मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः
वृन्दावन लीला में ठाकुर है बाल-गोपाल और गोपाल की माँ है यशोदा
बाल गोपाल के दर्शनों की परंपरा गोपाल मां के जीवन में एक बार प्रारंभ हुई। अोरमणि देवी [संगीत] के जीवन में एक बार प्रारंभ हुई। इसके बाद में उन्होंने देखा कि बार-बार यही बाल गोपाल ठाकुर के श्री अंग के भीतर में प्रविष्ट हो जाता है और कभी-कभी ठाकुर के अंग में से ही बाहर निकल कर के उनके साथ में खेलता है। यानी उनको एकदम दृढ़ विश्वास हो गया कि ठाकुर और बाल गोपाल अभिन्न है। और उनको तो पता ही है कि सर्वप्रथम दर्शन के समय क्या हुआ था। उन्होंने देखा कि ठाकुर उनकी बगल में बैठे हुए हैं और फिर जैसे ठाकुर को स्पर्श करने का प्रयास किया तो ठाकुर अदृश्य हो गए और वही बाल गोपाल प्रकट हुआ सर्वप्रथम दर्शन हाथ में वो लड्डू मुद्रा ऐसा करके वह जो घुटनों के बल बैठा हुआ है और कहता है मां मुझे मक्खन दो और जैसे ही मां घुरमणि देवी ने यह सुना जोर से चित्कार कर उठी तो जितना भी अभी तक का उनका अनुभव है अ दो महीने का यह एक समय रहा है गोपाल मां के जीवन के भीतर में अघोरमणि देवी के जीवन में कि सतत और कंटीन्यूस वही बाल गोपाल का दर्शन होता है और जैसे ही यदि आपने वो भागवत की कहानियां सुनी होगी भागवत के यह जो बाल कृष्ण के यह जो उनके ऊपर में पदावलियां जो वृंदावन में रचित वह सब यदि सुने होंगे तो पता होगा कि बाल गोपाल कितना नटखट है। वह गोपियों के घर जाकर के वो मक्खन है, दही है चुरा लेता था। गोपियां यदि वह पानी भरने के लिए वो मट्टी का घड़ा अपने सर पर रख के वो जाती है तो पत्थर मार के वह मटकी तोड़ देता था। क्या-क्या वह सब शरारतें करता था। पूरा एक नंबर का वह शरारती लड़का था। तो यहां पर भी देखिए एग्जजेक्टली उसी तरह की शरारती लीलाएं वो मां को परेशान करना मां की गोद में बैठ जाना मां के वो जप की माला खींच लेना मां जब काम करती है तो बीच में आकर के डिस्टरबेंस खड़ा करना और फिर दुनिया भर की डिमांड करते रहना यह खाना है वह खाना है यह नहीं खाना है वो नहीं खाना है वगैरह वगैरह तो जितना मां एक शिशु से परेशान रहती ती है उतना ही मां के हृदय में एक आनंद का प्रवाह बहता है। तो अभी यह एक जो एक अपना यह जो सामान्य शिशु जो है उसको लेकर के ही मां के हृदय में इतना आनंद बहता है। तो जस्ट इमेजिन कीजिए कि भगवान कृष्ण स्वयं बाल गोपाल का स्वरूप धारण करके हमारे सामने इस तरह से बाल्य लीलाएं करें। बाल्य लीला तरंग तूफान यह जो शरद महाराज का शब्द है तो इस तरह से सब शरारती हरकतें करें तो कोई भी मां है जिसका यह सद्भाग्य हुआ है यह दर्शन करने का समझ लीजिए कि उनका हृदय कितने आनंद से उतफ हो जाएगा तो यह है गोपाल की मां एक के बाद एक दर्शन की परंपरा दो महीने तक सतत उनके के जीवन में चली है। हमने प्रथम दर्शन की घटना तो देख ली कि किस तरह से अपने घर में सुबह को जप समाप्त करके जप समर्पण कर रही थी। उस समय प्रथम दर्शन हुआ। उसके बाद में गोपाल को अपनी गोद में लेकर के दक्षिणेश्वर गई। दक्षिणेश्वर में ठाकुर के कमरे में क्या लीला हुई? इसके बाद में वहां से वापस आई कामारहाटी ठाकुरवाड़ी में अपने कमरे में तो वहां रात को भी यह बाल गोपाल है। सोने के समय भी सब शरारतें करता है। कहता है कि बिना बालिश के सोऊंगा नहीं। तो बेचारी अघोरमणि देवी क्या करेगी? उनके खुद के पास में तो कुछ भी नहीं था। एक खाली कमरा था मात्र। दरिद्रता इतनी थी उनके जीवन में। तो फिर यह घुरमणि देवी ने कहा बेटा मेरे यह हाथ है मेरे हाथ के ऊपर में सो जाओ कल सुबह को मैं जाकर के तुम्हारे लिए एक अच्छे एक बालिश की पिलो की व्यवस्था करूंगी तो यह पहले दिन का जो लीला है उस दिन समाप्त हुआ किंतु दो महीने तक सतत प्रतिदिन गोपाल आकर के कुछ ना कुछ शरारतें करेगा और एक दिव्य आनंद का प्रवाह गोपाल मां के हृदय में बहाएगा। जस्ट इमेजिन कीजिए कि जितना भी संस्कार जितने भी पूर्व जन्म के यह सब होंगे बंधन कर्म के बंधन कितना वह सब के सब उस समय कट गए होंगे। तो यह तो एक पूरा घटनावली हुआ। एक दिन क्या हुआ? गोपाल मां दक्षिणेश्वर गई है और ठाकुर के साथ में वार्तालाप कर रही है। तो ठाकुर ने कहा कि माने ठाकुर तो जिस तरह से अपना उपदेश वगैरह देते हैं तो उसके बाद में गोपाल मां ने अपने कुछ दर्शनों की बात करना प्रारंभ किया। तो उस समय ठाकुर कहते हैं कि देखो इस तरह से दर्शन की बात ना किसी को करनी नहीं चाहिए। ऐसा उचित नहीं है, ठीक नहीं है। तो गोपाल मां ने कहा कि अरे दर्शन तो मुझे आप ही के हो रहे हैं। तुम ही तो हो बाल गोपाल का स्वरूप धारण करके मेरे पास आते हो। तो अपना आपको मैं यह बात क्यों ना बताऊं। तो ठाकुर कहते हैं नहीं भले ही चाहे मेरा खुद का दर्शन हो रहा हो इसके बावजूद मुझे भी यह दर्शन की बात बतानी नहीं चाहिए। तो ठीक है। गोपाल मां कहती है कि भले यदि आपकी यही इच्छा है कि दर्शन की बात किसी को ना बताऊं तो ठीक है। हालांकि देखिए कि यही ठाकुर और यही अघोरमणि देवी इनका रिश्ता जो है इनका जो नाता है कितना पुराना है। एक बार यही ठाकुर अघोरमणि देवी को सब अच्छी-अच्छी चीजें बनाकर के खिलाते थे। तो अघोरमणि देवी पूछती है कि क्यों आप मेरे लिए इतना सब बना के खिलाते हो? तो ठाकुर ने कहा कि देखो तुमने भी तो मुझे कितना खिलाया है। तो अगुरमणि देवी कहती है कहां खिलाया? तो ठाकुर कहते हैं जन्मांतर माने जन्मजन्म से इस जन्म में नहीं किंतु पुराने कितने जन्मों में तुमने मुझे खिलाया है तो क्या पता कि वो कृष्ण लीला के समय अोरमणि देवी मां यशोदा हो सकती थी और ठाकुर तो भगवान कृष्ण थे ही थे तो यह जन्म जन्मांतर का दोनों का यह दिव्य संबंध है। तो अभी यह बात हुई कि ठाकुर ने कहा कि दर्शन के बारे में इवन मुझे भी नहीं बताना तो ठीक है। अगुरमणि देवी कहती है कि यदि दर्शन के बारे में आपको भी नहीं बताना तो आपको भी नहीं बताऊंगी। अभी मीन वाइल यह जो पूरा सीन है ठाकुर और अघोरमणि देवी के बीच
गोपाल की माँ ने स्वामी विवेकानन्द का खाया जूठा साफ़ कर त्याग दिए जाति, कुल, शील और मान-अभिमान
