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Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 7 may 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग ठाकुर का प्रामाणिक जीवनी [संगीत] स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा लिपिबद्ध इसका द्वितीय भाग साधक भाव उसका प्रथम अध्याय साधक और साधना इसका हम पाठ कर रहे थे। ऑलरेडी हमने देख लिया कि किस तरह से

चार योगों के समन्वय से ज्ञान की प्राप्ति

साधक भक्ति मार्ग का आश्रय करके भी ज्ञान मार्ग का जो सर्वोच्च उपलब्धि है उसको प्राप्त कर सकता है। पहले तो कोई भी साधना हो चाहे ज्ञान मार्ग की साधना हो ना कि कर्म मार्ग की या तो भक्ति मार्ग की या तो फिर यह राज योग हो ध्यान मार्ग की साधना जो चार योग हमारे जो मुख्यत्व रूप से प्रदर्शित किए गए हैं कर्म ज्ञान भक्ति और ध्यान ये चारों साधनाओं में सर्वप्रथम तो स्टेज है कि यह जो अपना मन मन इस संसार के साथ में दृढ़ रूप से जो आबद्ध हो गया है उससे उसको वापस खींच करके लाना है। तो यह प्रथम स्टेप हो जाता है। दूसरा कि अपने मन के भीतर में जितने भी विकार चल रहे हैं जितने भी ये संकल्प विकल्प उठ रहे हैं जितना यह कामना वासनाओं का प्रवाह बह रहा है उससे भी अपने मन को अपने को सेपरेट कर लेना है। तो देखिए कि ज्ञान योग में तो यह दो स्टेप है ही है। किंतु क्या है कि ज्ञान योग कहता है कि यदि आपने सही सही में अपने को यह जगत के पूरा जो प्रपंच है और यह जो बाह्य जगत का प्रपंच और यह आंतर जगत की माया जाल जैसे ही इन दोनों से अपने को विमुख कर लिया साथ में ही हमारा जो सही स्वरूप है सच्चिद आनंद वह प्रकट हो जाएगा। किंतु यह जो मार्ग है अपने को सांसारिक विषयों से संपूर्ण रूप से वापस खींच लेना संपूर्ण त्याग संपूर्ण वैराग्य 100% ब्रह्मचर्य यह बहुत कम लोग ही कर पाते हैं। इसलिए बाकी के जो तीन योग है उसमें और एक स्टेप दर्शाया गया है। ज्ञान योग की तरह सर्वप्रथम तो संसार से यह जो बाह्य जगत है उसके ये जो प्रपंच है उसके यह जो सब आपके एंटेंगलमेंट्स है रिस्पांसिबिलिटीज है उससे तो सर्वप्रथम मन को धीरे-धीरे करके वापस खींचना ही है। मन के खुद के भीतर में जो कामना वासनाओं का प्रवाह तरंग रूपी जो चल रहा है उससे तो मन को खींचना ही है। यह दो तो आइडेंटिकल है। ज्ञान योग के साथ में किंतु फिर यह भक्ति मार्ग, कर्म मार्ग और यह ध्यान मार्ग राजयोग का इन तीनों में और एक स्टेप है कि कोई भी एक ऑब्जेक्ट के ऊपर में अपने मन को एकाग्र करना है। अब जैसे भक्ति मार्ग में हम इष्ट के ऊपर में अपने को एकाग्र करेंगे। मन को कर्म योग है। उसमें जिनकी सेवा कर रहे हैं उनके ऊपर में जो हमारा सेवा भाव है उसके ऊपर में मन को एकाग्र करेंगे और ध्यान मार्ग तो लेजिटमेट मन को एकाग्र करने की साधना है। देश बंद चित्तस्य धारणा तत प्रत्यय एकानता ध्यानम तदैव अर्थ मात्र निर्भासम स्वरूप शून्यम इव समाधि तो वो तो एक लेजिटमेट मन को एकाग्र करने का साधन है। पहले तो कोई भी एक ऑब्जेक्ट के ऊपर में मन को एकाग्र कीजिए। यह हो गया धारणा। उसके प्रति एक ताल से एक लय से अपने मन को प्रवाहित होने दीजिए। वह हो गया ध्यान। और जो ऑब्जेक्ट है ध्यान का ऑब्जेक्ट धेय जो है वही रहेगा। ध्यान करने वाला जो है ध्याता जो है वह अदृश्य हो जाएगा। तो फिर हो जाएगा यह सविकल्प समाधि। तो यहां पर देखिए कि यह तीनों मार्ग में एक एक्स्ट्रा स्टेप हमको सविकल्प समाधि का एक बताया गया है कि इष्ट के ऊपर में सेवा भाव के ऊपर में और फिर या ऑब्जेक्ट ऑफ मेडिटेशन के ऊपर में मन को इस तरह से एकाग्र कीजिए कि यह जो संसार है और यह मन का यह जो तरंग है तरंग तूफान है मन का इन दोनों से अपना मन जो है हमारी की जो एकाग्रता है पूरे दोनों से वापस आके यह ऑब्जेक्ट ऑफ कंसंट्रेशन के ऊपर में एकाग्र हो जाए और फिर इसको काट देंगे जैसे ही माने आखिरी अवस्था में साथ में ही यह निर्विकल्प समाधि में हम स्थित हो जाएंगे तो यह ज्ञान मार्ग है और यह बाकी के कर्म कर्म ध्यान और भक्ति यह तीन मार्ग है। ये चार मार्ग में जो मेनली अपना हिंदू धर्म की साधन पद्धति मुख्यत्व रूप से हमको प्रदर्शित की गई है। तो यह हमने कल देखा और इसके बाद में अभी जो नया पॉइंट है वो अभी हम देखते हैं। देखिए मैं कल थोड़ा सा सोच रहा था कि खास करके जिस तरह से शरद महाराज ने डिस्क्रिप्शन दिया है तो एक तो मन जो है यदि भक्ति मार्ग में भी अपने इष्ट पर मन को एकाग्र करना है आपको वैराग्य तो चाहिए ही चाहिए एक दृढ़ संकल्प तो चाहिए ही चाहिए शक्ति समाहित मन चाहिए शक्ति में प्रतिष्ठित मन चाहिए तो फिर भक्ति मार्ग में भी यदि स्पष्ट स्पष्ट रूप से वैराग्य, संकल्प शक्ति और यह यह जो मन का यह जो आत्मश्रद्धा वगैरह जो गुण है जो कि सामान्यतः हम ज्ञान साधना के साथ में जोड़ते हैं तो वे तो भक्ति मार्ग में भी चाहिए। तो फिर यह जो भारत का जो अध पतन हुआ था पिछले 1000 साल से उसके पीछे का कारण क्या था? हमने थोड़ा सा डिस्कस किया था कल। एक तो यही कारण है कि भक्ति का जो डेफिनेशन है भक्ति को जिस रूप में हमको लेना है माने उल्लसित भक्ति सिंह विक्रम से जो ठाकुर नृत्य करते हैं जो एक संपूर्ण आत्मश्रद्धा से भरपूर भक्ति वो शायद हम भूल गए और एक दीनहीन भक्ति में हम लोग प्रवेश कर गए तो यह एक हो सकता है कि पिछले 1000 साल में हमारे अध पतन का कारण रहा हो। ऑफकोर्स यह आप सब कुछ धर्म को इसके लिए बदनाम नहीं कर सकते। इसके लिए जो हमारी आर्थिक, सामाजिक और यह जो पॉलिटिकल व्यवस्था थी वो भी काफी हद तक जवाबदार थी। यह जो नात जात का जो जुनून हमारे सर के ऊपर में उठा था। तो वो भी एक बहुत बड़ा रिस्पांसिबिलिटी वो भी एक बहुत बड़ा फैक्टर था। और फिर एक दूसरा भी पॉइंट हमने पहले भी एक बार डिस्कस किया था कि जब इवोल्यूशन आना है तो कोई भी स्पीशीज जो है अपनी संपूर्ण शक्ति कोई एक ट्रेट के ऊपर में कोई एक लाक्षणिकता के ऊपर में लगा देती है। जिससे क्या होगा? बाकी सब जगह से वह कमजोर हो जाएगा। किंतु जो एक लाक्षणिकता जो एक बिहेवियरल पॉइंट के ऊपर में उसने अपनी शक्ति लगाई है उसमें वह बहुत तगड़ा हो जाएगा। तो पिछले 1000 साल में हमने अपनी प्राण शक्ति को आध्यात्मिकता के ऊपर में केंद्रित किया है। जिसके परिणाम से श्री रामकृष्ण देव का अवतरण हुआ। यह जो पिछले 1000 साल की हमने गुलामी जो भुगती है, पिछले 1000 साल की प्रचंड तपस्या जो भारतीय समाज ने की है, उसका यह जो फलश्रुति है, उसका ये जो आउटकम है वो है श्री रामकृष्ण। और अभी देखिए कि यदि हमको अभी डेवलप होना है भविष्य में तो श्री रामकृष्ण के पद कमल पर चलते-चलते ही हम लोग डेवलप होंगे। क्योंकि ऑलरेडी इवोल्यूशनरी स्टेप नेक्स्ट इवोल्यूशनरी स्टेप जो है वह ले लिया ले लिया जा चुका है। अभी हमको सिर्फ उसको फॉलो ही करना है। तो यह सब हमने डिस्कस किया है। अभी एक नया टॉपिक प्रारंभ होता है। यह जो टॉपिक है यह

भगवान के अवतार को साधना करने की क्या आवश्यकता है?

