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Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 25 Mar 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते [गाना गाने की आवाज़] नमः

गोपाल की माँ के आगमन से ही श्रीरामकृष्ण लड्डू-गोपाल की मुद्रा धारण करते है

ठाकुर एक बार आए हैं बलराम बाबू के घर तो जैसे ही ठाकुर कोलकाता में किसी के घर पधारेंगे जैसे बलराम मंदिर है या तो फिर राम बाबू का घर है वगैरह तो क्या होगा कि कोलकाता में सभी के घर यह बात पहुंच जाएगी कि हां ठाकुर आए हैं ठाकुर आए हैं और फिर वहां से इतने सारे भक्त वहां पर आन उपस्थित होंगे ठाकुर का दर्शन प्राप्त करने के लिए उनका सत्संग प्राप्त सत्संग लाभ करने के लिए अभी क्या होता है कि ठाकुर तो यूजुअली रहते हैं दक्षिणेश्वर में तो बहुत सारे भक्त जिन लोगों के पास में आने जाने की सुविधा है समय है वे लोग दक्षिणेश्वर आएंगे किंतु आने वालों में ज्यादातर पुरुष ही रहेंगे क्योंकि उनके पास में यह मोबिलिटी रहता है। स्त्रियों को क्या है घर से निकलना यह सब थोड़ा मुश्किल होता था उस समय की जो बात है तो उसमें भी यह दक्षिणेश्वर आना वो काली महाराज की वो स्मृति कथा में है ना कि पहली बार वो पैदल चल के दक्षिणेश्वर आ रहे हैं चलते ही जा रहे हैं चलते ही जा रहे हैं सोच रहे हैं कि यह इतना दूर है मुझे पता ही नहीं था तो आजकल की तरह ये ट्रांसपोर्ट के ये जो साधन है इजीली अवेलेबल वह नहीं थे उस समय बोलकर के थोड़ा सा कष्ट होता था कोलकाता से दक्षिणेश्वर आने में। उसमें भी लेडीज लोगों को तो आना है तो नेचुरली हम समझ सकते हैं कि इतनी सुविधा नहीं होगी। तो इसीलिए जब ठाकुर कोलकाता में किसी के घर आएंगे तो सीधा बहुत सारी जो लेडी डिवोटी है ठाकुर की वो वहां पर इकट्ठा हो जाएगी। यह किसी की मां है। यह किसी की बहन है। म ठाकुर इस तरह से लोगों को पुकारते थे। तो ये गोपाल मां ये गोपाल की मां है। तो यह उसकी बहन है। यह उसका यह रिलेशन है। इसका परिवार ऐसा बोलकर के ये इसकी पत्नी बोलकर के ठाकुर ने सबको नाम देकर रखे थे। तो सब लेडीज इकट्ठा हो जाएगी। और कोलकाता में क्योंकि थोड़ा सा इजी रहता है दक्षिणेश्वर की ओर जाने की वजह। तो बहुत सारी लेडीज वहां पर इकट्ठा हो जाएगी। इस तरह से एक दिन ठाकुर आए हैं बलराम मंदिर में और इसी तरह से लेडी डिवोटी के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं जो कि सब उनको उनका दर्शन करने के लिए आई तो ठाकुर ने कहा अच्छा देखो यह जो कामारहाटी है वहां से एक बामनी एक ब्राह्मणी यहां पर आती है म ठाकुर का दर्शन करने के लिए तो देखो कि उसको सतत बाल गोपाल का दर्शन होता रहता है उसके देह के भीतर में देखो हरिमय देह हरि छोड़कर के और कुछ नहीं है। इस तरह का इसका पवित्र देह है। तो ऐसा बोलकर के ठाकुर जब प्रशंसा कर रहे हैं तो सभी लेडी डिवोटीजों को म ऐसा लगा कि अरे वाह तो इनका तो दर्शन करना चाहिए। इनको पुकारना चाहिए। इस तरह से जब भक्तों की मंडली बैठती है तो तो ठाकुर ने भी बात में बोल दिया कि अरे जाकर के उसको बुला के लाओ ना यहां पे क्योंकि बलराम मंदिर में ठाकुर एकद दिन रहने वाले थे। तो अभी बलराम बाबू तो है ठाकुर के आज्ञा वह जैसे ही आज्ञा हुई तो फटाक के वो कामरारहाटी वो अघोरमणि देवी को बुलाने के लिए लोगों को भेजा गया अोरमणि देवी आई भी सही अभी देखिए पूरा टेबल म यह पूरा सीन कैसे अनफोल्ड होता है। यहां पर ठाकुर भक्तों से घिर करके बलराम मंदिर में बैठे हुए हैं। पता तो है कि यह अघोरमणि देवी को लेने के लिए लोगों को भेजा है। किंतु वह तो आज की तरह वह WhatsApp मैसेज वह लाइव लोकेशन वगैरह तो नहीं है कि पता चले कि कब आ रहे हैं, कब जा रहे हैं, एग्जैक्टली कौन से टाइम पे आएंगे। सो एनीवे ठाकुर वहां पर बैठे हैं। भक्तों से घिर करके एकाएक ठाकुर के भीतर में भाव का उद्रेक हुआ। भाव का एक उथला आया। और ठाकुर जैसे कि उनके भीतर में यह बाल गोपाल भाव प्रकट हुआ। और जैसे वो लड्डू गोपाल की जो धातु की मूर्ति आपने देखी होगी वो जो घुटनों के बल बैठता है ना दो घुटने और दो हाथ इस तरह से जो बच्चे चलते हैं ना हामागड़ी बांग्ला बांग्ला में कहते हैं तो ऐसा वो घुटनों के बल बच्चा चलता है तो वैसे ही वही मुद्रा में और एक हाथ इस तरह से ऊपर किया हुआ जैसे कि हाथ में लड्डू पकड़ा है तो वही वो जो लड्डू गोपाल नॉर्थ इंडिया में इसको कहते हैं। इस मुद्रा को इस पोस को कहते हैं लड्डू गोपाल। तो यह लड्डू गोपाल की धातु की मूर्तियां छोटी-छोटी आपको बहुत सारे घर में नॉर्थ इंडिया में देखने को मिल जाएगी। लोग उसकी पूजा करते हैं। उनकी पूजा करते हैं। तो ठाकुर के भीतर में अभी तो सब म बैठकर के हंसी मजाक वार्तालाप ठाकुर मां कहती है ना बापू हमें तो ओना के कनो निरानंद देखी नहीं। मैंने अरे बापू मैंने तो ठाकुर को कभी भी निरानंद नहीं देखा है। 5 साल का बच्चा हो ना कि बड़ी उम्र का बूढ़ा हो जो भी उनके सामने आता है सबके साथ में हंसी मजाक हास्य तूफान तरंग ठाकुर बहाते हैं। तो कहां यह हास्य और आध्यात्मिकता की तरंग बह रही है। एकाएक भाव का उथला आया और ठाकुर ये लड्डू गोपाल वाले पोज में जैसे कि स्थिर हो गए। बिल्कुल जैसे कि छोटा बच्चा हो और देखिए कभी-कभी ठाकुर की उम्र उस समय ऑलमोस्ट 49 इयर्स के आसपास थी। अभी यह जो लड्डू गोपाल मुद्रा जो है वो छोटा शिशु को जब हम इस मुद्रा में देखते हैं वो वो हमने घुटनों के बेल घुटनों के बल चल रहा है तो बड़ा क्यूट दिखता है देखने में। बड़ा ही मधुर दृश्य दिखता है। मां को इस तरह से अपने शिशु को चलते हुए देखकर के घुटनों के बल रेंगते हुए देखकर के बड़ा आनंद आता है। ठाकुर की उम्र थी किंतु उस समय 49 इयर्स के आसपास। तो देखिए कि इस उम्र के किसी व्यक्ति को आप इस तरह से शिशु मुद्रा में देखेंगे तो आपको कैसा लगेगा? थोड़ा सा शायद विचित्र लगेगा। माने स्वामी जी कहते हैं क्योंकि क्या है कि ठाकुर के आसपास में इसका भाव तो बहुत लोगों को होता था। तो बहुत लोग भाव का अभिनय भी करते थे। फेक वो एक भाव दिखाएंगे। तो स्वामी जी ऐसे लोगों को देखकर के बोलते थे यह गैंडा जो होता है ना राइनोसोरस वो गैंडा एक नृत्य करता है तो कितना खराब दिखेगा। [हंसी] कोई एक ग्रेसफुल व्यक्ति है। अभी रिसेंटली कल ही हमारे यहां पर एक डिवोटी आते हैं। तो उन्होंने कहा कि वो ये वो साउथ इंडियन का ये जो होता है ना नृत्य वो क्या बोलते हैं कथकली ने ऐसा कुछ फॉरगॉट मैंने भूल गया मैं तो जो भी है बड़े फेमस स्टाइल है साउथ इंडिया की नृत्य की तो वो वहां पे टीचर थे अभी रिटायर हुए हैं। तो मैंने कहा अच्छा वाह तो उनका बॉडी जो है एकदम स्लिम है और ग्रेसफुल है। बूढ़े हो गए हैं। रिटायर हो गए हैं। किंतु देख के ही समझ में आता है कि यह नृत्य कर सकते हैं। स्लिम बॉडी है। ग्रेसफुल उनका मूवमेंट है। जेंटलमैन है। वो हमारे क्लास में आते हैं यहां पे। तो सैटरडे को बड़े महाराज का क्लास होता है उसमें आते हैं। तो उनको देखकर के लगता है कि हां यह नृत्य कर सकते हैं। किंतु एक गेंडा मैंने कहा राइनोसोरस वो यदि इस तरह से वो क्लासिकल डांस करने का प्रयास करें तो कितना वो कदूपा दिखेगा। कितना वो खराब दिखेगा। सो स्वामी जी कहते हैं जो लोग यह भाव फेक करते हैं ना भाव का दिखावा करते हैं और फिर ठाकुर के साथ में ऐसा वो नृत्य कीर्तन करते हैं दिखावा करके करके वो इतने ही खराब दिखते हैं। किंतु ठाकुर का देखिए कि इतनी बड़ी उम्र होने के बावजूद एक शिशु का भाव और शिशु की अंगभंगिमा शिशु की मुद्रा उन्होंने धारण की है। किंतु भीतर में से जो आनंद जो एक इनोसेंस एक दिव्यता पवित्रता निर्मलता प्रकाशित हो रही है। सभी लेडी डिवोटीज को लगा कि सही में वो एक शिशु ही है जो कि इस लड्डू गोपाल की शिशु मुद्रा में वहां पर विराजित है। और जैसे शिशु को देखकर के मां के हृदय में जो स्नेह प्रकट होता है एग्जजेक्टली वैसा ही स्नेह ठाकुर की इस शिशु मुद्रा को देखकर के सभी स्त्रियों के मन में प्रकट हुआ। तो यह वहां पर चल रहा है और उसी समय यह गोपाल की मां अोरमणि देवी वो उसने उस कमरे में प्रवेश किया और जैसे ही प्रवेश किया वैसे ही सभी लेडी डिवोटीज को समझ में आ गया कि ठाकुर ने तो वर्णन किया है बाल विधवा है बाल वगैरह काट के रखती है सफेद वस्त्र पहनती है वगैरह वगैरह म वृद्धा हो चुकी है तो अब इस तरह से सफेद वस्त्र पहनी हुई वृद्धा स्त्री बाल कटे हुए हैं। जिस तरह से उस समय विधवाओं का था वो जैसे ही उसने प्रवेश गरीब है यानी वो देखकर के ही पता चल जाता है कि यही है गोपाल की मां और यहां पे पहले ही ठाकुर उस दिव्य शिशु मुद्रा में लड्डू गोपाल मुद्रा में आरूढ़ हो चुके हैं और यहां पे कुछ समय के बाद में गोपाल की मां का प्रवेश होता है। तो यह देखकर के सबको यह समझ में आ गया जितनी लेडी डिवोटीज थी कि हां उनके आने के यह जो पूर्वाभास की वजह से ही ठाकुर के मन में बाल गोपाल के भाव का यह उदय हुआ है। देखिए माने यह सब प्रीमोनिशन कहे कि क्या कहे आजकल जैसा आप WhatsApp पर लाइव लोकेशन शेयर करते हैं तो हमारे यहां अभी जस्ट रिसेंटली जैसे प्रेसिडेंट महाराज वाइस प्रेसिडेंट महाराज आए तो उनके सेवक क्या करेंगे? वह लाइव लोकेशन शेयर कर देंगे WhatsApp के ऊपर में। तो हम लोगों को यहां पर तैयार होकर रहना है स्वागत के लिए। तो एग्जजेक्टली पता चलता है कि वो अभी एयरपोर्ट से कितना दूर है, इतना दूर है, इतना दूर है। अभी आ ही रहे हैं। तो वो मैप के ऊपर में आप एग्जैक्ट देख सकते हैं। उस समय तो ऐसा कुछ था नहीं कि लाइव लोकेशन शेयर करें। पता चले कि बस उनका गाड़ी प्रवेश करने ही वाला है इस गली में तो अभी पता चलेगा कि अभी वह आ ही रही है। वह था पूरा प्रीमोनिशन का युग। अपना यह जो एक हायर लेवल एक एकिस्टेंस होता है ना स्पेस टाइम के परे एक हायर डायमेंशन जो होती है स्पिरिचुअल डायमेंशन सुपरकॉन्शियसनेस उस लेवल पे यह सब कनेक्शन बैठता था। सुपरकॉन्शियस लेवल पर यह सब लाइव लोकेशन शेयर किया जाता होगा। तो जैसे ही गोपाल मां का उस गली में आगमन हुआ वैसे ही यहां पर ठाकुर ने वो दिव्य लाड लड्डू गोपाल भाव धारण किया और बाय द टाइम गोपाल की मां कमरे में प्रवेश करती है। देख रही है कि ठाकुर एग्जजेक्टली उसी मुद्रा में विराजित है। जैसे कि गोपाल की मां का इस मुद्रा में वह स्वागत कर रहे हैं। तो देखिए कि जितनी भी स्त्रियां थी वहां पे सभी लोग बड़ी माने प्रभावित हो गई कि हां इनके आने का पूर्वाभास ठाकुर को मिल चुका है और इसलिए उन्होंने यह मुद्रा धारण की है। इसका अर्थ आप समझ लीजिए कि गोपाल की मां अघोरमणि देवी कितनी बड़ी आध्यात्मिक अस्थि है। उनका यह जो आध्यात्मिक उपलब्धि किस लेवल पर पहुंचा है कि उनके आने के पूर्वाभास से ही ठाकुर के मन में इतना प्रचंड भाव का यह उथला आता है। तो सभी स्त्रियां बड़ी खुश हो गई। फिर ठाकुर भी धीरे-धीरे भाव का उपश्रम हुआ। सामान्य वो स्थिति में आए। सभी लोग ये गोपाल की मां की प्रशंसा कर रहे हैं कि देखिए आपकी यह जो पवित्रता है, आपका यह जो आध्यात्मिक उपलब्धि है, बाल गोपाल का दर्शन होता है वो इतना मतलब प्रभाविक है कि ठाकुर के भीतर में भी इस तरह का यह काउंटर भाव प्रगटित कर सकता है। तो यह सब हुआ एक दो दिन ठाकुर वहां पर रहे थे। फिर एक दिन

