मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णााय ते नमः श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा लिपिबद्ध श्री रामकृष्ण देव की प्रामाण्य जीवनी इसका हम पाठ कर रहे थे भाग दो साधक भाव उसका प्रथम अध्याय साधक और साधना इसका आखिरी पॉइंट जो है कि अवतार
अवतार में दिव्य और मानवीय, दोनों भाव होते हैं
पुरुष के भीतर में देव और मानव दोनों भावों का सम्मेलन होने की वजह से साधना करने के समय भी उनको सिद्ध की तरह देखने में आता है। इसीलिए देव और मानव दोनों भाव का समिश्रण करके उनके जीवन की आलोचना आवश्यक है। या तो फिर कहेंगे कि देव भाव से भी उनके जीवन की जीवन के प्रसंगों की आलोचना आवश्यक है। मानव भाव से भी उनके जीवन के प्रसंगों की आलोचना आवश्यक है। तो यह पॉइंट आखिरी हमने प्रारंभ किया था। उसमें हमने ऑलरेडी देख लिया कि ज्ञानी और भक्त दोनों तरह के जो साधक है वह निर्विकल्प समाधि तक पहुंच सकते हैं। वह पॉइंट हमारा ऑलरेडी डिस्कस हो चुका है। अवतार पुरुष में देव और मानव दोनों भावों का सम्मिलन है। वह हमेशा रहने की वजह से उनको कभी-कभी सिद्ध की तरह प्र सिद्ध की तरह प्रकाशमान होता उनका सिद्ध भाव दिखता है। साधन काल में भी ये दोनों भूमि में देवभूमि और मानव भूमि ह्यूमन प्लेन और डिवाइन प्लेन दोनों में उनका आना जाना चलता रहता है। दोनों में जैसे कि वह झोले खाते रहते हैं। मैं छोटा था तो हमारे गांव जाता था तो वहां पे वह सेकंड फ्लोर पे हमारा घर था। बाहर में एक बड़ा सा वरांडा जैसा था और वहां पे वो हिचका लगाया हुआ था। झोला जिसको कहते हैं। गुजरात में काफी घरों में आपको इस तरह का झोला देखने को मिल जाएगा। वो लकड़ी का था उसका वह बैठने वाला और वह मेटल की सलाखों से उसको टांग करके रखा था। तो हम लोग वहां पर बैठेंगे और फिर झोले खाते-खाते गप लगाएंगे। सब मेरी ही उम्र के वो कजिन थे मेरे कुछ उनके साथ में। सो दैट वाज़ अ वेरी ब्यूटीफुल मेमोरी। यहां पे सामने बड़ा बहुत ही खुला मैदान था और इस मैदान में आपको वैसे तो रेलवे स्टेशन था किंतु साथ में एक बहुत बड़ा मैदान भी था। तो आपको खुला यह हरियाली है, प्राकृतिक नजारा है, खुला आसमान है वगैरह आपको देखने को मिल जाता था। सूर्योदय होता था उस साइड से वो देखने को मिल जाता था। सो क्या है कि यह झोला खाना यानी कि झोले में तो आप समझ ही सकते हैं कभी ऐसा जाएंगे, कभी ऐसा आएंगे। सो वैसे ही यह कभी यह देवभूमि में, कभी मानव भूमि में। कभी यह डिवाइन प्लेन पे, कभी यह ह्यूमन प्लेन पे। इस तरह से माने ये जो डलिटी जो है अवतार के नेचर की इस इसके पीछे का राज क्या है तो वो शरद महाराज हमको समझाने का प्रयास कर रहे हैं। दो ऑप्शन हो सकते हैं। दो रीजन हो सकते हैं ये डवालिटी के ह्यूमैनिटी और डिविनिटी देवत्व और मनुष्यत्व यह दोनों एक ही साथ में किसी एक व्यक्ति के भीतर में हो उपस्थित इसके पीछे का यह एक सीक्रेट है या तो फिर इसके पीछे का यह एक मैकेनिज्म है कि ज्यादातर लोग आप देखेंगे कि वो बहुत माने माने बहुमंजली मकान है। माने मल्टी स्टोरी ये स्काई स्क्रेपर कहते हैं ना आजकल स्काई स्क्रेपर का अर्थ क्या है पता है? आकाश को आकाश में वो स्क्रेप करता है। आकाश को छूता है। इस तरह के जो बहुमंजली मकान अभी इंडिया में तो इतने नहीं है। बॉम्बे में शायद होंगे। अमेरिका में न्यूयॉर्क वगैरह जाएंगे तो आपको इतने लंबे-लंबे मकान दिखेंगे। तो स्काई स्क्रेपर कहते हैं उसको। तो स्काई स्क्रेपर में उठने आप वैसे तो लिफ्ट होती है किंतु मान लीजिए लिफ्ट नहीं है। आपको सीढ़ी चढ़ चढ़ के ही उठना है। तो हम कितना सीढ़ी चढ़ पाएंगे? ज्यादा से ज्यादा आठ मंजिला नौ मंजिला एट द मोस्ट हम चढ़ पाएंगे। उसके बाद में हम थक जाएंगे और उसके बाद नहीं चढ़ पाएंगे। क्यों? क्योंकि हम सीढ़ी चढ़कर के जा रहे हैं। जबकि अवतार के पास में लिफ्ट का एक्सेस होता है। अवतार लिफ्ट में बैठकर के वो बटन दबाएंगे। 100वीं मंजिल पर पहुंचा दो। सीधा रॉकेट की तरह वो लिफ्ट है। उनको 100वीं मंजिल पर ले जाएगी। और फिर कहेंगे कि ग्राउंड फ्लोर पे ले जाओ। तो जैसे ही 100वीं मंजिल पे ग्राउंड फ्लोर क्लिक किया फटाक करके ग्राउंड फ्लोर पे ले आएगी। वो लिफ्ट है बोलकर के जितना ऊपर जाना चाहे जा सकते हैं और जब भी इच्छा हो वो ग्राउंड लेवल पर आ सकते हैं। हमारा है कि सीढ़ी चढ़कर के जाना है तो ज्यादा से ज्यादा हम कितना सीढ़ी चढ़ पाएंगे? पांच मंजिला, फाइव फ्लोर, सिक्स फ्लोर, 10 फ्लोर, 15 फ्लोर एट द मोस्ट। जिस मकान में जिस स्काई स्क्रेपर में 100 फ्लोर हो, मुझे नहीं लगता कि अपने से इतना कैपेसिटी है। एटलीस्ट मेरे में तो नहीं है। मुझे नहीं लगता मैं फाइव फ्लोर या सिक्स फ्लोर से ऊपर उठ पाऊंगा। तो देखिए कि यह बिकॉज़ की अपनी फिजिकल कैपेसिटी इतनी ही है। जबकि लिफ्ट जो है उसमें कोई बंधन नहीं। तो यह आध्यात्मिक