prayer
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा कथित द्वितीय खंड साधक भाव प्रथम चैप्टर साधक ओ साधना जो डिस्कशन हमारा चल रहा है सर्वभूत में ईश्वर दर्शन यही अंतिम सत्य है। यही है आध्यात्मिक जगत की सर्वोच्च उपलब्धि और यह कहने के बाद में लेखक स्वामी शारदानंद जी महाराज प्रश्नोत्तरी के माध्यम से हमको और ज्यादा डिटेल में यह कांसेप्ट समझाते हैं। उसमें एक प्रश्न हुआ कि यदि अ जगत भ्रम है
वेदांत कहता है कि यह जगत भ्रम है — पर भ्रम हम सबको एक ही तरह का कैसे दिखाई देता है?
जो कि हमको यह वैविध्य दिख रहा है ये ये पेड़ है यह फूल है यह फल है यह यह बिल्ली है यह समुंदर है यह मनुष्य है मनुष्य में भी नर है नारी है वृद्ध है बालक है तो यह बिल्डिंग है यह इलेक्ट्रिकल आइटम्स है तो इतना अपना सब कुछ वैविध्य जो हमको दिख रहा है तो यह क्या आप कहते हैं कि हम सबको एक ही तरह का भ्रम हुआ है। यह कैसे हो सकता है? सबको एक तरह का भ्रम कैसे हो सकता है? यदि आप देखें कि स्वप्न में ऐसा हो सकता है कि मुझे स्वप्न में दिखा कि मैं प्राइम मिनिस्टर हो गया हूं। हो सकता है आपने स्वप्न देखा। आपके स्वप्न में आप प्राइम मिनिस्टर हुए हैं। फॉर मान लीजिए कि ऐसा हो सकता है कि भारत के 140 करोड़ भारतवासी स्वप्न देखते हैं। हम सभी लोग अपने स्वप्न में अपने-अपने से प्राइम मिनिस्टर हुए हैं। किंतु यदि आंख खुलती है तो प्राइम मिनिस्टर तो सिर्फ एक ही दिखता है जो कि एक्चुअली ऑफिशियली इेड है। बाकी आप चाहे उसके साथ में सहमत हो ना हो आपने उसको वोट दिया हो ना दिया हो उसकी जो गवर्निंग पॉलिसी है वो हमें अच्छी लगे ना लगे किंतु वो प्राइम मिनिस्टर है वो तो हमको स्वीकार करना ही पड़ेगा तो यह एक शेयरर्ड ट्रुथ जो है कि एक एक ही जो सत्य जो कि सबको एक तरह का दिखाई दे रहा है सत्य नहीं कह के यदि ऋषि मुनि कहेंगे कि एक ही भ्रम है जो कि हम सबको एक ही तरह का दिखाई देता है तो यह कैसे संभव है? स्वप्न तो हम सबको अलग-अलग दिखते हैं। भ्रम कैसे सबको एक तरह से दिखने लगा जागृत अवस्था में यदि आप यह कहते हैं कि जागृत अवस्था भी स्वप्न की तरह ही है। क्षणभंगुर है। पल-पल बदलती रहती है और तुरीय अवस्था ही सही है। तो इस केस में सबको एक तरह का भ्रम क्यों होता है? ऐसा प्रश्न हो सकता है। तो इसके लिए शरद महाराज जो उत्तर देते हैं वह थोड़ा सा कॉम्प्लिकेटेड है और इस उत्तर को समझाते हैं शरद महाराज इसी लीला प्रसंग में और ज्यादा डिटेल में तृतीय खंड में। तो पहले हम क्या करेंगे कि इस प्रश्न के उत्तर को थोड़ा सा पढ़ लेते हैं और उसके बाद में उसकी यह जो ज्यादा एक्सप्लेनेशन शरद महाराज तृतीय खंड में जो देते हैं गुरु भाव मुखे रहना क्या है? जगदंबा ने ठाकुर को आदेश दिया था। जबकि वह निर्विकल्प समाधि में थे। कहा था कि तुम भाव मुखे रहो। तो यह भाव मुखे रहने को किसको बोलते हैं? इसका पूरा डिस्कशन शरद महाराज करते हैं। तो इस डिस्कशन के भीतर में यह जो टॉपिक है यह टॉपिक जो उत्तर जो शरद महाराज यहां पर देते हैं कि एक विराट मन है। इस विराट मन के भीतर में यह नाम और रूप रूपी तरंग सतत उठती रहती है। और इस विराट मन के ही हम सभी पार्टिसिपेंट हैं। इसी विराट मन के भीतर में ही जो मेरा जो क्षुद्र आमी अर्थात कि मेरा जो स्मॉल आई है तो यह स्मॉल आई भी इसी विराट मन की एक तरंग है। यानी कि सोच लीजिए यदि हम एनालॉजी देने को जाएंगे सिमाइल देने को जाएंगे तो किस तरह से कहेंगे कि एक बहुत बड़ा समुंदर है। अभी यह समुंदर तो जैसे एक ही