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Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 19 Nov 2025

prayer

तो वहां पर दो साधुओं का मिलन हो गया। एक दिन रात को दोनों एक ही जो कुटिया थी उसमें विश्राम ले रहे हैं। तो अभी क्या हुआ कि दोनों तो जिन साधु है। रात को तो साधना करनी है। सो के नहीं बितानी है रात। तो फिर साधना करने के लिए उद्दीपना मिले। एनकरेजमेंट मिले। इसलिए एक साधु ने चौक से लेकर के दीवार के ऊपर में कुटिया की दीवार पे लिख दिया। सोहम अर्थात कि वही निर्गुण निराकार ब्रह्मण ही मेरा सही स्वरूप है। सतित आनंद ही मेरा सही स्वरूप है। यह तमस रजस सत्व रूपी गुण जो है गुणत्रय जो है वो मेरा स्वरूप नहीं है। वह एक अज्ञान रूपी आवरण मात्र है जो कि भ्रम से प्रकट हुआ है। तो बोलकर के सोहम उसने यह दीवार के ऊपर में लिख दिया और बैठकर के साधना कर रहा है। अभी वह था ज्ञान मार्गी अद्वैत मार्गी किंतु जो दूसरा साधु था वह था कि भक्ति मार्गी वह था विशिष्ट अद्वैती तो फिर उसने जैसे ही देखा सो हम तो वो तो बड़ा ही नाराज हो गया कहता है कि काम कांचन ये जो अविद्या अज्ञान वगैरह से जो भरे काम क्रोध मद लोभ मोह मत्सर से भरे इस पंचमहाभूत के नश्वर देह को क्या तुम मैं ईश्वर हूं मैं परब्रह्म नारायण हूं ऐसा कहते हो कैसे तुम्हारी ये जुर्रत हुई ऐसा बोल के उसने किंतु सोहम मिटा नहीं दिया वो मिट्टी की जो दीवार होती है उसमें मिटाना मुश्किल है वो म ऐसा तो नहीं है ना ब्लैक बोर्ड है फिर डस्टर है उसको इरेज कर दिया तो वहां तो एक बार लग गया तो लग गया तो फिर उसने क्या किया चौक से लेकर के सोहम के सामने लिख दिया दा तो अभी क्या हो गया दासोहम मैं वही परब्रह्म नारायण जो है उनका दास हूं तो फिर ये निराकारवादी साधु नाराज हो गया इति नीति नेति ज्ञान मार्ग का अवलंबन करने वाला कहता है कि यह जो देह है इसी के भीतर में तो ये जो कॉस्मिक आई सत चित आनंद रूपी सत चित आनंदमय ब्रह्मण ही निर्गुण निराकार ब्रह्मण ही इसके भीतर में निवास करते हैं। यह जो मन बुद्धि चित्त अहंकार ये पंच ज्ञानेंद्रिय पंचर्मेंद्रिय रूपी यह जो बाकी आवरण दिख रहा है वो सिर्फ एक आवरण ही है जैसे कि यह रस्सी के ऊपर में सर्प का भ्रम हो रहा है। जिस क्षण हमको यह ज्ञान हो गया कि मैं सर्प नहीं हूं निराकार निर्गुण सतचित आनंद ब्रह्मण हूं उसी क्षण ये जगत के जितने भी दुख कष्ट है चले जाएंगे। मैं निर्विकल्प समाधि में डूब जाऊंगा। अनंत आनंद में डूब जाऊंगा। तो ये निराकारवादी साधु यह ज्ञान मार्गी उसने गुस्सा हो करके अभी उसने भी उसको मिटाया नहीं। देखिए तो ये जो ज्ञानी साधु था उसने जैसा ही देखा दासोहम तो उसने फिर से चोक लेकर के उसके सामने लिख दिया स तो क्या हो गया सदा सोहम मैं सिर्फ सोहम यानी कि ये ब्राह्मण ही नहीं हमेशा हमेशा के लिए मैं ब्राह्मण हूं कभी भी तीनों काल में मेरे भीतर में अज्ञान था ही नहीं एक्चुअली तीन काल जो है भूत वर्तमान भविष्य वो भी माया के भीतर में ही है और मैं मायातीत निर्गुण निराकार ब्राह्मण हूं तो अभी जैसे उसने लिखा सदा सोहम तो फिर ये जो भक्ति भक्त साधु था उसने नाराज होकर के उसके सामने लिख दिया दास दासोह मैं सिर्फ दास नहीं दासों का दास हूं। तो ये जो ज्ञान मार्गी साधु उसने फिर से लिख दिया सदा सदा सोहम सिर्फ सोहम नहीं सिर्फ सदा सोहम नहीं सदा सदा सोहम तो ये दोनों झगड़ रहे हैं और ये दा लिख रहा है ये स लिख रहा है सदा सदा सदा सोहम दास दास दास दास सदा सोहम ओम स्थापकाायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री राम कृष्ण लीला पहला प्रसंग स्वामी जी का जीवनी इसका हम पाठ कर रहे हैं। लेखक है स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वितीय खंड साधक भाव और इसके भीतर में प्रथम चैप्टर साधक और साधना यह हम अभी पाठ कर रहे हैं। आज जो पॉइंट हम देखने वाले हैं थोड़ा सा फिलॉसोफिकल है। तो इसका टाइटल शरद महाराज ने दिया है नेति नेति और इति इति साधन पद। तो इसको हम देखें। इससे पहले तो थोड़ा समझ लेते हैं कि इसमें महाराज जी क्या कहना चाहते हैं। बेसिकली हमको पता है आज हम दो

