Prayer
देखिए यह जो जाहिर में गेरुआ पहनना यह तो भारत में बंगाल में कोलकाता में तो मुश्किल था ही था। आप इमेजिन करके देख लीजिए कि अमेरिका में कितना मुश्किल होगा जब स्वामी जी ये गेरुआ माने एकदम विविड कलर का ये ऑरेंज ये जो ड्रेस है पहन करके वो न्यूयॉर्क की गलियों में चलते थे। तो लोग इनको किस दृष्टि से देखते होंगे। मिस एलन वोल्लो यह जो स्वामी जी का स्वामी जी की यह जो थाउजेंड आइलैंड पार्क में स्वामी जी के क्लास है क्लास को जिसने लिपिबद्ध किया है और वह अमर हो गई है इंस्पायर्ड टॉक जिसने लिपिबद्ध किया वही सारा एलन व्ल्डो तो वो एक हमको बताती है कहानी कि स्वामी जी जब न्यूयॉर्क में किसी कार्य के लिए बाहर जाते तो वो भी उनके साथ-साथ में जाती अभी देखिए कि स्वामी जी एकदम भड़क कलर के ये गेरवा वस्त्र पहन करके क्रिमजन कलर का एक वस्त्र पहन करके कोट ओवरकोट पहन करके वहां पे न्यूयॉर्क के रास्ते पर चल रहे हैं और सर के ऊपर में वो टर्बन बांधी हुई है पगड़ी बांधी हुई है तो सभी लोग उनके सामने इस तरह से देखते हैं कि जैसे यह सर्कस में से कहीं निकल के आया है ना कि यह कौन है? तो ऐसा करके लोग सब उनके सामने देखते हैं। तब यह मिस व्ल्डो लिखती है कि स्वामी जी के साथ में चलना वो भी एक बहुत बड़ी बहादुरी का काम था। सब लोग मेरी ओर इस तरह से देखेंगे कि यह एक काला आदमी है। लाल कलर के कपड़े पहन के जा रहा है। साथ में अमेरिकन औरत उसके साथ में क्यों जा रही है? क्या वो इसका किडनैप करके जा रहा है ना कि क्या हो रहा है? तो लोगों के मन में यह प्रश्न होता तो स्वामी जी को किंतु कोई संकोच नहीं, कोई डर नहीं। किंतु ये मिस वर्ल्डो को थोड़ा सा ये टेंशन हो जाता था। फिर उन्होंने स्वामी जी को बहुत समझाया कि स्वामी जी जब हम बाहर रास्ते पे जाते हैं तो एटलीस्ट आप इस तरह के विविध कलर का क्रिमसन कलर का कोट मत पहनिए। थोड़ा सा नॉर्मल क्लोथ्स पहनिए। तो स्वामी जी पहले तो सुनते ही नहीं थे। क्योंकि वही वैराग्य की अग्नि तपस्या, साधन भजन का जो प्रवाह है उनके मन के भीतर में इतना दृढ़ीभूत हो गया है कि कोलकाता की गलियों में भी जाते थे। लोग मजाक करते थे, सुनते नहीं थे। तो कोलकाता में लोग मजाक करेंगे तो क्यों सुनेंगे? किंतु फिर जब मिस होल्डो ने बार-बार विनती की तो स्वामी जी ने फिर नॉर्मल कलर के कपड़े जो होते हैं रेगुलर क्लॉथ जो कि अमेरिकन लोग पहनते हैं ऐसे कुछ खरीदे और जब गलियों में शेरियों में बाहर जाना है तो इस तरह के कपड़े पहनना शुरू किया। ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का लाइफ उसका हम स्टडी कर रहे थे ठाकुर की महासमाधि के बाद के दिनों की घटना है कि किस तरह से रामकृष्ण संघ का जो फाउंडेशन जो डाला गया है रामकृष्ण संघ की जो नींव स्थापित हुई है उसके पीछे कौन-कौन सी घटनाएं हैं तो एक घटना हमने ऑलरेडी देख ली कि किस तरह से सुरेश बाबू ने ठाकुर ने जब उनको आकर के दर्शन दिया तो वह नरेंद्र के पास में आए और नरेंद्र को कहा कि मैं जितना रुपया काशीपुर में प्रतिमाह देता था ठाकुर की सेवा के लिए उतना ही मैं यह संघ की स्थापना के लिए जो मठ के लिए मकान भाड़े पर लेना है उसके लिए दूंगा। तो सुरेश मित्र के ही सर्वप्रथम यह जो अवदान था उसकी वजह से यह वराह नगर रूपी जो जगह है वहां पर एक भूतिया मकान वो था एक जहां पर और कोई नहीं रहता था। वहां पे एक जगह भाड़े की गई और वहीं पर फिर देखिए कि कुछ दिनों के बाद में सब गुरु भाई गए आठपुर आठपुर में वही ध्वनि ज्वाला करके जीसस के जो एपोस्टल्स थे उनका जो फरवर था फरवर ऑफ प्रीचिंग कि किस तरह से जीसस की इस अग्निमय वाणी को पृथ्वी के प्रत्येक कोने पर पहुंचाया जाए। तो यह जो उनका डिजायर था वह उन्होंने किस तरह से अपने जीवन में फलीभूत किया। सभी की एक के बाद एक आप एपोस्टल्स को देखेंगे तो उनकी हत्या हुई थी। जबकि हिंदू धर्म में देखेंगे कि इस तरह से जो प्रीचर होते हैं धर्म के उनके ऊपर में कभी भी जुल्म गुजारा नहीं जाता। तो आपको पता है कि इस तरह की भयावह परिस्थिति में भी यह यूरोपियन जो था उस समय का बार्बेरिक सोसाइटी उसके भीतर में उन्होंने क्रिश्चियनिटी का प्रचार किया और यह जब स्वामी जी बात कर रहे थे तो उससे उद्दीपित होकर के यह गुरु भाइयों ने भी ठीक किया कि हम लोग भी अपना जीवन ठाकुर के उपदेश अनुसार गठन करेंगे और ठाकुर की वाणी का प्रचार करने के लिए उत्सर्ग करेंगे। करेंगे। तो यह घटनावली हमने देख ली। उसके बाद में जब गुरु भाई ठाकुर के मोनेस्टिक डिसाइपल्स कोलकाता वापस आते हैं वराह नगर मठ में तब और एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना
गुरुभाईओ ने विधिवत संन्यास ग्रहण करने के लिए किये हुए विरजा होम की कहानी
उसका प्रारंभ होता है। घटनावली का घटना चक्र का प्रारंभ होता है कि किस तरह से अनुष्ठानिक रूप से हिंदू धर्म में बताई गई विधिवत रूप से सन्यास ग्रहण किया जाए। तो सन्यास ग्रहण की विधि उसको कहते हैं विजा होम। तो यह विजा होम करके किस तरह से गुरु भाइयों ने सन्यास लिया। अभी इसके बारे में बहुत ज्यादा डिटेल हमको नहीं पता है। जो थोड़ी सी डिटेल्स हमको पता है, वह हमारे सामने गंभीरानंद जी महाराज प्रस्तुत करते हैं। उसमें से थोड़ा सा हम लोग पाठ करते हैं कि किस तरह से विजा होम किया गया। का कौन से समय पर किया गया वह सब वह लिखते हैं। गंभीरानंद जी का पुस्तक युगनायक में से एक छोटा सा विवरण हम पाठ करेंगे। फिर उसके बारे में चर्चा करेंगे। क्या कहते हैं गंभीरानंद जी? एक प्रश्न ए अभी प्रश्न यही है त्यागी भक्त वृंदो अनुष्ठानिक रूपे सन्यास लोलेन कबे एवं की रूपे त्यागी भक्त वृंद अनुष्ठानिक रूप से अर्थात कि हिंदू धर्म में दर्शित विधि के अनुसार उन्होंने सन्यास लिया कब और कैसे मठेर आदि जीवन कोखानी चित्रों कथामृत कार्य लेखनी मुख्य अंकितो होइया छ ताहा होते अमरा जानी ते पारी अंतत 1887 ख्रिस्ताब्दे 21 फरवरी शिव चतुर्दशीने मठेर त्यागी जुबक ब्रंदेर परिधाने गेरुआ वस्त्र छिलो एवं ओई बर आठ में तारीखे गेरुआ वस्त्रे उल्लेख पाई जब यह एक डेट फिक्स करनी थी कि कौन से समय में इन्होंने विधिवत सन्यास लिया तो उसका वैसे तो कोई फिक्स डेट हमको नहीं पता है। किंतु एक डेट रेंज हमको अवश्य पता है कि यह लोग आठपुर से आए तो वह ऑलमोस्ट 31 दिसंबर के आसपास की होगी घटना और जब यह 8th फरवरी है 29th फरवरी ना तो उस समय उन्होंने 21 फरवरी तो उस समय हमको पता है कि इन्होंने गेरुआ वस्त्र धारण किया है। तो इसके लिए गंभीरानंद जी कहते हैं मठ का जो आदि जीवन है अर्थात कि वराह नगर मठ का जो प्रारंभिक जीवन है उसके बारे में जो कुछ-कुछ चित्र हमको कथामृतकार की लेखनी के द्वारा अंकित हुए गए हैं। उसको पढ़कर के हम जान पाएंगे कि एटलीस्ट 1887 साल का 21 फरवरी का शिव चतुर्दशी के दिन मठ के त्यागी युवक वृंदों ने गेरुआ वस्त्र परिधान किया हुआ था और इसी साल की 8 मई तारीख को भी गेरुआ वस्त्र का उल्लेख मिलता है। अर्थात कि आठपुर से आकर के यह शिव चतुर्दशी यह महाशिवरात्रि यह जो ऑलमोस्ट डेढ़ महीने जैसा समय है उसी समय के दौरान उन्होंने वीरजा होम का अनुष्ठान किया होगा। तो 21 फरवरी पुरबेर कोनो विवरण कथामृते नहीं 21 फरवरी के पहले का कोई भी विवरण कथामृत में उपलब्ध नहीं है तबे आमरा अनुमान करते पारी जे श्री रामकृष्ण श्री श्री ठाकुर प्रदत्त गेरवा वस्त्र अंततो ध्यानाद काले मठ बासीरा प्रथमा बधि व्यवहार कर तेन 21 फरवरी महा महाशिवरात्रि के पहले का कोई भी विवरण कथामृत में उपलब्ध नहीं है। किंतु हम लोग अनुमान करके कह सकते हैं कि ठाकुर ने तो अपने यह मोनेस्टिक डिसाइपल है, त्यागी संतान है। उनको तो गेरुआ दे ही दिया था। तो यह त्यागी संतान भले ही चाहे बाहर जाने के समय गिरवा वस्त्र का व्यवहार ना करते हो किंतु एटलीस्ट मठ में रहने के समय में जप करते होंगे, ध्यान करते होंगे, पूजा करते होंगे, उस समय तो ठाकुर ने यह जो गेरुआ वस्त्र दिया था, वह अवश्य पहनते ही होंगे। देखिए यह जो गेरुआ वस्त्र पहनने