उसके भीतर में किसी भी तरह का डिफरेंस आपको नहीं दिखेगा। यह समुंदर चाहे यह पेसिफिक ओशन कहिए ना कि अटलांटिक ओशन कहिए ना कि यह भूमध्य समुद्र कहिए मेडिटेरेनियन या तो फिर यह अरेबियन ओशियन या तो फिर बे ऑफ बंगाल, इंडियन ओशियन, आर्कटिक ओशनियन, अंटार्कटिक ओशियन। आप चाहे कोई भी नाम दे दीजिए। जियोग्राफिकली उनके विभिन्न विभिन्न नाम है समुंदर के। किंतु समुंदर तो एक ही है पूरी पृथ्वी पे। वो पूरे कनेक्टेड है। जितनी भी जल राशि है सभी जलराशि एक दूसरे के साथ में कनेक्टेड है। आई थिंक मेडिटेरेनियन सी शायद एक ऐसा है जो कि एक आइसोलेटेड कहा जाएगा। नहीं वह भी आइसोलेटेड नहीं कह सकते क्योंकि वह जिब्राल्टर का वो जो यह है वहां से तो वो अटलांटिक ओशन के साथ में मिलता ही है। तो एक भी आप ऐसा नहीं कहेंगे कि जो समुंदर है वह सेपरेट है। एक ही समुंदर है एक ही कंपोजशन है उसका। बस उसका जियोग्राफिकली सेपरेट नाम दिए हैं। तो अब देखिए कि एक विराट मन है जिसका कि सेम कंपोजशन है जिसमें कोई भी डिफरेंशिएशन नहीं है। किंतु उसके ऊपर में कितनी ही हजारों लाखों करोड़ों तरंगे उठती रहती है। अभी इस तरंग में एक है कि आम का पेड़, एक है कि यह वट वृक्ष है। एक है कि ये डायनासोर है। एक है कि मेंढक है। एक तरंग है सांप है। एक तरंग है मनुष्य है। एक तरंग है पृथ्वी। एक तरंग है सूर्य। एक तरंग है यह माइक, एक तरंग है यह वस्त्र, एक तरंग है यह चश्मा। तो इस जगत में जो कुछ भी आप देखते हैं नाम रूप का जो वैविध्य वह सब यही एक अनंत क्षीर सागर में तरंग के रूप में उठता है। यह जो मेरा जो स्मॉल आई है जिसको कि मैं कहता हूं कि मेरा नाम है यह। मेरा जन्म इस साल हुआ था। मेरे मां-पिताजी यह थे। मेरा करियर मैंने इस तरह से बनाया। मेरे संस्कार इस तरह के हैं। मैं मेरी भविष्य की यह जो आशाएं आकांक्षाएं हैं यह इस तरह की है। तो जो जिसको कि मैं मैं कहता हूं तो वैसे ही 700 करोड़ की पपुलेशन है इस जगत की 7 बिलियन। तो सभी का जो सेल्फ आइडेंटिफिकेशन रहता है अस्मिता या तो फिर ईगो जो रहता है अहम जो रहता है वो 700 करोड़ मनुष्य या तो उनके ईगो या तो उनका स्मॉल आई इसी समुंदर की एक-एक लहरें है और एक लहर होने की वजह से हमको दूसरी लहर भी दिखाई देती है किंतु जिस क्षण जिस क्षण ये मुखौटा चला गया नाम रूप का मुझे यह पता चल गया कि भले ही चाहे मैं दिखता हूं एक तरंग के रूप में किंतु सब्सटेंस तो मैं वही हूं जो कि समुंदर का है और मैं यदि आपको एक एक अलग सत्ता के रूप में यदि देखता हूं किंतु जब मुझे ज्ञान हो जाता है तो मुझे पता चलेगा कि भले ही चाहे आपका स्वरूप अलग है। आपकी जो सत्ता है, जो सब्सटेंस है वो तो वही समुंदर का पानी है। जिस पानी से मैं बना हूं, उसी समुंदर के जल से ही आप बने हैं। उसी समुंदर के जल से ही पूरा विश्व ब्रह्मांड बना है। स्पेस, टाइम, मैटर, एनर्जी, फोर्सेस ये सब कुछ जो है उसी समुंदर की लहरों से ही बनी है। सब्सटेंस सिर्फ सब्सटेंस एक ही है। सिर्फ नाम रूप भिन्न-भिन्न है। तो, यह जो एक विराट मन के भीतर में यह कल्पनाओं का उदय होने की वजह से हमको यह सब कुछ भिन्न-भिन्न दिखता है। यह शरद महाराज की एक्सप्लेनेशन है। तो, यह एक्सप्लेनेशन हम इस प्रश्न के उत्तर में भी पढ़ते हैं और फिर इसी एक्सप्लेनेशन को यह जो तृतीय खंड है उसमें शरद महाराज भाव मुख में रहने को रहने का अर्थ क्या है? वह जो समझाते हैं, उसमें भी इसी तरह की एक्सप्लेनेशन देते हैं। तो, यह दोनों एक्सप्लेनेशन पढ़ते हैं हम। क्या कहते हैं शरद महाराज?
