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Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 31 Dec 2025

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा रचित भाग दो प्रथम अध्याय साधक और साध इसका एक पॉइंट अभी जो हम आज डिस्कस करने वाले हैं वह है निर्विकल्प समाधि और इसके बाद का जो पॉइंट है कि किस तरह से भक्ति

सामाजिक, आर्थिक और आध्यात्मिक जड़ता—यही कारण बना भारत की हज़ार साल की पराधीनता का

मार्ग से निर्विकल्प समाधि प्राप्त हो सकती है। देखिए हमने कल भी थोड़ा सा डिस्कस किया था कि हम कब अ हमारे जीवन में यह जो स्पिरिचुअल मैच्योरिटी के जो स्टेजेस आते हैं स्पिरिचुअल एडवांसमेंट के जो स्टेजेस आते हैं तो कौन से स्टेज पर हमको यह पता चले कि हां अभी भक्ति मार्ग में से ज्ञान मार्ग में जाने का समय आ चुका है। तो उस समय हमने डिस्कस किया था कि किस तरह से हमारी जो वैदिक जो धर्म प्रणाली है वैदिक धर्म है हमको कहता है कि हमारे जीवन के चार स्टेजेस है पहले 25 साल है ब्रह्मचर्य आश्रम उसके 25 साल है उसके बाद के गृहस्थ आश्रम उसके बाद के 25 साल है वानप्रस्थ आश्रम अर्थात कि जो भी हमारे रिस्पांसिबिलिटीज है उसको को धीरे-धीरे करके त्याग करना है और फिर आखिर के जीवन के 100 साल का यदि जीवन है तो आखिरी 25 साल है सन्यास आश्रम तो ऑब्वियस है कि जब तक हम गृहस्थ आश्रम में है तब तक तो हम भक्ति मार्ग को ही फॉलो कर पाएंगे क्योंकि ज्ञान मार्ग जो है ज्ञान मार्ग स्पष्ट रूप से कहता है कि यह जगत और जगत के जितने भी विषय है सब मिथ्या है उसका त्याग करना है तो हो सकता है कि गृहस्थ आश्रम में रह के यह मुश्किल हो असंभव नहीं है मुश्किल है तो गृहस्थ आश्रम में जब तक है तब तक भक्ति मार्ग को फॉलो करें फिर जैसे ही वानप्रस्थ आश्रम में आए तो भक्ति मार्ग में से ज्ञान मार्ग में ट्रांजिशन प्रारंभ कर दे और जैसे ही सन्यास आश्रम में प्रवेश किया तो साथ में ही हमारा यह ट्रांजिशन समाप्त हो गया। अभी हम 100% ज्ञान मार्ग को फॉलो कर सकते हैं। किंतु देखिए कि यह जो थिंकिंग है कि ट्रांजिशनिंग फ्रॉम भक्ति मार्ग टू ज्ञान मार्ग दिस इज यूनिक टू रामकृष्ण भावधारा। यह जो हमारी भावधारा है, रामकृष्ण संघ की जो विचार सरणी है, ठाकुर मां स्वामी जी का जो जीवन है, उसमें यह एक यूनिक कैरेक्टरिस्टिक है। बाकी आप देखिए पिछले एटलीस्ट जितने समय से अभी गीता की बात यदि छोड़ दें। श्रीमद्भगवत गीता में आप देखेंगे कि भगवान कृष्ण एक के बाद एक सभी साधन पद्धतियों के बारे में उसी गीता में क्रमबद्ध हमको कहते हैं और कहते हैं कि सभी साधन पद्धतियां मेरी तक आने के विभिन्न विभिन्न मार्ग मात्र है। तो वो जो समन्वय जो है वो ऑलरेडी श्रीमद्भगवत गीता में हो चुका है। किंतु फिर जैसे हुआ पिछले 1000 साल में भारत की ये जो आर्थिक और राजनैतिक अवनति हुई, उसमें जैसे कि धार्मिक अवनति भी एक हो गई थी और यह जितने भी यह मार्ग थे, साधन मार्ग थे, वह एक वाटर टाइट कंपार्टमेंट बनके रह गए। सभी लोग अपना एक संप्रदाय प्रारंभ कर रहे हैं। और यह संप्रदाय को यदि आप फॉलो करते हैं तो दूसरे संप्रदाय के सामने आपको देखना भी नहीं है। उस संप्रदाय की जितनी भी विचार सरणी है वह सब आपके लिए वर्जित है। जिस तरह से नात जात में अपना देश बट गया वैसे ही यह संप्रदाय में अपना देश बट गया। वरना तो देखिए कि यह जितनी भी साधन पद्धति थी और यह जितने वर्ण थे यह वर्णाश्रम जिसको कहते हैं वर्ण व्यवस्था यह तो क्या था क्षत्रिय का लड़का क्षत्रिय होगा ऐसा नहीं जिसमें शारीरिक जोर है जिसके भीतर में दैहिक शक्ति है वह क्षत्रिय बनेगा जिसमें बौद्धिक शक्ति है वह ब्राह्मण बनेगा जिसका सेवा भाव का नेचर है वह फिर शूद्र अर्थात कि लोगों की सेवा करेगा और जिसकी एक प्रैक्टिकल सेंस है वह व्यापार करेगा वैश्य होगा तो यह समाज है गुण के अनुसार आपका वर्ण ठीक होता था नहीं कि जन्म के अनुसार वर्ण ठीक होना तो साथ में ही वैदिक युग में ही सब साधन पद्धतियों का आविष्कार हो चुका था और वैदिक युग में यह बात स्पष्ट थी कि अधिकारी भेद के अनुसार यदि आपकी बौद्धिक क्षमता तीव्र है तो आप ज्ञान मार्ग को अनुसरण कीजिए। आप में यदि भक्ति का प्राधान्य है, भाव का प्राधान्य है तो भक्ति मार्ग को फॉलो कीजिए। यदि आपके मन में एकाग्रता है तो योग मार्ग को फॉलो कीजिए। यदि भीतर में रजस है तो फिर कर्म मार्ग को फॉलो कीजिए। जैसे कि अर्जुन है, अर्जुन क्षत्रिय है। वह यदि सन्यास ले लेगा तो उसको कभी भी शांति नहीं मिलने वाली। तो क्या है कि जिसकी जो एबिलिटी है, जिसकी जो क्षमता है, जिसके जो लाक्षणिकताएं और कैरेक्टरिस्टिक्स है, उसके अनुसार उनको साधन पद्धतियां फॉलो करनी है। उसके अनुसार उनका व्यवसाय ठीक होगा। दोनों ओर से फ्लैक्सिबिलिटीज थी। बाहर के जगत में आपका क्या व्यवसाय है? वह आपकी क्षमता निर्धारित करेगी। आंतर जगत में कौन सी साधन पद्धति को फॉलो करना वो आपका जो अधिकारी अधिकारित्व है वह ठीक करेगा। तो यह फ्लैक्सिबिलिटी हमको वैदिक युग में देखने को मिलती है और इसको एग्ेंंपलीफाई करता है श्रीमद्भगवत गीता और भगवान कृष्ण का उपदेश। तो यह एक युग किंतु समाप्त हो गया। जैसे ही यह वैदिक युग समाप्त हुआ बौद्ध धर्म का जैसे कि उदय हुआ। बौद्ध धर्म और जैन धर्म इन दोनों का जैसे भारत में इन्फ्लुएंस बढ़ा साथ-साथ में ही देखिए अल्टीमेटली तो क्या था कि वैदिक युग का जो अंत हुआ अस्त हुआ उसके पीछे में यह जो साधन पद्धतियों की फ्लैक्सिबिलिटी और यह व्यवसाय वाणिज्य की फ्लैक्सिबिलिटी वो धीरे-धीरे करके रिजिड होना उसी समय शुरू हो चुकी थी कि ये ब्राह्मण का लड़का ब्राह्मण ही होगा। यदि