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Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 30 Dec 2025

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा रचित द्वितीय भाग साधक भाव उसका प्रथम चैप्टर साधक ओस इसका हम पाठ कर रहे थे जो हमारा पॉइंट चल रहा था नेति नेति और इति इति साधन पथ तो

ईश्वर प्राप्ति के मार्ग : भक्ति पथ और ज्ञान पथ

ऑलरेडी शरद महाराज ने हमको बताया कि दो तरह के साधन पथ भारत में प्रख्यात थे। एक तो है कि ज्ञान मार्ग। ज्ञान मार्ग में साधक यह सोचता है कि यह पूरा जो जगत है यह माया के आवरण से ढका है। ब्रह्मन के ऊपर में माया का आवरण है। अध्यारोप हुआ है। बोलकर के यह जगत हमको दिख रहा है। जिस क्षण यह अपवाद अध्यारोप और अपवाद अद्वैत वेदांत में जो दो टर्मिनोलॉजी है जब माया का आवरण ब्राह्मण के ऊपर में होता है तो अध्यारोप होता है। जगत दिखता है और माया का आवरण हट जाएगा। अपवाद जब होगा तब जगत अदृश्य हो जाएगा। दक्षिण दक्षिणेश्वर में एक साधक आया था। तो उसके हाथ में वो कैलडोस्कोप था। तो कैलडोस्कोप पता है ना उसमें देखने से आपको सब तरह के रंग दिखाई देते हैं। तो सब तरह के रंग वह देखता है कि वैसे आप कैलडोस्कोप हटाएंगे तो आपको यह जगत दिखता है वैसे सूर्य का प्रकाश है वैसे सफेद कलर का वैसे तो प्रकाश का कलर नहीं किंतु यदि कहना चाहते हैं तो उसका अपना कोई कलर नहीं है। किंतु जैसे ही वह केडोस्कोप अपने आंखों में लगाया उससे देख रहे हैं तो आपको 10 तरह के रंग दिखाई देंगे। तो क्या है कि यह कैलडोस्कोप है जैसे कि यह माया का आवरण जिससे कि हमको यह जगत में इतने सारे रंग दिखाई देते हैं। जैसे ही इसको हटा दिया तो सब तरह के रंग चले गए। तो क्या है कि अपने को रिमाइंड करवाने के लिए यह साधक एक कैलडोस्कोप अपने पास में रखता था। तो यहां पे भी देखिए कि जो नेति नेति मार्ग के साधक हैं, ज्ञान पथ के साधक हैं, वे लोग उनके मन में यह कांसेप्ट एकदम क्लियर होता है कि यह जगत है माया का बना हुआ। अभी यह माया का जगत का अर्थ क्या है? यह तो एक फिलॉसोफिकल आईडिया हो गया। प्रैक्टिस में कहे तो इसका क्या अर्थ है? प्रैक्टिकल ज्ञान योग क्या है? तो वह है कि जगत के साथ में हमारा जो रिश्ता है वह रिश्ता एकदम ने वह जो षड रिपु जो है इसका बना है। जगत के किसी चीज के ऊपर में हमारा काम प्रकट होता है। कभी क्रोध प्रकट होता है। काम क्रोध मद प्रकट होता है कि मुझे अहंकार है कि मेरे पास में इतनी सारी चीजें हैं। मद लोभ की यह अच्छी-अच्छी चीजें हैं। उसको मुझे कैसे भी करके प्राप्त करना है। तो यह जो काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, मत्सर यह जो रिश्ता हमारा जगत के साथ में है। पंचक्लेश की दृष्टि से कहे योग की दृष्टि से तो अविद्या में से सर्वप्रथम अज्ञान प्रकट होता है। अविद्या में से अस्मिता प्रकट होती है। यानी कि मैं हूं। यह एक भाव खड़ा होता है। फिर जगत के साथ में राग और द्वेष का रिश्ता बनता है। जो चीजें मुझे अच्छी लगती है उसके ऊपर में मेरा आकर्षण जो चीजें अच्छी नहीं लगती या जो चीजें मुझे कष्ट देती है उनके ऊपर में द्वेष। तो यह राग और द्वेष का रिश्ता हमारे मन में प्रकट होता है। और इसी राग और द्वेष में से प्रकट होते हैं अभिनिवेश अर्थात कि मृत्यु का भय यह जगत संसार है। मुझे इतना प्रिय है। इतना प्रिय है कि इसको छोड़कर के जाने की मेरी इच्छा नहीं होती। मैं मृत्यु शैया पर पड़ा हुआ हूं। तो कहां ईश्वर का चिंतन करूंगा ना कि कहां यह सोचूंगा कि यह जो दिए की वाट जो है वह ज्यादा लंबी है। ज्यादा तेल खा रहा है। दिए की वाट को कम करो। कोईकोई है मरने के समय पत्नी और पुत्रों के लिए रोते हैं। सोचते हैं हाय मेरे जाने से इनका क्या होगा? तो यह जो माया का रिश्ता जो है जगत के साथ में अपना बना है। जगत का त्याग करना इस बात का क्या अर्थ है? ऐसा नहीं कि आप सब कुछ त्याग करके वन में चले जाएंगे। हां, ऐसा भी आप कीजिए। भगवान बुद्ध वन में जाकर के उन्होंने तपस्या की थी। राज्य वगैरह त्याग करके। हम लोग भी घर छोड़कर के यहां पर आश्रम में आकर के रहते हैं। किंतु यह तो एक स्टेप हो गया। द्वितीय स्टेप है कि जगत का यह जो प्रपंच है जगत प्रपंच उसके साथ में अपने मन का रिश्ता काटना है। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, मत्सर रूपी रिश्ता काटना है। यह राग, द्वेष रूपी रिश्ता काटना है। यदि वह नहीं कर पाए और फिर वन में ना कि आश्रम में जाकर रहे तो वहां पर एक दूसरा संसार खड़ा हो जाएगा। और इसीलिए भगवान कृष्ण ने अर्जुन को कहा था कि तुम्हारी हड्डियों में रजस है। इस रजस को सबसे पहले यूटिलाइज करो, वर्कआउट करो, युद्ध करो। यह युद्ध त्याग करके वन में जाकर के सदी सन्यासी के रूप में रहोगे तो यह रजस जो है तुम्हारे से इस तरह के विकृत कर्म कराएगा कि तुम्हारा माथा खराब हो जाएगा। तो बोलकर के यह रजस जो है रजस को वर्कआउट करना ही होगा। तो यह वर्कआउट यदि आप संसार में है तो संसार के धर्म को अपना करके करें। धर्म का पालन करके करें। यदि हम लोग सन्यासी है तो सन्यासी के धर्म का पालन करके करें। किंतु यह रजस को वर्कआउट करना होगा। तमस और रजस से मुक्ति पानी होगी और सत्व में जाना होगा। तो यह ज्ञान मार्ग है। ज्ञान मार्ग का पथिक जो है उसके सामने उसका लक्ष्य भी क्लियर होता है कि हां यह ब्रह्मन है। ब्रह्म साक्षात्कार मुझे करना है। यह जीव जगत है। उसका मुझे त्याग करना है। ये जीव और जगत से लेकर के ब्राह्मण का जो रास्ता है यह रास्ता उपासना स्मरण मनन निध्यासन यह भी ज्ञान मार्ग के पथिक के मन में एकदम स्वयं सिद्ध स्पष्ट रूप से प्रथम से ही उसके मन में बैठा हुआ है। तो यह हो गया ज्ञान मार्ग की बात और फिर है एक इति इति साधन पथ अर्थात कि भक्त की साधना। एक भक्त सोचता है अभी भक्त जो है वह ज्ञानी के जैसा विद्वान नहीं होता। वह इस तरह से फिलॉसोफी पढ़कर के प्रारंभ नहीं करता कि हां यह ब्राह्मण है। फिर यह अध्यारोप हुआ है। उससे फिर यह जगत की सृष्टि की रचना हुई है। और यह सृष्टि का त्याग करके एक के बाद एक यह जितने डरिपु है, पंचक्लेश है, अष्टपाश है, उसको काट करके यह मुझे साधना उपासना करनी है। यह इतना उसको क्लेरिटी नहीं होता। वह अपने मन के आवेग से ईश्वर की आराधना करता है। रोते-रोते उसके जो आराध्य देव है, इष्ट देव है, उनकी वह पूजा करता है। कहता है कि हे प्रभु मैं आपका संतान, आप मेरे पिता या आप मेरी माता, मैं आपका दास, आप है मेरे ईश्वर। आप मुझे मुझ जैसे एक अबोध अबूझ संतान को जो मुझे सीखना चाहिए जो मुझे जानना चाहिए वो सब आप ही सिखा दीजिए तुम ही जंत्रो आमी जंत्री तुम हो आमी जंत्रो तुम ही जंत्री अर्थात कि मैं हूं यंत्र और तुम हो यंत्र चलाने वाली यह इंजीनियर तो यह है एक भक्त का भाव यह भक्त का भाव यहां पे फिलोसोफिकल क्लेरिटी इतनी ज्यादा ना हो, इतनी विद्वत्ता ना हो। यह इंद्रियों के विषयों का त्याग 100% ना हो। स्मरण, मनन, निध्यासन, महावाक्य, विचार वगैरह एक बौद्धिक क्षमता है। वह ना भी हो तो भी उससे ज्यादा कोई फर्क नहीं पड़ता। वह सोचता है उसको पक्का पता है कि प्रभु है और यह जगत जो है वह प्रभु की ही सृष्टि है। तो बस सृष्टि में मुझे एक सत व्यक्ति की तरह एक सात्विक आदर्श मान करके चलना है। सात्विक आदर्श का पालन करके चलना है और प्रभु की उपासना आराधना पूजा मुझे करते रहना है। तो यह हो गया इति इति साधन पथ। यहां पे बौद्धिक क्षमता इतनी आवश्यक नहीं है। यहां पे आपको हृदय का जो आवेश है, हृदय का जो वेग है वही आपके लिए 100% सिंसियरिटी जिसको कहते हैं वही एक आवश्यक है। इंद्रियों का संयम यदि 100% नहीं भी होता है तो भी चल जाएगा। तो यह है इति इति साधन पद। अभी शरद महाराज यह दोनों