एक अनंत, असीम सामष्टि-मन में जगतरूप कल्पना उदित हुई है
एक असीम अनंत समष्टि मने जगत रूप कल्पनार उदय होइया छे एक असीम अनंत समष्टि मन में जगत रूप कल्पना का उदय हुआ है। एक असीम अनंत समष्टि समुंदर में यह जगत रूपी नाम रूप रूपी लहरें उठ रही है। तोार आार एवं जनसाधारण व्यष्टि मन ओई विराट मनेर अंश ओ अंगीभूत होवाए आमादग के ओई एकई प्रकार कल्पना अनुभव करते हो छे तुम्हारा मेरा और जन साधारण का व्यष्टि मन उसी विराट मन का अंश और अंगीभूत होने की वजह से हम सबको वह एक ही प्रकार की कल्पना अनुभव हो रही है। यदि मान लीजिए कि पृथ्वी पे तो यह H2O का समुंदर है। पानी का समुंदर है। पानी का केमिकल साइन है H2O यानी हाइड्रोजन के दो एटम और ऑक्सीजन का एक एटम जब कंबाइन होता है तो बनता है पानी। ये पानी का समुंदर है पृथ्वी पे। किंतु यह जो एग्जो प्लेनेट्स जिसको कहते हैं ना कि यह दूसरी प्लेनेट्स पृथ्वी के अलावा जो दूसरी दूसरी प्लेनेट है वहां पे भी समुंदर है। अब जैसे कि कहां पे मिथेन का समुंदर है। कहां पे हो सकता है कि सल्फ सल्फ्यूरिक एसिड का समुंदर हो। कहां पे हो सकता है कि अमोनिया का समुंदर हो। कहां पे हो सकता है कि नाइट्रोजन का समुंदर हो। क्योंकि प्रत्येक ग्रह की यह जो जियोलॉजी है, केमिकल कंपोजशन है, यह जो नेचुरल फोर्सेस है जो कि उसको गढ़ते हैं, वह तो काफी भिन्न है। तो मान लीजिए कि सल्फ्यूरिक एसिड का समुंदर जहां पे हो। हो सकता है कि उसका कंपोज माने कंपोजशन कंप्लीटली डिफरेंट है। यह पृथ्वी के पानी H2O के जो कंपोजशन है पृथ्वी के समुंदर का और वहां का समुंदर है सल्फ्यूरिक एसिड का ना कि अमोनिया का ना कि सोडियम का व्हाटएवर केमिकल कंपोज़शन कंप्लीटली डिफरेंट है समुंदर का। तो हो सकता है कि उस समुंदर में जो लहरें उठती होगी उसका नाम रूप या तो फिर उसका जो फॉर्म है वह डिफरेंट होगा। किंतु यहां पर यदि ऐसा होगा कि मैं एक अलग विराट मन का अंश हूं। आप एक अलग विराट मन के अंश है। इस विराट मन के भीतर में इस तरह की कल्पना होती है। आप जिस विराट मन का अंश है उसमें दूसरी तरह की कल्पना होती है। यदि ऐसा होता तो हमारे अनुभव इस जगत के बारे में कंप्लीटली डिफरेंट होते। अभी जैसे कि मान लीजिए कि हम लोग पृथ्वी पर रहते हैं तो पृथ्वी में ही यह बायोकेमिकल रिएक्शन बन के यह जो स्टेप बाय स्टेप इवोल्यूशन हुआ सिंगल सेल ऑर्गेनिज्म से प्रारंभ करके मल्टीसेल्यूलर ऑर्गेनिज्म उसके बाद में यह जलचर पानी में रहने वाले ऑर्गेनिज्म वाटर बोन ऑर्गेनिज्म्स और उसके बाद में स्थलचर जमीन पे चलने वाले ऑर्गेनिज्म और उसमें से भी इवोल्यूशन होते-होते रेप्टाइल में से मैमल मैमल्स में से एप एप में से भी यह एडवांस एप है। थिंकिंग एप है मनुष्य। यह पूरा इवोल्यूशन हुआ। अभी पृथ्वी पे जो जीवन है वो चाहे सांप हो ना कि चाहे डायनासोर हो ना कि चाहे ट्राइलोबाइट्स हो ना कि चाहे एप हो ना कि चाहे डॉल्फिन हो ना कि चाहे मनुष्य हो। हम सबकी बेसिक बायोकेमिस्ट्री एक ही तरह की है क्योंकि पृथ्वी पर एक सिंगल फॉर्म बायो