साधक भाव : अवतरणिका || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 17 Feb 2025
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प्रश्न: आज सुबह दिल्ली में भूकंप आया था
प्रश्न: हमारे संघ में स्वामी विवेकानंद ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जो शास्त्रों के अध्ययन पर ध्यान देते थे। ठाकुर और मा हृदय परिवर्तन पर अधिक ध्यान देते थे।
प्रश्न: स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि सेवा कार्य ऑब्जेक्टिव से अधिक सब्जेक्टिव होता है। अब इस सब्जेक्टिव सफलता को कैसे मापा जाए? हम कैसे जानें कि हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं? चरित्र निर्माण का मेज़रमेंट क्या है ?
प्रश्न: हम गृहस्थों को सबसे पहले क्या त्यागना चाहिए?
अभेदानन्दजी में अपनी शक्ति का संचार कर विवेकानन्द ने उनके लिए और खुद के लिए कितना बड़ा खतरा मौल लिया था.
ठाकुर की दूर-दर्शन की शक्ति
मथुर बाबू की दुर्गा पूजा और ठाकुर का आशीर्वाद
स्वामीजी के स्पर्श ने अभेदानंदजी के आध्यात्मिक मार्ग को द्वैत से अद्वैत में बदल दिया। इसका उनके व्यवहार पर हानिकारक प्रभाव पड़ा। swamiji's touch forcefully changed abhedanandaji's spiritual path, from dvaita to advaita. this had detrimental effect on his behaviour.
नर लीला में सभी क्रियाएं मनुष्यों के समान ही होती हैं। चूँकि भगवान मानव रूप धारण करके अवतार लेते हैं, इसलिए उन्हें मनुष्यों के समान ही दुःख और पीड़ा सहनी पड़ती है।
अहंकार की कहानी
श्रीरामकृष्ण ने साधना का द्वार -- आबाल-वृद्ध, स्त्री-पुरुष, सन्यासी-गृहस्थ -- सभी के लिए खोल दिए है
मानव शरीर स्वीकार कर भगवान को भी मनुष्य की तरह ही सुख-दुःख का अनुभव करना पड़ता है तथा मनुष्य की तरह ही प्रयत्न, पुरुषार्थ व तप द्वारा सभी विषयों में सिद्धि प्राप्त करनी पड़ती है।
अवतार के देह में सत्त्व का प्राधान्य होता है, मनुष्य के देह में तमस और रजस का. परन्तु आत्मश्रद्धा और निरंतर साधना से हम भी सत्व-प्रधान की अवस्था तक पहुंच जाएंगे
दो ऋषियों की कहानी और साधना में उनका धैर्य: कई जन्मों के बाद मुक्ति
दैव और पुरुषार्थ के बारे में ठाकुर का मंतव्य
दो साधकों की कहानी: अद्वैत और द्वैत का झगड़ा: सोऽहं - दासोऽहं - सदासोऽहं - दासदासोऽहं
ठाकुर दो साधनाएँ सिखाते हैं:
श्रीरामकृष्ण और स्वामी विवेकानंद की अतुल्य तपस्या की कहानी
प्रश्न: ईश्वर से रस्सी लम्बी करवाने के लिए कड़ी मेहनत करने के बजाय, हम एक स्थान पर बैठकर शिकायत करते रहते हैं। Q: instead of working hard so that ishvar will lengthen the rope, we sit in one place and complain.
प्रश्न: हमें ठाकुर द्वारा की गई तपस्या का केवल 1/16 भाग ही करना है। क्योंकि उन्हें पूरी दुनिया की चिंता करनी थी, हमें केवल अपनी चिंता करनी है। Q: we have to do only 1/16th of the tapasya that thakur did. because he had to worry about the whole world, we have to worry about only ourselves.
प्रश्न: दैव और पुरुषार्थ के बारे में
प्रश्न: हम ठाकुर की कहानियों की ओर आकर्षित होते हैं। यह अपने आप में एक बहुत बड़ा आशीर्वाद है। कभी-कभी हम इसकी सराहना नहीं करते हैं। Q: we are attracted to thakur's stories. this itself is such a huge blessings. sometimes we do not appreciate this.
प्रश्न: हम हमेशा साधन-भजन ही करते रहेंगे न की कभी समाधी भी प्राप्त होगी?
प्रश्न: रामचंद्र दत्त और स्वामी विवेकानन्द में कैसा विरोधाभास था!
वराहनगर मठ में स्वामी विवेकानन्द पे गुरुभाईओ का जिम्मा
प्रश्न: ईश्वर प्राप्ति भले ही न हुई हो, साधना नहीं छोड़नी!
प्रश्न: सारदानन्दजी कहते है की अवतार की नरलीला साधना का आदर्श स्थापित करने के लिए है. जबकि वैष्णव कहते है की नरलीला हमें ईश्वर पे प्रेम हो इस लिए है. तो क्या यह दोनों विचार विरोधाभासी है?
प्रश्न: वैसे तो स्वामीजी सोऽहं के घर के थे, किन्तु रामचंद्र के जूते खाट के निचे से निकालते है. यानि की ठाकुर के दास के दास -- दासोऽहं, दासदासोऽहं
त्याग के उच्च आदर्श की कहानी: गोपाल की माँ और ठाकुर
दैव और पुरुषार्थ के बारे में कहानी: रस्सी से बंधी हुई गाय
नारद मुनि द्वारा नरक वास की कहानी: ईश्वर कृपा और जात-महेनत से आध्यात्मिक उन्नति
प्रश्न: नारद के नरक वास की कहानी में क्या "नाम और नामी अभेद" का उपदेश है?
प्रश्न: विभीषण ने राम नाम लिखा एक कागज दिया। जब तक राम नाम पे विश्वास होगा तब तक इंसान तैरता रहेगा. अभी यह विश्वास कैसे बने?
प्रश्न: राम सेतु बनाते समय जब भगवान राम ने एक पत्थर पर अपना नाम लिखकर समुद्र में फेंका तो वह पत्थर तैर नहीं सका।
प्रश्न: अपना विश्वास कैसे बढ़ाएं? हम बहुत कुछ पढ़ते या सुनते हैं लेकिन फिर भी हमें श्रीरामकृष्ण के नाम पर विश्वास नहीं होता।
प्रश्न: कर्ता भाव और भोक्ता भाव साथ में चलते है. उस बागान मालिक की तरह हम यह नहीं कह सकते की ईश्वर पे विश्वास है और साथ ही बागान मेरी बजह से अच्छा बना है.