यह कुम्हार है तो उसका लड़का कुमारीगिरी ही करेगा। यदि यह सैनिक है तो उसका लड़का सैनिक ही होगा। यह वैद्यराज है तो उसका लड़का वही होगा। बोलकर के यह वंश परंपरागत व्यवसाय वाणिज्य बाहर के जगत में जिस तरह से एक तरह का रिजिडिटी कैल्सिफिकेशन होना शुरू हुआ। आंतर जगत में भी साधन पथ में भी अभी आप कौन से संप्रदाय को फॉलो करते हैं? यदि मैं यह भक्ति मार्ग को फॉलो करता हूं तो फिर मैं और किसी मार्ग पर जा नहीं सकता। यदि ज्ञान मार्ग को फॉलो करता हूं तो और किसी मार्ग पर जा नहीं सकता। ऐसा रिजिडिटी जो है वो भीतर में और बाहर में दोनों ओर सामाजिक क्षेत्र में भी और आध्यात्मिक क्षेत्र में भी आना शुरू हो गया था। और इसीलिए आप देखिए कि हमने देखा है कि तीन लेवल पर ह्यूमन सिविलाइजेशन होती है। एक तो हमारा आंतर जगत है। हमारी कॉन्शियसनेस है। आध्यात्मिकता जहां पे फैक्टर होती है। इसके बाद में हमारा एक कम्युनिटी लाइफ है। हमारा जो परिवार है, मित्र बंधु है। उसके बाद में हमारे परिचित गण जो है कोई एक व्यक्ति मैक्सिमम कितने लोगों के साथ में वन टू वन रिलेशन रख सकता है? मुझे ऐसा लगता है कि 200 300 400 के आसपास रख सकता होगा। तो देखिए कि यह जो है 200, 300, 400, 500 मैक्सिमम यह जिसके साथ में आपका वन टू वन रिलेशन है वो हो गया आपका कम्युनिटी और फिर हो गया सिविलाइजेशनल लेवल एक्सप्रेशन। देखिए भारत की पॉपुलेशन 150 करोड़ के आसपास की है। उसमें से मैं एक भी म यह जो 300 400 को छोड़कर के रेयर किसी के साथ में मेरा वन टू वन इंटरेक्शन होने वाला है। अभी मैं ट्रेन में जर्नी कर रहा हूं और बगल की कुर्सी पे जो बैठा है उसके बाद जो बात हुआ उसके साथ तो वह एक बात है। प्लेन में जर्नी करते हैं जो मुसाफिर है साथ में उनके साथ में कुछ वार्तालाप होता है तो वह एक बात है। अदरवाइज ज्यादातर भारतीयों के साथ में हमारा पर्सनल कोई इंटरेक्शन नहीं होता। इसके बावजूद हम सभी भारतीयों को अपना मानते हैं। क्यों? क्योंकि हम सभी लोग एक ही संस्कृति से बंधे हैं। एक ही इतिहास से बंधे हैं। एक ही समाज व्यवस्था से बंधे हैं। एक ही धर्म परंपरा से बंधे हैं। तो ये एक जियोग्राफी है हमारी। यह अपने स्किन कलर है। अपनी लैंग्वेज है। यह जो लैंग्वेज फिर यह स्किन कलर फिर यह जियोग्राफी ये कल्चर ये इंस्टीटशंस ये रिलीजन ये मनुष्य बहुत बड़े मनुष्य के समाज को एक साथ में बांधता है। और यह जो विभिन्न विभिन्न जो बांधने के तरीके हैं उसको कहते हैं सिविलाइजेशन। तो देखिए कि तीन लेवल पर मनुष्य का अस्तित्व है। मेरा आंतर जगत जो कि आध्यात्मिक क्षेत्र है। मेरा यह कम्युनिटी लाइफ, सामाजिक जीवन जो कि मैं जिनके साथ में व्यक्तिगत जिनके साथ में मेरा वार्तालाप होता है, परिचय होता है, रहना खाना होता है वे लोग हैं और फिर मेरा एक लार्जर सांस्कृतिक जीवन जो कि यह सिविलाइजेशन में मैं बंधा हूं। तो, यह तीनों लेवल पर जो मेरे एक्सप्रेशन है, देखिए कि तीनों लेवल पर वैदिक युग में मेरे पास में यह फ्रीडम था। किस तरह का फ्रीडम था कि आध्यात्मिक जगत में मैं जिस रास्ते को चुनना चाहता हूं उस रास्ते पर मैं चल सकता हूं और यह जो साधन पथ है उसको फ्लैक्सिबल है। आज सुबह को भक्ति किया तो शाम को मैंने ज्ञान मार्ग का अवलंबन लिया तो दोपहर को मध्य रात्रि को मैंने ध्यान किया और फिर दिन भर में कर्म करता हूं। तो वो फ्लैक्सिबिलिटी मेरे में थी। मेरे पास में अवेलेबल थी। यह सामाजिक क्षेत्र पर देखिए कि यह वर्ण व्यवस्था थी। यह सिविलाइजेशनल लेवल पर यह वर्ण व्यवस्था किंतु यह वर्ण व्यवस्था फ्लेक्सिबल थी। मैं भले ही चाहे कुम्हार का लड़का हूं किंतु मेरे में बुद्धिमत्ता है तो मैं ब्राह्मण गुरु के पास में जाकर के वेदों का अध्ययन कर सकता हूं। वह फ्लेक्सिबिलिटी थी। और फिर यह सामाजिक क्षेत्र है। सामाजिक क्षेत्र में एक बहुत इंपॉर्टेंट फैक्टर है स्त्रियों का सम्मान। तो यह जैसे वो वेद में कहा जाता है यत्र नारियस्तु पूज्यंते तत्र रमंतु देवता। तो जहां पर नारियों की पूजा होती है या तो उनको समान अधिकार मिलते हैं, सम्मान मिलता है वहीं पर देवता गण वास करते हैं, निवास करते हैं। तो वो एक था कि समाज में हमारा यह जो कम्युनिटी लाइफ है, उसमें स्त्रियों का एक महत्वपूर्ण एक सस्माननीय स्थान था। किंतु देखिए कि वैदिक युग के अंत के साथ में ही यह तीनों लेवल पर हमारा समाज जो है हमारा भारतवर्ष जो है वो रिजिड होता गया। यह देखिए कि आंतर जगत में हम लोग संप्रदाय के फंदे में फंसना शुरू हो गए। यह संप्रदाय को मैं फॉलो कर रहा हूं तो फिर उसी को करना है। इस गुरु को फॉलो कर रहा हूं तो उन्हीं को करना है। फिर यह तो हो गया आध्यात्मिक जगत में अपना कम्युनिटी लाइफ में सामाजिक जीवन में देखिए कि स्त्रियों का जो दर्जा है, स्त्रियों का सम्मान है, उनको जो रिस्पेक्ट मिलना है, वह धीरे-धीरे करके कम होता गया। पुरुष प्रधान समाज ज्यादा होता गया। पुरुष स्त्री पर अत्याचार करता है तो भी यह समाज उसको ज्यादा पुरुष को कुछ बोलेगा नहीं। देखिए घटना है जयराम भाटी की ही है। मां उस समय वहां पर थी और पास के ही एक गांव में एक वो जो ये पालखी होता है ना पालकी ले जाने वाले जो होते हैं वो बंगाली में उनको बेहारा की ऐसा कुछ कहते हैं। तो इस तरह से वह एक सरदार था जो कि पालकी लेकर के मां को पालकी यानी प्लेंक्विन तो वह जो पालकी लेकर के मां यदि क्वालपाड़ा जाना चाहती है या और कहीं पर जाना चाहती है तो वो उसके और जो पूरा एक ग्रुप था वो पालकी ले आ जाएंगे मां को बिठाएंगे पालकी में और फिर उनको ले जाएंगे तो उनका यह जो था सरदार तो वह पास के ही गांव में रहता था। अभी उसके साथ में प्रॉब्लम