इन्द्रिय सुखो का त्याग है आध्यात्मिक जीवन का मूल मन्त्र

को समझाने के बाद में किंतु एक आखिरी स्टेटमेंट देते हैं। कहते हैं कि चाहे इति इति साधन पथ का अवलंबन करें ना कि नेति नेति साधन पथ का अवलंबन करें। यदि मैं पहले से ही मेरे पास में इतनी विध्वत्तता है कि यह ब्राह्मण क्या है? ब्राह्मण का स्वरूप क्या है? माया का यह अध्यारोप कैसे होता है? यह जगत की रचना जो है पंजीकरण कैसे हुआ है? यह महावाक्य क्या है? महावाक्य विचार क्या है? स्मरण मनन निध्यासन करके महावाक्य विचार करके अपवाद करना। यह जो माया का आवरण हटा करके यह जो ब्राह्मण है उसका साक्षात्कार करना। वह कैसे करना है? वो यदि फिलॉसोफिकल क्लेरिटी है भी और यदि नहीं भी है बस हृदय के आवेश से मां काली की आराधना करता है। फिर मां जैसे कहे वैसा वह कार्य करता है। तो दोनों रास्ते ज्ञान का रास्ता हो ना कि भक्ति का रास्ता हो नेति नीति का रास्ता हो ना कि इति इति का रास्ता हो दोनों पथ के साधकों को इंद्रियों के विषय का त्याग करना होगा। क्या कहते हैं शरद महाराज? जगत संबंधे उल्लेखितो स्वार्थ पर भोग सुख को लखो साधारण धारणा परिहार के ही शास्त्रों वैराग्य बोलिया निर्देश करिया छे जगत के बारे में उल्लेखित स्वार्थ पर अर्थात कि स्वार्थ से भरपूर भोग सुख एक लक्ष्य भोग और सुख एकमात्र जिसका लक्ष्य है इस इस तरह की साधारण धारणा का त्याग करना, परिहार करना इसी को शास्त्र वैराग्य बोलकर के निर्देश करता है। जगत के बारे में हमारी जो धारणा है, एक आम आदमी की जो धारणा है, वह क्या है? जगत को भोग्य रूप में भो्य वस्तु के रूप में वो देखता है। आप अभी घर के बाहर निकलिए ना गाड़ी में ना कि स्कूटर में बैठकर के आप रास्ते पर जाइए। आप दोनों ओर जितनी भी दुकानें देखते हैं देखिए कि सभी दुकानें भो्य वस्तुओं की एडवर्टाइज करती है। अभी यहां पर आश्रम से ही बाहर निकलेंगे तो यह तो सी शोर है ना। यहां पे सब तरह की लग्जरी ब्रांड वगैरह आपको दिख जाएगी। आश्रम के सामने ही एक बड़ा होटल है। फिर एक बड़ी रेस्टोरेंट है। उससे थोड़ा सा आगे जाएंगे तो यह स्पा है। फिर उससे आगे जाएंगे तो यह बहुत बड़ा बेकरी है। उससे आगे जाएंगे तो यह जो बच्चों को खेलने के लिए वह जो सब होता है इस तरह से कुछ है। तो यह जितनी भी आप रास्ते पर जाइए जितनी दुकान देखेंगे आपको चिल्ला चिल्ला करके आमंत्रण देगी। बड़े-बड़े वो होर्डिंग जो होते हैं ना वह फट करके अपना मन जो है उनकी ओर चला जाता है। जस्ट अभी रिसेंटली इसी वीक को हमारे आश्रम के गेट के एग्जैक्ट सामने एक नया रेस्टोरेंट खुला है। तो अभी हम लोग क्या है कि रात को वॉकिंग करते हैं कभी-कभी तो गेट के आसपास में ही वह वॉकिंग करते हैं और वहां पर वह रेस्टोरेंट देखते हैं कि अच्छा यह नया रेस्टोरेंट ओपन हुआ है और फिर यह भी देखा कि यह कोई चैन है। ये फ्रेंचाइज है पूरा और उस फ्रेंचाइज का यह एक है। तो यह फ्रेंचाइज का नाम तो कभी सुना नहीं। तो फिर यहां पर एक महाराज है। उन्होंने फ्रेंचाइज सर्च किया इंटरनेट पर और फिर वहां पर देखा कि वहां पर क्या-क्या मेनू है। फिर वो मेनू देख के फिर वो मुझे बता रहे थे कि देखा यहां पर पिज़्ज़ा वगैरह मिलता है। मैंने कहा अच्छा बहुत अच्छा। तो देखिए कि आश्रम के गेट के सामने ही यह जो रेस्टोरेंट तो उसी के ऊपर में अभी हम लोग देख रहे हैं कंस्ट्रक्शन हो रहा है। वो होर्डिंग लग रहे हैं। बहुत बड़ा बोर्ड लगा है। अभी वह ओपन होगा। तो हम लोग भी देख रहे हैं कि यह सब चल रहा है। यह जगत जो है हमको खींचता है। यह जो स्वाद जो है जिकवा के यह जो नजर के यह जो दर्शन सब भव्य नजारे जो है यह कर्ण से जो हम यह ग्रहण करते हैं संगीत वगैरह जो कि मन को लुभाने वाला है। मन को चंचल करने वाला है। तो यह अपनी इंद्रियां 24 घंटे यह जगत इंद्रियों के माध्यम से 24 घंटे हमारे पर एसॉल्ट करता रहता है। हमारे पर हमला करता रहता है। और यह हमले में कब हम कहां फंस जाएंगे उसका कोई ठिकाना नहीं। और इसीलिए शरद महाराज कहते हैं कि चाहे आप ज्ञान मार्ग के पथिक हो ना कि भक्ति मार्ग के। जगत के बारे में हमारी जो ये सर्वसाधारण जन समाज की धारणा है कि हां ये आप घर से बाहर निकलने से यहां पे रेस्टोरेंट है तो पैसा इतना इकट्ठा करना है कि मैं इस एक दिन तो इस बड़ी महंगे रेस्टोरेंट में जाकर के महंगा सा खाना खा पाऊं। यहां पर यह बच्चों के खेलने की जगह है। बहुत बड़ा पार्क है। वहां पर एडमिशन फी ही बहुत ज्यादा है। तो मेरे पास में इतना बैंक बैलेंस होना चाहिए कि बच्चों को लेकर के मैं वहां पर पार्क में जा पाऊं। यह जो सुपर मार्केट है वहां पे सब तरह की चीजें मिलती है। तो जब मेरे पास में इतना पैसा होना चाहिए कि वहां जाकर के मैं खरीदी कर पाऊं, शॉपिंग कर पाऊं। तो यह है हमारी धारणा कि बहुत ज्यादा बैंक बैलेंस बनाओ सत रास्ते से हो ना कि फिर असत के रास्ते से पैसा बनाओ और इस पैसों से जगत का उपभोग करो तो यह कहते हैं शरद महाराज कि जगत के बारे में स्वार्थ पर यानी कि स्वार्थ किस तरह से पैसा कमाना है सुख भोग जिसका लक्ष्य है इस तरह के जगत में जगत का भोग करने के लिए पैसा कमाना है और यह पैसा कमा करके यदि हम किसी को हर्ट भी करें, यदि किसी को हम कष्ट भी दें तो भी उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। इसको कहते हैं स्वार्थ। देखिए बहुत सारी जगह पर यह खाने-पीने की यह जो रेस्टोरेंट वगैरह होता है ना ही वहां पर हेल्थ और हाइजीन की कोई चिंता की जाती है। यह एक्सपायरी डेट चीजें जो है वह सब लोग एक कस्टमर को दे देते हैं। फिर यह कस्टमर प्रोटेक्शन में कंप्लेन करने से भी कोई फर्क नहीं पड़ता है। ऐसी किस कितनी-कितनी सब चीजें दो नंबर की चलती रहती है। ये जो बेचने वाले हैं उनको स्पष्ट पता है कि ये चीज यदि लोगों को देंगे तो उनको नुकसान होगा। ये जो बेबी फार्मूला जो है उसमें यह लोग गड़बड़ करते हैं। यह जो कफ सिरप है उसमें कुछ गड़बड़ करते हैं। मेडिसिन में कुछ ना कुछ उल्टापुल्टा डाल देंगे। कैसे भी कंस्ट्रक्शन देखिए आप वो 2001 में अर्थक्वेक हुआ था। कितने ही मकान जो थे ढह गए थे। गिर गए थे। क्यों? गुजरात की बात कर रहा हूं। 2001 में जो अर्थक्वेक हुआ था। क्यों मकान गिर गए? क्योंकि जो कंस्ट्रक्शन जो किया गया था उसमें वह अच्छे से सीमेंट वगैरह डालने की बजाय रेती वगैरह ही ज्यादा डाल दिया होगा। बोल के मकान जो है वह तकलादी है। वो फ्रेजाइल है। एक झटका लगा अर्थक्वेक का कि फटाक करके गिर गए। तो देखिए कि अभी यह हम लोग आए दिन न्यूज़ पेपर में पढ़ते हैं कि वो नया रास्ता बनाया है ना कि ओवरबिज बनाया है। दूसरे ही दिन उसमें गड्ढे हो गए। या तो जैसे ही पहली बारिश हुई उसमें गड्ढे हो गए। मैं मैं लिमड़ी में था तो लिमड़ी के आश्रम के सामने ही एक बड़ा सा माने हाईवे जैसा ही एक रास्ता जाता है क्योंकि इसके बाद में तो पूरा गांव का अंत ही आ जाता है। उसके बाद में तो हाईवे ही चलता है। तो ये छोटा हाईवे जैसा रास्ता है। में हम प्रत्येक साल देखते हैं कि उसको रास्ते का मरम्मत किया गया है। फिर जैसे ही बारिश आई बड़े-बड़े गड्ढे हो गए और फिर बारिश गई तो फिर से उसका मरम्मत किया। फिर से बारिश आई फिर से गड्ढे हो गए। जब सोचिए कि कितना स्कैम होता होगा इस पूरे मामले में हर साल उसको रिपेयर करवाने का पता नहीं कितने करोड़ रुपया यह लोग खा जाते होंगे तो देखिए कि इसको कहते हैं स्वार्थ कि जगत का भोग करना है और भोग करने के लिए मुझे स्कैम करने हैं, फ्रॉड करने हैं, करप्शन करना है, कष्ट देना है, लोगों को हत्या तक कर देनी है। कैसे भी करके पैसे कमाने हैं। तो इसको कहते हैं स्वार्थ परता। तो यह भोग और सुख का भी त्याग और यह स्वार्थ परता का भी त्याग। इसको शास्त्र कहते हैं वैराग्य। तो चाहे आप ज्ञान मार्ग से ईश्वर की ब्रह्म साक्षात्कार की ओर जाए ना कि भक्ति मार्ग से ईश्वर दर्शन की ओर जाए। आपको वैराग्य तो आपके भीतर में होना ही चाहिए। दोनों पथ के पथिक के लिए वैराग्य कॉमन प्रॉपर्टी है। समान लक्ष सामान्य लक्षण है। दोनों में यह दोनों यह वैराग्य होना ही चाहिए। तो इसके