में यह दिव्य लीला चल रही है। इसमें एंट्री होती है ठाकुर के दूसरे एक वीर भक्त की महादेव सम निराकार निर्विकार ब्रह्म का साक्षात स्वरूप स्वामी विवेकानंद की उस समय के नरन तो नरेंद्र एक दिन आया है ठाकुर के पास में बैठकर के मां काली को उस समय एक बकरा बलि के रूप में दिया गया था तो अभी उस जो लोग बेंगली नहीं है खास खास करके यह नॉर्थ और वेस्ट इंडिया में यह लोग जब यह सब सुनते हैं कि यह बकरा बलि दिया गया है। फिर बकरा रंधा गया है। उसको कुक किया गया है और फिर स्वामी जी उसको खा रहे हैं। तो उनको सुनकर के बड़ा आश्चर्य होता है। कभी-कभी थोड़े से नाराज भी हो जाते हैं। किंतु देखिए यह हिंदू धर्म जो है वह इतना विशाल है। इतना व्यापृत है। अपनी यह वैविध्य के लिए तो आप कभी भी यह नहीं कह सकते। कि मैं जिस तरह से हिंदू धर्म को समझा हूं वही एक सत्य है। तो जो भी है बहुत सारी जगहों पर आप देखेंगे कि जब यह कथामृत या ठाकुर मां स्वामी जी की कहानियों का ट्रांसलेशन होता है तो वहां पर यह नॉनवेज कोई खा रहा है तो उसको संदेश है या आलू की सब्जी है वगैरह बना करके बिठा देते हैं। मैंने खुद ने सबसे पहली बार कथामृत पढ़ा था गुजराती में। तो अभी मुझे यह तो ख्याल था कि स्वामी जी नॉनवेज खाते हैं। किंतु मैंने सोचा ठाकुर की तो बात ही अलग है। वह तो अवतार है। वह तो नॉनवेज नहीं खाते होंगे। फिर जब मैं बेंगली कथामृत पढ़ना शुरू किया तब मुझे पता चला कि बार-बार यह मछली का उल्लेख है। ठाकुर के लिए भी बनाते थे। ठाकुर खाते भी थे। और इतना ही नहीं मां खुद जब भी कोई भक्त जयराम भाटी जाएगा तो वह सिंह वाहिनी देवी को बकरा बलि देकर के फिर उस बकरे का मांस जो है भक्तों के लिए बनाती थी। सो एनीवे यहां पे और और अभी यदि ये मैं कहानी कह रहा हूं ना यहां पे प्रॉब्लम क्या है? यदि मैं ऐसा कहूंगा स्वामी जी आलू की सब्जी खाते थे सब्जी या तो संदेश खाते थे तो ये कहानी का कोई अर्थ नहीं रहेगा। यहां पे कंपलसरी नरेंद्र को वो बकरे का मांस खिलाना है। तभी यह कहानी का कोई अर्थ बनता है। तो यहां पर नरेंद्र आया है। काली मंदिर में बकरे का बलि दिया गया है। मांस रंधा गया है। एक कटोरी में नरेंद्र के सामने ठाकुर ने दिया कि अभी तुम खाओ इसको। और पता ही है कि नरेंद्र के भीतर में तो ज्ञान का अग्नि प्रज्वलित है। तो नरेंद्र तो जो भी खाएगा वह तो सब हजम हो जाएगा। उसका कोई कुकर्म नरेंद्र को नहीं लगने वाला। तो नरेंद्र इस तरह से बकरे का मांस खाया। अभी मांस खाएंगे तो उसमें हड्डियां भी रहेगी। तो मांस खा के वह जो हड्डी है वह बगल में वह रख रहा है कटोरी के। वह सब पूरा खाना हो गया। पूरी कटोरी समाप्त हो गई। भाई चारों ओर हड्डियां बिखरी पड़ी है। तो फिर उसके बाद में तो नरेंद्र खड़ा होकर हाथ धोने को चला गया। अभी ठाकुर ने एक लेडी डिवोटी को कहा कि तुम यह जो स्थान है उसको परिष्कार कर दो। उसको साफ कर दो। अभी क्यों इस लेडी डिवोटी को कहा? क्योंकि क्या है कि देखिए भीतर में जो भी संस्कार है संस्कार को काटने की जो प्रक्रिया है बड़ी ही कठिन है। कभी-कभी हम लोग सोचते हैं कि मैं मन में ही मन में सब काट दे रहा हूं। मन में ही मन में मैं त्याग कर दे रहा हूं। किंतु मन में मन में करने से नहीं चलेगा। ठाकुर ने क्यों? अदरवाइज इतना एक्सट्रीम ये जो अष्टपाश कहते हैं लज्जा घृणा भय जाति कुलशील मान अभिमान इस बचने के लिए इसको काटने के लिए ठाकुर ने सब कुछ प्रत्यक्ष किया है। अब वो जो जाति का अभिमान कि मैं ब्राह्मी हूं। कुल और शील का अभिमान कि मेरे पिताजी बड़े ही तपस्वी थे। इवन शूद्र के घर का भी जो भिक्षा है तो वह ग्रहण नहीं करते थे। तो यह जो सब काटना है तो वही वह रसिक मेहतर है जो कि लोगों का टॉयलेट क्लीन करता था। जाकर के उसका टॉयलेट क्लीन करते हैं। वह भी अपने बालों से करते हैं। तो क्या है कि यह सब कुछ ठाकुर ने प्रत्यक्ष किया है। तब यही एक उपाय है यह अपने अष्टपाश काटने का। वरना इवन मैं खुद देखिए हम लोगों का आज का साधु जीवन इतना एक हम लोग डर डर करके रहते हैं समाज से कि किसी को कुछ दिखाना नहीं है। जो कुछ भी करना है मन में वन में और कोने में करना है। ठाकुर ने कहा है ना तो यह मन में वन में और कोने में करतेकरते प्रॉब्लम कभी-कभी क्या हो जाता है कि जब तक कुछ कुछ तपस्याएं इस तरह से प्रत्यक्ष ना करें वह संस्कार कटते नहीं है। मन में ही मन में मान लेने से कि हां मैंने अपने जाति का जो अभिमान है वो काट दिया। दूसरों के प्रति जो घृणा है उसको काट दी। उसके प्रति मेरा द्वेष है उसको काट दिया। इसके प्रति मेरी ईर्ष्या है उसको मैंने काट दिया। मन में ही मन में बोलने से नहीं चलेगा। आपको एक बार प्रत्यक्ष होकर के बहुत बार मैं कहता हूं कि आप जप करने को बैठते हैं, ध्यान करने को बैठते हैं और यदि किसी के प्रति विद्वेष, ईर्ष्या या घृणा आपके मन में प्रकट होती है तो उसका एक और एकमात्र उपाय है कि आप दूसरे दिन जाकर के उस व्यक्ति को बड़े ही विनम्रता पूर्वक बड़े ही प्रेम भाव से उसके साथ में वार्तालाप कीजिए। भले ही चाहे यह व्यक्ति आपका कितना ही बड़ा दुश्मन क्यों ना हो। आप उसके साथ में अच्छे से बात करने को जाएंगे। वह हो सकता है और आपका अपमान करेगा। किंतु डज नॉट मैटर। हमने अपनी ओर से अपना अकाउंट क्लोज कर दिया। अभी वह जाने और उसका काम जाने। मैं बहुत साल पहले मैं एक आश्रम में था तो वह आश्रम छोड़कर के जाने की बात आई। परमानेंटली दूसरी जगह पर ट्रांसफर हो रहा है। तो मैं सभी साधुओं को प्रणाम कर रहा हूं। अभी वहां पर मेरे एक हितैषी साधु खड़े हैं जिनका कि मेरे पर बहुत कृपा है उनकी। सीनियर साधु है। बड़े आशीर्वाद है मेरे पे उनके। तो वहां पर खड़े-खड़े देख रहे हैं और देख रहे हैं और उस पहले तो मुझे समझ में नहीं आया कि क्यों इतना शार्पली देख रहे हैं कि मैं क्या कर रहा हूं। बाद में किंतु मुझे समझ में आया। एक साधु है जो कि वहां से जा रहे थे जिनको कि मैंने प्रणाम नहीं किया क्योंकि उनके साथ में मेरा अच्छा नहीं पड़ रहा था तो बाकी सब साधुओं को प्रणाम किया और वह जो साधु दूसरी ओर जा रहे हैं उनको छोड़ कर के फिर से मेरे ये जो मेंटोर साधु है उनके पास में आकर मैं खड़ा हुआ तो उन्होंने इमीडिएटली कहा अच्छा तुमने उनको प्रणाम क्यों नहीं किया मैंने कहा अरे महाराज जाने का समय हो गया है कहां अभी उनका मुंह देख के जाऊंगा यह वो मुझे बोला नहीं देखो तुम उनको प्रणाम करो। तुम्हारी ओर से तुम अपना अकाउंट क्लोज कर दो। जो भी उनके साथ में अच्छा है, बुरा है, जो भी है सब इसी सेंटर में रहेगा। तुम यहां से उसको कैरी फॉरवर्ड ऑन मत करना। नेक्स्ट सेंटर में उनको यदि तुम्हारे मन में कटु भाव है तो भले रहे। तुम्हारा प्रणाम नहीं स्वीकार करना है भले ना करें। यदि तुम प्रणाम करने को जाओगे तुम्हारा अपमान करेंगे भले करें। वह उनके पास में रहेगा। वह उनके अकाउंट में वह डेबिट दिखाता रहेगा। फिर वह उनका जिम्मा है उसको काटने का। तुमने अपना अकाउंट क्लोज कर दिया। तो मैंने कहा बात तो सही है। मैंने जाकर के उन साधु को बड़े ही भक्ति भाव से प्रणाम किया और फिर मैं चला आया। और सही में यह जो सीनियर साधु ने मुझे जो बताया था वो जो मैंने सेंटर छोड़ा उसके बाद में जिनके प्रति मेरा विद्वेष था उनके प्रति मेरे मन में एक इवन 1% भी विद्वेष कभी नहीं रहा। उनका मेरे प्रति क्या है बिहेवियर क्या था वर्तन वो तो मुझे नहीं पता फिर से कभी मुलाकात नहीं हुई किंतु मेरे हृदय में वह अकाउंट क्लोज हो चुका था तो देखिए कि आपको ना ये अकाउंट क्लोज करने हैं जीवन के यदि जप करने में ध्यान करने में शांति से बैठना है तो यह जगत के अकाउंट क्लोज करते जाना होगा और वह अकाउंट तभी क्लोज होंगे जबकि आप कुछ-कुछ चीजें प्रत्यक्ष करेंगे जब तक आप प्रत्यक्ष करके करके फिजिकली नहीं करेंगे तब तक सिर्फ मन में वन में और कोने में करने से नहीं चलेगा। मन में वन में कोने में आप ईश्वर को पुकारिए। किंतु यह जगत के अकाउंट क्लोज करने के लिए आपको प्रत्यक्ष कुछ ना कुछ तो करना ही पड़ेगा। तो यहां पे भी नरेंद्र ने यह मांस खाया है। चारों ओर हड्डियां बिखरी पड़ी है। तो इस लेडी डिवोटी को ठाकुर ने कहा कि यह स्थान तुम परिष्कार कर