प्रथम अध्याय का आखिरी टॉपिक है कि अवतार जीवन में साधक भाव या तो फिर अवतार जीवन में यह दे माने यह मनुष्य और देव भाव यह दोनों एक साथ में कैसे चल सकते हैं? एक आम आदमी जो एक सामान्य साधक जो है वह साधना करता है, गिरता है, खड़ा होता है, गिरता है, फिर से कमर कस के फिर से साधना करने को लग जाता है और फिर आखिर में साधना में सिद्धि प्राप्त करता है। जैसे कि भगवान बुद्ध के बारे में वे लोग हम लोग भले ही चाहे उनको अवतार के रूप में गिने वे लोग तो ऐसा अपने से ऐसा नहीं कहते। भगवान बुद्ध ने भी ऐसा कोई डिक्लेअ नहीं किया था। तो फिर भगवान बुद्ध का जो जर्नी है एक आम आदमी का एक जर्नी को हम देख सकते हैं। बहुत तपस्या की कितनी बार गिरे होंगे कितनी बार खड़े हुए होंगे और फिर आखिर में निर्वाण प्राप्ति की। तो एक आम आदमी का एक सामान्य साधक का जो जर्नी है टुवर्ड्स दिस फुलफिलमेंट टुवर्ड्स द गोल सुप्रीम वह तो हमको समझ में आता है किंतु एक अवतार है। अच्छा एक ईश्वर जो है वो भी तो हमको समझ में आता है कि ईश्वर तो है संपूर्ण ही है। उनको साधना करने की जरूरत नहीं। तो यहां पे भगवान विष्णु है, भगवान शिव है, ये जो मां सरस्वती है, मां काली है। उनका तो जो दिव्यत्व ही इतना प्रचंड है कि जिस दिव्यत्व को प्राप्त करने के लिए मनुष्य साधना करता है वह तो इन्होंने प्राप्त कर ही लिया है तो उनको साधना करने की जरूरत नहीं तो एक तो है ईश्वर जो कि ऑलरेडी संपूर्ण है और एक है आम आदमी जो कि अपूर्णता से पूर्णता की ओर साधना करता है। पूर्णता की ओर जाने के लिए पूर्णत्व प्राप्त करने के लिए साधना करता है। तो यह दो तो हमको समझ में आते हैं। किंतु अवतार जीवन में साधना यह थोड़ा सा समझना मुश्किल है। क्यों? यदि यदि आप कहेंगे कि अवतार है वह तो ईश्वर ही है। बस वह मुखौटा पहनकर के नाम रूप का जमीन पर अवतरित हुए हैं। तो फिर उनकी साधना का कोई मतलब नहीं रह जाता। वो तो पूर्ण ही है। पूर्णत्व को पूर्णत्व को प्राप्त करने के लिए साधना क्यों करेगा? तो वो तो एक बात है। दूसरा है कि यदि हम अवतार को सिर्फ एक आम आदमी के रूप में गिने तो फिर एक आम आदमी के जीवन में साधना में इतनी प्रचंड सिद्धि प्राप्त होती हुई हम कभी नहीं देख पाते हैं। वो जो तोतापुरी ने कहा था कि ठाकुर को तीन ही दिनों में समाधि प्राप्त हो गई तो तोतापुरी क्या कहते हैं? अरे ये क्या है? उन्हें इस तरह से वो आश्चर्य से चिल्ला उठे थे। तो हिंदी में वो भी तो देखिए कि जो चीज एक सामान्य साधक तोतापुरी के मोनेस्ट्री का विवरण पता है ना एक जगह पे है वो पंजाब में कहीं पर उनका मोनेस्ट्री था तो वहां पर नागा साधु तो नागा साधु को कैसे ट्रेन करना है तो पहले तो एक अच्छा सा एक गद्दी के ऊपर में बैठकर के ध्यान करने को कहेंगे फिर उसके ऊपर में उसको प्रैक्टिस हो गया लंबा समय बैठने का फिर एक पतले आसन पर बैठकर ध्यान करने को कहेंगे। तो अभी उसके ऊपर में लंबा समय बैठ के ध्यान करने का हैबिट हो गया तो यह पतला वाला आसन भी हटा देंगे। फिर मिट्टी में बैठकर के ध्यान करने को कहेंगे। तो यह जो सब है पहले गद्दी पर बैठना है। फिर पतले आसन पर बैठना है। फिर मिट्टी में बैठना है। धीरे-धीरे करके वस्त्र त्याग करने हैं। पहले तो ऊपर का देह जो है वह अनावृत करना है। किंतु एक धोती जैसा पहन के रखना। फिर जैसे उसका हैबिट हो गया तो धोती हटा देना। कौपिन पहन के रखना। फिर उसका हैबिट हो गया तो कौपिन हटा देना। ठाकुर के जीवन में देखिए ध्यान करने को बैठते थे तो वह कहां पर बैठते? गद्दी पर बैठते हैं ना कि आसन पर बैठते हैं कि मिट्टी पर बैठते हैं वो कोई फर्क नहीं पड़ता। जैसे ही बैठे वह खटखट करके आवाज आती थी और जैसे कि उनके जितने भी जॉइंट्स है लॉक हो जाते थे और यह दिगंबर होना वो ऐसा प्लान करके कि स्ेड्यूल बना करके कि पहले टाइम टेबल बना करके पहले धोती निकालने पहले वो यह जो शर्ट निकालना है फिर धोती निकालनी ऐसा कुछ नहीं। जब भाव में आते थे तो अपने ही वस्त्र निकल जाते थे। अपने से ही एक सदानंद शिशु की तरह पवित्र पूर्ण सदानंद शिशु की तरह दिगंबर हो जाते थे। उनके लिए सब कुछ सहज था। तो फिर हम समझ ही सकते हैं कि कहां इस तरह का एक कठोर परिश्रम करके तोतापुरी जी की तरह आप पूर्णत्व प्राप्त करते हैं और कहां ठाकुर सहज रूप से पूर्णत्व में प्रतिष्ठित हो जाते हैं तो फिर आप ठाकुर को मनुष्य के रूप में कैसे गिनेंगे और फिर यदि आप उनको ईश्वर के रूप में देखते हैं तो फिर उनको साधना करने की क्या जरूरत है यानी तो कंफ्यूजन हो गया ना क्या ठाकुर पूर्ण है कि नहीं पहले यह बताइए यदि पूर्ण है तो साधना करने की क्या जरूरत है? यदि अपूर्ण थे तो फिर साधना में इतना फटाफट करके इतना शीघ्र सिद्धि किस तरह से लाभ कर दिया जो कि हमारे एक आम आदमी के तो बस की बात ही नहीं। तो यह कंफ्यूजन जो है वो थोड़ा सा प्रकट होता है। तो इसके लिए ही यह जो प्रथम अध्याय का आखिरी पॉइंट है उसमें अवतार पुरुष के जीवन में यह जो देव और मानव ये दोनों भाव का समन्वय कैसे होता है? यह आखिरी पॉइंट में शरद महाराज डिस्कस करते हैं। किंतु साथ में ही इसके बाद वाला जो चैप्टर है द्वितीय चैप्टर उसका टाइटल ही दिया है अवतार जीवन में साधना। अवतार के जीवन में साधना। तो अवतार जीवन में साधक भाव। तो उसमें पूरा इसी को लेकर के पूरा चैप्टर उन्होंने डिस्कस किया है कि ठाकुर अवतार भी है और साथ में वह साधना भी करते हैं। अवतार है इसलिए ईश्वर का एक पूर्णत्व का अंश तो उनमें है ही है किंतु साथ में साधना भी करते हैं। तो अब जैसे देखिए अह ठाकुर ने तो कहा ही था अह कि जो राम जो कृष्ण वही राम कृष्ण किंतु तुम्हारी वेदांत की दृष्टि से नहीं। वेदांत ऑलरेडी कहता है कि राम और कृष्ण तो जाने ही दीजिए। जो सर्वोच्च सत्ता है पूरे विश्व में माने पूरी यह क्रिएशन में पूरी रियलिटी में जो एकमात्र जो सर्वोच्च सत्ता है वह है ब्राह्मण। और यह ब्राह्मण ऑलरेडी मेरा स्वरूप है। तो फिर इसमें राम और कृष्ण की तो मुझे चिंता ही नहीं करनी। किंतु ठाकुर कहते हैं कि नहीं इस वेदांत की दृष्टि से नहीं कहता कि सबके भीतर में सर्वम खलवम इदम ब्रह्मन सभी के भीतर में वही ब्रह्मन है। अहम ब्रह्मास्मि मैं ब्रह्म हूं। तत्वमसी