नित्य-परिवर्तनशील निश्चित-मृत्यु मानव जीवन

बाद में जो एक पैराग्राफ था ऑलरेडी हमने पढ़ लिया है। किंतु उसका जो एक सेंटेंस है वह बहुत ही सुंदर सेंटेंस है। फिर से एक बार पढ़ लेता हूं। नित्य परिवर्तनशील निश्चित मृत्यु मानव जीवन जगत अनित्यता ज्ञान सहजे आशिया उपस्थित होए नित्य परिवर्तनशील निश्चित मृत्यु मानव जीवन देखिए मानव जीवन कैसा है वो है नित्य परिवर्तनशील सतत परिवर्तन होता रहता है आज आपने आप बच्चे थे पढ़ाई कर रहे हैं कल तो देखते ही देखते आप ग्रेजुएट भी हो गए अभी शादी शादी का मामला है। शादी भी हो गई। फिर कुछ समय हुए बच्चे भी हुए। अभी आपको लगता है बच्चों को ले आनंद करेंगे। कहीं तो पलक झपकते झपकते ही बच्चे बड़े भी हो गए। कोई शादी बच्चों की भी शादी हो गई। बच्चों के भी बच्चे आ गए। अभी जैसे पलक झपक करके यह जीवन जो है वह सतत ट्रांजिशन या ट्रांसफॉर्मेशन जीवन में सतत चलता रहता है। ऐसा होगा नहीं कभी भी कि मुझे मेरा बचपन बहुत पसंद है तो मैं चाहता हूं हमेशा मैं बच्चे की तरह ही रहूं। मुझे मेरी युवानी बड़ी पसंद थी तो मैं युवान ही रहूं सब समय। मुझे मेरे कॉलेज के दिन बहुत अच्छे लगते थे। उस समय मुझे बहुत आनंद हुआ था। तो जीवन भर मैं कॉलेज में ही पड़ा रहूं। ऐसा कभी होने वाला नहीं है। मेरे बच्चे हुए थे तो बच्चे छोटे थे तो उनके साथ में मुझे बहुत आनंद आता था। तो मैं चाहता हूं मेरे बच्चे छोटे ही रहे कभी बड़े ही नहीं होंगे तो ऐसा भी नहीं होने वाला। नित्य परिवर्तनशील यह जगत है। और साथ में क्या है यह जगत में? निश्चित मृत्यु मृत्यु जो है अवश्यभावी है। मेरे प्रियजन है, मेरे रिलेटिव्स है, मेरे यह जो मित्र मंडल है, देखेंगे कि एक के बाद एक जैसे-जैसे समय जाता जाएगा, मृत्यु एक के बाद एक सबको खाता जाएगा। अपने कराल वदन में सबको एक के बाद एक पकड़कर वो ग्रास करता ही जाएगा। तो यह निश्चित मृत्यु नित्य परिवर्तनशील मानव जीवन है। मानव जीवन में जगत के अनित्यता का ज्ञान सहज रूप से आकर के उपस्थित होता है। यह निश्चित मृत्यु नित्य परिवर्तनशील मानव जीवन में जगत अनित्य है। यह ज्ञान सहज रूप से आकर के उपस्थित होता है। इसलिए जगत के बारे में नीति नेति मार्ग वैराग्य मार्ग या तो फिर ज्ञान मार्ग हमने सबसे पहले खोज निकाला। जो विद्वान थे जिन लोगों में मेधा शक्ति थी जिनका आईक्यू हायर लेवल का था। उन्होंने देखा कि हां मेरे देह में भी परिवर्तन हो रहे हैं। वृद्धा युवानी से वृद्धावस्था की ओर जा रहा हूं और बीच-बीच में मृत्यु जो है वह कहीं ना कहीं स्ट्राइक करता ही रहता है। तो इस तरह के जीवन में जीवन के पीछे दौड़ने से अच्छा है कि जीवन के परे ऐसा कौन सा तत्व है जो कि जन्म मृत्यु जरा व्याधि के चक्र से परे हैं जो कि नित्य परिवर्तनशील नहीं है। वो सब सब समय अपरिवर्तनशील है। निश्चित मृत्यु नहीं है। वो जन्म मृत्यु जरा व्याधि के ये काल चक्र से परे है। इस तरह का कौन सा तत्व है? तो यह तत्व की खोज करतेकरते उन्होंने ज्ञान मार्ग खोज निकाला। तो शरद महाराज कहते हैं कि सबसे पहले ज्ञान मार्ग जो है लग रहा है उपनिषदों को पढ़कर के कि उसका सबसे पहले आविष्कार हुआ है। इसका सबसे पहले हमारे ऋषि मुनियों को ज्ञान हुआ है। और फिर बाद में धीरे-धीरे करके भक्ति और भक्ति मार्ग जो है वो धीरे-धीरे करके भक्ति मार्ग में ये जो भाव साधना है धीरे-धीरे करके स्टेप बाय स्टेप एजेस आफ्टर एजेस युग के बाद युग साधना करते-करते विभिन्न भावों का उदय हुआ है साधकों के मन में। तो इसीलिए पहले नेति नेति मार्ग और फिर इसके बाद में भक्ति और भाव का मार्ग जो है वह प्रारंभ हुआ है और भक्ति भाव के भीतर में भी हमने देखा था कि किस तरह से उपनिषद युग आप ले वैदिक युग क्या या तो फिर सत्य युग यदि आप लेते हैं तो खास करके शांत भाव वहां पर प्रधान था। उसके बाद में त्रेता युग में देखिए कि भगवान राम के प्रति यह हनुमान जी की जो भक्ति है महावीर की भक्ति वो दास्य भाव या तो फिर भगवान राम का शांत भाव यह वहां पर प्रधान था और फिर जैसे ही हम द्वापर युग की ओर आएंगे तो मां यशोदा का मातृ भाव यह जो चंचल जो बालक जो कृष्ण थे उनका यह संतान भाव और फिर ये श्रीमती राधा का मधुर भाव और सबके बाद में देखेंगे अल्टीमेटली श्रीमती राधा के ही देह में सभी भावों के मिलन के रूप में महाभाव प्रकट होता है। वही महाभाव हमको चैतन्य महाप्रभु में भी देखने को मिलता है बाद में और श्री रामकृष्ण के भीतर में भी महाभाव का उदय होता है। तो यह जो भाव का जो विकास है वह धीरे-धीरे करके युग परंपरा से हुआ है। तो इतना हमने ऑलरेडी देखा। इसके बाद में क्या कहते हैं शरद महाराज?

