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Sri Ramakrishna & Swami Vivekananda ·

Sri Ramakrishna & Swami Vivekananda : English & Hindi : 19 April 2023

Swami Vivekananda

स्वामी विवेकानंद शेयरिंग मी स्क्रीन यस सो स्वामी दिस इस एन स्पीकर फ्रॉम दिस स्पीकर कर गोइंग ऑलवेज आउटसाइड इन ऑर्डर तू सी माइसेल्फ आई बिल हैव तू उसे दिस मिरर इन डी ओल्ड आगे इस आगे आईटी उसे तू हैपन डेट पीपल उसे तू सी डी रिफ्लेक्शन इन रिवर और समथिंग और देवर आर में स्टोरी अलसो देवर आर सम नरसिमाइज्म स्टोरी ऑफ नार्सिसिस्म डेट पीपल वुड फल इन डी लव ऑन रिफ्लेक्शन और दे बिल कप ऑन वाचिंग डेमसेल्वेस इन डी रिवर और इन एन वाटर दे बिल गान वाचिंग देवर ऑन रिफ्लेक्शन बिलीविंग देवर देवर सो ब्यूटीफुल लेटर ऑन मिरर्स कम और नो वे हैव गो दिस वेब आई कैन सी मी सेल्फ इन दिस वेबकैम और ऑन दिस मॉनिटर कंप्यूटर मॉनिटर बट आई कनॉट सी माइसेल्फ विथ मी ऑन आइस सिंग माइसेल्फ थिस टेक्नोलॉजी इस इवॉल्वड ओवर ए लॉन्ग पीरियड ऑफ टाइम प्रीवियसली वे उसे तू सो ओवर रिफ्लेक्शन इन वाटर दें वे उसे तू सी अवर रिप्ले लेकिन इन रिवर दें वे कैन सी अवर रिफ्लेक्शन इन दिस कैमरा डेट इमेज डेट इस मेड बाय कैमरा और नो देवर आर 3d होलोग्राम अलसो डेट आई कैन सी एक्जेक्टली हो आई एम इन नोट इन ओनली तू डाइमेंशन बट इन थ्री डाइमेंशंस दिस फॉर दिस टेक्नोलॉजी इस एडवांस और देवर आर में पीपल हूं लव इमेज देवर इसे पीपल हूं लव देवर ऑन रिफ्लेक्शन और देवर गोंद स्पेंडिंग ए लॉन्ग टाइम बिफोर डी मिरर नो वर्किंग ऑन देवर हेयर स्टाइल और डूइंग मेक एन पेन अलसो थिंग्स और दिस इस नोट जस्ट पर वूमेन में आर अलसो व्हेन अबाउट देवर अपीरियंस इस आर वूमेन बट दिस वैनिटी बट आई कनॉट सी माइसेल्फ डेट इस डी बिगेस्ट प्रॉब्लम सो आई हैव ऑलवेज तू टेक हेल्प ऑफ सम एक्सटर्नल इंस्ट्रूमेंट डी से थिंक इस अबाउट जो डिसेंसेस डी सेंस ऑफ टच डी सेंस ऑफ फिंगरिंग डी सेंस ऑफ साइट आई कैन हर व्हाट इसे गोइंग ऑन आउटसाइड आई कैन फूल व्हाट इस एक्सटर्नल स्टिम्युलेट आई कैन टेस्ट व्हाट इस दें एक्सटर्नल ऑब्जेक्ट ए स्वीट ऑरेंज आइटम रसगुल्ला दही वादा जई के चौक वॅटीवर इस तेरे आई कैन टेस्ट बट आई कनॉट सी मी सेल्फ आई कनॉट हर माइसेल्फ आई कनॉट टच माइसेल्फ और डी व्हाट इसे दिस ट्रू सेल डी ट्रू सेल्फ इस आत्मा डेट इस वही स्वामीजी सेल्स डेट जो नॉलेज इसे ऑफ डी रिफ्लेक्ट इस वे कैन ओनली सी अवर फेस इन एन मिरर डेट नॉलेज आईटी कॉम फ्रॉम मी रिफ्लेक्शन डेट इसे गॉड व्हाट इस व्हाट इस एन डिफरेंस बिटवीन गॉड और आत्मन गॉड इस समथिंग डेट वे हैव क्रीटेड आउटसाइड गॉड इस समथिंग हज ग्रज उसे लीला मर्सी वे कैन सी वर्किंग आउटसाइड से पर एग्जांपल वे कैन सीट अकुर वे कैन सी हो ठाकुर यू तू डू कीर्तन हो ठाकुर यू तू को इन समाधि आउट ठाकुर यू तू गिव उपदेश हो मास्टर महाशय रोड डॉ हज उपदेश त्यार वे कैन सी विथ अवर आइस वे कैन लिसन विद अवर इयर्स बट वे कैन नोट सी अवर ऑन आत्मा विथ अवर आइस वे कनॉट हर डी सॉन्ग ऑफ वर्तमान विद दिस एयर वे कैन नोट टच वर्तमान विद दिस हेड्स पर डेट वे हैव तू ठाकुर उसे तू से डेट इन ऑर्डर तू फूल तू इन ऑर्डर तू टच आत्मा दिस इसे बॉडी मेड ऑफ डिवाइन लव डिवाइन लाइट वे नीड भाई बॉडी स्टेट अंदर ओवर ए लॉन्ग पीरियड ऑफ टाइम बर्थ आफ्टर बर्थ इन दिस बर्थ एडिट सम कर्म वेदर दिस कर्म गुड और बाद डीओईएसएन'टी मटर अन्य कर्म बिल लाइव इट्स इंप्रिंट / अवर मन से पर एग्जांपल आईएफ यू आर फैमिलियर विथ अकाउंटिंग दें व्हाट हैपेंस डेट ऑन वन हैंड देवर इस एन पॉजिटिव बैलेंस ऑन डी अंदर और डी रीजन नेगेटिव बैलेंस सपोज आईएफ वे डू गुड कर्म आईटी बिल लीव पॉजिटिव बैलेंस आईएफ वे डू सम बैठ कर्म आईटी बिल लीव नेगेटिव बैलेंस दिस पॉजिटिव और नेगेटिव बैलेंस डेट बिल एवं आउट दे बिल कैंसिल