prayer
ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग साधक भाव उसकी अवतरणी का जो पॉइंट हम देख रहे थे उसमें हमको पता है कि कल ऑलरेडी हमने ने इसका डिस्कशन प्रारंभ कर दिया है। शरद महाराज क्या लिखते हैं? दैव और पुरुषकार संबंधे ठाकुर मत। दैव अर्थात कि ईश्वर की इच्छा या ईश्वर की कृपा और पुरुषार्थ यानी कि हमारी अपनी तपस्या से हमने खुद कर की हुई मेहनत के परिणाम से प्राप्त हुआ आध्यात्मिक विकास। इन दोनों के बीच में क्या विरोधाभास है कि इन दिनों इन दोनों के बीच में एक तरह का सामंजस्य है। इसके बारे में ठाकुर क्या कहते हैं? तो फिर ऑलरेडी हमने देखा कि शरद महाराज कहते हैं ठाकुर ने दोनों तरह की बातें की है। एक और तो कहते हैं कि आमी भात रेंधे छची तोरा बाड़ा भाते बसेजा। अर्थात कि मैंने भात पका दिया है। भात बना दिया है। तुम लोग तैयार भात पर बैठकर के खाना खा लो। छांच तैयारी होए छे तोरा से छांचे निजे निजेर मन के फेल ओ गड़े तोल मैंने एक मोल्ड बना दिया है। तुम लोग सभी अपने अपने मन को इस मोल्ड के भीतर में ढाल दो और इसको ईश्वरीय स्वरूप दे दो। कि छुई जदी ना करते पारबी तो हमार ऊपर बकल मा दे यदि तुम कुछ नहीं कर पाओगे तो मुझे पावर ऑफ एटर्नी दे दो मैं ही तुम्हारी सब तरह की आध्यात्मिक चिंता करूंगा मैं ही मेरे ही आशीर्वाद से तुम्हारा आध्यात्मिक जीवन सफल होगा तो यहां पर ठाकुर कहते हैं कि जो कि ईश्वर के ऊपर में संपूर्ण निर्भर होता है उसके ऊपर में ईश्वर की कृपा होती है तो यहां पर कृपा की बात कर रहे हैं। तो यहां पे जैसे कि दूसरे कुछ सेंटेंस में ठाकुर पुरुषार्थ के बारे में कह रहे हैं। क्या कहते हैं? एक-एक कोरे सब वासना त्याग को तबे तो होवे। एक-एक करके सब वासनाओं का त्याग करो। तभी तो होगा। यह जो ठाकुर की वो जो फेमस कहानी है कि एक पत्नी ने अपने पति को कहा कि देखिए वह जो पड़ोसी है वह तो उसकी इतनी सारी बीवियां है तो एक के बाद एक करके सभी बीवियों का त्याग कर रहा है। आपने क्या अपने जीवन में त्याग किया? तो यह पति एकदम वह उत्तेजित होकर के कहता है कि ऐसे करके एक-एक करके त्याग नहीं होता है। त्याग किसको कहते हैं कि एक साथ में संपूर्ण त्याग कर दे। उसको त्याग कहते हैं। देखो जो मैं त्याग करता हूं। ऐसा बोल के वह सीधा गमछा अपने कंधे पर डाल के घर से निकल गया। ना ही एक बार पीछे मुड़कर के देखा कि पत्नी की क्या हालत है? बच्चों का भविष्य कैसा होगा? घर, प्रॉपर्टी, जमीन जायदाद इसका सब क्या होगा? एक क्षण में उसने सब फेंक करके घर छोड़कर के त्याग कर लिया। तो यह त्याग के बारे में कहते हैं झोड़ेर आगे एंटो पातार मतन होए था। अर्थात कि यह झड़ यानी कि यह जो तूफान आता है उसमें एक जो पत्ता होता है उसकी तरह हो जाओ। झड़ जहां पर पत्ते को ले जाएगी यहां पर यह पत्ता जाएगा। इसके बारे में एक दूसरा भी उदाहरण ठाकुर कहते हैं कि जैसे कि बिल्ली का बच्चा वह म्याऊं म्याऊं करता है और अपनी मां के ऊपर में संपूर्ण भरोसा रखता है। उसकी मां उसको जहां इच्छा रखेगी वह चुपचाप उसका अनुसरण करेगा। उसकी उसके साथ में जाएगा। यदि उसकी मां पकड़ करके बिल्ली के बच्चे को यदि वह बिस्तर पर रखेगी तो वह बिस्तर पर लेटा रहेगा। कहीं वह बरामदे में रखेगी तो बरामदे में लेटा रहेगा। तो मां के ऊपर में यह संपूर्ण भरोसा, संपूर्ण विश्वास और फिर आगे कहते हैं कामिनी कांचन त्याग करे ईश्वर के डाको। कामिनी कांचन का त्याग करके ईश्वर को पुकारना चाहिए। यह जो एक सुंदर कहानी है कि यह गोपाल की मां अघोरमणि देवी तो वो एक बार यहां पे आई थी बलराम भवन में बलराम मंदिर में तो ठाकुर भी वहां पे थे। उसके बाद में ठीक हुआ कि सभी ठाकुर तो जा रहे हैं दक्षिणेश्वर। तो इस इनकी भी इच्छा हो गई कि मैं भी ठाकुर के साथ में जाऊंगी दक्षिणेश्वर। तो वह वहां से जाने के लिए निकली गोपाल की मां ठाकुर के साथ में तो बलराम भवन की जो स्त्रियां थी बलराम की पत्नी या जो भी वहां पर होंगे उनको तो पता था कि यह ब्राह्मणी बेचारी गरीब है। उसके पास में तो ऐसा कुछ खाने-पीने का ऐसा कोई अच्छा सरंजाम नहीं है। तो उन्होंने क्या किया कि एक पोटली में कुछ चीजें बांध करके उनको दे दी। हो सकता है कुछ फल ना कि कुछ सब्जी वगैरह ऐसा कुछ होगा। तो जो भी है कपड़े भी हो सकते हैं। तो जो भी है यह पोटली लेकर के गोपाल की मां अघोरमणि देवी वो ठाकुर के साथ में निकली। अभी ठाकुर नौका में बैठे हैं और यह भी नौका में बैठी। अभी जा रही है नौका। एकाएक ठाकुर की नजर वह पोटली के ऊपर में पड़ी। तो वह ठाकुर तो अंतर्यामी थे। एक ही क्षण में समझ गए कि यह निश्चय बलराम मंदिर बलराम भवन की स्त्रियों ने उनको कुछ बांध करके दिया है तो वह अपने साथ में ले आ रही है। तो देखिए कि ठाकुर इस बात से ऐसे नाराज हो गए कि एक छोटा बच्चा जब नाराज होता है तो कैसे वह कातर आंख करके किसी के सामने देखता रहता है जिसके सामने वह नाराज है। तो ऐसा ऐसा करके नाराजगी भरी दृष्टि से बार-बार वह अघोरमणि देवी को और उनकी पोटली को देखते हैं। तो फिर वह अघोरमणि देवी समझ गई कि अच्छा मैंने यह पोटली यहां से ली है। यह सब चीज वस्तु ये गिफ्ट जो भी मिला है मैंने साथ में लिया है। इसलिए ठाकुर नाराज है। तो बेचारी बड़ी ही दुखित हो गई। तो अभी क्या करें? दक्षिणेश्वर में गए तो यह वह तो जाकर के सीधी मां के पास में गई। कहा मां शारदा देवी उस समय नहबत में थी तो इन्होंने कहा कि देखिए मां यह तो बलराम भवन की स्त्रियों ने मुझे यह दिया है किंतु मैं ठाकुर की नजरों से समझ गई कि ठाकुर मेरे पर बहुत नाराज है तो अभी मैं इसका क्या करूं इस पोटली का क्या मैं गंगा में फेंक दूं तो मां ने मां का बिल्कुल किंतु प्रैक्टिकल है मां ने कहा देखो वो उनकी बात पर इतना तुम सीरियसली मत लो उनको पता नहीं है घर संसार कैसे चलता है तुम इसको अपने पास में रखे रहो ऐसा कोई इस तरह से गिफ्ट लेना कोई बहुत महापाप नहीं है। भले ही चाहे ठाकुर कुछ भी कहे। तो देखिए कि यहां पे किंतु ठाकुर की दृष्टि से कि यह कामिनी कांचन त्याग यानी कि जीवन में किसी भी तरह के प्रलोभन हो। अभी आप जब ईश्वर का चिंतन करने को बैठेंगे वो आपकी वो आपका ध्यान जाएगा उस पोटली के ऊपर में कि अच्छा उसमें क्या-क्या दिया है खोल करके देखूं तो फिर खोल करके देखना। फिर वो जैसे ठाकुर कहते हैं ना कि पैसों का आनंद कैसा आनंद होता है? पैसे गिन रहे हैं तो पैसा हाथ में पकड़ा है। उसका आनंद है। फिर पैसों का वजन अपने हाथ में आता है। वह एक आनंद है। पैसों को देखते हैं। वह एक आनंद है। तो वैसे ही इस तरह की गिफ्ट आपने स्वीकार की है। तो गिफ्ट को लेकर के रहना उसको हाथ में उठा के देखना। यह सब चीजों का एक आनंद होता है। तो ठाकुर की दृष्टि से ठाकुर ठीक कहते हैं कि इस तरह का संपूर्ण त्याग किए बिना जो भी गिफ्ट हो जो भी यह छोटी-मोटी चीजें हो संपूर्ण त्याग किए बिना ईश्वर के रास्ते पर हम आगे नहीं बढ़ सकते और फिर क्या कहते हैं आमी शलो टांग कोरे छ तोरा एक टांग कोर अर्थात कि मैंने 16 आना ऐसा किया है तुम तुम लोग एक आना तो साधना कर लो तो यह ठाकुर एक और कहते हैं कि मुझ पर तुम विश्वास रखो, मुझ पर भरोसा रखो, मुझे पावर ऑफ एटर्नी दे दो। और यहां पर कहते हैं कि तुम लोग तपस्या करो ईश्वर प्राप्ति के लिए कामिनी कांचन या तो फिर यह जगत के जितने भी प्रलोभन है उसका त्याग करो। तो दैव और पुरुषार्थ इन दोनों में कौन सा सही है कौन सा नहीं। तो फिर