Prayer
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का जीवन वराह नगर मठ वा पीरियड चल रहा है। वराह नगर मठ में गुरु भाई रहने को आ गए हैं और अभी वहां पर प्रचंड तपस्या होने वाली है। तो वह सब घटनावली वह सब विवरण देखेंगे। अनफॉर्चूनेटली बड़ा ही अल्प विवरण अपने पास में है। प्रारंभ के कुछ दिनों का विवरण मास्टर महाशय ने किया है। बाद के कुछ वराह नगर मठ को विवरण की दृष्टि से यदि तीन फेजेस में बांट दें तो प्रारंभ का जो विवरण है वह हमको मास्टर महाशय की डायरी में से मिलता है। बीच वाला जो विवरण है वो हमको स्वामी जी के जो छोटे भाई है मोहिन बाबू उनकी किताब है श्रीमद् स्वामी विवेकानंदर जीवनर घटनावली उसमें मिलता है और आखिर आखिर के दिनों का जो विवरण है वह हमको वीजानंद जी की अतिर स्मृति वह एक किताब है और वीरानंद जी या तो फिर उस समय जो कुछ लड़के आए थे तो उनकी कुछ विवरण में मिलता है तो यह प्रारंभ आरंभ के दिन है बोलकर के हमारे पास में मास्टर महाशय का विवरण यहां पर है अवेलेबल। ऑफकोर्स बाद बात बाद में जब स्वामी जी एक बार ट्रैवल करना शुरू करते हैं। दो बार स्वामी जी गए हैं वराह नगर मठ से। तो वो जो ट्रैवलिंग कर रहे हैं तो उस समय का विवरण अपने पास में है। माने जो एक जो कंप्लीटली छोड़ दिया वराह नगर मठ उससे पहले दो बार गए थे आए थे। गए थे आए थे तो इस तरह से जो स्वामी जी की जो टेंपरेरी ट्रैवल जो है आइटिनरीज उसका विवरण है अपने पास में स्वामी जी लेटर भी लिखते हैं प्रमदादास बाबू को तो वो लेटर्स वगैरह भी है तो अपार्ट फ्रॉम स्वामी जी मठ का सिर्फ यदि विवरण देखें तो यह तीन है और फिर चतुर्थ ऑफ कोर्स स्वामी जी की आइटिनरीज का स्वामी जी की उत्तर भारत यात्राओं का विवरण हमको मिलता है। तो यहां पर मास्टर महाशय हमको बताते हैं और मास्टर महाशय का भी हमने देखा कि वह अप्रैल 1886 उसी के समय एक आखिरी बार आए थे। माने आखिरी विवरण उन्होंने कथामृत में लिखा है। उसके बाद में ठाकुर की जो अवस्था ठाकुर का स्वास्थ्य इस तरह से डिटेरेट होना शुरू हुआ कि फिर उन दिनों का विवरण लिखना भी जैसे कि मास्टर महाशय को कष्ट होता होगा। हमको तो पता है कि यह सब कथामृत खास करके किस तरह से लिखा गया। तो मास्टर महाशय वो जो अपनी उनकी स्कूल थी उसकी छत पे ना कहीं पर जाकर के बैठते थे और उनकी जो शॉर्ट हैंड नोट्स जो है सब उसमें से वो चिंतन करते थे कि हां यह कुछ शॉर्ट नोट्स मेरे पास में है। यह कुछ पॉइंट्स है। तो उस दिन को एक्चुअली डिटेल्स सब क्या थी? तो मास्टर महाशय उस डिटेल पर ध्यान करते थे और फुल डिटेल जो है वह कथामृत में लिखते थे। तो अभी नेचुरली है कि जिस दिनों का विवरण जिस दिनों की शॉर्ट नोट्स मास्टर महाशय ने लिखी है काशीपुर के आखिरी चार महीने की उस समय के दिनों पर ध्यान करना वह भी तो कितना कष्टकर होगा। ठाकुर का कष्ट उस समय नहीं सहा जा रहा था। आज वह यदि बैठकर ध्यान करेंगे तो कैसे होगा? तो फिर वह इस वो दिन अप्रैल 1886 के बाद के दिन उनके ऊपर में मास्टर महाशय ने ध्यान किया ही नहीं। तो बोल के वह नोट्स अपने पास में कथामृत में वह विवरण नहीं है। तो वहां से स्टार्ट करके यह सीधा शिवरात्रि 1887 की शिवरात्रि 21 फरवरी तक का कथामृत में गैप है। फिर 21 फरवरी से मास्टर महाशय का विवरण फिर से प्रारंभ होता है। ऑलरेडी
श्री रामकृष्ण की महासमाधी के बाद माँ सारदा और त्यागी युवकगण की तपस्या प्रारम्भ हो रही है
हमने फर्स्ट पैरा देख लिया कि किस तरह से नरेंद्र वगैरह गुरु भाई वराह नगर मठ में आकर के एक के बाद एकजुट हो रहे हैं। कुछ अभी भी वृंदावन है। वृंदावन में मां शारदा देवी गई है। उनको साथ में उनकी रक्षा करने के लिए सेवा करने के लिए जब मां वृंदावन से वापस आएगी कामारपुकुर जाएगी। मां की भी तपस्या के दिन प्रारंभ होने वाले हैं। और यहां पर वराह नगर मठ में गुरु भाइयों की भी तपस्या प्रारंभ होने वाली है। तो ठाकुर की महासमाधि के बाद में गुरु भाई और मां दोनों को काफी तपस्या करनी पड़ी और यह तपस्या के दिनों का अंत सही में देखा जाए तो तभी आएगा जब कि स्वामी विवेकानंद का भारत में आगमन हुआ अमेरिका से। यह 18 1897 के जनवरी महीने में तो तभी यह इन लोगों की तपस्या का अंत आएगा। यानी कि देखिए कि 10 साल तपस्या गुरु भाइयों को भी और मां को भी करनी है। तो यह 10 साल की तपस्या अभी प्रारंभ होती है। और देखिए कि यह जो महापुरुषों का जो जीवन है बाहर से लग रहा है कि अरे ठीक से खाने को भी नहीं है। ठीक से वस्त्र भी नहीं है। पहनने को घर में भी देखिए कि इतनी कोई फैसिलिटीज नहीं है। समाज की ओर से भी सतत एक तरह की लांछना आपके ऊपर में बहाई जा रही है। यहां पर यह लोग गेरुआ धारण किए हुए सन्यासी थे तो समाज उनके ऊपर में क्रोधित था कि किस तरह से यह लोग जो आपका एक धर्म होता है युवक का धर्म क्या है? तो नौकरी करके अपना करियर बनाना और फैमिली की संभाल रखना। यह तो युवक का धर्म है। उसको छोड़कर के कहां वो पागल परमहंस के पल्ले में पड़े और अभी घर बार छोड़कर के यहां पे ये टूटे फूटे भूतिया मकान में रह रहे हैं। भिक्षा मांग के जीवन बिताते हैं और बीच-बीच में उदाम नृत्य कीर्तन करते हैं। तो यह क्या समाज के लिए गलत आदर्श नहीं होगा क्या? तो जैसे वराह नगर मठ में गुरु भाइयों के ऊपर में लांछना की बारिश होती थी। वैसे ही कामार पुकुर में देखेंगे कि मां शारदा वैसे तो सफेद वस्त्र धारण किए हैं। किंतु हमको यह भी पता है कि लाल कलर की किनारी थी बॉर्डर थी मां की साड़ी में और फिर वो जो चूड़ियां जो है वो ठाकुर ने जो बनाई बनाई थी मां के लिए सोने की वो भी मां धारण करती थी। तो फिर समाज में वह एक बात कि अरे विधवा का जो धर्म है उनका पालन नहीं करती वगैरह वगैरह तो यहां पर मां के ऊपर में लांछना मां के ऊपर में इस तरह का कटु व्यवहार फिर यह रामलाल दादा वगैरह तो कम नहीं थे वो वहां पे एक बार गए कामरार पुकुर उस समय मां वहां पर नहीं थी शायद जय राम बाटी गई थी तो वहां पर घर का सब डिवीजन वगैरह कर दिया यह इसका यह उसका यह उसका जो ठाकुर जिस कमरे में रहते थे वह मां को दिया बाकी सब आपस में बांट लिया। वह एक पागलपन फिर यहां पे मां को वह जो पेंशन मिलता था ₹5 दक्षिणेश्वर काली मंदिर की ओर से वह रामलाल दादा ने जाकर के बंद करवा दिया कि मां के तो बहुत सारे डिवोटी है तो मां को पैसों की कोई जरूरत नहीं। अरे भाई तुम्हारा खुद का तो पैसा है नहीं। यह धनी जमींदार देते हैं ठाकुर पर श्रद्धा थी बोल के ठाकुर की धर्मपत्नी को यह देते हैं थोड़ा सा पेंशन। तुमको क्या पेट में दर्द होता है? किंतु नहीं वह बंद करवा दिया। उस समय नरेंद्र ने कहा था कि देखिए इस तरह से मां को जो मिलता है पेंशन उसको बंद मत करवाइए क्योंकि मां के कष्ट के दिन प्रारंभ होने वाले हैं। नरेंद्र को समझ में आ रहा था क्योंकि देखिए गुरु भाई लोग खुद अपने जो साधन भजन में इस तरह से डूब गए थे कि मां की चिंता करें। मां की संभाल ले। वह सब संभव ही नहीं था। वह तो एक बात। दूसरा कि वराह नगर मठ सन्यासियों का मठ था। वहां पे मां को आकर के रहना वो तो एक उचित नहीं है स्त्रियों का वहां पर रहना। काशीपुर में या तो श्यामपुकुर में तो ठीक था। ठाकुर की खुद की प्रेजेंस थी। किंतु ठाकुर की प्रेजेंस के बिना मां वराह नगर मठ में आकर रहे। वो तो म समाज भी एक्सेप्ट नहीं करेगा। मां भी एक्सेप्ट नहीं करेगी। एक्चुअली यह डिस्कशन हुआ था कि मां जब कामारपुकुर में थी और पहली बार जब कोलकाता के भक्तों को पता चला कि मां इस तरह से कष्ट में रह रही है तो उन्होंने मां को बुलावा भेजा कि इनविटेशन भेजा कि मां आप यहां पर कोलकाता आकर के रहिए। तो मां को तो पता है कि यह समाज कितना दुष्ट है, कितना बदमाश