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Swami Vivekananda' Complete Life ·

Swami Vivekananda: Life and Teachings 13 Mar 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य [संगीत] सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः

Swami Vivekananda: Vedantic brain in Islamic body

स्वामी जी का एक स्टेटमेंट इस्लामिक बॉडी वि वेदांतिक ब्रेन। तो इसको लेके काफी कुछ चर्चा वगैरह होती है। गंगाधर महाराज स्वामी अखंडानंद जी उन्होंने इसके बारे में कहा है। वह कहते हैं कि स्वामी जी दैट इज स्वामी विवेकानंद इस्लाम की सामाजिक उदारता पसंद करते थे। और जिस तरह से वह एक मिशनरी रिलीजन है कि लोगों को अपने धर्म मत के भीतर में लाना वो जैसे कि अपने हिंदूइज़्म में नहीं है। अखंडानंद जी कहते हैं कि हिंदूइज़्म और यह जो हब्रू रिलीज हब्रू लोगों का जुड़ाइज्म है। यह यहूदी धर्म इजराइल का यह दो इस तरह के पुराने स्टाइल के रिलीजन है। यहां पे आपको यदि हिंदू या एक यहूदी बनना है तो आपको उनके घर में जन्म लेना होगा। हमारे यहां पे ऐसा कोई मिशनरी सिस्टम नहीं है। यदि था तो वह हजारों साल पहले था कि भगवान राम यह साउथ इंडिया में आए और फिर यह लंका तक गए। तो वह जो गंगा के तट की जो वैदिक संस्कृति है उन्होंने प्रसार प्रचार की और साथ में ही यह भारत से निकल कर के यही रामायण महाभारत की कहानियां पूरे साउथ ईस्ट एशिया में फैली तो वह एक युग था। किंतु उसके बाद में ना जैसे कि हम लोग अपना दरवाजा बंद करके इस तरह से बैठ गए कि अखंडानंद जी कहते हैं कि हिंदू धर्म में प्रवेश तो नहीं है। ऊपर से आपको नात बाहर निकाल देंगे। जात बाहर निकाल देंगे। आपको हुक्का पानी बंद कर देंगे। नॉर्थ इंडिया में वो जो पंचायत होती है ना गांव की यदि आपने कुछ अपराध किया है तो वह आपको गांव से निकाल देंगे। या तो फिर गांव की यह जो फैसिलिटी है कुएं का पानी है, मंदिर है, फेस्टिवल है वगैरह खेत है, वहां से आपको कोई अधिकार नहीं रहेगा वहां पर जाकर के कुछ करने का। कुएं का पानी पीने का, पंचायत में रिप्रेजेंट होने का, मंदिर में जाकर दर्शन करने का तो उसको हुक्का पानी बंद कर देना। ऐसा कहते हैं। तो क्या है कि हम लोगों का हृदय ओवर ए लॉन्ग पीरियड ऑफ टाइम ऐसा करके संकुचित होता गया कि हिंदू धर्म में खुले हाथों से किसी को ग्रहण करना तो दूर है। अपने यहां से लोगों को भगाना शुरू कर दिया और उसकी वजह से जो यह इस्लाम भारत में प्रवेश किया वह इतना इजीली फैल सका क्योंकि जब मनुष्य को तो हृदय में कुछ सांत्वना चाहिए ईश्वर का एक सानिध्य चाहिए कुछ भरोसा चाहिए यदि आपके खुद के धर्म में वह नहीं मिलता है तो नेचुरली है कि वह अन्य किसी धर्म में वह जाएगा अन्य किसी धर्म में उसको खोजने का प्रयास करेगा। तो यह एक है कि अपना धर्म उदार नहीं था। हालांकि देखिए रिफॉर्म मूवमेंट्स बार-बार आती रही है। रामानुजाचार्य फिर ये अपने चैतन्य महाप्रभु और फिर आखिर में ऑफ कोर्स श्री रामकृष्ण स्वामी विवेकानंद स्वयं किंतु फिर भी क्या है एक बहुत बड़ा यह है खास करके देखिए यूपी और बिहार में कि कितने सारे लोग जो कि तथाकथित लोअर कास्ट के भी थे और उनके लिए अपर कास्ट वालों ने यह जो फैसिलिटीज होती है एक सम्मान होता है। एक इक्वल ओपोरर्चुनिटीज होती है। उसके रास्ते बंद कर दिए थे। सो दैट वास एक बात है। दूसरा अखंडानंद जी स्वामी जी के ही इस स्टेटमेंट के बारे में कहते हैं। स्वामी जी कहते थे कि मुगल रक्त अभी देखिए मुगल लोगों को लेकर के भी यह सब चल रहा है। डिबेट कि भारत में आए भारत पे शासन किया। हम लोग बार-बार बोलते हैं 1000 साल की गुलामी वि इज ट्रू इन अ वे। किंतु फिर भी देखिए कि यह सिविलाइजेशनल इवोल्यूशन जो है समाज या राष्ट्र का इवोल्यूशन वो इतना गहराई तक उसका जो सर्टिलिटीज जो होती है उसके जो इंप्लिकेशंस होते हैं उसके जो तात्पर्य होते हैं उसके जो अर्थ होते हैं इतना गहराई तक जाते हैं कि हम लोग ऊपर ऊपर से उसको समझ नहीं पाएंगे। जो अच्छे-अच्छे हिस्टोरियन भी होते हैं, वे लोग क्या करते हैं? अपने आप को तथ्यों के एक मायाजाल में बांध देते हैं। फक्चुअल एक मायाजाल खड़ी करेंगे। इस साल में यह राजा था, इस साल में यह राजा था, इस साल में यह युद्ध हुआ, इस युद्ध में यह जीता, उसका यह सब था परिणाम। किंतु ऐसा करके हिस्ट्री के जो डीपर अंडरकरंट्स है वो यह लोग नहीं समझते। तो यह हिस्ट्री के सिविलाइजेशनल इवोल्यूशन के जो अंडर करंट है उसको समझने के लिए स्वामी जी की तरह ऋषि की दृष्टि चाहिए। वो स्वामी जी वो कन्याकुमारी गए थे ना वो वहां पर वो रॉक के ऊपर में बैठकर के उन्होंने पूरे भारतवर्ष पर ध्यान किया था। तो निवेदिता ने लिखा है कि स्वामी जी इस फर्स्ट ऋषि प्रथम ऋषि है जी कि अन्य सब ऋषि मुनि ईश्वर पर ध्यान करेंगे। आत्मन ब्राह्मण पर ध्यान करेंगे। निर्वाण प्राप्त करने का चेष्टा करेंगे। जबकि स्वामी विवेकानंद है फर्स्ट ऋषि कि जिन्होंने भारत के ऊपर में ध्यान किया। तो देखिए कि भारत के ऊपर में जब स्वामी जी ध्यान करेंगे तो भारत का जो इतिहास, वर्तमान और भविष्य तीनों तो उनकी नजर के सामने खुल जाएगा। स्वामी जी कोई स्टेटमेंट जब देते हैं तो उसका एक बहुत ही गहन तात्पर्य है। तो और एक स्टेटमेंट जो कि स्वामी जी ने दिया है और जो कि अखंडानंद जी हमको कहते हैं कहते हैं कि स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि मुगल रक्त जो है वो है आतारशुरा। बेंगली शब्द है आता अर्थात आत्मन। आत्मा और सुरा अर्थात की वाइन मुगल रक्त है आत्मन की सुरा आत्मन का वाइन किस तरह से यह बात स्वामी जी कहते हैं कि भारत में जो तमस इस हद तक बढ़ गया था हम लोगों के भीतर में कि यह जो मुगल लोग भारत में आए और इनके भीतर में जो एक राजसिक शक्ति थी उनके भीतर में जो जगत पे राज्य करने कि वीर भोग्यम वसुंधरा जिसको कहते हैं। तो वीर होकर के वसुंधरा का भोग करने की उनकी जो यह एंबिशन थी उसने जैसे कि भारत के यह जो मृत प्राय शब्द देह के भीतर में एक नए प्राण का संचार किया। बहुत बार क्या होता है? भारत का जो हमेशा से होता आ रहा है खास करके पिछले 1000 साल में कि एक आते हैं महापुरुष जिनकी आध्यात्मिक ऊंचाई आध्यात्मिक उनकी उपलब्धि इस लेवल की होती है कि हम इनको मनुष्य या इंसान कह ही नहीं सकते। उनको आप देवता या अवतार ही आपको