बायोकेमिस्ट्री में से यह पूरा इवोल्यूशन हुआ है। किंतु अभी देख लीजिए कल ही एक न्यूज़ पढ़ा मैंने कि नासा ने मार्स के ऊपर में पॉसिबल बायोसिग्नेचर उन्होंने खोज निकाला है। यानी कि एक समय था जबकि यह मार्स ग्रह है। मंगल ग्रह वहां पे भी जीवन था। तो उस जीवन हो सकता है कि उस समय जैसे ही पनपा होगा सिंगल सेल्यूलर ऑर्गेनिज्म वहीं पर वो खत्म भी हो गया होगा क्योंकि वहां की जो क्लाइमेट है जियोलॉजिकल फोर्सेस है वो एडवांस लाइफ को सपोर्ट नहीं करती है। वहां पे इवोल्यूशन एकदम शुरू में ही नीप इन द बर्ड जैसे इंग्लिश में कहते हैं प्रारंभ में ही उसका खात्मा हो गया होगा। पृथ्वी पर किंतु यह जियोलॉजिकल फोर्सेस अनुकूल है बोलकर के यहां पर जीवन एडवांस हुआ है। तो मान लीजिए कि यदि मंगल ग्रह के ऊपर में जियोलॉजिकल फोर्सेस सपोर्टिव होती और मंगल ग्रह के ऊपर में अह यदि जीवन पनपा होता इवोल्यूशन स्टार्ट हुआ होता तो वहां की बायोकेमिस्ट्री पृथ्वी की बायोकेमिस्ट्री से हो सकता है कि बिल्कुल भिन्न हो सकती थी और फिर वहां पे आज का जो जिसको कि हम ह्यूमन कहते हैं एक थिंकिंग बीइंग तो वहां पर यदि ये थिंकिंग बीइंग का जन्म जन्म हुआ होता उसका बायोकेमिस्ट्री बिल्कुल ही भिन्न होता। तो यहां पर देखिए कि यदि यह विराट मन अलग-अलग होते तो हो सकता है कि आप एक विराट मन का अंश है। मैं दूसरे विराट मन का अंश हूं और हमको अलग-अलग तरह की कल्पनाएं या तो फिर विराट मन के भीतर में जो अलग-अलग कल्पनाएं हैं जो अलग-अलग नाम रूप के जो फॉर्म है दिखाई देते हैं। किंतु वेदांत कहता है कि ब्राह्मण में
ब्रह्मन् में सजातीय या विजातीय भेद नहीं --लेकिन स्वगत भेद है
सजातीय भेद नहीं है। इस अर्थ में कि अब सजातीय भेद किसको कहते हैं? अब यह आम का पेड़ है और यह है इमली का पेड़ है और उसके बाद में वटवृक्ष है। उसके बाद में अश्वत्थ है। है तो सब पेड़ ही किंतु वो डिफरेंट डिफरेंट टाइप के पेड़ है। एक पेड़ में फल आपको आम देता है। दूसरे पेड़ में फल आपको हो सकता है। ऑरेंज मिलता है। तीसरे में आपको यह लीची वगैरह कुछ मिलता है। तो है तो सब पेड़ ही किंतु विभिन्न विभिन्न फलों के पेड़ है तो इसको सजातीय भेद कहते हैं। अर्थात कि है तो पेड़ ही एक ही जाति है किंतु एक ही जाति में विभिन्नता है। वैविध्य है। जैसे कि मनुष्य में सजातीय भेद होता ही है। हम सभी लोग मनुष्य हैं। किंतु मैं मैं हूं। आप आप हैं। मेरा फिजिकल कंपोजिशन यह जो जिस तरह से जन्म से लेकर के मैं अभी तक आया हूं। मेरे संस्कार, मेरी मेमोरीज, मेरा नॉलेज, मेरी स्किल्स, मेरी टैलेंट आपसे बिल्कुल भिन्न है। तो हम सबके भीतर में सजातीय भेद होता ही है। यहां तक कि जो आइडेंटिकल ट्विंस होते हैं, जिन दोनों का डीएनए ऑलमोस्ट मैच हो जाता है, इन दोनों के बीच में भी आपको जब यह दोनों बड़े होते हैं, काफी डिफरेंट टाइप का इवोल्यूशन डेवलपमेंट देखने को मिलता है। यानी कि सजातीय भेद हम सब में है। किंतु ब्राह्मण के भीतर में सजातीय भेद नहीं है। ऐसा नहीं है कि यह ब्राह्मण बोलकर के एक स्पीशीज