क्या था कि उसकी जो पत्नी है उसने दो लड़कियों को जन्म दिया। लड़के को जन्म नहीं दे रही है। तो उस पर वह बड़ा नाराज रहता था। अभी आज देखिए कि आज के युग में आप कहेंगे कि स्त्री यदि जिम्मेदार है कौन सा जेंडर बर्थ होगा तो ऐसा है नहीं एक्चुअली यह पूरा चांस के ऊपर में है किंतु यह जो पुरुष प्रधान समाज और फिर जहां पे स्त्रियों का सम्मान खत्म हो जाना या तो फिर बहुत ही निम्न कक्षा का हो जाना जहां पे ऐसा होता है वहां पे जो भी गड़बड़ होती है घर में स्त्रियों के सर पर डाल देते हैं। तो यह जो आदमी था वह भी उसकी पत्नी से बड़ा नाराज रहता था और बीच-बीच में उसको मारता था। अभी एक दिन की बात है और फिर किंतु यह जो आदमी था मां का बड़ा भक्त था। जब भी मां बुलाएगी कि उसको बुलाओ जाना है कहीं पे तो व्यवस्था करनी है तो एकदम सस्मान मां के सामने आकर खड़ा हो जाएगा हाथ जोड़ के और जो मां बोलेगी सब स्वीकार कर लेगा। तो मां पे तो भक्ति थी उसकी वो बीवी को मारता था। तो एक दिन की घटना है। वह घर आया ऐसा हो सकता है शराब शराब पी के ही आया होगा और फिर बीवी को मारना शुरू किया। इतना मारा उसको इतना मारा। उसकी बीवी बेचारी रो रही है उसकी पत्नी। किंतु फिर दूसरे दिन पत्नी ने क्या किया? कैसे भी करके जयराम बाटी गई और मां को कंप्लेन कर दी। तो फिर मां बड़ी नाराज हो गई। अरे तुमको इस तरह से मारता है। उसको शर्म नहीं आती है। बुलाओ उसको। तो वह बुलावा पहुंचा उसको तो आकर के एकदम डर के मारे यह आदमी था मां के सामने हाथ जोड़कर के खड़ा हो गया बोलता है मां क्या हुआ अभी उसको पता तो चल ही गया होगा क्या हुआ है बीवी नहीं है घर में और कहां है तो वो तो अंदाज कर ही सकता है तो मां ने उसको डांट के कहा कि अपनी पत्नी को क्या इस तरह से मारना होता है तुम्हारे मन में तुम्हारे भीतर में अकल फकल है कि नहीं ऐसा बोल के उसको डांटा तो यह क्या बोलेगा बेचारा वो बोलता है कि मां उसने आकर करके आपको कंप्लेन कर दिया है। समझ पा रहा हूं। किंतु देखिए ना वह लड़का जन्म नहीं दे रही है। समाज में सभी लोग कह रहे हैं कि तुम्हारा वंश निर्मूल हो जाएगा लड़के का जन्म नहीं होने से। तो मां बोलती है कि देखो मां ने कुछ समय तक तो यह सुना। फिर एकाएक मां ने क्या कहा पता है? अच्छा ठीक है। चलो मैं तुमको आशीर्वाद देती हूं। तुमको लड़के का जन्म होगा। तो यह आदमी बड़ा खुश होकर के गया घर। वो और उसकी बीवी गए घर गए और सही में कुछ समय के बाद में उसकी पत्नी ने एक पुत्र संतान को जन्म दिया। अभी देखिए यह पूरी कहानी जो है इतनी डिप्रेसिंग है। एक तो है कि वो पुरुष पत्नी को मारता है और वहां पर सामाजिक कोई बंधन है ही नहीं। जैसे कि पत्नी को किसी चीज का वह प्रोटेक्शन नहीं है। आजकल तो फिर भी वुमेन एंपावरमेंट की बातें चल रही है। वहां तो बेचारी को मार ही खाना है। किसको जाकर कंप्लेन करेगी? वो एक बड़ा डिप्रेसिंग है। दूसरा कि मां ने भी उसको कहा पुत्र संतान होगा। मैं तुमको आशीर्वाद देती हूं। मां कह सकती है कि अरे स्त्री तो लड़की है। तुम्हारी दो लड़कियां है। वह तो लक्ष्मी है। वो वो तुम्हारे घर में आई है तो तुम्हारा तो अच्छा ही कल्याण ही होगा। क्यों बिना मतलब पुत्र संतान के लिए रो रहे हो? बिना पुत्र क्या लड़कियां क्या वंश को आगे नहीं बढ़ा सकती क्या? किंतु ऐसा कुछ नहीं कह के मां ने कहा अच्छा ठीक है चलो तुमको पुत्र संतान हो जाएगा। तो देखिए अभी मां का थिंकिंग मां का लॉजिक उसके ऊपर विचार करने वाले हम कौन होते हैं? तो वो बात उसको थोड़ा छोड़ दें। तो देखिए कि यह जो पूरा एक थिंकिंग है कि हां स्त्री का जो स्थान है वह नहीं वत है। पुरुष ही यह वंश परंपरा को आगे बढ़ाएगा और पुरुष नाराज होगा तो स्त्री को मारेगा भी सही और उसके पास में कोई भी लीगल या सोशल प्रोटेक्शन नहीं है। ये जो भारत का ये जो अधपतन हुआ ये जो भारत का जो ये डिग्रेडेशन हुआ तो एक तो हमारा भीतर में देखिए संप्रदाय उसमें हमारा धार्मिक जीवन कैल्सिफाई हो गया। वाटर टाइट कंपार्टमेंट में बट गया। सामाजिक लेवल पर देखिए कि स्त्री और पुरुष इस तरह से दोनों विभाग हो गए। तो पहले दोनों का इक्वल स्थान था वैदिक युग में। अभी धीरे-धीरे करके वैदिक युग के अंत के समय में दोनों का डिस्टिंक्ट लेवल हो गया। पुरुष है वह प्रधान है। स्त्री जो है उसके पास में किसी भी तरह का अधिकार नहीं। और फिर यह सिविलाइजेशनल लेवल पर देखिए कि वर्ण व्यवस्था जन्मगत हो गई। वह वंश परंपरागत हो गई। नहीं कि आपका क्षमता के अनुसार, आपकी एबिलिटीज के अनुसार आपको कार्य करने को मिलेगा। तो ये तीनों लेवल पे रिजिडिटी आ गई थी भारत में। आध्यात्मिक क्षेत्र में भी, सामाजिक क्षेत्र में भी और यह सिविलाइजेशनल लेवल पे भी। इसीलिए देखिए कि भले ही चाहे भगवान कृष्ण ने इतना जो भगवत गीता का उपदेश दिया हो किंतु वो जो डिग्रेडेशन प्रारंभ हुआ बौद्ध धर्म देखिए आप कि बौद्ध धर्म ने एक तो प्रयास किया कि ये जो कैल्सिफिकेशन जो हो रहा है जो रिजिडिटी आ रही है वाटर टाइट कंपार्टमेंट जो बनते जा रहे हैं उसको तोड़ने का किंतु फिर भी यह प्रयास बहुत लंबे समय तक सक्सेसफुल नहीं हुआ या तो फिर बहुत ज्यादा सक्सेसफुल नहीं हुआ जो भी है यह जो उसके बाद में जो हजार साल की हमारी गुलामी आन पड़ी है उसका यही एक सबसे बड़ा कारण है ना ही आध्यात्मिक जगत में हम लोग एक तरह का संप्रदा अंध अंध बन करके आ संप्रदाय को अंध फॉलोविंग कर रहे हैं। आंख बंद करके हम किसी ना किसी संप्रदाय को फॉलो कर रहे हैं। यदि मैं विशिष्ट अद्वैत को फॉलो करता हूं तो मैं उसी को फॉलो कर सकता हूं। यदि मैं ये द्वैत को फॉलो कर रहा हूं तो उसी को कर सकता हूं। शाक द्वैत को फॉलो