जीवन में भी जो एक आम आदमी होता है काम कांचन रूपी ग्रेविटी जो है उसको ऐसा जोर से टानती है कि जमीन से वह ज्यादा से ज्यादा पांच या छह फ्लोर उठ सकता है। जबकि यह अवतार पुरुष है। वह काम कांचन रूपी ग्रेविटी से मुक्त है। बोल करके लिफ्ट की भी जरूरत नहीं। वह जैसे ही उसने क्लिक किया तो ग्रेविटी एंटाई ग्रेविटी वो फील्ड एक्टिवेट हो गया। ग्रेविटी से मुक्त हो गया। सीधा हवा में उड़ने लगा। आजकल ये सुपरमैन वगैरह देखते हैं ना वो सुपर हीरो मूवीज उसमें वह कैसे हवा में उड़ते हैं। तो वैसे ही वह ग्रेविटी से मुक्त है। जब भी जहां पे भी जाए वो जाना चाहे वे जा सकते हैं। ये काम कांचन रूपी ग्रेविटी है जो कि एक आम आदमी को धरती पर बांध के रखती है। तो यहां पे भी यह तो एक शरद महाराज कहते हैं कि यह सीक्रेट क्या है? कभी उनमें देवत्व दिखता है, कभी उनमें मनुष्यत्व दिखता है। तो यह एक सीक्रेट है कि वह दोनों भूमि के भीतर में झोले खाते हैं। कभी यह टॉप फ्लोर पर उठेंगे स्काई स्क्रेपर के। कभी यह ग्राउंड फ्लोर पर आएंगे दया की वजह से हमको रास्ता दिखाने के लिए कि ग्रेविटी से मुक्त कैसे हुआ जाए? तो यह एक ऑप्शन है अथवा या तो फिर एक ऑप्शन यह है कि उनके भीतर का जो देव भाव है वह सहज स्वाभाविक है उनके भीतर में। इसीलिए यह देवभाव कभी-कभी यह जो मानव भाव रूपी जो आवरण है उसको भेद करके उसको चीर करके बाहर में प्रकाशित हो जाता है। आप देखा है बहुत बार आपने देखा होगा अह वो पॉकेट में मोबाइल रखा है किंतु आपको कोई कॉल करेगा तो स्क्रीन ऑन हो जाएगा। तो आपने कभी देखा होगा किसी के पॉकेट में मोबाइल है। एकाएक वो स्क्रीन ऑन हो गया है। आपको बाहर से दिखता है। भले ही चाहे पॉकेट मोबाइल पॉकेट में हो। स्क्रीन ऑन हुआ है। आपको बाहर से दिखता है। क्योंकि प्रकाश का गुणधर्म है। यह जो कपड़े जो है कपड़े कोई इस तरह से नहीं कि 100% प्रकाश को रोक पाए। कपड़े के अभी यह जो मेरा पॉकेट है पॉकेट में वैसे मैं मोबाइल रखूंगा तो आपको पता नहीं चलेगा। किंतु जैसे ही कॉल आने से स्क्रीन ऑन होगा आपको स्पष्ट दिखाई देगा कि यह पॉकेट में मोबाइल रखा है। यह प्रकाश का जो गुणधर्म है जो प्रकाश का जो किरण है कपड़ा इतना पतला है और इतना वो छिद्र है उसके भीतर में कि उसके भीतर में से प्रकाश सहज रूप से बाहर दिखाई देता है। तो वैसे ही यह आप समझ लीजिए कि हम लोग जो है वह पॉकेट में रखे हुए मोबाइल की तरह है। हम आम आदमी है। हमारा मोबाइल का स्क्रीन ऑफ है और यह अवतार पुरुष है। उनके मोबाइल का स्क्रीन परमानेंट ऑन रहता है। बोल करके यह हमेशा आपको दिखाई देगा कि भले ही चाहे पॉकेट के आवरण के भीतर में मोबाइल ढंका है किंतु फिर भी स्क्रीन ऑन है वो प्रकाश आपको पॉकेट के बाहर में भी दिखाई देता है। तो यहां पे भी शरद महाराज कहते हैं वैसे तो बाहर में मनुष्य का आवरण है। यह पंचमहाभूत का देह बनाया हुआ है। कल जैसे हमारा डिस्कशन चल रहा था। यह 14 पोया बेंगली वर्ड है। 3 हाथ का यह मनुष्य का देह है। इसके भीतर में क्या खेल और करामत जगन माता नहीं दिखाती है। तो वैसे ही यह छोटे से मनुष्य देह के भीतर में किंतु जब दिव्यत्व प्रगटित होता है तो यह देह को चीर करके वह बाहर में सबको दिखता है। ठाकुर के समाधि की अवस्था का जो वर्णन है आप देखेंगे कि उसमें सब समय लिखा है कि चेहरे पे जो दिव्य आनंद दिखाई दे रहा है अद्भुत दिव्य आनंद चेहरे पर दिखाई देता है तो यहां पे भी यह दो ऑप्शन शरद महाराज ने कहे या तो फिर अवतार है कभी यह देवभूमि में जाएंगे कभी मानव भूमि में आएंगे यह एक ऑप्शन है दूसरा ऑप्शन है कि भले ही चाहे चाहे मानव का देह धारण किया हो भीतर का दिव्यत्व वो देह को चीर करके देह रूपी आवरण का भेद करके वो दिव्य प्रकाश बाहर में दिखाई देता
अवतार की पूजा ही पर्याप्त है या उनके जैसा तप भी करना चाहिए?
है। महाराज कहते हैं कि मीमांसा जाई हो ना केनो अल्टीमेट सॉल्यूशन अल्टीमेट उत्तर जो भी हो ना क्यों किंतु इस तरह की घटना हमारे लिए अवतार पुरुष के जीवन को दुर्भेद्य और जटिलतामय कर देती है। एक और हम देखेंगे ठाकुर नाराज भी हो जाते हैं। कल ही हमने देखा हृदय पर नाराज हो जाते थे तो उसको ऐसी गाली देते थे कि वह गुंडा प्रकृति का हृदय वह भी थोड़ा सा लज्जित हो जाता था कि अरे मामा इस तरह की गाली क्यों दे रहे हैं और फिर और भी यदि एक्साइटेड हो जाते ठाकुर तो हाथ में जो कुछ भी आया झाड़ू आया जूता आया सीधा लेकर के हृदय को मारना शुरू करेंगे तो वह भी एक है कि नाराज भी हो जाते हैं डिप्रेस भी हो जाते हैं आज हम सोच कहते हैं जब मैं यह मेडिटेशन का क्लास लेता हूं तो लोगों को कहता हूं देखो आजकल तो लोगों को यह डिप्रेशन ये इंसोमिया नींद नहीं आना वगैरह वगैरह जो प्रॉब्लम है आप मेडिटेशन कीजिए सब दूर हो जाएंगे अच्छा ठीक है इंसोमनिया ठाकुर के जीवन में पूरा लाइफ लगा है कभी रात को सोते