Transcript
ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णा यते स्वामी जी का पत्र हम पढ़ रहे थे बैकग्राउंड है कि स्वामी जी अपने ने गुरु भाइयों को बताते हैं कि अभी व्यष्टि साधना करने का समय समाप्त हो चुका है अपने खुद के लिए भ्रमण करते-करते उन्होंने जहां-जहां जाकर के गांव गांव शहर शहर जाकर के प्रव्रज्या की वह समय अभी हुआ समाप्त और अभी एक नया चैप्टर स्टार्ट होगा रामकृष्ण संघ के इतिहास में भारतवर्ष के इतिहास में कलयुग का सूर्यास्त हो चुका का है और नए सतयुग का सूर्योदय हो रहा है और इस सूर्योदय होने के लिए इन लोगों का बहुत ही बड़ा अवदान होना है तो यह परिप्रेक्ष्य में स्वामी जी उनको पत्र पत्र लिखते हैं और पत्र में क्या लिखते हैं उसका हम पाठ कर रहे हैं आगे थोड़ा सा पढ़ते हैं कल स्वामी जी ने एक बहुत बड़ी बात कर दी कि मुक्ति भक्ति भार दूर कोरे दे ए एकमात्र रास्ता आछे दुनियाय परोपकाराय ही सता जीवितम पर्थम प्राज्ञ उत्सुर जेत अर्थात की मुक्ति और भक्ति की चिंता अभी अपने सर से निकाल दो अभी जो हमारे लिए कर्तव्य है वह है परोपकार के लिए ही साधुओं का जीवन है प्राज्ञ व्यक्ति अर्थात की जो सही सही साधक है वह दूसरों के लिए ही जीवन का उत्सर्जन करता है यह प्रश्न यह बात थोड़ी सी विकट है समझने के लिए कि ठाकुर के साथ में ही देखिए कि कितना कंट्रास्ट होता है ठाकुर ने एक बार कहा था कि तुम लोग काली मंदिर में गए मान लीजिए तो फिर वहां जाकर क्या करोगे कि बाहर में जो भिक्षुक वगैरह जो बैठे हुए हैं उनको दक्षिणा दान देते देते ही समय समाप्त कर दोगे ना कि कैसे भी करके धक्का मुखी करके जद भीड़ तो होने ही वाली है मंदिर में तो कैसे भी करके धक्का मुखी करके वेट करके एक बार सबसे पहले मां काली का दर्शन कर दो और फिर उसके बाद में इन भिक्षुओं को जितनी भिक्षा देना है वह देते रहना तो ठाकुर ने तो ऐसा कहा और इसके सामने स्वामी जी ऐसा कह रहे हैं अरे बाप रे ये तो कितना बड़ा कंट्रास्ट हो गया और एक बात है कि एक डिवटी दक्षिणेश्वर आया था मैं नाम भूल गया तो अभी उस दिन ठाकुर का जन्मोत्सव था तो जन्मोत्सव होने से तो वहां पर कीर्तन या कीर्तन करने के लिए लोग इकट्ठा हुए थे कितने ठाकुर भी कितने मतलब उस समय आध्यात्मिक उच्च भूमि पर विराजित है और सब कीर्तन शुरू ही होने वाला था तो इस डिवोटा ने कहा कि वह वराह नगर जा रहा है उनको कुछ काम है तो ठाकुर तो बड़े ही आश्चर्य चकित हो गए अरे आज जन्मदिन है इसकी इतनी खुशियां मनाई जा रही है ठाकुर बार-बार समाधि में चले जाएंगे तो इस तरह से ठाकुर का दर्शन का मने एक बेनिफिट छोड़ कर के अच्छा यदि किसी कारण वश तः नहीं आ पाया तो बात अलग है किंतु आया है दक्षिणेश्वर में और ठाकुर के दर्शन भी कर रहा है किंतु अभी यह जो सही सही भजन कीर्तन ठाकुर की समाधि यह एकदम जो शुरू होने वाला है उसी के आगे वोह छोड़ कर के चला जा रहा है दक्षिणेश्वर कहां जा रहा है तो उसने कहा वराह नगर में वर्किंग मेनस एसोसिएशन एक है तो वहां पर वो जा रहा है कई क्लास पास लेने होंगे ना कि ऐसा कुछ होगा तो ठाकुर ने तो अभी ठाकुर तो क्या कहेंगे अभी उसको जाना है तो जाए तो ठीक है ठाकुर कुछ तो उस समय तो बोले नहीं किंतु एक बार जब वो चला गया तब ठाकुर ने कहा कि इसके नसीब में नहीं है इसके नसीब में नहीं है ऐसा ठाकुर ने कहा तो देखिए दो उदाहरण है एक तो मां काली के दर्शन करने के लिए जाते हैं तो सबसे पहले कैसे भी करके धक्का मुखी करके दर्शन कर लीजिए बाद में भिखारियों को भिक्षा देते रहिए और दूसरा कि ठाकुर का मतलब बार-बार समाध भजन कीर्तन जिस दिन होना था वो छोड़ कर के कहां वो वर्किंग मेंस एसोसिएशन में जाकर के मजदूर लोगों को लेक्चर देना मतलब उसका कपाल में ही नहीं है तो ठाकुर एक और हमको यह कह रहे हैं और दूसरी र है यह स्वामी जी स्वामी जी कहते हैं कि भक्ति मुक्ति का भार अपने सर से निकाल दो भक्ति और ये मुक्ति वगैरह सब भूल जाओ जो पर दूसरों के लिए जो साधु है जो प्राज्ञ है यहां पर शब्द यूज किया है दो