तुम ही ब्रह्म हो। वो उस दृष्टि से नहीं। वेदांत के महावाक्य की दृष्टि से नहीं। भक्ति मार्ग में अवतारवाद की दृष्टि से ठाकुर अवतार है। तो फिर यहां पर काफी सारे प्रश्न खड़े होते हैं कि यह जो वेदांत है और यह अवतारवाद है। यहां पर रिकंसिलिएशन कैसे होता है? वगैरह-वगैरह, तो फिर यह अवतारवाद क्या है? अवतार के जीवन में साधक भाव का क्या प्रयोजन है? यह पूरा इस चैप्टर में शरद महाराज डिस्कस करते हैं। तो अब अभी हम क्या करेंगे कि यह प्रथम अध्याय का यह जो आखिरी पॉइंट है वो पढ़ लेते हैं और उसके बाद में जो है यह द्वितीय अध्याय उसको प्रारंभ करेंगे। तो क्या कहते हैं शरद महाराज? पहले तो इस पॉइंट का टाइटल क्या दिया है? अवतार पुरुष देव और मानव उभय भाव विद्यमान थाकाय साधन काले तहा दग के सिद्धेर न्याय प्रतीत होय देव और मानव उभय भावे तहा दग जीवन आलोचना आवश्यक अवतार पुरुष में देव और मानव दोनों भाव रहने की वजह से दोनों भाव विद्यमान रहने की वजह से विद्यमान होने की वजह से साधन काल के साधन काल में उनको सिद्ध की तरह प्रतीत होता है। हम उनको सिद्ध की यह जो गुणावली है हम उनमें देखते हैं। देव और मानव दोनों भावों का एक साथ में लेकर के उनके जीवन की आलोचना आवश्यक है। तो ऑलरेडी जब यह लोग साधना करते हैं, हमको यह सिद्ध ही प्रतीत होते हैं कि अरे ठाकुर फटाफट करके यह जो भैरवी ब्राह्मणी कहां से एक निव अ एक दिगंबरी एक स्त्री को लेकर आई। ठाकुर को कहा कि इनकी गोद में बैठकर के आप जप कीजिए। अभी ठाकुर जैसे ठाकुर ने पहले तो मां काली को पूछा कि अरे तुम्हारे ये कमजोर संतान को तुम ये किस तरह की परीक्षा में डालती हो? किंतु फिर जैसे ही वह उन्होंने देखा कि मां काली का नाम लिया भीतर में से साहस प्रकट हुआ उस स्त्री की गोद में बैठे और जैसे ही जप करना प्रारंभ किया वैसे ही समाधि में मग्न हो गए और जब समाधि भंग हुई तब भैरवी ब्राह्मणी उनको कहती है कि बाबा है वो भैरवी ब्राह्मण उनको बाबा करके पुकारते थे तो देखिए बाबा कि और कोई होता तो इस अवस्था में कैसे भी करके अपने मन को संयमित करके करके कैसे भी करके थोड़े से जप करके फटाक करके वहां से खड़ा हो जाता। 99% का तो वहीं पर पतन होता किंतु जो 1% जो कि इस भाव में सिद्ध इस साधना में सिद्ध होते हैं। कैसे भी करके अपने मन को संयमित करके कुछ ही क्षणों में फिर से खड़े हो जाते हैं। किंतु आपने सिर्फ जप नहीं किया। आप तो उसकी गोद में बैठकर के समाधि में मग्न हो गए। अर्थात कि यह जो वीर भाव जो है वीरासन रूपी यह जो साधना है उसमें आप सिद्ध हो गए हैं। तो देखिए कि कहां एक जनरल साधक, एक सिद्ध साधक और कहां यह अवतार साधक कितना डिफरेंस हमको दिखाई देता है। तो दोनों है इनके जीवन में। एक तो जब साधना करते हैं तो बहुत ही शीघ्र सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं तो फिर हमको प्रश्न होगा कि यह मनुष्य है ही नहीं। यह तो देव है। तो यदि देव है तो फिर साधना करते ही क्यों है? क्या हमारी आंखों में धूल झोंकने के लिए? क्या? तो यह सब प्रश्न खड़े होते हैं। इसलिए शरद महाराज कहते हैं देव और मानव दोनों भाव से इनके साधक भाव की आलोचना करना उनके साधक भाव का एनालिसिस करना आवश्यक है। ज्ञानी

अवतार में दिव्य और मानवीय, दोनों भाव होते हैं। इसलिए साधना करते समय भी उनमें सिद्ध पुरुषों जैसी शक्तियाँ दिखाई देती हैं।

एवं भक्त साधक कुलेर चरम लखे उपनीितो होइबार ओई रूप क्रम शास्त्र निर्धारितो ज्ञानी और भक्त साधक कुल का चरम लक्ष्य में उपनित होने का यह क्रम शास्त्र निर्धारित है। पहले तो यह कह दिया कि किस तरह से भक्ति मार्ग से जो निर्विकल्प समाधि में जा सकते हैं, उसके बारे में यह पहला सेंटेंस है जो कि ऑलरेडी हमने डिस्कस कर लिया कि ज्ञानी हो कि भक्त हो उनका जो चरम लक्ष्य में उपनित होना चरम लक्ष्य निर्विकल्प समाधि को प्राप्त करना यह मार्ग है। यह तो हमने ऑलरेडी डिस्कस कर लिया। ज्ञानी जो है बाह्य जगत और अंत जगत दोनों में से जैसे ही अपने मन को संकुचित कर लेता है जैसे ही अपने मन को रिट्रीट कर लेता है रिट्रैक्ट कर लेता है साथ में ही वह निर्विकल्प समाधि में मग्न होता है और जो भक्त है यह जो बाह्य जगत और आंतर जगत दोनों से अपने मन को रिट्रैक्ट करके ईश्वर के ऊपर में केंद्रित करता है और फिर आखिर में यही ईश्वरीय भाव को भी काट देता है और निर्विकल्प समाधि में मग्न होता है। तो शास्त्र में ज्ञानी और भक्त दोनों जो साधक हैं उनके लिए चरम लक्ष्य निर्विकल्प समाधि में स्थित होने का क्या उपाय है वो ऑलरेडी डिस्कस किया गया है और हमने भी उसको डिस्कस कर लिया है। अवतार पुरुष शकले किंतु देव एवं मानव उभय भाबेर एकत्र सम्मिलन आजीवन विद्यमान थाकाय साधन काले तहा दिग के कोखन कोखन सिद्धे न्याय प्रकाश और शक्ति संपन्नो देखते पावा जाए अवतार पुरुषों में परंतु देव और मानव दोनों भाव का एकत्र सम्मिलन आजीवन रहने की वजह तरह से साधन काल में ही उनके भीतर में कभी-कभी सिद्धि की तरह प्रकाश और शक्ति देखने में आती है। शरद महाराज की वाक्य रचना तो अवतार पुरुष में किंतु देव और मानव दोनों भावों का सम्मिलन है। मानव है बोलकर के साधना करते हैं। मानव नहीं होते तो साधना की आवश्यकता ही नहीं थी। देव है बोलकर के जो साधना करते हैं उसमें बहुत ही शीघ्र वो प्रगति करते हैं। यह ऐसा हो गया पता है यह पुनर्जन्मवाद पुनर्जन्मवाद को लेकर के काफी कुछ डिस्कशन चलता है। अभी कभी-कभी क्या है कोई कहता है कि पुनर्जन्म यदि बिल्कुल ठीक होता तो आप तो पहले वाले जन्म में जो आपका नॉलेज था जो आपकी स्किल थी वह तो लेकर के ही आप जन्म लेंगे। मान लीजिए पिछले जन्म में आप बहुत ही अच्छे संगीतकार थे। बहुत ही अच्छे गायक थे। तो अभी इस जन्म में क्यों आप इतना अच्छे से नहीं गा पाते? तो यह एक प्रश्न होता है। दूसरा है कि कोईकोई बच्चों के जीवन में हम देखते हैं बहुत ही छोटी उम्र में वे लोग कोई भी एक विद्या सिद्ध हस्त कर लेते हैं। जिनको कि हम प्रोड जी कहते हैं। छोटी सी उम्र में ही चेस में मास्टर हो गए। छोटी सी उम्र में ही बहुत ही अच्छा तबला बजा देते हैं। छोटी सी उम्र में ही बहुत अच्छे गायक हैं। तो फिर कहा जाता है कि पिछले जन्म में वो इस जो यह स्किल