गेरुआ वस्त्र और दशनामी सन्यासी संप्रदाय के बारे में भ्रांत धारणाए
का एक जो परमानेंट रूप से जो स्टार्ट हुआ था उसके पीछे की भी कुछ-कुछ कहानियां है। बाद में गंभीरानंद जी हमको बताएंगे कि किस तरह से शुरू-शुर में यह त्यागी युवक वृंदों को संकोच होता था कि बाहर में जाने के समय गेरुआ वस्त्र पहने के नहीं क्योंकि उस समय बंगाल में यह शंकराचार्य के निर्दिष्ट दशनामी संप्रदाय के बारे में अवेयरनेस बहुत कम थी। ज्यादातर लोग तो यही समझते थे कि यह गेरवाधारी अर्थात कौन? तो यह नॉर्थ इंडिया है या वेस्ट इंडिया है। वहां से यह जो भिखारियों का दल या तो एक लंबी-लंबी जटा वाले बाबाियों का दल आ जाता है जो कि लड़कों को चोरी करके उठा के ले जाते हैं। यही लोग गेरवा पहनते हैं। बोलकर के लोगों के मन में था। तो यह सब जो प्रजुडाइज था गंभीरानंद जी कहेंगे बाद में तो इसी की वजह से यह युवकों को यह थोड़ा सा संकोच होता था कि बाहर जाने के समय गेरुआ पहने के नहीं। दूसरा यह भी एक प्रश्न था कि पैसों का अभाव था बोलकर के अभी जिन लोगों ने अपने घर के जो कपड़े पहने हैं वही तो है ना पहनने के लिए। एक गिरवा वस्त्र जो ठाकुर ने दिया था। इसके अलावा दूसरा गिरवा वस्त्र लाएंगे भी कहां से? तो फिर इसकी वजह से कुछ प्रैक्टिकल कंसीडरेशंस थे, कुछ फाइनेंशियल कंसीडरेशंस थे, मॉनिटरी कंसर्न्स थे। बोल करके ही हो सकता है कि नियमित रूप से प्रारंभ प्रारंभ में इस गुरु भाइयों ने गेरुआ वस्त्र धारण नहीं किया था। किंतु जैसे-जैसे करके सन्यास जीवन के भीतर में उनका प्रवेश होता गया, जैसे-जैसे वराह नगर में उनकी तपस्या, साधन, अग्नि और ज्यादा प्रज्वलित रूप से और ज्यादा प्रकाशित रूप से प्रज्वलित होने लगा। वैसे-वैसे ही इन्होंने इनके मन में गेरुआ के प्रति जो संकोच था वह धीरे-धीरे करके दूर होता गया और बाहर में भी गेरुआ पहन करके जाते थे और जब कोई उनकी मजाक भी उड़ाता था, कटाक्ष भी करता था, अपमान भी करता था तो मन के भीतर में इतना यह जो तपस्या का अग्नि प्रज्वलित हो रहा था कि इसकी वजह से लोगों के अपमान भी जो है वह उनको को ज्यादा स्पर्श नहीं करते थे। इसीलिए यह डेफिनेटली बोलना मुश्किल है कि विजा होम यह जो पूरा आपको घटनावली है उसमें विजा होम कौन से दिन कब हुआ कौन सी तिथि को हुआ कौन से उत्सव के दिन हुआ वह हमको नहीं पता है। अनुमान करके हम कहते हैं कि आठपुर से आने के बाद और महाशिवरात्रि के पहले इस जो 1ढ़ महीने के आसपास का कुछ समय है उसी समय विजा होम हुआ होगा। यहां पर बाद में गंभीरानंद जी कहेंगे कि ऑलमोस्ट जनवरी के थर्ड वीक के आसपास में यह घटना हुई है। देखिए यह जो
स्वामी विवेकानन्द के साहस की कहानी : अमेरिका के रास्तो पर स्वामीजी सन्यासी के वस्त्र पहन कर चलते है
जाहिर में गेरुआ पहनना यह तो भारत में बंगाल में कोलकाता में तो मुश्किल था ही था। आप इमेजिन करके देख लीजिए कि अमेरिका में कितना मुश्किल होगा। जब स्वामी जी यह गेरवा माने एकदम विविड कलर का यह ऑरेंज यह जो ड्रेस है पहन करके वह न्यूयॉर्क की गलियों में चलते थे तो लोग इनको किस दृष्टि से देखते होंगे मिस एलन वोल्डो यह जो स्वामी जी का स्वामी जी की यह जो थाउजेंड आइलैंड पार्क में स्वामी जी के क्लास है क्लास को जिसने लिपिबद्ध किया है और वह अमर हो गई है इंस्पायर्ड टॉक जिसने लिपिबद्ध किया वही सारा एलन व्ल्डो तो वह एक हमको बताती है कहानी कि स्वामी जी जब न्यूयॉर्क में किसी कार्य के लिए बाहर जाते तो वह भी उनके साथ-साथ में जाती। अभी देखिए कि स्वामी जी एकदम भड़क कलर के यह गेरुआ वस्त्र पहन करके क्रिमजन कलर का यह वस्त्र पहन करके कोट ओवरकट पहन करके वहां पे न्यूयॉर्क के रास्ते पर चल रहे हैं और सर के ऊपर में वह टरबन बांधी हुई है। पगड़ी बांधी हुई है। तो सभी लोग उनके सामने इस तरह से देखते हैं कि जैसे यह सर्कस में से कहीं निकल के आया है ना कि यह कौन है। तो ऐसा करके लोग सब उनके सामने देखते हैं। तब यह मिस व्ल्डो लिखती है कि स्वामी जी के साथ में चलना वह भी एक बहुत बड़ी बहादुरी का काम था। सब लोग मेरी ओर इस तरह से देखेंगे कि यह एक काला आदमी है। लाल कलर के कपड़े पहन के जा रहा है। साथ में अमेरिकन औरत उसके साथ में क्यों जा रही है? क्या वो इसका किडनैप करके जा रहा है ना कि क्या हो रहा है? तो लोगों के मन में यह प्रश्न होता तो स्वामी जी को किंतु कोई संकोच नहीं, कोई डर नहीं। किंतु यह मिस वर्ल्डो को थोड़ा सा यह टेंशन हो जाता था। फिर उन्होंने स्वामी जी को बहुत समझाया कि स्वामी जी जब हम बाहर रास्ते पर जाते हैं तो एटलीस्ट आप इस तरह के विविड कलर का क्रिमसन कलर का कोट मत पहनिए। थोड़ा सा नॉर्मल क्लोथ्स पहनिए। तो स्वामी जी पहले तो सुनते ही नहीं थे क्योंकि वही वैराग्य की अग्नि तपस्या साधन भजन का जो प्रवाह है उनके मन के भीतर में इतना दृढ़ीभूत हो गया है कि कोलकाता की गलियों में भी जाते थे लोग मजाक करते थे सुनते नहीं थे तो कोलकाता में लोग मजाक करेंगे तो क्यों सुनेंगे किंतु फिर जब मिस व्डो ने बार-बार विनती की तो स्वामी जी ने फिर नॉर्मल कलर के कपड़े जो होते हैं रेगुलर क्लॉथ जो कि अमेरिकन लोग पहनते हैं ऐसे कुछ खरीदे और जब गलियों में शेरियों में बाहर जाना है तो इस तरह के कपड़े पहनना शुरू किया था। तो यह देखिए कि यह पूरा
गेरुआ वस्त्र और दशनामी सन्यासी संप्रदाय के बारे में भ्रांत धारणाए 2
ट्रेजेक्टरी है कि पहले जब ठाकुर ने गेरवा वस्त्र दिया तो यह जो त्यागी युवक वृंद है उनको थोड़ा सा झिझक होता था। थोड़ा सा संकोच होता था कि हां ठाकुर ने हमको अंतर में से तो सन्यासी बना दिया है। किंतु सन्यास का यह जो बाह्य चिन्ह है गेरवा उसको पहन करके जब हम लोगों के सामने निकलेंगे तो लोग क्या कहेंगे? अननेसेसरी हमारी मजा करेंगे। अननेसेसरी हमारा अपमान करेंगे। ऐसी कितनी सारी कहानियां है। यह जो जो त्यागी संतान भिक्षा मांगने के लिए जाते हैं। मोस्ट प्रोबेबबली आई थिंक ये योगिन महाराज कि बाबूराम मोस्ट प्रोबेबबली योगिन महाराज ने ही यह कहानी कही है कि किसी एक स्त्री के घर गए भिक्षा मांगने के लिए तो उसने देखा कि यह नवयुवक है। हट्टाकट्टा है। फिजिकली मेंटली फिट है। चेहरे से भी लगता है कि अच्छे घर का है। ऊपर में से यह गेरुआ पहन करके भिक्षा मांग रहा है। तो यह स्त्री ने तो जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया कि इतने हट्टे-कट्टे हो। तुमको शर्म नहीं आती भिक्षा मांग कर के खाने में। जाओ तुम थोड़ा सा काम करो। मेहनत मजदूरी करो। पसीने की कमाई खाओ। क्यों लोगों का पैसा इस तरह से मुफत में मांगते हो? भागो यहां से। ऐसा करके जोर-जोर से चिल्ला रही थी। तो