करता हूं तो वही मेरे लिए सब कुछ है। कश्मीरी शेवज्म को फॉलो करता हूं तो वही मेरा प्राण है। अद्वैत को फॉलो करता हूं तो मैं भक्ति में जा ही नहीं सकता। यह जो आध्यात्मिक रिजिडिटी संप्रदाय में बैठ गई परिणत हो गई। यह जो सामाजिक लेवल पर स्त्रियों का स्थान तो हमको पता ही है। पिछले 1000 साल वो बहुत ज्यादा हम नहीं भी पढ़ेंगे। मां के जीवन की ही घटनावलियों को देखेंगे तो पता चलेगा कि स्त्रियों का क्या स्थान था। तो यह एक वहां पर बट गया। देखिए एक इंटरेस्टिंग कहानी है। मां की ही है। मां जय रामबाटी में है और मां को किसी ने एक आसन दिया है। मोस्ट प्रोबेबबली निवेदिता ने ही दिया है। बड़ा सुंदर आसन था बैठने के लिए। अभी पता है कि वहां पे कारपेट जैसा तो कुछ होता नहीं। गांव में वो जो गोबर से लिपा हुआ फर्श होता है ठंडी में उसके ऊपर बैठना है तो बैठने में हार्ड भी होता है और ठंड में तो ठंडा हो ही जाएगा तो फिर मां को किसी ने इस तरह का सुंदर आसन दिया बैठने के लिए तो ठीक है एक दिन एक त्यागी संतान ने देखा कि मां बंटी लेकर के बंटी अर्थात कि वो जो वेजिटेबल काटने वाला एक तरह का साधन उसको उसको लेकर के मां आसन के दो टुकड़े कर रही है तो वह इतना आश्चर्यचकित हो गया त्यागी संतान बोलता है आश्चर्यचकित होकर के अरे मां ये क्या कर रही हो इतने सुंदर आसन के दो टुकड़े क्यों कर रही हो तो मां थोड़ी सी लज्जित हो गई देखिए उसी का संतान मां का ही संतान है मां उसको जो चाहे वो आदेश दे सकती है और वो बिना किसी आर्गुममेंट के मां के आदेश को फॉलो भी करेगा किंतु फिर भी देखिए मां का कभी-कभी ये बाली का भाव हो जाता था तो तो मां एकदम तुम शर्मिंदा हो गई कुछ क्षण के लिए और फिर अपने ही बच्चे को अपने ही संतान को समझाते कहती है कि देखो बेटा यह नलिनी और राधु वह तो अपने ससुराल में रहती है और ससुराल में तो उनकी संभाल रखने वाला कोई है नहीं बेचारी का तो बैठने के लिए इस तरह से जमीन पर फर्श पे ही बैठना पड़ेगा तो मैं इस आसन के दो टुकड़े करके उनको दे रही हूं जिससे कि यह दो मेरी बच्चियां अपने ससुराल जाए तो एटलीस्ट बैठने ने के लिए कुछ आसन उनके पास में हो तो देखिए कि एक तो है मां का मातृ हृदय कि कितना यह नलिनी है राधु है उसकी चिंता करती है दूसरा सामाजिक अवस्था देखिए कि बहू घर में आई है तो उसके लिए बैठने को आसन भी नहीं वो ठाकुर की वो जो कहानी कि एक सास थी उसकी दो-तीन बहुएं थी तो उनको भात खिलाने के खाने के समय वो सास उनकी भात परोसती थी तो भात का यह जो जो बर्तन था वह थोड़ा सा छोटा था। तो अभी जितनी भूख लगी है उतना भात मिलता नहीं है। तो सब समय भूख लगी रहती थी बहुओं को। एक दिन हुआ वो बर्तन टूट गया। तो यह बहुएं जो है वो बड़ी खुश हो गई। अभी जो सास जो है उनकी वो बड़ा बर्तन लेगी और ज्यादा भात देगी। तो यह सास भी हंसती-हंसती कहती है कि चिंता मत करो आमरार हाथर अटकेल आज अर्थात कि मुझे अपने हाथ का अंदाज है। कटोरी इतनी थी तो मुझे पता है कि यह हाथ ही इतना है। इतना ही राइस मिलेगा। कम ही मिलेगा। ज्यादा नहीं मिलेगा। कोई माने खुश होने की कोई जरूरत नहीं है। तो बेचारी बहुएं निराश हो गई। तो देखिए कि यह परिस्थिति सामाजिक लेवल पर और फिर यह सिविलाइजेशनल लेवल पर तो पता ही है स्वामी जी गए हैं साउथ इंडिया केरल त्रावणकोर यानी कि केरल आज का जाके कहते हैं कि एटा देखम पागला गारद अर्थात कि यह पागलखाना है। दिस इज़ अ मेड हाउस जहां पे वो जो उच्च वर्ण के है वह घंटी ले चलते हैं। नीच वर्ण के जो है वो घंटी लेकर चलेंगे और जिससे कि जो उच्च वर्ण वाले हैं उनको देखकर के दूर हो जाए। उनका छाया जो है उनकी उनका जो यह शैडो जो है वो भी अपने पर ना गिरे। तो स्वामी जी ऐसा नाराज होकर के कहते हैं कि ये जो नीच वर्ण की स्त्रियों का भोग करना है। तब उन लोगों को कोई शर्म नहीं आती। किंतु फिर उनका उनके साथ में कोई भी सामाजिक व्यवहार करना है तो उनको बिल्कुल दूर कर देते हो। किस तरह का पागलपन है? तो यह सामाजिक क्षेत्र में भी और यह सांस्कृतिक सिविलाइजेशनल क्षेत्र में भी भारत जो है वाटर टाइट कंपार्टमेंट में ऐसा बट गया था कि जैसे कि हमारी सांस रुद्ध हो गई थी। हमारा दम रुका जा रहा था। तो उसमें देखिए कि यह ठाकुर मां स्वामी जी का उस समय में आगमन हुआ है। मां ने जिस तरह से देखिए मां को आजकल कोई भी ऐसा नहीं कहेगा कि स्त्रियों के अधिकार के लिए मां ने कोई बात की है। यदि स्त्रियों के अधिकार की बात एट ऑल आएगी तो निवेदिता को शायद लोग खड़ा कर देंगे सामने कि हां वो लड़कियों के लिए स्कूल चालू किया। मां खुद कहती है देखिए यह जो सामाजिक बंधन किस तरह के थे निवेदिता लोगों के घर जाएगी भक्तों के घर रिक्वेस्ट करने के लिए कि गर्ल्स स्कूल चालू कर रही हूं मैं स्वामी जी और मां के आशीर्वाद से तो आप अपनी लड़की को वहां पर भेजिएगा अब यह ठाकुर के ही सब भक्त वे लोग क्या करेंगे निवेदिता जैसे ही वहां से जाएगी पहले तो उनको उसको घर में ही नहीं आने देंगे क्यों म्च्छ है और ब्राह्मण उच्च वर्ण के घर में नहीं जा सकती घर अपवित्र हो जाएगा और कोई-कोई अपने घर में यदि आने भी देगा तो फिर जैसे ही निवेदिता घर से बाहर निकलेगी वह जहां पे बैठी है वह गोबर लगा देंगे वहां पे। मां खुद यह बात कहती है। देखिए कि स्वामी जी को फॉलो करके निवेदिता भारत में आई भारत में उसको इतना अपमान सहन करना पड़ता है। वह जैसे ही घर से बाहर निकलती है। वह जहां पर बैठी है, वे लोग वहां पर गोबर लिप रहे हैं। निवेदिता देख के भी अनदेखा करती है। मां के शब्द है ये। निवेदिता देखकर के भी अनदेखा करती है। इतना उसका स्वामी जी के प्रति श्रद्धा था। तो निवेदिता को फिर