Transcript
अखंडानंद जी महाराज हम लोगों ने इसका पाठ करने की शुरुआत की थी महाराज जी प्रथम दर्शन के बड़े में बता रहा है तो एक्चुअली हम कंपेयर करें वैसे कंपेयर नहीं करना चाहिए किंतु फिर भी क्या है की जो लोग ये सब पढ़ाई लिखी करते हैं इन लोगों को इस तरह की बेड हैबिट हो जाति है की थोड़ा सा विश्लेषण करके चीजों को पढ़ें हालांकि इसमें पूरा भक्ति रस ही भारत है जब भी कोई भक्ति अंतर की इच्छा से अपने पूरे हृदय मां प्राण को ईश्वर को समर्पित करके ईश्वर के श्री चरणों में आता है तो उसमें फिर आगे पीछे सोने वाली बात नहीं रहती वो जो शरणागरी का जो दृश्य ही है वो शरणागरी का जो मुहूर्त ही है वो खुद इतना पवित्र इतना स्मृति मधुर होता है की उसका श्रवण करके उसका पान करके ही हमारे अंतरमन की जो बिपाशा जो होती एक भक्ति की हो जाति है किंतु फिर भी हम सबको कभी कभी ऐसा लगता है की यह क्षण गति का यह जो अति पवित्र मुहूर्त जो है उसके बड़े में थोड़ा सा चिंतन आत्मा विश्लेषणात्मक एक थोड़ा सा बात रखें तो अखंडानंद जी महाराज का प्रथम दर्शन और जी तरह से कथामृत में मास्टर महाशय जब प्रथम दर्शन के बड़े में लिखा है वो इन दोनों में देखिए की अखंडानंद जी ने या तो ठाकुर ने उनको कितना कुछ कहा होगा हमको पता है की ठाकुर की वाणी को विराम नहीं था महाराष्ट्र थैली देख ठाकुर नीचे बोले थे बोले चिली अर्थात की जब वो उद्यान जो भूनते हैं और जो धन को जो कृष करते हैं उसमें एक औरत वहां पर पास में बैठी होती है वो जो एक वो जो ये होता है क्रेशर जो की धन को लकड़ी का प्रेशर होता है जो की धन को वो भगत है तोड़ता है और फिर जैसे वो उसका वो जो ये हो जाता है उसका वो मैंने पाउडर जैसा हो जाता है तब वो औरत जो वहां पर बैठी है तो दूसरा धन अपने हाथों से वो धन जिसमें वो कृष होता है उसमें दाल देती है तो तो राष्ट्रीय ले अर्थात की मां उनकी वाणी को जैसे ही एक उपदेश समाप्त हुआ वैसे ही मां सरस्वती मां काली ठाकुर की जिकवा पे एक के बाद एक उपदेश ओजस्य उपमा उपिछ फिर ये चिंतन ये आशीर्वाद इसका प्रवाह जो है अविराम जो है आपूर्ति जीव पे वो लगाते ही रहती थी वो मां सरस्वती मां महाकाली नमः शारदा जिसको भी आप कहे तो ठाकुर सिर्फ इतना ही कहे होंगे की अच्छा तोर बार छोटे बेला मैन ठाकुर अखंडानंद जी ने कहा ठाकुर को की मैं जब बहुत छोटा था तब आपको देखा था तो ठाकुर हंसने लगे और वह उनको वह गोपाल दादा को बोलते हस्ते कर रहे हैं की अच्छा यह वैसे ही छोटा बच्चा है और फिर कहता है की मैं और भी छोटा था तब मेरा आपको देखा था तो ठाकुर ऐसा सिर्फ इतना तो नहीं कहे होंगे कितना सब कुछ कहे होंगे रात पुरी जो है अखंडानंद जी ने ठाकुर के पास बीते थी तो यह भी एक कंट्रास्ट देखिए की ठाकुर ने एक बार देखा की जो अपने खुद के हैं यह जो त्यागी लड़के जो की भविष्य में उनके नाम से सन्यास ग्रहण कर कर जो आत्मनानुक्षार्थम जगत हितायत के पवित्र मंत्र पे एक उनके नाम से पूरा विश्वविद्यालय का गठन करेंगे उसका एक फाउंडेशन डालेंगे उनको ठाकुर पहले से ही पहचान लेते थे और फिर उनको अपने पास में एक रात रहने को बोलते थे तो ये भी एक है की अखंडानंद जी को कहा की हां तुम मेरे पास में इस रात को र जो और मास्टर महाशय को हालांकि ऐसा नहीं कहा था पता है मास्टर महाशय को किंतु और ही कुछ कहा था यह शायद