योगेंद्र महाराज ने आकर के पूरी कहानी बताई थी। तो सभी गुरु भाई भी हंस रहे। तो देखिए कि एक समय था कि गेरुआ उनका पहनने का संकोच धीरे-धीरे करके दूर हो रहा था और वह संकोच इस हद तक दूर हो गया कि न्यूयॉर्क जैसे न्यूयॉर्क में जहां पे कि इंडिया को वैसे ही तो भारत गुलाम देश है। ऊपर में से न्यूयॉर्क में अर्थात कि अमेरिका में रेसिज्म बहुत था। तो यह काला आदमी गुलाम है और गोरे आदमी रूलर है। सुपीरियर है। यह भाव बड़ा दृढ़ था। तो उस तरह की परिस्थिति में एक काले आदमी होकर के लाल रंग के कपड़े पहन के रास्ते पर निकलना वो स्वामी जी के लिए कितना करेज का काम होगा। तो देखिए कि एक देयर इज समथिंग एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी कि अमेरिका में पुलिस वालों के साथ में स्वामी जी का कभी कोई हुआ है? उनका इंटरेक्शन झगड़ा हुआ है ना कि ऐसा कुछ हुआ है। उन लोगों ने स्वामी जी को परेशान किया है। इस तरह की एक भी कहानी मैंने नहीं सुनी। शायद हुआ भी होगा तो शायद लिखा नहीं गया होगा। किंतु यह बहुत सरप्राइजिंग है। भारत में ही इस तरह की बहुत सारी कहानियां है। एक बार स्वामी जी यही नॉर्थ इंडिया में भ्रमण कर रहे थे। तो ब्रिटिश गवर्नमेंट का एक सीआईडी ऑफिसर उसने सोचा एक तो पता है ना हमको कि 1857 जो फर्स्ट वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस था इंडिया का उसमें जब हार गए यह हिंदुस्तानी सैनिक तो फिर वे लोग भाग खड़े हुए और यह गेरुआ पहन करके साधुओं का वो भेष रच करके सब जगह पर घूमते थे तो ब्रिटिश गवर्नमेंट के सर पर एक बैठ गया था कि गेरुआ परिहित साधु है तो उसका अर्थ है कि वह या तो क्रांतिकारी है या तो वही वह 1857 की वॉर में से वह भाग खड़ा हुआ कोई सैनिक है वगैरह तो जैसे ही ऐसा साधुओं को देखती यह सीआईडी वगैरह ब्रिटिश गवर्नमेंट की ये स्पाई एजेंसीज गुप्तचर संस्था है तो उनके पीछे पड़ जाती तो इस तरह से स्वामी जी के पीछे एक गुप्तचर लग गया था तो उसने एक बार शायद स्वामी जी को धमकी भी दी होगी कि हम तुमको जेल में डाल देंगे तो स्वामी जी ने क्या कहा पता है उसको कि अच्छा जेल में डालना चाहते हो डाल दो बहुत अच्छा होगा। मैं बहुत खुश होऊंगा। तो यह सीआईडी ऑफिसर सोचता है कि लोग तो जेल के मारे डर के ये हो जाते हैं। भाग खड़े होते हैं। यह सामने से कहता है कि ऑफिसर मुझे जेल में बंद कर दो। क्या माज रहा है? पूछा क्यों तुमको जेल में जाना है? तो स्वामी जी कहते हैं कि देखो यहां पे तुम्हें दर-बदर भटकते भटकते भिक्षा करके करके भी दो बेला का खाना नहीं जुटता। आप जेल में डाल देंगे तो एटलीस्ट रहने के लिए एक कमरा तो मिलेगा। खाने के लिए दो बेला की रोटी तो मिलेगी। इसके लिए अच्छा है। मुझे आप जेल में ही डाल दीजिए। तो स्वामी जी ने ऐसा कहा वह ऑफिसर बड़ा परेशान होकर के कहा भागो यहां से। जरूरत नहीं तुमको जेल में जाने की। तो भारत में इस तरह के इंसिडेंट है। किंतु अमेरिका में इस तरह के एक भी इंसिडेंट मैंने पढ़े नहीं है कि वहां की पुलिस के साथ में स्वामी जी का कोई इस तरह का इवेंट घटना हुई है। व्हिच इज वेरी सरप्राइजिंग क्योंकि अमेरिका में रेसिज्म इतना स्ट्रांग है कि यह जो गोरे लोग हैं बार-बार पुलिस को बुलाएंगे। यदि कोई काला आदमी उनको दिखेगा तो फटाक करके पुलिस वालों को फोन करेंगे। कहेंगे ये काला आदमी यहां पर प्रवचन दे रहा है। ऐसा सब कर रहा है। स्वामी जी को बहुत भुगतना पड़ा था। यह मिस व्ल्डो ही कहती है कि न्यूयॉर्क में जब वह किसी के मतलब उनको रेंट पर रहना है ना भाड़े के मकान पर रहना है तो न्यूयॉर्क में क्या होता है कि एक अपार्टमेंट होता है। अपार्टमेंट किसी की मालिकी का होता है। तो जो जिसकी मालिकी का अपार्टमेंट होता है उसको लैंड लॉर्ड या तो फिर लैंड लेडी कहते हैं। ज्यादातर यह लेडीज़ ही यह सब ऑपरेट करती थी। तो लैंड लेडी तो अभी किसी अपार्टमेंट में वो भाड़े का कमरा लेने को जाएंगे तो वो लैंड लेडी सीधा स्वामी जी के मुंह पर कह देती है कि स्वामी जी हमारे यहां जगह नहीं है आप वापस चले जाइए तो स्वामी जी कहते हैं मुझे तो दिख रहा है कि यहां पे जगह है आपने ऐड भी तो दिया है बोल के मैं आया हूं तो फिर यह लैंड लेडी कहती कि हां जगह है किंतु वह गोरे लोगों के लिए है काले लोगों के लिए नहीं तो फिर स्वामी जी को इस तरह से दर-बदर भटकना पड़ता था और फिर कहीं जाकर के एक अपार्टमेंट में उनको जगह मिली। किंतु वहां पे खाने का जो क्वालिटी था इतना खराब था, इतना खराब था। वह बेचारे स्वामी जी खा नहीं पाते थे। तो फिर उन्होंने मिस व्ल्डो को कहा कि देखिए यहां पे तो खाने का क्वालिटी बहुत ही बुरा है। यदि आप मेरे लिए खाना पका सकते हैं तो बहुत अच्छा होगा। तो मिस वर्ल्डो कहती है हां स्वामी जी मैं आपके लिए खाना पकाऊंगी। किंतु प्रॉब्लम क्या है? मिस वोल्डो का जो घर है वह स्वामी जी जहां पर रहते थे जिस अपार्टमेंट में भाड़े में वहां से 2 किमी की दूरी पर था तो प्रतिदिन 2 घंटे की दूरी पर था यानी कि प्रतिदिन अर्ली मॉर्निंग को वो जो घोड़ा गाड़ी होती है उसमें बैठकर के ट्र में बैठकर के मिस व्डो को यहां पे आना पड़ता था स्वामी जी का जो अपार्टमेंट था वहां पे स्वामी जी के लिए खाना बनाएगी और फिर स्वामी जी प्रवचन वगैरह देंगे तो उसकी नोट्स वगैरह रखेगी। स्वामी जी की सेक्रेटरी का कार्य भी करेगी और स्वामी जी के कुक का भी कार्य करेगी। पूरा दिन भर स्वामी जी को हेल्प करेगी और फिर आखिर में रात में 8:00 बजे ना 9:00 बजे फिर से घोड़ा गाड़ी और ट्रम में बैठकर के अपने घर जाएगी। जाते-जाते 2 घंटे का रास्ता देर रात हो जाएगी और फिर अर्ली मॉर्निंग दूसरे दिन तो फिर से आना ही है वापस। तो देखिए कि इस तरह से स्वामी जी को भी इस तरह के डेडिकेटेड वालंटियर मिल गए थे। यहां पर जिस तरह से मिस व्ल्डो है। फिर यह बाद बात बादबाद में तो और भी बहुत आ गए थे। यह अपना गुडविन है। फिर यह तो अपना पूरा टीम था। वहां पे सारा ओली बुल है, जोसेफाइन में क्लाउड है, बेटी लेगेट है, मिस्टर लेगेट है वगैरह-वगैरह। तो देखिए कि दैट वाज़ अ वेरी गुड टीम के स्वामी जी जहां पे भी जाते थे खड़ा हो जाता था। यहां पे कोलकाता का एक अनफॉर्चूनेट प्रॉब्लम क्या था कि ठाकुर ने परफेक्ट टीम खड़ा करके गए थे। ये मास्टर महाशय ये बलराम बसु ये गिरीश घोष ये सुरेश मित्र ये इनके जैसे और म डेडिकेटेड डिवोटी तो और कहां मिलने वाले हैं? ये योगेन मां है, गोलाप मां है, गौरी मां है, अोरमणि देवी है। इन तरह के लोग कहां मिलने वाले हैं। किंतु वही था कि यह लोगों का अह समाज में जो गेरुआ के प्रति एक तरह का कटाक्ष या तो फिर अवमानजनक भाव था। माने एक तरह का अपमानजनक भाव था। इंसल्टिंग एक एटीट्यूड था। वह बहुत ही खराब था। तो इसकी वजह से एक जाहिर में गेरुआ पहन कर के जाना विधिवत सन्यास ग्रहण करना यह सब निर्णय लेना भी ना इन लोगों के लिए बड़ा मुश्किल था। ये यंग लड़के नौकरी नहीं करके फिर यह संसार नहीं करके साथ में रहते हैं। उसके बाद में यह लोग सन्यास धारण करते हैं। फिर इस तरह से उस समय तो शिव ज्ञान जीव सेवा का तो कार्यक्रम प्रारंभ नहीं हुआ था। वह यदि हो जाता तो उसके बारे में भी विरोध हमको तो पता है। बहुत सारे यह हमारे अगेंस्ट में यह केस भी स्टार्ट किए गए थे। यह कह के कि बेलूर मठ जो है वह तो कहीं एक बाबू