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Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 17 Nov 2025

prayer

इट कैन नोट बी देयर द सोल नोस। ऐसा नहीं है कि आत्मन के आत्मन ज्ञान प्राप्त करता है या तो फिर आत्मन के पास में ज्ञान है। इट इज नॉलेज। यानी कि आत्मन ज्ञान स्वरूप है। मैं मेरे में अज्ञान है। मैंने किताब पढ़ के ज्ञान प्राप्त किया। किंतु वो मेरे लिए है। किंतु किताब तो ज्ञानमय स्वयं है। किताब के भीतर में ही ज्ञान ही किताब है। किताब का ही ज्ञान है। यानी कि ऐसा नहीं है कि आत्मन जानता है। आत्मन ज्ञानमय है। इट कैन नॉट बी दैट द सोल हैज़ एक्सिस्टेंस। बट इट इज एक्सिस्टेंस। ऐसा नहीं है कि आत्मन का अस्तित्व है। आत्मन अस्तित्वमय है। इट कैन नॉट बी दैट द सोल इज हैप्पी। इट इज हैप्पीनेस इटसेल्फ। ऐसा नहीं है कि आत्मन खुशी होता है। आत्मन खुशी स्वयं है। दिस इस सच अ सेटल कांसेप्ट। सतचित आनंद। आत्मन का स्वभाव क्या है? ये आत्मन का स्वभाव नहीं है। सतचित आनंद ही आत्मन है। जिसके भीतर में आनंद का अभाव है। वो एंटरटेनमेंट प्राप्त करने के लिए टेलीविजन मूवीस देखेगा। उसको मित्र मंडल की जरूरत पड़ेगी। जो किंतु जिसका स्वभाव ही आनंद है वो जहां पे भी बैठा है परमहंस की तरह भीतर में से हास्य प्रकट होता रहेगा। उसको फिर एंटरटेनमेंट के लिए जो रील्स चलता है आजकल मोबाइल्स के ऊपर में उसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। उसको फिर ये जो आंख वो उसकी फट जाए तब तक ये सोशल मीडिया देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। उसको बाहर से कहीं से एंटरटेनमेंट नहीं चाहिए होगा। वो एंटरटेनमेंट स्वरूप है। उसके भीतर में ही एंटरटेनमेंट है। तब देखिए कि सच अ पावरफुल कांसेप्ट इट कैन नॉट बी दैट द सोल नोस। इट इज नॉलेज। इट कैन नॉट बी दैट द सोल हैज़ एक्सिस्टेंस। इट इज़ एकिस्टेंस। इट कैन नॉट बी दैट द सोल इज़ हैप्पी। इट इज़ हैप्पीनेस। इटसेल्फ ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः इस सप्ताह स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा रचित श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग इसका पाठ करेंगे हम लोग द्वितीय खंड खंड साधक भाव तक पहुंचे हैं। प्रथम अध्याय साधक और साधना। इसमें प्रारंभ के कुछ पॉइंट्स हमने ऑलरेडी देख लिए हैं।

अवतार भी साधना करते हैं। श्रीरामकृष्ण की साधना का वर्णन पढ़ना प्रत्येक साधक के लिए आवश्यक है।

[गला साफ़ करने की आवाज़] साधक और साधना से पहले साधक भाव की जो अवतरणिका थी उसमें शरद महाराज हमको कहते हैं कि पूर्व पूर्व अवतारों के साधक जीवन का विवरण हमको ज्यादा नहीं मिलता है। भक्त जो होता है, वह अपने इष्ट को जिस अवतार की वह आराधना करता है, उस अवतार को वह स्वयं संपूर्ण ही देखना चाहते हैं। वह नहीं देखना चाहता कि उसके अवतार उसके इष्ट के भीतर में कहीं पर कुछ शॉर्ट कमिंग्स थी और उन्होंने साधना करके इस शॉर्ट कमिंग्स को कंप्लीट किया। तो इस तरह से वह नहीं देखना चाहता है। वह अपने इष्ट को जन्म से ही सर्वांग संपूर्ण आध्यात्मिक जगत में सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त ही देखना चाहता है। किंतु अ शरद महाराज कहते हैं कि यदि हम इस तरह से सोचना शुरू करेंगे तो होगा क्या कि साधक अवतार ने जो साधना की जिस तरह की साधना करके वो सिद्धि को प्राप्त होते हैं उस साधना को फिर हम एक लीला के रूप में ही लेंगे। उसको हम इस तरह से देखेंगे कि या तो लोगों को शिक्षा देने के लिए वह साधना कर रहे हैं या तो फिर एक लीला के रूप में कि देह धारण किया है तो देह धारण के कुछ संस्कार भी होते हैं। कुछ यह कहेंगे कि रिस्पांसिबिलिटीज भी होती है। तो साधना भी एक है। बोल के वह साधना कर रहे हैं। तो ऐसा कहीं हमारे मन में ना बैठ जाए। बोल के शरद महाराज कहते हैं कि अवतार को दिव्यता और मनुष्यत्व इन दोनों का जो जंक्शन है इन दोनों का जो संगम है वहां पर खड़ा रहता हुआ हमको उनको देखना है। यदि हम उनको इस तरह से सोचेंगे कि संपूर्ण रूप से दिव्य है। उनका देह, उनका जीवन, उनका चरित्र और उनकी लीला तो फिर साधना जो वह करते हैं या तो फिर उनके पवित्र जीवन में से हम कुछ सीखेंगे ही नहीं। क्यों? क्योंकि किसी भी तरह की आध्यात्मिक जीवन का फाउंडेशन है त्याग। इंद्रियों के ऊपर में संयम। अवतार के जीवन में इंद्रियों के ऊपर में संयम 1% दिखता है। किंतु हम यदि उनको एक ईश्वर ही मान ले यदि यह सोचे कि मनुष्य के कोई भी गुण उनमें नहीं है तो उन्होंने जो इंद्रिय संयम अचीव किया है, प्राप्त किया है, वह हम उनसे कभी सीखेंगे ही नहीं। हम लोग यह मान लेंगे कि मैं तो एक पामर इंसान हूं। मेरी संकल्प शक्ति बहुत ही कमजोर है। बोलकर के इस जन्म में तो इंद्रिय संयम होगा ही नहीं। बस भक्ति के माध्यम से मुझे आगे बढ़ने दो। किंतु यह एक बहुत बड़ा गलती होगा। यदि हम इंद्रिय संयम नहीं करते हैं। ठाकुर की भाषा में काम कांचन त्याग नहीं करते हैं। या तो फिर उसके प्रति हमारी स्प नहीं करते हैं। तो फिर हम आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ ही नहीं पाएंगे। तो वह एक पूरा डिस्कशन अवतरणिका में साधक भाव की अवतरणिका में शरद महाराज ने किया और अभी