जो है यह विद्या जो है उसमें वो एक्सपर्ट होंगे। इसलिए इस जन्म में बहुत ही छोटी उम्र में इन्होंने यह विद्या सीख ली है। जिनको कि हम प्रोडी जी कहते हैं इंग्लिश में। प्रोडीजी चाइल्ड प्रोडजी अर्थात कि बहुत ही छोटी उम्र में कोई एक विद्या ये लोग बहुत ही एक्सपर्ट के रूप में सीख लेते हैं। चाहे वो मैथमेटिक्स हो चाहे वो तबला बजाना हो चाहे ये और कुछ भी हो। आप थोड़ा सा न्यूज़पेपर खोल के अभी तो आजकल न्यूज़पेपर क्या है? एआई को सर्च मार दीजिए। इआई में एक सर्च लगा दीजिए। चाइल्ड प्रोडजी ऐसा बोलकर के तो बहुत सारे एग्जांपल आपको मिल जाएंगे। अभी दो प्रश्न है यहां पे। यदि पिछले जन्म का सब कुछ याद रहता तो फिर यह पहले नेक्स्ट जन्म में उनको सीखने की जरूरत ही क्या पड़ी माने बचपन से ही तो वो सीख लेते बिल्कुल जन्म के साथ में ही तो सीख करके आते किंतु ऐसा तो नहीं पहले तो छोटी उम्र में भी सीखा तो है भले ही चाहे सीख के बहुत ही स्पीडीली उन्होंने उसमें सिद्धि प्राप्त कर दी है किंतु एक बार तो अच्छे टीचर को रख के सीखना तो पड़ा है तो फिर वह सीखने की क्या आवश्यकता थी और आप कहेंगे पिछला जन्म है ही नहीं तो फिर आप कैसे एक्सप्लेन करेंगे कि इतना फास्ट वे लोग सीख लेते हैं तो यहां पे प्रोड जी और यह जो पुनर्जन्मवाद इसको लेकर के एंडलेस डिबेट है तो यहां पे भी ऐसा है कि यदि मनुष्य है तो फिर इतना जल्दी साधना में सिद्धि क्यों प्राप्त कर लेते हैं और यदि इतना जल्दी साधना में सिद्धि प्राप्त करते हैं बोलकर के आप उनको देव कहेंगे तो प्रश्न होगा कि साधना करने की आवश्यकता ही क्या है? तो यह जो कंफ्यूजन है वो यहां पर रहेगा ही और इसीलिए अवतार पुरुष के जीवन में देव और मानव दोनों भावों का एकत्र सम्मिलन हमेशा उनके उनके संपूर्ण जीवन में देखने को मिलता है और इसीलिए साधन काल में साधना के समय उनको कभी-कभी सिद्ध की तरह प्रकाश और शक्ति से संपन्न देखने में आता है देव एवं मानव उभय भूमि ते तहा दग स्वभावत विचरण कर बार शक्ति थाकात ते ओई रूप होया थाके देव एवं मानव दोनों जगत में उनको स्वभावत विचरण करने की शक्ति है बोलकर के ऐसा होता है। कभी यह ह्यूमन प्लेन पर रहेंगे। कभी यह डिवाइन प्लेन पर रहेंगे। डिवाइन प्लेन पर रहकर के साधना करेंगे तो फटाफट करके उसमें सिद्धि प्राप्त करेंगे और जो ह्यूमन प्लेन पर रहकर के यह जगत के जितने भी यह अच्छे बुरे फल है वह भी भुगतते हैं। बोलकर के ही ठाकुर ने कहा कि पंचभूतेर फांदे ब्रह्म पड़े कांधे। भगवान जो पंचभूत का जो फंदा है पंचभूत रूप जो ट्रैप है उसमें पकड़ उसमें गिर कर के ब्रह्म भी रोता है तो भगवान राम भी पता ही था कि अवतरण ही हुआ है। वह रावण का वध करने के लिए सब कुछ प्रीऑर्डिन था कि मां सीता का अपहरण होगा। उनको लंका पे जाना है। उस पर अटैक करना है। रावण वध करना है। मां सीता को छुड़वाना है। किंतु फिर भी वह मां के लिए रोए थे। तो क्या है कि जभी वो कभी-कभी वो उच्च दिव्य अवस्था में रहते हैं। कभी-कभी मनुष्य अवस्था में रहते हैं। और इसमें भी ऊपर में आना जाना। इसके लिए ठाकुर का भी कहना है पता है ना स रे गा मा पा धा नी यह जो नी जो है ना तीव्र स्वर है उस स्वर में आप बहुत लंबा समय गा नहीं सकते हैं। आपको थोड़ा सा दो-तीन सुर नीचे आ जाना पड़ेगा। सा रे गा मा पा धा यहां तक आप गाते हैं तो ठीक है। नी में आप थोड़ा सा ही आलाप कर सकते हैं। उसके बाद में दो-तीन जो स्टेप्स है आपको नीचे आ जाने पड़ेंगे। तो यहां पे भी उनका जो मन है वैसे तो मनुष्य पूर्ण मनुष्य लेवल पे नहीं रहता ऊपर में ही रहता है किंतु साथ में ही पूर्ण देवत्व के लेवल पे भी लंबा टाइम नहीं रहता थोड़ा सा नीचे आ करके रहता है ये ऊपर में जाना और नीचे आना ये जो देव ह्यूमन प्लेन और यह डिवाइन प्लेन इन दोनों के बीच में वह झोले खा रहे हैं। [गला साफ़ करने की आवाज़] देव और मानव देव और मानव दोनों स्तर पे दोनों लेवल पे उनका स्वभावतः विचरण करने की शक्ति होने से ऐसा होता रहता है। अथवा भीतरे देव भाव तहां दग सहज स्वाभाविक अवस्था होए उहा ताहा दग मानव भाबेर बहिरावरण के समय समय भेद कोरिया ओई रूपे स्वतः प्रकाशित होय या तो फिर माने या तो है कि ह्यूमन प्लेन और डिवाइन प्लेन इन दोनों के बीच में वे लोग झूला खाते हैं। कभी डिवाइन प्लेन पे रहते हैं, कभी ह्यूमन प्लेन पे रहते हैं। यह एक एक्सप्लेनेशन है। या तो फिर दूसरी एक्सप्लेनेशन यह है कि भीतर का देवभाव उनकी सहज स्वाभाविक अवस्था होने की वजह से वह देव भाव यह जो बाह्य आवरण है मानव भाव का मनुष्य भाव का उसको समय-समय भेद करके कुछ-कुछ समय में भेद करके स्वतः प्रकाशित होता रहता है। बाहर में है मनुष्य भाव और भीतर में है देव भाव। तो कभी-कभी यह क्या होता है? यह मानव भाव रूपी जो बाह्य आवरण है उसको भेद करके उसको काट करके भीतर का जो देवत्व है वह कभी-कभी छलक पड़ता है। भीतर का जो देवत्व जो छुपा करके रखा है एकाएक कभी ना कभी प्रगटित हो जाता है। ठाकुर ने कहा है कि जिन लोगों के भीतर में इस तरह का देव भाव होता है ना तो उनको आप थोड़ा सा चंदन का लेप कीजिए। उनके सामने धूप रखिए। थोड़ा सा एक पुष्प उनके सामने रखिए। देखिए इमीडिएटली वे लोग समाधि में चले जाएंगे। ठाकुर ने कहा यहां पे एक ब्राह्मण कन्या आई थी। बड़ी ही सुलक्षणा थी। तो उसके सामने जैसे ही ठाकुर ने इस तरह से धूप दीप चंदन वगैरह ऑफर किया साथ में ही वह समाधि में चली गई थी। तो क्या है कि जिन लोगों का एक स्वाभाविक देव भाव की ओर उच्च गति है थोड़ा सा भी स्टिमुलेशन मिलने से थोड़ा सा भी यह जो उद्दीपना होने से फटाक करके जो है उनका मन देव भाव में चला जाएगा और भीतर का देवत्व जैसे कि बाहर में छलक आएगा। वो जो इनकी जो कहानी है चैतन्य देव की तो चैतन्य देव कहीं से एक रास्ते से जा रहे थे देखा कि यहां की जो जो मिट्टी है मिट्टी में से खोल तैयार होता है। तो यह खोल जो है फिर वो इनके वो जो कीर्तन में वो खोल बजाया जाता है। तो जैसा ही सुना तो साथ में ही यह कीर्तन का ईश्वरीय भाव का ये जो हुआ उद्दीपन और वो समाधि में मग्न हो गए। तो ये जो ठाकुर ने खुद ने कहा है वहां पे वो जो मैदान है मैदान में बलून उड़ा रहे हैं वो देखने के लिए गए। वहां पर यह जो ब्रिटिश एक लड़का