नहीं थे डिप्रेशन वगैरह की क्या बात करते हैं दो बार सुसाइड करने को गए हैं एक तो हृदय ने इतना उनको तकलीफ दिया था कि वो गंगा में झापंप लगाने को गए और एक बार शूल वेदना की ऐसा कुछ हो रहा था। माने पेट में दर्द हो रहा था। मैं एग्जैक्ट भूल गया तो गले में छुरी मारने को गए थे। एटलीस्ट दो इंस्टेंट इंस्टेंस हमको पता है कि ठाकुर का सुसाइडल आचरण रहा है। तो आप कहेंगे कि यहां पे इतनी बड़ी-बड़ी बातें जो मेडिटेशन के योग के वेदांत के टीचर है करते हैं। कंपेयर टू दैट आप ठाकुर के जीवन में ऐसा एक समरूप से एक शांति और आनंद का प्रवाह क्यों नहीं देखने को मिलता है? कभी एक्साइटेड हो जाएंगे, कभी रोना स्टार्ट कर देंगे, कभी संदेहवान हो जाएंगे। नरेंद्र ने जब कहा यह सब आपके मन का भ्रम है तो सीधा वह मां काली के गर्भ गृह में गए थे दौड़ते दौड़ते मां को कंप्लेन करने के लिए कि मां वो नरेंद्र ऐसा कहता है तो अभी ठाकुर का खुद का एक्सप्लेनेशन है कि सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त होने के बाद में मां ने उनको बालक भाव में रखा है। किंतु फिर क्या यह अल्टीमेट एम नहीं है स्पिरिचुअलिटी का कि यह जो अप एंड डाउन हो यह जो वैसिलेशन अपने मन का जो है ओवर एक्साइटमेंट ओवर डिप्रेशन यह सब से बचना क्या आध्यात्मिक जीवन का यह लक्ष्य नहीं है तो फिर अल्टीमेट लक्ष्य को प्राप्त करके आपके जीवन में वह सब कैसे बना रहा है अभी निर्विकल्प समाधि के बाद में भी यह सब बना रहा है दैट इज वन क्वेश्चन दूसरा है कि यदि ठाकुर अवतार है तो भी वह यह बना रहा है माने निर्विकल्प समाधि प्राप्त होना, अवतार होना यह डबल पावर डबल इंजन के साधना में सिद्धि प्राप्त करने के बावजूद ये ठाकुर के जीवन में इस तरह का क्यों है वेरिएशंस दिखते हैं? तो उसका उत्तर तो यही है अल्टीमेटली कि हमारे जीवन में काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह वगैरह जो है वो संस्कार की छाप छोड़ जाते हैं। जबकि ठाकुर का है वो नजीरे जन ठाकुर कहते हैं वहां साधना वगैरह जो है नजीरे जन माने वो सिर्फ दिखावे के लिए ऐसा नहीं कहेंगे किंतु क्या कहेंगे? अब जैसे मां ने राधु का विवाह करवाया। मां को शायद पता ही था कि राधु का विवाह करवाएंगे तो वह पागल होने ही वाली है। वैसे ही तो पागल की लड़की है। वैसे भी तो उसके भीतर में वह सब लक्षण दिखने शुरू हो गए थे। ऊपर में से विवाह करवाया है। मां कहती है उसको पति को लेकर के उसके मन में इतना आकर्षण है। मां बीमार थी तो मां को छोड़कर के वह चली गई थी अपने पति के घर। तो मां दुख करती है तो फिर वह योगेन मां कहती है कि हां मां आप भी तो ठाकुर को ठाकुर का ठाकुर के साथ में रहने के लिए जय राम बाटी छोड़ के दक्षिणेश्वर आ गई थी अपने पिताजी का घर छोड़कर के तो फिर मां कुछ नहीं बोलती है किंतु ऑफ कोर्स ठाकुर और मां का कहां दिव्य संबंध और कहां वो राधु और उसके पति का तो वो फिर वो जो गर्भवती हुई प्रेग्नेंट हुई फिर उसके बाद में जो सब उसमें मानसिक विकृतियां प्रारंभ हुई वो अफीम लेना ओपियम लेना देना शुरू कर दिया। फिर म दुनिया भर का झंझट उसके साथ में तो मां कहती है कि देखो मुझे पता था कि यह विवाह करके तो गड़बड़ होने ही वाली है। किंतु क्या करें? संस्कार है तो विवाह करवाया है। तो क्या है यह संस्कार की छाप हम जो आम आदमी जो भी करता है संस्कार की छाप छूटती है। फिर यह प्रारब्ध जो है फिर यह आगामी है। फिर यह संचित है। यह सब संस्कार फलते रहते हैं। तो अवतार पुरुष के जीवन में भले ही चाहे ऊपर में से इस तरह की तरंगे दिखती हो, कभी सुसाइड करने को जाते हैं, कभी गाली गलौज करते हैं, कभी मारपीट करते हैं, हाथ उठाते हैं, सब कर लेते हैं। किंतु फिर भी यह सब कर्मों का संस्कार नहीं बनता है। सो दैट इज एक थोड़ा सा डिस्कशन है इस सबके लिए। और फिर आगे क्या कहा? शरद महाराज ने यह जटिल रहस्य का जो कभी संपूर्ण भेद होगा यह हमको लग नहीं रहा है। अवतार का जीवन ही है इतना जटिल देवत्व और मनुष्यत्व इनका इतना डिलीशियस कॉम्बिनेशन कल हमने देखा था वो जो चॉकलेट आइसक्रीम सैंडविच आइसक्रीम सैंडविच इट्स अ कंप्लीटली न्यू थिंग मैंने पहली बार खाया पता ही नहीं था कि ऐसा कुछ है। वो बिस्किट है। चॉकलेट बिस्किट है जो कि हार्ड होता है, गर्म होता है और दो चॉकलेट के बिस्किट में आइसक्रीम का लेयर होता है जो कि सॉफ्ट है और ठंडा है। और किस तरह से एक नॉर्मल टेंपरेचर वाले बिस्किट टू बिस्किट के बीच में यह ठंडा आइसक्रीम का लेयर बिठाया है। आई डू नॉट नो। किंतु खाया तो बड़ा ही टेस्टी लगा था। तो एक क्रंची और गरम बीच में यह सॉफ्ट और ठंडा। सो सच ए डिलीशियस कंट्रास्ट। तो यह ठाकुर का भी जीवन आप देखिए कि यह जो मनुष्यत्व और देवत्व का एक डिलीशियस कंट्रास्ट एक हार्मोनी कंट्रास्ट भी कह सकते हैं हार्मोनी भी कह सकते हैं। वो उनके जीवन में