पहले दर्शन की बात नहीं थी दूसरे या तीसरी दर्शन की बात है एग्जैक्ट कौन से दर्शन की मैं भूल गया किंतु कथामृत में है की मास्टर महाशय अपने घर से परेशान हो करके ऑलमोस्ट आत्महत्या करने को जा रहे थे या सुसाइडल थॉट जो है उनके मां में प्रवेश कर चुका था उसे समय वो ठाकुर के पास लगाएं थे तब ठाकुर ने उनको पता है कौन सी कहानी कहीं थी की वह एक आदमी है जो की वहां दक्षिणेश्वर में ठाकुर के पास पड़ा राहत है मां के मंदिर में और उसके बीबी बच्चों को फिर ठाकुर कहते हैं कौन देखेगा क्या पड़ोसी पड़ोसी ए करके उसके बीबी बच्चों को देखेंगे ना की बीबी बच्चों को देखने की जो जवाबदारी है अच्छा दादी संसार नहीं करते तो नहीं करते फिर तो कोई बात ही नहीं किंतु यदि संसार कर लिया है तब उनको तो देखभाल करने का जवाबदारी जो है जम्मा जो है वो तो आपका है ही है तो फिर वो यहां पे वो सब छोड़ के दक्षिणेश्वर में पड़े रहना ठाकुर को पसंद नहीं था इसलिए मास्टर महाशय को इनडायरेक्ट कहते हैं की आपका रिस्पांसिबिलिटी आपके फैमिली की और है पहले तो कुछ लिया की आपने शादी कर दी है तो मौसम हास्य कहते हैं शादी हो गई है तो ठाकुर इस तरह से दुखी हो गए वो अरे उसने शादी भी कर लिया रामलाल दादा को बुला के कहते हैं फिर पूछा की बच्चे हो गए हैं तो यहां बच्चे भी हो गए हैं तो और भी बेचारे ज्यादा दुखी हो गए तो क्या है की अभी शादी हो गई है बच्चे हो गए हैं तो उनका तो सर्वप्रथम रिस्पांसिबिलिटी अपने फैमिली की और है किंतु अखंडानंद जी का ऐसा नहीं है 15 16 साल के बच्चे थे और पहले ही पैराग्राफ में एकदम वह फ्रेंकली का दिया है नटन होते हो अमर लब्ज हो तो ना दिगंबर होने पर पर भी मुझे कोई लज्जा नहीं हो रही थी अभी जैसे मैं तो छोटा था मैंने दिगंबर साधुओं को बहुत देखा था जैन दिगंबर साधुओं को उनके मां के ऊपर में उनका जो संयम किस हद तक होना चाहिए की जहां पर गर्भावस्था महिलाएं भी खड़ी है वहां पे भी वो अपना अपने मां को संयम में रख सकते हैं तो इतना भयानक प्रचंड संयम बड़े होने से जैसे-जैसे हमारी जो बुद्धि जो है परिपक्व होती है हमको बड़ा मेहनत करके इस तरह का संयम लाना पड़ता है किंतु जो छोटा बच्चा होता है उसको तो क्या है की यह संसार की माया क्या है इस सब का तो कोई ज्ञान ही नहीं होता तो अभी आजकल क्या है की बच्चे बहुत टीवी वगैरा देख कर के ये जो एंटरटेनमेंट के जो सब साधन है इतने सारे हो गए हैं की वो देखकर के छोटे बच्चे भी क्या है की थोड़े मैच्योर हो जाते हैं और इस तरह के जो है सांसारिक विचार उनके मां में भोग वासना के विचार उनके मां में ए जाते हैं किंतु उसे समय ऐसा था जैसे लीला प्रश्न में शरद महाराज ने मां के बड़े में लिखा है की पाली ग्राम यानी की बहुत ही एक सुंदर ग्रामिया परिवेश है वहां पर क्या है की ये जो धार्मिक नाटक जिसको बांग्ला में यात्रा कहते हैं तो धार्मिक नैटको का अभिनय होता है फिर ये जो पंडित वगैरा जो होते हैं तो उन लोगों का जो एक पार्ट कथा वगैरा जो है पुराने की वो तो चलते रहते हैं कोई भी उत्सव वगैरा हुआ तो जैसे वैष्णो धर्म का प्रभाव वहां पर रहने से ये जो भक्ति मलिक वगैरा से पार्ट होगा कोई पुराण का पाठ होगा ध्रुव चरित्र का पाठ होगा कथा अमृत में हम पढ़ने हैं की जो और जो है इस तरह से वह परल चरित्र का पाठ सुनते सुनते श्रवण करते-करते