त्रिभंग होकर के पेड़ के सहारे खड़ा था। तो जैसे ही ठाकुर ने इस ब्रिटिश लड़के को देखा त्रिभंग होकर खड़ा है। साथ में ही भगवान कृष्ण का उनको उद्दीपन हो गया और साथ में ही ठाकुर समाधि में मग्न हो गए। और ठाकुर को तो पता है ना कैसे-कैसे उद्दीपना होती थी। एक नीलवसन पहनी हुई एक नारी जो कि थी प्रॉस्टिट्यूट। तो उसको देखकर के मां सीता का उद्दीपन हो गया था। तो ठाकुर को कैसे-कैसे सब उद्दीपनाएं होती थी। तो जैसे ही कोई भी एक स्टिमुलेशन मिलता है, कोई भी एक ईश्वरीय भाव का कोई वार्तालाप होता है या कुछ भी होता है, साथ-साथ में ही ठाकुर जैसे की समाधि में मग्न हो जाते हैं। तो यह दोनों एक्सप्लेनेशन कि यह जो है कि मनुष्य भाव और यह देव भाव दोनों का कॉम्बिनेशन जो है कैसे संभव है? तो हो सकता है कि या तो फिर यह कभी-कभी ह्यूमन प्लेन पर रहते हैं, कभी-कभी डिवाइन प्लेन पर रहते हैं। वह बीच में आना जाना करते रहते हैं। झोला खाते रहते हैं। या तो फिर भीतर का जो देव भाव है कभी इतना स्ट्रांग हो जाता है कि बाहर में जो मनुष्यत्व रूपी जो आवरण है उसको भेद करके उसको चीर करके भीतर का जो दिव्य प्रकाश बाहर आ जाता है। मीमांशा जाह हो ना केनो उसका सॉल्यूशन जो भी हो ना क्यों ओ रूप घटना किंतु अवतार पुरुष शकले जीवन मानव बुद्धि निकटे दुर्भेद्य जटिलता मोय कोरिया राखिया छे जो भी इसकी मीमांसा हो परंतु यह सब जो घटनावली है उसने अवतार पुरुषों के जीवन को हमारे सामने मनुष्य बुद्धि के सामने ने दुर्भेद्य जटिलतामय करके रखा है। कभी-कभी वह मनुष्य की तरह दिखते हैं। कभी-कभी किसी पर नाराज भी हो जाएंगे, गाली भी देंगे। ठाकुर हृदय पे नाराज होकर इतनी खराब गालियां देते थे तो हृदय भी माने हृदय तो वैसे ही तो थोड़ा सा गुंडा टाइप का था। वो हृदय भी ऐसी बात बोलता है। अरे मामा क्या बोल रहे हो? क्या बोल रहे हो? इतनी खराब गालियां [हंसी] तो और ठाकुर ने हृदय को कहा था जब तुम नाराज हो जाओगे मेरे पे तो मैं चुपचाप सुनूंगा और जब मैं तुमको गाली दूंगा तो तुम चुपचाप सुनना वरना हम दोनों में यदि झगड़ा लग गया तो जो खजानची है उसको बुलाना पड़ेगा फिर क्या होगा वो दो बिल्ली एक बंदर वाला हो जाएगा वो जो बंदर है दोनों बिल्लियों को एक्सप्लइट करके अपना वो पूरा रोटी खा के चला जाएगा तो ऐसा कहीं ना हो जाए तुम मुझे गाली दोगे तो मैं सुन लूंगा मैं तुमको गाली गाली दूंगा तो तुम सुन लेना तो और फिर कभी-कभी क्या था हृदय पे इतने नाराज हो जाते थे हाथ में जो भी आया झाड़ू आया चप्पल आया फटाफट हृदय को मार देते थे तो [हंसी] उस समय रामलाल दादा कहते थे कभी-कभी इन दोनों का झगड़ा ऐसा बढ़ जाता था कि मैं सोचता था कि बस अभी हो ही गया इन दोनों के बीच में ये हमेशा के लिए दरार पड़ जाएगी किंतु देखता था फिर कुछ ही समय के बाद में कुछ ही क्षण के बाद में दोनों एकदम सहृदयता पूर्वक मित्रता से वार्तालाप कर रहा है तो वो सोचता है कि अभी तो इतना भयानक झगड़ा और अभी फिर से मित्रता यह कौन सी बात हुई? तो पता ही है कि देव मनुष्य भाव की वजह से गुस्सा आता है। देव भाव की वजह से यह गुस्सा जो है वह पानी पे अकी हुई लकीर की तरह है। आप मिट्टी में पत्थर में आप लकीर लगाइए वह हमेशा के लिए लगी रहेगी। और जैसे आप वो जो पर्यटन स्थल पर जाते हैं ना वो वहां पे वो लिख वो सब लोग अपना नाम लिख करके रखते हैं। क्या-क्या सब दीवार पे पत्थर पे वो लिख करके रखते हैं। तो वो परमानेंट रिकॉर्ड रह जाता है। किंतु आप मिट्टी पे आप पानी पे लकीर खींचिए। देखिए क्षण भर में वो जो पानी की तरंगे आकर के उसको मिटा देगी। तो इनके दोनों है और यह दोनों की वजह से एक और ठाकुर मास्टर महाशय ही एक दिन देखा जाकर के तो ठाकुर उनको डांट रहे हैं कि तुम ज्ञानी हो क्या और फिर यह कोलकाता के लोगों का वही एक कि इसको उपदेश दे दे उसको उपदेश दे दे खुद को कौन समझाए यह ठीक नहीं फिर वह जो नरेंद्र भजन वो जो गीत गा रहा है तो ठाकुर समाधि में मग्न हो रहे हैं और यह समाधि और आनंद की यह अपूर्व वह छवि अपने हृदय में भर करके मास्टर महाशय अपने घर जा रहे हैं। दूसरे दिन आकर के देखते हैं यह बच्चे जो लड़के हैं यंग लड़के उनके साथ में ठाकुर हंसी मजाक कर रहे हैं। तो मास्टर महाशय सोचते हैं क्या वही है ये दोनों किस तरह से एक ही व्यक्ति दोनों कैसे हो सकते हैं? कभी मुझे डांट भी देते हैं। मेरे जैसे विद्वान मास्टर महाशय तो विद्वान थे। टीचर थे। एमए वगैरह किया था तो मेरे जैसे विद्वान को डांट सकते हैं। भाव समाधि में चले जाते हैं। आनंद का जो लहरें हैं सुनामी आनंद की उनके भीतर में से चारों ओर बिखर पड़ती है यह भी देखा और अभी एक सामान्य मनुष्य की तरह प्रकृत मानुष्य मतो मास्टर महाशय लिखते हैं एक प्रकृत सामान्य व्यक्ति की तरह लड़कों के साथ में हंसी मजाक भी कर रहे ये दोनों कैसे संभव है तो ये दोनों संभव है इन लोगों के जीवन की जटिलता देखिए बुद्धि से देखने का प्रयास करेंगे अकल से जानने का प्रयास करेंगे तो हमको यह सब जटिल दिखेगा वरना भाव से समझने का माने भाव से स्वीकार कर लेंगे तो कुछ जटिल नहीं है। मनुष्य भाव और देव भाव दोनों का एक बहुत ही डिलीशियस समिश्रण इन दोनों के जीवन में है। वो जो आइसक्रीम सैंडविच पता है आइसक्रीम सैंडविच क्या है? बिस्किट की तरह वो दो लेयर रहते हैं और उसके बीच में आइसक्रीम रखा है। तो वो चॉकलेट बिस्किट खाने का भी एक टेस्ट आता है और क्रंची होता है और फिर यह सॉफ्ट और ठंडा आइसक्रीम। इट इज सच अ डिलीशियस कॉम्बिनेशन। पहली बार मैंने खाया था। मैंने कहा यह है क्या? मुझे समझ में नहीं आ रहा। यह चॉकलेट बिस्किट तो पता है। क्रंची होता है, हार्ड होता है और उन्हें गर्म होता है यूजुअली। और उसके बीच में ही यह आइसक्रीम है। सॉफ्ट है, ठंडा है। यह कॉम्बिनेशन कैसे पॉसिबल है? किंतु खाया तो इतना अच्छा लगा। तो यह आइसक्रीम सैंडविच की तरह यह चॉकलेट बिस्किट है। हार्ड है, गर्म होता है। बीच में यह सॉफ्ट आइसक्रीम जो कि ठंडा है। सो यह मनुष्य भाव देव भाव से डिलीशियस कॉम्बिनेशन इनके जीवन में होता है। ओई जटिल रहस्य कनो जे संपूर्ण भेद होइबे बोध हो ना। यह जटिल रहस्य का जो कभी संपूर्ण रूप से भेद होगा लग नहीं रहा है इस अर्थ में कि जो मनुष्य की बुद्धि है इस बुद्धि के इस लेवल पर रहकर के हम इसका हमें इसका कोई सॉल्यूशन ला पाए यह संभव नहीं है। वही हो सकता है कि हम जब उच्च आध्यात्मिक जर्नी प्रारंभ करें उच्च लेवल पर पहुंच जाए। उच्च शिखर पर आरूढ़ हो तब यह सहज रूप से मीमांसा हो जाएगी। किंतु जब तक हम जो शिखर के तले में खड़े हैं वो अभी जमीन पर ही खड़े हैं तो इस लेवल पर इसकी मीमांसा इसका सॉल्यूशन होने वाला नहीं है। किंतु परंतु श्रद्धा संपन्न होइया उहार