कहना पड़ेगा। तो एक तो इस तरह के लोगों का आगमन होता है और फिर एक होता है एक विशाल जन समुदाय जो कि इस तरह के तमस के गड्ढे में डूबा हुआ है। आलस के गड्ढे में इस तरह से डूबा हुआ है कि जैसे कि माया मिली ना राम ना मिली आध्यात्मिक उन्नति ना ही हुआ इस पृथ्वी का भोग और यह तमस क्या है कि सत्व का मुखौटा पहन लिया है। तमस के ऊपर में मैंने कहा था रांची में एक था मेरा मेरे ही रूम के बगल में और एक यंग लड़का रहता था तो उसके घर में तो कुछ कामधाम करता नहीं था उसके मां-पिताजी ने कहा जाओ किसी आश्रम में जाकर रहो एटलीस्ट मुफत में कुछ खाना मिलेगा तो बोलकर के वह आश्रम में पड़ा रहता था आश्रम में थोड़ा बहुत काम करेगा नो डाउट रामकृष्ण मिशन के किसी भी सेंटर में आपको मुफत में बिठा करके कोई खिलाने वाला नहीं है। यहां पे रहना है तो काम तो करना पड़ेगा और इनफ काम करना पड़ेगा। ऊपर ऊपर से करने से भी नहीं चलेगा। काम का एक स्टैंडर्ड मेंटेन करना है यहां पे। तो वो सब करता तो था। किंतु म मुझे उसको देखकर के इतना आश्चर्य होता था। जैसे ही वह कमरे में आएगा वह एक बैठा रहेगा चुपचाप ना ही कुछ पढ़ाई लिखाई करेगा। नहीं वह ऐसा किसी के साथ में बात करने का ऐसा कुछ होगा। शुरू शुरू में तो मैं ऐसा इंप्रेस हो गया था। मैंने सोचा यह कोई गुप्त ब्रह्म ज्ञानी है। बिना कोई ब्रह्म ज्ञान के इस तरह से आप चुपचाप एक जगह पर नहीं बैठ सकते। तो मैं उसके साथ में बात करने का प्रयास करता था। मुझे कुछ सीखने को मिल जाए। किंतु कुछ ही समय में पता चल गया कि नॉट ओनली कि यह आदमी आध्यात्मिकता तो छोड़ ही दीजिए। आलसी है और एक नंबर का क्या कहेंगे? तामसिक है। एट द सेम टाइम सत्य वचन वो एक सिंसियरिटी होना मैं उसके ऊपर मैं भरोसा कर सकता हूं कि हां भाई यह आदमी जो बोलेगा मिथ्या वचन नहीं कहेगा। वह सब भी था और साथ में इतना गहरा तमस यह दोनों का कॉम्बिनेशन हाउ इज इट पॉसिबल? यह मैंने न भूतो न भविष्यति तामसिक व्यक्ति को देखा है। राजसिक व्यक्ति को देखा है। सात्विक व्यक्ति को देखा है। और यदि आप रामकृष्ण मिशन में थोड़ा सा परिचय होगा तो सात्विक रजस वाले बहुत सारे आपको मिल जाएंगे कि सुबह शाम ठाकुर की आराधना भी करते हैं। कैरेक्टर भी स्ट्रांग है। एट द सेम टाइम भयानक रजस है। काम करना है। सेवा करनी है। कार्य का विस्तार करना है। वह एक स्ट्रांग एंबिशन होता है। सो वह यह सब आप समझ सकते हैं। तामसिक सत्व तामसिक रजस समझ सकते हैं कि भीतर में वासना बड़ी प्रबल है और कार्य करने की भी बड़ी शक्ति है। यह पूरा सिलिकॉन वैली तामसिक रजस पर बना है। तो वह भी एक समझ सकते हैं। किंतु ये तामसिक सत्व कैसे समझ में आएगा? पहला उदाहरण मैंने अपने जीवन में देखा। किंतु क्या है? ऐसा एक पूरा जन समुदाय खड़ा हो गया था। आधा तामसिक है, आधा सात्विक है। आध्यात्मिकता की ओर आकर्षण तो है किंतु भीतर में वह शक्ति नहीं है कि फुल स्केल आप आध्यात्मिक जीवन जी सके। एट द सेम टाइम। अभी आध्यात्मिकता के अलावा जीवन में और कोई उद्देश्य है नहीं। ऐसा दिन रात यह लोग सुनते हैं तो फिर सांसारिक कुछ उन्नति हो। सांसारिक कुछ एडवांसमेंट यदि अपना नहीं तो समाज का समाज का नहीं तो देश का वह बात ही जैसे कि बेचारे को समझ में नहीं आती क्योंकि समाज तो माया है। देश भी तो माया है। मिथ्या है। असत है। उसको करने से क्या लाभ है? समाज में कुछ कंट्रीब्यूट करने से। पर पर्सनल एक मेंटेन करें। एथिक्स एंड मोरालिटी बहुत हो गया। समाज में कंट्रीब्यूशन करने की जरूरत नहीं। वो भगवान बैठे हैं वो सब करने के लिए। तो वैसे भी तो आधा स्वप्न है। आधा भगवान बैठे हैं। आधा ये ईश्वर कर लेंगे। ऐसा बोलकर के जो इनके मन में जो घुसा है तमस तो देखिए कि इस तमस ने बहुत ही तोड़फाड़ की है भारत के भीतर में। तो इसलिए स्वामी जी यहां पर कहते हैं मुगल रक्त को बोलते आत्मा की सुरा आत्मा का वाइन अर्थात कि यह जो आधा जो तमस घुस गया है आधा सत्व है आधा तमस है तो वो तमस को लात मारकर के रजस में ले जाना वरना क्या है यह जो आपका सत्व जो है ऊपर की ओर खींचता तो है किंतु नीचे वाला जो तमस है इतना भयानक स्ट्रांग है कि आप ऊपर जा ही नहीं पाए पाएंगे। सो यह तमस वाले पार्ट को लात मार करके उसको रजस में फेंकना वह एक कार्य मुगल लोगों ने किया है। तो दैट इज वेरी सरप्राइजिंग स्टेटमेंट फ्रॉम स्वामी जी और एक स्टेटमेंट अगेन यह सब अखंडानंद जी ही हमको बताते हैं। कहते हैं कि स्वामी जी का कहना है शरीर और मस्तिष्क अर्थात कि ब्रेन बॉडी एंड ब्रेन यह दोनों का समन्वय करना है। यह ऑलरेडी स्वामी जी ने कह दिया कि वेदांतिक ब्रेन इन एन इस्लामिक बॉडी। किंतु यहां पर एक तो चीज हो गई कि सामाजिक उदारता इस्लाम की उसके साथ में वेदांत की जो आध्यात्मिक ऊंचाई है इन दोनों को कंबाइन करना है। वह तो एक कांसेप्ट हो गया। किंतु और भी एक कासेप्ट है कि देखिए कि फिजिकल स्ट्रेंथ नहीं होने से यह जो उच्च आध्यात्मिक तत्व है उसको ग्रहण करने की अपनी क्षमता है ना बड़ी लिमिटेड हो जाएगी। अब ध्यान करने को बैठे हैं। तो 10-15 मिनट हुआ तो अभी कमर में दर्द, कहीं घुटन में दर्द, कहीं गर्दन में दर्द तो कहीं सिर दर्द और थोड़ा सा 40 मिनट जैसा कुछ बैठे तो भीतर में से ऐसा एक आएगा कि अभी का अभी खड़े हो जाना है। वरना फिर बहुत बड़ा गड़बड़ हो जाएगा। लोग लिटरली दौड़ के उठकर के खड़े होकर भाग जाते हैं। तो देखिए कि ये एक फिजिकल स्टेमिना नहीं होने से एक लंबे समय तक आप बैठे कैसे रहेंगे? यह जो ऑस्टेरिटीज करनी है, वह ऑस्टेरिटीज है, तपस्या है, साधन भजन है, वह आप कैसे कर पाएंगे? वह तो एक चीज है कि फिजिकल फिटनेस होने से आप आध्यात्मिक जगत में आगे बढ़ सकते हैं। साथ में ही यह और जैसे अपना फ्रेमवर्क है स्पिरिचुअलिटी, कम्युनिटी, सिविलाइजेशन तीनों लेवल पर तो हमको एडवांस होना है। यह कॉन्शियसनेस के लेवल पर हमको स्पिरिचुअलिटी में आगे बढ़ना है। कम्युनिटी के लेवल पर हमको उदार हृदय होना है। मातृ हृदय होना है। जिससे कि हम सबके प्रति जो आसपास में हमारे रहते हैं सबके प्रति स्नेह प्रदर्शित कर सके और सिविलाइजेशनल लेवल पे हमको कुछ सीरियस कंट्रीब्यूशन करना है। अभी यह जो एआई में एडवांसमेंट है प्रतिदिन यह नया मॉडल डेवलप हुआ। यह एक नया फीचर डेवलप हुआ। यह नया टूल डेवलप हुआ। यह या यह इसने यह किया नया। एवरीडे कुछ ना कुछ आता रहता है। अभी आप यह जो सब एआई बेंचमार्क भी देखेंगे ना सेचुरेट होने को आए हैं। अभी प्रोग्रामिंग का जहां तक प्रश्न है ऑलरेडी जो एआई टूल्स है दे आर बेटर एट प्रोग्रामिंग देन ह्यूमन प्रोग्रामर्स। आर्ट लिटरेचर के क्षेत्र में भी देखिए कि एआई जो है अभी एक इंडिपेंडेंट कंपोजशन करना शुरू कर दिया है और इंडिपेंडेंट कंपोजशन यदि इतना अच्छा ना भी हो लोगों को अच्छा ना भी लगे एटलीस्ट जो अच्छा ऑथर होता है वो एआई को लेकर के बहुत सारे आइडियाज को ब्रेन स्टार्म कर सकता है। सो वो एक है इंजीनियरिंग मैथमेटिक्स में तो कोई प्रश्न ही नहीं है। ह्यूमैनिटीज वाला जो है उसमें अभी यह जो लॉयर है उसका जो ब्रीफ तैयार करना है अभी वॉर है तो वॉर में टारगेट मैपिंग करना है तो ये जो बैटल डैमेज असेसमेंट करना है वो इतना फटाफट करके अभी एआई कर रहा है तो देखिए कि यह जो फ्रंटियर लैब्स है एंथ्रोपिक है ओपन एआई है Google है यह जो फ्रंटियर लैब्स में जो कंट्रीब्यूशन होता है टुवर्ड्स द एडवांसमेंट ऑफ सिविलाइजेशन। देखिए बहुत सारे लोग ना टेक्नोलॉजिकली पेसिमिस्ट होते हैं। अर्थात कि टेक्नोलॉजी का डेवलपमेंट होगा तो मनुष्य समाज पीछे पड़ जाएगा। और जैसे यह साइंस फिक्शन मूवीज में होता है। कोई रोबोट है, एआई है, हमारे पे कंट्रोल जमा लेगा और फिर मनुष्य का मनुष्य को मार करके पृथ्वी पर राज करेगा। यह एक टेक्नोलॉजिकली पेसिफिस्ट व्यक्ति का इस तरह का सोचना है। आई एम ए टेक्नोलॉजिकली ऑप्टिमिस्ट पर्सन। मैं कहता हूं जितना साइंस एंड टेक्नोलॉजी डेवलप होता है उतना ही मनुष्य समाज के लिए अच्छा है। वो 1000 साल तक हम आंख बंद करके बैठे रहे। शाहमृग की तरह यह ऑस्ट्रीच की तरह रेती में मुंह डाल के कि यह जगत मिथ्या है। जगत मिथ्या है। बोल के हमको इतनी लात खानी पड़ी है। यह गलती फिर से कभी नहीं करना है। ये टेक्नोलॉजिकल पेसिफिज्म है। बड़ा ही डेंजरस है। बी ऑलवेज टेक्नोलॉजिकली ऑप्टिमिस्ट इस अर्थ में कि जितना भी एडवांस हां वो नुकसान करेगा। यह सेकंड वर्ल्ड वॉर में जितना भी टेक्नोलॉजी डेवलप हुआ था सबका यूज किया गया है मनुष्य को मारने के लिए। अभी भी हम देख रहे हैं यह जितने भी युद्ध हो रहे हैं यह ड्रोन है यह एआई है। इट इज़ यूज्ड कि और अभी ये जो एक डिबेट चला है अमेरिका में ये एंथ्रोपिक वाले कहते हैं कि ऑटोनॉमस किलिंग मशीन नहीं बनाने हैं। हमारा एआई का यूज़ यह सर्वेलेंस के लिए नहीं करना है। ऑटोनॉमस किलिंग मशीन बनाने के लिए नहीं करना। व्हिच आर गुड डिबेट्स। ऐसा नहीं है कि सब कुछ आंख बंद करके आपको मिलिट्री यूज करना है टेक्नोलॉजी का बट डेवलप द टेक्नोलॉजी एंड हैव दैट विज़डम दैट टेक्नोलॉजी इज यूज्ड फॉर ए बेनिफिशियल पर्पस ऑफ ह्यूमैनिटी। सो क्या है कि देखिए यह जो एक स्ट्रांग बॉडी रहेगा तो आप यह सब कुछ कर पाएंगे। वरना फिर यह कमजोर शरीर रहने से ना ही आध्यात्मिक उन्नति होती है, ना ही आपका हृदय विकसित होता है, ना ही आप इंटेलेक्चुअली या तो एक्टिवली समाज के एडवांसमेंट के लिए कुछ आप कंट्रीब्यूट कर पाते हैं। सो स्वामी अखंडानंद जी ने एक विज़ उनको देखा था। स्वप्न देखा था। अखंडानंद जी को स्वप्न आया। स्वप्न में क्या देखा? स्वामी विवेकानंद एक प्रकांड बलिष्ठ मुसलमान का वेश धारण करके रास्ते से जा रहे हैं। मुसलमान फकीर और उनका देह है प्रचंड वो पहलवान की तरह वो सिक्स पैक वगैरह कहते हैं ना आजकल इस तरह से इनक्रेडिबली फिट बॉडी बिल्डर की तरह उनका देह है। कौपिन पहना है और जंजीरें अपनी कमर में बांधी हुई है और इस तरह के वेश में जा रहे हैं और साथ में चार चेले हैं। तो अखंडानंद जी स्वामी जी का इस तरह का वेश देखकर के आश्चर्यचकित हो गए कि इस तरह का वेश क्यों आपने धारण किया है? तो स्वामी जी कहते हैं यह जो बॉडी बिल्डर का शरीर बॉडी दिखा के यह मसल्स और सिक्स पैक दिखा के कि इस तरह का शरीर नहीं होगा तो क्या काम होगा? यह बार जो मैंने बंगाल में जन्म लिया और बंगाल का यह जो भेतूड़े शरीर भेतूड़े अर्थात भात भात अर्थात कि राइस और जो आदमी राइस खाता है जीवन भर उसका शरीर कैसा हो जाता है? भेतड़े अर्थात कि बात खाने वाला। तो स्वामी जी कहते हैं कि यह जो भेतड़े शरीर है बंगाल का उसको लेकर के मैंने सामान्य कठोरता की। उसी में मेरा देह मन टूट गया। और इसके लिए स्वामी जी मीट ईटिंग पसंद करते थे। खास करके यह जो आज का जो बांग्लादेश है उस समय का पूर्व बंगाल तो स्वामी जी कहते हैं कि देखो तुम्हारे पूर्व बंगालियों का शरीर कितना अच्छा रहता है क्योंकि वे लोग मछली खाते हैं सब समय और यह जो अपना वेस्ट बंगाल है वहां पे ज्यादातर भात या तो फिर यह तली हुई चीजें यह कचौड़ी यह पूरी यह सब खाई जाती है। ये कथामृत में इनफ वर्णन है कि गिरीश घोष के लिए कचोरी मंगवाई गई। ठाकुर खुद यह रास्ते से जा रहे हैं तो कहा भूख लगी है। तो रामलाल दादा जाकर के वो फागगू फागगू बोल के एक था। उसकी दुकान से कचोरी खरीद करके लाया था। तो यह फागगू की कचोरी ठाकुर को बहुत अच्छी लगती थी। तो यह क्या है? तली हुई चीजें और भात। यह खा करके यह जो अपने जो इंडिया के बंगाली है उनका शरीर जो है कमजोर हो गया है। जबकि यह पूर्व बंगाल आज का बांग्लादेश वहां पर मछली ज्यादा चलती है तो मछली खाकर के फिजिकल फिटनेस उन लोगों का अच्छा रहा। तो स्वामी जी कहते हैं जब यह अखंडानंद जी ने देखा कि इतना मस्कुलर बॉडी और मुसल मुसलमान का देह धारण करके जा रहे हैं तो पूछा कि इस तरह का क्यों? तो स्वामी जी ने कहा कि इतना मस्कुलर बॉडी नहीं रहने से काम कैसे होगा? इस बार तुम्हारा यह जो भेतड़े शरीर भात खाने वाला शरीर यह ले आया हूं तो थोड़ा सा ही काम किया उसमें शरीर टूट गया। और फिर देखिए कि दूसरा क्या कहते हैं कि तुमको पता है कि मैं बैठा नहीं रहा हूं। अभी यह सब तो कब की बात है? स्वामी जी की महासमाधि हो चुकी है। उसके बाद की बात है। अखंडानंद जी गंगाधर महाराज इसको सपने में देखते हैं। तो सपने में ही स्वामी जी कहते हैं कि तुमको पता है जानो कि मैं बैठा नहीं हूं। अर्थात कि त्याग करने के बाद में भी मैं चुपचाप नहीं बैठा हूं। मैं इन लोगों के भीतर में ठाकुर की उदारता का प्रचार कर रहा हूं। इसीलिए मैं इन लोगों के देश के फकीर का स्वांग सज के फकीर का देह ये देह धारण करके इनके साथ में मैं मिल रहा हूं। तो अभी यह तो कौन यह स्वामी जी के साथ में चार शिष्य