है। जैसे मनुष्य के भीतर में मनुष्य स्पीशीज तो एक है। किंतु 700 करोड़ मनुष्य अलग-अलग है। तो ब्राह्मण बोलकर के भी एक स्पीशीज है। एक जात है। उसके भीतर में 10 15 20 25 टाइप के ब्राह्मण है। पृथ्वी पर एक ब्राह्मण है। मार्स के ऊपर में यदि वहां पर जीवन पनपता है। इवॉल्व होता है तो दूसरा ब्राह्मण है। फिर अभी तो कितनी सैकड़ों एग्जोप्लेनेट्स हमने खोज ली है। एग्जोप्लेनेट अर्थात कि दूसरी सोलर सिस्टम में बनी हुई प्लेनेट। तो प्रत्येक एग्जो प्लेनेट के ऊपर में एक-एक ब्राह्मण है। यदि ऐसा होता तो फिर क्या होता कि प्रत्येक अभी पृथ्वी पर जो मनुष्य रहते हैं वे लोग जगत को जिस तरह से देखते हैं वो बिल्कुल डिफरेंट होगा कि मार्स के ऊपर में यदि जीवन डेवलप हुआ होता इवॉल्व हुआ होता तो वे लोग जगत को बिल्कुल डिफरेंट तरीके से देखते। किंतु ऐसा नहीं है। ब्रह्मन के भीतर में सजातीय भेद नहीं है। एक चीज दूसरा कि ब्राह्मण के भीतर में विजातीय भेद भी नहीं है। विजातीय भेद का अर्थ क्या है? सजातीय भेद अर्थात कि एक ही जाति में डिफरेंट-डिफरेंट स्पेसिमेन यानी कि हम सब मनुष्य जाति के हैं। किंतु मैं मैं हूं आप आप हैं। हम दोनों में क्लियर डिफरेंस है। तो ये सजातीय भेद हो गया। अभी विजातीय भेद क्या है? जाति ही डिफरेंट है। अभी मैं मनुष्य हूं तो यह माइक है। तो यह कॉटन है तो यह एक बंदर है, एक पत्थर है, एक पानी है, एक आकाश है, एक बादल है, एक हवा है। यह पृथ्वी है। हम सबके भीतर में कहीं पर कोई भी मैच नहीं है। क्योंकि वह पदार्थ ही अलग है। यह पत्थर एक पदार्थ है। मैं एक पदार्थ हूं। यह माइक एक पदार्थ है। यह चश्मा एक पदार्थ है। तो इसको कहते हैं विजातीय भेद। तो ब्रह्मन में विजातीय भेद भी नहीं है। अर्थात कि हम तो यहां पर ब्राह्मण के पार्ट है। इस अर्थ में कि एक विराट मन के भीतर में जो तरंगे उठती है। इस तरंगे हम सब देख सकते हैं। किंतु मंगल ग्रह के ऊपर में यदि जीवन इवॉल्व हुआ होता। वहां पर कंप्लीटली डिफरेंट टाइप का वेदांत काम कर रहा है। यहां पर यह ब्रह वहां पर यह ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या जीवो ब्रह्मवना पर यह जो महावाक्य है यह सब काम ही नहीं करेगा। कंप्लीटली डिफरेंट टाइप का यह वहां पे ईश्वर आध्यात्मिकता ब्रह्म तत्व आत्म तत्व कंप्लीटली डिफरेंट है। तो ऐसा भी नहीं है कि ब्रह्म तत्व इस पूरे ब्रह्मांड में और सिर्फ ब्रह्मांड में ही नहीं। ठाकुर कहते हैं ना स्वामी जी को ब्रह्म योनि का दर्शन हुआ था कि एक रिवर्स ट्रायंगल अपसाइड डाउन ट्रायंगल जिसमें से कि कोटि-कोटि ब्रह्मांड प्रकट हो रहे हैं। तो ठाकुर ने कहा तुमको ब्रह्म योनि का दर्शन हुआ है। तो एक ही जो कांसेप्ट है एक ही बेसिक आईडिया है। उसमें से सिर्फ पृथ्वी या मंगल या दूसरी सैकड़ों एग्जोप्लेनेट बनी है। इतना ही नहीं जितने भी ब्रह्मांड प्रकट हुए हैं सृष्टि स्थिति प्रलय की साइकिल को पार करते-करते वह सभी ब्रह्मांड एक ही कांसेप्ट में से प्रकट होते हैं। यानी कि कल ना परसों यदि हमको एक एलियन लाइफ भी