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Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 30 May 2025

prayer

ओम स्थापकाय यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग उसकी अवतरणी का या तो फिर इंट्रोडक्टरी चैप्टर समाप्त हो गया है। अभी हम डिस्कस कर रहे हैं प्रथम चैप्टर साधक और साधना इस प्रथम अध्याय का नाम है। इसमें हमने ऑलरेडी देखा कि शरद महाराज कहते हैं स्वामी शारदानंद जी महाराज जो कि श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग के लेखक हैं। वो कहते हैं कि ठाकुर की साधना का विवरण

साधना के मूल तत्वों पर चर्चा करने की क्या आवश्यकता है?

पढ़ने से पहले हम भारत में भारतीय आध्यात्मिक ग्रंथों में साधना के बारे में क्या लिखा गया है उसके बारे में थोड़ा सा चर्चा विचारणा करेंगे। फिर जैसे यह उत्तर पक्ष और पूर्व पक्ष यह हमारे भारतीय जो दर्शन शास्त्र है फिलॉसोफी है हमारी उसमें यदि कोई भी फिलॉसोफी आपको डेवलप करनी है तो क्या होता है पहले तो आप अपना मत या तो फिर आप अपना ओपिनियन रजू कीजिए सबके सामने रखिए फिर उस आपका जो प्रस्ताव है उसके सामने क्या अपोजिशन हो सकता है उसके सामने क्या विरोध हो सकता है? उसका क्या काउंटर पॉइंट हो सकता है? वह आप सुनिए। फिर उस काउंटर पॉइंट को आप अगेन काउंटर पॉइंट से काटिए। तो यह उत्तर पक्ष पूर्व पक्ष जो लोग भारतीय खास करके यह जो दर्शन शास्त्र प्रकरण ग्रंथ है खास करके शंकराचार्य के बाद में यह जो प्रकरण ग्रंथ लिखे गए उनमें आपको यह बात देखने को मिलेगी कि पहले तो आचार्य गण अपना पॉइंट रजू करते हैं। अपना मत रजू करते हैं। अपना जो वक्तव्य है वह रजू करते हैं। और फिर उसको जो विरोध है उसका उसके बारे में उत्तर देते हैं। तो यहां पर भी शरद महाराज ने पहले तो अपना वक्तव्य रजू किया। कहा कि ठाकुर की साधना का विवरण हम पढ़ने से पहले साधना क्या है? उसके कुछ मूल तत्वों की आलोचना करेंगे। एनालाइज करेंगे। एनालिसिस करेंगे। किंतु फिर कोई प्रश्न कर सकता है कि भारत में जितने भी धर्म ग्रंथ हैं उस सब में साधना के बारे में गहनता पूर्वक एनालिसिस किया गया है। चर्चा विचारणा की गई है। तो आप फिर से उसी चर्चा को इस पुस्तक में डालकर के पुस्तक की साइज क्यों बढ़ा रहे हैं? हम तो लीला प्रसंग पढ़ रहे हैं श्री रामकृष्ण देव की जीवनी के बारे में जानने के लिए। ठाकुर ने किस तरह से कौन सा आचरण किया? कौन सी परिस्थिति में उनके जीवन के साथ में रिलेटेड कौन से यह प्रेरणादाई प्रसंग है। कौन से इस तरह से प्रसंग है उनके उपदेश क्या है? जिसको कि सुनकर के पढ़ के हमको हमारे जीवन में आध्यात्मिक जीवन में प्रेरणा मिले। तो यह सब पढ़ने के लिए हम तो लीला प्रसंग पढ़ रहे हैं। साधना क्या है? इसको यदि हमको जानना होगा होता तो फिर तो यह विवेक चूड़ामणि है श्रीमद् भगवत गीता है। इतने सारे टीका भाष्य इतने सारे ग्रंथ लिखे गए हैं। जो जो आप स्ट्रीम के साथ में रिलेटेड है। यदि आप द्वैत वेदांत भक्ति मार्ग को फॉलो करते हैं तो वह भक्ति शास्त्र है। ज्ञान मार्ग को फॉलो करते हैं तो ज्ञान शास्त्र है। आपको अलग से रामकृष्ण लीला प्रसंग में वो सभी बातें जो कि सभी शास्त्रों में लिपिबद्ध की जा चुकी है। उसको यहां पर फिर से वर्णन करने का क्या आवश्यकता है। तब शरद महाराज कहते हैं कि देखिए कि भारत में खास करके वर्तमान युग में हमारे शास्त्र जिस तरह से साधन पद्धति को प्रदर्शित किए हैं। उसको अधूरा अधूरा पढ़कर के ऊपर ऊपर से पढ़कर के हम लोगों ने अपने मन में साधना के बारे में बड़ी ही विचित्र बड़ी ही विकृत धारणाएं बनाकर के रख दी है और इसीलिए पहले तो इन विकृत धारणाओं से मुक्ति पाई जाए। पहले तो यह समझा जाए कि सही-सही साधना क्या है? उसके बारे में जब हम उसके बाद में जब हम ठाकुर की साधना का विवरण करेंगे लिखेंगे तब आपको उस साधना का साधना की जो महत्ता है साधना का जो तात्पर्य है वह आपको ठीक-ठीक समझ में आएगा। वरना तो आप सब मिस रीड ही करेंगे। मिस इंटरप्रेट ही करेंगे। लीला प्रसंग पढ़ करके कुछ विचित्र चीजों को ही लेकर के आप यहां से जाएंगे। जैसे कि शरद महाराज कहते हैं कि कौन-कौन सी यह सब भ्रांत धारणाएं हमारे समाज में प्रवेश कर चुकी है। समाज में नहीं कह के ऐसा कहेंगे कि कौन-कौन सी यह भ्रांत धारणाएं हैं जो कि कुछ कुछ साधकों के मन में प्रवेश कर चुकी है। और इन साधकों को इन भ्रांत धारणाओं से विकृत विचारों से ईश्वर प्राप्ति धर्म अध्यात्म इन सबके यह जो विचित्र जो सब उनके विचार हैं उनसे मुक्ति पाने की आवश्यकता है। तो वो विचित्र धारणाएं कौन सी है? तो इसमें यहां पर शरद महाराज एक लिस्ट हमारे सामने रजू करते हैं। उस लिस्ट में देखिए कि तीन आइटम उन्होंने लिखी है। क्या है? केवल मात्र शारीरिक कठोरताएं। सिर्फ शारीरिक कठोरता अर्थात कि चार आइटम है यहां पर। एक तो है कि हम लोग धर्म या तो अध्यात्म के साथ में शारीरिक कठोरता को जोड़ते हैं। किंतु सिर्फ यह जो तप जैसे कि स्वामी जी ने देखा था एक बार कि कहीं पर वह भ्रमण के लिए जा रहे थे। किसी तीर्थक्षेत्र में एक साधु को देखा कि उसने दो एक हाथ ऐसा ऊपर करके वह सालों के बाद सालों वो तपस्या कर रहा है तो यह जो पूरा उसका हाथ इस तरह से जो ऊपर था तो वो हाथ जैसे कि उसके जितने भी मसल है वो सब गल चुके थे। हड्डी पसली उस हाथ में दिखाई देती थी। तो स्वामी जी ने कहा कि देखिए इस तरह की तपस्या का कोई भी स्थान रामकृष्ण संघ में नहीं है। भले ही चाहे वह इस तरह से कठोरता करें। कठोरता सराहनीय है। कामिनी कांचन के पीछे दौड़कर के अपने मन को विकृत कर देना उससे तो बेटर है कि ईश्वर प्राप्ति के लिए आप कोई भी शारीरिक तपस्या करें। किंतु जिस तरह से भगवान बुद्ध ने स्वयं यह बात खोज निकाली डिस्कवर की बड़ी ही अल्प