भी आप प्रोजेक्ट कर सकते हैं कि चलो स्त्रियों के स्वातंत्र्य के लिए वीमेन एंपावरमेंट के लिए वीमेन एजुकेशन के लिए उसने कुछ किया है। मां को इस तरह से मां का जो जीवन है जिस तरह से वह लज्जा पटावृता होकर के नौबत में रहती है। सब समय ठाकुर को अपने देवता के रूप में ही पूजती है। मां के एक त्यागी संतान मां को पूछते हैं कि मां ठाकुर क्या पूर्ण ठाकुर क्या वही अवतार है? वही ईश्वर है? तो मां कहती है हां बेटा वो है वो मेरे पूर्ण ब्रह्म सनातन है। तो मां ने क्या कहा? मेरे पूर्ण ब्रह्म सनातन है। अभी यह जिस तरह से मां ने यह वाक्य की रचना की है, फ्रेजिंग जिस तरह से मां ने किया है, तो यह त्यागी संतान कहता है कि मां मैं आपको वो तो ठाकुर तो आपके पति थे। तो पत्नी के लिए तो पति होता है पूर्ण ब्रह्म सनातन। वह तो मैं मान लेता हूं। किंतु मैं आपको पति के रूप में नहीं पूछ रहा ठाकुर के बारे में। इन जनरल पूछ रहा हूं। क्या ठाकुर वही अवतार थे? तो फिर मां ने उत्तर दिया हां बेटा वो पति भाव से भी और वैसे भी माने वो ठाकुर पति भाव से भी मेरे पूर्ण ब्रह्म है सनातन और वैसे भी पूर्ण ब्रह्म सनातन है तो देखिए कि मां बाहर से लगेगा कि इतना रिजिड सब कन्वेंशन को फॉलो कर रही है। किंतु जितना मां के जीवन में भीतर में जाएंगे। आज का ये जो फेमिनिज्म कहो ना वीमेन एंपावरमेंट कहो मुझे लगता है कि भारत में सर्वप्रथम माने आधुनिक युग में इसका जो फाउंडेशन है वो मां ने ही डाला है। मां कहती है तो कि माने घोड़ते ऐसे थे भांगते नहीं। अर्थात कि ऐसे लोग थे, ऐसी स्त्रियां थी कि जिन्होंने सामाजिक कन्वेंशन के सामने बगावत पुकारी, रेबेलियन किया और फिर किंतु क्या है पता है? ज्यादातर समय वे लोग यूरोपियन आईडियोलॉजी से प्रभावित होकर के यह सब करते थे। भारत की मिट्टी में वह सब ज्यादा बड़ा गहरा जाने वाला नहीं था। अभी जैसे देखिए ब्राह्म समाज ब्राह्म समाज में भी यह वीमेन एंपावरमेंट विधवा विवाह बाल्य विवाह को हटा देना वगैरह-वगैरह बातें चलती थी जो कि ट्रेडिशनल वीमेन एंपावरमेंट वाले पॉइंट्स कहे जाते हैं। किंतु फिर भी देखिए कि बिकॉज़ कि ये ब्राह्म समाज है। भारतीय संस्कृति में ग्राउंडेड नहीं था। बोलकर के आज ब्राह्म समाज का ज्यादा कोई अस्तित्व नहीं है। एक इंटेलेक्चुअल एक एग्जिस्टेंस है। जो इंटेलेक्चुअल लोग हैं उन लोग जिनका कि एक हिस्टोरिकल सेंस है वे लोग शायद उनको फॉलो करते होंगे। यह भारतीय जन साधारण जन समाज में इसका कोई फैलावा नहीं हुआ है। तो एक तो है कि भारतीय साहित्य संस्कृति अध्यात्म में ग्राउंडेड होकर के वुमेन एंपावरमेंट करना आई थिंक कि मां ने जो रास्ता दिखाया है वह सही रास्ता है। तो देखिए कि ठाकुर जो है वहां पे यह आध्यात्मिक जितने वाटर टाइट कंपार्टमेंट है वह जैसे टूटते हैं कि द्वैत अद्वैत ज्ञान मार्ग भक्ति मार्ग वो कोई रिजिड वाटर टाइट ये आपको बना नहीं देने हैं कंपार्टमेंट कि मैं यदि भक्ति मार्ग को फॉलो करता हूं तो वही करूंगा यह जो निबारकाचार्य को फॉलो करता हूं तो फिर मैं यह शंकराचार्य को नहीं पढ़ सकता या तो फिर वल्लभाचार्य को फॉलो करता हूं तो रामानुजाचार्य चार्य को नहीं स्टडी कर सकता या तो रामानुजाचार्य द्वारा बताई हुई साधन पद्धति को नहीं फॉलो कर सकता। यह जो रिजिडिटी है वह हटा देनी है। अधिकारी भेद के अनुसार और स्पिरिचुअल मैच्योरिटी के अनुसार। यह दोनों जो क्राइटेरिया है उसके अनुसार आपको साधन पद्धति को अपनाना है। तो वह साधन पद्धति का जिस तरह से स्वामी ठाकुर ने फ्रीडम दिया है अपने आध्यात्मिक क्षेत्र में वैसे ही यह सामाजिक कम्युनिटी लेवल है। वहां पर स्त्रियों को एंपावर करके जो हमको एक नया मंत्र मिला है ठाकुर से और मां से भी और यह जो सिविलाइजेशनल लेवल है कि यहां पे हमारा उद्देश्य क्या है? शिव ज्ञान जीव सेवा नहीं कि झूठमूठ का यह इस जाति का है वह इस जाति का है जैसे निवेदिता के साथ में होता था निवेदिता म्लेच्छ है तो हमारे घर में आई है तो जैसे ही उठकर के खड़ी होगी वैसे ही वहां पर गोबर लगा दो इस तरह का जो पागलापन था तो ये तीनों लेवल पे जो वाटर टाइट कंपार्टमेंट थे तीनों लेवल पे ये जो हिस्टोरिकल रिजिडिटी जो घुस गया था ऑर्थोडॉक्सी जो हिंदू धर्म में प्रवेश कर गया था। इस तीनों को तीनों लेवल पे इन तीनों ने तोड़ा है ठाकुर मां और स्वामी जी

साधन-मार्गों में विवाद व्यर्थ है; साधनाएँ आवश्यकता के अनुसार विकसित हुई हैं।

ने। तो देखिए कि यहां पे जो पॉइंट है शरद महाराज हमको बताना चाहते हैं। पहले तो हमको निर्विकल्प समाधि क्या है उसका एक एक ऊपर ऊपर से आभास देते हैं क्योंकि निर्विकल्प समाधि के बारे में और ज्यादा डिस्कशन और कहीं पर महाराज करने वाले हैं। यहां पे वह जो खास करके कहना चाहते हैं कि किस तरह से भक्ति मार्ग को फॉलो करके आपको ज्ञान मार्ग का जो सर्वोच्च अनुभूति है निर्विकल्प समाधि उसको आप प्राप्त कर सकते हैं। तो क्या कहते हैं शरद महाराज और और ये पॉइंट को समझाने के लिए हमने यह डिस्कशन किया कि यह भक्ति मार्ग में से ज्ञान मार्ग में जाना, ज्ञान मार्ग में से भक्ति मार्ग में आना। दीज़ आर यूनिक कैरेक्टरिस्टिक ऑफ रामकृष्ण भावधारा और कहीं पे भी जाएंगे आप इवन आजकल भी देखेंगे संप्रदाय में हम बंधे हुए हैं तो उसी संप्रदाय को ही फॉलो करना है। उससे आगे पीछे कुछ सोचना नहीं है। भक्ति मार्ग है तो भक्ति मार्ग ही है। यह शैव मार्ग है तो शैव मार्ग ही है। उससे ज्यादा आगे पीछे सोचना नहीं है। संप्रदाय को रिजिडली हमको पकड़ के रखना है। ज्यादातर तो ऐसा ही देखने को मिलेगा। आध्यात्मिक जीवन में जिस तरह से यह समन्वय किया है, समन्वय शब्द ही गलत है। समन्वय आप