मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा लिपिबद्ध श्री रामकृष्ण देव की प्रामाणिक जीवनी इसका द्वितीय भाग साधक भाव। इसका हम पाठ कर रहे हैं। प्रथम चैप्टर है जिसका कि नाम है साधक और साधना। देखिए इस चैप्टर का जो आखिरी पॉइंट है कि
विद्या का संसार और अविद्या का संसार
इति इति अर्थात कि भक्ति पथ से निर्विकल्प समाधि किस तरह से प्राप्त की जाती है। इसका एक विवरण और इसका जो सेंटेंस शरद महाराज का हम देख रहे थे। क्या लिखते हैं? शरद महाराज भक्त जगत और उसके भीतर में जो कुछ भी है सर्व वस्तु और व्यक्ति इसको ईश्वर के साथ में संबंध युक्त देख के अपना कर लेता है अपना लेता है ईश्वर जग इस जगत में चाहे पेड़ हो पौधे हो समुंदर हो यह समुंदर के किनारे की रेती हो ना कि मनुष्य हो मनुष्यों के भीतर में कोई चाहे वह इंडियन है, कोई है यूरोपियन है, कोई अमेरिकन है, कोई चाइनीस है, कोई क्या है? यह सबको ईश्वर के साथ में संबंध युक्त देखता है। सबके भीतर में ईश्वर का प्रकाश देखता है और उनको अपना कर लेता है। भक्त का हृदय विशाल हो जाता है। जगत में सभी के प्रति उसके मन में सहानुभूति प्रकट होती है। तो यह पॉइंट हम देख रहे थे। देखिए कल भी थोड़ा सा हमारा इसके बारे में डिस्कशन हुआ था। कुछ कुछ उदाहरण श्री रामकृष्ण के जीवन में से ही हमने देखे कि किस तरह से ठाकुर गए थे रामलीला देखने के लिए उसमें जिस अभिनेता और अभिनेत्रियों ने मां सीता भगवान राम विभीषण वगैरह का पात्र अभिनय किया था। ठाकुर कहते हैं कि उनको मैं साक्षात भगवान राम साक्षात मां सीता के रूप में देखकर के उनकी पूजा करने लगा। क्यों? जनरली क्या होता है? इस तरह के अभिनेता या अभिनेत्रियों के चरित्र के बारे में लोगों की धारणा अच्छी नहीं रहती। किंतु यहां पर देखिए कि ठाकुर ने यहां पर जैसे शरद महाराज ने कहा सबके भीतर में ईश्वर का प्रकाश देखना है। आप किसी को देखिए किसी के भी प्रति अपने मन में सहानुभूति प्रकट हो। किसी के भी मन में किसी के भी प्रति अपने मन में करुणा का उदय हो। उसके लिए यह आवश्यक है कि हम उनके भीतर में ईश्वर का प्रकाश देखें। देखिए मां भी अपने बच्चे को स्नेह करती है। अ हम भी अपने फ्रेंड्स के साथ में अच्छा सलूक करते हैं। अच्छा व्यवहार करते हैं। किंतु यह क्या है कि एक अपना लिमिटेड फ्रेंड एंड फैमिली सर्कल है। यहां पे यह जो मित्रता या तो यह जो सहृदयता या तो जो यह प्रेम है इसके पीछे में माया एक बहुत बड़ा कारण है। क्योंकि इनके साथ में हमारा सांसारिक संबंध है। किंतु देखिए ठाकुर जैसे कहते हैं एक तो है अविद्या का संसार और एक है विद्या का संसार। अविद्या के संसार में हमारी मित्रता, हमारा संबंध, हमारी करुणा, सह हृदयता, हमारे साथ में सांसारिक जिनका संबंध है वहीं तक सीमित रहेगी। जबकि ठाकुर जैसे कहते हैं दूसरा है विद्या का संसार। विद्या के संसार में हमारी करुणा, मित्रता, सह हृदयता इस संसार में सभी के प्रति धावित होगी। सभी के प्रति विस्तरित होगी। उस समय हम यह नहीं देखेंगे कि यह मेरा मित्र नहीं या तो यह मेरा रिलेटिव नहीं या तो यह अनजाना है या तो कोई यह स्ट्रेंजर है। उसके प्रति मैं क्यों करुणा रखूं? तो उस समय हम ऐसा नहीं सोचते। क्यों? क्योंकि हम सभी के भीतर में विद्या के संसार की बात सभी के भीतर में भक्त ईश्वर की ही एक-एक किरण का दर्शन करता है। सभी को वह ईश्वर के साथ में संबंध युक्त देखता है। देखिए अविद्या के संसार में हमारा जो संबंध है वह माया का संबंध है। अविद्या का संबंध है या तो कामना वासनाओं का संबंध है। जबकि विद्या के संसार में हमको पता है कि हमारा सबका संबंध ईश्वर के साथ में है। ईश्वर के साथ में संबंध है बोलकर के हम सभी लोग इकट्ठा हुए हैं। यह रामकृष्ण मिशन को ही आप देखिए। कोई बंगाली, कोई पंजाबी, कोई तेलुगु, कोई मलयाली, कोई साउथ ये आपका ये कहेंगे कि मराठी, कोई गुजराती तो और सिर्फ भारत ही नहीं यहां पर अमेरिकन भी है, ब्रिटिशर भी है, यह सब तरह के जो भक्त हैं त्यागी हो ना कि गृहस्थ रामकृष्ण संघ के साथ में जुड़े हुए हैं। तो क्यों जुड़े हैं? क्या हमारा आपस में कोई संबंध है? नहीं है। आपस में क्या कोई मित्रता है? नहीं है। यहां आने से पहले हम एक दूसरे को पहचानते तक नहीं थे। किंतु यहां पर आने के बाद में हमारा