श्रीरामकृष्ण गोपाल की माँ को त्याग की शिक्षा देते है

जैसे कि हुआ कि वैसे ही वो तो जाने का तो समय आ ही जाएगा। तो जैसे ही जाने का समय आया तो वैसे ही वहां पे गोपाल की मां ने भी सोचा कि चलो मैं भी चलती हूं ठाकुर के साथ दक्षिणेश्वर में। अभी कामारहाटी में तो ऐसा कोई कामधाम है नहीं। वहां पर भी बैठकर के जप करना है। यहां पर भी ठाकुर और फिर तो वही बात कि कल ही हमने देखा कि ठाकुर ने कहा कि तुम्हारा दर्शन वगैरह तो इतना हो चुका है। जप करने की जरूरत नहीं और यदि करना चाहती हो तो इसके कल्याण के लिए अपनी ओर इशारा करके करते हैं। कहते हैं तो जो भी अभी जप तप है ठाकुर के ही लिए है। तो ठाकुर का सानिध्य प्राप्त हो। उससे म ज्यादा अच्छा क्या हो सकता है? इससे शुभ क्या हो सकता है? इससे कल्याण कर क्या हो सकता है? तो ठाकुर दक्षिणेश्वर जाने के लिए प्रस्तुत हुए तो गोपाल की मां भी जा रही है और भी कुछ स्त्रियों ने ठीक किया कि यह मौका है ठाकुर का संग दिव्य संग प्राप्त करने का तो वह भी संग साथ में जा रही है। देखिए ये जो एक आकर्षण जो होता है ना यह जो यहां पर पानीहाटी महोत्सव में सब काफी कुछ स्त्री भक्त ठाकुर के साथ में पानीहाटी गई थी। अभी यह दिव्य संघ का आकर्षण ऐसा होता है कि जब वहां से वापस और फिर वो फेमस घटना मां ने कहा था कि मैं क्या जाऊं साथ में इतनी सारी लेडी डिवोटीज जा रही है तो ठाकुर ने कहा यदि उसकी इच्छा है तो जाए तो मां समझ गई कि ठाकुर की इच्छा नहीं है तो वो एक पूरी कहानी अब जब ये लेडी डिवोटीज ठाकुर के साथ में वापस आई दक्षिणेश्वर तो दूसरे ही दिन एक दूसरा उत्सव था भूल गया दो पूर्णिमा की ऐसा कुछ जो भी है वो एक दूसरा एक उत्सव था तो उन्होंने ठीक कर दिया कि वह यहां पर रात को रहेगी और दूसरे दिन जब उत्सव होगा ठाकुर फिर से वह भाव में आएंगे नृत्य कीर्तन करेंगे दिव्य आनंद की तरंगे बहेगी तो वे लोग भी उसका आनंद उठाएगी ठाकुर ने किंतु देखा कि देखो इस तरह से इतना ज्यादा अटैचमेंट जो है वह अच्छा नहीं है। तो फिर ठाकुर ने मैसेज पहुंचाया कि देखो यह जो अभी मथुर बाबू तो थे तो ठाकुर के संपूर्ण रूप से अनुगत थे। किंतु अभी उनका जो लड़का है यह द्वारिक बाबू ना कि ऐसा जो भी होगा उस समय वह तो इतना मतलब ठाकुर का इतना अनुगत नहीं है। ठाकुर का इतना शरणापन्न नहीं है। वह यदि इस तरह से लेडी डिवोटी को वहां पे दक्षिणेश्वर में रात बिताते हुए देखेगा तो वह नाराज हो जाएगा। तो बेटर है आप लोग चली जाइए। तो ठाकुर ने ऐसा मैसेज पहुंचाया तब कहीं जाकर के यह लेडी डिवोटीज वहां से गई थी। सो देखिए कि ठाकुर के मन में दोनों था। लोगों को आकर्षण भी करते थे और साथ में एक सीमा भी बांध करके रखते थे कि कहां तक यह आकर्षण को कार्य करना है। तो अभी उस दिन भी अब ठाकुर दो दिन रहे हैं बलराम मंदिर में और फिर सभी के मन में यह आकर्षण है कि हम लोग ठाकुर के साथ में दक्षिणेश्वर चले और ज्यादा दिव्य संग और माने मन तृप्त नहीं होगा ना ठाकुर जैसे किसी को मिल जाए फिर अपना मन क्या तृप्त होगा अपना मन क्या ये सांसार की चीजों की ओर वापस आएगा कभी नहीं आएगा तो फिर यह अतृप्त मन को ये माने यह अमृत सुधा ठाकुर के दिव्य जीवन की दिव्य दिव्य संग की अमृत सुधा पान करने की सभी लोग चली दक्षिणेश्वर तो ठाकुर ने भी ऐसा कोई मना नहीं किया ठीक है लेडी डिवोटीज बैठी है अोरमणि देवी भी बैठी किंतु हुआ ऐसा कि बलराम मंदिर में किंतु बाय दैट टाइम एक बन गया था अघोरमणि देवी का कि हां एक बड़ी उच्च आध्यात्मिक शक्ति है और साथ में यह भी पता चलता है स्पष्ट दिखता है कि बड़ी ही गरीब है तो वहां से एक पुटली बांध करके दी उसमें यह थोड़े से बर्तन है थोड़ी सी साड़ी ना थोड़ा सा कुछ खाना मिश्री वगैरह ऐसा कुछ होगा वह सब उनको दे दिया और कहा कि यह पुटली आप अपने साथ में ले जाइए। अभी अोरमणि देवी ने भी सोचा चलो संसार में तो यह अभाव है ही है और दूसरा कि यह जो कामारहाटी की जो मालकिन जो लेडी थी वही तो उनको सब देती है ना घुरमणि देवी को उनकी व्यवस्था और कौन करेगा वो तो कामरारहाटी की जो मालकिन है जिनका यह कामारहाटी ठाकुरवाड़ी था अब जैसे ठाकुर के लिए कौन सब जुगाड़ करता है मथुर बाबू करते थे ठाकुर के रसददार थे तो मथुर बाबू एक पूर्ण रसददार थे फिर यह शंभू मलिक एक पूर्ण रसददार था। फिर यह सुरेश मित्र अध आधा रसददार था। बलराम बाबू आधे रसददार थे। फिर यह मिज ओलीबुल जिन्होंने कि बेलूर मठ परचेस करने के लिए जमीन के लिए पैसा दिया था। वो एक रसददार ऐसा करके वो चार रसददार ठाकुर के भी थे। तो रसददार के पास से ही तो साधक को मिलेगा ना। और कौन देने वाला है साधक को? तो अगोरमणि देवी ने भी सोचा यह बलराम बाबू ठाकुर स्वयं यहां पर रहकर के इनका अन्न ग्रहण करते हैं। ठाकुर ने कहा ना कि बलराम का अन्न बड़ा शुद्ध है। तो ठाकुर स्वयं बलराम बाबू के घर रहकर के उनका अन्न ग्रहण करते हैं। तो उनके घर से यदि उनको कुछ प्राप्त हो तो उसमें बुरा क्या है? गरीबी में रहना है किंतु जो सामान्य चीज जीवन धारण करने के लिए मिनिमम वस्त्र तो चाहिए ही चाहिए। बर्तन तो चाहिए ही चाहिए। तो उसमें इतना ग्रहण करने में बुरा क्या है? बोल के उन्होंने तो बड़े इनोसेंट भाव से वह पोटली ले ली और नौका में बैठी है। पोटली अपनी गोद में रखी है और जा रही है नौका। मीन वाइल ठाकुर की नजर पोटली के ऊपर में पड़ी। उन्होंने पूछा अरे इसमें क्या है? तुम तो जब आई थी तो इसमें कुछ था मतलब इस तरह की पोटली पोटली तो थी नहीं। अभी ये एकाई पोटली कहां से आ गई? तो फिर अगोरमणि देवी ने कहा कि बलराम बाबू के घर की स्त्रियों ने मुझे कुछ बर्तन साड़ी वगैरह दी है। तो जैसे ही कहा ठाकुर बड़े ही नाराज हो गए। अभी किंतु क्या है जो छोटा शिशु होता है ना देखिए माने अघोरमणि देवी के साथ में उनका नाता कैसा है? शिशु का वो मां है वो उनके शिशु है तो जैसे एक शिशु नाराज हो जाता है एक बालक मां से तो कैसा कतराता है वो वो मुंह से डायरेक्ट तो बोलेगा नहीं वरना मां मारेगी फिर वो तो डर भी लगता है तो कतराता है मुंह चढ़ा करके बैठता है थोड़ा सा नाराज होकर