शरीर को कष्ट देना या मन को विकृत करना——यह साधना नहीं है

प्रथम अध्याय प्रारंभ हुआ है। साधक और साधना। इसमें साधना क्या है? व्हाट इज स्पिरिचुअल प्रैक्टिस? अभी देखिए कि विश्व के जितने भी धर्म है, जितने भी पंथ है, जितने भी संप्रदाय है, जितने भी आचार्य है, उन्होंने अपनी-अपनी एक साधन प्रणाली प्रारंभ की है। इवन आजकल भी आप देखेंगे कि यह सुदर्शन क्रिया जैसी क्रियाएं। अब जितने भी ऑर्गेनाइजेशन है वह सभी अपनी-अपनी एक क्रिया को वह प्रोजेक्ट कर रहे हैं। अपनी-अपनी एक क्रिया को वे लोग मार्केटिंग कर रहे हैं। तो हमको कंफ्यूजन यह हो जाएगा कि यदि इतनी सारी क्रियाएं है, इतनी सारी साधन पद्धति है, योग के ही इतने सारे प्रकार हैं। तो फिर उसमें सही कौन सा, गलत कौन सा? मेरे लिए कौन सा आवश्यक है? मेरे पार्टिकुलर मेरा जिस तरह का कर्म प्रवाह और चरित्र है जिस तरह की मेरी कैपेबिलिटीज है उसके अनुसार मेरे लिए क्या आवश्यक है मेरे लिए क्या बेनिफिशियल है तो वह प्रश्न होगा और इस प्रश्न का समाधान करने के लिए ही जैसे कि शरद महाराज ने साधक और साधना चैप्टर में साधना के जो कुछ मूलभूत तत्व है उसके बारे में हमको बताया है। तो सर्वप्रथम तो चैप्टर का प्रारंभ शरद महाराज करते हैं कि साधना के बारे में कुछ कुछ भ्रांत धारणाएं क्या-क्या है? साधना के बारे में कुछ मिस्टेकन नोशंस क्या-क्या है? तो इसके बारे में वह कहते हैं कि सिर्फ शारीरिक कठोरता या तो फिर दुष्प्राप्य जो सब चीजें हैं उसको इकट्ठा करके कुछ विचित्र प्रकार का अनुष्ठान करना या तो फिर श्वास प्रवास को नियमन करना या तो फिर जो विकृत मन है वह विकृत मन की असंबद्ध चेष्टाएं जो होती है उसको बहुत बार हम लोग साधना मान लेते हैं। की यदि हम देखिए आजकल भी आप देखेंगे कि बहुत सारे कुछ आप नॉर्थ इंडिया में जाएंगे जहां पे भी साधु समाज है आपको अभी आजकल इतना नहीं देखने को मिलता किंतु पहले ऐसा बहुत देखने को मिलता था कि वह जो खिले का वह जो बेड होता है ना बेड के ऊपर में कांच रख दिए हैं। कांच रखे हैं या तो फिर नेल्स रखे हैं, स्पाइक्स रखे हैं। इसके ऊपर में कोई आदमी एक योगी लेटा हुआ है। तो आपको लगेगा अरे यह जो स्पाइक है या जो यह खिले हैं क्या उसके देह में नहीं वह पंक्चर कर देंगे क्या? इसको ब्लीडिंग नहीं होगा, कष्ट नहीं होगा। हम लोग तो ऐसा गद्दी वाली जगह पर बैठना पसंद करते हैं। वैसे खुली जमीन पे भी नहीं बैठना चाहते। तो यह तो यह स्पाइक्स के ऊपर में बैठा है। किंतु देखिए कि वे लोग इसको कठोरता मानते थे और इस तरह के लोगों को लोग ऐसा मानते भी थे कि बहुत बड़ा साधक है। फिर जैसे एक हाथ ऊपर करके घूमना यानी कि कभी भी एक हाथ नीचे करेगा ही नहीं। भले ही चाहे हड्डी पसली जो उसकी यह जो मसल है उसकी यह जो फैट है पूरी बर्न आउट हो जाए। हाथ बिल्कुल यह हड्डी दिखने लगे। फिर भी ऐसा वह एक हाथ ऊपर करके रहेगा। इस तरह की बहुत सारी शारीरिक कठोरताएं उस समय देखने को मिलती थी। मैं खुद एक साधु को मिला हूं जिसने ऐसा प्रण किया है कि मैं बैठूंगा नहीं। तो अभी उन्होंने क्या किया है? उनकी कुटिया जो है उसमें एक झूला जैसा झूला करके रखा है। तो वो झूला उनके यहां तक आता है। चेस्ट तक आता है। अभी जब थक जाते हैं तो झूले के ऊपर में ऐसा हाथ रख के खड़े हो जाते हैं। पूरी रात ऐसा खड़े रहेंगे और फिर मतलब बैठना नहीं है, सोना नहीं है। यदि थोड़ी बहुत नींद आ भी जाती है तो इस झूले के ऊपर में दोनों हाथ रख के वह अपना सर टेका करके थोड़ा सा विश्राम कर लेंगे। तो ऐसे लोगों को भी मैंने देखा है। तो क्या है कि हम लोग समझते हैं अच्छा जिस साधु को मैंने देखा किंतु उसका चरित्र बहुत अच्छा था। बहुत ही अच्छे साधु थे। किंतु बहुत सारे लोग ऐसा समझते हैं कि यह शारीरिक कठोरता ही आध्यात्मिक साधना है। किंतु यह बात नहीं है। काम कांचन त्याग और ईश्वर के प्रति शरणागति यह दोनों ही आध्यात्मिक साधना का मूलभूत तत्व है। आध्यात्मिक साधना का हार्ट है। इसके बाद में ये जितनी भी दुष्प्राप्य चीजें जहांजहां पर मिलती है उसको इकट्ठा करके कुछ विधिविधान करना वो जो हमने वह कहानी देखी थी राधु की कि राधु का पागलपन तो बढ़ता ही जा रहा है तो फिर किसी ने आकर के मां को कहा मां उस समय कोलपाड़ा में थी कि वह एक तांत्रिक है उसको बुलाइए तो मां का भी बाली का भाव उस समय मां का आखिरी समय चल रहा था आई थिंक 18 1980 18 या तो 1919 की ही बात है। मां की महासमाधि हुई 1920 में। 1920 में तो उसके एकद साल के पहले की ही यह घटना है। तो मां का पूरा बाली का भाव चल रहा है और राधु पागल हुई है। तो किसी ने आकर के मां को कहा कि एक तांत्रिक को ले आइए। वह अच्छा है। वह इसका इलाज करेगा। तो फिर मां तो बालिका भाव में बोल देती है अपने सेवक को कि जाओ उसको बुला करके लाओ। तो वह तांत्रिक पगला आता है। फिर वह तो बड़ा चालाक था। समझ गया कि मां का मां का बालिका भाव दिव्य भाव है। ऐसा तो शायद समझा नहीं होगा। किंतु ऐसा अवश्य समझ गया कि इनके पास में से पैसे पड़ा सकते हैं। तो उसने आकर के पूरा नाटक करना चालू कर दिया। मां भी जैसे कि अपना सर ढक के दो हाथ से इतना विनम्र होकर उसके सामने जाकर कहती है कि मेरी बिटिया को अब बचा लीजिए। आप नहीं बचाएंगे तो इसका और कोई रखवाला नहीं है। ऐसा बोलकर के करुण स्वर से तांत्रिक को कहती है और तांत्रिक भी क्या सब उटपटांग वो सब बातें बताता है कि यहां से यह तेल ले आइए। वहां से यह जड़ी बूटी ले आइए। वहां से यह पत्थर ले आइए। यहां से यह ले आइए। अभी जो विवरण दिया है जहां से जो लाने का वह आप कभी ला नहीं पाएंगे। वह तो यहां पे हनुमान की तरह पूरा पहाड़ उठा के ले आएंगे। जड़ी बूटी ना मिली ऐसा तो कोई था नहीं तो कुछ ही समय के बाद में पता चल गया कि तांत्रिक पटा करके गया है उनको पैसा लेकर गया है और जो चीजें उसने इकट्ठा करने को कहा था उसमें से कुछ भी इकट्ठा हो नहीं पाएगा तो फिर देखिए कि अभी मां का तो बाली का भाव था मां के लिए तो यह सब चलता है। हम लोग यदि इस तरह के किसी पागलपन में फंसेंगे तो हम अपना पैसा भी नष्ट करेंगे। अपनी बुद्धि भी भ्रष्ट करेंगे। तो यह दुष्प्राप्य चीजों को इकट्ठा करके उटपटांग विधि विधान करना इसको कहीं पर आध्यात्मिकता समझा जाता है। कहीं पे यह श्वास प्रश्वास निरोध है या संयमन है, प्राणायाम है उसको आध्यात्मिकता समझा जाता है। कहीं-कहीं पर लोग जो कोई मानसिक तरह से विकृत कोई व्यक्ति है, उसको कोई बहुत बड़ा महात्मा का दर्जा दे देते हैं। महात्मा का उपमा दे देते हैं। और फिर वह जिस तरह का पागलपन करेगा उस सबको सहन करते हैं। तो पहले तो साधना क्या नहीं है? यह