मात्रा में भगवान बुद्ध आहार करते थे जब वह तपस्या कर रहे थे उस समय और उनके साथ में और भी कुछ साधक थे। आई थिंक पांच साधक और भी थे। उनके साथ में सभी लोग मिलकर के बड़ी ही कठोर शारीरिक तपस्या कर रहे थे। खाना नहीं खाना है। वन में रहना है। यह जो श्मशान में चीता जल रही है, वहां पे यह जो डेड बॉडीज जो होती है, मृत देह उनके यह जो कपड़े होते हैं, वस्त्र जो कि फेंक दिए गए हैं, उसको पहनना है। और भी कितनी भयानक शारीरिक तपस्या वे लोग करते थे। किंतु एक बार तपस्या करतेकरते खाना नहीं खा के उपवास करतेकरते भगवान बुद्ध बेहोश हो गए और फिर एक गोप बाला ने आकर के उनको खीर खिलाई तब वह फिर से जागृत हुए और फिर उन्होंने समझा कि देखिए इस तरह से शारीरिक तपस्या करने से ईश्वर या तो फिर निर्वाण प्राप्ति तो हुई नहीं है। इससे बेटर है कि एक मध्यम पंथा अवलंबित किया जाए। मन से तपस्या करनी है। मन को यह विषय वासना के जो प्रलोभन है उससे अलग करना है। नहीं कि आप उपवास के बाद उपवास करते ही जाइए। शारीरिक कठोरता करते ही जाइए। रात को सोए सोएंगे नहीं। दिन को खाएंगे नहीं। इस तरह की कठोरता करने से ईश्वर प्राप्ति निर्वाण प्राप्ति नहीं होगी। तो फिर जब भगवान बुद्ध ने मध्यम पंथ अपनाया निर्वाण प्राप्ति की और जब यह मध्यम पंथ अपनाया उस समय यह जो उनके जो दूसरे साथी साधु थे उन्होंने सोचा कि अरे यह तो राजकुमार था। अभी वह तपस्या करने के लिए आया है। अभी उससे तपस्या नहीं हो रही है। तो क्या सब गड़बड़ गड़बड़ बातें करता है? मध्यमपंथा वगैरह-वगैरह चलो हम उसको छोड़कर के चले जाते हैं। बोलकर के यह जो साथी थे वे लोग वहां से चले गए। यहां पर क्योंकि उन्होंने सोचा कि यह अभी यह जो गौतम है राजकुमार वह तो तपस्या नहीं कर रहा है। उसका अर्थ कि वह अभी यह जो संसार में फिर से डूब गया है। बोल कर के वे लोग चले गए। यहां पर भगवान बुद्ध ने निर्वाण प्राप्त किया। निर्वाण प्राप्त करके जब उन्होंने यह सोचा कि मैं जगत को मेरा उपदेश या तो फिर मैंने जो प्राप्त किया है, मैंने जो सीखा है, मैं जगत को कैसे बताऊं? तो उस समय उनको याद आया कि जो उनके वह संगी थे, प्रचंड तपस्या कर रहे थे। तो उनको जाकर के यह बात बताई जाए कि सही-सही निर्वाण प्राप्त कैसे करना है। तो भगवान बुद्ध ने जाकर के उन्हीं लोगों को फिर से पकड़ा और उन्हीं लोगों को सर्वप्रथम अपना उपदेश दिया। तो देखिए कि यह शारीरिक तपस्या कठोरता फॉर द सेक ऑफ कठोरता खास करके यह जो दिगंबर साधु जो होते हैं उन लोगों में यह शारीरिक तपस्या का बड़ा ही एक भाव रहता है। वे लोग वस्त्र भी नहीं पहनेंगे। निगम दिगंबर होकर के रहेंगे। मुंह के ऊपर में यह पट्टी वगैरह बांध के रखेंगे कि जिससे कि वह पशु यह जो जीवजंतु है उनके मुंह में जाकर के उनकी कहीं हत्या ना हो जाए या तो इस तरह से पैदल चलेंगे कहीं पर किसी वाहन का इस्तेमाल नहीं करेंगे। मैं जब छोटा था तो मैंने इस तरह के साधुओं को देखा था और फिर जब मैं रामकृष्ण मिशन में आया तो मैंने देखा कि यहां तो बिल्कुल अलग से सब कुछ है। काफी लग्जरी है कंपेयर टू जिस तरह से दिगंबर साधु रहते हैं जैन दिगंबर। तो खैर यह जो है अपने यहां पर मामला एकदम हमारे यहां पर जो फिलॉसोफी है बड़ी स्पष्ट है कि मन से वासनाओं का भोग तृष्णाओं का त्याग करना है। यदि मन से नहीं कर पाए तो शारीरिक कठोरता अपने आप में किसी काम की नहीं। शारीरिक कठोरता होनी चाहिए। क्योंकि यह तो सन्यास जीवन है। तो आपने ईश्वर प्राप्ति के लिए यहां पर आए हैं। तो शारीरिक लग्जरी में रहेंगे तो मन भी आलसु हो जाएगा। मन भी लेजी हो जाएगा। इससे इसलिए शारीरिक कठोरता करनी है किंतु उसमें बहुत ज्यादा मातामाती नहीं करनी है। बांग्ला तेो बोले ओानी ये मातामाती करते होवे ना उसको लेकर के पागलपन नहीं कर लेना है। एक्सट्रीम में नहीं चले जाना है। तो इसलिए शरद महाराज कहते हैं कि जब हम अपना उद्देश्य है ईश्वर दर्शन निर्वाण प्राप्ति मोक्ष प्राप्ति उसको भूल जब जाते हैं और कोई इस तरह से कुछ खोजना शुरू कर देते हैं कि मुझे संसार में कुछ लाभ चाहिए तब हम इस तरह की यह जो आध्यात्मिक जो सब उपदेश है या तो फिर स्पिरिचुअल टीचिंग है उसका इस तरह से मिस इंटरप्रिटेशन करते हैं। फिर क्या कहते हैं? दूसरा मिस इंटरप्रिटेशन क्या होता है? तो दुष्प्राप्य जो सब चीजें हैं उसको कलेक्ट करके उनको इकट्ठी करके किसी एक जगह पे किसी एक विशेष तरह की क्रिया का निरर्थक अनुष्ठान। तो इसके बारे में भी कल हमने देखा कि देखिए कि शरद महाराज यह वार्निंग हमको ना देते कि क्या कि यह सब दुष्प्राप्य वस्तु जो चीजें इजीली अवेलेबल नहीं है बाजार में जाएंगे दुकान में से पटाख करके खरीद ली या तो फिर आजकल अमेजॉन ऑनलाइन जो आपको नहीं मिलती है उस सब चीजों को आप दुष्प्राप्य चीजें कहेंगे। तो इस तरह की चीजों को इकट्ठी करना और फिर एक स्थान विशेष पर जाकर के बैठना जैसे कि तंत्र साधना के लिए कहा गया है बिल्व वृक्ष की छांव या तो फिर यह अद्वैत वेदांत साधना के लिए या तो फिर यह भक्ति मार्ग के लिए यह जो वट वृक्ष है यह तुलसी है या तो अशोक का वृक्ष है यह सब शुभ जगह है मानी गई है तो वहां पर जाकर करके बैठना और सब क्रिया विशेष का अनुष्ठान करना। क्रिया विशेष क्या अर्थात कि यह जो भैरवी ब्राह्मणी ने ठाकुर के पास में जो सब साधनाएं करवाई तंत्र साधनाएं वह सब वगैरह इसके अलावा भी यह तो चलो लेजिटमेट साधनाएं थी। किंतु यह जो जिसको कहेंगे कि सिर्फ लोगों को भ्रम में डालना यह आप वहां पर बाहर में कहीं जाएंगे तो आपको अंगूठी पहना देंगे। वह माला पहना देंगे, तावीज पहना देंगे। यह जो वगैरह वगैरह जो आप तो देखते ही हैं सब समाज में ऐसा नहीं है कि इन सब चीजों का कोई आवश्यकता नहीं है। या तो फिर यह गलत है। कहने की बात यह है कि मन प्राण सब कुछ ईश्वर