अद्वैत वेदान्त और "नेति नेति" ज्ञान मार्ग की सामान्य समज

फिलॉसोफी को लेते हैं वेदांत की। एक तो है अद्वैत वेदांत। दूसरा है विशिष्ट अद्वैत वेदांत। अभी अद्वैत वेदांत आपको पता है कि उसकी किस तरह से इसकी व्याख्या करनी है। बहुत ही सहज सरल रूप से व्याख्या करें तो वह वर्ल्ड फेमस एग्जांपल है रज्जू और सर्प। यदि आप रास्ते पर जा रहे हैं अंधेरे में यदि आपने रास्ते में पड़ा हुआ एक रज्जू देख लिया एक रस्सी देख ली एक रोप देख लिया तो एक रोप को देखकर के इस रस्सी को देखकर के आपको शायद अंधेरे में यह भ्रम हो सकता है कि यह सांप है। इसको सांप को देखकर के जैसे हमको सांप को दसने का डर तो लगता ही है। अभी यहां पे ही इस विशाखापट्टनम आश्रम यह चारों ओर इस तरह से जंगल जैसा है थोड़ा सा और सामने समुंदर है तो ग्रीनरी काफी है तो यहां पे सांप होते हैं तो एक दिन में हम लोग नाइट क्लास शायद आपको पता होगा कि हमारे आश्रम में रात को खाने के बाद में जितने भी साधु हैं सब मिलकर के पाठ करते हैं। माने एक साधु पाठ करेगा कोई भी एक किताब में से अब जैसे कि हमारा आजकल चल रहा है किताब अह रेमिनेशन ऑफ स्वामी विवेकानंद तो एक साधु पाठ करेगा 10-15 मिनट और फिर बाकी सब साधु लोग सुनेंगे साधु ब्रह्मचारी जो भी है और पाठ के बाद में हो सकता है थोड़ा बहुत डिस्कशन हो और इसके बाद में सब अपने कमरे में चले आएंगे रात को विश्राम करने के लिए तो एक प्रत्येक आश्रम में ऐसा होता है और एक कमरा फिक्स होता है कि यहां पर पाठ होगा। तो हम लोग पाठ करने के लिए कमरे में जा रहे थे। पांच छ महीने पहले की बात है। एकाएक देखा कि वहां पे दरवाजे के ऊपर में एक सांप था। तो इतना डर गए हम लोग। एकाएक फटाक के पीछे चले आए। कहीं सांप दस ना दे। तो देखा कि सांप का डर है वह मनुष्य के हृदय में जैसे कि हमारे डीएनए में ही बैठा हुआ है। क्यों? क्योंकि हमारे जो पुरखे हैं उन्होंने जंगल में बहुत साल बिताए हैं। बोलकर के हम सब हमारे डीएनए में ही यह सांप का डर बैठा हुआ है। तो जैसे ही ऐसा एक आभास भी हुआ मुझे एक घटना याद है रांची की तो रांची में वो तो जंगल ही है। वहां पे जो जहां पे हमारा फार्म था यह फार्म है 75 एकड़ के दो फार्म है। तो वहां पर एक फार्म उसका नाम गतलसुद माने गतलसुद नाम की जगह है वहां पर यह फार्म तो चारों ओर जंगल ट्राइबल एरिया सांप वगैरह तो कितने ही निकलेंगे वहां पे तो वहां का मैनेजर मुझे एक बार बता रहा था कि एक दिन अर्ली मॉर्निंग को गया बाथरूम में तो हाथ धो रहा है हाथ धोते-धोते उसको ऐसा लगा लाइट ऑफ था बाथरूम का तो उसको ऐसा लगा कि वहां पर बजिन के भीतर में कुछ सॉफ्ट कुछ पड़ा पड़ा हुआ है। तो उसने सोचा कि इस बजिन में तो मैंने क्या रखा है? तो उसने फिर लाइट ऑन करके देखा तो वहां पर एक सांप पड़ा हुआ था कुंडली मार करके वहीं बेजिन के भीतर में तो वो मुझे बता रहा था महाराज इतना मैं डर गया चिल्ला करके मैं वो बाथरूम से बाहर दौड़ा आया। तो क्या है कि सांप को देखने से डर लगना बड़ा स्वाभाविक है। तो जब हम रास्ते में जाते हैं और रस्सी भी यदि पड़ी है और अंधेरे में सांप रूपी भ्रम भी होगा तो भी हमारा हृदय जो है वह धकधक करने लगता है। किंतु देखिए कि जैसे ही आपने आपके मोबाइल की टॉर्च ऑन की और उसके ऊपर में मारी साथ-साथ में ही पता चला कि यह सांप नहीं है। सिर्फ एक रस्सी पड़ी हुई है। साथ में ही हमारा भ्रम जो है वह दूर हो गया। तो अद्वैत वेदांत कहता है कि यह है निर्गुण निराकार ब्रह्मण जिसका कि कोई एट्रिब्यूट नहीं है। जिसके भीतर में ना ही कोई क्रिया है ना ही जिसके भीतर में कोई कर्म है। सतचित आनंद यह माने यह ब्रह्मन का ही स्वरूप है। ब्रह्म सच्चित आनंद है तो सही किंतु इसके अलावा और कोई गुण नहीं है। जैसे सत्व, रजस, तमस जैसे कि सृष्टि की उत्पत्ति करना, सृष्टि का पोषण करना, सृष्टि का संहार करना यह सब निर्गुण निराकार ब्राह्मण नहीं करता है। उसके ऊपर में अविद्या या अज्ञान का एक लेयर प्रकट होता है। जिसके बाद में से अब जैसे ये आपने ये फिजिक्स का यह एक्सपेरिमेंट शायद किया होगा जब आप स्कूल में होंगे कि एक प्रिज्म ग्लास है और यहां पर सूरज का प्रकाश उसके ऊपर में आप डालते हैं। तो आपको तो पता है कि सूरज का जो प्रकाश है उसमें किसी भी कलर का कलर नहीं होता। बिना कलर का वाइट प्रकाश है। इवन वाइट भी नहीं कहेंगे। सूरज के प्रकाश को हम कलरलेस ही कहेंगे। किंतु जैसे ही उसको हम इसके ऊपर में प्रिज्म रूपी ग्लास के ऊपर में डालते हैं तो साथ में ही यह जो ट्रायंगुलर ग्लास जो होता है तो एक ओर से सूरज का यह कलरलेस प्रकाश गिरेगा। प्रकाश की किरण तो दूसरी ओर से सप्त रंगों में विभाजित पूरा एक इंद्रधनुष या तो मेघ धनुष देखने को मिलेगा। रेनबो देखने को मिलेगा। तो प्रश्न होगा कि यह जो निर्गुण निराकार जो सूर्य का प्रकाश है उसमें से यह सप्त रंग कहां से प्रकट हुए? तो एक्चुअली क्या है कि सूर्य का जो प्रकाश है उसके भीतर में पोटेंशियली जीवन है या तो पोटेंशियली कलर है। बस वो प्रिज्म था कि इस पोटेंशियल कलर को स्प्लिट करके उसको एक्चुअल मैनिफेस्टेशन ऑफ कलर में रूपांतरित करें। तो यहां पर भी ब्राह्मण जीवन है। सत चित आनंद वही ब्राह्मण है। तो इसके भीतर का जो पोटेंशियल है यह यह जब एक माया का आवरण लगता है तो सप्त रंग में इंद्रधनुष में वह कन्वर्ट होता है और फिर हमको सब कुछ दिखाई देता है। यहां पे यह सूरज है, चांद है, सितारे है, स्पेस टाइम है, मैटर एनर्जी है, पृथ्वी है। पृथ्वी के ऊपर में पहाड़, नदी, जनमान मानव, जंगल यह जो देश सब कुछ हमको दिखाई देता है। तो यह एक प्रिज्म रूपी अज्ञान रूपी प्रिज्म बीच में आया है। बोलकर के ब्राह्मण के भीतर का जो पोटेंशियल लाइफ जो है वह हमको मैनिफेस्ट होता दिखता है। किंतु हमको यह पता है स्पष्ट पता है कि प्रिज्म जो है जिस क्षण हम प्रिज्म को प्रिज्म को हटा लेंगे उसी क्षण यह जो सप्तरंगी इंद्रधनुष जो है वो गायब हो जाएगा अदृश्य हो जाएगा। बस सूरज का निर्गुण निराकार प्रकाश ही रह जाएगा। तो यह हो गया अद्वैत वेदांत। और यदि अद्वैत वेदांत की साधना करके निर्गुण निराकार ब्रह्मण का साक्षात्कार करना है तो हमको यह स्पष्ट रूप से अपने मन को बताना होगा कि रस्सी जो है उसके ऊपर में सर्प रूपी जो भ्रम है वह भ्रम मात्र है। हमारे अज्ञान की वजह से प्रकट हुआ है। रस्सी नहीं रज्जु सर्प नहीं रज्जू मात्र है। सांप नहीं है। रस्सी ही है। इसको कहते हैं नेति नेति मार्ग या तो फिर ज्ञान मार्ग। जगत से अपना नाता तोड़ के निर्गुण निराकार ब्रह्मण को साक्षात्कार करना है तो जगत के विषयों के प्रति हमारा जो आकर्षण है उसको संपूर्ण रूप से उसमें विच्छेद डालना होगा। ठाकुर जैसे कहते हैं काम कांचन त्याग बिना काम कांचन त्याग के आप निर्गुण निराकार ब्रह्मण प्राप्ति का मार्ग पे प्रथम कदम भी रखा नहीं है। तो यह हो गया ज्ञान मार्ग या तो फिर नेति नेति मार्ग अद्वैत वेदांत की सिस्टम में निर्गुण निराकार ब्रह्मण को प्राप्त करने का। किंतु यहां पर एक