था और यह जटिल रहस्य का जो संपूर्ण रूप से भेद होगा मुझे नहीं लगता है। वो शरद महाराज कहते हैं बोध हो ना। लगता नहीं है कि यह होगा। यह उसी तरह है। ठाकुर ने कहा ना कि ब्रह्म कभी झूठा नहीं हुआ। किस अर्थ में? कि ब्रह्म क्या है? मुंह से कभी बोला नहीं गया। बोलकर के मुंह से बोला नहीं गया। बोलकर के ब्रह्म झूठा नहीं हुआ। ज्यादा से ज्यादा इतना कह सकते हैं नेति नेति यह भी ब्रह्म नहीं। यह भी ब्रह्म नहीं, यह भी ब्रह्म नहीं। नेति नेति के अंत में जो आता है जो कि वाणी से भी व्यक्त नहीं हो सकता। नेति नेति भी जिसको व्यक्त करने में फिर वो छोटा पड़ जाता है। दैट इज ब्रह्मा। तो अवतार चरित्र के बारे में भी कि ये जटिल रहस्य ऐसा है कि मनुष्य बुद्धि से उसका कभी भी सॉल्यूशन नहीं आने वाला। आप आध्यात्मिक शिखर पे आरूढ़ होइए और फिर आपको जैसे नीचे का सब कुछ दिखाई देता है उस तरह से वो दिखाई देगा। मैं ट्रेनिंग सेंटर में था उस समय अ बेलर मठ में एक लाइब्रेरी है। शायद आपको पता होगा। अखंडानंद मेमोरियल जो है वहां पर एक बहुत बड़ा लाइब्रेरी है अपना साधुओं के लिए ही अभी ट्रेनिंग सेंटर का भी एक लाइब्रेरी है हमारा ब्रह्मचार्यों का और यह एक जनरल लाइब्रेरी भी है सभी साधुओं के लिए तो मैं कभी-कभी वहां पर जाकर बैठा रहता था क्योंकि वहां पे इतना शांति है लाइब्रेरी में आप जाकर बैठेंगे तो एक और सब लाइन है खिड़कियों की पूरी लाइन है और बाहर में पूरा बहुत ही सुंदर गार्डन है अभी वो अभेदानंद कन्वेंशनल कन्वेंशन हॉल बन गया है। किंतु उस समय एकदम खुला वो बागान था और उस नेक्स्ट था सीधा वो मेन रोड जो भीतर में आने का और मिशन ऑफिस तो बहुत ही सुंदर लंबा एक चौड़ा बागान है और इस साइड जो है दूसरी साइड में वो साधु निवास है। वहां पर कोई जाता आता नहीं। पूरा शांति बना रहता है। और कमरा सुंदर है। किताबें सब बड़े ही सुंदर रूप से सजा के रखी है। तो मैं बहुत लंबा टाइम वहां पे कुर्सी पर बैठे-बैठे वो जो डेस्क पर बैठे-बैठे किताबें पढ़ने में बिताता था। तो वहां पे एक किताब थी धम्म पद। धम्म पद तो पता ही होगा शायद। जिस तरह से हम हिंदुओं के लिए गीता है तो बुद्धिज्म में भगवान बुद्ध के उपदेशों का संकलन धम्म पद है। धम्म अर्थात कि धर्म पद अर्थात कि एक तरह का श्लोक तो धम्म पद धर्म के श्लोक ये जो किताब है वो बुद्धिज्म का बड़ा ही फाउंडेशनल बुक है। अभी ये जो वर्जन था धम्मपद का वहां पर मुझे मिल गया एक दिन मैं एक्सप्लोर करतेकरते तो इतनी बड़ी किताब इतनी बड़ी किताब और उसमें क्या था प्रत्येक पेज पर एक श्लोक लिखा है एक पद लिखा है प्रत्येक पद के लिए एक-एक पेज था शायद सभी पद नहीं होंगे उसके भीतर में जो भी मुझे एग्जैक्ट याद नहीं किंतु इतना बड़ा किताब इतने बड़े पेज के ऊपर में एक वो पद लिखा है और फिर इतना ब्यूटी उसका थोड़ा सा एक्सप्लेनेशन दिया है ट्रांसलेशन और एक्सप्लेनेशन और फिर इतना सुंदर पेंटिंग है उस पद को इलस्ट्रेट करने के लिए तो अभी क्या है धम्म पद जो है बेसिकली वैराग्य भाव की किताब है उसमें जगत के जितने भी प्रलोभन है उसको छोड़कर के आप जब अंतर्मुखी होंगे निर्वाण की निर्वाण प्राप्ति के लिए प्रयास प्रारंभ करेंगे, साधना प्रारंभ करेंगे, धर्म के मार्ग पर बढ़ना आरंभ करेंगे तो वैसे ही यह जो जगत जो है, जगत के प्रलोभन है, कामना वासनाएं हैं, लालसाएं [गला साफ़ करने की आवाज़] हैं। वो आपको छोटी दिखने लगेगी। तो वो उसका बेसिक थीम है। तो बहुत सारे पद ऐसे ही है। बहुत सारे श्लोक ऐसे ही है। तो पता है उसको इलस्ट्रेट कैसे करते हैं? एक छोटा सा पहाड़ जैसा है। पहाड़ के नीचे में चारों पहाड़ को घेर करके लोग नृत्य कर रहे हैं। कीर्तन कर रहे हैं। आमोद आह्लाद कर रहे हैं। जैसे कि एक मेला होता है ना मेले में वो एक टिपिकल मेले की तरह खाने पीने की चीजें हैं। सुंदर युवतियां है। वो कहीं वो नृत्य कीर्तन चल रहा है। कहीं बैंड बाजा बज रहा है। वो पूरे वो जो पहाड़ के नीचे में ग्राउंड पे यह सब चल रहा है। और फिर वो जो भिकु है बौद्ध साधु उसको भिकु कहते हैं। पहाड़ की टोच पर बैठा है और वो ध्यान में मग्न है। चेहरा ऐसा आनंदमय कि नीचे में जो इतना प्रलोभन पूर्ण जो सब चल रहा है प्रपंच उससे उसका मन कहां उर्ध्वय विचरण कर रहा है। तो माने ये चित्र देखकर के ही मेरे मन में ना एक तरह का एक इंस्पिरेशन प्रकट होता था। जिसने भी वह चित्र बनाए होंगे मैं किताब भूल गया अभी वह कौन सी के इस बार जब मैं गया था वोटर आईडी के लिए लास्ट मंथ तो मैंने उस किताब को खोजने का प्रयास किया मिला नहीं अब सीरियस प्रयास भी नहीं किया था क्योंकि समय कम था किंतु जो एक एक बार तो लाइब्रेरी में गया मैंने कहा लाइब्रेरी में तो जाना ही है जितने भी मेरे पुराने-पुराने अड्डे हैं वहां पे सब एक राउंड लगा देना है तो यूनिवर्सिटी गया था वहां पे वो कैंटीन है वहां वहां