है। एक लड़की की बात जय राम भाटी में ही। वो बेचारी बाल विधवा थी और बचपन से ही उसको अभी बाल विधवा का जो परिस्थिति था कठोरता करनी है नहीं अच्छा खाने को मिलेगा नहीं अच्छा पहनने को मिलेगा सब समय आपके ऊपर में एक धार्मिक कोई भी विधि में भाग नहीं ले पाएगी क्योंकि अशुभ माना जाता है विधवा की प्रेजेंस तो यह बेचारी बचपन से ही इस तरह से सब तरह से उसकी लांछना की बारिश हो रही है उसमें वह बेचारी रह रही है। अभी किसी व्यक्ति के साथ में उसका संबंध बना और फिर समाज में और लांछना और उसकी निंदा और उसका तिरस्कार और उसके पीछे में लोगों का लगना। तब मां ने कहा था देखो कि जब वह बेचारी कष्ट करके बाल विधवा का जीवन जी रही थी। उस समय किसी को भी यह नहीं के चलो उसको थोड़ा हेल्प करें। उसकी थोड़ी सहाय करें। उसकी थोड़ी सी खबर रखें। वो कुछ नहीं। उसको बेचारी को अपने हाल पर छोड़ दिया। अब जब उसकी एक गलती हो गई है तो सब लोग समाज के प्रतिष्ठित जय राम भाटी के जय राम भाटी के जितने भी यह लोग घर है सब सब उसके ऊपर में टूट पड़े हैं उसको गाली देते हैं यह किस तरह का न्याय है तो मां को ऑलरेडी पता था कि यह समाज की परिस्थिति कैसी है तो जब यह कोलकाता से इनवाइट आया कि आप आइए यहां पे आपको वहां पर कष्ट होता है हम भक्त लोग आपकी संभाल रखेंगे उस समय किंतु मां को पता था कि मैं जाऊंगी तो यहां पर 10 लोग 10 मुंह से बात करेंगे। तो फिर मां ने फिर सबको पूछना चालू किया। खास करके यह जो प्रसन्नमई है तो प्रसन्नमई को जाकर के मां ने कहा कि मैं इस तरह से वहां पर जा रही हूं तो क्या आपको ऐसा कोई गलत तो नहीं कर रही हूं मैं? तो क्योंकि लोग कहेंगे कि ऑलरेडी लोगों ने बोलना शुरू कर दिया था। इनवाइट आया है सब पता तो चल ही जाता है गांव में तो गोसिपिंग तो एक मेन काम है और कोई एंटरटेनमेंट तो था नहीं मोबाइल टीवी वगैरह सिनेमा वगैरह तो यात्रा होती थी गोसिप होता था यह वहां का एंटरटेनमेंट है तो ऑलरेडी पता चल गया लोग बात कर रहे हैं ये तो सब लड़के लोग हैं वहां पे ये पुरुष भक्त है वो मां को बुला रहे हैं वो लड़कों के साथ में जाकर मां रहेगी यह कौन सी बात हो गई क्योंकि वैसे तो बाकी सब भक्त है गुलाब मां योगेन मां मास्टर महाशय बलराम बाबू किंतु मां के साथ में रह के मां की सेवा करने वाले तो यह लड़के भक्त ही है तो यह सब युवान लड़कों के साथ में जाकर मां रहेगी यह कौन सी बात है वो सब ऑलरेडी रूमर मगरिंग चालू हो गया था तो मां ने जब जाके किंतु मां को पता है मां में थोड़ी इतनी प्रैक्टिकल बुद्धि भी थी तो वो जाके वो प्रसन्नमई वो जो लाहा बाबू की कन्या जो कि ठाकुर जब बच्चे थे जो छोटे थे बालक थे उस समय उनके साथ में इनके बड़े ही मित्र मित्रता थी और ठाकुर को बड़ी ही श्रद्धा करती थी प्रसन्नमय तो फिर और उसका कामार पुकुर में प्रेस्टीज भी था वह यदि कुछ कहेगी तो फिर यह सब बंद हो जाएगा तो मां ने जाकर के उनको कहा प्रसन्नमई को कि मैं जा रही हूं वहां पे कहां कोलकाता यह भक्त लोग मुझे बुला रहे हैं तो क्या यह गलत होगा क्या तो प्रसन्नमई कहती है कि नहीं नहीं अरे वो तो सब लड़के तो तुम्हारे संतान जैसे ही है उसमें क्या इतना चिंता करने की बात है तो जैसे प्रसन्नमई ने यह जजमेंट दिया यह बात कही तो सब वहां पर जो चल रहा था रुमर वंगारी सब शांत हो गया। तो शरद महाराज लिखते हैं शरद महाराज ना कि कौन लिखते हां शरद महाराज जी लिखते हैं कि यह सब जो बातें हैं ना वो शरद महाराज की गंभीरानंद जी जो भी है दो में से एक लिखते हैं कि यह जो बातें जो चलती है ना वह सब मैं महल प्रारंभ होए और मे मोहल और शेष हो अर्थात कि ये स्त्रियों के भीतर में ही यह सब बातें चलना चालू होती है और स्त्रियों में से ही इसका कोई ना कोई उसका समाधान करता है। पुरुष लोगों का उसमें कोई काम नहीं है। तो इस तरह से देखिए कि यहां पर मां है कामारपुर में तपस्या कर रही है। वराह नगर मठ में गुरु भाई तपस्या कर रहे हैं। और एक बार स्वामी जी वराह नगर मठ छोड़कर चले जाते हैं। तो फिर वही आलम बाजार मठ में थोड़ी सी सछलता हुई थी। थोड़ी सी अल्प हुई थी। बोलकर के ही स्वामी जी अमेरिका से लेटर में लिखते हैं कि पानी जो ऐसा वैसा पानी पी रहे हो। बोल के तुम सबको बार-बार मलेरिया हो जा रहा है। एक फिल्टर रखना है। फिल्टर में पानी गर्म करके यह सब करके करना है। तो यदि फिल्टर रखने की कैपेसिटी है तो तो फिर थोड़ा तो मतलब वरानगर से परिस्थिति अच्छी हुई होगी। तो जो भी है किंतु खैर अल्टीमेटली तो 10 साल की यह तपस्या है। गुरु भाइयों के सामने, स्वामी जी के सामने और मां के सामने। स्वामी जी अमेरिका गए तो इट वाज़ नॉट बेड ऑफ रोज। जैसा कहते हैं इंग्लिश में कि मने ऐसा नहीं है कि सब कुछ हकीकडोरी था। सब कुछ ठीक-ठाक था। वहां पे स्वामी जी किस तरह से स्वामी जी कहते हैं कि खून का पसीना करके खून का पानी करके यह जो पैसा इकट्ठा किया है उन्होंने स्वामी जी ने अपना ठाकुर का अस्थियों को स्थापित करने के लिए मठ बनाने के लिए। तो पहले तो कृष्ण दो बार स्वामी जी गए थे। सेकंड टाइम तो फिर भी थोड़ा सा शांति था। फर्स्ट टाइम तो थोड़ा सा ही स्वामी जी को प्रसिद्धि मिला। जितने भी ये मिशनरी जितने भी ये इवन अपने इंडियन जो थे मजूमदार फजूमदार सब लोग स्वामी जी पर टूट पड़े थे उनकी निंदा करने के लिए तो एक और तो वेदांत का जो योग और वेदांत का सनातन संदेश है उसको फैलाना है। सामने इन पगलों के साथ में लड़ना है। स्वामी जी को कोई इनवाइट करता तो पहले से ही यह जो उनके विरोधी थे उनका दल में से उनके होस्ट को फोन करते कि अरे वह काले इंडियन को आप क्यों बुलाते हैं? उसका चरित्र अच्छा नहीं है और आपके घर में सब स्त्रियां रह रही है। आप वो फिर वह सबके साथ में कुछ ना कुछ गड़बड़ करेगा। आपको लांछना का भोग बनना पड़ेगा। उसको आप मत बुलाइए। तो अल्टीमेट किंतु फायदा यह है अमेरिका का कि अमेरिका में लोगों का इंडिपेंडेंस है। लोगों में करेज है। भारत में क्या है? समाज क्या कहेगा? समाज क्या कहेगा? बोल के आपकी इच्छा नहीं होने से भी जो बोलते हैं सब लोग करना पड़ता है। साहस किसी में नहीं है। सब के सब कायर थे। बोल के ही तो हजार साल की गुलामी आ पड़ी। किंतु अमेरिका तो इंडिपेंडेंट कंट्री था। वो यदि कोई पादरी पादरी आकर के बोलता है कि इसको मत बुलाओ। तो वहां पे तो ऐसे लोग थे क्या? आप बोल रहे हैं मत बुलाओ तो तो मैं उसको बुलाता ही हूं। मुझे नहीं इच्छा थी बुलाने की। वह पादरी कहता है मत बुलाओ तो मैं अभी बुलाऊंगा उसको। तो ऐसे उल्टे दिमाग वाले वहां पे पड़े थे। बोल के स्वामी जी को इस तरह से सामाजिक लांछना का बहुत ज्यादा भोग नहीं बनना पड़ा था। रिमोट कंट्रोल से सब होता था। किंतु स्वामी जी के आसपास में जो लोग थे वो उनके बहुत पक्के सपोर्टर थे। अनलाइक इंडिया इंडिया में गुरु भाई को छोड़कर के इवन देखिए कि हमको पता है कि ठाकुर के अंतरंग भक्तों में से भी कोई लोग हैं। स्वामी जी का विरोध करते थे। तो अनलाइक इंडिया कि आधे लोग कायर है। आधे लोग यह सब सुपरस्टिशन के भोग बने हुए हैं। अमेरिका इज एन इंडिपेंडेंट कंट्री। करेजियस लोग थे। बोल के उन्होंने स्वामी जी को अपने सर पर बिठाया। बोल के रामकृष्ण मिशन की सक्सेस का आज यदि यह कहा जाए बहुत बड़ा हिस्सा यह स्वामी जी के अमेरिकन एडमायरर से उनको देना पड़ेगा। यदि स्वामी जी अमेरिका नहीं गए होते और सिर्फ भारत में ही उन्होंने राम भारतीयों की सहाय से रामकृष्ण मिशन प्रारंभ करने का सोचा होता तो आई डू नॉट नो कि हम कितने सक्सेस होते। सो अभी वराह
जीवन के विविध अनुभवों ने स्वामी विवेकानंद के विचारों को कैसे परिपक्व और व्यापक बनाया।