विशिष्ट अद्वैत और "इति इति" भक्ति मार्ग। ज्ञान और भक्ति मार्ग की तुलना

विशिष्ट अद्वैत रूपी रामानुजाचार्य प्रवर्तित एक दूसरी भी फिलॉसोफी है। शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत का प्रवचन प्रचलन प्रारंभ किया। तो यहां पे रामानुजाचार्य ने विशिष्ट अद्वैत फिलॉसोफी का प्रचलन किया। अभी विशिष्ट अद्वैत फिलॉसोफी क्या कहती है? ब्राह्मण जो है वह सगुण और साकार है। उनको हम नारायण रूपी नाम दे सकते हैं। और यह जो नारायण है यह जगत और जीव और जगत यह दोनों नारायण के देह है। अब जैसे कि आप इमेजिन करते हैं। यह फैन चलता है। राइट? तो अभी फैन चलता है तो उसके भीतर में इलेक्ट्रिसिटी है। वह भी चाहिए और फिर यह फैन जो पूरा बाहर का जो पूरा फैन जो है वह भी चाहिए। तीन पंख उसके चाहिए। फिर उसके भीतर में मोटर चाहिए। सब चाहिए। आप यह कहेंगे कि सिर्फ इलेक्ट्रिसिटी ही फैन है तो ऐसा कैसे चलेगा? आप फैन को हटा लीजिए। सिर्फ इलेक्ट्रिसिटी का स्विच ऑन ऑफ करते रहिए। क्या हमको ठंडक प्राप्त होगी? नहीं होगी। आपको इलेक्ट्र इलेक्ट्रिसिटी के साथ में जो कि एक इमटेरियल एलिमेंट है उसके साथ में यह मटेरियल फैन जो है वह भी चाहिए और अच्छी क्वालिटी का फैन होने से आपको ठंडक भी अच्छे से लगेगी। तो अब जैसे फ्रिज है तो फ्रिज में आपको कोई भी चीज ठंडी करनी है तो आप फ्रिज के भीतर में तो रखेंगे। आप सिर्फ इलेक्ट्रिसिटी कनेक्शन ला के बिठा देंगे और यह जो आपका जो फल है उसके ऊपर में यह खुले केबल छोड़ देंगे इलेक्ट्रिसिटी के तो फल तो जल जाएगा वो ठंडा थोड़ी ना होगा यह इलेक्ट्रिसिटी को कोल्ड में परिवर्तन करने के लिए ठंडक में परिवर्तन करने के लिए आपको एक मैकेनिज्म चाहिए एक मशीन चाहिए जिसको कि हम फ्रिज कहते हैं। अर्थात कि यह सगुण ब्रह्मण और यह जीव जगत यह दोनों की आवश्यकता है। दोनों एक दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। अर्थात कि यहां पर ईश्वर है, नारायण है। और यह जो जीव और जगत है, वह उनके देह है। नारायण और नारायण का देह अर्थात कि यह जीव और जगत। तो यह हो गया विशिष्ट अद्वैत का फार्मूलेशन और यदि आपको इस नारायण का दर्शन प्राप्त करना है, नारायण के आशीर्वाद या तो साक्षात्कार प्राप्त करना है तो नारायण की उपासना करनी पड़ेगी। अभी यहां पर एक चीज किंतु बड़ा स्पष्ट देखिए कि यह जीव और जगत है वह नारायण के ही एक अंश है। अर्थात कि उनका त्याग नहीं करना है। उनको भी स्वीकार कर लेना है नारायण के अंश के रूप में। अर्थात कि यह जो साधना है विशिष्ट अद्वैत में भक्ति पात जिसको कहते हैं इसको हम इति इति साधन पथ कहेंगे। अर्थात कि देखिए कि यह जीव है, जगत है, विषय के सब सामग्रियां है, जो जिसके प्रति मेरी इंद्रियों का प्रलोभन धावित होता है, वह सब है तो सही किंतु बहुत ज्यादा उसके बारे में चिंता करने की वजह नारायण की उपासना प्रारंभ कर लेते हैं। त्याग होता रहेगा। सबसे पहले हमको शरणागति और उपासना शरणागति और आराधना करनी है। ईश्वर के साथ में कोई ना कोई एक संबंध बनाना है। जैसे कि बालक भाव है, मातृ भाव है, सख्य भाव है, दास्य भाव है वगैरह। कोई ना कोई एक भाव का संबंध ईश्वर के साथ में रखना है जिससे कि ईश्वर साक्षात्कार प्राप्त हो और इसके बाद में जैसे ही ईश्वर साक्षात्कार प्राप्त हुआ फिर भगवान ही हमको कह देंगे ईश्वर ही कह देंगे कि यह जो मिथ्या है यह सत्य है इंद्रियों के विषय का त्याग वह त्याग करने की शक्ति सब कुछ ईश्वर ही हमको दे देंगे। जैसे कि ठाकुर उदाहरण देते हैं। बिल्ली का एक बच्चा है। तुम अपनी मां के ऊपर में संपूर्ण भरोसा रखता हुआ म्याऊ म्याऊ करता हुआ बिल्ली रूपी जो उसकी मां है उसकी गोद में जाकर बैठा रहता है। फिर उसकी मां उसको पकड़ करके कहीं पर बिछाने पर रखे तो वहां पर रहता है। उसको पकड़ करके कहीं जमीन पर रखे तो वहां पर रहता है। म्याऊ म्याऊ करता है बिल्ली का बच्चा और मां के ऊपर में संपूर्ण निर्भर होकर रहता है। तो यह हो गया इति इति साधन पथ या तो फिर भक्ति मार्ग। भक्ति मार्ग में जीव और जगत का त्याग करना है। यह बहुत ज्यादा टेंशन लेने की जरूरत नहीं है। क्योंकि जीव और जगत है सगुण ब्राह्मण या तो फिर नारायण के ही अंश विशिष्ट है। जैसे कि मेरा देह है। अभी देखिए कि मैं अपने हाथ को काट दूं तो मुझे क्षति तो बहुत होगी। कष्ट तो बहुत होगा किंतु यह हाथ जो है वह मैं नहीं हूं। तो क्या है कि मैं मैं अपने हाथ पर डिपेंडेंट नहीं हूं। हाथ मेरे पर डिपेंडेंट अवश्य है। तो क्या है कि यह जो कनेक्शन है देही और देह यह कनेक्शन है नारायण और इस जीव और जगत के बीच में। तो आप यदि मेरे साथ में मित्रता करना चाहेंगे तो आप ऐसा थोड़ी ना कहेंगे कि हाथ के साथ में मित्रता नहीं करनी पैर के साथ में मित्रता नहीं करनी सर के साथ में मित्रता नहीं करनी किंतु महाराज के साथ में करनी है बट किंतु यह हाथ पैर सर वगैरह हटा दे तो फिर मेरा रहेगा क्या तो वही कि यहां पे आपको नेति नेति नहीं इति इति करना है और सोचना भी नहीं है यह सब के बारे में किसी भी एक व्यक्ति के साथ में मित्रता करने को जाते हैं। क्या आप ऐसा सोचते हैं कि मैं उसके हाथ के साथ में मित्रता कर रहा हूं। उसके कान के साथ में मित्रता कर रहा हूं। उसके नाक के साथ में मित्रता कर रहा हूं। उसके