साधु और प्राज्ञ प्राज्ञ अर्थात कि जिसने आध्यात्मिक साधना करके एक आध्यात्मिक विजडम जिसने कलेक्ट किया है उसको प्राज्ञ कहते हैं प्राज्ञ का एक अर्थ तो वैसे तो बुद्धिशाली या तो बौद्धिक या तो ज्ञाता या तो ज्ञानी ऐसा तो होता ही है किंतु यह सिर्फ एक साइंस या तो फिर यह नेचुरल स्टडीज में वोह उसकी ज्ञान होना दैट इज नॉट इनफ उसका एक्चुअली ज्ञान होता है आध्यात्मिक जीवन में जैसे कि एक अच्छे-अच्छे कथाकार जो बेस्ट कथाकार जो होते हैं उनकी बात सुनकर के हमारे हृदय में कैसा एक यह हो जाता है कि एक भाव का एक यह हो जाता है प्राग्यवारे क्च है उनकी मेमोरी एक इंटेलेक्चुअल किंतु ट्रेडिशनल सेंस में नहीं एक तो मेमोरी तो उनकी होती ही है बहुत सारी बातें बहुत सारी पौराणिक कथाएं उनको तो सबके ग्रंथ के ग्रंथ उनको मुख स्त हो जाते हैं अभी अभी कुछ दिनों पहले मैं यहां पर एक दो यहां वॉलंटस से उनके साथ बात कर रहा था तो गुजरात में इस तरह से डायरो बोलकर एक होता है रात को माने पूरी रात भर चलता रहेगा वो कथा वगैरह होता है तो यह जो कथाकार होते हैं या तो फिर यह जो डायरो जो होता है उसमें जो बोलने वाले हास्य कलाकार यह वगैरह जो होते हैं रात रात भर ये लोग बोलते जाते हैं उनको कोई विश्राम लेने की जरूरत नहीं पड़ती एक बार व्यासपीठ पर आकर के बैठ गए तो जैसे कि वो जिह्वा के ऊपर में सरस्वती बैठ जाती है वो उनकी बातें एक के बाद एक कथाएं एक के बाद एक जो अपने पुराणों में जो विजडम हमको दिया गया है वह बहता ही जाता है उनके मुंह से तो इसको कहते हैं प्राज्ञ नहीं कि एक एकेडमिकली इंटेलिजेंट हो सकता है कि इस तरह के कथाकार मने कथाकार को तो छोड़ ही दीजिए मैंने इस तरह से एक दो तबल च के दिखाए तबल च यानी जो तबला बजाते हैं तो अरे ने घंटों घंटों तक वो बजाते रहेंगे इतने उसमें मशगूल हो जाएंगे कि जैसे कि मतलब ऐसा लगेगा कि ये संगीत साधना करते करते उनको समाधि प्राप्त हो जाएगी तो माने कोई एक विशेष विषय को उसमें अपनी जो भी है प्राण शक्ति डाल कर के उस विषय को साध्य करना उसको प्राज्ञ कहते हैं नहीं कि सिर्फ एक एकेडमिकली नरो डेफिनेशन तो यहां पर स्वामी जी कहते हैं कि साधु और प्राज्ञ अपना जीवन उत्सर्जित करते हैं दूसरों के लिए नहीं कि अपने खुद के लिए तो यह दोनों चीजों में इतना बड़ा कंट्रास्ट है अभी ठाकुर ऐसा नहीं कहते कि आपको सेल्फिश होना है ठाकुर कहते हैं पहले ईश्वर दर्शन कर दो बाद में जितना भी ठाकुर का खुद का देखिए नेती नेती करके आप पहले तो आध्यात्मिक रास्ते पे ऊपर में जाएंगे उसके बाद में जाकर जैसे कहते हैं ना सीढ़ी प चढ़ उसके बाद में छत पे जद पहुंच जाएंगे तो पता चलेगा कि जिस चीज की यह सीढ़ी बनी हुई है उसी चीज का उसी चीज के हम बने हुए हैं उसी चीज का तो सब कुछ बना हुआ है अर्थात कि ईश्वर दृष्टि ईश्वर साक्षात्कार होने के बाद में एक सम दृष्टि प्रकट होती है और उसके बाद में दूसरी सीढ़ी से हम सामने वाली सीढ़ी से इती इती करके नीचे जमीन पर आते हैं तो यह साधक की साधना है नेति नेति अर्थात कि जगत का जगत के साथ में जुड़ी हुई वासना एं भोग इच्छाएं यह अपने जितने भी नेगेटिव पेजस है उन सबको एक के बाद एक त्याग करके हम ईश्वर की ओर आगे बढ़ते हैं ईश्वर का साक्षात्कार होता है और फिर वही ईश्वर हमको आदेश देते हैं ई भावो मुखे था ठाकुर को जैसे मां ने कहा था कि इस कॉन्शसनेस और सुपर कॉन्शसनेस की बॉर्डर लाइन पर रहना तो उस आदेश को प्राप्त करके साधक फिर जगत कल्याण के इस कार्य में रत होता है किंतु उसके बाद में ठाकुर कहते हैं ना छले कोनो आठ था केना अर्थात कि जो बच्चा है उसका कोई ये ये नहीं होता माने अटैचमेंट किसी चीज से नहीं होता बच्चा यह नहीं सोचता कि ये मेरी चीज है या यह उसकी चीज है कोई उसका खिलौना भी ले ले हां उसको चिल्लाएगा यदि खिलौने के साथ में वह खेल रहा है तो किंतु यदि खिलौने के साथ में खेल के उसने रख दिया है और कोई ले जाएगा तो वो ऐसा नहीं सोचेगा कि ये खिलौना मेरे मेरे घर का है मेरे फैमिली का है और दूसरा ले जा