शरद महाराज कहते हैं कि एक बार दक्षिणेश्वर में वह अपने एक मित्र के साथ में यह वाद विवाद कर रहे थे कि कौन सा बेटर है किसका किसको फॉलो करना चाहिए तो उस समय ठाकुर ने वह जो बताया उन्होंने जो सॉल्यूशन दिया तो वह सॉल्यूशन क्या है वो हम पढ़ते हैं। पहले तो यहां से स्टार्ट करते हैं। शरद महाराज लिखते हैं दक्षिणेश्वरे एक दिन आमरा जनक बंधुर सहित मानव बेर स्वाधीने इच्छा किछु मात्र आ की ना ए विषय लया अनेक खण बाानुबा पर उहार यथार्थो मीमांशा पाईबार निमित्तो ठाकुर निकट उपस्थित होई दक्षिणेश्वर में एक दिन हम एक मित्र के साथ मनुष्य की स्वाधीन इच्छा थोड़ी सी भी है कि भी नहीं इस विषय को लेकर के बहुत देर तक वादानुवाद किया, तर्क किया, आर्गुममेंट किया। उसके बाद में उसकी ठीक-ठीक मीमांसा यानी कि प्रॉपर उसका सॉल्यूशन खोजने के लिए ठाकुर के पास में उपस्थित हुए। ठाकुर बालक दिगे विवाद किछु क्षण रहस्य करिया सुनीते लागी लेन। ठाकुर अभी यह तो सब बच्चे थे उस समय ठाकुर के पास जब जाते थे तो ठाकुर कहते महाराज लिखते हैं कि ठाकुर हम लोगों के बच्चों का जो विवाद है कुछ क्षण तो उन्होंने बड़ा ही शांति से सुना रहस्य करिया सुनीते लागीन रहस्य अर्थात कि एक तरह का व्यंग विनोद जो कि किसी की किसी का इंसल्ट करने के लिए नहीं किंतु जस्ट एक थोड़ा सा आनंद कि यह बच्चे लोग इस तरह से भी सोचते हैं। तो वो जो एक्सपर्ट होता है जो मास्टर होते हैं उनको कैसा आनंद आता है कि हां बच्चे लोग इस तरह से भी सोचते हैं। तो इस तरह से ठाकुर थोड़ा सा आनंद करके यह सब सुनने लगे परे गंभीर भावे बोलीलेन किंतु बाद में गंभीर होकर के कहा स्वाधीन इच्छा फच्छा कारो किु आ रे किसी की भी स्वाधीन इच्छा वगैरह है क्या ईश्वर इच्छा ते चिर काल सब ह ओ होवे ईश्वर इच्छा से ही चिरकाल सब हो रहा है और होगा मानुष ओई कथा शेष काले बुझते पारे मनुष्य आखिरी समय में अपने जीवन के आखिरी समय में यह बात समझ सकता है तबे की जानिश किंतु फिर क्या पता है जैमन गोटा के लंबादौड़ी दिए खोटाई बंधे रखे छ जिस तरह से एक गाय को लंबी रस्सी देखकर के कहीं पर बांध बांध करके रखा है गरुटा खोटार एक हाथ दूर दाड़ाते पारे आबार दौड़ी गाछा जतो लंबा ततो दूर वो ततो दूर ग दाड़ाते पारे गाय जो है वो जहां पे उसको बांधा है वहां से एक हाथ दूर भी खड़ी रह सकती है और जितनी लंबी रस्सी जाती है वहां तक जाकर के भी वह खड़ी रह सकती है। मानुषे स्वाधीन इच्छा टाटाओ ओ रूप जान भी मनुष्य की स्वाधीन इच्छा को भी इसी तरह से समझना गरु एतोटा दुरे भीतर जेखाने इच्छा बशुक दांडाक बा घरे बेड़ाक जितनी रस्सी इसको गाय को दी है उस रस्सी की परिधि में गाय की जितनी इच्छा हो वहां पर जाकर वह बैठे खड़ी रहे ना कि वह वहां पर चलती रहे मने कोरे ही मानुषता के बांधे मन मन में करने से ही मनुष्य उसको बांध के रखता है। तेमनी ईश्वरों मानुष के कतकटा शक्ति दिए तार भीतरे से जेमन इच्छा जतोटा इच्छा व्यवहार करुक बले छेड़े दिए छ तो वैसे ही ईश्वर ने भी मनुष्य को थोड़ी सी शक्ति देकर के हमको छोड़ दिया है। फिर यह जो शक्ति हमको मिली है उसके साथ में हम चाहे जो भी करें वह फिर आखिर में हमारे ऊपर में है। ताई मानुष करे ताई मानुष मोने को छे से स्वाधीन और इसीलिए कोई मनुष्य है हम मनुष्य लोग हैं। हम लोग सोचते हैं कि हम स्वाधीन है। देखिए मेरे पास में इतनी शक्ति है कि मैं दो-तीन घंटा पढ़ सकता हूं। तो अभी मुझे लगता है कि देखिए मैं अपनी इच्छा से दो-ती घंटा पढ़ता हूं। किंतु यह दो-ती घंटा स्टडी करने की कैपेसिटी तो मुझे ईश्वर ने ही दी है। जिन लोगों को डिसेबिलिटी होती है, जो लोग फोकस नहीं कर पाते, लर्निंग डिसेबिलिटी या तो फिर यह जो जिसको कहते हैं एडीडी इस तरह का कोई भी सिंड्रोम जो होता है तो ये लोग तो फोकस भी नहीं कर पाते स्टडी करने के लिए। तो फिर इन लोगों का क्या? तो इसलिए मैं सोचता हूं कि मैं स्टडी करता हूं। मेरी अपनी शक्ति से किंतु यह जो स्टडी करने की शक्ति है वह मुझे ईश्वर ने ही दी है। दड़ीटा किंतु खोटा ही बांधा छ किंतु रस्सी वहां पर खिले में बंधी हुई है। तबे की जानिश तबे क्या पता है तार काछे कातर होए प्रार्थना को ले त ने बांधते पारेन दड़ी गास्टा आरो लंबा कोरे देते पारेन यदि ईश्वर के पास में कातर भाव से प्रार्थना करें तो ठाक ईश्वर इसको थोड़ा सा जोर से भी बांध सकते हैं और रस्सी जो है उसको और थोड़ा सा लंबा भी कर सकते हैं। चाय की गोलार बांधन एके बार खुलेते पारेन यहां तक कि यह जो रस्सी से बांध के रखा है वह रस्सी से संपूर्ण रूप से छोड़ भी सकते हैं। कथा गुली शून्य आमरा जिज्ञासा कोलाम तबे महाशय साधन भजन कराते तो मानुष हाथ नहीं मानुष हाथ नहीं शकल ही तो बोलते पारे आ जहां किु करेते छ सब तहार इच्छा ते करते छ तो अभी जब यह प्रश्न इस तरह से ठाकुर ने कहा कि ईश्वर हमको थोड़ी सी शक्ति देकर के छोड़ देते हैं। फिर इस शक्ति से हम जो कुछ भी करें यदि हम सुकर्म करेंगे हम अच्छे कर्म करेंगे तो हो सकता है कि ईश्वर इस रस्सी की लंबाई जो है इस रस्सी की जो लेंथ जो है उसको बढ़ा दे। अभी हम 5 फुट की लेंथ पे वह हम भीतर में घूम रहे थे। अभी यदि ईश्वर की कृपा हुई तो 10 फुट की लेंथ हो गई रस्सी की। कि 10 फुट का यह जो सर्कल है उसके भीतर में हम घूम सकते हैं, चर सकते हैं, खाना खा सकते, घास खा सकते हैं। अभी यदि ईश्वर की और भी कृपा हुई यदि हमने यह 10 फुट के भीतर में सुकृति यानी कि सुकार्य किए अच्छे कर्म किए जो शक्ति हमें मिली है उसमें यदि हमने अच्छे कर्मों के लिए इस्तेमाल किया तो ईश्वर की इच्छा होने से वह जो रस्सी हमारे गले में बंधी है उससे हमको संपूर्ण रूप से मुक्त भी कर सकते हैं। हमको मोक्ष भी दे सकते हैं। रस्सी और उसका बंधन बिल्कुल हमारे रास्ते में किसी भी तरह का अंतराय नहीं बनेगा। यह बहुत बार हम लोग सोचते हैं कि जो लोग खास करके मैं पहले सोचता था कि यह जो वेपन साइंटिस्ट होते हैं, यह जो न्यूक्लियर बम बनाते हैं वगैरह उनके पास में कितनी प्रचंड मेधा शक्ति ईश्वर ने दी है। किंतु इस मेधा शक्ति का इस्तेमाल यह लोग क्या करते हैं? तो ये वेपंस ऑफ मास डिस्ट्रक्शन बनाने के लिए करते हैं। यहां पे न्यूक्लियर वेपन बना दिया। यहां पे ये कोरोना वायरस बना दिया। यहां पे ये केमिकल वेपंस बना दिए। कहां पे ये बायोलॉजिकल वेपंस बना दिए। यहां पे वायरस बना दिया। तो अभी यह मेधा शक्ति का क्या अर्थ रह गया? यदि यह लोग इसका इस तरह से इस्तेमाल करेंगे तो और कोई-कोई लोग होता है जो कि उनको जो मेधा शक्ति दी गई है उसका कितना सुंदर यह लोग उसका इस्तेमाल करते हैं। यह जितने भी नोबेल प्राइज साइंटिस्ट लोगों को मिले हैं। देख लीजिए एक-एक का लाइफ उनका अभी ऐसा नहीं कहना चाहता हूं कि उनका चरित्र कोई बहुत अच्छा है। यदि आध्यात्मिकता की दृष्टि से देखें। हो भी सकता है, नहीं भी हो सकता है। दैट इज बसाइड द मैटर। बात वह है कि ईश्वर ने उनको मेधा शक्ति दी है और इस मेधा शक्ति का इस्तेमाल उन्होंने जगत के कल्याण के लिए किया है। अभी यह जो पेनिसिलिन ड्रग है उसका यह लोगों ने जो उसके इन्वेंटर थे उन्होंने फ्री में इसको सबके लिए पेटेंट खोल दिया। वरना यदि इसका पेटेंट रख लेते तो इस ड्रग का तो बड़ा ही वाइड स्प्रेड यूज़ है पेन रिलीफ वगैरह में तो उनको कितना करोड़ों-करोड़ों रुपया मिलता। अभी यह जैसे रिसेंटली यह डेमिस हसाबिस यह जो ब्रिटिश एआई इंजीनियर है तो उसने क्या किया? वो जो प्रोटीन