बातें करता है जैसे एग्जैक्ट एक नाराज शिशु अपनी मां के साथ में जिस तरह से वर्तन करता है इस तरह का वर्तन कर रहे हैं और फिर बीच-बीच में क्या कहते है जो त्यागी है वही ईश्वर को प्राप्त करते हैं। जो लोगों के घर जाकर के खाना खाकर के सिर्फ खाली हाथ चले आते हैं वो भगवान के पास में बैठते हैं। देखिए बहुत बार आप किसी भक्त के घर जाएंगे तो फिर क्या होगा? बहुत सारी आपको गिफ्ट मिलेगी। तो नेचुरली है कि आप सत्संग करने को गए हैं। खास करके हम साधु लोग वैसे मैं किसी के घर जाता नहीं किंतु कोलकाता गया था तो मुनमुनंदी के घर गया था। तो बहुत सारी गिफ्ट मिली थी मुझे। मुझे याद है मिठाई थी। फिर वो प्रणामी भी थी वगैरह वगैरह फल भी थे। तो वो सब ले मैं आया था बेलूर मठ वापिस। यहां पर ठाकुर क्या कहते हैं? जो लोगों के घर जाकर के सिर्फ खाना खाकर के खाली हाथ चले आते हैं, वह भगवान के पास में बैठते हैं। तो गाय ठेस दिए बोशे। गाय ठेस दिए बोसे अर्थात कि उनके अंग के साथ में अंग मिलाकर के माने अंग स्पर्श करवा करके बैठते हैं। इतना माने आप किसी के घर माने आप किसी के इतना पास के जब बैठेंगे कि आपका अंग है उनके साथ में स्पर्श होता हो। आपका हाथ उनके साथ में स्पर्श होता हो। इतना नजदीक आप कब बैठेंगे? जब आपका कोई इंटिमेट रिलेशन होगा। शिशु है मां की गोद में बैठेगा। तो हस्बैंड और वाइफ है इस तरह से वह भी पब्लिक में तो नहीं ही नहीं तो क्या है कि बहुत ही इंटमेट रिलेशन होने से उनके देह स्पर्श होते हैं। इस तरह से बैठते हैं। भगवान शिव और मां पार्वती का आप चित्र देखेंगे तो इस तरह से बिल्कुल पासपास में बैठे हुए दिखाई देंगे। यानी कि देखिए जो भक्त के घर जाता है खाली खाना खाकर के खाली हाथ वापस आ जाता है वो इतना इंटिमेट रिलेशन होता है उसका ईश्वर के साथ में गाय ठेश दिए बोझ अंग के साथ में अंग स्पर्श हो देह के साथ में देह स्पर्श हो इतना इंटिमेट रिलेशन है इस तरह से वो ईश्वर के साथ में बैठता है तो ठाकुर इस तरह की त्याग की बातें कर रहे हैं नाराज हो गए हैं कतराती नजर से देख रहे तो यह बेचारी अघोरमणि देवी तो बड़ी दुखित हो गई। उन मन में लगा और समझ गई ठाकुर जो त्याग की बातें करते हैं और यह जो स्पष्ट कह दिया अभी इससे स्पष्ट क्या कहना कि भक्त के घर जाकर खाना खा के गिफ्ट नहीं लेनी है। इससे स्पष्ट और क्या हो सकता है? तो उन्होंने सोचा कि मैं यह पुटली है वह फेंक देती हूं गंगा में। किंतु फिर भी अभी लेकर के आई। उनको पता है वो रामकृष्ण संघ के भक्तगण जो है माने एक तो है हाई कोर्ट है माने एक तो लोकल कोर्ट होती है फिर हाई कोर्ट होती है फिर सुप्रीम कोर्ट होती है तो ये सुप्रीम कोर्ट है अभी एक वहां पे दक्षिणेश्वर जहां जा रहे हैं तो फिर ये सुप्रीम कोर्ट को कंसल्ट करके डिसीजन लेंगे तो ठीक है गंगा के म दक्षिणेश्वर में नौका आई गंगा के किनारे सभी लोग उतरे और यह अघोरमणि देवी गई सीधी नहबत में मां शारदा के पास में और जाकर के बड़े रोते-रोते कहा देखो मां मुझे तो मेरे पास में तो कुछ है नहीं और मेरे मन में लोभ भी नहीं है। लोभ होता तो इस तरह से बाल गोपाल का क्या दर्शन होता? इस तरह से ठाकुर के मन में ये जो भाव प्रकट हो रहा है उनके आने के पूर्वाभास मात्र से यह क्या संभव होता? तो ये मैं गरीब ब्राह्मणी हूं, बाल विधवा हूं। एक छोटा सा एक मुझे एक साड़ी क्या दे दी? एक बर्तन क्या दे दी? उसी में ठाकुर मेरे से नाराज हो गए हैं। तो मैं क्या करूं? बताइए। आप कहती है तो मैं सब गंगा में फेंक देती हूं या लोगों में बांट देती हूं। तो फिर देखिए किंतु मां का सब कुछ प्रैक्टिकल है। तो मां कहती है कि अरे उनको बोलने दो तुम्हारा तो और कोई है नहीं। तुमको देने के लिए तो और कोई है नहीं। तो तुम क्या करोगी? जो जब जिस चीज की दरकार है वो तो चाहिए ही चाहिए ना। ठाकुर को खुद को या कुछ साधु उस मां उस समय जय राम बाटी में थी। ठाकुर की महासमाधि के बहुत सालों के बाद की बात। तो कुछ साधु है पैदल चल के काशी जाएंगे। ऐसा सोच कर के रास्ते में जय राम भाटी गए और मां का दर्शन करके कहते हैं कि मां हम लोग पैदल चल के भिक्षा मांगते मांगते इस तरह से प्रवृजिया करेंगे। तो मां कहती है कि अरे बेटा ठाकुर का ये जो पायशर बाटी और माछेर मुंडो म पायस की कटोरी और मछली का माथा एटा तो ठाकुर माने मथुर बाबू जुगाड़ करता था वो बैठकर के उन्होंने इसलिए साधना की है तुम बेचारे इस तरह से धूप में भूखे पैदल चल के चल के क्लांत हो गए थक गए इस परिस्थिति में तुम साधन भजन कैसे करोगे बेटर है तुम बेलूर मठ वापस चले जाओ अभी तो सामने दुर्गा पूजा ने ऐसा कोई त्यौहार आ रहा है। वहां पर भी कर्मी की जरूरत होगी। काम करने वालों की वर्कर्स की। इस समय तुमने किसी को ना बताए चले गए वहां से वो उचित नहीं किया। जाओ वापस जाओ। तारकदा अर्थात कि महापुरुष महाराज उस समय इंचार्ज थे बेलून मठ के। मैं तारक को लेटर लिख देती हूं। तो तुमको डांटेगा नहीं। तुम लोगों को वापस ले लेगा। तो देखिए कि ठाकुर के लिए पायस की कटोरी है, मछली है और जो कुछ भी है ठाकुर का जो जो कुछ उनके मन में खाम ख्याल ये जो तरंगे उठती थी सब तो पूर्ण करते थे। एक बार ठाकुर के मन में इच्छा हुई सच्चे जरी के वस्त्र पहनेंगे। यह सोने का जो नल है इस तरह के हुक्के में वह तंबाकू पान करेंगे। बढ़िया मजे से गद्दी और तकिए पर विराजित होंगे। तो जो भी उनके मन में यह काम ख्याल आते थे तरंगे उठती थी वो सब मथुर बाबू ने जरी का पोशाक जुगाड़ कर दिया यह जो सिल्वर जो उसका जो नल होता है इस तरह का हुक्का जुगाड़ कर दिया बिस्तर है तकिया है सब जुगाड़ कर दिया ठाकुर ने सब विराजित होकर बढ़िया मजे से वो हुक्का का पान किया किंतु फिर साथ में ही वैराग्य जो आया ठाकुर कहते हैं ना कि बड़ी-बड़ी वासनाएं मन में से संपूर्ण रूप से माने इन द बिगिनिंग इटसेल्फ एक के बारे संपूर्ण रूप से उसको भगा देनी है। प्रथम से ही भगा देनी है। और छोटी-छोटी वासनाएं है उसका वो जो है भोग कर लेना है। तो यहां पर ठाकुर खुद इस तरह का उपदेश देते हैं। छोटी-छोटी वासनाओं का भोग