रहा है तो ये चोरी है उसके मन में यह पोजिशन का भाव नहीं है तो मतलब जब वो जमीन पर वापस आएंगे इती इती करके पृथ्वी पर वापस आएंगे तो ये परमहंस की तरह रहेंगे इच्छा करके कुछ नहीं कर रहे हैं ये सोच करके प्लान करके जगत कल्याण नहीं कर रहा है एक बार निवेदिता ने स्वामी जी को बताया था कि हमको कोई प्लान बनाना चाहिए प्लान ऑफ कैंपेन हमको एक पॉलिसी बनानी चाहिए दे एक्ट वर्ड शी यूज दैट वी नीड ए पॉलिसी फॉर अवर मिशन फॉर अवर वर्क तो स्वामी जी ने इमीडिएट उत्तर दिया नो पॉलिसी देयर शुड बी नो पॉलिसी ऑफ राम कृष्ण मिशन यह सहज रूप से जो होता है वह होना है हालांकि इस सेंटेंस में भी बहुत सारे कंट्रा इक्स है स्वामी जी ने खुद ने अपना एक प्रवचन दिया है माय प्लान ऑफ कैंपेन वगैरह और यह पॉलिसी स्टेटमेंट्स तो इस तरह के पत्रों में उन्होंने कितने सारे दे दिए हैं और भी कुछ पत्र है वहां पे तो यहां तक मैंने इतना डिटेल इंस्ट्रक्शन देते हैं कि आपका जो पानी भी है उसको भी उबाल करके पीना है मठ में फिल्टर होना चाहिए इस तरह से फिल्टर करके पानी पियो वरना तो बार-बार बीमार हो जाओगे इस तरह से पॉइंट बाय पॉइंट एकदम माइक्रो मैनेज करने के लिए मठ को उन्होंने यह सब इंस्ट्रक्शंस दिए हैं किंतु वहां पे पॉलिसी का एक डिफरेंट एस्पेक्ट होता है निवेदिता जिस तरह से सोच रही थी कि उसका और स्वामी जी का माने वो एक बहुत लंबा एक डिस्कशन है किंतु अभी फिलहाल अपना यह डिस्कशन छूट ना जाए इसके लिए यहां पर वापस आते हैं तो कंट्रक्शन बिटवीन व्ट ठाकुर सेज एंड व्ट स्वामी जी सेज इसका रेजोल्यूशन क्या है देखिए इसका रेजोल्यूशन इजी नहीं है हम सोचते रहते हैं सोचते रहते हैं अच्छी-अच्छी बातें भी कर लेंगे अपने ही लिटरेचर में आपको बहुत सारा इसका सोल्यूशन मिल जाएगा किंतु भीतर से कन्वीन होना चाहिए अभी यहां पर मैं एक दो लोगों के साथ में बात कर रहा था किसी ने मुझे प्रश्न किया कि यह जो हम कर्म कर रहे हैं कर्म का क्या तात्पर्य है कर्म का क्या फायदा है हम लोगों को तो ऐसा लगता ही नहीं है कि यह सब काम करके ईश्वर की ओर जा रहे हैं हमको तो ऐसा ही लगता है कि और ज्यादा से ज्यादा माया में फंस रहे हैं क्योंकि यहां पर तो एक के बाद एक अभी जिस तरह से अभी अभी ये जो क्या है कि ये एक समय ही एक ऐसा है सेलिब्रेशंस और फेस्टिवल का एक के बाद एक सभी सेंटर्स की यह 50 एवर्स 100 एनिवर्सरी ऐसा सब कुछ ये अभी सेलिब्रेशन हो रहा है तो अभी देखिए कि अभी ये कोयंबतूर का भी यह सेलिब्रेशन हुआ राजकोट का भी अभी सामने आ रहा है 2027 में 100 एनिवर्सरी सेलिब्रेट होगी तो अभी यहां पर वही अभी से प्लानिंग चल रहा है कि अभी चलो सेलिब्रेशन वगैरह करना तो मन में प्रश्न होता है कि हम लोग यह सब जो कर रहे हैं उसमें एक्चुअली कर्मयोग होता है कि नहीं होता है ईश्वर की ओर हम जाते ही नहीं जाते तो दिस ऑ डाउट इज वैलिड यदि प्रश्न नहीं करेंगे तो हम अपना सेल्फ एनालाइज एनालिसिस नहीं करेंगे और जब तक यह सेल्फ एनालिसिस नहीं होता तब तक हम लोग अपना साधक जीवन यह साधना का जीवन हमारा साधना की यात्रा वहां पर हम कितने आगे बढ़ रहे हैं आगे बढ़ भी रहे हैं कि रिग्रेशन हो रहा है प्रोग्रेशन नहीं होके रिग्रेशन भी कभी-कभी हो जाता है तो हम रिग्रेशन की ओर तो नहीं जा रहे यह सोचना जरूरी है देखिए ये जो वेस्टर्न साइकोलॉजी है और ये ईस्टर्न साइकोलॉजी इसमें दो बहुत बड़े डिफरेंस है वेस्टर्न साइकोलॉजी में आप पेशेंट को साइको एनालिसिस करते हैं पेशेंट को साइको एनालाइज करते हैं और ईस्टर्न साइकोलॉजी में हम अपने को खुद को साइको एनालाइज करते हैं हम अपने खुद के भीतर में स्काल्पेल डाल कर के यह डिसेक्शन करके अपने मन कीय जो यंस की तरह ये प्याज की तरह जितने भी ले से एक के बाद एक सभी लेयर्स को काट करके ओपन करते हैं और देखते हैं कि हमारे भीतर में क्या है यह जो वेस्टर्न पूरा जो थिंकिंग है कि अपने को जीरो कर देना और यह विश्व को ही इतना प्राधान्य दे देना तो इस वजह से इन्होंने यह नेचुरल साइंस नेचुरल आर्ट्स