हाथ, नाक, कान, पैर जो कुछ भी है उसको आप सिंगल एक होल के रूप में ही देखते हैं। एक संपूर्ण परिपूर्ण एक व्यक्ति के रूप में ही देखते हैं। उसको आप सेपरेट करके नहीं देखते। जिस तरह से अद्वैत वेदांत में है कि ब्राह्मण जो है निर्गुण है। उसको सृष्टि के साथ में कोई लेना देना नहीं है। बस एक प्रिज्म ग्लास बीच में अब जैसे कि रज्जू है रस्सी है। रस्सी को सर्प के साथ में क्या लेना देना है? सर्प का जो आभास जो हुआ है रस्सी के ऊपर में वह तो आपके अज्ञान की वजह से हुआ है। रस्सी को थोड़ी ना कोई फर्क पड़ता है कि आप उसको रस्सी के रूप में देखते हैं ना कि फिर उसको आप सांप के रूप में देखते हैं। यह जो सूर्य का प्रकाश है, उसको हम सप्तरंगी इंद्रधनुष के रूप में जो देखते हैं, उसके साथ में सूर्य के प्रकाश को क्या लेना देना है? वो जो हम देख रहे हैं हम ही ने तो यह प्रिज्म ग्लास बना करके हम ही ने तो उसको इसमें से इसमें पसार करवाया है और हम ही ने उसको स्प्लिट करवाया है सप्त रंग में तो उसके साथ में सूरज के प्रकाश को तो कोई लेना देना नहीं ऐसा थोड़ी ना है कि मैं यदि प्रिज्म ग्लास बीच में रखूंगा तो सूरज की शक्ति बढ़ जाएगी और प्रिज्म हटा लूंगा तो सूरज की शक्ति कम हो जाएगी। सूरज को उसके साथ में कोई लेना देना नहीं। अर्थात कि यह जो अद्वैत वेदांत का रास्ता है उसमें निर्गुण निराकार ब्राह्मण को जीव और जगत के साथ में कोई लेना देना नहीं है। अर्थात कि यदि आपको निर्गुण निराकार ब्रह्मण को प्राप्त करना है प्राप्त करना क्या वो तो हमारा सही स्वरूप ही है। यदि अपना सही स्वरूप साक्षात्कार करना है तो फिर आपको जीव और जगत को संपूर्ण रूप से रिजेक्ट करना होगा। यह जो जगत है, विषयों के भोग्य वस्तु है, उसके साथ में अपनी जो कामना वासना रूपी कनेक्शन जो बैठा हुआ है, उसको संपूर्ण रूप से विच्छेद करना होगा। जैसे ही आपने उसको विच्छेद कर दिया, वैसे ही हमारे भीतर में जो निर्गुण निराकार ब्रह्म जो हमारा स्वरूप है, सतचित आनंद स्वरूप है, वह स्वतः ही जागृत हो जाएगा। आपको एक बार यह प्रिज्म का ही यदि फिर से उदाहरण दें तो एक बार आपने सूरज के प्रकाश के सामने प्रिज्म रख दिया सप्तरंग में उसको विभाजित कर दिया रेनबो के रूप में अभी आप कहते हैं कि मुझे अभी रेनबो नहीं चाहिए। यह इंद्रधनुष नहीं चाहिए। मुझे फिर से वही सूरज का वही निर्मल प्रशांत प्रकाश ही चाहिए। तो ऐसा करने के लिए क्या आपको यह रेनबो को फिजिकली हटा के सूरज के प्रकाश को फिजिकली थोड़ी ना ले आना है। ऐसा नहीं है। जैसे ही प्रिज्म हटाया वैसे ही वह रेनबो अदृश्य हो गया और वही सूरज का प्रकाश जैसा था एज इट इज रहेगा। ठाकुर का जैसे उदाहरण कि एक कमरा हजार साल से बंद है तो उसमें आपने जैसे ही लाइट का स्विच ऑन किया या तो फिर जैसे ही लैंप का प्रकाश डाला तो ऐसा थोड़ी ना है कि हजार साल का अंधेरा जाने के लिए और 1000 साल लगेंगे धीरे-धीरे करके अंधेरा आया था धीरे-धीरे करके अंधेरा जाएगा नहीं जैसे ही प्रकाश चला गया अंधेरा आ गया जैसे ही प्रकाश ऑन हो गया अंधेरा गायब हो गया अभी हजार साल आप उसको अंधेरे में रखें ना कि 1 लाख साल आप उसको अंधेरे में रखें। कोई फर्क नहीं पड़ता। जिस क्षण आपने वह स्विच ऑन किया बत्ती का उसी क्षण उजाला हो गया। देखिए यह जो माइनिंग करते हैं हम लोग यह जो पृथ्वी के भीतर में जमीन के भीतर में तो माइनिंग करतेकरते हम कितना डीप में जाते हैं। अभी जहां पर हम डीप में गए हैं वहां पर तो सूरज का प्रकाश कभी पहुंचा नहीं है। पृथ्वी की यह जो गठन हुआ है, पृथ्वी जो फॉर्म हुई है, वो 4 बिलियन इयर्स उसको लगे हैं। 400 करोड़ साल पृथ्वी को लगे हैं। आज अह माने 400 करोड़ साल पहले पृथ्वी की रचना हुई थी। अर्थात कि मान लीजिए कि आज एक बहुत गहरी आप माइन अर्थात कि यह जो यह खाण जिसको कहते हैं वो आप खोदेंगे जमीन के भीतर में बहुत डीप में जाएंगे और फिर वहां पर आप बत्ती जलाएंगे तो फिर क्या यह 400 करोड़ साल जो लगे हैं पृथ्वी को बनने के समय तो 400 करोड़ साल से यहां पर अंधेरा था तो आपने जब बत्ती ऑन की इस माइंड के भीतर में तो क्या प्रकाश को आते-आते 400 करोड़ साल थोड़ी ना लगेंगे। 4 सेकंड आपको माने वो स्विच ऑन करने में जितना टाइम लगा 4 सेकंड का विदिन फोर सेकंड वो पूरा जो चेंबर है जो माइन आपने किया है क्रिएट वो जो खोदा है वो चार सेकंड में उसमें उजाला हो जाएगा। तो यहां पे इस तरह से है और यहां पे है कि जीव और जगत सगुण ब्रह्मण के ही नारायण के ही अंशभूत है। नारायण को प्राप्त करने के लिए बिकॉज़ के जीव और जगत नारायण के अंश है। उसके बारे में ज्यादा टेंशन नहीं लेकर के बस जो नारायण है उस उनकी उनका खुश करने के लिए उनको हमको आशीर्वाद दे इसके लिए उनको प्रसन्न करने के लिए जो जो कोई भी क्रिया है हमको करनी है। तो यह बेसिकली दो मार्ग है। एक है ज्ञान मार्ग, एक है भक्ति मार्ग। ज्ञान मार्ग में नेति नेति करके जीव और जगत के साथ में अपना पूरा ना जो रिश्ता है या तो नाता है उसको तोड़ना है। यहां पे इति इति करके ईश्वर को आवकारना है कि मैं आपका दास हूं। मैं गरीब हूं। मैं अधम हूं। मेरे भीतर में पूरा अंधेरा छाया हुआ है। हे प्रभु आप आइए और मेरे हृदय को उजाला प्रदान कीजिए। ऐसा कुछ आपको शरणागति के माध्यम से करना है। तो यह दो रास्ते हैं