फोल्डिंग प्रेडिक्शन करने वाला एक एआई तैयार किया। वह क्या करता है कि एक पार्टिकुलर प्रोटीन किस तरह से फोल्ड होता है वह उसको प्रेडिक्ट करता है। उसको डिस्क्राइब करता है। अभी यह जो भी नया ड्रग डिस्कवरी प्रोसेस है, पहली बात तो है कि मनुष्य लाइफ का जो बेसिक फाउंडेशन है, उसमें यह प्रोटीन बहुत बड़ा पार्ट वो प्ले करता है। यह प्रोटीन किस तरह से इनफोल्ड होते हैं, उसको प्रेडिक्ट करना वह किसी भी तरह की नई ड्रग्स यदि हमको डिस्कवर करनी है कोई भी बीमारी के लिए वो बहुत ही हेल्पफुल होता है। अभी यह कितने 200 मतलब कितने हजारों हजारों प्रोटीनंस है मनुष्य के बॉडी में मनुष्य के देह में। तो अभी एक प्रोटीन किस तरह से फोल्ड हो उसको समझने के लिए कोई एक पीएचडी स्टूडेंट उसके ऊपर थीसिस लिखेगा तो 4 साल उसको चाहिए। यानी कि पीएच केमिस्ट्री में पीएचडी किया हुआ स्टूडेंट वो यदि अपना 4 साल थीसिस का देगा तब यह एक प्रोटीन किस तरह से फोल्ड होता है वह समझ पाएगा। तो अभी तक जितने प्रोटीन फोल्ड हुए थे उसकी संख्या मेरे ख्याल से अभी एग्जैक्ट फिगर्स मुझे याद नहीं आ रहे हैं। किंतु वो कहीं 30-40 ना कि ऐसा ही कुछ होगा। इसके बाद में किंतु जब यह एआई सॉफ्टवेयर तैयार हुआ प्रोटीन फोल्डिंग किस तरह से होता है उसको प्रिडिक्ट करने का। उसने विदिन ए वेरी शॉर्ट पीरियड ऑफ टाइम कहीं कुछ पांच ही सालों के भीतर में जितने भी प्रोटीन है मनुष्य के देह में सभी सभी प्रोटीन किस तरह से फोल्ड होते हैं उसने प्रिडिक्ट करके दिखा दिया। यानी कि कहा जाता है कि कितने मिलियंस ऑफ इयर्स इन पीएचडी थीसिस बच गए। यदि कोई विद्यार्थी कोई यदि अपना यह पीएचडी थीसिस लिखता 4 साल के लिए एक प्रोटीन प्रेडिक्ट करने में तो कहीं वो मिलियंस ऑफ इयर्स लगते कि जबकि यह प्रोटीन जितने भी प्रोटीन है उन सबको कैसे फोल्ड होता है वह प्रेडिक्ट कर पाते। तो ये मिलियंस ऑफ इयर्स ऑफ़ पीएचडी वर्क इज़ कंप्लीटेड बाय एआई इन वििन अ वेरी फ्यू शॉर्ट इयर्स वेरी फ्यू इयर्स। तो और फिर क्या किया इसने? डेमिस हसाबिस ने कि यह जितना भी प्रोटीन एनफोल्डिंग डेटाबेस है उसको उसने ओपन सोर्स कर दिया। देखिए कितनी बड़ी बात है। यदि यह डाटाबेस आप यदि यह जो ड्रग्स कंपनियां है ऑलरेडी वह तो कस्टमर के पास में से पेशेंट के पास में से 500% ना कि 1000% प्रॉफिट लेते हैं। यह जो जितनी भी ड्रग्स कंपनियां है ड्रग्स इसीलिए इतनी महंगी है और इंडिया से भी जो ज्यादा अमेरिका में और भी महंगी है। तो क्या होगा कि यदि यह ड्रग्स कंपनियों को बेच दिया होता यह डेटाबेस तो वह आज बिलियनर माने मल्टी बिलियनर वह हो जाता इतना पैसा कमाता उसकी वजह उसको फॉर द सेक ऑफ द बेटरमेंट ऑफ ह्यूमैनिटी यह डेटाबेस को उसने ओपन सोर्स कर दिया जो भी ड्रग्स बनाने वाली कंपनी है इस जगत में जहां पे भी बैठी है उस डेटाबेस में से यह डाटा लेकर के इंफॉर्मेशन लेकर के अपनी ड्रग्स इसके ऊपर में बना सकते हैं। तो देखिए कि यह कितना अच्छा कार्य उसने किया है। तो क्या है कि हमको ठाकुर थोड़ी बहुत शक्ति थोड़ी बहुत बुद्धि ईश्वर देकर रखते हैं। फिर इसका हम क्या इस्तेमाल करते हैं इसके ऊपर में फिर भविष्य में और कितनी शक्ति हमको मिलने वाली है उसको वो डिपेंड करता है। यदि मैं सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए ही अपने सुख उपभोग के लिए ही इसका इस्तेमाल करूं। जैसे कि यह हिटलर है, जैसे कि यह स्टालिन है, जैसे कि ये माउस है, दोंग है। इन लोगों के भीतर में तीव्र मेधा शक्ति थी। इस बात का कोई प्रश्न ही नहीं है। अदरवाइज तो वह जिस पोजीशन पर पहुंचे, वहां पर कभी नहीं पहुंचते। किंतु फिर उस पोजीशन पर पहुंच के उन्होंने क्या किया? करोड़ों-करोड़ों अपने ही देश के लोगों की हत्या कर दी और फिर युद्ध में अपने देश को डाल दिया और इस युद्ध में और करोड़ों लोग मर गए। मनुष्य सभ्यता का इतना अकल्याण किया हो। इतना और कोई तीन नाम मुझे याद नहीं आ रहे हैं। जितने यह तीन राक्षस थे। माने इन तीन लोगों ने इकट्ठा होकर के सबसे ज्यादा नर संहार मनुष्य इतिहास में किया है। तो आप इन तीन की तरह मनुष्य का संहार करने के लिए अपनी बुद्धि लगा सकते हैं। या तो फिर आप इस तरह से डेमिस हसाबिस की तरह से यह कोई इतना सुंदर कोई इन्वेंशन करें, डिस्कवरी करें ना कि इवन आर्ट्स है, म्यूजिक है, इतने सारे फील्ड है। यू डू सम पॉजिटिव कंट्रीब्यूशन टू द सोसाइटी। और यदि आध्यात्मिक जगत में आप प्रवेश कर गए तो कोई बात ही नहीं है। यह नरसिंह मेहता फिर यह मीराबाई चैतन्य महाप्रभु यहां साउथ इंडिया में इतने सारे संत हैं। पूरे विश्व में देखिए संत महापुरुषों की कमी नहीं है। यह जैन बुद्धिज्म, बुद्धिज्म जितने भी यह अह धर्म है। सभी धर्मों में आप देखेंगे कितने महान संत एक के बाद एक हुए हैं। जिन्होंने अपनी सभी यह जो कहेंगे कि इंद्रियों की वासना की इच्छाएं है उसको त्याग करके संपूर्ण रूप से ईश्वर में या तो आत्मन में या तो ब्रह्मन में व्हाटएवर फिलॉसोफी दे आर फॉलोइंग उसके ऊपर में उन्होंने मन को एकाग्र किया और इसकी वजह से यह धरती पवित्र हो गई है। यह धरती को उन्होंने पुण्य से सिंचा इसी की वजह से जो है जनसाधारण में धर्म फैलता है। हम लोग कभी-कभी सोचते हैं कि धर्म कैसे फैलेगा तो प्रवचन देकर फैलेगा ना कि किताब लिखने से फैलेगा या तो फिर यह वार्तालाप करके ना कि दीक्षा देकर के नो डाउट इससे भी फैलता है। किंतु इससे भी ज्यादा फंडामेंटल दूसरा भी एक मैकेनिज्म है। यदि आप एक भूमि पर बैठकर के तपस्या करते हैं तो वह भूमि सात हाथ तक वह पवित्र हो जाती है। जैसे ठाकुर कभी-कभी कहते हैं ना कि एक बार कहा है कि एक आदमी वहां पे आकर के गोसिप कर रहा था दक्षिणेश्वर में। तो जैसे ही वह उठकर के चला गया तो ठाकुर ने कहा यहां पर गंगाजल छिड़क इस तरह के आदमी जहां पर बैठते हैं वहां पर सात हाथ भूमि अपवित्र हो जाती है। यानी कि वह जहां पे बैठते हैं वहां पे सात हाथ तक की डेप्थ एक हाथ को आप 1ढ़ फुट के इतना कुछ गिन लीजिए तो इतनी डेप्थ वो अपवित्र हो जाती है। इसके ऊपर में गंगाजल छिड़कना पड़ता है। इसका रिवर्स यदि देखें तो जहां पे संत ऋषि मुनि बैठ के तपस्या करते हैं वहां की सात हाथ जमीन पवित्र हो जाएगी। वहां पे किलोमीटर मतलब माइल्स अप टू माइल्स माने पूरा वो जो प्रदेश है पूरा जनपद है वो पूरा समाज है वह पवित्र हो जाएगा। तो जहां पर शांति से बैठकर के नीरव बैठकर के साधना भी करते हैं वह भी मनुष्य समाज के लिए बड़ा ही वरदायक है। तो यहां पर ठाकुर कहते हैं कि देखिए हमको लगता है कि मेरे पास में यह स्वाधीन इच्छा है कि मैं अपनी टैलेंट का क्या इस्तेमाल करूं तो वहां तक तो यह बात ठीक है। किंतु सबसे दो इसके साथ में क्सकुएंसेस अटैच है जिसको कि हमको देखना है कि मेरी स्वाधीन इच्छा पूर्ण करने के लिए जो टैलेंट मेरे पास में है सर्वप्रथम तो वह टैलेंट ईश्वर ने दी है। दूसरा कि इस स्वाधीन इच्छा का मैं किस तरह से इस्तेमाल करता हूं। दैट विल डिटरमाइन कि फ्यूचर में मुझे कितना टैलेंट मिलने वाला है। नेक्स्ट बर्थ में कि इवन ए लगर पीरियड ऑफ टाइम आप देखेंगे कि दो-ती साल के बाद में किसी किसी को अभी ठाकुर का एक मित्र था तो जिसके साथ में श्री हरि मोस्ट प्रोबेब श्री राम श्री राम ना श्री हरि ऐसा ही कुछ उसका नाम है। तो वह ठाकुर के साथ में वह बचपन में खेला करता था। तो अभी ऐसा हुआ कि ठाकुर का भी उसके ऊपर में बड़ा प्रीति था। किंतु