सर्वभूत में ब्रह्म-दर्शन करना ही साधना की चरम सिद्धि है

शरद महाराज ने बता दिया। फिर उन्होंने कहा कि साधना क्या है? साधना है सर्वभूत में ब्रह्म दर्शन या तो सर्वभूत में ईश्वर दर्शन। यह पहले ही दिन होगा नहीं। किंतु इस डायरेक्शन में आपकी साधना जानी चाहिए। यदि चारप साल एक आध्यात्मिक साधना करने के बाद में दूसरों के प्रति करुणा है। दूसरों के प्रति सहानुभूति है। उनका सुखदख अनुभव करने की क्षमता है। यदि यह सब हमारे हृदय में प्रकट नहीं होता है तो समझ लीजिए कि आप साधना के गलत रास्ते पर जा रहे हैं। कोई-कोई साधक को आप देखेंगे कि कुछ समय के बाद में दुर्वासा मुनि जैसा अपना स्वभाव बना करके रखते हैं। उनके साथ में बात करने को भी आपको डर लगेगा। बात बातबात में गुस्सा करेंगे। बड़े ही शॉर्ट टेंपरर्ड होंगे। बात बातबात में लोगों का इंसल्ट करना यह सब बहुत कुछ ये लोग डेवलप करके रखते हैं। तो समझ लीजिए कि शरद महाराज की डेफिनेशन के अनुसार या तो फिर रामकृष्ण संघ की यह जो बेसिक फिलॉसोफी है उसके अनुसार उन्होंने साधना में प्रथम स्टेप्स भी आगे नहीं बढ़ाए हैं। वे लोग अभी भी माने एकदम प्राइमरी स्टेजेस पे ही है। दूसरों पर क्रोध करना, दूसरों के ऊपर में अत्याचार करना, दूसरों का शोषण करना, दूसरों को पीड़ा देकर के अपने को आनंद प्राप्त करना। यह सब चीजें जब तक हृदय में रहेगी तब तक साधना में हमने फर्स्ट स्टेप भी नहीं रखा। सबसे पहले वो स्वामी जी का जो फेमस कोटेशन है मेक द हार्ट लाइक एन ओशन माने अपने हृदय को एक महासमुंदर की तरह बना दो। अपने हृदय का दरवाजा खोल दो। सबके प्रति सहानुभूति करुणा होनी चाहिए। यहां पर एक जो पिटफॉल है इस तरह से सबके प्रति करुणा रखने का कि फिर वो कहीं वो स्त्री पुरुष जो होता है कोई स्त्री के चक्कर में ना फंस जाए और स्त्री जो होती है कहीं पुरुष के चक्कर में ना फंस जाए। यह बात बहुत ध्यान में रखना है। वो ठाकुर कहते हैं ना कि वात्सल्य भाव ना शेष तात्सल्य भाव होए जाए। अर्थात कि माने कोई एक स्त्री थी तो ठाकुर के एक बालक संतान के प्रति उसका वात्सल्य भाव था। तो ठाकुर कहते हैं कि देखो साधु सावधान वो जो नृत्य गोपाल को कहते हैं कि वो जो स्त्री भक्त है उसके घर पर तुम एक दो बार जाना उससे ज्यादा मत जाना। और यदि वात्सल्य भाव दिखाती है तो यह सब चीजों से पटना मत थोड़ा सा भी। भले ही वह स्त्री जो थी बड़ी ही भक्तिमती थी किंतु फिर क्या है ना कि यह संसार चीज ही ऐसी है यह कामना वासना चीज ही ऐसी है कि सामने के संपर्क में आप आए और कामना का उदय ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता। यानी कि एक संयम के भीतर में आपको अपना हृदय खोलना है। यानी कि देखिए कि यह सुरस्य धारा वो जिसको कहते हैं ना कि यह वो तलवार की धार पे चलने के बराबर है। आप यदि एक ओर जाएंगे एक सिर्फ एक ओर चले जाएंगे तो वहां पे भी विकृति है। उस सामने की ओर जाएंगे वहां पे भी विकृति है। यदि आप स्त्रियों से दूर रहना है बोलकर के स्त्रियों के प्रति द्वेष यदि आपके मन में बैठ गया तो भी एक भयानक विकृति का सामना करना है और यदि माने स हृदय को खोल मेक योर हार्ट लाइक एन ओशन ऐसा बोल कर के सबके साथ में इनडिसक्रिमिनेटली मिलना शुरू कर दिया तो वह दूसरा पिटफॉल आता है। यानी कि अपने हृदय में करुणा को बनाए रखना है। एट द सेम टाइम त्याग और तपस्या को मेंटेन करना है। ठाकुर जैसे ठाकुर कहते हैं कि जब कोई स्त्री भक्त मेरे कमरे में ज्यादा बैठी रहती है तो फिर मैं उसको कहता हूं जाओ यह सब बिल्डिंग म यानी कि ये काली मंदिर तो बड़े-बड़े बिल्डिंग थे दो ठाकुर कहते हैं ये सब बिल्डिंग वगैरह देख के आओ और यदि वह नहीं खड़ी होगी तो फिर मैं ही वो तंबाकू खाने के बहाने स्मोकिंग के बहाने खड़ा हो के वहां से चला जाता था तो यह एक डिस्क विवेक जिसको कहते हैं विवेक और दूसरा है करुणा तो यह विवेक और करुणा सर्वभूत सर्वभूत में ब्रह्म दर्शन यदि करना है तो विवेक अपना बड़ा ही शार्प रहना चाहिए। तो यह एक शरद महाराज कहते हैं साधना क्या नहीं है? तो यह उटपटांग विधि विधान है वह साधना नहीं है। तो साधना क्या

जिन ऋषियों को सर्वभूत में ब्रह्म का दर्शन हुआ, उनके उदात्त जीवन से ही उनके उपदेशों की सत्यता सिद्ध होती है