मिल जाए और उसका बायोकेमिस्ट्री डीएनए आरएनए स्ट्रक्चर उसका जियोलॉजी उस प्लेनेट का भले ही चाहे कंप्लीटली डिफरेंट क्यों ना हो किंतु वे लोगों को यदि ईश्वर साक्षात्कार ब्रह्म साक्षात्कार या स्पिरिचुअल लाइफ में आगे बढ़ना होगा तो उनको यही कांसेप्ट के माध्यम से आगे बढ़ना होगा जिस कांसेप्ट्स को हमारे ऋषि मुनियों ने खोज निकाला है। तो यहां पे सजातीय भेद भी नहीं है, विजातीय भेद भी नहीं है। किंतु स्वगत भेद है। स्वगत अर्थात कि क्या कि अब जैसे कि मैं मनुष्य हूं। तो मान लिया अभी मेरे भीतर में किंतु मेरे जो अंग है यह जो ऑर्ग्स है उसमें डिफरेंस दिखता है। अभी यह हाथ है और यह सर है। ऑब्वियसली हाथ और सर के भीतर में डिफरेंस है। दोनों का फंक्शन डिफरेंट है। दोनों का बायोकेमिस्ट या तो फिर कहेंगे कि ऑर्गेनिक स्ट्रक्चर डिफरेंट है। अभी जैसे मेरा हार्ट है और मेरा किडनी है, मेरा लीवर है, मेरा ये जो भी फिजिकल मेरा ये जो कंपोजशन है, लंग्स है। तो इन सबका डिफरेंट-डिफरेंट फंक्शन है। डिफरेंट-डिफरेंट प्रकार का सेल्यूलर स्ट्रक्चर है। ब्रेन एक काम करता है तो हार्ट दूसरा काम करता है। लंग्स तीसरा काम करता है। तो मेरे भीतर में विभिन्न तरह के अंग है। तो यह अंग प्रत्यंग मेरे भीतर में डिफरेंट होने से इसको स्वगत भेद कहेंगे। ऑर्गेनिज्म एक ही है किंतु विदिन दिस ऑर्गेनिज्म डिफरेंट-डिफरेंट टाइप की फंक्शनैलिटीज है। तो देखिए कि तीन तरह के भेद हो गए। सबसे बड़ा भेद है विजातीय भेद। अर्थात कि मनुष्य और पत्थर कहीं पर कोई भी मेल नहीं है। पत्थर एक दूसरा स्पीशीज है या तो फिर एक तरह का पदार्थ है। मनुष्य दूसरे तरह का पदार्थ है। तो ब्रह्मन में यह विजातीय भेद हो ही नहीं सकता है कि पृथ्वी पर हम ब्रह्म साक्षात्कार करते हैं तो फिर यह मार्स के ऊपर में वे लोग शायद जाकर के शैतान का साक्षात्कार करते हैं। ऐसा कभी हो ही नहीं सकता। आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ना है तो ब्रह्म साक्षात्कार ही करना होगा। तो विजातीय भेद नहीं है। सजातीय भेद भी नहीं है। इस अर्थ में कि पृथ्वी का ब्राह्मण एक है। मार्स का ब्राह्मण एक है। यह जो जितनी भी एग्जोप्लेनेट्स है सबका अपना-अपना ब्रह्मन या अपना-अपना ईश्वर है। तो ऐसा भी नहीं है। ईश्वर कहो ना कि ब्राह्मण कहो एक ही है। सजातीय भेद भी नहीं है। किंतु स्वगत भेद यहां पे हो सकता है। ऐसा आप कह सकते हैं। क्योंकि यदि एक ब्राह्मण के भीतर में यह नाम रूप रूपी यदि यह तरंगे उठती है तो आप कह ही सकते हैं कि ये डिफरेंट-डिफरेंट ऑर्गन्स है। जैसे मेरे भीतर में ये ब्रेन है, लंग्स है, हार्ट है, किडनी है, हाथ है, पैर है, आंख है, नाक है, कान है, सर है। तो जो इतना जो भले ही चाहे मैं एक ही हूं, एक ही स्पीशीज का एक ही स्पेसिमेन हूं। किंतु मेरे भीतर में डिफरेंट-डिफरेंट ऑर्ग्स है। मेरे में सजातीय विजातीय भेद नहीं है। जब तक मैं अकेला रहता हूं। किंतु स्वगत भेद मेरे में अवश्य है। तो फिर ऐसा यदि कहते हैं कि
क्या ठाकुर का मत शंकराचार्य से भिन्न था?
