता है कि शंकराचार्य ने कहा कि ज्ञान ही जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है और जहां पर ज्ञान है वहां कर्म नहीं जहां पर कर्म है वहां पे ज्ञान नहीं तो इस पैराडॉक्स को हमने इस तरह से रिजॉल्व किया था कि जगत को आप दो पार्ट में डिवाइड कर दीजिए एक तो मटेरियल वर्ल्ड है दूसरा है कॉन्शियस वर्ल्ड यह कॉन्शियस वर्ल्ड के भीतर में यह मटेरियल वर्ल्ड है उसका एक रिफ्लेक्शन जाता है और मेरी यह जो प्योर अवेयरनेस है वह इस रिफ्लेक्टेड वर्ल्ड के साथ में इंटरेक्ट करती है और यह जो इंटरेक्शन होता है उसी से प्रकट होता उसी को कहते हैं कर्म यानी कि मैं शारीरिक लेवल पर तो कर्म कर ही रहा हूं किंतु साथ-साथ में मैं मेंटल लेवल पर भी कर्म करता हूं अभी जैसे देखिए मैं जब लीमड़ी में था तब मैं आखिर में मंदिर में पूजा किया करता था इसके बाद में जब से मैं यहां पर आया हूं पब्लिकेशन में तब से यह मंदिर में काम करना खास करके पूजा आरती करना मेरा बंद ही हो गया है तो अभी राजकोट में भी कोई इस तरह का यह नहीं था अपॉर्चुनिटी ही बेलूरमठ में था अभी जब यहां मैं जब से आया हूं तब यहां पर क्या है छोटा आश्रम है चार पांच ही लोग हैं हम साधु तो बीच-बीच में मुझे आरती करनी पड़ती है तो देखिए कि इतने सालों के बाद में मैं फिर से आरती कर रहा हूं पहले एक दो बार आरती किया तो मुझे बड़ा अच्छा लगा जैसे-जैसे में ऐसा दिया घुमाना है फिर यह पुष्प है फिर यह जो शंख फिर ये वस्त्र फिर चामर ऐसा मैं जैसे-जैसे ऑफर करता जाता हूं मेरा मन एक एकदम स्थिर होकर के उसी के ऊपर में लगा है कि हां मैं यह पंच प्रदीप है ठाकुर के सामने मैं घुमा रहा हूं मेरा पूरा माइंड वहीं पे है अर्थात कि इतने सालों के बाद में मैं कर रहा हूं तो मुझे बड़ा ही अलर्ट रहना पड़ेगा कि इसमें कहीं गलती ना हो जाए दूसरा क्या है एक हाथ से उसको गोल-गोल घुमाना है पंच प्रदीप को दूसरे हाथ से घंटी बजाना है यानी कि घंटी बजाने का जो एक एक्शन है वो और यह हाथ को गोल घुमाने का एक्शन दोनों डिफरेंट है साथ में करना है सिंक्रोनाइज वे में करना है एट द सेम टाइम कहीं पर भी डिस्कंटीन्यूटी नहीं होनी चाहिए जो प्रैक्टिस हो जाती है जिन पुजारी महाराज की उनका बड़ा ही इजी हो जाता है एक हाथ से घंटी बजाते जाते हैं एक हाथ से दिया घुमाते जाते हैं फिर ध्यान यह रखना है कि यह जो आरती है कौन से श्लोक तक पहुंची है क्योंकि आपको जैसे ही यह नमो नमो प्रारंभ होता है वहीं से चामर घुमाना शुरू कर देना है यानी कि प्रथम तो पंच प्रदीप उसके बाद में सिंगल प्रदीप उसके बाद में यह शंख फिर यह है वस्त्र और फिर आखिर में पुष्प उसको इस तरह से आपको मैनेज करना है कि जहां जब से नमो नमो प्रारंभ हो उस समय अपने हाथ में चामर आ जानी चाहिए तो यह पूरी फार्मूला है बड़ा ही कंसंट्रेशन करके आपको करनी पड़ती है यह कंसंट्रेशन आपको एकाद सप्ताह के लिए करना पड़ेगा उसके बाद में क्या है वह सहज हो जाता है इंस्टिंक्टिवली आपका जो मन है आपका जो हाथ है ऑटोमेटिक यह सब कर्म को करने लगेगा उसके बाद में आपको इतना अलर्ट रहने की जरूरत नहीं है सहज हो जाता है तो मैंने जब पहली बार यहां पर आकर के ऑलमोस्ट 12 1 साल हो गए पहली बार मैं आरती कर रहा था मेरा पूरा माइंड उसी के ऊपर में है इस एक हाथ से मुझे वो शंख है उसको घुमा रहा हूं दूसरे हाथ से मैं घंटी बजा रहा हूं पूरा कंसंट्रेशन मेरा पूरा उसी के ऊपर में है 15 मिनट जो आरती चलती है 100% कंस टेड ऑन व्हाट आई एम डूइंग तो देखिए कि इस क्षण में क्या होता है मेरा जो दैहिक कर्म शारीरिक कर्म जो है और मानसिक कर्म है वह एकाकार हो गए हैं मैं हाथ से भी शंख घुमा रहा हूं हाथ से ही घंटी