के अर्पण हो गया है। तो यह सब चीजें ठीक है। किंतु मन के भीतर में कामना वासना है। कोई हमको यह आर्थिक लाभ चाहिए। इसके लिए यह सब कर रहे हैं तो यह सब किसी काम का नहीं है। तीसरा कहते हैं कि श्वास प्रवास रोध अर्थात कि यह कुंभक प्राणायाम वगैरह तो इससे भी यह कोई अपने आप में कोई यह नहीं है कि मैं श्वास प्रश्वास रोकूंगा तो मैं रिमोट हीलिंग कर पाऊंगा। जैसे कि राजयोग में स्वामी जी कहते हैं या तो फिर मैं प्राण के ऊपर में नियमन प्राप्त कर लूंगा तो फिर मैं सूर्य, चंद्र तारों की गति बदल सकता हूं। या तो फिर मैं बहुत बड़े समुदाय के ऊपर में अपनी मोहिनी वाणी से इस तरह से उनका ब्रेन वाश कर लूंगा कि वो मैं जो चाहूं वह मुझे दे देंगे। अपना वोट दे देंगे। अपना धन दे देंगे। यह सब मैं मांग सकता हूं। तो यह कामना वासना से यदि आप प्राण रूपी विज्ञान में का अनुष्ठान करके प्राणायाम या तो फिर प्राण की शक्ति पे कंट्रोल प्राप्त करना चाहे तो वह भी आपके लिए किसी काम का नहीं है। और फिर है कि असंबद्ध मन असंबद्ध मन की जो विषदृष्ट चेष्टा है उसको भी कभी-कभी हम साधना के रूप में गिन लेते हैं। असंबद्ध मन अर्थात कि जो मन जो कि लॉजिकली क्लियरली नहीं सोचता जो कि हेयर ब्रेन जिसको कहते हैं ना इंग्लिश में या तो फिर एडल्ट शब्द है एडी एलईडी ये एडल्ट माइंड जिसका होता है पागल जो होता है उसकी ये जो पागल विषदृश यानी कि जो खराब दिखती है जो अच्छी नहीं होती इस तरह की यह जो उसका जो आचरण है उसको भी कभी-कभी हम साधना के रूप में गिन लेते हैं। देखिए एक उदाहरण कि ठाकुर का तो हमको पता है कि सिंसियरिटी इतनी है कि यह सब कुछ अभी जैसे यह जो है ना विषदृष असंबद्ध मन की विसदृश चेष्टा यानी कि जिसका मन बिगड़ गया है उसकी ये जो उटपटांग जो आचरण है उसको कभी हम यह साधना के रूप में गिन लेते हैं तो यह हृदय के साथ में एग्जैक्टली ऐसा ही हुआ था। देखिए उसने ठाकुर को देखा। ठाकुर को क्या देखा कि वह जो मां की जो भोग की जो पूरी है मां काली के भोग के लिए जो पूरी बनाई गई है वह बिल्ली को खिला देते हैं। फिर मां काली का जो शयन कक्ष में उनका यह जो खाट है उसके ऊपर में अपने से शयन कर लेते हैं। उसके बाद में वो एक सुंदर एक कहानी है कि वहां पर वो एक पेड़ के ऊपर में बैठे थे। ठाकुर हनुमान के भाव में थे। दिगंबर थे और वहां से पेड़ एक डाल के ऊपर में बैठकर के हनुमान भाव में डाल के ऊपर में से वह पेशाब कर रहे हैं। तो वहां पर यह हलधारी ना कि कोई आ गया तो उसने देखा कि ठाकुर यह सब क्या कर रहे हैं? देखकर के उनको लगा कि इसके ऊपर में ब्रह्म राक्षस ना कि ऐसा कोई सवार हो गया है। तो अभी क्या है कि ठाकुर की बात तो बिल्कुल अलग है। उन्होंने उनका मन तो 100% ईश्वर को समर्पित हो चुका था। किंतु यह वार्निंग यदि हम ना पढ़ते कि यदि आपका मन 100% ईश्वर में समर्पित नहीं है और यदि आप ठाकुर का अनुकरण करने को जाते हैं तो क्या होगा? यही हृदय हृदय जो कि ठाकुर का भांजा ठाकुर की बड़ी सेवा की थी। साधना के समय में ठाकुर के साथ में ही था। बहुत कुछ उसने ऑब्जर्व भी किया था। किंतु आखिर में हमको पता है कि उसके मन में वासनाओं का ऐसा तूफान खड़ा हुआ कि आखिर में उसको काली मंदिर छोड़कर के जाना पड़ा। अच्छा इसके बाद में जब ठाकुर की महासमाधि हुई ठाकुर के अस्थियों को काकुड़गाछी में स्थापित किया गया। रामबाबू ठाकुर के बड़े भक्त उन्होंने सोचा कि ठाकुर की अस्थियों की उस समय हृदय को नौकरी चाहिए थी। इधर-उधर बेचारा उसके पास में एंप्लॉयमेंट नहीं था तो वह रामबाबू के पास में आया होगा। तो रामबाबू ने भी सोचा कि ठाकुर की यदि सेवा पूजा ही करनी है तो हृदय से उत्तम और कौन हो सकता है? इसी हृदय ने तो ठाकुर जीवंत थे। उस समय ठाकुर की पूजा की थी। ठाकुर का रिलेटिव है, ब्राह्मी है, शुद्ध आचारी है। ऐसा नहीं होता तो ठाकुर की स्वयं सदेह अवस्था में कैसे पूजा कर सकता? तो ठाकुर की अस्थियों की और ठाकुर की जो वहां पर वह जो इमेज है उनकी पूजा करने के लिए हृदय से उत्तम और कौन है? बोलकर के हृदय को वहां पर नौकरी पर रखा तो सही पुजारी के रूप में किंतु फिर उन्होंने लक्ष्य किया कि हृदय वह सब करने का प्रयास कर रहा है जो कि ठाकुर करते थे। ठाकुर जैसे भोग की पूरी बिल्ली को खिला देते थे। तो ऐसे ही ऐसा कुछ विचित्र विचित्र आचरण करने का यह हृदय भी प्रयास कर रहा है। तब रामबाबू नाराज हो गए। कहा कि देखो भाई वह तो ठाकुर थे और तुम तुम हो ठाकुर ठाकुर थे। तुम अपने को ठाकुर के साथ में कंपेयर मत करो। जिनका कि मन 100% शरणागत हो गया है। जिनके मन में से संपूर्ण रूप से कामना वासनाओं का निकंदन निकल गया है। विच्छेद हो गया है। वो यदि दिगंबर होकर के घूमते हैं। वह यदि इस तरह की कोई क्रिया हरकतें करते हैं तो वो उनके लिए ठीक है। तुम्हारा मन तो कामना वासना से भरा हुआ है और तुम यह सब ठाकुर का कॉपी करने को जाओगे। नकल करने को जाओगे तो इससे विकृतता छोड़कर के और कुछ प्रकट नहीं होगा। बोलकर के रामबाबू ने हृदय को नौकरी से निकाल दिया था। इसलिए यहां पे लीला प्रसंग पढ़ने से पहले हमको यह सब चीजों की बड़ी ही अच्छे से ख्याल अलर्ट हो जाना है कि ठाकुर ने जो कुछ भी किया उसका आंख बंद करके अनुकरण हम ना कर ले। ठाकुर वह सब कर सकते थे क्योंकि उनका मन 100% पवित्र था। हमारे लिए जो रास्ता है हमारा मन जो कि अपवित्रता के शिकंजे में अभी भी बंधा हुआ है कामना वासना से काम कांचन से बंधा हुआ है पंच कक्श से बंधा हुआ है डरिपु से अष्टपाश से बंधा हुआ है हमारे लिए ठाकुर का अंध अनुकरण ब्लाइंड कॉपी वो कभी भी उचित नहीं है। हम लोग विकृति में चले जाएंगे। हमारे आसपास के जो रहने वाले हैं वे लोग भी बड़े परेशान हो जाएंगे। तो यह सब अलर्ट यह सब वार्निंग शरद महाराज शुरू में दे दे रहे हैं। आगे