यह नेचुरल लर्निंग यह सब तो इंजीनियरिंग इंडस्ट्रियल इजेशन यह सब तो ये एक्सप्लोरेशन यह मून मिशन ये सब तो स्पेस साइंस ये सब तो उन्होंने बहुत सारा डेवलप कर दिया किंतु वो अपने को खुद को भूल गए हैं जो रोल ऑफ कॉन्शसनेस है अंडरलाइन दिस ऑल नॉलेज इस बात को वे लोग समझ नहीं पा रहे जिसको जिसका महात्म्य पता है वह उसी के ऊपर में चिंतन करेगा उसी को वह समझने का प्रयास करेगा तो उनकी दृष्टि से यह जो बाह्य जगत है इतना महत्त्वपूर्ण है कि उन्होंने अपनी पूरी सिविलाइजेशन की जो डायरेक्शन है बाह्य जगत को समझने में बिता दी और भारत का जो एक दूसरी डायरेक्शन जो हमने लिप पसंद की है दूसरी डायरेक्शन में चलना हमने ठीक किया है कि हमारे ही भीतर में जो कॉन्शसनेस है द कॉन्शियस कॉम्प्लेक्शन असनेस इज फार ग्रेटर देन एनीथिंग दैट यू विल फाइंड इन दिस कॉस्मो माने यह लिटरली सही है मेटाफोरिकली तो छोड़ ही दीजिए ये अपना जो ब्रेन है ब्रेन एक डिवाइस है इसके भीतर में साइनेप्टिक के बीच के कनेक्शंस दिस नंबर्स ऑफ साइप्स गोज इन ट्रिलियंस पूरे ये जो मिल्की वे गैलेक्सी में जितने सितारे नहीं है जितने तारे नहीं है उतने कनेक्शंस तो हमारे ब्रेन सेल्स के भीतर में आपस में है दैट मींस यह ब्रेन इट सेल्फ इज सच ए कॉम्प्लिकेटेड डिवाइस एंड दिस ब्रेन होस्ट कॉशसनेस कॉन्शसनेस इस सच्चे माने इसके बारे में हम सोचना शुरू करेंगे समझना शुरू करेंगे समथिंग सच ए कॉम्प्लिकेटेड मशीन सच ए कॉम्प्लिकेटेड डिवाइस कि इसको एनालाइज करते करते इसको डिसेक्ट करते करते आपको कितने जन्म जन्मांतर चले जाएंगे तो दिस इज द स्टडी ऑफ वेदांता एमफसिस ऑन द स्टडी ऑफ कॉन्शसनेस तो व्हाट एवर अपना जो मेन पॉइंट था अगेन रिटर्निंग बैक टू दैट दिस कंट्रक्शन तो ये कंट्रक्शन का ऐसे सहज उकेल संभव नहीं है स्टैंडर्ड मने आंसर हम बहुत सारे दे सकते हैं कि जिस ईश्वर की आराधना हम कर रहे हैं मंदिर के भीतर में या तो फिर हमारे हृदय के भीतर में वही ईश्वर तो सभी के भीतर में है और यदि मैं दूसरों का कष्ट नेगलेक्ट करके अपने ही भीतर हृदय के भीतर में बसे हुए या तो मंदिर में बस हुए ईश्वर की आराधना करूंगा तो यह क्या सेल्फिश स नहीं हो जाएगा तो सेल्फिश नेस तो सबसे बड़ा अंतराय है आध्यात्मिक जीवन में तो इस सेल्फिश नेस को हमको दूर करना है उसके बाद में ही हम लोग सही सही अधिकारी होंगे यह मंदिर में विराजित ईश्वर की आराधना करने के लिए या तो हृदय में स्थित आत्मन की पूजा करने के लिए या तो फिर आत्मन की उसके ऊपर में मन को एकाग्र करने के लिए तो ये सेल्फिश इज अनदर ऑफ दी ऑब्स्ट कल्स ये इस ऑब्स्ट कल्स को हटाना है और इसके जैसे कि ये अ काम है कामिनी और कांचन जैसे कि ठाकुर बार-बार कहते हैं कि कामिनी और कांचन अर्थात कि ये विषय तृष्णा ये विषय तृष्णा हों से हमको जब तक मुक्ति नहीं मिलती ईश्वर हमारे हाथ में नहीं आएंगे ये बार-बार जो ठाकुर उदाहरण देते रहते हैं कि वो घट है एक उसके भीतर में नीचे में एक छेद है अभी उसके भीतर में आप जितना ही पानी डालते रहे वो छेत तो जब तक आप वो भरेगा नहीं तब तक पानी डालने से वो वहां से वो जल तो निकलता ही रहेगा तो इस तरह से ठाकुर तो उदाहरण हमको देते हैं कि विषय वासनाओं से मुक्त नहीं होकर के हम ईश्वर की ओर आगे नहीं बढ़ सकते तो ये विषय वासनाओं के साथ-साथ में ही एक सेल्फिश नेस भी एक जुड़ा हुआ है ये सेल्फिश नेस इतना एक स्ट्रांग ये अविद्या है ना जैसे योगशास्त्र की दृष्टि से जद देखेंगे तो एकदम स्पष्ट हो जाता है ये बात कि अविद्या अस्मिता राग द्वेष और अभिनिवेश यानी कि सर्वप्रथम तो अविद्या आती है अविद्या क्या है कि मैं यह आत्मन नहीं हूं मैं यह शरीर हूं यह बोलकर के सबसे पहले तो अविद्या प्रकट होती है तो अविद्या से दूसरा प्रकट होता है अस्मिता अस्मिता क्या है कि जदिया तो मैं यह शरीर हूं यह अज्ञान जैसे ही हो गया वैसे ही शरीर के साथ में आइडेंटिफिकेशन होता है शरीर के ऊपर में मोह प्रकट होता है यह हो गई अस्मिता तो फिर अस्मिता से अभी आएगा राग द्वेष