थे तो अखंडानंद जी ने कहा कौन है यह चार शिष्य किन के भीतर में तुम यह ठाकुर की उदारता का प्रचार कर रहे हो किन के देश का देह धारण ये वेश धारण करके तुम घूम रहे हो तो स्वामी जी यह चार शिष्यों को दिखा के कहते हैं एक है ईरान दूसरा है तुरान तीसरा है खरासान और चौथा है अफगान इंटरेस्टिंग आज का जो यह जिओपॉलिटिकल कॉन्टेक्स्ट है उसमें अफगानिस्तान अच्छा सबसे पहली बात तो इसमें पाकिस्तान आ जाता है बाय डिफॉल्ट क्योंकि ये ब्रिटिश आज का समय था तो भारत की जो बाउंड्रीज थी यहां पे बर्मा से लेकर के तिबेट से लेकर के वो आज का जो पाकिस्तान है सिंध है बलूचिस्तान है नॉर्थवेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस है पंजाब है पूरा यह तो पूरा भारत के भीतर में था ही था। इसके अलावा भारत की बॉर्डर के ऊपर में ब्रिटिश राज के समय के भारत की बॉर्डर के ऊपर में पहला तो आता है अफगानिस्तान। फिर आता है यह ईरान आज का और फिर यह जो आज हम उनको सेंट्रल एशिया कहते हैं ना उज़्बेकिस्तान, ताजाकिस्तान वगैरह यह सेंट्रल एशिया के कंट्रीज जिसको कि तुरान और खुरासान कहते थे। उस समय में बाउंड्रीज थोड़ा सा हैज़ है तुरान और खुरासान का हिस्टोरिकल यह सब है तो एग्जैक्टली किसी देश के साथ मैच नहीं होता मैंने थोड़ा देखने का प्रयास किया इंटरनेट पे सर्च करके तो ये देश का थोड़ा सा उस देश का थोड़ा सा ऐसा करके है किंतु बेसिकली ये जो चार नाम दिए हैं ब्रिटिश राज की बॉर्डर के और म पाकिस्तान तो पूरा आ ही गया इसके बाद के ये ईरान तुरान खरासान अफगानि िस्तान तो अफगानिस्तान तो हमको पता है ईरान हमको पता है। प्लस आप सेंट्रल एशिया ले लीजिए। तो स्वामी जी कहते हैं कि देखो इन लोगों के भीतर में रहकर के मैं ठाकुर का उदार भाव है। इसका प्रचार कर रहा हूं और इसीलिए इनके देश के मुसलमान फकीर का स्वांग सज के मैं आज निकला हूं। सो अखंडानंद जी वास सो सरप्राइज। हम लोग भी सरप्राइज हो जाएंगे स्वामी जी की यह बात सुनकर के क्योंकि आज का जो जिओपॉलिटिकल कॉन्टेक्स्ट है यह देखकर के स्वामी जी की बात कब सिद्ध होगी मुझे तो म [गला साफ़ करने की आवाज़] फोरिएबल फ्यूचर जिसको कहते हैं ना कि आज की परिस्थिति को देखकर के आप भविष्य का अंदाज लगाइए। तो फॉर सीएबल फ्यूचर आज की परिस्थिति को देखकर के अगले 5 साल तक तो हम कह सकते हैं कि कोई आशा नहीं है कि जिस तरह का फेनेटिसिज्म आज के जो हमारे वेस्टर्न बॉर्डर पे है कोई आशा नहीं है कि वहां का जो फेनेटिसिज्म थोड़ा सा भी कम हो जिसको कि हम फोर्सिएबल फ्यूचर कहते हैं। फोरसिएबल फ्यूचर अर्थात कि आज की परिस्थिति को लेकर के आप उसको फ्यूचर में कितना मैप कर सकते हैं। 10 साल, 5 साल, 15 साल, 20 साल। मुझे नहीं लगता कि अपने लाइफटाइम में वहां का फेनेटिसिज्म थोड़ा सा भी कम हो। बढ़ता जाएगा शायद। अभी कल परसों ही तालीबान ने अनाउंस किया कि स्त्रियों के लिए सब तरह के एजुकेशन द इंस्टट्यूट है। बंद हो गए हैं। एक भी लड़की स्कूल में नहीं जा पाएगी। तो गॉड नोज़ ठाकुर नो स्वामी जी नो कि कितना उनका काम उनके भीतर में चल रहा है। तो किंतु जब अखंडानंद जी ने इनको पूछा कि ऐसे लोगों के साथ में हमारा काम कैसे होगा? तो स्वामी जी का उत्तर है वेरी एनलाइटनिंग कि इस तरह का शरीर नहीं होगा तो वेदांत पढ़कर के लाभ क्या होगा? इसी तरह के शरीर के साथ में तो आपको वेदांत पढ़ना है। यानी एक जो फिजिकल फिटनेस है, एक भीतर में जो और उल्लास है, वो यदि नहीं होगा तो वेदांत पढ़ने से क्या लाभ है? देखिए यह यह जितने भी कंट्रीज का नाम स्वामी जी ने दिया ईरान है, अफगानिस्तान है, तुरान, खरासान अर्थात कि ये सेंट्रल एशिया के उज्बेकिस्तान, ताजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान वगैरह-वगैरह। तो ये जितने भी महासत्ताएं हैं ये तो ब्रिटिश कॉलोनियल एंपायर हो, रशियन एंपायर हो, सोवियत यूनियन हो ना कि अमेरिका हो। इस सभी ने जैसे कि इनके ऊपर में कंट्रोल बिठाने के लिए उन्होंने प्रयास किया। किंतु जैसे कि पत्थर की दीवार के साथ में सर पटरा करके वे लोग जैसे कि हार गए हैं। सोवियत यूनियन का अफगानिस्तान से विदाई लेना वो तो जग जाहिर है कि कितने एडवांस हेलीकॉप्टर वगैरह भेजे थे। किंतु आखिर में इतने सारे सोल्जर्स का डेथ होने लगा और फाइनेंशियली इतना बड़ा ड्रेन होने लगा कि इसकी वजह से पूरा सोवियत यूनियन टूट गया। ब्रिटिश एंपायर ने जितनी भी आर्मीज भेजी है अफगानिस्तान में सब की सब डिफिटेड होकर के वापस आई है। कुछ समय के लिए वहां पर राज किया है। किंतु आखिर में तो हार मान के ही चले आए हैं। अमेरिका जैसा अमेरिका आज की महासत्ता अफगानिस्तान से जा रहा है। वो आखिरी सीन जिन लोगों ने देखा है इतना आश्चर्यजनक सीन मूवीज में भी वे लोग जो मूवी के डायरेक्टर होते हैं ना वो स्पेस की कल्पना करते हैं। ये डायनासोर की कल्पना करते हैं। रोबोट की कल्पना करते हैं। किंतु जो सीन उस दिन हुआ था किसी ने कल्पना नहीं की होगी कि अमेरिका का लास्ट प्लेन जा रहा है और उसका जो टायर है उसका जो व्हील उसके ऊपर में लोग टंगे हुए हैं और विमान हवा में उड़ रहा है और व्हील में से वो नीचे में से लोग गिर रहे हैं जमीन पे। सो इस तरह से वो दो पैर के बीच में पूंछ दबा के भागना। कुत्ता जब डर के भागता है तो ऐसा कहते हैं पैर के बीच में पूंछ दबा के भागना। तो अमेरिका भी वैसे ही वहां से भागा है। ईरान में क्या हो रहा है? इट्स ऑल फॉर एवरीवन टू सी। इतना मार खाने के बाद में भी वो जो भीतर का जो अहम है कि हम हार नहीं मानेंगे। वह भी टूटा नहीं। जबकि भारत के साथ में क्या हुआ? ये तीनचार धमाका इधर किया। तीन-चार धमाका उधर किया और आधा देश इनके पैरों के सामने झुक गया कि हां भाई हमको छोड़ दो। जो अखंडानंद जी राजस्थान से जा रहा ना गुजरात से जा रहे हैं स्वामी जी को खोजने के लिए यह वही एक कच्छ भुज की साइड की ही बात है तो उन्होंने पता है कि डाकात का डर है डकैतों का डर है रास्ते में तो किसी के किसी से सीख लिया होगा कि लोकल लैंग्वेज में डकैत जब हमला करते हैं तो क्या कहना है तो किसी ने सिखा दिया होगा कि ऐसा बोलना मेडेगढ़ो मोके मारियो मुंह अर्थात कि मेरा जो है मेरा सामान वह सब ले लो किंतु मुझे मारना मत तो सही में हुआ ऐसा कि वो अखंडानंद जी जा रहे हैं और एकाएक के डकैत लोगों ने हमला कर दिया तो उन्होंने जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया। अखंडानंद जी खुद बोलते हैं जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया। मेडगड़ो मेगड़ो मुके मारियो मुंह तो मेरा सब ले लो किंतु मुझे मत मारना। तो ये यहां पे चार धमाके किए। यहां से चार धमाके किए। नो इंटेंशन अखंडानंद जी को इस तरह का दिस जस्ट अ ह्यूमन एक्सप्रेशन ह्यूमन क्या कहेंगे कि रिएक्शन अखंडानंद जी का नथिंग टू डू विद कि भारत की जो जियोपॉलिटिकल सिचुएशन थी उस समय की यहां से चार धमाके हुए। वहां से चार धमाके हुए। सीधा पैरों में लेट गए। सो यह जो स्वामी जी कहते हैं कि एक प्रचंड आत्मश्रद्धा चाहिए। प्रचंड आत्मविश्वास चाहिए। दुनिया की बड़ी से बड़ी महासत्ता भी हमारी नजर के सामने आकर के हमको धमकी देती है। तो उनका भी हम देख लेंगे। आज ईरान की पपुलेशन देखिए 90 मिलियन यानी 9 करोड़। भारत की पपुलेशन है 130 नहीं 140 करोड़। इसके बावजूद ट्रंप किस तरह से हमको ट्रीट करता है। तो और हम लोग भी कुछ बोल नहीं पाते हैं। सो ये देखिए कि ये आत्मश्रद्धा आत्मविश्वास ये जो स्ट्रेंथ जीजीविषा जिसको कहते हैं जीवन धारण करने की इच्छा हम लोगों का धर्म या अध्यात्म में गिर कर के एक ऐसा परिस्थिति आ गया है कि ना ही धर्म में या तो आध्यात्मिक जीवन में उस ऊंचाई तक पहुंच पाए हैं। जहां तक कि पहुंचना उचित है, जहां तक कि पहुंचना चाहिए, एट द सेम टाइम जगत से मुंह मोड़ लिया है। तो वह जो मेरा जो नेबर था सुधीर जी उनका नाम ही इज अ परफेक्ट रिप्रेजेंटेशन ऑफ इंडिया। उस समय का भी इंडिया आज का भी बहुत सारा इंडिया। एक आधे तो सात्विक है। इस अर्थ में के मैं उसके ऊपर पूरा भरोसा कर सकता हूं। पूरे आश्रम में मैं मुझे एक व्यक्ति पे यदि भरोसा है कि झूठ नहीं बोलेगा तो वह वह आदमी है। एट द सेम टाइम इतना महातामिक इतना महा आलसी व्यक्ति और कोई नहीं था पूरे आश्रम में। सो इट्स अ तामसिक सत्व वेरी स्ट्रेंज फिनोमिना ये तामसिक सत्व। यह तामसिक सत्व से निकलना है और राजसिक सत्व की ओर जाना है। सो यहां पर स्वामी जी कहते हैं कि इस तरह का शरीर नहीं होने से वेदांत पढ़कर के हमको क्या लाभ होगा? तो फिर आखिर में पंच लाइन अखंडानंद जी आखिर में पूछते हैं कि अच्छा इन लोगों को अपने साथ में रखने से क्या होगा? तुम क्या करना चाहते हो? अल्टीमेटली तुम्हारा क्या ऐ है? तो स्वामी जी कहते हैं जिससे कि हिंदुस्तान के साथ में इन लोगों का मिलन हो यह मैं करना चाहता हूं। वेद और महाभारत पढ़ के देखो कि यह तुम लोगों के ही जात भाई है। नाउ दिस इज अप टू एन एक्सटेंट फैक्ट। क्योंकि देखिए हमको तो पता है कि जिनको हम आर्यन कहते हैं तो ईरान में भी वही आर्यन है और यहां पर भी अपने भारत में भी वही आर्यन है। तो यह जो ईरान है, सेंट्रल एशिया है, अफगानिस्तान है और ये नॉर्थ इंडिया, साउथ इंडिया वही आर्य प्रजाओं से ही तो बसा हुआ है। यह जो रिवर्स माइग्रेशन रिवर्स माइग्रेशन यह जो पूरा दौर चला है आर्य प्रजा ने चारों ओर भ्रमण करके यूरोप तक जाकर के यानी सिर्फ ये ईरान खरासान अफगानिस्तान ही नहीं ये जो मिडिल ईस्ट छोड़ दें तो फिर ये यहां पे ये ब्रिटिश है जर्मन है वे लोग भी तो आर्यन है। यह सेंट्रल एशिया है, ईरान है। यह सब सब भी आर्यन ही है। इसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। किंतु वी ऑल नो कि वहां की जियोल जिओपॉलिटिकल सिचुएशन आज कैसी है। तो स्वामी जी कहते हैं कि मैं चाहता हूं कि इन लोगों का हमारे साथ में फिर से मिलन हो। वेद और महाभारत पढ़कर के देखो कि यह हमारे ही जात भाई है। किंतु आखिर में लास्ट पंच लाइन स्वामी जी कहते हैं किंतु और एक शक्ति है वह क्रमागत चेष्टा कर रही है कि जिससे कि यह ना हो पाए। एक ऐसी शक्ति है वह इस तरह का प्रयास करती है जो कि भारत का ईरान, तुरान, खरासान, अफगानिस्तान और यदि आज का पाकिस्तान भी ले ले तो इनके साथ में मिलन नहीं होने देना चाहती। सो दिस वास द लास्ट लाइन कि अखंडानंद जी ने इस पूरे स्वप्न के बारे में कहा है। पढ़कर के सुनकर के आश्चर्य होगा ही होगा कि आज की जो परिस्थिति है उसको आप भविष्य में प्रोजेक्ट करें तो मुझे नहीं लगता कि अपने पूरे लाइफ टाइम में ऐसा कुछ हो जो कि स्वामी जी चाहते हैं कि इन सब देशों के साथ में भारत का मिलन हो। वैसे ईरान अपना मित्र है। अफगानिस्तान भी आजकल हमारे साथ में अच्छा सलूक कर रहा है। किंतु ऐसा तो कभी होने नहीं वाला है कि हम लोग एक सिंगल पॉलिटिकल एंटिटी के भीतर में आके बसे। व्हिच इज ऐसा कोई संभावना फिलहाल तो नहीं दिख रहा है। और यह जो स्वामी जी का जो एक असेसमेंट है असेसमेंट कहो कि उनकी अदृश्य शक्तियों को अंडर करंट्स को पहचानने की क्षमता कि और एक शक्ति है जो कि इस तरह का प्रयास कर रही है जिससे कि इन सब देशों का भारत के साथ में मिलन ना हो। और वह शक्ति कौन सी है? देखिए स्वामी वैसे तो आप ऊपर ऊपर से तो 10 उत्तर दे सकते हैं। वहां का धर्म ही एक ऐसा है जो कि इस तरह से नहीं होने देगा। किंतु दिस इज अ वेरी सरफेस लेवल का आंसर। थोड़ा सा डीप में देखिए तो स्वामी जी ने यहीं पर उसका उत्तर भी दे दिया है। क्या कहा है? कि मैं इन सब के भीतर में ठाकुर का उदार भाव प्रचार कर रहा हूं। ठाकुर का उदार भाव क्या है कि प्रत्येक धर्म प्रत्येक साधन पद्धति प्रत्येक आपकी यह जो धर्म वो एक ही अल्टीमेटली सुप्रीम रियलिटी तक लेकर के जाती है। एक ही अल्टीमेट रियलिटी तक जाने के विभिन्न रास्ते मात्र है। तो यह जो ठाकुर का उदार भाव है वह वहां पे स्वामी जी प्रचार कर रहे हैं। और यह जो वो शक्ति जो कि इसको अपोज कर रही है जो कि यह नहीं होने देना चाहती तो वो शक्ति कौन सी है तो वो है अनुदारता अर्थात ये फेनेटिसिज्म ये फेनेटिसिज्म अर्थात कि एक तरह का धर्मनु ये धर्मजनून जो है एक ऐसा इन लोगों के भीतर में कुछ समय से प्रवेश कर चुका है कि ये ठाकुर का उदार भाव ईजीली अपना नहीं सकते हैं। तो यह जो अपोजिंग पावर है धर्म जनुनून की यह फनेटिसिज्म इसको काटने के लिए ठाकुर के उदार भाव का प्रचार आवश्यक है। तो स्वामी जी कहते हैं कि मैं इनके भीतर में ऑलरेडी यह कार्य कर रहा हूं। अभी यह ऑलरेडी मैं कार्य कर रहा हूं। इस शब्द इसका क्या अर्थ है? अह इंटरेस्टिंगली यदि पता होगा फ़ेमस है ठाकुर ने यह नॉर्थ ईस्ट की तरह ना नॉर्थवेस्ट की तरह ही अह नॉर्थवेस्ट की ओर ही इशारा