बजा रहा हूं और मेरा माइंड भी एगजैक्टली किस तरह से शंख को घुमाना है किस तरह से घंटी बजाना है उसी के ऊपर में लगा है 100% उसी के ऊपर में लगा है और यह डर है कि इतने सारे इतने सालों के बाद में मैं फिर से आती कर रहा हूं कहीं गलती ना हो जाए राइट अभी एक दो बार इस तरह से आरती किया तो इमीडिएट पहले वाला जो मेरा एक्सपीरियंस था वोह फिर से वोह आ गया कॉन्शसनेस के भीतर में ऐसा होता है ना कभी-कभी आप बहुत सालों के बाद में कुछ काम करते हैं तो शुरू शुरू में बड़ा झकते हैं किंतु कुछ देर के बाद में कुछ क्षण के बाद में इमीडिएट आप उसमें वो फिर से पुराना एक्सपर्टाइज्ड आई थिंक ठन 12 में 2012 में आई थिंक मैं गुजरात में आया था पहली बार लिमडी पोस्टिंग हुआ था तो कोलकात्ता से मैं अहमदाबाद उतरा अहमदाबाद ट्रेन में और फिर वहां से लिमडी के जो बड़े महाराज थे बापा महाराज उन्होंने मुझे कह दिया था पहले से ही कि एक डिवटी आएगा तुमको वहां पर रिसीव करने के लिए ट्रेन स्टेशन पे फिर उसके साथ में वह अपनी कार में तुमको लीमड़ी ले आएगा लीमड़ी अहमदाबाद से आई थिंक दो ढाई घंटे का ता है तो मैंने कहा ठीक है अभी जैसे पहली बार मैं ज जैसे ही अहमदाबाद स्टेशन पर उतरा और यह जो डिवटी है मुझे रिसीव करने के लिए आया तो उसको पहले ही पता है कि मैं गुजराती हूं वो मेरे साथ में गुजराती में बात करना शुरू कर दिया किंतु मैं बात कर रहा हूं हिंदी में क्यों इतने सालों से मैंने गुजराती में बात की ही नहीं है बड़ा रेयरली गुजराती में बात करने का मौका आता था तो मैं हिंदी में बोल रहा हूं वो गुजराती में बोल रहा है तो थोड़ी देर के बाद में उसने पूछा महाराज गुजराती भूल गया क्या मैंने कहा अई पता नहीं भैया इतने साल के बाद में तो अभी मैं भी थोड़ा सा सोच रहा हूं फिर जैसे भी गाड़ी स्टार्ट की और जाना शुरू हुए लिंबड़ी की ओर एक घंटे में वो बात कर रहा है तो मैं उत्तर दे रहा हूं तो कब मैं हिंदी में से गुजराती ट्रांसलेशन कर दिया मुझे पता ही नहीं चला बाय द टाइम लीमड़ी आया और मैं बापा महाराज के साथ में बात कर रहा हूं प्योर गुजराती तो कभी-कभी क्या होता है कि कोई चीज अब पहले बड़ी अच्छे से आती थी फिर लंबा गैप हो जाता है और फिर से उसको सीखते हैं या तो फिर से उसको करने का प्रयास करते हैं शुरू में थोड़ी सी झक होगी किंतु बाद में वो फिर से ऑटोमेटिक हो जाएगा तो यहां आरती में भी पहले एक दो दिन मुझे बड़ा ही अलर्ट रहना पड़ा था कि कहीं इसमें पहले पंच प्रदीप उसके बाद में एक शिखा का प्रदीप उसके बाद में फिर यह शंख उसके बाद में यह वस्त्र फिर यह पुष्प चामर यह सीक्वेंस में कहीं गड़बड़ ना हो जाए काउंट करना है तीन बार ठाकुर को घुमाना है तीन बार मां को तीन बार स्वामी जी को काउंट में कहीं गड़बड़ ना हो जाए फुल अटेंशन उसके ऊपर है अर्थात कि मेरा देह जो कर्म कर रहा है और मेरा मन जो कर्म कर रहा है वो एक ही है किंतु दो-तीन दिन के बाद में जैसे ही मेरी एक्सपर्टाइज्ड ना कि कुछ मैं क्या थोड़ा सा घूमने के लिए टहलने के लिए जाऊंगा यहां पर छत के ऊपर में टहलने का बड़ा सुंदर है तो कभी-कभी मैं क्या करता हूं टहलते टहलते कुछ चिंतन करता रहता हूं या तो फिर मैं वो लिकटी बनाता हूं वो कावा जो होता है ना तो इस तरह से कुछ बनाऊंगा तो मैं कमरे में जाकर के मेरे पास में कितना अभी 7:00 बजे आरती खत्म हो गई 6:30 से 7:00 तो मेरे पास में 9:00 बजे तक का टाइम है 9:00 बजे नाइट क्लास होता है तो 2 घंटे में मैं क्या करूंगा तो ये यह सोचता हूं कभी-कभी सोचता हूं कि अच्छा कल ऐसा कुछ हुआ था तो क्यों इस तरह से हुआ या तो फिर प्रश्न होगा कि कल फिर मुझे सुबह को क्लास लेना है तो