किसी विशिष्ट साधक के लिए निर्धारित साधना की विशिष्ट विधियां सभी पर लागू नहीं मानी जानी चाहिए।

क्या कहते हैं? आ ए रूप देखा जाए जे कुसंस्कार एवं कु अभ्यासे विकृत मन के प्रकृतिस्थ ओ सहज भावपन्न करिया आध्यात्मिक पथे चालित कर ते महापुरुष गण कोखन कोखन जे शकल क्रिया बा उपाय उपदेश करिया छेन से शकल के साधना बोलिया धारणा पूर्वक शकले पखे ओई समूहे अनुष्ठान समभावे प्रयोजनीय बोलिया अनेक स्थले प्रचारित होते छे साथसा में ऐसा भी देखा जाता है कि जो मन कुसंस्कार और कु अभ्यास से विकृत हो चुका है उसको प्रकृतिस्थ यानी कि सहज भाव से सहज भाव में वापस लाने के लिए सहज भावापन्न करने के लिए आध्यात्मिक पथ में चालित करने के लिए महापुरुष गण कभी-कभी जो क्रिया या उपाय का उपदेश देते हैं उसी क्रिया या उपदेश को साधन बोलकर के धारणा करके सभी को उसी तरह की क्रिया और प्रयास करना उचित है। बोलकर के बहुत सारी जगह पर प्रचारित होता है। कॉम्प्लिकेटेड सेंटेंस है। किंतु उसका अर्थ सहज है। देखिए कि कभी-कभी हम लोग हम हमारे सबका तो अपना-अपना एक कर्म का प्रवाह है। तो अभी जैसे देखिए कि आप एक क्लास में पढ़ते होंगे। क्लास में आपके साथ में मान लीजिए 30 40 50 लड़के लड़कियां और भी हैं। आप देखेंगे कि टीचर जो बोल रहे हैं वो धारणा करना सभी के लिए इक्वल नहीं है। यदि टीचर मैथमेटिक्स का कोई एक चैप्टर सिखाएंगे तो मान लीजिए 101 स्टूडेंट ऐसे होंगे कि उन्होंने फटाफट करके सीख लिया। 2025 स्टूडेंट ऐसे होंगे कि जिनको थोड़ा सा कष्ट होता है और वह सामने टीचर को प्रश्न करेंगे कि अच्छा सर या मैडम आप इसका हमको फिर से थोड़ा सा समझा दीजिए और फिर 30 एक जितने लोग ऐसे भी होंगे जिनको कि ना ही कुछ समझ में आया है ना ही वह प्रश्न करने का कोई ये करते हैं उद्योग करते हैं वह सोचते हैं नहीं समझ में आया तो नहीं समझ में आया यानी कि वे लोग इंटेलेक्चुअली लेजी होते हैं बौद्धिक रूप से आलसी होते हैं। तो ये जो है हम अपने क्लास में ही हम लोग देख पाते हैं। फर्स्ट रैंक, सेकंड रैंक, थर्ड रैंक जिसका आता है वे लोग बड़े ही अलर्ट होते हैं। बड़े ही एक्टिव होते हैं और बड़े ही इंटेलिजेंट भी होते हैं। और फिर थोड़े से कम इंटेलिजेंट, कम एक्टिव, कम अलर्ट और फिर उसका एक्सट्रीम भी देखने को मिलेगा। तीनचार लड़के लड़कियां ऐसे भी हो सकते हैं कि जिनको पढ़ाई लिखाई में जैसे कि किसी भी तरह का कोई ना ही इंटरेस्ट है ना ही करने की कोई इच्छा है। तो देखिए कि हमारे क्लास में हमको यह पूरा स्पेक्ट्रम देखने को मिलता है। अभी जो कि जैसे कि ठाकुर ने कहा ना कि उत्तम वैद्य की उपमा दी थी। उत्तम वैद्य कौन है? जो कि अच्छा पेशेंट है जो कि अपने स्वास्थ्य के बारे में बड़ा ही अलर्ट है। उस पेशेंट को कहेंगे अच्छा यह औषध ले लो औषध ले लो यह दवाई ले लो ठीक हो जाओगे और जो पेशेंट अपने स्वास्थ्य के बारे में अलर्ट है वो एकदम वो वैद्य के पास में से डॉक्टर के पास में से जो कुछ करना है सब सीख लेगा और उसकी तरह से ट्रीटमेंट चालू करेगा। कोई-कोई पेशेंट होते हैं अपने स्वास्थ्य के बारे में इतने ज्यादा अलर्ट नहीं होते या तो फिर इतने उनको इच्छा नहीं होती कि मैं ये जो डॉक्टर कहता है डायबिटीज हो गया है तो मैं जो मिठाई है यह खाना छोड़ दूं। मुझे तो मिठाई बहुत पसंद है। मैं कैसे छोड़ दूं? ब्लड प्रेशर बढ़ गया है। डॉक्टर कहता है नमक छोड़ दो। किंतु मुझे तो मैं बिना नमक के खा ही नहीं सकता। बिना नमक का तो सब कुछ फीका फीका लगता है। कैसे छोड़ दूं? हार्ट डिसीज हो गया है। डॉक्टर कहता है ऑयल है, बटर है। यह सब बंद कर दो। किंतु मुझे तो वही सब पसंद है। यह जो रात को निकलते हैं ना रास्ते पे वो जो रास्ते के किनारे ये सब पड़ा वो सब लारी ग्ला होता है। वहां पे ये जो सब चटपटी आइटम्स खाने को मिलती है। मुझे तो वह सब बड़ी ही पसंद है। मैं कैसे बंद कर दूं? तो फिर इस तरह का पेशेंट उन डॉक्टर की बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं देगा। तो यदि उत्तम वैद्य होगा तो जोर जबरदस्ती करके जैसे ठाकुर कहते हैं उसको जमीन के ऊपर में पटक करके उसकी छाती पर पैर रख के औषध भी खिला देगा और फिर बड़ा ही अलर्ट होकर के फॉलो अप करेगा कि यह जो कचरा जो खाने को मना किया है वह नहीं खाते हो तो तो यह उत्तम वैद्य की पहचान है। उत्तम वैद्य क्या करता है कि पेशेंट की जो प्रकृति है उसकी जो पैथोलॉजी है उस पैथोलॉजी को समझ करके उसको उसके अनुसार ट्रीटमेंट देता है तो जो उत्तम शिक्षक है वो भी देखेगा कोई अध्य अधम या मध्यम शिक्षक है वह क्या करेगा मिडओकर टीचर है वह क्या करेगा वो उसको जो सिखाना है सिखा करके चला जाएगा फिर कितने लड़कों ने कितना सीखा कितना नहीं सीखा उस सब की चिंता नहीं करेगा। किंतु वो जो उत्तम शिक्षक है, जो बेस्ट टीचर है, वह क्या करेगा कि प्रत्येक स्टूडेंट के पास में जाकर के देखेगा कि उसने ठीक-ठीक सीखा है कि नहीं और वो जो इंटेलेक्चुअली लेजी जो होते हैं वगैरह-वगैरह उनके पास में जाकर के और लंबा समय तक खड़ा रहेगा और ज्यादा उनके ऊपर में अटेंशन देगा। स्वामी जी ने कहा है ना कि यदि ब्राह्मण के जो पुत्र के लिए एक शिक्षक की आवश्यकता है तो परिया का जो पुत्र है उसके लिए 10 शिक्षक की आवश्यकता है। यानी कि यदि ब्राह्मण का जो संतान होगा वो वैसे ही इंटेलेक्चुअली शार्प होगा। किंतु उस समय जिन जातियों का जिन वर्णों का दमन किया गया था उनके बच्चों को सिखाना है तो आपको 10 शिक्षक चाहिए। क्यों? क्योंकि तभी इतना अटेंशन देंगे तभी वे लोग सीख पाएंगे। तो यह