फिर एक बार वह दक्षिणेश्वर आया बड़ा होकर के उम्र में तो यह मित्र तो ठाकुर को कहता ही कि अरे तुम तो मैंने जिस तरह से बचपन में देखा था वैसे के वैसे ही तुम हो। किंतु उसको देखकर के ठाकुर कहते हैं कि देखो कि उसके चेहरे पर जैसे कि एक काला आवरण पड़ गया है। मैं उसके चेहरे पर देख नहीं पाया। चेहरे के सामने देख नहीं पाया। इतना वह आदमी संसार में डूब गया है। वह बैठे-बैठे कहता है कि उसका पुत्र का मृत्यु हो गया। उसकी स्त्री पागलिनी की तरह हो गई है। मृत्यु शोक में पुत्र के तो इस तरह की वह घर संसार की बात कर रहा है। ठाकुर कहते हैं मैं उसके चेहरे के सामने भी नहीं देख पाता हूं। तो देखिए कि यह इसी जन्म में यदि हम इस तरह से संसार में डूब जाएंगे तो हमारा डिटेरेशन इसी जन्म में होना शुरू हो जाएगा और नेक्स्ट जन्म की तो बात ही और है। तो इसीलिए यहां पर कहते हैं कि यह स्वाधीन इच्छा की बातें लगती तो अच्छी है और हमको अनुभव भी ऐसा होता है किंतु इसके साथ में दो क्सिक्वेंसेस जुड़े हुए हैं जिसको कि हमको समझना है। अच्छा यह बात सुनकर के किंतु फिर शरद महाराज पूछते हैं कि अच्छा महाशय तो क्या स्वाधीन इच्छा हमारी बिल्कुल नहीं है। ईश्वर ही हमको शक्ति देते हैं। तो फिर यह साधन भजन करने की यह जो सुकृति है वह कहां से आती है? क्या हम ऐसा कह सकते हैं कि ईश्वर ने मुझे साधन भजन करने की क्षमता दी ही नहीं है। इसीलिए फिर मैं इस तरह के पाप कर रहा हूं। वो जो महाभारत में वो दुर्योधन कहता है जानामि में धर्मम नच में प्रवृत्ति जानामि में अधर्म नच में निवृत्ति धर्म क्या है पता है किंतु उसका पालन नहीं कर पाता हूं। अधर्म क्या है पता है किंतु उसका उसको मैं छोड़ नहीं सकता हूं। जैसे कि मेरे मन को बांधकर के कोई एक दूसरी शक्ति है जो कि मुझे ऐसे कि गुलाम परवश बना करके कार्य कर रही है। तो यह बड़ी पुरानी आर्गुममेंट है। एक और यदि कोई साधु संत कहेंगे कि हमारी स्वाधीन इच्छा है ही नहीं तो यह सुनकर के जितने भी दुराचारी है बड़े ही खुश हो जाएंगे। चलो यह साधु ने ही कह दिया है कि मेरी स्वाधीन इच्छा नहीं है। यानी कि साधन भजन करने की मेरी जो इच्छा नहीं है। मेरी यदि स्वाधन भजन करने के प्रति कोई आकर्षण प्रवृत्ति नहीं बन रही है। उसके लिए मैं दाई नहीं हूं। उसके लिए फिर भगवान ही दाई है। वह जो फेमस कहानी ठाकुर की कि एक आदमी था। उसने बड़ा सुंदर बागान बनाया। गार्डन बनाया। अब इस बगीचे में इस गार्डन में आकर के एक काऊ एक गाय आ गई और गाय ने सब यह फूल वगैरह खाना शुरू कर दिया। तो यह आदमी बड़ा गुस्सा हो गया और एक लाठी जोर से उसने उठा के गाय को मारी भगाने के लिए कि मैंने इतनी मेहनत करके फूल लगाए उसको तुम खा रही हो। किंतु लाठी का आघात इतना भयानक था कि गाय की वहीं पर मृत्यु हो गई। तो यह आदमी डर गया। सोचा कि अरे अभी तो गौ हत्या मुझे लगेगी। कि यह तो बड़ा ही डेंजरस है। तो फिर वो क्या सोचता है कि वो उसे ट्रिक करता है अपने माइंड में कि अपने को कन्विंस करता है। सेल्फ हिप्नोटिज्म जिसको कहते हैं कि हां मैंने तो गाय को मारा नहीं मेरे हाथ ने गाय को मारा है और हाथ के देवता है इंद्र अर्थात कि गाय की हत्या की है इंद्र ने। अभी जब यमदूत उसको लेने को आए नर्क में ले जाने के लिए तो उसने कहा कि मुझे क्यों ले जाते हो? इंद्र को ले जाओ। और फिर उसने यह लॉजिक समझा दिया। तो यमदूत गए इंद्र के पास। तो इंद्र कहता है अच्छा ठीक है मुझे थोड़ा सा समय दो उस आदमी की अकल को मैं ठिकाने लाता हूं बोल के इंद्र एक सामान्य आदमी का रूप लेकर के बगीचे में आए और प्रशंसा करने लगे कि अरे वाह कितना सुंदर फूल है कितने सुंदर पेड़ है वगैरह वगैरह तो जिसका गार्डन था वह भी बड़ा खुशी से प्रशंसा होती है तो फूल जाता है ना आदमी कैसे भीतर में अच्छा लगता है तो वह भी खुशख होकर के कहता है हां जी हां जी कि यह बड़ा सुंदर गार्डन है तो फिर वो जो गेस्ट है इंद्र है इंद्र पूछता है कि अच्छा अच्छा बताओ गार्डन किसने बनाया? ये फूल किसने डाले? तो वो बागान का मालिक कहता है मैंने डाले। फिर वो इंद्र पूछता है कि अच्छा बताओ यह पेड़ किसने तैयार किया? तो बागान का मालिक कहता है मैंने किया। जो भी कुछ भी इंद्र पूछता है तो वह बड़ा खुश होकर के कहता है यह भी मैंने किया। यह भी मैंने किया। तब इंद्र आखिर में अपना सही स्वरूप धारण करके उसको कहते हैं कि तबे साले कि तुम जब भी कोई क्रेडिट लेनी होती है तो तुमने वो किया है और जहां पर पाप को अपने सर से हटाना है पाप स्वीकार नहीं करना है तो तुम मेरे सर पर डाल देते हो मेरा नाम ले लेते हो जैसा ही इंद्र ने ऐसा कहा वैसे ही यमदूत आकर के वह बागान के मालिक को पकड़ करके उठा के ले गए बगीचे के मालिक को तो यहां पे भी देखिए कि हम लोग यह जो स्वाधीन इच्छा है कि नहीं है यह दोनों का इस जो डिबेट है उसका यह मिसयूज यह लोग करते हैं कौन करते हैं जिनको कि साधन भजन नहीं करना होता है इसीलिए शरद महाराज यहां पर पूछते हैं कि शकले ही तो बोलते पारन सभी लोग तो पूछ सकते हैं आमी जहां किछु कर ते छ सब तहार इच्छात ते कोते छ मैं जो कुछ भी करता हूं वह सब ईश्वर की इच्छा से ही करता हूं यदि मैं पाप कर्म करता हूं वह भी ईश्वर की इच्छा से करता हूं यदि मुझे मुझे साधन भजन करने की इच्छा नहीं हो रही है। साधन भजन करने की प्रवृत्ति नहीं हो रही है। वह भी ईश्वर की इच्छा से। तो फिर तो इस जगत में कितना दुराचार फैल जाएगा। तो फिर ठाकुर कहते हैं मुखेशुधु बोलने की होबे रे। अरे मुख सुधू मुंह से बोलते रहने से कुछ होगा रे। कांटा नहीं खोचा नहीं। मुखे बोलने की होबे। मने कांटा लग गया है पैर में। तो यह पैर मेरा नहीं है। यह दर्द मेरा नहीं है। मैं पैर के परे दर्द के परे अनंत यह समय और अवकाश के परे जो आत्मन है सतचित आनंदमय आत्मन वही मैं हूं। तो ऐसा मुंह से बोलते रहने से थोड़ी ना होगा। कांटा लगा है तो खून निकलेगा ही। खून निकलेगा तो दर्द तो होने ही वाला है। कांटा ही हाथ पढ़ ले ही कांटा फूटे उहू करे उठते होवे। जैसे ही कांटे में हाथ गिरा वैसे ही कांटा लगेगा और दर्द से उहू करके उठना पड़ेगा। साधन भजन कराटा यदि मानुष हाथ थक तो तबे तो शक्ल ही ता करते पारतो साधन भजन करना यदि मनुष्य के हाथ में होता तो सभी वो कर पाते ता पारे ना कैनो वो क्यों नहीं कर पाते हैं तबे की जानिश तो फिर क्या जानते हो जतोटा शक्ति तनी तोके दिए छ ततोोटा ठीक ठीक व्यवहार ना कर ले तनी आर अधिक देना तुमको जितनी शक्ति ईश्वर ने दी है उसका उसका ठीक-ठीक व्यवहार ना कर पाओ तो फिर ईश्वर उससे अधिक शक्ति नहीं देंगे। ओ जन पुरुषकार बा उद्यमेर दरकार और इसीलिए पुरुषार्थ या तो फिर उद्यम की आवश्यकता है देखना देखो ना शकल के ही किसीु ना किछु उद्यम करें तबे ईश्वर कृपा अधिकारी होते हुए सभी को थोड़ा बहुत तो उद्यम करके थोड़ा बहुत तो मेहनत करके तपस्या करके साधन भजन करके बाद में ही ईश्वर की कृपा का अधिकारी होना पड़ता है ओ निरूप कर ले तार कृपाई 10 जन्मेर भोगटा एक जन्मे ही केटे जाए थोड़ा बहुत साधन भजन करेंगे तो 10 जन्म तक हमको जो कष्ट भुगतना होता था वह एक ही जन्म में समाप्त हो जाएगा किंतु तार ऊपर निर्भर करे किु ना किछू उद्यम करते ही हो किंतु उनके ऊपर में भरोसा करके श्रद्धा और शरणागति से थोड़ा बहुत तो उद्यम करना ही पड़ेगा। अभी देखिए कि यहां पर वह ठाकुर का वह जो एक उदाहरण है कि एक आदमी जा रहा था रास्ते से होने वाला था