श्रीरामकृष्ण के ज्ञान और भक्ति मार्ग समन्वय की पूर्व-भूमिका

जिसके बारे में अभी हमको शरद महाराज बताते हैं। ये जो एक बार हम शरद महाराज का यह डिस्क्रिप्शन देखेंगे। उसके बाद में आखिर में हम यह भी देखेंगे कि ठाकुर की कौन सी साधन प्रणाली है। क्योंकि ठाकुर ने ऑब्वियसली दोनों मार्ग की बातें की है। नेति नेति साधन पथ की भी बात की है। इति इति साधन पथ की भी बात की है। ठाकुर के जो उदाहरण है आपको दोनों तरह के उदाहरण दिख जाएंगे। भक्ति मार्ग के भी उदाहरण दिखेंगे। ज्ञान मार्ग के भी दिखेंगे। तो फिर प्रश्न होगा ठाकुर कौन थे? क्या वह ज्ञानी थे ना कि वह भक्त थे। नेति नेति मार्ग अपनाया था ना कि इति इति मार्ग अपनाया था। या तो फिर बहुत बार रामकृष्ण मिशन में एक जनरल धारणा ऐसी है कि पहले इति इति मार्ग अपना करके भक्ति करके अपने हृदय को शुद्ध चित्त निर्मल कर दीजिए। उसके बाद में फिर आप नेति नेति मार्ग से आगे बढ़िए। अर्थात कि भक्ति मार्ग जो है वह स्टेपिंग स्टोन है टुवर्ड्स दी ज्ञान मार्ग। भक्ति मार्ग एक लोअर साधना है। हायर साधना जो कि ज्ञान मार्ग है। वहां पर जाने की सीढ़ी मात्र है। तो इस तरह का एक अधिकारीवाद भी एक चलता है कि आप किस पथ के अधिकारी हैं। माने त्याग करने की क्षमता तो बहुत कम लोगों में ही रहती है। तो बेटर है कि आप भक्ति मार्ग का आश्रय लीजिए। और जिन लोगों में बचपन से ही सन्यास जीवन के प्रति उनके मन में आकर्षण प्रकट होता है। बचपन से ही स्टूडेंट डे से ही उन्होंने ठीक किया है। जैसे नरन वगैरह पहले से ही ठीक करके रखा है। ना ही शादी करनी है ना ही कैरियर बनानी है। तो उन लोगों के लिए जो नीति नेति ज्ञान पथ है वह सही है। यानी कि इन दोनों को रिकंसाइल पहले तो ऐसा होता था कि दोनों इररिकंसिलिएबल थे। यह ज्ञान मार्ग इस यहां पर इस डायरेक्शन में जाता है तो भक्ति मार्ग इस डायरेक्शन में जाता है। वही जो फेमस कहानी जो एक बार हमने डिस्कस की थी कि वो एक गांव है। गांव के बाहर में धर्मशाला है। चोटी जिसको कहते हैं बांग्ला में तो यह धर्मशाला में जो साधु लोग जो गंगा सागर व कहां पे वो यात्रा करने को जाते हैं तो वहां पे आकर के बंगाल में इस तरह के गांव की बाहर की धर्मशाला में रहेंगे। तो वहां पर दो साधुओं का मिलन हो गया। एक दिन रात को दोनों एक ही वो जो कुटिया थी उसमें विश्राम ले रहे हैं। तो अभी क्या हुआ कि दोनों तो जेनुइन साधु है। रात को तो साधना करनी है। सो के नहीं बितानी है रात। तो फिर साधना करने के लिए उद्दीपना मिले। एनकरेजमेंट मिले। इसलिए एक साधु ने चौक से लेकर के दीवार के ऊपर में कुटिया की दीवार पर लिख दिया सोहम अर्थात कि वही निर्गुण निराकार ब्रह्मण ही मेरा सही स्वरूप है। सतित आनंद ही मेरा सही स्वरूप है। यह तमस रजस सत्व रूपी गुण जो है गुणत्रय जो है वह मेरा स्वरूप नहीं है। वह एक अज्ञान रूपी आवरण मात्र है जो कि भ्रम से प्रकट हुआ है। तो बोलकर के सो हम उसने यह दीवार के ऊपर में लिख दिया और बैठकर के साधना कर रहा है। अभी वह था ज्ञान मार्गी अद्वैत मार्गी। किंतु जो दूसरा साधु था वह था कि भक्ति मार्गी वह था विशिष्ट अद्वैती। तो फिर उसने जैसे ही देखा सो हम तो वह तो बड़ा ही नाराज हो गया। कहता है कि काम, कांचन, यह जो अविद्या अज्ञान वगैरह से जो भरे काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, मत्सर से भरे इस पंचमहाभूत के नश्वर देह को क्या तुम मैं ईश्वर हूं। मैं परबह्म नारायण हूं। ऐसा कहते हो कैसे तुम्हारी यह जुर्रत हुई? ऐसा बोलकर के उसने किंतु सोहम मिटा नहीं दिया। वो मिट्टी की जो दीवार होती है उसमें मिटाना मुश्किल है। वह माने ऐसा तो नहीं है ना ब्लैकबोर्ड है फिर डस्टर से उसको इरेज़ कर दिया तो वहां तो एक बार लग गया तो लग गया तो फिर उसने क्या किया चौक से लेकर के सोहम के सामने लिख दिया दा तो अभी क्या हो गया दासोहम मैं वही परबह्म नारायण जो है उनका दास हूं तो फिर यह निराकारवादी साधु नाराज हो गया इति नेति नेति ज्ञान मार्ग का अवलंबन करने वाला कहता है कि यह जो देह है इसी के भीतर में तो यह जो कॉस्मिक आई सतित आनंद रूपी सतचित आनंदमय ब्राह्मण ही निर्गुण निराकार ब्राह्मण ही इसके भीतर में निवास करते हैं। यह जो मन बुद्धि चित्त अहंकार यह पंच ज्ञानेंद्रिय पंचकर्मेंद्रिय रूपी यह जो बाह्य आवरण दिख रहा है वह सिर्फ एक आवरण ही है। जैसे कि यह रस्सी के ऊपर में सर्प का भ्रम हो रहा है। जिस क्षण हमको यह ज्ञान हो गया कि मैं सर्प नहीं हूं। निराकार निर्गुण सतचित आनंद ब्राह्मण हूं। उसी क्षण यह जगत के जितने भी दुख कष्ट है चले जाएंगे। मैं निर्विकल्प समाधि में डूब जाऊंगा। अनंत आनंद में डूब जाऊंगा। तो यह निराकारवादी साधु यह ज्ञान मार्गी उसने गुस्सा हो के अभी उसने भी उसको मिटाया नहीं। देखिए दिस इज अनदर ब्यूटी ऑफ इंडिया। कि ये सेक्ट्स जो है वो आपस में झगड़ा तो करते हैं किंतु एक दूसरों का मर्डर करने को नहीं जाते। जैसे कि आपको यह वेस्टर्न हिस्ट्री को आप जितना पढ़ेंगे वेस्टर्न हिस्ट्री और यह मिडिल ईस्ट का हिस्ट्री देखेंगे कि जैसे ही कोई एक नया पथ प्रारंभ होता है पहला काम करता है उसके पुराने वाले पथ जो है पुराने वाले जितने भी धर्म है उनके अनुयायियों की हत्या करने का। तो हमारे यहां पे ऐसा नहीं है। हम लोग हत्या नहीं करते। हम लोग डिबेट करते हैं। इंटेलेक्चुअल विजय प्राप्त करते हैं। तो यह जो ज्ञानी साधु था उसने जैसा ही देखा दासोहम तो उसने फिर से चौक लेकर के उसके सामने लिख दिया स तो क्या हो गया? सदा सोहम मैं सिर्फ सोहम यानी कि यह ब्राह्मण ही नहीं। हमेशा हमेशा के लिए मैं ब्राह्मण हूं। कभी भी तीनों काल में मेरे भीतर में अज्ञान था ही नहीं। एक्चुअली तीन काल जो है भूत, वर्तमान, भविष्य वह भी माया के भीतर में ही है और मैं मायातीत निर्गुण निराकार ब्राह्मण हूं। तो अभी जैसे उसने लिखा सदा सोहम तो फिर यह जो भक्ति सा भक्त साधु था उसने नाराज होकर के उसके सामने लिख दिया दा। तो दास दासोह मैं सिर्फ दास नहीं दासों का दास हूं। तो यह जो ज्ञान मार्गी साधु उसने फिर से लिख दिया सदा सदा सोहम सिर्फ सोहम नहीं सिर्फ सदा सोहम नहीं सदा सदा सोहम तो ये दोनों झगड़ रहे हैं और यह दा लिख रहा है यह स लिख रहा है सदा सदा सदा सोहम दास दास दास दास दास सोहम तो देखिए कि यह एक समय था कि इस तरह से एक दोनों के बीच में डायवर्जेंस जैसा चलता था डिबेट होती थी खुनामर की नहीं होती थी किंतु एटलीस्ट डिबेट तो होती थी और एक इंटेलेक्चुअल बैरियर जैसा था दोनों के बीच में किंतु रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य में भावधारा में दोनों को कंप्लीटली रिकंसाइल कर दिया गया है। बस अभी हमारी भावधारा में प्रश्न वही जागृत होता है कि यह जो रिकंसिलिएशन किया गया है, हार्मोनाइज किया गया है, यह जो ज्ञान मार्ग और भक्ति मार्ग किस बेसिस पे किया गया है? तो एक जैसे कि बेसिस है कि यह अधिकारीवाद यदि आप में त्याग करने की क्षमता नहीं है तो भक्ति मार्ग को फॉलो कीजिए। इवेंचुअली ईश्वर ही आपको त्याग करने की शक्ति दे देंगे और फिर आप ज्ञान मार्ग के अधिकारी हो जाएंगे और यदि आप में पहले से ही यदि त्याग करने की क्षमता है तो आप ज्ञान मार्ग को फॉलो कीजिए। सन्यास के रास्ते को अपनाइए। तो यह अधिकारीवाद यह एक रिकंसिलिएशन है। दूसरा है स्टेपिंग स्टोनवाद। अर्थात कि आप पहले तो भक्ति मार्ग के माध्यम से अपने चित्त को निर्मल बना दीजिए। अपने भीतर के जितने भी यह मलिनताएं हैं, मलिनताओं को दूर कर दीजिए और देखिए कि अभी आप में क्षमता आ गई है कि ज्ञान मार्ग को फॉलो करने की। यानी यह स्टेपिंग स्टोन है। यहां पर अधिकारीवाद है। तो ऐसा ही एक रिकंसिलिएशन जनरली चलता है। किंतु मुझे ऐसा लग रहा है पर्सनली कि यह जो ठाकुर का रिकंसिलिएशन है वह सिर्फ भक्ति मार्ग को एक अधिकारीवाद के रूप में नहीं देखता या स्टेपिंग स्टोन के रूप में ही नहीं देखता। इसको एक इंटीग्रल बेसिक फिलॉसोफी के रूप में देखता है। किंतु किस तरह से उसको हम देखेंगे। एक्चुअली यह डिस्कशन हमने यह कथामृत का पाठ कर रहे थे उस समय ऑलरेडी कर दिया था। तो वो किया था कथामृत के कॉन्टेक्स्ट में। आज जो करेंगे वो लीला प्रसंग के कॉन्टेक्स्ट में। तो ठाकुर का जो रिकंसिलिएशन है जो कि मुझे ऐसा लग रहा है कि ठाकुर ने इस तरह से किया है। गोइंग बियों्ड अधिकारीवाद या गोइंग बियों्ड ये स्टेपिंग स्टोनवाद मुझे जो लग रहा है कि ठाकुर का इस तरह का रिकंसिलिएशन उसको बाद में देखते हैं। पहले यह पैसेज जो है शरद महाराज का इसको एक बार पढ़ लेते