उत्तम वैद्य या तो उत्तम आचार्य की यह डेफिनेशन है कि जो अच्छे से सीखते हैं उन पे भी ध्यान देते हैं। जो अच्छे से नहीं सीखते उन पे भी ध्यान देते हैं। तो यहां पर भी उत्तम गुरु की पहचान यह है कि जिनको कि उपदेश देकर के एक बार बोलकर के यह लोग फटाफट उसका अनुष्ठान कर दे उनको भी सिखाएंगे और जो लोगों को साधना करने में तकलीफ होती है उनको भी अटेंशन देकर के उनकी क्या तकलीफ है? उनका क्या कर्मों का प्रवाह है? उनकी पैथोलॉजी क्या है? उनकी साइकोलॉजी क्या है? यह समझ करके उनको भी एक स्पेशल उपदेश देंगे। अभी कभी-कभी होता क्या है? जिन लोगों ने इस तरह का एक स्पेशल उपदेश प्राप्त किया है अकॉर्डिंग टू उनके कर्म प्रवाह तो लोग सोच लेते हैं कि अच्छा उनको तो इस तरह से कहा तो फिर हमको भी तो कहते हैं ना तो हम लोग भी इसका अनुष्ठान करते हैं। किंतु वह सबके लिए नहीं है। जैसे कि राजा महाराज का उदाहरण कि राजा महाराज का विवाह हुआ था। ठाकुर ने ही उनको अपनी पत्नी के पास में भेज दिया था। और फिर जब उनको पुत्र संतान भी हुआ था राजा महाराज स्वामी ब्रह्मानंद ठाकुर के मानस पुत्र रामकृष्ण संघ के प्रथम प्रेसिडेंट तो उनको पुत्र संतान भी हुआ था। फिर वह ठाकुर के पास में वापस आए और फिर साधना में ऐसे डूब गए कि जैसे कि इस जगत के साथ में किसी भी तरह का सांसारिक संबंध नहीं रहा। तो अभी यह बात पढ़कर के हम मुझे भोग करना है और मुझे भोग करने के लिए एक एक्सक्यूज चाहिए। तो यह जो पाजी मन है ना यह जो अपना भयानक चतुर मन वो सब समय इस तरह से एक्सक्यूज खोजता रहता है। इस तरह से बहानेबाजी करता रहता है। तो यह पाजी मन क्या कहेगा कि अच्छा राजा महाराज को तो ठाकुर ने अपनी पत्नी के पास भेजा था तो मैं भी थोड़ा सा भोग कर लेता हूं। बाद में मैं वापस आऊंगा। किंतु बाद में वापस आएंगे तो फिर वापस आकर जो राजा महाराज ने प्रचंड तपस्या की थी वो जो वहां पर वृंदावन में वहां पर वो सरोवर के किनारे बैठकर के या तो फिर भारत में भ्रमण करते-करते या तो फिर काशी काशीपुर में या तो फिर यह वराह नगर में जो प्रचंड तपस्या उन्होंने बाद में की थी उसका क्या 1% भी हमसे होने वाला है? नहीं होने वाला है। तो फिर इस तरह की कंपैरिजन करना कि राजा महाराज को तो पत्नी के पास में भेजा था। था तो मैं भी थोड़ा सा भोग कर लेता हूं। इस तरह की कल्पनाएं इस तरह की बातें बिल्कुल बेतुकी है। जो राजा महाराज के लिए अप्लाई हुआ वो राजा महाराज के कर्मों के प्रवाह के अनुसार ठाकुर ने उनको उपदेश दिया था। वह उपदेश सबके लिए नहीं है। यह योगेन महाराज योगेन महाराज का विवाह इसी तरह से वो छल से इस तरह से छल करके उनकी माता ने उनका विवाह करवाया था। फुसला करके पटा करके फुसला करके विवाह करवाया था। कहा था तुम विवाह नहीं करोगे तो देखो कि तुम्हारे जो पिताजी है उन्होंने तो वचन दे दिया है वह जो कन्या पक्ष है उनको यदि वह वचन का पालन नहीं करेंगे तो फिर उनका नाम खराब होगा समाज में बदनामी होगी मैं आत्महत्या करूंगी ऐसा ऐसा बोलकर के योगेंद्र महाराज को विवाह तो करवा दिया किंतु फिर विवाह के बाद में जब योगेंद्र महाराज का जब पत्नी के के प्रति कर्तव्य पालन करने की ऐसी कोई इच्छा नहीं थी उदासीन थे तब यही ही मां जाकर के उनको कहती है कि अरे तुमको यदि पत्नी के प्रति कर्तव्य का पालन नहीं करना था तो विवाह क्यों किया? तो योगेंद्र महाराज तो बड़े ही बेचारे यह हो गए नाराज हो गए। कहा कि आश्चर्यचकित हो गए। कहा कि तुम तुमने कहा था बोलकर के तो मैंने विवाह किया। अभी तुम ही कहती हो मेरी तो इच्छा नहीं थी। मैंने तो पहले ही कह दिया था। अभी मैं विवाह के जो नियम है जो ऑब्लिगेशंस जो होते हैं उसका पालन नहीं करता हूं। तो मेरे पर क्यों नाराज होती हो? तो मां ने क्या कहा कि तुम्हारी इच्छा नहीं होने से क्या तुम विवाह करते? झूठ-मूठ का मेरा नाम क्यों ले रहे हो? तो योगेंद्र महाराज तो बेचारे बड़े ही दुखी हो गए। ठाकुर के पास जाकर के कहते हैं कि देखिए इस तरह से मैंने मां की बात सुनकर के विवाह तो किया किंतु अभी वह मेरे पे ही दोष का जो टोपरा है वह पूरा सीधा मेरे सर पर डाल रही है। तो ठाकुर ने क्या कहा कि अरे देखो तुमको यदि विवाह संबंध में नहीं बंधना है तो तुम्हारे भीतर की जितनी भी कामना वासना है सब कुछ दूर कर दूंगा। यहां तक कि तुम्हारी पत्नी है तुम उसको यहां पर लेकर आओ। देखो कि उसका भी मन में इस तरह से ईश्वर अभिमुख कर दूंगा। ईश्वर की ओर कर दूंगा कि उसके मन में भी कभी कामना वासना जागृत नहीं होगी। तुम बिल्कुल चिंता मत करो इस बात की। मेरे शरणागत जब हुए हो तो तुमको थोड़ी ना यह कामना वासना का कोई भय है। तो देखिए योगेंद्र महाराज को इस तरह से कहते हैं अपनी पत्नी के साथ में किस तरह से बिहेव करना। ठाकुर कहते हैं मैं तुम्हारी सब कामना वासनाओं को खा जाऊंगा। तुम इसकी चिंता मत करो। ऑन दी अदर हैंड राजा महाराज को अपनी पत्नी के पास भेजते हैं। तो देखिए कि जो जिसका जो कर्म प्रवाह है जिसके हृदय में जो है उसको देखकर के सुनकर के समझ के ठाकुर उपदेश देते थे। तो फिर हमको क्या अप्लाई होता है? योगेन महाराज को जो कहा वो अप्लाई होगा। राजा महाराज को जो कहा अप्लाई होगा डज नॉट मैटर। जो स्टैंडर्ड उपदेश है उसको हमको फॉलो करना है और विशेष यदि कोई उपदेश चाहिए तो कोई गुरु है कोई आचार्य है उनके पास जाकर के अपने मन की बात करनी है। वो जिस तरह से उपदेश दे उसका अनुष्ठान करना है। तो यह जो है कि किसको कुछ कहा है उसको जनरल रूप में नहीं ले लेना है। एक एक सुंदर कहानी है।