की बागानवाड़ी है। माने यह धनी लोगों का यह गार्डन हाउस है। मठ थोड़ी ना है। तो वह सब घटनाएं हुई है। बोल के देखिए कि यह सर्वप्रथम सन्यास लेने का जो साहस करना उसके लिए जो निर्णय करना वह एक रेवोल्यूशनरी आईडिया से कम बिल्कुल नहीं था। बोल के अभी देखिए कि क्या कहते हैं। अच्छा एक दूसरा बात है कि देखिए मास्टर महाशय मास्टर महाशय का भी बड़ा इंटरेस्टिंग है कि ठाकुर जब अत्यंत बीमार हो गए थे। इवन अत्यंत बीमार थे उस समय भी ठाकुर के ज्यादातर फिलॉसोफिकल डिस्कशन को ही उन्होंने कथामृत में प्राधान्य दिया है। और फिर ठाकुर बोल भी नहीं पा रहे थे। जब उस समय के दिनों की बातें मास्टर महाशय ने लिखी ही नहीं है। उसको पब्लिश ही नहीं किया है। और फिर आखिर में जब यहां पर कहते हैं कि 21 फरवरी को उन्होंने वराह नगर मठ का जो विवरण है वहां से उन्होंने फिर से स्टार्ट किया है। बीच का जो पूरा विवरण है वह खा गए हैं। वि इज आल्सो वेरी एक तरह से मैं कहूंगा अनफॉर्चूनेट इसलिए है क्योंकि ठाकुर की वह जो अंत्य लीला थी वो हम सबको यदि पता चलती डिटेल में पता चलता तो वो उसका भी तो एक स्पिरिचुअल सिग्निफिकेंस होता किंतु खैर मास्टर महाशय ने सिलेलेक्ट किया कि मैं इसके बारे में नहीं लिखूंगा। अनफॉर्चूनेटली यह भी देखिए कि जब शरद महाराज है स्वामी शारदानंद जी महाराज वो अंत्य लीला के बारे में लिखने को जाते हैं। काशीपुर तक आती है उनकी विवरण घटनावली तब फिर मां का निधन हो जाता है। मां शारदा की महासमाधि हो जाती है 1920 में। तो फिर शरद महाराज का यह लिखने का जो पूरा यह था एक मूड कहो ना कि एक पूरा जो प्रेरणा कहो वो प्रेरणा ही जैसे कि चली गई। जब तक मां थी तब तक लिखने की प्रेरणा उनको मिलती रहती थी। मां की महासमाधि के बाद में लिखने की प्रेरणा ही मिलना बंद हो गई और उन्होंने भी काशीपुर के दिनों का ज्यादा डिटेल में डिस्क्रिप्शन नहीं दिया। वही बात है कि मास्टर महाशय की जो नोट्स थी उसके बेस पर प्रभानंद जी ने बाद में श्री श्री रामकृष्ण देव की अंत्य लीला बोलकर के दो वॉल्यूम पब्लिश किए हैं। तो यहां पर देखिए कि यह जो पूरा एक स्पेक्ट्रम है कि गेरुआ उन्होंने भीतर में से तो ध इवन देखिए ठाकुर का भी यह जाहिर
सन्यास लेने के बाद श्रीरामकृष्ण ने अपनी माँ को कष्ट होगा सोचकर सबके सामने गेरुआ नहीं पहने थे.
में गेरुआ नहीं पहनने के बारे में ठाकुर का भी डर था। जब तोतापुरी से ठाकुर ने सन्यास ग्रहण किया उस समय ठाकुर ने पहले ही कंडीशन रखी थी कि मेरी बूढ़ी मां अभी भी जीवित है तो मैं सन्यास लेने को तो तैयार हूं विजा होम करने को तो तैयार हूं और सन्यास का जो स्पिरिट है काम कांचन त्याग उसको मैं अक्षरशः पालन करने को तैयार हूं लिटरली उसको मैं पालन करने को तैयार हूं किंतु मैं गेरवा वस्त्र नहीं पहनूंगा। क्यों? क्योंकि मेरी बूढ़ी मां अभी भी जीवित है और वह यदि मुझे गेरुआ पहने हुए देखेगी तो वह बेचारी बड़ी दुखित हो जाएगी। तो फिर तोतापुरी ने उनको यह परमिशन दे दी एक्सेंपशन दे दिया एनओसी दे दिया कि ठीक है तुम विजा होम करो किंतु बाहर में यदि गेरुआ वस्त्र नहीं पहनोगे तो भी चलेगा। ऐसा बोलकर के ठाकुर को भी यही डर था कि जाहिर में यदि इस तरह के गेरुआ पहनेंगे तो बेचारी मां उनकी जो है दुखित हो जाएगी और यहां पर यह वराह नगर मठ में गुरु भाई थे उनको यह थोड़ा सा संकोच था कि उनको अपने मां-पिता जी का इतना चिंता नहीं था जितनी चिंता जितना संकोच उनको समाज के बारे में था। यह सब विवरण आएंगे। हमको वीरानंद जी महाराज वगैरह ये सब विवरण कुछ कुछ है कि किस तरह से वराह नगर मठ के सन्यासियों का अपमान होता था। जब वे लोग गेरुआ पहन के बाहर जाते थे तो तो फिलहाल
गुरुभाईओ ने विधिवत संन्यास ग्रहण करने के लिए किये हुए विरजा होम की कहानी 2
हम वीरजा होम के बारे में थोड़ा सा आगे देखते हैं। क्या लिखते हैं गंभीरानंद जी कि 21 फरवरी के पहले इस तरह का कोई विवरण नहीं है कथामृत में। कथामृत के लेखक है मास्टर महाशय ठाकुर की महासमाधि के पहले ही वैसे तो उन्होंने अपना नैरेटिव स्टॉप कर दिया है और फिर डायरेक्ट स्टार्ट किया है 21 फरवरी को ही तब आमरा अनुमान कोते पारीजे श्री श्री रामकृष्ण ये ऑलरेडी हो गया कि हम लोग अनुमान करके कह सकते हैं कि इवन विजा हूं करने से पहले भी ठाकुर ने तो उनको गेरवा दे दिया था तो यह गुरु भाई जब जब ध्यान करते होंगे उस समय अवश्य गेरुआ पहनते होंगे काशीपुर होते गोया गमन काले नरेंद्र तारक और काली गेरुआ परिहितो छिलेन तो काशीपुर से गया गए थे नरेंद्र तारकदा अर्थात कि महापुरुष महाराज और काली अर्थात कि अभेदानंद जी महाराज तो ठाकुर के रहते रहते ही यह तीनों गए थे गया में जाकर के जप कर रहे थे ध्यान कर रहे थे और एकाएक वहां की एक कहानी प्रसिद्ध है कि स्वामी जी ध्यान स्नान करते-करते एकाएक जागृत हो गए और महापुरुष महाराज के कंधे पर सर रखकर के वह रोने लगे। सो उनको हुआ होगा कोई अनुभव वगैरह तो जो भी है तो वही गया में यह लोग गए थे। किंतु गया से भी यह लोग वापस आ गए। किंतु जब गए थे तब गे पहन के गए थे। अतः पर पूज्यपाद स्वामी अभेदानंदे आमार जीवन कथा होते जाना जाए। श्री रामकृष्ण लीला काले तनी एक बार गयार निकटवर्ती बराबर पहाड़े हठ जोग शिखा करीते जान इसके बाद में पूज्यपाद स्वामी अभेदानंद की मेरी जीवन कथा पुस्तक में से जानने में आता है जानने को मिलता है कि ठाकुर के लीला काले जब ठाकुर जीवित थे उसी समय वह एक बार गया के पास में बराबर पहाड़ है वहां पर हठयोग सीखने के लिए गए एवं ओई अबशरे पहाड़े पाद देश बाशकारी जनक परमहंस निकट होइते सन्यासे मंत्रादि लिख्या आनेन और उसी समय पहाड़ के नीचे में रहते हुए एक परमहंस के पास में से सन्यास के मंत्र लिख करके आए थे मठेर प्रथमावस्थाय नरेंद्रनाथ एक दिन सन्यास ग्रहण बासना व्यक्त करले अभेदानंदो उई कोथा प्रकाश करेन एवं एवं नरेंद्र आदि के यथाविधि बिजा होम करिया अनुष्ठानिक भावे सन्यास ग्रहणर परामर्शतेन यह वराह नगर मठ की जब शुरू की अवस्था थी प्रथम अवस्था शुरू के दिन थे उस समय एक दिन नरेंद्रनाथ ने स्वामी विवेकानंद ने सोचा कि हम लोग सन्यास ग्रहण करते हैं विधिवत रूप से उस समय अभेदानंद जी ने यह बात कही कि वह परमहंस देव के परम परमहंस एक थे नॉट परमहंस देव हमारे परमहंस देव तो ठाकुर किंतु और एक परमहंस बराबर पहाड़ के नीचे में जो रहते थे उसके पास उनके पास में से उन्होंने वीरजा होम के मंत्र लिख के लाए हैं और यदि उनको विधिवत यदि सन्यास ग्रहण करना है तो वह विधिवत वीरजा होम करके अनुष्ठानिक रूप से सन्यास ग्रहण कर सकते हैं। तदनुसार नरेंद्र निरंजन शशि शरद राखाल शारदा लाटू और काली प्रज्वलित होम कुंडे बिरजा होम संपादन पूर्वक सन्यास ग्रहण करें इसके अनुसार नरेंद्र स्वामी विवेकानंद निरंजन निरंजनंद शशि रामकृष्णानंद शरद शारदानंद राकाल ब्रह्मानंद शारदा त्रिगुणातिनंद लाटू अभ अद्भुतानंद और काली अभेदानंद इन लोगों ने प्रज्वलित होम कुंड में विजा होम संपादन करके सन्यास ग्रहण किया। इहा 1887 ख्रिस्ताब्दे जनवरी माशेर तृतीय सप्ताह कथा यह बात है 1887 की साल जनवरी का महीना और तृतीय सप्ताह ऑलमोस्ट इस तरह से हमने इस रेंज को ठीक किया है। देखिए यह जो
वर्तमान समय में बेलूर मठ में संन्यास विधि