अवतारों के जीवन का श्रद्धापूर्वक चिंतन ही कल्याणकारी है

अनुशीलने मानव अशेष कल्याण साधित तो हो एकथा ध्रुव श्रद्धा संपन्न होकर के इसका अर्थात कि अवतार के मानव और देव भाव के समिश्रण का अनुशीलन करने से उनको फॉलो करने से उसका उनके प्रति श्रद्धा भक्ति रखने से उनके कहे के अनुसार अपने जीवन को ढालने से मनुष्य का अशेष कल्याण साधित होता है। यह बात ध्रुव सत्य है। प्राचीन पौराणिक मास्टर महाशय तो बेस्ट उदाहरण है। ये पहले पहले तो यह सब कंफ्यूजन कि कभी यह लड़कों के साथ में हंसी मजाक करते हैं। कभी ये भाव समाधि में चले जाते हैं। कभी ये सिंह विक्रम से नृत्य करते हैं। तो कौन से ठाकुर सही है? तो ठीक है। बुद्धि से सोचना एक यह काला दूध कभी सफेद हो सकता है क्या? यह जो कंट्राडिक्शन कि जो साकार है वह निराकार भी है और भी कितना कुछ है? तो यह सब कैसे संभव है? जो काला दूध क्या कभी सफेद हो सकता है क्या? यह कंट्राडिक्शन पहले पहले उनको लगता था। किंतु फिर श्रद्धा पूर्ण श्रद्धा पूर्वक अनुशीलन करने से ठाकुर को समर्पित होकर के उनके कहे अनुसार जीवन गठन करने से आखिर में देखिए कि मास्टर महाशय का जीवन किस तरह से अमृतमय जीवन हो गया था। आनंद में तरबोर हो गए थे। आनंद रूपी रस में पूरे वह डूब गए थे। रस से भरपूर हो गए थे। प्राचीन पौराणिक जुगे अवतार चरित्र मानव भावटी ढाकिया चापिया देव भावटी आलोचनाई कोरा होइया छिलो प्राचीन पौराणिक युग में अवतार चरित्र के मानव भाव को ढक करके छुपा करके देव भाव की आलोचना ही करी गई थी संदेहशील वर्तमान जुगे वही चरित्र देव भावटी संपूर्ण उपेक्षित तो होइया मानव भाव टी आलोचना ही चोलिया छ संदेहशील वर्तमान युग में उसी चरित्र के देव भाव को संपूर्ण उपेक्षित करके मानव भाव की आलोचना ही चली है। पौराणिक युग में देखेंगे अवतार को हम देवता के रूप में ही देखते थे और इसीलिए यह जो पहला अध्याय है साधक और साधना उसका प्रारंभ में ही यह शरद महाराज हमको कहते हैं कि पूर्व पूर्व युग में जो अवतार आए उनकी साधना का वर्णन हमको नहीं मिलता क्योंकि हमने पहले से ही उनके भीतर में देव भाव को ही देखा है और साथ में शरद महाराज यह भी कहते हैं कि कभी-कभी भक्तों को लगता है कि यदि मैं उनके ऊपर में मानव भाव की आरोप ना आरोप करूंगा तो मेरी भक्ति को हानि होगी। मैं अपूर्ण व्यक्ति को जो एक अपूर्ण है उसकी आराधना क्यों करूं? उनको मैं अपने इष्ट के रूप में क्यों स्वीकृत करूं? वो पूर्ण ही है। बोलकर के ही मेरे इष्ट है। अपूर्ण है तो फिर मेरे फिर तो हमको क्या एक एक्सक्यूज मिल जाता है ना। मनुष्य का जो पाजी मन है हमेशा एक्सक्यूज खोजता है गड़बड़ करने के लिए। काम वासना में अपना मन डूब जा रहा है। तो यह मैं जो कर रहा हूं गलत कार्य कामना वासना में डूब जा रहा हूं। काम कांचन में मैं लिप्त हो जा रहा हूं। उससे अपने को खींच करके अपने मन को मार मार करके डिसिप्लिन करके खींच करके वापस लाना है। ऐसा नहीं। मैं कामना वासना में डूबा हूं तो क्या है? वह भी तो अवतार भी तो इसी तरह से थे। वो जो ठाकुर की वो जो फेमस कहानी कोई एक आदमी आकर के कहता है कि युधिष्ठिर को भी नरक दर्शन करना पड़ा था। तो ठाकुर उसको डांट के कहता है कि युधिष्ठिर की सत्य धर्म उनकी ये जो मुमुक्षत्व तपस्या वो सब नहीं देखकर के वो जो युधिष्ठिर को एक नरक दर्शन करना पड़ा। यदि यही एक बात तुम याद रखते हो क्या? किस तरह का तुम्हारा बुद्धि है? किंतु ये वो बुद्धि सिर्फ उसी आदमी का नहीं। हम सबका ऐसा ही बुद्धि है। अवतार के जीवन में यदि एक भी गड़बड़ हो जाए वो वाली को पीछे से तीर मार के मारा था तो हम लोग भी यह लोगों की पीछेछे निंदा करते हैं तो कहां गलत किया? भगवान राम ने भी ऐसा किया है। वो जो कर्ण था वो निहत्ता था उसके ऊपर में हाथ उठाया था। उसका वध किया था। तो भगवान कृष्ण यदि निहत्ते लोगों पे आक्रमण कर सकते हैं। उसका वध कर सकते हैं। तो हम कमजोर लोगों को एक्सप्लइट करते हैं। लोगों का शोषण करते हैं। उसमें गलत क्या है? भगवान ने जो किया हम लोग भी वही कर रहे हैं। यह जो पाजी मन जो है वह हमेशा यह एक्सक्यूज खोजने का प्रयास करता है और इसीलिए हमारे मन को यह एक्सक्यूज का रास्ता ना रहे। हम लोग बहाने बना करके ये लूटने का काम यह चीटिंग करने का काम ना करें। असत कार्य ना करें। बोल करके ही उनके मनुष्य भाव को दबा करके पूरे देव भाव को ही प्रोजेक्ट किया गया पूर्व युगों में। और आज का यह जो संदेहशील जगत है उसमें देव भाव को संपूर्ण रूप से ढक करके मनुष्य भाव की ही आलोचना होती है। अब जैसे डॉक्टर सरकार ही सबसे बड़े उदाहरण है। वो आकर के भक्तों को कहते हैं कि इतना सीधा साधा अच्छा आदमी है उसको अवतार अवतार बोलकर के इसका सर क्यों घुमा दे रहे हो तुम लोग? और बात भी तो सही है। यह जितने भी जो सो कॉल्ड अपने को अवतार कह के घूमते हैं जो एक आदमी जो है जैसे ही लोग उसको अवतार करके या भगवान का यह जो एक स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव बोल के लोग प्रचार करते हैं साथ-साथ में ही महा भयानक करप्शन वहां पे प्रारंभ होता है। तो फिर आज का यह जो संदेहशील युग है वह कभी भी यह दिव्यत्व नहीं देखता। देखता है कि मनुष्य के रूप में किस कितना वह एथिक और एथिकल और मोरल है वि इज गुड। माने आप यहां पे स्वामी जी ने खुद तो कहा है ना कि फर्स्ट बिकम ए जेंटलमैन देन बिकम ए साधु। आप पहले जेंटलमैन होइए। बाद में गेरवा पहन करके साधु होइए। किंतु वरना फिर क्या होगा? गेरवा पहन लिया है। और अभी आप लोगों का शोषण कर रहे हैं। लोगों पे अत्याचार कर रहे हैं। लोगों को कष्ट पहुंचा रहे हैं। अभी लोग आपके ऊपर में सामने वार नहीं कर पा रहे हैं। क्यों? क्योंकि आप गेरवा के प्रोटेक्शन में