है? सर्वभूत में ईश्वर दर्शन ही साधना है। इसके बाद में प्रश्न होगा कि यह सर्वभूत में ईश्वर दर्शन जो ऋषियों ने किया वो क्या सही है ना कि फिर उनके ही मन का भ्रम था। ज्यादातर 99% लोग हैं पृथ्वी पे। वह तो अपने देह की ओर ही उनकी चेतना ज्यादातर रहती है। और यदि करुणा या एंपैथी होगा भी तो उनके पत्नी है, बच्चे हैं, मां-बाप है, भाई-बहन है, मित्र मंडल है। उन्हीं के प्रति थोड़ा बहुत सद्भाव रहता है। वरना फिर बाकी और एक पेट्रियोटिज्म एक है। यानी कि एब्स्ट्रैक्ट एक इंडिया है। इंडिया का एक एब्स्ट्रैक्ट कांसेप्ट है। उसके प्रति मेरा एक आइडेंटिफिकेशन है। किंतु यह इंडिया के जो गरीब गुरबे हैं, गांव में रहते हैं जिनका कि कोई सहारा नहीं, इनके प्रति सहानुभूति नहीं जाती। किंतु इंडिया इज एब्स्ट्रैक्ट कांसेप्ट इसके वह एक पेट्रियोटिज्म रहता है। तो यह ज्यादातर लोगों के भीतर माने सिर्फ इंडिया ही नहीं ज्यादातर सभी देश में ऐसा ही होता है। पेट्रियोटिज्म एक एब्स्ट्रैक्ट कांसेप्ट रहता है। देश के प्रति अपना एक तरह का श्रद्धा है। देश के साथ में आइडेंटिफिकेशन है। किंतु देश बांधवों के साथ में नहीं है। सभी देशों में ऐसा ही होता है। तो यह जो है कि 99% लोगों के साथ में तो यही है। तो यह जो 1% ऋषि मुनि कहते हैं कि हमको तो सभी व्यक्ति प्रत्येक स्त्री पुरुष आबाल वृद्ध वनीिता जैसे वो संस्कृत में कहते हैं ना आबाल वृद्ध वनीिता अर्थात कि बच्चे बूढ़े और स्त्री जितने भी हैं उन सबके भीतर में मुझे तो ब्रह्म दर्शन होता है और सिर्फ मनुष्य कहां यह पेड़ पौधे पशु पंखी पृथ्वी चंद्र ग्रह नक्षत्र तारे समुंदर पहाड़ जंगल नदी जो कुछ भी है सबके भीतर में हमको वही ब्रह्म दर्शन ही होता है। वही ब्रह्मन ही है जो कि विभिन्न आकार धारण करके यह डिफरेंट-डिफरेंट दिखता है। जैसे कि समुंदर एक ही है। यूनिफॉर्म है। किंतु उसकी जो लहरें हैं, सतह के समय सतह के पास में आने के समय जो लहरें जो बनती है, तरंगे जो बनती है, वो वेव्स डिफरेंट होते हैं। यह वेव सर्फिंग होता है ना कोईकोई जो सी शोर होते हैं ना वहां पे वेव सर्फिंग बड़ा सुंदर होता है। बड़े-बड़े वेव्स होते हैं। तो यह जितने भी सर्फर्स जो होते हैं वर्ल्ड क्लास वगैरह उस सब बीचेस पे जाकर के खड़े रहते हैं। और यहां पे मैंने देखा विशाखापटनम का जो बीच है हमारा यहां पे ऐसा वेव्स वगैरह कहीं नहीं होता कि आप जिसको कि वेव सर्फिंग कर पाए। तो देखिए कि यह माने समुंदर तो एक ही है। पानी वही H2O फिर उसके भीतर में साल्ट मिलाया हुआ है। वही तो है। वही मछलियां समुंदर में तैरती है। वो अटलांटिक हो पेसिफिक हो ना कि इंडियन ओशन हो। किंतु जो बीच की जो कैरेक्टरिस्टिक है जियोप जियोलॉजिकल फॉरमेशन है विंड स्पीड वगैरह जो है जो कि डिसाइड करते हैं कि किस तरह के वेव्स होंगे। वो अलग-अलग है प्रत्येक बीच के ऊपर में बोलकर कि कहां पर वह वर्ल्ड क्लास वेव्स होते हैं जहां पर सर्फर लोग स्पेशली सर्फिंग के लिए जाते हैं और जैसे यहां पे है कि वेव्स होते तो है किंतु बहुत बड़े नहीं आई थिंक तीन-4 फुट के ही होते होंगे। तो फिर क्या है कि देखिए समुंदर तो एक ही है किंतु जिस तरह से यह वेव्स कल्प होते हैं वह डिफरेंट है। तो यहां पे भी ऋषि मुनियों देखते हैं कि ब्राह्मण एक ही है किंतु ब्राह्मण जिस तरह का यह जो आध्या शक्ति है आध्या शक्ति ब्रह्मण के ऊपर में किस तरह का यह विभिन्न विभिन्न आकार नाम रूप धारण करवाती है। तो यह प्रश्न होगा कि ऋषि मुनियों ने जो देखा वही सही और 99% जो जगतवासी देख रहे हैं वो गलत ऐसा आप कैसे कह सकते हैं? तो उसका भी बड़ा लॉजिकल उत्तर शरद महाराज देते हैं। कहते हैं कि देखिए यह जो सर्वभूत में ब्रह्म दर्शन करके ऋषि मुनियों का जो पूत चरित्र जो पावन चरित्र उनका डेवलप हुआ है उसको आप दर्शन कीजिए। और आप 99% लोग हैं। यह मटेरियलिज्म में डूबे हुए हैं। आप अपना चरित्र देखिए। स्वार्थ परता ये काम कांचन के प्रति आपका मोह हृदय के भीतर में दुनिया भर का करप्शन लोगों को ठग लेने की लोगों का शोषण कर लेने की वृत्ति लोगों के प्रति द्वेष ईर्ष्या यह जो काम क्रोध मद लोभ मोह डरिपु जिसको कहते हैं वेदांत में उससे भरे हुए हैं आप लोग और यहां पर ऋषि मुनि देखिए उनका मन जो है शांत पवित्र निर्मल हो चुका है यम नियम उनके जीवन में देखने को मिलते हैं। सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, तप, शोष, संतोष, स्वाध्याय, ईश्वर, प्रणिधान यह जो 10 यम नियम है इससे उनका जीवन भरपूर दिखता है। तो यहां पे वो डरिपु से भरे हुए हैं। आप लोग यहां पे है कि यह जो यम नियम जो 10 है, वह उससे भरे हुए हैं। अभी आप समझ लीजिए कि किसका जीवन ज्यादा सक्सेसफुल है ऋषि मुनियों का ना कि आपका। तो इस तरह से उस क्वेश्चन का उत्तर देते हैं और उसके

एक अनंत, असीम सामष्टि-मन में जगतरूप कल्पना उदित हुई है

बाद में एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट क्वेश्चन जो है जो कि शरद महाराज करते हैं कि अच्छा मान लिया कि जगत भ्रम है और भ्रम के परे जो सर्वोच्च तत्व है काम समय और काल और कॉन्शियसनेस का टाइम, स्पेस एंड कॉन्शियसनेस। इसकी सीमाओं से परे जो अनंत तत्व है वही सत्य है। मान लिया। तो फिर आप यदि कहते हैं कि भ्रम है तो भ्रम सबको एक ही जैसा क्यों दिखाई देता है? क्योंकि हम सबका तो अभी आप जैसे कहें कहते हैं कि स्वप्न सुशुप्ति जागृत ये तीन अवस्था है तो सुशुप्त स्वप्न अवस्था में हम सबको विभिन्न स्वप्न दिखते हैं किंतु जागृत अवस्था में तो हम सबको एक ही जगत दिखता है तो आप यदि यह कहते हैं कि जागृत अवस्था भी यह सुशुप्ति या स्वप्न की तरह ही मिथ्या है और इन तीनों अवस्थाओं के परे एक तुरीय अवस्था है तो आप किस हिसाब से कहते हैं कि हम लोग यह किस हिसाब से मान लें क्योंकि स्वप्न अवस्था हमको पता है कि मिथ्या है, भ्रम है, इल इल्ल्यूजन है क्योंकि हम सबको अलग-अलग स्वप्न आते हैं। किंतु जागृत अवस्था तो हम सबको एक ही दिखाई देती है। वो एक ही तरह के साइंस के नियम काम करते हैं। ऐसा नहीं है कि अमेरिका में अलग ग्रेविटी चलता है। भारत में अलग ग्रेविटी है। नहीं भारत और अमेरिका को तो छोड़ ही दीजिए। यह पूरा विश्व ब्रह्मांड जो है वो ग्रेविटी के जो फार्मुलेशंस खोजे गए हैं जनरल थ्यरी ऑफ रिलेटिविटी में उसी के अनुसार तो काम करता है और यह साइंटिफिक वर्ल्ड में और यह जो आध्यात्मिक जगत में यह कर्म का सिद्धांत अच्छा कर्म किया तो अच्छा फल बुरा कर्म किया तो बुरा फल और यह सिर्फ एक जन्म की बात नहीं जन्म जन्मांतर तक यह कर्म का सिद्धांत आपका चला आएगा तो यह पूरा विश्व विश्व ब्रह्मांड को व्यापृत करता है। साइंस के नियम और यह जन्म जन्मांतर की यात्रा को यह कवर करते हैं। यह कर्म का सिद्धांत। तो इतना विशाल फलक है जागृत अवस्था का। आप कैसे कह सकते हैं कि यह भ्रम है, मिथ्या है और इसके परे एक सर्वोच्च रियलिटी है, वही सत्य है। तो फिर इसके उत्तर में शरद महाराज कहते हैं कि एक विराट असीम अनंत मन के भीतर में जगत रूपी कल्पना का उदय हुआ है। यानी कि यदि एक ही व्यक्ति सपना देखता है तो विदिन दैट ड्रीम कुछ ना कुछ तो कंसिस्टेंसी होना ही चाहिए। तो यह कंसिस्टेंसी है इस पूरे विश्व ब्रह्मांड में जन्म जन्मांतर की यह जो हमारी यात्रा है उसमें यह रिलेटिविटी भी सही है। कर्म का सिद्धांत भी हमको 100% सही दिखता है। क्योंकि यह दोनों जो है वही एक विराट असीम अनंत मन के भीतर में स्वप्न की तरह दिख जागृत हुआ है। उदय हुआ है। बोल कर के हम जो इस स्वप्न के पार्ट है यह जो एक तो भ्रम कल्पना के जो पार्ट है हम सबको यह कल्पना कंसिस्टेंट दिखती है। तो इस तरह से शरद महाराज इसका उत्तर देते हैं और साथ

दुर्घटना से वैराग्य — आध्यात्मिक जीवन का प्रारंभ

में हमको यह बात भी पता है कि यह आध्यात्मिक जीवन का प्रारंभ कब होता है? जब यह जो कल्पना जो कि हमको इतनी वास्तविक दिखती है इस कल्पना में सडनली कभी ना कभी एक ब्रेक आ जाता है। हम जगत में ऐसे डूबे हुए हैं। आज मैं स्टूडेंट हूं तो मेरा वही लक्ष्य है कि जो स्टडी आज मेरा चल रहा है मेरे स्कूल में मेरे क्लासेस में एक्स्ट्रा करिकुलम एक्टिविटीज में उसी में मुझे पूरा फोकस करना है। मेरे फ्रेंड्स कितने आगे बढ़ गए हैं। उनके साथ में कंपटीशन चलता है। इसके बाद में नेक्स्ट एग्ज़ाम क्रॉस करनी है, पास करनी है। अच्छे मार्क्स लाने हैं। इसके बाद में यह करना है। वह जो स्टूडेंट के सामने सब कुछ स्टूडेंट से लेकर के वृद्धावस्था तक ये कंटिन्यूअस एक वर्ल्डली ऑब्जेक्टिव में अपना मन पड़ा रहता है। किंतु एकाएक ऐसी कोई घटना हो जाती है हमारे जीवन में कि हम लोग चौंक जाते हैं। अरे यह मैं जो आंख बंद करके गुजराती में एक शब्द है गाडरियो प्रवाह। अर्थात कि यह जो ब्लाइंड एक जो फ्लो चल रहा है उस फ्लो में उस फ्लो के भीतर में मैं बहता तो जा रहा हूं किंतु एक घटना एकाएक ऐसी हो गई कि फट के मेरी आंखें खुल गई। अरे यह मैं क्या कर रहा हूं? अरे मैं यह क्या कर रहा हूं? किसी का मृत्यु हो गया। जो कि मेरा प्रियजन था उसका मृत्यु हो गया। मेरे साथ में कोई सीरियस एक्सीडेंट हो गया। कोई सीरियस बीमारी हो गई। या तो फिर माने ऐसा ही कुछ देखिए आध्यात्मिक जगत के जितने भी सितारे हैं बड़े-बड़े जो हीरोज़ हैं स्पिरिचुअल लाइफ के वो ठाकुर हो स्वामी जी हो देखिए कि दोनों के जीवन में पिताजी का मृत्यु युवा अवस्था में पिताजी का मृत्यु उसने इस घटना ने उनके जीवन को इस तरह से झंझोल के रख दिया था कि उसके बाद में उनका डायरेक्शन बिल्कुल चेंज हो गया। तो मैंने यहां तक कि ठाकुर और स्वामी जी जैसे महापुरुषों को एक मृत्यु जो है उनके पिताजी का युवावस्था में इसने एक टर्मिनिंग पॉइंट लाया है तो हम लोग तो कौन खेती मूली है हमको भी तो एक इवेंट चाहिए जो कि हमको झंझोल करके रख दे यह जो पूरा ब्लाइंड जो फॉलो कर रहे हैं हम एक प्रवाह को उसमें से हमको निकाले अनफॉर्चूनेटली देखिए फॉर्चूनेटली अभी फॉर्चूनेटली कहे कि अनफॉर्चूनेटली यू डिसाइड कि इस तरह के एक्सीडेंट है या तो फिर यह दुर्घटनाएं हैं। सबके जीवन में होते ही होते हैं। वही बात है कि उसका बेनिफिट लेकर के एक नई दिशा में अपने जीवन को संचालित करना यह जो कैपेसिटी है, यह जो एक अकल है, शार्प विज़डम जो है, वह बहुत ही अल्प लोगों के जीवन में रहता है। यानी कि यह जगत रूपी कल्पना हमको कंसिस्टेंट दिखती तो है किंतु इस कल्पना के भीतर में भी दुर्घटनाएं होती है। दुर्घटना को किसी ने कहा ठाकुर को कि ये नरेंद्र को इतना कष्ट क्यों मिल रहा है? तो ठाकुर कहते हैं वो संपद के विपद ज्ञान कर बोले छिलो तो एक देखो मैं नरेंद्र तो वो बोलने में माहिर है ना तो ठाकुर के सामने जाकर के उसने एक दिन ऐसा बोल दिया होगा कि मैं संपद जब आती विपद जब आती है विपद के संपद ज्ञान करवे बोले छिलो तो ऐसा ठाकुर ने कहा विपद विपद अर्थात कि जीवन में दुर्घटना या विपत्ति या तो चैलेंज तो नरेंद्र जाकर के ठाकुर के सामने कहता है विपत जब आएगी तो मैं उसको संपद मानूंगा। संपद अर्थात कि अपॉर्चुनिटी या तो वेल्थ यानी कि जब जीवन में चैलेंज आएगी तो मैं उसको अपॉर्चुनिटी के रूप में देखूंगा कि हां दिस इज अ पॉइंट दिस इज वन टाइम आई कैन प्रूव मायसेल्फ। तो ठाकुर कहते कहते हैं कि विपद के संपद ज्ञान कर बोले छ तो एक देखो माने वो नरन ऐसा वो बातें करता है ना कभी-कभी एकदम हथौड़ा मार बातें तो जाके बोल देता है कि जब भी चैलेंज आएगी मैं देखूंगा कि ये मेरे लिए ओपोरर्चुनिटी है तो ठाकुर बोलते हैं अभी आ गया उसके लिए चैलेंज अभी करो इसको अपॉर्चुनिटी में कन्वर्ट तो ठाकुर तो मजाक कर रहे थे बट दिस इज व्हाट कि 1% लोग होते हैं जो कि वो विपद को संपद कर सकते हैं अदरवाइज ज्यादातर लोग विपद जब आती है जीवन में क्राइसिस आती है डिजास्टर होते हैं तो रोना धोना शुरू कर देते हैं या तो फिर वो कहीं एक उसमें चले जाएंगे वो बेड हैबिट्स जो होती है उसमें चले जाएंगे एडिक्शन एडिक्शन इतना पॉपुलर क्यों है लोगों को हजार तरह के एडिक्शन है एडिक्शन है आपके सामने जो ग्रीफ आती है जो चैलेंज आती है उसको उसको मैनेज करने का एक तरीका का तो ज्यादातर लोग किसी ना किसी एडिक्शन में डूब जाएंगे। किसी ना किसी तरह की बैड हैबिट्स डेवलप कर देंगे। या तो फिर किसी ना किसी मानसिक विकृति का भ्रम ये भोग हो जाएंगे। यह मास्टर महाशय की पत्नी ही वो बिल्कुल काशीपुर के अध्याय की ही बात है। काशीपुर के जो घटनावली है उसमें बिल्कुल आखिरी चैप्टर में ही यह बात है कि मास्टर महाशय अपनी पत्नी को लेकर ठाकुर के पास में आते हैं। कहते हैं कि मेरा एक छोटा बच्चा मर गया है और जब से मरा है तब से मेरी बीवी जो है आधी पागल की तरह हो गई है और उसका जो दूसरा बच्चा है उसको मारपीट करती है। वो खाना मतलब इस तरह का वो और मैं जब यहां पे आता हूं आपके पास में मास्टर महाशय ठाकुर को कहते हैं मैं कि आपके पास में आता हूं तो मैं इस इस वजह से वो मेरे साथ में झगड़ा करती है कि घर छोड़ के क्यों जा रहे हो उस परमहंस के पास में तो ठाकुर थोड़े से वो चिंतित हो गए फिर कहते हैं कि वो जो उसको खाना मत बनाने देना क्यों खाना बनाने के समय तो वह चूल्हा जलता है तो चूल्हे का जो ताप होता है तो वैसे ही पागल है फिर चूल्हे के सामने वो खाना पकाएगी और वहां वहां पे उस समय तो लकड़ी का चूल्हा और वेंटिलेशन अच्छा नहीं था। यानी कि गर्मी और धुआ उसके भीतर में वो रहेगी तो और पागल हो जाएगी। और फिर आखिर में ठाकुर एक आखिरी बात कहते हैं कि वो माहिर का छीनी है जाओ मां के पास में ले जाओ। तो पहली बार जब मैंने पढ़ा तो हम तो इसे एक पार्ट ऑफ कन्वर्सेशन ही समझ लेते हैं कि हां ठीक है। ठाकुर ने बोला है जाओ इसको जाकर मां के पास में ले जाओ और और ठाकुर क्या करने वाले हैं? यही तो बोलने वाले हैं ना। किंतु देखिए वो पहली बार कथामृत पढ़ा था 20 साल पहले और अभी आज 20 साल हो गए ऑलमोस्ट अभी आज कुछ ही दिनों पहले यह चैप्टर फिर से पढ़ रहा था ठाकुर कहते हैं मां के पास ले जाओ देखिए कि कितना बड़ा उपाय दे दिया है जगत संसार की ये जो चैलेंजेस है ठाकुर भी जैसे कि उसका उपाय नहीं खोज पाते हैं हमको कहते हैं कि मां की वाणी मां की जो छोटी-छोटी कहानियां है उसमें इसका उपाय खोजो तो देखिए कि विपद जब आती है तो उसको संपद ज्ञान करना है। तो दैट इज द स्पिरिच वैराग्य का प्रारंभ वहां से ही होता है। तो यह सब बातें हुई। अच्छा मैंने यहां पर

सत्–चित्–आनंद ही है आत्मन् : स्वामी विवेकानन्द

स्वामी जी का एक कोटेशन निकाला है। वह थोड़ा सा मैं पाठ करता हूं जस्ट कि किस तरह से कि स्पेस, टाइम, मैटर, एनर्जी इन सबके परे जो आत्मन है उसके रिलेटेड कि क्यों हम लोग हमारा जो मन है, वह जो इस अद्भुत ब्रह्म तत्व है, उसको नहीं समझ पाता है। और यह जो ब्रह्म तत्व है उसका जो पावर क्या है? तो मैंने जो हमारा जो डिस्कशन हुआ है उसी के रिलेटेड स्वामी जी का एक कोटेशन है और यह कोटेशन मैंने लिया है कॉस्मोस माइक्रोकोजम प्रवचन में से। आपको यदि याद होगा तो राजकोट में मैंने यह दो लेक्चर्स जो है स्वामी जी के वो लिए थे। कॉस्मोस माइक्रोकोजम और कॉस्मोस माइक्रोकोजम। तो यह जो माइक्रोकोजम जो लेक्चर है उसमें से यह स्वामी जी का कोटेशन है। क्या कहते हैं स्वामी जी? नाउ वी सी दैट द बॉडी द एक्सटर्नल शेप हैज़ नो लाइट एज इट्स ओन एसेंस इज नॉट सेल्फ लुमिनस एंड कैन नॉट नो इटसेल्फ। सर्वप्रथम तो स्वामी जी यह प्रूव करते हैं कि ये जो मेरा बाह्य देह है वो तो जड़ ही है। जड़ के भीतर में जो चेतन तत्व है। जड़ के भीतर में यह जो नियंत्रित करता है इस देह को वही असली चेतन तत्व है और वही मेरा असली स्वरूप है। यदि मैं अपने को इस देह के साथ में आइडेंटिफाई करता हूं तो वह आइडेंटिफिकेशन गलत है। देह के परे जो मेरा अस्तित्व है वही सत्य है। तो इसलिए स्वामी जी कहते हैं कि मैं देखता हूं कि यह जो देह है यह जो बाह्य आवरण है उसके भीतर में कोई भी अपना खुद का प्रकाश नहीं है। वो सेल्फ लुमिनस नहीं है और वह अपने को जान नहीं पाता। देखिए चंद्र और सूर्य दो है। चंद्र का प्रकाश सूर्य का रिफ्लेक्शन मात्र ही है। सूर्य प्रकाश का रिफ्लेक्शन मात्र ही है। चंद्र का अपना कोई प्रकाश नहीं है। जबकि सूर्य जो है उसका खुद का प्रकाश है। सूर्य है सेल्फ लुमिनस और चंद्र जो चांदनी है चंद्र की वो है रिफ्लेक्टेड लाइट। तो यह देह जो चेतन दिखता है उसका यह अपना खुद का चेतन नहीं है। इसके भीतर में जो आत्मन है उसका रिफ्लेक्टेड लाइट मात्र है। नाइदर कैन द माइंड यह जिस तरह से देह जड़ है तो वैसे ही मन भी जड़ है। वो जो ठाकुर की फेमस कहानी चूल्हे के ऊपर में यह आलू है वगैरह जो सब्जियां है उबालने को रखा है। अभी यह जो जो हांडी है जो पात्र है उसमें यह रखा है उबलने के लिए उसके नीचे में अग्नि जल रहा है तो अग्नि जलता है तो जल जो है वो गर्म होता है और गर्म जल के भीतर में ये आलू वगैरह है वो उछलते हैं कूदते हैं तो उनको लगता है कि हम अपनी ही शक्ति से उछल कूद कर रहे हैं जो वाटर बॉईल होगा तो कैसा उसमें वेव्स जैसा आएगा और जो ऊपर नीचे होगा उसमें रखी चीजें किंतु नीचे में से अग्नि बुझा दो तो फट करके पानी ठंडा हो जाएगा और आलू जो है पानी में रखा हुआ उछलना बंद कर देगा। यानी जो उछल रहा है अपनी शक्ति से नहीं उसके नीचे में जो अग्नि प्रज्वलित है उसकी शक्ति से। तो स्वामी जी कहते हैं कि ना ही यह बाह्य देह ना ही इसके भीतर में मन बुद्धि चित्त अहंकार जो कि हमारे अंतःकरण है। यह दोनों जड़ है। व्हाई नॉट पूछते हैं कि हमको ऐसा क्यों दिखता है कि वह जड़ है। क्यों वो चेतन नहीं है? बिकॉज़ द माइंड वैक्सीस एंड वेंस। बिकॉज़ इट इज विगरस एट वन टाइम एंड वीक एंड अनदर। क्यों मन जो है वह खुद चेतन नहीं है? क्योंकि मन जो है उसकी शक्तियां बढ़ती रहती है, कम होती रहती है। वैक्सीस एंड वेंस यह जो दो शब्द है यह चंद्र की कलाओं के शब्द है। चंद्र की जो कलाएं हैं बढ़ती है, कम होती है। अभी पूर्णिमा का चांद है तो कभी वह नव यह जो नवचा जिसको कहते हैं। नया चांद है और कभी-कभी अमावस्या यानी कि चांद पूरा अदृश्य हो जाता है। तो अभी सूर्य जो है सूर्य वैसे तो इक्लिप्स होता है सूरज के भीतर में किंतु वैसे तो सूरज जो है हमेशा वैसे का वैसे ही रहेगा। ये तो जो चंद्र की कलाओं के ये शब्द है वैक्सिस एंड वेंस तो इसलिए स्वामी जी बड़ा ही सुंदर पोएटिक एक डिस्क्रिप्शन देते हैं। कहते हैं मन चेतन क्यों नहीं है? क्योंकि मन की कलाएं हैं। कभी पूर्ण चंद्र की तरह पूर्णिमा के चांद की तरह स्ट्रांग है। कभी अमावस्या के अंधेरे की तरह मन के भीतर में तमस आकर छा जाता है। बिकॉज़ इट इज विगरस एट वन टाइम एंड विक एट अनदर। मन कभी-कभी स्ट्रांग होता है। कभी-कभी कमजोर हो जाता है। बिकॉज़ इट कैन बी एक्टेड अपॉन बाय एनीथिंग एंड एवरीथिंग। कोई भी चीज है बाहर के संसार की फट के आकर के हमारे मन के ऊपर में असर करती है। किसी ने हमारा इंसल्ट कर दिया। मन दुखी हो गया। किसी ने आकर के प्रशंसा कर दी। मन घमंड से भर गया। कभी आज मेरा मैं जो चाहता हूं वैसा हुआ है। बोलकर के मैं खुश हो गया। और जो मैं नहीं चाहता ऐसा खुश हुआ है तो मैं दुखी हो गया। यानी कि बाहर की घटनावली मन के ऊपर में असर करती है। देयर फॉर द लाइट वि शाइन थ्रू द माइंड इज नॉट इट्स ओन। और इसीलिए मन के माध्यम से जो प्रकाश आता है वह मन का खुद का नहीं है। हू इज इट इज देन? तो फिर यह किसका प्रकाश है? कौन सा प्रकाश? यह कौन सा चेतन तत्व है जो कि मन और देह को चालित करता है? इट मस्ट बिलोंग टू दैट व्हिच हैज़ इट इज़ इट्स ओन एसेंस। कि प्रकाश जो है वह उसी तत्व का होना चाहिए जो कि जिसका कि जो पूरा एसेंस जो है वह प्रकाश है। उसका जो कैरेक्टर है वही प्रकाश है। वो और कहीं से प्रकाश नहीं लेता है। जैसे कि यहां पे यह फैन चल रहा है। तो फैन के भीतर में जो इलेक्ट्रिसिटी है वह फैन का खुद का नहीं है। किंतु वहां पे जहां पे इलेक्ट्रिसिटी जनरेट होती है जनरेटर वहां पे तो एक्चुअली इलेक्ट्रिसिटी जनरेट होती है और फिर वहां से डिस्ट्रीब्यूट होती है। फैन जो है वहां पे इलेक्ट्रिसिटी जनरेटर में से आती है। तो इलेक्ट्रिसिटी जनरेट कहां पे होती है? जनरेटर में। जहां पे यह डैम है ना कि कोयला का प्लांट है ना कि यह न्यूक्लियर पावर प्लांट है जो कुछ भी है वहां पे वो इलेक्ट्रिसिटी जनरेट होती है और जो फैन के भीतर की जो इलेक्ट्रिसिटी है वो तो वहां से खींची हुई है। यदि बीच की जो लाइन है उसमें इंटरप्शन हो जाए। ये जो साइक्लोन अभी आया था तो फिर आजकल तो अपना इलेक्ट्रिक ग्रिड जो है वो काफी अच्छा है। वरना पहले ऐसा होता था। जैसे भी बारिश हुआ साइक्लोन जैसा कुछ भी हुआ तो फटाक के लाइट बंद हो जाएगी। क्यों? कि वहां पर वो पोल गिर गया है। वहां पर वायर कट गए हैं। कहां पे क्या हुआ है? तो यहां पे भी देखिए कि किंतु जहां पे जनरेटर है, जहां पे यह रिएक्टर है, इलेक्ट्रिसिटी प्रोड्यूस होती है। वहां से इलेक्ट्रिसिटी नहीं जाएगी। सिर्फ फैन के भीतर में जाएगी। तो, यहां पे भी स्वामी जी कहते हैं कि द लाइट व्हिच शाइन थ्रू द माइंड इज नॉट इट्स ओन। देन हुज इज इट? इट मस्ट बिलोंग टू दैट वि हैस इट एस इट्स ओन एसेंस। लाइट जो जहां से प्रकट होती है वो तत्व जो है उसका खुद का एसेंस ही प्रकाश है। एंड एस सच कैन नेवर डिक और डाई। यानी कि जनरेटर जो है वहां पे ये इलेक्ट्रिकल फ्लक्चुएशन नहीं होगा। वरना कभी-कभी अपने घर में हम देखते हैं कि ये जो बिजली का ये जो अपना ये लाइट है लाइट कभी एकदम ब्राइट हो जाता है कभी कम हो जाता है। अगेन आजकल ऐसा बहुत ज्यादा नहीं होता। मैं जब छोटा था तो अपने घर में बहुत देखता था। एकाएक प्रकाश बढ़ जाता है वो ट्यूबलाइट का। फिर एकाएक कम हो जाता है। तो फिर वो मेरे पापा कहेंगे अरे बंद कर दो बंद कर दो। ये फ्लक्चुएशन हो रहा है। कहीं वो ट्यूबलाइट को तोड़ ना दे। तो देखिए कि अभी आजकल क्या इलेक्ट्रिकल करंट में काफी स्टेबिलिटी है। किंतु फिर भी हमको तो पता ही है कि यह टेलीविज़ है ना कि यह अपना लैपटॉप है ना कि यह ट्यूबलाइट है ना कि यह फैन है ना कि यह एसी है ना कि फ्रिज है। वह सब बोरोड इलेक्ट्रिसिटी के ऊपर में उधार ली हुई इलेक्ट्रिसिटी के ऊपर में चलते हैं। पहले वाले फ्रिज के भीतर में वह स्टेबलाइजर आता था। जैसे ही फ्रिज खरीद लिया साथ में ही आपको वो वोल्टेज स्टेबलाइजर लेना है। यानी कि वोल्टेज फ्लक्चुएशन होता है। तो ये स्टेबिलाइजर जो है फ्रिज को के जो कॉइल है उसकी ये जो ठंडा करने वाली उसको डैमेज ना कर दे बोल के फ्रिज के ऊपर में इतना बड़ा काला बॉक्स जैसा एक स्टेबलाइजर रहता था। आजकल तो मैं यह सब देखता नहीं हूं। ये स्टेबलाइजर इनबिल्ट हो गए हैं शायद जो भी है तो जिसका कि इलेक्ट्रिसिटी स्वभाव नहीं है उसका जो स्वभाव परिवर्तन होता रहेगा उसके भीतर में प्रकाश बढ़ता रहेगा कम होता रहेगा किंतु जो तत्व इलेक्ट्रिसिटी प्रोड्यूस करता है वहां पर जो आप लाइट ऑन करके रखेंगे तो एक ही सिंगल वोल्टेज में वो कंटीन्यूअस प्रकाश देती रहेगी। इट इज सेल्फ लुमिनस इट इज लुमिनोसिटी इटसेल्फ यह आत्म तत्व है। वह सेल्फ लुमिनस है। वह लुमिनोसिटी इटसेल्फ है। वो इलेक्ट्रिसिटी जनरेट करता है और वह खुद इलेक्ट्रिसिटी मय है। इट कैन नॉट देखिए वेरी पावरफुल पैसेज। इट कैन नॉट बी दैट द सोल नोस। ऐसा नहीं है कि आत्मन के आत्मन ज्ञान प्राप्त करता है या तो फिर आत्मन के पास में ज्ञान है। इट इज नॉलेज यानी कि आत्मन ज्ञान स्वरूप है। मैं मेरे में अज्ञान है। मैंने किताब पढ़कर के ज्ञान प्राप्त किया। किंतु वो मेरे लिए है। किंतु किताब तो ज्ञानमय स्वयं है। किताब के भीतर में ही ज्ञान ही किताब है। किताब का ही ज्ञान है। यानी कि ऐसा नहीं है कि आत्मन जानता है। आत्मन ज्ञानमय है। इट कैन नॉट बी दैट द सोल हैज़ एकिस्टेंस बट इट इज एग्जिस्टेंस। ऐसा नहीं है कि आत्मन का अस्तित्व है। आत्मन अस्तित्वमय है। इट कैन नॉट बी दैट द सोल इज हैप्पी। इट इज हैप्पीनेस इटसेल्फ। ऐसा नहीं है कि आत्मन खुशी होता है। आत्मन खुशी स्वयं है। दिस इज सच अ सल कांसेप्ट। सतचित आनंद। आत्मन का स्वभाव क्या है? यह आत्मन का स्वभाव नहीं है। आत्म सतचित आनंद ही आत्मन है। जिस जिसके भीतर में आनंद का अभाव है, वह एंटरटेनमेंट प्राप्त करने के लिए टेलीविजन मूवीज देखेगा। उसको मित्र मंडल की जरूरत पड़ेगी। जो किंतु जिसका स्वभाव ही आनंद है, वह जहां पे भी बैठा है, परमहंस की तरह भीतर में से हास्य प्रकट होता रहेगा। उसको फिर एंटरटेनमेंट के लिए जो रील्स चलता है आजकल मोबाइल्स के ऊपर में उसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। उसको फिर यह जो आंख वो उसकी फट जाए तब तक यह सोशल मीडिया देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। उसको बाहर से कहीं से एंटरटेनमेंट नहीं चाहिए होगा। वो एंटरटेनमेंट स्वरूप है। उसके भीतर में ही एंटरटेनमेंट है। तो देखिए कि सच अ पावरफुल कांसेप्ट इट कैन नॉट बी दैट द सोल नोस। इट इज नॉलेज। इट कैन नॉट बी दैट द सोल हैज़ एग्ज़िस्टेंस। इट इज़ एग्ज़िस्टेंस। इट कैन नॉट बी दैट द सोल इज़ हैप्पी। इट इज़ हैप्पीनेस इटसेल्फ। दैट व्हिच इज़ हैप्पी हैज़ बोरोड इट्स हैप्पीनेस। जो खुश है, उसने यह खुशी को कहीं बाहर से इंपोर्ट किया है। दैट व्हिच हैज़ नॉलेज हैज़ रिसीव्ड इट्स नॉलेज। जिसके पास में ज्ञान है, उसने कहीं से यह ज्ञान ग्रहण किया है। एंड दैट वि हैज़ रिलेटिव एग्जिस्टेंस हैज़ ओनली अ रिफ्लेक्टिव एग्जिस्टेंस। अर्थात कि जिसका कि अस्तित्व कम जा कम ज्यादा होता रहता है। ये जो चंद्र की कलाओं की तरह आज पूर्णिमा है कल अमावस्या है। उसने अपना अस्तित्व और कहीं से प्राप्त किया है। उसका जो प्रकाश है वो रिफ्लेक्टेड प्रकाश है। जैसे कि चांद का प्रकाश रिफ्लेक्टेड प्रकाश है। व्हेयरवर देयर आर क्वालिटीज़ दिस क्वालिटीज़ हैव बीन रिफ़्लेक्टेड अपॉन द सब्सटेंस। जहां-जहां भी यह गुण है, वह गुण जो है, वह और कहीं से इंपोर्ट किए गए हैं। बट द सोल हैज़ नॉट नॉलेज, एकिस्टेंस एंड ब्लेसडनेस एज इट्स क्वालिटीज। दे आर द एसेंस ऑफ द सोल। आत्मन जो है उसके लिए ज्ञान है। सत, चित आनंद। यह ज्ञान या तो फिर यह अस्तित्व या तो फिर यह आनंद यह उसके गुणधर्म नहीं है। यह सतचित आनंद ही आत्मन है। नॉलेज एग्जिस्टेंस एंड हैप्पीनेस यह आत्मन का स्वरूप ही है। आत्मन ही सतचित आनंद है। आत्मन के गुण नहीं है यह सब। तो इतना हमने देखा ऑलरेडी अभी तक लीला प्रसंग में। अभी इसके बाद का जो पॉइंट है शरद महाराज जो नया पॉइंट स्टार्ट करते हैं उसको अभी हम कल से देखना प्रारंभ करेंगे। आज यहीं तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ओम