गेरवा सन्यास जो विधि है मेरे जीवन में मैंने देखा है कि यह सन्यास की विधि यह सबसे ज्यादा गहराई से हमारे मन के ऊपर में असर करती है। बेलूर मठ में यदि आप गए होंगे। बेलूर मठ की जो कार्यावली है उसके साथ में यदि आप लोग परिचित होंगे तो आप लोगों को पता ही होगा कि जिस दिन ठाकुर की तिथि पूजा होती है उसके दूसरे दिन बहुत सारे भक्त वहां पे बेलूर मठ के दरवाजे के सामने भिक्षा लेकर के खड़े होते हैं। क्यों? क्योंकि सबको पता है कि ठाकुर की तिथि पूजा की मध्य रात्रि को बेलूर मठ में सन्यास व्रत का अनुष्ठान होता है और उसके बाद में नियम अनुसार यह जो नवसन्यासी है युवक सब इनको तीन दिन तक यह जो सिलाई किए हुए कपड़े नहीं पहनने हैं चप्पल नहीं पहनने हैं और भिक्षा करके आहार ग्रहण करना है तो इसके अनुसार अर्ली मॉर्निंग को जब यह लोग बाहर आएंगे भिक्षा करने के लिए तो देखेंगे कि गेरुआ धोती पहना है। ऊपर में यह गेरुआ जो उपवस्त्र है चद्दर वो ओढ़ी हुई है और पैर में जूते नहीं है। हाथ में वो जो झोली है भिक्षा की उसको लेकर के सब लोग भिक्षा करने को जाते हैं। तो यह बहुत सारे डिवोटी यहां तक के साधुओं के मां-पिताजी भी वहां पर खड़े रहते हैं। पता है कि कल रात को मेरे बच्चे का सन्यास हुआ है तो उसको पहली दीक्षा मैं ही दूंगी। ऐसी मां भी होती है। तो इस तरह से पेरेंट्स होते हैं, डिवोटी होते हैं। वह मठ के दरवाजे के जो मेन गेट है बेलूर मठ का वहीं पर खड़े रहते हैं। नव सन्यासियों को भिक्षा देंगे। कोई-कोई सन्यासी ऐसे होते हैं कि जैसे मैं हम लोग सन्यास के समय ठीक किए थे कि पीछे का दरवाजा जो है मठ का वहां से निकल जाएंगे और बेलूर के आसपास की ये जो घर है वहां पर जाकर भिक्षा लेंगे क्योंकि एक्चुअली क्या है आप जैसे ही मठ के बाहर में गेट के बाहर में ही निकले वहीं पे आपका भिक्षा का झोली भर जाता है तो भिक्षा करने का वह जो एक सेटिस्फेक्शन है वह तो नहीं मिलता है बोल के हम चारप चार पांच साधु थे तो हम लोग मठ के बैक गेट जो है पीछे का दरवाजा वहां से निकल गए बाहर में और वहां पे फिर थोड़ा सा आगे गए वो गरीब बस्ती है पूरी गरीब बस्ती है और वहां पे बहुत गरीब लोग ही रहते हैं तो वहां पे जाकर के घर-घर जाकर के भिक्षा मांग रहे हैं तो देखिए कि वह गरीब लोग भी उन्होंने जैसे ही देखा सन्यासी आए हैं भिक्षा मांगने के लिए और क्या है कि देखिए यह भी तो अभी ट्रेडिशन है कोई-कोई साधु मेन गेट पे जाते हैं तो कोईकोई पीछे वाले गेट से निकल कर के इस तरह घरघर भी जाते हैं। तो उनको ऑलरेडी पता है कि इस तरह से यह लोग आते ही है तो उन लोगों ने भी कुछ ना कुछ तैयार रखा है। कोई कोई स्त्रियां होती है अपने घर के दरवाजे के सामने खड़ी रहती है। वो देखती है जैसे कि यह सन्यासी लोग आ रहे हैं भिक्षा मांगने के लिए। तो बुलाती है महाराज जी हमारे यहां पे आइए। हमारे यहां पे आइए। हमारे यहां से भिक्षा लीजिए। और फिर नियम ऐसा है कि वो तीन घर माने एक घर से ज्यादा भिक्षा नहीं लेनी है। जिससे कि क्या होता है कि किसी एक गृहस्थ के ऊपर में ज्यादा बोझा ना आ जाए। तो अल्प-अल्प भिक्षा ही लेनी है। तो वो थोड़ा सा झोली फैला करके थोड़ा सा यहां पे लिया, थोड़ा सा यहां से लिया, थोड़ा यहां से लिया। ऐसा करके भिक्षा लेकर के हम लोग फिर मठ में आएंगे और फिर जितना भिक्षा इकट्ठा हुआ है वह सब इकट्ठा करके उसके फिर डिवीजन करेंगे प्रेसिडेंट महाराज को रिवियर्ड प्रेसिडेंट महाराज को देने को जाएंगे। फिर वह जो ठाकुर को वो कुछ जाएगा उसमें से गर्भगह में फिर जब अपना जो मेन डाइनिंग हॉल है वहां पर सन्यासी लोग दो दोपहर का आहार करेंगे तो उनके लिए कुछ जाएगा हिस्सा ऐसा करके वह हिस्सों में बांट देते हैं और फिर हम सन्यासी लोग वो अलग से हमारे लिए टेंट वगैरह बनाया होता है वो आहार करने के लिए हम लोग वहां सन्यास कैंप उसको कहते हैं तो हम लोग वहां पर बैठकर के भिक्षा ग्रहण करेंगे हम हम लोगों को वो मेन डाइनिंग हॉल में जाने की परमिशन नहीं तीन दिन तो इतना सुंदर वातावरण प्रेसिडेंट महाराज को जाएंगे भिक्षा देने के लिए महाराज आशीर्वाद देंगे उसके बाद में सन्यास कैंप में हम लोग भिक्षा कर रहे हैं तो इतने सारे साधु लोग हैं वे लोग फिर वहां पे उस दिन वहां पर डाइनिंग हॉल में नहीं खाएंगे वे लोग भी हमारे साथ में ही जमीन पर बैठ के ही यह जो भिक्षा का पवित्र अन्न है वे लोग भी वही ग्रहण करेंगे और बहुत आनंद आता है तीन दिन खाइए उत्सव होता है। तो यह तो बाद के दिन की बात किंतु इवन अब सन्यास की सेरेमोनी है वह तो सीक्रेट है। वह तो सबको पता है कि मध्य रात्रि के बाद में से यह सब प्रारंभ होता है। उस समय मठ में सन्यासियों के अलावा और किसी को प्रवेश निषिद्ध है। यहां तक कि मेन टेंपल में जहां पर सन्यास सेरेमोनी हो रही है। ब्रह्मचारियों को भी आना अलाउ नहीं है। उस समय में सिर्फ जो सन्यास कैंडिडेट है अर्थात कि सन्यास लेने के लिए आए हुए ब्रह्मचारी और जो ऑलरेडी सन्यास जिनका हो चुका है वही लोग मेन टेंपल में बैठेंगे। विजा होम प्रारंभ होगा। हमारे समय में भजनानंद जी हमारे आचार्य थे। तो वो मंत्रोार करते थे और फिर हम लोग रिपीट करते थे। एक के बाद एक जो होमाग्नि प्रज्वलित हो रहा है उसके भीतर में आहुति के बाद आहुति देते जाएंगे और फिर आखिर में रिवर्ड प्रेसिडेंट महाराज के पास में से हमको घेर हुआ वस्त्र मिलेगा और फिर रेवियड प्रेसिडेंट महाराज ही ब्रह्मचारी की जो शिखा होती है उसको काट करके फिर वह उसको वहां पे विजा होम में उसको भी आहुति देना होता है। वो बहुत ही सुंदर विधियां है सब एक के बाद एक जो जिन जिसने इस गेरवा वस्त्र धारण करने की यह जो पूरी विधि और फिर दूसरा क्या होता है जब यह पूरी विधि समाप्त हो जाती है एकदम अर्ली मॉर्निंग को रिवर्ड प्रेसिडेंट महाराज के क्वार्टर में यह सब नव सन्यासी और फिर बेलूर मठ के जितने भी साधु है सब इकट्ठा होंगे और रिवर्ड प्रेसिडेंट महाराज सबको नाम देंगे तो वह भी एक बड़ा आनंद का सेरेमनी है। मुझे याद है कि स्मरणानंद जी महाराज थे उस समय प्रेसिडेंट और मैं जाकर के सभी को एक के बाद एक जाकर के महाराज को साष्टांग प्रणाम करना है और फिर इस तरह से हाथ जोड़कर के उनके सामने बैठना है और फिर महाराज आपको आपका नाम देंगे सन्यास नाम। तो जैसे ही मैंने साष्टांग प्रणाम किया ऐसा हाथ जोड़कर के उनके सामने बैठा स्मरणानंद जी ने कहा स्वामी कृष्ण सखानंद तो फिर वो नाम मुझे मिला। उसके बाद में बेलूर मठ में जितने भी सीनियर साधु हैं सबको जाकर प्रणाम करना है। फिर सब आपको अपना नाम पूछेंगे। क्या नाम हुआ? तो सबको अपना नया नाम बताना है। वेरी मतलब इतना आनंद भी आता है और इतना दिव्यता और पवित्रता से भरपूर यह सेरेमनी है। म ग्रेटेस्ट इवेंट इन माय लाइफ। में जब ब्रह्मचर्य सेरेमोनी वो भी इसी तरह से होती है। मोर और लेस वहां पर भिक्षा नहीं करनी होती है। बाहर में जाकर भिक्षा नहीं करनी होती है। किंतु मठ का जो किचन है वहां से ही वे लोग हमको भिक्षा देंगे। तो फिर वो हमको जहां पर ब्रह्मचर्य कैंप होता है। हमको अपने हाथों से भिक्षा का अन्न पकाना होता है। तो वह तो बड़ा ही इंप्रेसिव था। उस समय मुझे लगता था कि इससे ज्यादा इंप्रेसिव और कोई सेरेमनी हो ही नहीं सकती। किंतु फिर सन्यास सेरेमोनी जब देखी सन्यास सेरेमोनी का जब अनुभव हुआ मुझे लगा कि इससे ज्यादा इंप्रेसिव और कुछ नहीं हो सकता। तो जितने भी