किस चीज का करेंगे? जो विभिन्न डिफरेंट डिफरेंट चीजें हैं, उसका आप समन्वय करेंगे। साधन पद्धति में ऐसा कोई वाटर टाइट कुछ है ही नहीं। साधन पद्धति ये रिचिड पाथ को फॉलो करती ही नहीं है हमेशा हमेशा के लिए जैसे फिजिक्स केमिस्ट्री बायोलॉजी अह जो फिजिक्स आप देखिए कि आप स्कूल में स्टडी करते हैं फिजिक्स केमिस्ट्री बायोलॉजी मैथमेटिक्स हिस्ट्री है फिलॉसोफी है सब स्टडी करते हैं। फिजिक्स का जो सब्जेक्ट होता है, उसके लिए फ़िज़िक्स का साइंस है, बायोलॉजी का जो फ़िज़ जो हमारा ह्यूमन बॉडी है, या तो ऑर्गेनिक जो भी स्ट्रक्चर्स है, उसको समझने के लिए बायोलॉजी है। फिर ये जो केमिकल इंटरेक्शन है, उसको समझने के लिए केमिस्ट्री है। क्या कोई ऐसा कहता है कि केमिस्ट्री मेरा धर्म है। जगत में जो कुछ भी है सब कुछ मैं केमिस्ट्री से समझने का प्रयास करूंगा। जो कि असंभव है। फिजिकल फिनोमिना है, मैटर एनर्जी है। उसको आप केमिस्ट्री से कैसे समझेंगे? उसके लिए आपको आइंस्टाइन का रिलेटिविटी का इक्वेशन ही चाहिए। उसके लिए आपको क्वांटम डायनेमिक्स ही चाहिए। एट द सेम टाइम ये जो सब एटॉमिक पार्टिकल है उसको आप केमिकल इंटरेक्शन कैसे समझेंगे? उसका म केमिस्ट्री से कैसे समझेंगे? तो देखिए कि यह कोई धर्म नहीं है। फिजिक्स फिजिक्स है। वह फिजिक्स के रिलेटेड जो भी फिनोमिना है उस साइंस से समझा जाता है। वह मेरा धर्म नहीं है। किंतु आध्यात्मिक क्षेत्र में हमने इस तरह का पागलामी कर दिया है कि यह जो एक लिमिटेड थिंकिंग है, एक पाथ है जो कि एक पर्टिकुलर फ्रेमवर्क में यह पाथ तैयार किया गया है। ये साधन पद्धति तैयार की गई है। जब तक यह फ्रेमवर्क सही है तब तक यह साधन पद्धति सही है। किंतु होता क्या है मनुष्य के सामने कि फ्रेमवर्क चेंज होता रहता है। जीवन के विभिन्न स्टेजेस पे भी फ्रेमवर्क चेंज होता है और यह एक इनेट एबिलिटी होती है कि उसकी क्षमता इतनी ही है। तो क्षमता के अनुसार फ्रेमवर्क चेंज होती है। तो फ्रेमवर्क तो चेंज होती है। फ्रेमवर्क के अनुसार आपको साधन पद्धति लेनी है। नहीं कि साधन पद्धति को इस तरह से रिजिड बना देना है कि जैसे कि वह उसी को मुझे फॉलो करना है और कुछ फॉलो नहीं कर पाऊंगा। साधना के प्रारंभ में कुछ तरह का रिजिडिटी ऑर्थोडॉक्सी आवश्यक है। क्योंकि उस समय हमारा मन सतत ये होता रहता है। वीक होता है। उस समय हमारा मन उस समय हमारा मन संकल्प विकल्प में फंसा हुआ होता है। तो यह संकल्प विकल्प में फंसे हुए मन को सब समय जो वीक है जो मन जिसका जो संकल्प शक्ति बहुत ही कमजोर है विल पावर कमजोर है उस समय म एक रिजिड डिसिप्लिन को यदि आपको फॉलो करने को कहे कि नहीं आपके संप्रदाय के अनुसार आपको सुबह 5:00 बजे उठना है ठंडे पानी से स्नान करना है सर के ऊपर में इस तरह का तिलक करना है गले में इस तरह की माला पहननी है शाइन में जाकर के पूजा घर में जाकर करके इस तरह से पूजा करनी है। यदि नहीं करोगे तो अधम नरक में जाओगे। ऐसा करके भय दिखा के साधना के प्रारंभ में उसको कैसे भी करके ये तमस में से उसको निकाल करके रजस और सत्व में ले आए उस समय एटलीस्ट ये रिजिड साधन पद्धति या भय दिखा के काम करवाना उस समय तो ठीक है किंतु एक बार सत्व के एक लेवल पर आ जाते हैं और फिर आपका मन जैसे कि अनंत नील आकाश में विचरण करना शुरू कर देता है उसके बाद में आप कहेंगे कि नहीं अभी भी मुझे सुबह को इतने बजे ही उठना है। अभी भी मुझे इसी तरह का तिलक करना है। अभी भी मुझे इसी तरह की माला पहननी है। अभी भी मुझे इसी तरह की पूजा करनी है। तो उस लेवल पर जाकर के ना आपको यह सब बंधन लगने लगेंगे। ठाकुर की ही बात ठाकुर अपना जो यह पैता है जनोई है उसको फेंक करके वो ध्यान करते थे। तो हृदय ने देख लिया। तो आकर के ठाकुर को डांटते हुए कहता है कि अरे कितने जन्मों की सुकृति होती है तब ब्राह्मण जन्म मिलता है तब ब्राह्मण शरीर मिलता है तो तुम यह जो जनोई फेंक के ध्यान करते हो शर्म नहीं आती ब्राह्मणत्व को तुम इस तरह से तुच्छ समझते हो तो ठाकुर क्या कहते हैं देखो भाई ये अष्टपाश छोड़कर के ध्यान करना है ध्यान करने के समय फिर मैं ब्राह्मण हूं ना कि शूद्र हूं ना कि वह रसिक मेहतर हूं ना कि मंदिर का पुजारी काली मंदिर का वह तुमको भूल जाना तो देखिए कि एक लेवल पर जब पहुंच जाते हैं मुक्त ग मुक्त पंछी होकर के नील आकाश में अपना मन उड़ने लगता है तब यह सब बंधन महसूस होते हैं तब इसको तोड़ देना है तो ये ये पूरा जो थिंकिंग है दिस इज यूनिक टू रामकृष्ण भावधारा तो देखिए कि क्या

भक्ति मार्ग से निर्विकल्प समाधि की प्राप्ति

कहते हैं शरद महाराज निर्विकल्प समाधि यह टॉपिक प्रारंभ होता है महाराज जी लिखते हैं पूर्वे बोलिया छ पहले जैसे कहा था जगत संबंधीय धारणा जगत संबंधीय साधारण धारणा ज्ञानी और भक्त उभयबीध साधक के ही त्याग करते होए जगत के बारे में जो एक साधारण धारणा है वह ज्ञानी और भक्त दोनों को ही त्याग करनी होती है। क्या धारणा कि यह जगत है भोग और सुख के लिए बना है और स्वार्थ पर होकर के इन भोग सुखों का जितना उपभोग कर ले उतना ही हमारे लिए अच्छा है। यह धारणा का त्याग करना है। और साथ में ही शरद महाराज ने कहा था यह धारणा के त्याग को ही शास्त्र वैराग्य की संज्ञा से अभिनित करते हैं। वैराग्य की संज्ञा इसको देते हैं। तो यह वैराग्य जो है वह ज्ञानी हो ना कि भक्त दोनों को दोनों साधकों को अपने जीवन में उसका पालन करना है। कोई धारणा एकांत त्यागी मानव मौन सर्ववृत्ति रहित हो या समाधिर अधिकारी होय जगत के बारे में जो साधारण धारणा है उसका संपूर्ण त्याग से ही मनुष्य का मन सर्ववृत्ति रहित होकर के समाधि का अधिकारी होता है। देखिए यह जो