करके कहा था कि मैं वहां पे फिर से आऊंगा। ये नॉर्थ वेस्ट अर्थात कि ये वही ये पाकिस्तान, अफगानिस्तान वगैरह-वगैरह जो भारत के ये जो वेस्टर्न बॉर्डर पे जो कंट्रीज है क्योंकि वेस्टर्न बॉर्डर में नॉर्थ साइड पे ही तो कंट्रीज है। साउथ में तो फिर यह वेस्टर्न बॉर्डर पूरा यह इंडियन ओशन है। अरेबियन सी से भरा हुआ है। तो फिर यह नॉर्थ वेस्ट कहेंगे। वहीं पे यह सब कंट्रीज है। तो ठाकुर ने उन्हीं की ओर इशारा करके कहा है कि मैं फिर से आऊंगा। तो ठाकुर ने भी कहा है और यहां पर स्वामी जी भी कहते हैं कि मैं इनके भीतर में उदार भाव का प्रचार कर रहा हूं। दिस इज सो सरप्राइजिंग क्योंकि हम जितना भी न्यूज़पेपर पढ़ते हैं और यह जो पूरा एरिया है वहां के बारे में जो कुछ भी पढ़ते हैं तो एक तो नेगेटिव ही पढ़ने में आता है और दूसरा कि वे लोग खुद जैसे कि फनेटिसिज्म को लेकर के बड़े ही संतुष्ट है। उनके खुद के भीतर में ऐसा कोई यह नहीं आता कि नहीं हमको भविष्य को इंप्रूव करना है। ये हमारा जो वर्तमान जिस तरह से चल रहा है इस तरह के हमारे शासक है करप्ट है हमको बार-बार युद्ध में टेररिज्म में डाल रहे हैं तो दैट इज ओके वि अस ऐसा ही हमको ऊपर ऊपर से लगता है किंतु भीतर में क्या सामाजिक अंडर करंट्स चल रहे हैं हु नोस अब स्वामी जी और ठाकुर दोनों का यह क्लेम है ठाकुर ने कहा कि मैं वहां पर फिर से जन्म ग्रहण करूंगा और यहां पर स्वामी जी स्वयं कहते हैं कि में इनके भीतर में से ऑलरेडी ये देखिए ये अखंडानंद जी का जीवनकाल जो है उनका महासमाधि हुआ था 1836 के 34 के आसपास में जब मेन टेंपल का क्सक्यूशन हुआ था अपना बेलूर मठ का तब वो नहीं थे विज्ञानानंद जी ने क्सक्यूरेशन किया है। दैट मींस जहां तक मैं रफली याद है 1934 के आसपास में अखंडानंद जी का महासमाधि हुआ है। तो यह उस समय से स्वामी जी जैसे कि उन लोगों के भीतर में काम कर रहे हैं। तो सरप्राइजिंग बात यह है कि नियरली 100 साल होने को आया है। तो स्वामी जी ने यदि वहां उस समय से ही काम करना शुरू किया होगा तो हमको रिजल्ट ऐसा कुछ दिखता नहीं है। तो इसका अर्थ यही हुआ कि यह जो अनुदारता है वहां की यह फनेटिसिज्म जो है धर्म जुनून जो है इतना गहराई तक चला गया है कि रूट एंड ब्रांच इसको खत्म करना होगा। पूरा गहराई से इसको तोड़ देना होगा। तब कहीं जाकर के वहां पर कुछ इंप्रूवमेंट होगा। सो दैट इज वन थिंग कि ठाकुर और स्वामी जी दोनों का कहना है कि उस एरिया में फिर से आएंगे। स्वामी जी तो उसी समय से काम कर रहे हैं और स्वामी ठाकुर ने कहा है 100 साल के बाद में 100 200 म डिपेंड्स कि आप लीला प्रसंग पढ़ते हैं कि और कुछ पढ़ते हैं। कभी-कभी बोलते हैं कि वो जो एक बाउल का स्वांग लेकर के आएंगे तो वो भी एक है और यह भी एक है। सो एनीवे

इतिहास का बदला: चीन बनेगा पश्चिम का दुश्मन

एक और एक इंटरेस्टिंग बात यह सब कुछ पढ़कर के कि ठाकुर और स्वामी जी ने यह नॉर्थ वेस्ट को ही क्यों पसंद किया? यह ईस्ट अर्थात कि आज का जो चाइना है उसको क्यों नहीं पसंद किया? क्योंकि यदि जियोपॉलिटिकलेंस और किसी देश का है एज ऑफ नाउ तो वह चाइना का है। उस समय भी माने स्वामी जी का खुद का यह अंतर्दृष्टि था। अमेरिका जब गए हैं तो अमेरिकन लोगों कुछ कुछ लोगों के भीतर में जो घमंड देखा कि हमारे पास में दुनिया की सर्वोच्च सत्ता है। हम लोग सर्वोच्च धनी देश है। हम लोग सर्वोच्च मिलिटरी पावर है। तो वो घमंड देखकर के स्वामी जी कहते हैं कि यह जो चाइना है वो आकर के अमेरिका को जितना भी घमंड है ना सब उतार देने वाला है। तो उस समय जो चाइना की परिस्थिति थी भारत से भी गई गुजरी थी। यह स्वामी जी यह जो बताए हैं अमेरिका जाने के कुछ ही समय के भीतर में यह बात हुई है स्वामी जी की तो यह 1893 के आसपास की घटना है 94 के आसपास की घटना है एट द मोस्ट उस समय भारत से भी गई गुजरी परिस्थिति में चाइना था ना स्वामी जी का किंतु यह अंतर्दृष्टि था ना कि स्वामी जी का यह सिविलाइजेशनल अंडर करंट समझने का यह शक्ति था कोई इमेजिन नहीं कर सकता कि यह जो संपूर्ण रूप से क्षतविक्षत 4000 टुकड़ों में बटा हुआ यह जो भूमिखंड है वो एक महासत्ता बनकर के इतना पावरफुल होगा कि विश्व की जो सर्वोच्च मिलिट्री पॉलिटिकल इकोनॉमिक पावर है उसको चैलेंज करेगा। किसी ने सपने में नहीं सोचा। 187 1970 तक किसी ने नहीं सोचा था। माओ ज़ेदोंग ने सत्ता प्राप्त करने के बाद में कम्युनिस्ट रिवोल्यूशन के बाद में जिस तरह से पागलपन किया है ये ग्रेट लिप फॉरवर्ड वगैरह-वगैरह तो जिसने कि चीन को भीतर से ऐसा तोड़ दिया था। इतने लाखों हजारों करोड़ों लोगों की हत्या हो गई थी कि जिसको कि आज हम समझ ही डिफिकल्ट टू ग्रेस डिफिकल्ट टू अंडरस्टैंड द स्केल ऑफ जो विनाश महाविनाश उस समय कम्युनिस्ट रिवॉल्यूशन के बाद में हुआ है। तो उस समय आज से मोर देन 1330 इयर्स से यह इंसाइट होना यह अंडरस्टैंडिंग होना कि आज का जो चीन है वो अमेरिका को अमेरिका के सामने चैलेंजर के रूप में वो खड़ा हो सकता है। दैट ओनली स्वामी जी कैन डू। सो यू सी कि यूजुअली हम ऐसा सोचेंगे कि जहां पर यह जो भीतर से शक्ति प्रकट हो रही है वहां पर ही अवतार का जन्म होना चाहिए। सो ऐसा नहीं करके इस अर्थ में कि चीन में नहीं जन्म ग्रहण करके यह दोनों ने यह ठीक किया है कि यह जो पूरा आज का जो कि फेनेटिक जो कि इकोनॉमिकली संपूर्ण रूप से क्षतविक्षत इस तरह का जो एरिया है वहां पर आना है और वहां पर आकर के उस एरिया का भारत के साथ में फिर से मिलन करवाना है और स्वामी जी ऑलरेडी फॉर मोर देन 100 इयर्स वो ऑलरेडी इस वहां पे जाकर के कार्य कर रहे हैं। सो अभी यह अखंडानंद जी का विज़न है। गॉड ओनली नोस कि कहां तक यह कार्य कर होगा। हम आशा रखेंगे कि स्वामी जी खुद जब ऐसा कहते हैं ठाकुर ने खुद जब ऐसा कहा है कि वह वहां पर आने वाले हैं। सो समथिंग लाइक दिस विल हैपन। किंतु जो आज का जो जियोपॉलिटिकल जो माहौल है उसको देखकर के लगता नहीं कि इसमें से कुछ भी हो सकता है। एटलीस्ट नॉट ड्यूरिंग आवर लाइफ टाइम। सो एनीवे लेट अस सी व्हाट हैप्स। सो इनफ फॉर टुडे नाउ मंडे को क्लास होगा। आज शाम को मेडिटेशन का क्लास। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: ऐसा कहते है न की -- दुर्बल को आत्मा प्राप्त नहीं होती? इसी लिए लगता है स्वामीजी इस्लामरूपी देह धारण करना चाहते थे.