सन्यासी हैं उन सबके जीवन में यह विजा होम एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है। आनंद से भी भरपूर है और दूसरा है कि सेंस ऑफ रिस्पांसिबिलिटी। देखिए कि ब्रह्मचारी की जो शिख है ना शिख इज अ ब्रिज एक सेतु है सन्यास और संसार के बीच जब तक यह शिख है आप उस शिख को पकड़ कर के सन्यास के रास्ते से संसार में वापस आ सकते हैं विधिवत आपको इसमें कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए समाज भी शायद आपको एक्सेप्ट कर लेगा किंतु जिस क्षण आपने शिख को कट किया और उसको विजा होम रूपी जो अग्नि है उसमें आहुति दे दी। उसके बाद में संसार में वापस आने का यह जो सेतु है वह कट हो जाता है। इसके बाद में यदि मन के भीतर में कामना वासना ने प्रवेश किया और हम यदि संसार की ओर वापस आना चाहेंगे तो समाज शायद हो सकता है हमको एक्सेप्ट कर ले अपना मन भी चाहे शायद हो सकता है इस सबको मान ले। किंतु जो अपना हिंदू धर्म जो है वह इस बात को स्वीकार नहीं करता है क्योंकि आपको पता होगा कि सन सन्यास धारण करने से पहले हमको हमारा खुद का श्राद्ध करना पड़ता है। श्राद्ध हुआ अपना अर्थात कि विधिवत हमारा मृत्यु हो गया। जिसका विधिवत मृत्यु हो चुका है, वह किसी भी तरह की वैदिक सेरेमोनी है, उसमें पार्टिसिपेट नहीं कर सकता। तो फिर यह मृत्यु के बाद में पुनर्जीवन कैसे संभव है? मृत्यु के बाद में पुनर्जीवन तभी संभव है जबकि यह देह का मृत्यु हो जाए। नहीं कि देह के रहते-रहते आपका पुनर्जीवन हो। सो वो फिर एक स्क्रिप्चरल एक कोनंड्रम आकर के पैराडॉक्स आकर के खड़ा हो जाता है। तो यह देखिए कि इवन हम लोगों के लिए आज के युग में यह विर्जा होम इतना प्रभाव घटना है। तो उस समय तो कैसा हुआ होगा कि यह गुरु भाई है। यह गुरु भाइयों ने एक साथ में वही वराह नगर मठ में पवित्र विरजा होम रूपी अग्नि प्रज्वलित किया होगा। उसमें एक के बाद एक अपने सभी कामना वासनाओं की आहुति दे दी होंगी। वीरजा होम के मंत्र है सब वो मंत्र का पाठ करने से ही हमको रोमांच हो जाता है। तो एक के बाद एक मंत्रों का पाठ करके आहुति देना प्रारंभ किया होगा और आखिर में उन्होंने अपने सन्यास नाम ग्रहण किए होंगे। आज हमको हमारे सन्यास नाम रिवर्ड प्रेसिडेंट महाराज देते हैं। उस समय स्वामी जी ने सबको सन्यास नाम दिए थे
संसार-ताप दग्ध जन-साधारण को शीतल छाया देने वाले विशाल वटवृक्ष-सम स्वामी विवेकानंद
और स्वामी जी ने स्वयं अपना नाम धारण किया था स्वामी विविधानंद वि इज सरप्राइजिंग विविध का दो तरह के सन्यास है। हमको पता है विविधिशा सन्यास और विद्वत सन्यास। त्रिविधिशा सन्यास का अर्थ है कि इस तरह का साधु जिसने कि अभी साधन मार्ग में पैर ही रखे हैं प्रारंभ ही किया है उसको सिद्धि प्राप्त करने की बाकी है और विध्वत सन्यास अर्थात कि जिसने साधन मार्ग में सिद्धि प्राप्त कर ली है और बाद में जो सन्यास धारण करता है तो स्वामी जी को तो निर्विकल्प समाधि मिल ही चुकी थी। फिर उन्होंने विविध इस तरह का नाम क्यों रखा? तो शायद यही हो रखा होगा कि ठाकुर ने उनकी यह जो उपलब्धि थी उसके ऊपर में ताला लगा दिया था। अर्थात कि फाइनल के बाद में सेमीफाइनल निर्विकल्प समाधि प्राप्त तो कर दी है किंतु अभी फिर से यही संसार चक्र नरेंद्र के सामने फिर से उपस्थित हुआ है। किंतु यह वो संसार है जहां पर वह अपनी नहीं पूरे समाज की चिंता करने वाले हैं। पूरे समाज का किस तरह से कल्याण हो। उनका जो अहम जो उनके देह तक सीमित था पूरे विश्व में फैल गया है। प्रत्येक व्यक्ति के भीतर में वह ठाकुर का ईश्वर का दर्शन करते हैं। वही ब्रह्म अग्नि जो कि उन्होंने अपने हृदय में प्रज्वलित पाई है। वही विजा होम रूपी अग्नि जिसका की आहुति में उन्होंने अपनी सभी कामना वासनाएं भस्मीभूत कर दी है। वही वीरजा होम की अग्नि उनको प्रत्येक नर नारी के हृदय में देखने को मिली होगी। प्रत्येक नर नारी के हृदय में किस तरह से आध्यात्मिकता का संचार किया जाए। यह जीवन व्रत उन्होंने धारण करना था बोल कर के फिर से उनको यही एकड़े एक जिसको कहते हैं ना अल्फाबेट से स्टार्ट करना है वह सब्सिडी की रमत पता है ना स्नेक एंड लेडर। तो स्नेक एंड लेडर में क्या होता है कि आप एक दो तीन ऐसा करके आप जाते जाइए। फिर यदि आपके वहां पर यदि लेडर आ जाती है, सीढ़ी आ जाती है तो सीढ़ी चढ़ के फटाक करके आप ऊपर चढ़े जाएंगे। और यदि सांप आ जाता है तो फटाक करके आप नीचे आ जाएंगे। तो मुझे याद है कि वो मेरे पास में एक ऐसा बोर्ड था वो स्नेक एंड लेडर वाला। उसमें ऐसा था कि आपको 1 तक पहुंचना है ना। 99 पे सांप है। और 99 पे इस तरह का सांप है कि उसकी पूंछ जो है सीधा नंबर एक पे आ जाती है। यानी कि आपने मेहनत करके 1 2 3 4 5 6 करके 99 तक गए यदि 99 के ऊपर में आपका यह आ गया तो फिर सीधा नंबर वन पे आ जाएंगे। फिर से आप पूरा स्टार्ट कीजिए। ट्रिक क्या है जीतने का कि 98 या 96 से सीधा 100 पे जाया जाए। तो यहां पर भी स्वामी जी के साथ में भी यहां पर ऑलमोस्ट ब्रह्म ज्ञान प्राप्त हो ही चुका है। ऑलमोस्ट क्या ब्रह्म ज्ञान में ऑलमोस्ट नहीं होता। वो ब्रह्म ज्ञान ब्रह्मज्ञान ही है। तो ब्रह्म ज्ञान प्राप्त हो चुका है। इसके बाद में भी फिर से जैसे कि नंबर वन पर आकर के उनको पूरा युद्ध करना है। किंतु पहले अपने लिए किया था। अभी इनको पूरे जगत संसार के लिए युद्ध करना है तो हो सकता है कि स्वामी जी ने अपना नाम इसलिए विविध रखा हो
वराहनगर मठ में सन्यास विधि और सन्यास नाम-ग्रहण
ए विवरण आरो उल्लेख आ छे जे नरेंद्र व्यतीत अपर शकले ओई दिन तहा देर अधुना प्रसिद्धो सन्यास नाम गुली ग्रहण करेन इस विवरण में यह भी उल्लेख है कि नरेंद्र के अलावा बाकी सब ने उसी दिन उनका अभी कि आज जो जगत प्रसिद्ध सन्यास नाम है वो ग्रहण किया था किंतु नरेंद्र नाथर नाम हो विविषानंदो किंतु नरेंद्रनाथ का नाम हुआ था विविधानंद द्वितीय आर एकटी विवरण आमरापाई स्वामी शिवंदर एक खानी पत्र अच्छा इसका अर्थ क्या है कि यह जितने लोगों ने सन्यास धारण करके जो नाम एक बार लिया है तो वही नाम उन्होंने जीवन भर यूज किया है वही है कि स्वामी जी ने अपना नाम बीच-बीच में बदला है। हमको पता है यहां पर विविषानंद है। फिर बाद में जब वह वेस्ट इंडिया में जाते हैं तो कहीं सच्चिदानंद नाम यूज करते हैं। और फिर आखिर में वह विवेकानंद नाम आता है। और विवेकानंद नाम को रिलेटेड भी कहा जाता है कि किसने दिया है यह नाम। वो कहीं राजा ने दिया है ना कहां से आया है। वह सब बातें हैं। तो किंतु गंभीरानंद जी कहते हैं कि स्वामी जी ने जिस तरह से नाम बदले हैं बाद में इस तरह से अन्य किसी गुरु भाई ने नहीं किया है। विजा होम करके जो नाम नरेंद्रनाथ ने उनको दिया था वही नाम उन्होंने अपना जीवन भर यूज किया है। द्वितीय आर एकटी विवरण आमरापाई स्वामी शिवंदर एक खानी पत्र और एक विवरण हमको मिलता है स्वामी शिवनंद के एक पत्र में से 1890 क्रिस्टाब्दे 4 जनवरी तनी गंगाधर प्रश्न उत्तरे जाना छे जे तहारा सन्यास ग्रहण पूर्वक नाम परिवर्तन करिया छे 1890 1890 यानी कि एटलीस्ट तीन चार साल के बाद की बात है। 