ब्राह्मण के भीतर में स्वगत भेद है। इस तरह का आर्गुममेंट आप कर सकते हैं तो उसमें से एक दूसरा आर्गुममेंट प्रकट होगा कि क्या शंकराचार्य के साथ में ठाकुर का क्या कोई मेल नहीं है? क्योंकि यह जो बात हमने यहां पर कही है शरद महाराज जो कहते हैं कि एक असीम अनंत विराट मन के भीतर में यह सब कल्पनाओं का उदय होता है। तो यह बात शरद महाराज ने कोई शास्त्र में से शास्त्र वगैरह में तो खैर बहुत कुछ लिखा ही है। किंतु शरद महाराज इस बात को ठाकुर का खुद का जो अनुभव है उसके ऊपर में आधार करके कहते हैं। और ठाकुर का अनुभव किस तरह से जाता है? किस तरह से ठाकुर के अनुभव के आधार पे यह बात कही है उन्होंने। यह हम देखेंगे जब हम इसके रिलेटेड तृतीय खंड का जो एक पैसेज है भाव मुखे रहने का अर्थ क्या है? उसका डिस्कशन जब हम करेंगे तो उसमें हम देखेंगे। किंतु यहां तक एक मामला
वैसे तो हम थ्योरी मान लेते है की सब ब्रह्मन् है -- परन्तु वास्तविकता मे अपने शत्रुओ के प्रति द्वेष दूर करना असंभव सा दिखाई देता है
हम क्लियर करके ले आए हैं। यदि प्रश्न यह था कि हमको सबको विभिन्न विभिन्न चीजें जो दिखती है किंतु दो दो है प्रश्न। एक तो है कि मुझे यह वैविध्य क्यों दिखता है? यह तो एक प्रश्न है। यदि सब कुछ ब्राह्मण है तो वैविध्य नहीं दिखना चाहिए। मुझे मैं अलग, आप अलग, मेरे संस्कार अलग, आपके संस्कार अलग। हम दोनों में मित्रता भी नहीं। कभी-कभी दुश्मनावट भी हो जाती है, द्वेष हो जाता है, ईर्ष्या हो जाती है। एक मनुष्य दूसरे मनुष्य की हत्या करता है। तो प्रश्न तो यह होना चाहिए ना कि चलो भाई आप इन दोनों के बीच में एटलीस्ट मैं भी ब्राह्मण हूं, वह भी ब्राह्मण है। ऐसा यदि ना दिखे तो एटलीस्ट दोनों के बीच में वेर तो नहीं होना चाहिए। दुश्मनावट तो नहीं होनी चाहिए। यदि ब्रह्म तत्व भीतर में है तो कभी ना कभी उसकी एक तो झलक एक तो झांकी तो दिखनी चाहिए। नहीं कि अभी जैसे एक देश का दूसरे देश के प्रति प्रचंड द्वेष है। आप उसके साथ में खेलना भी पसंद नहीं करेंगे। इतना द्वेष एक दूसरे के बीच में है। तो यदि भीतर में इस देश के जो निवासी है उन्हीं के भीतर में वही ब्राह्मण है जो कि इस देश के निवासी है उनके भीतर में तो फिर वो ब्रह्मानुभूति कभी ना कभी तो वो एक जागृत होनी चाहिए ना। दूसरों के बीच में जो द्वेष है थोड़ा सा तो ठंडा हो जाना चाहिए। भले ही चाहे एकदम गले ना मिले बिछड़े मित्रों की तरह या तो परिवारजनों की तरह तो एटलीस्ट एक दूसरे की हत्या तो ना करें तो यह क्यों कि मुझे इतना वैविध्य दिखता है और दूसरा कि यह वैविध्य इतना सच बोलकर के प्रतीत होता है कि मैं हजार विचार क्यों ना कर लूं मैं वो उस सच को जैसे कि अपने मन से हटा ही नहीं पा रहा हूं। अभी जो हमारा दुश्मन देश है अब हम कहेंगे कि उसके साथ में क्रिकेट खेलना है तो हजार लोग इकट्ठा होकर के चिल्लाएंगे। क्यों उसके साथ में क्रिकेट खेलने को जाना है? अभी आप उन लोगों को हजार लॉजिक देकर समझाइए कि देखिए भारत का यह जो ये जो अपना ऐतिह्य है वारसा है यह जो स्पिरिचुअल विज़डम है वो कहता है कि उन्हीं के भीतर में वही ब्राह्मण है। मेरे भीतर में भी वही ब्राह्मण है। तो इस तरह की बातें यदि करने को जाएंगे तो सब लोग या तो उसको पागल ठहराएंगे या तो फिर उसकी हत्या कर देंगे। जैसे महात्मा गांधी की हत्या हो गई थी कि क्यों वह दूसरे लोगों को इतना प्रेफरेंस देते हैं। भले आपको यदि उनके साथ में