कहानी: जप का फल राक्षस खा जाएगा

उद्बोधन की बात है। उद्बोधन यानी कि कोलकाता में जो मां के रहने के लिए जो भवन का निर्माण किया था स्वामी शारदा जी महाराज ने तो वही उद्बोधन ठाकुर की महासमाधि के बहुत सालों के बाद में स्वामी विवेकानंद की महासमाधि के बहुत सालों के बाद में उद्बोधन में मां रह रही है। वहां पे एक डॉक्टर महाराज भी रहते हैं। डॉक्टर हैं साधु हुए हैं। तो इतनी विद्या भी है और सिंसियरिटी भी है। ईश्वर के प्रति शरणागति भी है। ठाकुर के प्रति श्रद्धा भी है। किंतु राजा महाराज ने सोचा राजा महाराज उस समय संघ के प्रेसिडेंट थे। तो उन्होंने सोचा कि यह लड़का तो है बड़ा अच्छा किंतु यदि ईश्वर साधना को छोड़कर के बहुत ज्यादा यह डॉक्टरी करने को जाएगा सेवा करने को जाएगा तो क्या होगा कि उसका गढ़तर जो होगा चरित्र का आध्यात्मिक जीवन का वो ठीक-ठीक नहीं होगा। बोल करके उन्होंने इस डॉक्टर महाराज को कुछ उपदेश दिया। अच्छा क्या उपदेश दिया वो तो गुरु जाने और शिष्य जाने। यहां पर किंतु हुआ ऐसा कि रात को खाने में डॉक्टर महाराज प्रतिदिन लेट आते हैं और यह संचालिका थी वहां की गुलाब मां। गुलाब मां यानी कि उनका जो नेचर कड़ा नेचर सब समय क्रोधित हो जाती गुस्सा हो जाती यदि कोई नियम का पालन नहीं करता। देखिए गुलाब मां के बारे में मां ने बड़ी सुंदर बात कही है। उनके बारे में कहा है कि उसका गुस्सा थोड़ा सा है भले है किंतु देखिए कि गुलाब के शरीर में आलस्य थोड़ा सा भी नहीं है। हमेशा कुछ ना कुछ काम करती रहती है। हमेशा यह कोई ना कोई यह जो सेवा कार्य है वह करती रहेगी। बैठी नहीं रहेगी। तो यह जो आलस है, लेजीनेस है, तमस है, वह आध्यात्मिक जीवन की बहुत बड़ा अंतराय है और इसीलिए यह सेंटीमेंटालिटी कि मां के पास जाकर के रोना, मां-मां करके मां को कष्ट हो रहा है, वो नहीं समझ में आता है। ऐसे भक्तों के सामने गुलाब मां का बड़ा गुस्सा होता था। ऐसा नाटक कोई भक्त चालू करेगा तो गुलाब मां जाकर के ऐसा नाटकेगी कि वह भक्त भाग जाएगा। यहां पर भी देखिए कि खाना खाना है। सबको एक साथ में बैठना है। देरी क्यों हो रही है भाई? ऐसा तो काम तुमको नहीं दिया गया कि तुम रात के खाने में देरी से आओ। झूठ-मुठका वो तुम्हारा प्लेट जो है वह अलग से रखना पड़ता है। फिर प्लेट में जाकर बिल्ली वगैरह कोई मुंह ना डाल दे। वह देखना पड़ता है। तो सबको कष्ट होता है ना। जो रसोइया होता है, जो परोसने वाले होते हैं सब लोग एक बार खाना खा के जो काम करना है वापस जाकर करो ना। कौन मना करता है? खाने में देरी मत करो। ऐसा वह गुलाब मां का था और होना भी चाहिए। संघ होकर के आप रहते हैं। एक व्यक्ति सतत देरी से आता है, एब्सेंट रहता है तो सबको कष्ट होता है। यहां पर डॉक्टर महाराज बार-बार देरी से आ रहे हैं और गुलाब मां का गुस्सा जैसे कि सातवें आसमान में उठ रहा है। मां सब कुछ देख रही है। तो फिर एक दिन फिर मां ने करुणा से परवश होकर के दया से वह आपलुत होकर के मां का हृदय डॉक्टर महाराज को बुलाया और पूछा कि अरे भाई गुलाब तो सब प्रतिदिन कहती है समय पर आकर खाना खा लो देरी मत करो तुमको यदि कोई काम है तो तुम बाद में करना तुम टाइम पर क्यों नहीं आते हो तो फिर यह देखिए कि अभी और जब गोलाप मा डांटती थी तो डॉक्टर महाराज बेचारे कुछ नहीं बोलते थे क्यों क्योंकि साधना के बारे में व्यक्तिगत जीवन के बारे में गुरु के पास में ही बोलना चाहिए। गुरु ने जो उपदेश दिए हैं, उसका डिस्कशन गुरु के साथ में ही करना चाहिए। या तो फिर जो गुरु तुल्य है उनके साथ में करना चाहिए। तो गोलाप मां की डांट सुन लेते थे किंतु सामने कुछ बोलते नहीं थे। अभी जब मां मां शारदा देवी ने स्वयं पूछा कि भाई तुम ऐसा क्यों कर रहे हो? तो मां तो फिर गुरु तुल्य है। तो फिर उन्होंने कहा कि मां मुझे राजा महाराज ने ऐसा कहा है कि तुम इतने हजार जप करना और तुम्हारा जो काउंट है वह ठीक-ठीक रहना चाहिए। एक से तुमने जो काउंट किया तो एक दो तीन चार पांच छ जो हजार तक 10,000 तक जितने भी जप करने को बोले राजा महाराज काउंट में बिल्कुल मिस्टेक नहीं होना चाहिए। यदि काउंट तुम्हारा जप की संख्या जो गिनती करते हो उसमें थोड़ा इधर-उधर हो जाए तो तुमको जप पहले से फिर से स्टार्ट करना होगा और यदि तुम फिर से स्टार्ट नहीं करोगे तो तुम्हारे जप का फल राक्षस खा जाएगा। तो जैसे ही वह डॉक्टर महाराज ने कहा कि जप का फल राक्षस खा जाएगा तो मां जोर से हंस उठी और कहा कि बेटा तुम मन लगा के जप करो इसीलिए राजा ने ऐसा कहा है। मैं कहती हूं किंतु अभी मैं कहती हूं कि जैसे ही खाने का टाइम हो तुम खाना आकर के खा लो और फिर फिर से तुमको जो जप करना है करो। तुम्हारे जप को राक्षस नहीं खाएगा। तो फिर डॉक्टर महाराज बड़े ही आश्वस्त होकर के चले गए। अभी देखिए यह बात सुनकर के यदि हम यह सीरियसली मानना शुरू कर दें कि मैं भी यदि गण जो गिनती है जो काउंट है जप का ठीक-ठीक नहीं करूंगा तो मेरा जो जो जप का फल है वो राक्षस आकर के खा जाएगा वो तो कोई बात नहीं हुई जो डॉक्टर महाराज की जो प्रकृति थी उनका जो जिस तरह का कर्मों का प्रवाह था उसके अनुसार राजा महाराज ने उनको उपदेश दिया था तो इसके लिए यहां पर शरद महाराज कहते हैं कि जिसका जो कुसंस्कार और कु अभ्यास से जिसका मन विकृत हो गया है उसको प्रकृतिस्थ करने के लिए सहज भाव में वापस लाने के लिए आध्यात्मिक पथ के ऊपर में चालित करने के लिए महापुरुष गण कभी-कभी जो क्रिया या उपाय का उपदेश देते हैं वह सभी क्रियाओं और उपदेश को साधारण साधना समझ करके सबके लिए उस क्रिया और उपदेश का अनुष्ठान करने की आवश्यकता है। इस तरह का भ्रम लोगों के मन में हो जाता है। तो इस तरह का भ्रम नहीं होना चाहिए। गुरु और शिष्य इन दोनों के बीच की जो बात है वो उन्हीं दोनों के बीच में रहनी चाहिए। देखिए कि हम कथामृत का पाठ कर रहे हैं। उसमें एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट चैप्टर कि मास्टर महाशय ठाकुर के पास में आए हैं। क्रिसमस के दिनों की छुट्टी है। ठाकुर ने कहा है कि मन में, वन में और कोने में जाकर के बीच-बीच में रिट्रीट करनी चाहिए। बीच-बीच में तपस्या करनी चाहिए। और फिर थोड़ी सी तपस्या करके करने से ही गुरु रूपी इष्ट आकर के या तो फिर इष्ट रूपी गुरु आकर के कह देंगे ए अर्थात कि यह ये करो आगे बढ़ने के लिए तो यह ए ठाकुर के मुंह से सुनने के लिए तपस्या करने के लिए मास्टर महाशय दक्षिणेश्वर आए हैं और हमको बड़ा ही सुंदर उन दिनों का जो कि वह दक्षिणेश्वर में रह रहे थे रिट्रीट कर रहे थे बड़ा ही सुंदर उन्होंने ठाकुर का जो ठाकुर के साथ जो वार्ता वार्तालाप हुआ लिपिबद्ध किया है। किंतु इस वार्तालाप को ध्यान से पढ़ेंगे तो जो जनरल इंस्ट्रक्शन होती है वही सब मास्टर महाशय ने लिखी है। मास्टर महाशय को स्वयं उनके खुद के कर्म के प्रवाह के कर्म के फल के बंधन तमस रज सत्व का कौन सा उनका प्रोफाइल है, कौन सा परसेंटेज है, उसके अनुसार जो ठाकुर ने उपदेश दिए होंगे, वो हमको उस चैप्टर्स में पढ़ने को नहीं आता है। जो उत्तम गुरु, उत्तम साधक, उत्तम लेखक होते हैं, वे लोग हमेशा जनरल उपदेशों को ही बताते हैं। उसके बारे में ही चर्चा करते हैं। यदि कुछ भी विशेष आपकी प्रकृति आपकी सिचुएशन को लेकर के है तो गुरु के साथ में डिस्कस करने से आपके लिए जो विशेष बंदोबस्त है विशेष जो एक आपको यह उपाय करना है वो आपको पर्सनली गुरु कहेंगे वो आपको और किसी के साथ में डिस्कस करने की जरूरत नहीं है। एक चीज दूसरा कि गुरु के पास से सुना अपने व्यक्तिगत आध्यात्मिक जीवन की ये जो उन्नति के लिए उसको जनरल प्रचार नहीं कर देना है कि ठाकुर के पास में से कि ठाकुर के जो संतान है उनके पास में से यह सब सुना और अभी आप भी ऐसा कीजिए मेरा कल्याण हुआ तो आपका भी कल्याण होगा अकल्याण हो जाएगा सामने वाले का उसकी प्रकृति अलग है हमारी प्रकृति अलग है इसके लिए हमेशा ध्यान में रखना है कि जनरल उपदेश होते हैं और विशेष उपदेश होते हैं स्पेसिफिक िक उपदेश होते हैं। जनरल उपदेशों के बारे में ही पुस्तकों में लिखना चाहिए। जाहिर में चर्चा करनी चाहिए। स्पेसिफिक साधक स्पेसिफिक उपदेश कभी भी जाहिर में चर्चा विचारणा नहीं करनी है। तो यह एक पॉइंट शरद महाराज कहते हैं। आगे क्या लिखते हैं?

हम कोई विधि-विधान करके भगवान को सम्मोहित करना चाहते हैं और उनसे अपनी वासनाए मिटा लेना चाहते हैं

