मङ्गलाचरण
ओम स्थापकायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा रचित इसका हम पाठ कर रहे थे भाग दो साधक भाव अध्याय प्रथम साधक और साधना इसमें अभी हम जो
भक्ति मार्ग से ज्ञान मार्ग की सर्वोच्च उपलब्धि -- निर्विकल्प समाधि की प्राप्ति कैसे हो?
पॉइंट देख रहे हैं कि किस तरह से इति इति मार्ग से निर्विकल्प समाधि प्राप्त होती है। किस तरह से भक्ति मार्ग से हम निर्विकल्प ज्ञान मार्ग की जो सर्वोच्च उपलब्धि है उसको प्राप्त कर सकते हैं। तो इसका लॉजिक शरद महाराज हमको बता रहे हैं कि सर्वप्रथम तो जब भक्त अपने इष्ट के ऊपर में ध्यान करता है तो इष्ट उसको खंडित रूप से दिखाई देते हैं। कभी सर दिखाई देगा कभी हाथ कभी पैर किंतु जैसे-जैसे ध्यान गंभीर होता जाएगा। संपूर्ण अवयव संपूर्ण इष्ट का दर्शन कर पाएगा। और फिर इसके बाद में जैसे-जैसे यह दर्शन जो है इष्ट का घनीभूत होता जाएगा वैसे ही इस दर्शन की वास्तविकता जो कि बाह्य जगत की वास्तविकता है बाह्य जगत की वास्तविकता जितनी है उतनी ही दिखेगी और फिर और भी एक डीपर स्टेप आएगा कि यह जो दर्शन हो रहे हैं वही वास्तव दिखेंगे और बाह्य जगत जिसके साथ में वह अभी तक इतनी गहराई से जुड़ा हुआ था। वह उसको परछाई की तरह धुएं की तरह दिखाने लगेगा। तो यहां तक हमने देखा कल जो हमने पढ़ा जस्ट मैं एक बार पढ़ लेता हूं। रिपीट कर लेता हूं। अह शरद महाराज कहते हैं कि जीवंत मूर्ति का दर्शन लाभ जिनके भाग्य में उपस्थित हुआ है उनके पास में जागृत समय दृष्ट पदार्थ की तरह ही ध्यान काल में दृष्ट भाव राज्यगत वह सभी मूर्तियों का समान अस्तित्व अनुभव होता है। कॉम्प्लिकेटेड सेंटेंस किंतु इसका अर्थ हमने देख ही लिया। जैसेजैसे दर्शन होते हैं। अब जैसे कि गोपाल मां की ही हमने कहानी देखी कि बाल गोपाल जो है वह जैसे ही प्रकट हुआ अघोरमणि देवी के सामने साथ में ही यह बाल गोपाल इतना वास्तव दिखने लगा। इतना जीवंत दिखने लगा कि बाहर का जो जगत है बाहर के जगत के जो कठोर नियम कानून में वह तो बाल विधवा थी जिन्होंने बाह्य जगत के कठोर नियम कानून में अपने को जो बांध करके रखा था वह सब कठोरता धीरे-धीरे करके मृदुता में परिणत होने लगी। जब ठाकुर के पास में प्रथम आई थी बाल गोपाल को अपनी गोद में उठाकर के तो वैसे तो उसका पहली पहली बार जब आती थी तो बड़ा ही ऑर्थोडॉक्स बिहेवियर रहता था ठाकुर को जब भात वो परिवेशन कर रही थी भात परोस रही थी उस समय जिस चमचे से भात को परोस रही थी वह चमचा ठाकुर की थाली को स्पर्श हो गया ना ठाकुर की उंगली ली को स्पर्श हो गया। जैसे ही स्पर्श हुआ वह चमचा भी फेंक दिया गया और जिस हांडी में से भात ले रही थी परोस रही थी उस हांडी में से वह अभी खाएगी नहीं। दूसरी हांडी में नया भात बनाना पड़ेगा। मां शारदा स्वयं ठाकुर के लिए जिस चूल्हे में खाना पकाती थी उस चूल्हे पर यदि अोरमणि देवी को अपनी हांडी रखनी है बात की तो इस चूल्हे को तीन बार गोबर से लेपना पड़ेगा और गंगाजल छीटकना पड़ेगा तब कहीं जाकर के अघोरमणि देवी की भात की हांडी उस चूल्हे पे उठेगी चढ़ेगी तो अब देखिए यह जितनी भी यह ऑर्थोडॉक्सी थी जितने आचार विचार नियम ों का पालन करती थी। वह सब कहां हवा में उड़ गया। और जब यह गोपाल को पहली बाल गोपाल को पहली बार अपनी गोद में उठाकर के ठाकुर के पास आई तो फिर वो भाव के आवेग में आकर के भाव के तरंग तूफान में फंस के ठाकुर के कमरे में नृत्य कीर्तन नृत्य करती हुई गाती हुई घूम रही है। ब्रह्मा नाचे विष्णु नाचे। तो और फिर यह भी हमने देखा जब महेश बोलकर के गंगा के सामने की ओर कामारहाटी से हमको पता है कामारहाटी में गोपाल की मां रहती थी तो कामारहाटी से सामने गंगा है। गंगा के सामने ओर महेश बोलकर के जगह है। वहां पर जगन्नाथ देव का रथ खींचा जा रहा था। गोपाल की मां दर्शन करने को गई है। एकाएक देखा कि रथ रथ के ऊपर में विराजमान जगन्नाथ देव की मूर्ति रथ को खींचने वाले विराट जन समुदाय सबके भीतर में वही गोपाल है। तो वहां पे भी हंसते नाचतेगाते उन्होंने कुरुक्षेत्र खड़ा किया था। तो देखिए कि जितना ही इष्ट का दर्शन हमारा घनीभूत होता जाएगा उतना ही यह जो बाह्य जगत है और यह जो बाह्य जगत की जो कठोरता है जिसने कि हमारा जैसे कि दम घुंट करके रखा है। जिसने कि हमारे हृदय पे एक भय का एक एक हाथ फैला करके रखा है। यह भय है। संकुचितता है। ये लज्जा, घृणा, भय, जाति, कूल, शील, मान और अभिमान ये अष्टपाश से यह बाह्य जगत ने हमको बांध करके रखा है। तो जैसे ही इष्ट का दर्शन होना प्रारंभ होगा वैसे ही यह जगत जो है हमको परछाई की धुएं की तरह कुआसे की तरह दिखने लगेगा। वो एक परछाई की तरह छवि की तरह दिखने लगेगा। उसका जो अस्तित्व है, उसकी जो सत्यता है, वह सत्यता हमको मिथ्या बोध होने लगेगी। तो, यह एक हमने देखा कल। फिर कल साथ में ही हमने एक इंपॉर्टेंट प्रश्न हुआ था कि वैसे एक टेंपरेरी एक विज़ होता है। और फिर
त्याग है दाल-रोटी-सब्जी, भाव है नमक
इस तरह के एक परमानेंट विज़न जो होते रहते हैं सविकल्प समाधि में स्थित होकर के। इन दोनों में डिफरेंस क्या है? तो वह भी हमने देखा था कि देखिए कि भाव के आवेश में कोई आप धार्मिक स्थान पर जाएंगे या तो महापुरुष का संग करेंगे या तो सत शास्त्रों का अध्ययन करेंगे तो मोमेंटरीली क्षण भर के लिए भाव में आकर के आपको कुछ दर्शन या अनुभूति होगी। किंतु इस तरह के दर्शन या अनुभूति जो है बड़ी ही डेंजरस है क्योंकि आपके पास में वो फंडामेंटल फाउंडेशन नहीं है इस अनुभूति को धारण करने के लिए गोपाल मां का आप उदाहरण देखिए और फिर यह जो ये था अपना नित्य गोपाल ये गोपाल मां और यह नित्य गोपाल ये दोनों के उदाहरण किस तरह से ऑपोजिट डायरेक्शन में है। गोपाल मां का था कि पूरा जीवन तपस्या की है, कठोरता की है, त्याग किया है, संयम किया है। उसके बाद में जब यह दर्शन परंपरा प्रारंभ होती है तो वो क्या है? उनका देह, मन, प्राण इस दर्शन को धारण करने के लिए ये भाव के तरंग तूफान को हजम करने के लिए सक्षम हो गया था। जबकि यह नित्य गोपाल है। उसने ऐसा कोई कठोरता, त्याग, तपस्या, संयम नहीं किया। इसकी वजह से ठाकुर के साथ में कीर्तन करते-करते उसको जो भाव का उथला होता