4 जनवरी को उन्होंने गंगाधर को एक पत्र गंगाधर स्वामी अखंडानंद जी तो उनको एक पत्र के उत्तर में लिखा था कि उन्होंने सन्यास ग्रहण करके अपना नाम परिवर्तन किया है। पत्र ए रूप एकटी तालिका देवा होया छे। इस पत्र में यह एक लिस्ट दिया हुआ है। लिस्ट में सभी का सन्यास नाम लिखा है। क्या है? निरंजन का नाम है निरंजनंद। हरिबाबू का नाम है तुरियनंद स्वामी योगेन योगानंद स्वामी तुलसी निर्मलांद स्वामी बाबूराम प्रेमानंद स्वामी दक्ष ज्ञानानंद स्वामी लाटू अद्भुतानंद स्वामी काली अभेदानंद स्वामी शशि रामकृष्णानंद स्वामी गोपाल दादा अद्वैतानंद स्वामी देखिए यहां पे दो नाम है जो कि हमारे ऑफिशियल जो अपने सन्यासी शिष्य हैं ठाकुर के उसमें नहीं आता एक है दक्ष दूसरा है तुलसी। तो देखिए कि यह पत्र लिखा गया है 1890 को और जो ओरिजिनल सन्यास हुआ था 1887 को। तो ओरिजिनल सन्यास के समय जिन लोगों थे उनमें से यह दो नाम नहीं है। हो सकता है उन्होंने बाद में विजा होम करके सन्यास लिया हो। पत्र नीचे लेखक तारकनाथ निजो शही आ शिवनंद नाम और इस पत्र के आखिर में तारकदा महापुरुष महाराज ने अपना सन्यास नाम से साइन किया है स्वामी शिवनंद आश्चर्य विषय आश्चर्य की बात है ए तालिकाए स्वामी विवेकानंदर उल्लेखनाई इस लिस्ट में स्वामी विवेकानंद का उल्लेख नहीं है हो सकता है कि स्वामी जी के साथ में अलग से गंगाधर महाराज का तो बहुत सारा पत्र लेखन हुआ था पत्रालाप हुआ था उसी में स्वामी जी ने अपनी ओर से पूरा विवरण दे दिया होगा। आर एक विवरण पाई स्वामी अखंडानंद स्मृति कथा और एक विवरण मिलता है स्वामी अखंडानंद जी की स्मृति कथा में ताहार मते सन्यासीरा मठे अवस्थान काले गेवा वस्त्र धारण कर ले ओ बहिर्गमन काले श्वेतो वस्त्र परिधान करते इनके अनुसार मठ के सन्यासी मठ में रहने के समय गेरवा वस्त्र पहनते थे किंतु जब बाहर जाते थे तब सफेद कपड़े ही पहनते थे श्वेत वस्त्र ही पहनते थे स्वामी शिवंद पत्रे ओ देखा जाए त गंगाधर के सावधान करते छेन स्वामी शिवंद के पत्र में भी देखा जाता है कि वह गंगाधर महाराज को सावधान कर देते हैं क्या पत्रे ठिकाना जेनो सन्यास नाम ना लिखिया बसेन पत्र के ठिकाना जो एड्रेस होता है उसमें कहीं सन्यास नाम न लिख बैठे मने हो गिरवा बस्तेर न्याय सन्यास नामो तखन व्यवहार करते विशेष विघ्न छीलो ऐसा लग रहा है कि जाहिर में पब्लिक में जिस तरह से गेरुआ वस्त्र व्यवहार करने में एक तरह का विघ्न था वैसा ही विघ्न सन्यास नाम को व्यवहार करने में भी था। हो तो बंगो समाज अनभिज्ञताई इहार कारण हो सकता है कि बंग समाज बंगाली समाज की अनभिज्ञता अर्थात कि इग्नोरेंस ही इसके पीछे का कारण थी। सन्यासे प्रति सामाजिक विरोधर आभास आमरा पोरे पाइबो सन्यास के बारे में जिस तरह का सामाजिक विरोध था इसके बारे में हम देखेंगे बाद में स्वामी अखंडानंदो आरो उल्लेख करिया छे जे श्री रामकृष्ण देहत्यागे द्वभरे मध्य नरेंद्रो राखाल बाबूराम शरद शशि सुबोध लाटू गोपाल दादा तारक ओ काली बिरजा होम संपादन पूर्वक सन्यास ग्रहण करें स्वामी स्वामी अखंडानंद ने भी उल्लेख किया है कि श्री रामकृष्ण देव के देह त्याग के दो साल के भीतर में ही नरेंद्र राखाल बाबूराम शरद शशि सुबोध लाटू गोपाल दादा तारक और काली ने विरजा होम करके सन्यास ग्रहण किया था अवश्य ओ काले गंगाधर तिबद्ध प्रमाणे व्यापतो छिलेन एवं तनी सन्यास नाम गुलर उल्लेख कोरे नाई अवश्य इस समय गंगाधर अर्थात कि अखंडानंद जी तिब्बत में तिब्बेट में भ्रमण कर रहे थे और इसीलिए उन्होंने सन्यास नाम का उल्लेख नहीं किया है। इसके बाद में वो जब स्ट्रगल कि बंग समाज बंगाली समाज कोलकाता में यह गेरुआ धारण करना फिर यह सन्यास नाम लेना इस सब के रिलेट कि किस तरह का प्रजुडाइस था। वह सब विवरण अभी आएगा इसके बाद में जिसको कि अभी हम हमारे नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।
प्रश्न: धार्मिक विधियों का कितना महत्व है! जैसे की विवाह की विधि के बाद लड़की को अपने पति का घर अपना लगाने लगता है.
ये रिचुअल्स है ना हमको ये ट्रांजिशन करने में हेल्प करते हैं। अब मान लीजिए आपने कोई रिचुअल नहीं करके शादी कर ली सीधा-सीधी और अभी आजकल ये लिव इन अरेंजमेंट वगैरह होता भी है। बिना रिचुअल्स के आप साथ में रहते भी हैं। किंतु इन सबका फिर यह लाइफ मतलब कितना टिकेगा? राइट? अभी आज साथ में रह रहे हैं, कल साथ में नहीं रह रहे हैं। जबकि रिचुअल्स जब होते हैं तो आपका एक पूरा एक ओरिएंटेशन होता है कि नहीं यह जीवन भर का व्रत है, उसका पालन करना ही है। जहां पे डिवोर्स या तो फिर यह सेपरेट हो जाना बड़ा आम बात है। वहां के आप बच्चों का माइंडसेट देखिएगा कि वह प्रॉब्लम चाइल्ड बचपन से ही वह कोई ना कोई एक साइकोसिस का भोग बन करके रह जाते हैं। आज जितनी भी आईवी लीग कॉलेजेस है अमेरिका की देखेंगे कि 60 टू 70% आपको एशियन ही दिख जाएंगे अमेरिकनों की वजह। क्यों? क्योंकि एशिया में क्या है? एक स्टेबल फैमिली सिस्टम है। बोल के अपने यहां पे बच्चों का जो परवरिश होता है, वह एक स्टैंडर्ड रीच से होता है। उनको एक एक मेंटल नरिशमेंट मिलता है। बोल के वे लोग स्टडी में काफी एडवांस होते हैं। ऐसा नहीं है कि कि बाय डिफॉल्ट अपना आईक्यू ज्यादा है। अपना नरिशमेंट इस तरह से होता है। सो दैट इज वन बिग थिंग। और ये आपने वो ऐसा कहा ना कि कि उनके घर जाकर के रहना कि पति के घर जाना। देखिए कि मां के जीवन में भी एक घटना है। उस समय राधु राधु मां के साथ में झगड़ा करके चली गई। तो मां के साथ में झगड़ा करके चली गई और अपने पति के वहां पर रह रही है। तो मां को उस समय बड़ा दुख हो गया। तो मां ने अपना गुलाब मा की किसी को कहा कि देखा आपने मैंने राधु की इतनी परवरिश की और फिर भी मुझे छोड़कर के अपने पति के घर चली गई। मुझे बहुत दुख हुआ इस बात से तो गुलाब मां सामने कहती है कि मां आप भी तो अपने पति पिताजी का घर छोड़कर के ठाकुर के पास आई थी दक्षिणेश्वर आप यह बात भूल गई क्या? तो फिर मां और फिर क्या उत्तर दे बोल के मां चुप हो गई। [हंसी]
एक से अधिक ध्यान-पद्धतियाँ सीखने का महत्त्व
दूसरा एक बात बताऊं। देखिए विदिन रामकृष्ण विवेकानंद ट्रेडिशन इटसेल्फ यह साधना का इतना वैविध्य है कि हम लोग कभी-कभी सोचते हैं कि जप ही है एकमात्र साधना किंतु ऐसा नहीं है। बहुत तरह के डिफरेंट-डिफरेंट मेथड्स आप इस्तेमाल कर सकते हैं और दे आर परफेक्टली लेजिटमेट। बस वही है कि उसके बारे में आपको थोड़ा सिस्टमेटिक ट्रेन करने वाला कोई चाहिए। अभी यहां पे मैं एव्री सैटरडे को मेडिटेशन क्लास लेता हूं। तो वहां पे मैं डिफरेंट-डिफरेंट मेथड्स ऑफ मेडिटेशन बताता हूं। तो मैं देखता हूं कि यह जितनी भी मेथड्स मैं बताता हूं, ऑल ऑफ देम आर विदिन द फोल्ड ऑफ हिंदूइज़्म इटसेल्फ विद इन दिस रामकृष्ण विवेकानंद ट्रेडिशन इटसेल्फ। माने बाहर से कुछ नहीं है। इसके बावजूद यहां पे इतना वैविध्य है। सो दैट वी कैन लर्न। देखिए मन क्या है? मन एक मंकी की तरह है। हम सबको पता है। आप एक ही आप एक पकड़ करके बैठेंगे जीवन भर करेंगे। जैसे वो मोती का उदाहरण ठाकुर देते हैं। वो एक शेल होता है ना। शेल के भीतर में यह एक रेती का एक दाना जाता है। फिर यह शेल बंद हो जाता है और उस समुंदर के नीचे में चला जाता है। फिर इसी यह रेती के दाने के आसपास में पूरा वो मोती तैयार होता है और फिर यह शेल ओपन होता है। उसमें से मोती बाहर आता है। किंतु इस तरह का डेडिकेशन कि एक बीज गुरु ने दे दिया। अभी उसी बीज के ऊपर में पूरा जीवन कार्य करते जाइए। इज हाउ डिफिकल्ट। देखिए दिस