एच अदर और वॅटीवर रीमेंस आईटी बिल कम विथ स इन ओवर नेक्स्ट बर्थ सपोज वे हैव दान मोर पॉजिटिव कर्म और ली नेगेटिव कर्म दें वे बिल हैव पॉजिटिव कर्म और ली पॉजिटिव कर्म दें वे बिल टेक विथ स इन ओवर नेक्स्ट बट सम नेगेटिव बैलेंस बट दिस बैलेंस बिल ऑलवेज कर्मफल्स जो दिस इंप्रिंट वे बिल हैव तू दिस मेडिटेशन वर्कशाउट जो करमास में आईटी बी पॉजिटिव और नेगेटिव वंस ओवर करमास आर कद आउट वंस दिस बर्डन ऑफ कर्मफल एन बिगिंस तू लेसन वंस दिस इंप्रिंट / आउट बेगन तू वाइफ आउट दें वे बिल एक्वायर पॉजिटिव मेड का डिवाइन लाइट एन मन विच इस मेड ऑफ डिवाइन लाइट और विथ दिस मन विद दिस डिवाइन आइस विद दिस डिवाइन इयर्स वे कैन हर डी आत्मन सिंह वे कैन सी डी ग्लोरी ऑफ आत्मन इन योग शास्त्र डी देवर इसे एन साधना कॉल्ड प्रत्याहार व्हाट इस प्रत्याहार प्रत्याहार इस प्रति आहार व्हाट इसे डी आहार व्हाट इस डी फूड ऑफ मी आइस इस एन एक्सटर्नल साइट वे हैव तू रिवर्स दिस रिवर्स एक्सटर्नल साइड तो इंटरनल साइट वे हैव तो रिवर्स डी डायरेक्शन ऑफ की डेट इस कॉल्ड प्रतिहार दत रिवर्स फूड तू गिव तू गिव फूड इंसटिड ऑफ एक्सटर्नल साइट गिव आईटी इन इंटरनल साइट व्हाट इसे डी फूड पर मी इयर्स आईटी इसे डी एक्सटर्नल वॉइस दें टर्न आईटी अराउंड गिव आईटी और इंटरनल साउंड इंटरनल साउंड दिस इस व्हाट अवर एयर शूट लिसाड़ सो प्रति आहार डेट मेंस तू गिव अवर सेंसेज इन रिवर्स फूड इन्वर्स फूड डी फूड डेट इसे जेनरेटेड फ्रॉम अवर इनसाइड फ्रॉम वर्तमान दिस फूड वे शुड गिव ओवर सेंसेज दिस साधना इसे कॉल्ड प्रत्याहार प्रति आहार दें विथ हज साधना ऐवेंंचुअली वे कैन अटैं गुड वीकेंड सी आत्मा वे कैन फूल आत्मन वे कैन लिसन तू डी सॉन्ग ऑफ आत्मन और ऐवेंंचुअली रिलाइज आत्मा डेट इसे वॉइस स्वामी ऑफ डी रिफ्लेक्ट इसे वे कैन ओनली सी अवर फेस इन एन मिरर नो वन बिल एवर नो हज ऑन सेल्फ बी आर डेट ऑन सेल डी वर्ल्ड तू नो मन इत्सेल्फ और व्हाट इसे डी फूड ऑफ दिस मन आईटी इस डी नॉलेज नो एक्सटर्नल नॉलेज व्हाट इसे डी फूड ऑफ मन विच इस एन जनरल मन इस एक्सटर्नल नॉलेज बट विथ दिस एक्सटर्नल नॉलेज वे कैन नेवर लिसन तू वे कैन नेवर नो ओवर नो इन ऑर्डर तू विथ रिगार्ड तू आगमन वे कैन नोट उसे डी शब्द नो बिकॉज़ इन ऑर्डर तू उसे डी शब्द नो डियर हज तू बी थ्री एलिमेंट्स डी ऑब्जेक्ट ऑफ नॉलेज आई कैन रिलाइज मी ट्रू नेचर आई कैन आई कैन बी इस्टैबलिश्ड इन मी रूम नेचर था इस वही वे कैन नोट वे हैव तू रिलाइज आत्मा डेट इसे डी ग्रेट डिफरेंस

स्वामी विवेकानन्द

विद्या जो है विद्या किस चीज की होती है एक बाहर में कोई ऑब्जेक्ट है उसको जिसको हमको जानना है जन के लिए जो ऑब्जेक्ट होता है वो दूसरा है की सब्जेक्ट की मैं इस ऑब्जेक्ट को जन वाला हूं अर्थात की ये किताब है किताब में बहुत साड़ी जानकारी है तो ये किताब को जानना है मैं इसको जन वाला हूं मैं इसको पढ़ने वाला हूं और ये जो जन की भीम है पढ़ने की भीम ये तीन चीज इकट्ठा हो करके नॉलेज बंता है ज्ञान विद्या बंटी है किंतु ये विद्या किस चीज की होती है जो की बाहर में ये किताब है उसे चीज की किताब है जिसको जानना है मैं हूं जो की जन वाला हूं और मैं पढ़ रहा हूं या तो इसके बड़े में चिंतन कर रहा हूं यह प्रोसेस ऑफ नॉलेज कपूर के यह उपदेश है तो मुझे ठाकुर के उपदेश पढ़ने की जरूर नहीं है मुझे सिर्फ यह जान लेना है की हां ठाकुर ने इस किताब में जो कुछ भी लक्खा है जो सब कुछ छोड़कर के ईश्वर के श्रीपाद पद्भमों में अपने मां को संपूर्ण रूप से यह जो है शरणागत कर देना ये जो ठाकुर ने जो बात कहीं है वो जो शरणागरी का भाव है वो तो मेरा सही स्वरूप है तो मैं शरणागत स्वरूप हूं मुझे शरणागरी के बड़े में सीखना नहीं है मैं शरणागत स्वयं हूं यह जो ईश्वर ज्ञान है या तो ईश्वर के जो दर्शन है वो दर्शन को मुझे बाहर में से