करके उसको त्याग करना है और बड़ी-बड़ी वासनाएं निकाल देनी है। तो बेचारी जो अघोरमणि देवी तो ऐसा ही तो कर रही है। उनके जीवन में बड़ी वासना है कहां पे? ठाकुर का दर्शन नहीं हुआ था। तब से लेकर के तो वह इतनी तपस्या कर रही है। बड़ी वासना तो थी ही नहीं। अब छोटा-छोटा और वह भी जीवन जरियात चीजों के लिए इस तरह से ठाकुर करें तो कैसे चलेगा? तो फिर अब जब मां ने ऐसा उपदेश दिया कि ठाकुर को तो कुछ पता नहीं है। उनको तो सब रेडीमेड मिलता था। पहले वो मथुर बाबू जुगाड़ करते थे। अभी यह जो भक्त जो है माने ठाकुर के खाने की व्यवस्था जितनी भी थी बलराम बाबू के हस्त थी और वो भक्तों के खाने की बाकी सब जो व्यवस्थाएं थी वो सुरेश बाबू के हाथ में थी। तो ये दोनों मिलाकर के सब व्यवस्था कर रहे हैं। यहां मां स्वयं खाना बना के उनके कमरे में लाके उनको खिला के आ जाती है। ठाकुर को तो पता नहीं है कौन सी चीज कहां से आती है। तो तुम ऐसा टेंशन मत लो। रखो तुम इसको अपने पास में। तो अगोरमणि देवी ने सोचा किंतु ठाकुर को तो थोड़ा शांत करना पड़ेगा। तो उन्होंने क्या किया? उसमें से एक दो वस्त्र बर्तन वह बांट दिए और फिर ठाकुर के लिए बढ़िया सा खाना। ठाकुर पहले से ही वो कहते थे ना जब द्वितीय दर्शन में अघोरमणि देवी ठाकुर के लिए वो सूखे संदेश ले गई। पैसा तो है नहीं। सूखे संदेश लेकर गए तो ठाकुर ने कहा ना कि तुमको इस तरह से पैसा देकर के खर्च करने की जरूरत नहीं है। वह नारियल के लड्डू है फिर तरकारी है वगैरह मेरे लिए बना के लेके आओ। और जितनी भी बार अघोरमणि देवी जाएगी ठाकुर पूछेंगे मेरे लिए क्या खाना बना के लाई हो? बताओ मैं खाना ये खाना है मुझे वो खाना है। अघोरमणि देवी कहती भी है ऐसे कैसे साधु के पल्ले में पड़ी हूं। सब समय खाना खाना खाना तो अच्छा भी है तो ये अघोरमणि देवी दो-तीन बर्तन वगैरह बांट दिया बढ़िया मजे से तरकारी बना करके ठाकुर के पास में ले गई तो बाय दैट टाइम अब ठाकुर ने भी देखा कि उनको पश्चाताप हुआ है और फिर वो टेलीपथिक संदेश भी मिल गया होगा सुप्रीम कोर्ट का वो आ गया है यह माने उनका वर्डिक्ट आ गया है सुप्रीम कोर्ट का वो भी एक टेलीपथिकली मिल गया होगा तो ठाकुर फिर से प्रसन्न हो गए फिर से उनके साथ वार्तालाप कर रहा तो देखिए कि ये जो त्याग की महिमा है दोनों तरह से एक तो माने यह जो पूरा इंसिडेंट है वो कितना गहराई तक जाता है। एक है कि उनके आने के पूर्वाभास से ही अघोरमणि देवी के बलराम मंदिर में आने के पूर्वाभास से ही ठाकुर के मन में यह भाव का उथला आया था। माने किस हद तक आपकी स्पिरिचुअल एक पावर हो होगा कि जबकि ठाकुर के भीतर में आप इस तरह का भाव प्रकट करवा सकते हैं। तो वो तो एक चीज हो गई और दूसरा हो गया कि इतनी सामान्य चीज कि दो-तीन साड़ी बर्तन दिए हैं उसी में ठाकुर इनके ऊपर में इतना नाराज है। सो त्याग की महिमा देखिए। देखिए यह जो शरद महाराज का यह जो सेंट्रल थीम जिसको लेकर के हम यह डिस्कस कर रहे हैं कि सविकल्प समाधि से निर्विकल्प समाधि की यात्रा या तो फिर कहेंगे सगुण ब्रह्म से निर्गुण ब्रह्म के साक्षात्कार की यात्रा भक्ति से ज्ञान की यात्रा यह ऑप्शनल नहीं है। ऐसा नहीं है कि भक्ति मार्ग का जो सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त हो गई, उसके बाद में अभी मैं हाथ पर हाथ रखकर के बैठा रहूंगा, तो ऐसा होगा नहीं। क्योंकि यह जो काम कांचन रूपी यह जो इतना गहराई पूर्वक उसने अपने हृदय में जड़ बिठाई हुई है जितना ही आप उसको काटेंगे इस पेड़ को कामना वासना के उतना ही म आज नहीं ना कल कल नहीं ना परसों नईनई उसकी ये जो पत्ते हैं नईनई डालियां है प्रकट होना शुरू हो जाएगी इस तरह से नहीं तो उस तरह से इस रास्ते से नहीं तो दूसरे रास्ते से यह पेड़ पेड़ देखते हैं ना मैं राजकोट में हमारा एक टेरेस गार्डन था तो अभी टेरेस गार्डन तो छोटा ही है और प्लस धूप जो है वो यूनिफॉर्मली नहीं आती है बीच में थोड़ा सा छांव जैसा होता है मैं करता क्या था वो जो कुंडे के भीतर में यह जो मिट्टी का ये जो गमला होता है उसके भीतर में मैं पौधे रख देता था और छांव के भीतर में भी कुछ है कुछ धूप के भीतर है तो मैंने हमेशा देखता हूं कि यह जो छाव छांव के भीतर रखे हुए गमलों के जो पौधे हैं वो थोड़ा सा बड़ा होंगे ना फिर जिस ओर धूप है उस डायरेक्शन में वह विस्तृत होना शुरू हो जाएंगे। यह स्पष्ट दिखता था मुझे और वैसे ही जो भी गार्डनिंग करता है उसको स्पष्ट पता होता है कि धूप की ओर ही सब पौधे आगे बढ़ते हैं क्योंकि फोटोसिंथेसिस की मदद से इनको आहार प्राप्त करना है। तो क्या है कि यह कामना वासनाओं का भी ऐसा है। यदि आपने एक जगह से उसको दबा दिया तो दूसरी जगह ठाकुर कहते हैं ना जैसे ओल्ड अर्थराइटिस किसी के देह में बैठा हुआ है। अभी गर्दन में पेन करेगा उसका कुछ उपाय करेंगे तो घुटनों में करेगा पेन वहां के कुछ उपाय करेंगे तो और तीसरी जगह पे यानी ये अर्थराइटिस शरीर से जाएगा नहीं उसको आप यहां से सप्रेस करेंगे तो दूसरी जगह निकलेगा तो ये काम कांचन रूपी वासना की जड़ हमारे हृदय में इस हद तक बैठी हुई है कि देखेंगे कि आप उसको कितना ही माने भक्ति मार्ग में कितना ही आगे बढ़ जाइए उसका कहीं पे शांत होना करना तब तक नहीं होगा जब तक कि निर्विकल्प समाधि में यह दगबीज ना हो जाए। सो दिस इज वेरी इंपॉर्टेंट कि शरद महाराज जैसे कहते हैं कि भक्ति मार्ग से निर्विकल्प समाधि की प्राप्ति तो ये कोई ऑप्शनल नहीं है। देखिए ज्यादातर लोगों के लिए इस तरह का दर्शन होना माने वो तो जन्मा जन्मांतर के लिए उनकी जो पिपासा है मिट गई। किंतु यदि आपकी एंबिशन यदि इतनी तीव्र है कहते हैं कि नहीं जो सर्वोच्च आध्यात्मिक शिखर है उसको सर करना है सर्वोच्च आध्यात्मिक प्राप्ति है वो मुझे चाहिए तो फिर साधक वहां पर बैठेगा नहीं वो और भी आगे बढ़ता जाएगा और भी आगे बढ़ता जाएगा तो यहां पर भी यह अघोर मणि की देवी के जीवन में कहीं यह गोपाल के दर्शन से शांत होकर के बैठी रहे ऐसा ना हो जाए बोलकर के ठाकुर उनको त्याग का जो कठोर पथ है उसके ऊपर में उनको आगे बढ़ा रहे