‘नेति, नेति’ मार्ग का लक्ष्य है आत्म-स्वरूप का संधान

नेति नेति पथ का लक्ष्य है मैं क्या पदार्थ नेति नेति पोथेर लोक आमी कौन पदार्थ तद विषय संधान कोरा नेति नेति पथ का लक्ष्य है मैं मेरा सही स्वरूप क्या है इसका संधान करना नेति नेति नित्य स्वरूप जगत कारण इहा न है इहा कोरिया साधन पथे अग्रसर होइया मानव स्वल्प काले जे अंतर्मुख मुखया पिया छिलो उपनिषद ए विषय शाखो प्रदान कोरे नेति नेति अर्थात कि नित्य स्वरूप जगत कारण यह नहीं यह नहीं करके जो साधन पथ में अग्रसर होकर के मानव कुछ ही समय में स्वल्प काल में ही अंतर्मुख हो पड़ा था। उपनिषद इसके बारे में साक्ष्य प्रदान करता है। जगत जो है उसका स्वरूप जो है वह है माया या अज्ञान इसका स्वरूप है। तो यह माया या अज्ञान से प्रकट हुआ जो कुछ भी यह जगत प्रपंच है वह जन्म मृत्यु जरा व्याधि व्यष्टि लेवल पे और समष्टि लेवल पर सृष्टि स्थिति प्रलय इसका भोग बना हुआ है। इवन यह जो विश्व ब्रह्मांड जो कि हमको नित्य दिखते हैं मनुष्य का तो चलो कि समझ में आता है। इतने सारे मनुष्यों को हम प्रतिदिन जन्म लेते भी देखते हैं। मृत्यु के मृत्यु पामते भी देखते हैं। किंतु फिर यह सूरज है, चंद्र है, पृथ्वी है, नक्षत्र है, ग्रह है। उन सबका क्या? यह समुंदर है, यह आकाश है। यह तो क्या हमेशा के लिए नहीं है क्या? तो नहीं। देखिए कि एस्ट्रोनॉमी का थोड़ा सा भी मॉडर्न एस्ट्रोनॉमी या कॉस्मोलॉजी का स्टडी करने से पता चलेगा कि यह जगत की भी उत्पत्ति हुई है बिग बैंग नामक एक धमाके से और फिर एक के बाद एक जो कुछ नहीं था पहले तो स्पेस और टाइम भी जगत के साथ में प्रकट हुआ है। धीरे-धीरे करके यह ग्रह नक्षत्र की रचना हुई। गैलेक्सी की रचना हुई। यह जो सूरज है सूरज बना सूरज के आसपास में यह ग्रह बने और फिर धीरे-धीरे पृथ्वी ग्रह के ऊपर में इवोल्यूशन होकर के आज कहीं मनुष्य बना है। तो यह नहीं था और आज है और कल नहीं रहेगा। ये एस्ट्रोनॉमी स्पष्ट रूप से कहती है। स्पेस साइंस स्पष्ट रूप से कहता है कि हमारा सूरज है। उसका अस्तित्व उसका लाइफ टाइम है। आई थिंक अराउंड 4 बिलियन ईयर जितना है उसका लाइफ टाइम 400 करोड़ साल के आसपास का। इसके बाद में यह सूरज में विस्फोट होगा और यह आसपास के जितने भी ग्रह हैं सबको यह विस्फोट आ जाएगा। और फिर थोड़ा सा लंबा देखेंगे तो जितने भी यह पूरा विश्व ब्रह्मांड जो है पूरा कॉस्मोस जो है वो धीरे-धीरे करके डिसइीग्रेट हो जाएगा या तो बिग क्रंच रूपी महा धमाके में खत्म हो जाएगा। देयर आर सेवरल पॉसिबिलिटीज डिपेंडिंग अपॉन कि ग्रेविटी का स्ट्रेंथ क्या है वगैरह-वगैरह थ्यरी ऑफ रिलेटिविटी के इक्वेशन जो है वो हमको गाइड करते हैं कि कॉस्मोस का अंत कैसे आएगा? तो किंतु यह बात बड़ी स्पष्ट है कि यह इवन हमारे भारतीय हिंदू सनातन धर्म के अनुसार तो सृष्टि स्थिति प्रलय है ही है। किंतु इवन मॉडर्न कॉस्मोलॉजी की दृष्टि से भी यह कॉस्मोस का प्रारंभ है और उसका अंत है। और कॉस्मोस के भीतर में जितने भी यह ग्रह, नक्षत्र, सूर्य, चंद्र, तारे, पृथ्वी, ग्रह जो कुछ भी है उसका भी प्रारंभ है और अंत है। यानी कि यह नित्य परिवर्तनशील वस्तु में सभी चीजों का प्रारंभ है अंत है। इसीलिए इहान न है ईहां है। यह जो जन्म मृत्यु जरा व्याधि सृष्टि स्थिति प्रलय से ग्रसित जो कोई पदार्थ है वो ब्रह्मन नहीं है। वह ब्रह्मन नहीं है। बोलकर के जब साधन पथ में मनुष्य आगे बढ़ता है तो कुछ ही समय में वो अंतर्मुख हो जाता है और उपनिषद इसके बारे में साक्ष्य प्रदान करते हैं। मनुष्य अंतर्मुख क्यों हो जाएगा? देखिए जो लोग इस जगत को वास्तव मानते हैं उन लोगों का बिहेवियर देखेंगे। सब समय नेटवर्किंग करना चाहेंगे। सब समय अपना जो सोशल प्रेस्टीज है, सोशल इन्फ्लुएंस है उसको बढ़ाना चाहेंगे। सब समय अपना बैंक बैलेंस बढ़ाना चाहेंगे। सब समय करियर में एडवांसमेंट हो, प्रमोशन हो। वे चाहेंगे बिजनेस कर रहे हैं तो सब समय बिजनेस को एक्सपैंड करना चाहेंगे। आज का जो सिलिकॉन वैली या तो फिर ये कंप्यूटर साइंस जो इसका एकदम स्पष्ट रूप से उदाहरण है। जगत को आप सत्य मानते हैं तो एक के बाद एक जो ट्रांजिस्टर जो है माइक्रोपर उसमें ट्रांजिस्टर ट्रांजिस्टर की जो संख्या है वह बढ़ती ही जाएगी। उसकी साइज कम होती जाएगी। आजकल ना कि 2 नैनो मीटर ना उसका आई थिंक थ्री ना 2 नैनो मीटर तक का वो माइक्रोपर आ चुका है। तो ट्रांजिस्टर की संख्या बढ़ानी जा बढ़ाती जानी है। उसकी साइज कम करते जाना है। ये जो कंप्यूट है उसका प्राइस जो है कॉस्ट है वह कम होना है। फिर यह एआई जैसी नई इनोवेशन नई डेवलपमेंट कंटीन्यूअस करते जाना है। तो ये जो है ऐसा जो लोग जगत को वास्तव मानते हैं उन लोगों का हमेशा ये बहिर्मुख मन होता है। किंतु जो लोग इस जगत को अवास्तव मानते हैं, मिथ्या मानते हैं, नित्य परिवर्तनशील मानते हैं, निश्चित मृत्यु मानते हैं, वे लोग इस तरह की झंझट में फसेंगे ही नहीं कि आज आपको कितने नैनोमीटर का ट्रांजिस्टर बनाना है। कितनी पावरफुल यह प्रोसेसर बनाना है। कंप्यूटर चिप बनानी है। यह कितने एआई की यह हर तीन-4 महीने पे एआई का नया वर्जन रिलीज होता रहता है। तो कैसे करना है? यह सब चीजों में वे लोग जाएंगे ही नहीं। उनका मन जो है धीरे-धीरे अंतर्मुख होता जाएगा। भीतर में जो ब्रह्म पदार्थ है उसी की ओर उनका मन धावित होगा। उपनिषद के ऋषि मुनियों का जीवन इस बात का साक्षात प्रमाण है। मानव बुझिया छिलो बािरे अन्न वस्तु शकल अपेक्षा ताहार निजो देहो मोनई ताहा के शर्माग्रे जगोतेर सहित संबंध युक्त कोरिया राखिया छे मान मनुष्य को समझ में आ गया था कि बाहर की चीजों की वजह उसके भीतर में ही उसका जो खुद का देह और मन है वही उसको सबसे ज्यादा जगत के साथ में बांध करके रखता है। अत एव इसीलिए देह मनावलंबने जगत कारण अन्वेषण अग्रसर होले उहार संधान शिख बार संभावना इसीलिए देह और मन के अवलंबन से जगत कारण का अन्वेषण या तो फिर डिस्कवरी करने को हम आगे बढ़ेंगे तो उसका संधान जो है जगत अतीत वस्तु का जल्दी ही मिल सकता है। देखिए ये जो सेंटेंस है थोड़ा सा समझने में डिफिकल्ट है किंतु इतना भी डिफिकल्ट नहीं। जब पहली बार पढ़ेंगे तो थोड़ा डिफिकल्ट लगता है। देखिए एक तो है जड़ जगत। एक और हम रखेंगे। दूसरा है पूर्ण चैतन्य। ब्रह्म। यह जो जड़ जगत है और यह जो पूर्ण चैतन्य ब्राह्मण है इन दोनों को जोड़ता क्या है? हमारे लिए क्या जोड़ता है? तो मनुष्य देह ही तो जोड़ता है। यदि मनुष्य देह नहीं है तो मैं या तो पूर्ण जड़ रूप में हूं या तो फिर मैं चैतन्य के रूप में हूं। यह दोनों को कनेक्ट करने का काम यह मनुष्य का देह ही करता है और कुछ नहीं। इसीलिए यह जो मनुष्य का देह है वह की है। वो मिसिंग लिंक बायोलॉजी में या तो इवोल्यूशनरी साइंस में इसको कहते हैं मिसिंग लिंक। मिसिंग लिंक का अर्थ क्या है? तो यह बंदर है और यह मनुष्य है। तो बंदर में से मनुष्य हुआ। यह थ्यरी को प्रूव करने के लिए आपको यह मिसिंग लिंक चाहिए। यानी कि बंदर और मनुष्य दोनों के मिश्रित लक्षण वाली प्रजाति आपको खोजनी होगी। तो हमने बहुत सारी इस तरह की ये जो इंटरमीडिएट स्पीशीज है उसको खोज निकाला है। होमो इरेक्टस है। फिर यह जो नियंडर थाल है वो वगैरह-वगैरह जितने भी स्पीशीज है बंदर के भी लक्षण है। एप के भी लक्षण है और मॉडर्न मनुष्य के भी लक्षण है। यानी कि मिसिंग लिंक से पता चलता है कि हां बंदर धीरे-धीरे करके इस इस स्टेप के माध्यम से मनुष्य हुआ है। तो यह बायोलॉजी में या इवोल्यूशनरी साइंस में इसको मिसिंग लिंक कहते हैं। तो यहां पर भी देखिए कि यह जड़ पदार्थ जो है वो चेतन का ही एक प्रतिबिंब है। चेतन के प्रतिबिंब के अलावा जड़ पदार्थ का अपना कोई अस्तित्व नहीं है। तो फिर यह जड़ और चेतन आप कहेंगे कि यदि यह दोनों लिंक है तो इसमें क्या मिसिंग लिंक है कि नहीं? ऐसी कोई कड़ी जो कि जड़ और चेतन को दोनों को कनेक्ट करे तो वह मिसिंग लिंक है और वह है मनुष्य का देह। मनुष्य के देह के भीतर में देखिए कि बाह्य जो देह है वह तो जड़ ही है। आज खुदा ना खास्ता कहीं मेरा हाथ कट गया। अब यह कट जब तक यह हाथ मेरे देह के साथ में कनेक्टेड है। मैं उसको स्पर्श करूंगा तो यह स्पर्श का सेंसेशन जो है मैं फील करूंगा। किंतु जैसे ही यह हाथ कट के जमीन पर गिरा उसको मैं स्पर्श करने से भी वह मुझे कोई सेंसेशन उस हाथ का नहीं होने वाला। क्यों? क्योंकि वह जो हाथ है वह तो अपने से तो जड़ ही है। वो मेरे ब्रेन के साथ में कनेक्टेड था। यह नर्वस सिस्टम के माध्यम से बोलकर के मैं उसको स्पर्श करता था और यह स्पर्श की अनुभूति होती थी। तो यह मेरे देह के भीतर में जड़ और चेतन दोनों कनेक्टेड है। यह जो ह्यूमन कॉन्शियसनेस है, यह ह्यूमन कॉन्शियसनेस है। यह मिसिंग लिंक यह जड़ जगत, मर्त्य जगत और यह अमर जगत या तो फिर यह पूर्ण जगत दोनों के बीच में मिसिंग लिंक है। यह मेरा देह। तो देखिए इसलिए राजयोग में स्वामी जी कहते हैं कि आप प्राण प्राण को कंट्रोल करेंगे तो सूर्य चंद्र नक्षत्र की गति को भी आप परिवर्तन कर देंगे। प्राण को यदि आप कंट्रोल करेंगे तो कहां वह पृथ्वी के दूसरे कोने में एक व्यक्ति है उसको आप कंट्रोल कर सकते हैं। हिप्नोटाइज कर सकते हैं। या तो फिर उसको रिमोट हीलिंग कर सकते हैं। मेरे देह में से स्वस्थता के वाइब्रेशन किसी में बीमार व्यक्ति के भीतर में भेजूंगा तो बीमार व्यक्ति भी स्वस्थ हो जाएगा। तो हम पूछेंगे नेचुरली कि स्वामी जी किस तरह से यह प्राण को कंट्रोल किया जाए? अब जल्दी-जल्दी बता दीजिए। मैं अभी का अभी प्राण को कंट्रोल करना चाहता हूं। तो स्वामी जी क्या उत्तर देते हैं? देखिए कि मैं सबसे ज्यादा मेरे नजदीक जो प्राण है वह