वैराग्य बा ना होया संसार खई रूप रसादी भोग जनभा लालाई तो था मंत्र बा क्रिया विशेष सोहाए जगत कारण ईश्वर के मंत्र औषधि वशीभूत सरप न्याय निज कर्तवाधीन करते पारा जाए ए रूप भ्रांत धारणार वशवर्ती होया अनेक केथा चेष्टाए कालोक्षेप करते देखा देखते पावा जते छे वैराग्यवान न होकर करके संसार के क्षण क्षण स्थाई रूप रसादि भोग के लिए लालायित होकर के समभाव लालायित होकर के उसके लिए हमारा मन सब समय आकर्षित होकर के मंत्र या तो फिर क्रिया विशेष की सहायता से जगत कारण ईश्वर को मंत्र या तो फिर औषधि से वशीभूत सांप कैसे हमारे कंट्रोल में आ जाता है किस तरह से हमारे कर्तृत्वाधीन कर हो सकता है। उस तरह से जगत कारण ईश्वर को भी हम अपने कंट्रोल में ला सकते हैं। हमारी बातें मनवा सकते हैं। अपनी प्रार्थनाओं का उत्तर दिलवा सकते हैं। इस तरह की भ्रांत धारणा से वशवर्ती होकर के अनेक को वृथा चेष्टा में अकारण प्रयास में काल समय बिताते-बिताते हम लोग देखते हैं। देख सकते हैं। देखिए और एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट पॉइंट है। एक सांप जो होता है ये जो सपेरा जो होता है ना वो जो अभी तो आजकल तो देखने में नहीं आता है। मैं जब छोटा था हमारे सोसाइटी में आए थे ऐसे तो वह सांप को एक वो जो छोटा सा जो बास्केट होता है ना वो बास्केट में लेकर के सांप को भर करके उसमें आते हैं। फिर वह सांप बास्केट खोलेंगे तो फिर वह सांप खड़ा होगा उसमें से वह जो फैन पसार करके सांप नहीं नाग फिर वह जो ये जो अपना वो जो यह बजाता है ना वो सपेरा तो जैसे वो बजाता है उसकी ट्यून के अनुसार वो सांप भी ऐसे ऐसे होता है तो ऐसा आपने टीवी में भी कभी देखा होगा मूवी में भी देखा होगा मैंने तो अपने वो सोसाइटी में देखा था तो क्या है कि विदेश में खास करके ऐसी एक धारणा है कि भारत है सांप और हाथी का देश और गाय का देश जहां पे भी रास्ते में जाएंगे आपको सांप दिख जाएगा हाथी दिख जाएगा गाय दिख जाएगी तो खैर उन लोगों का हमारे प्रति ये भ्रांत धारणा हम लोगों की भ्रांत धारणा हो जाती है कि जिस तरह से उन लोगों की भारत के बारे में भ्रांत धारणा है हमारी ईश्वर के प्रति भ्रांत धारणा हो जाती है कि जिस तरह से आप सांप को इस तरह से हिप्नोटाइज कर सकते हैं वह अपना वह बंसी बजा के जिस तरह से उसको नचा सकते हैं वैसे ही ईश्वर को कुछ प्रलोभन दे दिया। ईश्वर को कुछ लांच दे दी। ईश्वर को कुछ गिफ्ट दे दिया। कुछ प्राणामी दे दिया। यह जो यह श्री फल है, मिठाई है। उनके सामने रख दिया। या तो फिर अंगूठी पहन ली, ताबीज पहन लिया ना कि कोई साधना कर ली, ज्योतिष को बुलाकर के कोई क्रिया करवा दी, कथा बुलवा दी वगैरह-वगैरह कर दिया। तो उसी से यह ईश्वर भी जैसे कि यह मंत्रमुग्ध सांप की तरह हमारे वश में आ जाएंगे। और फिर हम इस ईश्वर के पास में से हमारी कामना पूर्ति के लिए अपनी वासना पूर्ति के लिए जो कुछ भी मांगेंगे सब दे देंगे। कहेंगे परीक्षा में अच्छे मार्क से पास करवा दो करवा देंगे। बीमारी भगा दो बीमारी भगा देंगे। कहेंगे कि जॉब में प्रमोशन दिलवा दो दिलवा देंगे। मेरी प्रोडक्ट सेल नहीं हो रही है। उसके लिए कस्टमर जुगाड़ कर दो तो कस्टमर जुगाड़ कर देंगे। मेरा कलीग मुझे परेशान कर रहा है। उसको भगा दो कंपनी से तो उसको भगा देंगे। कि यह रिलेटिव है मुझे परेशान कर रहा है। उसका कुछ निकाल कर दो तो रिलेटिव को भगा देंगे या तो फिर उसको मार ही देंगे। तो यह जो सब हमारे मन में संसार के प्रति कामना वासनाएं हैं उसको लेकर के फिर हम ईश्वर को मंत्रमुग्ध करके ईश्वर को हिप्नोटाइज करके कुछ ना कुछ हम उससे निकालना चाहते हैं। तो ये जैसे वो जो कहानियां होती है ना वो जीनी होता है। एक वो जो ये होता है एक लैंप होता है। किसी के हाथ में यह पुराना लैंप आ जाता है। फिर उसके ऊपर में वह खोलेंगे तो उसमें से एक जीनी बाहर निकलेगा। फिर यह जीनी क्या कहेगा कि आपको मेरे आप जो काम करवाएंगे मैं करूंगा। आपकी जितनी भी इच्छाएं हैं मैं पूर्ति करूंगा। तो ऐसे वो देखा है कहानियां काफी पढ़ी है। मैं जब छोटा था ये सब बच्चों की ये जो मैगजीन आया करते थे ना चंपक है। चांदा मामा है ये सब पढ़ता रहता था। तो उसमें ये सब कहानियां होती थी। यह जीनी है या एक राक्षस है यह उसके वश में आ जाता है। फिर क्या होता है कि वश में आकर के फिर जिसके वश में आता है वो जो भी इच्छा मुझे एक बहुत बड़ा राजमहल बना दो तो वो जीनी या तो फिर यह राक्षस जाकर के राजमहल बना देगा। फिर वह कहेगा मुझे बहुत सारी सुंदर स्त्रियां लाकर के दे दो तो वह भी उसके साथ में हो जाएगा। मुझे राजकुमारी के साथ में विवाह करवा दो। वह भी हो जाएगा। बहुत सारे सोना महोर दे दो तो वह भी हो जाएगा। तो अपने मन की यह जो सांसारिक वासनाएं हैं ये जीनी के पास से ना कि राक्षस के पास से हम लोग उसका कुछ ना कुछ जुगाड़ करवाना चाहते हैं। तो कभी-कभी हम यह सोच लेते हैं कि ईश्वर भी इसी तरह से बैठे हैं जीनी की तरह हमारी कामना वासनाओं की पूर्ति करने के लिए। वही मथुर बाबू वो विष्णु घर के

कहानी: माथुर बाबू भगवान राधाकांत पर आक्षेप लगाते है

गहने चोरी हो गए राधाकांत के। तो जाकर के राधाकांत की मूर्ति के पास में जाकर के क्या कहते हैं कि अरे ईश्वर तुम अपने खुद के गहनों की रक्षा नहीं कर पाए। यह किस तरह के ईश्वर हो तुम? किस तरह के ठाकुर हो? म किस तरह के भगवान हो? तो ठाकुर ने वहां जाकर के कहा कि अरे तुम्हारी ये कैसी हीन बुद्धि है? जिनकी लक्ष्मी स्वयं जिनकी दासी है यह सूर्य चंद्र नक्षत्र स्वयं जिन लोगों के जिनकी सेवा करने के लिए खड़े हैं उसके लिए तुम्हारे गहने तो ईंट पत्थर के बराबर है। गहने तुम्हारे लिए ही गहने हैं। उनके लिए तो ईंट पत्थर है। तो वैसे ही हम लोग सोचते हैं गहने हैं, जमीन जायदाद है, सोना जवाहरात है, मान धन प्रतिष्ठा है। वो कितनी महत्व की चीजें हैं। ईश्वर के लिए तो यह सब राख के समान है। जो कि पूरे त्रिभुवन के जो सृष्टि करता है, त्रिभुवन के संहार करता है, त्रिभुवन के पालनकर्ता है, उनके लिए थोड़ी ना यह सब चीजों का कोई मायने है। किंतु फिर भी हम लोग ईश्वर के पास में जाकर के कहते हैं कि तुम्हारा मंदिर बना दूंगा यदि मेरी यह इच्छा पूरी कर दो। ये स्वामी जी स्वयं जब वो खीर

कहानी: स्वामी विवेकानंद खीरभवानी मंदिर की रक्षा करना चाहते थे

भवानी का टूटा हुआ मंदिर देखकर के वो खीर भवानी मां को प्रार्थना पूजा प्रार्थना करके कहते हैं उनके सामने कहते हैं यदि मैं उस समय वहां पर होता तो किसी भी आक्रमणकारी को इस मंदिर को ना तोड़ने देता तो मां ने दर्शन देकर के क्या कहा कि बच्चा तुम्हारी रक्षा मैं करूंगी कि मेरी रक्षा तुम करोगे। मेरी इच्छा से ही तो यह मंदिर टूटा है और यदि बनेगा तो वह भी मेरी इच्छा से ही होगा। तो हम लोग सोच लेते हैं स्वामी विवेकानंद जैसे स्वामी विवेकानंद सोच लिए थे कि ये जो त्रिभुवन की ये जो जन्मदात्री है त्रिभुवन की जो संहार करत्री है उसका उनका मंदिर वो बनाएंगे। क्या हम लोग हैं कौन ये सब मंदिर बनाने वाले ये सब करने वाले? मां यदि थोड़ी बहुत शक्ति देती है तो उसके अनुसार मां का कार्य हम पृथ्वी पर संपन्न करते हैं। इतना ही मन के भीतर में यह सब बना करके बैठ लेना कि मेरी वजह से यह मठ हुआ है। यह जो स्वामी जी की मां भुवनेश्वरी देवी तो

कहानी: स्वामी विवेकानंद की मां को गर्व होता है कि उनके बेटे ने बेलूर मठ का निर्माण किया है