दो। अभी यह लेडी डिवोटी कुछ कहे कुछ करे उसके पहले ही गोपाल की मां वहां पर खड़ी थी। तो जैसे ही ठाकुर ने दूसरी डिवोटी को कहा गोपाल की मां सामने से जाकर कहती है कि नहीं मैं परिष्कार कर देती हूं। मैं साफ कर देती हूं। ऐसा करके नरेंद्र जो जितनी भी हड्डियां बिखरी पड़ी थी सब कलेक्ट की और जो एक गीले कपड़े से वह साफ करके कटोरी धोकर के हड्डियां फेंक करके एकदम स्थान जो है स्वच्छ सुंदर कर दिया। अभी देखिए जब यह घटना पढ़ते हैं। आप याद कीजिए कि अघोरमणि देवी की यात्रा कहां से स्टार्ट हुई थी। यह वही अघोरमणि देवी है। यह वही गोपाल की मां है। ठाकुर को ठाकुर को स्वयं वो खाना परोस रही है। वो परोसने के समय जो हाथा होता है भात का ठाकुर ने गलती से उसको स्पर्श कर दिया। तो हाथा तो गंगा में फेंक ही दिया। किंतु जिस हांडी में से भात परोस रही थी वह हांडी में से अघोरमणि देवी ने दूसरी बार भात नहीं खाया। कहा कि यह नहीं अभी दूसरी बार भात बनाना पड़ेगा मेरे लिए अलग से। मां शारदा स्वयं ठाकुर के लिए नारायण के लिए खाना पकाती है। जिस मिट्टी के चूल्हे पे चूल्हे के ऊपर में बर्तन रखकर के यदि उस चूल्हे के ऊपर में अघोरमणि देवी का भात रंधना है तो फिर उस चूल्हे को तीन बार गोबर लीपना है और तीन बार गंगाजल छिड़कना है। तब कहीं जाकर के अघोरमणि देवी की भात की हांडी उस चूल्हे पर चढ़ेगी। तो यह वही है आचार निष्ठा ऑर्थोडॉक्सी यह जो ब्राह्मी होने का अभिमान इतना भरा हुआ था जिनके भीतर में और यहां पे गोपाल ने प्रकट होकर के सब कुछ जैसे कि नेस्तनाबुद्ध कर दिया और यही अघोरमणि देवी जो कि सपने में कभी सोच भी नहीं सकती कि किसी ने खाई हुई और खास तो यह स्वामी जी फिर तो कायस्थ थे ना वो तो ब्राह्मण तो थे नहीं तो ये नरेंद्र ने खाई हुई ये हड्डियों को उठाकर के फेंकना उस स्थान को परिष्कार करना ये अोरमणि देवी कभी सोच भी नहीं सकेगी गोपाल के दर्शन से पहले कि वो ऐसा कभी कुछ करेगी और यही देखिए कि ये और देखिए यदि हम इनको
जब परम्परानिष्ठा बन गई ईश्वर-प्राप्ति का साधन — गोपाल की माँ की अद्भुत कथा
कंडेम करें कि अरे इस तरह की ऑर्थोडॉक्सी क्यों थी इसकी तो आवश्यकता नहीं थी किंतु देखिए कि शरद महाराज हमको को और एक बड़ी ही इंपॉर्टेंट बात कहते हैं। शरद महाराज जब यह स्वामी जी की यह फॉरेन डिसाइपल्स भारत आई। यह जोसेफाइन मैक्लाउड है, सारा ओलीपुल है, यह निवेदिता है और उन्होंने सर्वप्रथम अघोरमणि देवी का दर्शन किया। वो प्रभावित तो अवश्य हो चुकी थी किंतु साथ में यह प्रश्न भी था कि किस तरह से कोई भी एक मनुष्य किस तरह से कोई भी एक व्यक्ति इतना रिस्ट्रिक्टेड लाइफ लीड कर सकता है। इवन अघोरमणि देवी तो शी वाज़ वेरी लिबरल। अभी जब यह लेडी डिवोटी जो स्वामी जी की अमेरिका से आई वो तो इतनी लिबरल थी कि उनको अपने घर में बिठा के उनके साथ में वार्तालाप किया। इससे पहले यदि ऐसा कुछ होता तो वह उनको घर में प्रवेश तक नहीं करने देती। तो क्या है कि ऑलरेडी शी वास वेरी लिबरल कंपेयर टू प्रीवियस और इसके बावजूद वो लिबरलिज्म जो था इतना नहीं था कि वो जैसे वेस्टर्न लेडी को होता है एक उनका एक जो माइंडसेट होता है तो यह तीनों इस तरह से आश्चर्य प्रकट कर रही है। इसके सामने शरद महाराज उत्तर देते हैं कि देखिए वेस्टर्न कंट्रीज में और भारत में जब कोई व्यक्ति खास करके कोई भी लेडी जब वो आध्यात्मिक होने को जाने उनके जीवन में आध्यात्मिकता प्रवेश करती है जब वह धर्म करने को जाती है तो दोनों ही डिफरेंट डिफरेंट रास्ते पर जाते हैं। वेस्ट में यदि कोई लेडी धर्म की ओर आकृष्ट होगी आध्यात्मिक होने का प्रयास करेगी तो उनका डायरेक्शन है एक्सट्रोवर्ट। वह समाज में कुछ अच्छा कार्य करने का प्रयास करेगी। किसी चैरिटी के साथ में अपने को संलग्न करेगी। अपने को जॉइ करेगी। किसी ये जो मिशनरी ऑर्गेनाइजेशन है क्रिश्चियन मिशनरी ऑर्गेनाइजेशनंस जो कि एशिया में अफ्रीका में वो नेटिव्स उस समय कहते थे नेटिव। वो काले जो नेटिव होते हैं सब लोकल उन लोगों जंगली जो होते हैं स्थानिक निवासी उनके भीतर में जीसस की लाइट प्रसारित करना ये जो मिशनरी लोग जिस तरह से अपने कार्य का प्रचार करते थे अमेरिका और यूरोप में तो यह अमेरिकन यूरोपियन लेडी जब धार्मिक होने का प्रयास करेगी तो इस तरह के क्रिश्चियन मिशनरी ऑर्गेनाइजेशंस के साथ में वह युक्त होगी और फिर वहां पर डोनेशन देना स्टार्ट करेगी और फिर 10 लोगों के ऊपर में नजर नजर रखना शुरू करेगी अपने पड़ोसियों के ऊपर में अपने जो आसपास जो लोग रहते हैं उनके ऊपर में कि देखो यह क्या कर रहा है देखो वह क्या कर रहा है तो क्या है कि उनका पूरा एक एक्सटर्नल एक पाथ स्टार्ट होता है धार्मिक होने का जबकि भारत में ऐसा है कि जब भी कोई लेडी है खास करके स्त्रियों के बारे में वह जब आध्यात्मिक होने का प्रयास करेगी वह जब धर्म की ओर आगे बढ़ेगी तो वह उनका जो प्रसार होगा भीतर में होगा इनर डेवलपमेंट होगा जगत के साथ में धीरे-धीरे करके नाते तोड़ करके अपने को एक ऑर्थोडॉक्सी की एक दीवाल में यह लोग बांध देंगे और फिर मन को संपूर्ण रूप से वृत्तिहीन करके एक ही ईश्वर या आत्म तत्व पर केंद्रित करने का प्रयास करेंगे सतत जप करेंगे सतत पूजा पाठ लेकर के रहेंगे सतत स्मरण मनन करेंगे। सतत ईश्वर को प्रार्थना करेंगे। सतत कुछ ना कुछ सद ग्रंथों का पाठ करेंगे। या तो फिर ज्यादा से ज्यादा कोई साधु का सत्संग करेंगे। साधु संत का सत्संग करेंगे। तो यह जो पूरा एक इनर लाइफ डेवलप होता है भारत में साधिका के लिए। और यदि वेस्टर्न वर्ल्ड में इस तरह की कोई लेडी है तो यह मिशनरी ऑर्गेनाइजेशन, चैरिटी ऑर्गेनाइजेशन, कम्युनिटी ऑर्गेनाइजेशन उसमें वो अटैच हो के फिर कुछ ना कुछ एक्टिविटी बढ़ाने का प्रयास करेंगे। सो दैट इज हाउ यह ईस्टर्न स्पिरिचुअलिटी हैज़ ऑलवेज टू वर्क। कि आपको एक इनर लाइफ यदि प्रॉपर्ली लीड करना है तो जगत के साथ में आपका जो नाता है उसको तोड़ना होगा। अभी यह नाता क्या है? आप सब समय सोच समझ करके नहीं तोड़ सकते। अच्छा मुझे यह नहीं करना चाहिए। अच्छा मुझे यह नहीं करना चाहिए। यह करूं कि ना करूं? ये सब सोचने को जाएंगे तो बहुत बार हम कंफ्यूज हो जाएंगे। इसके लिए क्या हुआ है? कुछ ट्रेडिशन बना दी गई है। ट्रेडिशन को आप फॉलो करेंगे तो ऑटोमेटिक जगत के साथ में आपका जो नाता है लिमिटेड हो जाएगा। सो दिस इज द रोल ऑफ द ऑर्थोडॉक्सी। कि जो 10 दिशाओं में अपना मन बिखरा पड़ा है उसको एकाग्र करके ईश्वर के ऊपर में ही केंद्रित करें। यह ऑर्थोडॉक्सी का रोल है। तो अघोरमणि देवी ऑर्थोडॉक्स थी। उनके जीवन में दुनिया भर के नीति नियम थे, कायदे कानून थे। इसका अर्थ यह नहीं कि हम उनको कोसे। उसका अर्थ यह है कि वह इतना सिंसियरली ईश्वर की ओर जाना चाहती थी। यह हम समझे और उनकी सराहना करें। सो किंतु देखिए कि साथ-साथ में ऐसा भी होता है कि ऑर्थोडॉक्सी कभी-कभी अपने ही पैरों में एक जंजीर बनकर के हो रह जाती है। यह ऐसा हुआ कि यहां से आपको बेलूर मठ जाना है तो आप क्या करेंगे? ट्रेन का टिकट तो आपने निकाल लिया है। यहां पे आश्रम से मैं गाड़ी में बैठकर के कार में बैठकर के रेलवे स्टेशन जाऊंगा। अभी मैं यह कहूंगा कि यह कार के साथ में मेरा बहुत ही एक अच्छा संबंध हो गया है। यह मुझे कार बड़ी प्रिय है। कार को मैं छोडूंगा नहीं। तो फिर प्रॉब्लम क्या होगा? कार को छोड़कर के मैं ट्रेन में बैठूंगा नहीं और ट्रेन में बैठ के मैं बेलूरम पहुंचूंगा नहीं। वो कार में ही बैठा रहूंगा और कार की यह जो यह जो रेंज है बहुत ज्यादा नहीं है। ज्यादा से ज्यादा मुझे 10-15 कि.