दो साधन पथ: "नेति नेति" और "इति इति"

हैं। तो क्या कहते हैं शरद महाराज? साधारण भा बोलते गले जगततीत वस्तु अनुसंधान पूर्वोक्त चेष्टा द्वटी प्रधान पथे एतो काल परजंतो प्रवाहितो होइया आशिया छे सामान्य रूप से कह सकते हैं कह करके हम सामान्य रूप से सोच करके हम बोल सकते हैं कि जगत अतीत वस्तु का अनुसंधान करने के लिए पूर्वोक्त अर्थात कि पहले जो बताई थी इस तरह की चेष्टा द्वटी अर्थात कि दो तरह के जो प्रयास है उसको प्रधान पथ के रूप में वह दो प्रयास अभी तक प्रधान पथ के रूप में प्रवाहित होते आ रहे हैं। अर्थात कि यह शरद महाराज का लिटरेरी स्टाइल यह जो ज्ञान मार्ग है और भक्ति मार्ग है इसी को दो प्रधान मार्ग के रूप में दो प्रधान साधनाओं के रूप में दो मुख्य उपासनाओं के रूप में आज तक चलता आ रहा था। ज्ञान मार्गी साधु है शंकराचार्य वादी जो कि यह दशनामी सन्यास प्रथा को फॉलो करते हैं और यह जो भक्ति मार्गी जो है वह खास करके रामानुजाचार्य ने वैसे तो फिलॉसोफिकल फाउंडेशन डाला किंतु उसके बाद में जो भारत में यह भक्ति मूवमेंट चला एक के बाद एक संत महापुरुषों का अवतरण होता गया उसमें सर्वश्रेष्ठ जिसको कहेंगे चैतन्य महाप्रभु तो यह जो भक्ति भक्ति मूवमेंट जो है वह एक रास्ता है। अर्थात कि यहां पर दशनामी संप्रदाय रूपी शंकराचार्य का एक पथ रहा है। यहां पर भक्ति मूवमेंट जिसको कहा जाता है उसमें यदि यह पुष्टि मार्ग है ना कि वल्लभाचार्य जो है ना कि यह जो हित हित हरिवंश महाप्रभु वो जो एक थे यह अभी देखिए वल्लभाचार्य का द्वैत वेदांत वैसे तो फिलॉसोफी में डिफरेंट है। किंतु जहां तक साधना की बात है वही भक्ति मार्ग को ही फॉलो करता है। यानी कि भक्ति मार्ग में कहेंगे कि बेसिकली दो तरह की फिलॉसोफी चलती है। एक तो रामानुजाचार्य का विशिष्ट अद्वैतवाद और वल्लभाचार्य का द्वैतवाद। किंतु दोनों की यह जो साधन पद्धति है भक्ति वह तो सिमिलर ही है। जबकि यह अद्वैत वेदांत है। ज्ञान मार्ग उसके भीतर में भी आप शायद कह सकते हैं कि अजातवाद एक है। तो यह अद्वैतवाद और यह अजातवाद यह दो तरह की फिलॉसोफी कहेंगे किंतु उसकी जो साधन पद्धति है मोर और लेस नीति नेति वाली ही साधन पद्धति है। तो फिलोसोफिकल यदि डायवर्जेंस हम देखेंगे तो काफी दिख जाएंगे। किंतु जहां तक साधन पद्धति का प्रश्न आ जाता है कोई एक साधना करके प्रैक्टिस करके वहां जो अंतिम लक्ष्य है उसको प्राप्त करने का प्रश्न आता है जब तक तो यह नेति नेति रूपी ज्ञान मार्ग और यह इति इति रूपी भक्ति मार्ग यह दो मुख्य साधन पद्धति भारत में अभी तक प्रवाहित होती आ रही है। प्रथम शास्त्र जहां के नेति नेति बा ज्ञान मार्ग बोलिया निर्देश करिया छे यह जो दो प्रधान साधन पद्धति है उसमें से प्रथम है जिसको कि शास्त्र नेति नेति या तो फिर ज्ञान मार्ग बोलकर के शास्त्रों ने निर्देश किया है एवं और द्वितीय जहां इति इति बा भक्ति मार्ग बोलिया निर्दिष्ट होया था के और द्वितीय है जो कि इति इति या भक्ति मार्ग बोलकर के निर्दिष्ट हुई होती आ रही है। ज्ञान मार्ग