उसका कर्म ऐसा था कि उसके उसका पैर टूटने वाला था किंतु फिर वह जो थोड़ा बहुत साधन भजन करता था उसकी वजह से पैर तो नहीं टूटा किंतु पैर में एक कांटा लग गया। तो इसी तरह से कर्म का भोग उसके ऊपर में से हो गया। और इसी के बारे में और एक अजामिल की भी कहानी है। ठाकुर कहते हैं कि अजामिल ने पूरा जीवन नारायण को गाली देकर बिताया। किंतु आखिर में उसने आखिरी मृत्युशैया पे उसने अपने पुत्र को बुलाया। उस पुत्र का नाम था नारायण। तो जो एक बार नारायण नाम लिया तो उसको मुक्ति हो गई। तो कहा जाता है कि कहां उसने पुरुषार्थ किया? कहां उसने उद्यम किया? तो ठाकुर साथ में ही कहते हैं किंतु कहा जाता है कि अजामिल को उसके बाद के जन्मों में बहुत सारी तपस्या करनी पड़ी थी या तो फिर उसने की थी। यानी कि ठाकुर क्या कहते हैं? कभी-कभी पहले फूल आते हैं, बाद में फल आते हैं। यानी कि पहले हम तपस्या करते हैं, बाद में हमको सिद्धि मिलती है। किंतु कभी-कभी ऐसा होता है कि पहले फल आ जाते हैं, बाद में फूल आते हैं। यानी कि पहले हमको सिद्धि मिल जाती है और फिर हम उस सिद्धि को चरितार्थ करने के लिए तपस्या करते हैं। साधन भजन करते हैं। यही जो त्यागी संतानों को ठाकुर ने कहा था कि तुम लोग तपस्या करना। राजा महाराज को जब किसी ने पूछा कि ठाकुर के आशीर्वाद से आपको आध्यात्मिक जगत में सब कुछ मिल गया है तो आप साधन भजन तपस्या क्यों कर रहे हैं तो फिर राजा महाराज ने क्या कहा वो निजेर करे निवार जनो वो अपना अपना कर लेने के लिए अपना लेने के लिए जो सिद्धि ठाकुर ने दी है उसको अपना लेने के लिए हम लोग साधन भजन कर रहे हैं तो यहां पर देखिए कि साधन भजन थोड़ा तो करना ही होगा थोड़ी सी तो तपस्या करनी ही होंगी जो शक्ति हमको मिली है उसके माध्यम से अदरवाइज फिर क्या होगा कि जो शक्ति आज हमको मिली है सदुपयोग नहीं करने से हो सकता है कि नेक्स्ट जन्म में या तो नेक्स्ट कुछ सालों में यह शक्ति भी चली जाए। देखिए आज का जो मॉडर्न ब्रेन साइंस है वह भी यही कहता है कि यदि आप कंटीन्यूअसली अपने ब्रेन का यूज करते रहते हैं फॉर एनी इंटेलेक्चुअल टास्क कोई भी बौद्धिक कार्य के लिए ब्रेन का यूज करते हैं तो फिर यह जब हम वृद्धावस्था की ओर जाती है तो वह जो ब्रेन का जो डिटरेशन होता है वह रुक जाता है या तो फिर स्लो हो जाता है। किंतु यदि आपने ब्रेन का यूज करना बंद कर दिया, तो फिर यह ब्रेन के साइनप्सिस से उनके बीच का जो कनेक्शन है, वह टूटता जाएगा और वृद्धावस्था में अल्जाइमर जिस तरह के जो मानसिक रोग हैं, उसका इजीली हम भोग बन जाएंगे। यानी कि जब तक कोई भी अभी बॉडी के बारे में भी साइंटिस्ट लोग कहते हैं कि यह जो सप्ताह में एटलीस्ट इतना इतना घंटा आपको एक्सरसाइज करना पड़ेगा। जिससे क्या होगा कि आपके मसल की एट्रोफी है या तो फिर मसल का यह जो स्ट्रेंथ है वह कम नहीं होगा। मस्कुलर स्ट्रेंथ बना रहेगा। यदि आप एक्सरसाइज नहीं करेंगे मिनिमम जो एक्सरसाइज पीरियड बताया गया है वीकली वो नहीं करेंगे तो आपके मसल जो है उसकी जो स्ट्रेंथ है वह धीरे-धीरे कम होना शुरू हो जाएगी। वृद्धावस्था में आपका बॉडी बिल्कुल वीक हो जाएगा। यानी फिजिकल या मेंटल एक्सरसाइज हम जितना करें इतना ही अपना बॉडी फिट रहता है। माइंड एंड बॉडी फिट रहते हैं। तो यहां पे भी आध्यात्मिकता में भी ईश्वर ने हमको जितनी शक्ति दी है उसको एक्सरसाइज करते रहना चाहिए। वरना जो दी हुई शक्ति भी चली जाएगी। और यदि एक्सरसाइज करेंगे तो हो सकता है कि ईश्वर की कृपा से ईश्वर के आशीर्वाद से यह शक्ति बढ़ती जाएगी। इसके बारे में ओई विषय एक गोलप्पो शो इसके बारे में एक कहानी सुनो तो अभी एक नया टॉपिक महाराज चालू करते हैं। उसका टाइटल दिया है ओई विषय श्री विष्णु और नारद संवाद और इसी के बारे में विष्णु और नारद संवाद गोलोक बिहारी विष्णु एक बार नारद के कोनो कारण अभिशाप देन जे तो केके नरक भोग करते होवे गोलोक बिहारी यानी कि जो भगवान विष्णु है एक बार नारद को किसी कारण से श्राप देते हैं कि तुमको नरक भोग करना होगा। नारद भे आकुल नारद तो चिंता करते करते ही बेचारे परेशान हो गए नाना रूपेश तब स्तुति करे ताके प्रसन्न करे बोलले अच्छा ठाकुर नरक को थाई की रूप कतो रकम ही बा आर जानते इच्छा हो कृपा करे आमा के बोलन तो स्तव स्तुति करके नारायण को प्रसन्न करके फिर नारद मुनि ने पूछा कि अच्छा ठाकुर बताइए यहां पर ठाकुर यानी कि भगवान स्वयं कि अच्छा भगवान बताइए कि नरक कहां पे है? किस तरह का है और कितने प्रकार का है। मेरी जानने की बड़ी इच्छा हो रही है। कृपा करके मुझे बताइए। विष्णु तखन भूए खड़ी दिए स्वर्ग नरग पृथ्वी जेने जे रूप आ एक दिए एकके देखिए बोललेन एक खाने स्वर्गो आर एकखाने नरक तब विष्णु ने क्या किया? अभी नारद की बड़ी इच्छा है कि नर नरक क्या है? स्वर्ग क्या है? कितने प्रकार के हैं वह देखने की तो उन्होंने जमीन पे किसी चौक से यह आकृति दौड़ करके पिक्चर दौड़ के दिखा दिया। क्या दिखाया कि स्वर्ग नर्क पृथ्वी जहां पे जिस तरह से है वह दौड़ करके ड्रॉ करके दिखा दिया और कहा यहां पे स्वर्ग है और यहां पे नरक है। नारद बोलले बोटे तबे हमार ए नरक भोग हलो। नारद ने कहा अच्छा तो फिर यही मेरा नरक भोग हो गया। बोले ही वही आंका नरक के ऊपर घड़ाग घड़ी दिए उठे ठाकुर के प्रणाम कर ले। ऐसा करके ही उन्होंने जो नरक जो भगवान ने जमीन पर दौड़ा था उसी के ऊपर में लेट गए और फिर खड़े होकर के भगवान को प्रणाम किया। देखिए कितनी अच्छी बुद्धि है। भगवान विष्णु ही तो इस नरक और स्वर्ग के वो सृष्टि करता है। यदि उन्होंने यदि दौर करके दिखा दिया। यदि कहा कि यह नरक है तो फिर क्या सही में नरक हो गया क्योंकि भगवान की इच्छा मात्र से ही तो यह सब प्रकट होता है। वो जो हमने ज्ञान योग में पढ़ा था स्वामी शिष्य संवाद में पढ़ा था कि किस तरह से फिर वो अनाहत ध्वनि अनाहत ध्वनि में से ओमकार ओमकार में से जितने भी पदार्थ है वह पदार्थ के शब्द जैसे कि गाय एक पदार्थ है तो गाय शब्द प्रकट हुआ और फिर इस शब्द में से एक्चुअल वह ऑब्जेक्ट्स प्रकट हुए और फिर जब आप नेति करके निर्विकल्प समाधि की ओर या तो फिर प्रलय की ओर जाते हैं पहला हो गया सृष्टि और यह प्रलय प्रलय जब होगा तो क्या होगा? जगत के जितने भी पदार्थ हैं वह अपने शब्द में लय हो जाएंगे। शब्द ओमकार में लय हो जाएगा। ओमकार अनाहत ध्वनि में लय हो जाएगा और अनाहत ध्वनि ब्रह्मन में लय हो जाएगा। यानी कि सृष्टि संपूर्ण रूप से समाप्त हो गई। और फिर जब सृष्टि का नया चक्र प्रारंभ होगा तो ब्राह्मण में से अनाहत ध्वनि अनाहत ध्वनि में से ओमकार ओमकार में से गाय वगैरह जितने भी शब्द है पेड़ पौधे मनुष्य फूल फल जितने भी शब्द है वह प्रकट होंगे और शब्दों में से पदार्थ प्रकट होंगे। तो यह देखिए कि इच्छा मात्र से ही इन्हीं के ब्राह्मण के भीतर में से ही यह सब प्रकट होता है। तो ब्राह्मण यदि एक बार बोल दे कि यह नरक है तो वह तो सही में नरक हो गया। नॉट नेसेसरी कि दोरा हुआ है असल है। यह दौड़ा हुआ असल यह डिस्टिंशन फिर उनके सामने काम नहीं करता। तो यहां पर भी जब नारायण ने स्वयं दिखा दिया जमीन पर दौड़ करके कि यह नरक है तो फिर यह नारद मुनि ने उसमें लेट करके अपने का अपना नरक भोग कर दिया। अभी देखिए कि नरक भोग तो उनको करना पड़ा। जो भी पाप थे या जो भी कर्म किया है उसको उनको भुगतना तो पड़ा किंतु वही है कि उसकी जो सीवियरिटी है उसकी जो तीव्रता है वह