स्वामी विवेकानंद की मां एक बार वह मठ में आई है। तो अभी देखती है कि चारों अभी ये स्वामी जी ने बेलूर मठ की रचना कर दी है। बिलूर मठ बना दिया है। दुर्गा पूजा है। मां शारदा देवी स्वयं आई है। वहां पे लाखों लाखों हजारों भक्त वहां पर उपस्थित हैं। तो ये भुवनेश्वरी देवी सोच कर के बड़ी गर्वित होती है कि मेरे नरेंद्र ने यह सब किया है। तो उस समय नरेंद्र कहता है कि देखो ये जो कुछ भी करने वाले हैं सब ठाकुर है। मैं कुछ नहीं हूं। तुम इधर-उधर घूमो मत। जाकर के मां शारदा देवी के पास में बैठो। तो स्वामी जी को खुद को अपनी मां का यह जो गर्व था, उसका खंडन करना पड़ा था। बेलूर मठ का बनाने वाला बेलूर मठ का निर्माण करने वाला नरेंद्र नहीं है।

कहानी: स्वामी विवेकानंद प्लेग रोगियों की सेवा के लिए बेलूर मठ को बेचना चाहते थे

ठाकुर है। यहां तक कि स्वामी जी का खुद का गर्व मां शारदा देवी को खंडित करना पड़ा था। जब प्लेग हुआ स्वामी जी ने कहा कि बेलूर मठ को बेच के पैसा इकट्ठा करके रोगियों की सेवा करेंगे। तब मां ने कहा कि बेलूर मठ तुम्हारा थोड़ी ना है कि तुम उसको बेचोगे। यह जो जगत में जो कुछ भी होता है ईश्वर हमको थोड़ी बहुत शक्ति देते हैं। हम उसका अनुष्ठान करते हैं। यदि मन में यह अहंकार आ जाए कि ईश्वर को प्रलोभन देकर के हम अपने वशीभूत कर लेंगे। ईश्वर का बड़ा मठ बना के बड़ा मंदिर बना करके हम उसको अपने कंट्रोल में ला लेंगे तो यह सब बेतुकी बातें हैं। ईश्वर सिर्फ एक ही चीज से प्रसन्न होते हैं। वह है संपूर्ण शरणागति से या तो फिर संपूर्ण कामना वासनाओं के त्याग से। यदि द्वैत मार्ग फॉलो करते हैं तो कहेंगे शरणागति। अद्वैत मार्ग या तो ज्ञान मार्ग फॉलो करते हैं तो कहेंगे कि कामना वासनाओं के त्याग से। यह दोनों एक सिक्के के ही दो पहलू के समान है। तो ईश्वर को वश में लाने का। यह एक ही मात्र उपाय है संपूर्ण शरणागति। जैसे कि ये देखिए कि ठाकुर ने खुद ने एक बार कहा था एकानकार सब किछु और जन नरेंद्र की ओर इशारा करके यहां का जो कुछ भी है वह सब उसके लिए है। उसी की पुकार सुनकर के मेरा अवतरण हुआ है। यानी कि भक्त यदि सही-सही ईश्वर के प्रति शरणागत होकर के श्रद्धावान होकर के ईश्वर को पुकारेंगे। ईश्वर को आना ही पड़ेगा। भक्त की बात सुननी ही पड़ेगी। किंतु वो कब होगा? ईश्वर भक्त के वशीभूत कब होंगे? जब भक्त के मन में अपने खुद के स्वार्थ की एक रेखा मात्र ना रहेगी। स्वार्थ संपूर्ण रूप से विच्छेदित हो जाएगा उसके मन से। तब ईश्वर उस भक्त के जैसे कि वो क्या कहेंगे कि वो जो भक्त मांगेगा वह देने को तैयार हो जाएंगे। भक्त की पुकार सुनकर के वह दौड़े आएंगे। किंतु वो जो बड़ा सुंदर उदाहरण है कि वो एक

कहानी: कब भगवान हमारी रक्षा करते हैं, और कब नहीं करते

भगवान शिव वो कैलाश में बैठे हुए हैं और एकाएक वहां से खड़े होकर जा रहे हैं दौड़ते दौड़ते तो मां पार्वती ने सोचा कि अरे भगवान कहां जा रहे हैं? थोड़ी देर के बाद में भगवान वापस आ गए। तो मां ने पूछा कि अरे आप दौड़ते दौड़ते गए भी सही वापस भी आ गए। क्या माजरा क्या है? तो भगवान ने कहा कि मेरा एक भक्त वो जा रहा था। रास्ते में धोबी लोगों ने वस्त्र सुखाए हुए थे। तो उसके ऊपर में पैर पड़ा उसका तो यह लोग उसको मारने के लिए जा रहे थे। इसके लिए अपने भक्त की रक्षा करने के लिए मैं जा रहा था। तो फिर मां ने पूछा कि वापस क्यों आ गए? तो भगवान ने कहा कि उसने खुद ने अपनी रक्षा करने के लिए पत्थर उठा लिया। वो खुद अपनी रक्षा करने को तो मुझे मेरी क्या जरूरत है? तो भगवान अपने वश में आ जाएंगे। जब हम संपूर्ण शरणागत हो जाएंगे। किंतु यदि कामना वासना से प्रेरित होकर के कोई विशेष क्रिया का अनुष्ठान करके सोचेंगे कि भगवान वश में आ जाएंगे तो बिल्कुल पागलपन वाली बात होगी। अत जुग जुगांतर व्यापी अवसाय चेष्ट फले भारत ऋषि महापुरुष गण साधना संबंध जे शकल तत्व उपनित होइया छिलेन ताहार संख्येप आलोचना एकने विषय विरुद्ध होइबे ना तो इसीलिए इन सब कारणों की वजह से ही युग युगांतर वापपी अध्यवसाय और चेष्टा युग युगांतर से तपस्या और प्रयास करके भारत के ऋषि और महापुरुष गण साधना के बारे में जो सब तत्व उन्होंने खोज निकाले हैं जो सब तत्वों पर आकर के उपस्थित हुए हैं उन सब तत्वों की संक्षिप्त आलोचना यहां पे विषय विरुद्ध रहेगी नहीं। तो इसके साथ में यह जो यह है इंट्रोडक्शन कि क्यों हमको साधना के मूलभूत तत्व के बारे में सोचना है वह समाप्त होता है। अभी इसके बाद के पैराग्राफ से साधना के मूलभूत तत्व क्या है? उसकी आलोचना प्रारंभ होगी। वह अभी लीला प्रसंग के नेक्स्ट क्लास में। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम

प्रश्न: स्वामीजी गरीब बच्चों के लिए 10 शिक्षक क्यों चाहते थे?

कृष्णपणमस्तु देखिए कि जिसको कि वेल्थ ऑफ नेशंस कहते हैं। पहले एक समय समझा जाता था कि वेल्थ ऑफ नेशन क्या है? तो वह है जैसे कि नेचुरल रिसोर्स या तो फिर यह मैन्युफैक्चरिंग या तो फिर यह जो प्रोडक्शन करते हैं साइंस टेक्नोलॉजी वगैरह। अभी जनरली समझा जाता है कि वेल्थ ऑफ नेशंस आर ह्यूमंस। ये जो मनुष्य है वही तो कोई भी एक देश की सबसे बड़ी संपत्ति है। मनुष्य यानी कि जनता या तो फिर यह नागरिक ये लोग पढ़े लिखे नहीं रहेंगे। तो फिर क्या है कि पढ़ाई लिखाई नहीं होगी तो डेमोक्रेसी ठीक से नहीं चलेगी और गरीबी रहेगी तो देश कभी भी ऊपर नहीं आएगा। अमेरिका में देखिए कि जो नागरिक हैं पढ़े लिखे हैं तो फिर वो डेमोक्रेसी भी ठीक से चलती है और इकोनॉमी भी ठीक से चलती है। तो पढ़ाई लिखाई के लिए एजुकेशन जो है वो फाउंडेशन है। किसी भी देश की शक्ति के लिए आज जो गरीब देश है उन लोगों को देखिए ना ही मिलिट्री पावर उनका ठीक है ना ही उनका इकोनॉमिक पावर ठीक है। इसके लिए जो और जो एजुकेटेड कंट्रीज़ हैं वह मिलिट्री भी उनका यह रहेगा पावरफुल इकोनमी भी पावरफुल रहेगा। तो एजुकेशन किसी भी देश की सबसे बड़ी वेल्थ है और यदि आपको जो गरीब लड़के हैं उनको यदि एजुकेट करना होगा तो मेन पावर जो है लगाना पड़ेगा क्योंकि क्या है कि बचपन में उनको यह मन को डिसिप्लिन करने की कोई ट्रेनिंग नहीं दी गई है। तो फिर वह अच्छे से मेन पावर लगाएंगे। अच्छे टीचर इकट्ठा करेंगे तब वह कुछ सीखेंगे।