ज्ञानमार्ग में लक्ष्य की स्पष्टता और भक्तिमार्ग में क्रमिक उन्नति

साधक चरम लोक कथा प्रथम हते हृदय धारणा ओ सर्वदा स्मरण राखिया ज्ञातोशारे तदभ मुखे दिन अग्रसर होइते थाके ज्ञान मार्ग का जो साधक है वह चरम लक्ष्य की बात पहले से ही अपने हृदय में धारणा और फिर सर्वदा स्मरण रख के ज्ञात सारे नोविंगली कॉन्शियसली उस चरम लक्ष्य की ओर और दिन अग्रसर होता रहता है। कि ज्ञान मार्ग के साधक को पता है कि यह जगत जो है और जगत के जितने भी जीव है यहां तक कि मेरा खुद का यह अहंकार है, मेरी जो मेमोरीज है, मेरी यह जो इंटेलेक्ट है, मेरी यह बुद्धि है, मेरा जो मन है, यह पंचकर्मेंद्रिय, पंच ज्ञानेंद्रिय रूपी आंख, कान, नाक वगैरह जो इंद्रियां है, सेंसेस जिसको कहते हैं और यह कर्मेंद्रिय अर्थात कि कार्य करने की यह औजार टूल्स आजकल की लैंग्वेज में हाथ पैर वगैरह वह सब मिथ्या है। इन सबके परे निर्गुण निराकार सतित आनंद ब्रह्मण ही मेरा सही स्वरूप है। यह ज्ञान मार्ग का जो साधक है उसमें यह फिलॉसोफिकल अंडरस्टैंडिंग परफेक्टली बैठी हुई है। एक्चुअली ये फिलॉसोफिकल अंडरस्टैंडिंग ही यह स्मरण मनन निध्यासन ही ज्ञान मार्ग की प्रधान साधना है। बोल के जो ज्ञान मार्ग के रास्ते पे आगे बढ़ता है प्रारंभ से ही उसको अद्वैत वेदांत की यह जो फिलॉसोफी है उसको अच्छे से समझा दी जाती है किंतु भक्ति पथ पथिकरा चरम कोथाय उपस्थित होबे त विषय अनेक स्थले अज्ञ भक्ति पथ के जो पथिक है वो उसका जो चरम लक्ष्य कहां पे है उसके बारे में बहुत बार अज्ञ रहते अज्ञानी रहते हैं। अभी आपने भक्ति मार्ग प्रारंभ किया तो ऐसा थोड़ी ना है कि अब भक्ति मार्ग के जो साधक होते हैं वे लोग यह सब बोधरेशन नहीं लेते टेंशन नहीं लेते कि यह जो जीव जगत और ईश्वर यह तो तीन चीजें हैं। उसमें से मुझे क्या करना है? किसकी आराधना करनी है? यह पेड़ है तो पेड़ देखना है ना कि उसको ईश्वर देखना है। मेरी यह इंद्रियां है। मेरे विषयों के प्रति जो लोभ मोह है उसके बारे में मुझे क्या करना है? यह सब टेंशन जो है वह भक्ति मार्ग वाला साधक नहीं लेता। वह सिर्फ एक काम करता है। अपने घर में छोटा सा श्राइन बनाएगा और कोई भक्ति ग्रंथ है उसको अपने पास में रखेगा। भक्ति ग्रंथ में से पाठ करेगा और फिर ईश्वर की पूजा है वगैरह जो आराधना है वह प्रारंभ कर देगा। आखिर में ईश्वर ही बता देंगे कि क्या-क्या है माने क्या सही क्या मिथ्या किसके साथ में किस किस तरह से डीएलिंग करना वह सब ईश्वर ही आपको बता देंगे। यह जीव जगत ईश्वर यह सब ट्रायंगल क्या है? त्याग कैसे करना है? वह सब टेंशन जो है भक्ति मार्ग वाला साधक नहीं लेता। इसलिए महाराज जी कहते हैं कि ज्ञान मार्ग का जो साधक है उसके लिए फिलॉसोफिकल स्मरण मनन निधिद्यासन यह महावाक्य विचार उसके लिए फंडामेंटल साधना है बोल के वो आज कहां पे है किस तरह से साधना करनी है कौन सा चरम लक्ष्य उसको प्राप्त करना है यह तीन साध्य साधक और साधना ज्ञान मार्ग के पथिक के मन में स्पष्ट रूप से क्लियर होता है। जबकि यह जो भक्ति मार्ग का पथिक है, उसको यह नहीं पता कि यह इसको ज्ञानेंद्रिय कहते हैं। इसको कर्मेंद्रिय कहते हैं। यह मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार है। ये जो सांख्य के जो 24 तत्व है वो भी उसको नहीं पता। ना ही यह वेदांत की पंचीकरण की मेथड जिसके माध्यम से यह सब गुणों का कॉम्बिनेशन करके ना ऐसा वैसा करके जगत की उत्पत्ति हुई। इसके बारे में वह टेंशन नहीं लेता। वह बस एक ही चीज देखता है कि भगवान कृष्ण है मेरे पति है। जैसे कि मीराबाई ने उनकी आराधना की थी। या तो फिर नरसिंह मेहता ने उनकी आराधना की थी। या तो फिर ये चैतन्य महाप्रभु ने। हालांकि चैतन्य महाप्रभु तो बहुत बड़े पंडित थे। किंतु यह मीराबाई या तो फिर यह नरसी मेहता इस तरह के कोई पंडित नहीं थे। और पंडिताई के बारे में उन्होंने कोई ज्यादा टेंशन भी नहीं लिया था। बस ईश्वर को प्रेम करना है। बाकी की चीजें ईश्वर ही दिखा देंगे। बोलकर के भक्ति मार्ग का जो पथिक होता है, उसको साध्य क्या है? साधन क्या है? साधक क्या है? वह सब टेंशन वह नहीं लेता है। अनेक स्थल अज्ञता केन भक्ति

भक्ति मार्ग से अद्वैत प्राप्ति

मार्ग का जो साधक है बहुत बार वो अज्ञानी ही अज्ञ अर्थात कि यह साधना के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी नहीं रखता। एवं उच्च होते उच्चतर लखते परिग्रह लखतरंत परिग्रह करते करते अग्रसर होइया परिशेषे जगदतीत अद्वैत बस्तुर साक्षात परिचय लाभ करिया थाके के और उच्च से उच्चतर लक्ष्य की ओर आगे बढ़ते-बढ़ते अग्रसर होते आखिर में जगत अतीत अद्वैत वस्तु है। उसका साक्षात परिचय लाभ करता है। अभी देखिए यहां पे ऑलरेडी शरद महाराज जो है वह ट्रेडिशन के सामने कुछ खिलवाड़ कर रहे हैं क्योंकि स्पष्ट है कि जो भक्ति मार्ग का साधक है वह या तो अद्वैत वेदांत को फॉलो करता है या तो द्वैत वेदांत को फॉलो करता है। इन दोनों में ब्राह्मण को सगुण कहा गया है। निर्गुण नहीं। तो यहां पर भक्ति मार्ग में एक के बाद एक स्टेजेस को क्रॉस करतेकरते आप एक अद्वैत वस्तु का साक्षात परिचय कैसे लाभ करेंगे वह एक डाउटफुल है बात या तो फिर हम इस बात को अद्वैत वस्तु को अद्वैत वेदांत रूपी निर्गुण ब्रह्म नहीं समझ करके वही परबह्म नारायण भगवान कृष्ण या भगवान राम जो भी है उनको यदि अद्वैत वस्तु के रूप में गिने तो फिर हम कह सकते हैं कि यह ठीक है। इंटरेस्टिंगली मां ने जब वह पत्र में लिखा कि तुम्हारे गुरु थे अद्वैत और तुम लोग भी हो अद्वैतवादी। यह पत्र का आप ड्यूल अंडरस्टैंड किंतु आप मीनिंग निकाल सकते हैं कि माने नारायण के रूप में भी वो ठाकुर अद्वैत है। यानी कि नारायण ही है और कुछ नहीं है। बाकी जो कुछ भी है नारायण के अंग ही है। तो मां ने ऐसा नहीं कहा कि आपके गुरु अद्वैतवादी थे। मां ने कहा कि आपके गुरु अद्वैत थे। तो यहां पर भी देखिए कि शरद महाराज जो है यह शब्द की रमत ऐसे करते हैं कि भक्ति मार्ग की उपासना करके करके आप अद्वैत वस्तु को प्राप्त कर सकते हैं। नहीं कि आप अद्वैत वेदांत द्वारा दर्शित निर्विकल्प निर्गुण ब्राह्मण को प्राप्त कर सकते हैं। ऐसा नहीं लिखा। अद्वैत वस्तु को प्राप्त कर सकते हैं। जो कि टेक्निकली करेक्ट होना चाहिए। भक्ति मार्ग में यदि आप भक्ति मार्ग के जो सगुण ब्रह्मण को प्राप्त करते हैं तो वह भी तो अद्वैती है क्योंकि ब्राह्मण के अलावा सगुण ब्रह्मन के अलावा और कुछ तो नहीं है क्योंकि जीव और जगत ब्राह्मण के अंग ही है। इसके अलावा तो और कुछ नहीं। यह जैसे कि मैं हूं शशि या तो फिर कृष्ण सखानंद तो फिर आप ऐसा थोड़ी ना कहेंगे कि मेरे हाथ मेरे से अलग है। मेरा कान मेरे से अलग है। मेरा हृदय मेरे से अलग है। आप यदि मेरे साथ में मित्रता करेंगे, मेरे साथ में वार्तालाप करेंगे तो आप ऐसा थोड़ी ना सोचने वाले हैं कि मैं महाराज के हाथ के साथ में बात नहीं कर रहा। उनके पैर के साथ में बात नहीं कर रहा। उनके सर के साथ में बात नहीं कर रहा। उनके आंख या कान के साथ में बात नहीं कर रहा। मैं महाराज के साथ में बात कर रहा हूं। ऐसा आप थोड़ी ना सोचेंगे। मेरे हाथ, पैर, नाक, कान जो कुछ भी है वो मिलाकर के तो मैं हूं। तो फिर और यदि मैं आप मुझे सब कुछ मिलाकर के एक समझते हैं तो मैं तो एक ही हूं और कोई दूसरा कृष्ण सखानंद नहीं है। तो इस अर्थ में आप मुझे अद्वैत गिन सकते हैं। तो यहां पे भी वो जो मां का पत्र उसका भी यह ड्यूल मीनिंग हो सकता है कि ठाकुर अद्वैत थे। आप अद्वैतवादी हैं। यानी कि नेति नेति मार्ग से आप सगुण साकार नारायण को प्राप्त कर सकते हैं। ऐसा मीनिंग कर सकते हैं। आप करेंगे नहीं। किंतु जिसको करने की हैबिट है वह हेयर स्प्लिटिंग आर्गुममेंट करने की वे लोग कर सकते हैं। तो यहां पर भी देखिए कि भक्ति मार्ग को फॉलो करके करके उच्च से उच्चतर साधना करतेकरते जगत अतीत अद्वैत वस्तु की प्राप्ति आप करते हैं। यह यहां पर शरद महाराज स्पष्ट रूप से कहते हैं।