नगर के दिनों की घटनावली का मास्टर महाशय की दृष्टि से प्रारंभ करते हैं। ऑलरेडी एक पैराग्राफ पढ़ ही लिया है। उसका जो आखिरी सेंटेंस था उसको लेकर के थोड़ा सा डिस्कशन भी हुआ था कि गीता में भगवान जो निष्काम कर्म योग करने को कहते हैं वह पूजा जप ध्यान यही सब कर्म और कुछ नहीं। तो इसको लेकर के हमने डिस्कशन भी किया था दो-तीन चीजें कि एक तो है कि स्वामी जी जब जिस बात को कहते हैं उसको इतना बड़ा करके कहते हैं और फिर बाद में हमने यह भी देखा था कि स्वामी जी के खुद के विचारों का इवोल्यूशन हुआ है। हालांकि स्वामी जी ने तो ठाकुर के रहते-रहते ही कहा था कि यह शिव ज्ञान जीव सेवा का जो ठाकुर का यह जो एक पॉइंट है और कोई नहीं समझा था। स्वामी जी समझे स्वामी जी ने कहा मौका मिलेगा तो पूरे विश्व में उसका मैं प्रचार करूंगा। किंतु अपार्ट फ्रॉम दैट यह भी हमको समझ में आता है कि स्वामी जी के विचारों का इवोल्यूशन हुआ है। और एक्चुअली यह जो अपना पूरा स्टडी है जो स्वामी जी के जीवन का यह सब माइलस्टोनस के ऊपर में ही बना है। किस तरह से स्वामी जी के जीवन में एक के बाद एक माइलस्टोंस आते गए। प्रत्येक माइलस्टोन ने प्रत्येक मंजिल ने स्वामी जी के जीवन को एक नया मोड़ दिया है। एक नई डायरेक्शन दी है। तो वह भी अ इंटीग्रल पार्ट ऑफ आवर स्टडी। अब जैसे अल्मोड़ा की गुफा की ही वह बात कि स्वामी जी ने सोचा कि बस जप ध्यान करके निर्विकल्प समाधि में जीवन त्याग देंगे। इंस्पाइट ऑफ दैट के ठाकुर ने कहा था स्पष्ट कहा था कि बहुत बड़े वट वृक्ष की तरह तुमको लोगों को शीतल छाया देनी है। वह सब भूलकर के स्वामी जी वहां पे निर्विकल्प समाधि में बैठना चाहे थे। किंतु जैसे ही अपनी बहन की मृत्यु का संवाद आया स्वामी जी को लगा कि मेरी ही बहन की यदि यह परिस्थिति है तो भारत की यह करोड़ों बहनाएं हैं मेरी। उनकी क्या परिस्थिति होगी? बोल के लिटरली एंड मेटाफोरिकली स्वामी जी हिमालय में से फिर से गंगा के प्रदेश में वापस आए माने ये प्लेन में गंजेटिक प्लेन यानी उत्तर प्रदेश और फिर वहां से पूरे भारत का भ्रमण किया और फिर म दोज़ आर वेल नोन स्टोरीज हम उसको डिटेल में भी देखेंगे। बट देखिए कि दैट हिमालयन केव वाज़ वन ऑफ द टर्निंग पॉइंट इन स्वामी जीसस लाइफ। तो इसी तरह से यह मिराट जहां पर स्वामी जी ने ठीक किया कि गुरु भाइयों का संग छोड़कर के अकेला मैं अभी भ्रमण करूंगा वि इज अनदर टर्निंग पॉइंट इन स्वामी जीसस लाइफ। फिर यह जो राजस्थान वगैरह गए सर्वप्रथम राजस्थान में स्वामी जी को जो सम्मान प्राप्त्य था वह स्वामी जी को राजस्थान में मिला। कितने लोग उनके पास में आते हैं। किस तरह से उनकी सराहना करते हैं, कदर करते हैं। और यह जिस तरह से राजा स्वयं उनके पास में आकर के उनके शिष्य का स्थान ग्रहण करते हैं। उस समय स्वामी जी को पहली बार यह एक अंदाज हुआ कि हां कोलकाता में तो थे हमारे सब एक मित्र मंडल भक्त मंडल ठाकुर का किंतु सही-सही में आध्यात्मिकता सन्यास संप्रदाय सन्यासी इन सबका क्या आदर सम्मान है वही ट्रेडिशनल भारत में अभी भी वो सब स्वामी जी को वहां पर पता चला और एक्चुअली क्या था कि राजस्थान है गुजरात है वैसे यह डायरेक्टली ब्रिटिशरों के द्वारा इतना इतना कंट्रोल नहीं थे। ऑफ कोर्स ब्रिटिश रेसिडेंट सब जगह पर रहते थे। यह मद्रास प्रेसिडेंस बॉम्बे प्रेसिडेंसी जिसका अंडर में यह गुजरात महाराष्ट्र सब आते थे। किंतु कोलकाता यह ब्रिटिश लोगों का खास राजधानी था। वहां पर ब्रिटिश कल्चर, वेस्टर्न कल्चर जितना डीप पेनिट्रेट किया है, इतना डीपली पेनिट्रेट और किसी भारत में और कोई जगह पर नहीं हुआ है। बोल के राजस्थान में अभी भी वो जो ट्रेडिशनल भारतीय कल्चर था उसका थोड़ा बहुत सम्मान था और स्वामी जी कहते भी है एक जगह पे कि जब वो साउथ इंडिया में थे और यह मैसूर के राजा ना कि किसी ने स्वामी जी को प्रॉमिस तो किया कि हां आप अमेरिका जाते हैं मैं आपको सहाय करूंगा किंतु फिर प्रॉमिस देने के बाद में उन्होंने वचन का पालन किया नहीं। तो स्वामी जी ने उस समय कहा था असली राजा तो राजस्थान के हैं। वहां पर अभी भी रघुकुल नीति सदा चली आई प्राण जाए पर वचन ना जाए। वो नियम का अभी भी पालन होता है। ये साउथ इंडिया के राजा किसी काम के नहीं है। वचन देकर के यदि वचन भंग करें तो वह राजा किस काम का क्षत्रिय धर्म का कौन सा पालन कर रहा है? तो ये राजस्थान में जब स्वामी जी पहुंचे इट्स अ कंप्लीटली न्यू एक्सपीरियंस। वही रघु रघुवंशीय जो भारतीय परंपरा है उसका एक अंश संपूर्ण रूप से तो नहीं भारत गुलाम अदरवाइज तो होता ही नहीं थोड़ा बहुत भी होता सब्सटेंशियल में वो मात्रा में किंतु जो अल्प मात्रा में वो रघुकुल नीति जो थी वो राजस्थान में थी। सो दैट वाज़ वन ऑफ द नोवेल एक्सपीरियंस ऑफ स्वामी जी। दे वी विल सी कि एव्री माइलस्टोन एक प्रत्येक मंजिल किस तरह से स्वामी जी के जीवन में जो फिलॉसोफिकल इवोल्यूशन है वो लाती है। किस तरह से उनके थिंकिंग को उनकी लाइफ को एक नया मोड़ देती है। सो ये सेंटेंस और इसके बाद में अभी
वराहनगर मठ का प्रथम महाशिवरात्रि उत्सव
मास्टर महाशय आगे क्या कहते हैं? आज शकाले नरेंद्र कोलकाता आशिया छे आज सुबह नरेंद्र कलकाता आए हैं बाड़ी बाटीर मुकदमा तदवीर करते हो छ घर का जो मुकदमा है उसकी सब व्यवस्था करनी पड़ती है नरेंद्र को अदालते साक्षी देते हो अदालत में साक्षी देनी पड़ती है मास्टर बेला नोटार समय मठे उपनीत होया छ मास्टर महाशय सुब को 9:00 बजे के आसपास मठ में पधारे हैं। दाना देर घरे प्रवेश कोले पोर तहां के देखिया श्रीजुक्तो तारक आनंदे शिबेर गान धर ले जैसे ही उन्होंने यह दानवों के घर में दानव दैत्यों के कमरे में प्रवेश किया वैसे ही उनको देखकर के श्रीक्त तारक महापुरुष महाराज स्वामी शिवनंद रामकृष्ण संघ के द्वितीय परमाध्यक्ष उन्होंने आनंद में आकर के शिव का गान प्रारंभ ताथैया ताथैया नाचे भोला ताहर गाने सहित राखालो जोक दिल तो महापुरुष के साथ में ही राजा महाराज ने भी गान में योग देना गाने में योग देना प्रारंभ किया राखाल यानी राजा महाराज स्वामी ब्रह्मानंद रामकृष्ण संघ के प्रथम अध्यक्ष आर गान गाहिया दुई जने ही नृत्य करते छे और गान गातेगाते दोनों नृत्य कर रहे हैं। देखिए मास्टर महाशय का क्या रिस्पेक्ट है। रामकृष्ण संघ के भविष्य के प्रथम परमाध्यक्ष सेकंड परमाध्यक्ष प्रथम प्रेसिडेंट सेकंड प्रेसिडेंट उनके आगमन से ही गान गाते हैं और आनंद से नृत्य करते हैं। देखिए इतना सम्मान वो मिलना कितना सद्भाग्य का बात है ना। सबको पता है कि मास्टर महाशय ठाकुर को जिस तरह से मन प्राण सब कुछ समर्पित कर दिए थे। बोलकर के वह पूजा के पात्र है। बोलकर के वह इस तरह की श्रद्धा के पात्र हैं। आर गान गाइया और गान गातेगाते दोनों ही नृत्य कर रहे हैं। ए गान नरेंद्र शबे बांधिया छन यह गान नरेंद्र ने अभी-अभी कंपोज किया है। ताथैया ताथैया नाचे भोला बम बम बाजे गाल डिमी डिमी डीमी डमरू बाजे दुली छे कपाल माल गरजे गंगा जटा माझे उगरे अनल त्रिशूल राजे धक धक धक मौली बंद ज्वलेश शशांक भाल ये शिवरात्रि होती है तो वहां पे बेलूर मठ में आपको पता ही होगा बेलूर मठ ही और भी बहुत सारे सेंटर में भी राजकोट में भी था कि पूरी रात शिव पूजा होती है और बीच-बीच में यह जो भगवान शिव का जो नृत्य है वह नृत्य होता है शिव नृत्य तो बेलर मठ के YouTube चैनल पर आपको मिलेगा शिवरात्रि के दिन का वीडियो यदि देखेंगे तो तो उस समय यह सब गान गाए जाते हैं तो ट्रेनिंग एक्चुअली क्या है कि यह सब नृत्य करने वाले शिव सजने वाले शिव और नंदी भ्रुंगी सजने वाले तो ट्रेनिंग सेंटर के ही ब्रह्मचारी चारी होते हैं तो वह एक एक ब्रह्मचारी महाराज है वह गान गाएंगे और फिर यह जो तीन ब्रह्मचारी महाराज है शिव नंदी भ्रंगी