और अभिनिवेश राग अर्थात कि जो हमको प्रिय चीज है उसके ऊपर में हमारा प्रेम द्वेष अर्थात कि जो हमको अच्छा नहीं लगता उसके ऊपर में क्रोध या तो वितृष्णा और अभिनिवेश अर्थात कि मृत्यु का भय किंतु यह राग द्वेष और अभिनिवेश प्रिय चीजों के ऊपर में अपनी आसक्ति अप्रिय चीजों के ऊपर में विरक्ति और मृत्यु का भय ये तीनों चीजें कब आती है जब मेरा इस देह के साथ में आइडेंटिफिकेशन होता है जैसे ही इस देह से मेरा आइडेंटिफिकेशन चला गया जैसे ही इस आत्मन की ओर मेरा मुह मेरा मेरी नजर मेरी दृष्टि मेरा आइडेंटिफिकेशन मुड़ा वैसे ही मैं आध्यात्म की ओर मने आध्यात्म की ओर आगे बढ़ना क्या एक्चुअली वही तो आध्यात्मिक सर्वोच्च उपलब्धि हो जाएगी वहीं पर हो जाएगी तो देह से अपनी आसक्ति को हटाना है देह की ऊपर की आसक्ति से ही धीरे-धीरे ये इंद्रियों के जो भोग है इंद्रियों के विषय है वो दूर होना शुरू होंगे तो यहीं पे यह जो सेल्फिश नेस जो है वही फंडामेंटल है ये जितने भी क्लेश इसको पंच क्लेश कहते हैं योग की भाषा में तो यह पंच क्लेश का फाउंडेशन ही है ये सेल्फिश तो जब तक यह सेल्फिश नहीं जाएगी कामिनी कांचन के ऊपर से मन नहीं जाएगा और जब तक विषय के ऊपर में अपनी आसक्ति है तब तक हम ईश्वर की ओर आगे नहीं बढ़ पाएंगे यानी कि देखिए कि एकदम हाईएस्ट वेदांत से लेकर के साधना की एकदम जिसको कहते हैं ना निट ग्रिटींग शब्द है अर्थात कि एकदम साधना की डिटेल में जाएंगे यानी एकदम ओवरऑल फिलोसोफी बर्डस आई व्यू और एकदम निट ग्रीटी अर्थात की डे टू डे डिटेल पूरा स्पेक्ट्रम आप ले लीजिए फिलोसोफी का और आध्यात्मिक थिंकिंग का पूरे स्पेक्ट्रम में प्रत्येक टॉप पर प्रत्येक पॉइंट पर आप जहां पर है उस पॉइंट की दृष्टि से आपको इस प्रश्न का उत्तर इस पैराडॉक्स का सोल्यूशन मिल सकता है कि यह पैराडॉक्स यहां पर क्यों है सबसे पहले इसका और एक मैंने एक दृष्टिकोण से इसको देखना है मैंने एक वेरी इंपॉर्टेंट इसका यह है कि एक तो है कि पहले आप साधक किस पोजीशन में है किस स्टेज में है अपनी साधना के वो तमस में है ना कि रजस में है ना कि सत्व में है यदि साधक तमस में है तो उसके लिए सर्वप्रथम चाहिए रजस यह जो निवेदिता ने जो स्वामी जी को कहा था कि भारत में कोई चोरी भी नहीं करता स्वामी जी कहते हैं काश कोई चोर होता कोई एक आदमी एक लड़का स्वामी जी के पास आया मुझे साधु होना है तो स्वामी जी ने कहा कि भगवान बुद्ध के पास में वो मुझे त्याग करना है सन्यासी बनना है तो स्वामी जी ने उत्तर दिया भगवान बुद्ध के पास में राज्य था त्याग करने के लिए तुम्हारे पास में त्याग करने के लिए क्या है तीसरा एक आदमी आया बोलते हैं स्वामी जी मुझे भक्ति भाव का उपदेश दे दीजिए स्वामी जी कहते हैं क्या तुम चोरी कर सकते हो क्या तुम डकेट डाल सकते हो तो मैंने वो तो बेचारा एकदम डर गया क्या पूछ रहा हूं क्या उत्तर मिल रहा है तो यदि चोरी नहीं कर पाओगे डकती नहीं डाल पाओगे ये जो भीतर में एक क्षात्र वीर्य तुम प्रकट नहीं कर पाओगे तो ब्रह्म तेज कहां से आएगा ये तो दोनों तो एक दूसरे के पूरक है एक सिक्के की दो बाजू है तो एक नहीं होगा तो दूसरा भी नहीं आएगा अर्थात कि सबसे पहले तो तमस से रजस में जाना है क्षात्र वीर्य का यह जो स्वामी जी कहते हैं ना कि शक्ति थाक लेही विकास दिखाते होवे शक्ति रहने से ही विकास दिखाना होगा वरना तो फिर इस जगत में नहीं चलेगा सो सबसे पहले तमस में से रजस में आना है फिर रजस में आकर के निष्काम कर्मा और साधना करके धीरे-धीरे सत्व में जाना है यदि हम रजस में है तो ठाकुर के उपदेश हमको अप्लाई होते हैं किंतु जब तक हम तमस में है तो स्वामी जी के उपदेशों का सहारा लेकर के मार्गदर्शन लेकर के सबसे पहले तो रजस में जाना होगा उसके बाद में तो हम सत्व की ओर जाएंगे ये स्वामी जी का एक सुंदर उदा उरण है ना पहले मैं बार-बार इसको बताता रहता हूं ये सिलोन के बारे में शायद स्वामी जी ने इसको श्रीलंका में ही दिया होगा उस समय का सीलोन तो ये बुद्धिज्म बुद्धिज्म है ना अहिंसा