कहानी से प्राप्त नहीं करना मैं ईश्वर मैं हूं मेरा सही स्वरूप ही ईश्वर है तो जो कुछ चीज बाहर में होती है उसको हम जान सकते हैं उसको का सकते हैं उसको देख सकते हैं उसको सुन सकते हैं किंतु जो मेरा सही स्वरूप है ना ही मैं उसको देख सकता हूं ना ही मैं उसको सुन सकता हूं ना मैं उसको स्पर्श कर सकता हूं ना ही मैं उसको का सकता मेरा जो सही स्वरूप है मैं सिर्फ उसको रिलाइज कर सकता हूं मेरा जो सही स्वरूप है मैं अपने सही स्वरूप में एस्टेब्लिश हो सकता हूं मैं अपने सही स्वरूप में जो है उसको मैं उसे स्थिति में स्थित हो सकता है तो यह जो मेरा सही स्वरूप है उसमें स्थित होना यही है वेदांत की असली साधना इसलिए स्वामी जी यहां पर कहते हैं की जो ज्ञान है वो बाह्य किसी चीज का ज्ञान है मेरा जो सही स्वरूप है वो उसको मैं ज्ञान से प्राप्त नहीं कर सकता अपने सही स्वरूप में मैं सिर्फ ठीक हो सकता हूं तो देखिए यह जो वेदांत जो है वेदांत की एवं जो टर्मिनोलॉजी है वेदांत के लिए जो शब्द भी जो है वो शब्दों को जन के लिए समझना के लिए हमको कितना मतलब डिफरेंट डिफरेंट तरीके से सोचना पड़ता है जो की चुप बाकी है जो एक्सटर्नल वर्ल्ड जो है उसको समझना के लिए हम जी तरह के शब्द प्रयोग करते हैं बाहर का यह जो जगत है उसको समझना के लिए हम जी तरह के इतिहास मतलब यूटिलाइज करते हैं और यह जो आंतरिक जगत का जगत है आत्मा राज्य जो है यह जो ईश्वरीय जो राज्य है यह जो स्वर्ग लोक है हमारे भीतर में उसमें जान के लिए यह जो हमारे भीतर जो ब्राह्मण लोग हैं या तो फिर रामकृष्ण लोग बोल लीजिए या तो फिर आप बैकुंठ बोल लीजिए या तो कैलाश बोल लीजिए जो कुछ भी है वो हमारे हृदय में है और इस बैकुंठ या तो इस कैलाश में प्रवेश करने के लिए बिल्कुल डिफरेंट तरीके से सोचना होगा हम ये जो है मां है बुद्धि है चित है अहंकार है फिर ये जो ज्ञानेंद्रिय है जो पांच ज्ञानेंद्रिय जोक्षुक स्पर्श करना ये जो सब ज्ञानेंद्रिय जो है पांच फिर ये जो पांच महाभूत है ये इन सब की चीज इन सब की मदद से जो ये जो बाकी है जो जगत है उसको जान यह जो पूरा हमारा एक्सटर्नल साइंस से वो क्या है बाकी जो जगत के हमारे नॉलेज के ऊपर में ही तो ये सब डिपेंडेंट है अभी हम आज देखते हैं की यह जो हमारा इसरो है वो एक के बाद एक रॉकेट जो है आकाश में भेज रहा है अभी रॉकेट को आकाश में भेजना या तो फिर यह माइक्रोप्रोसेसर बनाना यह दो चीज हैं वो की सबसे कॉम्प्लिकेटेड चीज कहानी जाति है साइंस में हमारे मार्मिक जी उसमें से माइक्रोप्रोसेसर बनाते हैं वन ऑफ डी मोस्ट कॉम्प्लिकेटेड थीम डेट ह्यूमन कैन एवर डू मैन मनुष्य सभ्यता ह्यूमन सिविलाइजेशन जो की सबसे ज्यादा कॉम्प्लिकेटेड चीज कर शक्ति है तो यह दो चीज है तो माइक्रोप्रोसेसर बनाना दूसरा है आकाश में रॉकेट को भेजना या तो फिर दूसरे ग्रह पर जाकर के यह जो हमारे जो साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट है उसको स्थापित करना तो यह तो कॉम्प्लिकेटेड चीज हम करते हैं उसके पीछे का जो विज्ञान है वो पूरा विज्ञान जो है वो बाकी है इंद्रियों के आधार पे बना है तो यह जो पूरा विज्ञान है यह पूरा फिलासफी है यह पूरा जो बाकी है रिलिजन है वो हमारे अंतर जगत में कुछ कम नहीं आने वाला है एक चीज कम में आएगी वह हमारी संकल्प शक्ति यदि मुझे फिजिक्स सीखना है यदि मुझे मैथमेटिक्स सीखना है यदि मुझे केमिस्ट्री या बायोलॉजी या तो हिस्ट्री या तो फिर जो है लैंग्वेज या विभिन्न विभिन्न तरह की लैंग्वेज यह चली मुझे कुछ सीखना है तो मुझे हार्ड क करना पड़ेगा बहुत ही मेहनत करनी पड़ेगी और मेहनत करने के लिए मेरा जो बिल पावर है मेरी जो संकल्प शक्ति है वो बड़ी ही स्ट्रांग चाहिए अभी मैं यहां से अपने रूम में जाता हूं शाम के समय में और उसे समय मेरे सामने एक टारगेट राहत है की यह जो 7 से 9 का