किस तरह से उनके आस-पाखों से असुरों की धारा बहाने लगी है वो भक्ति से वो डार्विगोलिथ होकर के तो क्या है की वहां के जो गांव है वहां पे इस तरह से परल चरित्र इस तरह से वो कोई भी पुराण की कहानी है उसका पार्ट होता था उसका अध्ययन होता था फिर इसके बड़े में यात्रा नाटक वगैरा होता था ठाकुर का हमने देखा है ठाकुर ने अपनी खुद की वो नाटक मंडली अप की थी और वह जो अमृतानंद जो है वो वहां पे वो जाकर के नाटक का अभिनय करते थे अपने से और इतना सुंदर अभी नहीं करते थे की लोगों जैसे शिवा का अभिनय किया तो लोगों इतने प्रभावित हो गए जैसे भगवान शिवा बाल शिवा स्वयं पृथ्वी पर आकर के लोगों को आशीर्वाद देने के लिए यह बच्चे का स्वरूप धरण करके आए हैं तो इतना सुंदर अभिनय करते थे तो क्या है की वो धर्म जो है वहां के वातावरण में था है तो बोल करके यह जो प्यूबर्टी जो है वह आने से डेरी होती थी मैंने 14 15 साल तो हो जाते थे प्यूबर्टी होते होते किंतु अभी आज का जो जमाना है वैसे तो खाने-पीने में ही इतना पॉल्यूशन है हवा पानी में जो विचार जो है जो मतलब ये जो हमारे सर के ऊपर में ये जो वेस्टर्न इतिहास जो इतने जोर से हमारे सर पे फेक जा रहे हैं इतना बड़ा आक्रमण जो वेस्टर्न कलर का हो रहा है तो आजकल के बच्चे भी बहुत छोटी उम्र में यह सब देखते हैं और प्यूबर्टी भी मैंने बहुत जल्दी ए जाति है और फिर ये सब इतिहास ये सब विचार वो भी उनके मां में बहुत पहले से ए जाता है तो यहां पे जब अखंडानंद जी कहते थे की 15 16 साल का था फिर भी दिगंबर होने में संकोच नहीं होता था अर्थात की उसे समय का और आज के समय का कंपेयर करके देखिए बात सिर्फ अखंडानंद जी की नहीं है हमने जितने भी यह लड़कों को देखा इतने सारे सबके बड़े में हमने देखा ये राजा सूरज हो एन की शशि महाराज हो एन की शर्ट महाराज हो एन की स्वामी जी हो सबके बड़े में हमने देखा की पहले से ही पवित्र विचार लेकर के और उनका आसपास का वातावरण भी ऐसा था की वो पवित्रता पे हनी नहीं करता था आघात नहीं करता था अभी आजकल तो कोई बच्चा बचपन से यदि ऐसा कुछ सोने का आरंभ करें या तो ऐसा कुछ सोच की हां मैं आध्यात्मिक धार्मिक जीवन जिऊंगा मैंने मेरा खुद का मैंने बताया था शायद एक बार की मैंने जब ठीक किया की मैं साधु होने को जा रहा हूं तो मेरे एक-दो मित्र थे वो मुझे आकर के बोलते हैं की अरे तुम पागल हो गए हो क्या ये सब चीज तो रिटायर होने के बाद की जाति है जब बूढ़े हो जाते हैं हाथ पर कम नहीं करते जब वो ठाकुर के पास ईश्वर के पास जान का समय ए जाता है तब कहानी जाके धर्म की बात होती है अभी से तुम क्या यह सब धर्म धर्म कर रहे हो तो आज के समाज में ऐसी बात हो गई है की धर्म कब किया जाता है जबकि ठाकुर के पास में ईश्वर के पास मैं भगवान के पास में जान का समय ए गया है तब भगवान का थोड़ा सा नाम ले लो तब कहानी जाकर के वो भगवान के पास जाएंगे हम बोल पाएंगे की अच्छा देखो पूरा जीवन हमने भोग में लिपट हो करके ये मैटेरियलिज्म के पीछे दौड़ करके नहीं बिताया थोड़ा सा तुम्हारा नाम भी कर दिया है इसलिए वो बैलेंस सीट में देखिए बैलेंस से सबको देखकर के नया जन्मदिन देना ऐसा वो एक कैलकुलेशन बुद्धि करके वो हो सकता है की आखिर ये उम्र में भगवान का नाम है किंतु सही सही ईश्वर का नाम कब लिया जाता है ठाकुर कहते हैं पुष्प