साधक भाव : अवतरणिका || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 26 May 2025
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अवतार के भीतर मनुष्य का अंश भी है - इसलिए उनकी मोक्ष प्राप्ति की साधना आवश्यक है
अष्ट पाश से बद्ध मानव ईश्वर या अवतार का मानव भाव ही समझ सकता है
प्रश्न: अवतार तत्व को समझना बहुत कठिन है
प्रश्न: अवतार के जीवन में चमत्कार
प्रश्न: हमारे भक्तों में दूसरों की तुलना में अधिक त्याग है। अन्य मंदिरों में भक्तगण अपनी बीमारी ठीक करने या कुछ सांसारिक लाभ प्राप्त करने के लिए जाते हैं। हमारे भक्त जानते हैं कि ठाकुर चमत्कार को प्रोत्साहित नहीं करते हैं, बल्कि त्याग और उपासना सिखाते हैं। कुछ लोगों को ठाकुर की कथामृत उबाऊ लगती है क्योंकि अन्य धार्मिक पुस्तकों की तरह इसमें कोई चमत्कार नहीं है।
कहानी: श्रीरामकृष्ण के साथ विवाह नहीं हुआ इसलिए एक महिला अफसोस करती है
साधक भाव : अवतरणिका || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 27 May 2025
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अवतार मनुष्य न होते तो उनकी साधना और तपस्या का कोई अर्थ न रहेगा
श्रीरामकृष्ण के सेवक ह्रदय राम की कहानी
जिस क्षण हम साधना करने के लिए अपने मन को संसार से उठा लेते हैं, लाखों विचलित करने वाले, विनाशकारी विचार हमारे मन पर आक्रमण कर देते हैं।
साधकों की दो श्रेणियाँ:
यदि हम नियमित रूप से एक घंटा जप-ध्यान करें, तो हम पाएंगे कि बुरे विचार हमारे मन पर आक्रमण कर हमारी साधना को नष्ट करने का प्रयास करते हैं।
कहानी: काम-कांचन श्रीरामकृष्ण को लुभाने के लिए उनके सामने प्रकट होते है
कहानी: कश्मीर में एक तांत्रिक स्वामीजी पर जादू-टोना करता है
कहानी: जप-ध्यान करते समय दिव्य शक्तियां श्रीरामकृष्ण की रक्षा करती हैं
धर्म जगत के बाह्य अवलम्बन हमारी संकल्प शक्ति को बढ़ाते है, परन्तु जप-ध्यान ही आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त कराते है
शिव होकर ही शिव की पूजा कर सकते है. मनुष्य ईश्वर का मनुष्य भाव ही समझ पाएगा.
कहानी: स्वामी विवेकानंद आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त होने से डर जाते है
कहानी: आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त होने से ठाकुर का सेवक ह्रदय अद्भुत आचरण करता है
प्रश्न: विचार मार्ग साधना कैसे काम करती है?
प्रश्न: एडिक्शन की बात से याद आया ठाकुर कालीपद घोष को कहते है मेरे पास बड़ा स्ट्रांग शराब है!
प्रश्न: जैसा कि ठाकुर कहते हैं, जब बहू गर्भवती होती है, तो सास उसका कर्म कम कर देती है। क्या आप ऐसे किसी साधक से मिले हैं जो बहुत सक्रिय थे, कर्म योग कर रहे थे, लोगों की सेवा कर रहा थे, लेकिन अब उनके कर्म दूर हो गए हैं और वो आंतरिक जीवन की ओर मुड़ गये है?
प्रश्न: ठाकुर जब ध्यान करने को बैठते और वह सन्यासी त्रिशूल लेकर उनको डरता की जब तक ध्यान समाप्त न हो जाए तब तक खड़े नहीं होना है, यह एक सीधा-सदा विल पावर नहीं लगता. यहाँ और ही कोई शक्ति काम कर रही है.
प्रश्न: जो आसुरी शक्तियों के बारे में अपने बताया, जो हमें जप-ध्यान करने में बाधा डालती है, वह क्या हमारे पिछले जन्म के कर्म है?
प्रश्न: जैसा कि आपने जिम के बारे में बताया - केवल मांसपेशियों का निर्माण ही पर्याप्त नहीं है। हमें युद्ध के मैदान में अपनी फिटनेस का परीक्षण करना होगा। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, है ना?
साधक भाव : अवतरणिका || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 28 May 2025
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बद्ध मानव ईश्वर का मानव भाव ही समझ सकता है
कहानी: एक पागलिनी का श्रीरामकृष्ण के प्रति मधुर भाव
A crazy woman used to come to the Master at Dakshineswar. At first all took her to be merely insane and so treated her kindly. Afterwards it turned out that she belonged to that class of spiritual aspirants who consider God as their sweetheart. As she identified Sri Ramakrishna with God, she mentally developed that peculiar attitude towards him. As contrasted with this, the Master regarded all women as veritable manifestations of the Universal Mother. Without considering seriously the consequences of such a contradiction, the crazy woman ventured one day to speak out her mind to him. As a reaction to such an antagonistic sentiment, the Master was thrown so violently into a fit of childlike protest that he jumped up from his seat instantaneously, his cloth dropped down from his loins, and he began to pace the room like a madman, cursing such a relationship in the strongest terms he could muster. (Holy Mother Sarada Devi: Swami Gambhirananda)
श्रीरामकृष्ण की यात्रा: "आत्मदीपो भव" से "कृष्णस्तु भगवान स्वयं"
one young disciple asked the Master to grant him some spiritual experiences. The Master told him: “Look. That kind of experience comes when one practises meditation and prayer regularly and systematically. Wait. You will get it eventually.” A couple of days later, in the evening, the young disciple saw the Master walking towards the Divine Mother's temple, and he followed him. Sri Ramakrishna entered the temple, but the disciple did not dare go inside, so he sat in the natmandir [the hall in front of the Mother's temple] and began to meditate. After a while he suddenly saw a brilliant light, like that of a million suns, rushing towards him from the shrine of the Divine Mother. He was frightened and ran to the Master's room. A little later Sri Ramakrishna returned from the shrine. Seeing the young disciple in his room, he said: “Hello! Did you sit for meditation this evening?” “Yes, I did,” answered the young disciple, and he related to the Master what had happened. Then the Master told him: “You complain that you don't experience anything. You ask, 'What is the use of practising meditation?' So why did you run away when you had an experience?” (Sri Ramakrishna as we saw him)
साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 30 Jun 2025
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सभी में ईश्वर को देखना ही साधना की परम उपलब्धि है
भगवद गीता में : सर्व भूत में ईश्वर दर्शन
ईशोपनिषद् में : सर्व भूत में ईश्वर दर्शन
मुण्डकोपनिषद् में : सर्व भूत में ईश्वर दर्शन
कठोपनिषद में : सर्व भूत में ईश्वर दर्शन
प्रश्न: भिखारी में माँ काली को देखने से पहले हमें काली में ब्रह्म को देखना है
प्रश्न: भिखारी में ब्रह्म को देखना आसान है क्योंकि हमें उनके साथ समय नहीं बिताना पड़ता। लेकिन अपने रिश्तेदारों, दोस्तों, सहकर्मियों के साथ हमें रोजाना रहना पड़ता है और उनमें ब्रह्म को देखना बहुत मुश्किल है।
प्रश्न: हमें प्रतिदिन अपने रिश्तेदारों, मित्रों, सहकर्मियों के साथ रहना पड़ता है। आपके रांची त्याग की तरह कोई विकल्प नहीं है।
साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 1 Jul 2025
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कठोपनिषद में : सर्व भूत में ईश्वर दर्शन
हमने "आत्मनो मोक्षार्थम्" तो हासिल कर लीया, लेकिन हम "जगत हिताय च" को भूल गए
स्वामी विवेकानंद: ह्रदय में ब्रह्म साक्षात्कार करने से भी उच्च सोपान है सर्व भूत में ब्रह्म साक्षात्कार करना
प्रश्न: हमने कभी यह अपेक्षा नहीं की थी कि तुरियानन्दजी स्वामीजी के कर्म योग पर इस दृढ़ विश्वास के साथ बोलेंगे।
प्रश्न: हमने सोचा था कि एक बार हमें आत्मसाक्षात्कार प्राप्त हो जाए तो हम खुश हो जाएंगे। लेकिन यहाँ हम सीखते हैं कि आत्मसाक्षात्कार के भी कई सोपान होते हैं।
प्रश्न: जैसे-जैसे हम आध्यात्मिक क्षेत्र में आगे बढ़ेंगे, क्या हमारी साधना भी बदलेगी?
प्रश्न: कभी-कभी हम गृहस्थों को ऐसा लगता है कि हमने अपना जीवन अपने परिवार और नौकरी में बर्बाद कर दिया है। हम सब कुछ छोड़कर भाग जाने और हिमालय में भगवान को याद करने का सपना देखते हैं। लेकिन जैसा आपने कहा कि हम संसार में रहते हुए भी साधना कर सकते हैं, हर किसी में भगवान को देख सकते हैं।
प्रश्न: तुरियानन्दजी कहते हैं, "आँखें बंद करके ध्यान करो और आँखें खोलकर भी ध्यान करो। उन्हें सर्वत्र देखो!"
साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 3 Jul 2025
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सर्व भूत में ईश्वर दर्शन का क्या अर्थ है
रांची में आदिवासी/ग्रामीण विकास के मेरे दिनों की कहानी
worldview vs heart
प्रश्न: यदि वे आपको पुनः रांची भेजेंगे तो आप कैसे काम करेंगे?
प्रश्न: क्या आप पुनः रांची जाना चाहते हैं?
प्रश्न: रांची के ग्रामीण क्षेत्रों में हमारे काम का क्या प्रभाव पड़ा?
प्रश्न: हमारे काम से आदिवासियों के जीवन में वास्तविक सुधार हुआ होगा?
प्रश्न: क्या रांची में काम अभी भी चल रहा है?
स्वामी शशांकानंद
प्रश्न: रांची में आपके सब कर्म क्षय हो गए
प्रश्न: कभी-कभी धनी लोग भी हमारी सेवाओं का लाभ उठाने का प्रयास करते हैं
प्रश्न: हम सभी से समान रूप से प्रेम कर सकते हैं, लेकिन हम सभी के साथ एक जैसा व्यवहार नहीं कर सकते।
प्रश्न: कभी-कभी हम दूसरों पर नाराज हो जाते हैं। इस आक्रोश से कैसे छुटकारा पाएँ?
प्रश्न: कुछ लोग हमारे साथ बुरा व्यवहार करते हैं। हम उनसे दूर रहने की कोशिश करते हैं, लेकिन वास्तव में हम उनके प्रति दयालु नहीं हो पाते। तो क्या इससे मेरी साधना को नुकसान होगा?
प्रश्न: मैंने भी वही गलती की है जो मेरे मित्र ने की है। लेकिन परिणाम स्वरूप केवल मैं ही पीड़ित हूँ, जबकि मेरा मित्र काफी खुश है। तो फिर कर्म फल हम पर अलग-अलग क्यों लागू होता है?
साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 4 Jul 2025
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स्वामी विवेकानंद: केवल ज्ञान ही हमें शाश्वत शांति देता है
स्वामी विवेकानंद: केवल धर्म ही हमारी चेतना सहित ब्रह्मांड के सभी तत्वों को एकत्व प्रदान कर सकता है
स्वामी विवेकानंद: आत्मन् कि महिमा
प्रश्न: परंपरागत रूप से, वेदांत की यात्रा आत्म-साक्षात्कार, ब्रह्म-साक्षात्कार के साथ समाप्त होती है। क्या यह सच है कि स्वामी विवेकानंद पहले व्यक्ति थे जिन्होंने कहा था कि आत्मसाक्षात्कार के बाद सेवा या धर्म प्रचार आता है?
प्रश्न: मृत/जीवित बिल्ली के बारे में
प्रश्न: ठाकुर बहुत व्यावहारिक थे। स्वामीजी कहते थे कि हमें खेत में काम करने के लिए तैयार रहना चाहिए और अगले ही पल वेदांत का प्रचार करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए।
साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 6 Aug 2025
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आध्यात्मिक साधना क्या है, साधना के बारे में भ्रांत धारणाएं, और उनका समाधान
आज के समय में धर्म और अध्यात्म के बारे में गलत धारणाएँ
साधना के बारे में भ्रांत धारणाएं फैलने का कारण क्या है
साधना का चरम फल है सर्वभूत में ईश्वर दर्शन
हमें सर्वभूत ब्रह्म दर्शन क्यों नहीं हो रहा है? कारण है भ्रम या अज्ञान
वराहनगर मठ के प्रति पड़ोसियों का संदेह
प्रश्न: क्या यह सच है कि आध्यात्मिक व्यक्ति को वास्तव में कोई भय या चिंता नहीं होती?
प्रश्न: हमें किसी भी स्थिति में संतुष्ट रहना चाहिए, है ना?