हैं। तो यह तो गेरवा का आप दुरुपयोग कर रहे हैं। तो पहले तो जेंटलमैन होइए फिर गेरवा धारण कीजिए फिर साधु बनिए। यह स्वामी जी का कहना है। तो यहां पे भी आज का जो आधुनिक युग है लोगों की दृष्टि इतनी मतलब कहेंगे कि [हंसी] प्रखर है। आप बोल रहे हैं यहां पे एक और कि वो अवतार है। और यहां पे यह सब इतना सब कुछ भ्रष्टाचार करता है। लोगों का शोषण करता है। लोगों पे लोगों को कष्ट पहुंचाता है। ये क्या-क्या सब करता है? मैं जब राजकोट में था तो वहां पे नाइट क्लास के बाद में एक दिन टीवी ऑन करके हम लोग सब देख रहे एक न्यूज़ आया था तो बोला कि अरे देखो देखो क्या चल रहा है। तो नाइट रात को हमारा सब नाइट क्लास होता है। सभी साधु लोग इकट्ठा होकर कोई एक किताब पढ़ते हैं। एक साधु पढ़ेगा बाकी सब सुनेंगे तो 10-15 मिनट के लिए होता है। उसके बाद में सभी लोग टीवी ऑन करके देखने लगे। क्या चल रहा था कि एक साधु है। वो उसकी वो एक होटल में रह रहा है। कहीं दूसरे गांव दूसरे शहर में गया होगा। गुजरात में ही एक सिटी की बात है। वो दूसरे सिटी में गया होगा। एक होटल में रह रहा होगा और उसने एक लेडी को उसको मिला उसके साथ में बात करने के लिए बुलाया। अभी हो सकता है यह लेडी उसकी डिवोटी होगी तो जो भी है अ दोनों लोग होटल के कमरे में बंद हैं। अभी सामने में एक जो लारी वाला जो होता है ना यह जो पानी पानी पूरी वगैरह जो बेचते रहते हैं वो जो रास्ते में वो जो स्टॉल होता है तो ऐसा उसने देख लिया कि ये साधु है अकेला है कमरे में होटल में वो एक लेडी गई है वहां पे और दोनों अकेले हैं कमरा बंद कर दिया है उसने इमीडिएटली किसी जर्नलिस्ट को फोन किया कि देखिए यहां पे क्या हो रहा है तो यह जर्नलिस्ट सीधा कैमरा लेके आया और अभी एक लोगों का तो नेटवर्क होता है एक दौड़ा तो बाकी सब दौड़े आया अभी सभी लोग वहां पे लाइव टेलीकास्ट कर रहे हैं। टीवी पे हम लोग देख रहे हैं। वो दरवाजा पे जोर-जोर से वह धक्का लगा रहे हैं। दरवाजा खोला। भीतर में से यह साधु और ये लड़की दोनों बाहर में आए और फिर ये म इट्स सच एंबरेसिंग सिचुएशन। वो साधु का चेहरा देख के मुझे एंबरेसमेंट हो रहा था। उसका आशय कुछ भी हो। राइट? किंतु ये जो सीन है सच ए बैड सीन। माने सच एंबरेसिंग सीन। वो पूरा लाइव टेलीकास्ट हो रहा है और हम सब लोग टीवी पर देखकर हंस रहे हैं। सो देखिए कि यह आज का युग है। आप गेरवा पहनते हैं अपने को कुछ भी डिक्लेअ करके घूमते हैं। किंतु लोगों की दृष्टि है बड़ी शार्प। थोड़ा सा भी यह एथिक्स और मोरालिटी में आपने इधर से उधर किया। पूरा समाज जो है आपके ऊपर में टूट पड़ेगा। आपके चीथरे उड़ा देगा। और ऐसा होना ही चाहिए। मैं तो कहता हूं। तभी तो यह धर्म के नाम पे जो भ्रष्टाचार चल रहा है वो बंद होगा। सो यहां पे है कि एक युग था कि हम लोग सिर्फ देवभाव ही देखते थे क्योंकि उस समय हमारा आशय था कि हमको खुद को जो भी है बाकी सब हमको ईश्वर प्राप्ति करनी है। वो एक आशय था। अभी आज का युग है कि एक तरह से कहे बदमाशी का युग है। आप क्या गड़बड़ करते हैं हमको पकड़ लेना है। आप भले ही अपने को कुछ भी डिक्लेअ करते घूमिए अपने को बहुत बड़ा साधु बना के कहिए। बहुत बड़ा यह है, वो है। हम लोग हमेशा देखते रहेंगे कि कहां पर गड़बड़ करते हैं। तब हम आपको पकड़ेंगे। सो एक तरह से दुष्टता का युग है और होना भी चाहिए। मैं तो कहता हूं। अदरवाइज क्या होगा? मूर्ख लोगों को गुजराती में कहावत है। लोभिया हो ना त्या धुतारा भूखे नो मरे। अर्थात जहां यह लोभी लोग रहते हैं शॉर्टकट लगा करके मुझे कुछ जीवन में प्राप्त कर लेना है। तो इस तरह के जो लोभी लोग जो है उसको उनका धन हड़प करने के लिए जो धूता रहे ना वो वो कभी भूखे नहीं मरते वहां पे। तो अभी दो पूरा जीवन भर दो नंबर का काम किया है। दो नंबर का पैसा इकट्ठा किया है। अभी सोचते हैं कैसे भी करके थोड़ा बहुत धन शुद्धि कर ले और स्वर्ग का पासपोर्ट ले ले। वो जो कैथोलिक चर्च में जब करप्शन आना शुरू हुआ था मिडिवल एजेस में तो ये स्वर्ग का पासपोर्ट बेचते थे। एक राजा है उसने दुनिया भर के भ्रष्टाचार किए। प्रजा का शोषण किया, स्त्रियों का शोषण किया, सब कुछ कर लिया। अभी आखिर में मृत्यु के समय लगता है कि अरे यार स्वर्ग में जाएंगे, हेवन में जाएंगे तो फिर तो जैसे कहा जाता है सब लोग कहते हैं कि वहां पर हमारे कर्मों का लेखाजोखा होगा। यदि बुरा कार्य किया है तो इटरनल डेमिनेशन हमेशा के लिए नर्क भुगतना होगा। अच्छा कार्य किया है तो इटरनल हेवन हमेशा के लिए हम स्वर्ग में रहेंगे। तो फिर अभी जीवन भर तो बुरा कार्य किया। अभी आखिरी समय एकदम डर लग गया। तो ये जितने भी ये कार्डिनल फाडिनल बिशप वगैरह है उनको रुपया देके उनके पास में स्वर्ग का पासपोर्ट निकाल देते थे। सो ये माने यहां पे जिस तरह से लोभी लोग हैं म जिस तरह से भ्रष्टाचारी लोग हैं वहां पे उसी तरह के धुतारे लोग जो है ना भूखे नहीं मरते कभी तो यह साइकिल टूटना चाहिए धर्म के नाम पे भ्रष्टाचार बंद होना चाहिए तो जो भी है ऑल ऑफ दिस आर देयर हमारा जो एक आशय होना है कि कैसे भी करके हम लोग वी आर वेरी फॉर्चूनेट कि ठाकुर की शरण में आए हैं तो ठाकुर के जीवन को आप जितना ही आप देख लीजिए योगेंद्र महाराज ने तो देखा ही था रात को ठाकुर अपने कमरे में से बाहर निकल कर के पता नहीं कहां गए तो बेचारा का हृदय धकधक करने लगा कि दिन में तो काम कांचन त्याग की बात करते हैं रात में क्या नबत में जाकर के अपनी पत्नी के साथ शयन करते हैं तो बाहर में आकर के नहबत के सामने खड़े रह गए सोचा कि पकड़ेंगे जैसे उस साधु को पकड़ा था सोचा कि ठाकुर को भी पकड़ेंगे कमरे में से बाहर आते नहबत में ऐसा है किंतु देखा ठाकुर तो आ रहा है झाऊला से वापस शौच के लिए गए थे। तो देखकर के ही योगेंद्र महाराज स्वयं शर्मिंदा हो गए। तो देखिए ठाकुर का टेस्ट इनफ हो चुका है। अभी उनके प्रति श्रद्धा भक्ति रख के हम अपना जीवन कैसे भी करके जीवन नैया को पार करवा दे। भवसागर पार करवा दें। वो इसी में अपना श्रेय है। अच्छा इसके बाद का अभी नेक्स्ट क्लास में। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न : आजकल साधुओं के आचरण पर इतनी कड़ी नज़र रखी जाती है। यह अच्छी बात है या बुरी?