बहुत कम हो गई। सही-सही नरक में जाते हैं। अभी देखिए सही गलत यह सब तो यहां पर काम नहीं करता ना। जो कि पॉपुलर कंसेप्शन में जो नरक है हमारे वो दिस इज अ बेटर वर्ड कि जो हमारे जो पॉपुलर कंसेप्शन में जो नरक है उसमें यदि जाते हैं तो राक्षस लोग कितनी यंत्रणा देते हैं। यहां पे मिट्टी में आपको सिर्फ लेट जाना है। एक बार आपके कपड़ों में धूल लगेगी। इतना ही इससे ज्यादा और कुछ नहीं होने वाला है। तो तपस्या करके अभी जो भगवान की प्रार्थना की इस तवस्तुति की उनको प्रसन्न किया तो इस तरह से तपस्या करके आपको अपनी यह जो कर्म है इसको काट देने हैं। तो फिर विष्णु हंसते-हंसते बोले शेकी तुम्हार नरक भोग होलो कई तो यह भगवान विष्णु भी समझ गए कि नारद की नारद की चालाकी तो फिर वो हंसते-हंसते बोले क्या कर रहे हो? तुम्हारा नरक भोग कहां हुआ है? तो नारद बोलले नारद ने कहा कैनो ठाकुर तुम्हारे सृजन तो स्वर्ग और नरक क्यों भाई ईश्वर आप ही का जो सृजन है स्वर्ग और नरक तुम ही ए देखिए जोखन बोलले ए नरक तोन ओ स्थान शत शत ही नरक हो आपने जदी यहां पे तुम ही शब्द यूज़ किया है तुमने जदी यह दौड़ करके दिखा दिया कि यह नरक है तो वह स्थान सही सही में नरक ही हुआ आर आमी ताते गड़ागड़ी देवाते अमार नरक भोग होए गो और उसमें लेट जाने से मेरा नरक भोग हो गया। नारद कथागुली प्राणर विश्वासेर सहित बोलले कि ना नारद यह बात पूरे प्राण के विश्वास के साथ बोले नहीं बोले ना इसलिए विष्णु ताई तथास्तु बोल लेन और इसीलिए विष्णु ने कहा तथास्तु यही तुम्हारा नरक भोग हो गया नारद के किंतु तार ऊपर ठीक ठीक विश्वास करे वही आका नरक के गड़ागड़ी दीते हो अर्थात कि नारद को उनके के ऊपर में ठीक-ठीक विश्वास करके वह दोहरा हुआ नरक था उसमें लेटना पड़ा उसमें रेंगना पड़ा वही उद्यम टुकु करें इतनी तो उनको वह जो तपस्या करनी पड़ी तबे तार भोग काट लो तब उनका नरक भोग कटा तपस्या यदि करेंगे तो फिर ईश्वर स्वाधीन इच्छा भी देंगे ईश्वर यह जो कर्म के फल है वह भी काट देंगे ए रूपे कृपा राज्य जे उद्यम ओ पुरुष स्थान आचे ताहा ठाकुर गोलपोटी सोहाए कखनो कखनो आमादिक के बुझया बोली तेन इसीलिए कृपा के राज्य में भी उद्यम और पुरुषार्थ का स्थान है। यह बात ठाकुर इस तरह के वार्ताओं कहानियों के सहाय से मदद से कभी-कभी हमको समझा देते थे। देखिए कि यह जब डिबेट लेकर के वह शरद महाराज सर्वप्रथम ठाकुर के पास में आए कि महाशय यह स्वाधीन इच्छा है कि नहीं है तब तो ठाकुर पहले तो कर कह देते हैं एकदम स्पष्ट रूप से कह देते हैं कि देखो स्वाधीन इच्छा टिच्छा की आश्चर्य स्वाधीन इच्छा वगैरह कहां पे है ईश्वर ही सब कुछ करते हैं और युवावस्था में हमको समझ में नहीं आएगा किंतु वृद्धावस्था में हमको समझ में आएगा यह बात ठाकुर बिना किसी कंडीशन दिए बिना किसी ये यह दिए इफ बट करते हुए ठाकुर ने स्पष्ट शब्दों में हमको समझाई है। यानी कि हमारी स्वाधीन इच्छा बिल्कुल नहीं है। किंतु यह बात है कि देखिए कि स्वाधीन इच्छा नहीं होना इसका अर्थ यह नहीं है कि हम दुराचार करने लगे। हम लोग यह करना शुरू कर दें कि जो मैं करता हूं वह सब नारायण की इच्छा से ही करता हूं। क्योंकि नारायण ने मुझे स्वाधीन इच्छा दी ही नहीं है। एक इंडिपेंडेंट थॉट कभी दिया नहीं है। इंडिविजुअलिटी जो स्वामी जी अमेरिका गए थे तो सभी लोगों का एक टेंशन है कि यह ईस्टर्न जितने भी रिलीजन है वो इंडिविजुअलिटी को मेंटेन नहीं करते। इंडिविजुअलिटी को एक कलेक्टिव उसके भीतर में समा देते हैं। तो उनको इंडिविजुअलिटी का बड़ा एक टेंशन रहता था। तो स्वामी जी को बार-बार समझाना पड़ा कि वेदांत के भीतर में जो इंडिविजुअलिटी है उस तरह की इंडिविजुअलिटी और कहीं पर नहीं है। आप लोग सोचते हैं कि यह काम, कांचन, मदद, मोह, लोभ, मोह से घिरा हुआ आपका जो मन है, अपवित्रता से बना हुआ जो आपका मन उसकी आप इंडिपेंडेंस चाह रहे हैं। इससे भी परे चाहिए। इससे भी परे जाइए। आपकी जो आत्मन है, आत्मन तो यह समय और अवकाश की सीमाओं से परे है। बिय्ड द बाउंड्रीज ऑफ स्पेस, टाइम एंड कोजालिटी। दैट इज द ट्रू ग्लोरी ऑफ योर आत्मन। बी इंडिविजुअल विद इन द ग्लोरी ऑफ योर आत्मन। यदि आपको इंडिविजुअलिटी की ही फिक्र करनी है, तो थिंक योरसेल्फ एज़ एन आत्मन रेदर देन ऐज़ अ बॉडी व्हिच इज़ व्हिच हैज़ टेकन बर्थ फ्यू इयर्स एगो। इट इज डिक्लाइनिंग ऑलरेडी एंड विद इन ए फ्यू इयर्स इट विल रिटर्न टू डस्ट। फ्रॉम डस्ट टू डस्ट इज द जर्नी ऑफ अ ह्यूमन बॉडी। बट फ्रॉम इमोर्टलिटी टू इमोर्ट फ्रॉम इनफाइनाइट ब्लीस टू इनफाइनाइट ब्लीस इज़ द जर्नी ऑफ़ द ह्यूमन सोल। सीक योर इंडिविजुअलिटी विद इन ह्यूमन सोल एंड नॉट विदिन दिस मटेरियल बॉडी। ना स्वामी जी को भी वहां पे इसी बात का बड़ा सामना करना पड़ा था। तो यह यहां पे ठाकुर का उत्तर है। अभी इसका बाद का जो पॉइंट है अभी हम नेक्स्ट क्लास में लेंगे। आज यहीं तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु। मुझे ऐसा नहीं लगता कि इसमें नाम और नाममी अभेद वाला मैसेज छुपा है क्योंकि ईश्वर स्वयं उन्होंने अभी जैसे यह जो कहा कि जो सिंबॉलिज्म है कि सिंबल एंड रियलिटी इन दोनों के अभी जैसे ओमकार बेसिकली जैसे हमने वो देखा स्वामी जी का जो कांसेप्ट है कि ओमकार के भीतर में से शब्द आया है। शब्द में से पदार्थ आए हैं। तो यदि इसको आप प्रोसेस को रिवर्स करेंगे तो पदार्थ शब्दों में शब्द ओमकार में मिट जाएंगे और यह सब अनाहत ध्वनि में और अनाहत ध्वनि ब्रह्मण में चला जाएगा। सो यह जो सीक्वेंस ऑफ क्रिएशन है वहां पे देखिए मॉडर्न साइंस में बिग बैंग है कि किस तरह से विदिन बिग बैंग जो एनर्जी एक्सप्लोजन हुआ उसमें से ये पहले अह क्वार्क्स या तो स्ट्रिंग्स बनी व्हिच एवर इज़ लेटेस्ट थिए ना अवर डेज़। उसमें से फिर ये इलेक्ट्रॉन प्रोटॉन न्यूट्रॉन बने। फिर उसमें से ये स्टेबल एटम बने। वह उनका थ्यरी है। क्रिएशन ऑफ यूनिवर्स का अपना यह थ्यरी है। सो शब्द में से पदार्थ आए हैं तो यदि इसको कहा कि यह नरक है तो नरक जब क्रिएट हुआ होगा तो पहले तो नरक शब्द क्रिएट हुआ होगा। फिर नरक शब्द में से एक्चुअल नरक आया। तो उसी नरक शब्द का प्रयोग यदि वही नारायण करते हैं कि हां यह नरक है तो वही प्रोसेस हुआ ना। अभी वह उसमें आप बड़ा नरक बनाते हैं। जहां पर अग्नि के भीतर में आप मनुष्य को डालते हैं। यहां पर जमीन पर बनाते हैं। बट दैट डज नॉट मैटर। बोथ आर एसोसिएटेड विद द वर्ल्ड नरक एंड बोथ आर अटर्ड बाय नारायण। हम बोलने से कुछ नहीं होगा। स्वामी जी उसी समय कहते हैं वो जो जो डिसाइपल प्रश्न करता है शरदचंद्र कि हम लोग बोलते हैं तो क्यों कुछ नहीं होता? मैं नरक बोलूंगा, मैं गाय बोलूंगा। क्यों गाय प्रकट नहीं होती? तो स्वामी जी क्या कहते हैं कि जो सत्व माने संपूर्ण सात्विक या तो फिर जो कि त्रिगुणातीत नारायण स्वयं है यानी कि वही बोलने से होगा। दूसरा कि यदि मुझे सिद्धि प्राप्त हो गई मोक्ष या निर्वाण प्राप्त हो गया तो फिर मेरे पास में वह शक्ति आ जाएगी कि जो शब्द मैं बोलूंगा वो सत्य में परिणत हो जाएंगे। वो योग सूत्र का एक सूत्र भी है कि सत्य वचन का पालन करने से हम लोग जो कुछ बोलते हैं वह सही हो जाता है। तो अभी वो जो हलधारी की कहानी थी ना कि हलधारी तपस्या करता था। यह भागवत वगैरह पढ़ता था। तो जो जिसको जो बोलता था वह सत्य हो जाता था। तो वो ठाकुर को उसने एक बार श्राप दे दिया कि तुम्हारे मुंह में से रक्त