सबका आपस में एक भाईचारे का संबंध बना है। तो यह संबंध क्यों बना? क्योंकि हम सबका ठाकुर के साथ में संबंध है। हम सभी लोग ठाकुर मां स्वामी जी के भक्त हैं। ठाकुर मां स्वामी जी के साथ में हमने अपना संबंध बनाया है। बोलकर के हमारा आपस में संबंध बना है। यह अपना क्लास में ही देखिए कि आप लोग जो प्रतिदिन आते हैं तो इसलिए तो नहीं कि हम लोग सब आपस में एक दूसरे को पहचानते हैं। हम सभी लोग ठाकुर मां स्वामी जी को पहचानते हैं। ठाकुर मां स्वामी जी की वजह से हमारा यहां पे आना हुआ है। और फिर यहां पे आकर के हमने एक दूसरे को पहचानना शुरू किया है। तो हमारा जो फोकल पॉइंट है जो कॉमन थ्रेड है वह है ठाकुर मां स्वामी जी और ठाकुर मां स्वामी जी की वजह से ही हम सबका संबंध है। तो यहां पर भी देखिए कि वही ईश्वर इस तरह के अभिनेता या अभिनेत्री के भीतर में भी वही ईश्वर है। ऐसा ऐसा समझ करके ऐसा विश्वास करके और ऐसा प्रत्यक्ष दर्शन करके ठाकुर उनकी पूजा करने लगे। फिर एक हमने देखा कि किस तरह से बकुल तला अर्थात कि बकुल नाम के पेड़ के नीचे में गंगा के किनारे दक्षिणेश्वर काली मंदिर में ठाकुर ने देखा कि नील वस्त्र पहनी हुई एक स्त्री खड़ी है जो कि प्रॉस्टिट्यूट है जिसका चरित्र अच्छा नहीं है। उसको देखकर के ही ठाकुर को मां सीता का उद्दीपन हो गया। देखिए कहां यह स्त्री नील वस्त्र पहनी हुई। कहां उसका चरित्र और कहां मां सीता स्वामी जी ने जैसे कहा हमेशा हमेशा के लिए मां सीता का चरित्र भारत में अमर हो गया है। जब तक पांच भारतवासी भी बचेंगे। जब तक वह भले ही चाहे कितना ही सांस्कृतिक तरह से सांस्कृतिक गतिविधि के बिल्कुल अधः पतन तक पहुंच गए होंगे। उसके बावजूद मां सीता का चरित्र उनकी जुबान पे अमर रहेगा। तो यह देखिए कहां पवित्रता स्वरूपणी मां सीता स्वयं और कहां यह नील वस्त्र पहनी यह स्त्री। इसके बावजूद ठाकुर सबके भीतर में वही ईश्वर या ईश्वरी का ही दर्शन करते हैं। वही नारायण या वही नारायणी का ही दर्शन करते हैं। बोलकर के स्त्री को देखकर के ठाकुर के मन में एकाएक मां सीता का उद्दीपन हुआ। तो इतना हमने देखा। इसके बाद में हम देख रहे थे कि किस तरह से ठाकुर कहते हैं कि गिरीश घोष ने ठाकुर को स्टार थिएटर में चैतन्य चरित्र का चैतन्य लीला का अभिनय देखने के लिए आमंत्रण किया है। ठाकुर जाने वाले हैं। यह सब डिस्कशन हो रहा है और वहां पर किसी भक्त ने आपत्ति उठा के थोड़ा सा विरोध करके कहा कि वहां पर जो स्त्रियां अभिनय करती है चैतन्य देव का पात्र भी एक स्त्री वो अभिनय करने वाली है और यह सब स्त्रियों का चरित्र अच्छा नहीं है। तो फिर ठाकुर ने साथ-साथ में ही कहा आमी मैं उनको मां आनंदमई देखूंगा। अर्थात देखिए इस तरह की स्त्रियां उसके भीतर में भी ठाकुर जिनकी आराधना करते थे मां काली मां जगदंबा मां आनंदमई जिनकी ठाकुर मंदिर में आराधना करते थे वही मां आनंदमई को मां जगदंबा मां काली को ठाकुर इन सब स्त्रियों के भीतर में देखेंगे और फिर क्या कहते हैं वे लोग यदि चैतन्य देव का अभिनय करती है तो करने ही दो। उसमें बुरा क्या है? यदि आप यह नकली सीताफल देखेंगे तो असली सीताफल का ही उद्दीपन होगा। यह कल भी हमने देखा था कि बहुत बार खास करके पहले के समय में आजकल तो पता नहीं नकली फल होते हैं। वैक्स के बनाए हुए ना कि इस तरह से कोर्क ना ऐसा कोई मटेरियल के बनाए हुए। तो वह डाइनिंग टेबल पर रखते हैं वह ग्लास के पात्र में ना ऐसा करके कि जिसको देखकर के मुंह में पानी आए। एपेटाइजर का काम करें या डेकोरेशन का काम करें। तो इस तरह का नकली सीताफल आप देखेंगे वैक्स का बनाया हुआ ना कि ऐसा कुछ तो उसको देखकर के असली सीताफल का ही उद्दीपन होगा। तो वैसे ही भले ही चाहे इस तरह की स्त्रियां चैतन्य देव का अभिनय करती हो पात्र का उनको देखकर के असली चैतन्य देव का ही उद्दीपन होगा और फिर ठाकुर इसके बारे में उदाहरण देते हैं कि किस तरह से यह जो एसोसिएशन लॉ ऑफ एसोसिएशन या तो फिर यह उद्दीपन का यह जो सिद्धांत है किस तरह से कार्य करता है। तो इस तरह के एक उदाहरण में ठाकुर कहते हैं कि एक भक्त है रास्ते में जा रहा था। बबूल के पेड़ देखे। पेड़ देख के ही भाव से विहवल हो गया। क्यों? यह सोच के कि यही बबूल के पेड़ को काट करके लकड़ी इकट्ठा की जाएगी। यही लकड़ी यह जो कोदाल है उसका ह्थ बनाने में यूज़ होगी। उसका जो हैंडल है वह उस इस लकड़ी से बनेगा और फिर वही कोदाल से श्याम सुंदर का बागान जो है उनमें वो बागान में अच्छे से वह मिट्टी को काट पाएंगे। पेड़ पौधे फल फूल आप रोप पाएंगे। तो जैसे ही यह पूरा लॉ ऑफ एसोसिएशन इस भक्त के मन में फटाफट फटाफट करके काम कर रहा है और जैसे ही बबूल का पेड़ देखा वह भाव से विफल हो गया और कल हमने यह भी देखा कि किस तरह से यह पॉजिटिव एसोसिएशन काम करता है वैसे ही सांसारिक एसोसिएशन भी काम करता है। ठाकुर ने जब यह सुना यह जो बछड़ा लेकर के यह हृदय ठाकुर का भांजा ठाकुर का सेवक हृदय वह एक बछड़ा लेकर के आया ठाकुर के सामने तो ठाकुर ने कहा इसका क्या करोगे तो वह कहता है हृदय कहता है यह बड़ा मैं उसको सिहोड़ ले जाऊंगा सिहोड़ है हृदय का एनसेेस्ट्रल विलेज उसका गांव तो मैं उसको सिहोड़ ले जाऊंगा यह बछड़ा बड़ा होगा बेल बनेगा तब यह खेत में हल जोतेगा तो जैसा ही हृदय ने ऐसा कहा ठाकुर को चक्कर आ गया और वह गिर गए। यह सोच के एक सांसारिक मनुष्य कितना लंबा लंबा कैलकुलेशन करता है। तो यह लॉ ऑफ एसोसिएशन जैसे इस तरह से काम करता है तो इस तरह से भी काम करता है। तो इतना हमने देखा। इसके बाद में ठाकुर यह जो उपमा है,
त्रिभंग मुद्रा में खड़े अंग्रेज बालक को देख समाधि में लीन श्रीरामकृष्ण
उपमा और भी आगे बढ़ाते हैं। कहते हैं कि एक बार में मैदान में यह जो वहां पर एक फोर्ट था। अभी मुझे पता नहीं कौन सा फोर्ट ब्रिटिश लोगों के समय का एक फोर्ट या तो फिर एक किला होगा। तो यह किला जो है तो वहां पे उसके सामने एक बहुत बड़ा मैदान था। तो इस मैदान में यह बलून उस समय उड़ा रहे थे। यह जो बलून वगैरह यह टेक्नोलॉजिकल एडवांस इतना तो हो चुका था। तो यह ठाकुर को बलून देखने के लिए ले गए। तो ठाकुर बलून देखने के लिए गए तो वहां पर अभी यह तो बलून वगैरह का शोक तो ज्यादातर गोरे लोगों को ही होने वाला है। तो वहां पर गोरे लोग भी थे। तो ठाकुर ने देखा यही गोरे अर्थात कि ब्रिटिशर ये ब्रिटिशर का एक लड़का एक ब्रिटिश लड़का यंग उम्र में तो एक अ पेड़ के सहारे पेड़ पे पेड़ के सहारे वो खड़ा था वो त्रिभंग होकर के अर्थात कि त्रिभंग मुद्रा तो पता है भगवान कृष्ण की किस तरह से है तो वही पेड़ की मुद्रा में यह ब्रिटिश लड़का एक पेड़ के सहारे खड़ा था। तो जैसे ही ठाकुर कहते हैं कि मैंने उसको देखा साथ में ही मुझे कृष्ण का उद्दीपन हुआ और साथ में ही मैं समाधस्थ हो गया। देखिए कहां यह ब्रिटिश लोग भारत को लूटने के लिए आए हैं। भारत का शोषण कर रहे हैं। ब्रिटिश लोगों की पॉलिसी की वजह से भारत में जो अकाल आए हैं बार-बार उससे करोड़ों-करोड़ों भारतवासियों का मृत्यु हुआ है। इसके बावजूद अब यह ठाकुर यह नहीं देख रहे हैं कि यह हमारे हमारे शोषण करता है। यह हमारे पे अत्याचार करने को आए हैं। वगैरह नहीं देखकर के जैसे ही त्रिभंग मुद्रा में इस ब्रिटिश लड़के को खड़ा देखा ठाकुर को भगवान कृष्ण का उद्दीपन हो गया। भगवान कृष्ण का स्थान कहां भारत के इतिहास में और कहां यह ब्रिटिश लोगों का स्थान। इसके बावजूद यह देखिए कि ठाकुर के मन में यह लॉ ऑफ एसोसिएशन किस तरह से कार्य करता है। इसके बाद में और एक उदाहरण ठाकुर देते हैं कि श्रीमती राधा रानी जब मेघ या मयूर का कंठ देखती थी तो वह स्थिर नहीं रह पाती थी। श्री कृष्ण का उद्दीपन होकर के संपूर्ण रूप से बाह्य शून्य हो जाती थी। बाह्य ज्ञान शून्य हो जाती थी। देखिए श्रीमती राधा रानी उनका तो भगवान कृष्ण के साथ में जो संबंध है मधुर भाव का वह तो जग जाहिर है और भगवान कृष्ण का श्याम वर्ण था। तो अभी श्याम वर्ण किसका होता है? प्रकृति में आप देखेंगे तो यह जो वर्षा के जो मेघ जो होते हैं वर्षा ऋतु में जो मेघ छा जाते हैं आकाश में उसका श्याम वर्ण होता है और जो मयूर है मयूर का जो कंठ है उसका श्याम वर्ण है। तो यदि श्रीमती राधा रानी यह मेघ का दर्शन करती या तो फिर मयूर के कंठ का दर्शन करती तो साथ-साथ में ही भगवान कृष्ण का रंग भी वर्ण यह इसी तरह का रंग है। यह उद्दीपना होती और वह बाह्य ज्ञान शून्य हो जाती अर्थात कि समाधि मग्न हो जाती। देखिए यह यदि इस संसार में जो कोई भी व्यक्ति है जो कोई भी चीज है उसको यदि हमको अपना कर लेना है तो सबके भीतर में हमको ईश्वर का प्रकाश देखना होगा। दो ही तरह से संबंध बनते हैं। एक तो है कि माया का संबंध है कि हां यह मेरा भाई है ना कि यह मेरा भतीजा है ना कि यह मेरा मित्र है ना कि यह मेरा पड़ोसी है। यह सब माया के संबंध है। इनके प्रति हमारी सहानुभूति सहज है। किंतु जो बगल वाले देश सोसाइटी में रहते हैं या तो फिर वह दूसरे राज्य में रहते हैं या तो दूसरे देश में रहते हैं। या तो जो हमारे दुश्मन है इवन जो हमारे दुश्मन है जैसे कि यह ब्रिटिश लोग हैं। वह ब्रिटिश का लड़का देख के ठाकुर को जिस तरह से समाधि हुई जो कि हमारे दुश्मन भी है। किंतु इन सबको देखकर के यदि हमारे मन में करुणा का उदय होना है तो एक ही उपाय है कि इन सबके भीतर में ईश्वर की एक-एक किरण का दर्शन करना होगा। ईश्वर के साथ में इनको संबंध युक्त देखना होगा। यह बात सही है कि यह थोड़ा सा मुश्किल है। कल भी हमारा डिस्कशन हुआ था कि इस तरह से इतना आसानी से हम दूसरों के भीतर में ईश्वर दर्शन कैसे करें? इतना आसानी से दूसरों के प्रति सहानुभूति कैसे प्रकट करें? क्योंकि इस तरह की सहानुभूति प्रकट करने से पहले उस व्यक्ति के साथ में हमारा अच्छा रिलेशन तो होना ही चाहिए या तो फिर एटलीस्ट रिलेशन नहीं होना चाहिए। चलो आप रास्ते में जा रहे हैं। वह ट्रैफिक का सिग्नल आपने देखा रेड लाइट हुई है तो आप रेड लाइट पर खड़े हैं। तो अभी आपके स्कूटर पर खड़ बैठे हैं। आपके बगल वाला कोई दूसरा एक स्कूटर पर बैठा है। उसके बगल में कोई कार में बैठा है। उसके बगल में कोई रिक्शा में बैठा है। अभी यह लोग तो संपूर्ण स्ट्रेंजर्स है आपके लिए। संपूर्ण रूप से अननोन है। आप ना ही वह रिक्शा में कौन बैठा है उसको पहचानते। ना ही यह गाड़ी में कौन बैठा उसको पहचानते हैं। तो इन लोगों के प्रति सहानुभूति होना फिर भी सहज है। कहा अच्छा चलो सबके प्रति सहानुभूति है। किंतु जो अपना दुश्मन है जिसने हमारा अहित किया है जो कि हमारा अहित चाहता है जिसने हमारा अकल्याण किया है। उसके प्रति किस तरह से मन में सहानुभूति रखें? तो यह एक बड़ा ही सीरियस प्रश्न है। इस प्रश्न का उत्तर भी कल हमने थोड़ा सा डिस्कस किया था। देखिए आध्यात्मिक रास्ते पर आगे बढ़ना है तो यह सीरियस क्वेश्चन को हमको रिजॉल्व करना होगा। हमको अपने मन को मनाना होगा कि देखिए इस रास्ते के अंत में जो प्राइस है जो हमारे हाथ में जो मिलने वाला है वह है आत्मज्ञान या तो ब्रह्म साक्षात्कार। तो यदि इतना बड़ा प्राइस हमको मिलने वाला है तो उसके लिए जो मेरा जो पेटीजेलसी है या रिजेंटमेंट है ना कि एनमिटी है लज्जा ये जो काम क्रोध मद लोभ मोह यह सब चीजों से मैं क्यों अपने मन को इन सब चीजों के वश में मैं क्यों आ जाऊंगा मेरा इस व्यक्ति पर क्रोध है मेरा इस व्यक्ति पर ईर्ष्या है मेरा इस व्यक्ति के ऊपर में रिजेंटमेंट है मेरा इस व्यक्ति के ऊपर में द्वेष है। इसको मैं ईश्वर के साथ में संबंध युक्त नहीं कर पाऊंगा। जगत में बाकी आप जितने को बोलिए सबको मैं ईश्वर के साथ में संबंध युक्त कर लूंगा। ये जगत में 7 बिलियन ना कि कितना पॉपुलेशन है? 700 करोड़ का 800 करोड़ का लेटेस्ट फिगर क्या है? ये 700 करोड़ 800 करोड़ को ईश्वर के साथ में संबंध युक्त मान लेना हमारे लिए बिल्कुल मुश्किल नहीं है। थोड़ा सा भी प्रॉब्लममेटिक नहीं है। मान लिया चलो किंतु यह जो चार लोग हैं जिन्होंने मेरा अहित किया है इनको मैं ईश्वर के साथ में संबंध युक्त नहीं मान पाऊंगा। इनके प्रति मेरे मन में सहानुभूति नहीं होगी। तो देखिए कि यह जो 700 करोड़ की पपुलेशन को उसके प्रति हमारी सहानुभूति हो सकती है क्योंकि हम उनको नहीं पहचानते और हमारा इनके साथ में कोई इंटरेक्शन भी कभी नहीं होने वाला। किंतु यह जो सात लोग हैं जिनके साथ में मेरा भूतकाल में इंटरेक्शन हुआ है जिनके साथ में मेरा भूतकाल में वार्तालाप हुआ है और मैं अपने को कंविंस कर दिया है मैंने कि यह सात लोग मेरा अहित चाहते हैं तो उन सात लोगों के प्रति मेरा सहानुभूति कभी प्रकट नहीं होगा। तो हम कभी ऐसा सोचे कि अच्छा 700 करोड़ को मैंने ईश्वर के साथ में संबंध युक्त देख लिया। बस ये सात लोगों को छोड़कर के तो फर्क क्या पड़ने वाला है? सात को छोड़ा है, 700 करोड़ को अपनाया है। किंतु देखिए वही सात लोग हमको ले डूबेंगे। यदि ये माने संस्कार का गठन करने की बात आई तो ये सात लोगों के प्रति अपना विद्वेष है। वो इतना तीव्र हो जाएगा कि यह 700 करोड़ों के प्रति जो अपनी सहानुभूति है वह भी उसके सामने छोटी पड़ जाएगी। तो देखिए कि मनुष्य का मन इसी तरह से कार्य करता है। विध्वेष की जो भावना है वह बड़ी ही स्ट्रांग होती है। आप 10 लोगों का कल्याण कीजिए। किंतु यह कल्याण से जो हमारा शुभ संस्कार बनता है। कल्याण से जो हमारा पुण्य अर्जन होता है। ये एक व्यक्ति के प्रति विद्वेष रखा तो वह सब जो पुण्य अर्जन किया है सब मिट्टी में मिल जाएगा। सब कट जाएगा। इसीलिए यह जो मेरे दुश्मन भी है उनके प्रति सहानुभूति रखना बड़ा ही आवश्यक है। और जैसे कल भी डिस्कस हुआ हमारा कि यह तो बड़ा ही डिफिकल्ट है। कैसे करें? तो सबसे पहले तो है अपने मन को मनाना है कि देखो मेरे पास में यह लग्जरी है कि उसको मन में ही मन में कोसते रहना। मन में ही मन में गाली देते रहना। यह लग्जरी है मेरे पास में। और यह लग्जरी का मैं बेनिफिट उठा के जीवन भर उसको गाली भी देता रहूंगा। किंतु अल्टीमेटली इससे मेरा आध्यात्मिक अकल्याण ही होगा। आध्यात्मिक जीवन में मेरी उत्तरोत्तर अधोगति होती जाएगी। दिन प्रतिदिन मैं गहरे से गहरे गड्ढे में गिरता जाऊंगा। यदि मैंने यह लग्जरी का पोषण किया। यदि मेरे मन में मैंने यह विध्वेष को स्थान दे दिया। यह जैसे वो गार्डन जो लोग गार्डनिंग करते होंगे, खेती करते होंगे तो उनको पता होगा कि यह जो ये होता है ना विड्स अच्छा सा आपका लोन है। इस लोन के भीतर में थोड़े से विड्स जो है अर्थात कि यह अहितकारी यह जो पौधे हैं उसको आपने उगने दिया। उसको आपने पनपने दिया। तो होगा क्या? कुछ ही समय के बाद में यह विड्स जो है ना पूरे गार्डन को खा जाएंगे। पूरे गार्डन में यह विड्स ही फैल जाएंगे। फिर आपको यह पेस्टिसाइड यह सब डाल के यह विड्स को हटाना होगा। जितने भी अच्छे-अच्छे पौधे हैं, प्लांट है, उन सबको यह खा जाएंगे और जितना भी जमीन में आप खाद डालते हैं, यह फर्टिलाइजर डालते हैं, वह सब फर्टिलाइजर यह विड्स ही खा जाएंगे। और फिर और किसी भी पौधे को वहां पर पनपने नहीं देंगे। तो यह विद्वेष जो है एक बार अपने हृदय में अपने मूल जो है अपने रूट्स जो जमा देता है फिर यह जो रूट्स जो है वह गहराई में जाते ही जाएंगे जाते ही जाएंगे और अपना जो भाव है, अपना जो पुण्य है, अपनी जो आध्यात्मिकता है, सबको खा जाएंगे और और किसी चीज के लिए स्थान नहीं रहेगा। अपना हृदय जो है डेजर्ट बन जाएगा। मरुभूमि बन जाएगा। वहां पर सिर्फ कांटे ही पनपेंगे। तो यह विद्वेष एक बार हृदय में प्रवेश किया तो अपना आध्यात्मिक लाइफ को चौपट करके रख देगा। इसलिए उससे तो छुटकारा पाना ही पाना है। यह जो अपना दुश्मन है, अपना अहित जिसने किया है, हमारे प्रति जो वेद द्वेष भाव रखता है, उसके प्रति सहानुभूति हमको अपने हृदय में प्रकट करनी ही होगी। देयर इज नो अल्टरनेट। यह अपने को आपको कैसे भी करके कन्विंस करना है। यदि कन्विंस ना भी हो पाए तो भी आपको मेहनत तो करनी ही है। देखिए यह एक बात है। मैं दूसरा भी एक प्रश्न इसके साथ में एसोसिएटेड है कि यदि कोई अपना अहित करने को आए तो क्या हमको अपना अहित होने देना है? नहीं। यह भी जरूरत नहीं है। यह जो क्फ्लिक्ट भारत में जो प्रकट हुआ कि दुश्मनों के प्रति सहानुभूति रखना एट द सेम टाइम दुश्मनों के द्वारा मार खा ले मार ना खा लेना। यह दोनों चीजें जो है ये ये एक साथ में मिलकर के ऐसा हमको कंफ्यूज कर देती है कि फिर जब दुश्मन सही में आ गए तो हम लोग अपना आत्मरक्षा भी ना कर पाए। इसीलिए गीता में क्या कहा है? भगवान कृष्ण ने माम अनुस्मरश्च युद्धस तुम मेरा स्मरण करो जो कोई भी कर्म कर करते हो सब मुझे समर्पित करके तुम युद्ध करो तो देखिए एक और हिंदू या हिंदू धर्म हमको यह कहता है कि इवन दुश्मनों के प्रति भी सहानुभूति रखनी है और दूसरी ओर यह भी कहता है कि हमारा अहित करने के लिए जो आता है उसके उसके हाथ काट देने हैं। यह जो अपेरेंटली कंट्राडिक्टरी मैसेज है वह है श्रीमद्भगवत गीता का हार। यह जो हिंदू धर्म का जो हार्ट है वह यही मैसेज है कि किसी के प्रति विद्वेष नहीं रखना। एक चीज और दूसरा कि यदि कोई हमारे पर हमला करने को आए तो उसका हाथ काट देना। यह दोनों चीजें साथ-साथ में रहनी चाहिए। यह कॉम्प्लेक्सिटी अपने विचारों की, अपनी फिलॉसोफी की होनी ही चाहिए कि मैं सामने से जाकर के किसी का अहित नहीं करूंगा। एक चीज किंतु यदि कोई मेरा मेरे परिवार जनों का मेरे देश बांधवों का अहित करने को आता है तो मैं उसकी अच्छे से पिटाई करूंगा। डट करके उसका सामना करूंगा। मुंह तोड़ जवाब दूंगा। यह दोनों कासेप्ट एक साथ में रहने चाहिए और इसके लिए ना देखिए अपना एक विनिंग एटीट्यूड होना चाहिए। हमारा एक सेल्फ इमेज क्या है? वह बहुत हद तक हेल्प करता है हमको। बहुत बार लोग घमंड में आकर के रहते हैं कि यह मेरे पास में इतना पैसा है, मेरे पास में इतना सोशल प्रेस्टीज है, मेरे पास में यह है, वो है। तो यह लोगों का घमंड जो है ना वह घमंड में आकर रहते हैं। इसको कहते हैं सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स। जिनके भीतर में सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स है। इनका दूसरों के प्रति बहुत ही निम्न कक्षा का ओपिनियन रहता है। दूसरों को बड़ी ही वे लोग निम्न दृष्टि से देखते हैं। तो यह हो गया सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स। दूसरा आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करेंगे तो हमको लगता है अहंकार को मार देना है। तो साथ-साथ में ही हमारे भीतर में यह इनफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स आ जाता है। दीनहीन भावना आ जाती है। जैसे ही दीनहीन भावना आई साथ में ही हम लोग किसी भी काम के रहते नहीं है। और इसीलिए ना ही चाहिए यह सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स, ना ही चाहिए यह इंफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स, ना ही चाहिए घमंड, ना ही चाहिए यह दीन हीन भाव। क्या चाहिए हमको? आत्मश्रद्धा। आत्मश्रद्धा अर्थात कि मुझे अपने पर पूरा विश्वास है। एट द सेम टाइम दूसरों के प्रति ना ही मेरी घृणा है ना ही दूसरों के प्रति विद्वेष है। ना ही मैं दूसरों को निम्न दृष्टि से देखता हूं। तो यह आत्मश्रद्धा सेल्फ इमेज अपना क्या है? वह भी इसमें एक बड़ा फैक्टर है। तो यह पूरा इसका डिस्कशन। इसके बाद में शरद महाराज और एक बड़ा ही
ईश्वरप्राप्ति के मार्ग में बाधा स्वरूप होने वाले गुरुजनों की आज्ञा का उल्लंघन करना चाहिए
इंपॉर्टेंट स्टेटमेंट देते हैं। क्या कहते हैं? ओ संबंध दर्शन करब पथे जहां अंतराय बोलिया प्रतीति होय ता के त दूर परिहार करें इस संबंध को दर्शन करने के रास्ते में कौन सा संबंध दर्शन करने के रास्ते में जगत में जो कुछ भी है कोई भी वस्तु या कोई भी व्यक्ति है इसको ईश्वर के साथ में संबंध युक्त करके के भक्त देखता है और सभी को अपना कर लेता है। तो यह जो ईश्वर के साथ में संबंध बनाना है जगत में सभी व्यक्तियों का सभी वस्तुओं का इस रास्ते में इस पथ में इस संबंध दर्शन करने के पथ में जो लोग अंतराय बोलकर के भक्त को प्रतीत होता है उनको वह भक्त दूर परिहार करता है। अर्थात कि मैं देखना चाहता हूं कि इस जगत में सब कुछ ईश्वर के माध्यम से ही बना है। सभी व्यक्तियों का ईश्वर के साथ में ही रिलेशन है। सभी व्यक्तियों के हृदय में वही ब्रह्म विराजमान है। यह मैं दर्शन करना चाहता हूं, अनुभूति करना चाहता हूं, विश्वास करना चाहता हूं, देखना चाहता हूं। किंतु मेरा इस यह जो मेरा जर्नी है इस जर्नी में इस मार्ग में यदि कोई रुकावट बनकर के आन खड़ा होता है तो भक्त उसको दूर कर देता है। कोई भी यदि आकर के ऐसा कहे आज देखिए यदि मैं चाहता हूं कि ईश्वर जो है अब जैसे देखिए मीराबाई का ही उदाहरण मीराबाई थी कि भगवान कृष्ण को अपना पति मानती थी। अभी उसके खुद के पति ने उसको जहर देने का प्रयास किया। तो क्या है कि देखिए मीराबाई ने उसको अपने मन से ही दूर कर दिया था। पति तो है भगवान कृष्ण नहीं कि वह राजा तो भगवान कृष्ण को पति मानने के रास्ते में जो कोई भी बाधा या अंतराय आता है उसको दूर कर देना है। देखिए एक बड़ा ही सुंदर एक वार्तालाप सुंदर तो नहीं कह के एक इफेक्टिव वार्तालाप हमको कथामृत में देखने को मिलता है। एक भक्त ठाकुर को ठाकुर इसी तरह से सब बातें करते थे कर रहे थे। उस समय एक भक्त ने ठाकुर को पूछा कि अच्छा यदि किसी की मां यह कहती है कि तुम दक्षिणेश्वर में मत जाना और यदि कहे कहती है कि यदि तुम दक्षिणेश्वर में जाओगे तो मैं आत्महत्या कर लूंगी। तो मुझे क्या करना चाहिए? देखिए यहां पर कॉन्टेक्स्ट क्या है? ठाकुर के पास में तारक आया हुआ है। तारक अर्थात कि भविष्य के स्वामी शिवनंद महापुरुष महाराज तो महापुरुष महाराज उस समय युवक थे। तारक था उनका नाम ठाकुर के पास में आए हैं। ठाकुर उनको उपदेश दे रहे हैं कि जगत में जो कुछ भी है विषयों की वस्तुएं सबका त्याग करना है। काम कांचन का त्याग करना है और संपूर्ण रूप से ईश्वर को निष्ठावान होकर के रहना है। वगैरह वगैरह ठाकुर तारक को समझा रहे थे। तो उस समय यह वार्तालाप यह भक्त ने सुन लिया और भक्त यह प्रश्न करता है कि मेरी मां अभी मेरी मां ऐसा करके तो नहीं कहा इनडायरेक्टली प्रश्न किया कि किसी की मां ऐसा कहती है कि तुम दक्षिणेश्वर मत जाना। वह जो दक्षिणेश्वर का पगला परमहंस है। कितने लोगों का ब्रेन वाश कर दिया है। तुम वहां पर जाओगे तो मैं आत्महत्या करूंगी। तो हमको क्या करना चाहिए? ऐसा प्रश्न यह भक्त कहता है और देखिए यह प्रश्न करने के पीछे क्या बात है कि वही शरद महाराज का कि ईश्वर साक्षात्कार सभी मनुष्य के भीतर में हो यह रास्ते पर यदि कोई अंतराय बनता है तो उसको दूर कर देना है। इसी परिप्रेक्ष्य में यह प्रश्न हुआ और भगवान रामकृष्ण उसका उत्तर देते हैं। क्या कहते हैं? जो मां यह बात करती है वह मां नहीं है। वह अविद्या रूपणी है। उस मां की बात ना सुनने से कोई दोष नहीं है। देखिए कितना स्ट्रांग स्टेटमेंट ठाकुर ने दे दिया। जनरली ठाकुर अपनी खुद की मां चंद्रामणि देवी के प्रति इतने श्रद्धावान थे। जब तोतापुरी से सन्यास लेने की बारी आई तो ठाकुर तोतापुरी को कहते हैं कि मैं सन्यास तो ग्रहण करूंगा। किंतु सन्यास के जो बाह्य चिन्ह है गिरवा वस्त्र वो मैं पहनूंगा नहीं। क्यों? क्योंकि नहबत में मेरी बूढ़ी मां रहती है। वह यदि मुझे सन्यासी के वेश में देखेगी तो बेचारी को बड़ा कष्ट होगा। तो तोतापुरी ने भी हां बोल दिया। अच्छा ठीक है। भले चाहे तुम गिरवा वस्त्र धारण ना करो। हृदय में से तो तुम सन्यासी हो गए हो और सन्यासी जनोचित सन्यासियों के लिए उचित जो साधना है वह तो तुम कर ही रहे हो। बोल के तोतापुरी ने परमिशन दे दी थी। तो यहां पे मामला क्या है? बात क्या था कि ठाकुर का अपनी मां के प्रति श्रद्धा और इन जनरल जितनी भी स्त्रियां थी उनके प्रति ठाकुर की तो बड़ी ही श्रद्धा थी ही थी। इसके बावजूद ठाकुर इतना स्ट्रांग स्टेटमेंट देते हैं कि जो मां ईश्वर प्राप्ति के रास्ते में विघ्न देती है उस मां की बात ना सुनने से कोई दोष नहीं है। यह मां है अविद्या रूपणी और इसके बाद में ठाकुर एक के बाद एक उदाहरण देना शुरू करते हैं। क्या कहते हैं? ईश्वर प्राप्ति के लिए यदि गुरुजनों की बात ना भी सुने उनका वाक्य उल्लंघन भी करें तो भी इसमें कोई दोष नहीं है। भरत ने राम के लिए कैकई की बात सुनी नहीं। गोपियों ने कृष्ण दर्शन के लिए अपने पतियों की बात बाधा जो है पतियों ने जो मना किया है वह भी सुना नहीं। प्रहलाद ईश्वर के लिए अपने पिताजी की बात सुनते नहीं। बलि है भगवान की प्रीति के लिए गुरु शुक्राचार्य की बात को अमान्य कर लेते हैं। विभीषण राम को प्राप्त करने के लिए जष्ठ भ्राता रावण की बात को अनसुना करते हैं। तो देखिए कि यह जितने भी अपने पुराणों के उदाहरण है सबको देकर के ठाकुर कहते हैं कि ईश्वर प्राप्ति का रास्ता जो है वह सर्वोच्च रास्ता है और इस रास्ते में अपनी संस्कृति के अनुसार हम जिनको पूज्यग कहते हैं। मां पिताजी ज्यष्ठ भ्राता गुरु इन सब की भी बात को आप अमान्य कर सकते हैं। यदि आप ईश्वर प्राप्ति के लिए ईश्वर साधना के लिए आप यह सब कर रहे हैं। किंतु साथ-साथ में ठाकुर यह वार्निंग भी देते हैं कि इस तरह का लोगों की बात ना सुनना यह कहीं हैबिट ना पड़ जाए। क्योंकि अपनी संस्कृति तो यही कहती है गुरुजनों की बड़ों की बात सुननी चाहिए। आज्ञा का पालन करना चाहिए। तो यह तो अपनी संस्कृति कहती है। तो ठाकुर इसमें एक एक्सेप्शन करवाते हैं। ईश्वर प्राप्ति के रास्ते में यदि कोई बाधा स्वरूप होते हैं तो उनकी बात नहीं सुननी। अदर वाइज बाद में ही ठाकुर यह वार्निंग साथ में ऐड कर देते हैं। किंतु ईश्वर के पथ में आगे मत बढ़ो। यह बात छोड़कर के और जो कुछ भी यह गुरुजन कहते हैं वह सब बातें अवश्य सुननी है। तो देखिए ठाकुर के खुद के जीवन में यही हुआ। वो झामापुकुर में थे। बड़े भाई उनके रामकुमार उनको गांव से लाए थे। राम अभी क्या है कि घर का पूरा जिम्मा तो ठाकुर के बड़े भाई रामकुमार के ही कंधे पर था। क्योंकि ठाकुर के पिताजी खुद हीराम का तो देहांत हो चुका था। तो यह रामकुमार कोलकाता आकर के ये जो लोगों के घर जाकर के पूजा वगैरह किया करते थे। तो देखा कि अभी वृद्ध भी हो रहे हैं। उनका स्वास्थ्य भी बिगड़ रहा है। अपने से ज्यादा होगा नहीं तो यह छोटे भाई है रामकृष्ण गदाधर। उसको ले आया जाए कोलकाता में कोलकाता में और इसके पास में काम करवाया जाए। तो ऐसा बोलकर के सोच के गदाधर को बालक युवक किशोर किशोर रामकृष्ण को वो रामकुमार ले तो आए किंतु देखा कि मैं गदाधर श्री रामकृष्ण का बचपन का नाम गदाधर किशोर अवस्था का तो रामकुमार देखते हैं कि गदाधर का वैसे कोई ये सब चीजों में कोई मन ही नहीं है कि किस तरह से ज्यादा पैसे अर्जन किया जाए। किस तरह से सांसारिक उन्नति की जाए। किस तरह से यह घर का ख्याल रखना चाहिए। वह सब चीजों में गदाधर का मन जाता ही नहीं है। सब समय ईश्वर के भाव में रहता है। तो फिर रामकुमार एक बार गदाधर को डांटता भी है कि अरे तुम इस तरह से सब करोगे तो घर कैसे चलेगा? संसार कैसे चलेगा? तो गदाधर साथ-साथ में ही उत्तर देता है कि चाल कोला बधा चाल कोला बांधा विद्या आमी शिखवना अर्थात कि यदि यह पूजा वगैरह का कार्य जो सिखा रहे थे रामकुमार अपने छोटे भाई को यह कार्य किस तरह का है? चाल और कोला चाल अर्थात कि चावल कोला अर्थात कि केला तो यह चावल और केला अर्थात कि यह जो सीधा यानी जो भिक्षा प्राप्त होती है ब्राह्मण को पूजा करने के बाद में यह जो दक्षिणा प्राप्त होती है तो यह दक्षिणा प्राप्त करने वाली विद्या मुझे नहीं सीखनी है। मुझे तो सिर्फ ईश्वर प्राप्ति करवाए वही विद्या सीखनी है। एक जगह पर ठाकुर कहते हैं शाला से चालाकी चालाकी अर्थात कि जो ईश्वर प्राप्ति करवाए वही चालाकी असली चालाकी है अर्थात कि वही विद्या असली विद्या है। बाकी सब अविद्या है। तो ठाकुर का कांसेप्ट बड़ा क्लियर था। वो किशोर अवस्था से ही युवा बालक अवस्था से ही कि मुझे ईश्वर प्राप्ति ही करनी है। इसके अलावा इस जगत में और बाकी सब सेकेंडरी है। तो देखिए कि बड़े भाई ज्यष्ठ भ्राता रामकुमार इनके प्रति भी ठाकुर का इतना स्नेह था, इतनी श्रद्धा थी। इसके बावजूद उन्होंने बड़े भाई की बात नहीं स्वीकार की। और यहां पर रामकुमार के मन में भी थोड़ा सा गिल्ट फीलिंग हुआ कि देखिए अपनी खुद की सुविधा के लिए यह किशोर गदाधर को वह गांव से ले आए हैं। कहां वह बेचारा गांव में अपनी मां के साथ में खुशी-खुशी रहता तो ऐसा नहीं करके उसको खींच करके शहर में ले आए हैं। अपने सहा अपने को खुद को सहाय करने के लिए तो ऐसा गिल्ट फीलिंग रामकुमार के मन में हुआ। तो फिर उन्होंने भी बाद में यह कहना छोड़ दिया कि तुम यह सब पूजा वगैरह सीख करके यह जो यजमान है उनके घर जाओ पूजा करो और थोड़ा बहुत दक्षिणा वगैरह ले आओ। तो यह बोलना भी उन्होंने बंद कर दिया। हालांकि ठाकुर जाते थे, पूजा करते थे। झामापुकुर में जो संस्कृत टोल था, वहां थोड़ा बहुत शायद अभ्यास भी किया होगा और जहां-जहां ठाकुर पूजा करने को जाते थे, जिन-जिन घर में सोचिए कि वह घर सब पवित्र हो गए होंगे। वह भी एक बात है और वहां पर ऐसा भी विवरण है कि जितने भी लोगों के घर जाते थे ठाकुर पूजा करने के लिए उस घर में सभी के बड़े ही स्नेह और प्रीति के पात्र हो गए थे। क्योंकि यह किशोर गदाधर का सहज सरल स्वभाव सब समय यह ईश्वर की ईश्वरीय भाव से उद्दीपित हो के रहना हर इतना मधुर कंठ से ईश्वर के गान गाना ये सब सुनकर के किसी का मन इनके प्रति श्रद्धा से आकृष्ट ना हो ऐसा भी नहीं हो सकता तो अच्छा ही था वहां पर सब कुछ किंतु ठाकुर का यह था कि बड़े भाई की सब बात सुनेंगे किंतु जहां तक ईश्वर प्राप्ति के रास्ते में अंतराय खड़ा करती है। वह बात को नहीं स्वीकार करेंगे। तो यह शरद महाराज ने जैसे कहा कि ईश्वर प्राप्ति के रास्ते में अंतराय बोलकर के प्रतीति हो वह सब चीजों को भक्त दूर परिहार करता है। इसके बाद का जो है सेंटेंस और इसका जो उदाहरण वगैरह थोड़ा सा लंबा है उसको अभी हम कल से प्रारंभ करेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ओम