टाइम है जो दो घंटे का उसमें मैं ठाकुर की कोई किताब में ट्रांसलेट करो यह जो बंगाली से गुजराती ट्रांसलेट करने वाले ज्यादा लोग नहीं है एक दो लोग भी वोटिंग है जिनके मदद से मैं करता हूं और मैं हूं तो फिर क्या होता है की यह जो ट्रांसलेट दो घंटा बैठ करके मैं ट्रांसलेशन भी कर सकता हूं जिससे मेरे मां को भी सुकून मिलेगा मेरे लिए इतना हो जाएगी और यह जो हमारे जो गुजराती जो रीडर से उनको एक बहुत ही अच्छी चीज पढ़ने को मिलेगी वह मैं कर सकता हूं या तो फिर मैं जो है की और या तो दो लोगों के साथ में बैठकर के गम भी लगा सकता हूं इतना बड़ा आश्रम है गैप लगाने वाले लोगों की कोई कमी नहीं है तो मैं टाइम वेस्ट भी कर सकता हूं टाइम का सदुपयोग भी कर सकता हूं मेरे में मेरे अपने शरीर के ऊपर में मेरे मां के ऊपर में कितना डिसिप्लिन है उसके अनुसार मेरे जीवन का गठन होता है यदि मैं अपने को डिसिप्लिन में रख सुकून हम लोग यदि अपने को डिसिप्लिन में रख सके तो हम लोग जो है संसार के लिए जगत के लिए आशीर्वाद मैं हो जाएंगे और यदि हम अपने को डिसिप्लिन में एन रख सके तो हम इस संसार के ऊपर में बोझ स्वरूप हो जाएंगे भारत स्वरूप हो जाएंगे तो इसीलिए यह जो डिसिप्लिन जो है वह दोनों जगह पर कम लगता है यह चाहे बाकी जो विज्ञान है साइंस से उसको सीखना है या तो फिर जीवन में आंतरिक साधना करनी है किंतु यह साधनाएं दोनों डिफरेंट है बाकी साधना जो की साइंस टेक्नोलॉजी सिविलाइजेशन पॉलिटिक्स डिप्लोमेसी यह सब चीजों इस जो क्षेत्र में होती है और आंतरिक साधना जो की ज्ञान योग है भक्ति योग है कर्मयोग है या तो राजयोग है यह क्षेत्र में होती है साधनाएं दो तरह की बाकी साधना आंतरिक साधना किंतु ये साधना करने के लिए जो डिसिप्लिन आता है जो बिल पावर आता है वो एक ही है दोनों की बॉर्डर लाइन पे बिठा हुआ है दोनों के जंक्शन पर बैठा हुआ है मैं जब छोटा था तो गांव में जाते थे तो ट्रेन में बैठ करके तो बच्चों को तो क्या है ट्रेन बहुत पसंद आई है मुझे भी ट्रेन बहुत अच्छा लगता था देखने का तो जब वो मैं एकदम खिड़की के पास बैठा राहत था अपने गांव जान के समय और जितनी भी ट्रेन आई है वह स्टेशन आते हैं वह देखा राहत था वो स्टेशन पर कहीं-कहीं पर लिखना था जंक्शन जैसे की पेटलाद जंक्शन जैसे की आनंद जंक्शन यह गांव के सिटी के नाम है तो मुझे ये सब ये जो जंक्शन शब्द बड़ा पसंद ए गया था उसे समय जब छोटा बच्चा इंग्लिश सीखने हैं तो मुझे समझ में आता है जंक्शन का क्या अर्थ है आई वैसे वेरी प्राउड की यस आई अंडरस्टैंड वन इंग्लिश शब्द मुझे एक इंग्लिश शब्द तो आता है मैंने किसी को पूछ लिया था जंक्शन क्या है तो वहां पे बहुत साड़ी ट्रेन इकट्ठा होती है उसको जंक्शन बोलते हैं मुझे पता नहीं ये डेफिनेशन सही या गलत है किसी ने मुझे बताया था तो ये मुझे बड़ा खुशी होता था की हां ये जंक्शन है ये जो डिसिप्लिन जो है वैसे ही एक्सटर्नल वर्ल्ड और इंटरनल वर्ल्ड के जंक्शन पर बैठा है और ये डिसिप्लिन के मध्य से जैसे ये वो आनंद जंक्शन वो रास्ते में आता था हमारे वहां पर हम एक ट्रेन में से दूसरी ट्रेन में स्वर होते थे एक ट्रेन जो थी वो मेरे शहर से वो आनंद तक पहुंच दिया और आनंद में दूसरी ट्रेन में बैठेंगे वो वहां से हमको हमारे गांव तक ले जाते थे तो वो ट्रेन चेंज करनी होती थी वहां पर तो वैसे ही यह जंक्शन पर आकर के हमको जो एक्सटर्नल वर्ल्ड है वहां से हमको जो है ये इंटरनल वर्ल्ड में ये जो ट्रेन चेंज करनी है वाया आनंद यस तो ये वही हार्ट डिसीप्ल ये जो वायर बिल पावर वा संकल्प शक्ति ये जो संकल्प शक्ति है वह हमको दोनों में जो है ये जो हमको एक लिवर है हमको बाहर के जगत में भी हमको टिक टिक बनाए रखना है भीतर के जगत में भी हमको शांति और आनंद प्रधान करता है अच्छा अभी कथामृत

श्रीरामकृष्ण कथामृत : कोलकाता में ईश्वरचंद्र विद्यासागर के साथ