जो है वो जब हम उसको तुलते हैं पुष्पक को जब हम पेड़ से पौधे से जब ग्रहण करते हैं तब वो जो एकदम फ्रेश पुष्प होता है सुगंधित पुष्प होता है ताज पुष्प होता है वही भगवान के श्री चरणों में अर्पण होता है छोटी सी उम्र में ही ये धर्म है अध्यात्म है ईश्वर के प्रति शरण गति है भक्ति है फ्री आसन प्राणायाम है ध्यान की पद्धतियां है यह सब बच्चों को बाल मंदिर से ही सीखना चाहिए तब तो कहानी जाकर के वे लोग ग्रेजुएट होंगे गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करेंगे तब एक अध्यात्म का एक एथिक्स और मोरालिटी का एक ऐसा फाउंडेशन तैयार होगा की वे लोग एक आदर्श ग्रुप एक आदर्श पति एक आदर्श पुत्र एक आदर्श नागरिक एक आदर्श शिक्षा या तो सही नहीं या तो फिर राजनेता जो भी कार्य करें एक आदर्श रूप में करें तो तभी तो कहानी जाकर के सोसाइटी का स्ट्रांग फाउंडेशन होगा भारत जगत गुरु होगा वरना सिर्फ मुझे तो बोलने से हम लोग जगतगुरु ने ही होने वाला है और फिर हमको तो सिर्फ स्वामी जी ने कहा है ना की भारत का तो करिया ही यही है युग युग से भारत से आध्यात्मिकता का प्रवाह जो है पूरे विश्व में प्रसारित हुआ है भारत ने सिर्फ आध्यात्मिकता का यहां पे संचय ही नहीं किया आध्यात्मिकता का पोषण मंत्र नहीं किया आध्यात्मिकता के प्रवाह को पूरे विश्व में बहाई है जिससे की यह धर्म पिपासु जिज्ञासु जहां कहानी भी हो यह भारत की वेदांत की धारा का पान करके वेदांत की अमृत धारा का पान करके अपने ज्ञानपीपासों को मित सके वो तृप्ति हो सके तो इसीलिए यह ठाकुर भी देखिए की जिन लोगों को समझ लिया है मेरे खुद के बच्चे हैं यहां पे रहने वाले हैं तो खानदान जी को बोल दिया तुम रात को रहना जबकि मास्टर महाशय को कहा की देखो वो आया था एक दूसरे को भक्ति का उदाहरण देकर के और यहां पे पड़ा राहत है और अपने बीबी बच्चों को अपने पिताजी के पास में भेज दिया है बीबी के अपने पिताजी के पास में तो अभी उसकी संभल कौन करेगा तो ऐसा करके ठाकुर जो है मास्टर महाशय को इनडायरेक्ट का देते हैं की आपको यहां पर आकर के रहने की जरूर नहीं है संसार का भी धर्म निभाइए फिर बीच-बीच में मेरे पास में आई है ठाकुर ने एक बार कहे ठाकुर कहते हैं ना की मैन बने और कौन है साधना कहां करनी चाहिए तो मां में वन में और अपने घर की एक खुशी कोनी में एक कॉर्नर में जैसे की जहां पे हम थोड़ा सा अकेलापन है थोड़ा सा एक आइसोलेशन में र सके और जहां पर हम अपने पूरे मां को एकाग्र करके 1612 आना मैन 100% मां जो है ईश्वर पर लगा सके तो ऐसा बीच-बीच में कहानी पर जाना चाहिए तो यह बीच-बीच में वन में जाना चाहिए अर्थात के रिट्वीट में जाना चाहिए जो ठाकुर जो हमको कहते हैं उन्होंने मास्टर महाशय को भी कहा था पहले दिन तो इनडायरेक्ट बोल दिया की वह जो आदमी है वो यहां पे राहत है उसका बीबी बच्चों को नहीं देखा इसलिए तो जाकर के बच्चों का पहले फिक्र करो बाद में यहां पे बीच-बीच में आते रहना पहले ही दिन बोल दिया किंतु बाद में मास्टर महाशय को कहा था की बीच-बीच में यहां पर आकर के थोड़ा सा समय रहो और साधना करो तो कथम रूप में वर्णन है की मास्टर महाशय दक्षिणेश्वर आते हैं कुछ समय तक रहते हैं और ठाकुर का प्रतिदिन पूरा दिन जो ठाकुर का कथा है और वहां नौबत में जाकर के फिर वो रहते हैं पंचवटी में रहते हैं