स्वार्थ और भोग को जगत् का परम लक्ष्य मानने वाली सोच का त्याग — यही वैराग्य है

नतुबा जगत संबंध साधारण जनगण जे धारणा आ ताहा उभय पथेर पथिक गण के ई त्याग करते होए अदरवाइज जगत के बारे में साधारण लोगों की जो धारणा है उसको तो दोनों रास्ते के जो पथिक कहे दोनों पथ के पथिक कहे उन दोनों को त्याग करनी होगी किस तरह से त्याग करनी होगी देखिए साधारण लोग जगत को वास्तव मान करके जगत में अपनी कैरियर बनाना जगत में नेम फेम प्राप्त करना। इसी को जैसे कि जीवन का उद्देश्य मान लेते हैं। तो यह धारणा तो दोनों को त्याग करनी होगी। यदि आप जगत को सत्य समझे ना कि मिथ्या समझे। जगत के भीतर में नेम और फेम प्राप्त करना काम कांचन के पीछे में अंधी दौड़ लगाना। यह बात तो भक्ति मार्ग के पथिक को भी और ज्ञान मार्ग के पथिक को दोनों को त्याग करनी ही होगी। ऐसी कोई भी धार्मिक सिस्टम इस जगत में नहीं है। वह कहती है कि जीवन का अंतिम उद्देश्य इस जगत में सक्सेस प्राप्त करना है। जो भी धार्मिक सिस्टम है, जो भी फिलॉसोफिकल सिस्टम है, जितने भी ज्ञान साधन मार्ग है, जितने भी साधन पथ है, साधन की प्रणालियां है, सभी आपको यही कहेगी कि अद्वय यह जो जगत के परे जो एक रियलिटी है, उसको प्राप्त करना है। इस रियलिटी को आप यदि आप परबह्म नारायण कहे ना कि आप देवी या आध्या शक्ति कहे ना कि यह निर्गुण निराकार ब्राह्मण कहे आप जो भी नाम ले दीजिए वो चाहे क्रिश्चियनिटी हो ना कि इस्लाम हो ना कि बुद्धिज्म हो आप निर्वाण हो जो कोई भी आप नाम ले दीजिए। आप जितनी भी साधन पद्धतियां है जेन्युइन साधन पद्धतियां वह सब आपको वही कहेगी कि जगत के परे जाकर के हमको एक जो वस्तु है जो पदार्थ है उसको प्राप्त करना है। यानी कि साधन पद्धति कोई भी हो जनसाधारण एक कॉमन मैन जगत के बारे में जो धारणा रख के बैठा है उसको तो आपको त्याग करना ही करना है। ज्ञानी उहा प्रथम होते ही शरबतो भावे परित्याग करते चेष्टा कोरे ज्ञानी जो है पहले से ही संपूर्ण रूप से जगत को त्याग करने का या तो फिर जगत के साथ में अपना जो आकर्षण अटैचमेंट है उसको त्याग करने का प्रयास करेगा एवं भक्त उहार कतक छाड़िया कतक राखिया साधनाएं प्रवृत्त होइले ओ परिणामे ज्ञानी नाई उहा समस्त त्याग करिया एक मेव द्वितीयम एक मेवा द्वितीयम तत्व वे उपस्थित होन और जो भक्त है उसको थोड़ा सा रखेगा थोड़ा सा छोड़ेगा क्या रखेगा कि भगवान की उपासना करने के लिए मंदिर बनाना है मूर्ति है या फिर यह जो भोग राग की जो सामग्री है यह जो चामर व्यजन करना है पंच प्रदीप चलाना है भगवान की सेवा करने के लिए जो है वह सब रखना है किंतु यह जो काम उपभोग के साधन है उसको त्याग करना है यानी कि भक्त उसमें से कुछ छोड़कर के कुछ रख के साधना में प्रवृत्त होने पर भी आखिर में तो उसको ज्ञानी की तरह ही वह समस्त त्याग करके अर्थात कि इवन यह जो साधन भजन के उपकरण भी है जो पूजा विधि भोग राग भी जो है उसको भी त्याग करके एकम एव अद्वितीयम तत्व [गला साफ़ करने की आवाज़] उसको उपस्थित होना होगा। ठाकुर की वह जो फेमस कहानी कि जब वह निर्विकल्प समाधि में जाने का प्रयास कर रहे थे जितनी भी बार आंख बंद करते हैं देखते हैं कि मां काली उनके सामने आ जाती है। तो फिर आखिर में तोतापुरी ने एक कांच का एक टुकड़ा लेकर के भ्रू मध्य कपाल के भीतर में ठाकुर को जोर से चुभाया। जैसे ही वह चुभाया तो निश्चय है दर्द होगा। फिर तोतापुरी जी कहते हैं ठाकुर को कि अभी यह जो दर्द हो रहा है उसके ऊपर में मन को एकाग्र करो। कंसंट्रेट योर माइंड अपॉन दिस पेन बिटवीन योर आइब्रोज़। तो जैसे ही ठाकुर ने ऐसा करने का प्रारंभ किया वैसे ही उनका मन जगत को त्याग करके हू हू करके फटाफट फटाफट वो अद्वैत निराकार ब्रह्म की ओर बढ़ने लगा। और जब रास्ते में मां काली का दर्शन फिर से हुआ तो ठाकुर ने ज्ञान रूपी खड़ग से ज्ञान रूपी तलवार से मां के दो टुकड़े कर दिए और फिर वो उनका मन जो है अद्वैत पर ब्रह्मण में वो विलीन हो गया या तो फिर वो जो ब्राह्मण है सतित आनंद ही मेरा सही स्वरूप है। जीव ब्रह्म ऐक्य अहम ब्रह्मास्मि प्रज्ञानम ब्रह्म जो कि जो उपनिषद के महावाक्य है उसका साक्षात्कार उनको हो गया। यानी कि आप यदि ज्ञान मार्ग के माध्यम से आगे बढ़े ना कि भक्ति मार्ग के माध्यम से आगे बढ़े आखिर में तो वही एक अद्वय ब्रह्म वस्तु तक ही पहुंचना है। हालांकि जैसे हमने ऑलरेडी डिस्कस किया ट्रेडिशनल जो अद्व विशिष्ट अद्वैतवादी या द्वैतवादी जो है इस डिस्क्रिप्शन के बारे में कुछ ना कुछ विरोध प्रकट करेंगे। वे लोग निराकार ब्राह्मण को नहीं सगुण ब्राह्मण यानी कि नारायण को स्वीकार करते हैं। नारायण के साथ में एक ही आपको एक ही भूत नहीं होना है। नारायण की गोद में जाकर बैठना है। किंतु नारायण के साथ में एकीभूत नहीं होना है। यानी कि यह एक डिफरेंस ट्रेडिशनल द्वैतवाद और हम जिसको कि द्वैत या तो ट्रेडिशनल भक्ति मार्ग और रामकृष्ण भक्ति मार्ग जो है इन दोनों में यह डिफरेंस है। जगत संबंधे उल्लेखितो स्वार्थ पर शोक भोग सुकई लख साधारण धारणार परित्याग परिहार के शास्त्र वैराग्य बोलिया निर्देश करिया छे जगत के प्रति स्वार्थ पर भोग और सुख से लिप्त साधारण धारणा के त्याग को ही परिहार को ही शास्त्र वैराग्य बोल के निर्देशित करता देखिए ज्ञान मार्ग का पथिक हो ना कि भक्ति मार्ग का पथिक हो चाहे नारायण की नारायण की गोद में बैठना चाहता हो नारायण के आशीर्वाद प्राप्त करना चाहता हो कि यह सतचित आनंद ब्रह्मण के साथ में एकीभूति चाहता हो एक्य चाहता हो यह दोनों पथिक को दोनों साधक को यह भोग सुख से लिप्त स्वार्थ से भरपूर यह जो साधारण धारणा है जगत की उसका तो परिहार करना ही होगा। उसका तो त्याग करना ही होगा। और इस त्याग को शास्त्र कहते हैं वैराग्य। इसके बाद जो है अभी हम नेक्स्ट क्लास में करेंगे डिस्कस। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।