prayer
ओम स्थापकाय यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग साधक भाव प्रथम अध्याय साधक और साधना इसमें हम प्रश्नोत्तरी देख रहे थे शरद महाराज स्वामी शारदानंद जी लीला पहला प्रसंग के ग्रंथकार हमको प्रश्नोत्तरी के माध्यम से वेदांत और साधना इसके कुछ मूल तत्व है वह समझाते हैं। इसमें सर्वप्रथम मूल तत्व या तो फिर बेसिक कोर कांसेप्ट जिसको हम कहेंगे वेदांत या तो फिर आध्यात्मिक साधना के वो तो सबसे पहला कोर कांसेप्ट है मूलभूत सिद्धांत है। सर्वभूत में ईश्वर दर्शन ही है आध्यात्मिक जीवन का चरम लक्ष्य परम प्राप्ति और दूसरा है कि मैं सभी के भीतर में अपना ही स्वरूप या तो फिर मेरे भीतर में जो आत्मन है मेरा जो सही स्वरूप है मैं सर्व सभी के भीतर में नहीं दर्शन कर पा रहा हूं नहीं अनुभव कर पा रहा हूं इसका कारण है भ्रम हमारे मन के ऊपर में एक भ्रम भ्रम का आवरण हुआ है। इसकी वजह से हम इसका जो सर्वभूत ईश्वर दर्शन या तो फिर सभी के भीतर में वही दिव्य ईश्वरीय अंश यह हम ना ही अनुभूत कर पाते हैं ना ही दर्शन कर पाते हैं। तो यह भ्रम क्यों हुआ? यह कैसे हुआ? या तो फिर भ्रम क्या है? इसके बारे में शरद महाराज अभी आगे वर्णन करते हैं। हम लोग इस वर्णन को आगे पढ़े। इससे पहले पहले तो शरद महाराज का जो भ्रम के बारे में जो उत्तर है वह पढ़ लेते हैं। उसके बाद में रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर में भ्रम के बारे में क्या कहा गया है? अज्ञान अविद्या माया के बारे में क्या कहा गया है? उसको कुछ कहानियों के माध्यम से देखेंगे।
सर्व भूत में ईश्वर दर्शन क्यों नहीं हो रहा है
तो प्रश्न था कि सर्वभूत में ईश्वर दर्शन क्यों नहीं हो रहा है? उत्तर है तोमरा भ्रम पिया छो तुम लोग भ्रम में पतित हुए हो जतो ना ओई भ्रम दूरीभूत होए ततो क्षण केमोन कोरिया ओ भ्रम धर ते पारबे जब तक यह भ्रम दूर नहीं होगा तब तक यह किस तरह से समझ सकोगे कि मैं भ्रम में पतित हुआ हूं यथार्थ वस्तु वो अवस्थार सहित तुलना कर आमरा बाहरे ओ भीतरे भ्रम दरिया था की जो सही वस्तु है और उसके जो वस्तु और अवस्था है उसके साथ में तुलना करके ही कंपैरिजन करके ही हम बाहर का और भीतर का भ्रम पकड़ सकते हैं। ये यथार्थ वस्तु और अवस्था के साथ में तुलना करना। देखिए बहुत बार जब हम पढ़ाई लिखाई में ज्यादा ध्यान नहीं देते तो हमारे मां-पिताजी क्या करेंगे? हमारा कोई फ्रेंड या हमारा कोई कजिन या हमारा कोई रिलेटिव जो कोई भी हो पढ़ाई लिखाई में बड़ा तेज होता है तो उसका एग्जांपल देकर बताएंगे कि देखो वह कितना अच्छे से स्टडी कर रहा है और तुम हो कि तुम्हारे परसेंटेज या तो फिर मार्क्स जो होते हैं परीक्षा में वह कहां 60 70 से ज्यादा आते ही नहीं है और उसको देखो कैसा 80% 90% लाके आता है। वह बड़ा होगा तो डॉक्टर बनेगा, इंजीनियर बनेगा और तुम बड़े होगे तो क्या करोगे? ना ही नौकरी मिलेगी। दर-बतर भटकते रहोगे पैसों के लिए और तुम्हारा परिवार भी कष्ट में, तुम्हारा जीवन भी कष्ट में तो तुम्हारे वो जो मित्र है या तुम्हारा कजिन है सीखो उससे कुछ। तो ऐसा करके मां-पिताजी हमको थोड़ा सा डराते हैं, धमकाते हैं। क्यों? क्योंकि हमको खुद को समझ में नहीं आता कि स्टडी या तो फिर अभ्यास काेंस क्या है। हमको ऐसा लगता है कि मैं जो कर रहा हूं अच्छा ही है। किंतु फिर जब दूसरों को देखते हैं उनके यह जो परफॉर्मेंस देखते हैं उनका जो रिजल्ट देखते हैं तब हमको लगता है कि अरे नहीं मैं जो कर रहा हूं इनफ नहीं है। आध्यात्मिक जीवन में भी देखिए कि यह किस तरह से नरेंद्र जो था यह जो जितने भी त्यागी संतान थे ठाकुर के उन सब में नरेंद्र की जो अवस्था थी आध्यात्मिक अवस्था सबसे उच्च थी तो नरेंद्र को देखकर के बाकी लोगों को भी शास्त्रार्थ करने का साधना करने का बल मिलता था प्रेरणा मिलती थी लाटू महाराज की वह कहानी जग जाहिर है एक बार उन्होंने ठीक ठीक कर लिया। वराह नगर मठ की घटना है। ठाकुर की महासमाधि के बाद में लाटू महाराज ने ठीक कर लिया कि स्वामी जी से ज्यादा जप करके दिखाएंगे। स्वामी जी से ज्यादा ध्यान करके दिखाएंगे। तो फिर उन्होंने पूरी रात बैठकर के पूरा दिन बैठकर के जप करते ही गए करते ही गए और आखिर में जब आंख खोल के देखा तो नरेंद्र तो कहीं वहां पर बैठे नहीं रहने वाला है। जब लाटू महाराज जप कर रहे थे तो नरेंद्र क्या बैठे रहने वाला है कि हां वह आकर के मेरे आगे निकल जाए। मैं उसकी राह देखता हूं। वह अपने से अपना जब प्रारंभ रखे हैं, चालू रखे हैं। तो बाय द टाइम स्वामी जी जहां पर थे जिस लेवल पर उस लेवल पर लाटू महाराज पहुंच गए। तब पता चला कि स्वामी जी और कहां और कितने आगे निकल गए हैं। यह अखंडानंद जी यह अपने गंगाधर महाराज वो गुजरात में गए थे। अ स्वामी जी का संधान करने के लिए पता चला कि स्वामी जी यहां पे है जूनागढ़ ना कहीं पे जाकर के बात किया तो पता चला कि वो कहां कच्छ ना कि भज निकल गए हैं तो बड़े कष्ट से बड़ी मुश्किल से वहां पर गए रास्ते में कुछ लूटोरों ने भी हमला किया डाकुओं ने भी हमला किया तो ऐसा करके वहां पर पहुंचे नारायण सरोवर नक कहां पे जो भी हो तो पता चला स्वामी जी और आगे निकल गए हैं तो फिर और फिर कष्ट करके वहां पर गए पता चला स्वामी स्वामी जी और आगे निकल गए हैं। तो फिर और कष्ट करके गए तो पता चला कि अभी कुछ ही समय पहले ही स्वामी जी यहां से निकले और नेक्स्ट मंजिल जो है वहां पर चले गए। तो जितना बेचारे अखंडानंद जी पीछे जाते जाएंगे उतना ही पता चलेगा कि स्वामी जी बस थोड़ी समय पहले ही अगले ही दिन या अभी कुछ समय पहले निकल गए हैं यहां से। आखिर में गंगाधर महाराज ने स्वामी जी को पकड़ लिया। किंतु देखिए कि आध्यात्मिक जगत में तो स्वामी जी विश्राम नहीं करने वाले हैं। यह एक एक मंजिल पर पहुंच के कि लाटू अभी मुझे पकड़ने के लिए आ रहा है तो मैं यहां पर थोड़ा सा विश्राम कर लूं। वह तो अपना चलते ही जाएंगे। चलते ही जाएंगे। उनकी जो गति है तो बाय द टाइम लाटू महाराज वहां पर पहुंचे तो पता चला स्वामी जी और कितने आगे निकल गए हैं। यह काली महाराज की घटना अभेदानंद जी तो उन्होंने एक बार वैसे तो क्या है कि शास्त्रार्थ करने में फिलॉसोफिकल डिबेट और आर्गुममेंट करने में तो नरेंद्र का कोई मुकाबला नहीं है। स्वामी जी जिस तरह से आर्गुमेंट करेंगे। कोई उनके सामने नहीं जीत सकता है। किंतु एक दिन बड़ी खुशी की पल आई काली महाराज के लिए। एक बार उन्होंने नरेंद्र को कॉर्नर कर दिया। यह भी वराह नगर की ही घटना है। ठाकुर की महासमाधि के बाद की ही मोस्ट प्रोबेबबली। तो नरेंद्र को कॉर्नर कर दिया कि सब तरह से घिर लिया फिलॉसोफिकल आर्गुमेंट देकर के। तो नरेंद्र उसमें से रास्ता निकाल ही नहीं पा रहा है। तो काली महाराज खुद इस घटना का वर्णन करते हैं। कहते हैं मुझे इतना खुशी हुआ चलो एक बार तो नरेंद्र को मैंने कॉर्नर किया है। हराया नहीं है। स्वामी जी कहते हैं कि देखो अभी मुझे कुछ आर्गुममेंट इसके बारे में मिल नहीं रहा है। आज रात ठहर जाओ। कल सुबह को फिर से प्रारंभ करते हैं। तो उस दिन तो काली महाराज बड़े खुशख हो गए कि नरेंद्र को कॉर्नर कर दिया। नरेंद्र को बेचारे को उत्तर देने में तकलीफ हो रही है। देखो मेरी जो फिलोसोफिकल शक्ति कितनी है। तो फिर दूसरा दिन किंतु पता चला कि सुबह में ही स्वामी जी ने फ्रेश आर्गुममेंट ऐसा गोला बारूद प्रारंभ किया कि बेचारे खाली महाराज कुछ ही क्षण में उनके सामने हार मान गए। किंतु देखिए कि बात यह नहीं है कि स्वामी जी इनको हराना चाहते थे या इनको नीचा दिखाना चाहते थे। ठाकुर की ही जो उपमा है कि एक पहलवान अपने शागिर्द को ट्रेन कर रहा है। तो अभी वह तो जो नया लड़का आया है उसको तो कुश्ती के दांव पेच आते नहीं है। तो वह जो उसका गुरु जो होगा कुश्ती कुश्तीबाज वो क्या उसको बार-बार हराएगा? बार-बार पटकेगा। बार-बार क्या उसकी पिटाई करेगा? वह बेचारे का तो उत्साह ही खत्म हो जाएगा कुश्ती लड़ने का। तो अभी गुरु क्या करेगा? बीच-बीच में वह शागिर्द को हराएगा और बीच-बीच में खुद अपने से हार स्वीकार कर लेगा। जिससे कि क्या है चेले को थोड़ा सा उत्साह मिले। उसे भी लगे कि हां मैं भी कुछ कुश्ती में आगे बढ़ सकता हूं। मास्टरी प्राप्त कर सकता हूं। तो यहां पे भी स्वामी जी का तो कहीं