ना इट्स अ गुड थिंग इट्स अ गुड थिंग देखिए आप गेरवा पहनते हैं दैट मींस आप सम्मान के अधिकारी है राइट बाय डिफॉल्ट अपना जो कल्चर है ठाकुर ने कहा ना कि गधे को भेक पहना के चैतन्य देव ने प्रणाम किया था। इस अर्थ में भेक अर्थात कि वैष्णव का परिधान वो माला फिर यह तिलक फिर ये पीतांबरी वगैरह एक वैष्णव इस तरह से पहनता है तो चैतन्य देव कहना चाहते हैं यदि गधे ने भी भेद पहना है तो वह भी प्रणाम के योग्य है तो फिर आप सम्मान लेने के लिए तत्पर है और फिर अपना यह जो एथिक्स और मोरालिटी को ठीक नहीं रखेंगे और फिर जब निंदा होगी तो वो आप कैसे कहेंगे कि ये मेरी निंदा कर रहे हैं आप एक सामान्य कपड़े पहन लीजिए फिर जितना प्रश्न ये आप पॉलिटिशियन को देखिए। माने इतने बेशर्म है। दुनिया भर का भ्रष्टाचार करते हैं। फिर भी बड़ा हंसते-हंसते वोट मांगने को आ जाता है। ठीक है ना? तो इट इज़ एक्सपेक्टेड फ्रॉम देम कि पॉलिटिशियन है। भ्रष्टाचार करना ही है और फिर ये बड़ी-बड़ी बातें भी करना है। सो मत पहनिए गेरुआ और देन जितना जो भी करना है कीजिए। अपना तो भारतीय समाज बहुत ही फॉरगिविंग है। आप सालों के सालों भ्रष्टाचार करेंगे फिर भी वोट देते ही जाएंगे। इतना फॉरगिविंग हमारा समाज है। किंतु फिर आप गेरवा पहन करके भ्रष्टाचार करें। दैट इज अनएक्सक्यूज़बल। मेरे साथ में एग्जैक्टली ऐसा हुआ था। मैं मैं तो रांची में था। तो क्या है कि अब रांची में यह जो वन प्रोडक्ट जो है वो दैट इज के उसका एक असेसमेंट करना म लोगों को सिखाना दैट इज़ पार्ट एंड पार्सल ऑफ कृषि विज्ञान केंद्र। तो ये सगवान का पेड़ है। ये ये बांस है तो इसका क्या वैल्यू है? किस तरह से आप इसको यूटिलाइज कर सकते हैं वगैरह-वगैरह बहुत सीख के रखा था। अभी यह सब तो गया पूरा नागपुर में पोस्टिंग हुआ। वहां पे मंदिर में मेरा काम था। तो एक दिन हुआ है ऐसा कि पीछे में एक जेल है। बहुत बड़ा जेल मतलब जेल की बहुत बड़ी जमीन है। उसमें से कुछ जमीन हमने ली है। माने गवर्नमेंट ने हमको दी है। परचेस वगैरह जो कुछ भी हो डोंट नो एग्जैक्टली। किंतु हमको कुछ जमीन उसका मिला है। तो मैं और एक साधु और कुछ भक्तों के साथ में वह देखने के लिए गया। तो वहां भी यह सगवान के पेड़ है। उसके पेड़ है। और नेचुरली मैं बोल रहा हूं। अच्छा ये पेड़ का इतना वैल्यू है। इस पेड़ का इतना वैल्यू है। इसको काट करके बेचने से इतना आएगा। इसको बेचने से इतना आएगा। तो बाकी सब मेरे और इस तरह से देख रहे हैं कि महाराज ये पेड़ों का क्या कीमत है? इसको बेचने से क्या? आप कहो ये सब आप ये सब बातें क्यों कर रहे हैं? अब मंदिर में काम करते हैं कि भगवान की बातें कीजिए। एक पेड़ को बेचने से ही था और मैं सहज रूप से बोल रहा हूं सब मेरा जो पास्ट ट्रेनिंग है [हंसी]

प्रश्न : भगवान शिव तो स्वयं ईश्वर हैं, भोलानाथ हैं। मैं उनकी आराधना तो कर सकता हूँ, लेकिन उनकी तपस्या से प्रेरणा कैसे लूँ? उनके जैसी तपस्या मैं भला कैसे कर सकता हूँ? जबकि ठाकुर में हम ईश्वरभाव और मानवभाव, दोनों देखते हैं। इसलिए हम उनकी आराधना भी कर सकते हैं और उनकी साधना से प्रेरणा भी ले सकते हैं। ठाकुर को इष्ट के रूप में स्वीकार करने का यह एक बहुत बड़ा लाभ है।

यही कारण है ना कि देखिए वेस्ट में भगवान बुद्ध का इतना अभी एकदम ये क्यों हो रहा है पॉपुलर क्यों हो रहा है म भगवान तो हम कहते हैं वे लोग कहते हैं बुद्धा राइट तो देखिए अब जीसस इज़ अ सन ऑफ़ गॉड राइट तो आपको उनको भक्ति ही करनी है। उससे ज्यादा अभी और कुछ नहीं है वहां पे। ज्यादा से ज्यादा इफ यू फॉलो हिम इमिटेशन ऑफ क्राइस्ट करेंगे तो ज्यादा से ज्यादा वो एक है कि फॉलो हिज लाइफ जो सरमन ऑन द माउंट वगैरह जो है डू ऑन टू द नेबर व्हाट द यू विल डू ऑन टू द सेल्फ या गोल्डन रूल वगैरह। सो एट द मोस्ट आप यह कर सकते हैं। बट द सेंटर ऑफ़ क्रिश्चियनिटी इज़ टू हैव रेवरेंस टुवर्ड्स जीसस एज अ सन ऑफ़ गॉड। यहां पर भगवान बुद्ध है। आई कीप टेलिंग भगवान किंतु बुद्ध है। तो बुद्ध कहते हैं कि आत्मदीपो भव अपने जीवन को साधना करके पूर्णत्व की ओर ले जाओ। मैं तो एक मनुष्य मात्र हूं। आप मुझे देख के ये सीखिए कि मैंने पूर्णता प्राप्त की आप क्यों नहीं कर पाएंगे। अभी नो डाउट भगवान बुद्ध ने जो पूर्णता प्राप्त की उसके बाद में कितने लोगों ने उनको फॉलो करके किया। वी डू नॉट नो। बट दैट स्टोरी इटसेल्फ इज सो म हमारे मन को म भा जाती है कि हां ऐसा होना है। ये आज मैं रैशनलिस्ट हूं। मैं एआई इंजीनियर हूं। मैं एट द टॉप ऑफ माय फील्ड हूं। एट अ कटिंग एज रिसर्च कर रहा हूं। व्हाई वुड आई बिलीव एट ओनली इन अ सन ऑफ़ गॉड? आई विल बिलीव बिलीव समवन लाइक अ बुद्धा हु वाज़ अ प्रिंस। बट देन ही बिकम निर्वाणा ही अटेंड निर्वाणा। राइट? सो यू आर राइट दैट इफ यू अंडरस्टैंड दैट उन लोगों के भीतर में ह्यूमैनिटी थी देन यू कैन मोल्ड योर लाइफ्स अकॉर्डिंग टू देम। देखिए दिव्यत्व का यह लाभ है कि इस तरह से वो एंबरेसिंग सिचुएशन में वे लोग कभी नहीं फंसने वाले। जिस तरह का वो उसके साथ हुआ था साधु के साथ। सो दैट इज दिव्यता का एक है बेनिफिट कि उनका जो काम कांचन त्याग है एब्सोल्यूट है। यू कैन ऑलवेज डिपेंड अपॉन दैट। उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। सो वो एक निकल गया कि कभी भी आप इस अवतार को फॉलो करके यू विल नेवर बी एंबरेस कि कोई कहे कि अरे तुम्हारे इष्ट इस तरह से सब कर रहे हैं तो हमको उनके लिए कभी एंबरेस नहीं होना पड़ेगा। दैट पार्ट एकदम श्योर हो गया है। और फिर देन टेक द ह्यूमैनिटी ऑफ देम। और फिर अपने लाइफ को उसके अनुसार गढ़िए। ओम