गोपाल की माँ की त्याग की पराकाष्ठा: मारवाड़ी भक्तों द्वारा दिया हुआ आहार जो स्वामी विवेकानंद को ही ठाकुर खाने को देते थे उसे ठाकुर ने गोपाल की माँ को खाने के लिए दिया

हैं। और देखिए त्याग के पथ के ऊपर में आगे बढ़ने से क्या होता है। मारवाड़ी की जो कुछ कहानियां है ठाकुर के साथ में हमको पता ही है फेमस कहानियां है कि उनकी भक्ति भी बहुत थी कुछ मारवाड़ी डिवोटी की और वो ठाकुर को अपने घर बुलाकर के वो जब पूजा पाठ वगैरह उनके घर में होता है उत्सव का आयोजन तो ठाकुर को पुकारते भी थे ठाकुर जाते भी थे सबका आनंद वर्धन करते थे उसी मीन वाइल किसी एक मारवाड़ी ने कहा था कि आपके नाम में ₹100 000 ना कि 10,000 आई थिंक इतना ही था तो इतना रुपया मैं आपको लिख करके देता हूं। जीवन भर के लिए आपका सेवा का कोई त्रुटि नहीं होगा। तो ठाकुर पहले तो बड़े नाराज हो गए उसके साथ में। किंतु फिर जैसे कि मां की परीक्षा लेने के लिए मां को पुकार करके कहते हैं कि देखो यह मारवाड़ी इस तरह से रुपया दे रहा है तो तुम लेना स्वीकार करना चाहोगी कि नहीं? तो मां ने स्पष्ट मना कर दिया कि क्यों? मैंने मुझे पैसा देना हुआ तो आप ही को तो देना हुआ। मैं तो आप ही की सेवा के लिए खर्च करूंगी। तो मुझे भी इस तरह का पैसा नहीं चाहिए। तो देखिए ठाकुर और मां तो वो त्याग के आद सर्वोच्च आदर्श में ऑलरेडी स्थित हो चुके थे। इंटरेस्टिंगली ऐसी ही सेम कहानी राधु के बारे में है। तो फेमस कहानी है। साउथ इंडिया मां गई है तो साथ में राधु भी गई है। साउथ इंडिया पिल्गिमेज के लिए शशि महाराज ने सब व्यवस्था कर दी है। सब मंदिरों में वो मां के लिए 108 सुवर्ण पत्र देकर के वो शिवलिंग की रामेश्वरम मोस्ट प्रोबेबबली कि 108 सुवर्ण पत्र देकर के शिवलिंग की पूजा करवाई है मां के पास से। तो उसी समय मोस्ट प्रोबेब्ली ये रामनाथ की ही बात है। तो वहां के राजा ने वहां का जो स्थानिक लोग जो होंगे उनको मैसेज पहुंचा दिया कि मेरे गुरु के गुरु परम गुरु पधार रहे हैं तो हमारा खजाना है उनके लिए खोल दो। जो भी उनको चाहिए सब उनको दे दो। तो बोलकर के वो जो स्थानिक लोग जो थे म एडमिनिस्ट्रेटर्स तो मां को लेकर के राजा के खजाने के भीतर में गए। सोना, माणिक, जवाहरात, गहने वगैरह सब पड़ा हुआ है। तो मां को बताया कि मां इसमें से जो चाहिए आप पसंद कर लीजिए। तो मां तो खैर मां का तो स्पष्ट है कि उसमें से कुछ चाहिए नहीं। मां ने कहा देखो बेटा शशि महाराज ने तो मेरे लिए सब व्यवस्था कर दी है। मुझे इसमें से कुछ चाहिए नहीं। हालांकि मां कह सकती थी कि शशि महाराज को कुछ चाहिए तो बोल दो। शशि महाराज ठाकुर की सेवा के लिए शायद कुछ ले लेते। एनीवे तो मां ने तो स्पष्ट मना कर दिया। किंतु फिर मां राधो को कहती है कि देखो तुमको यदि इसमें से कुछ चाहे तो ले लो। अभी मां कहती तो है किंतु साथसा मां खुद यह घटना का वर्णन करती है। घटना का वर्णन करने के समय मां कहती है कि मेरा हृदय है ना दुखद दुख कर रहा है। यदि राधु इसमें से कुछ मांग ले। बोले कि यह गहना दे दो, यह जवाहरात दे दो, यह सोने की स्वर्ण मुद्रा दे दो। तो हमारा तो पूरा माने क्या है कि यह जो त्याग और तपस्यामय एक शांति एक जीवन है उसमें किस तरह का कलेल पहुंचेगा किस तरह का डिस्टरबेंस पहुंचेगा और यह माने काम कांचन का मोह भयानक है। इसके बाद में ही यह द्वेष है। ईर्ष्या है। कटु वचन लोगों को कहना है। दूसरों के प्रति दुश्मनावट रखना है। सब आ जाता है। आध्यात्मिक जीवन को जहर बना देता है। आजकल डॉक्टर कहते हैं ना डायबिटीज और हाइपरटेंशन दे आर साइलेंट किलर्स यदि है तो बाहर से कुछ पता नहीं चलेगा किंतु भीतर भीतर में आपके ऑर्गन फेल स्टार्ट हो जाएंगे आपका हार्ट है फिर ये लीवर है लंग्स है सब अफेक्ट होंगे यदि डायबिटीज या हाइपरटेंशन है ये सब साइलेंट किलर है भीतर भीतर में से वह सब सड़ा देते हैं अपने बॉडी को तो यह काम कांचन का मोह जो है आध्या आध्यात्मिक जीवन में आपको लगेगा बढ़िया साधु के कपड़े पहन करके बढ़िया साधक का स्वांग रच करके बैठे हैं। वो हजरा बैठता था ना वो ठाकुर के कमरे के सामने वो पीतांबरी पहन के तिलक लगा के माला बड़ी-बड़ी वो जप करता रहता है। फिर निंदा भी करता है भीतर-बितर में। ये राखाल टाखाल रहा हो करे बेड़ा जप टप करे ना राखाल टाखाल वगैरह जो ठाकुर के पास में यंग लड़के आते हैं हो करके घूमते फिरते रहते हैं और बैठकर के जप तो करते नहीं तो क्या है भीतर में काम कांचन की वासना रहने से बाहर में तो दिखावा बढ़िया होता है किंतु भीतर में आपका ऑर्गन फेलियर होता जाता है तो यहां पे भी मां का हृदय धकधक कर रहा है कहीं राधु कुछ मांग ना ले तो राधु भी देखिए योग माया है ना ऐसी वैसी तो है नहीं तो वो मां को कहती है कि मैं इसमें से और क्या लूंगी? मेरी पेंसिल जो है वह खत्म हो गई है। मुझे एक पेंसिल दे दीजिए। तो मां बड़ी उनका हृदय में शांति हुई। फिर वो खजाने में से बाहर निकले। रास्ते में एक दुकान थी। वहां से एक पैसे का पेंसिल राधु के लिए परचेस करके उसको दिया। सो देखिए कि ठाकुर और मां दोनों के भीतर में त्याग का जो यह है शक्ति प्रचंड रूप से था। म स्थित था और इसीलिए मारवाड़ी ने जब पैसों का ऑफर किया मां ने स्पष्ट मना कर दिया कि पैसा नहीं चाहिए। ठाकुर ने भी मना कर दिया मां ने भी मना कर दिया। अभी दोनों ओर से है मां का जब पेंशन बंद करवा दिया था हमको पता है रामलाल दादा ने मां ने कहा था कि देखो हेमन सोनार मानुष चले गो और एक टाका नियामी की करो माने इस तरह का सुवर्ण मनुष्य दोनों ओर से कहा है मां ने जो अस्थि को लेकर के जो झगड़ा हुआ था मां ने ऐसा ही कहा था कि इस तरह के सोने का मनुष्य चला गया अब राख को लेकर के झगड़ा कर रहा है फिर इसी घटना के बारे में भी कहा कि इस तरह के ठाकुर ही चले गए अभी पैसा लेकर कि मुझे क्या करना है? तो मां के जीवन में भले ही चाहे इतना पॉवर्टी था, इतना सब कुछ था किंतु त्याग की महिमा संपूर्ण रूप से थी। तो वही मारवाड़ी भक्त अभी वह लक्ष्मीारायण मारवाड़ी हो ना कि जो भी हो इस तरह के मारवाड़ी भक्त ठाकुर के लिए जब भी वे लोग भक्त दक्षिणेश्वर आते हैं वो पंचवटी में उत्सव वगैरह कुछ करते हैं वहां पर वो जो काजू किशमिश ये मिचरी अर्थात कि साकर वगैरह का वो भोग लगाते भगवान को और ठाकुर के पास में आकर के उनको ऑफर करते हैं। अभी सबको पता है कि यह जो मारवाड़ी लोगों की जो चीजें खास करके अच्छी-अच्छी खाने की चीजें ठाकुर कहते थे कि देखो इसके भीतर में कामना वासना बहुत सारी जुड़ी हुई है। ये कामना करके देते हैं। संकल्प करके देते हैं कि ठाकुर इसको खाएंगे। ठाकुर को मैं ऑफर करूं। इससे मुझे लाभ क्या होगा? तो मेरे घर में यह बीमारी है वह दूर हो जाए। मेरा यह मुकदमा चल रहा है कोर्ट में। उसमें मेरी जीत हो जाए वगैरह कुछ ना कुछ संकल्प करके ठाकुर को देते थे और ठाकुर भी जो है समझते थे तो बोल के किसी को देते नहीं थे ये सब चीजें इतनी अच्छी अच्छी खाने की चीजें उनका अधिकारी था सिर्फ एक और सिर्फ एक नरन ठाकुर कहते हैं नरन के भीतर में ज्ञानागिनी प्रज्वलित है उसके भीतर में आप कितना ही संकल्प किया हुआ कितना ही कामना वासना से वह जो युक्त आहार फेंकेंगे सब जैसे कि ज्ञान की अग्नि में भस्मीभूत हो जाएगा। तो यदि कोई भक्त उपस्थित है तो ठाकुर उनको कहेंगे कि जाओ तुम कोलकाता जाकर के यह नरेंद्र को देकर आओ और यदि कोई भक्त उपस्थित नहीं थे तो रामलाल दादा उनको कहेंगे ठाकुर कि जाओ तुम और फिर क्या है थोड़ा संकोच भी है बार-बार ऐसा कहना तो रामलाल दादा कहीं नाराज ना हो जाए मना ना कर दे वह तो काली के पुजारी थे ना उनका भी अभी तो एक स्टेटस हो गया है तो फिर ठाकुर उनको पूछेंगे कि अच्छा तुमको क्या कोलकाता में कुछ काम है किया तो रामलाल दादा बोलेंगे नहीं मुझे तो ऐसा कुछ काम है नहीं किंतु यदि आप कहेंगे तो मैं जाऊंगा उनको सब पता है भीतर भीतर देखते हैं कि ठाकुर का जो है संकोच कितना है तो ठाकुर फिर कहेंगे एक काम करो ना तुम यहां से एक पैसा ले जाओ वहां पर शेर की गाड़ी करके तुम जाओ नरेंद्र को मिलकर के आओ मैं उनको उसको उसको देखने के लिए मेरा हृदय जो है बड़ा ही माने उत्सुक हो चुका है तो तुम यह जो मारवाड़ी लोगों की ये जो मिठाई ये काजू किशमिश ये साकर मिचरी वगैरह ले जाओ उसको खिला के आओ वो कहना कि वो तुमको देखने के लिए बड़े व्याकुल है तो रामलाल दादा भी वो फिर वो शेर की गाड़ी करके जाएंगे और नरेंद्र के घर जाकर ये सब खिला के आएंगे। सो देखिए कि नरेंद्र के भीतर में वो जो ज्ञान अग्नि प्रज्वलित है जितनी भी कामना वासना युक्त अह आहार है सब नरेंद्र के भीतर में पड़कर भस्मीभूत हो जाएंगे। कोई संस्कार रहेगा नहीं, कुछ रहेगा नहीं। अभी देखिए कि गोपाल की मां की जर्नी कहां तक पहुंची है। पहले तो ठाकुर इस तरह से जितना भी त्याग वैराग्य माने भक्ति भाव की चरम सीमा तो पहुंच गए हैं। अभी त्याग और वैराग्य की चरम सीमा तक उनको ले जाना है। तभी तो यह सर्वोच्च प्राप्ति होगी। तो जब यह त्याग और वैराग्य की चरम सीमा तक पहुंच गई है अोरमणि देवी एक दिन दक्षिणेश्वर आई है। ठाकुर ने कहा कि देखो यह मारवाड़ी लोगों ने जो मिचरी वगैरह जो दी है सब गोपाल की मां को दे दो। तो जैसे ही ठाकुर ने कहा ऐसा जो लोग बैठे थे सब बड़े आश्चर्यचकित हो गए। माने सन्नाटा छा गया एकदम कि ठाकुर ये क्या कह रहे हैं? सिर्फ एक व्यक्ति है। ठाकुर कहते हैं कि जिसके भीतर में इस तरह की ज्ञान अग्नि प्रज्वलित है कि यह सब कामना वासना युक्त संकल्प युक्त आहार वो कर सकता है और वो है नरन और अभी यह दूसरी उनके नरेंद्र के ही समकक्ष जिनका आविर्भव हुआ है वो है अघोरमणि देवी। देखिए ना ही राखाल ना ही शरद महाराज ये जितने भी ईश्वर कोटि थे ये पूर्ण ये बाबूराम महाराज निरंजन महाराज कोई किसी को भी ठाकुर ने यह मिश्री या बादाम किशमिश इनके द्वारा लाई हुई ठाकुर किसी को नहीं देते थे। सिर्फ नरेंद्र को देते थे। और अभी दिया है अघोरमणि देवी को। सो सी कि ज्ञान की अग्नि अभी उनके भीतर में भी प्रज्वलित हो गई है। सर्वप्रथम भक्ति और भाव की पराकाष्ठा तक पहुंची। बाल गोपाल का दर्शन हुआ और फिर इसके बाद में त्याग की पराकाष्ठा पहुंची कि मारवाड़ी लोगों के द्वारा संकल्प युक्त जो भी आहारी पदार्थ है वह खा रही है और भीतर में ज्ञाना अग्नि इस तरह से प्रज्वलित है कि सब जैसे कि भस्मीभूत हो जाता है। सो देखिए कि भक्ति के मार्ग से यह ज्ञान की ओर जाने की यात्रा और भी इसमें बहुत सारी स्टोरीज है जो कि अभी हम नेक्स्ट क्लास में लेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।

प्रश्न: मारवाड़ी भक्त जो सकाम भाव से ठाकुर को मेवा-मिठाई अर्पित करते थे, क्या उससे उन्हें कोई लाभ मिलता था? जबकि ठाकुर तो वह मेवा-मिठाई स्वयं न खाकर प्रायः स्वामी विवेकानन्द को ही खाने के लिए दे देते थे।