यह उद्देश्य नहीं था कि काली महाराज या फिर लाटू महाराज का अपमान करना या उनको नीचा दिखाना। हो सकता है कि स्वामी जी ने स्वयं उस दिन अपने को कॉर्नर करके काली महाराज को एक दिन के लिए वो एक उत्साह लेने दिया कि हां कि करो आनंद मुझे कॉर्नर करने का एक दिन के लिए। तो जो भी है यहां पर जो शरद महाराज कहते हैं कि यथार्थ वस्तु और अवस्था के साथ में तुलना करके ही हम बाहर का और भीतर का भ्रम पकड़ सकते हैं। अदरवाइज तो हमको पता ही नहीं चलेगा कि हम भ्रम में पतित हुए हैं। ठाकुर को जब देखेंगे ठाकुर को वो जब वो काली मंदिर में वह भाव अवस्था में वह पड़े हुए थे तो उस समय एक आदमी ने आकर के ठाकुर से बड़ा ईर्ष्या करता था वो। वह सोच रहा है कि यह मथुर बाबू वगैरह को ठाकुर ने जादू टोना करके अपने वश में कर लिया है। ऐसा कुछ सोचता था तो उसने वह भाव में गिरे हुए ठाकुर के शरीर अंग पे जूतों से पैरों से बहुत सारे आघात पहुंचाए। जब ठाकुर भान में आए अर्थात कि उनका जो भाव है उसका उपशम हुआ और जागृत अवस्था में वापस आए तब उनको यह जो कष्ट हुआ दर्द हुआ वह तो हम समझ ही सकते हैं। फिर ठाकुर के जो उनके मित्र होंगे वहां पर मुझे पता नहीं कि इस घटना में हृदय का क्यों कोई उल्लेख नहीं है। हृदय के रहते रहते कोई ठाकुर का इस तरह से उनके अंग पर आघात करें। यह तो विश्वास नहीं हो रहा है। एक चीज दूसरा कि ठाकुर के साथ में इस तरह का अपमान होने के बाद में हृदय कोई चुपचाप बैठा रहे। वह भी समय विश्वास नहीं होता है। तो जो भी है शायद हृदय उस समय होगा नहीं या तो फिर ठाकुर ने उसको जोरों से मना किया होगा डांट करके कि अभी तुम बदला लेने के लिए मत जाना। तो जो भी है और कोई जो भी वहां पर उपस्थित होगा सब ने कहा कि चलिए मथुर बाबू को कंप्लेन करते हैं। तो ठाकुर कहते हैं नहीं कोई जरूरत नहीं है कंप्लेन करने की। उसने अज्ञता में आकर के अज्ञान वशत यह कार्य किया है। अभी जब हम अपने को ठाकुर का ठाकुर के साथ में इस तरह से कंपेयर करते हैं तो पता चलता है कि उनके भीतर में जो क्षमा का गुण था, धैर्य का गुण था, करुणा का गुण था, दया का गुण था। उसमें से 1% 1% का भी 1% हम लोगों में नहीं है। कोई हमारे पे आघात करने की बात तो छोड़ ही दीजिए। कटु वचन भी कोई यदि कहता है हम हमको कोई क्रिटिसाइज भी करता है तो हम फट करके उत्तर दे देते हैं साथ में उतना सा भी हम में सहन शक्ति नहीं होता तो फिर हम जब अपने को ठाकुर के साथ में कंपेयर करेंगे तब पता चलेगा कि हम देखिए कि कितने बड़े भ्रम में पतित हुए हैं। तो इसलिए यहां पे फिर महाराज क्या कहते हैं? पूर्वोक्त भ्रम धरते होले तोमा देर ओ रूप ज्ञान प्रयोजन इस भ्रम को पकड़ने के लिए तुमको इस तरह के ज्ञान का प्रयोजन है। अच्छा तो यहां तक तो शरद महाराज ने हमको कहा कि हमारा जो अज्ञान है या तो फिर सर्वभूत में ईश्वर दर्शन नहीं हो रहे हैं। उसका कारण है भ्रम। अभी भ्रम क्या है? इसके बारे में कुछ कुछ कहानियां अपने ऑर्डर में है ही है। किंतु मैं इस कहानियों का प्रारंभ करता हूं जैन बुद्धिज्म से। जैन बुद्धिज्म
story of Hui Neng - sixth patriarch of Zen
में एक बड़ी सुंदर कहानी है। अ जैन बुद्ध अभी हमको तो पता है कि जैन का जैन बुद्धिज्म का इवोल्यूशन कैसे हुआ। भारत में से जो बौद्ध धर्म चाइना में गया तो उस समय चाइना में उसकी एक सब ब्रांच प्रारंभ हुई। उसका नाम था चांद या तो फिर चैन जो भी आप प्रोनाउंस करें सी एच ए एन यह चांद जो था चांद बुद्धिज्म या तो फिर बुद्धिज्म की चांद स्कूल यह ध्यान का बौद्ध ध्यान का चाइनीस वर्जन है। संस्कृत में कहेंगे ध्यान तो चाइनीस में कहेंगे चांद। तो यह ध्यान का हुआ चांद। यानी कि बौद्ध धर्म के वैसे बहुत सारे शाखा प्रशाखाएं बढ़ गई थी। उसमें कहीं देवी देवताओं की सांप की और पत्थर और यह भी सब पूजाएं प्रारंभ हो गई थी। किंतु उसका जो प्योर फॉर्म था कि मेडिटेशन यानी कि यह निर्वाण प्राप्ति वही एक प्योर रास्ता है। तो वह एक रास्ता यह अभी भी बचा हुआ था। और इस ब्रांच को कहते थे चांद बुद्धिज्म। किंतु इसमें भी ऐसा हुआ कि इसमें भी कुछ-कुछ शाखाप्रशाखाएं होती गई। एक प्रशाखा गई जापान में और जापान में चांद का हुआ जैन। तो यह जैन बुद्धिज्म जो है यह लोग अपने पेट्रियाक गिनवाते हैं। पेट्रियाक अर्थात कि इस तरह के संत महापुरुष कि जिनकी तपस्या ने जैन बुद्धिज्म को जीवित रखा। जैन बुद्धिज्म रूपी यह जो शाखा है उसको उन्होंने परिपुष्ट किया। उसमें उन्होंने फिलॉसोफिकल या तो फिर स्पिरिचुअल नर्चरिंग किया। स्पिरिचुअल या तो फिलॉसोफिकल फूड प्रोवाइड किया। तो इस तरह से वो जैन बुद्धिज्म में पेट्रियक गिनवाते हैं। उसमें जो सिक्स्थ पेट्रियाक था हुनेंग इसका नाम था चाइनीस नेशनल था। तो उसका नाम एक बड़ा प्रोमिनेंट रूप से लिया जाता है। हुनेंग के द्वारा रचित या तो फिर हनेंग के उपदेशों के ऊपर में उनके डिसाइपल द्वारा रचित प्लेटफार्म सूत्र वो बड़ा ही पॉपुलर है। जैन बुद्धिज्म का एक आधार स्तंभ माना जाता है। तो यह हुई की कहानी है। वो एक्चुअली अनपढ़ लड़का था। वैसे तो उसके पिताजी थे। राजा वहां का जो चाइनीस एपरर था उसकी कोर्ट में एक यह थे कोई ऑफिसर थे किंतु कोई भी कारण से वो राजा का वो उनके विश्वास के पात्र रहे नहीं राजा ने उनको कोर्ट में से निकाल दिया और कुछ ही समय के बाद में उनका मृत्यु हो गया युवा अवस्था में ही तो समझ सकते हैं कि यह छोटा बच्चा हुई नहीं और उसकी मां अभी कैसे जिएंगे बेचारे तो उन्होंने यह साउथ चाइना में रहते थे तो नॉर्थ चाइना की ओर उन्होंने माइग्रेशन किया। अभी नॉर्थ चाइना में यह बच्चा जो है वह कहीं पर वह कुछ अभी छोटी सी दुकान में एक छोटे से बाजार में कुछ चीजें विक्रय कर रहा होगा। तो उस समय उसने एक कस्टमर को देखा। कस्टमर को वह कुछ सेल कर रहा था। उस समय यह कस्टमर यह डायमंड सूत्र का पाठ कर रहा था। तो यह बुद्धिज्म का बड़ा ही इंपॉर्टेंट सूत्र है। तो यह पाठ सुनकर के यह बच्चा हुई नहीं वो बड़ा ही प्रभावित हो गया। तो उसने पूछा कि अच्छा बताइए तो यह जो आप सूत्र का पाठ कर रहे हैं उसका चेंटिंग कर रहे हैं। यह है क्या चीज? ये तो मुझे सुनने में बड़ा अच्छा लगा। अभी क्या है? लड़का बेचारा पढ़ा लिखा था नहीं। और चाइना में भी यह कास्ट सिस्टम जैसा होता है। जैसे अपने यहां पे भी है। हर जगह पे होता है। बस लोग स्वीकार नहीं करते। तो यह जो बच्चा था वह थोड़ा लोअर कास्ट का था। उनके हिसाब से यह लोग इनको सदर्न बार्बेरियन कहते थे। यानी कि साउथ चाइना से आया हुआ एक जंगली आदमी। तो जो भी है। तो अभी यह लड़का पूछ रहा है अपने उस कस्टमर को कि यह कहां से आपने सीखा? क्या हुआ? तो फिर एक कस्टमर ने कहा कि यहां पे एक बुद्धिस्ट मेडिटेशन मोनेस्ट्री है। वहां पर मैंने यह सीखा। तो यह हुनेंग तो बड़ा ही खुश हो गया सुनकर के। फिर यह कस्टमर ने कहा कि वहां पे चांद जो स्कूल है उसके फिफ्थ पेट्रियर्क वहां पर रहते हैं। यदि तुम्हारी इच्छा है तो तुम जाकर के उसके साथ में बात करो। तो हुनैंग कहता है अच्छा फिर उसने वो घर सब छोड़कर के वो दुकान मां सबको छोड़कर के बुद्धिस्ट मोनेस्ट्री में गया मेडिटेशन मोनेस्ट्री में जाकर के यह जो फिफ्थ पेट्रियाक था उस समय का गुरु वहां का मोनेस्ट्री का उसके साथ में बात की। अभी देखिए कि यह कास्ट सिस्टम कैसे काम करती है। हुनेंग को देख कर के ही वह समझ गए वह फिफ्थ पेट्रियर कि यह जो साउथ चाइना से आया हुआ अनपढ़ गवार आदमी है तो उन्होंने पूछा कि तुम यहां पर क्यों आए हो? तो इसने कहा कि मुझे भी यह सब चीजें स्टडी करना है। तो ये पूछते हैं कि तुम्हारा जो ओरिजिन जो है साउथ चाइना से हो और फिर तुम अनपढ़ हो गवार हो और बार्बेरियन हो तो तुम क्या यह समझ पाओगे क्या कि यहां पे जो मैं सब सिखा रहा हूं बौद्ध धर्म के बड़े ही हाइली फिलॉसोफिकल सूत्र हाइली फिलॉसोफिकल स्क्रिप्चर्स उसका यहां पे अभ्यास होता है। तुमको क्या ये सब समझ में आएगा? तो लड़के ने फट करके उत्तर दिया कि बुद्धा नेचर इज इक्वल फॉर एवरीवन। यह जो बुद्ध नेचर जो है उनका यह जो सही स्वरूप है आपका भी वही है मेरा भी वही है। यह वही उत्तर हुआ जो कि उस चंडाल ने शंकराचार्य को दिया था। शंकराचार्य गंगा में स्नान करके बाहर आ रहे थे। घाट के ऊपर में चंडाल ने उनको स्पर्श