प्रश्न: माँ शारदा ने पगली मामी को श्राप दिया था। किसी ने कहा कि माँ श्राप नहीं दे सकती, यह घटना हमारी पुस्तक में सही ढंग से नहीं लिखी गई है। कृपया इसे समझाएँ।
प्रश्न: क्या हमें जगदम्बा से से किसी भी चीज़ के लिए प्रार्थना करनी चाहिए की नहीं ?
प्रश्न: हर किसी को एक ही तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है - स्वास्थ्य, करियर, परिवार, धन आदि, तो फिर इनके समाधान के लिए प्रार्थना क्यों न की जाए?
साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 8 Aug 2025
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हमें ब्रह्मज्ञान क्यों नहीं हो रहा? उत्तर है हम भ्रम में पड़े है.
practical vedanta: "सर्व भूत में ईश्वर दर्शन" को व्यवहार में कैसे लाया जाए
भ्रम होने का कारण क्या है? उत्तर है अज्ञान
प्रश्न: आपने शिशु का उदाहरण दिया। ऐसा लगता है कि आप कह रहे हैं कि शिशु अज्ञानी है और हमें उसे बाहर से ज्ञान देना होगा।
प्रश्न: हम भी एक बच्चे की तरह हैं। यदि आप हमें कहते हैं कि तत्वमसि श्वेतकेतु तो हमें भी ब्रह्म ज्ञान नहीं होगा!
प्रश्न: स्वामीजी कहते हैं कि शिक्षा आपके भीतर पहले से विद्यमान पूर्णता की अभिव्यक्ति है education is manifestation of perfection already within you । इसका क्या अर्थ है?
प्रश्न: आप अंतर्दशा, अर्धबाह्यदशा और बाह्यदशा के बारे में बात कर रहे थे। क्या ठाकुर या स्वामीजी बाह्यदशा में भी आनंद का अनुभव करते थे? स्वामीजी ने बाह्यदशा में इतनी मेहनत की कि उनका स्वास्थ्य खराब हो गया। इसके बावजूद वे कहते हैं कि मैं गरीबों की मदद करने के लिए बार-बार जन्म लेने को तैयार हूं। इसका मतलब है कि उन्हें उस दशा में भी आनंद की अनुभूति होती होगी।
साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 13 Oct 2025
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वेदान्त कहता है कि स्वप्न, सुषुप्ति और जाग्रत — तीनों अवस्थाएँ भ्रम हैं; सत्य तो इन तीनों से परे स्थित तुरीय अवस्था है। फिर हमें जाग्रत अवस्था इतनी वास्तविक क्यों प्रतीत होती है, और क्यों सब लोग एक ही वास्तविकता को देख रहे हैं? सबको एक समान भ्रम क्यों होता है?
विराट मन में जगत-रूप कल्पना का उदय होने के कारण ही समस्त मानवों को एक समान भ्रम हो रहा है
विराट मन में जगतरूप कल्पना का उदय तो होता है, परन्तु वह हमारी तरह अज्ञान के बंधन में नहीं बँधता
स्वामी विवेकानन्द विराट मन में जगतरूपी कल्पना के बारे में क्या कहते है?
प्रश्न: महत को स्वप्न आना हमारा मूवी देखने के बराबर है. हमें पता रहता है की हम मूवी देख रहे है उसे सत्य नहीं मान लेते.
प्रश्न: यदि मेरा अज्ञान मिट जाए और मैं ब्रह्म में लीन हो जाऊँ, तो फिर बाकी सब लोग माया में बंधे क्यों रहेंगे?
प्रश्न: अद्वैत तो कहता है कि हम सब एक ही हैं, हमारी अलग-अलग व्यक्तित्व की भावना ही माया है। तो फिर जब एक को मुक्ति मिल जाती है, तब बाकी सब लोग माया में कैसे बंधे रह जाते हैं?
प्रश्न: स्वप्नावस्था में असंगति तो है ही, पर जाग्रत अवस्था में उससे भी अधिक असंगति है।
प्रश्न: मुक्त जीव तो मुक्त हो चुका है, बद्ध जीव संसार का आनंद ले रहे हैं — और पीड़ा में हैं केवल हम मुमुक्षु। इसलिए हमें मुमुक्षुओं का एक कम्युनिटी बनाना चाहिए, ताकि हम एक-दूसरे का सहारा बन सकें।
प्रश्न: इसीलिए ठाकुर ने यह कम्युनिटी स्थापित किया था — ताकि मुमुक्षुजन एक-दूसरे के सहारे, संगति और साधना से मुक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ सकें।
साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 18 Nov 2025
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जगत के विषय में हमारी धारणाएँ और अनुभूतियाँ दीर्घकालीन संचित आदतों का परिणाम हैं
शक्ति का बाह्य प्रदर्शन नहीं, आतंरिक अनुभूति ही मनुष्य की सही परख है
संस्कार का ज़ोर कितना गहरा है — श्रीरामकृष्ण काली मंदिर में अन्न ग्रहण नहीं करना चाहते
जगत को यथार्थ रूप में जानने के लिए नाम-रूप और देश-काल के पार जाना होगा
ब्रह्मज्ञान हो जाने पर संसार के सुख तुच्छ प्रतीत होने लगते हैं
ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिए की गई चेष्टा को ही वेदप्रमुख शास्त्र ‘साधन’ कहते हैं
जो स्त्री या पुरुष ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करते हैं, वही भारत में ‘साधक’ कहलाते हैं
प्रश्न: जब हम लगभग पंद्रह वर्ष के होते हैं, तब हम अच्छे करियर, ऐश्वर्यपूर्ण जीवन, अच्छी पत्नी और परिवार जैसे लक्ष्य तय करते हैं। फिर आगे चलकर ये लक्ष्य आध्यात्मिक लक्ष्यों में क्यों नहीं बदलते? हमारा आंतरिक evolution क्यों रुक जाता है?
प्रश्न: एक बार हम सांसारिक प्रलोभन में फंस जाते है तो फिर इससे मुक्त होना असंभव लगता है. क्योकि हमारे आसपास सभी लोग तो इसी मायाजाल में बंधे है. पूरा सिस्टम हमें फंसाना चाहता है. जो माया से मुक्त हो भी जाते है, वे लोग अपने को छुपाके रखते है.
प्रश्न: इसलिए सत्संग का इतना प्राधान्य है. साथ में अन्य साधको को देख कर हमें भी भरोसा मिलता है. लगता है इसीलिए ठाकुर ने गुरुभाईओ को साथ में रहने को कहा होगा.