और वह ईश्वर की साधना करते हैं तो उन लोगों के लिए है की बीच-बीच में आकर के हो सकता है हो सकता है दक्षिणेश्वर में थोड़ा समय रहो किंतु यह अखंडानंद जी को पहले ही दिन रात को अपने पास रख दिया तो ये जो हम देखते हैं की कंट्रास्ट और कंपैरिजन इससे हमको पता चला है की ठाकुर जो है जो साइकोलॉजी कितना सुंदर समझते थे सड़क को समझते थे कौन अपने अपने संघ का जो आध्यात्मिक भित्ति डालने वाला है वह समझते थे और उनको उसे तरह से ट्रिक कर देते हैं तो हम थोड़ा आगे पढ़ने हैं अभी जो क्षेत्र है चैप्टर है चैप्टर का हेडिंग है जाता-जा| इसके बाद ठाकुर ने कहा था की तुम शनिवार को आना तो उसे दिन फिर अखंडानंद जी कहते हैं गंगाधर महाराज की मैं फिर से एक बार शनिवार को ठाकुर के पास गया और ठाकुर ने मुझे घर फर्न नहीं दिया अपने ही पास में उसे दिन रख लिया शानदार पूरा आरती हुए गले तीन एक के बड़े उलहानगो हो पश्चिम दिखे और बरन दाएं आम के एक खाना माधुरी पांच देखिए जो मास्टर महाशय के साथ में किंतु वह दिगंबर होता है पहले तो ट्रांसलेशन संध्या के बाद आरती होने के बाद ठाकुर पूरे दिगंबर हो गए और एक मधुर अर्थात की एक चटाई लेकर के गंगाधर महाराज को कहा की एक वरांडा में की जाकर के चटाई को लगाओ जमीन पे लगाओ मैं आपका हम लोग जाकर के बैठने हैं तो अभी मास्टर महाशय के सामने किंतु इस तरह से ठाकुर कभी दिगंबर ने किया भाव वास्ता में कीर्तन करते-करते यदि वस्त्र निकाल जाता है तो बात अलग है किंतु बच्चों के सामने उनका जो पूरा आचरण है जो बिहेवियर है पूरा डिफरेंट है 100% त्याग के ऊपर में इनका जीवन गठित होना है मास्टर महाशय जैसे रामचंद्र डेट है या तो फिर ना की बलराम बसु है इन सब के सामने क्या की उनको विभिन्न विभिन्न साधनाएं करवानी पड़ती है किंतु इन लोगों के लिए जो है त्याग ही एक मंत्र सनातन साधना है इसके बाद में जो भी करना हो करो जैसे की शरद महाराज ने पूर्णाभिषेक लेकर के तंत्र साधना की थी तो वो सब जितना बाद में करना हो करो क्योंकि शक्ति वो शरद महाराज को क्या है की मां की सेवा करनी थी वो शक्ति की आराधना करनी थी बोल करके ये सब थोड़ा सा उनके मां में था तो उन्होंने किया था किंतु अल्टीमेटली फंडामेंटल ही उनकी सर्वश्रेष्ठ साधना है सर्वप्रथम साधना है त्याग तो इसीलिए दिगंबर हो करके चटाई पे बैठ है कहा की चटाई लगाओ हम बैठने हैं उसके बाद में तकिया ले एक उसके ऊपर में थोड़ा सा विश्राम किया उसके ऊपर में सर रखकर के थोड़ा सा विश्राम करने को लेते उससे पहले ही बोल दिया था की तुम जो हो अपना वस्त्र निकाल लो ठाकुर ने कहा मां के पास में जैसे बच्चा इसके बाद में मुझे सुखासन में बैठा करके ध्यान करवाया मेरे पास बोलने ए के बड़े झुकी पूछते नहीं आभार तन पायो बेस्ट ने ठाकुर ने कहा आगे झुक करके भी मत बेटा और एकदम सीधा हो करके ही मत बैठना सुखासन जो महाराज ने शब्द प्रयोग किया है बिल्कुल ठीक है थोड़ा सा सीधा बहुत अकड़ हो करके नहीं थोड़ा सा सीधा और पूरा शरीर जैसे रिलैक्स हो इस तरह से बैठना है जैसे की ठाकुर की यह जो छवि है जिसकी की हम पूजा करते हैं मंदिर में उसमें ठाकुर कैसे वो सुखासन में बैठे हैं और खानदान जी का खुद का ऐसे सुखासन में बैठा हुआ छवि है तो इसको देख कर के पता चला है की किस आसन में हमको यह ध्यान करना चाहिए बड़ा भाग पहले तू हिम्न