कर दिया। तो शंकराचार्य ने क्या कहा? दूरम अपसर रे चंडाल। तुम दूर चले जाओ चंडाल। मुझे स्पर्श क्यों किया? तो चंडाल ने इमीडिएटली उत्तर दिया कि आपके भीतर में वही आत्मन है जो कि मेरे भीतर में है। तो आपने कैसे कर दिया? कह दिया कि क्या ब्राह्मण है? मैं चंडाल हूं। तो इमीडिएटली वो शंकराचार्य को ज्ञान हो गया। तो यहां पे भी देखिए कि यह जो बार्बेरियन था साउथ चाइना से आया हुआ ही नहीं। उसने एग्जैक्टली सेम उत्तर दिया कि आपका भी वही सेम बुद्धा नेचर है जो कि मेरा है। तो फिर मैं बार्बेरियन हूं। आप ज्यादा पढ़े लिखे स्कॉलर है। ऐसा कैसे आपने कह दिया? तो यह जो फिफ्थ पेट्रियाक था वो बड़ा इंप्रेस हो गया। तो उसने सोचा इसको रख लेते हैं। किंतु यह कास्ट सिस्टम जो होती है ना सब जगह पे बड़ी टेढ़ी-मेढ़ी होती है। तो वहां पे भी उसने कहा कि पेट्रियक ने कहा देखो भाई मैं तुमको यदि मोनेस्ट्री में बाकी सब लड़कों की तरह भिखों की तरह रखूंगा तो यह लोग है ना तुम्हारे से नाराज हो जाएंगे। हो सकता है कि मेरी भी आज्ञा का उल्लंघन कर दे। क्योंकि यह सिस्टम बड़ी स्ट्रांग है। साउथ चाइना से आए हो। तुम लोअर कास्ट के हो। तुम एक काम करो। वर्कर के रूप में रहो और वर्कर के रूप में जो सफाई वगैरह करना है, क्लीनिंग करना है, यह जो गेहूं वगैरह जो सेपरेट करना है वो अपने उसमें से वो वो सब तुम करते रहना। ठीक है? तुम किंतु यह जो स्टडी हॉल है, मेडिटेशन हॉल है वहां पर तुम मत आना। तो यह लड़का कहता है ठीक है चलो कैसे भी करके मोनेस्ट्री में तो रहने को मिला। तो यह बेचारा झाड़ू पोछा लगा रहा है, फिजिकल वर्क कर रहा है, सब कुछ कर रहा है। अभी एक दिन ऐसा आया कि जो फिफ्थ पेट्रियाक था अभी उसका अंतिम समय आ गया है। तो अभी यह सिंबॉलिकली उसको अपना जो गुरु पद है गद्दी जो है उसको ट्रांसमिट करना है उसके डिसाइपल को। तो कैसे होता है? उसका जो रोब है यानी कि यह जो साधु के जो भिखू के जो वस्त्र है वह और बैगिंग बॉल अर्थात कि यह लोग तो भिक्षा मांग करके वह जीवन निर्वाह करते थे। तो उसके जो वस्त्र और यह जो भिक्षा का पात्र यह अपने डिसाइपल को देगा। जिसको देगा वह बनेगा सिक्स्थ पेट्रियर्क। तो अभी क्या है कि इस तरह से तो फट करके किसी को आप पेट्रियक नहीं बना सकते। बड़ा ही इंपॉर्टेंट पोजीशन है। तो फिर यह गुरु ने क्या किया? फिफ्थ पेट्रियक ने एक कंपटीशन रखा कि आप पोएम लिखिए। देखिए पोएम किसका अच्छा सा लिखते हैं। अब उसका जो बुद्धा नेचर जो है आपका वो आपको रियलाइज हुआ है कि नहीं। ये जो सूत्र वगैरह है, स्क्रिप्चर्स वगैरह है वो आपको समझ में आए हैं कि नहीं? तो वो हकू वगैरह नहीं होता। तीन लाइन का पोएम ना कि ऐसा कुछ तो इस तरह से शॉर्ट पोएम आप लिखिए और बताइए तो उसको पढ़कर के मुझे समझ में आएगा कि आपको रियलाइजेशन हुआ है कि नहीं। तो उस समय उसका एक प्रोमिनेंट डिसाइपल था उस मोनेस्ट्री में और सबको लगता था कि वही जीत जाएगा क्योंकि वो तो हम लोग एक दूसरे को ऑब्जर्व करते रहते हैं ना सबकॉन्शियसली हम एक दूसरे को मेजर करते रहते हैं। वो जब इक्वल आप क्लासरूम में देखिए कि कहां पे भी देखिए वो एक दूसरे को मेजरमेंट तो चलता ही रहता है। सबकॉन्शियस कंपटीशन तो चलती ही रहती है। तो सबको पता था कि एक डिसाइपल ऐसा है इस मास्टर का इस मोनेस्ट्री में कि वह जीत ही जाएगा। तो सब ने उसको कहा कि भाई तुम लिखो। तो इस डिसाइपल ने क्या किया? वहां पर एक दीवार थी। दीवार के ऊपर में उसने यह पोएम लिख दी। क्या लिखता है वह पोएम में? द बॉडी इज द बोधी ट्री। यह देह है। वो है यह बोधी वृक्ष। द माइंड इज लाइक ए ब्राइट मिरर स्टैंड। यह मन जो है वह एक चमकीला एक आईना है। एट ऑल टाइम्स वी मस्ट ट्राइव टू पॉलिश इट। हमको इस आईने को सतत क्लीन करते रहना होगा। एंड मस्ट नॉट लेट डस्ट टगेदर। और इस आईने के ऊपर में यह धूल मिट्टी ना लग जाए। इसलिए देखिए अभी इसका जो ओरिजिनल जो होगा उसका जो पावर उसका जो पोएटिकल ब्यूटी जो होगा वह तो अभी हमको अनुमान ही करना है यह कहां से यह सेकंड थर्ड रेड ट्रांसलेशन हमारे पास में आया है तो जो भी है किंतु देखिए पोएम बड़ा स्पष्ट है और बुद्धिज्म का जो यह भाव है बड़े ही सुंदर रूप से यह व्यक्त करता है कि देह है बोधी वृक्ष और मन है जैसे कि इस आईना अभी मन रूपी इस आईने के ऊपर में धूल मिट्टी लग जाती है। अर्थात क्या है कि यह देह के माध्यम से यह सेंसरी इनपुट जो है इंद्रियों के सुख जो है या तो फिर इंद्रियों के विषय जो है सतत अपने मन में प्रवेश करते रहते हैं। मन में प्रवेश करेंगे तो मन रूपी आईने पे जैसे कि यह एक मिट्टी का आवरण लगा देते हैं। तो इस मिट्टी के आवरण को आपको सतत क्लीन करते ही रहना होगा। जैसे ही यह मिट्टी का आवरण हट जाएगा हम आईने में देखेंगे तो हम अपना सही बुद्ध स्वरूप जो है उसका दर्शन कर पाएंगे। निर्वाण प्राप्त कर पाएंगे। तो यह एक्चुअली जो भगवान बुद्ध का जो एक सतत आत्मदीपो भव इस यह जो भाव जो है एकदम सुंदर रूप से व्यक्त करता है यह सूत्र। अदरवाइज उस समय की यह जो पुरानी सुपरस्टिशियंस वगैरह थी तो ऐसी थी कि यह कोई देवता है, कोई उपदेवता है, कोई भूत है, कोई यह पिशाच है, कोई यह कोई देवी है। इन सब का हमारे पर कोप हुआ है। इन सब का हमारे पर कोई बुरी नजर पड़ी है। तो बुरी नजर को हटाने के लिए अभी यह सब कुछ एक के बाद एक हमको विधिविधान करने पड़ेंगे। यह बहुत ही प्रचलित था और समाज में तो प्रचलित था ही था। किंतु हमने स्वामी जी को पढ़कर के हमको यह भी पता है कि इवन बुद्धिज्म में भी जो जातियां प्रजातियां प्रवेश कर गई जंगली जातियां वगैरह ने तो उन्होंने अपनी यह जो अंधश्रद्धा है वह भी बुद्धिज्म के भीतर में लेकर के आई। बोल के यह जितने भी सांप की पूजा यह वृक्ष की पूजा पत्थर की पूजा यह सो जो सब ट्राइबल एक वो शमानिक कल्चर वो शमानिक कल्चर बुद्धिज्म के भीतर में भी प्रवेश कर गया था तो यहां पे एक फाइनली ही इज वन पर्सन एक ऐसा भिकू है एक ऐसा बौद्ध है जो कि भगवान बुद्ध का जो प्योर मैसेज है कि हमारे हृदय में ही हमारा सही स्वरूप बुद्धा नेचर कहो ना कि निर्वाण विद्यमान है। आत्म साक्षात्कार करने के लिए आत्म प्रचेष्ठा ही जथेष्ठ है। यह आत्म प्रचेष्ठा या तो फिर यह यह कहेंगे कि हमको अपने ही निर्वाण अपने हाथों में है। यह जो साधन या तो फिर उपासना यही एक माध्यम है बुद्धा नेचर प्राप्त करने का। तो यह छोटी सी पोएम में बड़ा ही सुंदर रूप से आ जाता है कि देहब बोधी वृक्ष है। मन जो है एक चमकीला आईना है। शाइनिंग मिरर ब्राइट मिरर है। इसके ऊपर में सतत धूल मिट्टी जमती रहती है। तो धूल मिट्टी जमने से कामना वासना रूपी इसको जैसे ही साफ कर दें तो साथ में ही हमको अपना सही स्वरूप दिखने लगेगा। तो छोटी सी पोएम में बड़ा ही सुंदर रूप से बुद्धिज्म का भगवान बुद्ध का मैसेज कलेक्ट हुआ है। अभी यह जो दूसरे दिन जिन लोगों ने इस पोएम को देखा सभी वाहवाह करने लगे कि हां देखो यह इसने पोएम लिखा है यही जीतेगा। और एक्चुअली यह डिसाइपल जो था उसका इतना यह प्रेस्टीज था विद इन दैट मोनेस्ट्री और किसी ने पोएम लिखने का साहस ही नहीं किया। कंपटीशन में आए ही नहीं। पता है कि इसके जैसा तो हम करने नहीं वाले हैं। इसकी जो लिटरेरी ब्यूटी है, इसका जो फिलॉसोफिकल डेप्थ है, इसके सामने हम लोग टिके कभी रहने वाले नहीं है। बिना मतलब का लिखेंगे सामने पोएम तो 10 लोग हमारी मजाक उड़ाएंगे। बोल के और किसी ने कंपटीशन में सामने कोई पोएम लिखा ही नहीं। अभी यह जो फिफ्थ पेट्रियाक था दूसरे दिन उसने देखा कि दीवार पर वह पोएम लिखी गई है तो वह भी जाकर के पढ़ रहा है पढ़कर के किंतु कोई मतामत नहीं दे रहा है। कोई ओपिनियन नहीं दे रहा है। तो सब लोग आश्चर्यचकित हो गए कि यह गुरु कुछ बोल क्यों नहीं रहे हैं? उन्होंने तो सोचा था जैसे ही गुरु यह पोएम पढ़ेंगे इमीडिएटली अपना जो बेगिंग बॉल है और अपना जो भिक्षू का रोब है वह सीधा उसको दे देंगे। तो किंतु यहां पर गुरु कुछ बोल नहीं रहे हैं ना ही कोई ओपिनियन दे रहे हैं ना ही उसको वो पेट्रियक बना रहे हैं। तो सब लोग आश्चर्यचकित हो गए। अभी दिन के बाद दिन जाते रहते हैं और कोई पोएम लिखी गई है दीवाल के ऊपर में। इनको लगा बाकी सब डिसाइपल को कि शायद गुरु को लोभ हो गया है अपनी गद्दी का। एक बार