था, वैसे ही वह किसी स्त्री के संग में पड़ा। तो यह जितना भी भाव है सब जैसे कि वह ड्रेनेज में आप ड्रेनेज होता है ना बाथरूम में। आप पानी डालेंगे तो ड्रेन में से कैसा पानी पूरा बह जाएगा। कुछ पानी टिकेगा नहीं तो वो ड्रेन में पानी की तरह वह सब उसका भाव है वह पूरा बह गया वो खाली हो गया पूरा ठाकुर ने इसीलिए उसको कहा था साधु सावधान देखिए त्याग और भाव इन दोनों का रिलेशन कैसा है पता है आज सुबह कोई मैं खाना खा रहा था नाश्ता कर रहा था तो उस समय एकाएक मेरे मन में फ्लैश हुआ देखिए आप खाना बनाते हैं तो क्या है कि उसमें आप नमक डालते हैं राइट अभी हमारे देह को आवश्यकता क्या है? हमारे देह को चाहिए फाइबर जो कि हमको यह स्वीट पोटैटो है वगैरह में से मिलते हैं। कार्बोहाइड्रेट वगैरह जो कि हमको राइस में से मिलते हैं। प्रोटीन जो कि हमको दाल में से मिलते हैं। तो यह जो सब माइक्रो और मैक न्यूट्रिएंट्स हमको चाहिए जो कि हमारे खाने का बेस बनाता है। भात है, फिर दाल है, फिर तरकारी है, फिर कुछ ना कुछ यह घुगनी जैसा है। चने है, मूंग है, दाल यह सब मिला करके और फिर साथ में यदि हो सके तो फ्रूट है और दही है, पापड़ च वगैरह पापड़ तो नहीं किंतु दही है। दूध है कभी-कभी तो क्या है कि यह मुलाक सब मिलाकर के एक संपूर्ण आहार होता है। अभी देखिए आप संपूर्ण आहार करने को बैठे हैं। आप दोपहर को खाने को बैठे हैं। आपको परोसा गया भात या रोटी जो भी आपको अच्छा लगे एक तरकारी है एक दाल है फिर यह मूंग या चना या तो फिर ऐसा कुछ एक पल्स है कठोल जिसको बोलते हैं गुजराती में और यह इस तरह से आपको परोसा गया और आपने जैसे ही खाना शुरू किया आप बोलेंगे अरे यह क्या इसमें नमक नहीं डाला है सब कुछ फीका फीका है बिना नमक के कैसे खा सकते हैं तो अच्छा चलो खाने में नमक डालना भूल भूल गए। अभी आपने खाने में नमक डाला। जैसे ही नमक डाला वैसा ही खाना एकदम टेस्टी हो गया और आप आराम आनंद से खाने लगे। अभी प्रश्न होगा आपने एक जो थाली भर जो खाना लिया है उसमें यदि आप खाना में नमक डालना भूल गए हैं और ऊपर से आप नमक लेते हैं तो थाली भर के खाने में आप नमक कितना छिटकेंगे? इतना ऊपर ऊपर से दो-तीन बार ऐसा ऐसा करके ही छिटकेंगे। इतना ही तो इतना सा जो चपटी भर नमक है वह पूरा थाली भर का खाना है उसको टेस्टी बना देता है। अभी देखिए हमारे मन में यदि ऐसा विचार आए कि मान लो कि नमक ही तो सही टेस्ट देता है ना। यह दाल, चावल, सब्जी ये सब का क्याेंस है? असली टेस्ट तो नमक ही देता है। बिना नमक का तो यह खाना किसी काम का नहीं। तो फिर मैं क्या करूंगा? मुट्ठी मुट्ठी नमक ही खाता रहूंगा। तो क्या ऐसा चलेगा? पहली बात तो हम मुट्ठी भर नमक खा ही नहीं पाएंगे। दूसरा कि यदि खाने का प्रयास करेंगे तो इन फिर कुछ ही समय में हमको हाइपरटेंशन हो जाएगा। हाई डायबिटीज हो जाए। हाई ब्लड प्रेशर बढ़ जाएगा। तो देखिए कि नमक भले ही चिपटी भर नमक जो है वो टेस्ट देता है पूरे खाने के थाले में किंतु आप सिर्फ नमक कभी नहीं खा सकते। अभी यह पॉसिबल है कि आप बिना नमक का खाना खाएं। इससे आपको हानि बिल्कुल नहीं होगी और आपके देह को जो पोषक तत्व मिलने चाहिए वह भी मिलेंगे। बिना नमक का दाल भी खा सकते हैं। बिना नमक का तरकारी भी खा सकते हैं। बिना नमक का भात भी खा सकते हैं। जो कुछ भी है बिना नमक का आप खा सकते हैं। टेस्ट अच्छा नहीं लगेगा। किंतु किंतु हमारे शरीर को जो पोषक तत्व चाहिए वह सब मिल जाएंगे। किंतु आप सिर्फ नमक नहीं खा सकते। पहले तो इसमें किसी भी तरह का पोषक तत्व नहीं। वह सिर्फ टेस्ट ही एनहांस करता है और कुछ नहीं करता। चपटी भर ही चाहिए। उससे ज्यादा बिल्कुल नहीं आप खा सकते। तो यह त्याग और भाव का ऐसा ही रिलेशन है। त्याग है। यह आपका फुल थाली भर के खाना। आपको सब्सटेंशियल अमाउंट ऑफ त्याग अपने जीवन में चाहिए। वह हमारे आध्यात्मिक जीवन को पोषण प्रदान करता है। मैक और माइक्रोोनट्रिएंट प्रदान करता है। अभी उसमें भाव रूपी नमक छिटक दिया जाए तो यह खाना जो है बड़ा ही टेस्टी हो जाएगा। किंतु यदि भाव नहीं है तो त्याग अपने आप में कोई बुरा नहीं है। टेस्ट अच्छा नहीं लगेगा। किंतु आपके आध्यात्मिक जीवन को जो पोषण मिलना चाहिए वो सफिशिएंट मिल जाएगा। नमक से थोड़ा सा भी आपके न्यूट्रिएंट में प्लस माइनस नहीं होता। नमक सिर्फ टेस्ट ही भाव जो है वह टेस्ट ही ऐड करता है। वो कहीं आध्यात्मिक जीवन में प्लस माइनस कुछ नहीं करता। आध्यात्मिक जीवन में प्लस माइनस होता है। त्याग का यह जो फंडामेंटल फाउंडेशन है उसी से। अभी मान लीजिए कि आपके जीवन में त्याग भी हो और फिर यह भाव भी हो तो सोने पे सुहागा। किंतु सिर्फ भाव हो। यह कैसा है? सिर्फ नमक खाने के बराबर है। अब भाव के बाद में भाव चलता ही रहा तो कभी एकदम हवा में उड़ेंगे, कभी सीधा पाताल में गिरेंगे। फिर एकदम हवा में उड़ेंगे, फिर सीधा पाताल में गिरेंगे और फिर कुछ समय के बाद में ऐसे पाताल में गिरे कि फिर वहां से हवा में उड़ना असंभव हो जाएगा। तो यह त्याग और भाव का यह रिलेशन है। त्याग है आपका फुल मील। दाल, चावल, तरकारी जो भी आप खाते हैं चपाटी वह फुल मील है। उसमें सभी तरह के मैो माइक्रो न्यूट्रिएंट्स है त्याग के भीतर में और भाव जो है उसको टेस्ट प्रदान करता है। हमारे जीवन को एक आनंद उत्साह से भरपूर कर देता है। किंतु सिर्फ भाव को लेकर के आप रहेंगे। त्याग को छोड़ देंगे तो भयानक परिणाम आएगा। तो यहां पर भी
गहरे ध्यान में भावराज्य का अनुभव बना रहना और बाह्य जगत विलीन हो जाना—यही सविकल्प समाधि है