देखिए कुछ नहीं होता तो ठाकुर ये नरेंद्र को नहीं खिलाते। नरेंद्र के भीतर में जो ज्ञान अग्नि प्रज्वलित है वह कामना वासनाओं को काट देता है। अभी उसकी खुद की तो कामना वासना है नहीं ना। यह तो जिन्होंने दी है उनकी है। तो वह तो कट जाती होगी बोलकर के ही ठाकुर यह देते होंगे ना। देखिए ठाकुर अल्टीमेटली ही इज अ बेनेवोलेंट फोर्स। माने लोगों के कल्याण के लिए आए हैं। इसमें माने मूर्ख नारायण, दरिद्र नारायण, चंडाल नारायण ये सब यदि आ गए हैं तो फिर कौन बाकी रह गया इनकी कृपा से? एक बार मां ने कहा था कि जय राम भाटी की कहानी है। अ पागली मामी का एक रिलेटिव वहां पे आया है उनको मिलने के लिए। तो वहां पे मां का घर का वरांडा है। सब तो वहीं पर रहते हैं। घर के वरांडे में उसको खाने को बिलाया बिठाया है। पगली मामी ने बच्चा ही है। अभी बच्चा है तो खाना खा रहा है। बगल में पानी का गिलास पड़ा है। तो एक बिल्ली आकर के उसमें मुंह डाल दिया। तो अभी बच्चे को तो वो तो रोक नहीं पाएगा ना। उसमें इतनी अकल भी नहीं है। पागली मामी ने देखा बड़ी नाराज हो गई। वो पानी फेंक करके दूसरा पानी दिया। वो बिल्ली आकर फिर से उसमें मुंह मारती है। तो फिर से उसने वो पानी बदल दिया और फिर बिल्ली को मारने को भी दौड़ी। तो फिर मां कहती है कि अरे देखो उसको प्यास लगी है। तुम उसकी प्यास में बाधा मत दो। उसको पानी पीने दो। अब नेचुरली है ना। अब यह तो थोड़ा मुश्किल हो गया। एक बच्चा यदि खाने को बैठा है। वो बिल्ली उसमें मुंह डालती है। वह पानी वो पिएगा। उस समय तो हाइजीन सैनिटेशन का इतना नहीं था। किंतु कोई भी मां इस तरह से कैसे सहन कर सकती है? तो वो पागली मामी तो वैसे ही उसका टेंपर आई तो मां के ऊपर में बड़ी नाराज हो गई। कहा कि इतनी दया दिखाने की जरूरत नहीं है तुमको। मनुष्य पे दिखाओ ना दया यदि दया ही दिखानी है। पशु पक्षियों पर क्यों दया दिखाती हो? तो मां ने सीरियस होकर के कहा देखो ऐसा जगत में कोई नहीं है जिसके ऊपर में मेरी दया नहीं है। यदि ऐसा जगत में कोई होगा कि जिसके ऊपर मेरी दया नहीं तो उससे बड़ा अभागा और कोई नहीं। राइट? तो ठाकुर मां स्वामी जी सबके ऊपर दया है। वो मारवाड़ियों के भी ऊपर है। तो यदि ये मैकेनिज्म काम नहीं करता कि स्वामी जी को खिलाने से यह ज्ञान अग्नि में उनका जो है संकल्प वगैरह जो लिया है थोड़ा बहुत भी वह फलीभूत ना हो। ऐसा माने देखिए दोनों ओर से है ना आप भगवान के पास कुछ मांगते हैं मान लीजिए और भगवान श्रेय और प्रेय आपने प्रेय चीज मांगी तो भगवान ने आपको श्रेय चीज दे दी ऐसा भी तो है मैंने मांगा कि सांसारिक कल्याण हो तो भगवान ने दे दिया तुम्हारा आध्यात्मिक कल्याण होगा ऐसा भी तो है तो मारवाड़ी लोगों ने जिस संकल्प के साथ में वो चीजें दी होगी कोर्ट केस जीते या वगैरह जो भी है वो फलीभूत हुआ कि नहीं हुआ वी डू नॉट नो किंतु उनका आध्यात्मिक कल्याण हुआ उसमें तो कोई प्रश्न ही नहीं है। किंतु देखिए भगवान के पास मांगना बुरा नहीं है। फिर भगवान के ऊपर है क्या देंगे? हमने जो मांगा है वो ना दे और भी कुछ दे दे। सो बहुत बार है ना कि भगवान के पास आप सुख मांगेंगे ना दुख दे देंगे। क्यों? कि दुख रूपी ज्वाला में तप करके अपना यह जो कामना वासना है जल जाएगा। सो वो भी है थोड़ा ध्यान से मांगना है कि हमारे कल्याण के लिए देंगे। फिर वो कल्याण को हम पचा पाएंगे कि नहीं किसको पता [हंसी] वो जो कहते हैं ना ये जो ये जो पानी वाला ये सब भेड़े सेड़ वाला दूध पहन पी पी करके अब जो शुद्ध दूध मिलता है वो खाने से पेट गड़बड़ हो जाता है। [हंसी]

प्रश्न: एक ओर लगता है कि अपनी हर समस्या का समाधान ईश्वर से ही माँगना चाहिए—आख़िर उनसे बढ़कर अपना कौन है? लेकिन दूसरी ओर यह भी कहा जाता है कि ईश्वर जो दें, उसे प्रसाद मानकर स्वीकार करो। फिर प्रश्न उठता है—माँगें या केवल स्वीकार करें? यही तो दुविधा है।

नहीं, नहीं, एग्जैक्टली, वह स्वामी जी वाला। वह गए हैं रोटी, कपड़ा, मकान मांगने के लिए। वह बार-बार मांग के आते हैं ज्ञान, भक्ति, वैराग्य। फिर आकर के ठाकुर को कहते महाशय आप ही का सब जादू चमत्कार है। आप ही अभी कुछ करवा दीजिए। [हंसी] तो ठाकुर ने कहा, "अच्छा ठीक है, ठीक है। वो मोटा भात कापड़े और अभाव थकवेना।" म सामान्य खाने पीने के अभाव नहीं रहेगा।" तो यू आर राइट कि मांगने को क्या गए हैं? मुंह से मतलब स्वामी जी का तो इतने लेवल पे थे मुंह से निकल जाता है। अपना तो ऐसा होगा नहीं। हमको तो वही मांगेंगे जो मांगना है। [हंसी] हम तो रोटी कपड़ा मंगा नहीं मांगेंगे। बट देन व्हाट ईश्वर गिव्स दैट वी हैव टू और फिर उपाय भी तो नहीं है ना। देखिए कहां पे जाएंगे। आप बोल ठीक ही कहा ज्योतिष के पास जाएंगे जादू चमत्कार कुछ दोरा धागा करवाएंगे वगैरह-वगैरह बट डस इट इवन हेल्प राइट सो ऐसा तो है नहीं कि माने ईश्वर को बाईपास करके और कोई पावर है कि जिसके पास हम जाए मन की शांति के लिए हम जा सकते हैं। मां ने खुद ने राधो के लिए वो तांत्रिक को बुलाया था वगैरह जो मन की शांति के लिए जो एक सामान्य लेवल पर करना है हम सब कर लेंगे। बट अल्टीमेटली म हमको पता वेदर वी रियलाइज इट और नॉट कि ईश्वर के अलावा ऐसी कोई अल्टीमेट सत्ता है नहीं कि जो हमको हेल्प कर पाए। जैसे आपने कहा ये जो फ्रेंड होते हैं तो फ्रेंड को ही हेल्प कर देंगे। पैसा दिलवा देंगे थोड़ा बहुत नेटवर्क है तो कहीं पर कांटेक्ट करवा देंगे वगैरह-वगैरह। सो माने देखिए सांसारिक प्रगति हो। मास्टर महाशय ने पूछा कहा ना ठाकुर को कि माने संसार में पैसा ज्यादा मिले म नौकरी में ऐसी चेष्टा करना क्या ठीक है कि गलत है ठाकुर ने कहा ठीक है उसमें कुछ गलत कुछ नहीं है किंतु देखो कि सत रास्ते पर हो असत के रास्ते पर ना हो सो ठाकुर ने स्पष्ट कह दिया है मास्टर महाशय को स्वामी जी ने वो शरद चंद्र चक्रवर्ती को कहा था कि अच्छा तुमको साधु नहीं होना है तो तुम इंपोर्ट एक्सपोर्ट का काम करो बैठे मत रहो हाथ पर हाथ रख के इंपोर्ट एक्सपोर्ट करो देश का कल्याण करो जे आरडी टाटा को कहा था ये आप लोग लेना बेचना क्या करते हैं? मैन्युफैक्चरिंग स्टार्ट करो। है ना? तो अपना तो ब्रह्म और शक्ति माने अभेद ऐसा तो है नहीं कि आप जगत को छोड़कर के ही ईश्वर के पास जाए। जगत का भी कल्याण हो। माने सत्य के रास्ते पे हो।

प्रश्न: हमें ईश्वर की इच्छा को स्वीकार करना चाहिए। लेकिन कहीं यह स्वीकार करने का भाव हमें भाग्यवाद (Fatalism) और पराजयवादी मानसिकता (Defeatism) की ओर तो नहीं ले जाता? फिर प्रश्न उठता है—क्या हमें पूरा पुरुषार्थ करना चाहिए, या केवल जो हो रहा है उसे स्वीकार करते रहना चाहिए?