मी. इधर-उधर ले जाएगी। तो क्या है कि कार का कार्य है मुझे रेलवे स्टेशन तक ले जाना और फिर मुझे कार छोड़कर के ट्रेन में बैठना होगा यदि मुझे बेलूरमठ जाना है। बेलूरम की ये 500 कि.मी. ना 600 कि.मी. जो भी जर्नी है वो ट्रेन में ही होने वाली है। कार की रेंज 10-12 कि.मी. से ज्यादा नहीं। तो ये ऑर्थोडॉक्सी का ऐसा है। आपको 10-12 कि.मी. आगे ले जाएंगे। अभी ऐसा तो होगा नहीं कि ट्रेन मेरे आश्रम के सामने मेरे कमरे के सामने आ जाए। वह तो ट्रेन तो अपने रेलवे स्टेशन में ही है। 10 कि.मी. का जो डिस्टेंस है वह तो है ही है। वो 10 कि.मी. के लिए मुझे कार तो चाहिए ही चाहिए। तो माने दोनों की आवश्यकता है। हायर साधना हमारे जीवन में प्रारंभ हो। उससे पहले हमको एक लेवल अचीव करना है। संस्कार का, एकाग्रता का, डिसिप्लिन का, मन की शांति का। यह लेवल जैसे अचीव हो जाए फिर जो हारनेस या जो व्हीकल हमको उस लेवल तक ले आया है उसको फिर हमको डिस्कार्ड कर देना है और फिर वह हायर साधना प्रारंभ कर देनी है। अनफॉर्चूनेटली बहुत सारे लोग इस तरह की ऑर्थोडॉक्सी को बिल्कुल निकम्मा गिन करके त्याग कर देते हैं। फिर वह यहां से रेलवे स्टेशन चलते-चलते जाएंगे। प्रॉब्लम क्या होगा? बाय दैट टाइम रेलवे स्टेशन पहुंचेंगे। गाड़ी निकल गई होगी। तो माने वो जिस लेवल पर पहुंचना चाहिए साधना प्रारंभ करने से पहले वो लेवल तक ही नहीं पहुंचते हैं। तो यह तो हो गया ऑर्थोडॉक्सी डिस्कार्ड करने का परिणाम और यदि ऑर्थोडॉक्सी को बहुत ज्यादा पकड़ के बैठे रहे प्रॉब्लम यही होगा कि रेलवे स्टेशन जाकर के भी आप कार छोड़ना नहीं चाहते। ट्रेन में बैठना नहीं चाहते। यही होगा कि आप रेलवे स्टेशन तक ही आपकी जर्नी रहेगी। वहां से मैं बेलूर मठ नहीं पहुंच पाऊंगा। सो दोनों ओर से ऑर्थोडॉक्सी को डिस्कार कर देना वह भी हमको हेल्पफुल नहीं है और बिय्ड वन पॉइंट ऑर्थोडॉक्सी को पकड़ के रखना वो भी किसी काम का नहीं है। और अघोरमणि देवी वास सच ए फॉरर्चूनेट पर्सन कि ठाकुर का सत्संग प्राप्त हुआ बोलकर के ठाकुर के आने तक ऑर्थोडॉक्सी उनको सहाय किया। क्योंकि देखिए यहां पे और भी एक बात है ठाकुर का दर्शन करने के लिए सर्वप्रथम कौन गए थे? अघोरमणि देवी ठाकुर ने अघोरमणि देवी ने ठाकुर का जो सर्वप्रथम दर्शन किया वह अकेली नहीं थी। उनके साथ में यह कामारहाटी की ठाकुरवाड़ी है। उसकी मालकिन भी उनके साथ में थी। दोनों महिलाओं ने ठाकुर के बारे में सुन के रखा था और दोनों ठाकुर का दर्शन करना चाहती थी। तो दोनों साथ में गई। किंतु अभी दर्शन होने के बाद में ठाकुर ने दोनों की प्रशंसा की। कहा कि भाव और भक्ति से दोनों भरे हुए हैं। माने नाके तिलक परजती सुंदर माने ठाकुर ऐसा कहते हैं नाक का जो तिलक है वह भी सुंदर है। इतना वो भाव और भक्ति से भरे हुए हैं। दोनों महिलाओं के बारे में दोनों लेडीज के बारे में ठाकुर ने यह बात कही थी। किंतु प्रॉब्लम वही है कि दूसरी बार ठाकुर का दर्शन करने के लिए अघोरमणि देवी अकेली गई थी। वह ठाकुरवाड़ी की जो मालकिन थी वो नहीं गई। क्यों? क्योंकि फिर उनके पास में 10 तरह की चीजें हैं। उनके पति का तो देहांत हो गया था। किंतु उनकी पुत्री है, जमाई है, जमाई का घर संसार है तो वह सब चिंता करनी पड़ती है। बोलकर के विधवाओं के जो कठिन नियम का पालन करना है, वह नहीं करके अपनी पुत्री के संसार में वह सब समय वह बिजी रहती थी। बोल के अभी ठाकुर का दर्शन दूसरी बार करने का सद्भाग्य उनको प्राप्त नहीं हुआ। जबकि अघोरमणि देवी तो निसंतान थी। वह तो एक बेनिफिट था और यदि संतान होता भी उनका मुझे डाउट है कि उसके जीवन में इनका कोई ज्यादा म जाकर के इंटरफेयर करेगी। बस वो उनका ऐसा था कि बस ईश्वर है और मैं हूं। ऐसा वो विधवा जब
श्री रामकृष्ण की विनोदमय घोर-संसारी विधवा की कथा
दूसरों के घर में जाके ये सब ठाकुर के पास में कुछ लेडीज लेडी डिवोटी ठाकुर का दर्शन करने के लिए आई। एक दिन दक्षिणेश्वर में तो ठाकुर कहते हैं कि देखो इस तरह की एक विधवा है तो माने इन जनरल कहते हैं यदि कोई विधवा है तो उसको तो चाहिए कि ईश्वर का नाम गुणगान कीर्तन करें जब ध्यान करने में अपना समय बिताए तो नहीं वो क्या करेगी अपने भाई के घर में जाकर के रहेगी सब चीजें जैसे कि हस्तगत कर लेगी सभी चीजों सभी लोगों के ऊपर में हुकुम चलाएगी अपनी वो जो साड़ी पहनती है ना तो कमर में वो जो चाबी का वो पूरा यह रहता है यह बंच। वह चाबी अपने वह वहां पे लगा करके कमर में लगा के चारों ओर घूमेगी और फिर ऐसा दिखावा करेगी कि उनके घर में उनके बिना कुछ काम ही नहीं होगा। यदि मैं नहीं हूं तो मेरे भाई का घर का सब काम अटक जाएगा। ऐसा करके ठाकुर इस तरह की विधवाओं की निंदा कर रहा है। तो देखिए वह अह हुआ ऐसा कि जो चार पांच लेडी डिवोटी वह वहां पे बैठी थी उसमें से एक डिवोटी ने अपनी एक रिलेटिव लेडी को वह वहां पे लेके आई थी और वह जो लेडी थी एज ए वो पहली बार वहां पे आई थी वो उसका इसी तरह का था विधवा है अपने भाई के घर में रह रही है और सभी पर हुकुम चला रही है ईश्वर का नाम गुणगान कीर्तन करना तो कहां दूर रह गया तो वह जो लेडी डिवोटी अपनी ये रिलेटिव को लेके आई है। वह तो बेचारी इतनी शर्मिंदा हो गई। वह सोच रही है कि ठाकुर को आज ही यह सब बातें करनी थी और यह मेरी रिलेटिव है। वह तो एग्जैक्टली यही सब करती है। तो उसको कितना बुरा लगेगा। तो देखिए किंतु ठाकुर को तो पता नहीं है जो लेडी पहली बार आई है डिवोटी उनके पास में उसके संस्कार क्या है? पकड़ करके ठाकुर ने अपने ऑटोमेटिकली यह सब बोलना शुरू कर दिया था। तो क्या है
जब परम्परानिष्ठा बन गई ईश्वर-प्राप्ति का साधन — गोपाल की माँ की अद्भुत कथा - 2
कि ये ऑर्थोडॉक्सी आपको एक लेवल तक ले जाती है वि इज वेरी एसेंशियल। तो ये दोनों डिवोटी आई थी वो ठाकुरवाड़ी की मालकिन और यह अघोरमणि देवी उसमें से दूसरा दर्शन अघोरमणि देवी ने ही किया। और वह जो ठाकुरवाड़ी की मालकिन थी जिसके बारे में भी ठाकुर ने कहा था कि भाव और भक्ति से भरपूर है। उसने ठाकुर का दूसरी बार दर्शन किया ही नहीं। तो क्या है कि ऑर्थोडॉक्सी हमको एक लेवल पर ले जाती है। उस लेवल पर जाना एसेंशियल है। किंतु फिर उस लेवल पर जाकर के ऑर्थोडॉक्सी का त्याग करना है। तो यह अघोरमणि देवी की यात्रा कि कहां वो इवन ठाकुर और मां के साथ में भी यह सब छूत अछूत का वो रखती थी। वहां से प्रारंभ करके स्वामी जी ने यह मांस खाया है। वह हड्डियां बिखरी हुई है। उसको उठाकर के क्लीन करना। यह पूरी यह अघोरमणि देवी की
गोपाल की माँ के साथ शरारती बाल-गोपाल की लीलाएँ सुनकर महाज्ञानी स्वामी विवेकानन्द की आँखें भर आईं