को कितनी बड़ी बात कर दी खाने के लिए जब भारत दिया है थाली में तो कैसे ही खाओ तुम्हारा पेट भरेगा ही अर्थात ध्यान करने को जब बैठने हो तो ध्यान जो है उसका जो भक्ति रस जो है उसका जो ज्ञान अरेस्ट जो है उसका जो ओजस जो है उसकी जो कुंडली ने शक्ति का जागरण जो है वही अल्टीमेटली हमारे लिए प्रताप है वो कुंडली नहीं शक्ति का जागरण करने के लिए ना की ओजस शक्ति एन की यह प्राण शक्ति का वो जो अपने हृदय में जागरण करने के लिए फिर हम बहुत सीधे हो करके तेतर होकर के सीधे होकर के बेटे ना की चुप करके बैठे ना की सुखासन में बैठे वो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता हालांकि वो सुखासन में बैठना चाहिए चुप करके या तो बहुत ज्यादा अकड़ करके नहीं बैठना चाहिए इस दिन को ठाकुर ने उनको दीक्षा दी थी उनकी जुबान पर अपनी उंगली से मंत्र लिख करके तार पर सुए पढ़ लेने एवं अमर काले पारेख पार्टी पर डाइट बोलने इसके बाद में ठाकुर ने लेट करके विश्राम किया और अखंडानंद जी के पैरों के ऊपर में अपना पर रख दिया अखंडानंद जी की गॉड में अपने पर रखें और कहां की पैरों की सेवा करो मैन देखिए की ये गुरु शिष्य जो मैंने शिष्य यदि सही-सही विद्या अर्जन करना चाहता है तो उसको गुरु की जो है सेवा करनी पड़ेगी इसीलिए रामकृष्ण सॉन्ग में आप देखेंगे की हमारे प्रेसिडेंट महाराज वाइस प्रेसिडेंट महाराज हमारे जो सीनरी साधु है इन सब की सेवा करने का एक बहुत बड़ा महत्व है क्योंकि हम जब किसी सीनरी साधु की सेवा करते हैं तब हम जैसे सीधे ठाकुर की सेवा करते हैं क्यों क्योंकि जी सन्यासी ने अपना जीवन ठाकुर के नाम से अपना वह जो संसार त्याग किया है अपना जीवन सर्वस्व जिसको अर्पण किया जी ठाकुर को उसे ठाकुर का इनके हृदय में होता है और इनकी सेवा करने से ठाकुर की सेवा करना ही एक वैसा ही हुआ और वैसे भी अपने माताजी पिताजी की सेवा करते हैं गुरु जनों की जो सेवा करते हैं ये जो वृद्ध जनों की गुरु जनों की ये जो अपने बड़ों की सेवा करना ये हमारी भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंगता पहले से ही है तो इसमें सर्वश्रेष्ठ सेवा किंतु जिसे गुरु सेवक की जाए कहीं जाति है तो इस तरह से ठाकुर ने अपने पैरों को अखंडानंद जी की गॉड में रख दिया कहा की पर डीबीए थोड़ा सा अभी ऐसा नहीं है की ठाकुर को चाहते थे की कोई उनके पर दबे वो बात नहीं है ठाकुर चाहते थे की उनको गंगाधर महाराज को सेवा करने का मौका दें मैन यदि कोई हमको यह कहता है की कोई सीनरी साधु या हमारे गुरु जानकी तुम मेरी यह सेवा करो मेरे लिए कार्य करो तो बात यह नहीं है की उसको क्या फायदा हो रहा है बात ये है की हमको क्या फायदा हो रहा है हमको यह अपॉर्चुनिटी मिल रही है सेवा करने की इस तरह से हमको ये बात को ग्रहण करना है इस बात को लेना है स्टार पर सुए पढ़ लेने एवं अमर काले पारेख पार्टी पर देते हैं तब मैं थोड़ा-थोड़ा कुश्ती करता था शरीर था एकदम स्ट्रांग बाल ब्रह्मचारी थे अच्छा पोस्टिक आहार करते थे कुश्ती सीखने थे तो अनुमान कर सकते हैं की शरीर कितना स्ट्रांग होगा जैसे वो अखंडानंद जी ने जोर से पर दबाने की शुरुआत की जो ठाकुर एकदम चिल्ला उठे अरे क्या कर रहे हो क्या कर रहे हो पर चंडी फैट जाएगी ऐसा करके मत करो ऐसा करके ठाकुर ने फिर उनके हाथ में पकड़ के धीरे-धीरे बता दिया