तो उन्होंने डिक्लेअ कर दिया कि हां मैं अपनी गद्दी छोड़ रहा हूं। किंतु शायद उन्होंने देखा कि इतना अच्छा मुझे सक्सेसर मिल रहा है तो शायद वह मेरा जो यह होगा मैंने अभी तक जो किया है कहीं उल्टा पुल्टा ना कर दे बोलकर के गद्दी का लोग हो गया होगा ऐसा वो बोल सोचने वाले लोगों की तो कमी नहीं है 10 लोग 10 चीजें सोचते हैं तो दिन के बाद दिन जाने लगे एक दिन एकाएक सब सुबह को उठकर के देखे तो आधी रात में किसी ने वहां पर दूसरी पोएम लिख दी थी तो एकदम ये तुमने आग की तरह यह बात फैल जाती है ना इतने दिनों तो स्पेककुलेशन चला कि गुरु कुछ बोलते नहीं गुरु कुछ बोलते नहीं क्या रीजन है क्या है और कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था क्योंकि जो रहने वाले थे सबने ठीक कर ही लिया था हम लोग तो कंपटीशन में कुछ लिखने वाले नहीं तो ये सेकंड पोएम आ कहां से गई सब लोग इकट्ठा होकर के पोएम पढ़ रहे हैं क्या लिखा है बोधी ओरिजिनली हैज़ नोटरी ये जो पहला तो सेंटेंस था कि बॉडी इज द बोधी ट्री। तो उसके सामने पोएम लिखी गई है कि देयर इज नो बोधी ट्री। उसका दूसरा सेंटेंस है देयर इज नो ब्राइट मिरर। एंड एस देयर इज नो ब्राइट मिरर द बुद्धा नेचर इज ऑलवेज क्लियर एंड प्योर। एंड एस देयर इज नो ब्राइट मिरर। देयर इज नो नीड टू क्लीन इट। तो अब यह पोएम इतना रेडिकल है। उसके कांसेप्ट में इतना पावरफुल है कि सभी लोग आश्चर्यचकित हो गए कि इस तरह की पोएम लिख कौन सकता है? क्योंकि बुद्धिज्म का तो हार्ट ही यही है कि सतत साधना करते रहना। अपना मन जो है सतत कामना वासना से मुक्त रखे रहना। और यहां पे यह आदमी जिसने भी यह पोएम लिखा डिक्लेअ करता है कि देयर इज नो बोधी ट्री, देयर इज नो ब्राइट मिरर, देयर इज नो नीड टू क्लीन इट। बिकॉज़ देयर इज नो नीड टू क्लीन इट। आवर बुद्धा नेचर ऑलवेज शाइन फोर्थ इन इट्स ओरिजिनल फॉर्म। जब हम यह कहते हैं कि उसके ऊपर में मिट्टी लग गई है तो हम अपने को ही भ्रमित कर रहे हैं। ऐसा ही तो कुछ इंटरप्रिटेशन हुआ। तो यह इंटरप्रिटेशन यह पोएम इज सो रेडिकल। सभी लोग आश्चर्यचकित हो गए। कोई कोई गुस्सा भी हो गया कि अरे बुद्ध के टीचिंग्स के विरोध में यह कौन लेकर आए? तो जो भी है और पूरा हल्लागुल्ला मच गया मोनेस्ट्री में। तो उस दिन किंतु मास्टर ने और सब लोग पूछ रहे हैं एक दूसरे को क्या तुमने यह पोयम लिखा क्या तुमने लिखा तुमने लिखा सभी बोल रहे हैं मैंने नहीं लिखा तो उस दिन रात को मास्टर ने यह जो लड़का था जो लेबरर का काम करता था झाड़ू पोछा कर लगाता था खाने में किचन में सहाय करता था उसको बुलाया तो पूछा कि पोएम तुमने लिखा है तो तो ये लड़के ने कहा हां मैंने लिखा है तो यह मास्टर उनको कहते हैं कि देखो तुम्हारा जो पोएम है बुद्धा नेचर जो है उसको परफेक्टली उसको एग्ेंंपलीफाई करता है। क्योंकि जिस क्षण हम लोग यह मान लेंगे कि यह जो शाइनिंग मिरर या तो फिर मेरा मन इसके ऊपर में धूल लगी हुई है। उसी क्षण तो हम इस तरह के भ्रम में पतित होंगे कि इस धूल को निकालने के लिए हम जीवन भर प्रयास करते रहेंगे। किंतु ना ही कोई मिरर है ना ही कोई धूल मिट्टी है। वो बुद्धा नेचर इज ऑलवेज शाइनिंग फोर्थ। उसको तो हमको सिर्फ रियलाइज करना है। झूठ-मूठ की तपस्या करके, उपासना करके, साधना करके समय नहीं गवाना है। सिर्फ अपने बुद्धा नेचर को रियलाइज करना है। दिस इज द ट्रू टीचिंग ऑफ बुद्धिज्म। और मैं चाहता हूं कि मैं अपना रोब और यह बेगिंग बॉल तुमको दे दूं। किंतु देखो कि यहां की जो कास्ट सिस्टम तुमको तो पता ही है कि मैं तुमको एज ए डिसाइपल के रूप में भी ना रख पाया तो तुमको यदि मैं बना दूंगा पेट्रिय्क तो पता नहीं यह लोग नाराज होकर के शायद तुम्हारी हत्या भी कर दे तो एक काम करो यह ये लो मेरा बैगिंग बॉल और ये लो मेरा रोब ऐसा बोल के उन्होंने दे दिया उसको और कहा तुम रात को ही यहां से भाग खड़े हो सुबह को मैं वह जो दूसरा डिसाइपल है जिसने पहली पोएम लिखी है मैं उसको अपना दूसरा रोब और बैगिंग बॉल देकर करके उसको डिक्लेअ कर दूंगा। यानी यह लोग यहां पर शांत हो जाए किंतु मेरे सही सक्सेसर तुम ही हो। तो उसी दिन रात को हुई अपने मास्टर का यह बैगिंग बॉल और यह भिकू का रोप जो है वस्त्र लेकर के भाग खड़ा हुआ और कहां दूर जाकर के उसने एक दूसरी मोनेस्ट्री स्थापित की और वहां से उसका यह जो टीचिंग्स और उसकी लाइफ है उसके बेस पे यह प्लेटफार्म सूत्र बोलकर के रचित हुआ है और इसके बेस पे ही फिर जापान का जो आज का फेमस जैन बुद्धिज्म जो है वो उसमें से डेवलप हुआ है। तो देखिए कि इस स्टोरी में कितना ब्यूटीफुली एक पोएम के माध्यम से हमको पता चलता है कि देयर इज़ नो बोधी ट्री, देयर इज़ नो मिरर, देयर इज़ नो नीड टू क्लीन द मिरर। व्हाई? बिकॉज़ द बुद्धा नेचर इज़ ऑलवेज देयर। और यह स्टोरी पढ़कर के हमको ठाकुर की वह कहानी याद आ ही जाएगी। बड़ी फेमस कहानी कि यह तोतापुरी ठाकुर को कहते हैं कि देखो हमको प्रतिदिन साधना उपासना करनी ही पड़ेगी। क्यों? क्योंकि जैसे यह कमंडलू है उसको मैं यदि प्रतिदिन नहीं धोऊंगा तो फिर इसके ऊपर में धूल मिट्टी लग जाएगी। तो ठाकुर क्या कहते हैं कि यदि यह सोने का हो गया तो फिर क्या प्रतिदिन धोने की जरूरत है? तो तोतापुरी भी हंसते-हंसते अपने शिष्य की बातों का समर्थन करते हैं कि हां यदि निर्विकल्प समाधि प्राप्त हो जाती है तो फिर और उसके बाद में यदि आपका पुनः आगमन होता है। वैसे तो 21 दिन में मृत्यु है निर्विकल्प समाधि में किंतु यदि ईश्वर की इच्छा से माने यह भी तो एक कंट्राडिक्शन इन टर्म है ना। निर्विकल्प समाधि में तो हम ईश्वर हो गए। ईश्वर के भी परे चले गए। किंतु जो भी है हमारी ही इच्छा से यदि कहे एक तरह से तो कंट्राडिक्शन क्योंकि अद्वैत वेदांत को शब्दों में व्यक्त करना बड़ा मुश्किल है। हमारी जो लैंग्वेज है वो सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट के रिलेशन डेवलप करने के लिए बनी गई है। किंतु ऑब्जेक्ट है ही नहीं। जहां पे सिर्फ सब्जेक्ट ही है तो फिर इस तरह की ये जो सिचुएशन इसको आप कैसे लैंग्वेज में डिस्क्राइब करेंगे? तो व्हाटएवर तो किंतु यदि ऐसा कुछ योगानुयोग हो गया कि निर्विकल्प समाधि से वापस आए तो यह मनुष्य जो है वो जीवन मुक्त हो जाता है। उसको फिर इस तरह की प्रतिदिन साधना करने की आवश्यकता नहीं। वो साधना करेगा। जैसे ठाकुर कहते हैं ना कहते हैं ना कि मधुमक्खी है तो मधुमक्खी फूल के जब तक वो मधु का अनुसंधान करती है तब तक वो बूंद वो आवाज करती है कुछ ना कुछ आवाज करती रहती है उसके बाद में जैसे ही वह फूल उसको मिल गया फूल के ऊपर में बैठकर के मधुपान कर रही है उस समय बिल्कुल शांत हो जाएगी किंतु जब मधुपान हो गया तब वह जो संतुष्टि के मारे वो मतलब वह आत्मसंतुष्टि जो मिली है संतुष्टि से आनंद प्राप्त करके कभी-कभी वह गुनगुना करेगी। वह कोई ना कोई गीत जो है कोई ना कोई ध्वनि है उसको गुनगुनाया करेगी। तो यहां पे भी वह निर्विकल्प समाधि के प्राप्त करने के बाद में अभी पूरा जीवन तो साधना में ही बिताया है तो ईश्वरीय आनंद में ही तो यह लोग मग्न रहेंगे। तो देखिए कि यह भ्रम किसको कहते हैं? कि जिस क्षण हम यह मान लेते हैं देखिए यहां पर यह भी एक बात सीखने की है। हम लोग समझते हैं कि भ्रम कहीं अवकाश में रहता है। भ्रम कहीं हवा में रहता है जो कि मुझे अपना यह जो सभी लोगों के भीतर में ब्रह्म दर्शन करने से रोकता है। भ्रम कहीं मेरे भीतर में विद्यमान है जो कि मेरे सही स्वरूप को पहचानने नहीं देता। भ्रम कहीं मेरे मन पर सवार हो गया है जो कि मुझे कामना वासना की ओर आकर्षित करता है। किंतु देखिए कि कामना वासनाएं है ही नहीं। यह भ्रम नहीं है ऐसा नहीं है। कामना वासनाएं ही नहीं है। यह तो हमने अपने को कंडीशन कर दिया है। जन्म जन्मांतर का यह कंडीशनिंग है। तो कि वो एक बच्चा अज्ञान के मारे उसको समझ में नहीं आता। वह सोचता है कि इंद्रिय के सुख ही उसके जीवन का सर्वस्व है। तो ना ही उसको मां समझाती है ना ही आजकल उसको गुरु समझाते हैं। तो वह इंद्रियों के सुख के पीछे बचपन से ही मारामारा घूमता है। किंतु पहले से ही उसको पता चल जाए इंद्रियों का सुख किसी काम का नहीं तो फिर बचपन से ही वह आत्मसंतुष्टि के साथ में ही वह बड़ा होगा। तो यह एक इंपॉर्टेंट मैसेज इसमें है और इसके बाद में और भी बहुत सारी कहानियां है। ठाकुर की वह फेमस कहानी है। हमने जब कथामृत का पाठ कर रहे थे तो पिछली बार ही देखा था कि एक आदमी है वह एक बाघ का एक मास्क पहन करके हमारे सामने आता है। बाघ की जो चमड़ी है उसको ओढ़ के हमारे सामने आता है। हमको भय दिखा रहा है। हम हो सकता है कि कुछ क्षण के लिए तो डर जाए किंतु फिर इमीडिएटली पहचान लेंगे कि अरे तुम तो मेरा मित्र हो हरे तो तो फिर यह हरे बोलकर के जो हमारा मित्र है वह हंसता हंसता चला जाएगा और और किसी को डर दिखाने का प्रारंभ करेगा और किसी को डर दिखाएगा तो यह भाग तो है नहीं यह मित्र ही है अपना बस उसने यह मास्क पहन करके रखा है यह जो स्किन ओढ़ के रखी है तो उसको जैसे जैसे ही पहचान लेंगे वैसे ही वह भाग