यात्रा और फिर स्वामी जी के साथ में फिर वही फेमस कहानी कि पहले तो ठाकुर ने अघोरमणि देवी को कह दिया कि देखो तुमको जो दर्शन वगैरह होते हैं तो किसी को बताना नहीं है। यदि मेरा खुद का दर्शन होता है तब भी तुमको मुझे बताना नहीं। यह एक स्पष्ट सूचना उन्होंने अधोरमणि देवी को देकर रखी है। किंतु एक दिन हुआ ऐसा कि यह नरेंद्र आकर के बैठा है और साथ में उसी समय अघोरमणि देवी का आगमन हुआ। तो अभी ठाकुर का वो जो सेंस ऑफ ह्यूमर है वो बड़ा ही स्ट्रांग है। नरेंद्र का जो माने नरेंद्र एक्साइटेड हो जाता था ना वाद विवाद करते-करते आर्गुममेंट करते-करते तो ठाकुर को देख के बड़ा आनंद आता था। वो कोई भी एक नरेंद्र से ऑोजिट भाव वाला यदि कोई आएगा उसको नरेंद्र के साथ में भविष्य के स्वामी विवेकानंद के साथ में आर्गुममेंट करने को लगा देंगे तो मास्टर महाशय को वो पहला पहला पहली पहली बार मास्टर महाशय आए हैं ठाकुर का दर्शन करते थे उसी समय की बात है एक दिन ठाकुर ने मास्टर महाशय को कहा मास्टर महाशय और नरेंद्र को दोनों को कि तुम दोनों इंग्लिश में वाद विवाद करो तर्क करो मैं सुनना चाहता हूं किंतु बाय दैट टाइम मास्टर महाशय का जो भी अहंकार था वो सब पिघल गया था। वो सब पूरा डिॉल्व हो गया था। और जैसे ही वो द्वितीय दर्शन के टाइम में जैसे मास्टर महाशय ने लिखा था कि ठाकुर के साथ में उनका यही प्रथम और आखिरी तर्क उसके बाद में मास्टर का तर्क का दरवाजा हमेशा के लिए बंद हो गया था। ना तो मास्टर महाशय नहीं ठाकुर के साथ में तर्क करेंगे ना ही वह नरेंद्र के साथ में तर्क करेंगे। तो अभी जब ठाकुर बार-बार बच्चे की तरह बच्चा कोई अपने पिताजी से कोई चीज मांगता है ना यही है बाल गोपाल अभी मां के पास में कुछ मांगेगा तो कैसा जििद करेगा नहीं मुझे तो यह चाहिए ही चाहिए मुझे ये चाहिए ही चाहिए ऐसा करके जो जििद करता है ना तो वैसे वैसे ठाकुर बिल्कुल बालक भाव में जििद करते हैं ये तुम दोनों करो इंग्लिश में तर्क करो मैं सुनना चाहता हूं किंतु जैसे कि मास्टर महाशय का खुद का तो तर्क का दरवाजा बंद हो गया था और लगता है उस दिन शायद नरेंद्र भी तर्क करने के मूड में नहीं था। तो ये दोनों फिर बात तो करते हैं आपस में एक दूसरे के साथ में किंतु बंगाली में ठाकुर की इच्छा थी कि इंग्लिश में दोनों का तर्क हो स्टार्ट फाइट हो और वो बड़े बच्चे की तरह आनंद से सुने तो किंतु वो हुआ नहीं। वो दोनों बंगाली में ही बात करते हैं और वो फाइट करने की बजाय वैसे ही कोई जनरल बात करते हैं। तो ठाकुर का ऐसा था गिरीश घोष के साथ में वो फाइट करवा देते थे नरेंद्र की। तो गिरीश घोष कहेगा कि ठाकुर अवतार कृष्णस्तु भगवान स्वयं यदि ऐसा कहते हैं तो देयर इज नथिंग बियों्ड भगवान आत्म तत्व की वहां पर बात उड़ जाती है तो और यदि आप यदि कृष्ण के जैसे ही हो गए तो आप कृष्ण ही हो गए। कृष्ण के जैसे होना ऐसा कोई मतलब ऐसा कोई बात नहीं है। आप कृष्ण ही हो गए हैं। आप भगवान ही हो गए हैं। तो यह गिरीश घोष का एक भक्ति भाव था। नरेंद्र का यह निराकारवाद था। यह एक अद्वैतवाद था। तो दोनों के बीच में ठाकुर तर्क लगा देते थे। फिर किसी ने आकर के ठाकुर को कहा कि नरेंद्र है तर्क में हार गया है। तो ठाकुर कहते हैं अरे नहीं नहीं नरेंद्र ने मुझे बताया। गिरीश घोष का विश्वास इतना स्ट्रांग है कि फिर उस इस लेवल के विश्वास के ऊपर में आप जाकर के तर्क के माध्यम से किसी को कन्विंस नहीं करवा सकते। तर्क का एक ही लेवल तक उसका है जर्नी। इसके बाद में विश्वास का राज्य प्रारंभ होता है और गिरीश घोष था विश्वास के राज्य का राजा तो फिर गिरीश घोष तक ये तर्क का कोई माने तर्क तर्क गिरीश घोष को स्पर्श करके गिरीश का मत परिवर्तन नहीं करवा सकता तो इसलिए नरेंद्र ने कहा कि अरे उसका विश्वास इतना स्ट्रांग है कि अभी उसके ऊपर में मैं और क्या कहूं बोलकर के मैंने तर्क करना छोड़ दिया तो यह था गिरीश और स्वामी जी तो यहां पे है अघोरमणि देवी देवी और यह स्वामी जी यू कैन नॉट इमेजिन टू ऑोजिट पर्संस इनसे ऑोजिट दो पर्सनालिटी आप इमेजिन नहीं कर सकते। नरेंद्र था संपूर्ण रूप से एक तरह से पाश्चात्यवादी संपूर्ण रूप से रैशन संपूर्ण रूप से एक साइंटिफिक लॉजिकल माइंडसेट वाला पर्सन एक बार नरेंद्र दक्षिणेश्वर आकर के गीता की प्रशंसा करता है भगवत गीता की तो ठाकुर कहते हैं कि मुझे लगता है कि किसी यूरोपियन पंडित ने गीता की प्रशंसा की है इसलिए नरेंद्र कर रहा है प्रशंसा तो ये नरेंद्र का इस हद तक भारतीय आध्यात्मिकता भारतीय संस्कृति उसके उसके प्रति एक रैशन आउटलुक था। अश्रद्धा नहीं थी। रैशन आउटलुक था। क्योंकि क्या है कि युग युगांतर से खास करके आखिरी 1000 साल में ये जो एक एक लेयर लग गया था धूल और मिट्टी का अंधश्रद्धा रूपी ये कुसंस्कार रूपी वो मिट्टी के लेयर को हटा करके जो भीतर का ये जो आध्यात्मिक खजाना है ये जो सोना मोहर है आध्यात्मिक उसको आपको खजाने को बाहर करना होगा। तभी इसी खजाने को आप जगत में फैला सकते हैं। वरना उस समय का जो हिंदूइज़्म था उसका आप जगत में प्रचार नहीं कर सकते। भारतवासियों के भीतर में भी नहीं कर सकते हैं। तो नरेंद्र का एक रैशनलिस्टिक आउटलुक था कि क्या अच्छा है क्या बुरा है। बुरे को हटा के राजहंस की तरह पत्थर छोड़कर के मोती लेने का। यह था नरेंद्र का स्वभाव। और यहां पे है अोरमणि देवी रैशनलिटी लॉजिकलिटी लर्निंग या तो फिर ये वेस्टर्नाइजेशन वेस्टर्न कल्चर उन सब के साथ में जन्म जन्मांतर से कोई नाता नहीं था। अनपढ़ थी, विधवा थी, बाल्य विधवा थी, गरीब थी, दरिद्र थी और पढ़ाई लिखाई के साथ में कभी कोई नाता रहा नहीं। हृदय के आवेश से बाल गोपाल की आराधना करती थी। तो इससे दो ऑोजिट पर्सनालिटी आप सोच नहीं सकते रामकृष्ण संघ के भीतर में एट द सेम टाइम ठाकुर ने नरेंद्र का जिसके साथ में तर्क लगाया है वो सभी लोग नरेंद्र से एक तरह से कहे तो स्पिरिचुअली इनफीरियर थे वो चाहे मास्टर महाशय हो ना कि चाहे गिरीश घोष हो किंतु अोरमणि देवी माने रामकृष्ण संघ में मात्र दो हस्ती है कि जिनका जिनको कि ठाकुर ने यह मारवाड़ियों के द्वारा दी गई आहारीय पदार्थ खाद्य पदार्थ खाने को दिए हैं। तो सर्वप्रथम नरेंद्र को दिया है। वह बादाम, किशमिश, मिचरी वगैरह, साकर वगैरह और फिर यह अघोरमणि देवी को दिया। और जिस दिन ठाकुर ने कहा दक्षिणेश्वर में ही अपने कमरे में ही यह अघोरमणि देवी बैठी है। सभी भक्त बैठे हैं। ठाकुर ने कहा किसी को अरे यह जो मारवाड़ी जो मिचरी वगैरह लाए हैं। अघोरमणि देवी को दे दो। गोपाल की मां को दे दो। तो जैसे ही ये ठाकुर ने ऐसी बात कही सन्नाटा छा गया। सबको पता है कि इसको ग्रहण करने का अधिकारी सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र है। यहां पे गोपाल की मां को ठाकुर यह सब दे रहे हैं। ना सबकी जो गोपाल की मां के प्रति श्रद्धा थी 10 गुना बढ़ गई। नाउ आध्यात्मिक ले जगत में शी सीट्स अलोंग विद नरन। नरेंद्र की जो सिद्धि है, नरेंद्र की जो आध्यात्मिक उसकी यह जो उपलब्धि है, एग्जैक्टली उसके बगल में गोपाल की मां विराजमान है। तो बाकी सबके साथ में नरेंद्र का तर्क हुआ। नरेंद्र उनको हरा भी सकता है या तो फिर वंटियरली विड्रॉ हो सकता है वह