पर बैठ के मैं कॉफी पिया करता था। यहां पे शारदा पीठ है। तो वहां पर मेरे कुछ बैचमेट है। फिर यह वेद विद्यालय है। फिर वहां पे तोतापुरी है। फिर यह नीलांबर गार्डन है। जहां पे मां रहती थी। पंचतपा किया था मां ने। और फिर यह जो गंगा के किनारे जो अपने समाधि मंदिरों की हारमाला जो है तो सब मैंने एकदम घूमघूम करके देख लिया था। आरोग्य भवन है। पूरा वो बेलूरमठ कैंपस जो है बेलूरमठ शारदा पीठ यूनिवर्सिटी कैंपस पूरा मैंने देख लिया था। सो लाइब्रेरी में भी गया और यह किताब खोजने का प्रयास किया क्योंकि मुझे याद है कि वह चित्र देखकर के मैंने काफी समय बिताया है और इतने इंस्पायरिंग पिक्चर्स है सब इस तरह के हैं कि किस तरह से यह जगत रूपी प्रपंच चल रहा है। जगत रूपी हास्य और विनोद का यह मेला चल रहा है। जहां पर लोग उन्मत्त होकर के विषयों के भोग कर रहे हैं। और कहां यह उर्ध्व एक भिक्षु विराजमान है। जैसे कि निर्वाण प्राप्ति के निर्वाण के आनंद में डूबा हुआ है। चेहरा जो है एकदम शांत और वह प्रशांत हो करके है उसका चेहरा। माने इस तरह के विभिन्न विभिन्न चित्र माने थीम तो एक ही है अल्टीमेटली धम्म पद में। किंतु इस एक थीम को आप कितने विभिन्न तरह से आप प्रोजेक्ट कर सकते हैं। विच इज रियली यूनिक। या तो फिर यह जो आर्टिस्ट है वो सही में उसको भी कुछ निर्वाण का एक स्वाद मिला होगा। या तो फिर कह सकते हैं ये जो बुद्धिस्ट इमेजरी जो है तिबेट में जाइए साउथ ईस्ट एशिया में जाइए बुद्धिस्ट मंदिर है गुफाएं हैं बुद्धिस्ट आर्ट है सब जगह पे आपको एक तरह का यह निर्वाण है वैराग्य है त्याग है शांति है परमानंद है यह जगत प्रपंच का त्याग करना यह सिर्फ थीम जो है आपको बुनी हुई दिखेगी सब जगह पे तो जो यह आर्टिस्ट िस्ट है रियली ही हैज़ टू बी अ जीनियस कि यह जो 2000 साल की यह जो आर्टिस्टिक डेवलपमेंट है बुद्धिज्म की ढाई हजार साल की उसको जैसे कि निचोड़ बना करके इस किताब में रखा है। रियली ब्यूटीफुल बुक। तो यहां पे भी देखिए कि यह जो रहस्य जो है यह रहस्य कि सही में अवतार के जीवन में क्या चल रहा है भीतर में इसका भेद हम तभी कर पाएंगे जब हम भी वह भिक्षु की तरह वो पहाड़ के शीर्ष पे कैलाश पर्वत पे अभी कैलाश और शिव तो अपने हैं बुद्धिज्म के नहीं किंतु फिर भी अभी ये अपना ये थीम चल रहा है ना क्रॉस वायर का तो क्रॉस वायर करके कर रहे हैं कि कैलाश पे भगवान शिव विराजमान है। नीचे में गंगा का जो प्लेन है वहां पे यह मेला चल रहा है। और फिर भगवान शिव जैसे परम आनंद में परम शांति में महा ध्यान में निमग्न होकर के वो निर्वाण शांति निर्वाण के भीतर में डूबे हुए हैं। तो अंटिल एंड अनलेस हम उस लेवल पर नहीं पहुंचेंगे। तब तक ये अवतार के भीतर में क्या चल रहा है हमको समझ में नहीं आएगा। किंतु शरद महाराज कहते हैं श्रद्धा संपन्न होकर के उसका अनुशीलन करने से मनुष्य का अशेष कल्याण साधित होता है। यह ध्रुव सत्य है। प्राचीन पौराणिक युग में अवतार चरित्र का मानव भाव ढक करके सिर्फ देव भाव की ही आलोचना हुई थी। और आज के संदेहशील वर्तमान युग में इस चरित्र का देव भाव उपेक्षित करके मानव भाव की ही आलोचना चल रही है। तो इसका भी काफी हमने डिस्कशन किया था। देव भाव की आलोचना उस युग में आवश्यक थी क्योंकि उस युग का लक्ष्य था निर्वाण प्राप्ति ब्रह्म साक्षात्कार आत्मदर्शन। तो आत्मानुभूति ईश्वर दर्शन यदि यह उद्देश्य है तो अवतार ने क्या सही किया क्या गलत किया वह सब छोड़ दीजिए अवतार के कहे हुए जो अवतार के जो पद चिन्ह है पद चिन्ह पे हमको चलना है अपने जीवन को उसके ऊपर में ढालना है तो वो एक था अभी किंतु जो वर्तमान जो संदेहशील जो युग है उसमें हम लोग अवतार कहां पे क्या गड़बड़ करते हैं वह पकड़ने में हम लोग बड़े ही एक माहिर हैं। योगानंद जैसे योगानंद उनको संदेह हो गया था कि ठाकुर आधी रात को कहां जाते हैं। और यह संदेह होना गलत भी नहीं है क्योंकि ये जो फ्रॉड लोग जो है इनका इतना एक बड़ा दल है थोड़ा सा भी आप अपने विजिलेंस को कम करेंगे। आपको लूटने के लिए, आपको आपसे यह पैसा छीन लेने के लिए यह जो ऑनलाइन फ्रॉड चलते हैं ना ऐसा वो धर्म में भी फ्रॉड चलते ही है। अनफॉर्चूनेटली आए दिन पेपर में देखते हैं। अभी यह जो महाराष्ट्र का एक चला था। सो इट्स अ वेरी अनफॉर्चूनेट कि लोग तो मूर्ख की तरह या तो भोलेभाले होकर के और यू नो दिस इज वेरी सरप्राइजिंग। मैं जितने भी लोगों को साधु होकर के मैं मिला हूं आश्रम में आए हुए अभी आप इमेजिन तो कर ही सकते हैं कि आश्रम में रामकृष्ण मिशन के आश्रम में आते हैं। श्रद्धा भक्ति से प्रेरित होकर के बहुत सारे दीक्षित भक्त हैं। बहुत सारे माने लंबे समय से वो ठाकुर के भक्त हैं। कभी-कभी तो जनरेशनल ये होता है। मां-पिताजी भी भक्त थे। अभी बच्चे हैं। उस समय बच्चे थे तो आते थे। मां पिताजी के साथ में अभी वह बड़े हो गए