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Swami Vivekananda's Macrocosm & Microcosm ·

ज्ञान योग स्वामी विवेकानन्द Cosmos Microcosm 7 Feb 2024

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ओम स्प सर्व अवतार कृषणा आज सुबह को मैं कथामृत पढ़ रहा था तो जैसे होता है ना कि जब नई बार से पढ़ते हैं तो भले चाहे आगे कितनी ही बार पढ़ लिया हो कोई कोई चीज हमको एकदम नए तरह से स्ट्राइक करती है तो आज एक इंसिडेंट देखा काशीपुर में मास्टर महाशय के घर की दो लड़कियां आई है मास्टर महाशय लेकर आए हैं आठन साल की होगी तो उनको भजन वगैरह सिखाया है तो ठाकुर के सामने बिठा कर के कहा कि गाओ तो गाया और ठाकुर ने बड़ा ही उनको अच्छे से उनके साथ में बात भी की अभी बाकी जो भक्त थे वह नीचे में बैठे थे काशीपुर में आप गए हो होंगे तो आपको पता होगा कि ठाकुर का बेडरूम जहां पर ठाकुर रहते थे वह फर्स्ट फ्लोर प था और ग्राउंड फ्लोर प सीढ़ी के नीचे में मां का कमरा था और फिर एक होल रूम जैसा एक होल जैसा था जहां पर बाकी सब भक्त एक साथ में रहते थे तो बाकी भक्तों ने सुना कि मास्टर महाशय की ये दो लड़कियां ऊपर में गा रही है तो जब लड़कियां नीचे आई मास्टर महाशय उनको नीचे लेकर आए तो बाकी सब भक्तों ने कहा कि अरे यहां पर भी गाओ बहुत सुंदर है तुम्हारा तो आवाज बहुत सुंदर सिखा है तो उन्होंने गाया अच्छी बात है यह तो सब भक्त ही थे ठाकुर के ही सब डिवटी थे फिर कुछ समय के बाद में मास्टर महाशय ठाकुर के पास में गए तो ठाकुर ने क्या कहा पता है कि जिसके तिस के सामने उनको गाने को बोल कर के उनकी लज्जा तोड़ मत देना तो अभी यह देखिए कि मैंने पढ़ा भी था मैंने इस इंसिडेंट को और सडन मुझे फिर से स्ट्राइक किया क्योंकि मां के खुद के जीवन में देखिए कि किस तरह से मां ने निवेदिता को पनाह दी और निवेदिता स्कूल में भक्त लोग अपनी बच्चियों को भेजे वो ट्रेनिंग ले एक मॉडर्न खास करके भरती प्राणा माता जी अभी कुछ दिनों पहले शारदा मठ का जो हिस्ट्री है उसके बारे में मैं एक दो लोगों से बात कर रहा था तो भारती प्राणा माता जी अथवा तो सरला दीदी इनका एक बड़ा ही इंटरेस्टिंग कैरेक्टर है हमारे बड़े महाराज वृंदावन गए थे तो उन्होंने मुझे वहां से मैसेज किया कि मुझे वो पार्ट भेजो और उनको स्पीच देनी होगी तो वो मुझे रेफरेंस भेजो जहां पर मां ने उनको कहा है सरला दीदी को कि तुम नरसिंह की ट्रेनिंग लो तो यह सरला दीदी का जब कैरेक्टर हम देखेंगे कि वह अपने घर में थी और सुधीरा दीदी को व मिला करती थी सुधीरा दीदी से उनका अच्छा पहचान था सुधीरा दीदी निवेदिता स्कूल में काम करती थी वो वहां पर टीचर थी अभी सरला दीदी को ऐसा लगा सडन कि मैं अभी संसार नहीं करना चाहती और एक आदर्श के रास्ते पर जीना चाहती हूं किंतु लड़कों के लिए जिस तरह से मठ की व्यवस्था थी बाय द टाइम बेलूर मठ की स्थापना तो हो चुकी थी यह 1915 10 15 के आसपास की बातें सब होंगी तो स्त्रियों के लिए तो ऐसे कोई मठ की व्यवस्था नहीं थी तो सरला दीदी सुधीरा दीदी के साथ में मिलकर के सब डिस्कस करती थी उसी समय सडन सरला दीदी के घर में एक ऐसी बात आई कि चलो इसकी शादी कर दी जाए या तो फिर इस तरह का कुछ प्रस्ताव आया होगा तो सरला दीदी इतनी डर गई वो जाकर के सुधीरा दीदी को कहा कि देखो ये लोग मेरी शादी के बारे में बात कर रहे हैं ऐसा सब बात करें तो मैं क्या करूं कहां जाऊं तो सुधीरा दीदी ने कहा एक काम करो तुम मेरे घर में आए और कहां एक स्त्री को तो कहां भेजेंगे आजकल का तो बिल्कुल जमाना ही अलग है यह तो 1900 की 19वीं सदी 20वीं सदी के प्रारंभ की बात है कहां पर भेजेंगे तो उन्होंने कहा तुम मेरे घर में आके छुप जाना किंतु एक बात है कि तुम मेरे घर में हो और किसी को पता नहीं चलना चाहिए वरना तो तुम्हारे माताजी पिताजी को पता चला कि मैं तुमको भगा करके ले आई हूं और मेरे घर में पनाह दी है तो यह लोग सीधा पुलिस में कंप्लेन करेंगे मुझे ये लोग पुलिस वाले पकड़ के ले जाएंगे मुझे जेल में जाना पड़ेगा तो सुधीरा दीदी सरला दीदी को बार-बार कहती थी कि देखो तुम मुझे जेल में मत भेजना ऐसा कुछ मत करना कि किसी को तुम री प्रेजेंस मेरे घर में पता चल जाए तो सरला दीदी सुधीरा दीदी के घर में बड़ा ही छुप-छुप करके रहती थी और सडन एक दिन क्या हुआ कि अभी आप किसी के घर में रहते हैं तो काम में तो हाथ बटाना चाहिए तो वह किचन में कुछ खाना पका रही थी या किचन में कुछ हेल्प कर रही थी सरला दीदी उसी समय उनकी एक रिलेटिव अभी उस समय की प्रथा तो पता है कि आप बाहर के घर में जाएंगे जहां पर पुरुष लोग आते जाते रहते हैं और अंदर में सिर्फ स्त्रियां जाती है या तो फिर जो घर के मालिक होते हैं वो पुरुष जाते हैं तो इस हिसाब से सरला दीदी सेफ थी कि कोई पुरुष उनका रिलेटिव उनको नहीं देख पाएगा क्योंकि वह बाहर वाले कमरे में नहीं जाएगी किचन में ही रहेगी भीतर वाले कमरे में रहेगी तो जिससे कि कोई किसी को पता ना चले किंतु एक दिन अनफॉर्चूनेटली ऐसा हुआ कि सरला दीदी की एक लेडी रिलेटिव एक स्त्री उनकी संबंधी उन्होंने किसी कारण सर सुधीरा दीदी के घर के भीतर में किचन में आई किसी काम से और जाकर के देखा कि यह सरला जिसको तो उनके माताजी पिताजी पूरे चारों ओर खोजते खोजते घूम रहे हैं उसके लिए रो रहे हैं उसके लिए कहीं पुलिस में भी कंप्लेन की होगी और ये यहां पर क्या कर रही है तो वो औरत तो कुछ बोली नहीं उस समय किंतु चुपचाप वो वहां से इमीडिएट चली गई वो उसके पिताजी को पता देने के लिए उसकी माताजी को सरला दीदी की यहां पे सरला दीदी बड़ी ही टेंशन में आ गई तो उन्होंने इमीडिएट सुधीरा दीदी को तो क्या है स्कूल में जाना पड़ता था वह तो टीचर थी तो इमीडिएट सुधीरा दीदी को उन्होंने खबर पहुंचाया कि अरे देखिए मेरी एक रिलेटिव आई थी उसने मुझे देख लिया है तो यह बात देख कर के सुधीरा जी तो बड़ी टेंशन में आ गई क्या करेंगे क्या करेंगे सो उन्होंने मेरे घर में देख लिया है पुलिस में कंप्लेन करेंगे तो पुलिस वाले आके पकड़ के ले जाएंगे तो सुधीरा दीदी ने क्या किया एक काम करो और और किसी एक रिलेटिव के साथ में उनको अपने गांव में भेज दिया सुधीरा दीदी का गांव था जहां के उनका एंसेल होम वगैरह कुछ होगा तो सुधीरा दीदी ने सरला दीदी को कहा मेरा और एक रिलेटिव है उसके साथ में तुम ट्रेन में जाकर के मेरे गांव में रहना और वहां पर बिल्कुल किसी को बत पता ना चलना चाहिए कि तुम वहां पर हो वरना तो मेरा जेल में जाना पक्का ही है और सुधीरा दीदी बड़ी ही नाराज हो गई थी बार-बार बोल रही है तुम मुझे जेल में भिजवा के ही रहोगी यहां पर सरला दीदी के मन पर क्या बीती होगी हम सोच करके देख सकते हैं तो वो क्या करेंगे वह रिलेटिव के साथ में सुधीरा दीदी के घर गई गांव में और वहां पर रह रही है किंतु क्या है अभी गांव का जो एटमॉस्फियर मां की कहानी पढ़ कर के हमको तो पता है कि कैसा है बार-बार व वहां प मच्छर फिर वो पानी पानी में इतना मतलब वो जिस तालाब में से स्नान करेंगे कपड़े धोएंगे वहीं से पानी पीना यह सब तो और मच्छर तो इतना बीमार हो गई सरला दीदी बेचारी वहां पर तो अभी क्या करें सुधीरा दीदी को मैसेज किया कि मेरे तो यहां पर नहीं रह पाओगी मेरा तो प्राण ही चला जाएगा अभी सुधीरा दीदी भी क्या करें तो सरला दीदी ने कहा कि देखिए मैं तो यहां से जा रही हूं यदि आप रख सकते तो रखिए वरना मैं अपने आप कहीं और कहीं चली जाऊगी तो अभी सुधीरा दीदी भी टेंशन में और एक रिलेटिव को भेजा कि जाओ सरला को कलकाता लेकर आओ तो सरला दीदी को फिर कलकाता बुलाया फिर आखिर में धीरे-धीरे करके उनके माताजी पिताजी को पता चला चला सरला दीदी के तो कहीं जाकर के वो ठीक हुआ कि अरे भले चाहे अभी मैंने इस तरह की जो परिस्थिति सरला दीदी के साथ में है कि घर में तो नहीं रहेगी फिर यदि सुधीरा दीदी के साथ में भी ना रहे और कहीं और कहीं भाग जाए तो सबके हाथ से जाएगी तो एक माने अनस्पोकन परमिशन जैसा उनको था फिर सरला दीदी सुधीरा दीदी ने सरला दीदी को मां से मुलाकात करवाई मां का दर्शन करवाया तो मां ने सरला दीदी को कहा कि तुम नर्सिंग की ट्रेनिंग लो वैसे तो तुम अकेली रह रही हो तुम नर्सिंग की ट्रेनिंग लो जिससे कि क्या होगा कि तुम इस तरह से क्या है कि समाज में तुम्हारा एक स्थान होगा अकेली लड़की बेचारी कहां जाए क्या करें उसका यदि कोई इनकम का सोर्स नहीं है तो फिर तो माने हमेशा इस तरह से डिपेंड रहना वो कितना मतलब हम खुद देखिए हम लोग आप अपने में इतना मने गुमान है हमारे पितर में इतना गर्व है कि किसी के घर जाएंगे वो ठाकुर का था ना वो ठाकुर गए थे किसी के घर तो अभी वो जिन लोगों का घर था वो तो बेचारे लड़के थे ब्राह्मण समाज की किसी उत्सव में ठाकुर को बुलाया था तो ये लड़के लड़के थे तो अभी ठाकुर की खातिर किस तरह से करना पता नहीं माने ठाकुर को इग्नोर