अहिंसा माने अहिंसा परमो धर्म तो स्वामी जी उदाहरण देते हैं कि इस तरह से अहिंसा परमो धर्म के घर में एक दिन रात को चोरी हुई माने अहिंसा परमो धर्म माने इस तरह से स्वामी जी इसको एक शेठ जी के घर में ऐसा नहीं कहके स्वामी जी की जो बात करने की स्टाइल है ना कि अहिंसा परमो धर्म के घर पर एक दिन चोरी हुई अर्थात कि एक ऐसे आदमी के घर पे जो कि अहिंसा परमो धर्म बोलता रहता है अच्छा ठीक है चोरी हुई चोर भी पकड़ा गया उसके लड़के उसकी पिटाई भी कर रहे हैं बेदम पिटाई कर रहे हैं वो सडन वो शेठ जी की नींद खुल गई बाहर आए देखा अरे अरे क्या कर रहे हो क्या कर रहे हो अहिंसा हम लोग तो अहिंसा के पालक है तो लड़के भी आश्चर्य चकित हो गए अरे क्या चोर को छोड़ दिया जाए क्या ये तो ठीक नहीं होगा तो शेठ जी एकदम बड़ा अहिंसक उत्तर देते हैं अहिंसक सोल्यूशन निकाल उसको एक बोरी में बांध दो और समुंदर में फेंक दो अपने से उसका ठिकाना आ जाएगा हमको कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ेगी यह हिंसा किसने की तो समुंदर ने की ये जो श ठाकुर की वो कहानी है कि एक ब्राह्मण ने एक गाय आ गई उसके गार्डन में अभी गार्डन बड़ा प्रिय था गाय खा रही है तो गुस्से से गाय को एक लाठी मार दी गाय मर गई तो अभी तो गौ हत्या का पाप लगेगा क्या करें क्या करें तो उसने ठीक कर लिया कि मैंने तो हत्या नहीं की हाथ ने हत्या की हाथ के देवता है इंद्र अर्थात ्र ने हत्या की है अभी ये गो हत्या का पाप इंद्र के पास गया इंद्र बेचारा टेंशन में आ गया अभी इसका क्या सोल्यूशन निकाला जाए तो वो भी ब चालक थे ना ये लोग भी जब वो इंद्रासन पर बैठा है तो वैसे ही नहीं बैठा होगा वो सब वो चालाकी उसको सब पता होगी तो वो आया ब्राह्मण का वेश धर के ब्राह्मण के जो जिसका गार्डन था उसके साथ बात कर रहा है पूछ रहा है अरे ये इतना अच्छा गार्डन है ये है वो है तो ब्राह्मण तो बड़ा खुश हो गया प्रशंसा करता है तो अच्छा लगता है ना तो बता रहा है घूम घूम करके ये ये पौधा मैंने अभी यहां पर डाला ये पौधा इतना खुश होकर के अपने गार्डन के बारे में सब कुछ बता रहे वो बार-बार कह रहा है ये मैंने किया है मैंने किया है मैंने किया है तो आखिर में वो जो दूसरा ब्राह्मण वो वो अपना इंद्र का असली स्वरूप धारण किया और बोला अरे पाजी तू जब ब्रह्मा जो गो हत्या का करने की बात थी तब इंद्र ने किया तुम्हारे हाथ ने किया और ये गार्डन अच्छा तुम कर रहे हो ये किस तरह का नाटक कर रहा है और जैसे ही इसने ऐसा बोला तो वो पाप भी था वो समझ गया कि ये ब्राह्मण जो वो इस तरह से मूर्ख बना रहा है तो उसके सर पर जाकर वो पाप सवार हो गया तो अभी क्या है कि अल्टीमेटली जो हम बात कर रहे थे कि ये तमस में से सबसे पहले रजस में जाना है और एक बार हम जब रजस में जाएंगे तब कहीं जाकर के यह ठाकुर का जो उपदेश है वो हमको अप्लाई होगा तो इसीलिए अच्छा यही एक बात है कोई ऐसा बोलेंगे कि अच्छा ठीक है जो कर्म योग करके एक बार हम रजस प्राप्त कर ले तो क्या कर्म योग समाप्त कर देना नहीं ऐसा भी नहीं है क्योंकि देखिए कि ठाकुर खुद कहते हैं कि जो हम लोग दिन प्रतिदिन कर्मा तो करते ही रहते हैं जो आहार ग्रहण करते हैं वह भी कर्मा है जो हम सांस लेते हैं वह भी कर्मा है तो जद कर्म करना ही है तो साथ-साथ में शुभ कर्म क्यों नहीं कर दिया जाए सिर्फ हम अपने खुद के लिए सेल्फिश कर्म ही क्यों करें तो इसके लिए माने कर्म तो हमको इवन रजस में भी जाएंगे करना है सत्व में भी जाएंगे करना है कर्म का स्वरूप सब समय चेंज होता रहेगा ऐसा कभी नहीं होगा कि कर्म बंद हो जाएगा उसका स्वरूप एक स्वरूप से दूसरे स्वरूप में दूसरे से तीसरे स्वरूप में वह मेटा मोरफो होता रहेगा किंतु कर्म तो हमेशा रहेगा ही रहेगा तो बेटर है कि हम लोग कर्म का विज्ञान समझ ले बेटर है कि हम अपनी कॉन्शसनेस ये साइंस ऑफ कॉन्शसनेस समझ ले फिर उसके अनुसार हम काम करें रदर देन कि हवा हवा में काम करके फिर हम खुद पछताए तो दैट इज व्हाई स्वामी जी यह जो कहते हैं वो जैसे हमारी