देखिए कि शरद महाराज कहते हैं कि त्याग और यह ध्यान के परिणाम से इष्ट मूर्ति का दर्शन हमारा जितना ही घनीभूत होता जाएगा उतना ही यह बाह्य जगत जो है आपको फीका महसूस होने लगेगा। बाह्य जगत आपको कुआसे की तरह महसूस होने लगेगा। एक फोग है इसी तरह दिखेगा। अच्छा इसके बाद में अभी हमने यह भी देखा कि गंभीर ध्यान के समय में भाव राज्य का अनुभव उसमें भक्त का मन इतना प्रबल हो उठता है कि उस समय के लिए उसको बाह्य जगत का अनुभव थोड़ा सा भी नहीं रहता है। यानी कि पहला तो स्टेप है कि इष्ट का दर्शन जैसे ही प्रारंभ हुआ साथ में ही बाह्य जगत की ये कठोरता बाह्य जगत के प्रति मेरा आकर्षण बाह्य जगत के प्रति मेरा द्वेष इस आदमी ने मेरा बुरा किया तो उसके प्रति द्वेष यह आदमी मेरा प्रिय है तो उसके प्रति प्रेम वो प्रेम द्वेष वगैरह सब धीरे-धीरे करके शिथिल होना शुरू होगा। दैट इज स्टेप वन और स्टेप टू है कि ईश्वर ही रहेंगे बाह्य जगत जैसे कि विलीन हो जाएगा। किंतु बाह्य जगत विलीन होता है। मेरा जो अहम है वो विलीन नहीं होता। मैं इस तरह इसको कहते हैं सविकल्प समाधि। सविकल्प समाधि में ध्याता धेय और ध्यान ये तीनों की त्रिपुटी बनी रहती है। मैं हूं मैं हूं ध्या अ ध्याता अर्थात कि मैं ध्यान करता हूं। ईश्वर है धेय अर्थात कि जिनके प्रति मैं ध्यान कर रहा हूं और है यह ध्यान की प्रक्रिया जो कि हम दोनों को जोड़ती है। साध्य साधक और साधना। मैं हूं साधक ईश्वर है साध्य और ईश्वर को और मुझे जो ध्यान की प्रक्रिया जोड़ती है उसको कहेंगे साधन। तो यह त्रिपुटी जो है वह बनी रहती है सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट एंड रिलेशनशिप वाली। इसीलिए इसको सविकल्प समाधि कहते हैं। तो इतना हमने कल देखा था और साथ में ही हमको समझ में आ ही जाता है कि यदि यह सविकल्प समाधि है तो निर्विकल्प समाधि क्या होगी? तो ध्याता धेय ध्यान साधक साध्य साधना यह तीनों की जो त्रिपुटी है वह टूट जाए तीनों फिर मेरा जो मैं हूं वह विलीन हो जाए ईश्वर ईश्वर है वह ईश्वरत्व कहीं विलीन हो जाए दोनों के बीच का रिलेशन विलीन हो जाए और फिर जो वही अद्वय ब्रह्म वस्तु सत चित आनंद इ रहे उसको कहेंगे निर्विकल्प समाधि तो यहां पे सविक विकल्प समाधि का जो एक योग सूत्र का सूत्र है वह भी देखा था वितर्क विचार आनंद अस्मिता रूप अनुगमात संप्रज्ञात अर्थात कि वितर्क विचार आनंद और अस्मिता इन अवस्थाओं के साथ जो समाधि होती है उसे संप्रज्ञात अर्थात कि या तो फिर सविकल्प समाधि कहते हैं। अस्मिता अर्थात कि मेरा मैं और वितर्क विचार और आनंद ये जो है मैं जब ईश्वर का चिंतन करता हूं उसमें से यह वितर्क विचार प्रकट होते हैं और माने वितर्क विचार करके मैं ईश्वर का चिंतन करता हूं और फिर उसमें से आनंद प्रकट होता है। तो ये सभी जहां पर बने रहते हैं उसको कहेंगे सिकल्प समाधि। उसके बाद में शरद महाराज जो कहते हैं उसको पढ़ते हैं। क्या कहते हैं महाराज जी वही प्रकार समाधि काले मानसिक शक्ति प्रभाव भक्त मने बा जगत विलय होले ओ भाव राज्य विलय होना इस प्रकार की समाधि के समय मानसिक शक्ति के प्रभाव से भक्त के मन में बाह्य जगत का विलय होने पर भी भाव राज्य का विलय होगा नहीं अब जैसे कि गोपाल मां बाल गोपाल को देखती है। अभी यदि ठाकुर ने कहा ना कि सर्वोच्च अनुभूति क्या है? तो सर्वभूत में ईश्वर दर्शन तो फिर बाल गोपाल को गोपाल मां ने कहां पर देखा? तो वो रथ में देखा। जगन्नाथ के भीतर में देखा रथ खींचने वालों के भीतर में देखा। विराट जन समुदाय के भीतर देखा। तो बाकी सब अदृश्य हो गया। किंतु बाल गोपाल रहा। तो एटलीस्ट बाल गोपाल तो रहेंगे ही रहेंगे। सविकल्प समाधि में तो इसीलिए कहते हैं कि इस इस तरह की समाधि के समय मानसिक शक्ति के प्रभाव से भक्त के मन में बाह्य जगत का भले ही चाहे विलय हो जाए ना ही रथ दिखता है ना ही जगन्नाथ महाप्रभु की मूर्ति दिखती है ना ही रथ को खींचने वाले दिखते हैं ना ही विराट जन समुदाय दिखता है किंतु यह जो बाह्य भावराज्यक जो है उसका विलयन नहीं होता गोपाल तो बना ही रहता है जगत दृष्ट वस्तु और व्यक्ति शकले सहित व्यवहार कोरिया आमरा नितो जे रूप सुख दुखादि अनुभव करिया ताकी आपन इष्ट मूर्ति सहित व्यवहारे भक्त तो ठीक तदूप अनुभव करते थाके जगत में दृष्ट वस्तु और व्यक्तियों के साथ में व्यवहार करके हम नित्य नियमित जिस तरह के सुख और दुख का अनुभव करते हैं, करते रहते हैं। इसी तरह अपनी इष्ट मूर्ति के साथ में व्यवहार करने से भक्त ठीक उसी तरह के अनुभव करता रहता है। अभी जैसे देखिए कि मेरा एक मित्र है। तो इस मित्र के साथ में मैं हंसी मजाक करता हूं। वार्ता वार्तालाप करता हूं। कभी मैं उस पर नाराज भी हो जाता हूं तो कभी उस पर स्नेह भी उमड़ आता है। तो यह सब मित्र के साथ में मेरा होता है। अभी मैं सख्य भाव से साधना करूंगा। सुदामा भगवान कृष्ण की सख्य भाव से साधना करते हैं तो उनके मन में भगवान कृष्ण जो भाव राज्य में प्रकट होंगे उसके साथ में सभी लीलाएं चलती ही रहेगी। जिस तरह की बाह्य कृष्ण के साथ में लीला चलती है वैसे ही अंतर कृष्ण के साथ में लीला चलती रहेगी। भाव राज्य में जब कृष्ण प्रकट होते हैं तो उनके साथ में भी कभी हम नाराज हो जाते हैं। उनके साथ में भी कभी हमारा प्रेम और स्नेह उमड़ आता है। सब कुछ होता है। किंतु यह जो दो राज्य है उसमें डिफरेंस क्या है? बाह्य राज्य में हम जो कुछ भी बिहेव करते हैं, जो भी एक्शन लेते हैं, उसका कर्म का परिणाम होता है। जबकि अंतर राज्य में जो भी यह लीला जो चलती है, वह हमारे कर्म के बंधन को काटती है। अभी ये जो अघोरमणि देवी इनका खुद का संतान नहीं था। किंतु मान लीजिए इनका संतान होता तो उसी संतान को उस अपने पुत्र को अघोरमणि इतना ही स्नेह करती वो पुत्र उनका जो शिशु पुत्र है वो चारों ओर दौड़ा मचाता है शरारत करता है बच्चे तो शरारत करेंगे ही वो बाल गोपाल अकेले नहीं है शरारत करने में सब बच्चे शरारत करते हैं तो मां भी क्या है कि यह शरारती बच्चे के पीछे दौड़ेगी उसकी शरारत देखकर के मन में हर्षोतफुल्ल भी होगी और नाराज इलाज भी होगी डर भी जाएगी कि बच्चा गिरे नहीं कहीं सर पर लग ना जाए कहीं यह कहीं ना हो जाए मां अपने बच्चे को प्रोटेक्शन में भी रखना चाहती है साथ में ही उसकी यह जो शरारती हरकतें हैं उसका भी वह दर्शन करना चाहती है जो कि उसके हृदय को उत्फुल्लता प्रदान करती है किंतु यह जो बाह्य जगत में हमारी क्रिया प्रतिक्रिया जो भी है उसमें कर्म बनते हैं कर्म के फल बनते हैं अच्छे हो बुरे हो कुछ भी हो जबकि जबकि यह अघोरमणि देवी बाल गोपाल की लीलाओं से जितनी हर्षोतफुल्ल होती थी उतनी ही वह नाराज भी हो जाती थी। यह खाना बनाती है तो गोपाल उनकी पीठ पर उठता है। कभी गोद में बैठता है, कभी बाल खींचता है, कभी क्या शरारत करता है। सोने के समय कंप्लेन