निकलेगा। तो ठाकुर के मुंह में से सही-सही रक्त निकलने लगा। फिर वो एक बार वहां पर वो एक साधु रहते थे। उन्होंने आकर के कहा कि अच्छा चिंता मत करो यह तो अच्छा ही हुआ है शराब की वजह से कि वह कुंडलिनी मस्तिष्क की ओर जा रही थी हठ योग की साधना के परिणाम से तो उसके अंत में जड़ समाधि हो जाती तो ऐसा नहीं होकर के यह जो कुंडलिनी रक्त के माध्यम से मुंह में से निकल गई तो जड़ समाधि नहीं होगी। मां जगदंबा की आपके ऊपर में कृपा है। आपके द्वारा कोई अच्छा कार्य करवाना चाहती है। इसलिए आपकी जान बचा दी। तो हलधारी ने श्राप दिया तो ऐसा हो गया। सो जो सिद्ध व्यक्ति है, संत है, उसके शब्द वास्तविकता में परिणत हो जाते हैं। वहां पे आप वो बात कर सकते हैं नाम नामी अभेद कि राम का नाम राम के नाम से पत्थर तैर जाते हैं तो यह आदमी क्यों नहीं तैरेगा? वहां नाम या वेद आप चला सकते हैं। को विश्वास था लेकिन स्वामी जी दो बातें यहां पे कहते हैं। पहले तो जो जैसे वो फेमस कहानी है कि वो वहां पे राजा के दरबार में बैठे थे वो मूर्ति पूजा के बारे में चर्चा हो रही थी। तो आज का जो मॉडर्न वो उस समय का था कि मतलब आइडोल्स जितने भी है उसकी पूजा नहीं करनी है। तो फिर स्वामी जी ने कहा अच्छा ठीक है ये राजा के पिताजी की छवि है उसके थूक के दिखा दो। तो वह वजीर तो बड़ा ही परेशान हो गया, डर गया कि राजा के पिताजी की छवि पर कैसे थूक सकते हैं। तो क्यों? क्योंकि द इमेज रिप्रेजेंट्स द रियल पर्सन। यदि आपके मन में यह विश्वास है कि ये छवि अलग है और पर्सन अलग है तो आप आराम से छवि का आप इंसल्ट कर सकते हैं। इमेज का इंसल्ट कर सकते हैं। किंतु मन में यह पक्का बैठा हुआ है कि इमेज को क्यों बिठाया है टू रिप्रेजेंट द रियल पर्सन। फिर दूसरी बात यहां पर वह जो लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा में स्वामी जी कहते हैं कि यह जितने भी आइडोलेटरी गलत है आइडोलेटरी जो करते हैं सब पापी है। ऐसा कहने वाले क्रिश्चियन लोग हैं वे लोग करते क्या है कि जहां तक उनके आइडोल्स का सवाल है वह पवित्र है। दूसरों के आइडोल है वह गलत है। ईश्वर यदि एक कबूतर के रूप में एक डव के रूप में आ जाए तो वह महापवित्र है। किंतु गाय के रूप में आ जाए तो वह भयानक अंधश्रद्धा है। तो माने यह ऐसा कहने वाले कि जो आइडियोलेटरी गलत है, मूर्ति पूजा गलत है, वह अपनी मूर्तियों को छोड़कर बाकी सब की निंदा करते हैं। सो दैट इज देयर। किंतु आपने ठीक कहा कि दैट इज के विश्वास होना चाहिए। तभी यह सब कुछ चीजें ठीक होगी। और जैसे वह जो स्वामी जी की कहानी इसी हमने देखा ना कि छवि पर थूकना नहीं चाहते। भीतर में तो यह क्लियर रहता है। किंतु यह जो प्रोपेगेंडा जो होता है आजकल विदेश से उसके सामने हम इतना कंफ्यूज हो जाते हैं कि फिर वह हमारा सनातन धर्म भूल करके उनकी बातें सुनना शुरू कर देते हैं। बिल्कुल ठीक। इसी तरह की दूसरी भी कहानी है कि राम का नाम लेकर के हनुमान समुंदर छलांग लगा के चले गए। किंतु राम खुद हनुमान की तरह छलांग ना लगा पाए। उनको सेतु बनाना पड़ा। तो यह बात सही है कि मैं अपने खुद पे फिर तो अहंकार आ जाएगा ना वो वो एक प्रश्न है कि मैं अपने पे इस तरह का विश्वास करना शुरू करूं तो अहंकार आ जाएगा। अभी आप कह सकते हैं भगवान राम के भीतर में अहंकार कैसे हो सकता है? किंतु फिर वही बात है कि नारायण जब देह पंचमहाभूत का देह धारण करते हैं तो थोड़ी तो अशुद्धि रखनी पड़ती है। अशुद्धि नहीं होगी। अभी जैसे वह जो एक फेमस मैंने कहा ना कि अपने एक व्यक्ति एक जो बड़े ही विद्वान है वह कहते हैं कि वह मां शारदा देवी ने पागली मामी को जो श्राप दिया कि तुम्हारा हाथ यह टूट जाएगा माने खस खसे जावे यानी कि तुम्हारा हाथ गल जाएगा। तो यह श्राप मां दे ही नहीं सकती है। यह कहानी गलत लिखी गई है। क्योंकि ठाकुर ने कहा है जिसको निर्विकल्प समाधि प्राप्त होती है वह कभी गलती से भी गलती नहीं कर पाएगा। किंतु देखिए कि यहां पे आप वेदांत को लेके आइए। वेदांत एक्चुअली क्या कहता है? जब तक आप संसार में हैं तब तक आप त्रिगुण तीनों गुणों से बंधे हुए हैं। यदि आप तीनों गुणों से बंधे नहीं है तो आप गुणातीत है और ब्रह्मन में स्थित है। यदि ब्रह्मन में स्थित है तो आप किसी भी तरह का कार्य नहीं कर पाएंगे। क्योंकि ब्रह्म अचल है। स्थिर है। वह किसी भी तरह का कार्य नहीं करता। कार्य कारण के जगत में आने के लिए आपको शक्ति के इलाके में आना होगा। शक्ति के राज्य में आना होगा। और जैसे ही शक्ति के राज्य में आए तो थोड़ा बहुत तो तमस और रजस का आपको रंग लगेगा ही लगेगा। किंतु वही बात है कि जब आप नेति करके साधना करते हैं तब आप तमस और रजस से बंधे हुए हैं। किंतु जब आप सिद्धि प्राप्त करके फिर से जब वापस आते हैं तो तमस और रजस आपके गुलाम होते हैं। आप उसके आप मायापति है। मायाधीश है। माया के गुलाम नहीं है। किंतु फिर भी तमस और रजस थोड़ा सा तो रहेगा और उसका इस तरह से छोटे-छोटे चीजों में दिखाई देगा। सो दिस इज व्हाट कि अभी वह वही कहानी कि तोतापुरी कहते हैं कि लोटा है उसको प्रतिदिन धोना पड़ेगा। किंतु जब लोटा सोने का हो गया तो फिर धोने की जरूरत नहीं है। किंतु ये सोने का तो सोना किंतु वो लोटा तो है अर्थात कि वो शक्ति के इलाके में आया है तो शक्ति का थोड़ा सा तो स्वीकार करना पड़ेगा। भले ही चाहे पूर्ण ज्ञानी है पूर्ण ब्रह्म है जो भी है। तो इसलिए भगवान राम अपने खुद पर विश्वास नहीं कर पाते हैं। क्योंकि पूर्ण सिद्धि पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के बाद में यदि जगत में वापस आना है तो सत्व और रजस थोड़ा सा तो आश्रय लेना पड़ेगा वरना तो फिर वह जैसे गहने के बारे में 24 कैरेट का सोना है गहना बनेगा ही नहीं गहना बनाएंगे तो ईजीली वह बेंड हो जाएगा उसमें स्ट्रेंथ नहीं है तो वैसे ही आपको थोड़ा बहुत सरजस डालकर के थोड़ी अशुद्धि डाल के आकार धारण करना होगा नाम रूप देह धारण करना होगा जो महापुरुष महाराज कहते थे गुरु कृष्ण वैष्णव तीन दया होो एकर दया बिने जीव छारे खारे गैो तो ये एक की श्री अमादिर मोहन अर्थात कि गुरु कृष्ण वैष्णव तीन की दया हुई किंतु एक की दया नहीं हुई इसलिए सब सत्यानाश हो गया तो यह एक कौन है तो वह है हमारा मन ईश्वर की दया होने से किंतु यदि मन अपना तैयार नहीं है साधन भजन करने के लिए पुरुषार्थ करने के लिए तो कोई किसी चीज काम की नहीं है तो और सॉल्यूशन क्या है? सॉल्यूशन इज़ देखिए विश्वास जो है ना इट इज़ अ डेस्टिनेशन रेदर देन अ मींस ऑफ़ ट्रांसपोर्टेशन। मुझे यहां से दिल्ली जाना है तो दिल्ली में कैसे जाऊंगा? साइकिल में बैठ के जाऊंगा, चढ़, बाइक पे, कार में, ट्रेन में, प्लेन में। सो, दीज़ आर द इंस्ट्रूमेंट्स। बट दिल्ली इटसेल्फ इज़ जस्ट अ डेस्टिनेशन। आई कैन नॉट यूज़ दिल्ली टू गो टू दिल्ली व्हिच इज़ अ मिसमैच इन कैटेगरी। राइट? सो, यहां पे भी विश्वास है, ब्रह्मचर्य है, यह जो इंद्रिय संयम है, यह सब चीजें क्या है? है दीज़ आर डेस्टिनेशंस। तो कर्म ज्ञान, भक्ति, ध्यान यह जो चार योग है वह है अपने पास में इंस्ट्रूमेंट। विद दिस इंस्ट्रूमेंट वी हैव टू गो अहेड एस फार एस वी कैन। और फिर जैसे ठाकुर ने कहा ना आज हमको ईश्वर ने 10 यूनिट शक्ति दी है तो 10 यूनिट का तो इस्तेमाल कर दो। यह कहना कि मैं तो स्वामी जी की तरह मेरा गुड फॉर्च्यून नहीं था कि ठाकुर जब थे तो मैं दक्षिणेश्वर जाकर के उनको प्रणाम करके