नयमात्मा बलहीनेन हां हां आत्मन जो है बलहीन के द्वारा लभ्य नहीं है प्राप्त नहीं है प्राप्त्य नहीं हम हमारा प्रॉब्लम क्या है ना कि हम डेफिनेशन को इतनी विस्तृत करते ही जाते हैं, करते ही जाते हैं। करते ही जाते हैं। फिर जो उसका फंडामेंटल है भूल जाते हैं। तो स्ट्रांग बॉडी का अर्थ है स्ट्रांग चरित्र फिर एथिक्स एंड मोरालिटी फिर आहार विहार वगैरह-वगैरह सब कुछ ले जब आ गए तो फिजिकल स्ट्रेंथ ही भूल गए उसमें। मैं सही बताया। [हंसी] एंटायर वर्ल्ड इज कन्व माने हम लोगों का क्या है? सीधा वो आत्मन ब्रह्मन तक ही सब कुछ को ले जाना है। अभी ये सात्विक आहार के बारे में है। तो सात्विक आहार आप रामानुजाचार्य अब एक एक लिमिटेड व्याख्या करते हैं कि सात्विक आहार का अर्थ है कि आपको यह व्हिच इज एक्चुअली फूड फूड स्टफ तक लिमिटेड रखते हैं। और शंकराचार्य है सात्विक आहार के रूप में सात्विक विचार, सात्विक आचार, सात्विक व्यवहार सब ले आता है। फिर उसमें बेचारा सात्विक आहार गायब हो जाता है। [हंसी] फिर ठाकुर की तरह कचौड़ी खाओ ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करो। [हंसी] ये सभी तो रेसलर थे ना स्वामी जी रेसलर थे। राजा महाराज रेसलर थे। शशि महाराज सब तो वो वो पहलवानी सीख करके आए हैं। वो अखंड वो विज्ञानानंद जी के साथ में तो ठाकुर ने एक्चुअली रेसलिंग किया था। [हंसी] हां वो नहीं है पता आपको याद। वो हां वो ठाकुर ने देखा इतना स्ट्रांग बॉडी है चलो मेरे साथ में कुश्ती करो तो विज्ञानानंद जी तो हंसने लगे ये वो म वो है इतना दुबला पतला शरीर मेरे साथ में कुश्ती करेंगे तो फिर भी ठाकुर जब दाव पेच की तरह वो उस मुद्रा में खड़े हो गए पहलवान की तरह तो अभी विज्ञान महाराज सोचते हैं अभी कुछ तो करना पड़ेगा तो ऐसा वो जैसे वो पकड़ते हैं ना ऐसा करके वो रेसलर अपना देसी कुश्ती में तो ऐसा करके पकड़ा किंतु जैसे ही ठाकुर को पकड़ा वैसे वैसे ही वो होश बोए से बेहोश हो गए और ठाकुर उनको धक्का लेकर मार के दीवार के साथ में जाकर सटका दिया और फिर विज्ञान महाराज को जो अनुभूति हुई कहते हैं रेसलिंग तो बगल में रह गया मैं होश में हूं कि नहीं वही नहीं समझ में आ रहा [हंसी] स्टेरॉयड लेते हैं ब्रह्म ज्ञान रूपी स्टेरॉइड

प्रश्न: आजकल एक नया अग्रेसिव हिन्दुइस्म देखने को मिलता है, जो पहले नहीं था. भगवान राम या महावीर हनुमान भी पहले सौम्य दिखते थे अभी पोस्टर और चित्रों में वीर्यवान दिख रहे है.

ऐसा ऐसा नहीं कह के कि दिस इज अ न्यू फिनोमिना ऐसा कहिए कि दिस इज अ अनदर वे ऑफ़ प्रोजेक्टिंग प्रोजेक्टिंग व्हाट ऑलरेडी इज देयर। आप युद्ध करते हैं तो फियर्स होके ही तो युद्ध करना है ना। अब वो एक टीवी सीरियल में बेचारे एक सौम्य होकर के चेहरे पर मंदमंद हास्य है और ऐसा वो तीर मारते हैं। तीर धीरे-धीरे करके उड़ता है। सामने दूसरा तीर आता है। दोनों वार्तालाप करते हैं। एक चला जाता है। ए दिस इज़ अ टीवी सीरीज डिपिक्शन, राइट? जो कि अपने मन में बैठा हुआ है। बट जस्ट इमेजिन व्हाट अ रियल वॉर वुड हैव बीन लाइक। यू हैव टू फाइट विथ ऑल द फियर्सनेस ऑल द एनर्जी। सो दैट इंटरप्रिटेशन हैज़ चेंज। अदरवाइज जो अंडरलाइन जो स्टोरी है वो तो सेम ही है। अब अब जैसे योग वाशिष्ट है। रामायण के ऊपर में इतना बड़ा एक ये लिखना योग वाशिष्ट। फिर यह रामचरितमानस है। दोनों भक्ति और ज्ञान के ग्रंथ है। राइट? अब अब जैसे भगवान कृष्ण उनका भी यह वृंदावन लीला है। सो दीज़ आर फियर्स वॉरियर्स किंतु उनका जो चरित्र है वो हमने उनके चरित्र के जो अन्य एस्पेक्ट है दैट वी हैव प्रोजेक्टेड टू द फुलेस्ट भगवान राम का वो जो वशिष्ठ के साथ में संवाद या तो फिर यह जो मर्यादा पुरुषोत्तम राम जो जिस तरह से वाल्मीकि रामायण में आते हैं या तो फिर यह वृंदावन के कृष्णा अभी यही कृष्ण तो अर्जुन का रथ युद्ध युद्ध भूमि में चलाते थे। यही कृष्ण ने अपना विश्वूप दर्शन अर्जुन को दिया है। और भयानक कराल जो उनका जो स्वरूप जिसको देखकर के इतना वीर योद्धा अर्जुन डर गया। सो दैट एस्पेक्ट इज आल्सो देयर। किंतु माने प्रोजेक्शन का ये पिछले 1000 साल में यही हुआ ना। हमने सौम्य एस्पेक्ट को प्रोजेक्ट किया है। अदरवाइज फियर्स एस्पेक्ट इज़ ऑलवेज देयर। अब जैसे देवी का है कि देवी का सरस्वती स्वरूप भी है और बगला स्वरूप भी है। काली स्वरूप भी है। सो वि स्वरूप आर यू प्रोजेक्टिंग?