कर रहे हैं ठाकुर को खाने के लिए बुलाना अलग से एक बिठाना एक उन्हें रिस्पेक्टफुली उनको खिलाना वो कुछ नहीं वो जैसे सबके साथ में वो खिलाते हैं वैसे ही ठाकुर को भी बुलाया खा लो तो राखल महाराज बड़े ही नाराज हो गए उस समय के तो राखा बड़े ही नाराज हो गए ठाकुर को कहते हैं चलिए महाशय चलते हैं यहां से तो ठाकुर ने कहा रोस रोस गाड़ी भाड़ा के देवे माने बैठो बैठो गाड़ी का भाड़ा कौन देगा वैसे ही थोड़ी ना चले जाएंगे दूसरा कि इतनी रात को तुमको दक्षिणेश्वर में खाना कौन खिलाएगा माने ठाकुर तो यह सब प्रैक्टिकल थे किंतु हम लोगों में इतना बड़ा ही गर्व होता है जहां पर भी थोड़ा सा भी अवमानना थोड़ा ही अपमान दिखा हमको फट करके उठ के चले जाएंगे तो सरला दीदी इस तरह से पराए के घर में रहती थी बाहर हर बार उनको डांट सुननी पड़ती थी कि देखो तुम्हारी वजह से मुझे जेल में जाना ना पड़े ऐसा वैसा तो उनका एक जो एक आत्म सन्मान होता है उसके ऊपर में कितना आघात लगता होगा तो मा मां ने देख लिया मां की अंतर्दृष्टि है कहा कि नर्सिंग की ट्रेनिंग लो अपने पैर पर खड़े होना सीखो तो यही मां कि सरला दीदी को इस तरह से नर्सिंग की ट्रेनिंग दिलवाई और फिर आखिरी दिन थे तो आखिरी दिन में सरला दीदी को अपनी सेवा करने का मौका दिया और जब राम मठ की स्थापना की बात चल रही थी आशा दीदी उनका एक ग्रुप था तो आशा दीदी यानी कि बाद में मुक्ति प्राणा माता जी जो कि वहां की पहली जनरल सेक्रेटरी हुई तो आशा दीदी का जो ग्रुप था वो अपने बेलूर मठ में जाते थे वहां पर बार-बार रिक्वेस्ट करते थे कि हमको सन्यास दीजिए तो फिर जब संन्यास देने की बारी आई मां की हथ एनिवर्सरी में तो 1962 63 में तो ऐसा कहा गया उनको कि देखिए सिर्फ आप लोग जो आशा दीदी अर्थात की वो तो बड़ी इंटेलेक्चुअल थी और कर्म तत्पर थी माने स्वामी जी का आइडिया बड़ा अच्छे से वह समझती थी किंतु इस तरह से कोई मठ की स्थापना नहीं होती आपके वहां पर कोई साधक चाहिए ऐसा कोई साधक जिसने कोई सिद्धि प्राप्त की हो जिसको कि ईश्वर का सही सही आशीर्वाद प्राप्त हो ऐसा साधक होगा तो इनके कंधे पर मठ बन सकता है यह कोई निष्काम कर्म करके ना कि वेदांत पढ़ के ना फिलोसोफी करके मठ की स्थापना नहीं होती ऐसा किसी का ईश्वरीय आशीर्वाद प्राप्त कोई साधक होगा सिद्ध होगा संत महापुरुष होगा उसके कंधे पर मठ स्टार्ट होगा तो उस समय बेलूर मठ से सरला दीदी निवेदिता स्कूल में रहती थी तो सरला दीदी को बुलाया गया और उनको कहा गया कि आप यहां पर प्रेसिडेंट हुइए और शारदा मठ में फिर यदि आप एग्री होते हैं तभी हम इसकी प्रारंभ कर सकते हैं तो सरला दीदी ने हां कहा फिर सन्यास के बाद में भारती प्राणा माता जी वहां की प्रथम अध्यक्षा तो ये सरला दीदी का जीवन जिस तरह से माने ने गठित किया है वो देख कर के हमको आश्चर्य होता है कि देखिए कि ऐसा नहीं है कि ठाकुर ने ठाकुर ने इवन मां को भी कहा था लक्ष्मी दीदी इस तरह से पुरुषों के सामने वो झांझर पहन कर के झुमरू होता है ना वह पैर में पहनने वाला उसको पहन करके वह नृत्य करते करते वह गीत भजन वगैरह गाया करती थी यह जो बांगला की यह ट्रेडिशनल वो भजन गाना इस तरह से कोई यात्रा अभिनय करना ऐसा तो लक्ष्मी दीदी तो इवन तीर्थ यात्रा भी कर किया करती थी अपने साथियों के साथ में तो ठाकुर ने मां को भी कहा था कि लक्ष्मी को देख कर के तुम अपनी लज्जा ना तो बांग देना तो ठाकुर ने इस तरह से मां को तैयार किया था इस तरह से अपने भक्तों को तैयार किया था किंतु वही मां को देखिए कि अपने भक्त निवेदिता हो सारा ओली बूल हो ना कि जोसेफाइन मैक्लाउड हो ना कि सरला दीदी हो इनका जीवन मां ने किस तरह से गठित किया आज आज हम लोग ऐसा सोचते हैं कि अरे यह जो स्वामी जी की तीन फॉरेन डिवटी थी अमेरिकन और ब्रिटिश डिवटी सारा ओली बुल जोसेफाइन मैक्लाउड और यह निवेदिता तो ठीक है उनके जीवन में उन्होंने मां को दर्शन किया मां को प्रणाम किया तो ठीक अच्छी बात है उनके जीवन का गठन उनके जीवन की डायरेक्शन तो स्वामी जी ने दी है ऐसा हम लोग यदि ऊपर ऊपर से पढ़ेंगे तो हमको पता चलेगा किंतु निवेदिता के लेटर्स पढ़िए निवेदिता के लेटर्स में निवेदिता बहुत फ्रीक्वेंसी फाइन मैक्लाउड और सारा ओली बुल को लेटर्स लिखा करती है तो उस लेटर्स में मां का जो प्रभाव है इन तीनों के जीवन में वो इतना सुंदर रूप से दिखाई देता है ऐसे कितने ही पैसेज होंगे बिल्कुल पहली बार