क्या है? तो यह श्वासोवास यह जो ब्रीथिंग का जो प्रोसेस हो रहा है मैं ब्रीथ इन और ब्रीथ आउट कर रहा हूं। वो कि मेरे देह के या तो मेरे सबसे पास वाला प्राण का पास वाला प्राण है। तो सबसे पहले तो यह ब्रीथिंग को नियमित करना नियमन करना सीखो। ब्रीथिंग कंट्रोल करना सीखो। यह जैसे ही हम कंट्रोल करना सीखेंगे तो मेरे भीतर का जो प्राण है वह धीरे-धीरे करके पूरे कॉस्मिक लेवल का जो प्राण है उसके साथ में कनेक्टेड है। मैं अपने देह के भीतर के प्राण को कंट्रोल कर सकता हूं। तो मैं कॉस्मिक प्राण को भी कंट्रोल पर कर पाऊंगा और फिर कॉस्मिक प्राण के माध्यम से विश्व जगत के जितने भी पदार्थ हैं सबको मैं कंट्रोल कर सकता हूं। तो यह स्वामी जी का थरी था कि यह जो देह है देह के सबसे नजदीक जो है या तो देह को ही नियमन करके कॉस्मिक प्राण को नियमन करना कॉस्मिक प्राण को कंट्रोल करना। देखिए आज का जो मॉडर्न साइंस है मॉडर्न साइंस में एक बहुत ही पावरफुल थ्यरी है क्वांटम डायनेमिक्स। यह क्वांटम डायनेमिक्स में ऑब्जर्वर का जो रोल है एक बहुत बड़ा रोल है। यह जो श्रोडिंजर स्केट इसका उदाहरण मैंने काफी बार दिया है। मान लीजिए अभी ये श्रोडिंजर स्केट एक हाइपोथेसिस है। एक्चुअली होता क्या है? सब एटॉमिक लेवल पे पार्टिकल का जो स्टेट होता है वो क्या है? कि वो प्रोबेबिलिटी प्रोबेबिलिस्टिक स्टेट होता है। या तो अप इलेक्ट्रॉन होगा या तो डाउन इलेक्ट्रॉन होगा। यूजुअली हम ऐसा मानते हैं। क्वांटम डायनामिक्स कहता है प्रोबेबिलिटी है कि अप भी है डाउन भी है। इसको वो ये कहेंगे कि वेव फंक्शन कहते हैं। और जब तक आप उसको ऑब्जर्व नहीं करेंगे तब तक वो अप एंड डाउन दोनों पोजीशन में रहेगा। जैसे ही आप उसको ऑब्जर्व करेंगे ये वेव फंक्शन कोलैप्स होगा और एक्चुअली अप और डाउन आपको दिखाई देगा। अभी यह कांसेप्ट समझना मुश्किल है। तो इस कांसेप्ट को समझाने के लिए वे लोग कहते हैं मान लीजिए एक बिल्ली है। सब एटॉमिक पार्टिकल एक बिल्ली है। अभी इस बिल्ली को आपने एक बॉक्स में रखा है। बॉक्स में आपने एक जहर का एक यह जो है प्याला रख दिया है। जहर पोइजन एक टेबलेट रख दी है। अभी यह टेबलेट कभी भी खुलेगी और उसमें से पोइजन गैस निकलेगा और यह बिल्ली मर जाएगी। किंतु देखिए कि जब तक बॉक्स बंद है तब तक आपको पता नहीं है कि बिल्ली जिंदा है या मरी हुई है। तो आप क्या कहेंगे? आपको कॉमन सेंस क्या कहता है? बिल्ली या तो जिंदा है या तो मरी हुई है। दोनों एक साथ में कभी नहीं हो सकती। हां, यह बात है कि मुझे पता नहीं है कि बिल्ली जिंदा है या मरी हुई। किंतु इग्नोरेंस ही उसके बारे में है मेरा। इससे ज्यादा और कुछ नहीं। बिल्ली एक साथ में जिंदा या मृत्यु नहीं हो सकती। मेरा इग्नोरेंस है उसके बारे में जो कि मुझे पता नहीं कहता है कि जिंदा है या मरी हुई। किंतु इनफैक्ट बिल्ली या तो जिंदा है या मरी हुई है। जैसे ही मैं बॉक्स खोलूंगा ये जो सही वास्तविक जो स्टेट है बिल्ली का पता चल जाएगा। क्वांटम डायनामिक्स कहता है कि यदि यह बिल्ली सब एटॉमिक पार्टिकल होती तो सही-सही में जब तक हम बिल्ली को ऑब्जर्व नहीं करते हैं तब तक बिल्ली जिंदा और मृत दोनों एक साथ में है। यह दोनों प्रोबेबिलिटीज एक साथ में अस्तित्व है उसका। और जैसे ही मैंने बॉक्स खोला, जैसे ही मैंने उसको ऑब्जर्व किया, साथ में ही यह वेव फंक्शन कोलैप्स हुआ और बिल्ली या तो जिंदा है या तो मर गई है। एक स्टेट में आ जाएगी। दो स्टेट में ऑब्जर्व करने के बाद नहीं रहेगी। तो आप कहेंगे ये फिलॉसोफिकल स्पेकुलेशन के अलावा और क्या है? किंतु देखिए कि यह डबल स्प्लिट डबल स्लिट एक्सपेरिमेंट वगैरह बहुत सारे एक्सपेरिमेंट हमने किए हैं और क्वांटम लेवल पर सब एटॉमिक पार्टिकल के लेवल पे हमको यह बात पक्का पता चल गया है कि यह दोनों चीजें जिसको वेव फंक्शन कहते हैं या प्रोबेबिलिटी क्लाउड कहते हैं। दोनों चीजें संभव है। यह माने दिस इज अ रियल फिजिक्स। क्या बिल्ली जिंदा भी है, मृत्यु मृत भी है। ये दिस इज़ अ रियल फिजिक्स। यह कोई फिलॉसोफिकल स्पेककुलेशन नहीं है। मेरे अज्ञान की वजह से नहीं है। जब तक मैं बिल्ली को ऑब्जर्व नहीं करता हूं। बिल्ली दोनों चीज एक साथ में है। जिंदा भी है और मरी भी है। सो दिस इज वेरी एसोटेरिक साइंस। किंतु यह क्वांटम फिजिक्स यह स्वीकार करता है कि ऑब्जर्वर का एक रोल है फिजिक्स के भीतर में। जो कि क्लासिकल फिजिक्स कहता है कि ऑब्जर्वर होगा या ना होगा। कोई फर्क नहीं पड़ता। यह नेचुरल फिनोमिना है। वह वैसे के वैसे ही चलते रहेंगे। चाहे पृथ्वी पर पूरा जीवन समाप्त हो गया तो भी कोई फर्क नहीं। जिस तरह से पृथ्वी सूर्य की आसपास में ऑर्बिट करती है वह करती ही रहेगी। यह चांद जो है पृथ्वी की ओर घूमता ही रहेगा। यह जो समर है, विंटर है, स्प्रिंग है, ऑटम है, यह सीजनल चक्र जो है ऋतुओं का चक्र वो चलता ही रहेगा। पृथ्वी पर बर्फ गिरेगी, पृथ्वी पे ठंड लगेगी, पृथ्वी पे यह बारिश होगी, यह धूप होगी। यह सब चलता रहेगा। भले ही चाहे पृथ्वी पर मनुष्य है या नहीं है, कोई फर्क नहीं पड़ता। तो यह क्लासिकल फिजिक्स कहता है कि मनुष्य का इस नेचर में कोई रोल नहीं है। किंतु क्वांटम डायनेमिक्स है। कहता है कि ऑब्जर्वर का मनुष्य का रोल है। दिस आईडिया जो है इतना रेवोल्यूशनरी आईडिया है। यह फिजिक्स में प्रूव हो चुका है। यह कोई थ्योरी या फिलॉसोफिकल स्पेककुलेशन नहीं है। तो देखिए कि यह जो देह है वह मिसिंग लिंक है जड़ जगत और चैतन्य के बीच में। तो यहां पर शरद महाराज कहना चाहते हैं कि यदि यह मिसिंग लिंक है देह तो देह के ही अवलंबन से देह के परे हमको जाना है। यदि मैं जड़ जगत को पकड़ कर के जड़ जगत से परे जाने का प्रयास करूं वह तो संभव नहीं है। यह जो रास्ता जो है अनंत की ओर का रास्ता वो जैसे मेरे हृदय में से पसार होता है। मेरे हृदय पे मैं अपने मन को एकाग्र करूं या तो यह जो मेरी कॉन्शियसनेस है ये कॉन्शियसनेस रूपी जो पहेली है ये जो पजल जो है इसको मैं जैसे ही सॉल्व करूं तो ये इंडिविजुअल कॉन्शियसनेस से ये व्यष्टि चेतना से समष्ट समष्टि चेतना की ओर कॉस्मिक कॉन्शियसनेस की ओर मैं जा सकता हूं। तो यह शरद महाराज कहना चाहते हैं। फिर से एक बार पढ़ते हैं कि मनुष्य को समझ में आ गया था। बाहर की वजह बाहर की चीजों की वजह उसके खुद के देह मन को ही सबसे आगे जगत के देह मन ही उसको जगत के साथ में बांध करके रखा है। तो फिर देह मन के अवलंबन से ही जगत कारण के अन्वेषण में डिस्कवरी करने में आगे बढ़ने से उसका संधान उसको जल्दी से मिल जाएगा। आड़ी रे भात टिपिया जमन बुझते पारा जाए भात हाड़ी सुसिद्ध होया छ कि ना तदूप आपनार भीतरे नित्य कारण स्वरूप अनुसंधान पायली अपर बस्तु और व्यक्ति शकले अंतरे उहार अन्वेषण पावा जबे और फिर हांडी के भीतर में भात की हांडी भात बनाने के लिए एक हांडी रखी है एक मटकी रखी है उसमें भात को हमने सिद्ध किया है भात को बनाया है। तो यह भात कच्चा है कि पक्का उस भात का सिर्फ एक दाना जो है हाथ में उठा करके ऐसा स्क्वीज़ करने से पता चल जाएगा कि यह दाना कच्चा है तो फिर पूरी हांडी जो है सब भात के दाने कच्चे हैं और यह ठीक से बॉईल हो गया है तो पूरी हांडी का भात जो है वह बॉईल हो गया है। तो इसी तरह से हांडी के भीतर का भात का एक दाना जो है उसको टिप करके स्क्वीज़ करके जैसे पता चलता है कि पूरे हांडी का भात सुसिद्ध हुआ है कि नहीं वैसे ही अपने भीतर में नित्य कारण स्वरूप का अनुसंधान पाकर के बाकी सभी वस्तु और व्यक्तियों के भीतर में उसका संधान अन्वेषण मिल सकता है। मेरे भीतर में जो जगत कारण है, मेरे भीतर में जो यह चेतन तत्व है, उसको मैं यदि खोज निकालता हूं, तो समग्र विश्व ब्रह्मांड में जो चेतन तत्व है, उसी को भी मैं पकड़ लूंगा। क्यों? क्योंकि चेतन तत्व तो एक ही है। अलग-अलग चेतन तत्व नहीं है। मेरे भीतर में एक चेतन तत्व आपके भीतर में एक फिर उसके भीतर में एक, चाइनीस के भीतर में एक, जापानीज के भीतर में दूसरा, कोरियन के भीतर में तीसरा ऐसा बिल्कुल नहीं है। वो चाहे चाइनीस हो, ना कि जापानीज हो, ना कि इंडियन हो, ना कि फ्रेंच हो, ना कि ये स्वाहिली हो, ना कि ये इजिपशियन हो। सबके भीतर में वही चेतन तत्व है। स्त्री हो, पुरुष हो, वृद्ध हो, युवान हो कि बालक हो, सबके भीतर में वही चेतन तत्व है। यदि मैंने अपने भीतर के चेतन तत्व का अनुसंधान प्राप्त कर लिया, उसको मैंने पहचान लिया, तो सबके भीतर का जो चेतन तत्व है, उसका क्या सही स्वरूप है, वह मुझे समझ में आ जाएगा। ए जन पथर पथ के निकट आमी कौन पदार्थ ए विषय अनुसंधानी एकमात्र लखो होया उठे और इसीलिए जो ज्ञान मार्ग का पथ पथिक है उसके लिए मैं क्या पदार्थ हूं मेरा सही स्वरूप क्या है इस बात का अनुसंधान ही इस बात को खोजना ही एकमात्र लक्ष्य हो उठता है इसीलिए शरद महाराज कहते हैं कि नेति नीति मार्ग या तो ज्ञान मार्ग जो फॉलो करता है उसके लिए यह आवश्यक है कि वह फिलॉसोफी ठीक ठीक समझे। वो फिलॉसोफी समझ करके उसको पता चलता है कि यह देह जो है वो मिसिंग लिंक है जड़ और चेतन के बीच में और जो चेतन तत्व मेरे भीतर में है वही सेम चेतन तत्व सभी के भीतर में प्रकाशमान है। इसलिए मैं अपने भीतर के चेतन तत्व का अनुसंधान करता हूं। अन्वेषण करता हूं तो फिर मैं पूरे विश्व ब्रह्मांड का जो चेतन तत्व है उसको समझ लूंगा। यह फिलॉसोफी क्लियर होने से ही ज्ञान मार्ग का पथिक आगे बढ़ता है। तो यह हो गया कि नेति नेति पथ का लक्ष्य। इसके बाद का टॉपिक है निर्विकल्प समाधि जो कि अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: "नेति नेति" मार्ग हम गृहस्थों के लिए नहीं है. इतना त्याग हमसे कैसे होगा?