फाइट में से जैसे गिरीश के साथ में। अभी उसकी श्रद्धा इतनी स्ट्रांग है कि उसकी श्रद्धा को मुझे तोड़ना नहीं है। तर्क अभी उसके सामने मुझे करने नहीं है। नरेंद्र ने जानबूझकर के वो जो फाइट थी वो ड्रॉ कर दिया। वो मैच थी वो ड्रॉ की ओर ले गए और मास्टर महाशय को तो नरन ऐसे ही करके वो खा जाएंगे। वो तो कोई कंपटीशन ही नहीं है। तो किंतु अोरमणि देवी इज वन पर्सन कि जिनकी आध्यात्मिक सिद्धि इस लेवल की है कि नरेंद्र के बिल्कुल बगल में वो विराज कर सकती है। तो यही अघोरमणि देवी और नरेंद्र दोनों एक दिन दक्षिणेश्वर में उपस्थित थे। और फिर ठाकुर का यह जो सेंस ऑफ ह्यूमर शरद महाराज ऐसा कहते हैं सेंस ऑफ ह्यूमर मैं कहूंगा कि ठाकुर की ये जो भीतर में जो एक बाल गोपाल था ना शरारती वो शरारती बाल गोपाल उसको लगा कि अब ये आनंद करने का यह अच्छा मौका है। तो फिर उन्होंने अोरमणि देवी को कहा कि अच्छा यह बैठा है लड़का कॉलेज का लड़का है नरेंद्र उसको तो पहचानते ही हो। पता ही यह तो है कैसा है उसका दिमाग किस तरह से सोचता है। एक काम करो तुम अपने दर्शन की बात इसको कहो। बोलो पूछो उसको कि यह सब ठीक है कि नहीं? मुझे तो सब समय परेशान करता रहता है। कहता है महाशय आपके जो दर्शन है वो सब हेलुसिनेशन है। आपके मन की कल्पनाएं हैं। तो ठाकुर तो रोते-रोते मां काली के पास में मां काली के मंदिर में गए थे। कहते थे नरेंद्र यह सब कह रहा है। तुम मैं मूर्ख गवार समझकर के क्या तुमने मेरे साथ में धोखा किया क्या? ठाकुर ऐसा रोते-रोते मां काली को पूजते हैं क्योंकि ठाकुर खुद तो मने अगरमणि देवी की तरह ही पढ़ाई लिखाई का कोई नामोनिशान नहीं वेस्टर्न रैशनलिटी लॉजिक साइंटिफिक आउटलुक वगैरह का कोई नामोनिशान ठाकुर में नहीं था एक आर्टिस्टिक माइंड था हृदय का आवेग था जिससे वह ईश्वर की आराधना करते थे बिल्कुल अोरमणि देवी की तरह ही प्रथम दर्शन प्राण के आवेग से पुकार पुकार करके ही हुआ था बाद में तो फिर सब एक के बाद एक गुरुओं का आगमन हुआ और उन्होंने ठाकुर के पास में विभिन्न सा विविध साधनाएं करवाई। सर्वप्रथम दर्शन जो था मां काली का मां काली के गर्भगृह में वो तो हुआ था हृदय के आवेश से प्रार्थना करके। तो इस तरह से देखें तो ठाकुर के दर्शन और अघोरमणि के गोपाल की मां के दर्शन में एक पैरेलल है। किंतु नरेंद्र जब ठाकुर के पास में आकर के ठाकुर के दर्शन की बातें सुनता है तो सीधा उड़ा देता है हवा में। महाशय आपको मन का भ्रम हो रहा है। ऐसा कुछ बोल के ठाकुर बीच-बीच में एशियस हो जाते थे। फिर जब मां काली को ऐसा बोलने को गए रोते-रोते कि नरेंद्र तो कहता है कि तुम जो मुझे दर्शन देकर जो सब बताती हो वह सब मेरे मन का भ्रम है तो मैं अनपढ़ हूं मैं गवार हूं ऐसा समझ के क्या तुम मेरे साथ में धोखाधारी कर रही हो क्या तब मां ने प्रकट होकर कहा अरे उसको पता नहीं है जिस दिन वह पता चल जाएगा उसको जिस दिन वह स्वीकार करेगा जिस दिन वह समझ लेगा उस दिन से वह सब स्वीकार करना शुरू कर देगा तो फिर ठाकुर का मन शांत शांत हुआ। फिर वो आकर के फिर वापस आए थे। सो देखिए कि यह नरेंद्र यह ठाकुर के साथ में ऐसा बार-बार इस तरह की बातें करता है। तो अोरमणि देवी को वो क्या कहेगा? बोल के गोपाल की मां को ठाकुर ने कहा कि नरेंद्र को बताओ तुम्हारे दर्शन की बात। देखो वो क्या कहता है। तो अभी गोपाल की मां ने पूछा ठाकुर को सबसे पहले तो देखिए कि आप ही ने तो कहा था कि दर्शन की बात और किसी को बतानी नहीं है। तो क्या मैं नरेंद्र को बताऊं कोई उससे कोई हानि तो नहीं होगी? तो ठाकुर ने कहा नहीं कोई हानि नहीं होगी। बताओ तुम उसको। तो फिर गोपाल की मां नरेंद्र को सब कुछ बता रही है। किस तरह से कि पहली बार गोपाल का दर्शन हुआ। पहले तो ठाकुर का दर्शन हुआ। स्पर्श करने को गई तो ठाकुर अदृश्य होकर के बाल गोपाल प्रगटित हुआ। फिर बाल गोपाल ने दुनिया भर की शरारतें करना शुरू किया। फिर कैसे वह बाल गोपाल को अपनी गोद में उठाकर के ठाकुर के पास में आई। स्पष्ट देख पा रही है कि उसके जो लाल पैर थे उस उनकी गोद में झूल रहे हैं। स्पष्ट देख पा रही है। ठाकुर के पास में आई। वही गोपाल ठाकुर के देह के भीतर में प्रविष्ट हो जाता है। फिर बाहर निकलता है। फिर चारों ओर दौड़ता है। फिर वह मां की गोद में बैठता है। फिर जब घर वापस आती है तो यही गोपाल वो जििद करता है। बिना तकिए के बिने बिना पिलो के वह सोएगा नहीं। और फिर यह खाना है, वह खाना है बोलकर के दुनिया भर की डिमांड करता है। यह ब्राह्मणी बेचारी बता रही है नरेंद्र को यह सब और आंखों में से अश्रुओं की धारा बह रही है। बह रही है। बस माने इतना भाव से तन्मय हो गई कि फिर से वही गोपाल प्रगटित होकर के फिर से वही शरारतें उनके सामने कर रहा है। वो देख पा रही है। किंतु और तो कोई देख नहीं पा रहा है कि बाल गोपाल फिर से प्रकट हुए हैं। फिर से वही दिव्य शरारतें करना शुरू किया है। तो ब्राह्मणी जो है बेचारी गोपाल की मां संपूर्ण रूप से चेहरा आश अश्रुओं से भीगता जा रहा है और अपने मुंह से यह सब कहानियां बता रही है। और देखिए नरेंद्र के हृदय में उस [गला साफ़ करने की आवाज़] समय किस तरह का परिवर्तन होता है। मुझे ऐसा लग रहा है कि ये जो नरेंद्र ने बाद में मां काली को जो स्वीकार किया है उसकी ये जो यात्रा है नरेंद्र की पिताजी का देहांत हुआ। ये जो एक बहुत बड़ा झटका था उनके लिए किंतु साथ-साथ में ही ना शायद ये जो अघोरमणि देवी ने यह जो सब उस दिन पूरी कहानी बताई थी और नरेंद्र के हृदय में ना एकाएक एक तरह का एक किस तरह का भावांतर प्रगटित हुआ। किस तरह का एक ट्रांसफॉर्मेशन प्रगटित हुआ। कल तक तो ठाकुर को कहते थे महाशय आपके दर्शन जो है हेलुसिनेशन है। आपके मन की कल्पना है। आपको किसी तरह का रोग हुआ है। यही नरेंद्र आज अघोरमणि देवी जब यह गोपाल के दर्शनों की बात बता रही है। एक तरह का ऐसा भवांतर एक ऐसा ट्रांसफॉर्मेशन खड़ा होता है कि नरेंद्र की आंखों में से भी अश्रुओं की धारा बहनी शुरू हो जाती है। और जब गोपाल की मां पूछती है कि बेटा मुझे यह जो दर्शन वगैरह हो रहा है तो मैं तो अनपढ़ हूं। मैं तो गवार हूं। वही ठाकुर के शब्द मुझे तो यह सब पता नहीं कि यह सही है या गलत है। तो बताओ कि यह दर्शन सही है कि मेरे मन का भ्रम है। तो नरेंद्र की आंखों में भी अश्रुओं की धारा बह रही है। बह रही है और वह भी रोते-रोते गोपाल की मां को कहता है कि ना मां आपने जो कुछ भी देखा है सब सत्य है। जो कुछ भी आपने देखा है सब सही है। सही सही सब दर्शन हुए हैं। तो जब नरेंद्र ऐसा कहता है तब कहीं गोपाल की मां को सांत्वना मिलती है और वह थोड़ा सा शांत होती है। यहां पे ठाकुर यह पूरा सीन देखकर के बढ़िया मजे से एक शरारती गोपाल की तरह ही वह आनंद कर रहे हैं। किंतु देखिए यह घटना का जो एक माने एक सौंदर्य है एक घटना का एक जो भाव प्रवाह है थोड़ा एक डीपर में जाएंगे तो मुझे ऐसा लग रहा है कि यह दिस माइट बिहेव बीन अ फर्स्ट टाइम कि नरेंद्र के हृदय में जो ट्रांसफॉर्मेशन प्रारंभ होता है ना मां काली को जो स्वीकार किया है वो एक रैशनलिस्टिक से लेकर के एक मिस्टेक तक की जो स्वामी जी की जर्नी