प्रश्न: स्वामीजी के बारे में भी वही है न? उनका क्षात्रवीर्य भूल कर ब्रह्मतेज ही याद कर रहे है.

स्वामी जी के बारे में आप देखेंगे ना कर्म योग, ज्ञान योग फिर ये थाउजेंड आइलैंड पार्क वाला इंस्पायर टॉक यह सब ज्यादा डिस्कस होता दिखेगा। किंतु ये जो लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा है जहां पे वो चाबुक चलाते हैं वो ज्यादा लोग उसको नहीं टच करना चाहते

प्रश्न: स्वामीजी ने चीन के बारे में जो कहा वो सच हो रहा है, तो भारत के उत्थान के बारे में जो कहा वह भी सच होगा आशा रखते है.

ना किस कॉन्टेक्स्ट में म प्रॉब्लम क्या है ना कि स्वामी जी का सब कुछ प्रिजर्व नहीं हुआ है ना अब जहां पे जो कॉन्टेक्स्ट है वहां पे उस तरह से बोलना है। भारत में आए हैं तो भारत के लिए बोलना है। अभी एक लार्जर जियोपॉलिटिकल कॉन्टेक्स्ट में बोल रहे हैं तो फिर ये ईरान तुरान वाली बात तो उन्होंने कही ही है। तो अमेरिका में जब वह मौका आ गया तो वह भी उन्होंने कह दिया यू हैव टू पोक ना वह ठाकुर कहते हैं ना वह शशधर पंडित बैठा है तो ठाकुर कहते हैं एक खोचा दाओ म पोक हिम तो थोड़ा सा आप उनको पोक करेंगे तो वो बाहर आएगा ना अमृतवाणी [हंसी] वो वो वो दोनों को भिड़वा देते थे गिरीश और नरेंद्र को मास्टर महाशय और नरेंद्र को नरेंद्र को सबके साथ में भिड़ा देते थे इसके साथ में करो डिबेट अभी देखो मजा मां ने कहा है ना कि छले हो ना कि बूढ़ो ठाकुर के कनो निरंदो देखी नहीं बापू छेले हो ना कि बूढ़ो शबाए संग आनंद कथा बोलछ ठाकुर को कभी मैंने निरानंद नहीं देखा बच्चा हो ना कि बूढ़ा सभी के साथ में ठाकुर आनंद से वार्तालाप कर रहा है

प्रश्न: स्वामीजी मांसाहार करने को कहते है -- यह बात हमें थोड़ी सी विचित्र लगती है

भथुड़े शरीर [हंसी] बट देखिए वो एक ऐसा युग था कि जबकि प्रोटीन का और कोई सोर्स नहीं था। माने डेयरी का जो गुजरात का ही ये जो अमूल डेरी का जो सक्सेस है दैट इज फार अवे इन द फ्यूचर ना। और क्या है कि बहुत सारे लोग लैक्टोज़ इनटोलरेंट होते हैं कि वो डेयरी प्रोडक्ट खा नहीं पाते। तो दैट इज कि फिर तो प्रोटीन का कोई सोर्स तो होना चाहिए ना। सोयाबीन इतना भारत में उस समय नहीं होता होगा। मुझे नहीं लगता होता होगा। सो डेयरी प्रोडक्ट है, सोयाबीन है। दीज़ आर द मेजर सोर्सेस ऑफ प्रोटीन जो कि आम जनता को अवेलेबल नहीं थे। जबकि यह मछली है, मीट है व्हिच आर ईजीली अवेलेबल। ये ओमेगा थ्री फैटी एसिड वगैरह आप देखेंगे देयर आर नो अदर सोर्सेस अदर देन दिस एनिमल फैट। सो वो देखकर के स्वामी जी ने देखा कि ये बिना मतलब का हम वेजिटेरियन भी है। शरीर भी हमारा ऐसा इजीली टूट जाता है। जबकि अमेरिका जाकर देखा जिस तरह से ये लोग परिश्रम कर पाते हैं। बार-बार कहते हैं ना इस तरह का शरीर होगा तो वेदांत आप फॉलो कर पाएंगे। अदरवाइज आत्मश्रद्धा देखिए फिजिकल वीकनेस से सब कुछ स्टार्ट होता है। आपकी आत्मश्रद्धा भी वहीं पर खत्म हो जाती है। और दूसरा कि ठाकुर को खुद को देखिए ना। मछली खाने वाले थे। दूसरी बात है कि बहुत सारे लोग गाय का दूध इसलिए नहीं पीते क्योंकि बछड़े से छीन करके हम लोग पी रहे हैं। गांधी जी ने इसलिए गाय का दूध पीना बंद कर दिया था। फिर बहुत बीमार हो गए थे। फिर आखिर में वह बकरी का दूध पीना चालू किया था ना ऐसा। तो इवन जयराम भाटी में गाय को बछड़े को बांध के रखा है। बछड़े को खुला छोड़ देंगे तो गाय का जाके दूध पी लेगा। नया बछड़े का जन्म हुआ है। तो रात को बछड़ा ऐसा जोर-जोर से चित्कार कर रहा है। मां सो नहीं पाई। खड़े होकर के दौड़ के गई। हां बेटा आ रही हूं आ रही हूं। ऐसा करके बछड़े को छोड़ा। बछड़ा दौड़ के जाके मां का दूध पान करने लगा। म अपनी अपनी मां का। सो बहुत सारे लोग इसलिए गाय का दूध नहीं पीना चाहते कि बछड़े से छीन करके लेते हैं। बट दैट इज वन थिंग। देखिए माने इन टुडेज़ ऐज़ देयर आर इनफ़ अह सोर्सेस ऑफ़ वेजिटेरियन सोर्सेस फॉर एवरीथिंग। ओमेगा थ्री फैटी एसिड जो कि आज फिश ऑयल है उसका कैप्सूल आपको मिलता है। प्रोटीन है उसके लिए आपको सोयाबीन है जो डेरी प्रोडक्ट है वो है। माने फॉर नो पर्पस यू आर डिपेंडेंट अपॉन मीट प्रोडक्ट्स। अह राइट? एवरीथिंग कैन बी हेड विथ इन दिस वेजिटेरियन सोर्सेस इटसेल्फ। सो आज के युग की बात अलग है। स्वामी जी के युग की बात अलग थी। इवन आज के युग में जो ओमेगा थ्री फैटी एसिड है या तो प्रोटीन है। एनिमल प्रोडक्ट में बहुत सस्ता मिलेगा। बहुत ही ईजीली मिलेगा। जबकि ये कैप्सूल कैप्सूल खरीदना या एक हाई एंड डेयरी प्रोडक्ट खरीदना सबके बस की बात नहीं है। अभी रिसेंटली एक आर्टिकल पढ़ा था कि डायबिटिक पेंडेमिक इन इंडिया माने इंडिया में ये जो हाई शुगर इतना प्रिवेलेंट है। सो वी सरप्राइजिंग हाई शुगर। हाई शुगर कब होता है कि जब कि हम यह कैलोरी हैवी फूड खाते हैं। सो जो आप वेजिटेरियन होंगे ना आपको हाई शुगर का प्रॉब्लम है। और यदि आप एनिमल प्रोडक्ट खाएंगे ना आपको हार्ट डिसीज का प्रॉब्लम है क्योंकि उसमें वो ज्यादा होता है। आपका वो क्या कहेंगे? फैट ज्यादा होता है। सो बोथ वे इट इज डेंजर। अह ओबेसिटी अमेरिका में भी इतना है जितना यहां पे है। बट आई मीन दीज़ आर द कंसीडरेशन। ओवर ईटिंग करने से सब प्रॉब्लम एक्सरसाइज इज़ नेसेसरी। राइस यहां पे एक डॉक्टर आते हैं। बोला वाइट जो भी है ना बंद कर देना है। वाइट राइस वाइट साल्ट और यह वाइट और क्या कहा? राइस साल्ट शुगर। हां। यह शुगर। वाइट शुगर। ये तीनों को बंद कर देना है। [हंसी] ओम