देखिए [हंसी] पुरुषार्थ और परमार्थ दोनों का इक्वल महात्म है। हिंदू शास्त्र जैसे ही पढ़ेंगे गीता वगैरह पुरुषार्थ भी करना है परमार्थ भी चाहिए। सो ऐसा कहीं नहीं है कि सिर्फ परमार्थ पर भरोसा करके बैठना है। सो स्वामी जी का तो फेमस आत्मश्रद्धा यदि आत्मश्रद्धा नहीं है तो फिर तो आध्यात्मिक जीवन का क्या होगा? कुछ नहीं होगा। सो पुरुषार्थ है, आत्मश्रद्धा है। देखिए यह जो मैं यहां पर सीपी क्लीनिक में जाता हूं यदि मैं सबको कहता हूं कि आप यदि डिप्रेस हो जाते हैं ना सीपी क्लीनिक में जाइए। माने आपका जितना भी बुरा है उस लेवल का बुरा नहीं है। माने हाथ पैर ही नहीं चल रहे हैं। आपकी उम्र उसके बच्चों की उम्र 12 13 15 है। बाथरूम जाने के लिए आपको असिस्टेंस चाहिए। बिना मां के आप जा नहीं पाएंगे। और मां का यदि खुदा ना खास्ता म भगवान ना करे मां का मृत्यु हो गया देहांत हो गया तो फिर तो संभाल रखने वाला कोई नहीं है। आप उनकी कहानियां सुनेंगे कि घर में तो चारों ओर से उनको लानत तो मिल ही रही है। ऊपर से मां ही अकेली है जो कि उनको ले आती है। मां नहीं रही तो कोई नहीं उनको म खाना भी कोई खाने को नहीं देगा। सो उस लेवल पे और फिर भी देखिए कि आई सी चेयरफुलनेस। मां के भीतर में चेयरफुलनेस बच्चों के भीतर में भी है। जैसे ही जाएंगे जय राम कृष्ण जय राम कृष्णा करके वो एकदम हल्ला मचा देंगे बच्चे लोग। सो अपना कितना ही अपने जीवन में हो उस लेवल पर तो नहीं है हम लोग। राइट? सो इफ दे कैन बी चेियरफुल? व्हाई शुड आई गो डाउन इनू डिप्रेशन कि अरे मेरे साथ में क्या होगा? रेिग्नेशन दे दिया मैंने मेंटली। अब जो होना है सो होगा। व्हाई शुड वी बी लाइक दैट? हां है ना अपने जीवन में फिर भी चलो भाई एक तो आशा बनी है हाथ पैर जब तक चलते हैं तब तक आशा है तो हाथ पैर ही चलना बंद हो गया फिर क्या और माने हाथ पैर चलना बंद तो फिर भी ठीक है माइंड चलना बंद हो गया स्वामी जी ने कहा ना इफ आई गो मेड शूट मी माने मेरा दिमाग खराब हो जाए तो मुझे शूट कर देना स्वामी जी ने स्पष्ट कहा है तो यदि दिमाग चलना बंद कर देन यू हैव टू लीव [गला साफ़ करने की आवाज़]

प्रश्न: जब कोई बच्चा सेरेब्रल पाल्सी (CP) जैसी गंभीर अवस्था में जन्म लेता है, तब ईश्वर उसकी सहायता किस प्रकार करते हैं?

किंतु देखिए ऐसे ही तो संस्कार कटेंगे ना संस्कार को काटना वो तो काटना तो है ही है हमको आज नहीं ना कल देखिए हम लोग पिछले 60 70 साल से शांति के युग में जी रहे हैं माने थोड़ा बहुत इधर-उधर बॉर्डर पर होता है वगैरह वगैरह दुनिया के दो-तीन कोनों में कुछ ना कुछ चलता रहता है किंतु वर्ल्ड वॉर वन वर्ल्ड वॉर टू जैसे जैसा वो जो एक ग्लोबल कॉन्फ्लगरेशन जो स्टार्ट हुआ था ऐसा तो अभी नहीं है। ऑलमोस्ट 90% पीपल पृथ्वी के वो शांति से जी रहे हैं। आखिरी 60 70 साल से ये शांति चल रही है। किंतु दिस इज अ यूनिक फिनोमिना। आप हिस्ट्री पढ़ेंगे ना कंटिन्यूस वॉर, सिविल वॉर, पेंडेमिक ऐसा कुछ ना कुछ चलता रहता है। लोगों का लाइफ कभी सेटल नहीं था। सो वी आर लीडिंग दिस सेटल्ड लाइफ। राइट? दिस इटसेल्फ इज गॉड्स ग्रेस। अब तपस्या तो करनी ही है। अभी आप ध्रुव की तरह एक पैर पर बैठ खड़े रह के तपस्या करें ना कि फिर इस तरह से क्राइसिस आकर तपस्या करें। भगवान अपने से तपस्या करवा लेंगे। इवन माने अह अघोरमणि देवी का खुद का ना बाल्या विधवा है तो समाज के कठोर नियम का पालन करना है। सो बहुत कुछ तो अनइड था ना। वो तो आ गया है उनके सर पे म स्वामी जी एक मात्र है जो कि पूरे मंडल में ठाकुर के भक्त मंडल में जो कि वो खा सकते हैं ना अघोरमणि देवी गोज़ एंड सीट विद स्वामी जी और बाद में तो वो फाइट होने वाली है फिर [हंसी] उन्होंने ठाकुर का सेंस ऑफ ह्यूमर ऐसा था ऐसा दो बिल्कुल ऑोजिट भाव वाले भाव वाले जो होंगे लगा देंगे दोनों में झगड़ा यहां पे वो गिरीश घोष और स्वामी जी का लगा दिया था वो हीरानंद आया था तो उसको बोल दिया था स्वामी जी के साथ में विचार करो मास्टर महाशय को स्वामी स्वामी जी के साथ में लगा दिया था। ठाकुर ऐसा स्वामी जी के साथ में जो भी आता है ना लगेगा कि ऑोजिट भाव वाला लगा देंगे। चलो अभी तुम लोग विचार करो मैं सुनता हूं।

प्रश्न: ठाकुर कहते हैं—बलराम बाबू के उपहार मत लो। लेकिन माँ सारदा कहती हैं—ले सकती हो। क्या यहाँ माँ सारदा ठाकुर की कठोर आध्यात्मिक आदर्श को निचा कर रही हैं, या इसके पीछे कोई गहरा आध्यात्मिक रहस्य है?

वो जो योगानंद की कहानी है ना मोस्ट प्रोबेब्ली योगानंद योगेंद्र महाराज ही थे। वो पेट में दर्द हो रहा है। मां ने उनको शरबत बना के दिया। तो ठाकुर आकर के मां को कहते हैं कि देखो इसको साधु होना है। जीवन भर तपस्या करनी है। अभी जब तक तुम हो तो उसको तो शरबत बनाकर पिलाओगी। ये साधु बनेगा तपस्या करेगा तो शरबत पिला पिलाने वाला कोई नहीं रहेगा। तुम ऐसा क्यों करती हो? तुमने शरबत क्यों पिलाया? ये तो बेड हैबिट तुम लगा रही हो उसको। तो मां थोड़ी नाराज होकर बोलती है उसकी सब चिंता मैं करूंगी। आपको चिंता करने की जरूरत नहीं। तो ठाकुर बेचारे वहां से निकल गए। [हंसी] तो यू आर राइट कि देखो सब तो उस लेवल के अधिकारी नहीं होते हैं ना। सो हम लोगों अब जैसे आप है या मैं हूं जो भी अपने लेवल के हैं इस तरह की कठोरता कैसे होगी? इंपॉसिबल म जो ठाकुर ने किया वो तो अद्भुत है ना। हनुमान दास्य भाव की साधना करते हैं तो पूछ बढ़ना शुरू हो जाता है। वह पेड़ के नीचे बैठकर साधना करते हैं तो पेड़ के पत्ते झुलस जाते हैं। वो मधुर भाव की साधना करते हैं तो अकॉर्डिंगली बॉडी चेंज हो जाता है। तो तो हम तो सोच भी नहीं सकते ना। तो कि क्या आध्यात्मिकता का रास्ता बंद हो गया हमारे लिए। ऐसा भी तो नहीं है। जो थोड़ा बहुत इस जन्म जन्मांतर की यात्रा है। ठाकुर ने एक जन्म में सब कंप्लीट कर दिया। 12 साल में कंप्लीट कर दिया। भगवान बुद्ध ने 12 साल तपस्या करके निर्वाण प्राप्ति कर ली। अपना तो 12 हजार 12 लाख 12 करोड़ जितने भी जन्म जन्मांतर चलेंगे। सो अपने लिए रास्ता थोड़ी ना बंद हो जाना चाहिए। माने जैसे कहा संसार में ऐसा कोई नहीं जिसके ऊपर मेरी दया नहीं। वो गली में चौका लगाते हैं। फिर आईसीसी में पहुंच जाइए तो पता चलेगा वहां का तो स्टैंडर्ड ही अलग है। [हंसी] ओम