क्लास में मैं क्या बोलूंगा देखिए ये स्प्लिट हो गया मेरा देह या मेरा शरीर ठाकुर की आरती कर रहा है वह आरती का कर्म कर रहा है किंतु मेरा मन है वह और ही कुछ कर रहा है उसका यह आरती में ध्यान ही नहीं है फिर मैं बड़ा जोर करके आरती प ध्यान दूंगा नहीं नहीं आरती कर रहा हूं ठाकुर की आरती है आरती पे ही ध्यान होना चाहिए देखिए कितनी बार ऐसा होता है जब इस तरह का कोई चैलेंजिंग कर्म आप करते हैं तो क्या है कि आपका मन और शरीर एक ही कर्म करता है सिंक्रोनाइज होकर के किंतु इस तरह का कर्म करते हैं जो कि रूटीन है तो रूटीन कर्म करने से ही देखेंगे कि आपका जो मन है ना आपके शरीर के साथ में से डिसोसिएट हो जाता है वह अपना ही एक जगत में चला जाता है कोई कोई लोग होते हैं ना एब्सेंट माइंडेड होते हैं उसके साथ में आप बात करेंगे तो उत्तर भी नहीं देखा फिर हम उसको पूछेंगे क्यों अरे तू क्या कर रहा था कौन सी दुनिया में रह रहा था तो बोलेगा अरे नहीं नहीं फिर से बताओ तो देखिए कि अपना मन अपने यह जो अंतःकरण इसके भीतर में मन के भीतर में कॉन्शियस निस के भीतर में एक दूसरी सृष्टि की रचना करता है और इस सृष्टि के साथ में हम इंटरेक्ट भी करते हैं जैसे कि हम सपने में सपना देखते हैं अभी सब कुछ सपने में देखा हुआ सब कुछ जो है वह अपने भीतर में है उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है कि बाहर से कुछ आकर के सपने में मैं देख रहा हूं कि मैं बाइक चला रहा हूं तो सपने में देखी हुई बाइक का रियल लाइफ की बाइक के साथ में कोई लेना देना नहीं है किंतु देखिए कि वहां पे भी यह सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट डिवीजन बना रहता है मैं समथिंग एल्स यानी कि बाइक को चला रहा हूं मैं और किसी के साथ में बात कर रहा हूं हालांकि दोनों मेरी ही कॉन्शियस निस के भीतर में है किंतु मैं जो हूं व बाकी सब चीजों से सेपरेट हुआ दिखाई देता हूं यह कभी-कभी ऐसा होता है कि किसी के साथ में मैं बात कर रहा हूं तो मुझे यह पता है कि मैं क्या कहूंगा किंतु सामने वाला क्या कहे हालांकि मेरा खुद का सपना है हालांकि मेरे खुद के मन की यह पैदाइश है किंतु फिर भी मैं यह नहीं कर पाऊंगा प्रिडिक्ट नहीं कर पाऊंगा कि वह क्या कहने वाला है जब तक वो एक्चुअली वह कहना दे तो देखिए कि यह जो ऑब्जेक्टिव रियलिटी जो है अपने बाहर में जो जगत है उसका एक रिफ्लेक्शन अपने मन के भीतर में आता है और दो तरह के कर्म होते हैं जैसे कि यह मैं अपने शरीर से अपने हाथों से आरती कर रहा हूं किंतु अपने मन से मैं वह लिकटी बना रहा हूं या कावा बना रहा हूं दो तरह के कर्म हो रहे हैं एक मानसिक कर्म हो रहा है एक दैहिक शारीरिक कर्म हो रहा है तो जब शंकराचार्य कहते हैं कि कर्म और ज्ञान एक साथ में नहीं रह सकते तो वह इस मानसिक कर्म के बारे में कहते हैं कि हमारे दे मन के भीतर में जो सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट स्प्लिट है यह जो सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट ये डिविजन है वो नहीं होना चाहिए सब कुछ सब्जेक्ट हो जाना चाहिए दिस इज द आइडियल ऑफ ज्ञाना ज्ञान क्या है कि हमारे मन के भीतर में किसी भी तरह की वृत्ति का उदय ना हो जो योग शास्त्र में दूसरा ही सूत्र है योग चित्त वृत्ति निरोध यह चित्त की वृत्तियों का निरोध ही इसको कहते हैं योग प्रथम सूत्र है अतः योगासनम अर्थात कि हम योग रूपी अनुशासन योग रूपी डिसिप्लिन का प्रारंभ करते हैं अतः यानी लेटस नाउ बिगिन और दूसरा ही सूत्र है योगः चित्त वृत्ति निरोध इसका अर्थ है चित्त की वृत्तियों का निरोध करना इसी को कहते हैं योग तो शंकराचार्य की डेफिनेशन से जो ज्ञान है