इस तरह से धीरे-धीरे करके पद डीबीए अपुन का शरीर तो एकदम कोमल था और यह लोग तो सब कुश्ती करते थे तो अभी पता है ना वो विज्ञान आनंद जी की बटन विज्ञान नंदन जी कुश्ती करते थे वह सब ज्यादा वैसे ज्यादातर लोग जो आते थे सब कुश्ती वाले ही थे राजा महाराजा स्वामी जी का तो पता ही है हमको स्वामी जी की तो बात ही नहीं है तो विज्ञान आनंद जी महाराज ऐसा कुछ सीखने थे तो ठाकुर के पास गए थे तो ठाकुर ने कहा की क्या करते हो तुम तो बोले मेरे कुश्ती करता हूं तो ठाकुर ने अच्छा बताओ उन्होंने अपना अक्षर निकाल दिया अपना वो जो ऊपर वस्त्र वो निकाला तो ठाकुर ने वो देखा की अरे वह इतने मतलब मजबूत है तुम्हारा शरीर चलो हम लोग कुश्ती करते हैं बोलकर विज्ञानानंद जी के साथ में इस तरह से जैसे वो कुश्तीबा जैसे वो हाथ दोनों पकड़ कर के जैसा वो कुश्ती करते ऐसा करके तो अभी विज्ञान आनंद जी इतने बड़े लंबे स्ट्रांग ठाकुर का शरीर तो साधना करके इतना कोमल हो जाता था की मैंने एकदम बच्चे जैसा उनका शरीर हो गया था तो वही ठाकुर किंतु विज्ञान आनंद जी को धक्का देकर के वो दीवार जो है दीवाल से सत्ता दिए थे और उसे समय विख्यानानंद जी पर इस तरह से ऐश्वर्या भाव का आवेश हुआ था जैसे की वो जैसे वो स्वामी जी के बड़े में है ना स्वामी जी की प्रथम मुलाकात के दौरान क्या हुआ था तो जैसे ही ठाकुर ने उनको छुआ उनका मां किस राज्य में चला गया किस वो मैन स्टार पे चला गया वो सुपर कॉन्शियस लेवल पे की वो बेचारे चिल्ला उठे पहले तो पता ही नहीं था की ये सब होता है तो चिल्ला उठे बोले की अरे आप क्या कर रहे हैं हमार मच है मेरे पिताजी है मेरी मां है मेरे मुझे तो उनके पास जाना है आप मेरे साथ में ये क्या है मुझे यह किस तरह के वशीकरण में आप दाल रहा है और ऐसा खाने के बाद स्वामी जी कहते हैं किंतु की मैंने मैं सोचता था की मेरा जो मां है इतना स्ट्रांग है मेरा जो बिल पावर है इतना शार्प है की कोई भी आदमी मुझे हिप्नोटाइज नहीं कर सकता हिप्नोटाइज अब किसको कर सकते हैं की जिनका जो जिसका कॉन्फिडेंस लॉक होता है जिसका बिल पावर बहुत ही वीक होता है जिसका की वो सेल्फ कंट्रोल बिल्कुल नहीं होता है जैसे वो पूरा तममास में राहत है उसे लोगों को आप वशीकरण कर सकते उसे लोगों को ऐसे लोगों को आप हिप्नोटाइज कर सकते हैं तो स्वामी जी तो कहते हैं मेरा बिल पावर इतना स्ट्रांग मेरी मेथाशक्ति इतनी मतलब शार्प है तो ठाकुर कैसे मुझे वशीकरण में ला सकते हैं ऐसा तो हो ही नहीं सकता तो बोल कर के स्वामी जी कहते हैं मैं इनका अच्छे से अभ्यास करूंगा देखा हूं की किस तरह की देवी अलौकिक शक्ति इनके पास में है तो ये तो अलौकिक शक्ति तो ऐश्वर्या शक्ति है मां की शक्ति है मां काली की शक्ति है अपुन तो इस तरह से किसी को हिप्नोटाइज नहीं करते तो इस तरह से देखिए की बच्चों के साथ में ठाकुर का यह जो इंटरेक्शन है कितना सुमधुर है ठाकुर बेचारे चिल्ला उठे बोले अरे क्या कर रहे हो क्या कर रहे हो फिर मेरे मेरी चंडी चिल जाएगी इस तरह से मत करो धीरे-धीरे करो तो खून अच्छी शरीर की नरम अखंडानंद जी कहते हैं तब देखा की ठाकुर का शरीर कितना नरम है ऊपर माखन देव रॉयस है जी तरह से जैसे की हड्डियों के ऊपर में माखन जो है मक्खन जो है वो लगा दिया हो इतना मतलब वो कोमल ठाकुर की त्वचा है ठाकुर का शरीर है पर