देखिए ये जो वैदिक युग में ही ये सब आइडियल तो बता दिए गए हैं कि पहले तो 25 साल ब्रह्मचर्य आश्रम फिर गृहस्थ आश्रम फिर वानप्रस्थ आश्रम फिर सन्यास आश्रम यानी कि आप जब तक गृहस्थ आश्रम है तब तक नेति करना असंभव है। वह तो ऑब्वियस है। किंतु फिर गृहस्थ आश्रम का जीवन के अंत तक जो आकर्षण है वो भी तो नहीं होना चाहिए। एट वन पॉइंट आपको धीरे-धीरे आकर्षण से दूर होकर के सन्यास आश्रम की ओर तो सबको जाना है। चाहे आप ब्रह्मचर्य आश्रम के बाद में ही सन्यास आश्रम में चले जाइए। या तो फिर यह गृहस्थ आश्रम को क्रॉस करके जाइए। अल्टीमेट लक्ष्य तो सबका सन्यास आश्रम है। सबका नेति नेति है। यह मामला तो उस समय स्पष्ट था। आज ही है कि मतलब आप जीवन के आखिरी तक ये सब चीजों को लेकर के रहते हैं। सो यह लाइफस्ट का परिवर्तन तो आवश्यक है। सो दैट इज वन पॉइंट। और दूसरा आपने कहा कि देखिए इति इति मार्ग तो है ही है। मान लीजिए कि परिस्थिति ऐसी अनपढ़ है कि आप वैराग्य नहीं प्रकट हो रहा है तो इति इति मार्ग तो है ही है कि ईश्वर की आराधना, ईश्वर की भक्ति वो सब तो एक लेजिटमेट पाथ पहले से ही है। तो उसका अनुष्ठान कर सकते हैं।

प्रश्न: गृहस्थ आश्रम में "इति इति" साधना करते है, बाद में संन्यास आश्रम में "नेति नेति" साधन करते है. क्या यह अस्वाभाविक gear change करना नहीं हुआ?

ये इसको गियर चेंज नहीं करना नहीं बोल के कहेंगे कि नेचुरल इवोल्यूशन ठाकुर का खुद का देखिए ठाकुर ने तो कोई प्लान करके अद्वैत साधना नहीं की थी। उनका तो प्रारंभ ही हुआ था जीवन का कि मां की आराधना करके मां के सामने रो करके मां के सामने नृत्य करके मां का गीत गा करके नेचुरल इवोल्यूशन में वो अद्वैत की ओर गए हैं। सो यदि आप ठीक-ठीक इति इति पथ का अनुसंधान करते हैं। देखिए शरद महाराज ने तो स्पष्ट ही कहा कि नेति नेति साधन पथ हो कि इति इति हो सर्टेन अमाउंट ऑफ वैराग्य इज नेसेसरी इन बोथ पाथ। तो गृहस्थ आश्रम में भी रह करके जो एक एक्सेसिव अभी आपने जैसे कहा कि वह अह अपने पोतो कि उनके बर्थडे पे नृत्य करना। सो एट लीस्ट वी कैन लिमिट आवर एक्सपोज़र टू विषय के जो वस्तु है तो थोड़ा वैराग्य तो उसी से प्रारंभ हो जाएगा। और फिर नेचुरल इवोल्यूशन ही हमको नेति नेति की ओर ले जाएगा। और यदि मान लीजिए नहीं भी ले जाता है। हम सिर्फ ईश्वर के दर्शन को ही प्राप्त करते। वह क्या कम है क्या? [हंसी]

प्रश्न: क्या हमें अपने मन को आध्यात्मिक साधना के मार्ग पर खुद ही रास्ता खोजने देना चाहिए या हमें इंट्रोस्पेक्शन के ज़रिए उसे रास्ता दिखाना चाहिए?