प्रश्न: दुसरो को सही आध्यात्मिक दिशा दिखने की हमारी ड्यूटी कितनी है?
स्वामी विवेकानंद - “मृत्यु भी मुझे भयभीत नहीं कर सकता”
प्रश्न: जीवन में हमारी वास्तविक खोज क्या होनी चाहिए?
प्रश्न: उपनिषद कहते हैं कि हमारी यात्रा अनेकता से एकता की ओर है
प्रश्न: स्वामी विवेकानंद कहते है: Think always: "I am Brahman". Every other thought must be cast aside as weakening. Cast aside every thought that says that you are men or women. Let body go, and mind go, and gods go, and ghosts go. हम यह कब सिद्ध कर पाएंगे ?
प्रश्न: स्वामीजी के अनुसार समस्त स्मृतियों का पुनः स्मरण वैराग्य लाता है; पर जब हमारी स्मृति ही selective और अपूर्ण है, तब वह वैराग्य में कैसे सहायक हो सकती है?
प्रश्न: हमारे जीवन में अनुभवों की कमी नहीं है, फिर भी उनसे हमें वैराग्य क्यों नहीं होता?
प्रश्न: भक्ति और ज्ञान में मानो कांटे की टक्कर है; लेकिन अंततः तो भक्ति और शरणागति ही विजयी होती हैं। स्वामीजी इतने महान ज्ञानी थे, फिर भी अपने जीवन के अंत में उन्होंने शरणागति की ही बात कही
प्रश्न: जिन महापुरुषों ने त्रेता या द्वापर युग में इन भावों का विकास किया होगा, उनके जीवन का संघर्ष कितना गहन और कठिन रहा होगा!
साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 31 Dec 2025
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सामाजिक, आर्थिक और आध्यात्मिक जड़ता—यही कारण बना भारत की हज़ार साल की पराधीनता का
साधन-मार्गों में विवाद व्यर्थ है; साधनाएँ आवश्यकता के अनुसार विकसित हुई हैं।
भक्ति मार्ग से निर्विकल्प समाधि की प्राप्ति
प्रश्न : हमारे पास अद्वैत वेदांत जैसी बड़ी लिबरल फिलॉसफी थी, उसी समय हम इतने भेदभाव वाले थे कि निवेदिता के साथ बुरा बर्ताव करते थे। और वे ठाकुर के भक्त थे, कोई आम लोग नहीं।
प्रश्न : society is still a work in progress
प्रश्न: इन सब विचारों को विकसित होने में हजारों वर्ष लगते है. उन्हें हम अपने छोटे से जीवन में कैसे समझ सकेंगे!
साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 9 Feb 2026
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ज्ञान मार्ग से निर्विकल्प समाधी प्राप्ति कैसे होती है
द्वैत या विशिष्ट अद्वैत वेदांत मार्ग से ईश्वर साक्षात्कार
श्री रामकृष्ण के जीवन में विभिन्न साधन पद्धतियाँ और दर्शन शास्त्रों का समन्वय
निर्विकल्प समाधि के दो मार्ग: ज्ञान और भक्ति
भक्त सभी में ईश्वर-दर्शन कर सभी को अपना बना लेता है
त्याग के मार्ग पर चलकर भी यदि हृदय में विद्वेष हो, तो इससे बुरा और कुछ नहीं
प्रश्न: एक ओर ठाकुर का वचन कि “मैं दवाएँ देने लगता तो दक्षिणेश्वर अस्पताल बन जाता”; दूसरी ओर रामकृष्ण मिशन हर ओर अस्पताल खोल रहा है—यह कितना अद्भुत विरोधाभास है। इसी कारण, राष्ट्रनिर्माण के स्तर पर स्वामीजी का मार्ग ही हमारा पथ होना चाहिए।
प्रश्न: क्या हम "नेति नेति" और "इति इति" का समन्वय कर रहे है अपनी साधन पद्धति में?
प्रश्न: अर्थात हमारा मार्ग 100% "नेति नेति" वाला नहीं, ठीक?
प्रश्न: आपने आध्यात्मिक जीवन में पतन की बात कही। Deepak Chopra जैसे व्यक्ति, जो वेदांत पर विस्तृत लेखन करते हैं, उनका नाम भी Epstein files में सामने आया। तो वेदांत से उन्हें वास्तविक आध्यात्मिक विकास क्या मिला? दूसरा, हम जो साधक हैं—हमारा कितना विकास हो रहा है, इसका measurement क्या है? और क्या ऐसे कोई early warning system हैं, जो हमें बता सकें कि हम पतन की ओर जा रहे हैं?
प्रश्न: बहुत से लोग शिकायत करते हैं कि उन्हें हर तरफ से धोखा मिला है। तब मन में आता है—कभी अपने आप को भी देखा है? इस लिए में पूछता हूँ - क्या कोई external help है, जिससे हम जान सकें कि हमने कितना आध्यात्मिक विकास किया है?
प्रश्न: गिरिश में कोई hypocracy नहीं थी
प्रश्न: एक साधक के रूप में हमारा मन होता है कि हम अपने रिश्तेदारों से दूर रहें। लेकिन आप सहानुभूति और करुणा की बात करते हैं। कठिनाई यह है कि इससे हम कई सामाजिक बंधनों और दायित्वों में खिंच जाते हैं।
जैसे-जैसे हम आध्यात्मिक होते जाते हैं, लोगों को हम boring लगने लगते हैं।
साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 10 Feb 2026
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भक्ति मार्ग द्वारा निर्विकल्प समाधि
सच्ची आध्यात्मिकता चमत्कार नहीं, विशाल हृदय है
श्री रामकृष्ण कुमारी के भीतर जगदम्बा का दर्शन करते है
वेश्याओं और अभिनेत्रियों में माँ जगदम्बा के दर्शन — श्री रामकृष्ण की अद्भुत दृष्टि
बबूल के पेड़ में श्यामसुंदर का स्मरण — भाव में डूबा भक्त
प्रश्न: ठाकुर भाव में मदहोश हैं, फिर भी उन्हें इस बात का पूरा होश है कि लोग क्या कहेंगे; इसलिए वे किसी को अपना हाथ पकड़ने नहीं देते। उनमें दिव्यता और व्यावहारिक समझ—दोनों का अद्भुत संगम है।
प्रश्न: ठाकुर की तरह, जिसे हम बुरा मानते हैं, उसमें दिव्यता कैसे देखें? कभी-कभी हमें लगता है कि ऐसी शिक्षाएँ दैनिक जीवन में अव्यावहारिक हैं।
प्रश्न: क्या स्वाध्याय और प्रार्थना जैसी साधनाएँ हमारे मन का द्वेष मिटाकर करुणा जगाती हैं?