यही यहां पर चित्तवृत्ति निरोध के रूप में कहा गया है चित्तवृत्ति अर्थात कि यह कर्म हम अपने मन से जो कुछ भी सोचते हैं हमारे मन में जितने भी सेंटीमेंट है जितनी भी एक्शंस है जितने भी डिजायर्स से यदि हम सोए हुए है तो जो सपना आते हैं सब कुछ कर्म है यानी कि सब्जेक्ट और ऑब्जेक्ट के बीच में इंटरेक्शन है मेरी अवेयरनेस एक है इस अवेयरनेस के माध्यम से मैं विभिन्न मानसिक ऑब्जेक्ट के साथ में कार्य कर रहा हूं और यह कर्म करना इसी कर्म का नाश वही है ज्ञान अर्थात कि जब आप यह कहते हैं कि मैं शंकराचार्य के द्वारा उपदेश ज्ञान मार्ग में जा रहा हूं इसका अर्थ यह यह कतई नहीं है यह बिल्कुल नहीं है कि स्वामी जी के द्वारा कहा हुआ कर्म योग आप नहीं कर पाएंगे क्यों क्योंकि कर्म योग जो करना है वोह तो शारीरिक क्रिया है जद मैं यहां पर स्कूल चला रहा हूं या तो फिर यहां पर जैसे एक सेरेब्रल पाल्सी एक डिस्पेंसरी है सेरेब्रल पालिसी क्लीनिक है तो मैं वहां पर जाऊंगा वहां पर जो कुछ भी काम करना है मुझे वो तो मेरा देह करेगा हां जब मैं बिल्कुल पहली बार वहां पर जाऊंगा तो यह तो मेरे लिए बड़ी चैलेंज है मैंने कभी सीपी क्लीनिक में काम नहीं किया ये सेरेब्रल पाल्सी चीज क्या है उसके बारे में भी मुझे ज्यादा पता नहीं हालांकि राजकोट में यह क्लीनिक था तो वहां पर मैं जाया करता था तो वहां के जो हमारे इंचार्ज स्वामी जी थे उनके साथ में डिस्कस भी होता था किंतु क्या है वो एक डिटैच क्यूरियोसिटी के रूप में हां ऐसा कुछ है ऐसा कुछ होता है तो अब खुद जब आप इंचार्ज होते हैं तो आपको और थोड़ा सा उसमें अटेंशन देना पड़ता है तो पहली दूसरी बार जब आप जाएंगे तो आपका शरीर और मन दोनों वहां पर लगा है यानी कि शारीरिक कार्य भी आप क्लीनिक में कर रहे हैं मानसिक कर्म भी आप सीपी क्लीनिक में कर रहे हैं किंतु कुछ दिनों के बाद में आप देखेंगे कि जब यह टास्क सब रूटीन हो जाती है तब आपका देह वहां जाकर कर्म करेगा किंतु आपका जो मन है मन एगजैक्टली उस कर्म में संलग्न नहीं होगा इसका अर्थ क्या यह है कि हम अपने मन को वांडर होने दे अपने मन को इधर-उधर घूमने दे नहीं देखिए चित्त की वृत्तियों का निरोध करना अर्थात कि म मन को शांत कर देना ऐसा नहीं है कि मन को और किसी कार्य में लगा के रखना वह तो बिल्कुल गलत हो गया अपने हाथों से मैं आरती कर रहा हूं अपने मन से मैं और कुछ सोच रहा हूं यह तो ठीक नहीं हुआ ठाकुर की आरती करना ये तो आदर्श नहीं है ठाकुर की मूर्ति नजर के सामने है और मैं और कुछ सोच रहा हूं यह तो बहुत गलत है यदि मैं सीपी क्लीनिक में जाकर के बच्चों के वेलफेयर के बारे में नहीं सोच करके और कुछ सोच रहा हूं कि हां अभी कॉफी पीने का टाइम हो गया है तो कॉफी कहां पिएंगे वहां पे सिफ क्क में बनाएंगे ना कि यहां पर आकर के मैं किचन में पिऊंगा यदि मैं ऐसा कुछ सोच रहा हूं विच इज वेरी रंग अन एथिकल वो तो इस तरह हो गया नहीं बात यह नहीं है कि मैं अपने मन को और कहीं पर ले जाऊं बात यह है कि मन के भीतर में सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट डिवीजन है और इन दोनों के बीच में जो कर्म हो रहा है इस कर्म को मैं काट दूं इससे अर्थ क्या होगा कि मन के भीतर में कर्म नहीं होगा बाहर में कर्मा हो रहा है तो यह यदि आदर्श है तो प्रश्न इमीडिएट सामने यह हो होगा कि यदि मेरा मन शांत है मन कोई भी कर्म नहीं कर रहा है तो क्या मैं बाहर का कर्म सक्सेसफुली कर पाऊंगा जैसे कि मैंने आरती का उदाहरण दिया कि मुझे यह दिया तीन बार घुमाना है जब तक यह श्लोक चलता है आरती का उसके बाद में दूसरा श्लोक स्टार्ट होगा तो अभी मुझे प पंच प्रदीप रख कर के एक प्रदीप जो