है तो हमने देखा की किस तरह से ठाकुर ने सबसे पहले एस्टेब्लिश किया वह विद्यासागर के सामने जाकर के पहले उसका मां पढ़ लिया की उसको ईश्वर में इतना विश्वास नहीं है क्योंकि यह जो विभिन्न तरह की साधन प्रणालियों हैं जो की विभिन्न तरह की साइकोलॉजी के लिए हमने डेवलप की है हमारे ऋषि मुनियों ने जैसे छोटा बच्चा जो होता है यदि वो कोई गड़बड़ करता है वह तो फिर वो कोई मतलब तूफान करता है अपनी मां को परेशान करता है तो मां बोलती है जैसे की वो भूत ए जाएगा तुमको का जाएगा या तो फिर वो जैसे वो शोले का डायलॉग है ना वो मां अपने बच्चे को ऐसा का के डर दिखाई है की गब्बर ए जाएगा तो छोटे बच्चे को ऐसा धमक देकर के आप शांत कर सकते हैं किंतु वही बच्चा जब बड़ा हो जाता है और फिर वो और कुछ उल्टा पुल्टा शुरू करता है तो फिर उसको ठीक से बिठा करके शांति से उसको समझाया जाता है तब उसको एक झापड़ मार के या तो फिर डर दिखा करके अब बड़े लड़के को शांत नहीं कर सकते वो और भी गुस्सा हो जाएगा और भी पगलापन बड़ा देगा तो इसलिए बच्चे का क्या आगे है उसके अनुसार उसको डिसिप्लिन किया जाता है वो तो एक सामान्य बातें सभी मां है सभी पिताजी है ये बात को जानते हैं तो यहां पे भी हमारे ऋषि मुनियों को पता था की सड़क जो है साधना की किस्त स्टेज में है उसे स्टेज के अनुसार उसको साधन पद्धति दिखानी चाहिए तो इसलिए जो विभिन्न साधन पद्धतियां है विद्यासागर यह मां के कंफ्यूज हो गए की ये सब जो है एक दूसरे का कांट्रडिक्ट्री है एक दूसरे को वो जो है वो विरोधी है तो वो सोच लिए की हमारे ऋषि मनी जो बताना चाहते थे वो बता नहीं पे इसलिए ठाकुर ने कहा की ब्राह्मण तो आप अपने आंखों से देख नहीं सकते मां से जान नहीं सकते वाक्य बनातीत है तो फिर ब्राह्मण जो है उसका जो वाक्य मेनिफेस्टेशन है विभिन्न साधना का उसको हम जान सकते हैं क्योंकि ऋषि मुनियों ने साधना बताइए फिर एक के बाद जो है एक ठाकुर ने उदाहरण देकर के वो सब समझना शुरू किया अभी ठाकुर समाधिष्ट होने से ब्रह्म ज्ञान होता है ब्रह्म दर्शन होता है उसे दशा में विचार बिल्कुल बैंड हो जाता है आदमी चुप हो जाता है ब्रह्मजी के सी वास्तु है यह मुंह से बताने का समर्थ नहीं राहत क्योंकि जब हम अपना मां के लेवल पर है अपना मां का लेवल और फिर अपने ये जो मां के पैर का लेवल कॉन्शियस लेवल और सुपर कॉन्शियस लेवल दो लेवल और सब कॉन्शियस लेवल जब हम स्वाद यह जो निद्रा सुश्रुति जागरण और टूटी ये जो कर अवस्था वेद में कहीं गई है निद्रा या तो सूसूक्ति अर्थात की हम लोग जो है या तो सोते हुए हैं या तो फिर हम कोमा में चले गए हैं ये हो गया निद्रा और सुश्रुति ये हो गए जागृत अवस्था जैसे मैं पूरे जगत को जो है मैं समझ रहा हूं देख रहा हूं जान रहा हूं और पुरी अवस्था के नाम से पड़ा था तो यह जो अवस्था है या तो फिर जिसको हम इंग्लिश में एक रफ ट्रांसलेट करके वेरी रफ ट्रांसलेशन उसको कहेंगे सुपरकॉन्शियस स्टेट या तो फिर सुपरकॉन्शियस स्टेज तो वहां पे जाकर के हमको एंड्रिया राज्य जो है ये जो हमारे मां बुद्धि चित अहंकार पंचाग्यं महाभूत इससे के पैर का जो जगत है आत्मा ये जो कैलाश या तो फिर बैकुंठ उसके दर्शन होंगे और वो जो है जगत उसके बड़े में हम शब्दों से वर्णन नहीं कर सकते तो इसलिए ठाकुर कहते हैं की समादिष्ट होने से ब्रह्म ज्ञान होता है ब्रह्मदर्शन होता है उसे दशा में विचार बिल्कुल बैंड हो जाता है आदमी चुप हो जाता है यह कैसी अवस्था है जानते हैं जैसे की नमक का बना हुआ एक पतली एक गुड़िया नमक का बना हुआ एक पुतुल अर्थात की एक जो है एक गुड़िया वो जो है समुद्र को समुद्र की गहराई कितनी है है वह नापने के लिए गई किंतु क्या होगा की समुद्र तो समुद्र में से ही तो नमक प्रगति होता है तो फिर जब नमक की बनी हुई गुड़िया जब समुद्र