प्रश्न: आप सही कह रहे हैं। मैंने भी कई लोगों को देखा है जो बहुत भक्तिभाव वाले दिखते हैं, लेकिन साथ ही बहुत भ्रष्ट भी होते हैं। इसलिए हमें वास्तव में अपने आप को re-engineer “पुनर्निर्मित” करने की आवश्यकता है।
प्रश्न: करुणा हमारी आध्यात्मिक प्रगति का मापदंड है। इसके बिना लोग काफी क्रूर हो जाते हैं।
प्रश्न: जगत रमण महर्षि को भी नहीं छोड़ता। मैंने कहीं सुना था कि रमण महर्षि ने पास की एक किराने की दुकान से उधार लिया हुआ था! उनको भी उसकी चिंता थी!
प्रश्न: मुझे ज्ञान का अपच हो गया था, लेकिन अब मैंने करुणा का महत्व समझ लिया है।
प्रश्न: मैंने कहीं पढ़ा था कि जिस गायिका ने स्वामीजी के सामने “मेरे अवगुण चित्त न धरो” गाया था, उसका जीवन पूरी तरह बदल गया। उसने गाना छोड़ दिया और एक छोटी-सी कुटिया में एक संन्यासिनी की तरह रहने लगी, और अब केवल भगवान के लिए ही गाती थी।
साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 12 Feb 2026
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ईश्वर-प्राप्ति ही है साधक के जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य
श्रीरामकृष्ण की महावीर के प्रति अनुराग और ध्यान-तन्मयता
महावीर के प्रति अनुराग और ध्यान-तन्मयता से श्रीरामकृष्ण की पूँछ बढ़ने की कहानी - उत्क्रांतिवाद की चर्चा
महावीर के दास्य-भाव की साधना के समय श्रीरामकृष्ण को हुआ माँ सीता का दर्शन
प्रश्न: जब स्वामीजी कहते है " को राम:" तब सही में आनंद आता है. अभी तक तो यही सुनते आये है की राम ही सर्वस्व है.
प्रश्न: महावीर के दास्य भाव की साधना से ठाकुर की पूंछ बढ़ना शुरू हो गई. यह सुनना तो अच्छा लगता है. परन्तु हम सामान्य साधको के लिए क्या इसका कोई प्रैक्टिकल इस्तेमाल है?
प्रश्न: महावीर के दास्य भाव की साधना करते-करते ठाकुर में ऐसा तन्मयता आई कि उनकी पूंछ तक बढ़ने लगी। हम अपने मन को किसी एक साधना में इस प्रकार कैसे झोंक दें कि वह उसी भाव में पूर्णतः डूब जाए? ठाकुर ने अन्य भावो को मन से कैसे निकाल दिया यह भी सोचने की बात है.
प्रश्न: महावीर के दास्य भाव की प्रचंड साधना ठाकुर ने की. हम साधको के लिए इससे क्या सीख मिलती है?
प्रश्न: एक और ठाकुर ईश्वर प्राप्ति के लिए सर्वस्व त्याग करने की बात करते है, दूसरी और स्वामीजी कहते है each is great in his own place. तो हम गृहस्थ तो स्वामीजी को ही फॉलो कर सकते है. हम कैसे सब त्याग करे?
प्रश्न: अर्जुन भगवान कृष्ण की बात न सुनाता तब भी भगवान कैसे भी कर के युद्ध जितवा देते। किन्तु अर्जुन का जितना हम सब के लिए आवश्यक था.
प्रश्न: अर्जुन या स्वामीजी की भी एक destiny थी न. ठाकुर ने कहा था तुम्हारी हड्डिया तुम से काम करवाएगी
प्रश्न: swamiji says god became man so that man can become god
प्रश्न: ठाकुर का अनुकरण नहीं कर सकते किन्तु माँ और स्वामीजी का तो कर सकते है
साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 13 Feb 2026
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भक्त संसार की हर वस्तु और व्यक्ति को ईश्वर से जोड़कर उन्हें अपना बना लेता है
भक्ति मार्ग द्वारा निर्विकल्प समाधि की प्राप्ति
कल्पतरु दिवस पर रामलाल दादा के ईश्वर दर्शन
प्रश्न: मैंने सुना है की मूर्ति का ध्यान न हो पाए तो लीला-ध्यान करना चाहिए। क्या ये सही है?
प्रश्न: एक और रामलाल दादा कहते है, ठाकुर के लिए लोटा और गमछा वहन करना ही क्या मेरा जीवन है, दूसरी और त्यागी संतानगण जब ठाकुर सब को स्पर्श कर चैतन्य करवा दे रहे थे, तब भी ठाकुर के बिस्तर को धुप में देने में व्यस्त थे. सेवा ही उनके आध्यात्मिक जीवन की सार्थकता थी, नहीं की ईश्वर-दर्शन।
प्रश्न: क्या हम ऐसा कहे की ठाकुर के साथ में रहना सर्वोच्च है
प्रश्न: किसी भक्त से सुना है की मन की वासनाए तो कम हुई है, परन्तु ईश्वर दर्शन नहीं हुए. तो क्या दर्शन के लिए व्याकुल होना चाहिए की इतना काफी है?
प्रश्न: किसी महाराज के प्रवचन में सुना था की अष्टांग योग में यम-नियम ही मुख्य है. बाकि सब तो होता रहेगा।
प्रश्न: स्वामी रंगनाथनंदजी कहते थे की वो अगले जन्म में रामकृष्ण मिशन में साधु होना चाहते है. साधु जीवन तो ईश्वरप्राप्ति का साधन (means) मात्र है किन्तु उनके लिए तो साधु जीवन ही लक्ष्य (end) हो गया.
साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 23 Mar 2026
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भक्ति मार्ग द्वारा निर्विकल्प समाधि की प्राप्ति
गोपाल माँ (अघोरमणी देवी) की कहानी
गोपाल माँ श्री रामकृष्ण का प्रथम दर्शन करती है
गोपाल माँ प्रथम बाल गोपाल का दर्शन करती है
गोपाल माँ बाल गोपाल को लेकर श्री रामकृष्ण के पास दक्षिणेश्वर आती है
प्रश्न: ऐसे भी रूढ़िवादी लोग थे जिन्होंने माँ से भी दंड वसूली की. किन्तु कुछ ही रुपियो में उन्होंने अपना आत्म-सन्मान बैच दिया!