है एक शिखा प्रदीप उसको घुमाना है एक एक दीप वाला प्रदीप उसको घुमाना है तो यह तो मैंने सोचा तभी तो मैं ये एक्शन ले पाया क्या बिना सोचे मैं एक्शन ले पाऊंगा हां एक्चुअली देखिए कि बिना सोचे ये शब्द गलत है बिना सोचना यह कहूंगा कि इंटूटिव जो है एक्शन या तो फिर कहेंगे स्वामी जी जिस तरह से इसको कहते हैं कि हम जो कॉन्शियस लेवल पे रहते हैं उससे भी एक हायर लेवल है जिसको कहते हैं सुपरकॉन्शियस जब ये सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट स्प्लिट मिट जाएगा जब तक मेरे मन के भीतर में मेरी अवेयरनेस और यह जो बाहर के जगत का रिफ्लेक्शन यह है और इन दोनों के बीच में जो कर्म हो रहा है यह मिट जाएगा यह दोनों के बीच का डिवीजन समाप्त हो जाएगा बाहर के जगत को मेरा जो रिफ्लेक्शन हो रहा है उसको मैं काट दूंगा कर्म को मैं बंद कर दूंगा इमीडिएट मेरा अवेयरनेस जो है वो कॉन्शियस लेवल से सुपरकॉन्शियस लेवल की ओर चली जाएगी ये और यह जब सुपरकॉन्शियस लेवल पे आ जाएंगे तब क्या होगा कि सुपरकॉन्शियस लेवल पे तो सुपर नॉलेज सुपर जो भी इस जगत में जो कुछ भी नॉलेज है जो कोई भी इंटू है जो कोई भी इंटेलिजेंस है जो अवेयरनेस है सब कुछ तो सुपरकॉन्शियस लेवल पे है दैट मींस आई विल हैव डायरेक्ट एक्सेस टू एंटायस वर्ल्ड ये स्पेस टाइम के भीतर में स्पेस टाइम और इंडिविजुअल यह जो मनुष्य है उसके भीतर में ये जो डिवीजन हमको कॉन्शियस लेवल पे दिख रहे हैं सुपरकॉन्शियस लेवल पे वो डिवीजन चले जाएंगे ठाकुर के एक्सपीरियंस है या तो मां स्वामी जी के एक्सपीरियंस है या तो चैतन्य महाप्रभु जीसस क्राइस्ट हिमसेल्फ जितने भी मनुष्यों का जन्म पृथ्वी पर हुआ है उनके जितने भी एक्सपीरियंस नॉलेज आइंस्टाइन जो भी साइंटिस्ट है वोह पूरा नॉलेज उन्होंने कलेक्ट किया एवरीथिंग वो रिपोजिटरी के रूप में सुपरकॉन्शसनेस में पड़ा है और सुपरकॉन्शसनेस में सिर्फ पास्ट ही नहीं प्रेजेंट में जितने भी लोग हैं उनके जितने एक्सपीरियंस है फ्यूचर में जितने लोग आने वाले हैं उनके जितने एक्सपीरियंस नॉलेज और एक्सपर्टाइज्ड बी एक्सेसिबल इन द सुपरकॉन्शसनेस यानी कि यदि मुझे यह डर लगता है कि मैं बिना सोचे कोई भी कार्य करता हूं मान लीजिए मैं सीपी क्लीनिक में गया अभी मुझे पूछा गया कि इस तरह से एक नया इंस्ट्रूमेंट लेना है तो अभी हम क्या करें तो मैं अपने माइंड से सोचूंगा मैं उनको कहूंगा कि एक काम कीजिए इंस्ट्रूमेंट लेने से पहले आप उसके पास में उसने यह इंस्ट्रूमेंट यदि कहीं से लिया है तो उसका प्राइस पूछ लीजिए फिर यह जो इंस्ट्रूमेंट जो लेने वाले हैं वह कितना साल चलेगा यदि यहां पर रहता है तो बच्चों को किस तरह से वह फायदेमंद होगा वह सब आप एक तरह से सोच कर के फिर मुझे अल्टीमेटली बताइए कि इस इंस्ट्रूमेंट का इतना बेनिफिट है अब जैसे ये डोनेशन आता है रिसेंटली ऐसा हुआ किसी ने कहा कि 00 ना कि इतना कुछ डोनेशन देंगे तो यह बैठ कर के सोचा गया कि कौन सा इंस्ट्रूमेंट लेना है कहां कहां से लेना है इंस्ट्रूमेंट के बेनिफिट्स क्या है वगैरह वगैरह यदि आप सोचेंगे मैं इसमें अपना माइंड नहीं लगाऊंगा तो मैं अपना कार्य कैसे कर पाऊंगा सिर्फ अपने शरीर से अपने हाथों से मुझे चेक पे साइन करना है वाउचर पे साइन करना है इसी से क्या हो जाएगा नहीं हम मुझे तो सोचना तो पड़ेगा ही उ थोड़ा तो बुद्धि लगाना पड़ेगा कोई हमको ठग ना ले 10000 ले लिया और बिना मतलब का इंस्ट्रूमेंट दे दिया जो कि हमारे किसी काम का नहीं है मुझे सोचना तो पड़ेगा ही मन से कर्म तो करना ही पड़ेगा नहीं यदि मैं अपने मन के सभी कर्मों को शांत कर देता हूं चित्त वृत्तियों को शांत कर देता हूं इमीडिएट मैं सुपरकॉन्शियस