योग शास्त्र की जो डेफिनेशन है चित्तवृत्ति निरोध योगस चित्तवृत्ति निरोध योग क्या है? चित्त की वृत्तियों का निरोध। तो यहां पर भी महाराज कहते हैं कि जब यह जगत के बारे में यह मिथ्या धारणाएं त्याग करेंगे। जगत के भोग सुख को त्याग करेंगे। उस समय मानव मन सर्ववृत्ति रहित हो जाएगा। और सर्ववृत्ति रहित होकर के समाधि का अधिकारी हो जाएगा। वही रूप समाधि के शास्त्र निर्विकल्प समाधि आख्या प्रदान करिया छे। इसी तरह की समाधि को ही शास्त्र निर्विकल्प समाधि की आख्या प्रदान करते हैं। उसी तरह की समाधि को शास्त्र निर्विकल्प समाधि कहते हैं। ज्ञान पथेर साधक आमी वास्तविक कोन पदार्थ ए तत्व अनुसंधान अग्रसर होइया की रूप निर्विकल्प समाधि ते उपस्थित होन एवं ओ काले तार की दृश्य अनुभव होया था के ताहामरा पाठक के अन्नत्र बोलिया छ ज्ञान पथ का साधक मेरा वास्तविक स्वरूप क्या है इस तत्व का अनुसंधान करतेकरते जैसे ही आगे बढ़ता रहेगा साथ में ही किस तरह से उसके जीवन में निर्विकल्प समाधि उपस्थित होगी और उस समय उसके भीतर में किस तरह के अनुभव होते रहेंगे वह हमने पाठक को और कहीं पर कहा है। यह शरद महाराज का ट्रेडिशन स्टैंडर्ड कॉम्प्लिकेटेड सेंटेंस स्ट्रक्चर मीनिंग बड़ा सिंपल है। ज्ञान पथ के माध्यम से निर्विकल्प समाधि कैसे होती है? उसका जो विषद वर्णन डिटेल डिस्क्रिप्शन महाराज ने और कहीं पर किया है। अत एव और इसीलिए भक्ति पथ भक्ति पथ पथ कोई समाधि अनुभवे की रूप उपस्थित होया थाके के पाठक के एक तद विषय किंचित बोला कर्तव्य ज्ञान पथ के माध्यम से निर्विकल्प समाधि कैसे मिलती है और जगह पर देखेंगे। फिलहाल हम देखते हैं कि भक्ति मार्ग का जो पथिक है वह उस समाधि का अनुभव किस समाधि के अनुभव तक किस तरह से उपस्थित होगा पाठक को इसके बारे में थोड़ा बहुत यहां पर बोलना कर्तव्य है। भक्ति मार्ग के द्वारा निर्विकल्प समाधि कैसे प्राप्त होगी वह यहां पे महाराज जी हमको बताते हैं। देखिए यह ट्रेडिशनल साधन पद्धति को आप फॉलो करते संप्रदाय में बटे हुए जो हमारी पद्धतियां है संप्रदाय में ही यदि हम बटे रहते तो यह कहना कि हां भक्ति मार्ग के माध्यम से ज्ञान मार्ग का जो सर्वोच्च लक्ष्य है वो प्राप्त होगा तो वे लोग या तो आपको पूरा नाथ बाहर ही कर देंगे क्योंकि उनके अनुसार हमारी जो परंपरा है हमारा जो संप्रदाय है उसी को फॉलो करना है उसको छोड़ के और कहीं जाना नहीं है। अभी टॉपिक स्टार्ट होता है। इति इति पथे निर्विकल्प समाधि लाभर विवरण इति इति पथ अर्थात कि भक्ति मार्ग से निर्विकल्प समाधि लाभ का विवरण। अभी यह विवरण लंबा चलता है और टॉपिक भी नया स्टार्ट होता है। तो अभी इसको हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। अभी कल तो फर्स्ट जनवरी है किंतु कल क्लास करेंगे हम। यदि क्लास नहीं होगा तो मैं मैसेज रख दूंगा। अदरवाइज हम क्लास करेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।

प्रश्न : हमारे पास अद्वैत वेदांत जैसी बड़ी लिबरल फिलॉसफी थी, उसी समय हम इतने भेदभाव वाले थे कि निवेदिता के साथ बुरा बर्ताव करते थे। और वे ठाकुर के भक्त थे, कोई आम लोग नहीं।

देखिए आई एग्री विद यू 100% उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। किंतु लेट अस लुक एट अ डिपर क्वेश्चन हियर। ठाकुर के भक्तों को दोष क्यों दे? जबकि वे लोग यही सब ठाकुर को करते देखते थे। राइट? ठाकुर का जीवन देखिए कि किस तरह से रिजिड ब्राह्मिणत्व में अपने को बांध के रखा था। प्रारंभ से लेकर के कि वो कई वर्त है रानी रासमणि तो वहां पर काली मंदिर का प्रतिष्ठा उत्सव में वो खाना नहीं खाएंगे। बाद बात बाद बात बाद में भी शरद महाराज स्वयं लिखते हैं वो काली मंदिर का खाना खाना स्टार्ट तो कर दिया था। खाते-खाते रोते हैं। मां को प्रार्थना करते हैं मां और कितने दिन मुझे कई वर्ष का खाना खिलाओगी। यह जो शशि महाराज ब्राह्मण थे वह उनका आहार वगैरह सेवा करेंगे और लाटू महाराज जो कि ब्राह्मण नहीं थे तो वो जो उनका शौच वगैरह परिष्कार करेंगे। तो देखिए ठाकुर को यह कहना पड़ा महासमाधि की साइन क्या है? जिस तीस के हाथ का खाना खाऊंगा उसका अर्थ समझ लीजिए मैं महासमाधि की ओर जा रहा हूं। यानी कि जब तक देह धारण है ब्राह्मण के संस्कार इतने प्रबल है कि उसको आपको फॉलो करना है। मां के खुद के जीवन में कि एक समय आया डॉक्टर ने कहा पांव रोटी खाना है। तो मां ने कहा देखो बेटा मेरा इस उम्र में मां का आखिरी समय चल रहा था। मां ने कहा बेटा इस उम्र में तुम मुझे मुसलमान के हाथ का बनाया हुआ पांव रोटी मत खिलाओ। तो फिर एक ब्राह्मण को तैयार किया गया। पांव रोटी किस तरह से बनानी है सिखाया गया और फिर उसके हाथ की बनाई हुई मां खाती थी पांव रोटी। तो देखिए कि ठाकुर और मां इतना रिजिड ब्राह्मी संस्कार के भीतर में जिए हैं तो उनको देखकर के भक्तों को और क्या सीखेंगे? राइट? तो यहां पे वो एक क्फ्लिक्ट है। देखिए इन लोग इन दोनों का लेवल म कॉम्प्लेक्सिटी तो अपनी बुद्धि की बाहर है। ये कहना कि उन लोगों के भीतर में ब्राह्मण संस्कार का स्टेटमेंट ही फंडामेंटली गलत होना चाहिए। किंतु चलो फिर भी भगवान ने बुद्धि दी है तो उसका कुछ तो करना पड़ेगा उसके साथ यूज मिसयूज दोनों करना पड़ेगा। लेट अस ट्राई टू एनालाइज के ये व्हाट इज इसके मैं देखिए मैं खुद मेरा एक एक समय था यंग जब लड़के होते हैं ना तो कम्युनिज्म से बड़े प्रभावित होते हैं। क्योंकि कम्युनिज्म कहता है कि सबको जितना भी क्लासिफिकेशन स्ट्रेटिफिकेशन है सब तोड़ दो और सबको इक्वलिटी मिलना चाहिए समाज में। तो यंग लड़के थोड़े कम्युनिस्ट होते हैं। तो एक समय था मेरे में भी यह कम्युनिज्म जैसा