में जाएगी तो वो समुद्र के साथ में एक रस हो जाएगी एकाकार हो जाएगी देखिए एक बहुत अच्छी कहानी है यदि आपने पढ़ सनी होगी तो ये जो पारसी लोग जो थे वो जब सर्वप्रथम भारत में आए प्रवेश तो एक गुजरात में एक जो दरिया किनारे गुजरात का जो दरिया किनारा है समुद्र का किनारा वहां पे वो वहां सूरत यस यस सूरत तो वहां पे विलो ने वहां पे आए फिर अब वो उन्होंने वहां के जो राजा थे अच्छा झमौरी राजा अच्छा माण्विक जी को बोला हिस्ट्री का बड़ा अच्छा नॉलेज है खास करके गुजरात की हिस्ट्री का तो उनके साथ में उन्होंने बात की कहा की हम लोग यहां पर रहना चाहते हैं आप लोग क्या हमारे लिए यहां पर जगह बनाएंगे तो उसे राजा ने क्या किया वो दूध का एक ग्लास उनको भेज दिया दूध दिया तो फिर पानी का पूरा वो भारत हुआ था वो एकदम चिकर भारत हुआ था चलो अच्छा और वहां पर राजा को राजा ने वो ग्लास भेज दिया वो जो इन पारसी लोगों का वो जो नेता था उनको तो अभी बाकी लोग सब थोड़ा आश्चर्यया में हो गए की राजा ने हां या ना तो बोला नहीं ये दूध से भारत हुआ एक ग्लास हमको भेज दिया है इसका क्या अर्थ है किंतु वो जो परसों का जो नेता था वो समझ गया की इसका क्या अर्थ है राजा कहना चाहते हैं की यहां पे जो है हम लोगों के पास बिल्कुल जगह नहीं है रहने के लिए हम लोग खुद जो है यहां पे बहुत सारे लोग रहते हैं अर्थात जी ग्लास में दूध पूरा भारत हो उसमें अब थोड़ा सा भी दूध ज्यादा डालेंगे तो क्या होगा वो तो छलक के दूध गिर जाएगा बाहर तो ये नेता ने क्या किया पारसी नेता ने उसमें शक्कर दाल दी थोड़ी सी और फिर जो है दूध वापस भेज दिया अभी राजा के पास में दूध जब वापस आया तो उसने कहा की इसका टेस्ट करो तो देखा की तुम मीठा हो गया है पहले तो इसमें शक्कर नहीं डाली थी तो राजा समझ गया की ये लोग क्या कहना चाहते हैं हम लोग पारसी जो नेता है वह लोग कहते हैं हम लोग आप लोगों के साथ इस तरह से गुल मिल जाएंगे की आपको कोई कष्ट भी नहीं होगा और आपकी जो संस्कृति है आपका जो अर्थ यहां के जो अर्थव्यवस्था है राज्य व्यवस्था है उसको हम ऊपर से समृद्ध करेंगे उसमें हम अच्छा सा कंट्रीब्यूशन करेंगे तो इसीलिए बाद में देखिए जो टाटा है वगैरा इन लोगों ने कितना अच्छा ये जो अपने इंडिया के भारत के प्रोग्रेस में ये जो कितना अच्छा ये जो योगदान दिया है तो राजा को लगा की हां ये लोग स्मार्ट है और यहां पे र सकते बोल करके उनको रहने की अनुमति दे दी तो ऐसे है की ये जो समुद्र जो नमक की बनी हुई जो गुड़िया भी है वो यदि वो जो एक पुतला भी है वो यदि समुद्र में जाएगा तो क्या होगा वो एक रस हो जाएगा फिर वो जो है वो फिर कौन वापस आकर के आपको खबर देगा की ये समुद्र में कितनी गहराई है कितना गहरा समुद्र है या कितना दूर उसका दूसरा किनारा है इस तरह से ठाकुर उदाहरण देते हैं की ब्रह्मा ज्ञान जब होता है तो वापस आकर के आप का नहीं सकते की आपने क्या देखा किसी ने प्रश्न किया क्या समाधि स्थल पुरुष जिसको ब्रह्म ज्ञान हुआ है फिर बोलते नहीं है श्री रामकृष्ण ने उत्तर दिया की लोग शिक्षा के लिए शंकराचार्य ने विद्या का हम रखा था ब्रह्म दर्शन होने से मनुष्य चुप हो जाता है जब तक दर्शन ना हो तभी तक विचार होता है गी जब तक पकाना जाए तभी तक आवाज करता है पक्के गी से शब्द नहीं निकलता पर पैक गी में कच्ची पुरी छोड़ दी जाति है तो फिर एक बार वैसा ही शब्द निकलता है जब कच्ची पुरी को पकड़ डाला तब वह फिर से चुप हो जाता है वैसे ही समाधि स्थल पुरुष लोक शिक्षक के लिए फिर नीचे उतरता है फिर बोलना है जैसे ठाकुर ने बहुत अच्छा एक दूसरे जगह पर भी उदाहरण दिया था जब आप छठ पर जाते हैं तो आप सीडी से चढ़कर के छठ के ऊपर जाते हैं सीडी से जब चढ़ते हैं तो आप नेत्री नेत्री वेदांत का एक उपनिषद का एक शब्द है इसका अर्थ है की मैं ये जो जगत है इसमें जो