में चला जाऊंगा जितना भी नॉलेज है रिगार्डिंग दिस इंस्ट्रूमेंट रिगार्डिंग द प्रैक्टिलिटी रिगार्डिंग द यूज बिलिटी रिगार्डिंग दिस लॉन्ग टर्म प्रोस्पेक्ट ऑफ दिस इंस्ट्रूमेंट एवरीथिंग आई विल बी एबल टू एक्सेस इंटेंटली एंड इमीडिएट एंड बेस्ड ऑन दैट आई कैन टेक डिसीजन दैट मींस कि ये कर्मा और ज्ञान ये दोनों के बीच में स्प्लिट जो है वो बिल्कुल ठीक है यदि हमको कर्म भी करना है म मेरा शरीर यदि कर्म भी करेगा तो वह ज्ञान के लेवल पर रह कर के चित्त की वृत्तियों का नाश करके वह कर्म कर सकता है दिस इज एंटायस बल ऑफकोर्स जद इस तरह के लोग हमको बड़ा ही रेर देखने को मिलते हैं और यदि ठाकुर की दृष्टि से देखा जाए कि चित्त की वृत्तियों का नाश करने के बाद में सुपरकॉन्शियस में स्थित होकर के कर्म करने का क्या अर्थ है तो ठाकुर इसको कहते हैं कि पहले तो नेती नेती करके के अपनी मन की जितनी भी वृत्तियां है उसको एक बार काट दीजिए उसके बाद में आपका मन निर्विकल्प समाधि में स्थित हो जाएगा और उसके बाद में यदि ईश्वर की इच्छा होती है तो फिर से हम इति इति करके इस जगत में वापस आएंगे किंतु उस समय अपने मन के भीतर में ये जो सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट स्प्लिट है और यह सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट के बीच का जो इंटरेक्शन है कर्मा के रूप में वह खत्म हो जाएगा हम प्योर नॉलेज प्योर अवेयरनेस में स्थित हो जाएंगे हमारा देह कर्म करता रहेगा मन जो है पूर्ण रूप से ज्ञान में स्थित होगा ठाकुर को निर्विकल्प समाधि के बाद में भी उन्होंने वोह कुठी है कुठी घर दक्षिणेश्वर में गए होंगे तो वहां पे देखा होगा कि जहां पे मंदिर है मंदिर के पीछे में ही यह मथुर बाबू वगैरह के रहने के लिए एक कुठी घर बनाया गया है तो उसकी छत के ऊपर में जाकर के ठाकुर चिल्ला चिल्ला करके अपने भक्तों को पुकारते हैं कि तोरा पोथा या चीस आए रे तुम लोग कहां पे हो आओ यह संसारी लोगों की बातें सुन कर के मेरे कान जल गए तो यह निर्विकल्प समाधि में से वापस आने के बाद में ठाकुर ने इस तरह से भक्तों को पुकारा और भक्ति भक्तो निय थाका अर्थात कि भक्ति और भक्त को लेकर के वह रहे थे विद्या का संसार बनाया था उन्होंने तो यह सब कुछ पॉसिबल है वंस व अटन निर्विकल्प समाधि वंश अपने मन की चित्त की वृत्तियों का विनाश हो जाता है तो इसके बाद में और एक प्रश्न आता है तो क्या यह जो स्वामी जी ने जो कर्म योग कहा वह करने की आवश्यकता नहीं है क्या पहले हम यह सब कर्म ध्यान जप वगैरह करके निर्विकल्प समाधि को प्राप्त करें उसके बाद में ही क्या हम लोग वापस आकर के कर्म करेंगे नहीं देखिए कर्म योग यदि करेंगे तो इससे क्या होगा पता है हमारे मन के भीतर में यह करुणा है यह दया है लोगों के प्रति सहानुभूति है एंपैथी है यह सब गुण बनेंगे अभी देखिए यह जितनी भी गुण राजी है ना वह वही है जो कि एक जीवन मुक्त के भीतर में होती है जो मनुष्य निर्विकल्प समाधि से वापस आता है उसके भीतर में दया करुणा अनुकंपा एंपैथी कंपेज ये महासागर की तरह उथल होता है इनके सामने जाकर के ही हम नतमस्तक हो जाएंगे क्यों क्योंकि उसके भीतर में हमारे प्रति इतना प्रेम है इनफाइनों के बाद में निर्विकल्प समाधि के बाद में प्रकट होता है वही इनफाइनों से हमारे भीतर में आता है यानी कि क्या है पता है एक जीवन मुक्त किस तरह से रहता है उसके उसके जीवन को उसके मन को हम यहां पर रेप्ट करते हैं हम यहां पर मिमिक करते हैं जब तक हम संसार के भीतर में है जब तक हमारा मन कर्म के य झांसे में है कर्म की ंजूरी से बंधा हुआ है तब तक हमको क्या करना है कि हमको वही प्रेम वही करुणा वही मुदिता