है दिस माइट हैव बीन वन ऑफ द मोस्ट सिग्निफिकेंट स्टेप्स यह बड़ा ही एक सिग्निफिकेंट स्टेप होगा कि जब गोपाल की मां की बात को सुनकर के वह अपने खुद के अश्रुओं को रोक नहीं पा रहा है। वरना ठाकुर के साथ में इतनी सारी कहानियां है नरेंद्र की। कहां ऐसा हमने सुना कि ठाकुर अपने दर्शन की बात कर रहे हैं और नरेंद्र की आंखों में से अश्रुधारा बह रही है और दो हाथ जोड़कर के भक्ति भरे शब्दों में कहता है हां महाशय आप जो कहते हैं सब सही है। माने इस तरह के नरेंद्र की हम कल्पना भी नहीं कर सकते। ठाकुर जो कहेंगे अपने अनुभवों के बारे में, किसी उपदेश के बारे में और नरेंद्र उसके सामने कोई लॉजिकल कोई रैशनलिस्टिक कमेंट ना करें यह हम सोच भी नहीं सकते। दो हाथ जोड़कर के अश्रु भरे चेहरे वाले नरेंद्र की हम ठाकुर के सामने बैठे हुए कल्पना भी नहीं कर सकते। वो होगा किंतु यह फिर नरेंद्र जब काली को स्वीकार करता है बाद की यह सब घटनाएं हैं। उससे पहले नहीं उससे पहले यह पूरा रैशनलिस्टिक आर्गुमेंटेशन तर्क वितर्क किंतु यह गोपाल की मां के साथ में सर्वप्रथम नरेंद्र का यह जो भीतर भीतर में जो ट्रांसफॉर्मेशन प्रारंभ हो चुका होगा। ऑफ कोर्स ठाकुर के पास आए और ट्रांसफॉर्मेशन प्रारंभ ना हो वैसा संभव ही नहीं। किंतु कभी-कभी जैसे वह जो सीड आप जमीन के भीतर में डालते हैं ना तो क्या होता है कि जमीन के भीतर में ही अंकुरित होता है और धीरे-धीरे करके उसकी पंखुड़ियां जो है प्रसारित होनी शुरू होती है। किंतु वो जमीन से ऊपर में आने में उसको थोड़ा सा समय लगता है। कुछ समय के बाद में वह जमीन में से बाहर वो दिखाई देगा। इससे पहले जो ट्रांसफॉर्मेशन है जमीन के भीतर में ही है। अंकुरित हो रहा है। प्रथम पंखुणिया प्रस्फुटित होनी प्रारंभ हो चुकी है। यह सब अदृश्य होकर के होता है। जब जमीन में से वह बाहर आएगा छोटी-छोटी यह सब शाखा प्रशाखाएं तब हमको लगेगा कि नहीं यह बीज जो है अभी फर्टिलाइज हो गया है। किंतु उससे पहले का ट्रांसफॉर्मेशन पूरा अदृश्य रहता है। तो ठाकुर के पास में आने से ही ठाकुर ने वह जो स्पर्श कर दिया था और नरेंद्र चिल्ला उठा था। अरे महाशय क्या कर रहा है? मेरे मां है पिताजी है। तो तब से लेकर के ये ट्रांसफॉर्मेशन अवश्य प्रारंभ हो चुका होगा। किंतु क्या है वो इवन नरेंद्र का जो एक रैशनलिस्टिक एटीट्यूड है वो जोर करके सप्रेस करके रखता होगा कि नहीं इसको मुझे बाहर में इतना ज्यादा नहीं दिखाना। नृत्य कीर्तन गाना वगैरह सब होता था। किंतु यह जो नरन कि ऐसा आंखों में से अश्रुओं की धारा बह रही है और जो ठाकुर यदि जो कहे सब स्वीकार कर रहा है। दैट नरन वास आफ्टर मां काली का दर्शन। तो यह जो था गोपाल की मां के साथ में नरेंद्र का वार्तालाप सर्वप्रथम वो जमीन को भेद करके मिट्टी को भेद करके सर्वप्रथम जो शाखा प्रशाखाएं हैं जमीन पे बाहर में आकर के दिखना शुरू हुआ। दैट माइट हैव बीन द फर्स्ट इंसिडेंट कि सर्वप्रथम नरेंद्र का यह जो भावांतर है लोगों की नजर के सामने आया होगा। और फिर बाद की तो घटनाएं हमको सब पता ही है। सो दिस इज के नरेंद्र जैसा नरेंद्र और गोपाल की मां इससे दो ऑोजिट आप सोच नहीं सकते। एट द सेम टाइम दोनों आध्यात्मिक जगत में ऑलमोस्ट आसपास में पासपास में ही बैठे हुए हैं। इसके बाद अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: यदि मारवाड़ी द्वारा दी गई वस्तुएँ ठाकुर स्वामीजी को खिला सकते थे, तो स्वयं उन्हें क्यों नहीं खाते थे? उनके भीतर भी तो ज्ञानाग्नि प्रज्वलित थी
अभी इसका उत्तर देना मुश्किल है। यू आर राइट कि ठाकुर का क्योंकि क्या है पता है जैसे ठाकुर ने खुद ने कहा ना यह सब महासमाधि के लक्षण है। जिस के हाथ का खाना खाएंगे कोलकाता में रात्रिवास करेंगे। अपना अग्रभाग किसी को देकर खाएंगे। यह सब महासमाधि के लक्षण थे। यानी कि उन्होंने क्या है? ठाकुर ने जोर करके अपने को ऑर्थोडॉक्सी में फिर से बांधा था। ऑर्थोडॉक्सी से जगत के जितने भी नीति नियम थे उससे ऊपर उठ चुके थे। किंतु फिर से अपने को बांधा था जिससे कि जमीन पर रहकर के लोग कल्याण करें। वह भी यदि चला जाएगा तो सीधा फिर तो वहां समाधि की ओर ही जाएंगे। तो बोलकर के अब जैसे ठाकुर ने कहा ना पूरी दर्शन नहीं करना है। बुद्ध गया म ये जो विष्णु गया नहीं जाना है। क्योंकि वहां पे जाने से देह वापस ही नहीं आएगा। सो देह को टिकाने के लिए फिर से अपने को यह सब नीति नियम में बांधा था मेरी दृष्टि से। राइट? अभी वो जिस लेवल पे है वो तो हम लॉजिकली क्या एक्सप्लेन करेंगे। बट दिस सीम्स टू बी वन एक्सप्लेनेशन। [हंसी] माने हमारे और ठाकुर के बीच में ये तो सबसे बड़ा डिफरेंस है ना। हमको लिफ्ट ऑफ की चिंता है। उनको फिर लैंडिंग की चिंता है। [हंसी] वो लिफ्ट ऑफ हो गया तो ऑर्बिट से बाहर चले जाएंगे। फिर वापस ही नहीं आना होगा। [हंसी]
प्रश्न: ठाकुर तो खाने-पीने में अत्यंत विवेक रखते थे, पर हम तो जो मिल जाए वही खा लेते हैं। ऐसी स्थिति में हमारे लिए भोजन का सही आचरण क्या होना चाहिए?
जो अमेरिका से रिलेटिव्स आते हैं ना तो फिर वो कहेंगे वो फिल्टर वाटर चाहिए। वो मिनरल वाटर चाहिए। तो फिर यदि हम लोग तो ये सब पीते हैं। अपना पानी पी लेंगे तो बेचारे सीधे लेट जाएंगे। तो हमको लगता है भाई उनमें और हम में डिफरेंस क्या है? [हंसी] बात ऐसी है वो इतने म जहां पे वो क्या कहेंगे? हेल्थ हाइजीन सैनिटेशन अच्छा है उस जगह से आते हैं। हम लोग इसमें रहने को हैबचुएटेड है। तो ये खाने पीने का ऐसा है ना कि हम उस लेवल पे चले जाएंगे। बाद में यह सब आएगा। अभी फिलहाल हम जिस लेवल पर हैं खानेपीने का विचार अविचार करने से कोई लाभ नहीं है। वो जो 1% जहां पर मैटर करता है ना वहां पे वो सब मैटर करता है। आप वो लोहार की दुकान में जाएंगे बोले 10 किलो यह दे दो 20 किलो वो दे दो। वो जो स्क्रैप मेटल की दुकान में और वह जो जहरी के वहां पे जाएंगे बोला 10 ग्राम दे दो 20 ग्राम दे दो। 20 में से 21 ग्राम भी हुआ तो आपका सीधा 100000 2000 इधर-उधर हो जाएगा सोना। है ना? वहां स्कैप मेटल में आपका 10 किलो का 15 किलो भी हुआ कोई फर्क नहीं पड़ता। सो जहरी की दुकान में जाएंगे वहां एक-ए ग्राम की वो मेजरमेंट ठीक-ठीक रखना है। तब तो यह सब मैटर करता है। हम जिस लेवल पे हैं पहले तो हमको इतना सब कुछ म छोड़ना है। इतना सब कुछ अपनाना है। म लेवल ऑफ ट्रांसफॉर्मेशन व्हिच इज़ रिक्वायर्ड बिफोर अस इज सो ह्यूज। कि खाना पीना कोई मैटर नहीं करता हमारे लिए। पहले वो सब छोड़े फिर उस स्कैप मेटल की दुकान में से वो ज्वेलर की दुकान में जाए। बाद में तो वह सब मैटर करेगा। एक टाइम आएगा जब हां हां हां [हंसी] नॉट राइट नाउ और देखिए वो वो आएगा तो आपको ऑटोमेटिक पता चल जाएगा। आप जब खाना खा रहे हैं उसी समय आपको पता चलेगा कि ये अशुद्ध है। मेरे से ग्रहण नहीं होगा। उसी समय आपको पता चलेगा। फिर आपको किताब पढ़ के समझने की जरूरत नहीं है कि कोई आपको पॉइंट आउट कर दे वह भी जरूरत नहीं है। खाने के समय ही पता चलेगा कि यह खाना उचित नहीं है।
प्रश्न: स्वामीजी और गिरीश का भक्ति और ज्ञान मार्ग को लेकर तर्क-वितर्क कितना अद्भुत था!
किंतु यहां पर फिलॉसोफिकल म एग्रीड ऑफ कोर्स कि यदि आप कृष्ण के लेवल पर पहुंच जाएंगे तो आप कृष्ण ही हो जाएंगे। वो जो उपनिषद की फेमस कहानी कि आप जमीन पर पंखी बैठा है जैसा जैसा ऊपर जाएगा पता चलेगा टॉप डाल में जाकर के वही वो पंखी हो जाता है। उसके अलावा और कुछ था ही नहीं। सो यू आर राइट दैट वे। किंतु फिलोसोफिकल एक डिफिकल्टी यहां पर ऐसी है कि भक्ति साधना में भगवान कृष्ण की साधना में वो ब्राह्मण है सगुण ब्राह्मण माने कृष्ण स्वयं जबकि अद्वैत वेदांत में है निर्गुण ब्राह्मण दैट मींस कि ये जो कृष्ण रूपी जो नाम रूप है वो भी नहीं रहेगा कृष्ण भी तो एक नाम रूप है तो नाम रूप भी तो ये पूरा विलीन हो जाना चाहिए सो आप कृष्ण तो हो गए तो यदि इवन कृष्ण हो भी गए तो नाम रूप के लेवल में तो रहे आप कृष्ण रूपी रूप है कृष्ण रूपी नाम है। सो निर्विकल्प समाधि या निराकारवाद का हाईएस्ट लेवल है। नाम रूप भी नहीं रहेगा। सो दैट वे एक थोड़ा सा स्टेप लोअ हो जाता है। फिलोसोफिकली फिलोसोफिकली ना किंतु देखिए प्रैक्टिकली स्पीकिंग ऑफ कोर्स रामकृष्ण संघ में द्वैत अद्वैत वाले गियर ऑटोमेटिकली चेंज होते हैं। हमको कॉन्शियसली करने की जरूरत नहीं है। ऑटो गियर वाली गाड़ी है। किंतु फिलॉसोफिकली फिर भी देखिए कॉन्फ्लिक्ट रह ही जाएगा। फर्स्ट ऑफ ऑल ठाकुर ने खुद ने कहा है कि इसके भीतर में दो है। एक बालक है और एक मां है। हाथ टूटा है बालक का। मां का नहीं। यानी कि जब वो सामान्य लेवल पर रहते हैं। ठाकुर ने खुद ने कहा ना चैतन्य देव की तीन अवस्था होती थी। बाह्य दशा, अर्धबाह्य दशा, अंतर्दशा। तो बाह्य दशा में भक्तों के साथ वार्तालाप करते थे। अर्धबाह्य दशा में नृत्य कीर्तन करते थे। उदाम होकर के और अंतर्दशा में समाधिस्थ हो जाते थे। तो वो पूर्ण निराकार अवस्था या तो पूर्ण ज्ञान अवस्था तो अंतर्दशा थी समाधि अवस्था थी जिसमें कि मैं कौन हूं वगैरह वो विचार ही नहीं है। यू हैव मैं कौन हूं यह सोचने के लिए यू हैव टू बी सेपरेट फ्रॉम मी राइट व्हेन यू एंड आई मतलब मैं और मैं छोटा में बड़ा में एक हो जाता है तो छोटा में कहां रहेगा वो पूछने के लिए कि मेरा बड़ा में कौन सा है? सो वो पूर्ण ज्ञान की अवस्था निर्विकल्प समाधि में ही होती थी। सो हम ऐसा नहीं कह सकते कि हम ठाकुर के बारे में जब बात करते हैं तो निर्विकल्प समाधि वाले ठाकुर एक तो हम तो वह सगुण जो कि वार्तालाप करते हैं हमारे साथ में वो माने एंगेज्ड जो ठाकुर है उसी के बारे में हम यूजुअली सोचते हैं नहीं कि जो डिसएंगेज ठाकुर है अर्धबाह्य दशा वाले बाह्य दशा वाले सो दैट इज वन थिंग और इवन इफ आई बिकम श्री रामकृष्ण मायसेल्फ डिपेंड कर यू विल ऑलवेज से के वो रामकृष्ण तो एक नाम और रूप है बाह्य दशा और अर्धबाह्य दशा में अंतरर्दशा में ही नहीं है। अंतरर्दशा में रामकृष्ण रहते ही नहीं है। ही बिकम्स ब्रह्मण राइट वो नाम रूप चला जाता है। सो आप यदि यह कहते हैं कि जब कृष्ण हो जाएंगे तो आप म कृष्ण के साथ में चले जाएंगे तो कृष्ण ही हो जाएंगे तो कृष्ण को अपने को अपना एक स्टेप ऊपर जाना है। वह जब भी निर्विकल्प समाधि में चले जाएंगे तो ब्राह्मण ही रहेगा। फिर कृष्ण नहीं रहेंगे। राइट? हम बाह्य दशा अर्धबाह्य दशा वाले ठाकुर को सोचते हैं। यदि मैं ठाकुर के जैसा हो भी जाऊं, ठाकुर भी हो जाऊं तो भी मैं अर्धबाह्य दशा बाह्य दशा वाला ठाकुर हूं। ठाकुर स्वयं जब निर्विकल्प समाधि में जाते हैं तो ठाकुर भी नहीं रहते। इफ यू आर इन निर्विकल्प समाधि तो फिर कृष्ण भी कृष्ण नहीं रहेंगे। वो तो सच्चिदानंद ब्राह्मण हो। एज लॉन्ग एज यू आर कृष्ण यू आर अ सगुण ब्रह्म के लेवल पर हैं। आप द्वैत के राज्य में हैं। इवन आप टॉप ब्रांच वाले पंखी भी हो जाएंगे तो आप पंखी ही है। भले ही चाहे जितना भी शुद्ध हो पंखी ही है। पंखी फिर हवा में उड़ेगा तो फिर कि वो पंखी नहीं रहा। वह निर्गुण निराकार ब्रह्मण हो गया है ना किंतु आप लॉजिकल आर्गुममेंट को समझे तो जब तक कृष्ण है जब तक कृष्ण है तब तक तो वो अर्ध बाह्य दशा वाले बाह्य दशा वाले कृष्ण है यदि वो अंतरर्दशा में चले जाएंगे कृष्ण रहेंगे नहीं वो निराकार निर्गुण ब्रह्मण हो
प्रश्न: ठाकुर अपने फोटो की पूजा भी करते है
जाएंगे ना किंतु वो तो पहले ही कह दिया ना इसके भीतर में दो है ठाकुर ने कहा इसके भीतर में दो है जब तक वो कहते हैं खोलटा तब तब तक वो स्मॉल आई को सेपरेट कर रहा है। जब अपने खुद के फोटो की पूजा कर रहे हैं तो लार्जर आई की पूजा कर रहे हैं। हां हां हां [हंसी] अब देखिए ना ठाकुर ने कहा ना कि तुम लोग चिंता मत करना घरघर मेरी पूजा होगी। ये पहली बार ठाकुर मैं करके कहते हैं। हमने जब यह बात की थी उस समय मैंने नोट किया था कि देखिए कि पूरा कथामृत लीला प्रसंग पढ़ लीजिए। पहली बार लगता है कि यहां पर ठाकुर ने मैं करके कहा है। वरना यह इसका यहां का एककार एटा म ऐसा करके इनडायरेक्टली अपने को बुलाएंगे। वो पहली बार ठाकुर ने कहा है। व्हाट स्टेटमेंट इज सो सिग्निफिकेंट। घरघर मेरी पूजा होगी। सो दैट बिकम्स अ लार्जर आई। फिर वो छोटा फिर दो थे। भक्त था भगवान था। अभी भक्त चला गया है। भगवान ही रह गए हैं।
प्रश्न: ठाकुर के प्रत्येक शिष्य कितने महान थे !
ऑलमोस्ट ऑलमोस्ट कल का दिन अभी है थोड़ा सा एक दो बातें माने एक अल्टीमेट बात रह गई है अल्टीमेट जो है म अपना तो थीम है कि भक्ति से ज्ञान की ओर तो तो एक अल्टीमेट एक कहानी रह गई है सो दैट वी विल कंक्लूड टुमारो देखिए गोपाल मा गुलाब मा है योगेन मा है म लेडी डिवोटी में आप देखेंगे ना रामकृष्ण संघ निवेदिता गोलाप योगिन मां ये दिस थ्री आर फेमस और फिर जोसेफ एंड मैक्लड वगैरह कहा जाता है या घोरमणी देवी उन्हीं के वही लोग उनको जानते हैं जो कि फिर प्रवेश है अपने साहित्य में जिन्होंने एंट्री किया है उन लोगों को पता है अदरवाइज इन जनरल लोगों को नहीं पता देखिए ना क्रिश्चियनिटी को तो 2000 साल लगे ना ये उसका जो डेप्थ है वो रिवील होने में आज भगवान कृष्ण की जितने भी वो पार्षद है उनके जो आप संत संत महात्मा है। धीरे-धीरे करके रिवील होने में कितने साल लगे? उनके ऊपर में कहानियां लिखी जाएगी। उनके ऊपर में भजन गान स्तोत्र लिखे जाएंगे। तब तो कहीं जाकर यह फैलेगा। आज हमारा जो रेफरेंस है इस लिमिटेड टू ठाकुर मां स्वामी जी। किंतु फिर ऐसा समय आएगा। उनके पार्षद के ऊपर में यह सब भजन लिखे जाएंगे, कहानियां लिखी जाएगी, नाटक लिखे जाएंगे, स्तोत्र लिखे जाएंगे। स्वामी जी का लाइफ जैसेजैसे हम पढ़ते जाएंगे ना सबका कैरेक्टर रिवील होना शुरू हो जाएगा। मां की लाइफ क्या है? एक तो पैरेलल चली है पूरा एक उनका सेपरेट एक चला है। ठाकुर का क्या है कि ठाकुर जब थे इन लोगों का किसी का प्रोमिनेंस नहीं था। अदर देन स्वामी जी। तो उन दोनों को स्टडी करके इनके बारे में इतना डीप में नहीं पता चलेगा। किंतु जैसे-जैसे स्वामी जी का लाइफ प्रोग्रेस होता जाएगा। सबका रिवलेशन स्टार्ट होना। अभी जैसे ठाकुर का पढ़ते-पढ़ते कैसे अधोरमणि देवी का आ गया। हमने सेपरेटली नहीं लिया है। पार्ट एंड पार्सल ऑफ ठाकुर लाइफ। सो बाकी सब डायरेक्ट डिसाइपल का क्योंकि नरेंद्र तो उनका लीडर था। तो तो वो जब कहानियां स्टार्ट होगी सबका चरित्र ऐसे ही रिवल होना शुरू हो जाएगा। [हंसी] फिर उस समय सुबोधनांद जी पे पूरा सीरीज चलेगा। कभी कभी वो अद्वैतानंद जी पे चलेगा। [हंसी]