देखिए इंट्रोस्पेक्शन करें अपने मन को इवॉल्व करें इसमें गलत तो कुछ नहीं मैंने सन्यास के बाद में मैं वहां पर गया था साधना सदन कनखल में साधना सदन है वहां पे 40 डेज का ज्ञान सत्र होता है तो दिन के पांच छ घंटे कंटीन्यूअस प्रस्थानत्रय सिखाते हैं गीता उपनिषद और ब्रह्मसूत्र तो मैंने देखा कि साधु सन्यासी तो चार पांच ही बैठे हैं। बाकी सब के सब गृहस्थ थे। 30 से 40 गृहस्थ उसमें भी ज्यादा करके सब गुजराती है। और ऐसा स्थिर होकर के जमीन पर बैठ के पांच छ घंटा यह प्रस्थानत्रय सुनते हैं। मैं बड़ा ही इंप्रेस हो गया था। मैंने कहा देखिए इसको कहते हैं डेडीकेशन। है ना? तो ऐसे भी लोग हैं कि उनको एक बार चलो एक लेवल पर आ गए हैं संसार में। अभी यह ज्ञान सत्रा करें। अभी यह साधुओं की बात सुने, अभी सत्संग करें। तो ऑटोमेटिक भीतर से होता है। सो इट कुड बी आइदर नेचुरल इवोल्यूशन। दूसरा है एक नेचुरल क्यूरियोसिटी होता है। लोग एक्सप्लोर करते हैं कि क्या है। चलो थोड़ा सा देखते हैं। एक्सप्लोर करते-करते आजकल तो सोशल मीडिया पे वो तो आपको पता है ना वो फिल्टर बबल कि आप जिस टॉपिक को खोजते हैं उसी टॉपिक के फिर आपको वो पोस्ट देना शुरू करेगा। तो वहां पे बहुत कुछ आपको मिलता जाएगा। सो आई मीन इट इज आइदर नेचुरल और योर क्यूरियोसिटी ड्रिवन एनी हाउ इट डज नॉट मैटर कि आप नेति में आते हैं कि फिर इति इति में ही रहते हैं। यदि आते हैं तो बहुत अच्छा है। खास करके देखिए रामकृष्ण संघ के जितने भी फॉलोअर्स हैं उनके सभी के मन में ये सब बेसिक आइडियाज वो क्लियर हो जाते हैं एक बार कि यह द्वैत है। यह अद्वैत है। ठाकुर का इस तरह का है, मां का इस तरह का, स्वामी जी इस तरह का। तो हमारे संघ में जो जुड़े हैं उन लोगों के लिए यह सब कोई डिफिकल्ट क्वेश्चन नहीं है। हम लोगों के लिए गियर चेंज करना बहुत ही सहज है। फिर यह जो मार्ग वगैरह में जुड़े हैं उन लोगों के लिए फिर बड़ा डिफिकल्ट हो जाता है कि अरे भाई अभी तक भक्ति कर रहे अभी ज्ञान में कहां जाएंगे? तो एक फिलॉसोफिकल रेजिस्टेंस उनमें इनबिल्ट रहता है। तो वो लोग जोर जबरदस्ती करके नहीं भी करेंगे। अभी संप्रदाय है वे लोग तो एकदम स्पष्ट कह देंगे कि नेति नेति मार्ग है पूरा भ्रष्टाचारी मार्ग है। ऐसा कुछ बोल देंगे तो वे लोग नहीं भी आते हैं तो चलेगा। अपने संप्रदाय को फॉलो कर रहे हैं। निष्ठा के साथ कर रहे हैं तो चलेगा वो। इसमें बहुत कुछ आप कौन से संप्रदाय को फॉलो कर रहे हैं उस पे है। राइट? अभी अभी जैन लोग हैं तो जैन लोगों का अपना खुद का है। वे लोग इति इति नेति नेति वह सब वोकैबलरी ही वहां पे नहीं है। उन लोगों का अपना एक पाथ है। अब भक्ति अभी ये चैतन्य संप्रदाय है या श्री वो वैष्णव संप्रदाय है। उन लोगों का यह स्वामी नारायण का है। वो सबका अपना-अपना संप्रदाय है। तो रामकृष्ण संघ एक संप्रदाय है। मान लीजिए क्रिश्चियन है, मुस्लिम है, बौद्ध है। तो अपने संप्रदाय को सिंसियरली फॉलो करते हैं तो भी चल जाएगा। यह देखिए यह जो फिलोसोफिकल यह जो वास्टनेस है ना इट इज अ यूनिकनेस ऑफ रामकृष्ण मिशन यहां पर आपको यह सब तरह की पद्धतियों का एक बेसिक आईडिया देकर के आपको कहते हैं कि हां जीवन में अवस्था के साथ में आपका फिलॉसोफिकल इवोल्यूशन भी होना चाहिए। बाकी सब जगह पे तो ऐसा नहीं है। हार्ड कोर जो द्वैत मार्ग है फॉर एग्जांपल वहां तो आप बोल ही नहीं सकते ये सब चीजों के बारे में वो तो ब्लासफेमी हो जाएगा। तो डज नॉट मैटर यू फॉलो योर संप्रदाय सिंसियरली क्रिश्चियनिटी के जो संप्रदाय है मिस्टिसिज्म जहां पर है वहां पर वो जीसस के साथ में वो जो आइडेंटिफिकेशन की बात है वो इमिटेशन ऑफ क्राइस्ट वो जो कांसेप्ट है सो वो एक हो गया फिर जैसे हार्ड कोर द्वैतिक उनके वहां पे फिलॉसोफी है तो वो है। सो दुनिया के 90% लोगों के लिए तो जिस संप्रदाय में है उस संप्रदाय को फॉलो करना है। उनको यह कहना कि आप द्वैत से अद्वैत में आइए तो उनको ऐसा कहने के बराबर हो जाए कि आप कन्वर्ज़ कीजिए जो कि फिर जोर से रेजिस्टेंस आएगा। मैं क्यों कन्वर्ट हूं? मेरे संप्रदाय में क्या गलती है। राइट? रामकृष्ण मिशन इटसेल्फ इज अ यूनिक प्रपज़िशन कि हम लोग ये सब को कन्वर्शन के रूप में नहीं देखते हैं। हार्ड कोर वोटाइट कंपार्टमेंट के रूप में नहीं देखते। हम लोग देखते हैं दीज़ आर द नेचुरल स्टेप्स ऑफ इवोल्यूशन।

प्रश्न: जितना ज़्यादा हम पढ़ते हैं, हमें एहसास होता है कि harmony के हमारे कॉन्सेप्ट में कितनी गहराई हैं!

हम लोग इसको वाटर टाइट संप्रदाय के रूप में नहीं देखते। हम लोग इसको कहते हैं फिलोसोफिकल स्टेप्स इन द इवोल्यूशन स्पिरिचुअल इवोल्यूशन ऑफ ह्यूमन। तो आप यदि आपका जो इंटेलेक्चुअल स्पिरिचुअल लेवल आपका कम है तो आप मैं हूं और ईश्वर हैं। फिर जैसे वैराग्य बढ़ता जाएगा, साधना बढ़ती जाएगी, स्पिरिचुअल स्ट्रेंथ बढ़ती जाएगी तो वैसे ही लगेगा मैं और मैं ही हूं वही ईश्वर वही जगत कारण जो कि मेरे हृदय में बैठा है। सो हम लोग उस समय रेजिस्ट नहीं करेंगे। बाकी जो दूसरे संप्रदाय वाले होंगे सिंसियर भी होंगे और यदि मान लीजिए उस लेवल पर आ जाए कि उनके इष्ट के साथ में एकाकार होने को जा रहा है तो वे लोग रेजिस्ट करेंगे कि आई एम डूइंग ब्लास्टेमी ऐसा नहीं होना चाहिए तो उन लोगों का प्रोग्रेस जो है ना स्टफल हो जाता है सो ये संप्रदाय एक तरह से है कि आपको एक स्पीड भी देता है फनेटिसिज्म देता है कि हां मुझे ऐसा करना ही है। तो शुरू शुरू के समय में ठाकुर कहते हैं ना कि पौधा जब छोटा है तो उसको यह बांध करके रखना है उसको बैरियर में उसको तो ऐसा है संप्रदाय ऐसा है आपको बांध करके रखेगा प्रोटेक्ट करके रखेगा किंतु एक बार पेड़ बड़ा हो जाए तो फिर तो आप बैरियर को तोड़ देना है तो वो आप तोड़ नहीं पाएंगे तो इसलिए वो स्वामी जी कहेंगे बोर्न इन अ चर्च बट नॉट ओके मैं एक्सैक्ट वही बोलने वाला था [हंसी] देखिए ठाकुर की खुद की साधना के दो क्लियर फेसेस हैं। पहले तो मां का नाम लेकर के रोते-रोते मां का दर्शन हो गया। स्पिरिचुअल लाइफ स्टेबलाइज हो गई। फिर कामार पुकुर जाकर विवाह किया। फिर जब 2 साल के बाद वापस आए तब कहीं जाकर के ये वाइडर रेंज ऑफ साधना है। वो उन्होंने बाद में प्रारंभ किया। पहले तो वो एक हृदय के आवेग से रो-रो करके एक लेवल ला दिया था उन्होंने। सो दैट लेवल ऑफ़ फेनेटिज्म इज़ नेसेसरी। उस समय यदि वो उस कंफ्यूजन में आ जाते कि मैं जिस मां के लिए रोता हूं मैं मैं खुद वही मां हूं तो मैं क्यों उनके लिए रोऊं तो फिर वो काम नहीं होता [हंसी]

प्रश्न: श्री रामकृष्ण ने विवाह क्यों किया?