करता है कि वह पिलो चाहिए। सोने के लिए बालिश चाहिए। बिना पिलो के बिना तकिए के वह सोएगा नहीं। अभी वो बेचारी दरिद्रा ब्राह्मणी के पास में कहां से यह पिलो आएगा? वो बोलती है मेरे हाथ पे सो जाओ अभी कल मैं वो वो जो भूतो भूतो एक लड़की का नाम है। तो [हंसी] वो जो जो कामरारहाटी जो गार्डन था उसकी जो मालकिन थी उसकी लड़की का नाम भूतो तो वो कहती है कि कल मैं सुबह को भूतो के पास जाकर के तुम्हारे लिए एक अच्छा सा एक पिलो लेके आऊंगी। अभी मेरे हाथ पर सो जाओ। तो क्या है नाराज भी होती है, हर्षोतफुल्ल भी होती है, आनंद में मग्न भी होती है और कभी-कभी उसको मारने के लिए भी दौड़ती है। यह जो ठाकुर है वो रामलला के साथ में जो सब लीला किया करते थे रामलल्ला जब बहुत ज्यादा यदि वो तकलीफ माने वो ये शरारत करेगा तो ठाकुर फिर उनके नाराज भी हो जाएंगे। फिर जब ये रामलला रोएगा तो फिर ठाकुर इतने पश्चाताप करेंगे। अरे तुमको मैंने इस तरह से डांटा या ऐसा कुछ तो देखिए भाव राज्य में जो लीला होती है और यह जो बाह्य जगत में मटेरियल वर्ल्ड में जो लीला होती है कभी-कभी सेम ही दिखती है किंतु भाव राज्य की जो लीला है वह हमारे कर्म के बंधन को काटती है। जबकि बाह्य जगत में जो है वह अच्छा कर्म कि बुरा कर्म दोनों प्रकट करती है। इसीलिए कहते हैं ना कि सत्व, रजस, तमस तीनों के परे जाना है। सत्व भी जंजीर है। तमस और रजस तो जंजीर है ही है। सत्व भी जंजीर है। यदि मोक्ष मार्ग की ओर आगे बढ़ना है। मोक्ष मार्ग में आगे बढ़ना है तो सत्व को भी काटना है। तो इसलिए यहां पे लीला जो है बाह्य जगत में अंतर जगत में शायद समान दिखे। आंतर जगत का किंतु पूरा मामला डायनेमिक्स ही अलग है। केवल मात्र इष्ट मूर्ति को केवल मात्र इष्ट मूर्ति के आश्रय कोरियाई तहार मोने तो जतो किु संकल्प विकल्प उदय होते थाके केवल अच्छा पहले वाला जो सेंटेंस है वो क्या है कि इस तरह की समाधि काल में मानसिक शक्ति के प्रभाव से भक्त के मन में बाह्य जगत का विलय होने पर भी भाव राज्य का विलय नहीं होता। जगत में जो भी उसको दिखता है वस्तु या व्यक्ति और उसके साथ में भक्त जिस तरह का व्यवहार करता है इसी तरह का नित्य जिस तरह का सुख दुख रूपी अनुभव करते हैं उसी तरह का नित्य सुख दुख आनंद और यह कभी-कभी नाराजगी का अनुभव अपने इष्ट मूर्ति के साथ में व्यवहार करने के समय भक्त इसी तरह से अनुभव करता है। किंतु केवल मात्र इष्ट मूर्ति केवल मात्र किंतु यह जो अंतर जगत में जो कुछ भी उसको अनुभूति होती है। केवल मात्र इष्ट मूर्ति को आश्रय करके ही उस समय उसके मन में जो कुछ भी संकल्प विकल्प है उसका उदय होगा। उस आंतर जगत में इष्ट को लेकर के ही संकल्प विकल्प है। वरना बाह्य जगत में हम नौकरी करने को जाएंगे तो वहां पे भी कंपटीशन रहती है। वहां पे भी रेट रेस रहती है। वहां पे भी बैकस्टेबिंग रहता है। आपको पीछे करके कोई अपना प्रमोशन पाना चाहता है। वगैरह-वगैरह जो है नौकरी करेंगे, बिजनेस करेंगे तो यह सब चलता ही रहेगा। जो वहां पर वह संकल्प विकल्प खड़े होंगे और इष्ट के साथ में ध्यान के प्रभाव से इष्ट का साक्षात दर्शन होना प्रारंभ हुआ तो इष्ट के साथ में जो हमारा जो व्यवहार है उसमें भी संकल्प विकल्प होगा आनंद भी होगा हंसी मजाक भी होगा किंतु यह है कि इसका कोई फल नहीं होने वाला है इस कर्म का यह कर्म फलों को काटता है एक विषय के मुख्य रूपे अवलंबन कोरिया भक्त मने ओई समय वृत्ति परंपरा परंपराार उदय होबार जन शास्त्रों तहार ओई अवस्था के सविकल्पो बा विकल्प संजुक्त समाधि बोलिया छे एक विषय को मुख्य रूप से अवलंबन करके भक्त के मन में उस समय वृत्ति परंपरा का उदय होने की वजह से शास्त्र इस अवस्था को सविकल्प या विकल्प संयुक्त समाधि कहता है। एक विषय को मुख्य रूप अवलंबन किया है। बोलकर के शास्त्र इसको सविकल्प या विकल्प संयुक्त समाधि कहते हैं। इष्ट मूर्ति का जैसे ही दर्शन हुआ साथ में अब जैसे गोपाल मां के जीवन में किंतु इस तरह का विवरण नहीं देखने में आया कि वो बाह्य ज्ञान शून्य हो गई। समाधि का तो अर्थ है कि बाह्य ज्ञान शून्य हो जाना। आपकी आंखें अभी बाहर का देखना बंद कर दी है। कर्ण जो है बाहर का आवाज सुनना बंद कर दिया है। आपकी त्वचा जो है उसने बाहर का सेंसेशन ग्रहण करना बंद कर दिया है। बाहर का जगत जैसे कि आपके सामने विलुप्त हो गया है। अंतर जगत ही बचा है। तो अब जैसे कि अघोरमणि देवी के जीवन में समाधि की अवस्था हुई कि नहीं इस तरह का विवरण अभी तो मुझे याद नहीं आ रहा। किंतु यह समाधि के बाद की जो अवस्था है कि भीतर में जो इष्ट का दर्शन करते हैं उस इष्ट को आप खुली नजरों से पूरे विश्व में देखते हैं। तो ये यदि डेफिनेशन देखा जाए तो अोरमणि देवी ने जो इंटरमीडिएट स्टेज जो है नेति नेति करके सब त्याग करके पहले तो समाधि प्राप्त हुई। इष्ट का दर्शन हुआ। आखिर समाधि क्रॉस करके वापस जब आती है तो इष्ट चारों दिशा में देखते हैं। वह स्टेप ही जैसे कि उन्होंने स्किप कर दिया है सीधा माने उनकी तपस्या तो है प्रचंड तपस्या है। तो तपस्या की वजह से सीधा अपने इष्ट को पूरे विश्व में देखना शुरू कर देती है। अभी एक हो सकता है कि याद करिए कि भैरवी माने कामारहाटी की ब्राह्मणी कामारहाटी बामनी या तो फिर ये अघोरमणि देवी अोरमणि देवी को प्रथम दर्शन जो हुआ था आंखें बंद करके जप कर रही थी घंटों भर तक इसके बाद में जप समाप्त करने के लिए जैसे ही आंख खोली देखा बगल में ठाकुर बैठे हैं और जैसे ही ठाकुर को स्पर्श करने के लिए हाथ बढ़ाया तो ठाकुर अदृश्य होकर करके बाल गोपाल प्रकट हो गया। तो हो सकता है कि यह जो सीन उखड़ा हुआ वह उनकी समाधि अवस्था में होगा। वैसे ही तो जप कर रही है। वैसे ही तो स्थिर होकर बैठी है। तो उन्होंने जो देखा गोपाल को अपनी स्थूल दृष्टि से देखा कि भाव दृष्टि से देखा अपने अंतर में देखा और उस समय बाह्य ज्ञान विलुप्त हो चुका था। वह ऑलरेडी समाधि में थी। बाद में फिर समाधि से बाहर आई। वी डू नॉट नो। शरद महाराज ऐसा कुछ बोलते नहीं और इस तरह से और कहीं पढ़ा भी नहीं। किंतु स्पष्ट तो है कि सतत जब ध्यान घंटों घंटों भर जब ध्यान के परिणाम से उनकी यह परिस्थिति हुई तो उस समय कहीं ना कहीं उनको सविकल्प समाधि लग गई होगी और फिर बाकी का यह घटना परंपरा प्रारंभ हुआ है। यह अभी हम गेस वर्क करके कहते हैं।
ईश्वर-दर्शन की निरंतर आकांक्षा से मन की वृत्तियाँ शांत होकर निर्विकल्प समाधि प्राप्त होती है
ए रूपे भाव राज्य अंतर्गत विषय विशेष चिंताए भक्त मने स्थूल बाह्य जगतेर एवं एक भावेल प्राबल्य अन्न भाव सकलेर विलय साधित होय इस तरह से भाव राज्य के अंतर्गत विषय विशेष की चिंता से भक्त के मन में स्थूल बाह्य जगत का एवं एक भाव के प्रबलता से बाकी बाकी सब भावों का विलय साधित होता है। जब मैं अपने इष्ट का ही चिंतन करता हूं तो पहले तो क्या होगा? यह स्थूल बाह्य जगत है वह अदृश्य होना शुरू होगा। फिर अब जैसे आंतर जगत में भी मैंने प्रवेश किया तो वहां पर भी तो हजार तरह का कचरा पड़ा है। जैसे ये आंखें बंद करके हमने इष्ट चिंतन प्रारंभ किया तो दुनिया भर का यह चिंतन है साथ-साथ में आ जाता है। मेरा यह इन्वेस्टमेंट है। उसमें क्या करना है? फिर मुझे यह कल यह काम करना है। परसों दिन वह काम करना है। ये ये जितना भी हमारा सांसारिक जो घटना प्रवाह है सब जैसे कि हमारे मन के ऊपर में आक्रमण करता है। तो भाव राज्य में जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते जाएंगे वैसे ही दो चीज होगी। पहले तो बाह्य जगत जो है वह उसके साथ में हमारा नाता शिथिल होता जाएगा। इवेंचुअली बाह्य जगत विलुप्त हो जाएगा और भीतर में भी जैसे कि बहुत सारे भाव है तो जो भाव विशेष है जो एक भाव का हम आश्रय लिए हैं ईश्वर के प्रति शरणागति या ईश्वर के प्रति संतान भाव या तो फिर इष्ट बाल गोपाल है मैं मेरा उनके प्रति वात्सल्य भाव है ये जो भी एक भाव का आश्रय लिए हैं वो एक भाव को छोड़कर के बाकी सभी भावों का विलय होगा एक ही भाव रहेगा बाकी सब भाव चले जाएंगे आंतर जगत का भाव ही रहेगा बाह्य जगत विलुप्त होता जाएगा जे भक्त साधक ए तो दूर अग्रशर होते समर्थ होइया छे समाधिर निर्विकल्प भूमि लाभ तहार निकट अधिक दूर बर्ती ना है जो भक्त साधक इतने दूर आगे बढ़ने में समर्थ हुआ है उसके लिए समाधि की निर्विकल्प भूमि प्राप्त करना बहुत ज्यादा दूर नहीं है। निर्विकल्प समाधि में जाने के लिए हमको अल्टीमेटली क्या करना है? यह जो स्थूल बाह्य जगत है उसका भी विलोप करना है। उसका भी विलय करना है। और अंतर जगत जो है अंतर जगत में जो कल्पना परंपरा प्रारंभ होती है अंतर जगत का यह जो घात प्रत्याघात प्रारंभ होता है आंख बंद करके ही तो उसका भी तो विलय साधित करना है। उन दोनों का विलय करेंगे तो निर्विकल्प समाधि प्राप्त होगी। सविकल्प समाधि या तो फिर भक्ति मार्ग से निर्विकल्प समाधि प्राप्त करने में एक तीसरा एक इंटरमीडिएट स्टेट स्टेज आता है। पहला स्टेज तो है कि बाह्य जगत का विलोप करना है। दूसरा है कि जो आंतर जगत में जितने भी भाव है उसमें से एक भाव को रखना है। बाकी सब भावों का विलय करना है। ईश्वर के प्रति शरणागति, ईश्वर के प्रति सख्य भाव, ईश्वर के प्रति मधुर भाव, ईश्वर के प्रति संतान या तो वात्सल्य भाव। ये एक भाव को छोड़कर के बाकी सब भावों का विलय करना है। वो सेकंड स्टेज हो गया। फिर थर्ड स्टेज जो आता है जो एक भाव भी जो हमने रखा था ईश्वर के प्रति स्नेह ममता मधुरता जो एक भाव रखा था उसका भी हमको विच्छेदन करना है तो जैसे ही मन इमीडिएटली निर्विकल्प समाधि में स्थित होगा वर्ल्ड फेमस घटना निर्विकल्प समाधि से पहले ठाकुर के मन में सब समय मां काली प्रकट होती थी ठाकुर ने ज्ञान अस से मां काली काली को दो टुकड़ों में काट दिया। इमीडिएटली उनका मन निर्विकल्प समाधि में चला गया। जगत बहु कालाभ्यस्तो अस्तित्व ज्ञान जीनी तो दूर दूरी करने सया छ तहार मन जे समदिक शक्ति संपन्न और दृढ़ संकल्प होइया छे ए कथा बोली ते होबे जगत का बहुाल से अभ्यस्त अस्तित्व ज्ञान जिसने इस हद तक दूर करने में सक्षम हुआ है जो साधक उसका उसका मन अत्यंत शक्ति संपन्न और दृढ़ संकल्प हुआ है। यह कथा यह बात बोलने की जरूरत नहीं है। इवन यदि आपको अपने इष्ट के ऊपर में ही ध्यान करना है तो आप अब जैसे आप निराकार निर्गुण ब्राह्मण के आप स्मरण मनन निधि ध्यासन करें ना कि जो इष्ट है उसके ऊपर में आप ध्यान करें। दोनों के लिए अल्टीमेटली तो विल पावर सक्षम करना पड़ेगा। दोनों के लिए यह मन में जितना भी कचरा प्रकट होता है, बाह्य जगत का जितना भी आकर्षण खड़ा होता है, उसको तो काटना पड़ेगा। तो यह आकर्षण को काट करके इष्ट के ऊपर में मन को एकाग्र करने के लिए जो भक्त सक्षम हो गया है, उसका संकल्प शक्ति कितना दृढ़ हो जाएगा। उसका मन जो है कितना शक्ति संपन्न हो जाएगा वो आप सोच करके देखिए वो जो इसलिए इवन हम लोग कहते हैं ना कि ये दीनहीन भक्ति ये ये दीनहीन भक्ति इट्स ए ऑक्सिममोरॉन ऑक्सिममोरॉन समझते हैं ना कि दो ऑपोजिट वर्ड जैसे कि गर्म बर्फ बर्फ जो है वह कभी गर्म नहीं होता ठंडा होता है किंतु गर्म बर्फ अर्थात कि ऑक्सिममोरोन हो गया दो विरोधाभा दो विरोधाभासी भाव जो है एक साथ में इकट्ठा हुए हैं। मूर्ख पंडित दिस इज ऑक्सिममोरॉन। पंडित का अर्थ है कि वो व्यक्ति जो कि बहुत ही विद्वान है। अभी इस विद्वान व्यक्ति के सामने मूर्ख रूपी एडजेक्टिव ऐड करें मूर्ख पंडित तो फिर यह ऑिमोरन हो जाता है। तो वैसे ही यह दीनहीन भक्ति इट्स ऑिमोरॉन। भक्ति यदि करनी है, भक्ति में यदि आपको इष्ट साक्षात्कार करना है तो आपका जो मन है इतना शक्ति संकल्प और दृढ़ संकल्प शक्ति संपन्न और दृढ़ संकल्प होना चाहिए। दोनों शब्द शरद महाराज ने यूज़ किए हैं। शक्ति संपन्न और दृढ़ संकल्प। तो सोच के देखिए अद्वैत वेदांत में भी तो यही है आत्मश्रद्धा शक्ति संकल्प यही तो अद्वैत वेदांत का भी फाउंडेशन है। यदि आप आध्यात्मिकता को ठीक-ठीक समझे तो आध्यात्मिकता में ऐसा कुछ नहीं है जो कि मनुष्य को कमजोर बनाए। भक्ति शास्त्र हो कि ज्ञान शास्त्र हो। भक्ति मार्ग हो ना कि ज्ञान मार्ग हो। ठीक-ठीक अनुष्ठान करेंगे। ठीक-ठीक समझ करके उसकी साधना करेंगे। हमारे मन को एकदम सशक्त बनाएगा। हमारी संकल्प शक्ति को प्रचंड ताकत प्रदान करेगा। कोई हमारे सामने आकर के हमारा अब्यूज नहीं कर सकता। उसका सामना करने का फट करके अपने पास में वह भीतर से ही उत्तर आ जाता है। प्रश्न वही है कि भक्ति को हमको मेरे अहंकार को खत्म करना है। अहंकार को खत्म करना है। करके उसमें हम ऐसा एक दीनहीन भाव प्रकट किए हैं जिसकी वजह से भक्ति का पूरा जो हेतु है वही खत्म हो गया है। भक्ति शास्त्र का हेतु सिर्फ यह नहीं है कि अपने अहंकार को खत्म करना है और इसके लिए दीनहीन हो जाना है। भक्ति शास्त्र का तात्पर्य है इष्ट दर्शन करना है। इष्ट दर्शन करना है तो आपके मन को इष्ट पे एकाग्र करना है। इष्ट पे एकाग्र करने के लिए बाह्य जगत के या तो फिर आंतर जगत के जितने भी डिस्ट्रैक्शन है उसको जड़ मूढ़ से काट देना है। तो वह जड़ मूल से काट देने के लिए आपके पास में शक्ति और संकल्प समधिक शक्ति दृढ़ संकल्प ये दो नहीं होने से ये जो आकर्षण है बाह्य जगत का अंतर जगत में जो डिस्ट्रैक्शन है उसको कैसे काटेंगे तो ये भक्ति शास्त्र का ये जो परवर्जन जो है भक्ति शास्त्र का जो मिस एप्लीकेशन है उसमें हम ये दीन हीन शरणागति वाली भक्ति की ओर जितने जाते गए हैं उतना ही हमारे भारत देश का भी पतन होता रहता ठाकुर को आप देखिए शरणागति की साधना तो उन्होंने की है किंतु साथ में यह जो दृढ़ संकल्प जो है उनके मन में कितना प्रचंड था माया कभी भी उनका सर का एक बाल भी वह बांका नहीं कर पाएगी माया जब आएगी ठाकुर को प्रलोभन देने के लिए एक बार है कथामृत में वर्णन है ठाकुर किसी के साथ में जोर-जोर से झगड़ा कर रहे हैं किस तुम साली मेरा क्या बिगाड़ लोगी ऐसा बोलकर के झगड़ रहे तो फिर मास्टर महाशय बगल में खड़े पूरा यह देख रहे हैं और फिर ड्रामा और फिर लिखते हैं कि क्या माया ठाकुर का अहित करने के लिए आई है और क्या ठाकुर उसके साथ में झगड़ा कर रहे हैं पता नहीं अभी अभी ठाकुर ने तो इसका कोई एक्सप्लेनेशन दिया नहीं मास्टर महाशय का एक्सप्लेनेशन है तो यह जो माया अहित करने को आए तो सीधा उसका गला काटने के लिए जो शक्ति होगी तभी तो हम भक्ति मार्ग में इष्ट दर्शन कर पाएंगे। मन के एक काले निर्विकल्प कोते पारलेले ईश्वर संभोग अधिक भिन्न अल्प होना ए कोथा एक बार धारणा होले इहा समग्र मन ओ के शोत्साहे धाबित हो मन को संपूर्ण रूप से निर्विकल्प करने के परिणाम से ईश्वर संभोग ज्यादा ही होगा कम नहीं होगा इस बात की एक बार धारणा हो जाने से साधक का समग्र मन उसी दिशा में उत्साह पूर्ण सोत्साह उत्साह से उत्साह सह धावित होगा एवं श्री गुरु ओ ईश्वर कृपानी अचरे भाव राज्य चरम भूमि ते आरोहण करिया अद्वैत ज्ञाने अवस्थान पूर्वक चिरो शांति अधिकारी होन और श्री गुरु और ईश्वर की कृपा से भक्त अचीरे अल्प समय में ही भाव राज्य की चरम भूमि पर आरोहण करके अद्वैत ज्ञान में अवस्थान पूर्वक चीर शांति का अधिकारी होता है। एक बार इस साधक के मन में प्रचंड संकल्प शक्ति अद्भुत ये जो माया को काटने का जो क्षमता है वह प्रकट हो गया। इसके बाद में यह भक्त एक बार समझ ले कि मैं इष्ट के ऊपर में जितना ध्यान केंद्रित कर रहा हूं उतना ही इससे मुझे जो आनंद प्राप्त हो रहा है इससे कहीं ज्यादा आनंद मुझे निर्विकल्प अवस्था में होगा तो फिर यह धारणा करके भक्त का मन कंटिन्यूस वो निर्विकल्प अवस्था की ओर दौड़ता रहेगा। ठाकुर ने खुद कहा है मां को कि मां दर्शन जो होते हैं ना भाव जो होता है उसमें विच्छेद होता है भाव इट्स वेरी नेचर अप एंड डाउन अप एंड डाउन वो तो त्याग का फाउंडेशन है तो फिर यह बहुत ज्यादा नीचे नहीं गिरेगा बिना त्याग के फाउंडेशन के तो सीधा आकाश में फिर पाताल में आकाश में पाताल में तो एटलीस्ट त्याग का फाउंडेशन है बोलकर के बहुत ज्यादा नीचे नहीं गिरेगा किंतु विच्छेद तो होता रहेगा सतत यह जो तेल धारा वत एक ध्यान होकर के एक रूप होकर के एक लय होकर के एक ताल होकर के मन जो ईश्वर में परोया रहता है ऐसा नहीं होगा अप एंड डाउन अप एंड डाउन होता रहेगा तो ठाकुर मां को प्रार्थना करते हैं कि दर्शन में भी भाव में भी विच्छेद है विच्छेद रहित अवस्था करवा दो यह प्रार्थना ठाकुर मां को करते हैं तो एक बार यदि पक्का भक्त ठाकुर के जैसा पक्का भक्त भी क्यों ना हो संतान भाव मां के प्रति उनका आजीवन जो था इस तरह का पक्का भक्त भी एक बार यह समझ लेता है कि यदि निर्विकल्प समाधि की ओर जाएंगे तो अविछेद रूप से मन सतत ईश्वर में ही लगा रहेगा या तो फिर कहेंगे ईश्वर के साथ में ब्रह्मन के साथ में एकीकृत हो जाएगा। यह जो क्लासिक डायलेमा कि चीनी होना है कि चीनी खाना है। चीनी खाने के समय में याद रखना है कि आप सतत चीनी नहीं खा सकते। चीनी खाना अच्छा बहुत लगता है। किंतु आपको फिर एक मुट्ठा चीनी खाया फिर उसको डाइजेस्ट करने के लिए एक-द दिन चाहिए। फिर दूसरे दिन दूसरा मुट्ठा चीनी खाया। फिर उसको डाइजेस्ट करने के लिए फिर से एक-द दिन चाहिए। थोड़ा एक्सरसाइज एक्सरसाइज करना पड़ता है। किंतु चीनी ही हो गए तो फिर आप कंटिन्यूस चीनी रूपी स्टेट में बने रह सकते हैं। तो यह ट्रेड ऑफ जो है यह साधक को हमेशा करना है। चीनी का आस्वाद करना है तो पल भर के लिए करना है। फिर वह सामान्य भूमि पर आ जाना है। दूसरे दिन फिर से कुछ पल भर के लिए चीनी का आस्वाद कर लेना है। जबकि चीनी हो गए तो चीनी का आस्वाद नहीं कर पाएंगे। किंतु चीनी के साथ में एकरूपता हमेशा के लिए बनी रहेगी। यह ट्रेड ऑफ साधक को हमेशा करना है अथवा बोला जते पारे या तो फिर कह सकते हैं प्रगाढ़ ईश्वर प्रेम तहां के ओई भूमि दिखाइया देन कह सकते हैं कि प्रगाढ़ ईश्वर प्रेम ही साधक को वह निर्विकल्प भूमि दिखा देता है। एवं ब्रज गोपिका गणे न्याय उहार प्रेरणाय तिनी आपोन इष्टर शहित तो एकत्व अनुभव करें और ब्रज गोपिका गण की तरह इस ईश्वर ने ही दिखा दिया है। भगवान कृष्ण ने ही दिखा दिया है। बाल गोपाल ने ही दिखा दिया है कि वह अवस्था सर्वोच्च अवस्था है। तो उनकी प्रेरणा से भक्त अपने इष्ट के साथ में तब एकत्व अनुभव करता है। तो ये भक्ति के मार्ग से निर्विकल्प भूमि तक पहुंचने की पूरी यात्रा। इसके बाद में जो है नया टॉपिक स्टार्ट होता है जिसको कि अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न : भक्ति योग से निर्विकल्प समाधि का वर्णन यहाँ पे जैसे हुआ, वैसे ही कर्म योग से निर्विकल्प समाधि कैसे प्राप्त हो?
ना एक्चुअली कर्म योग और भक्ति योग एक तरह से देखें तो आइडेंटिकल है। भक्ति योग में हम बाल गोपाल है, मां काली है। इनकी आराधना करते हैं। कर्म योग में जिनकी हम सेवा करते हैं, वह हमारे इष्ट हो जाते हैं। तो जैसे-जैसे आप अपने सेवा करते जाएंगे, साथ में ही यह जो सांसारिक जगत के जो प्रलोभन है वह सब जाते जाएंगे। फिर सेवा ही आपके लिए एक माध्यम हो जाएगा। धीरे-धीरे आप आगे जाएंगे देखेंगे कि आपका मन के भीतर में भी जितना कचरा है वह भी चला गया। फिर सेवा का भाव ही रह गया। फिर अल्टीमेटली जैसे वह आपको मां काली के दो टुकड़े कर देने हैं तो एक सेवा भाव के भी दो टुकड़े कर देने हैं तो सीधा निर्विकल्प में स्थित हो गए और ध्यान में भी राजयोग में भी सेम मेथोडोलॉजी है माने ज्ञान योग ही ऐसा है कि आपको सीधा दो स्टेप में ऊपर में ले जाते हैं। बाकी यह कर्म ज्ञान भक्ति तीनों में तीन स्टेज में जाना है। राजयोग में भी सेम। अभी मैं अपने हृदय में अनाहत चक्र पर ध्यान करता हूं तो बाह्य जगत चला गया। फिर धीरे-धीरे करके अंदर का जगत चला गया। फिर ये अनाहत चक्र को भी काट दिया तो निर्विकल्प समाधि। यानी कि एक ऑब्जेक्ट पे हम कंसंट्रेट करते हैं। तो इस अल्टीमेटली उस ऑब्जेक्ट को काट देना है। जबकि ज्ञान योग में है कि ब्रह्मन का ही डायरेक्ट स्मरण मनन निध्यासन करते हैं। तो यानी पहले तो बाह्य जगत को काटा फिर अंदर जगत को काटा सीधा ब्रह्मन में स्थित हो गए। वो दो स्टेप में होता है। यहां पे तीनों में तीन स्टेप में होता है।
प्रश्न : भक्ति-शास्त्र और भक्ति-साधना दीन-हीन भाव से ही जुड़ी हुई है, ऐसा हमें लगता था। भक्ति के साथ उत्साह, आनंद और आत्मश्रद्धा भी जुड़ सकती है, यह बात हमें ठाकुर से ही पता चली। ठाकुर को हटा दें, तो भक्ति-शास्त्र में केवल दीन-हीन भाव ही रह जाएगा। भक्ति-शास्त्र - ठाकुर = दीन-हीन भाव
भक्ति शास्त्र माइनस ठाकुर इक्वल्स 1000 इयर्स लेवरी। भक्ति तमः [हंसी] ठाकुर नृत्य करते हैं तो मास्टर महाशय लिखते हैं सिंह विक्रम से नृत्य करते हैं। दीनहीन आदमी कैसे सिंह विक्रम से नृत्य कर सकता है? अगेन दिस इज़ ऑमोन ना नृत्य मींस कमनीय मधुरता वगैरह-वगैरह माने जो एक भाव अपने मन में आता है नृत्य शब्द सुनने से। अब कहते हैं सिंह विक्रम से नृत्य कर रहे हैं। ये तो तांडव नृत्य ही हो गया। फिर इसका तो [हंसी] सिंह विक्रम से नृत्य का और कौन सा उदाहरण है? भगवान शिव का तांडव नृत्य। [हंसी] देखिए दीनही नहीं है ऐसा नहीं। गिरीश घोष का जो माने इंसाइटफुल ऑब्जरवेशन है ठाकुर ने इस बार प्रणाम अस्त्र से जगत जय किया है तो प्रणाम तो जिसको तिसको वही कर सकता है ना जिसका कि अहम खत्म हो गया हो अब जैसे गिरीश घोष को ही फिर से लाए सब इंसाइटफुल सब उसके ऑब्जरवेशन महामाया दो लोगों को बांधने के लिए आई दो म सबको बांधने के लिए आई दोनों को नहीं बांध पाई नाग महाशय इतने छोटे हो गए कि जाल के छिद्र में से निकल गए स्वामी जी इतने बड़े हो गए कि जाल छोटी पड़ गई। ठाकुर इस बोथ माने छोटे हैं। इतने छोटे हैं कि जाल के छिद्र में से निकल जाते हैं। साथ में ही बड़े हैं। इतने बड़े हैं कि जाल उनके लिए छोटी पड़ जाती है। द डलिटी ऑफ नेचर इज देयर इन ठाकुर। प्रणाम अस्त्र से जगत जय किया है। सिंह विक्रम से नृत्य करते हैं। दैट डलिटी इज देयर। दैट इज अ परफेक्ट आप कहेंगे कि होलिस्टिक एप्रोच।
प्रश्न : भक्ति-शास्त्र की साधना है शरणागति और अहंकार का निर्मूलन। किंतु जो साधक, जो भक्त निरहंकारी और शरणागत है, वही आत्मश्रद्धा से युक्त कैसे हो सकता है? ये दो विरोधी भाव एक साथ कैसे रह सकते हैं? उसका खुद का सेल्फ आइडेंटिटी क्या होता होगा?
अब जैसे देखिए कल्याणंद जी तो स्वामी जी इस अ फुल ऑफ सेल्फ कॉन्फिडेंस राइट उन्होंने जो कनखल जाकर के जिस परिस्थिति में वो जो हॉस्पिटल स्टार्ट किया वो एक सेल्फ कॉन्फिडेंस आत्मश्रद्धा एक मदानगी का भाव नहीं होता तो वो संभव ही नहीं था। एट द सेम टाइम स्वामी जी ने जब उनको पूछा कि मैं तुमको एक जो वहां जो जो चाय के बागान है वहां पर तुमको मैं कुली के रूप में जाकर के बेच के आऊं क्योंकि मठ चलाने के लिए पैसा नहीं है। तुमको बेच के मैं पैसा ले आऊं तो तुमको चलेगा यह। तो बोला हां मैं आपके लिए मैं गुलाम होकर के विक्रय होने को तैयार हूं। सो ऑन वन हैंड दैट डिवोशन एंड डेडिकेशन टू स्वामी जी फिर स्वामी जी कहते हैं ओके तुम जाओ अभी कनखल बंगाल को भूल जाओ। वहां पे रह के रोगियों की सेवा करना तो पूरा जीवन वहां पर रह के सेवा की है। सो एक और ही इज़ टोटली डेडिकेटेड ऑन द अदर हैंड सिंह विक्रम के साथ में काम किया। यही शशि महाराज जो कि जीवन भर इतने ऑर्थोडॉक्स थे स्वामी जी ने कहा जाओ तुम जहां मुसलमान बस्ती है वहां से मेरे लिए वो ब्रेड खरीद करके ले आओ ना पाव रोटी खरीद के ले आओ। इमीडिएटली वो वहां पे गए। ऑर्थोडॉक्सी सब भूल गए। वहां पे गए खरीद के लाए। स्वामी जी ने टेस्ट किया कि ओबिडियंस कितना है। फिर कहा अभी तुम चेन्नई जाओ चेन्नई जाकर काम करो। तो सीधा चेन्नई जाकर काम किया। जो काम किया माने बिना आत्मश्रद्धा वो उसके बिना तो वो काम होता ही नहीं जिस तरह की परिस्थिति का विवरण हमको मिलता है। सो बोथ इज देयर टोटल डेडिकेशन टू गुरु इज देयर एट द सेम टाइम जब कर्मक्षत्र में आते हैं तो सिंह विक्रम वो सिंह प्रताप खड़ा होता है। किंतु मैं एक बात बताऊं ये कंट्राडिक्शन नहीं है। जिन लोगों में यह आत्मश्रद्धा होती है ना वही लोग ठीक-ठीक शरणागति ले आ पाते हैं। वरना तो जो शरणागति वो भय के मारी होती है। मुझे डर लगता है बोलकर के मैं कुछ नहीं बोलूंगा। तो ये तो कोई शरणागति नहीं हुई। ये तो का पुरुषता हो गई। मैंने दैट आर कॉम्प्लीमेंट्री कांसेप्ट्स। आत्मश्रद्धा है बोलकर के मैं शरणागत हूं। यदि आत्मश्रद्धा नहीं है तो मैं कायर हूं। जो बिना आत्मश्रद्धा का आदमी झुकता है तो उसको कायरता कहते हैं। शरणागति उसी को कहते हैं जो कि आत्मश्रद्धा से युक्त होकर के जो झुकता है। माने शरणागति और कायरता दो कांसेप्ट है। कायरता जुड़ा हुआ है का पुरुषता के साथ में। शरणागति जुड़ी हुई है आत्मश्रद्धा के साथ में। दे कंप्लीटली डिफरेंट कासेप्ट का पुरुषता और कायरता यह कॉम्प्लीमेंटरी है और आत्मश्रद्धा शरणागति यह कॉम्प्लीमेंट्री है अब ठाकुर में ठाकुर के साथ में आप का पुरुषता कायरता ये सब शब्द हम सपने में भी कभी जोड़ नहीं सकते है ना [हंसी] कृष्ण किशोर गया वो बोला तू मेरे लिए पानी लेके आ वो कुएं के वहां पे जाकर बोलता है वो कुएं में से पानी निकाल रहा है बोला मुझे दो पानी बोला मैं तो नीचे जाती कहां तो बोला शिव बोल शिव का नाम ले तुम कुछ प्रॉब्लम नहीं होगा शिव का नाम लेके पानी दे दे चल हो गया तुम्हारा काम ओ [हंसी] हां हां हां हां हां हां वो वो छिलिम सजाना वो पाइप है वो तंबाकू सजाना गुरु कहता है मेरे लिए तंबाकू सजा के ले आओ तो बोलता है मैं तंबाकू सजाने के लिए योग्य थोड़ी ना हूं तो बोल के तलाक नहीं इसको कहते हैं महातमस का लक्षण शरणागति के नाम पे तमस काम चोरी का बहाना वो स्वामी जी गए ना हिमालय में एक साधु कंबल ओढ़ के ध्यान कर रहा है तो दूर से लगेगा अच्छा कंबल में ध्यान कर रहा है। पास में जाएगा कर्राटे बुला रहा है। स्वामी जी ने बोला इसके गले में इसके कंधे पे लंगर डाल दो। हल जोत दो इसके कंधे पे बोलो जो जाके खेत में खेती करे बाद में आकर ध्यान करना। और देखिए एक बात बताऊं यह सब नया कुछ नहीं है। स्वामी जी ने कहा ना कि उपनिषद में मुझे जो एक शक्ति शक्ति शक्ति यही एक दिखता है। सो दिस इज ऑलरेडी पार्ट एंड पार्सल ऑफ उपनिषद। बीच वाला जो एक पीरियड गया ना हमारा एक बुरा पीरियड चला गया। अदरवाइज इन लोगों ने तो नया तो कुछ नहीं किया है। अदरवाइज स्वामी जी कहते क्यों कि मुझे उपनिषद में शक्ति ही दिखती है।
प्रश्न : Upanishads are a great mine of strength -- यह बात स्वामी विवेकानंद ने जो कही है, वह बिल्कुल यूनीक है। उपनिषदों के किसी अन्य भाष्य या टीका में हमको यह बात सुनने को नहीं मिलती।
उपनिषद किस तरह से समझते हैं पता है? देखिए आज जो हमने स्टडी किया ना स्टेजेस बताते हैं दृढ़ संकल्प शक्ति से युक्त होकर के जगत के साथ में नाता तोड़ना है। दृढ़ संकल्प शक्ति से युक्त होकर के मन का जो जितना भी भाव है उसको मिटा देना है। दृढ़ संकल्प शक्ति से युक्त होकर के एक ऑब्जेक्ट पर ध्यान को एकाग्र करना है। फिर उसको भी काट देना है। फ्रॉम उपनिषद बिगिंस फ्रॉम दिस स्टेज कि जो एक ऑब्जेक्ट भी जो बचा था उसको काटा फिर क्या होगा? वहां से उपनिषद स्टार्ट होता है। अभी प्रॉब्लम क्या है? जितने भी व्याख्याकार हैं उन्होंने माया का एक शास्त्र इतना डेवलप किया कि कहां उपनिषद स्टार्ट होते उसको छोड़ दो। फिलहाल ये पीछे वाला जो है उसको हमको डिस्कस करने दो। क्योंकि यह वाला पोर्शन अभी उपनिषद में नहीं मिलता। तो हमको यह फिल इन द गैप्स करने दो। किस तरह से जगत के साथ में डीएल करना है। किस तरह से मन के साथ में डीएल करना है। किस तरह से मन को एकाग्र करना है। किस तरह से साधना करनी है। हमको उस पे मन को एकाग अपने राइटिंग को फोकस करने दो। फिर जो होगा म यह सब काट के जो आता है वह तो फिर उपनिषद में लिखा ही है। सो दैट एजमशन हमारा प्रॉब्लम वहीं पर होता है। वो सरप्राइजिंग स्टेटमेंट ऑफ आवर 70% ने इतना वो माया को लेकर के ही है। आप वेदांत को पढ़ेंगे। फिर कहीं जाकर के आखिर में अंत में ब्राह्मण का नेचर आपको समझ में आता है। सो वो माया वाला पूरा काट दीजिए। फिल इन दैट गैप विद ठाकुर मां स्वामी जी। और फिर जब आप यह काट देते हैं मां काली को भी काट दिया फिर जब ब्रह्म साक्षात्कार होगा सो व्हाट इज दैट ब्रह्मण वहां से आप उपनिषद में चले जाइए ना ऐसा कहेंगे कि जितने भी महापुरुष आए ना उन सभी ने यह गैप को फुलफिल किया है। अब जैसे चैतन्य महाप्रभु उन्होंने अपने हिसाब से किया। मीराबाई है, सूरदास है या तो फिर यह नरसी मेहता है या तो फिर तुलसीदास है। जितने भी महापुरुष आए उन्होंने अपने हिसाब से इस गैप को फुलफिल करने का प्रयास किया क्योंकि अल्टीमेटली कोई भी मार्ग हो भक्ति मार्ग हो ना कि ज्ञान मार्ग माने कर्म मार्ग हो ना कि फिर यह ध्यान मार्ग हो। अल्टीमेटली आपको वहां तक तो लेके जाएगा। बिनीथ वन पॉइंट सविकल्प समाधि तक तो सब ले जाएंगे। वहां से निर्विकल्प समाधि में जंप लगाने के लिए फिर आपके पास में उपनिषद है क्योंकि वैष्णव शास्त्र को आप देखिए कृष्ण में आप इतने तन्मय हो जाएंगे कृष्ण रूप यदि हो जाएंगे तो फिर तो वहां से एक ही स्टेप बचा ना वे लोग इतने ऑर्थोडॉक्स हो गए बाद में कहते हैं यहीं पे अंत आ गया तो दैट वास देर डाउनफॉल बाकी आप थोड़ा सा ब्रॉड माइंडेड रहिए कि कृष्ण के साथ में एकरूप हो गए फ्रॉम देयर निर्विकल्प समाधि इस ओनली वन स्टेप अवे ये जो कृष्ण और काली के भक्तों का ठाकुर झगड़ा कहते हैं ना कि हमारे कृष्ण है भवसागर पार करवाते हैं तो वो काली के भक्त कहते हैं हमारी मां तो राजराजेश्वरी है वो थोड़ी ना भक्तों को पार करवाने को आएगी उन्होंने ही वो कृष्ण को रख दिया है नौकरी पे तो तुम लोग उनके भक्तों को पार करवाएगी मां काली ने ये पॉइंट किया है [हंसी]