हैं। उनके भी बच्चे हैं। उनके बच्चों को लेकर के आते हैं। यानी टू थ्री जनरेशन से वो हमारे साथ में जुड़े हुए हैं। बंगाल में जाएंगे तो ठाकुर के समय की जो जनरेशन से जो जुड़े हैं परिवार वो आज भी उनकी सेकंड, थर्ड, फोर्थ, फिफ्थ जो भी जनरेशन चल रही है ठाकुर के भक्त हैं। तो इतने सारे भक्तों को मैंने देखा है। मैंने एक भी ऐसा मूर्ख भक्त नहीं देखा कि कोई साधु जो कुछ कहे आंख बंद करके वह विश्वास कर ले। उनके मन में यह हायरार्की एकदम फिट बैठी हुई है। रामकृष्ण संघ के भक्तों के मन में कि किसका क्या स्टेटस है? कौन एक आम आदमी है? आम आदमी अर्थात कि यह कॉमन साधु है और कौन है यह हेड ऑफ द सेंटर है जिनको कि हम सेक्रेटरी प्रेसिडेंट महंत कहते हैं और फिर कौन हेड क्वार्टर लेवल पे जिनका पावर है जो कि हमारे ट्रस्टी होते हैं जो कि हमारे असिस्टेंट जनरल सेक्रेटरी होते हैं जनरल सेक्रेटरी होते हैं और फिर कौन गुरु के लेवल पे है वाइस प्रेसिडेंट रिवर्ड वाइस प्रेसिडेंट मोस्ट रिवर्ड प्रेसिडेंट तो ये हायरार्की जो है अपने भक्तों के मन में एकदम पक्का बैठा है यदि आपको कंट्राडिक्ट री सिग्नल मिले तो यह जो आम एक कॉमन साधु है उसको हमेशा आप सेफली इग्नोर कर सकते हैं। जो हेड ऑफ द सेंटर कहेगा उसको आपको लेना है। यदि आपको ट्रस्टी लेवल से कोई सिग्नल मिले तो आप हेड ऑफ सेंटर को ईजीली इग्नोर कर सकते हैं। यदि आपको गुरु से कोई बात सुनने को मिले। तो इवन आप हेड क्वार्टर लेवल को भी आप इजीली इग्नोर कर सकते हैं। दैट कहेंगे कि प्रैक्टिकल जो एक है सेंस म है वेरी क्लियर। मैंने इस तरह का क्लियर सेंस ना हो इस तरह के भक्त बहुत कम देखे हैं। ऐसे ही होंगे जो कि एकदम रिसेंटली आना शुरू किए और वे लोग भी विद इन अ वीक वन मंथ वो समझ में आ जाता है। हायरार्की कहां पे है क्या है। कॉमन साधु जो है लेयर उसमें भी कौन किसका प्रोग्रेस होने वाला है? किसका नहीं होने वाला, किसका फ्यूचर ब्राइट है, किसका नहीं है, एकदम क्लियर लोगों को पता चल जाता है विद इन अ फ्यू डेज इटसेल्फ। और वह अपना बिहेवियर इजीली मॉडिफाई भी कर देते हैं। और ये वो लोग हैं जो कि ठाकुर के बड़े ही माने पक्के डिवोटी है। इन अभी यह मैं देखता हूं और फिर मैं जब यह न्यूज़पेपर में पढ़ता हूं कि कहीं एक दो नंबरी आदमी वह कहता है मैं ज्योतिष हूं। मुझे ज्योतिष अच्छा आता है ना कि यह कुछ मुझे अच्छा आता है। मैं आपका भविष्य ऐसा कुछ-कुछ करके लोगों को जो पटा करके लाखों करोड़ों उनसे निकाल लेता है। लाखों लोगों को मूर्ख बना लेता है। हाउ इज दिस इवन पॉसिबल माने यहां पे आकर के जो डिवोटी अल्ट्रा रैशन दिखाई देते हैं वो वहां अभी नॉट नेसेसरी कि अपने ही डिवोटी वहां जाते हैं। मैं कह ऐसा दिस इज़ एंटायरली पॉसिबल कि रामकृष्ण मिशन का एक जो रैशनलिस्टिक एप्रोच है धर्म के प्रति उसकी वजह से एक रैशनलिस्टिक टाइप के जो पर्सनालिटी है वही यहां पे आकर्षित होते हैं और वो वहां पे जो एक है कि लोगों को क्या कहेंगे कि मूर्ख बना करके तो नहीं लोगों को प्रलोभन देकर के शॉर्टकट करवा लेना यह जो उनका जो अप्रोच है तो वहां पर ऐसे ही लोग जाते होंगे। आई डू नॉट नो कि उस तरह के लोग भी तो अल्टर रशनलिस्ट होंगे ना वरना तो पैसे कहां से आएंगे? जगत तो बड़ा क्रूल है। आप भोलेभाले होंगे तो जगत में पैसा कमाने का आपके पास में कोई साधन नहीं। तो दुनियादारी तो आपके भीतर में होनी ही चाहिए। तो एक और आपके भीतर में प्रचंड दुनियादारी है। कौन कहां पे क्या है? क्या हायरार्की है? क्या किसका कितनाेंस है? किसका कितना वैल्यू है? एकदम स्पष्ट रूप से आपको दिखता है। दूसरी ही ओर इस तरह के जो जादूगर है उनकी मायाजाल में आप फंस जाते हैं। इतना इजीली फंस जाते हैं। हाउ इज दिस इवन पॉसिबल? वी डू नॉट नो ये संदेह जो है संदेह दोनों तरह से है। एक अल्ट्रशनलिस्ट व्यक्ति ये नरेंद्र का संदेह था। नरन वाज़ अल्टरनालिस्ट। किंतु एट द सेम टाइम वो जो इंक्वायरी जो है उसके लॉजिकल कंक्लूजन तक जाने की क्षमता थी। और फिर यह जो दो होते हैं कि अल्ट्रा रैशनलिस्ट है किंतु फिर यह इंक्वायरी का लॉजिकल कंक्लूजन तक पहुंचने की उनकी क्षमता नहीं होती और यह रैशनलिज्म को एक कल्ट बना करके रख देते हैं। जैसे यह एक ये एक कल्ट है तांत्रिक लोगों का। यह एक कल्ट है जादूगर लोगों का कल्ट अर्थात समझते हैं ना एक एकदम सीक्रेट सोसाइटी जैसा। लोगों को मूर्ख बनाने की वहां पर सब गतिविधियां चलती रहती है। वो जो ठाकुर ने कहा ना कि वो कहानी कहते हैं एक एक आदमी वो सोना के सोने के गहना बनाने वाले की दुकान में गया तो वे लोग क्या बोलते हैं तो केशव केशव तो हर हर गोपाल गोपाल हर हर तो इस तरह से वो जो गहने बनाने वाले जैसे ही कोई नया कस्टमर जाता है तो इस तरह से चिल्लाते हैं। एक चिल्लाता है केशव केशव दूसरा चिल्लाता है गोपाल गोपाल तीसरा चिल्लाता है हर हर चौथा