उपेक्षा मैत्री कंपेज जो कि एक जीवन मुक्त के भीतर में है हमारे भीतर में लानी है जिससे कि क्या होगा पता है अपनी जो अवेयरनेस है ना अवेयरनेस ट्रांसफॉर्म होनी शुरू हो जाएंगी बहुत बार हम लोग सोचते हैं कि यह जगत के साथ में मन तो जुड़ा हुआ है तो कैसे करके यह मन और जगत को अलग से करें सेपरेट किस तरह से करें यह जो एक वैराग्य रूपी एक तलवार है एक खड़ग है उसको लेकर के या जगत को काटते जाए किंतु जगत क्या है वह उस तरह से ठाकुर ने कहा ना कि एक पेड़ है पेड़ की जड़ों को आप काट दीजिए तो उसमें से दूसरा एक पेड़ खड़ा होगा इसका कोई अंत नहीं है आप जितना ही काटते रहिए कामना वासना की इस पेड़ को नए से नई डालियां नए-नए पत्ते खड़े होते ही रहेंगे तो ये पेड़ को काटना जगत को काटना जगत के साथ में अपने इंटरेक्शन को काटना दैट इज नॉट द सॉल्यूशन सॉल्यूशन क्या है टू ट्रांस फॉर्म अवर सेल्फ यह जो मेरी अवेयरनेस अभी है आज है एज ऑफ टुडे इस अवेयरनेस में क्या है कि अवेयरनेस के भीतर में बहुत सारा सेल्फिश है तमस है रजस है सत्व भी है किंतु तमस और रजस भी है तो मुझे अपनी जो अवेयरनेस है इसको ट्रांसफॉर्म करते जाना है जैसे कि एक छोटा बच्चा है एक छोटा बच्चा आज अपने वो दोनों हाथ और पैरों से चल रहा है हमा मागुड़ी जाके बांगला ते बोले है वो क्रोलिम इंग्लिश शब्द है वो दोनों हाथ और पैरों से चलता है क्रोलिम करता है किंतु जैसे-जैसे वोह बड़ा होता जाएगा वैसे धीरे-धीरे करके वह सीधा खड़ा रहेगा और अपनी मां की उंगली पकड़ कर के धीरे-धीरे चलना शुरू करेगा फिर और ज्यादा बड़ा होगा तो आराम से दो पैरों के ऊपर में चलने लगेगा फिर और ज्यादा बड़ा होगा तो बाइसिकल चलाएगा और बड़ा होगा तो बाइक चलाएगा और फिर बड़ा होगा तो हो सकता है प्लेन भी उड़ाना शिकल है यदि वो पायलट बनता है तो वही है बच्चा आज वो क्रोलिम कर रहा है आज बड़ी मुश्किल से चलना सीख रहा है परसों दिन वह एयर एयरप्लेन का पायलट बन गया है हो सकता है वह एस्ट्रोनोवा इंक्रीज होती है जैसे-जैसे बच्चा मैच्योर होता है जैसे-जैसे उसका उम्र बढ़ता है वैसे ही अपनी अवेयरनेस है वह बड़े ही प्राइमरी स्टेजेस में है यह सब अंधकार से घिरी हुई है अंधकार की वजह से उसकी जो कैपेसिटी है वोह बड़ी लो कैपेसिटी है जैसे ही अपनी अवेयरनेस साथ धना करते करते मैच्योर होती जाएगी वैसे ही अवेयरनेस की स्किल जो है वह बढ़ती जाएगी इसके भीतर में आज सेल्फिश निस है आज यदि स्वार्थ है तो वो नहीं रह के धीरे-धीरे करके कंपेज है करुणा है शरणागति है भक्ति है यह सब गुणधर्म आना प्रकट होंगे और फिर जब फुल्ली मैच्योर हो जाएगी अपनी अवेयरनेस तो है स्टकर को आप दीवाल पर लगाते हैं क्यों आसानी से चिपक जाता है क्योंकि पीछे का जो गम है जो वो बड़ा ही स्ट्रांग होता है किंतु एक स्टीकर को आप एक बार उठाइए दीवाल पे लगा दिया है उसको फिर से निकाल दीजिए फिर से और एक जगह प लगाने का प्रयास कीजिए प्रॉब्लम क्या होगा गम जो है वो पहले बड़ा स्ट्रांग था वो थोड़ा वीक हो जाएगा फिर उसको फिर से उखाड़ उसको फिर से लगाने का प्रयास कीजिए जितनी भी बार आप स्टिकर को निकालेंगे दीवाल के ऊपर में से फिर से चिपकाए देखेंगे ग की शक्ति जो है वह कम से कम होती जाएगी आखिर में एक ऐसा होगा कि आप दीवाल पर चिपकाए भी तो यह गम जो है चिपक नहीं पाएगी स्टकर जो है दीवाल के ऊपर में से नीचे गिर जाएगा क्यों अभी ऐसा नहीं है कि दीवाल में कोई परिवर्तन हुआ है नहीं ऐसा है कि स्टीकर में कोई परिवर्तन हुआ है यह जो गम था इसके बीच का वाला वो बड़ा ही वीक हो गया है और जीरो हो गया है शून्य हो गया है तो वैसे ही अपनी ये जो इमैच्योरिटी है इमैच्योरिटी जैसे-जैसे जाएगी ऐसा