जो कि नॉन मैरिड अवतार है बुद्ध है जीसस है खास करके ये दो भगवान बुद्ध और भगवान जीसस इन दोनों का जीवन देखिए और यह जो मैरिड अवतार है शक्ति के साथ में जो आए हैं भगवान राम भगवान कृष्ण भगवान राम राम कृष्णा देखिए कि किस तरह से कंट्रास्ट चलता है। अ हिंदू धर्म में यह दोनों फिलॉसोफी का एक साथ में अस्तित्व है कि एक तो द्वैत है एक अद्वैत है। अद्वैत का अर्थ क्या है कि ब्राह्मण जो है वो निराकार निर्गुण है। अव्यवहार्य है। खुद कुछ कार्य नहीं करता। किंतु फिर तो ये जगत में यह जो धर्म चक्र प्रवर्तन करना है वह कौन करेगा? उसको तो शक्ति को करना है। यानी शिव और शक्ति दोनों का आना आवश्यक है। शिव जो है वह ब्रह्म ज्ञान में मत रहेंगे। शक्ति के माध्यम से वह जगत संसार में धर्म को फैलाएंगे। तो बिकॉज़ कि यहां पे अद्वैत फिलॉसोफी एकदम स्पष्ट रूप से क्लियर है कि जो शिव है, जो ब्राह्मण है, वह अव्यवहार्य है। बोल करके जो कार्य करता है, उसको सेपरेटली लेकर आना पड़ेगा। जबकि यह बुद्धिज्म है और क्रिश्चियनिटी है। वह दोनों अद्वैतिक फिलॉसोफी नहीं है। नॉन अद्वैतिक है। यानी कि सगुण ब्रह्म के ऊपर में है। यह सगुण ब्रह्म जो है वो स्थिर भी रहता है, कार्य भी करता है। दोनों एक साथ में करता है। तो बोलकर के शक्ति को सेपरेटली लाने की जरूरत नहीं है वहां पे।

प्रश्न: संतान भाव कब विकसित हुआ? क्या ठाकुर ने इसकी सबसे पहले साधना की?

नहीं एक्चुअली आपकी बात बहुत हद तक सही है। देखिए संतान भाव के पीछे में आपको और एक कांसेप्ट भी डेवलप होना है। ईश्वर को मातृ रूप में देखना है। जब तक आप वैष्णव जो भावधारा है ईश्वर को पुरुष के रूप में देखा गया है। अवतार को पुरुष के रूप में देखा गया है। राम हो ना कि कृष्ण हो तो अब जितने भी दशावतार है सभी के सभी पुरुष है। तो नारी को अवतार के रूप में या तो नारी की आराधना यह जो पूरा स्ट्रीम जो है यह वैदिक स्ट्रीम यदि आप गिनेंगे तो यह शक्ति आराधना या तंत्र साधना एक पूरा पैरेलल स्ट्रीम डेवलप होता आ रहा है और विदिन शक्ति साधना आपको वीर भाव या संतान भाव दिख जाएगा। अभी शक्ति साधना का मेरा हिस्ट्री इतना क्लियर नहीं है बोल के मैं बोल पाऊं कि वहां पर वीर भाव तो खैर वह तो फेमस ही है। शक्ति साधना के भीतर में शक्ति को मां के रूप में किसने पूजा किया तो सबसे पहला नाम जहां तक मुझे याद आता है वो है राम प्रसाद का और फिर राम प्रसाद के बाद में आते हैं श्री रामकृष्ण। तो देखिए कि ठाकुर के खास करके ठाकुर को हम संतान भाव का एग्ेंपलर क्यों कहेंगे? क्योंकि वह वैष्णव और शक्ति साधना दोनों का मिलन उनमें हुआ है। तो यह जो अवतार का कांसेप्ट है वह भी ठाकुर को अप्लाई होता है। यहां पे जो शक्ति साधना का कांसेप्ट है वह भी ठाकुर को अप्लाई होता है। बोल के ठाकुर को संतान भाव का एग्ेंपलर कह सकते हैं। रेदर देन कि हम राम प्रसाद को कहेंगे क्योंकि रामप्रसाद के जीवन में यह फिर यह वैष्णव भाव का मिलन नहीं होता है। बोलकर के उनको अवतार कहना इस तरह का कोई कांसेप्ट वहां पे नहीं है। तो यहां पे आपको दोनों कांसेप्ट का मिलन होना चाहिए। तभी वह संतान भाव ठीक-ठीक कहलाएगा। वह भी अवतार के भीतर में। वैष्णव भाव और शक्ति साथ

प्रश्न: हम किसे अवतार कहते हैं?

किस तरह से आप डिफाइन करेंगे उसके ऊपर बहुत कुछ आ जाता है। अभी चैतन्य महाप्रभु भी तो थे। राइट? तो उनको तो हम अवतार गिनते हैं। तो फिर चैतन्य महाप्रभु को गिनेंगे तो फिर यह राम प्रसाद को क्यों नहीं? तो वो सब फैक्टर हो जाएंगे। सो रेदर देन सेइंग के वह अवतार है या नहीं। बेटर यह कहना है कि वह अवतार वाली जो थिंकिंग है उसमें वह नहीं आता है। किंतु ठाकुर का देखिए ठाकुर का यूनिकनेस यही है ना यहां पे यह वेदांतिक स्ट्रीम है। यहां पे यह वैष्णव स्ट्रीम है और यह शक्ति साधना है। तीनों स्ट्रीम्स का कॉम्बिनेशन ठाकुर में हुआ है। यह जो इंप्लिकेशन है ना इसका इट स्टिल नीड्स टू बी वर्क्ड आउट। यह संतान भाव है। अवतार के भीतर संतान भाव ठाकुर का ही हो सकता है। क्योंकि ठाकुर ही पहले इस तरह के अवतार है जो कि शक्ति साधना को उन्होंने संपूर्ण रूप से स्वीकार किया। देखिए भगवान राम ने भी मां दुर्गा की उपासना की थी। वो सब चीजों से तो कोई मना नहीं कर सकता है। किंतु ये जो फुल फ्लेजेड शक्ति साधना है वो ठाकुर के जीवन में ही मुझे लगता है कि ज्यादा एग्िंपलीफाई हुई है। देखिए रामलल्ला की आराधना होती है यानी कि बालक राम है संतान भाव है। किंतु टू बी वेरी फ्रेंक यह रामलल्ला या तो फिर यह इवन बालकृष्ण इनकी आराधना जो है या तो फिर यह भाव का जो प्रचलन जो है वो प्रचलन मुझे नहीं लगता कि वो मिडीवल इंडिया में इतना हुआ है। जो कि ठाकुर ने जितना किया है। मुझे नहीं लगता उनके भीतर में और भी बहुत सारे भगवान राम का मुख्य भाव कहे तो शांत भाव ही है। भगवान कृष्ण का मुख्य भाव कहे तो फिर भगवान कृष्ण के साथ में यह मधुर भाव ही ज़्यादा जुड़ा हुआ है। जबकि संतान भाव मुख्यत्व ठाकुर में देखने को मिलता है। ठाकुर के भीतर में सब भाव है। मधुर भाव भी है। किंतु एग्जिंपलीफाई कुछ भाव को करते हैं। तो वह संतान भाव को एग्ेंंपलीफाई करते हैं। ठाकुर ने कहा ना मां ने मुझे संतान भाव में रखा है। मधुर भाव में नहीं रखा। साधना के अंत में संतान भाव में उनको रखा है।

प्रश्न: ठाकुर ने अपने अंदर सभी भावों को कितनी आसानी से एकरूप कर दिया था!

यह जो युग धर्म का एक प्रभाव है ना देखिए लीला प्रसंग में तो शरद महाराज स्पष्ट कहते हैं कि अवतार के साधक जीवन का इतना डिस्कशन नहीं हुआ है। क्यों? क्योंकि साधना के समय में अवतार इस तरह की डिफरेंट-डिफरेंट साधना को फॉलो करते थे। भक्त यह देखना नहीं चाहता। भक्त तो युग साधना को ही देखना चाहता है। भगवान राम युग साधना है शांत भाव। यह भगवान कृष्ण की युग साधना को कहेंगे मधुर भाव। तो भगवान रामकृष्ण की युग साधना या युग धर्म जो हमको देकर गए वो कहेंगे कि यह संतान भाव। अभी संतान भाव तक जाने के लिए उन्होंने जो साधनाएं की डिफरेंट-डिफरेंट वो साधक नहीं देखना चाहता। वो ये नहीं देखना चाहता कि ठाकुर ने मधुर भाव भी किया है। यह भी किया है। सब आखिर में वह संतान भाव में है। तो वैसे ही ये भगवान राम के भक्त भी यह नहीं देखना चाहेंगे कि भगवान राम क्या भगवान कृष्ण की तरह वो म एक चंचल बालक थे ऐसा नहीं देखना चाहते। उनको शांत भाव उन्होंने सिखाया है तो जीवन भर शांत भाव में ही है। वो ना ही उनको फिर ये चंचल भाव में देखना चाहते ना ही मधुर भाव में देखना चाहते। तो क्या है कि हम लोग ये युग धर्म को ही देखना चाहते हैं। जैसे ही युग धर्म देख लिया बाकी दूसरे जो भी साधनाएं की है ना हमको लगता है अरे सम हाउ दिस इज अ ब्लास्ट मेनी। तो इसीलिए ठाकुर की यह यूनिकनेस भी है कि अल्टीमेटली देखिए लीला प्रसंग नहीं लिखा गया होता। तो हम ठाकुर को एक संतान भाव के साधक के रूप में ही पहचानते। हम कहेंगे कि ठाकुर ने हम सबको संतान भाव ही सिखाया है। बट बिकॉज़ कि युग लीला प्रसंग लिखा गया है। हमको पता चला है व्हाट इज द मैकेनिज्म विनीत द हुड या स्विच वॉच खोलेंगे वो स्विस वॉच इतना परफेक्ट काम करता है। किंतु उसको खोलेंगे। इतने सारे इंट्रिकेट गियर सिस्टम है उसके भीतर में। सो ये विनीत द हुड एक नजारा हमको ये लीला प्रसंग में मिलता है। [हंसी] ओम