चिल्लाता है हरी हरि तो वह जो कस्टमर है वो बड़ा ही खुश हो जाता है यहां पे तो सब भक्ति की बहार लगी हुई है यहां पे ही सोने के गहने बनाते हैं किंतु ये जो दुकान वाले हैं उनका क्या आशय है केशव केशव अर्थात कि बेंगोली में केशव कौन है यह कौन है यह तो फिर उत्तर मिलता है गोपाल गोपाल कि यह जो गोपाल अर्थात कि भोलेभाले हरि के पाल है तो फिर यह भोलेभाले कस्टमर है उनको क्या करना है हर हर उनका जो सोना है वो हर लेना है तीसरा चौथा कहता है हरी हरी हां हर लो हर लो सोना हर लो इनका तो क्या है कि धर्म का स्वांग दिखा के लोगों की धन संपत्ति हड़प करना वो तो ठाकुर ने भी इतना स्पष्ट रूप से हमको बताया है अनादि काल से चलता आ रहा है। सो हाउ इज दिस पॉसिबल कि एक और दुनियादारी पूरी भरी हुई है। रैशनलिज्म है और जहां पे एक अच्छा धर्म वेदांत के बेस पे जो धर्म है वहां पे आकर के तो बढ़िया सा रैशनलिटी और बढ़िया सा वो आप दिखा के जाते हैं। किंतु जैसे ही एक जादूगर मिलता है सीधा उसके चंगुल में फंस जाते हैं। ये रिसेंटली पता है ना ये क्या हुआ? सच अ इंटरेस्टिंग घटना ये जो जो डोकिन बोलकर के एक है रिचार्ड डोकिन ना कि क्या वो अथेष्ट है डॉकिंस उसका नाम है अथेष्ट व्यक्ति है काफी पॉपुलर है विदेश में आप जाएंगे तो वो क्या है कि अथेज़्म के ऊपर में किताब लिखता रहता है भगवान है ही नहीं इस तरह से वह बातें करता रहता है और काफी पॉपुलर है जब भी धर्म और धर्म और माने थीज्म और अथिज्म अर्थात कि जो जो लोग धर्म को फॉलो करते हैं और जो लोग धर्म को रिजेक्ट करते हैं। इन लोगों में जब ये डिबेट होता है तो ये डॉकिंस को हमेशा बुलाया जाता है। ही इज़ सच एन अथस्टिक पर्सन और उसके पास में जो लॉजिकल आर्गुमेंट है तो लोग उससे काफी प्रभावित भी हो जाते हैं। उसको सुनकर के काफी लोग अथेष्ट हो भी गए हैं कि धर्म का पथ छोड़कर के अधर्म तो नहीं कहेंगे। कहेंगे धर्महीनता के पथ पे चले गए हैं। तो यही ये डॉकिंस जो है रिसेंटली उसने यह जो क्लाउड का एआई मॉडल है यूज़ किया और फिर क्या कहता है पता है ये मॉडल जो है कॉन्शियस हो गया है। उसके भीतर में उसका खुद का इंटेलिजेंस है और मैं मेरे साथ में इतना इंटेलिजेंटली बातें करता है कि वो मनुष्य की तरह कॉन्शियस हो गया है। मैंने कहा हाय रे देखिए क्या परिस्थिति है। यदि आप भगवान में विश्वास नहीं करेंगे तो आपको भूत में विश्वास करना है। इस ये हमेशा से मैं कहता रहता हूं। मेरे पहले भी आपको यदि याद होगा मैंने काफी बार कहा है जो आदमी भगवान पे विश्वास नहीं करता उसको भूत पे तो विश्वास करना ही है। यदि एक रैशनलिस्टिक एक प्रॉपर वेदांतिक रिलीजन को वो नहीं एक्सेप्ट करेगा तो जितना भी दोरा धागा यह अंगूठी फंगूठी विधि विधान जितना मैं नौटंकी नहीं कहूंगा क्योंकि अल्टीमेटली देखिए ठाकुर भी बहुत कुछ विश्वास करते थे यदि इसके जो प्रैक्टिशनर है उन लोगों में यदि थोड़ा सा भी सत्व है तो वह भी एक मार्ग है किंतु क्या है 99% जो प्रैक्टिशनर होते हैं वह सब वगैरह वगैरह के वे लोग फ्रॉड के अलावा कुछ नहीं होते। व्हिच इज अ वेरी अनफॉर्चूनेट। तो क्या है आप एक रैशनलिस्टिक वेदांत भक्ति मार्ग पे आप विश्वास नहीं करेंगे तो अल्टीमेटली आपको यह जितना भी धतिंग है दुनिया में उस सब में आपको फंसना है। और यह जो डॉकिंस जो है एक तो एकदम गोल्डन एग्जांपल है। इतने दिनों से ये अथेज़्म अथेज़्म भगवान है ही नहीं। भगवान है ही नहीं। चिल्ला चिल्ला करके घूमता था। जितनी भी टॉप लेवल कॉन्फ्रेंस है सब में जाकर के वो कहता था वो जो अथेज़्म का पक्ष लेकर के जो ईश्वर के जो ये है पक्ष वाले उनका विरोध करता था। आखिर में यही आदमी यह कहकर खड़ा रह गया कि यह जो एआई है इट इज कॉन्शियस। अरे भाई इट्स जस्ट एन एलएलए। नेक्स्ट वर्ड प्रेडिक्ट करने का एक ट्रांसफार्मर मात्र है जिसको कि म लाखों लाखों किताबें लाखों लाखों करोड़ों-करोड़ों वर्ड्स फीड किए गए हैं। तो उसकी मैसिव कॉन्टेक्स्ट मेमोरी के भीतर में से कॉन्टेक्स्ट विंडो में से ये ये सब कुछ निकालता है। दैट इज दैट इससे ज्यादा उसमें कुछ नहीं है। ये कैलकुलेटर को भी देखिए आप वो माने 1 * 500 बड़ा फिगर है। माने वन अह 128 * 368 यह करने को बोलिए। जैसे ही एंटर करेंगे 1 सेकंड में उसका उत्तर देगा। ये क्या प्रत्येक मल्टीप्लिकेशन का उत्तर क्या कैलकुलेटर में फिड करके रखा है? नहीं। एक लॉजिक एल्गोरिदम बना के रखा है। उस एल्गोरिदम के आधार पे कैलकुलेटर आपको उत्तर देता है। तो आप यह कहेंगे क्या कि बिकॉज़ कि प्रत्येक कैलकुलेशन का, प्रत्येक मल्टीप्लिकेशन का, प्रत्येक डिवीजन का, प्रत्येक सब्सट्रैक्शन का, प्रत्येक एडिशन का उत्तर उसमें फीड करके रखा हो तो समझ में आए। किंतु प्रत्येक जो कैलकुलेशन है उसका उत्तर फीड करके नहीं रखा। एल्गोरिदम बनाया है जो कि छोटा ही होता है। माने इजीली वो आप उसको छोटे से