ही अपने भीतर में यह ज्ञान कर्म यह जो ज्ञान है भक्ति है प्रेम है इसका प्रकाश बढ़ता जाएगा वैसा ही यह जो जगत के जो जगत हमको चिपक के रहता है वो कैपेसिटी उसकी कम होती जाएगी ऐसा होगा कि जगत सेपरेट हो गया हम सेपरेट हो गए और उसी क्षण हम निर्विकल्प समाधि में स्थित हो जाएंगे तो देखिए कि निर्विकल्प समाधि के बाद में वापस आने के समय जो गुणधर्म हमारे में प्रकट होते हैं इंफाइटिंग कंपेज कंप्लीट सरेंडर टू गॉड वह जो नेचुरल रूप से जो प्रकट होता है उसको हमको यहां पर मेहनत करके यहां पर अपने भीतर में प्रकट करवाना है यानी कि यदि आप साधक है तभी भी आपके भीतर में प्रेम है करुणा है ईश्वर के प्रति शरणागति है और सिद्ध हो गए हैं तभी भी आपके भीतर में प्रेम करुणा ईश्वर के प्रति शरणागति सब कुछ है बात वही है कि समाधि के बाद में वापस आने से यह सभी गुण आपके जैसे कि 100% नेचुरल हो जाएंगे और यहां पर है कि जब आप साधक अवस्था में है जब आप प्रयास कर रहे हैं कर्म कर योग जब कर रहे हैं साधना कर रहे हैं तब आपको मेहनत करके यह सब गुणों को आपके भीतर में प्रकाश करना है आज सुबह को मुझे बड़ा ही अच्छा फील हो रहा है आई एम वेरी कंपैशनेट किंतु ऐसा कुछ हो गया एकाएक में नाराज हो गया अभी जिसके साथ में बड़ा प्रेम से बात कर रहा था उसी के साथ में मैं नाराज होकर के बात कर रहा हूं क्यों कि किसी भी तरह से मेरा ईगो हर्ट हो गया कहीं पे मुझे कुछ बुरा लग गया तो यह चढ़ाव उतार आते रहेंगे यह फ्रिक्शन फ्रिक्शन जो है होता रहेगा जब तक मैं साधक हूं जब मैं सिद्ध हो जाऊंगा तब मेरी यह जो करुणा या प्रेम है उसमें कभी भी कमी नहीं आएगी हां मैं गुस्सा करूंगा किंतु उसको सिखाने के लिए नहीं कि बिकॉज़ कि मेरा ईगो हर्ट हो रहा है या मैं किसी बात से उसके ऊपर नाराज हो गया हूं यदि किसी को कुछ सिखाना है शिक्षा देनी है मां जैसे बच्चे को मारती है कभी-कभी क्यों बच्चे की शिक्षा के लिए तो तो उसके लिए मैं कभी नाराज हो सकता हूं किंतु जो अंडरलाइन लव जो है उसमें कभी भी कमती नहीं होगी उसमें कभी भी डिस्टरबेंस नहीं होगा सो सेम थिंग इनफाइनों के बाद में भी इनफाइनों के समय भी साधक अवस्था में भी वही बात है कि हमको यहां पर इसको मेहनत करके लाना है वहां पर वह नेचुरल हो जाएगा अच्छा तो आज यहीं तक अभी कल छुट्टी है अभी नेक्स्ट क्लास होगा हम हमारा नेक्स्ट मंडे को ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णा अर्पण मस्तु कंसंट्रेट करते गेले मनेर भीतर जेटा कर्म चल से यदि मन को जो कार्य में कंसंट्रेट करना है उसके लिए मन के भीतर में जो कर्म कर रहे हैं उसको शांत कर देना पड़ेगा यही एक उपाय है जब तक मैं दूसरा कुछ सोच रहा हूं तब तक तो मैं कंसंट्रेट नहीं कर पाऊंगा तो मन के भीतर के कर्मों को शांत करना जो कि हम विभिन्न माध्यम से करते हैं एक बार यह प्रैक्टिस हो जाए मैं जप कर रहा हूं या तो फिर मैं पढ़ रहा हूं उस समय में उसके ऊपर में कंसंट्रेट करना सीख लू मन को एकाग्र करके तो फिर मैं जो कुछ भी करूंगा सब जगह पर यह कंसंट्रेशन मेरे साथ में चलेगा अभ्यास और वैराग्य जैसे वह भगवान गीता में कहते हैं ना कि निश्चय महाबाहो मनोर निग्रहम चलम अभ्यासन तु कौंतेय वैराग्य च गृहित महाबाहो यह मन बिल्कुल चंचल है बात तुम्हारी सही है किंतु अभ्यास और वैराग्य के माध्यम से इसको कंट्रोल में लाना है ये वो जो घोड़े को वो जो पहना देते हैं ना ब्लिंकर्स कहते हैं उसको इंग्लिश में दोनों साइड पर वो घोड़े को सीधा एक ही डायरेक्शन में देखना है और कहीं पर नहीं देखना है फिर वो जो घोड़ा चलाता है उसके हाथ में चाबुक रहता है घोड़ा जैसे ही उधर उधर जाएगा चाबुक मारेंगे उसको जोर से