उनसे डायरेक्ट एनर्जी ट्रांसफर करूं। यह तो मेरा भाग्य नहीं था। तो मैं क्या करूंगा? तो दिस इज अ रॉन्ग वे ऑफ़ थिंकिंग। अभी जैसे यहां पे सीपी क्लीनिक के बच्चे हैं उनकी जो परिस्थिति है वह आई एम फार बेटर देन दिस। सो मैं यदि मुझे जो मिला है उसका मैं यदि इस्तेमाल नहीं करूंगा बैठे-बैठे रोता रहूंगा। दैट इज अ वेस्टेज ऑफ द एनर्जी गिवन टू मी और नेक्स्ट बर्थ में यह आधी हो जाएगी। सो व्हाटएवर इज़ गिवन टू मी। यह कर्म ज्ञान, भक्ति ध्यान, चार इंस्ट्रूमेंट यू डू इट। व्हाटएवर यू कैन। नेक्स्ट टाइम द एनर्जी विल इंक्रीस। नेक्स्ट टाइम इट विल इंक्रीज़ अगेन। ये जो हमने डिस्कस किया ना कि ईश्वर जब नर देह धारण करके आते हैं तो मनुष्य की तरह ही सब कुछ भुगतना पड़ता है। सब कुछ उनको करना पड़ता है। किंतु मैं जब अपना लाइफ देखता हूं वो ठाकुर का बचपन का लाइफ या तो युवा अवस्था का देखता हूं। कहीं पे कोई मैच नहीं है तो ये भाई लिखा ऐसा है। मेरा पर्सनल एक्सपीरियंस ऐसा है। वो प्रॉब्लम क्या है? तो प्रॉब्लम यह है कि उनके जीवन में सत्व का प्राधान्य है। जब मेरे जीवन में तमस रजस का प्राधान्य है। किंतु दिस इज नॉट एन इनसरमाउंटेबल डिफिकल्टी। मैं तपस्या करते जाओ करते जाओ एक जन्म आएगा जबकि सत्व का प्राधान्य हो जाएगा। व्हिच इज गारंटेड कर्म का जो नियम है उसमें कोई इधर-उधर नहीं होने वाला है। फ्रॉम दैट आई एम इक्वल विद ठाकुर। अभी कहेंगे चलो अभी हम करते हैं कंपटीशन लाडू महाराज की तरह मैं भी करूंगा जप जितना हो सके। सो क्योंकि देयर इज़ ऑलवेज होप दैट दिस कैपे कैपेसिटी यूटिलाइजेशन विल इंक्रीस द कैपेसिटी। अल्टीमेटली रिजल्ट इन इंक्रीमेंट ऑफ कैपेसिटी। सो दैट गारंटी वी हैव ठाकुर की कहानी है ना कि एक आदमी बड़ा म सतचरित्र आदमी था। अभी उसको एकाएक कोर्ट में लाया गया इस आक्षेप में कि इसने चोरी की है। तो जज पहचानते थे इस आदमी को। पूछा अरे तुमने चोरी कैसे कर दी? तो ये आदमी क्या कहता है कि राम की इच्छा से मैं अपनी दुकान में बैठा हुआ था। राम की इच्छा से कुछ लुटेरे आए। राम की इच्छा से मुझे पकड़ कर के ले गए। राम की इच्छा से उन्होंने चोरी की। राम की इच्छा से यह चोरी का सामान मेरे सर पर रख दिया। राम की इच्छा से पुलिस आए। राम की इच्छा से लुटेरे भाग गए। पुलिस ने मुझे पकड़ लिया। फिर राम की इच्छा से मुझे आपके दरबार में ले आए। कोर्ट में आए। तो जज ने यह पूरी देखा कि ही इज़ वेरी सिंसियर व्हेन ही सेस कि राम की इच्छा से तो उसको छोड़ दिया। तो स्वामी जी का कि वो जो जब भी कहते हैं कि अहम ब्रह्मास्म महावाक्य सिखाते हैं तो वहां पे अमेरिका में तो एक था एक बड़ा फनी एक उनका स्टूडेंट था तो स्वामी जी की पूरी बात सुन लेगा। फिर वह आखिर में कहेगा कि स्वामी जी व्हाट इज अ इफ आई एवरीथिंग इज ब्राह्मण व्हाट इज अ डिफरेंस बिटवीन मी एंड दिस कैबेज? तो स्वामी जी कहते हैं स्टिक ए नाइफ इन योर लेग एंड फाइंड आउट द डिफरेंस। बिकॉज़ इफ यू रियली बिलीव कि राम की इच्छा से सब कुछ हुआ है तो फिर मनुष्य कभी भी भोग वासना में जाएगा नहीं। क्योंकि राम की इच्छा नहीं है कि हम भोग वासना में जाए। यदि मैं भोग करता हूं इंद्रियों का। दैट मींस कि उस समय में फिर राम की इच्छा को भूल जाता हूं। दैट इज अ कफ्लिक्ट। यदि राम की इच्छा है तो सभी चीजों में राम की इच्छा चलाइए। दुष्कर्म करने के समय राम की इच्छा फिर जो मुझे श्रेय और प्रेय दो आते हैं मनुष्य के सामने तो मुझे जो प्रिय है वो करने के लिए मेरी इच्छा है और जो श्रेय मैं नहीं कर पाता हूं उसके लिए राम की इच्छा है। सो हाउ इज दिस पॉसिबल क्फ्लिक्ट? जो लोग स्टोरी लिखते हैं ना उनको रीडर का साइकोलॉजी पता है। उनको पता है कि रीडर्स लाइक्स गुड एंडिंग। यदि आप मूवीस देखेंगे तो हीरो हमेशा जीतेगा। वह विलेन जीता ऐसा कभी नहीं दिखाएंगे। बिकॉज़ लोगों को इस तरह का एंडिंग पसंद नहीं है। सो गुड एंडिंग मेक्स अ गुड स्टोरी। तो उसको जज को तो छोड़ देना था। अदरवाइज जज ने उसको बंदी बना के रखा होता तो आधे लोग यह सोचते भई वैसे भी यदि जेल में जाना है तो भोग करके जेल में जाओ, चोरी करके जाओ। दूसरा कि ये जो बेड एंडिंग वाली कहानी भी है। ये जैन बुद्धिज्म में एक फेमस कहानी है कि एक बड़ा ही पवित्र हृदय वाला एक भिखू एक जैन मास्टर वो एक गांव में रह रहा था। एकाएक एक दिन ऐसा हुआ कि एक लड़की ने आक्षेप लगाया वो लड़की कंवारी थी। अनमैरिड थी और उसको बच्चा हुआ। तो नेचुरली ये कंजर्वेटिव सोसाइटी थी उस समय की जापान की। तो सभी लोग आश्चर्यचकित हो गए कि कुंवारी लड़की को अनमैरिड लड़की को बच्चा कैसे हुआ? तो उस लड़की ने क्या किया? वो जो ज़हन मास्टर था उसकी ओर दिखा के कहा कि वो बच्चे का फादर है। उसने मेरे साथ दुराचार किया। तो अभी गांव वालों की जो जैन मास्टर पर इतनी श्रद्धा थी संपूर्ण श्रद्धा हवा हो गई उसको भिक्षा भी नहीं मिल रही है बड़ी ही गरीबी में उसको दिन काटने पड़ रहे हैं किंतु ये जैन मास्टर बिल्कुल शांति से कहता है अच्छा जैसा अभी वे लोग तो ईश्वर की इच्छा बोलेंगे नहीं वे लोग कहेंगे दिस इज द वे द वर्ल्ड मूव्स द वर्ल्ड इज सॉर्ट ऑफ अ फ्लोइंग लाइक ए जो पानी जो बहता है समुंदर में नदी में तो प्रतििक्षण बदलता रहता है वो अह उन्हें इट इट इज ए जोकि अनिश्वर है जिसका कि कोई परमानेंस नहीं है। इंपपरनेंट है। तो वर्ल्ड इज़ इंपरमानेंट। तो इंपपरनेंट वर्ल्ड में यह दुख मुझे मिला है। तो मिला है। अभी गरीबी में रहता है। उसकी प्रेस्टीज पूरी खत्म हो गई है। वगैरह-वगैरह बड़ा लंबा टाइम चला। वो साधु वृद्ध हो गया। इसके बाद में इस लड़की को किंतु बड़ा पछतावा। तो फिर एक दिन उसने कॉन्फेस कर दिया। देखिए मेरा बॉयफ्रेंड के साथ में मुझे यह बच्चा हुआ। किंतु मैं यदि ऐसा कहती तो फिर मेरी प्रेस्टीज बिगड़ जाती। तो इसलिए मैंने उस जैन मास्टर पे आक्षेप लगा दिया। तो उसने चुपचाप यह सब सहन करता रहा। किंतु उनकी जो तपस्या है, जो उनकी सहनशक्ति है, वर्ल्ड को जो इंपरमानेंट मानते हैं। सो आई एम नाउ कन्विंस के मतलब मैंने जो किया, बड़ा गलत काम किया। किंतु बाय द टाइम यह लड़की ने कंफेस किया यह साधु का जो पूरा लाइफ था वह तो खत्म होने को आया था। होल लाइफ ही लिव्ड इन अ डिसग्रेस। सो, यह बैड एंडिंग भी है इस तरह की कहानियों में। बट थिंग इज़ दैट वेदर देयर इज़ अ गुड एंडिंग और बैड एंडिंग। जज आपको छोड़ दे ना कि पूरा जीवन आपका नष्ट हो जाए। जो एक ये लिया है प्रण लिया है कि ये राम की इच्छा है या तो फिर यह लाइफ इज इपरर्मानेंट देन यू स्टिक टू इट इरेस्पेक्टिव ऑफ द आउटकम ना बट वो नहीं था अदरवाइज इट वुड हैव कम आउट यह जो वर्ल्ड इज इंपपरनेंट मैंने निर्वाण प्राप्त किया है निर्वाण इस इज द ओनली परमानेंट ये जो दैट कन्विक्शन इज सो स्ट्रांग दैट फ्रॉम विद इन ही सीरिन इट डजंट केयर कि बाहर में क्या हो रहा है ठाकुर वो गीत गाते हैं ना कुड़ी घड़ी लखेर एकटा दुटो केटे हशेदा दाव मा हाथ चापड़ी यानी कि मां काली जो यह पतंग उड़ाती है तो पतंग वैसे तो उड़ती है बड़ा हवा में किंतु उसकी जो दोरी होती है मां काली के हाथ में है जैसे मां काली खींचेगी वैसे वो वो पतंग इधर से उधर जाएगी किंतु यह जो 1 लाख जो पतंग मां चगा रही उसमें से एक दो की दोरी वो काट देती है वो पतंग फिर मुक्त होकर के हवा में उड़ती है तो वह देखकर के मां काली फिर वो तालियां बजाती है हंसती हंसती घोड़ी लख के रेटा दुशदा मा हाथ चापड़ी