प्रश्न: स्वामीजी ने कहा की -- the India of prayers and tears, of vigils and fasts, that is passing away, never to return! लगता है की भारत से विराग का आदर्श चला ही जा रहा है. हमारे आश्रमों में भी अभी प्रवृत्ति ही ज्यादा दिखाई देती है.
प्रश्न: हमारी तपस्या का स्वरूप भी बदल रहा है. बात सही है की परंपरागत तपस्या की तरह ही कर्मयोग में भी उतनी ही तपस्या है. परन्तु गोपाल माँ की तरह परंपरागत तपस्या अभी चली जा रही है.
प्रश्न: हम हमेशा सोचते रहते है की इतना सा responsibility चला जाये बस हम कर्म समाप्त कर सिर्फ साधन-भजन ले कर रहेंगे। परन्तु responsibility कभी समाप्त नहीं होती। हमारे लिए तो अभी स्वामीजी अपने प्रवचन God in everything में जो कहते है, इसी संसार के भीतर रह कर साधना करनी है. स्वामीजी ने ठीक ही कहा की -- the India of prayers and tears, of vigils and fasts, that is passing away, never to return!
प्रश्न: ठाकुर भी कही एकांत में छुप कर तपस्या करना नहीं चाहते थे. उन्होंने भी भक्तो को आमंत्रण दिया। उस निल वसन पहनी हुई स्त्री में माँ सीता का दर्शन किया।
प्रश्न: आखिर में तो हम जहां है वही रह कर हमें साधन-भजन कर लेना है. माँ भी तो संसार में रही.
साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 25 Mar 2026
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गोपाल की माँ के आगमन से ही श्रीरामकृष्ण लड्डू-गोपाल की मुद्रा धारण करते है
श्रीरामकृष्ण गोपाल की माँ को त्याग की शिक्षा देते है
गोपाल की माँ की त्याग की पराकाष्ठा: मारवाड़ी भक्तों द्वारा दिया हुआ आहार जो स्वामी विवेकानंद को ही ठाकुर खाने को देते थे उसे ठाकुर ने गोपाल की माँ को खाने के लिए दिया
प्रश्न: मारवाड़ी भक्त जो सकाम भाव से ठाकुर को मेवा-मिठाई अर्पित करते थे, क्या उससे उन्हें कोई लाभ मिलता था? जबकि ठाकुर तो वह मेवा-मिठाई स्वयं न खाकर प्रायः स्वामी विवेकानन्द को ही खाने के लिए दे देते थे।
प्रश्न: एक ओर लगता है कि अपनी हर समस्या का समाधान ईश्वर से ही माँगना चाहिए—आख़िर उनसे बढ़कर अपना कौन है? लेकिन दूसरी ओर यह भी कहा जाता है कि ईश्वर जो दें, उसे प्रसाद मानकर स्वीकार करो। फिर प्रश्न उठता है—माँगें या केवल स्वीकार करें? यही तो दुविधा है।
प्रश्न: हमें ईश्वर की इच्छा को स्वीकार करना चाहिए। लेकिन कहीं यह स्वीकार करने का भाव हमें भाग्यवाद (Fatalism) और पराजयवादी मानसिकता (Defeatism) की ओर तो नहीं ले जाता? फिर प्रश्न उठता है—क्या हमें पूरा पुरुषार्थ करना चाहिए, या केवल जो हो रहा है उसे स्वीकार करते रहना चाहिए?
प्रश्न: जब कोई बच्चा सेरेब्रल पाल्सी (CP) जैसी गंभीर अवस्था में जन्म लेता है, तब ईश्वर उसकी सहायता किस प्रकार करते हैं?
प्रश्न: ठाकुर कहते हैं—बलराम बाबू के उपहार मत लो। लेकिन माँ सारदा कहती हैं—ले सकती हो। क्या यहाँ माँ सारदा ठाकुर की कठोर आध्यात्मिक आदर्श को निचा कर रही हैं, या इसके पीछे कोई गहरा आध्यात्मिक रहस्य है?
साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 4 may 2026
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अनेक रूपों में प्रकट एक ही दिव्य सत्य
त्याग और वैराग्य: आध्यात्मिक उन्नति की आधारशिला
सरल बनो, पर कपटी या मूर्ख नहीं: श्रीरामकृष्ण की माँ से सीख
भक्ति से ज्ञान की चरम अवस्था निर्विकल्प समाधि तक
भक्ति और त्याग की पराकाष्ठा: गोपाल की माँ को हुए बालगोपाल के दर्शन
जब समाधि या ईश्वर-दर्शन 21 दिन तक निरंतर रहे—तो देह नहीं टिकती
जहाँ देखूँ, वहीं बालगोपाल: गोपाल की माँ का विश्वरूप-दर्शन
एक भक्त: एक ओर ठाकुर कहते हैं—पहले ‘नेति-नेति’, फिर ‘इति-इति’ -- अर्थात निर्विकल्प समाधि के बाद सर्वभूत में ईश्वर-दर्शन। दूसरी ओर स्वामीजी पहले ही ‘शिव-ज्ञान से जीव-सेवा’ की बात करते हैं। क्या ये दोनों एक-दूसरे के विरोधाभासी हैं या एकसाथ संभव है?
एक भक्त: साधना के प्रारंभ में वैराग्य बहुत तीव्र होता है, लेकिन कुछ समय बाद वह मंद पड़ने लगता है और अपनी साधना पर ही संदेह होने लगता है। ऐसी अवस्था में क्या करें?
एक भक्त: माँ का मन तो सांसारिक झंझावात से परे था न?
एक भक्त: साधना करते एक दिन तो आएगा न की हमारा मानसिक कष्ट समाप्त हो जायेगा ?
एक भक्त: दग्धबीज का अर्थ है कष्ट तो होगा पर संस्कार नहीं बनेंगे, ठीक?
एक भक्त: स्वामीजी ने एक पत्र में लिखा था की अभी मुझे मुक्ति की इच्छा भी रही नहीं
एक भक्त: स्वामीजी लोगो के दुःख के भागीदार होना चाहते थे. उनको सुख में भागीदार नहीं होना था. ठीक?
साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 5 may 2026
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ईश्वरीय रूप में तन्मयता से जगत-विस्मृति और निर्विकल्प समाधि
इष्ट एक, रूप अनेक— भक्त-साधक के दिव्य दर्शन
जब ध्यान में देखा ईश्वरीय रूप जाग्रत जगत जितना वास्तविक लगने लगे
गोपाल की माँ के स्वभाव का दिव्य-रूपांतरण
सविकल्प समाधि: जब बाह्य जगत् अदृश्य हो जाए
प्रश्न : ध्यान इतना गहरा कैसे हो कि बाह्य जगत् विस्मृत हो जाए?