कितना सुंदर वर्णन है कितना पोएटिक वर्णन है की हड्डियों के ऊपर में मक्खन लगाया हो इतना कोमल ठाकुर का शरीर है आमीन बेचारे वो थोड़े से लज्जित हो गए और थोड़ा डर के डर के बोले की मैं किस तरह से आपके पैरों को डीबीए तीन ही बोलने तब ठाकुर ने कहा की ऐसा करके उन्होंने खुद ने अपने हाथों से उनको बता दिया होगा की धीरे-धीरे करके हाथ अपना पैरों पर वो लगाओ अब ठाकुर कहते हैं निरंजन ओआई रकम करें निरंजन महाराज आए थे निरंजन महाराज को कहा की वो थोड़ा सा पर ढाबा दो तो निरंजन महाराज भी कुश्ती पर स्थित पूरे वो लाठी लेकर के उनका फोटो भी है लाठी लेकर के पगड़ी लेकर के पगड़ी पहन के खड़े हैं वो पता है ना ठाकुर के ठाकुर जब उनको काशीपुर में हो चिकित्सा के लिए सर्वर के लिए ले थे तो निरंजन महाराज को पगड़ी पहन के लाठी लेकर के वहां पे वो ऐसे गेट में चौकीदार वहां पे खड़े रहते थे की किसी को ठाकुर के पास नहीं जान देंगे ठाकुर के पास कोई जाएगा सुबह ठाकुर का तो क्या है ना की जो भी जाएगा उसको तो उपदेश देना की शुरुआत कर देंगे किंतु वो बेचारे तो इतने बीमा है बोलते बोलते अभी गले में से तो पूरा खाता थे तो गले में सिर्फ गाव हुआ है कैंसर का उसमें से जो अन्ना जो है गले में से निकाल जाता था पेट में तो जाता नहीं था इसलिए अवस्था में ठाकुर उपदेश देने की शुरुआत कर देंगे इशारों से बोलेंगे ऐसा करेंगे ठाकुर तो निरंजन महाराज लाठी लेकर के खड़े हैं तो वो जो तो विनोदिनी वह अभी-अभी थी उसकी इच्छा हुई की जगह ठाकुर का दर्शन करें किंतु उसको पता था की वो भक्ति लोग जो है लड़के ठाकुर के पास नहीं जान देंगे तो उसने जाकर के दाना काली को कहा वो दाना काली ठाकुर का वो भैरव जैसा वीर भक्ति जैसे एक दूसरा गिरीश तो दाना काली ने क्या किया की वो वो अभिनेत्री को वो जैसे वो एक ब्रिटिश ऑफिसर राहत है इस तरह से वो कोर्ट पेंट और वह जो है हिट ऐसा पहने दिया और फिर वो थोड़ा व्हाइट रहती है ना वो अभिनेत्री तो किसी को ऐसा कपड़े पहने हैं ब्रिटिश लोगों के तो ऐसे ही लगेगा कोई ब्रिटिश आर ही है तो उसको लेकर के गए बोला की ये साहब आए हैं ब्रिटिश साहिब तो ठाकुर का दर्शन करवा लेते हैं तो निरंजन महाराज ने सोचा अरे वो तो साहब तो थोड़ी ना वो ब्रिटिश लोग थोड़ी ना ठाकुर से कोई उपदेश मांगने वाले हैं आउट ऑफ क्यूरोसिटी आए होंगे तो ठाकुर को मिल्क चले जाएंगे तो बोल करके उनको जान दिया तो वहां पर जाकर के अभिनेत्री ने वो अपनी हाइट निकाल दी उसके बाल जो है वो देख कर के उठाकर समझ गए क्या रे ये तो विनोदिनी है तो फिर ना टीवी नो दिन तो उसे ठाकुर हंसने लगे जो एकदम हंसी मजाक करने लगे की देखा किस तरह से लड़कों को मूर्ख बना दिया जब बात नीचे खबर पड़ी तब ये लड़के लोग भी बेचारे थोड़े नाराज हो गए किंतु अभी क्या करें वो तो ऊपर चली गई है ठाकुर के पास में तो फिर ये लोग किंतु अभी और ज्यादा उनको भी अलर्ट रहना है की कोई इस तरह से हमको मूर्ख बना करके ठाकुर के पास ना चला जाए तो ये निरंजन महाराज पहले से ही कुश्ती है तो इस तरह से अपुर ने उनको बोला था तू मेरे पर डीबीए तो उन्होंने जोर से ढाबा दिया होगा तो ठाकुर वैसे ही चिल्ला लिए होंगे अरे ये क्या कर रहे हो जो ठाकुर यहां पे कहते हैं निरंजन ओआई रकम करें शीलो अच्छा तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं