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Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : अवतरणिका || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 28 May 2025

prayer

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्वधर्म स्वरूप अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णायते नमः श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा लिखित भाग दो उसमें साधक भाव इसमें जो अवतरणिका है प्रथम चैप्टर अह इंट्रोडक्टरी इसमें अवतार जीवन में साधक भाव का क्या प्रयोजन है? इसके बारे में शारदानंद जी महाराज हमको बता रहे हैं। साधक भाव की आलोचना का क्या प्रयोजन है? उसके बारे में डिस्कशन चल रहा था। देखिए कि इस चैप्टर के आखिरी दो पॉइंट तक हम पहुंच गए हैं। और इन दोनों पॉइंट में शरद महाराज कहते हैं शारदानंद जी या तो फिर शरद महाराज कहते हैं कि देव होकर के ही देव की उपासना ठीक-ठीक हो सकती है। यदि आप निर्विकल्प समाधि में प्रवेश करेंगे तभी आप ईश्वर तत्व क्या है? ईश्वर की महिमा क्या है? ईश्वर का ईश्वरत्व क्या है वह समझ पाएंगे। तो इसलिए यहां पर देवो भूत्वा देवम यजेत इस संस्कृत वाक्य का आधार लेकर के शरद महाराज हमको समझाते हैं। पढ़ते हैं

बद्ध मानव ईश्वर का मानव भाव ही समझ सकता है

इस पैराग्राफ का टाइटल है बुद्ध मानव मानव भाव मात्र बुझते पारे जो बद्ध मानव है। अष्टपाश से जो जड़ित है। षडरिपु का भोग बना हुआ है। पंच कक्लेश का शिकार बना हुआ है। काम कांचन के शिकंजे में फंसा हुआ है। इस तरह का बद्ध मानव बद्ध मनुष्य मानव भाव ही समझ सकता है। ईश्वर यदि मनुष्य देह धारण करके आएंगे, तभी वह ईश्वर को ठीक-ठीक समझ पाएगा, ईश्वर की महत्ता का वो गुणगान गा पाएगा। वरना यह निर्गुण निराकार ईश्वर जो कि पूरे भुवन में त्रिभुवन में व्याप्त है जो कि सृष्टि स्थिति प्रलय करते हैं वो किस लेवल पर उनका अस्तित्व है वह अपनी सूक्ष्म बुद्धि अपनी यह जो छोटी सी बुद्धि है उस बुद्धि से तो हम पकड़ ही नहीं पाएंगे। इसके लिए मनुष्य देह धारण करके ईश्वर आते हैं हमारी आराधना स्वीकार करने के लिए। क्या लिखते हैं शरद महाराज ठाकुर कृपाला भेर प्रत्याशी होलेले ओ आमादग के ताहा के आमादगे न्याय मानव भाव संपन्न बोलिया ग्रहण करते होवे ठाकुर की कृपा लाभ के आशा रखकर के बैठे हुए होकर के भी हमको उनके हमारी ही तरह मानव भाव संपन्न बोलकर के ग्रहण करना होगा। एक और हम ठाकुर के ऊपर में आशा लगा करके बैठे हैं कि आप मेरे जन्म जन्मांतर के कर्मों का फल है। उसको खा जाइए। मुझे मुक्ति दे दीजिए। मुझे दर्शन दिलवा दीजिए। मुझे आत्म साक्षात्कार करवा दीजिए। इस तरह की एक अपेक्षा रखकर के हम ठाकुर के पास में आए हैं। साथ-साथ में ही हमको उनको हमारे ही तरह मनुष्य भाव से संपन्न हुआ हुआ देखना है। यह कंट्राडिक्शन किस तरह का है? यदि मैं भगवान शिव के दरबार में जाकर के भगवान के सामने प्रार्थना करता हूं कि जब आप तांडव नृत्य करते हैं तो मेरे जितने कर्म के फल है उसका भी विनाश कर दीजिए। उसको भी प्रलय में डालकर के प्रलय रूपी भट्ठी में डालकर के उनको नेस्तनाबूत कर दीजिए। क्यों? क्योंकि मुझे पता है कि भगवान शिव प्रलय के देवता है। यह पूरा सृष्टि का संहार करने की क्षमता उनमें है। किंतु यदि मैं ठाकुर के पास जाकर के यह कहता हूं कि ठाकुर मेरे कर्मों के फल खा जाइए। मेरे से मुझे इससे मुक्ति दे दीजिए। यह मैं कहता भी हूं। साथ-साथ में मैं यह भी समझता हूं कि ठाकुर में मैं जिस तरह से पंचमहाभूत के इस पिंजरे में बद्ध हूं, ठाकुर भी उसी तरह से पंचमहाभूत के पिंजरे में बद्ध है। अष्टपाश का एक ना एक अंश उनमें भी है। था एटलीस्ट निर्विकल्प समाधि के बाद में सब दग्ध बीज हो जाता है। दग्ध बीज होना अर्थात कि बीज अर्थात सीड और दग्ध होना यानी उसका जल जाना। जब जो कोई लोग गार्डनिंग या एग्रीकल्चर समझते हैं उनको पता होगा कि यदि फूल उगाने हैं या फल उगाने हैं, सब्जियां उगानी है बागान में, खेत में तो बीज बोने पड़ते हैं। अभी यह बीज आप मिट्टी में डालेंगे, थोड़ा सा खाद डालेंगे, थोड़ा सा पानी डालेंगे तो बीज अंकुरित होंगे। अंकुरित हो के उसमें से पौधा जन्मेगा। किंतु इसी बीज को आप थोड़ा सा भट्ठी में डालकर के जला दीजिए। अभी यह जो जले हुए जो राख जले हुए जो बीज है उनको लेकर के आप उनको मिट्टी में डालिए। देखिए कि वह कभी अंकुरित होंगे ही नहीं। तो इसी तरह से अभी देखिए कि ठाकुर क्या कहते हैं कि यह काम कांचन के प्रति हमारी स्पूहा कैसी है? तो एक पेड़ की डाल है उसको आप कितना ही काटते रहिए वो नई डाल फिर से उगने ही लगेगी। एक पेड़ को आप जितना ही चाहे आप काटते रहिए। नई ना नई यह जो डालियां है शाखा प्रशाखाएं कभी ना कभी निकलती निकलती ही रहेगी। क्यों? क्योंकि उसकी जड़े जो है वह जमीन के भीतर में धरती के भीतर में लंबे गहराई तक फैली हुई है। धरती में से यह पोषक तत्व प्राप्त करती है। इसलिए जब तक यह सुविस्तृत जड़े हैं, रूट नेटवर्क है। तब तक आप पेड़ को काटेंगे भी तो नई-नई उसकी यह जो डालियां है, नई-नई उसकी जो यह है, शाखाएं वह निकलती ही रहेगी। अभी प्रॉब्लम यह है कि वृक्ष के जितने भी जड़े हैं उन सबको खत्म कर दे तभी तो कहीं जाकर के नया वृक्ष बनना बंद होगा। तो इसीलिए दग्ध बीज शब्द यूज किया गया है योग शास्त्र में कि जब तक हमको ऐसा लगता है आज चलिए कि मैंने अष्टपाश से मुक्ति प्राप्त कर ली। चलिए मैंने काम के प्रति मेरी स्पसे मैंने मुक्ति प्राप्त कर ली। अभी मैं कोई भी किसी भी सुंदरी स्त्री को देखूंगा तो मेरे मन में काम भाव कभी नहीं आएगा। अच्छा ठीक है। यह भाव लेकर के मैं घूम रहा हूं। किंतु पता नहीं कौन से दिन क्या अकस्मात क्या एक्सीडेंट हो जाए। क्या मेरे मन में किसी भी तरह का विकार आ जाए। कोई कुछ ठीक नहीं कह सकता। क्यों? क्योंकि यह काम का जो बीज है वह तो मेरे मन में अभी भी पड़ा हुआ है। वह तो दग्ध बीज नहीं हुआ। यह जो शाखा प्रशाखाएं हैं, रूट नेटवर्क है, यह जड़े इतनी गहराई तक हमारे हृदय में मेरे हृदय में प्रवेश कर चुकी है, वो कहीं ना कहीं से यह सस्टेनेंस पाती ही रहेगी। कहीं ना कहीं से यह तमस रजस रूपी पोषक तत्व प्राप्त करती ही रहेगी। कभी ना कभी कहीं ना कहीं काम के रूप में वह फिर से अपनी नई शाखाएं प्रारंभ करती ही रहेगी। जब तक ना कि मैं निर्विकल्प समाधि में प्रवेश करके सभी उसकी जो जड़े हैं भले ही चाहे मेरे हृदय की कितनी ही गहराई में वह डूबी ना क्यों हो मेरी कॉन्शियसनेस के कितने ही गहनतम अंतर में वह प्रवेशी ना हो यदि मैं निर्विकल्प समाधि में प्रवेश करता हूं तो पूरी जड़े उसकी दग्ध हो जाएगी जल जाएगी भस्मीभूत हो जाएगी तब कहीं जाकर के मेरे मन में जब मैं निर्विकल्प समाधि से वापस आता हूं तो फिर मेरे मन के भीतर में वह किसी भी तरह के काम का प्रवेश होना उद्भव होना असंभव है। एक इंटरेस्टिंग एग्जांपल ठाकुर का ही कि ठाकुर जब ठाकुर ठाकुर को

कहानी: एक पागलिनी का श्रीरामकृष्ण के प्रति मधुर भाव

तो पता है निर्विकल्प समाधि प्राप्त करके उनकी जितनी भी कामना वासनाएं हैं सब दगधबीज हो चुकी है। अभी एक पागली उनके पास में आती थी। तो अभी आकर के पहले तो अच्छी-अच्छी बातें करती है भक्ति भाव की किंतु एकाएक ठाकुर को पता चला कि उसका ठाकुर के प्रति मधुर भाव है। जैसा ही ठाकुर को यह पता चला ठाकुर को जैसे कि वह बिछी ने दंस मारा हो फटाक करके अपनी जो खाट के ऊपर में बैठे थे उससे उठ गए खड़े हो गए और इधर-उधर घूमने लगे। बड़े ही नाराजगी के साथ में जो वस्त्र पहना था वह भी चला गया। वो खिसक गया। दिगंबर होकर के जैसे कि बिल्कुल एक छोटा बच्चा है जिसको कि स्त्री पुरुष भेद क्या है? काम क्या है? उसका कोई अंदाज नहीं है। इस तरह से चारप साल के छोटे बच्चे की तरह दिगंबर होकर के कमरे में टहलने लगे और नाराजगी भरे स्वर से कुछ ना कुछ बोलते रहते हैं अपने साथ में। और फिर इस पागलिनी को कहते हैं कि अरे मेरी तो मातृ योनि है। मैं तुम्हारे प्रति इस तरह का भाव कभी भी नहीं रख पाऊंगा। भैरवी ब्राह्मणी के साथ में भैरवी ब्राह्मणी वैसे तो ठाकुर के प्रति उनका मातृभाव था। किंतु फिर भी कभी-कभी वह मधुर भाव के गीत है वह गाया करती थी। या तो फिर ठाकुर के प्रति मधुर भाव का उदय उनके मन में होता था। तो साथ-साथ में ही ठाकुर उनको मना कर देते थे कि इस भाव के भीतर में उनको कभी नहीं जाना है। देखिए ठाकुर ने मधुर भाव की साधना की है। किंतु वो मधुर भाव उन्होंने भगवान कृष्ण के साथ में रखा है। ईश्वर के साथ में रखा है। वो खुद गोपी है। वो खुद श्रीमती राधा रानी है और भगवान कृष्ण है उनके प्रियतम। किसी मनुष्य के साथ में मधुर भाव की साधना करना वह भयानक डेंजरस है। देखिए यहां तक कि ठाकुर और मां का जो संबंध है कितना पवित्र है। कभी-कभी ठाकुर का मां के ऊपर में एक प्रोटेक्शन का भाव है। मां जैसे छोटी बच्ची की तरह ठाकुर उनके गुरु है। इस तरह से ठाकुर के पास में से सब कुछ सीखती है। और कभी-कभी हमको पता है ठाकुर का पागलपन जब हद से बाहर निकल जाता है तो मां फिर जननी की तरह ठाकुर की रक्षा करती है। ठाकुर कहते हैं क्या मैं इतना सारा दूध पी पाऊंगा? तो मां झूठ बोलकर के भी ठाकुर को दूध पिलाती है कि नहीं दूध तो इतना कम ही है। उबाल करके उसकी जो क्वांटिटी है कम कर दी है। किंतु यह नहीं कह के मां कहती है कि नहीं यह कम ही है क्वांटिटी। और फिर यह गोलाप मां है। उनको मां स्पष्ट रूप से कहती है कि बीमार व्यक्ति के लिए झूठ बोल करके उनको पथ्य यानी कि डाइट खिलाना इसमें कोई पाप नहीं है। तो इवन ठाकुर और मां के भीतर में बीच में भी गुरु और शिष्य मां और संतान इस तरह का भाव था। किसी भी एक देह धारण किए हुए व्यक्ति के साथ पंचमहाभूत के जो पिंजरे में जो बद्ध है अष्टपाश से जो बंधे हैं डरिपु के शिकंजे में है उनके साथ में ठाकुर ने मधुर भाव का कोई संबंध रखा हो इस तरह से मेरे नजर में कभी नहीं आया है। तो देखिए कि यह जो है हम जब ठाकुर के

श्रीरामकृष्ण की यात्रा: "आत्मदीपो भव" से "कृष्णस्तु भगवान स्वयं"

पास में आते हैं तो ठाकुर की जो मनुष्य भाव है वह भी समझना है और उनकी दिव्यता कहां पे है यह भी समझना है। मनुष्य भाव इसलिए समझना है कि जिससे हमको पता चले कि प्रचंड साधना करके उन्होंने अष्टपाश से मुक्ति प्राप्त की है। काम कांचन के आकर्षण को उन्होंने संपूर्ण रूप से ध्वस कर दिया है। तो यह ठाकुर की सही-सही सिद्धि है। तो ईश्वर की क्या सिद्धि है कि ईश्वर के भीतर में तमस रजस है ही नहीं। ईश्वर के भीतर में एक्चुअली सत्व भी नहीं है। ईश्वर तो गुणातीत होने चाहिए। किंतु फिर भी सत्व का एक अंश होगा तो फिर हमारे प्रति उनकी जो करुणा है उनकी जो उनका जो प्रेम है उनका यह जो कंपैशन है एंपैथी है वह हमको दिखाई देगा तो ईश्वर के भीतर में एक अंश सत्व को छोड़कर के और कुछ भी नहीं है। उनके एक भी कर्म उनको किसी भी तरह के बंधन में नहीं डालते हैं। जबकि ठाकुर के भीतर में तमस रजस का एक अंश था जिसको जिसको कि उन्होंने साधना करके उसके ऊपर में विजय प्राप्त की है। भगवान राम की जो सर्वश्रेष्ठ सिद्धि हम क्या कहेंगे तो रावण का वध करना। भगवान कृष्ण की सर्वश्रेष्ठ सिद्धि क्या कहेंगे कि अर्जुन जो कायरता से भरा हुआ था उसको उन्होंने वीर्य बल और साहस का उपदेश दिया युद्ध के क्षेत्र में अर्जुन के माध्यम से पांडवों के माध्यम से अधर्म रूपी कौरव सेना का विनाश किया। तो देखिए कि भगवान राम और भगवान कृष्ण दोनों की कीर्ति है दुश्मनों के विनाश करने में। धर्म अधर्म का विनाश करके धर्म की स्थापना करने में। तो यहां पर भगवान रामकृष्ण की अखंड कीर्ति क्या होगी? जब तक वो ये रामकृष्ण भगवान रामकृष्ण का नाम रहेगा तब तक उनके साथ में कौन सा युद्ध जुड़ा हुआ रहेगा? तो वह है दी आंतर जगत में आंतर युद्ध। आज का जो कुरुक्षेत्र है हम सभी के हृदय में है। यदि एक योद्धा है तो वह अर्जुन की आराधना करेगा या तो भगवान राम की आराधना करेगा, परशुराम की आराधना करेगा, भगवान शिव की आराधना करेगा। क्यों? क्योंकि उनको पता इस योद्धा को पता है कि यदि युद्ध क्षेत्र में पराक्रम विक्रम दिखाना है तो इन लोगों से हमको शिक्षा या तो प्रेरणा प्राप्त करनी है। किंतु यदि आंतर जगत में युद्ध चल रहा है उसमें हमको अपना पराक्रम प्रदर्शित करना है तो हम किनसे प्रेरणा लेंगे? तो वह है भगवान रामकृष्ण। देखिए कि भगवान बुद्ध के साथ में ही यह आंतर जगत का युद्ध है। उसका प्राधान्य कितना है वह हमको समझ में आ गया था। तो यहां पे यह जो ठाकुर की जो जर्नी है वो किंतु सिर्फ भगवान बुद्ध तक भगवान बुद्ध की जो जर्नी थी वहां तक सीमित नहीं है। यह एक कहा जाएगा। माने यदि एक इंटरेस्टिंग हम कंट्रास्ट करें तो भगवान कृष्ण और ऑन वन हैंड भगवान राम और भगवान कृष्ण दूसरी ओर है भगवान बुद्ध दोनों में क्या कंट्रास्ट है भगवान बुद्ध आपको संग्राम आंतर जगत में संग्राम करने के लिए प्रेरणा देते हैं। कहते हैं आत्मदीपो भव अपना खुद का रास्त अपना रास्ता अपने ही पराक्रम से अपनी ही तपस्या से प्रकाशित करो। दूसरी ओर भगवान कृष्ण के बारे में भागवत में कहा गया है कृष्णस्तु भगवान स्वयं भगवान कृष्ण की आराधना करके उनके साथ में मधुर भाव या तो फिर संतान भाव मातृ भाव दास्य भाव सख्य भाव शांत भाव इस तरह से किसी ना किसी भाव का शत्रु भाव मैंने यह दुशासन वगैरह ने मुक्ति प्राप्त की भगवान के साथ में शत्रु भाव का आरोप मतलब शत्रु भाव से उनकी आराधना करके तो शत्रु भाव भी हो किंतु कोई ना कोई भाव से भगवान कृष्ण के साथ में एक संबंध बनाओ। यह है भागवत की जो मूल मंत्र यदि कहा जाएगा। अभी भगवान रामकृष्ण में देखिए कि पूरा स्पेक्ट्रम है या प्रारंभ होता है भगवान बुद्ध के आत्मदीपोभव से और उसका अंत आता है जो राम जो कृष्ण वही रामकृष्ण यानी कि भगवान रामकृष्ण हमको साधन भजन करने के लिए प्रेरणा भी देते हैं और साथ-साथ में ही हमको उनकी आराधना से प्राप्त जो फल है मुक्ति फल मोक्ष फल वह भी प्रदान करते हैं। यह कितना एक इंटरेस्टिंग यह है। अवतार वरिष्ठ जब स्वामी विवेकानंद ठाकुर को कहते हैं तो अवतार वरिष्ठ किस लिए? ऐसा नहीं है कि शक्ति जो है या तो फिर शक्ति का मैनिफेस्टेशन है वह शायद उनमें भगवान राम या भगवान कृष्ण से ज्यादा होगा। इस तरह का एनालिसिस करना वह थोड़ा जोखिम भरा कार्य है क्योंकि जो लोग भगवान कृष्ण के पूजक हैं वे लोग इस बात को स्वीकार नहीं करेंगे कि किस तरह से भगवान रामकृष्ण भगवान कृष्ण से ज्यादा शक्तिशाली हो गए यानी कि उनका जो शक्ति का मैनिफेस्टेशन था इनसे ज्यादा कैसे हो सकता है तो वो एक अननेसेसरी डिबेट में जाना होगा किंतु जहां तक यह डिफरेंट-डिफरेंट एट्रिब्यूट का सवाल है तो इस तरह से हम कह सकते हैं कि जो ऐतिहासिक धार्मिक विकास है भारत में उसकी जो दो महत्व थ्रेड है दो महत्व शाखाएं हैं कि एक तो है कि ज्ञान मार्ग से स्वप्रयास से आत्म साक्षात्कार करें। दूसरा कि प्रचंड तपस्या शरणागति के माध्यम से अवतार के ऊपर में संपूर्ण रूप से श्रद्धा और निष्ठा का हम लोग आचरण करें। हम लोग अनुष्ठान करें। तो यह जो दो ग्रेट थ्रेड्स थे यह दोनों थ्रेड्स यह दोनों शाखाएं भगवान रामकृष्ण के भीतर में एकत्रित होती हुई हमको देखने में आती है। और देखिए कि इस हिसाब से यदि कहा जाए तो अह धेय और अह माने माध्यम और धेय यह दोनों है भगवान रामकृष्ण किस तरह से यदि अंतिम लक्ष्य है ठाकुर का दर्शन तो वह धेय भी है और यदि कहे कि ठाकुर ने ही हमको उनको प्राप्त करने की शिक्षा दी है तो वह ध्यान भी है। ध्यान की जो पद्धति है वह भी है। अदरवाइज यदि देखें तो भगवान बुद्ध ने हमको ध्यान की या तो फिर उपासना की पद्धति दिखाई है और भगवान कृष्ण के बारे में कहा गया है कि वह हमारे अंतिम लक्ष्य है। आत्म साक्षात्कार करो या तो फिर भगवान कृष्ण का दर्शन करो। दोनों के भीतर में इक्वल पोटेंशियल पावर है। तो फिर भगवान बुद्ध का जो ध्यान की पद्धति उपासना की पद्धति भगवान कृष्ण बताते हैं कि मैं स्वयं आपकी आध्यात्मिक साधना की परिसमाप्ति हूं। परिपुष्टि हूं या तो फिर अंतिम लक्ष्य हूं। भगवान रामकृष्ण में हमको दोनों एक साथ में देखने को मिलता है। भगवान रामकृष्ण हमको उपासना की पद्धति भी बताते हैं और वह खुद अंतिम लक्ष्य भी है। यह तो ऐसा हो गया कि देखिए कि एक लंबा रास्ता है। लंबे रास्ते के अंत में हमारे इष्ट बैठे हुए हैं। जिनको कि हमको लंबा रास्ता पार करके उनके पास में जाना है। किंतु यह देखिए कि यही इष्ट खड़े होकर के हमारे पास में आते हैं। हमारा हाथ पकड़ करके प्रत्येक स्टेप पर हमारा मार्गदर्शन करके हमको आखिर में उसी राज सिंहासन तक ले जाते हैं जहां पर वह स्वयं बैठे हुए थे। स्वयं विराजित थे। वो जो उपनिषद की कहानी को थोड़ा सा रिवर्स करके देखा जाए कि वह एक पंखी सर्वोच्च डाल पर बैठा हुआ है। एक पंखी जमीन पर बैठा हुआ है या तो नीचे की डाल पर बैठा हुआ है। जितना-जितना वो एक के बाद एक डाल जंप करके ऊपर में जाएगा, उतना-उतना ही वह पंखी को पता चलता जाएगा कि जो सर्वोच्च डाल पर जो सुंदर रूपी पक्षी बैठा था और वो नीचे की डाल वाला दोनों एक ही है। तो यहां पे भी इस एग्ज़ांपल को थोड़ा सा रिवर्स करके देखें कि जो गुरु रूपी श्री रामकृष्ण शिक्षक रूपी रामकृष्ण मार्गदर्शक रूपी श्री रामकृष्ण हमारा हाथ पकड़ करके जिस गंतव्य जिस लक्ष्य की ओर हमको ले जाते हैं उस लक्ष्य को एक बार हम पहुंच जाएंगे तो पता चलेगा कि यही गुरु इष्ट में विलीन हो गए हैं। यही श्री रामकृष्ण हमारे मार्गदर्शक थे। हमारे पथ प्रदर्शक थे और यही श्री रामकृष्ण पथ का जो अंतिम लक्ष्य है पथ या तो फिर यात्रा का जो अंत है उस अंत में यही श्री रामकृष्ण अपने इष्ट भी है। गुरु और इष्ट एक हो जाते हैं। तो भगवान बुद्ध को यदि हम गुरु की उपमा दें। उन्होंने हमको मुक्ति का मार्गदर्शित किया। भगवान कृष्ण को हम यदि इष्ट की उपमा दें कि उन्होंने कहा कि मुझे प्राप्त करने से ही सर्वस्व आध्यात्मिक जीवन में प्राप्त हो जाएगा। तो यह दोनों उपमाएं श्री रामकृष्ण को आप लग उनके जीवन में देखने को मिलती है। दोनों उपमाओं से श्री रामकृष्ण को आप विभूषित कर सकते हैं। भगवान रामकृष्ण हमारे गुरु भी हैं। इस अर्थ में कि उनकी जो साधना है वह साधना हमको प्रेरणा देती है। जैसे कि भगवान बुद्ध की प्रचंड साधना उनके डिसाइपल्स को उनके शिष्यों को प्रेरणा देती थी और साथ में ही भगवान श्री रामकृष्ण इष्ट भी है। इस अर्थ में कि भगवान कृष्ण इष्ट है। वह भगवान स्वयं है। कोई ना कोई एक भाव लेकर के उनके साथ में संबंध बनाने बनाने से ही आप अपना अंतिम लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। तो इस अर्थ में भगवान रामकृष्ण इष्ट भी है। उनके साथ में यदि हम मातृभाव बालक भाव फिर यह दास्य भाव कोई भी एक भाव का आश्रय लेकर के उनकी उपासना करें तो वही अंतिम लक्ष्य भी हमको प्राप्त होगा। तो इस अर्थ में यहां पर शरद महाराज कहते हैं बड़ा ही इंपॉर्टेंट प्रथम स्टेटमेंट है। ठाकुर की कृपा लाभ के आशान्वित होकर के बैठे हुए हमको उनके भीतर में हमारी ही तरह मनुष्य भाव है। यह समझ करके चलना होगा। उनको हमारी ही तरह मानव भाव संपन्न बोलकर के ग्रहण करना होगा। कारण ठाकुर आमादगे गर दुखे समवेदना भागी होइया तो आमादगे गर दुख मोचन अग्रश होइबेन क्यों क्योंकि ठाकुर हमारे दुख में समवेदना भागी होकर के ही तो हमारे दुख मोचन के लिए अग्रसर होंगे। देखिए यह इष्ट इष्ट के रूप में वह अंतिम राज सिंहासन पर तो बैठे ही है। किंतु उनको यह भी पता है कि यह जो उनके तक पहुंचने का जो रास्ता है वह इतना भयानक कठिन है कि वह खुद स्वयं उस राज सिंहासन से खड़े होकर के हमारे पास में आकर के खड़े रहेंगे। वह जो प्रचंड तपस्यामय यात्रा है वह खुद उस यात्रा को पार करेंगे। हमारे लिए एक आदर्श रख के जाएंगे। तभी तो उस आदर्श से प्रेरित होकर के हम इस यात्रा को सफर को हम उसको कर पाएंगे। सफर कर पाएंगे। अंतिम लक्ष्य तक पहुंच पाएंगे। इस अर्थ से यदि देखा जाए तो भगवान बुद्ध और बाकी सब अवतारों में हमको यह एक डिफरेंस देखने को मिलेगा। साधना क्या है? साधन पद्धति क्या है? तपस्या क्या है? काम कांचन या तो पंचक्लेश से किस तरह से मुक्ति प्राप्त की जाए? इसके बारे में गीता के भीतर में उपदेश भरे पड़े हैं। श्रीमद् भागवत के भीतर में ज्ञान की चर्चा, तपस्या की चर्चा, उपासना की चर्चा भरी पड़ी है। किंतु भगवान कृष्ण ने खुद उनका जो मनुष्य भाव है, उनके भीतर में यह जो कामना वासना के जो एक अंश रहा होगा, मनुष्य देह धारण करके आते हैं तो एक ना एक अंश तो रहा ही होगा। तमस रजस का उस अंश से उन्होंने किस तरह से संग्राम करके मुक्ति प्राप्त की वह आदर्श हमको शायद या तो फिर श्रीमद् भागवत में या तो फिर राम गीता में या तो फिर महाभारत में देखने को नहीं मिलता है। अभी मैं यह बात इसलिए कर रहा हूं क्योंकि यह शरद महाराज ने जो लिखा है उसके बेस पे मैंने खुद ने मेरा खुद का इन तीन ग्रंथों में इतना डीप एक्सपर्टाइज नहीं है कि मैं कोई ऑथोरिटेटिवली यह स्टेटमेंट दूं। शरद महाराज का जो एनालिसिस है उसी के ऊपर में बेस करके मैं यह बात कह रहा हूं। तो ठाकुर का यह जो मनुष्य भाव है वह मनुष्य भाव उन्होंने क्यों धारण किया? क्योंकि यदि वह खुद माने सिर्फ उपदेश देकर के चलेगा नहीं कि हां तुम लोग जो है यह जो एक के बाद एक जो उपासना पद्धति है उसका अनुष्ठान करो। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि। फिर यह यम और नियम क्या है? तो अहिंसा सत्य अहिंसा अस्तेय अपरिग्रह ब्रह्मचर्य तप शोच संतोष स्वाध्याय ईश्वर प्रणिधान फिर यह जो चित्त प्रसाद क्या है तो मैत्री करुणा मुदिता उपेक्षा इस तरह से आप सब वैल्यूस जो है स्पिरिचुअल वैल्यूस अपने जीवन में इंकल्केट कीजिए और फिर इस तरह से उपासना पद्धति का अनुष्ठान कीजिए विचार मार्ग है भक्ति मार्ग है द्वैत अद्वैत विशिष्ट अद्वैत कर्म मार्ग है। ध्यान मार्ग है। इतने सारे रस्ते हैं। इतनी सारी फिलॉसोफीस है। इतनी सारी स्कूल्स ऑफ थॉट्स है। जो जो भी आपके चरित्र को जो कि आपकी पर्सनालिटी को अनुकूल हो उसके अनुसार आप उपासना कीजिए। ऐसा सिर्फ उपदेश देकर के शांत नहीं हो गए कि उन्होंने अपने से उन सभी रास्तों का एक अनुष्ठान करके सभी साधनाओं का सभी उपासनाओं का अनुष्ठान करके उस उपासना के माध्यम से सिद्धि प्राप्त की है। यानी कि एटा शुद्ध कथार कथा नहीं बांग्ला जैमन बोले सिर्फ हवा में बातें नहीं है। हमारे सामने उन्होंने एंपेरिकल उन्होंने एक्सपेरिमेंटल एक्सपेरिमेंट करके प्रूव करके दिखाया है कि इस तरह की साधना करने से इस तरह की सिद्धि प्राप्त होती है। तो इसके लिए हमारे प्रति कृपा परवश होकर के उन्होंने सिर्फ अपनी हमारी आराधना ग्रहण करने के लिए सिर्फ मनुष्य देह धारण नहीं किया। उन्होंने हमारी ही तरह अपने भीतर में काम कांचन या तो फिर यह तमस और रजस का एक अंश प्रवेश करवा करके साधना करके इस अंश से मुक्ति प्राप्त की और हमारी नजरों के सामने एक ज्वलंत उदाहरण वो प्रदर्शित करके गए। अत ए जे दिक दिया देखो त के मानव भाबापन्न बोलिया चिंता कोरा भिन्नो आमाद गर गत्यंतर ना इसलिए जिस दृष्टि से भी आप देखिए जहां से भी आप देखिए ठाकुर को मानव भाव मानव भावापन्न बोल के सोचने के अलावा हमारे पास में और कोई उपाय नहीं है। जिस दृष्टि से जिस दृष्टि बिंदु से जिस व्यू पॉइंट से आप ठाकुर के जीवन की आलोचना कीजिए उनके भीतर में मनुष्य का कोई ना कोई अंश था। मानव का कोई ना कोई भाव था। यह बात स्वीकार करने के अलावा हमारे सामने और कोई उपाय नहीं है। वास्तविक जतो दिन ना आमरा सर्वविध बंधन हो ते मुक्ति लाभ कोरिया निर्गुण देव स्वरूपे स्वयं प्रतिष्ठित हो ते पारबो ततो दिन परजंतो जगत कारण ईश्वर के एवं ईश्वरा अवतार दिग के मानव भापन बोल्या आमादिग के भाभीते वो ग्रहण करते होवे वास्तविक रूप से जितने दिन तक हम जब तक हम सर्व बंधन से मुक्ति प्राप्त करके निर्गुण देव स्वरूप में स्वयं प्रतिष्ठित ना हो सके तब तक हमको जगत कारण ईश्वर को और ईश्वर के अवतार को मानव भावापन्न मनुष्य भाव से मनुष्य भाव से मनुष्य भाव धारण किए हुए बोलकर के ही हमको सोचना होगा और ग्रहण करना होगा। जब तक हम निर्विकल्प समाधि प्राप्त करके जब तक हम एक ईश्वरत्व प्राप्त करके ईश्वर के सामने नहीं देखेंगे तब तक हमको यह पता नहीं चलेगा कि ईश्वर की सही महत्ता क्या है? सही-सही ईश्वर तत्व क्या है? सही-सही ईश्वर की देवत्व का क्या अर्थ है? सही सही ईश्वर की उपासना कैसे की जाए? तो पहले तो हमको ईश्वरत्व प्राप्त करना होगा। हमको देवत्व प्राप्त करना होगा। तभी कहीं जाकर के हम जगत कारण ईश्वर को शरद महाराज लिखते हैं तब तक हम जगत कारण ईश्वर को और ईश्वर के अवतार को मानव भावापन्न बोलकर के ही हमको स्वीकार करना होगा। देवो भूत्वा देवम यजेत कथाटी ओ रूप वास्तविक कोई शतो देव होकर के देव की उपासना यह बात सही सही में सच है तुम यदि स्वयं समाधि बोले निर्विकल्प भूमि ते पहुंचाईते पारिया थाको तभी तुम ईश्वर यथार्थ स्वरूप उपलब्धि और धारणा करिया ता यथार्थ पूजा करते पारबे तुम यदि स्वयं समाधि बल से समाधि की शक्ति से निर्विकल्प भूमि तक पहुंच सकते हो। तभी तुम ईश्वर की ईश्वर के यथार्थ स्वरूप की उपलब्धि और धारणा करके उनकी यथार्थ पूजा कर सकते हो। जब तक निर्विकल्प समाधि में नहीं पहुंचते तब तक हम ईश्वर क्या है? ईश्वर की उपासना क्या है? समझ ही नहीं पाएंगे। स्वामी ब्रह्मानंद का राजा महाराज का वह फेमस स्टेटमेंट कि निर्विकल्प समाधि के बाद में ही सही-सही आध्यात्मिक जीवन का प्रारंभ होता है। तो जब तक हम ईश्वर क्या हम खुद यदि हम ईश्वर ना बन जाए तब तक ईश्वर की उपासना का हमने प्रारंभ भी नहीं किया है। आर जदी ताहा ना पारिया थाको तबे तोमार पूजा उक्त देव भूमि ते उठिबार ओ यथार्थ पूजा अधिकार पब चेष्टा मात्र परजितो होइबे एवं जगत कारण ईश्वर के विशिष्ट शक्ति संपन्न मानव बोलिया तो स्वतः धारणा होइया थाकीबे और जब तक निर्विकल्प समाधि प्राप्त नहीं होती है तब तक तुम्हारी पूजा उस देव भूमि पर उठकर के और यथार्थ पूजाधिकार पाने की चेष्टा ही हो रह जाएगी। प्रयास ही हो जाएगा। और जगत कारण ईश्वर को एक विशिष्ट शक्ति संपन्न मनुष्य बोलकर के ही तुम्हारी स्वतः धारणा होती रहेगी। जब तक निर्विकल्प समाधि प्राप्त नहीं करते तब तक हमारी पूजा देवभूमि पर उठेगी ही नहीं। देवभूमि पर जाकर के ही तो हम देवता की पूजा करेंगे। कुरुक्षेत्र में जाकर के ही तो हम महाभारत का युद्ध करेंगे। वो धृतराष्ट्र की तरह महल में बैठे-बैठे संजय को पूछ के कहां पे क्या हो रहा है वो बोल के सोच करके या तो देख के सुनकर के तो हम महाभारत का युद्ध नहीं करने वाले हैं। उसके लिए तो धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में अवतरण करना ही पड़ेगा। इस तरह से देव की पूजा करनी है तो देवभूमि पर हमको प्रवेश करना होगा और तब तक हम देवभूमि पर प्रवेश प्रवेश नहीं करते हैं। हमारी यह पूजा का अधिकार पाने की यह सिर्फ प्रयास ही बनकर के रह जाएगा। मैं मुझे पूजा का अधिकार प्राप्त नहीं हुआ। मैं पूजा का अधिकार प्राप्त करने का प्रयास ही कर रहा हूं। और जब तक मैं देवभूमि पर आरोहण नहीं करूंगा, देवभूमि में प्रवेश नहीं करूंगा, तब तक मैं जगत कारण ईश्वर को एक विशिष्ट शक्ति संपन्न मनुष्य बोलकर के ही सोचता रहूंगा। इसी तरह की मेरी धारणा होती रहेगी। जैसे कि वो इतने सारे उदाहरण हमने कल भी देखे थे कि जैसे ही अर्जुन के सामने भगवान कृष्ण ने अपना विश्वूप प्रदर्शित किया साथ-साथ में ही अर्जुन डर के बोल उठा कि अरे आप यह किस तरह का देह धारण किए हैं? किस तरह का स्वरूप धारण किए हैं। कृपा करके आपके पुराने सौम्य स्वरूप में वापस आ जाइए।

स्वामी ब्रह्मानंद की कहानी

राजा महाराज की एक फेमस घटना है कि ठाकुर को बार-बार कहते हैं कि मुझे कुछ ना कुछ दर्शन दिलवा दीजिए। कुछ ना कुछ अनुभूति दिलवा दीजिए। तो ठाकुर कहते अच्छा होगा होगा होगा ऐसा करके तो राजा महाराज थोड़े से निराश होकर के बैठे थे। एक दिन देखा कि वो ठाकुर काली मंदिर की ओर जा रहे हैं। तो वो वहां पर खड़े थे सामने एकाएक देखा कि काली मंदिर की ओर से एक ऐसी विराट प्रचंड शक्तिशाली एक तत्व उनके सामने दौड़ता हुआ आया। उड़ता हुआ आया कि राजा महाराज बेचारे भय के मारे चिल्ला उठे और वहां से भाग खड़े हुए। तो हम लोग इस तरह के दर्शन की अपेक्षा तो बड़ी रखते हैं। किंतु इस तरह का दर्शन यदि नजर के सामने आ जाएगा तो दर्शन को धारण करने की दर्शन को समझने की क्षमता थोड़ी ना हमारे में है। राजा महाराज जिस तरह से ठाकुर की सेवा करते थे देहधारी ठाकुर की सेवा सभी लोग कर सकते हैं। आसानी से कर सकते हैं। सुख पूर्वक कर सकते हैं। प्रसन्नता पूर्वक कर सकते हैं। और देवता की आराधना करने से जो फल प्राप्त होता है, जो पुण्य प्राप्त होता है, मुक्ति की ओर हमारी उर्ध्वगति प्राप्त होती है, वह भी ठाकुर की उपासना से, ठाकुर की सेवा से, उतना ही हमारा आध्यात्मिक जीवन उर्ध्वगति करता रहेगा। उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। देखिए कि जब ठाकुर की अंतिम लीला चल रही थी, अंत्य लीला प्रारंभ हो गई थी। कैंसर के बाद में श्यामपुकुर काशीपुर में ठाकुर थे। उस समय यह सभी जो उनके जो त्यागी संतान है उन्होंने यह सोच लिया कि ठाकुर की सेवा करना ही हमारे जीवन की सबसे बड़ी उपासना है। और वे लोग जो ठाकुर के पास में आते थे कि हम लोग साधन भजन करेंगे, आराधना कुछ ना कुछ करेंगे, कुछ ना कुछ जप ध्यान करेंगे, नाक बंद करके प्राणायाम करेंगे और ठाकुर हमको ऐसा कुछ सिखा देंगे। या तो फिर ठाकुर उनकी शक्ति हमारे में प्रवेश करवा करके हमको कुछ ना कुछ अनुभूति करवा देंगे। वे सब लोग वहां से खिसक पड़े हैं। वे सब लोग वहां से भाग खड़े हुए। यह सोच के कि जो अपने खुद के कैंसर की ट्रीटमेंट नहीं कर सकता वह हमारे भवर रोग का क्या निदान करने वाला है। तो यह जो प्रश्न है कि ईश्वर मनुष्य देह धारण करते हैं जिससे कि वह हमारी सेवा ग्रहण कर पाए। जो सेवा ग्रहण करके ही हमारी आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा। इसके बाद का जो पॉइंट है ओ जन मानव प्रति करुणाए ईश्वर मानव देह धारण इसीलिए मनुष्य के प्रति करुणा पूर्वक ईश्वर का मानव देह धारण सुतरान मानव भाव या अवतार पुरुष जीवन आलोचना ही कल्याण कर इसलिए मानव मनुष्य समझ के अवतार पुरुष के जीवन की आलोचना ही कल्याण कर है। हम ठाकुर को गुरु के रूप में भी ले सकते हैं। इष्ट के रूप में भी ले सकते हैं। उनको पथ प्रदर्शक प्रेरणा दाता के रूप में भी समझ सकते हैं। वही इष्ट जिनके तक हमको पहुंचना है। उसी इष्ट ने प्रचंड तपस्या करके अपना खुद का सही स्वरूप उन्होंने रियलाइज किया था। साक्षात्कार किया था। यानी कि वह इष्ट भी है और इष्ट को प्राप्त करने के लिए स्वयं को प्राप्त करने के लिए जो उन्होंने साधना की वह हमारे लिए एक उदाहरण स्वरूप बनकर के हमेशा रहेगा। देवत्व आरूढ़ होया ओ रूपे ईश्वर मायाती तो देव स्वरूप यथार्थ पूजा करीते समर्थ व्यक्ति विरल देव स्वरूप में आरूढ़ होकर के ईश्वर की यथार्थ पूजा करने में समर्थ लोग विरल है अल्प ही लोग मिलेंगे आमाद में तो दुर्बल अधिकारी उहा होते एकनो बहु दूर अवस्थितो हमारी तरह दुर्बल अधिकारी अभी भी उससे बहुत दूर अवस्थित है से जनो आमादगे न्याय साधारण व्यक्ति प्रति करुणा परबोष होया आमादगे हृदय पूजा ग्रहण करबई ईश्वर मानव भूमि ते अवतरण मानवीय भाव और देहो स्वीकार करिया देवो मानव रूप तारणा इसीलिए हमारी तरह साधारण व्यक्ति के प्रति करुणा परवश होकर के हमारे हृदय की पूजा ग्रहण करने के लिए ही ईश्वर का मनुष्य भूमि पर अवतरण मनुष्य भाव और देह स्वीकार करके देव मानव रूप धारण मनुष्य की तरह ही देह स्वीकार करके मनुष्य की तरह ही भाव स्वीकार करके देव मानव रूप धारण देखिए देव मानव रूप का धारण की है माने वो वो सिर्फ मानव नहीं है देव मानव है। यह जो कंट्राडिक्शन यह जो कंपैरिजन या तो फिर यह जो पैराडॉक्स वह है अवतार तत्व का हृदय अवतार तत्व का हार्ट पूर्व जुगा जुगाब भूतो देवो मानव दग सहित तुलनाय ठाकुर साधन काले इतिहास आलोचना कर बार आमादे अनेक सुविधा आे कारण ठाकुर स्वयं ताने उई काले कथा समयसमय आमाद निकट विस्तृत भावे आलोचना कराए से शकले ज्वलंत चित्रो आमादे मने दृढ़ भा अंकितो रहया छ शरद महाराज के एक-एक सेंटेंस एक-एक पैराग्राफ की तरह है। अच्छा देखिए इसके जो पहले वाला जो सेंटेंस है ना उस सेंटेंस के साथ में यह जो चैप्टर की फिलॉसोफिकल थिंकिंग थी उसकी समाप्ति होती है। तो इसलिए ना मैं वो वो आखिर इसके बाद में अभी इसके बाद के चैप्टर्स में क्या होगा? इस तरह से वो थोड़ा सा एक जनरल एक डिस्कशन होता है। तीन-चार लाइन बची है अभी इस चैप्टर की आखिरी आखिरी चैप्टर आखिरी पैराग्राफ की आखिरी कुछ लाइनें बची है। तो जो फिलॉसोफिकल जो जो लाइन थी आखिरी वो यह इसके पहले वाली है। इसलिए उसको मैं फिर से एक बार पढ़ लेता हूं। पूरे चैप्टर में जो हमने थिंकिंग किया है उसका एक सुंदर एक क्या कहेंगे? समरी इस सेंटेंस में हमको देखने को मिलती है। इसलिए पढ़ता हूं। से जनो आमादगे न्याय साधारण व्यक्ति प्रति करुणा परबश होइया आमादगे हृदय पूजा ग्रहण करब जोई ईश्वर मानव भूमि ते अवतरण मानवीय भाव ओ देहो स्वीकार करिया देव मानव रूप धारण इसलिए हमारी तरह साधारण व्यक्ति के प्रति करुणा पर्वश होकर के हमारे हृदय की पूजा ग्रहण करने के लिए ईश्वर का मनुष्य भूमि पर अवतरण पृथ्वी पर अवतरण मानवीय भाव और देह स्वीकार करके देव मानव रूप धारण यह जो इतना सुंदर पैराग्राफ इतना सुंदर लाइन जिसके साथ में ही पूरे चैप्टर का जो फिलॉसोफिकल डिस्कशन था उसका अंत आता है। अभी इसके बाद में शरद महाराज क्या कहते हैं कि इसके पहले पहले युग में आविर्भूत देव मानव के साथ में ठाकुर की तुलना ठाकुर के साधन काल का जो इतिहास है उसकी आलोचना करने के बारे में हमारे पास में बहुत सुविधा है। क्यों? क्योंकि ठाकुर ने स्वयं उनके जीवन के साधन काल की बात समय-समय पर हमको बताई है। हमारे सामने विस्तृत भालोचना विस्तृत भाव से आलोचना की है। तो इसके लिए वह सभी का ज्वलंत चित्र हमारे मन के सामने दृढ़ भाव से अंकित होकर के रहा है। ठाकुर ने खुद ने अपने साधन काल में क्या किया? उसके बारे में अपने भक्तों को, अपने शिष्यों को बीच-बीच में बताते रहते हैं। कथामृत पढ़ेंगे तो वह वो पैराग्राफ का वो हेडिंग होता है पूर्व कथा। वो पूर्व कथा यानी कि ठाकुर अपने वो जो साधना के दिन है, पुराने दक्षिणेश्वर के दिन है, यह हलधारी है, यह कृष्ण किशोर है, उनकी बातें हैं। वो जो नॉर्थ इंडिया वो तीर्थ यात्रा के लिए गए थे। उन सब की बातें हैं। तो पूर्व कथा के रूप में ठाकुर यह सब बातें करते रहते हैं। तो यह पूर्व कथा तो इस तरह से उन्होंने फिर भैरवी ब्राह्मणी के बारे में तोतापुरी के बारे में अपनी साधनाओं के बारे में कथामृत में देखेंगे कि विस्तृत वर्णन है। तो इस तरह से ठाकुर ने हमारे सामने अपने साधन जीवन की बहुत सारी बातें की है। और महाराज कहते हैं कि इसलिए वह हमारे मन के ऊपर में दृढ़ भाव से अंकित होकर के रह गई है। यह सब कहानियां और इसीलिए पूर्व जो युग में आविर्भूत अवतार आए थे पृथ्वी के ऊपर में उनकी तुलना में ठाकुर के साधन काल का इतिहास किस तरह से हम आलोचना करें इसके बारे में हमारे पास में बहुत सारी सुविधाएं हैं। आ फिर से आमरा ता निकट जबर शल्पकार पूर्व तहार साधक जीवन विचित्र अभिनय दक्षिणेश्वर काली बाटी लोक शकल चकु सम्मु के संगठित होया छिलो एवं ओ शकल व्यक्ति अनेके तखनो ओ स्थाने विद्यमान छिलेन और भी एक हमारे सामने सुविधा है और भी एक हमारे सामने एक बेनिफिट यह है ठाकुर के साधक जीवन की आलोचना करने का चिंतन करने का कि हमारे उनके पास में जाने के कुछ समय पहले हमारे अर्थात कि शरद महाराज के वगैरह जो डायरेक्ट डिसाइपल थे वह ठाकुर के पास में 18 80 के बाद में सब आना शुरू हुए थे। 1880 1881 1882 वगैरह-वगैरह उसके थोड़े ही समय पहले अर्थात कि ठाकुर का जो साधन काल है वो उसको यदि 1854 से या तो फिर 1858 से लेकर के 1868 तक 10 15 साल लिया जाए तो 68 से लेकर के 78 यानी कि 10 12 साल ही अभी तो बीते हैं और इसलिए अल्पकाल ही समाप्त हुआ है। ठाकुर की साधना की परिसमाप्ति के बाद में ठाकुर की साधना की परिसमाप्ति 1872 को भी गिन सकते हैं। मां क्या 1873 मां की शोशी पूजा की अर्थात कि मुश्किल से 10 12 साल ही हुए हैं। तो अभी इसका फायदा यह है कि उनके साधक जीवन का जो विचित्र अभिनय है। ये शरद महाराज का शब्द है। साधक जीवन का विचित्र अभिनय कालीवाड़ी के लोगों की नजर के सामने पूरा संघटित हुआ था। पूरा अभिनय हुआ था और उन लोगों में से बहुत सारे लोग उस जगह पर अभी भी वर्तमान थे। तो वे लोग शरद महाराज है। बाकी जो डिसाइपल है उनको अच्छे से बता सकते हैं कि हां ठाकुर क्या-क्या पागलपन करते थे। तो वो सब कहानियां भी उनको सुनने को मिलती थी। से जहां हो वो जो भी हो ओ विषय आलोचनाएं प्रवृत्त हो बार पूर्व साधन तत्व मूल सूत्र गुली एक बार साधारण भावे आमादगे गर आवृत्ति कोरिया लवा भो तो जो भी है अभी ठाकुर की साधना की आलोचना में प्रवृत्त होने से पहले ठाकुर की साधना के बारे में चिंतन करने से पूर्व साधन तत्व के मूल सूत्र क्या है उसके बारे में साधारण रूप से हमको आवृत्ति कर लेना अच्छा साधना क्या है? साधन भजन क्या है? उपासना क्या है? इसके बारे में हमारे शास्त्र क्या कहते हैं? इसके बारे में थोड़ा उसके जो मूल सिद्धांत है थोड़ा सा हमको आलोचना कर लेना चिंतन कर लेना अच्छा रहेगा। अतः ए ओ विषय आमरा एकोन कथनचित आलोचना करबो। इसलिए उस विषय के बारे में अभी हम थोड़ी सी आलोचना थोड़ा सा चिंतन प्रारंभ करेंगे। तो ठाकुर की साधना का विवरण देने से पहले ठाकुर की तंत्र साधना शक्ति साधना वेदांत साधना मधुर भाव साधना इन सब की जो आलोचना करने से पहले इन सब के बारे में हमको बताने से पहले यह सब क्या है? साधना क्या है? शास्त्र साधना के बारे में क्या कहते हैं? उसके बारे में थोड़ा सा चिंतन शरद महाराज इसके बाद के जो अध्याय है साधक और साधना साधक और साधना इस अध्याय में शरद महाराज करेंगे तो उसका प्रारंभ अभी हम नेक्स्ट क्लास में करते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु हां।