जब निवेदिता मां को मिलने के लिए गई तब मां ने पूछा कि तुम्हारा क्या नाम है तो निवेदिता ने कहा मार्गरेट एलिजाबेथ नोबल तो मां ने कहा मैं तो इतना लंबा नाम नहीं पुकार पाऊंगी मैं तुमको खुकी करके पुकारूंगा अर्थात की बिटिया बच्ची बांगला में जिसको कहते हैं तो निवेदिता इतनी खुश हो गई थी हां मैं मां की बिटिया हूं मैं मां की बच्ची हूं आके स्वामी जी को बता रही है तो इनके जीवन में मां का जो प्रभाव है मां के आशीर्वाद से वो सारा ली बुल ने मां का पहला फोटो लिया कहा कि मैं तो अमेरिका चली जाऊंगी आपका दर्शन होगा नहीं तो आपका फोटो मैं लूंगी तो मेरे पास रहेगा तो मैं आपका दर्शन कर पाऊंगी ऐसा करके सारा ओली बुल ने मां का फोटो लिया था और सरला दीदी की तो बात ही अलग है कि शारदा मठ का पूरा भविष्य का गतर सरला दीदी ने किया था तो यह जो बाद में जो लेडी डिवोटा आई इनका जीवन माने जिस तरह से गठन किया था और ठाकुर ने इनको जिस तरह से शिक्षा दी है तो अभी क्या है कि हम हमको तो पता है कि ठाकुर महा स्वामी जी कोई तीन अलग आवाज से तीन अलग-अलग बातें नहीं करते ऊपर से दिखता है किंतु भीतर में बहुत ही पक्का एक लॉजिक रहता है कि समय स्थान और पात्र के अनुसार बातें करनी है है तो यह बात इन तीनों का एकदम पक्का था किंतु जब हम इस तरह से कंट्रा इक्स देखते हैं तो इस कंट्रा इक्स को फॉलो अप करके उसके ऊपर में सोचना वह हमारे लिए बड़ा आनंद का बात है क्योंकि इस तरह से जैसा जितना जितना हम सोचेंगे उतना उतना अपना रामकृष्ण संघ का यह जो भावधारानी उतरते जाएंगे यहां पे मैं ब्रह्मचार्य का क्लास करता हूं तो अभी क्या है कि कुछ समय पहले मैं एक टेक्स्ट माने लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा को लेक के मैं किया करता था क्लास अभी कुछ समय से मैंने सोचा इस तरह से नहीं बहुत ज्यादा वह फॉर्मल हो जाता है अभी कुछ कुछ पॉइंट्स लेकर के हम बात करेंगे तो जैसे कि कल मैंने कुछ दिनों पहले मैंने क्लास में कहा कि बताओ तो स्वामी जी जब भारत में आए तो स्वामी जी के जीवन में तो टर्निंग पॉइंट आया ही है मां के जीवन में भी टर्निंग पॉइंट आया किस तरह से तो मैंने यह जो आप सोचेंगे कि स्वामी जी के भारत में आने से मां का जीवन में टर्निंग पॉइंट क्या आया ऐसे तो यस आंसर बहुत सारे हैं कि मां अभी तक छुप कर के रहती थी किंतु बाद में भक्तों के सामने आई धीरे-धीरे मां के जीवन में जद भक्तों के सामने आना ठाकुर जब थे तो मां एकदम छुप कर के रहती थी किंतु धीरे-धीरे करके भक्तों के सामने अपना देवी प्रकाश करना वो जो मां की यात्रा है उसमें टू दो मेजर माइल स्टोन है एक तो कि बेलूर मठ की स्थापना दूसरा की उद्बोधन की स्थापना एक के बाद एक ईद दोनों घटनाओं की वजह से मां का कलकाता में आना ज्यादा फ्रीक्वेंसी थी तो मास्टर महाशय के वहां पर बलराम बसु के वहां पर या तो भाड़े का घर करके रहना बड़ा वो असुविधा होती थी किंतु अपना ही जब घर है बेलूर मठ में थी बेलूर मठ था तो मां वहां पर नीलांबर गार्डन में रहा करती थी फिर जब उद्बोधन हुआ तो कोई प्रश्न ही नहीं है अपना ही घर है अपने ही वो द्वारपाल अपने शरद महाराज द्वारपाल के रूप में वहां पर है तो यह जब कलकत्ता आने की फ्रीक्वेंसी बड़ी कलकाता में रुकने का समय थोड़ा सा बड़ा तब कहीं जाकर के कोलकाता के मोड जो सेकंड जनरेशन डिवोटा थे मां के पास आना शुरू हुए और मां का आशीर्वाद प्राप्त करके धन्य हुए तो इस तरह से जब हम एक के बाद एक पॉइंट लेते हैं वैसे तो हम टेक्स्ट पकड़ करके तो पढ़ते ही है किंतु इन जनरल जब सोचते हैं कोई कोई टिपिकल पॉइंट को लेकर के कि यह कंट्रा क्शन है कि नहीं यहां पर क्या टर्निंग पॉइंट है तो हमको और डिटेल में और डीप में अपने संग की भावधारानी का मौका मिलता है तो ज्ञान योग स्वामी विवेकानंद का ज्ञान योग कॉस्मो मैक्रो कजम जिसके बारे में हम पढ़ रहे हैं यह टेक्स्ट को लेकर के हुआ वो एक इनफॉर्मल हो गया है डिस्कशन या टेक्स्ट को लेकर के डिस्कशन भी आवश्यक है क्योंकि दो यदि सिर्फ एक इनफॉर्मल डिस्कशन भी रहेगा तो फिर क्या है कि अपना डिस्कशन में डेप्थ नहीं आएगी इनफॉर्मल डिस्कशन से अपना विड्थ बढ़ता है और टेक्स्ट को लेकर के डिस्कशन करने से डेप्थ बढ़ती है तो यह विड्थ और डेप्थ दोनों होने चाहिए फॉर्मल डिस्कशन और इनफॉर्मल डिस्कशन जिससे कि हम इस भावधारानी का एक पैसेज है कि समय को लेकर के स्वामी जी क्या कहते हैं