बात हो रही थी कि पूरा एक स्पेक्ट्रम है एक डे टू डे साधना की ट ग्रेटी से लेकर के एक ईगल आई स्काई वो बर्ड्स आई व्यू है साधना का ये पूरे स्पेक्ट्रम के ऊपर में जिस दृष्टिकोण से देखें उस दृष्टिकोण से आप इस पैराडॉक्स का सॉल्यूशन ला सकते हैं इस पैराडॉक्स के बारे में बहुत सारे प्रश्न हो सकते हैं किंतु सब समय अभी दूसरा क्या है पता है कि ऐसा नहीं है कि इसका सब समय उत्तर आपको मिल भी जाएगा अकॉर्डिंग टू योर सेटिस्फैक्ट्रिली सेज मने स्टार्टिंग स्टेटमेंट स्वामी जी फेंकता है ना कि ये वेस्टर्न थियोलॉजी गोज फॉर यूनिफॉर्म एंड वेदांत गोज फॉर कस्टमाइजेशन अर्थात कि प्रत्येक व्यक्ति का एक वेदांत होना चाहिए देयर इज वेदांत फॉर मी देयर इज वेदांत फॉर यू देर इज वेदांत फॉर एवरीवन इस पृथ्वी पर जितने भी लोग हैं ईच वन ऑफ हैज हिज ओन वेदांत ईच वन ऑफ देम हैज टू हैव हिज ओन वेदांत वन स्टंड वेदांत विल नॉट फिट एवरीवन तो ये स्वामी जी का अनदर ऑफ स्टार्टिंग स्टेटमेंट तो मैं मुझे मेरा एक उत्तर मिला है आपको एक्सप्लोर करके आपकी जो प्रकृति आपकी जो एक डायरेक्शन ऑफ इंटेलेक्चुअल जर्नी जिस डायरेक्शन में जा रही है उसके अनुसार आपको एक उत्तर मिलना है वी ऑल हैव टू फाइंड अवर ओन सॉल्यूशन अवर ओन आंसर जब तक हमको अपना खुद का उत्तर नहीं मिलता दूसरों के उत्तर के भरोसे हम ज्यादा दूर नहीं जा पाएंगे यह साधना भी एक ऐसी चीज है ना कि अ मैं जब यहां पे मंदिर में कभी-कभी देखता हूं कि कुछ-कुछ लोग भक्त बैठे होते हैं मंदिर में बैठ कर के जब भी आते हैं मंदिर आश्रम में आते हैं सीधा मंदिर में जाते हैं ठाकुर को प्रणाम करके वहां पर लंबा टाइम बैठे रहते हैं जप करते रहते हैं या तो आंख बंद करके सिर्फ बैठे भी रहते होंगे जो भी है किंतु अपना समय मंदिर में बिताते हैं फिर कोई कोई होता है कि पूरा आश्रम में घूम के कोई साधु कहां पर है उसके साथ बात करते हैं कौन कहां पर है क्या हो रहा है वह सब अवलोकन करते हैं ऑब्जर्व करते हैं तो देखिए कि आप यहां पर आते हैं मैंने इस तरह से मैं आश्रम की बात नहीं कर रहा किंतु ईश्वर के पास जब आप आते हैं तो ईश्वर का जो ऐश्वर्य है उसके अवलोकन करने के लिए आते हैं उसका एनालिसिस करने के लिए आते हैं ना कि ईश्वर का जो हृदय है प्रेममय हृदय उसके समीप होने के लिए आप आते हैं यानी ये एक हमको समझना है बहुत लोग ईश्वर के पास तो आते हैं किंतु यह ईश्वर का जो ऐश्वर्य है चारों ओर यह मंदिर की चारों ओर इतना बड़ा आश्रम है आश्रम में इतनी सारी एक्टिविटीज हो रही है इतने सारे साधु है इतने सारे भक्त वॉलंटस आते हैं कि यदि आप यहां पर आकर के और कुछ ना करें दो-तीन लोगों के साथ में गप भी लगा लेंगे तो आपका एक एक घंटा दो घंटा आराम से निकल जाएगा दिन प्रतिदिन यहां पे कोई ना कोई एक्टिविटी होती ही है पार्टिसिपेट कीजिए वॉलंटिज्म दिर में जाकर के आंख बंद करके शांत होकर के स्थिर होकर के बैठना दैट इज रियली अ बिग डील माने बहुत माने धीरे-धीरे ऐसा होता है ना कि ऐसे डिवटी जो कि मंदिर में जाकर समय बिताते हैं उनकी संख्या कम कम होते होते फिर धीरे-धीरे ऐसे डिवोटा जो कि आश्रम में मंदिर की चारों और अपना समय बिताते हैं ज्यादा समय ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जाती है तो यह वी हैव टू थिंक अबाउट अवर ओन सेल्फ कि हमको किस डायरेक्शन में जाना है ऐसा नहीं है कि आप मंदिर में आश्रम में आते हैं तो साधुओं से बात मत कीजिए एक्टिविटी में पार्टिसिपेट मत कीजिए वो तो करना ही करना है वरना तो आश्रम में आने का फायदा क्या हुआ मंदिर तो आप अपने घर में भी बना कर के वहीं पर भी बैठ सकते हैं आश्रम में आने का कुछ तो बेनिफिट होना चाहिए प्रसाद मिलेगा तब तो कहीं जाकर के लगेगा कि आश्रम में आए हैं तो वो सब तो है ही है किंतु साथ-साथ में एक होना चाहिए कि नहीं ठाकुर के पास जाकर के इक्वल अमाउंट ऑफ टाइम मैं बाहर में मंदिर के बाहर जितना टाइम बिताता हूं इक्वल अमाउंट ऑफ टाइम आई शुड स्पेंड इनसाइड द टेंपल बाहर में जद आधा घंटा