सजे हैं वो नृत्य करेंगे तो यह प्रैक्टिस एक महीने पहले से ही चालू हो जाता है तो शिवरात्रि आने के एक महीने पहले से ही ट्रेनिंग सेंटर में प्रतिदिन यह गान जो है हमको सुनने को मिलता है और हमको पता चलेगा कि हां अभी शिवरात्रि आ रही है और यहां पर प्रैक्टिस चल रही है शिव शिव नृत्य गीत बड़ा ही सुंदर गान मठेर भरा शकले उपवास खोरिया आन मठ के भाई सभी लोग उपवास करके रह रहे हैं आज सबने उपवास किया है घरे एक नरेन राखाल निरंजन शरद शशि काली बाबूराम तारक हरीश शिथिर गोपाल शारदा मास्टर आन कमरे में अभी इस समय नरेंद्र राखाल निरंजन शरद यानी शारदानंद जी राखाल काल राजा महाराज निरंजन निरंजनंद जी शशि रामकृष्णानंद जी काली अभेदानंद जी बाबूराम महाराज प्रेमानंद जी तारक महापुरुष महाराज हरीश वो पगला हरीश हरीश का भी भाग्य है देखिए सब जगह पे उसका नाम देखता है वो ठाकुर स्वामी जी को प्रथम दर्शन हुआ था ना ठाकुर की महासमाधि के बाद कि हां एक दिव्य ज्योति पुरुष शिव काशीपुर में प्रवेश करता है वो गेट से और ठाकुर की महासमाधि अभी हुई है सिर्फ मां को ठाकुर का दर्शन हुआ है अभी तक तो दूसरा दर्शन हुआ था नरेंद्र को तो यह नरेंद्र देख रहा है कि यह दिव्य कांत पुरुष आ रहा है भीतर में तो बगल में खड़ा है हरीश तो यही पगला हरीश तो स्वामी जी पूछते हैं क्या रे तुमको भी दिख रहा है क्या जो मुझे दिख रहा है तो वो बोलता है हां कोई कोई आ रहा है इस तरह से तो देखिए कि प्रथम दर्शन मां को हुआ है और द्वितीय दर्शन हुआ है स्वामी जी को और हरीश को सो ही इज़ अ वेरी लकी दैट वेयर किंतु अनफॉर्चूनेटली उसने एक ऐसा पागलपन कर दिया है कि उसका का नाम हमेशा के लिए खराब हो गया हमारे संग में तो वही हरीश और सिथिर गोपाल और शारदा शारदा त्रिगुणातिनंद जी और मास्टर महाशय इतने लोग हैं। देखिए ये मठ में उपवास करने की बात ये एकादशी वगैरह का उपवास बेलूर मठ में भी हम बेलूर मठ में ट्रेनिंग सेंटर में क्या होता है? 3 साल के बाद हम ट्रेनिंग सेंटर में जाते हैं ना तो उपवास कोई कंपलसरी नहीं होता क्योंकि क्या है कि वहां पर रूटीन एक तो बड़ा टफ है। फिर हम सभी लोग अलग-अलग जगह से आए हैं। बंगाल का खास करके बेलूर मठ में गंगा के किनारे का जो क्लाइमेट है ह्यूमिड क्लाइमेट सबको सहन नहीं होता। कोई गुजरात, कोई चेन्नई, कोई बेंगलुरु, कोई नॉर्थ इंडिया वहां से सब आए हैं। तो ह्यूमिड क्लाइमेट में रहना फिर इतना टफ रूटीन फॉलो करना वो खाना पीना किसको अच्छा लगे ना लगे वो सब बातें बोल के कोई ऐसा कंपलशन नहीं है कि आपको शिवरात्रि या तो फिर यह एकादशी का उपवास करना है। किंतु मैं बेलूर मठ गया था जॉइ करने के लिए। तो जो लोग ज्वाइन करने को जाते हैं उन लोगों के लिए एक दूसरा ट्रेनिंग सेंटर होता है प्री प्रोबेशनर्स ट्रेनिंग सेंटर तो पीपीटीसी उसको कहते हैं तो मैं वहां पर गया था जॉइ करने के लिए तो हमारे लिए जो जॉइ करने को आए हैं उन लोगों के लिए सब उपवास वगैरह कंपलसरी था तो अभी क्या है एक्चुअली मुझे उपवास से कोई ऐसा दिक्कत कुछ नहीं था मैं अपने घर में भी उपवास करता था तो मेरे लिए तो कोई इतना डिफिकल्ट नहीं है हां रूटीन टफ है तो भूख तो लगेगी किंतु मैं मैनेज कर लेता था। प्रॉब्लम कहां पे आता था कि उपवास के दिन जो स्पेशल जो चीजें आती है उपवास की वो इतनी सारी शीरा देखिए घी में बनाया हुआ शरा और रोटी आपको खाने को देंगे। अभी और कोई दिन होता है तो आपको मिलेगा दाल, रोटी, चावल, सब्जी वगैरह दही मिलेगा। किंतु यह उपवास के दिन खास करके एकादशी के दिन तो घी में बनाया हुआ इतना स्वादिष्ट हलवा और फिर उस साथ में ही रोटी तो अभी आप देखिए मेरा प्रॉब्लम यह नहीं था कि भूख को सहन करना प्रॉब्लम यह हो जाता था कि इतना स्वादिष्ट गरमा गरम घी में बनाया हुआ हलवा आता है शरा इसको गुजराती में कहते हैं तो वो इतना मैं खा लेता था फिर उल्टा हो जाता था यह मुश्किल हो गया अभी इतना खा के [हंसी] वेलूर मठ में फिर क्या है कि वहां पे हम लोग तो बिल्कुल जॉइ करने को आए हैं। यानी कि पूरे मठ में सबसे जूनियर अमित है। तो जितने भी सीनियर साधु उनका बड़ा सिंपथी हम लोगों के ऊपर में कि हां ये बच्चे लोग आए हैं बेचारे ज्वाइन करने को और आज तो उनको बेचारे को खाने को भी नहीं मिलेगा। पूरे बेचारे भूखे हैं। बोल के मठ ऑफिस में से मठ मैनेजर महाराज उस समय प्रमेयानंद जी रिवर्ड प्रमयानंद जी थे मठ मैनेजर तो उनकी हमारे पे बहुत दया तो वहां से कुछ ना कुछ आता रहेगा चॉकलेट आएगी समोसा आएगा ये आएगा वो आएगा फिर रिवर्ड प्रेसिडेंट महाराज क्वार्टर में से उस समय आई थिंक प्रेसिडेंट महाराज थे रंगनाथानंद जी तो फिर उनके सेवकों को फिर हम पर बहुत दया आ जाती थी कि बेचारे भूखे बैठे हैं क्या होगा हमको तो अच्छे से खाना मिल रहा है तो वहां से कुछ आता था स्पेशल तो उपवास के दिन उल्टा हो जाता था। ऐसा नहीं है कि भूख सहन करनी है। ऐसा है कि स्पेशल इतना सब कुछ आता है जो कि हमको डेली नहीं मिलता है। वो इतना सब अच्छा अच्छा स्पेशल आता है कि ओवर ईटिंग ना हो जाए और ओवर ईटिंग करके बीमार ना हो जाए वो एक टेंशन बना रहता था। सो यहां पे खैर वो कृष्ण किशोर का एकादशी ठाकुर कहते हैं ना कृष्ण किशोर का एकादशी तो ऐसा एकादशी यहां पे नहीं है। बेचारे सीरियस एकादशी कर रहे हैं मठ में तो मठ में सभी लोग एकादशी उपवास कर शिवरात्रि का उपवास करके हैं और इतने सारे लोग उपस्थित है। देखिए पांच ही महीने हुए हैं किंतु इतने सारे गुरु भाई ऑलरेडी उपस्थित हो चुके हैं। योगिन लाटू श्री वृंदावन आन योगिन महाराज और लाटू महाराज अद्भुतानंद जी अभी भी श्री वृंदावन में हैं। तानो मठ देखे नहीं उन्होंने अभी भी मठ दर्शन नहीं किया है। आज सोमवार शिवरात्रि 21 फरवरी 1887 21 फरवरी आगामी शनिवारे शरद काली निरंजन शारदा श्री श्री जगन्नाथ दर्शनार्थ पूरी धाम में यात्रा करीब नेक्स्ट सैटरडे शरद काली निरंजन शारदा श्री श्री जगन्नाथ दर्शन के लिए पूरी धाम यात्रा करेंगे श्रीजुक्त शशि दीन रात ठाकुर सेवा लोया छे कितना सुंदर स्टेटमेंट श्रीजुक्त शशि स्वामी रामकृष्णानंद जी महाराज दिन रात ठाकुर की सेवा को लेकर के रह रहे हैं पूजा होया गो पूजा समाप्त हुई शरद तानपुरा लोया गान गाई से शरद तानपुरा लेकर के शारदानंद जी गान गा रहे हैं शिव शंकर कर बम बम भोला कैलाशपति महाराज राज उड़े श्रृंग की खयाल गोले बाल माल लोचन विशाल लाले लाल भाले चंद्र शोभे सुंदर विराज शरद महाराज का गाने का आवाज जो था गले का आवाज बड़ा सुमधुर था जो वन ऑफ बेस्ट जो सिंगर्स से अपने गुरु भाइयों में से शरद महाराज वाज वन ऑफ देम और इसीलिए किंतु उनका प्रॉब्लम वही था कि थोड़ा सा जो उनका आवाज था पतला आवाज था। तो बोलकर के वो घटना हमने ऑलरेडी देखी कि यह गुरु भाई जो मठ में गान कर रहे हैं वो शरद महाराज गा रहे हैं। तो ये पड़ोसियों को लगा कि कोई लड़की गा रही है। किसी स्त्री को बुलाया है गाने के लिए। तो ये लोग सब मठ में घुसपैठ कर दिए। बोले कि उनकोे हाथ पकड़ेंगे भ्रष्टाचार करते हुए। किंतु जाके देखा तो शरद महाराज गान कर रहा है तो
स्वामी अभेदानंद : आध्यात्मिकता के साथ व्यावहारिक बुद्धि
नरेंद्र कोलकाता हुई ए मात्र आशिया छ पहले तो कहा कि नरेंद्र कोलकाता से अभी जस्ट आए हैं तो पहले तो कहा कि नरेंद्र कोलकाता गया था जो कोर्ट केस चल रहा है वो उसका जो मैनेजमेंट करना है तो अभी जस्ट कोलकाता से आया है एको स्नान कोरेन नहीं अभी भी स्नान नहीं किया है काली नरेंद्र के जिज्ञासा कोरिले मुकद्दमार की खोबर काली अर्थात अभेदानंद जी ने नरेंद्र को पूछा मुकदमे की क्या खबर है? माने क्या कोर्ट केस का क्या न्यूज़ है? हम लोग आपस में बात कि क्या न्यूज़ क्या है? क्या अपडेट क्या है? तो यहां पे भी ये मुकदमा का क्या खबर? वो आजकल लोग न्यूज़पेपर को ना पंचम वेद कहते हैं। वी आर सो इंटरेस्टेड। ये ह्यूमन नेचर है ना क्यूरियोसिटी कि क्या न्यूज़ है? क्या न्यूज़ है? वो पढ़ने का। तो यहां पे भी नरेंद्र विरक्त होइए आप। अब जैसे नरेंद्र को यह पूछा वह नरेंद्र थोड़ा सा नाराज होकर के कहा तो देर वही सब कथाएं काज की तुमको वह सब बातों से क्या काम है और नेचुरली भी है वो घर संसार का मामला है अभी नरेंद्र को तो क्या है कि उपाय नहीं है करना ही पड़ेगा किंतु काली महाराज को ये सब चीजों से क्या लेना देना है किंतु देखिए यहां पे वेरी शॉर्ट इंटरेक्शन दो ही सेंटेंस है इसके बाद में टॉपिक चेंज हो जाता है किंतु काली महाराज का देखिए वैसे तो यहां पे स्वामी जी ने उनको ये कर दिया बोल के कि तुमको इतना सब जानने की जरूरत नहीं। काली महाराज का एक थोड़ा क्या था एक प्रैक्टिकल सेंस तो था। राजा महाराज है, महापुरुष महाराज है। इवन उस समय के बाबूराम महाराज थे। बाद में बाबूराम महाराज मठ के मैनेजर हुए। तब वो काफी प्रैक्टिकल हो गए थे। बलून मठ के मैनेजर। किंतु उससे पहले उनका भी थोड़ा सा हवाहवा में ही था सब कुछ थिंकिंग। तो म नॉट इन अ वेरी बैड सेंस इस अर्थ में कि ईश्वर में इतने डूब गए हैं ईश्वर साधना में कि संसार को लेकर के ज्यादा ये लोग फिक्र नहीं करते थे इस अर्थ में किंतु काली महाराज का थोड़ा प्रैक्टिकल सेंस था तो यहां पर स्वामी जी ने उनको इस तरह से कहा किंतु दूसरा भी एक मामला है स्वामी जी जब अमेरिका थे और जो उनके ऊपर में चारों ओर से आक्रमण हो रहा था स्वामी जी बार-बार कहते हैं कि तुम लोग एक मीटिंग करो कोलकाता के प्रतिष्ठित लोगों का उसमें से रेजोल्यूशन पास करवाओ। यहां पे भेजो कि हां यह स्वामी विवेकानंद इज अ ऑथेंटिक रिप्रेजेंटेटिव ऑफ हिंदूइज़्म। ऐसा बोल के तुम लोग भेजो यहां पे। तो ये राजा महाराज वगैरह तो थे थोड़े से ब्रह्म भाव में ही विलीन। तो फिर यह काली महाराज थे कि उन्होंने सब मेहनत करके परिश्रम करके मीटिंग मीटिंग करवाया और रेजोल्यूशन पास करवा के अमेरिका भिजवाया था। उस समय स्वामी जी काली महाराज की बहुत प्रशंसा करते हैं कि हां उसने इतना अच्छा कार्य किया और फिर दूसरी भी बात है कि स्वामी जी की जब इच्छा थी कि कोई एक गुरु भाई लंदन या अमेरिका आए उनके कार्य में सहाय करने के लिए तो जितने को भी स्वामी जी बोलते कुछ ना कुछ विघ्न आ जाता है या तो फिर यह बाकी गुरु भाइयों की इच्छा नहीं होगी जो भी है काफी डिले हो रहा था उस समय यह काली महाराज थे कि वह सीधा लंदन पहुंच गए थे अनफॉर्चूनेटली हुआ ऐसा था कि बाय द टाइम काली महाराज आए थे। स्वामी जी लंदन से निकल गए थे। आई थिंक मोस्ट प्रोबेबबली ऐसा ही था। तो काली महाराज और फिर क्या है कि एक मिसकम्युनिकेशन जैसा हो गया था कि वह कब आ रहे हैं और ईटी स्टडी को पता नहीं कि वो इस पर्टिकुलर डे को इस पर्टिकुलर शिप में आ रहे हैं। तो उनको रिसीव करने के लिए वहां पर कोई था नहीं। तो काली महाराज अपने से देखिए फर्स्ट टाइम वो इस तरह से फॉरेन कंट्री में आए। अपने से वह रास्ता खोजते खोजते एड्रेस खोजते खोजते सीधा ईटी स्टडी के घर पहुंच गए। तो वह भी आश्चर्यचकित हो गया। किसी इंडियन के लिए इस तरह से रास्ता खोज के उनके घर आना व्हिच वास अ बिट डिफिकल्ट। किंतु कि एंटरप्रेन्य एंटरप्राइजिंग स्पिरिट जिसको कहते हैं वो काली महाराज में था। तो समटाइ्स इस तरह से वो प्रकट होता है। न्यूज़ क्या है? गोसिप क्या है? वह सब सुनने के लिए एंड समटाइ्स किसी पॉजिटिव कंस्ट्रक्टिव वे में भी प्रकट होता है यह स्पिरिट।
स्त्री के प्रति आकर्षण का त्याग करना है, उनके प्रति घृणा नहीं रखनी
नरेंद्र तांबाक खते छ और मास्टर प्रभुति सहित कथा कहते छ नरेंद्र यह तंबाकू खा रहा है और यह मास्टर महाशय वगैरह के साथ में बात कर रहा है कामिनी कांचन त्याग ना कोरले होबे ना यह वही ठाकुर की सनातन वाणी कि कामिनी कांचन त्याग ना करने से कुछ भी होगा नहीं कामिनी नरकस्य द्वारम कामिनी है नरक का द्वार जतोक स्त्री स्त्री लोग के बोश जितने भी लोग हैं सब स्त्रियों के वश है। शिव और कृष्ण एर आला को था। भगवान शिव ने विवाह किया था। भगवान कृष्ण ने विवाह किया था। किंतु इन लोगों की बात अलग है। शक्ति के शिव दासी कोरे रखे छिले शक्ति को भगवान शिव ने दासी बना करके रखा था। श्री कृष्ण संसार कोरे छिले ब किंतु केमोन निर्लिप्त भगवान कृष्ण ने संसार किया था। किंतु वो कैसे निर्लिप्त थे। होश करे वृंदावन केमन त्याग कर लेन फट करके वृंदावन कैसे त्याग कर लिया मां राधिका के साथ में इतना उनका भाव था किंतु जब यह धर्म का बुलावा आया कर्तव्य की बारी आई तो फिर मां राधिका को भी त्याग करके वो किस तरह से वृंदावन छोड़कर के मथुरा चले गए थे। अभी देखिए इस स्टेटमेंट के बारे में फिलॉसोफिकली इसका जो सार है हमको काफी अच्छे से पता ही है। किंतु इसका एक जो दूसरा एक डीपर एक मीनिंग जो है ना कि स्त्रियों की प्रति दृष्टिकोण देखिए ऐसा नहीं है कि यहां पे स्वामी जी उनकी निंदा कर रहे हैं या फिर उनकी उनका अपमान कर रहे हैं। ठाकुर यह सब मामले में बड़े स्पष्ट थे। यदि पुरुषों के सामने बात करते हैं तो स्त्रियों की कह मतलब स्त्रियों के बारे में उनको सावधान जैसे करेंगे वैसे ही स्त्रियों के साथ में यदि बात करते हैं तो स्त्रियों को उसी तरह से पुरुषों के बारे में सावधान करेंगे। माने जो साधक है यदि साधना के मार्ग में आगे बढ़ना है तो फिर इस तरह से जो विजातीय संबंध है उसको बनाने से नहीं होगा। माने दोनों को ठाकुर इक्वली ये करते हैं। उनको सावचेत करते हैं। सावधान करते हैं। यहां पे बिकॉज़ कि स्वामी जी के सामने सिर्फ पुरुष लोग ही बैठे हैं। बोल के स्वामी जी स्त्रियों के बारे में इस तरह से बात कर रहे हैं। वरना देखिए कि स्वामी जी का स्त्रियों के प्रति कितना सम्मान है। अह अमेरिका गए हैं तो सब स्त्रियां ही उन्होंने ही उनकी मदद की है। वही स्वामी जी की फर्स्ट डिसाइपल थी। वही यह जोसेफाइन मेक क्लाउड वही सारा ओलीबुल वही निवेदिता जिन्होंने स्वामी जी को अपना मन और प्राण अर्पण किया था। उनके सबसे डेडिकेटेड फॉलोअर्स थे। तो स्त्रियों की एस सच अपमान नहीं करते। बहुत बार जिसको कहते हैं ना कि मिसोजीनी आजकल की लैंग्वेज में कहते हैं तो पुरुषों में देखने को मिलता है कोई ना कोई बहाना खोज करके स्त्रियों का अपमान करना। इसके पीछे भाव क्या है कि माने काम का रिलेशन रखना चाहते हैं किंतु वो रिलेशन बनता नहीं है। तो वो जैसे वो पंचतंत्र की कहानी है ना कि वो शियाल वो उस ऊपर में वो ये है उस तो ये होती है ना कपर होती है कपर में अंगूर लगे किंतु अंगूर है बड़े ऊपर में तो वो शियाल है जंप लगा रहा है जंप लगा रहा है हाथ में अंगूर आते नहीं है तो फिर यह बोल के चला जाता है कि अंगूर तो खट्टे हैं कौन खाना चाहता है तो यह अंगूर के प्रति विरक्ति या तो अंगूर के प्रति विद्वेष भाव प्रकट होना कब हुआ अंगूर खाने का प्रयास तो बहुत किया वो मिला नहीं बोलकर के अभी देखिए अपने मन को भी तो मनाना है मैं मैं चाहता था मुझे नहीं मिला। यदि यह बात मैं मान लूं म यह बात जो व्हिच इज अ फैक्ट जो मेरे मन में बैठ जाए तो फिर क्या होगा? इनफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स आ जाएगा। हीन भावना आ जाएगी। डिप्रेशन में चला जाएगा बेचारा शियाल। तो फिर उसको तो डिप्रेशन से भी बचना है। इनफीरिटी कॉम्प्लेक्स से भी बचना है। तो फिर उसको एक एक्सक्यूज बनाना है टू जस्टिफाई हिज फेलियर। तो ये एक्सक्यूज क्या है? अंगूर खट्टे हैं। तो बहुत सारा ये जो मिसोजीनी जो होता है समाज में कि स्त्रियों के प्रति घृणा स्त्रियों की निंदा वो कहां से प्रकट होता है? वो भोग भोगना चाहते हैं जो कि उनको मिलता नहीं है। तो फिर अंगूर खट्टे हैं। मैं यदि यह मान लूं कि मैं किसी के साथ में संबंध रखना चाहता हूं। उसने मुझे रिजेक्ट कर दिया तो भयानक डिप्रेशन सुसाइडल थिंकिंग यह देख ही रहे हैं। हम न्यूज़पेपर थोड़ा सा भी खोलेंगे। प्रतिदिन आए दिन इस तरह के न्यूज़ आपको देखने को मिलेंगे। तो इस सब चीजों से यदि मुझे बचना है तो गो टू ऑोजिट एक्सट्रीम। एक ऐसा एक्सक्यूज खड़ा करो जो कि मुझे डिप्रेशन में जाने से रोके। तो एक्सक्यूज क्या है? स्त्रियां जितनी भी है वह सब नरक का द्वार है। उनका संग करने से ही हम पाप में पड़ेंगे। वगैरह-वगैरह उनके प्रति घृणा प्रकट करो। इसलिए ठाकुर स्पष्ट कहते हैं कि जितनी भी बार स्त्रियों के प्रति इस तरह की बात करते हैं उतनी ही बार हमने कथामृत में भी देखा था साथ-साथ में ही कहते हैं कि यत्र नारियस्तु पूज्यंते तत्र रमंतु देवता जहां पर स्त्रियों की पूजा होती है वहां पर देवताओं का निवास है। जहां पर स्त्रियों की घृणा होती है उस देश समाज वो सिविलाइजेशन उसका पतन होता है। स्वामी जी बार-बार अपने पत्र में लिखते हैं। यहां पर अमेरिका में देखो स्त्रियों का कितना सम्मान है। जबकि तुम लोग भारत में देखो 10 साल की लड़की हुई नहीं कि पर गोत्र करे जाओ पर गोत्र करे जाओ। उसका शादी कर दो उसका शादी कर दो। ऐसा रटना शुरू कर देते हैं। तो ये क्या सब पागलपन है। स्त्रियों की जहां पे सम्मान नहीं होता वहां पर देखेंगे। देश संपूर्ण रूप से नष्ट हो जाता है। पहले स्त्रियों का सम्मान करना सीखो। फिर यह जो प्रथम हरोड़ के जो देश है उसमें तुमको स्थान मिलेगा। उससे पहले नहीं मिलेगा फेमस स्टेटमेंट स्वामी जी का अमेरिका इज अ हेवन फॉर वुमेन एंड मासेस ये जनसाधारण और स्त्रियों के लिए अमेरिका स्वर्ग है सो दैट थिंकिंग स्वामी जी का बड़ा क्लियर था इंटरेस्टिंगली मां ने राधु का विवाह किया छोटी उम्र में ही किया वैसे थोड़ा उसके बाद में राधु का पागलपन प्रारंभ हुआ तो मां एक बार दुख करके कहती है कि देखो ये तो समाज का ये जो सब हे बंधन बोल के मुझे राधु का विवाह करना पड़ा। किंतु देखिए कि अभी राधु किस तरह से पागलपन करती है। वह तो प्रेग्नेंट हुई थी ना उस समय राधु और प्रेग्नेंट बच्चा होने वाला था। उस समय का उसका जो पागलपन है कैसा बढ़ गया था। अफीम खाने का ओपियम खाने का उसने हैबिट बना लिया था। और फिर जो थोड़े ओपियम नहीं मिलेगा। तो मां के साथ में जाकर के इतनी गाली गलौज करती। मां को मारने का प्रयास करती कि मां एकदम बेचारी ये हो गई परेशान हो गई थी। उस पागल को लेकर के क्वालपाड़ा रहने को गई थी। वो मां एक अपने त्यागी संतान को कहती है इस अगाध दरिया को लेकर के क्वालपाड़ा जा रही हूं। अगाध दरिया [हंसी] माने ऐसा यह समुंदर जिसका कोई अंत नहीं है। तो ये अगाध दरिया को लेकर के वो माने तो देखिए कि मां को पता है कि विवाह करने से प्रेग्नेंट होगी। यह सब पागलपन होगा। किंतु समाज का बंधन है कि छोटी उम्र में शादी करना है। तो मां ने उस सबको फॉलो किया। सो देखिए कि इस तरह की सोसाइटल सिस्टम बनाना कि छोटी उम्र में शादी करनी ही है। फिर प्रेग्नेंट होगी, पागलपन करेगी, बाल विधवा होगी तो इतना कष्ट यह किस तरह का भारतीय समाज है। तो स्वामी जी ने इस सब चीजों के विरोध में स्पष्ट रूप से जो भी स्वामी जी के लेटर पढ़ेगा, उसको एक तिनका भी उसको यह संदेह नहीं रहेगा कि स्त्रियों के प्रति स्वामी जी के मन में कितना सम्मान है। मां के प्रति तो स्वामी जी ने स्पष्ट कहा है। ठाकुर आए ना जाए उससे मुझे टेंशन नहीं है। किंतु मां शारदा यदि उनका थोड़ा सा भी उनका अपमान हुआ या उनकी अवगणना हुई तो हमारा सब कुछ खत्म हो जाएगा। ठाकुर स्वयं मां जब ठाकुर मां को कहते हैं इतना खर्चा कर रही हो जो भी आता है दक्षिणेश्वर में सब दे देती है मिठाई दे देती है ये दे देती है जो भी सामने पड़ा है मां मुक्त हस्त से सबको सब देती जाती है तो ठाकुर जैसे ठाकुर को वैरागी है वो धोती गोती का भी कोई ठिकाना नहीं भाव में आएंगे तो निवस्त्र हो जाएंगे दिगंबर हो जाएंगे ऐसे ठाकुर को वो पैसा मिट्टी पैसा पैसा मिट्टी ऐसा बोलकर के उन्होंने उसको पैसा ऐसा पत्थर पत्थर पे ऐसा ऐसा बोल के उन्होंने पैसे को गंगा में डाल दिया था जिससे कि पैसों के प्रति थोड़ा सा भी मोह ना हो। इस तरह के ठाकुर को मां को कहना पड़ा कि इतना खर्चा कर रही हो तो फिर कैसे चलेगा? तो मां किंतु उसका उत्तर तो कुछ दिया नहीं। वहां से चुपचाप खड़ी होकर के चली गई। तो साथ में ही ठाकुर टेंशन में आ गए। और रामलाल को चिल्ला करके बोलते अरे जा तुम्हारी चाची को शांत कर। वो यदि नाराज हो जाएगी तो यहां का जो कुछ भी है सब खत्म हो जाएगा। यहां का अर्थात कि ठाकुर की भक्ति, ठाकुर की मुक्ति, ठाकुर की आध्यात्मिक संपद यदि मां नाराज होगी तो संपूर्ण रूप से नष्ट हो जाएगी। सो रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर का थोड़ा सा भी स्टडी करने से आपको बिल्कुल भी यह संदेह नहीं रहेगा कि श्री रामकृष्ण स्वामी विवेकानंद स्त्रियों के प्रति उनकी कितनी रिस्पेक्ट देते थे। किंतु साथ में ही आध्यात्मिक जीवन है तो फिर क्या है कि यह विजातीय संबंध जो है उसको तो टालना ही होगा। तो टालने के लिए एक तरह का एक वैराग्य उत्पन्न हो उसके लिए इस तरह की बातें की जाती है कि कामिनी कांचन त्याग नहीं करने से होगा नहीं। कामिनी है नरक का द्वार। ज तो जितने भी लोग हैं स्त्री के वश है। किंतु साथ में जब यह लोग उदाहरण देंगे ना भगवान शिव ने विवाह किया था। भगवान कृष्ण ने सब ये गोपियों के साथ में रास लीला की थी। तो इसके लिए और यह सब डिबेट चलती होगी इन लोगों में सब। तो डिबेट करने में तो कोई पीछे नहीं हटने वाला है गुरु भाइयों में से। तो इसलिए स्वामी जी उसका काउंटर भी यहीं पर दे देते हैं। शिव और कृष्ण उनकी बात अलग है। शक्ति को शिव ने दासी करके रखा था। श्री कृष्ण ने संसार किया था किंतु किस तरह से निर्लिप्त थे। फस करके फट करके वृंदावन कैसे उन्होंने त्याग किया था। तो ये कीपिंग दिस स्टेटमेंट पढ़ना है। कीपिंग दिस इन माइंड कि स्त्रियों के प्रति उनकी संपूर्ण रिस्पेक्ट किंतु आध्यात्मिक जीवन में जो नियम पालन करना है वह करना है। उसमें कोई आपको फिर यह पीछे हट नहीं करनी है। और यह दोनों तरह से अप्लाई होता है। यदि पुरुष कहेगा स्त्रियों के प्रति यह सब बात, तो स्त्रियां भी पुरुष के बारे में यही कह सकती है कि पुरुष है जितने नरक के द्वार है, और जितने भी पुरुष है, सब स्त्रियों के वश है। तो, जितनी भी स्त्रियां है, सब पुरुष के वश। यह जो यहां पे जो लिखा है उसका एग्जैक्ट ऑोजिट करके भी आप कह सकते हैं। तो अच्छा उसके बाद में राजा महाराज कहते हैं आ द्वारिका केमन त्याग कर लेन और साथ में द्वारिका भी जैसे भगवान कृष्ण ने वृंदावन जैसे त्याग किया था तो साथ में द्वारिका भी किस तरह से त्याग की थी यानी कि देखिए वृंदावन त्याग किया था गोपियों का आकर्षण राधिका का आकर्षण छोड़कर के तो वैसे ही मथुर द्वारिका में जैसे उनके पास में जो पावर था प्रेस्टि था राज्य था वो कैसे उन्होंने उन्होंने त्याग किया था। यानी कि कामिनी त्याग की थी और कांचन भी त्याग किया था। ना ही उनको स्त्रियों का आकर्षण बांध के रख पाया था। ना ही यह सत्ता का लोभ उनको बांध करके रख पाया था। सो दैट्स इंपॉर्टेंट काव्याट राजा महाराज ऐड करते हैं। इसके बाद में टॉपिक चेंज होता है जो कि अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: हरीश को ठाकुर के साक्षात् दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ था, फिर भी उसके संस्कार शुद्ध न हो सके—यह कितनी दुःखद बात है!
देखिए ये जो लेसन सीखने की बात की ना हरीश से देखिए ठाकुर ने हरीश से क्या लेसन सीखा था माने वो प्रीएम स्ट्राइक कहते हैं ना आजकल जैसे कि भविष्य देख के ठाकुर ने लेसन सीख लिया था एक्च एक्चुअली हरीश का पगलपन कहां से स्टार्ट हुआ? उसकी पत्नी ने देखा कि वो सब यही मठ में वहां पर पड़ा रहता है। वो मेरी संभाल लेता नहीं है। तो उसने कोई दवाई फवाई उसको खिला दी। जैसे कि स्त्रियों के ऊपर में उसका आकर्षण बढ़े। तो दवाई का जो आड़ असर हुआ बोलकर के वो पागल हुआ था। सो दैट वास हिज रीजन। माने उसके दूसरे संस्कार होंगे भीतर से। किंतु उसकी स्त्री का उसमें बहुत ज्यादा हाथ था। अभी देखिए ठाकुर ने इसमें से भविष्यत देख के क्या लेसन लिया है। वो मां वहां पे दक्षिणेश्वर में जितनी वो मछवारन वगैरह जो आती थी ना वहां पे तो आकर के बोलती थी मां को कि अरे आपको तो यह लड़का भी नहीं होगा। ये वो वगैरह वगैरह तो ये ठाकुर वहां पर बैठे-बैठे सुनते थे कि ये लोग सब मां के पास में जाकर के इस तरह से दुख व्यक्त कर रहे हैं और कोई ना कोई रेमेडी देने का प्रयास कर रहे हैं। तो ठाकुर बच्चे थे ना वो बालक स्वभाव तो बालक स्वभाव में आकर मां को कहते हैं देखो तुम इन लोगों की बात सुनकर के ना मुझे औषध वषद मत देना दवाई भवाई मेरे पास में ठाकुर की ईश्वर की कृपा से सब है तो मैंने वो ईश्वर दर्शन के लिए सब कुछ चैनलाइज किया है। तुम इस तरह से औषध प्रयोग मेरे पर मत करना।
प्रश्न: हरीश के कारण हमें माँ का बगला-रूप देखने को मिला; इस दृष्टि से तो वह धन्य ही है। संभवतः स्वामी विवेकानंद को यह घटना ज्ञात थी, इसी कारण उन्होंने कहा कि माँ केवल सौम्यरूपा ही नहीं, रुद्ररूपा भी हैं।
दुशासन को भी दुशासन को भी कृष्ण प्राप्ति हुई थी। वो शत्रु भाव की आराधना कर यह भी है कि मां का यह स्वरूप देखने को मिला। चलो हरीश की वजह से वरना तो यह स्वरूप कभी देखने को नहीं मिलता। कामरार पुकुर के दिन की घटना है तो शायद स्वामी जी के रहते-रहते हुई होगी। किंतु फिर क्या है कि स्वामी जी फिर यह तीर्थ यात्रा में ऑलरेडी निकलना शुरू कर दिए थे ना। दो बार निकले हैं। दो बार ना कि तीन बार ऐसा निकले हैं वहां से। तो वो एग्जैक्ट टाइम वो वहां पर होंगे कि नहीं पता नहीं। किंतु माने मठ में लेटर लिखा था निरंजन महाराज आए थे। तो जैसे ही वो हरीश ने सुना निरंजन महाराज आ रहे हैं वैसे ही वो वहां से भाग खड़ा हुआ था। ये घटना का उनको पता होगा। हो सकता है। माने इट्स अ किंतु देखिए देखिए देखिए यहां य या यहां पे ना वह वो जो एक प्रजुडाइज की हमने पता है एक बार पहले भी बात किया था वह मां का वो जो सीन जो रात को उनका त्यागी संतान गया है दूसरी जगह पे बाहर में काम करने के लिए मां उनके लिए दूध का कप लेकर के बैठी है। राह देख रही है कि कब त्यागी संतान आएगा उसको दूध खिलाएगी। किंतु जो पूरा वर्णन है ना मैं गुजराती देख रहा था एक क्रूशियल लाइन उसमें मिस कर दिया है। क्यों? क्योंकि पूरा सुंदर वर्णन है। जय राम बाटी का वातावरण है। संध्या है। इससे पवित्र और क्या हो सकता है? मां खुद अपने कमरे में बैठी है। राह देख रही है और मन कहां उर्ध्व विचरण कर रहा है। पूरा वर्णन ट्रांसलेट किया है। एक क्रूशियल डिटेल छोड़ दी है। मां के बगल में एक लाठी पड़ी हुई है। और लाठी क्यों रखी है? तो बिल्ली यदि आकर के दूध में मुंह मारेगी तो उसको मार के भगाने के लिए लाठी रखी है। तो वो ट्रांसलेशन गुजराती में नहीं की। तो देखिए एटलीस्ट ओरिजिनल में यह सेंटेंस था। अभी ये रिपोर्टिंग बायस जो होता है ऐसी घटनाएं होगी जो कि ओरिजिनरी रिपोर्ट की ही नहीं गई है। सो दैट इज आल्सो पॉसिबल कि जो स्वामी जी को पता होगी कि हां यह सब घटनाएं हैं जो कि आज हमको पता नहीं।
प्रश्न: रामकृष्ण मिशन की स्थापना के लिए स्वामी विवेकानंद को जीवन भर कितना संघर्ष करना पड़ा। उनके विरोधियों ने उनके विरुद्ध अनेक कलंकपूर्ण कथाएँ फैलाईं। ऐसे अपमान और बदनामी से उनकी माता भुवनेश्वरी देवी का हृदय कितना पीड़ित हुआ होगा!
एक्चुअली मैं वही बताने वाला था कि और स्वामी जी को सबसे ये मानसिक कष्ट आपने जो कहा बिल्कुल सही कि फिजिकल कष्ट तो है ही है किंतु मानसिक कष्ट भी और दूसरा था यह मां का उनका एक बड़ा एक डर था कि मां को जब पता चला भुवनेश्वरी देवी स्वामी जी की गर्भधारिणी मां कि देखिए एक तो लड़का चला गया घर से साधु हो के तो कष्ट करना पड़ रहा है। वह एक चीज है। किंतु चलो एक गर्व भी होता है कि कोई गुंडा बदमाश तो नहीं हो गया। टेररिस्ट तो नहीं हो गया। है तो एक साधु एटलीस्ट। अभी यदि यह सुनने को मिले कि साधु होकर के भ्रष्टाचार कर रहा है तो और कितना कष्ट होगा? स्वामी जी लेटर में एक्चुअली लिखते हैं कि मेरी मां को यह कष्ट जो उन्होंने दिया है उससे मुझे और भी कष्ट हुआ है। सो यू आर राइट दैट वे कि भुवनेश्वरी देवी को जो यह सब सुनने में आया था आया होगा। एग्जजेक्टली मुझे पता नहीं। किंतु स्वामी जी लेटर में स्पष्ट लिखते हैं कि मेरी मां है वहां पे और मां को यदि यह सुनने में आएगा तो क्या होगा? सो दैट इज वन थिंग। तो सामने में देखिए कि यह जो स्वामी जी के फॉरेन डिसाइपल थे उन लोगों में भी कितना एक विज़डम था कि स्वामी जी जब अमेरिका से जाने वाले थे उस समय उन्होंने भुवनेश्वरी देवी को एक लेटर लिखा था। लेटर ऑफ एप्रिसिएशन कि आपका लड़का यहां पर आया और उन्होंने हमको इतना उपदेश वगैरह दिया हमारा जीवन जो परिवर्तित हुआ तो इस तरह के महापुरुष को जन्म देने के लिए हम आपके बड़े ही ऋणी हैं। हम आपके प्रति बड़े ही श्रद्धास्पद हैं। ऐसा बोलकर के सारा ओलीबुल ने लेटर भुवनेश्वरी देवी को लिखा था। और स्वामी जी को पता चला स्वामी जी अगेन लेटर में लिखते हैं कि देखिए आपने सही में इतना अच्छा काम किया। मुझे सबसे ज्यादा संतोष हुआ इस बात से। सो यू आर राइट कि खुद को जो कष्ट करना पड़े, खुद को जो मेंटल कष्ट सहन करना पड़े, उससे भी ज्यादा यदि मां को यदि करना पड़ेगा इस तरह से। सो विल बी इवन वर्स। देखिए मैं हमेशा कहता हूं यह हावर में प्रोफेसरशिप मिले तो पूरे इंडिया को बेच देने वाले इंटेलेक्चुअल की कमी नहीं है आज भारत में। और स्वामी जी को वही हार्व का प्रोफेसरशिप को ठुकरा करके भरत वापस आए। दिस इज द ग्रेटेस्ट साइन ऑफ ह रनसिएशन [हंसी] आज की दृष्टि से वि इन हैंड साइड ज देखिए [हंसी]
प्रश्न: वैराग्य के नाम पर कुछ साधकों में स्त्रियों के प्रति घृणा क्यों उत्पन्न हो जाती है? क्या यह साधना की सही दिशा है?
ये मिसोजीनी जो है ना उसके बड़े कॉम्प्लेक्स रूट है जो कि हमने ऑलरेडी आज डिस्कस किए ही है। आध्यात्मिक दृष्टि से देखिए तो दोनों को पुरुषों को स्त्रियों का स्त्रियों को पुरुषों से थोड़ा सा दूर रहना ही है। किंतु साथ में भी जो एक बात बड़ी क्लियर रखनी है कि द्वेष नहीं होना चाहिए। जो आध्यात्मिक वैराग्य है दैट इज वन थिंग और उनके प्रति द्वेष होना वो बिल्कुल अलग है और द्वेष के कारण है। ऑलरेडी हमने तो आज डिस्कस की देखिए अपने लिटरेचर में खास करके बाकी का तो मुझे पता नहीं। अपने लिटरेचर में क्या है? पुरुष प्रधान लिटरेचर है। लिखने वाले जितने भी है ना सब पुरुष हैं। किंतु आप स्त्रियों का जो रेमिनेशंस है ना वो आप पढ़ेंगे ना देखिए कि श्री रामकृष्ण जय रूपे देख उसमें एक स्त्री का रेमिनेशंस है। मैं भूल गया उनका नाम किंतु उन्होंने स्पष्ट लिखा है। आज लोग जब सब यह कहते हैं ना कि ठाकुर स्त्रियों के साथ में इस तरह से व्यवहार करते थे वगैरह-वगैरह तो यह पढ़कर के ना हमको हंसी आती है क्योंकि हमने भी ठाकुर का संग किया है और हमको पता है कि ठाकुर ये जो पुरुषों के सामने स्त्रियों के बारे में जो कहते हैं एग्जैक्टली वही बातें स्त्रियों के सामने पुरुषों के बारे में कहते हैं और ठाकुर हमको इतना सम्मान देते हैं कि हम लोग भाषा में व्यक्त नहीं कर सकते वो रेमिनेशंस जे रूप देखिया जी छ उसमें है यह बात और बड़ा बड़ा सुंदर रेमिनेशंस है। वे लोग एक बार ठाकुर का दर्शन करने के लिए आए दक्षिणेश्वर तो पता चला ठाकुर चले गए हैं कोलकाता। तो ये लोग भी गए कोलकाता। फिर वहां पे वो मोटा बामुन बोल के एक डिवोटी के घर में ठाकुर बैठे हैं। तो ये लोग भी गए वहां पे वो ठाकुर के साथ में बढ़िया मजे से हंसी मजाक कर रहे हैं। उस समय ठाकुर अकेले बैठे थे कमरे में। अभी एकाएक वो मोटा बामून आ गया। तो अभी ये लोग अभी क्या है? वो स्त्री पुरुष का तो थोड़ा सा पर्दा प्रथा जैसा था ना। तो कहां जाए? कहां जाए? पुरुष के सामने चेहरा नहीं दिखाना है। तो ठाकुर जिस कोर्ट के ऊपर में बैठे थे। कोर्ट के नीचे में वे लोग