था। फिर ठाकुर को मैं जितना पढ़ता हूं उतना माने चलो स्पिरिचुअल तो उनका ग्रेटनेस है ही है। किंतु यह जो ब्राह्मणत्व वाला उनका इतना रिजिड क्यों है ये मुझे बहुत आश्चर्य होता था। फिर मैं बेलूर मठ गया तो मैंने देखा कि वहां पे ब्राह्मण जिसका देह है वही पुजारी ठाकुर की पूजा करेगा। व्हिच इज कंप्लीटली रोंग। आपने एक बार सन्यास ले लिया। आपने श्राद्ध कर दिया। आप चारों वर्णों से ऊपर हो गए। उसके बाद में जिसका ब्राह्मण देह था वही तो कहना चाहिए ना। अभी तो रहा नहीं सन्यास के बाद में। इसके बावजूद जिसका ब्राह्मण देह था वही पुजारी वहां पे पूजा करेगा। तो ये क्या नौटंकी चल रहा है? ये मैं उस समय भी पूछता था। अभी भी पूछता हूं। मैंने इसका थोड़ा मेरा जो एनालिसिस है देखिए स्पिरिचुअल लाइफ जो है ना इट्स एक्सट्रीमली कॉम्प्लिकेटेड लाइफ। यह एक्सट्रीमली स्लिपरी स्लोप है। प्रत्येक स्टेप के ऊपर में आपको पैर फिसल करके मुंह के बल गिरने की संभावना है। यह जो एक्सट्रीम रिजिडिटी क्यों लाई गई है भारतीय समाज में? क्योंकि भारतीय समाज बनाया गया है आध्यात्मिक एक्सीलेंस को प्राप्त करने के लिए। तो एक एक्सट्रीम रिजिडिटी एक्सट्रीम स्ट्रेटिफिकेशन यहां पे बिठाया गया है। जिसको फॉलो करके आप निर्विकल्प समाधि तक पहुंच सकते हैं। यह कैसा है पता है? इवोल्यूशन देखिए कोई भी इवोल्यूशन जब होता है ना इवोल्यूशनरी प्रोसेस एक्सट्रीम होती है। अब जैसे यह रेप्टाइल थे एक समय में डायनासोर का राज था पूरी पृथ्वी पे और मैमल्स जो थे ना इतने इतनी साइज के मैमल्स थे और रेप्टाइल्स तो हमको डायनासोर का साइज तो पता है और 10 मंजिला मकान 50 मंजिला मकान की साइज का। तो पूरी पृथ्वी पर डायनासोर का ही राज था। मैमल्स तो इतनी इतनी साइज के किसी काम के नहीं थे। उनका कोई अस्तित्व नहीं था। किंतु देखिए कि वहां पे वो उल्कापात हुआ एमिटराइड स्ट्राइक हुआ पृथ्वी पे। उससे जो भयानक तबाही मची उसमें ये ठंडे खून वाले कोल्ड ब्लडेड डायनासोर मर गए। क्योंकि वो जो क्लाइमेट चेंज होता है तो जिसका बॉडी टेंपरेचर उसके साथ में चेंज नहीं होता। थर्मोस्टेट जिसको कहते हैं बॉडी टेंपरेचर थर्मोस्टेट। वो वार्म ब्लड या मैमल्स होते हैं वार्म ब्लड होता है। उसका खून का एक फिक्स टेंपरेचर होता है। तो बाहर के टेंपरेचर के साथ में हाईली वो जो फ्लक्चुएशन होता है तो मैमल ही बच सकता है। रेप्टाइल नहीं बच सकते। बोल कर के रेप्टाइल्स खत्म हो गए। मैमल्स को एक चांस मिल गया इवॉल्व होने का, डेवलप होने का। बोल कर के धीरे-धीरे फिर मैमल्स जो है रेप्टाइल्स के जाने के बाद में मैमल्स का राज्य पृथ्वी पे प्रारंभ हुआ। नाउ दिस इवेंट इज़ सो एक्सट्रीम। पूरी पृथ्वी को तबाही में फेंक दिया गया। वह जो मेटराइड स्ट्राइक होती है आप YouTube पे कोई वीडियो देख सकते हैं। देखेंगे वो एनिमेशन बना करके दिखाते हैं कि किस तरह से लास्ट डे ऑफ़ डायनासोर ऐसा करके मैंने एक देखा था एनिमेशन वो उल्कापात होता है और उसके बाद में जो भयानक तबाही फैलती है। सो दिस वाज़ नेसेसरी फॉर इवोल्यूशन। तो सिमिलरली यह जो अपना स्पिरिचुअल इवोल्यूशन है जो लोग फर्स्ट स्टेप रखते हैं हमेशा उसके बाद में बार-बार तबाही होने की जरूरत नहीं। एक बार वंस यू मेक दिस ट्रांजिशन आप एक नॉर्मल लेवल पे फिर इवॉल्यूशन चलता है। ट्रांजिशन लेवल इज़ वेरी डेंजरस। तो यह भारत में ना आखिर यह जो पिछले हजार 2000 साल एक इवोल्यूशनरी ट्रांजिशन हुआ है एक्सट्रीम स्ट्रेटिफिकेशन एक्सट्रीम कंडीशंस भारत में बिठाई गई है जिससे कि हम लोग निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर पाए। अभी किंतु जब हो गई है निर्विकल्प समाधि प्राप्त तो फिर यह एक्सट्रीम स्ट्रेटिफिकेशन की आवश्यकता नहीं रह गई। दिस वास इवोल्यूशनरी लीव व्हिच रिक्वायर्ड एक्सट्रीम कंडीशंस। किंतु ठाकुर ने वो प्राप्त कर लिया है। नाउ वी कैन ई अप ऑन दिस सोशल रिस्ट्रिक्शन। और इसीलिए ठाकुर ने कहा आखिरी घड़ी में जिसज के हाथ से खाना खाऊंगा समझ लेना देह जाने वाला है। दैट मींस ट्रांजिशन होने वाला है। फ्रॉम फिजिकल बॉडी था वहां से भक्तों के हृदय में रहेंगे। सो ठाकुर के जो नित्य लीला जो थी पृथ्वी पे उसमें जिस तरह से ये ट्रांजिशन हुआ है। भारत में भी पृथ्वी पे मनुष्य ह्यूमन स्पीशीज के हिस्ट्री में इवोल्यूशनरी लिप ले लिया गया है। नाउ वी कैन नॉर्मलाइज आवर सोसाइटी। दिस इज माय एनालिसिस।

प्रश्न : society is still a work in progress

ना पर किंतु देखिए इवोल्यूशन हमने प्राप्त कर लिया है जो नेक्स्ट लेवल पर जाना था निर्विकल्प समाधि रूपी इवोल्यूशन हमारा हो चुका है नाउ वी कैन इज अप ऑन दिस रिस्ट्रिक्शन इट विल टेक सम टाइम नो डाउट बट उसका जो नेसेसिटी था नेसेसिटी समाप्त हो गया

प्रश्न: इन सब विचारों को विकसित होने में हजारों वर्ष लगते है. उन्हें हम अपने छोटे से जीवन में कैसे समझ सकेंगे!

वो वो एक आदमी था तो उसको वो जीनी मिल गया। बोलता है तुमको एक विश देता हूं। क्या मांगोगे? तो वो आदमी बड़ा चालाक था। बोलते एक ही विश मिलता है तो मांगता हूं। मेरे पोते का वो चेहरा में देख के जा उसको मैं सोने की थाली में खिला करके मैं जाना चाहता हूं। यानी उसने वो दीर्घ जीवन मांग लिया। पोते का चेहरा देखना है। वो पोता होगा यानी संतान संततियां मांग लिया और उसको सोने की थाली में खिलाया। प्रोस्पेरिटी मांग लिया। बस सब कुछ एक ही जन्म में करके जा। एक ही विष में सब आ गए। नहीं हम लोग इस तरह का वरदान एक वरदान यदि मिलेगा तो एक शूद्र के साथ में पुष्पक विमान में बैठकर निर्विकल्प समाधि प्राप्त करनी है। तीनों ले वो आशीर्वाद वो मांगते हैं ना विश फुलफिलिंग ट्री।