प्रश्न : बाहर के डिस्टर्बन्स से तो शायद हम मुक्ति पा भी लें, किंतु भीतर के डिस्टर्बन्स से कैसे छूटें? ऐसा तो है नहीं कि बाहर पूरी तरह शांति हो जाने मात्र से ही हमारा ध्यान लग जाएगा।
प्रश्न : आपको मोबाइल डिस्टर्ब नहीं करता क्या? वह भी तो आपके पास ही पड़ा रहता होगा।
प्रश्न : किसी-किसी को बहुत साधन-भजन करने के बाद दर्शन होते हैं, और किसी-किसी को एकाएक, in a flash, दर्शन हो जाते हैं। तो इन दोनों में फर्क क्या है?
प्रश्न : एक बार सविकल्प समाधि हो गई, तो निर्विकल्प समाधि का मार्ग खुल गया है। अब रास्ते में कोई बड़ी बाधा नहीं रह जाती, ठीक?
प्रश्न : माँ काली की ठाकुर पर इतनी कृपा थी, और ठाकुर के हृदय में माँ काली के प्रति इतनी गहरी श्रद्धा और संतान-भाव था। फिर भी कैंसर के समय जब ठाकुर असह्य कष्ट सह रहे थे, तब उन्होंने माँ काली से अपने रोग को ठीक करने की प्रार्थना क्यों नहीं की?
प्रश्न : हमारे यहाँ ठाकुर, माँ और स्वामीजी से आर्थिक या बाह्य जीवन में हमारी उन्नति हो, यह तो हम लोग माँगते ही नहीं हैं। ठीक है ना?
प्रश्न : मथुर ने जब चाहा कि ठाकुरके नाम पर जमींदारी लिख दे या उनके नाम से इन्वेस्टमेंट कर दे, तब ठाकुर ने उसे भी मना कर दिया। वैसे देखा जाए तो मथुर की सलाह आर्थिक दृष्टि से बिल्कुल उचित थी, फिर भी ठाकुर ने उसे स्वीकार क्यों नहीं किया?
प्रश्न : ओबेसिटी और तमस, इन दोनों में संबंध है—यह आपने ठीक ही कहा। हमें भी अब अपने वेट के बारे में थोड़ा सावधान होना होगा।
प्रश्न : स्वामीजी ने अपने देह में बीमारी को भी आने दिया। साथ ही उनका लाइफस्टाइल भी काफी नॉन-ट्रेडिशनल था—वे बंगाली लोगों का पारंपरिक नॉन-वेज खाना खाते थे, सिगार स्मोक करते थे, और थोड़ा ओबेसिटी भी था। फिर जिस तरह उन्होंने शंकराचार्य आदि के इंटरप्रिटेशन को रिजेक्ट करके उपनिषदों को सीधे समझाने का प्रयास किया, उससे हमें लगता है कि स्वामीजी यह सिग्नल देना चाहते थे कि आध्यात्मिक जीवन के प्रति उनका एप्रोच काफी अलग था। क्या यह बात ठीक है?
साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 6 may 2026
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भक्ति मार्ग से ज्ञान मार्ग की सर्वोच्च उपलब्धि -- निर्विकल्प समाधि की प्राप्ति कैसे हो?
त्याग है दाल-रोटी-सब्जी, भाव है नमक
गहरे ध्यान में भावराज्य का अनुभव बना रहना और बाह्य जगत विलीन हो जाना—यही सविकल्प समाधि है
ईश्वर-दर्शन की निरंतर आकांक्षा से मन की वृत्तियाँ शांत होकर निर्विकल्प समाधि प्राप्त होती है
प्रश्न : भक्ति योग से निर्विकल्प समाधि का वर्णन यहाँ पे जैसे हुआ, वैसे ही कर्म योग से निर्विकल्प समाधि कैसे प्राप्त हो?
प्रश्न : भक्ति-शास्त्र और भक्ति-साधना दीन-हीन भाव से ही जुड़ी हुई है, ऐसा हमें लगता था। भक्ति के साथ उत्साह, आनंद और आत्मश्रद्धा भी जुड़ सकती है, यह बात हमें ठाकुर से ही पता चली। ठाकुर को हटा दें, तो भक्ति-शास्त्र में केवल दीन-हीन भाव ही रह जाएगा। भक्ति-शास्त्र - ठाकुर = दीन-हीन भाव
प्रश्न : भक्ति-शास्त्र की साधना है शरणागति और अहंकार का निर्मूलन। किंतु जो साधक, जो भक्त निरहंकारी और शरणागत है, वही आत्मश्रद्धा से युक्त कैसे हो सकता है? ये दो विरोधी भाव एक साथ कैसे रह सकते हैं? उसका खुद का सेल्फ आइडेंटिटी क्या होता होगा?
प्रश्न : Upanishads are a great mine of strength -- यह बात स्वामी विवेकानंद ने जो कही है, वह बिल्कुल यूनीक है। उपनिषदों के किसी अन्य भाष्य या टीका में हमको यह बात सुनने को नहीं मिलती।
साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 7 may 2026
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चार योगों के समन्वय से ज्ञान की प्राप्ति
भगवान के अवतार को साधना करने की क्या आवश्यकता है?
अवतार में दिव्य और मानवीय, दोनों भाव होते हैं। इसलिए साधना करते समय भी उनमें सिद्ध पुरुषों जैसी शक्तियाँ दिखाई देती हैं।
अवतारों के जीवन का श्रद्धापूर्वक चिंतन ही कल्याणकारी है
प्रश्न : आजकल साधुओं के आचरण पर इतनी कड़ी नज़र रखी जाती है। यह अच्छी बात है या बुरी?
प्रश्न : भगवान शिव तो स्वयं ईश्वर हैं, भोलानाथ हैं। मैं उनकी आराधना तो कर सकता हूँ, लेकिन उनकी तपस्या से प्रेरणा कैसे लूँ? उनके जैसी तपस्या मैं भला कैसे कर सकता हूँ? जबकि ठाकुर में हम ईश्वरभाव और मानवभाव, दोनों देखते हैं। इसलिए हम उनकी आराधना भी कर सकते हैं और उनकी साधना से प्रेरणा भी ले सकते हैं। ठाकुर को इष्ट के रूप में स्वीकार करने का यह एक बहुत बड़ा लाभ है।