वेदांत की कहानी: काशी की राजकुमारी
जाएगा। सर्वप्रियनंद जी एक कहानी वह बताते हैं बीच-बीच में प्रिंसेस ऑफ काशी उनकी यह बड़ी फेमस उनकी बड़ी प्रिय कहानी है कि एक राजा था उसको एक नाटक का अभिनय करवाना था अपने राजमहल में। तो उस उम्र की लड़की एक छोटी लड़की का पात्र था। वह मिल नहीं रही थी इस तरह की कोई लड़की उसका अभिनय करने के लिए। तो उनका यह राजकुमार था तो बड़ा देखने में भी वह छोटा होता है बच्चे। तो वह क्या है कि वह जेंडर डिफरेंशिएशन अभी प्रारंभ नहीं हुए होते हैं उनके भीतर में। तो उनके छोटे से राजकुमार को ही एक राजकुमारी के रूप में सजा करके उसको अभिनय करवाया। अभिनय समाप्त होने के बाद में वो वहां पर जो एक पेंटर होगा उसने सोचा होगा यह राजकुमारी राजकुमारी के वेश में बड़ा सुंदर दिखता है। तो राजकुमार बोलकर के उन्होंने उसको पेंट कर दिया उसका चेहरा और वहीं कहीं पर स्टोरेज में रख दिया होगा। बहुत सालों के बाद में यह राजकुमार जब बड़ा हुआ और वह स्टोर रूम में जब गया तो उसने यह राजकुमारी का चित्र देखा तो उसको देखकर के इतना मोहित हो गया। उसने कहा कि यदि शादी करनी है तो इसी के साथ में करनी है। किंतु वो किसी को बोल नहीं रहा है। लज्जा के मारे ना कि शर्म के मारे जो भी है। बड़ा दुखी होकर के घूम रहा है। फिर किसी ने पूछा कि भाई उसका प्रॉब्लम क्या है? यह अनुसंधान करके पता चला कि वह जो राजकुमारी का चित्र है उसके मोह में पड़ा है। तो मंत्री है उसको चित्र के सामने ले जाकर के कहता है यह जो चित्र में जो है राजकुमारी वह तुम ही हो। तुम ही को यह राजकुमारी के वस्त्र के रूप में सजा करके उस नाटक का अभिनय करवाया था। तो जिस क्षण राजकुमार को पता चला कि यह राजकुमारी और कोई नहीं मैं ही हूं तो वैसे ही उसके प्रति उसकी यह जो कामना वासना मोह था एक क्षण में अदृश्य हो गया। क्यों? तो यहां पर भी जगत में जो कुछ भी देखते हैं यह सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट डलिटी जब तक रहता है मैं मैं हूं आप आप है यह चीज जो है यह चीज यह मैसूर पाक है तो मैसूर पाक है मैं हूं एक आदमी अब मुझे मैसूर पाक खाना खाना अच्छा लगता है यह है सोने यह है गहने यह है रुपए यह है बैंक बैलेंस यह है कोई आदमी कोई व्यक्ति जिसके प्रति मेरा मोह है इन सभी चीजों के प्रति किंतु जिस क्षण मुझे यह पता चल गया कि यह सोने जवाहरात भी मैं ही हूं। यह गहने भी मैं ही हूं। यह बैंक बैलेंस भी मैं ही हूं। यह मैसूर पार्क भी मैं ही हूं। जिस व्यक्ति के प्रति मेरा मोह है, वह भी मैं ही हूं। यानी कि मेरा जो सब्जेक्ट जो है, मेरा जो स्वरूप है, वह इस देह के भीतर में आबद्ध नहीं रह के पूरे विश्व को जब इसमें आवृत्त कर देता है, तब यह अज्ञान या तो फिर अविद्या भ्रम दूर हो जाएगा। और इसके प्रति मेरी यह जो वासना है वह भी चली जाएगी। पंचदशी की फेमस कहानी
वेदांत की कहानी: दशम: त्वम् असि
है। दशमस्तमसी 10 मित्र जो है नौका पार करके सामने के किनारे जाते हैं नदी के और फिर वहां पे और फिर 10 है तो तो वह एक दूसरे को काउंट करते हैं कि ये कोई रह तो नहीं गया वो उस किनारे में नौका में सभी आ तो गए हैं। तो जो लड़का काउंट कर रहा है 1 2 3 4 5 6 7 8 9 तो जैसे ही नौ काउंट किया वह तो फिर वो 10 दवां तो दिखाई नहीं दे रहा है। तो बेचारा बड़ा ही वह दुखित हो गया। चिल्लाने लगा। अरे हमारा दवां मित्र कहां खो गया? उस समय वहां पर एक गुरु आए। पूछा कि क्यों चिल्ला रहे हो? तो वह लड़का कहता है कि दवां मित्र जो है हमारा वो उस किनारे रह गया है। तो अभी हमको कैसे भी करके वहां जाकर के उसको वापस लाना होगा। तब गुरु उनको फिर से गिनवाते हैं। बोले कि गिनो तो फिर से तो यह लड़का फिर से गिनता है। एक दो तीन 4 5 6 7 8 9 जैसे ही नौ आया तो अटक गया। तब गुरु ने कहा दशमस त्वमसी दसवां जो लड़का है वह तो तुम ही हो। तो जैसे ही उस लड़के ने अपने को गिना तो वैसे ही उसको ज्ञान हो गया कि हां दसवां तो मैं ही हूं। तो वैसे ही जिस क्षण मैंने अपने सही स्वरूप को पहचान लिया उस क्षण ये नाना विध वैविध्यमय जो माया है वो अदृश्य हो जाएगी।
वेदांत की कहानी: धोबी का गधा
इसके बाद में सर्वप्रियनंद जी की और एक फेमस कहानी है। वो भी इसको भी कहते रहते हैं। एक आदमी है कुम्हार ना कि एक धोबी धोबी मोस्ट प्रोबेबबली तो उसके पास में एक गधा है। तो गधे की पीठ पे कपड़े डाल के वह नदी के किनारे जाता है कपड़े को धोने के लिए। वहां पे एक खिला वगैरह कुछ होगा। वृक्ष वगैरह कुछ होगा। उसके पास में इस गधे को गधे के गले में रस्सी है। तो इस रस्सी को इस वृक्ष के साथ में बांध देते हैं। देता है और वहां पर कपड़े धो के फिर से उसकी कमर पर डालता है। फिर से घर जाता है। एक दिन आकर के देखा वृक्ष किसी ने काट दिया है। तो वहां पर उसको बांधने के लिए गधे को बांधने के लिए कुछ था नहीं। तो फिर यह सोचता है कि ना एक दिन ऐसा हुआ कि वह रस्सी ही भूल गया अपने घर। तो अभी रस्सी है नहीं तो गधे को बांधेगा कैसे? तो थोड़ा सा दुखी हो गया। उसका घर बड़ा दूर है। घर जाकर के रस्सी लानी पड़ेगी। उस समय कोई एक बुद्धिमान आदमी इस तरह का कोई पंडित वहां से जा रहा था। तो उसने पूछा क्यों दुखी होकर के बैठे हो? तो इसने कहा मैं रस्सी भूल गया हूं। रस्सी लेने के लिए घर जाना पड़ेगा। बड़ा दूर है घर और मैं यदि इसको वैसा ही गधे को छोड़कर चला जाऊं कपड़े धोने के लिए तो हो सकता है गधा भाग जाए। और मैं तो गरीब आदमी हूं। यह गधा ही है मेरा एकमात्र ट्रांसपोर्ट। वो चला जाएगा तो मैं मुश्किल में पड़ जाऊंगा। तो यह आदमी उसको सलाह देता है। तुम एक काम करो। यह तो गधा है ना। गधे की बुद्धि कितनी चलती है। तुम एक काम करो। इस तरह से तुम बिहेव करो जैसे कि उसके गले में अभी भी रस्सी है। तुम इस रस्सी को इस वृक्ष के साथ में जो बांधते हो वह पूरा अभिनय तुम करो। भले रस्सी चाहे वहां पर नहीं है। तो देखो कि गधा वहीं का वहीं खड़ा रहेगा। क्योंकि अभी उसको कंडीशनिंग हो गई है कि प्रतिदिन यह धोबी है। मुझे यहां पर लाता है। इस वृक्ष के साथ में बांधता है और मैं यहां पर खड़ा एक दो बार उसने भागने का प्रयास किया होगा। किंतु रस्सी ने पकड़ के रखा है। तब से वह कंडीशनिंग हो गया है। माया में आ गया है। भ्रम में आ गया है। या तो फिर यह उसको कहेंगे कि हैबिट हो गई है। अभ्यास हो गया है। वहीं पर खड़ा रहने का। तो आज तुम वही अनुभव अभी नहीं करो जो कि तुम प्रतिदिन करते हो। बस रसी नहीं है उतना ही। तो धोबी कहता है आईडिया तो अच्छा है तो है तो गधा ही उसकी अकल कितनी है तो वही अभिनय किया जैसे कि वह गधे के गले में रस्सी है तो खींच करके उसको वृक्ष के पास ले आया वृक्ष में रस्सी बांधता है और फिर वह बांध करके वो देखा कुछ क्षण कि वह गधा भागता है कि नहीं यहां पे किंतु अभी गधे को क्या है कि वह कंडीशनिंग हो गई है हैबिट हो गया है कि रस्सी बांधी है तो वहीं पर खड़ा रहना है तो यह धोबी चला गया वो कपड़े धोने के लिए कपड़े धोकर वापस आता है तो गधा वहीं पर खड़ा है तो खुश हो गया चलो ये ट्रिक काम तो कर गई। अभी वो ट्राई करता है गधे को अपने घर ले जाने का। गधा वहां से हट ही नहीं रहा है। तो यह तो बड़ी दूसरी मुसीबत आ गई सामने। क्या करें? बड़ा प्रयास किया। उसको धक्का मारा वो कुछ भी किया खींचा। वो वहां से हिल ही नहीं रहा है। तो यह आदमी जाकर के धोबी जो है उस आदमी के पास गया जिसने उसको यह पहले ओरिजिनल अकल दिखाई थी कि उसको तुम अभिनय करो बांधने का। तो उसके पास जाकर कहता है महाशय आपने जैसा कहा ऐसा मैंने किया तो सही अभी गधा किंतु वहां से जाने से इंकार कर रहा है अभी मैं क्या करूं तो उस आदमी ने कहा कि देखो तुमने जैसा पहले अभी नहीं किया था उसका रिवर्स अभी नहीं कर दो गधे को पता है कि तुम जब तक ये रस्सी छोड़ोगे नहीं वहां से तब तक उसको जाना नहीं है तो ये धोबी ने सोचा बात भी तो सही है माने लॉजिकल है तो वहां जाकर के फिर से रिवर्स अभी नहीं किया जैसे कि वो रस्सी को वृक्ष से छोड़ रहा है जैसे ही छोड़ा वैसे ही गधा जाने के लिए तैयार हो हो गया तो देखिए कि यह माया मोह हमारे को इस तरह से बांध करके रखती है जो है नहीं उस तरह से हमको दिखाती है यह भ्रम है नहीं किंतु फिर भी हम भ्रम में पतित होकर के यह हैबिट के मारे जैसे कि अभ्यास के वशतः अभ्यास के मारे इंद्रियों के विषय के पीछे में दौड़ते हैं। तो इसके बाद में यही सर्वप्रियनंद जी
वेदांत की कहानी: राजा जनक अहम् ब्रह्मास्मि का पाठ कर रहे है
की ही एक दूसरी सुंदर कहानी है। वह एक बार राजा जनक वह बैठकर के चट कर रहे हैं। वह स्मरण मनन निद्यासन होता है ना महावाक्य विचार तो अहम ब्रह्मास्मि अहम ब्रह्मास्मि तो ये अहम ब्रह्मास्मि वो जोरजोर से चेंट कर रहे हैं। उसका पाठ कर रहे हैं। के अहम ब्रह्मास्मि अहम ब्रह्मास्मि अहम ब्रह्मास्मि तो ये अष्टावक्र वहां से आ गए। वहां पे आए टहलते टहलते देखा कि राजा जनक वो अहम ब्रह्मास्मि अहम ब्रह्मास्मि का जप कर रहा है तो वह भी बगल में बैठ गए और उनके हाथ में दंड था कमंडलु था तो वो बोलने लगे यह दंड मेरा है यह कमंडल मेरा है यह दंड मेरा है ये कमंडलु मेरा है जोर-जोर से बोलने लगे तो राजा जनक थोड़े से नाराज हो गए बोला कि यह क्या चिल्ला रहे हो दंड मेरा है कमंडलु मेरा है सबको पता है तुमको भी पता है कि दंड तुम्हारा है कमंडलु आपका है दंड भी आपका किसको पता नहीं है यह बात? तो यह अष्टावक्र सामने कहते हैं कि यह किसको पता नहीं है कि तुम ब्राह्मण नहीं हो। जो चीज आप है ही है उसका चटिंग करने की क्या आवश्यकता है? उसका पाठ करने की विचार करने की क्या आवश्यकता है? आपको सिर्फ उसको रियलाइज करना है। वो तो है ही है ऑलरेडी आपका। तो
वेदांत की कहानी: राजा जनक स्वप्न में शत्रु राजा के सामने हार जाते है
ये राजा जनक की वही दूसरी अष्टावक्र गीता में से वो वही फेमस कहानी के रात को सोया हुआ था। और एकाएक उसको सपना आया कि उसके देश के ऊपर में और किसी राजा ने आक्रमण कर दिया है। भयानक युद्ध हुआ। आखिर में राजा जनक हार गए। इस दूसरे राजा ने उनको देश में से निकाल कर दिया। देश निकाल कर दिया। अभी यह राजा जनक बेचारा मारे-मारे घूम रहा है भिक्षा के लिए। कहीं से कोई कुछ दे नहीं रहा है। वो नए राजा का डर है सबको। तो अभी राजा जनक देश सरहद पार करके दूसरे देश में जाते हैं। वहां पर एक सदाव्रत जैसा कुछ होगा तो वहां लाइन में खड़े रह जाते हैं। अभी जैसे ही उनकी बारी आई तो वैसे ही उस जो दे रहा था वह अन्न दे रहा था। खिचड़ी ना कि जो कुछ भी दे रहा होगा। उसने कहा कि अभी सब कुछ खत्म हो गया है। अभी बाद में आना। तो वैसे ही तो राजा जनक भूखा प्यासा थका हुआ है। वो एक एक आशा जगी थी कि यहां से कुछ अन्न मिलेगा। वो भी आशा चली गई तो बड़ा बोला बेचारा बड़ा ही निराश होकर के वहां पर खड़ा है। उस समय वह सामने वाले को दया आई कहा कि देखो इस पात्र में थोड़ा बहुत कुछ बचा हुआ है नीचे का मैं निकाल करके तुमको देता हूं। बोल के एक पात्र में कुछ निकाल के दिया। तो राजा जनक वह बेचारा एक कोने में बैठकर के सोच रहा है कि कहां एक दिन था कि मैं महल में रहकर के अन्न पकवान वो जितने भी विविध प्रकार के हैं सर्वश्रेष्ठ मैं आहार करता था। आज मैं एक पात्र के नीचे में जो चिपका हुआ जो है उसको मैं खा रहा हूं। वैसा जो भी है अभी नसीब में जो मिला बोलकर के पात्र जैसे ही अपने मुंह के पास में लाए उसी समय एक पंखी ने आकर के उनके हाथ में से ये पात्र उठाकर के वो उड़कर के चला गया। तो वैसे ही जैसे चला गया तो वैसे ही उनके चेहरे के ऊपर में इस तरह की आपत्ति आ गई। इतने दुखी हो गए, इतने कष्ट में आ गए कि वह बेचारे गिर पड़े राजा जनक। और जैसे ही गिर पड़े वैसे ही उनका यह जो स्वप्न है, स्वप्न का भंग हो गया। जैसे ही स्वप्न भंग हुआ वैसे ही खड़े होकर के अभी यह सोचते हैं कि यह सही है ना कि वह सही है। माने यह जो अभी राजा में राजमहल में राजा के रूप में जो रह रहे हैं वह सही है ना कि स्वप्न में जो भिखारी की तरह रह रहे थे वह सही था। तो अभी जो कोई भी आता है उनके पास में सबको यह प्रश्न करते हैं कि यह सही है कि वह सही है। अभी समझ में नहीं आ रहा है। तो उस समय सभी लोग परेशान हो गए। राज्य का सब कार्यभार है। वह अटक गया है। उस समय यह अष्टावक्र मुनि वहां से आए। वहां पर आए। सब ने कहा कि देखो राजा के साथ में क्या गड़बड़ हो रहा है। तो ये अष्टावक्र मुनि का तो अंतर्यामी थे। राजा का मन हृदय देख पाते थे। तो उन्होंने कहा कि राजा ना तो वह सही है ना तो यह सही है। तुम ही सही हो। तुम्हारा जो स्वरूप है तुरिय अवस्था वही सही स्वरूप है ना ही जागृत ना ही यह स्वप्न ना ही यह सुशुप्त कुछ भी सही नहीं है यह सब मिथ्या है भ्रम मात्र है अपना सही स्वरूप और जिस अवस्था में यह स्वरूप रियलाइज करते हैं तुरीय अवस्था वही एकमात्र सत्य है। तो राजा जनक का भ्रम इस तरह से दूर होता है। फिर यह ठाकुर की वह
वेदांत की कहानी: भगवान नारद मुनि को माया क्या है वह दिखाते है
फेमस कहानी है कि नारद मुनि भगवान को कहते हैं नारायण को कि भ्रम क्या है? अज्ञान क्या है? माया क्या है? वह समझना है। तो नारायण हंसते-हंसते कहते हैं अच्छा ठीक है। इस गांव में से जाकर के मेरे लिए पानी लेकर आओ। जल लेकर के आओ। मुझे प्यास लगी है। तो नारद मुनि जाते हैं पानी लेने के लिए। जाकर के देखा कि एक घर में पानी लेने के लिए गए तो बड़ी सुंदर युवती ने उनको पानी दिया। तो नारद मुनि उसके मोह में आ गए। कहा कि तुम्हारे साथ साथ में मैं शादी करता हूं। पिताजी से परमिशन ले ली। शादी कर लिए। बच्चे भी हुए हरा म वो बड़ा ही सुंदर प्रोस्पेरस फैमिली भी हुआ। एकाएक वहां पर फ्लड आया। पूर आया और सब कुछ बहा करके ले गया। घर घर में जो बर्तन थे जो भी गोधन था सब कुछ माने का गाय ही तो थी उस समय का धन। इसलिए कहते हैं गोधन। तो एक गाय वगैरह सब कुछ बहा करके ले गया। आखिर में उसके बच्चे और अपनी बीवी को पकड़ा हुआ है। तो बच्चे भी एक के बाद एक हाथ में से निकलने लगे। आखिर में बीवी का हाथ पकड़ा है कि वह कहीं बह ना जाए। किंतु हुआ ऐसा कि वह भी बह के चली गई। तो यह बेचारे नारद मुनि हाहाकार करने लगे। दुख के मारे रोने लगे। एक उसी समय जैसे कि नारायण उनके सामने प्रकट होकर के कहा कि अरे नारद तुम तो मेरे लिए पानी लेने के लिए गए थे। का क्या हुआ पानी का? उस समय नारद मुनि आं खोल करके देखते हैं तो कुछ भी नहीं है ना ही घर है ना ही उसकी पत्नी है ना ही बच्चे हैं ना ही यह फ्लड है कुछ नहीं है बस वह वैसे ही गांव के बाहर में खड़े हैं तब उनको पता चला कि यह माया क्या होती है तो यह माया और भ्रम का स्वरूप ये कहानियों के माध्यम से इसके बाद में शरद महाराज क्या कहते हैं उसको अभी हम कल देखते हैं आगे ओम शांति शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: हम उस कहानी के गधे हैं और हमारे लिए रस्सी बहुत वास्तविक है
इसलिए तो उसको गधा कहते हैं। इसलिए तो घोड़े का उदाहरण नहीं दिया। गायिका ना कि ऐसा कोई उदाहरण देते तो हम विश्वास नहीं करते। वो ठाकुर वो जो उपमा देते हैं ना बद्ध जीव मुमुक्षु जीव और मुक्त जीव यानी वो मछली वो मछुआरा जो है मछली पकड़ने के लिए जाल फेंकता है तो वो जाल में जो मछलियां फंस जाती है तो उसमें से कोईकोई मछली है वह बड़ा मेहनत करके जंप लगा के बच जाती है तो यह मुक्त जीव हो गया कोई कोई मछली है अपने को बचाने का प्रयास तो बड़ा करती है किंतु वह बचा नहीं सकती है तो वो वो मुमुक्षु जीव हो गया। और कोई कोई मछली है जो मिट्टी में अपना मुंह छुपा करके रहती है। वो सोचती है मैं यदि जाल को नहीं देखूंगी तो जाल चली जाएगी। तो वो बद्ध जीव है। उनको जाल दिखती ही नहीं है। और कुछ-कुछ होते हैं नित्य मुक्त। उनको पता ही है कि मछुआरा इस जगह पर मछली डालने जाल डालने के लिए आता है तो उस जगह पर जाएंगे ही नहीं। तो ज्यादातर लोग क्या है कि यह बद्ध जीव या तो मुमुक्षु जीव की तरह है कि पहले तो आंख ही बंद कर दी है कि वह मछुआरा और उसकी जाल दिखे ही नहीं तो नहीं दिखेगा तो हम सेफ है। यह तो मान लेते हैं। दूसरा कि मुमुक्षु यानी कि क्या है कि मंद वैराग्य होता तो है कि प्रयास तो करते हैं निकलने का। किंतु वो जो मुक्त जीव जिसने इतना प्रचंड प्रयास किया कि कैसे भी करके जाल में से निकल गया वो प्रयास वैराग्य दृढ़ नहीं है तीव्र नहीं है तो मंद वैराग्य उछल कूद तो बड़ा होता है किंतु निकल नहीं पाता है सो 90% इसी कैटेगरी में आएंगे
प्रश्न: हम संसार में सभी को माया में फंसा हुआ देखते हैं। इसलिए हम स्वयं पर संदेह करने लगते हैं कि वेदांत सही है या गलत।
किंतु इसीलिए स्वामी जी कहते हैं ना कि इफ द मोहम्मद डजंट कम टू माउंटेन देन माउंटेन गोस टू मोहम्मद यह ठाकुर जो लोगों के घरघर जाकर करके उपदेश देते थे। पता चला केशवसेन साधक है तो उसको जाकर के मिलकर आए। बताया कि भाई यह एक ईश्वरीय आराधना ईश्वर तत्व ऐसा है। वो घरघर जाते थे। स्वामी जी प्रवरजिया करके वो कितना भारत घूमे अमेरिका गए। वेदांत का प्रचार किया। मां जब से मां ने गुरु पद संभाला। स्वामी जी की महासमाधि के बाद में देखिए कि मां बार-बार कोलकाता आती है। वैसे तो वो जयराम भाटी में रह सकती है किंतु बार-बार कोलकाता आती है। भक्तों के बुलाने पर वो जो उद्बोधन में लोगों की भीड़ लग जाती थी। वो जो कहानी हमने उस दिन सुनी थी ना योगोद्यान जाती है। उस समय तो काकुड़गांछ योगद्यान वो उनके अंडर में था। तो वह योग विनोद बोलकर के एक थे रामचंद्र के डिसाइपल। तो मां को पूरा दिन एक कुर्सी पर बैठा के रखा। पूरा दिन मां आशीर्वाद देती रही। वो सबको प्रणाम स्वीकार करती रही। पूरा पसीने से ये हो गई है, अस्थिर हो गई है। किंतु फिर भी कुछ बोल नहीं रही है। तो इस तरह का कष्ट ये लोग क्यों स्वीकार करते हैं? ने हमारे लिए ही क्योंकि उनको पता है कि यह नेगेटिव फीडबैक साइकिल इनके जीवन में है। यहां पे वह शरद महाराज कहते हैं ना जब तक हम इस तरह के किसी को ना देखें जो कि एनलाइटेंड है तब तक हमको समझ में नहीं आएगा कि हम भ्रम में पड़े हुए हैं। जो आपने बताया वो नेगेटिव फीडबैक साइकिल है। जो भ्रम में पड़े हुए इनका संग करके करके हमको लगता है यही सही है। किंतु ऐसे लोग जो कि अवतार लेवल के हैं जब सामने से हमारे जीवन में आए तब हम तो पता चलेगा कि हां हमारा जीवन में कुछ तो गड़बड़ है। ऐसा नहीं है कि इसके बाद का जो लाइफ है वो इजी हो जाएगा। बट एटलीस्ट हमको ये पता तो चल गया कि वो मछली जो अपना मुंह छुपा करके जो बैठी थी उसने एटलीस्ट ये तो देख लिया कि यह भ्रम है। जाल जाल में फंसी हुई है। इतना उसको नॉलेज तो हो गया। फिर वो उसके बारे में कुछ करे ना करे। दैट इज अनदर मैटर। यह सत्संग और कथा श्रवण का फायदा यही है कि प्रतिदिन या तो नियमित रूप से करने से एटलीस्ट हमको यह तो पता चलता है कि एक महत जीवन है और इसका संधान करना चाहिए। तो अभी मान लीजिए कि आज मैं बद्ध जीव हूं। कल मेरे में थोड़ा सा मंद वैराग्य यदि प्रकट भी हुआ जो मुमुक्षु जीव जिसकी बात करते हैं ठाकुर इस जन्म में मैं बद्ध जीव से मुमुक्षु जीव की ओर भी जाऊं तो भी तो एक बड़ा जंप हो गया ना फिर नेक्स्ट जन्म में वहां से प्रारंभ करेंगे मुक्त हो जाएंगे उसके नेक्स्ट जन्म में नित्य मुक्त होकर के जन्म लेंगे किसको पता मैं जब रांची में था ना तो एक लड़का ब्रह्मचारी बनने के लिए आया आया जाइन करने के लिए तो अभी हुआ ऐसा कि अभी ट्राइबल एरिया ट्राइबल विलेज से आ रहा है। वहां तो ऐसा कोई सन्यास का प्रथा नहीं है। अभी हम लोगों का काम चल रहा है तो बोलकर के साधु के संपर्क में आया था और आश्रम के संपर्क में आया था। तो बोल कर के उसको लगा कि साधु बनना चाहिए तो आ गया आश्रम में। तो अभी बड़े महाराज ने उसको रख भी लिया। तो कुछ-कुछ लोगों ने सलाह दी हां कि यह ट्राइबल लड़का है उसको रखिए मत। बड़ा मुसीबत आ जाएगा। तो बोलते बड़े महाराज शशांकानंद जी उस समय बोलते नहीं क्या होने वाला है? क्या हो उसमें रख लिया बोल के हुआ ऐसा यह लड़के का जो बड़े भाई वगैरह थे सब थे आर्मी में तो एक दिन आए सब लोग पूरा ट्रक लेकर के और आश्रम में हल्ला मचाने लगे बड़े महाराज के साथ में एकदम जोर-जोर से बात कर रहा है लड़के को पकड़ा है चलो हमारे साथ में अभी चलो वरना तो सारे तुमको मार ही देंगे तो मैं तुमको तुम्हारा मर्डर कर देंगे किंतु तुमको साधु नहीं होने देंगे तो मैंने सोचा यह किस तरह का मेंटालिटी है मैंने उसको मर्डर कर देंगे किंतु उसको साधु नहीं होने देंगे। कि ये क्या मेंटालिटी है? जो भी है उसको पकड़ करके ले गए तो लड़के का पता नहीं संस्कार अच्छा होगा तो आ गया कुछ ही दिनों के बाद में वापस फिर बड़े महाराज ने उसको भेज दिया पीपीटीसी जाओ जाओ बेलूर मठ में इन लोगों को जाके बेलूर मठ हल्ला करने दो तो फिर से वो लोग आए थे उस रिलेटिव कहां फेंक कहां पे छुपाया है हमारे लड़के को यह वो सब तो देखिए कि कहां एक लड़का साधु होता है तो उसको आपको आशीर्वाद देना चाहिए ना कि कहते हैं तुम मर जाओगे यह देखने को तैयार है किंतु साधु बनते हो यह देखने के लिए तैयार नहीं। किंतु देखिए यह वही बात हुई ना कि एक बात पता तो चल गया कि यह परिस्थिति हो सकती है माने वास्तव है और देखिए ऐसा तो है नहीं कि ठाकुर एक अकेले आदमी थे पूरे हिस्ट्री में पूरे जगत में जिनको कि यह अनुभव हुआ है जितने भी कल्चर देखे जितने भी लोकेशनेशंस देखे सब तरह पे सब जगह पे इस तरह के अनुभव वाले व्यक्ति है यह हुई की कहानी मुझे अच्छी इसलिए लगती है कि कल्चर पूरा डिफरेंट है बैकग्राउंड पूरा डिफरेंट है किंतु आईडिया है पूरा वेदांतिक आईडिया है कि भ्रम है ही नहीं वह तो सिर्फ एक जैसे कि वह चांद है चांद का प्रतिबिंब घट पे पड़ रहा है अभी 1000 घट है तो 1000 प्रतिबिंब गिरेंगे तो उसका अर्थ यह थोड़ी ना है कि 1000 चांद है चांद एक ही है बाकी सब घट के भीतर में प्रतिबिंब मात्र है तो घट को जैसे ही तोड़ दिया प्रतिबिंब भी अदृश्य हो गया तो यह कितना परफेक्टली फिट बैठ जाता है हमारे साथ में दिस स्टोरीज आर एवरीवेयर ना एक्चुअली देखिए वो तो अपना
प्रश्न: इस माया से कैसे मुक्त हुआ जाये? उत्तर है चार योगों का समन्वय.
लोगो है ही है। कर्म ज्ञान भक्ति ध्यान स्वामी जी ने अपने लोगो में ही डाल दिया है। उसमें देयर इज नो बिग मिस्ट्री देयर कि चारों योगों का यथाशक्ति अनुष्ठान करना है। और पहले जैसा होता था कि प्योरिटी ऑफ साधना प्योरिटी ऑफ़ फिलॉसफी। मैं द्वैतवादी हूं तो मैं अद्वैत के सामने देखूंगा भी नहीं। अद्वैत वाले हैं। द्वैत वालों को एकदम तुच्छ दृष्टि से देखेंगे। ऐसा सब तो अभी अपने यहां पे नहीं है। अपने मन की जो पोजीशन है यदि विल पावर आज सुबह को मेरा स्ट्रांग है चलो थोड़ा सा ज्ञान मार्ग की साधना कर दी महावाक्य विचार कर दिया थोड़ा सा विवेक चूड़ामणि खोल के पढ़ लिया भी रात को अभी मन बिल्कुल डाउन हो गया है तो कथामृत खोल के पढ़ लिया तो हमको कथामृत में और विवेक चूड़ामणि में कोई डिफरेंस नहीं लगता है सो दैट अपनी साधन पद्धति तो बड़ी क्लियर है तो देयर इज नो बिग मिस्ट्री हियर यहां पर रिवील करने के लिए कुछ नहीं एट द एंड ऑफ द डे वही चार योग पे ही बात आकर अटकने वाली है यस यस यस यस कि अपना अपने ऑर्डर का जो वैल्यू एडिशन है वो वही है कि टेक द बेस्ट ऑफ एव्री पाथ व्हाई वुड यू इवन जैन बुद्धिज्म राइट आप क्यों अपने को लिमिट करेंगे कि हिंदू धर्म के भीतर में से ही हमको सब कुछ लेना है। जैन बुद्धिज्म का मैंने स्टडी किया था शुरू-शुर में। इवन अपना जैनिज्म है। देखिए कि जो साधुओं की भगवान जो महावीर है उनकी तपस्या तितक्षा वो कितनी प्रेरणा देती है सबको। सिखों के जो वह सब एक के बाद एक गुरु थे। फिर इवन क्रिश्चियनिटी और इस्लाम में भी कुछ-कुछ जो संत हो गए तो टेरेसा ऑफ एिला उनका कैरेक्टर मुझे बहुत अच्छा लगता है। सो व्हाई शुड वी लिमिट आवरसेल्व्स? फ्रांसिस ऑफ अससी टेरेसा ऑफ एविला
प्रश्न: एक साधक एक साधन पद्धति से दूसरी की और जाता है - एक योग से दूसरे की और जाता है - ऐसे उदहारण है क्या?
ऑफकोर्स मेरा खुद का उदाहरण है ना। मैं जब रांची में था, मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं कर्म को या तो सेवा को छोड़ के और कुछ करूंगा। किंतु उसमें भी एक समय ऐसा आया कि मुझे लगा कि नहीं यह बहुत हो गया। इससे अभी ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाऊंगा इस क्षेत्र में। तो यहां पे जब आया बेलूर मठ फिर से ज्वाइन करने के लिए गया तो मुझे नागपुर भेज दिया सुहितानंद जी ने। यह कह के तुमने काम तो बहुत किया ट्राइबल एरिया में। अभी तुम थोड़ा सा मंदिर में काम कर लो। वो नया टेंपल उसका क्सिक्रेशन होने वाला था 2006 में नागपुर में तो वहां पर जाकर तुम काम करो तो तुम्हारा एक बैलेंस होगा। तो मैं जब नागपुर में गया और पहली-पहली बार मंदिर में काम करना शुरू किया भीतर से इतना रेजिस्टेंस आता था कि प्रत्येक दिन मैं ऐसा सोचता था। अब सोचिए कि कहां वो ट्राइबल एरिया में काम करना। सुबह को 7:00 बजे आप जीप ले निकल जाते हैं। रात को 7:00 बजे वापस आते हैं। डे आफ्टर डे पूरा आपका ये लाइफ कहां और यह लाइफ कहां के मंदिर में ही रहना है। भंडार गुरु में ही रहना है। फल काटने हैं। ठाकुर को सजाना है। फूलों से वो ये सब माने कंप्लीटली ऑोजिट। किंतु मैंने सोचा कि देखिए अभी एक बार मैंने सोच लिया है कि आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ना ही है। ठाकुर को गुरु के रूप में स्वीकार कर लिया है। तो चलो संघ की बात भी एक बार सुन लेते हैं। तो कैसे भी करके टिक गया और सिर्फ आखिर आखिर में टिका नहीं किंतु एक जो डिवोशन जो होता है उसमें आनंद भी आने लगा। उसके बाद में जब ट्रेनिंग सेंटर में आया तो मैंने सोचा कि थोड़ा सा स्टडी किया जाए। लेट अस सी कि फिलॉसोफी क्या कहता है। तो स्टडी किया तो ठाकुर की कृपा से इस तरह से हुआ कि मुझे सीधा कंप्लीट वर्स एडिट करने का मौका मिल गया। सो वो भी एक मैंने कर लिया। सो तो मैंने अपने खुद के जीवन में तो देखा है कि आपको यदि लगता है कि कर्म या भक्ति इन सब का लिमिट है तो यू कैन इजीली स्विच ओवर टू अनदर एंड इट विल टेक यू अहेड आल्सो। किंतु क्या है ना कि फिलॉसोफिकल क्फ्लिक्ट नहीं होना इट इज नॉट इनफ। आपको आपका साइकोलॉजिकल कन्फ्लिक्ट नहीं होना चाहिए। अह इन दैट सेंस अभी मुझे अ ट्राइबल एरिया का काम छोड़ करके रूरल डेवलपमेंट छोड़कर के आप किसी को मंदिर में बिठाएंगे उसका जो राजसिक पर्सनालिटी है वहां पे एडजस्ट कैसे कर पाएगा। दैट इज द बिगेस्ट रेजिस्टेंस। मैंने बहुत बार देखा है मतलब रामकृष्ण मिशन में यह फेमस है यह मतलब घटना इस तरह की कि किसी को मठ सेंटर में से उठा के मठ मिशन सेंटर में से उठा के मठ सेंटर में पोस्टिंग करते हैं। अब जैसे सेवा प्रतिष्ठान है। सेवा प्रतिष्ठान को रात को 2:00 बजे इमरजेंसी आएगा। आपको खड़े रहना है। बाकी सब भूल जाना है वहां पे। ना ही मंदिर है ना ही पूजा पाठ है। कुछ नहीं है। रात को काम करना है। म ओडल्ड ओवर्स पे सब होता है। राइट? तो सेवा प्रतिष्ठान से उठा के यदि अद्वैत आश्रम में रखे ना कि राजकोट जैसे या चेन्नई जैसे मठ सेंटर में रखे जहां पे कि मंदिर के आसपास में ही सब कुछ है। अद्वैत आश्रम में लिटरेचर को लेकर सब कुछ है तो एडजस्ट करने में बड़ा तकलीफ होगा क्योंकि सेवा प्रतिष्ठान का कहां नरेंद्रपुर यह रह सबका पूरा माइंडसेट अलग होता है कि एक एनी टाइम ये अपना ये है देवघर है वृंदावन है। ये जो हॉस्पिटल सेंटर में या स्कूल सेंटर में रहते हैं आपका माइंडसेट बिल्कुल डिफरेंट डायरेक्शन में जाता है। अभी वहां से उठा के मंदिर सेंटर में रखेंगे जहां पे ये फेस्टिवल मेन है। आपका पूजा पाठ मेन है तो किस तरह का रेजिस्टेंस आएगा भीतर में। सो दैट इज़ वेल नोन कि आपको इस डे 20 30 साल इस बिठाए हैं उस सेवा प्रतिष्ठान या वृंदावन में और आप कहेंगे अद्वैत आश्रम में जाकर रहो कि चेन्नई या राजकोट तो कितना मुश्किल होने वाला है। सो इट्स अ वेल नोन फिनोमिना। तो उन्होंने एक्चुअली जॉइ किया था नागपुर। तो नागपुर में पहला काम मिला था उनको मंदिर में। तो मंदिर में अभी एमडी करके आया है लड़का और काम कर रहा है मंदिर में फूल सजा रहा है तो पहले उनको भी थोड़ा यह लगा कि यह मेरे से क्या करवा रहा है दूसरे लोग भी आकर के बड़े महाराज को कहते हैं इतना टैलेंटेड लड़का एमडी करके आया है उसको आप मंदिर में फूल सजा रहे हैं तो नहीं या तो रीओरिएंटेशन तो करना ही पड़ेगा रीोग्रामिंग तो करना ही पड़ेगा अदरवाइज वो यहां पे टिक नहीं पाएगा माय गुड फॉर्च्यून वास कि माय गुड फॉर्च्यून वास कि मेरे जो सीनियर थे उनको समझ में आ गया कि इसको रीोग्राम करना पड़ेगा अदरवाइज यह रूरल डेवलपमेंट रूरल डेवलपमेंट ही फिर उसी को लेके मरेगा। यह तो उन्होंने प्रयास भी किया और मैं ठाकुर की कृपा से मोर और लेस सक्सेसफुल भी हुआ। तो मेरा तीन बार रीोग्रामिंग हो चुका है। वहां रूरल डेवलपमेंट से मंदिर और मंदिर से ये लिटरेचर सब समय में आई आई आई वाज़ एबल टू मैनेज मायसेल्फ। ये एडजस्ट हो जाना। दिस इज द बिगेस्ट थिंग। एडजस्ट कर लेना। दिस इज द बिगेस्ट थिंग। मां ने ठाकुर को कहा था ना कि ये ये जो घाव हुआ है गले में कैंसर का अभी वो बहिर्मुख हो रहा है तो अभी ये जल्दी से वो ठीक हो जाएगा ठाकुर को मनाने के लिए मां ये सब कहती थी ना तो घाव था वो भीतर भीतर में था कैंसर का अभी जैसे बाहर में निकलने लगा तो अभी आप ट्रीट कर सकते हैं गले के भीतर में तो आप कैसे उसको ट्रीट करेंगे वो मलम वगैरह कैसे लगाएंगे वो जब तक आपका सिम्टम्स दिखेगा नहीं तब तक तो पता ही नहीं चलेगा ना कि हमारे भीतर में रोग है। आज मैं मेरे में कोई सिम्टम नहीं। मैं झूठ-मूठ का डॉक्टर के पास जाकर चेकिंग करवाने वाला हूं कि देखो कि मेरे साथ में क्या प्रॉब्लम है। अभी टेंपरेचर बढ़ेगा तो मैं डॉक्टर को बुलाऊंगा। और कभी-कभी होता क्या है पता है? हम थोड़ा बहुत पेन होता है ना तो हम वैसे ही दवाई ले चला लेते हैं। अच्छा वह पेन किलर ले लो, यह ले लो। क्या है? मतलब कौन सोचेगा कि यह कैंसर का पेन है। छोटा-मोटा तो होता ही रहता है। कौन डॉक्टर के पास इतना जाता है? यह जो अपनी होम रेमेडीज होती है ना यह डोमेस्टिक रेमेडी यह अदरक का पानी पी लो ये अदरक चाय में डाल के खा लो ऐसा
माँ सारदा और स्वामी ब्रह्मानन्द के बालक भाव की दो कहानियाँ
ये राजा महाराज आखिर आखिर में बच्चे जैसे हो गए थे ना तो उनको बुखार ना कि ऐसा हुआ था कुछ एक बार तो स्नान नहीं कर रहा है तो अभी स्नान नहीं करेंगे तो क्या है कि वो तो मतलब एक तो प्रॉब्लम तो स्टार्ट होगा ही तो सेवक लोगों ने जाकर के शरद महाराज को कंप्लेन किया कि राजा महाराज स्नान नहीं कर रहे। उनका टेंपरेचर तो अभी नॉर्मल हो गया है। अब किंतु बड़ा डर रहे है स्नान करने से। तो शरद महाराज गए खुद वहां पे। राजा महाराज को कहा चलो राजा मैं तुमको स्नान करवाता हूं। स्नान कर लो। ये सब क्या है? ऐसा इतना गंदा वो इतने दिनों से बैठे हो। बदबू आ रही है। चलो चलो स्नान कर लो। नए कपड़े पहन लो। तो राजा महाराज तो एकदम डर गए। अरे नहीं नहीं जैसे ही पानी गिरेगा मेरे पे। मेरा हार्ट फेल हो जाएगा। मेरा हार्ट फेल हो जाएगा। तो शरद महाराज ना सुन रहे हैं ना कंप्लेन ना कि कुछ जोर जबरदस्ती करके सेवक को लेकर वो स्नान वान वगैरह करवा के नए कपड़े पहना के ठीक कर लिया वो राजा महाराज कंप्लेन करते ही जा रहे हैं अभी देखो मेरा हार्ट फेल हो रहा है अभी देखो मेरा हार्ट फेल हो रहा है वो बिल्कुल बच्चे जैसे और जो सेवक महाराज जो लिख रहे हैं ये कहानी बोलते राजा महाराज का जो बाल गोपाल स्वरूप जो हमको सुमधुर एक वो देखने को मिला हम कभी नहीं भूल पाएंगे मां की मां की ऐसी घटना है पैर में फोड़ा हुआ था बोईल जैसा जैसा हुआ था। अभी किसी ने कहा कि अस्त्रोपचार करना पड़ेगा। वो चाकू से उसको काटना पड़ेगा। तो मां एकदम बालिका की तरह नहीं नहीं उसको नहीं काटना है। मतलब नेचुरली ना आपको कहेंगे कि वो चाकू से काटना है तो कैसा डर तो लगेगा। मां बिल्कुल बच्ची की तरह पेन हो रहा है। हो रहा है किंतु फिर भी सहन कर रही है। चला भी नहीं जा रहा है। फिर भी सहन कर रही है। तो अभी वह बाबूराम महाराज थे उस समय। मोस्ट प्रोबेबबली बाबूराम महाराज ही थे। योगेन महाराज ना बाबूराम महाराज। मैं भूल गया। उन्होंने सोचा इसका कुछ इलाज करना पड़ेगा। तो एक डॉक्टर मित्र को लेकर आया। अभी वह डॉक्टर क्या करता है? मां को प्रणाम करने के लिए वह झुकता है। तो मैंने सोचा वो जैसे मां का हैबिट था वो घुमटा टान के बैठ गई। वो प्रणाम करेगा। ये डॉक्टर झुका चाकू लेकर फट करके मां का वो काट दिया। मां जोर से चिल्ला उठी। [हंसी] और बड़ी नाराज हो गई। और ये डॉक्टर भी मां मेरा अपराध स्वीकार मत करना। मेरा अपराध मत लेना। ऐसा बोल के वो चला भी गया वहां से। फिर वो सब सेवक लोग हैं ड्रेसिंग कर रहे हैं। तो जैसे ड्रेसिंग हो गया पेन तो कम हो गया तो फिर मां को शांति हुई। फिर मां फिर आशीर्वाद दे रही कि हां तुम लोगों ने अच्छा ही किया। किंतु जब तक वो काटा नहीं था तब तक जितना भी सजेशन दे नहीं अस्त्रोपचार तो नहीं करवाना है। बड़ा डर लग रहा है मुझे। बिल्कुल बालिका की तरह। महामाया सबका अस्त्रोपचार करती है। इसने माया का में आपको भी तो पता चले भ्रम क्या है मां को भी तो पता महामाया को भी पता चले लोगों को भ्रम में डालने से क्या होता है किंतु ठाकुर ने उत्तर यही दिया था कि भवे देखो तुम ही के तुम कौन हो तुम्हारे भीतर में तो वही ईश्वर है जो कि यह लीला कर रहे हैं तो प्रॉब्लम क्या है ईश्वर ने जब तक यह मुखौटा पहना है ईश्वर को पता नहीं चल रहा है कि यह मुखौटा पहनने वालों की क्या हालत होती है अभी यह ईश्वर को भी पता चल गया। हा