अ वेरी इंटरेस्टिंग स्टोरी। अ निवेदिता अघोरमणि देवी को मिलने के लिए जाती है। पहली बार उनका दर्शन होता है। तो शी इज वेरी इंप्रेस्ड कि इतना सुंदर जगह है। गंगा के किनारे हैं। अघोरमणि देवी गोपाल गोपाल की मां अकेली रहती है। विधवा है तो वो गंगा के पानी से अपने कुटिया की सफाई करती है। घर में खाने का तो कुछ है नहीं। ज्यादा कुछ मेहमान आते भी है तो वह सूखी हुई कैंडी है वह उनको देती है तो शी इज़ वेरी हैप्पी और आकर के स्वामी जी को बड़ा उत्साह के साथ में बताती है कि मैंने वह गोपाल की मां का दर्शन किया तो स्वामी जी कहते हैं आ यू हैव मेट द रियल इंडिया इंडिया ऑफ प्रिय प्रेयर्स एंड टियर्स विजिल्स एंड मेडिटेशन दैट इंडिया हैज़ गॉन नेवर टू रिटर्न अर्थात कि तुमने असली इंडिया का दर्शन किया है। असली भारत का दर्शन किया है। इंडिया ऑफ प्रेयर्स एंड टियर्स। यह प्रार्थना और आंसुओं माने आंसू बहाते बहाते जो प्रार्थना करना है। विजिल्स एंड दिस माने प्रेयर्स एंड विजिल्स अर्थात कि रात भर जग करके ईश्वर का नाम लेना है। यह पुराना भारत चला गया। कभी वापस नहीं आएगा। यह स्वामी जी कहते हैं। इसके पीछे का अर्थ क्या है? यह नहीं है कि यह प्रेयर है, टियर्स है, यह विजिल्स है, फास्टिंग है। वह सब साधना का भाग नहीं है। किंतु आज की हमारी जो माइंडसेट है, उसको यह एक लिमिटेड जो साधना का क्षेत्र है, उससे सेटिस्फेक्शन नहीं होने वाला है। बोलकर के ही स्वामी जी ने ये कर्म योग का अनुष्ठान किया। यदि आपको ठीक-ठीक साधना करनी है तो कर्म योग को आपको इसका पार्ट बनाना ही होगा। और इवन जिसको कि हम ट्रेडिशनल साधनाएं कहते हैं उसमें भी विदिन रामकृष्ण विवेकानंद ट्रेडिशन देयर इज अ लार्ज डायवर्सिटी जिसको कि हमको अपनाना होगा
वर्तमान समय में स्वामीजी के कर्मयोग की प्रासंगिकता
और देखिए कभी-कभी मुझे डर यह लगता है नहीं कि हम ही जैसे कि स्वामी जी को फिर से यहां से भगा रहा है। अभी आजकल यह भागवत कथा वगैरह का चला है। तो इस तरह से बातें करनी शुरू हो गई है। हमारे ही भीतर में से कोई-कोई कि यह जो रूरल डेवलपमेंट का कार्य है, डिस्पेंसरी चलाना है या तो फिर यह जितना भी सर्विस एक्टिविटी है, स्कूल है, कॉलेज है, इसका अभी कोई रिलेवेंस नहीं रहा। एक समय था जबकि भारत गरीब था तो हम लोग रूरल डेवलपमेंट करते थे। अभी हम लोगों को यह कथा, प्रेयर, विजिल, फास्टिंग इसी सब चीजों में वापस आ जाना है। सो यह एक एक पूरा ज्वार की तरह चला है पिछले कुछ समय से। तो मुझे डर यही लग जाता है कि स्वामी जी को ऑलरेडी हम हम ही लोग डिस्कार करना शुरू कर दिए। बाहर वाले तो क्या करेंगे? हम ही लोगों ने स्वामी जी को ऐसा कहना शुरू कर दिया है कि इंडिपेंडेंस के बाद के 50 60 साल आपकी जरूरत थी। आप वापस अभी चले जाइए यहां से। [हंसी] ना यहां पे जैसे आपने कहा कि यह बात तो सही ही है कि पहले अन्नदान उसके बाद में जीवन दान उसके बाद में विद्या दान उसके बाद में ज्ञान दान। ये जो स्टेजेस है स्वामी जी ने खुद ने ही कहे हैं। किंतु गोइंग डिपर देन दिस कि कर्म योग एज ए साधना देखिए आप एक्चुअली क्या साधना करते हैं कर्म योग के नाम पे ज्ञान दान देते हैं जीवन दान देते हैं। दैट इज अनदर थिंग कि मैं कर्म योग कर रहा हूं लोक कल्याण के लिए लोगों के भीतर में ईश्वर देख के उस ईश्वर की मैं पूजा कर रहा हूं। दैट एटीट्यूड जो स्वामी जी ने चेंज किया है। अभी तक देखिए अभी हम लोग जो कथा भी करते हैं तो नजर के सामने वो जिस जो भी भगवान की कथा करते हैं वो भगवान को नजर के सामने रखते हैं। कहते हैं कि उनको सुना रहे हैं। यानी कि भगवान को मूर्ति में ही देखना। भगवान को अवतार में ही देखना। भगवान को धर्म की किताब में ही देखना। दैट इज जो एटीट्यूड था वो स्वामी जी ने चेंज किया है। फंडामेंटली भगवान को जनसाधारण के भीतर में देखिए। दैट एटीट्यूड शिफ्ट जो है वह अभी भी हम नहीं समझ पाए हैं।
प्रश्न: आज हम वराहनगर मठ की तपस्या-गाथाएँ सुनकर कितने रोमांचित हो जाते है! स्वामीजी कैसे गुरुभाईओ को त्याग कर प्रव्रज्या करते है!
वह सब कहानी आएगी। बड़ी सुंदर कहानी है। स्वामी जी किस तरह से अपने गुरु भाइयों का पीछा छुड़वाते हैं। बार-बार उनको कहते हैं पीछे मत आओ। बड़ी सुंदर कहानियां है। वह सब आएगी। वो मिराट में फिर दिल्ली में स्वामी जी झगड़ा करते हैं। क्यों मेरे पीछे आ रहे हो? देखिए ऐसी सिचुएशन में ना शशि महाराज का कंट्रीब्यूशन हमको रिकॉग्नाइज करना होगा। क्योंकि जब सभी लोग बिखर गए थे तो शशि महाराज अकेले थे कि मठ को जागृत करके बैठे थे। तो मठ का जो कंटिन्यूटी है ना उसका एक बहुत बड़ा श्रेय शशि महाराज के ऊपर है। सो वो एक हमको स्वीकार करना होगा। हां और और उनकी श्रद्धा ऐसी थी कि इवन स्वामी जी को भी मार देते थे। वो जो स्वामी जी के साथ झगड़ा कर लेते थे। स्वामी जी कहते थे ठाकुर की पूजा उठा दो। हम लोग तो भिखारी सन्यासी हैं। कब कहां पे रहेंगे? कब भिक्षा करके खाएंगे कुछ ठीक नहीं है। बंद करो पूजा पूजा। तो स्वामी जी को मारने के लिए दौड़े थे उनके पीछे। वो उनकी श्रद्धा थी। क्योंकि देखिए आज अपना संघ जो खड़ा है वह ठाकुर की पूजा उसमें बहुत इंपॉर्टेंट पार्ट है कि आप इवन जो छोटा सा सेंटर होता है एक या दो साधु ही होते हैं और विधिवत पूजा होती है तो साधु वो मठ छोड़कर के कहीं जा नहीं पाएंगे ज्यादातर समय के लिए क्योंकि आपको इमीडिएटली वापस आकर के पूजा करनी है वो शिबुदा का उदाहरण है कामर पुकुर में तो वो रघुवीर की पूजा की ना तो एक दिन शिबुदा आ गए मां के पास में जय राम बाटी तो मां ने पूछा शिव तू इस समय आया है तो फिर तुम वापस कब जाओगे वो जो रघुवीर की पूजा कौन करेगा तो शिबुदा कहते हैं उनको शयन करवा के शीतल देकर के मैं एडवांस में सब करके आया हूं तो मां ने कहा अरे तुम्हारे रहते रहते ही तुम ऐसा करोगे पूजा में फांकी मारोगे तो तुम्हारे बाद में क्या होगा जाओ जाओ तुम अभी वापस जाओ जो शीतल देना है जो पूजा जो जिस तरह से जिस टाइम पर करनी है उसी टाइम पर करना है यानी कि देखिए कि यह कंस्ट्रेंट है सभी साधुओं के ऊपर में कि एक जगह है। जहां पर ठाकुर को विराजित किया गया है, विधिवत स्थापित किया गया है, वहां पर विधिवत सेवा चलती है। आप उसको छोड़कर के बहुत ज्यादा दूर नहीं जा पाएंगे। बोलकर के जो कंटिन्यूटी है ना इसके पीछे में यह सेवा बहुत बड़ी है। वरना जैसे हमने देखा ही कि गुरु भाई तो कहां तितर-बितर हो गए थे और उसके बाद को उनको देखकर के हम लोग यदि ऐसा करना शुरू कर दिए होते तो संघ एक इंस्टीट्यूशनल एंटिटी के रूप में टिकता ही नहीं और और वो लेटर में शशि महाराज की प्रशंसा भी करते हैं कि शशि मठ जागृत करके बैठा हुआ है वहां पे और वह भी ज्यादा टिकते नहीं ना। देखिए यह जो भ्रमण का कीड़ा तो सबके भीतर में था। तिबेट में खोल भी दिया होता तो वहां थोड़ी ना तिबेट में टिकने वाले थे। वो तो इमीडिएटली वापस आ गए थे। [हंसी] और देखिए अपना जो हिस्ट्री है ना इतना रिच है और इतना उसके भीतर में थ्रेड्स है। आप जितना डीप में जाएंगे ना आपको लगेगा यह तो कुछ नहीं है। मुझे तो सबसे बड़ा डर यही लगता है कि मेरी लाइफ टाइम में यह जो सब टॉपिक चालू हुए हैं ना वो खत्म ही नहीं होंगे शायद। [हंसी] स्वामी जी का लाइव जो हमने स्टार्ट किया वो मेरे रहते खत्म हो तो बहुत अच्छा है। [हंसी] ओम