बिताया आश्रम के भीतर में तो वही आधा घंटा मुझे मंदिर में भी बिताना है तभी यह अपना लाइफ एक बैलेंस होगा तभी अपनी साधना हम अपने को एनालाइज करके करके साधना पर ठीक चल रहे हैं कि नहीं व पता चलेगा कंट्रा इक्स बहुत सारे लेवल पे है सभी लेवल प एक-एक अलग-अलग उत्तर मिल सकता है और साथ-साथ में ही हम सबको अपना-अपना उत्तर अपने-अपने से उसको खोज करके निकाल आगे थोड़ा पढ़ता हूं तोमार भालो कोरले हमार भलो हो तुम्हारा भलाई करने से ही मेरी भलाई होगी दूसरा आर उपाय नहीं एक के बारे नहीं दूसरा उपाय नहीं है एक मने बिल्कुल भी नहीं है अभी एक दूसरा नया टॉपिक स्वामी जी यहां से स्टार्ट कर रहे हैं बिल्कुल मैंने यह परोपकार के बारे में बता रहे थे अभी एक दूसरा टॉपिक है जी क्या कहते हैं हे भगवान हे भगवान अरे भगवान हेन करवन तेन करवे और तुम बसे बसे की कर तुम यह जद बैठे बैठे बोलते हो कि हे भगवान हे भगवान तो स्वामी जी कहते हैं कि अरे भगवान यह करेंगे वो करेंगे ऐसी आशा रख के बैठे हो तो तुम बैठे बैठे क्या करोगे तही भगवान आमी भगवान मानुष भगवान दुनियाते शप करछ तुम भगवान हो मैं भगवान हूं यह मनुष्य रूपी ईश्वर दुनिया में सब कुछ कर रहे हैं अबार भगवान की गाछ परर बसे माने भगवान क्या नहीं तो क्या पेड़ के ऊपर में बैठे हुए हैं देखिए यह एक आत्म श्रद्धा के बारे में तमस में है तो हम लोग तो तमस में से निकलने के लिए दो प्रॉपर्टीज चाहिए या यूजिंग मॉडर्न लैंग्वेज मने किसी भी ऑब्जेक्ट की प्रॉपर्टीज होती है तो मने तमस में से निकलने के लिए दो प्रॉपर्टीज या तो दो कैरेक्टरिस्टिक या तो दो लाक्षणिक काए चाहिए एक तो है कि निस्वार्थ ता दूसरा है यह आत्म श्रद्धा जब तक आत्म श्रद्धा नहीं आएगी हम लोग अपने जीवन में कुछ भी नहीं कर पाएंगे ठाकुर का वह जो उदाहरण है दो मित्र चल रहे थे सामने से शेर आ गया तो एक मित्र दूसरे मित्र को बोलता है कि चलो इस पेड़ के ऊपर में एक मित्र कहता है कि चलो हम भगवान को पुकारते हैं तो दूसरा कहता है अरे भगवान को बिना मतलब क्या कष्ट देना चलो पेड़ के ऊपर में चढ़ जाते हैं हालांकि यह शेर भी पेड़ के ऊपर में चढ़ सकता है तो वो पीछे आएगा तो क्या करेंगे तो भगवान ही बचाएंगे बाद में किंतु य जस्ट एक उपमा हमेशा एक देशी होती है माने उपमा का एक ही पार्ट लेना होता है उसको बहुत ज्यादा एनालिसिस नहीं करना होता तो फिर तो ये जो आत्म श्रद्धा है नचिकेता के भीतर में जिस तरह से आत्म श्रद्धा थी यम के पास जाकर के अपने पिताजी के लिए क्षमा प्रार्थना आशीर्वाद लेकर के आ गया वरना तो जिस तरह की गाय जो कि हड्डी पसली एक हो गई है पूरा दूध द मने उसका चला गया है सूख गया है ऐसी गायों को जब अपने यज्ञ में वो ऑफर करेंगे माने दान करेंगे तो भगवान यम तो नाराज होने ही वाले हैं तो इसलिए अपने पिताजी पे कोई मने उनको कोई क्षति ना हो इसके लिए भगवान यम के पास जाकर के पिताजी के लिए क्षमा प्रार्थना वरदान लेकर के आ गया तो इस तरह से नचिकेता की तरह यह कठोपनिषद स्वामी जी का वन ऑफ दी मोस्ट फेवरेट उपनिषद तो इस तरह से आत्म श्रद्धा चाहिए यह जो कलकाता में प्लेग आ गया था तो स्वामी जी ने यह जो पेंपलेट डिस्ट्रीब्यूटर में क्या लिखा था अभी ही अभी ही अर्थात कि अभय अभय बिल्कुल डरो मत डरो मत ये भीतर से आत्म श्रद्धा होगी तो अपनी सिविलाइजेशन पर आए हुए इस तरह के कितने ही मतलब यह जो विपत्ति है यह जो जितने भी ये क्राइसिस है इस को हम पार कर जाएंगे तो दैट इज व्हाट स्वामी जी वांटेड फ्रॉम अस कि भीतर से प्रचंड आत्म श्रद्धा चाहिए और ऐसा नहीं है यह जो आगे में कहा है ना कि दीना हीना भाव के दूर करे दे दीन हीन भाव कि मैं कुछ नहीं हूं मैं कुछ नहीं कर सकता यह बिल्कुल दूर कर देना है भीतर से यदि एक प्रचंड आत्मविश्वास नहीं आएगा तो हम इस तमस में से रजस में कभी भी नहीं आ पाएंगे तो ये तमस में से रजस में जाने के लिए स्वामी जी जी की दो फार्मूला सर्वप्रथम तो सेल्फलेसनेस दूसरा है आत्म श्रद्धा तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु