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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

चिर सधवा || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 7 Apr 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः

वराहनगर मठ में स्वामी विवेकानन्द का सिंह-विक्रम से उद्दाम नृत्य-संकीर्तन

बलराम बाबू के पिताजी थे गोंडा वैष्णव बेंगली वर्ड है। इसका अर्थ क्या है? ऑर्थोडॉक्स वैष्णव एक तरह का फेनेटिसिज्म कि भगवान कृष्ण को छोड़कर के और कोई ईश्वर उतने उच्च कक्षा पे नहीं है जितने भगवान कृष्ण है। तो एक तरह का फनेटिसिज्म और जिस तरह से उस समय के वैष्णवों की रीति थी। सर के ऊपर में तिलक करेंगे। फिर गले में वह तुलसी की माला पहनेंगे जिसको कहते हैं कंठी और फिर हाथ में रखेंगे हरि नाम की झोली अर्थात कि वह जो जप करने की माला होती है और माला जो है सबको दिखे नहीं कि आप जप कर रहे हैं। इसके लिए एक झोली होती है कपड़े की। उस झोली के भीतर में माला रखकर के जप किया जाता है। तो वह उस समय के वह कुछ वैष्णव इस तरह से भेक धारण करते थे। ठाकुर कहते हैं मैंने भी वृंदावन में भेक धारण किया था। तीन दिन रखा था। इसके बाद में किंतु खोल के निकाल दिया। तो इस तरह से भेंक धारण करके फिर पीतांबरी वगैरह है वह जो कुछ पहन करके यह लोग कुछ रहते हैं। तो बलराम बाबू के पिताजी ठाकुर के साथ में मुलाकात हुई तो ठाकुर पूछते हैं कि मैंने दूसरे लोगों को कहते हैं कि जो लोग इतना सतत जप करते रहते हैं, तिलक लगाते हैं, कंठी पहनते हैं, जप करते हैं, भेंक धारण करते हैं उन लोगों का होता क्यों नहीं है कुछ? तो फिर उसी के उत्तर में ठाकुर कहते हैं दो-तीन चीजें तो सिंसियर नहीं होते। फिर मन जो है काम कांचन में पड़ा रहता है। बहुत सारे इस तरह से जप करतेकरते वो मछली बाजार में जाएंगे। मछली का दर करेंगे कि यह कितने रुपए की, यह कितने रुपए की। अभी जप कर रहे हैं तो मुंह से तो बोल नहीं सकते। तो फिर उंगली दिखा के दिखाएंगे कि यह दे दो, वह दे दो। तो एक तरह की इनसिंसियरिटी सभी में नहीं। कुछ-कुछ लोगों में होती है। तो यह थोड़ा सा जो लोग वेदांती है या तो फिर जो सिंसियर साधक है उन लोगों के भीतर में यह थोड़ा सा कटाक्ष का विषय था। तो अभी योगेंद्र महाराज जिनके बारे में आज हम देखेंगे कि वह मां उनको दीक्षा देती है। यही योगेंद्र महाराज जब वृंदावन से वराह नगर मठ वापस गए तो साथ में ले क्या गए थे। वही जो कंठी फिर वह जो तिलक माटी और फिर यह जो जप करने की माला और झोली तो यह सब कुछ लेकर के गए थे तो स्वामी जी ने देखा कि यह सब ले आया है तो एक दिन भोजन के बाद में स्वामी जी ने कहा कि दे आमाई बैरागी साजिए तुम लोग मुझे वैरागी सजा दो वैरागी के रूप में यह जो इस तरह का भेद धारण जो करते हैं उनको कहते हैं वैरागी तो वैष्णव वैरागी। तो स्वामी जी ने जैसे ही कहा तो सब गुरु भाई ऐसा देखिए गुरु भाइयों के भीतर में यह जो आनंद हलाद करने की जो क्षमता थी यह हमने पहले भी डिस्कस किया है कि एक तो होती है दीन हीन रोते हुए करने वाली भक्ति और एक होती है हर्षोत्फुल्ल होकर के आत्म श्रद्धा पूर्ण मेधा शक्ति से भरपूर भक्ति। तो इन लोगों के भीतर में जो भक्ति थी हर्षोतफुल आनंद व्यंग विनोद ये उन्हें फुल ऑफ लाइफ यह जो उनकी भक्ति थी तो जैसे ही स्वामी जी ने कहा सब लोग हंसी मजाक के मूड में स्वामी जी को किसी ने तिलक कर दिया कंठी पहना दी हाथ में झोली पकड़ा दी और फिर इसके बाद में जैसे हमने वो गंभीरानंद जी की स्वामी जी की जीवनी में देखा था कथामृत में जिस तरह से वर्णन है मास्टर महाशय गए हैं और देखा कि स्वामी जी मुंह में रसगुल्ला रख के फिर ठाकुर की तरह नाटक करते हैं कि जैसे वह ठाकुर को कैसे भाव होता था तो मुंह में रसगुल्ला रख के ठाकुर की नकल करते हैं और सभी लोग हंसी मजाक करते हैं। तो यहां पर भी स्वामी जी को वह पहना दिया सब कुछ और फिर स्वामी जी एक वैरागी की नकल करतेकरते वह झोली के भीतर में माला जप कर रहे हैं। राधा कृष्ण नाम जप करना तो कर रहे हैं। माने वो एक तो बंगाली में क्या है कि नाम थोड़ा सा चेंज हो जाता है। उसमें भी स्वामी जी जानबूझकर के अपभ्रंश करके कहते हैं। आधा केशस्तो आधा केस्टो ऐसा करके करके वो जप कर रहे हैं। वो हंसी मजाक चल रहा है। सब लोग आनंद में मग्न है। एकाएक स्वामी जी ने सिंह विक्रम से त्राड़ लगाई, गर्जन लगाई। बोल हरि बोल हरि हरि बोल। तो जैसे ही स्वामी जी ने यह गर्जन किया सिंह विक्रम से एकाएक जैसे कि सन्नाटा छा गया। जैसे कि भाव जो है व्यंग विनोद का भाव था। हास्य कुतूहल का भाव था। एकाएक प्रचंड भक्ति का प्रवाह सिर्फ स्वामी जी की एक गर्जन से सभी के भीतर में फैल गया और सभी लोग खड़े होकर के फिर स्वामी जी के साथ में बोल हरि बोल हरि हरि बोल बोल के उदाम नृत्य कीर्तन प्रारंभ कर दिए वहां पे कोई मृदंग है पखवाज है वह बजाने लगे पखवाज बजा रहे हैं तो बजा ही रहे हैं एक के बाद एक एक की अंगुली उंगली जब यह थक जाती है माने तब यह दूसरे को देते हैं। दूसरे की उंगली जब काम करना बंद कर देती है। हाथ जब काम करना बंद कर देते हैं तब तीसरे को देते हैं। ऐसा करके करके किसी एक से दूसरे के हाथ में यह पखवाज जा रहा है। और यहां पर उत्तान नृत्य कीर्तन सिंह विक्रम से सिंह गर्जन से चल रहा है। चल रहा है। चल रहा है। और इसकी जो आवाज है इसका यह जो रोल है मतलब तरंग कीर्तन की तरंग सुनामी की तरंग की तरह चारों ओर फैलने लगी। यह वराह नगर बाजार जो था वहां पे यह कीर्तन की आवाज गई। सब दुकान वाले दुकान बंद करके यह जो कस्टमर थे अपनी परचेस छोड़ के सब लोग वराह नगर मठ में दौड़ेदौड़े चले आए और फिर वहां पर रह के और क्या है कि लोग तो भीतर में प्रवेश करना चाहते थे तो किसी गुरु भाई ने दरवाजा बंद कर दिया जा यह जो दानादेर घर जो दानवों का घर जहां भी यह सब हो रहा था तो नीचे में चारों ओर लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई है और यहां वहां पर कीर्तन पे कीर्तन सिंह गर्जन के साथ में चल रहा है तो चल रहा है। कितनी देर के बाद में यह समाप्त हुआ और फिर कहीं जाकर के लोग अपने घर जा रहे हैं। वो जातेजाते कहते हैं कि इस तरह का कीर्तन भी कभी नहीं सुना और इस तरह की मधुर हरि नाम भी कभी नहीं सुनी। तो देखिए कि यह जो वृंदावन के बारे में जो हमारी घटनावली श्री मां का जीवन हम चर्चा कर रहे हैं चिर सिमंतिनी चैप्टर का जो अंतिम पार्ट जो प्रारंभ हुआ है उसमें वृंदावन में मां जो मां की जो लीला है वृंदावन में उसका हम पाठ कर रहे थे। तो देखिए कि वैसे तो वृंदावन का यह विरह मधुर भाव है। वृंदावन का यह मधुर भाव गोपी और कृष्ण के बीच में श्रीमती राधा रानी और भगवान कृष्ण के बीच में वह तो है ही है। किंतु देखिए कि भारतीय सनातन धारा यहां पर जिस तरह से वेदांत हमको आत्मश्रद्धा प्रदान करता है उतना ही हमको यह भक्ति साधना जो है ठीक-ठीक भक्ति साधना को समझे रामकृष्ण विवेकानंद ट्रेडिशन में तो इसके भीतर में भी प्रचंड उत्साह प्रचंड विडम और बुद्धिमत्ता और इसी के भीतर में प्रचंड आत्मविश्वास और शक्ति निहित है। सो उसका एक छोटा सा उदाहरण तो अभी हम कहानी फिर से प्रारंभ करते हैं। कल हमने देखा कि मां वृंदावन परिक्रमा कर रही है और बीच-बीच में चमत्कृत होकर के खड़ी रह जाती है। जैसे कि यह उनको सब याद आ रहा है कि श्रीमती राधा रानी के रूप में उन्होंने जब लीला की थी तब उन्होंने इस स्थल पर यह हुआ था। इस स्थल पर यह लीला हुई थी। इस स्थल पर भगवान कृष्ण के साथ में इस तरह से वार्तालाप हुआ था। तो वह जो एक पूरा उनके मन के भीतर में जागृत हो रही है पूर्व जन्म की स्मृतियां। और जो लोग यह रेमिनेशंस का वर्णन करते हैं योगिन मां है या स्वामी योगानंद जी है उन लोगों ने कहा कि हमको स्पष्ट प्रतीत होता है कि मां को दर्शन हो रहे हैं। किंतु जब यह लोग जिज्ञासित हो जिज्ञासु होकर के प्रश्न करते हैं कि मां क्या हुआ? आपने क्या देखा? तो मां सिर्फ इतना ही कहती है नहीं कुछ नहीं। ठीक है। चलो अभी यहां से आगे चलते हैं। तो यह एक पूरा हमने कल देख लिया। तो अभी आज है योगानंद जी की दीक्षा

माँ सारदा की दिव्य लीला: श्रीरामकृष्ण के प्रति मातृभाव और शिष्यों के साथ बालिका-भाव

हो रही है। देखिए मां ठाकुर की महासमाधि से योगानंद जी की दीक्षा। समय ज्यादा नहीं है। किंतु मां के जीवन में जो इतना परिवर्तन जो आया है वो एक लक्ष्य करने की चीज है। देखिए एक इंटरेस्टिंग कंट्राडिक्शन मैं कल सोच रहा था। मां जब ठाकुर के साथ में दक्षिणेश्वर में रह रही थी। तो हमको तो पता है कि ठाकुर और मां के बीच में एज गैप जो है काफी बड़ा था। 1858 में जब विवाह हुआ था 58 के आसपास में जो विवाह हुआ था ठाकुर और मां का तो ठाकुर की उम्र 23 साल थी और मां की पांच या छ साल थी इस हिसाब से आप देखें तो ऑलमोस्ट 17 16 साल का 16 17 18 साल का एज गैप ठाकुर और मां के बीच में था और किंतु सिर्फ इतना ही नहीं ठाकुर का जो विडम था ठाकुर मां को सब सिखा रहे हैं एक के बाद एक कि किस तरह से म यहां तक कि जब नौका में उठना है तो पहले हमको नौका में उठना है सबसे आखिर में उतरना है उसके बाद में यह जो लैंप बनाते हैं दिया बनाते हैं उसकी ये जो वाट होती है उसको कैसे बनाना है लोगों के साथ में किस तरह से व्यवहार करना है आध्यात्मिक जीवन में किस तरह से क्या करना है सब कुछ ठाकुर मां को बताते थे तो नेचुरली उनके बीच में पति और पत्नी का तो संबंध था ही था किंतु साथ में गुरु और शिष्या का भी संबंध था। तो हमको ऐसा लगेगा कि मां के जीवन में जो मातृभाव जो है मातृभाव तो तभी प्रारंभ होगा जबकि मां ठाकुर की महासमाधि के बाद में शिष्यों को उन्होंने मंत्र दीक्षा प्रदान करना शुरू किया। तभी से तो उनका मातृभाव प्रारंभ होगा। और जब तक ठाकुर है तब तो मां का बाली का भाव ही रहेगा या तो एक शिष्या का भाव रहेगा या तो पत्नी का तो भाव है ही है कि ठाकुर की सेवा करती थी किंतु मैं थोड़ा सा स्टडी करता हूं तो पता है सच एक डिलीशियस कंट्रास्ट खड़ा होता है ठाकुर की कितनी दशाएं होती थी ठाकुर ने चैतन्य देव का नाम करके तीन दशाओं का उल्लेख किया है बाह्य दशा अर्ध बाह्य दशा और अंतर्दशा तो बाह्य दशा में भक्तों के साथ में वार्तालाप करेंगे। खाना पीना खाना है जो कुछ भी करना है जीवन धारण करने के लिए अर्ध बाह्य दशा में उदाम नृत्य कीर्तन करेंगे और फिर अंतर्दशा तो पता ही है समाधि में बूंद होकर के पड़े रहेंगे। किंतु वो एक जो था उनका ठाकुर का भाव अर्धबाह्य दशा या तो अंतर्दशा उसमें वह जगत गुरु नारायण स्वयं थे किंतु बाह्य दशा में ठाकुर का एक बचपने का भाव था। भले ही चाहे मां को शिक्षा देते थे किंतु साथ में एक बच्चे के भीतर में जो नर्वसनेस होती है, ए्जायटी होती है, कभी-कभी वो डर डर जाता है, कभी-कभी वह उत्फुल्लित हो जाता है। वो सब बालक का बचपना ठाकुर के भीतर में दिखाई देता था। तो फिर ठाकुर के बचपने के साथ में डीएल करने के लिए मां को अपना मातृभाव जो है सब समय जागृत रखना पड़ता था। ठाकुर कब क्या पागलपन चालू करेंगे और फिर मां को आकर के सब कुछ उनको थोड़ा समझा बुझा के ठीक करना पड़ेगा। वो जो दूध पीने वाली घटना ठाकुर बीमार थे और डॉक्टर ने कहा होगा कि ठाकुर को दूध पीने की आवश्यकता है। शरीर में बल आए। अभी ठाकुर को यहां पे यह डर लग गया है कि दूध पीने से पेट बिगड़ता है। तो फिर ज्यादा दूध नहीं पिएंगे। तो मां बिल्कुल जैसे अपने बच्चे को पटा फुसला करके किस तरह से दूध को उबाल करके गाढ़ा करके ठाकुर को पिलाती है। अभी ठाकुर बच ठाकुर का बचपने का भाव है। बच्चे की तरह हरकत करते तो है किंतु इवन बच्चा भी समझ लेगा ना कि यह दूध गाढ़ा लग रहा है जनरली प्रतिदिन की जगह। तो फिर वो मां को पूछते हैं कि अरे इसमें कितना दूध है? तो मां बोलेगी अरे जो जितना चाहिए उतना ही है इससे ज्यादा थोड़ी ना होगा। किंतु फिर ठाकुर ने गुलाब मां को पूछा तो गुलाब मां को बेचारी को पता नहीं था। सही-सही बता दिया कि मां जो यहां पर काली वाड़ी काली वाड़ी की जो कटोरी है वो कटोरी में जितना आता है उतना ही इस कटोरी में आता है। तो ठाकुर समझ गए कि मां ने कुछ गड़बड़ किया है। तो ठाकुर नाराज होकर बोलते हैं बुलाओ उसको बुलाओ बुलाओ। तो मां को बुलाया। श्री ठाकुर पूछते हैं कि बताओ किस कितना दूध है उसमें? तो मां कहती है कि अरे तो दूध पीना है उसमें कितना मेजरमेंट कितना ये वो ये सब चिंता करने की क्या जरूरत है? किंतु फिर देखिए ठाकुर का बचपना जो है नर्वसनेस और ए्जायटी जो है वो इस तरह से मन के ऊपर काम करता है कि जब तक दूध पीते थे गाढ़ा दूध तब तक कोई प्रॉब्लम नहीं था। किंतु आज जब यह बचपना जब उनके ऊपर में आ गया कि अरे नहीं मैं गाड़ा दूध पी रहा हूं तो पेट बिगड़ेगा तो सही में उस दिन पेट बिगड़ गया और फिर उनको बार-बार वो जो दस्त के लिए जाना पड़ता है। तो देखिए कि ठाकुर का यह बचपना है। उसको डीएल करने के लिए उसके साथ में डीएल करने के लिए मां को मातृभाव का अवलंबन करना पड़ता था। माने ठाकुर के सामने वो शिष्या भी है। पत्नी होकर के ठाकुर की सेवा भी करती है और एक तरह से मातृभाव का अवलंबन करके ठाकुर की संभाल भी रखती है। किंतु फिर देखिए कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में अभी मां के मन के भीतर में जो एक परिवर्तन प्रारंभ होता है। जगत की जवाबदारी तो लेनी ही है। किंतु साथ में ही जमीन पे बांध करके रखने के लिए जैसे कि मां के पास में कुछ नहीं। इवेंचुअली राधु आएगी। किंतु जो ठाकुर की जिस तरह से मां संभाल रखती थी उस तरह से संभाल रखने के लिए वह जो एक एंकरिंग था जगत के साथ में वो एंकरिंग जैसे कि टूट गया है और मां का मन जो है भीतर से वो सब समय अर्धबाह्य दशा अंतरर्दशा की ओर जा रहा है और जब ऐसा होता है कि आपका सबकॉन्शियस माइंड सब समय अर्धबाह्य दशा अंतरर्दशा में विलीन है तब हमारा यह जो कॉन्शियस माइंड जो होता है यह जगत के रीति रिवाज नीति नियम को तोड़ के एकदम जैसे कि बचपने का अवलंबन करता है। तो कंट्राडिक्शन कि ठाकुर के रहते रहते मां का जो मन था जगत के साथ में ठाकुर की सेवा के साथ में इस तरह से युक्त था। इतना एंकरर्ड था पृथ्वी के ऊपर में कि मां के भीतर में यह मातृभाव का अवलंबन करना आवश्यक था। किंतु ठाकुर की महासमाधि के बाद में धीरे-धीरे करके यह एंकरिंग जो है वह लूज होता गया और मां के भीतर में यह बाली का भाव का उदय होता गया। तो यह जो बालिका भाव में आकर के मां यह जो सब मां की जो लीला प्रारंभ होती है उसके बहुत सारे उदाहरण बाद में हमको मिलते हैं। अपूर्वानंद जी वहां पे बांकुड़ा जिले में रिलीफ वर्क कर रहे थे। तो फिर अभी तो पता ही है कि बांकुड़ा में ही जय राम बाटी है। जय राम बाटी में ही मां है। मां का दर्शन करना है। मां से दीक्षा लेनी है। तो फिर वो उन्होंने महापुरुष महाराज की परमिशन लेकर के लेटर लिखकर के परमिशन लेकर के जय राम बाटी आगमन करते हैं। तो आते हैं तो पहले तो वह बाकुड़ा में वह जो एक वैुंठ डॉक्टर अपने ही एक साधु थे तो उनके पास में से आम बात आम बात एक तरह का रोग है जिससे कि शरीर के ऊपर में वो थोड़ा सा ये स्क्रैचेस जैसे म वो जो यह कहते हैं ना चुलकानी चुलकानी क्या ऐसा ही कुछ तो जो भी है माने वो रेशिस जिसको कहते हैं रेशिस जैसा हो जाता है तो वो उसके लिए तेल कि उसके ऊपर में तेल लगाने से वह ठीक हो जाए। तो इस तरह का तेल का शीशी लेकर के अच्छा अच्छा एला जी अच्छा अच्छा तो एलर्जी एलर्जी ओके हां तो इस तरह से वो तेल का शीशी लेकर के अपूर्वानंद जी जयराम भाटी आए तो जयराम भाटी आए तो फिर जैसे ही उन्होंने प्रणाम करके मां को यह तेल का शीशी दिया कि मां यह देखिए वैुंठ डॉक्टर ने भेजा है आपके यह एलर्जी या तो फिर यह रेशिस जो है उसके लिए तो मां ने देखकर के इतनी खुश हो गई। अच्छा वैुंठ डॉक्टर ने भेजा है तो चलो बहुत अच्छा होगा। मैं उसी की वजह से ही तो मैं बच के रही हूं। ऐसा बोलकर के फिर मां अपने रेशिस जो है वो अपनी साड़ी हटा करके उनको दिखा रही है। बिल्कुल जैसे बच्चे की तरह कि देखो बेटा मेरे साथ में ये क्या हो रहा है? इतना मुझे कष्ट हो रहा है। तो और अपूवानंद जी भी बिल्कुल बच्चे की तरह मां को फिर जैसे मां के संतान हो। मां के लिए वो रिस्पांसिबल हो। देखिए क्या रिलेशन क्या है? मां जगत जननी नारायणी स्वयं और अपूर्वानंद जी तो एक छोटे से बच्चे उनके सामने उम्र में भी आध्यात्मिकता में भी सब तरह किंतु मां जैसे की बालिका की तरह उनको यह दिखा रही है रेशिस दिखा रही है और अपूर्वानंद जी उनको सांत्वना दे रहा है। सो मां का ये जो कंट्रास्ट राइट के ठाकुर के रहते-रहते मां का मातृभाव का प्राबल्य ज्यादा था और फिर बाद में तो मातृभाव विकसित होगा ही होगा किंतु साथ-साथ में ही यह जो बालिका भाव का जो कॉम्बिनेशन होता है वि इज सो लीला की जोधुर्यता है मां के जीवन की कितनी डेप्थ हमको प्रदान करती है हम हमारे आस्वादन के लिए हमारे हृदय को शांति और तृप्ति देने के लिए सो वो वो सब लीला जो है अभी प्रारंभ हो रही है। तो यहां पे भी और एक उदाहरण म ये जो ठाकुर का जो था ना कि गाढ़ा दूध पी रहे हैं किंतु जब तक पी रहे हैं कोई प्रॉब्लम नहीं है। किंतु जिस दिन पता चला उसी दिन उनको ये लूज मोशन हो गया। यानी कि ये मन जो है ना बहुत बार हमारे शरीर पर काम करता है। हम लोग सोचते हैं कि ये गाढ़ा दूध पीने से एक्चुअली पता हो कि ना हो आपको यदि डाइजेशन का प्रॉब्लम है तो आपको लूज मोशन होगा। किंतु नहीं पता चला उस दिन लूज मोशन हुआ। जब तक शांति से पी रहे थे बिना उनको मां उनको पटा फुसला करके जितने दिन पिला रही थी। देखिए मां की बात भी तो गलत नहीं है। मां को भी पता है। ठाकुर का यह जो मानसिक गठन जो है ठाकुर महावीर भाव की आराधना करती है तो पूंछ बढ़ना शुरू हो जाता है। मधुर भाव की आराधना करती है तो स्त्रियों की तरह वो जो वो जो परिवर्तन होना है वो प्रारंभ हो जाता है। तो मां को पता है कि उनका मन जो है इतना स्ट्रांग है जिस दिन पता चलेगा कि गाढ़ा दूध पी रहे हैं उसी दिन प्रॉब्लम होगा। जब तक नहीं पता है तब तक कोई प्रॉब्लम नहीं। मां भी झूठ बोल के पिलाती थी। तो इस तरह का एक दूसरा उदाहरण है बूढ़ो गोपाल महाराज बूढ़ो

श्री रामकृष्ण के सन्यासी शिष्यों का विनोदमय प्रसंग: अफ़ीम की गोली की कहानी

गोपाल महाराज वो तो वृद्ध हो गए थे तो वृद्ध होने से क्या है अर्थराइटिस वगैरह तो होता है पेन वगैरह बॉडी में होता ही होता है यह पेन मैनेजमेंट है जैसे-जैसे वृद्ध होते हैं हमको सीखना है अभी आजकल तो क्या है मॉडर्न मेडिसिन फिर भी काफी एडवांस है उस समय पेन के लिए जो क्रॉनिक पेन जिसको कहते हैं उसका एक इलाज था अफीम की गोली खाना तो तो ये अफीम की गोली बूढ़ो गोपाल महाराज प्रतिदिन खाते थे तो गोली बना के एक डब्बे में रखी थी और फिर प्रतिदिन एक गोली करके खाएंगे टेबलेट और फिर यदि अफीम खाते हैं तो साथ में ही क्या है आपको थोड़ा सा दूध पीना पड़ेगा तो दूध पीते थे उनके लिए दूध रखा जाता था तो वराह नगर मठ की घटना है अखंडानंद जी का बड़ा ही मजाकिया भाव माने बालकवत और बालकवत हास्य विनोद करने की क्षम क्षमता उनकी तो हास्य विनोद में एक दिन उन्होंने सोचा कि हम सबको तो बिना दूध की चाय पीनी पड़ती है। यह ब्लैक टी पीनी पड़ती है पानी में चाय डाल के और यहां पे है बूढ़ो गोपाल दादा जो है वह बढ़िया मजे से दूध पीते हैं रोज चलो हम उसमें से हिस्सा निकालते हैं। तो उन्होंने सोचा उनका दूध चोरी करेंगे। किंतु देखिए कि यहां पे प्रॉब्लम क्या है? अफीम खा रहे हैं और दूध चोरी करके यदि उनको दूध नहीं मिला तो फिर अफीम का खाने का जो साइड इफेक्ट है बॉडी के ऊपर में वो तो भयानक होगा तो फिर पहले तो अफीम खाना बंद करवाना है कैसे करेंगे तो क्या किया अखंडानंद जी ने गंगाधर महाराज ने कि जो ख है खई अर्थात कि वो जो मुड़ी के जैसा ही एक होता है तो ख और क्वीनाइन फिर यह दोनों को मिक्स करके गोली जैसा बनाया टेबलेट जैसा फिर इसको क्या किया वह वाइट कलर का ही जिस तरह से अफीम की गोली होती है ऐसा यह होता है और फिर इसको अफीम के पानी में डुबो दिया यानी कि उसका टेस्ट अफीम के जैसा लगे किंतु वह अफीम नहीं है। उसके भीतर में खई और यह है क्वीनाइन की टेबलेट तो उसको पाउडर बना के किया है। तो उनकी अफीम की गोली सब हटा दी और उसकी जगह यह फेक गोलियां सब रख दी। काउंटर फेट आजकल कहते हैं यह काउंटर फेट वो जो है वो रख दिया एडल्टरेट ने तो ये रख दिया और फिर क्या किया? दूध जो है अभी दूध के ऊपर में तो वो मलाई का एक स्तर रहता है। अब दूध पिएंगे तो मलाई का स्तर यदि डिस्टर्ब होगा तो सामने वाले को पता चल जाएगा कि दूध के साथ में कुछ ना कुछ गड़बड़ किया है। इसके साथ में एडल्टरेशन हुआ है। तो फिर यह अखंडानंद जी क्या करेंगे? वो जो केले का एक पेप अर्थात कि यह जो पपाया है उसका यह जो डाली होता है वो स्ट्रो की तरह होता है। तो वो स्ट्रो की तरह यह डाली भीतर में डाली और उसमें से दूध पूरा पी लिया और इसी जो स्ट्रो के माध्यम से उसमें पानी डाल दिया। तो देखिए मामला क्या है? यहां पे वह जो अफीम की गोली है वहां पे अफीम नहीं है। वह कई की गोली है जिसको कि अफीम के पानी में डूबाया गया है। जिससे कि थोड़ा-थोड़ा अफीम का टेस्ट आए और यहां पे दूध की जगह पे पानी भरा है। किंतु थोड़ा सा दूध रहने से उसका कलर दिखता है वाइट। अभी बूढ़ो गोपाल दादा को कुछ पता नहीं है कि पीछे में यह सब करतूत हो रहे हैं। तो वह तो अपनी हैबिट के अनुसार प्रतिदिन वो अफीम की एक गोली खाते हैं। फिर वो दूध पीते हैं। गोली खाते हैं दूध पीते हैं। तो अभी सभी लोग उन लोगों को लगा एक ना एक दिन गड़बड़ होगा। फिर वो चिल्लाएंगे तब हम उनको सही बात बताएंगे कि हम आपके साथ में मजाक कर रहे थे। यहां पर बूढ़ो गोपाल दादा खाई जा रहे हैं। अफीम की गोली वो दूध पानी वाला पी पीते ही जा रहे हैं। कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। तो फिर अखंडानंद जी से रहा नहीं गया। तो तीन दिन के बाद में उनको कह दिया कि अरे बूढ़ो गोपाल दादा आप जो अफीम की गोली खा रहे हो वो तो कई की गोली है और ये जो दूध पी रहे हो वो तो पानी है। तो जैसे ही कहा तो वैसे ही ये जो विड्रॉवल सिम्टम्स जो होते हैं ना जो लोगों को यह जो एडिक्टिव सब्सटेंस का यह जो होता है अह एडिक्शन अह वह खाना बंद कर देते हैं। अफीम है या ओपीएम है वगैरह जो कुछ भी है तो क्या है? उनके शरीर में बहुत सारे तरह के प्रॉब्लम स्टार्ट होते हैं। सांस फूल जाती है। एलर्जी की तरह रेशिस वगैरह हो जाएगा। बहुत कुछ प्रॉब्लम होता है। विड्रॉवल जो है बड़ा भयानक चीज है। तो विड्रॉवल सिम्टम्स जो है बड़े भयानक होते हैं। तो सब कुछ उनके देह में एकाएक स्टार्ट हो गया। सब लोग डर गए। अरे बाबा क्या मर तो नहीं जाएंगे हार्ट फेल तो नहीं हो जाएगा स्ट्रोक तो नहीं आ जाएगा तो फिर इमीडिएटली वो जो अफीम की गोली जहां पर छुपाई थी तो वहां से लाकर के एक की जगह दो गोली उनको खिला दी तब कहीं जाकर के उनका थोड़ा सा ठंडा हुआ तो देखिए कि बूढ़ो गोपाल दादा तीन दिन से अफीम की गोली की जगह वो जो खोई की गोली है वह खा रहे हैं। उनको पता ही नहीं है कि यहां पे भीतर में सब रिप्लेसमेंट हो गया है। तो देखिए जस्ट वन इंटरेस्टिंग एग्जांपल तो यहां पे अभी कि

गुरुभाव का प्रारम्भ: माँ सारदा योगानन्दजी को प्रथम दीक्षा देती है

वृंदावन में योगेन महाराज को मां दीक्षा देती है। क्या कहते हैं गंभीरानंद जी महाराज वृंदावन ठाकुर श्री माय द्वारा त एक असमाप्त कार्य जो करया छले वृंदावन में ठाकुर मां के द्वारा उनका एक असमाप्त कार्य करवाया था मायर जी ने वो एक नूतन अध्याय सूत्रपात होया छिलो मां के जीवन में भी एक नए अध्याय का सूत्रपात हुआ था तनी मां के एक दिन दर्शन दिया बोलले ठाकुर ने एक दिन मां को दर्शन देकर के कहा तुम जोगेन के अर्थात जोगानंद के ए मंत्र दाओ तुम योगेन को अर्थात योगानंद जी को यह मंत्र दो प्रथम दिन मां वह माथार ख्याल भाबिया चुप करिया रो रही पहले दिन तो मां ने सोचा कि उनको कुछ भ्रम हो गया है माथा माथार ख्याल माने सर का भ्रम हो गया है ऐसा सोच के मां चुप करके रही अभी ऐसा क्यों सोचा माने जब दूसरे जब दर्शन हुए थे ठाकुर ने जब चूड़ियां निकालने से मना कर दिया था उसको तो माथार खेल सर का भ्रम नहीं समझा था इसको क्यों समझ लिया और दो देखिए कि दोनों घटनाएं मां ने बाद में कहा कि बाद में ही लिखा है लज्जा हो लोग माने शर्म भी आई लज्जा भी हो शकले बोलबे मां ए मध्य शिष्य को लाना सभी लोग कहेंगे मां ने इसी के भीतर में शिष्य करना भी आरंभ कर दिया। यानी ठाकुर की महासमाधि तो अभी हुई है और अभी यहां पर मां ने शिष्य बनाना भी प्रारंभ कर दिया। बोलकर के लोग इस तरह की बात करेंगे। बोलकर के मां को लज्जा हुई और फिर मां ने कुछ नहीं कहा। तो देखिए कि सामाजिक बंधन या तो कहेंगे कि सामाजिक लज्जा की यह बात यदि थी योगेंद्र महाराज को दीक्षा देना और इसी की वजह से मानी यह सोच लिया कि ठाकुर ने दर्शन देकर जो कहा है उनके सर का ख्याल है मात्र हेलुसिनेशन मात्र है नरेंद्र की लैंग्वेज में तो फिर यहां पे जो ठाकुर ने उनको चूड़ियां निकालने से मना किया था उसको माने हेलुसिनेशन के रूप में क्यों नहीं लिया वि इज इंटरेस्टिंग िंग कि दोनों घटनाओं के साथ में सोशल टेबू जो है इक्वली एसोसिएटेड है। विधवाओं को किसी भी तरह का श्रृंगार नहीं करना है। कठोरता करनी है वगैरह-वगैरह जो उस समय की जो सामाजिक परिस्थिति थी उसमें मां ये चूड़ियां पहन करके रहे। वो वि इज माने समाज में बात तो होगी ही होगी। मां को कामार पुखुर जब मां आई थी तो और फिर यह बात फिर से होना शुरू हो गई तो फिर एक दिन मां ने परेशान होकर के फिर से यही चूड़ियां निकालने का प्रयास किया। उसी समय ठाकुर ने फिर से उनको दर्शन देकर कहा कि तू चूड़ियां मत निकालो। तुमको पता है वैष्णव तंत्र क्या है? नित्य कृष्ण नित्य लीला तो मां ने कहा क्या है वैष्णव तंत्र मुझे पता नहीं। तो ठाकुर कहते हैं आज शाम को गौर दासी आएगी। वो तुमको बताएगी कि तुम कभी भी विधवा नहीं हो सकती। चीर सद्वा रहोगी। क्योंकि भगवान की लीला जो है कृष्ण की वो नित्य है। नित्य धाम नित्य लीला नित्य कृष्ण तो यह तुमको वो समझाएगी। तो उस दिन भी मां ने चूड़ियां नहीं निकाली और देखिए उसी दिन शाम को गौर दासी वहां पे आईमार पुकुर में और फिर उन्होंने मां को समझाया कि वैष्णव तंत्र में भगवान कृष्ण की नित्य लीला का क्या अर्थ है। तो दो बार मां ने चूड़ियां निकालने का प्रयास किया। दोनों बार ठाकुर ने दर्शन देकर के मां को मना किया और मां ने वह बात सुन भी ली। सो भाई यहां पर मां ऐसा सोचती है कि वह सर का ख्याल है बोल के मां उसको इग्नोर करती है। फिर भीतर में लज्जा भी होती है कि कोई लोग लोग कहेंगे मैं अभी से यदि दीक्षा देना शुरू कर दूंगी कि यह तो देखो कि ठाकुर की महासमाधि तो अभी जस्ट हुई है और इसी के भीतर में मां ने यह मंत्र देना प्रारंभ भी कर दिया। शिष्य जुटाना प्रारंभ भी कर दिया। यह कैसी बात हुई? तो राइट देयर इज नो आंसर एक्चुअली [हंसी] वो भगवान ने बुद्धि दी है तो बुद्धि का दुरुपयोग करते हैं हम लोग कभी-कभी। सो दिस इज अनदर ऑफ़ दोज़ इंस्टेंस यदि कोई कहेगा कि क्या उत्तर हो सकता है? आपके मत अनुसार बताइए। एब्सोल्यूट उत्तर तो किसी के पास नहीं। किंतु मेरा जो पर्सनल ओपिनियन है, मुझे ऐसा लगता है कि जो फर्स्ट इंस्टेंस था चूड़ियां निकालने का वो मां को अकेले को अफेक्ट करता था। यानी कि यदि समाज से ये जो एक बैकलेश जो आएगा ब्लोबक सीआई की लैंग्वेज में तो समाज की ओर से जो ये बैकलेश जो आएगा ये बैकलेश क्या है कि मां के प्रति ही लिमिटेड रहेगा और किसी में किसी को उसमें भुगतने की जरूरत नहीं। लोग यदि निंदा भी करेंगे तो मां की ही करेंगे कि अरे मां ने इस तरह से चूड़िया पे श्रृंगार करके रखा है ठाकुर की महासमाधि के बाद में विधवा होने के बाद में भी वह तो मां को ही भुगतना है और किसी को नहीं। किंतु यदि योगेंद्र महाराज को दीक्षा देती है मां और फिर यहां से जब निंदा प्रारंभ होगी तो योगेंद्र महाराज को भी सफर करना पड़ेगा। तो मां सोचती होगी शायद कि मुझे निंदा का सामना करना पड़े वो एक चीज है किंतु मेरे बच्चे को निंदा का सामना क्यों करना पड़े इसलिए शायद हो सकता है इस लॉजिक के अनुसार शायद हो सकता है कि मां ने इसको इग्नोर किया होगा। किंतु खैर यह सब अपने लेवल का लॉजिक है। ये सब घटनाओं के पीछे में लॉजिक रीजन ये सब चीजें बुद्धि वगैरह चलती नहीं है। ये सब देवी घटनाएं है। तो जो भी है द्वितीय दिन अनुरूप आदेश पया ग्रह जो कोरि लेना अभी दूसरे दिन मां को फिर से इसी तरह का दर्शन भी हुआ। इसी तरह का आदेश भी प्राप्त हुआ कि तुम योगेन को यह मंत्र दो। किंतु मां ने उसको भी इग्नोर किया। तृतीय दिन त ठाकुर के बोलीले तीसरे दिन उन्होंने ठाकुर को कहा आ तार शंगे कथा परजन तो कोई ना की को मंत्र दी अब तीसरे दिन जब ठाकुर ने आकर के मां को फिर से यही दर्शन दिया फिर से यही बात कही तो फिर मां ने आखिर में ठाकुर को कहा कि मैं तो उसके साथ में बात तक नहीं करती मैं मंत्र कैसे दूं देखिए ये जो मां लज्जा पटावता थी तो इवन त्याग संतानों के साथ में भी मां इस तरह से सब समय घूंघट टान करके रहती थी। और यहां पर तो मां स्पष्ट कहती है भले ही चाहे योगेंद्र महाराज के साथ में मां गई है वहां पे योगेन महाराज उनके सेवक है। इसके बावजूद अब देखिए बात नहीं करती है। यह एग्जजेक्टली ट्रू नहीं। क्योंकि इसके पहले वाली जो घटना है उसमें तो हमने स्पष्ट देखा कि मां जब समाधि में मग्न हो गई थी। मां को जब महाभाव हुआ था उस समय जब अर्धबाह्य दशा में मां आती है तो जैसे कि ठाकुर का आवेश हुआ था उस योगिन मां ने मां को मंत्र ईश्वर का नाम सुनाना प्रारंभ किया। ठाकुर जब समाधि में चले जाते थे सभी भक्तों को पता है कि ईश्वर का नाम सुनाने से ठाकुर फिर बाह्य दशा में वापस आते हैं। तो यहां पे भी मां समाधि में है। तो फिर योगिन मां ने मां को नाम सुनाना शुरू किया। मां मां की समाधि भंग हो ही नहीं रही है। समाधि में से वापस आ ही नहीं रही है। तो फिर योगिन महाराज को बुलाया गया और योगिन महाराज ने जब नाम सुनाना शुरू किया तब मां अर्धबाह्य दशा में आई। इसी अर्धबाह्य दशा में योगिन महाराज को समझ में आ गया कि मां के ऊपर में ठाकुर का आवेश हुआ है। योगिन महाराज ने उनको कुछ प्रश्न किए और प्रश्न का उत्तर मां ने एग्जजेक्टली इसी तरह दिया जैसे कि ठाकुर उत्तर देते हैं। तो वो घटना हमने पढ़ी है। सो स्ट्रिक्टली ऐसा नहीं है कि मां उनके साथ में बात बिल्कुल नहीं करती थी। किंतु हो सकता है कि बेर मिनिमम एकदम मिनिमम जो होता है उस समय तो मां अर्धबाह्य दशा में थी। तो वह हो सकता है कि यह नॉर्मल लेवल की कैटेगरी में नहीं आता। सो यह जो मां इस तरह से लज्जा के पट में आवृत्त होकर के रहती थी। यह उसका उदाहरण है। मां कहती मैं उसके साथ में बात भी नहीं करती। जो भी वो कम्युनिकेशन मीडियम जो होगा वो योगिन मां के थ्रू ही होगा। तो फिर मैं मंत्र किस तरह से दूं और यह जो मां का यह बात नहीं करना पुरुष भक्तों के साथ में। हालांकि योगिन महाराज कोई पुरुष भक्त में नहीं आते। वो तो उनके संतान है माने किंतु फिर भी एक जो पुरुष भक्तों के साथ में मां का बात करने का तरीका था उद्बोधन में मां एक कमरे में बैठेगी कुर्सी के ऊपर में ना कि खाट के ऊपर में संपूर्ण देह चादर से आवृत्त करके घुमटा टान करके और फिर वहां पर पुरुष भक्त कमरे की चौखाट पे प्रणाम करेंगे और मां फिर बगल में यह गुलाब मां खड़ी रहेगी। गुलाब मां का तो एकदम पहाड़ी आवाज था। तो जोर से चिल्ला के बात करने की अग्रेसिव पर्सनालिटी थी। तो फिर मां गुलाब मां उच्च आवाज में कहेगी मां को कि मां अमुक बाबू अपना के प्रणाम जाना छे माने अमुक बाबू आपको प्रणाम जना रहे हैं। आपको प्रणाम कर रहे हैं। तो फिर मां अति मृदु स्वर से प्रणाम का उत्तर देती। कुछ प्रश्न है तो प्रश्न करती। कुछ उत्तर देना है तो उत्तर देती। और गुलाम मां सुनकर के फिर अपनी उच्च आवाज में स्वाभाविक उच्च आवाज में उस पुरुष भक्त को कहते हैं कि मां आपको यह बता रही है यह पूछ रही है यह उत्तर दे रही है। व्हाटएवर और फिर पुरुष भक्त वहां से खुश होकर चले जाते हैं। यानी कि देखिए दर्शन तो नहीं ही देना। डायरेक्ट बात भी नहीं करती थी। उद्बोधन में रहने के समय गुलाब मां सब समय पास में खड़ी रहेगी। गुलाब मां के माध्यम से यह वार्तालाप होगा और यहां पे मोस्ट प्रोबेबबली लग रहा है योगिन मां साथ में थी तो योगिन मां के माध्यम से यह वार्तालाप होता होगा। योगिन मां वैसे वृंदावन में थी तो वृंदावन जाने के समय मां के साथ में यह मास्टर बाबू की मास्टर महाशय की पत्नी थी। निकुंज देवी और लक्ष्मी दीदी थी। लक्ष्मी दीदी का अपना एक वैष्णव भाव था। तो वो वो घुंघरू वगैरह पहन करके वो जो लीला ये जो नाट्य जो करना है नृत्य नाटक वगैरह किया करती थी पुरुष भक्तों के सामने तो ठाकुर देखते थे और बड़ा आनंद भी करते थे किंतु साथ में ही मां को कहते भी थे कि देखो और लय और ताले ताल मिलिए ना कि लय लय मिलिए तुम ही तुम्हार लज्जा भंगो कर देना माने उसके साथ में साथ देकर के तुम अपनी लज्जा भंग मत करना ठाकुर मास्टर महाशय की दो लड़कियां मास्टर महाशय उनको को गीत सिखा रहे हैं। तो मास्टर महाशय उनको लेकर के ठाकुर के पास में आए। तो ठाकुर ने उनका गीत सुना। बड़े ही प्रसन्न हुए। इसके बाद में यह दो लड़कियां जब नीचे गई काशीपुर की बात है। ठाकुर ट्रीटमेंट के लिए काशीपुर लाया गया था। वहां का आपने देखा होगा ठाकुर का कमरा था। फर्स्ट फ्लोर पे ग्राउंड फ्लोर पर डिवोटी रहा करते थे। तो फर्स्ट फ्लोर पर जाकर के पहले तो ठाकुर के सामने गान किया। उसके बाद में यही दो बच्चियां जब नीचे आई तो भक्त लोग थे। उन्होंने सुना होगा ठाकुर के सामने वो गा रही है। तो उन्होंने उनको रिक्वेस्ट किया दोनों बच्चियों को तो बच्चियों ने उनके सामने भी गाया। अब यह बात ठाकुर को पता चली और ठाकुर ने मास्टर महाशय को कहा कि देखो इनको ना अभी तुम गान मत सिखाओ ज्यादा। वो अपने आप अपने आनंद के लिए या ईश्वर को सुनाने के लिए गान करें। वह एक चीज है। प्रोफेशनली गान सुन उनको सिखाओगे और पुरुषों के सामने जहां तहां वह गाती फिरेगी तो उनकी लज्जा भंग हो जाएगी। तो यह थी ठाकुर की शिक्षा। तो इसी तरह से इसी शिक्षा का अनुसरण करके मां कहती है कि मैं तो उसके साथ में बात तक नहीं करती। मैं उसको मंत्र कैसे दूं? बाद बात बाद बात बाद में तो मां ने सबको मंत्र देना प्रारंभ कर दिया था। पुरुष भक्तों को भी और उस समय मां का ऐसा कोई लज्जा का भाव नहीं रहता था क्योंकि वो देवी भाव में आ जाती थी। किंतु ये तो प्रारंभ के दिन है तो इसीलिए ठाकुर परामर्श दिल ठाकुर ने परामर्श दिया सलाह दी। देखिए उत्तर दिया नहीं लिखते हैं। परामर्श दिया लिखते हैं। क्योंकि फ्रॉम नाउ ऑनवर्ड्स देखेंगे कि अभी मां का जो मातृत्व का इलाका जो है वह अभी विस्तृत हो रहा है। और इस मातृत्व के इलाके में ठाकुर को भी प्रवेश निषेध है। वो कुछ-कुछ कहानियां तो हमने देख ही ली है। यही वो मां बाबूराम महाराज ना योगेंद्र महाराज वो उनको कुछ बीमारी हो गई थी। तो मां ने उनके लिए वो मिश्री का शरबत बनाकर पिलाया। दक्षिणेश्वर की बात है तो ठाकुर को पता चला कि मां ने इस तरह से उनको शरबत दिया है पीने को तो आए ठाकुर मां को कंप्लेन करने के लिए कि अरे इन लोगों को तो साधु होना है साधु होकर के बड़ी तपस्या करनी है तपस्या करने के समय फिर से बीमार होंगे पेट का दर्द होगा जो कुछ भी है उनको कौन शरबत पिलाने पिलाने वाला है उस समय तुम इन लोगों को ऐसी गलत हैबिट मत डालो तो मां ने कहा ये सब मैं देखूंगी आपको चिंता करने की जरूरत नहीं तो बेचारे ठाकुर वहां से विदा ले लिए थे वही रोटी खिलाने की फेमस घटना ठाकुर कहते हैं इसको इतनी रोटी इसको इतनी रोटी मां कहती है मैं जितनी इच्छा रोटी खिलाऊंगी आपको इतनी चिंता करने की जरूरत नहीं उनका आध्यात्मिक जिम्मा मेरे सर पे है उनका आध्यात्मिक रिस्पांसिबिलिटी उनका रिस्पांसिबिलिटी फॉर स्पिरिचुअल प्रोग्रेस वो मेरा जिम्मा है उसमें आपको चिंता करने की जरूरत नहीं तो ऑलरेडी मां के मातृत्व का इलाका प्रारंभ हो चुका है सो ठाकुर ने परामर्श दिया ठाकुर ने आदेश नहीं परामर्श दिया कि तुम ही मे जोगेन के बोलो शे थाकबे तुम मे योगेन अर्थात कि ये दोनों का नाम तो योगेन था ना योगिन मां और योगेन महाराज तो योगेन महाराज को छेले योगेन अर्थात कि पुत्र योगेन ऐसा कहती थी मां और योगिन मां को कहती थी मैं योगेन अर्थात कि पुत्री योगेन सो यहां पे ठाकुर कहते हैं तुम मे योगेन के बोलो शे थकवे योगिन मां को कहो वो साथ में रहेगी तिन्ही की मंत्र देते हो बे तहा बोल्या दिल और साथ में ही कौन सा मंत्र देना है वह भी कह दिया अनंतर श्री मां जोगिन मार द्वारा जोगिन महाराज के जिज्ञासा कोलेन फिर आखिर में मां ने यह बात स्वीकार की योगिन मां के माध्यम से योगिन महाराज को प्रश्न किया पूछवाया तहार मंत्र दीक्षा हुई छ कि ना कि उनकी मंत्र दीक्षा हुई है कि नहीं तीन उत्तर दिल माने एटलीस्ट पूछना तो पड़ेगा वरना ठाकुर झूठमठ का कहीं कुछ यह नया तो नहीं चालू कर रहे हैं जिसकी आवश्यकता नहीं मां भी देखिए वो सब टेस्ट करके यह सब करती है तीन उत्तर उत्तर दिल योगिन महाराज ने उत्तर दिया ना मां विशेष कोनो इष्ट मंत्र ठाकुर हम दे ना नहीं मां विशेष कोई इष्ट मंत्र ठाकुर ने मुझे दिया नहीं है आ निजे रुचि मत एक्ट नाम जप करी मैं अपनी रुचि मतो अपनी इच्छा अनुसार एक नाम जप करता हूं योगिन महाराज इहा जाना ले जे तीन ठाकुर निकट मंत्र ग्रहण आदेश पया छेन किंतु लज्जा बोली ते पार योगिन महाराज ने यह भी बताया कि उन्होंने भी ठाकुर के पास में से मंत्र ग्रहण का आदेश प्राप्त किया है। ठाकुर ने उनको भी दर्शन देकर स्वप्न में आकर के कहा होगा किंतु लज्जा की वजह से लज्जित होकर के वह कुछ बोल नहीं पा रहा है। योगिन महाराज कैसे मां के पास जाकर कहेंगे कि मां तुम दीक्षा दो। वो तो बेचारे थोड़े से तो लज्जित होंगे ही। अबेषे मां तहां के मंत्र देते सम्मत होले। आखिर में मां उनको मंत्र देने में सहमत हुई ठाकुर छवि ओ देहावशेष कोटा सम्मुख राखिया पूजा करते करते श्री माय भाबाबेश होइलो दीक्षा के दिन ठाकुर की छवि और देह अवशेष का यह पात्र ताम्र पात्र जिसमें ठाकुर की अस्थियां रखी थी वो सामने रखकर के पूजा करतेकरते श्री मां को भाव का आवेश हुआ तखती तनी जोगिन महाराज के डाकाया बोशिते बोली लेन तब उन्होंने योगिन महाराज को पुकार करके पास में बैठने को कहा एवं ओई भावस्था ते मंत्र दिलन और उसी भाव अवस्था में ही मंत्र दिया मंत्र ए तो जोरे बोलिया छिलेन जे पाशर घोर होते जोगिन मा उहा सुनी ते पया छिले मंत्र इतने जोर से कहा था कि बगल वाले घर में योगिन मां जो उपस्थित थी वह भी सुन पाई थी। जोगिन महाराज माय प्रथम मंत्र शिष्य योगिन महाराज ही है मां के प्रथम मंत्र शिष्य। देखिए यहां पर भी सेम एक्चुअली भले ही चाहे मां ने कहा हो कि मैं उसके साथ में बात भी नहीं करती किंतु यहां पर जब मंत्र देने की बात आई तो योगिन मां साथ में नहीं थी। ऐसा नहीं है कि मां ने मृदु स्वर से योगिन मां को कहा कि यह मंत्र है। और फिर योगिन मां ने जोर से कहा योगिन महाराज को कि यह मंत्र है। नहीं मां और संतान अकेले ही है। और किंतु फिर यहां पे अगेन सेम कंडीशन है कि मां भाववस्था में है। तो वो नॉर्मल लेवल पर अभी भी शायद डायरेक्टली बात नहीं होगी। किंतु अर्धबाह्य दशा में भावावस्था में मां संतानों के साथ में वार्तालाप करती थी। उसका यह उदाहरण अभी वृंदावन की घटनाएं यहां पर समाप्त होती है। इसके बाद में मां हरिद्वार, जयपुर और प्रयागराज जाती है और फिर कोलकाता लौट के आती है। तो यह जो सब घटनाएं हैं वह अपने नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

एक भक्त: उस समय लगता है की दीक्षा की पद्धति इतनी फॉर्मल नहीं हुआ करती थी

ठाकुर और मां खास करके वो जो लाइफ ट्रांसफॉर्मेशन पे ज्यादा भार देते थे इस अर्थ में कि उनके पास जो आते हैं उनका बिहेवियर जो है वह रीइजीनियर करना है। वो पूरा वैसे तो उनका शुद्ध सात्विक आधार था ही था काफी लोगों का किंतु फिर भी प्रत्येक क्षेत्र में अब जैसे योगिन महाराज का ही आप देखिए कि वो जो भक्त हो भी तो बोका हो भी के माने भक्त हो तो फिर मूर्ख क्यों हो तो यह जो प्रत्येक फुटस्टप जो उपदेश देना है म एव्री सेकंड ऑफ देयर लाइफ किस तरह से ईश्वरमय करके रखना है उसके ऊपर में उन लोगों का ज्यादा भार था रेदर देन टू गिव गिव देम एनी फॉर्मल दीक्षा। तो अब जैसे और दूसरा क्या था कि फिर यह सब गुरु और शिष्य का जो नाता है इतना गहरा है कि कभी-कभी ठाकुर अब जैसे मां का ही है। मां की दीक्षा कैसे हुई? तो अब जैसे मां ने ठाकुर भले ही चाहे मां को सब कुछ सिखाते थे। ठाकुर ने सामने से मां को नहीं कहा कि मैं तुमको दीक्षा देता हूं या तुम दीक्षा लो। लक्ष्मी दीदी को उन्होंने दीक्षा दी। तो लक्ष्मी दीदी ने आकर के मां को कहा कि ठाकुर ने मेरी जिह्हावा के ऊपर में मंत्र लिख दिया है तो तुम भी जाओ ना तुमको भी लिख देंगे। तो मां ने बाय द टाइम एक एक गुरु से दीक्षा ऑलरेडी ली थी। वो कामरार पुर एक मोटा-छोटा एक सन्यासी था। उसके पास में से मंत्र लिया था। फिर भी मां गई ठाकुर के पास में। और ठाकुर ने मां की जीवा पे फिर से मंत्र लिख दिया। सो मां जैसी मां को भी ठाकुर सामने से जाकर नहीं कहते कि तुम दीक्षा लो। मां भी ठाकुर को नहीं कहती आप दीक्षा दीजिए। वो लक्ष्मी दीदी ने वो बीच में एजेंट का काम किया है। सो लाइफ ट्रांसफॉर्मेशन इज़ मच मोरेंट देन टू गिव देम फॉर्मल दीक्षा।

एक भक्त: ऐसा प्रतीत होता है कि स्वामी विवेकानंद ने बहुत कम लोगों को दीक्षा दी थी।

दीक्षा स्वामी जी की दीक्षा के बारे में दो बात है। पहले तो ये तो जग जाहिर है कि स्वामी जी ने ज्यादा शिष्य किए ही नहीं। सो ज्यादातर उन्होंने दो चीज है। एक तो भारत में उन्होंने बहुत कम समय बिताया। ज्यादा तो विदेश में ही थे। माने गुरु भाव प्रकट होने के बाद में और विदेश में ऐसा फॉर्मल दीक्षा का कांसेप्ट नहीं है। स्वामी जी कहते हैं कि मैं प्लेटफार्म पे वो लेक्चर देते देते ही सबको ओम मंत्र में दीक्षित करता था। तो इसमें मैंने हजारों हजारों लोगों को ओम मंत्र में दीक्षित किया है। स्वामी जी ने खुद ने कहा है। सो दैट इज वन थिंग। अभी इसको आप फॉर्मल दीक्षा ग कहेंगे नहीं कहेंगे दैट इज अप टू अस। किंतु स्वामी जी ने ऐसा स्पष्ट कहा है कि मैंने लेक्चर देते देते हजारों हजारों लोगों को ओम मंत्र में दीक्षित किया है। भारत वापस आने के बाद में फॉर्मल दीक्षा स्वामी जी ने बहुत कम लोगों को दी है। देखिए स्वामी जी की जो पावर जो है ऐसा प्लेटफार्म से लोगों को ओम मंत्र भी दे देते होंगे तो उनका इतना ही कल्याण होता होगा। म बेटर उनका कि वो आप एक फॉर्मल सेटिंग में आप दीक्षा ले किसी असामान्य गुरु के पास में यह जो आपने सिविलाइजेशनल लीडर कहा ना उससे याद आया स्वामी जी लंदन में थे उस समय तो शरद महाराज थे वहां पे अभी शरद महाराज बेचारे डर के डर के वहां पे गए थे इच्छा नहीं थी नरेंद्र ने धमक दी थी तो जाना पड़ा था तो बेचारे एडजस्ट हो ही रहे हैं उस समय एक ड्यूक था अभी ड्यूक है ना नोबल फैमिली का वो होता है वहां पे म नोबल यानी कि राज परिवार के ये सब तो एक ड्यूक ने स्वामी जी को इनवाइट किया लंच के लिए और स्वामी जी गए फिर स्वामी जी वापस आए शरद महाराज के साथ बात कर रहा है तो मतलब अभी स्वामी जी वो विनोद के मूड में है तो कह रहे हैं देखो इंडिया से सब कितने लोग यहां पे आते हैं गोरे लोगों की चमचागिरी करने के लिए और ऐसा कोई ड्यूक है जो कि एक हाई लेवल का नोबल पर्सन है उसके साथ में मुलाकात करनी है तो कितने सिफारिश पत्र ले आना पड़ता है कितनी चमचागिरी करनी पड़ती है और यह ड्यूक जो है ऐसे लोगों के साथ में लंच तो नहीं ही करेगा 2 मिनट के लिए मुलाकात देगा और सामने से इंसल्ट करके भगाएगा। तो यह है तुम्हारे दूसरे इंडियन जो कि यहां पे चमचागिरी करने आता है। और मुझे देखो मुझे ड्यूक ने सामने से बुलाया लंच लेने के लिए। फिर कहते हैं पता है आई एम ए टीचर क्लास। दिस इज़ एग्जैक्ट वर्ड स्वामी जी यूजस। आई एम ए टीचर क्लास। और ये लोग जो है वो सब म वे लोग वे है। आई एम ए टीचर क्लास। दैट इज व्हाट स्वामी जी कहना चाहते थे। [हंसी] और स्वामी जी ने देखिए योगेन महाराज को कहा भी था कि देखो योगेन तुम ना सॉरी बाबूराम महाराज को कहा था कि देखो बाबूराम तुम दीक्षा मत देना वरना क्या होगा तोर चे चेलेरा और राजा चेलेरा लेठा लेठी को [हंसी] सो क्या है कि गुरु एक ही होना उचित है जब ठाकुर थे तब ठाकुर थे मां थी तब मां थी मां और राजा महाराज ने पैरेलल दीक्षा दी है किंतु तो अदर देन दैट फिर बहुत ज्यादा लोगों को एनकरेज नहीं करते थे। सुबोध महाराज ने इधर-उधर कहीं पे वह जब भ्रमण में थे तो इधर-उधर दीक्षा दी है एक दो लोगों को शायद। किंतु बहुत अल्पसंख्यक लोगों को बाकी ने दीक्षा दी है। मेनली तो जब यह पहले 20 साल थे संघ के मैक्सिमम दीक्षा देने वाले थे मां और राजा महाराज हां हां और साउथ इंडिया में शायद शशि महाराज ने दी होगी और विदेश में जो तुरिया आनंद जी और त्रिगुणातीनंद जी ने दी है।

आलासिंगा पेरुमल के बारे में

देखिए उनका ग्रेटनेस यह है कि स्वामी जी के पे माने न्यू जनरेशन में वह ही इज़ वन ऑफ़ दैट स्वामी जी को पहचानने वालों में वह पहले थे। माने गुरु भाइयों ने तो स्वामी जी को पहचाना। ठाकुर के शिष्यों ने स्वामी जी को पहचाना। किंतु स्वामी जी जब बाहर निकले फिर वो जो एक न्यू जनरेशन स्वामी जी के साथ में जुड़ा। ही इज द वेनगार्ड ऑफ दैट न्यू जनरेशन। वो तो ब्रह्मवादीन के एडिटर थे और बड़े ही सिंसियरली काम किए उन्होंने ब्रह्मवादीन मैगजीन के ऊपर में। ब्रह्मवादीन में से ही तो अपना आज का यह वेदांत केसरी प्रारंभ हुआ ना। सो वो तो लिटरेरी ट्रेडिशन के साथ में बड़े ही अच्छे से युक्त थे आखिर तक। और फिर देखिए वो तो गृहस्थ थे ना। गृहस्थ से फिर आप कितना एक्सपेक्टेशन रखेंगे। यहां पे आप देखिए ना बलराम बाबू है वगैरह ठाकुर के जाने के बाद में उनका एस सच तो डायरेक्ट कोई रोल नहीं है। अपना जीवन ट्रांसफॉर्म करना है। वह एक बात है। अदर देन दैट तो फिर क्या करेंगे? गृहस्थ इतना ज्यादा क्या कर सकते हैं?

एक भक्त: आलासिंगा पेरुमल ने बहोत स्वामीजी का काम किया। बहोत कम लोग उनकी महानता को समझ पाए है

ठाकुर की लैंग्वेज में ठाकुर की लैंग्वेज में बामुनेर गड्डी खाए कौन दूध दे भड़भड़ कर ब्राह्मण की गाय खाएगी कम दूध देगी भड़भड़ करके इस अर्थ में ना इस अर्थ में कि वो प्रचार कम करते हैं कि मैं यह कर रहा हूं किंतु काम ज्यादा करते हैं ना बहुत सारे लोग काम इतना सा करेंगे वो प्रचार इतना सा करेंगे माने इसलिए तो स्वामी जी उस टाइप के लेटर उनको लिख पाए ना वह भी तो एक है कि अब जैसे देखिए कथामृत में स्पष्ट वर्णन आता है ठाकुर आज बड़े आनंद में है क्यों नरन आया है तो चेले का वो भाव देखकर के गुरु के भीतर में भी तो वो प्रचंड एक गुरु भक्ति माने गुरु शक्ति प्रकट होती है तो आला सिंघा को जो लेटर लिखे हैं वि आर यूनिक इन इट्स क्लास तो क्यों लिख पाए कि वह उसका वह होगा तो तभी तो स्वामी जी की गुरु शक्ति इतनी जागृत हुई होगी। ओम