तो मैं फिर से इस पैसेज को पढ़ लेता हूं फिर से उसके बाद में इसके ऊपर थोड़ा सा डिस्कशन करेंगे स्वामी जी क्या कहते हैं कि अ सेल्फ लुमिनस एसिस्टेंसिया एसिस्टेंसिया शून्य में से सर्जन नहीं कर सकते जो स्वयं प्रकाशित है जो अपना प्रकाश दूस दूसरों से उधार लेता है उसका आप सर्जन कर सकते हैं किंतु जो स्वयं प्रकाशित है उसका सर्जन आप कैसे करेंगे तो यह एक पॉइंट फिर स्वामी जी क्या कहते हैं इट ऑलवेज एसिस्टेड आत्मन हमेशा से अस्तित्व में था देयर वाज नेवर अ टाइम व्हेन इट डिड नॉट एजिस्ट ऐसा कोई समय नहीं था जब आत्मन नहीं था बिकॉज इफ द सोल डिड नॉट एजिस्ट वेर वाज टाइम क्योंकि जद आत्मन का अस्तित्व नहीं था तो समय कहां था टाइम इज इन द सोल समय आत्मन के भीतर में है इट इज व्हेन द सोल रिफ्लेक्ट्स इट्स पावर्स ऑन द माइंड एंड द माइंड थिंग्स दैट टाइम कम्स जब आत्मन अपना प्रकाश मन के ऊपर में डालता है और फिर मन जब जब सोचने की शुरुआत करता है तब जो यह सोचने की प्रक्रिया है थिंकिंग प्रोसेस है उसके साथ में जुड़ा हुआ समय तब एक्टिवेट होता है यदि सोच ही नहीं है यदि मन ही नहीं है यदि थॉट ही नहीं है तो थोट के साथ में संलग्न टाइम या तो समय वह हो ही नहीं सकता व्हेन देयर वाज नो सोल जब आत्म नहीं था सर्टेनली देयर वाज नो थॉट विचार भी नहीं था एंड विदाउट थॉट देयर वाज नो टाइम और विचार के अभाव में समय भी नहीं था हाउ कैन द सोल देयर फोर बी सेड टू बी एक्जिस्टिंग इन टाइम व्हेन टाइम इट सेल्फ एक्सिस्ट इन द सोल ऐसा कैसे कह सकते हैं कि आत्मन समय के भीतर में जीता है जबकि समय इट सेल्फ आत्मन के भीतर में अस्तित्व रखता है यह इसको लेकर के थोड़ा सा और थोड़ा डिफिकल्ट डिस्कशन कर लेते हैं अ न्यूटन जब था या तो फिर कहेंगे कि आइंस्टाइन की थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी उससे पहले कहा जाता था कि समय और अवकाश एब्सलूट है टाइम एंड स्पेस आर एब्सलूट उसमें कोई भी प्रकार का परिवर्तन नहीं होता क्योंकि यह क्या है कि इसके द्वारा सब कुछ ये यार्ड स्टिक है यह मेजरमेंट है समय और टाइम टाइम एंड स्पेस जिसके द्वारा सब कुछ नापा जा सकता है जिसके ऊपर में सब कुछ डिपेंड होता है जैसे कि एक सरल एग्जांपल लेते हैं मान लीजिए कि ₹ है ₹1 का नोट है अभी हमको पता है कि ₹1 के नोट का वैल्यू एक ही रुप है और ₹10 का नोट है जद मान लीजिए तो उसका वैल्यू ₹ ही जितना होगा अभी मान लीजिए कि अपना पूरा मान क्या लीजिए ये है ही है कि पूरा कॉमर्स इंडस्ट्री टेक्नोलॉजी यह सोसाइटी यह सब कुछ जो है यह रुपए की वैल्यू के ऊपर में डिपेंड करता है आज यहां पे ये जो लड़के आते हैं हमारे यहां पब्लिकेशन में काम करने के लिए उनको मान लीजिए कि ₹1000000 का सैलरी मिलता है तो यह उन्होंने इतना काम किया इतने अगेंस्ट में 00 सैलरी मिला अभी वो जब मार्केट में जाएंगे तो जो पैसा 10000 का खर्च करेंगे तो उसके अगेंस्ट में उन्होंने जो काम किया है उसी के अनुसार वो अब कोई भी चीज खरीद कर पाएंगे यदि नए कपड़े लेने है या तो बाजार में से साक सब्जी लेना है या तो बच्चा अपना बीमार हो गया है तो हॉस्पिटल में ले जाना है उसका जो खर्चा है आपने यहां पे प्रकाशन विभाग में आपने जो मेहनत की या तो फिर आपकी मेहनत का जो आकलन निकाला गया जो मेजरमेंट किया गया उसी मेजरमेंट के अनुसार मार्केट में आप जाएंगे तो उसी मेजरमेंट के अनुसार उसी मेहनत के अनुसार आप कोई भी चीज खरीद कर पाएंगे किंतु मान लीजिए कि यदि ऐसा होता यहां पे प्रकाशन विभाग में आकर के उन्होंने जो काम किया उसके अनुसार मैं कहता हूं कि ठीक है आप लोगों का सेल आप जो काम करते हैं मार्केट वैल्यू के अनुसार इसका 10000 सैलरी होता है किंतु यदि वो मार्केट में जाएंगे और कहा जाएगा कि नहीं यहां पर यह जो 0000 है उसकी कीमत सिर्फ 1000 जितनी है और आप एक ही हज की चीज खरीद सकते हैं तो तो कितना भयानक केस हो जाएगा जहां पर आप काम करते हैं वहां पे या जो मेहनत करते हैं उसका 10000 है और जहां पर मार्केट में जाते हैं तो 1000 हो जाता है तो यह जो पैसों की वैल्यू कम ज्यादा होगी अलग-अलग जगह पे तो तो बड़ा ही केस हो जाएगा यह अपना सोसाइटी काम नहीं करेगा एक जगह पर आपका 10000 की जो वैल्यू है दूसरी जगह पर 10000 की एगजैक्टली वही वैल्यू होनी चाहिए तभी तो जाकर के यह सोसाइटी काम करता है तो इसी तरह से यह न्यूटन के बारे न्यूटन ने जो अवकाश और समय की परिकल्पना की थी समय मेरे सबके लिए समान है मैं यहां पर एक घंटा क्लास करता हूं यदि ऐसा होता कि आप लोगों को क्लास करने में 10 घंटा जाता है तो तो फिर इस क्लास में कोई नहीं आता बड़ा ही केव हो जाता मेरे लिए यदि एक घंटा यहां पे जाता है फॉर एग्जांपल तो आपके लिए इस क्लास में एक ही घंटा जाएगा उससे एक सेकंड भी ज्यादा या कम नहीं जाएगी क्योंकि समय हम दोनों के लिए हम सभी के लिए एक ही तरह काम करता है तो समय एक मेजरमेंट है स्पेस एक मेजरमेंट है यहां से मान लीजिए कि मैं 10 किमी दूर जाकर के या तो फिर मान लीजिए 200 किमी दूर यहां से लिमडी नाम का एक गांव है जहां पे रामकृष्ण आश्रम एक दूसरा सेंटर है हमारा तो यहां से आज मैं यदि लीमड़ी जाता हूं तो 200 किमी होगा परसों दिन में जद लीमड़ी जाता हूं यहां से राजकोट से तो एक 100 किलोमीटर हुआ यदि ऐसा होगा तो मान लीजिए कि कैसा केस होगा यदि आज यहां से लीमड़ी का अंतर राजकोट से लीमड़ी 200 किलोमीटर है तो कल भी तो 200 किमी ही होना चाहिए परसों भी 200 किमी ही होना चाहिए ये समय और टाइम एंड स्पेस सब समय के लिए हमेशा सब जगह के लिए सब सभी लोगों के लिए एक ही तरह का होना चाहिए उसमें जद बढ़ना कम होना शुरू हुआ तो भयानक केस यह जगत में हम मॉडर्न सिविलाइजेशन बना ही नहीं पाएंगे तो इस हिसाब से ये ये समय और ये स्पेस एंड टाइम की परिकल्पना की गई थी किंतु जब से यह रिलेटिविटी आई तब से हमको पता चला कि नहीं टाइम एंड स्पेस आर रिलेटिव टू योर फ्रेम ऑफ रेफरेंस आप कहां पर किस स्पीड से गति कर रहे हैं या तो आप कहां पे है इसके ऊपर में टाइम एंड स्पेस वेरी होते हैं चेंज होते हैं यदि आप जैसे ट्विन पैराडॉक्स है वो मॉडर्न फिजिक्स में ये सब चीजों को जिस तरह से हम लोग ये पैराडॉक्स खड़ा करते हैं ना ये ये फिजिक्स में खास करके ये पैराडॉक्स खड़े किए जाते हैं दो ट्विन ब्रदर्स है जुड़वा भाई है एक भाई पृथ्वी पर रहा और दूसरा भाई ने स्पेसशिप में बैठ कर के वो मान लीजिए कि यहां से सबसे नजदीक का तारा है अल्फा सटोरी तो अल्फा सटोरी की यात्रा करके वापिस आया अभी यहां से अल्फा सेंटूरी फोर लाइट इयर्स दूर है तो यदि मान लीजिए कि आपकी एक ऐसी स्पेसशिप में बैठ कर के जाते हैं जिसकी स्पीड ऑलमोस्ट 20 पर ऑफ लाइट ईयर होती है तो मान लीजिए कि आपका एक आपका जुड़वा आप पृथ्वी पे रहे आपका जुड़वा भाई जाकर के वो अल्फा सेंटूरी यात्रा करके आया 20 परसेंटेज ऑफ स्पीड ऑफ टाइम मान लीजिए कि उसको आते-आते 50 साल हुए तो पृथ्वी के हिसाब से आपकी उम्र 50 साल बढ़ गई होगी आप 20 साल के हैं तो 20 प् 50 तो आपकी एज 70 इयर्स हो गई होगी किंतु आपका भाई यह जो 20 पर ऑफ स्पीड ऑफ लाइट गति करके जो आया है ट्रेवल करके हो सकता है कि उसकी ऐज मुश्किल से 30 35 साल हुई हो क्यों ये म भयानक ये तो पैराडॉक्स हो गया दो जुड़वा ब्रदर है दोनों की तो एज एक साथ में ही होनी चाहिए यदि एक का 70 साल हो गया तो दूसरा 30 साल या 35 साल का कैसे हो सकता है है किंतु वह हो सकता है क्योंकि जैसे-जैसे आपकी स्पीड बढ़ती है टाइम आपके लिए स्लो होता जाता है तो यह पैराडॉक्स जब हमारे सामने आया तब हम लोगों ने ये समय और अवकाश को भी रिलेटिव मानना शुरू किया स्वामी जी इसी बात को यह देखिए कि अ इन कल हमने जैसे डिस्कस किया था स्वामी जी के एडवांस आइडियाज को निकोला टेस्ला एक्सेप्ट नहीं कर पा रहा था क्योंकि उसके लिए समय और अवकाश टाइम एंड स्पेस एब्सलूट है उसमें चेंज होना या तो इस कोई रिलेटिव एक्जिस्टेंस होना ये तो फिर पूरा गड़बड़ हो जाएगा जस जिस तरह से हम ये कहते हैं ना कि ईश्वर ही सही है बाकी सब कुछ मिथ्या मान लीजिए कि कोई भक्त है ऐसा कहेगा कि ईश्वर के पास में ही सही शक्ति है बाकी पूरा विश्व ब्रह्मांड ईश्वर की शक्ति से उनके आशीर्वाद से चलता है तो फिजिक्स इसी ये जो गॉड एटिबल है ईश्वर की शक्ति वो स्पेस एंड टाइम को देते हैं पूरा ब्रह्मांड में स्पेस एंड टाइम बोलकर के चार डायमेंशन फैली हुई है ये सब कुछ जो कुछ देखते हैं स्पेस एंड टाइम के भीतर में ही है और स्पेस एंड टाइम सापेक्ष रहेगा भगवान जैसे कि और किसी के ऊपर में फेवरेटिज्म नहीं करता कि एक आदमी ने एक साल तपस्या की तो उसको पूरा राज्य दे दो दूसरे ने 100 साल तपस्या की फिर भी उसको लात मारो भगवान इस तरह से कोई फेवरेटिज्म नहीं करेंगे जिसने जितनी तपस्या की जिसने जितनी मेहनत की उसी के अनुसार कर्म के अनुसार ही फल मिलेगा यह तो कर्म का सिद्धांत पक्का है या तो फिर कहेंगे कि ईश्वर की आशीर्वाद भी इस तरह से निरपेक्ष है है ईश्वर किसी के किसी के ऊपर में कृपा करते हैं किंतु ईश्वर फेवरेटिज्म नहीं करते यह कृपा करना और फेवरेटिज्म करना यह बिल्कुल डिफरेंट डिफरेंट चीजें हैं फेवरेटिज्म होता है कि कोई आपकी प्रशंसा कर दे तो वो आपका फेवरेट होगा कृपा स्वयं होती है भीतर से एक आती है तो इस हिसाब से दोनों में बड़ा डिफरेंस है तो ईश्वर जैसे कि निरपेक्ष है यह कर्म का सिद्धांत जैसे निरपेक्ष है तो टाइम एंड स्पेस भी निरपेक्ष होने चाहिए मंगल ग्रह के ऊपर में आज का एक साल तो मंगल ग्रह में छ मही महीने में एक साल हो जाएगा ऐसा होगा तो तो पूरा ब्रह्मांड में केस फैल जाएगा तो यह जो एब्सलूट स्पेस टाइम था आइंस्टाइन ने उसको रिलेटिव बना दिया अभी स्वामी जी को पता है कि स्पेस टाइम को रिलेटिव होना चाहिए एब्सलूट नहीं होना चाहिए किंतु 19 सेंचुरी फिजिक्स निकोला टेस्ला जिसमें विश्वास करता था उसके अनुसार तो स्पेस टाइम मने एब्सलूट था ही था तो बोलकर के स्वामी जी को बड़ा ही डेलिकेटली अपना आईडियाज उन समय के साइंटिस्ट के सामने फिलोसोफर के सामने रखना है कि जैसे कि वे लोग स्वामी जी के आइडियाज को स्पेक्युलेटिव हैंड सेकंड की भविष्य की जनरेशन जैसे कि हम जैसे लोग हैं जब स्वामी जी को पढ़े तो स्वामी जी के वो आईडियाज में से गलती ना निकालना शुरू कर दे अरे जो स्वामी जी ने जो कहा है वो तो 19 सेंचुरी के अनुसार था ये 21 सेंचुरी में स्वामी जी के आईडिया सब गलत गलत है स्पेस एंड टाइम क्या है तो यदि स्पेस एंड टाइम के बारे में गलत बोल रहे हैं तो उसका अर्थ है कि ये वेदांत के बारे में भी सब गलत गलत होगा तो छोड़ो स्वामी जी को हम जैसे कुबुद्धि वाले लोग भी भविष्य में होने वाले थे ऐसा स्वामी जी को पता था तो हमको भी एक लॉलीपॉप देक के रखनी है कि 100% वो 19 सेंचुरी के अनुसार नहीं चलना है और इस तरह से भी मॉडर्न स्पेक्युलेटिव स्पेसशिप का एक एग्जांपल देखा कि यदि आप स्पेसशिप में बैठ कर के प्रकाश की गति की 20 पर स्पीड के साथ में गति आप यात्रा करते हैं लाइट की प्रकाश की गति क्या है 3 लाख किलोमीटर पर सेकंड इतनी प्रचंड गति से प्रकाश गति करता है तो 3 लाख किलोमीटर पर सेकंड की स्पीड से जो प्रकाश की जो वेलोसिटी है या तो स्पीड है उसका 20 पर कहे तो मान लीजिए कि चलो 10 15 हज ना कि मान लीजिए कि 500 किलोमीटर पर सेकंड की गति से आप जाते हैं तो ये रिलेटिविटी इफेक्ट में आना शुरू हो जाएगी और धीरे-धीरे करके आपका समय जो है वो स्लो होना शुरू हो जाएगा और मान लीजिए कि पृथ्वी पे 10 साल बीत गए तो हो सकता है अपना एक ही साल बीता स्पेसशिप में और यदि ब्लैक होल की बाउंड्री प चले गए वहां पर टाइम फ्रीज हो जाता है वहां पर समय स्टॉप हो जाता है वहां पर जाकर के आप य जिसको इवेंट होराइजन कहते हैं इवेंट होराइजन प आपकी स्पेसशिप चली गई तो आप वहां पे फ्रीज हो जाएंगे जैसे कि पिक्चर लेते हैं तो पिक्चर में कैसे आप फ्रीज हो जाते हैं तो वैसे ही आप वहां पे फ्रीज हो जाएंगे आपके लिए समय स्टॉप हो जाएगा तो अच्छा किंतु यह समय स्टॉप होता है पृथ्वी की दृष्टि से आपकी दृष्टि से नहीं आप आपको तो ऐसा ही लगेगा कि ये समय अपने नॉर्मल स्पीड से जाता है ये फ्रेम ऑफ रेफरेंस है ना वो बड़ा ही टिपिकल आईडिया है तो जो भी है किंतु यह जो समय इस तरह से नि सापेक्ष है तो अभी कह सकते हैं कि समय का जो अस्तित्व है अपने यहां पर स्वामी जी क्या कहते हैं आत्मन और टाइम इन दोनों के बीच में थॉट रूपी एक इंटरफेस खड़ा करते हैं थोट अथवा तो मन अथवा तो अंतःकरण जैसे कि हमने देखा कि जिस तरह से स्वामी जी ने पहले समझाया था कि अपनी आंखें प्रकाश के किरण को ग्रहण करती है फिर यह प्रकाश की किरण अपने मन में जाएगी और फिर ये मन जो है उसको टू मेक सेंस ऑफ व्ट ही इ सीइंग माने क्या देख रहा है उसका अर्थ घटन मन करेगा मन बुद्धि चित्त अहंकार यह अंतःकरण है किंतु यह जो देखता है उसका तात्पर्य क्या है यह किस चीज के लिए यह सब हो रहा है ये आत्मन जो है आत्मन इसके ऊपर में प्रकाश डाल रहा है बोलकर के ये सब चीजों का कोई अर्थ है वरना यदि सब कुछ जड़ होता और कोई इसको चेतन इसको देखने के लिए नहीं होता तो इसका क्या क्या अर्थ होता तो यह चेतन आत्मन है जो कि यह अंतःकरण के ऊपर में प्रकाश डालकर उसको जीवित करता है और इसको एक अर्थ प्रदान करता है तो यहां पर स्वामी जी कहते हैं कि एक आत्मन है और एक समय है इसके बीच में यह अंतःकरण रूपी इंटरफेस है ये अंतःकरण कार्य करता है तो यह समय चलता है यदि अंतःकरण कार्य करना बंद कर दे तो समय नहीं रहेगा जैसे कि हम इस जीवन में मेरा एक जीवन है मेरा एक जन्म है मान लीजिए कि मैं 60 साल 70 साल जिऊं इसके बाद में मेरा मृत्यु हो जाएगा मृत्यु हो जाएगा अर्थात कि मेरे विचार बंद हो जाएंगे मेरा अंतःकरण एक मान लीजिए कि एक ऐसी निष्क्रिय अवस्था में चला जाएगा तो समय उसके लिए स्टॉप हो जाएगा अभी ऐसा नहीं है कि पृथ्वी पर समय स्टॉप हो जाता है समय मेरे लिए स्टॉप हो गया और जब मैं नया जन्म धारण करूंगा मेरा अंतःकरण नए शरीर के भीतर में प्रवेश करेगा तो जैसे ही उसके लिए समय प्रारंभ हो गया अभी मान लीजिए कि मैं ऐसा मुझे ऐसा सोचना अच्छा लगता है कि ठाकुर जब थे दक्षिणेश्वर में तो मैं भी दक्षिणेश्वर में कहीं वो कालीवाड़ा वो माली की नौकरी करता हूंगा वो चौकीदार की ना माली की और ठाकुर को देखा होगा ऐसा सोचना मुझे अच्छा लगता है तो मान लीजिए कि 18828 1885 186 86 में ठाकुर का देहांत हुआ ठाकुर का ठाकुर की महासमाधि हुई उस समय में वहां पे था उसके बाद में मान लीजिए कि मेरे भी मेरा भी मृत्यु हुआ और फिर यहां आकर के फिर से 1980 में मेरा पुनर्जन्म हुआ तो ये 18 86 18864 के बीच का जो समय बीता है मेरे लिए तो एक पल भर में वो चला गया है क्योंकि मैं तो जीवित ही नहीं था मेरा मन कार्य निष्क्रिय था कार्य नहीं कर रहा था तो वो जो 100 साल का समय मेरे लिए चुटकी बजा के चला गया और जब से फिर से मेरा जन्म हुआ फिर फिर से मुझे समझ में आ रहा है कि हां धीरे-धीरे करके समय जो बीत रहा है मुझे समझ में आ रहा है तो यह अंतःकरण जब सक्रिय होगा तभी यह समय कार्य करेगा अंतःकरण निष्क्रिय हो जाएगा तब यह समय कार्य नहीं करेगा अर्थात कि समय अंतःकरण की सक्रियता के ऊपर में मन के विचारों के साथ में संलग्न है यदि मन के विचार नहीं है तो समय भी नहीं है तो मान लीजिए कि इस पूरे जगत में कोई भी नहीं होता इसको प्राण देने वाला तो फिर समय कहां से आता तो इसलिए समय आत्मन के ऊपर में निर्भर है आत्मन के भीतर में वह विराजित है नहीं कि आत्मन समय के भीतर में ऐसा नहीं कह सकते जैसे क्रिश्चन थियोलॉजी में है कि ईश्वर अनंत है अमर है यानी कि ब्रह्मांड की शरू से भी ईश्वर है और ब्रह्मांड के अंत तक ईश्वर है वह तो आपने एक अमर वस्तु के बारे में बोल दिया जो कि मृत्यु नहीं होता एक्चुअली ईश्वर या तो आत्म समय के ऊपर है समय का प्रारंभ होना समय का अंत होना इसके साथ में आत्मन ब्रह्मण या ईश्वर का कोई लेना देना नहीं जैसे कि हमने कल कहा था कि जमीन है जमीन के ऊपर में परछाई गिरती है तो परछाई आ कर के चली जाती है सूरज के यहां पे ये जो खिड़की खुली है मेरे सामने मैं देख रहा हूं कि सूरज का प्रकाश आता है अभी यह प्रकाश आता है तो यहां पे गिरेगा अ जैसे-जैसे सूरज की गति बदलती जाएगी अपना स्थान बदलता जाएगा प्रकाश अपना स्थान जो है जमीन के ऊपर में वो चेंज करता जाएगा तो प्रकाश आज यहां पर गिर रहा है एक घंटे के बाद में यहां दूसरे घंटे के बाद में वहां जमीन को उससे कोई फर्क नहीं पड़ता वैसे ही समय आता है जाता है बीतता है स्पीड में जाता है स्लो हो जाता है आत्मन को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता तो ये 20th सेंचुरी का आईडिया स्वामी जी वो 19th सेंचुरी के फिजिक्स के भाषा में व्यक्त करने का प्रयास कर रहे थे तो बिकॉज कि विथ हिंड साइट हिंड साइट अर्थात कि इतिहास का नॉलेज या तो कहेंगे कि पीछे जो घटना हुई उसके बारे में जानकारी तो विथ हिंड साइट हम समझ सकते हैं कि स्वामी जी की स्ट्रगल कैसी होगी कि वो आइडियाज इतने एडवांस है किंतु आइडियाज एक्सप्रेस करने के लिए विज्ञान जो है वो बड़ा सीमित है विदन लिमिटेड साइंस उनको इस तरह से एक्सप्रेस करना है कि लोग उनको माने वो ईस्टन कहते हैं ना कि ये इंडियन है इंडियन है माने वो इमेजिनेशन करता रहता है सपने देखता रहता है प्रैक्टिकल कुछ नहीं है ऐसा बोल के उनको डिस्मिस भी ना दे और भविष्य की जनरेशन उनको सीरियसली ले क्योंकि उन्होंने हमेशा ऐसे लूप होल छोड़े हैं उस लूप होल को पकड़ कर के हम स्वामी जी को समझ सकते हैं कि किस तरह की स्ट्रगल से वो गुजरे हैं तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम श्री राम कृष्णर्पण मस्त m