कुछ भी है सबका में त्याग करता हूं नेत्री अर्थात की ये नहीं ये नहीं मेरा जो मां है वो भी मैं नहीं चाहता या तो फिर मेरा जो मां है वो भी ब्रह्मा नहीं है मेरा जो अहंकार है वो भी ब्रह्मा ने ही है मेरे जो इंद्रिय सुख की जो मेरी लालसा है वो भी ब्राह्मण नहीं है तो नेत्री नेत्री नेत्री करके हम सीधी चढ़ते चढ़ते छठ पे चले जाते हैं जब छठ पे जाते हैं सब कुछ त्याग हो जाता है तब हमको ब्रह्मा दर्शन होता है फिर ठाकुर कहते हैं हम दूसरी सीडी से हम फिर से जमीन पर उतरते हैं ये कहकर की इतनी अर्थात की ये जो यहां पर ठाकुर कहते हैं शंकराचार्य ने लोक शिक्षा देने के लिए विद्या का हम रखा था की यह जो विद्या है इसके आधार पर यह जो शक्ति है उसके अनुष्ठान करके मैं जो है इस जगत में धर्म चक्र परिवर्तन करूंगा या तो ईश्वर की वाणी का प्रचार करूंगा जैसे ठाकुर ठाकुर ने जब एक के बाद एक साधना करके जो है ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर लिया तोतापुरी के साथ में वेदांत साधना की जटाधारी के साथ में वो जो है वैष्णव साधना की भैरवी ब्राह्मणी के साथ में शक्ति साधना तंत्र साधना की सब कुछ तरक्की साधनाएं जो है वो संपूर्ण हो गई ठाकुर जो है ब्रह्मज्ञान में स्थित हो गए उसके बाद में मां शारदा देवी दक्षिणेश्वर में आई 1873 में फिर ठाकुर ने उनको शोधशी रूप में उनकी पूजा की अपनी जो जाप माला है उनके श्री चरण में उन्होंने अर्पण कर दी और फिर शक्ति को स्थापित करके फिर उन्होंने लोक कल्याण के जो यह जो उनका योग्य था उसका उन्होंने किया यदि मां नहीं आई तो ठाकुर जो है शक्ति की सफाई के बिना ये जो लोक कल्याण नहीं कर सकते थे अर्थात की जब हम नेत्री नेत्री करके जो ब्रह्मज्ञान प्रताप करने का यह जो हमारा वह जो हमारा वो जो ये है समय उसे समय सब कुछ त्याग कर देना है संपूर्ण रूप से अपने मां को निर्विकार कर देना है हमारा हम जो है हमारे कर्म करने की जो वासना है सब कुछ ये लोग कल्याण बोलो जो भी बोलो सब कुछ त्याग कर देना है कैसे भी करके एक बार ब्रह्मा ज्ञान प्राप्त कर लेना है ईश्वर के दर्शन प्राप्त कर लेने हैं ठाकुर ने कहा ना एक काली मंदिर में जाते हैं कोलकाता का कालीघाट वहां पे जाएंगे तो आप जो बाहर में जो भिखारी बैठे हैं उनको दान दक्षिण देने में ही वो समय व्यर्थ कर देंगे ना की कैसे भी हो धक्का मुख करके एक बार भीतर में चले जाएंगे मां का दर्शन करेंगे फिर बाहर में आकर के फिर सुकून से वह चैन से अब जितने भी जो भी ध्यान दक्षिण देना है वह देते रहो तो वैसे ही पहले किसी भी तरह से ईश्वर प्राप्त हो जाए ईश्वर दर्शन हो जाए उसके बाद में जैसे वह यहां पर कहते हैं की शंकराचार्य अर्थात उन्होंने विद्या देने का कम किया था अच्छा अभी यहां पे एक प्रश्न हो सकता है की फिर रामकृष्ण मिशन में ये जो कर्म कर रहे हैं वो क्या है मैं यहां पब्लिकेशन में बैठा हूं मैंने डॉक्टर महाराज के बड़े में कहा था उनको कैंसर हो गया है फिर भी दिन प्रतिदिन जो है कितना अच्छा हमारा डिस्पेंसरी चलते हैं तो हम लोगों ने तो ईश्वर दर्शन नहीं किया तो फिर हम किस मुंह से ये कर्म कर रहे हैं किंतु यहां पे स्वामी जी ने कहा है की कर्म इत्सेल्फ इसे साधना और निष्पक्ष हो करके स्वार्थ होकर के जोकर्मक किया जाए वो साधना का ही एक अंग है मैं जो किताब छपता हूं तो मैं जाकर के सबसे पहले हम लोग क्या करते हैं उसकी तीन कॉपी जो है वो ठाकुर को मंदिर में जाकर के ऑफर करते हैं जो जैसे की यह मंथली मैगजीन है रामकृष्ण जो जैसे ही छाप करके ए गया 20 तारीख को वो प्रेस में जाता है और वो जो है 27 28 तारीख तक प्रेस में से ए जाता है तो जैसे ही प्रेस में से आया वो बंडल के बंडल आकर के वह ट्रक तोर पर रखकर जाति है तो सबसे पहले हमने एक बंडल खोल उसमें से तीन कॉपी ली रामकृष्ण ज्योत की और जाकर के मंदिर में ठाकुर को ऑफर करके ए गया अभी वो पुजारी महाराज है उसको ठाकुर के सामने रखेंगे उसके ऊपर में वो जो है वो चंदन का एक वो ये लगाएंगे स्पर्श करेंगे तिलक लगाएंगे ठाकुर के पास में रहेगा एक दिन 24 घंटा ठाकुर पढ़ेंगे जोधपुर को और वही खुद देखेंगे की ये लोग मेरे नाम से क्या उल्टा पुल्टा लिख रहा है जो भी है वो लोग पढ़ेंगे और फिर जो है वो प्रसाद ही कॉपी यहां पे आएगी और फिर शादी कॉपी को बड़े ही जतन से हम लोग संभल करके रखेंगे इस तरह से जो भी किताबें आई है तो मैं इसलिए लिखना हूं इसलिए किताबी लिखना हूं क्योंकि ठाकुर पढ़ने हैं बाकी लोग पढ़ने हैं वो तो मर्डर भाग जैसे बांग्लादेश वो हो गया बोनस जो दूसरे लोग पढ़ने हैं किंतु में चीज है ठाकुर पढ़ते हैं तो हम लोगों का जो कर्म है वो है ठाकुर आगे कहते हैं जब तक मधुमक्खी फूल पर नहीं बैठी तब तक भन-भनाते रहती है फूल पर बैठकर मधुर पीना शुरू करने के बाद वह चुप हो जाति है हां मधु पान के उपरांत मस्त होकर फिर कभी कभी बन बना दिया अर्थात मधुमक्खी जब तक मधु पान नहीं करती वो उसका जो वे उसका संगीत है वो चलते रहती है इसका अर्थ क्या हुआ हम लोग जो है जब तक ईश्वर दर्शन नहीं होता जब तक ब्रह्मज्ञान प्रताप नहीं होती तब तक हम लोग जो है कर्म करते रहते हैं हमारा जो ईश्वर प्रताप पहले के कर्म क्या है तो वह साधना जब ईश्वर प्रताप है तो ब्रह्मज्ञान हो जाए तब जब भी जितने भी कर्म है वो सब हो जाएंगे जब तक ईश्वर प्रताप करने की साधना चल रही है तब तक ही हमारे मां से हम विचार करते हैं चिंतन मनन स्मरण मनन निद्या सन करते हैं किंतु जैसे ही हमारा मां ब्रह्मज्ञान या तो आत्मज्ञान में स्थित हो जाता है हमारा मां जो है वो ब्रह्मज्ञान में विलेन हो जाता है फिर कौन में और कौन तुम और हम लोग सब हो गए एक तो ऐसे ही एकाकार ईश्वर के रूप में हो जाते हैं किंतु हां फिर यदि ईश्वर स्वयं चाहते हैं की हम लोग जो है नीचे आकर के फिर जो है लोक कल्याण के लिए कुछ कम करें तो फिर ठाकुर यहां पे कहते हैं की जब तक वो मधु पान करती है पूरा साइलेंट हो जाति है किंतु हां मधु पान करने के बाद में वो आनंद में आकर के फिर से कभी एक दो बार कोई गीत ग लेती है तो वैसे ही मधु पान करने से पहले का जो वो जो है मधुमक्खी का प्रयास वह बेचारी मधु खोजना के लिए मेरी मेरी घूमती है कहां मधु मिलेगा कहां मधु मिलेगा किंतु जैसे ही वह जो मधु मिल गया तो एकदम साइलेंट हो जाति है और मधु पान हो गया मां जो है वो तृप्ति हो गया अपना मां शांत हो गया आनंद से भर गया तो आनंद में आकर के एक-दो गीत वो शायद डालेगी वो गीत सुनकर के दूसरों को प्रसन्नता हो तो वैसे ही हमारे मां से जो कार्य होता है हमारे यह जो कोई भी कर्म है या तो मां के जो विचार है दो तरह के सड़क की बात कर रहा हूं एक तो है की ईश्वर प्रताप के लिए करने वाली साधना और फिर जब ईश्वर प्रताप हो जाति है ईश्वर मैं हो जाते तब संपूर्ण शांत ले अवस्था और फिर यदि ईश्वर की इच्छा होती है हमको आदेश देते हैं की हां तुम जो है दूसरों मेरे दूसरे जो भक्ति है उनको जाकर के मेरा नाम सुनाओ मेरे गुणगान गांव उनके सामने मेरे भजन गो मेरे गीत गो यदि मैं ऐसा आदेश देती है ईश्वर ईश्वर ऐसा आदेश देते हैं तो फिर से वो जो छठ से नीचे आकर करके इसे मस्ती में आकर के वो जो हमारे नरसी मेहता वगैरा उनके जो दोहे यह जो राम प्रसाद इनके भजन और सुनकर के ऐसा हमको लगता है की हां ये जो भजन है या तो फिर ये जो कीर्तन ये जो ये सॉन्ग है इसकी रचना जिसने भी की है उसको अवश्य ईश्वर दर्शन हुए होंगे एड और वाइस इतना मधुर संगीत कोई भी रचना नहीं कर सकता तो वह हो गया ईश्वर प्रताप के बात की रचना कर्म और ये है की ईश्वर प्रताप के लिए किया जान वाला कर्म और बीच में है संपूर्ण ले अवस्था संपूर्ण शांत अवस्था अच्छा तो आज यही पर कल फिर से मिलते हैं