कैलकुलेटर में फिट कर सकते हैं। तो आप ऐसा कहेंगे कि कैलकुलेटर इज़ कॉन्शियस। नहीं कहेंगे। तो एआई इज़ नथिंग बट अ सुपर स्मार्ट कैलकुलेटर। एआई एल्गोरिदम जो है ट्रांसफार्मर टेक्नोलॉजी है इट्स नथिंग बट अ न्यूरल नेटवर्क बेस्ड एल्गोरिदम और फिर मासिव डाटा फीडिंग इसके भीतर में हुआ है इट में मिमिक कॉन्शियसनेस बट इट इज नॉट कॉन्शियस ये जो सामान्य व्यक्ति को भी जो बात समझ में आती है वो अथेज़्म अथेज़्म करके सॉन्ग एंड डांस करने वाले नाच कूद करने वाले यह आदमी अभी कहीं जाके यह कह के खड़ा हो गया है कि एआई आई इज कॉन्शियस। तो देखिए कि एक एक्सट्रीम अथेज्म, एक्सट्रीम रैशनलिटी, एक्सट्रीम संदेह अल्टीमेटली आपको यह जितने भी धुतारे हैं उनके पल्ले में जाकर के डालेगा। सो एनीवे यह आज का जीवन है। एक युग था जबकि सिर्फ देवभाव देखते थे। अभी एक युग है कि सिर्फ मानव भाव मानव रूप में देख के उनके चरित्र की जितनी भी कमजोरी है उसको एक्सपोज करने में लगाते हैं। सो दैट इज दैट अभी जो आखिरी पैराग्राफ बचा है इस पॉइंट का उसको हम पढ़ लेते हैं। इसके बाद में नेक्स्ट चैप्टर स्टार्ट होगा द्वितीय अध्याय स्टार्ट होगा अवतार जीवन में साधक भाव। तो फर्स्ट चैप्टर का लास्ट पॉइंट का लास्ट पैरा वर्तमान खेत्रे हमरा ओई चरित्र आलोचना उहाते तदु भय भाव जे एकत्र एक काले विद्यमान थाके ए कथाई पाठक के बुझाईते प्रयास करबो वर्तमान क्षेत्र में हम इस चरित्र की आलोचना करतेकरते यह दोनों भाव मानव भाव और देव भाव एकत्र होकर के एक ही समय में विद्यमान रहते हैं। इस यह बात हम पाठक को समझाने का प्रयास करेंगे। एक ही समय देव भी है और मनुष्य भी है। ऐसा नहीं कि सुबह को देव भाव है तो रात को फिर मनुष्य भाव है या तो फिर दोपहर को मनुष्य भाव है तो शाम को देव भाव है। ऐसा नहीं। देव भाव और मानव भाव दोनों साइमलटेनियसली इन अ सिंगल बॉडी वो वर्तमान है और किस तरह से है यह बात अभी हम पाठक को समझाने का प्रयास करेंगे बोला बाहुल्यो कहने की जरूरत नहीं है देव मानव ठाकुर पुण्य दर्शन जीवने ना घोटले अवतार चरित्र ओही रूपे देखी ते आमरा कोखनो ही समर्थ होतामना कहने की जरूरत नहीं है कि देव मानव ठाकुर का पुण्य दर्शन यदि इस जीवन में ना मिलता तो अवतार चरित्र को इस रूप से देखने में हम लोग कभी भी समर्थ ना होते। अ शरद महाराज कहते हैं कि यदि हमारा यह सद्भाग्य ना होता कि ठाकुर का दर्शन करने का एक पुण्य प्राप्त हुआ तो फिर हम अवतार चरित्र के भीतर में इतना कॉम्प्लेक्सिटी है। इतना ये जो नंस है रिचनेस है यह हम समझ ही नहीं पाते। पौराणिक कहानियों में उनका देवभाव जादू चमत्कार सुदर्शन चक्र जैसे ही एक बार छोड़ा इतने राक्षसों का वध कर दिया। भगवान राम ने ब्रह्मास्त्र जैसे ही उठाया सामने जो आया सब खत्म। यह जो चंडी है, दुर्गा है, इनके जो अस्त्र-शस्त्र से पूरे के पूरे रण मैदान वो राक्षसों के खून से वो तर-बतर कर देते थे। यह सब कहानियां हम पढ़ते हैं तो यही लगता है कि वो ईश्वर हो ना कि यह अवतार हो। राम या कृष्ण रूपी अवतार या तो शिव और विष्णु रूपी ईश्वर। इनकी शक्तियां समान ही है और आइडेंटिकल ही है। बस वही है कि वे लोग स्वर्ग में रहकर अपना कार्य करते हैं और यह लोग पृथ्वी पर अपना कार्य करने को आए हैं। यही एक डिफरेंस है और कोई डिफरेंस नहीं। यही हमको लगता यदि हमने ठाकुर का दर्शन ना किया होता तो बिकॉज़ कि हमने ठाकुर को 24 * 7 दिन में देखा है, रात को देखा है। ठाकुर ने कहा ना योगेंद्र महाराज को साधु के दिन देख साधु के रातें देखवी। तब साधु कथा विश्वास करवी साधु को दिन में देखना साधु को रात में देखना तब साधु की बात पर विश्वास करना तो वैसे ही शरद महाराज या तो फिर शशि महाराज काली महाराज स्वामी जी राजा महाराज इन सभी ने ठाकुर को दिन में भी देखा है रात को भी देखा है अत्यंत बीमार जब्त थे जब मनुष्य की यह जो सहनशक्ति की हद क्रॉस हो जाती है जब मनुष्य का यह जो रैशनलिस्टिक ये जो एक आवरण जो होता है लॉजिकल आवरण वह चला जाता है मनुष्य या तो बालकवत हो जाता है पीड़ा सहन करतेकरते या तो फिर पिशाचवत हो जाता है पीड़ा सहन करते-करते इतनी पीड़ा सहन करते हुए उन्होंने ठाकुर को देखा है एट द सेम टाइम जो भी अवस्था है उनके भीतर में यह मनुष्य भाव और देवभाव का अद्भुत समिशण सब समय देखने को मिलता है। तो यदि इस तरह के ठाकुर का उन्होंने दर्शन ना किया होता तो यह भाव का अद्भुत संगम जो होता है अवतार जीवन में यह बात हमको कभी भी समझ ना आई होती यह कहने की जरूरत नहीं है। बोला बाहुल्य तो इसके साथ में प्रथम जो चैप्टर है साधक और साधना इसका अंत आता है साधक भाव द्वितीय खंड जो है लीला प्रसंग का साधक भाव इसका यह जो द्वितीय अध्याय जो है अवतार जीवन में साधक भाव वह अभी हम लीला प्रसंग के नेक्स्ट क्लास से प्रारंभ करेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ओम