दो-तीन स्त्रियां उसके नीचे में छुप गई। [हंसी] और ये जो मोटा बामून है वो ठाकुर के साथ में बात कर रहा है। और ठाकुर को पता है कि ये स्त्रियां उनके नीचे में छुपी हुई है। बोला मोटा बामन को पता नहीं। तो ठाकुर बढ़िया मजे से हंसते-हंसते बात कर रहे हैं क्योंकि उनको भी पता है देखिए कैसा रंग जमा है वो स्त्रियां भी ये जो रेमिनेशंस लिखती है कि देखिए हमको इतना उस समय हंसी आ रही थी द अब्सोडिटी ऑफ़ दिस सिचुएशन कि वो जिस कोट के ऊपर में ठाकुर बैठे हैं उसी के नीचे में हम छुपे हुए हैं और फिर मच्छर भी बहुत थे तो मच्छर भी काट रहे हैं इन स्पाइट ऑफ ऑल दिस इनकन्वेनियंस ए मॉस्किटो बाइट भीतर में से इतना आनंद आ रहा है सो लुकिंग एट द एब्सोर्डिटी ऑफ़ द सिचुएशन लुकिंग कि ठाकुर का हमारे प्रति कितना एक रिस्पेक्ट का भाव है। कितना एक करुणा का भाव है। और फिर यह मोटा बाबुन जब आखिर में गया तो फिर वह कोर्ट के नीचे में छुपी बाहर निकली और फिर से हंसती हंसती ठाकुर के साथ बात करे। सो बिकॉज़ कि हम लोग इतना ये नहीं है लिटरेचर का अपना अंडरस्टैंडिंग इतना ये तो एक बात है। दूसरा कि बिकॉज़ कि लिटरेचर इटसेल्फ पुरुष प्रधान है। बोलकर कि ये सब बातें हम भूल जाते हैं कभी-कभी। मां मां शारदा ठाकुर जो देहो त्याग हो मां काली को बोले कांद छ सो मां शारदा भी ठाकुर के भीतर में उस शक्ति का दर्शन करती थी सो यू आर राइट कि स्त्री और पुरुष अर्धनारीश्वर वो है ठाकुर
प्रश्न: कई बार हम स्त्रियाँ स्वयं नहीं समझ पातीं कि हमारा व्यवहार कुछ परिस्थितियों में ऐसा क्यों हो जाता है। इसीलिए आत्मनिरीक्षण के साथ हमें अपने ही व्यवहार में सुधार करने की आवश्यकता है
देखिए यह जो आपने कहा ना स्वामी जी एग्जजेक्टली यही बात करते हैं वो बड़ा क्रूल पैसेज है क्रूर जब मैं मैं जब बिल्कुल पहली बार स्वामी जी के यह पैसेज पढ़ा था मैं इतना आश्चर्यचकित हो गया था। स्वामी जी ऐसी बात करते हैं। माने और कोई ऐसा कुछ लिखता बोलता तो फिर भी समझ में आता था। स्वामी जी ऐसी बात करते हैं। स्वामी जी क्या लिखते हैं? देखिए स्त्रियों के भीतर में एक तरह का दास्य दासत्व भाव है। जैसे भारत गुलाम है तो गुलामी का क्या रिजल्ट क्या है? व्हाट इज द रिजल्ट ऑफ स्लेवरी? तो जेलसी? जो गुलाम प्रजा होती है हमेशा उनमें जेलसी होती है। स्वामी जी वो फेमस स्टेटमेंट है कि वो जो ये होते हैं ना क्रेब्स केकड़े तो वो बोतल में भर दो फिर जैसे ही एक उसमें से बाहर निकलने का प्रयास करता है दूसरे लोग उसके पैर खींच करके उसको नीचे खींचने का प्रयास करते हैं। स्वामी जी को पूरा लाइफ यह जेलसी का सामना करना पड़ा है। जो गुलाम प्रजा है उसके भीतर में ईर्ष्या भयानक रूप से भरी है। तो यही बात स्वामी जी वेरी सरप्राइजिंगली कहते हैं कि स्त्रियों के भीतर में भी एक तरह का पुरुषों के प्रति दासत्व भाव होता है। ईर्ष्या बड़ी स्ट्रांग होती है। यदि तीन-चार स्त्रियों को आप कहे कि एक मिलकर के काम करें तो वह आपस में झगड़ा ही करेगी। फिर कोई एक पुरुष आकर के सबको डांट करके कंट्रोल में करके काम करवाए तो वे लोग करेगी। अदरवाइज आपस में तो झगड़ा ही करेगी। जैसे स्वामी जी कहते हैं व्हिच इज वेरी सरप्राइजिंग।
प्रश्न: मुझे ऐसा नहीं लगता कि श्रीरामकृष्ण या रामकृष्ण-साहित्य में कहीं भी स्त्रियों के प्रति असम्मान व्यक्त हुआ है।
वो जो ठाकुर एक कहानी कहते हैं कि दुर्गा पूजा हो रही है तो मां की प्रतिमा गढ़ बनाई गई तो मां को जनेऊ पहनाया है तो जिसने जनेऊ पहनाया तो एक डिवोटी आकर कहता है कि मां को जनेऊ क्यों पहनाया उपनयन जनरली पुरुष लोग ही जनेऊ पहनते हैं ना स्त्रियां जनेऊ नहीं पहनती तो वो कहता है जिसने मूर्ति बनाई कि भाई यह मां पुरुष पुरुष है ना प्रकृति तुम ही समझे हो मुझे तो समझ में नहीं आया इसलिए मैंने स्त्री का शरीर बनाया देह बनाया है ऊपर में से जनेऊ पहनाया है ना ठीक देखिए ये ये मैंने जब पहले पढ़ा ना आई वास सो सरप्राइज कि और कोई भी कहेगा ये सब चीजें व्हिच इज किंतु स्वामी जी कैसे कह सकते हैं सो यू आर राइट इन अ वे के इस देखिए बहुत सारे फैक्टर्स इसमें कारणभूत है ओरिजिनल जब सिविलाइजेशन का प्रारंभ हुआ सिर्फ भारत में ही नहीं यह मेसोपोटेमिया, इजिप्ट सब जगह पे देखिए कि वो फर्टिलिटी फिगर्स की मूर्ति आपको मिलती है। स्त्री की मूर्ति मिलती है। क्यों? क्योंकि वो मातृ प्रधान देश थे। यह मैट्रियाकी जिसको कहते हैं ना लड़के के नाम के पीछे मां का नाम आता है। पुरुष का नहीं पिताजी का नहीं मां का नाम आता है। तो इसको मैट्रियर्की कहते हैं। जो घर है तो घर का लीडर मतलब जो मुखिया कौन है? तो पुरुष नहीं है, स्त्री है। जो मां है जो सबसे बूढ़ी जो अम्मा है वहां पे नानी वो घर की लीडर होगी। तो दिस इज अ ओरिजिनल फॉर्म ऑफ सिविलाइजेशन। किंतु प्रॉब्लम क्या हुआ? बात बादबाद में युद्ध जो चालू हुए ना तो युद्ध में तो फिजिकल स्ट्रेंथ का ही ज्यादा प्राधान्य है। बोलकर के जो लोग युद्ध करते थे उनके पास में पावर आने लगा। तो स्त्रियों के पास में था विज़डम। जो हंटर गैदर थे जो पशु की तरह जंगल में शिकार करके घूमते थे उस पशुत्व से मनुष्यत्व की ओर ले आए हैं स्त्रियां ही उनका विडम उनकी करुणा उनका जो फैमिली मेंबर्स के प्रति प्रेम आपस में जो ट्राइब्स होती है ट्राइब्स में कोऑपरेशन करके चलना ये सब स्त्रियां ही कर सकती थी मैट्रियर्की थी प्रत्येक पूरी पृथ्वी पे ऐसा नहीं कि भारत में मेसोपोटेमिया देखिए इजिप्ट देखिए जितनी भी पुरानी पुरानी सभ्यताएं देखिए सब जगह पर मेट्रियर्की थी स्त्रियों का शासन था किंतु जैसे-जैसे यह युद्ध का जो प्राधान्य बनता गया तो फिर समाज जो है मैट्रिय्की में से पेट्रिय्की यानी कि पुरुष प्रधान समाज में होना कन्वर्ट होना शुरू हुआ। अब यह पुरुष प्रधान समाज ने हमको आखिर में यह फर्स्ट वर्ल्ड वॉर, सेकंड वर्ल्ड वॉर, यह न्यूक्लियर वेपन यह क्या-क्या सब पागलपन दिया है। मुझे लग रहा है कि ठाकुर के आने के बाद से यह जो इमंबैलेंस था वो फिर से ठीक होना शुरू होगा। ठीक ठीक। स्वामी जी कहते हैं ना अमेरिका और भारत का आदर्श का डिफरेंस देखिए। वहां पर स्त्रियों को सम्मान है। किंतु किस तरह से डेमसेल इन डिस्ट्रेस जो मोहिनी रूप लिया है इस तरह की स्त्री यदि कष्ट में आती है तो पुरुष लोग सब समय उसको हेल्प करने को जाएंगे। तो स्वामी जी कटाक्ष करके कहते हैं एक बूढ़ी औरत है उसको कष्ट पड़ता है तो तुम जाओगे क्या दौड़ के हेल्प करने के लिए? तो बेचारा उत्तर देना बंद कर दिया। वो कहते हैं ना कि वो शिवालरी जो यूरोपियन कांसेप्ट है शिवालरी उसका क्या अर्थ हुआ कि पुरुष हमेशा स्त्रियों की रक्षा करने के लिए तत्पर है। तो स्वामी जी इसके पीछे का भाव समझते हैं। बोले तुम युवा स्त्रियों की रक्षा करने को तैयार हो। वृद्ध स्त्रियों की रक्षा करने के लिए क्या इतने तैयार हो? तो इसका कोई उत्तर नहीं है। राइट? भारत में जबकि है कि स्त्री अर्थात की मां अल्टीमेटली। तो मातृ स्वरूप की आराधना या तो मातृ स्वरूप की सबसे ज्यादा रिस्पेक्ट। सो यह डिफरेंस स्वामी जी समझ थे और स्वामी जी जब यह कहते हैं ना कि अमेरिका इज अ हेवन फॉर वीमेन एंड मासिस तो स्वामी जी के माइंड में यह सब क्लियर था। हालांकि उस समय के भारत की इतनी खराब अवस्था थी कि अमेरिका का जो कच्चा पक्का जो आदर्श था वो भी भारत से अच्छा था। ये 10 साल की लड़की की शादी करवाओ और फिर यह शास्त्र में उसको गर्भाधान हो। उसके ये सब आप प्रूफ खोजो ah खोजो। इससे तो बेटर है कि अमेरिका का परिस्थिति यह स्त्रियां देखिए स्वामी जी अमेरिका में स्वामी जी खुद कहते हैं मैं जब गली में रास्ते में जा जाता हूं ना चलते-चलते हमेशा मैं एक लेडी डिवोटी को साथ में रखता हूं क्यों क्योंकि ये तो चित्र विचित्र कपड़े पहनते थे वो कोट पेंट वगैरह जो स्वामी जी का शिकागो ड्रेस आपने देखा होगा पगड़ी पहनते थे तो वहां पे जो पुरुष लोग हैं लड़के हैं पत्थर मारते थे स्वामी जी को उनकी निंदा करते थे कटाक्ष करते थे तो स्वामी जी कहते हैं कि मेरे साथ में कोई एक लेडी डिवोटी होगी ना किसी का साहस नहीं है मेरा अपमान करने का तो देखिए कि दैट वाज़ रिस्पेक्ट अकॉर्डेड टू वमेन। सो हालांकि उन लोगों का जो स्त्रियों के प्रति देखने का जो आदर्श था इतना परफेक्ट नहीं था किंतु उस समय के भारत देश की जो अवनति थी उससे तो मच बेटर था। वी हैव टू ट्रांसेंट दैट आल्सो। जिस तरह से 18th सेंचुरी भारत को हमको ट्रांसेंट करना है वैसे ही 19th सेंचुरी अमेरिका के आदर्श को भी ट्रांसेंट करना है। दैट इज दी अल्टीमेट आइडियल ऑफ शक्ति इन रामकृष्ण भावधारा। ओम