वेयर नहीं रखना है तो आउटराइट आप प्रेफरेंस आप क्यों देते हैं? आउटराइट ऑफ फेवरेटिज्म क्यों करते हैं? इतना प्रॉमिनेंस क्यों देते हैं? बोल करके ही तो बेचारे को जान से हाथ धोना पड़ा था। तो क्या है कि बोलने में तो यह बात बड़ी सरल लगती है कि हां चलो मान लिया बोलते हैं तो कि है सभी के भीतर में ब्रह्मण किंतु वास्तविक क्षेत्र में कि वेदांत को यदि आप प्रैक्टिकल नहीं बनाना है तो इस वेदांत का अर्थ क्या है यह बोलने से क्या लाभ है कि एक ही विराट ब्रह्मण के भीतर में यह ब्रह्म समुद्र के भीतर में नाम रूप रूपी लहरें आती है आप भी एक लहर है मैं भी एक लहर हूं तो ये बोलने से क्या लाभ है यदि हम उसको व्यवहार में नहीं डाल सकते। तो देखिए कि इस तरह की थ्यरीज जो है पढ़ने में सुनने में बड़ी अच्छी लगती है। किंतु जैसे ही हम वास्तविक जगत में आ जाएंगे किसी के साथ में अपना वर है। किसी के प्रति अपना द्वेष है तो इतना गहरा द्वेष होगा। इतना गहरा वर होगा। इतना प्रचंड क्रोध होगा उसके प्रति कि वह हम ना हजार थरी हमको बता दी जाए। वह द्वेष कभी खत्म नहीं होने वाला। तो यह एक बहुत बड़ा प्रश्न आता है हमारे सामने कि आप जब बोलते तो है कि एक सत्ता को छोड़कर के एकम एव अद्वितीयम एक ही है अद्वितीय ही है। इसके अलावा और कुछ नहीं। तो यह थ्यरी सिर्फ थ्यरी नहीं है क्या? हमारे जो प्रैक्टिकल जो भी एक्सपीरियंस है उसमें तो हमको कंप्लीटली दूसरा कुछ दिखता है। तो यह एक प्रश्न आता है और दूसरा प्रश्न आता है कि हम सबको एक ही तरह का भ्रम क्यों होता है? अच्छा आपने कहा मान लिया कि एक ही विराट मन की लहरें हैं। तो अभी हो सकता है कि इज इट नेसेसरी कि हम लोग एक ही विराट मन के सब्सक्राइबर है ना मेंबर है ना कि पार्टिसिपेंट है। ऐसा नहीं हो सकता क्या कि विराट मन भिन्नभिन्न हो। एक मुस्लिम लोगों का एक अलग से एक ए रियलिटी क्रिश्चियन लोगों का डिफरेंट है। बुद्धिस्ट लोगों का अलग है। हिंदुओं का भी यह वैष्णवों का अलग, यह शक्ति साधकों का अलग, वेदांत साधना का अलग, सिखों का अलग, जैन का अलग। ऐसा नहीं हो सकता क्या? तो इन सबके भीतर में उत्तर यही है कि ब्राह्मण के भीतर में ना ही सजातीय भेद है ना ही विजातीय भेद है। तो इस उत्तर से फिलॉसोफिकल जो प्रॉब्लम है वह तो कट जाता है। ऑब्वियसली प्रैक्टिकल प्रॉब्लम तो रह ही जाएगा कि आप कैसे जिसके प्रति द्वेष है या तो फिर जिसके प्रति आकर्षण है दैहिक आकर्षण दैहिक आकर्षण से कैसे मुक्ति पाएंगे वो भी तो एक बहुत बड़ा प्रश्न है क्योंकि कामना वासना तो नहीं रहनी चाहिए जब कामना वासना कब होगी जबकि हम सामने वाले व्यक्ति को रियलिटी के रूप में स्वीकार कर लेते हैं। यूनियन की ओर सबको जाना है। तो यहां पर वह स्पिरिचुअल यूनियन है वहां पर वह दैहिक यूनियन है। जब हम स्पिरिचुअल यूनियन को ना स्वीकारे तो फिर हमको यह फिजिकल यूनियन की ओर जाना होगा। तो फिर यह बात है कि यह फिजिकल यूनियन या तो दैहिक आकर्षण है। इससे कैसे मुक्ति पाई जाए? हजार प्रयास करने के बावजूद वह मेरे मन में से नहीं जाता। तो खैर यह सब प्रैक्टिकल क्वेश्चंस है। प्रैक्टिकल क्वेश्चंस का सॉल्यूशन तो साधना में ही है। उपासना में ही है। सालों सालों तक संस्कार को स्वच्छ करना होगा, काटना होगा। तभी उसका सॉल्यूशन हमको मिलेगा। तो वह तो एक प्रश्न हो गया। किंतु फिलॉसोफिकल जो है वह हमने यहां पर शरद महाराज इस तरह का सॉल्यूशन देते हैं।
विराट मन में जगत रूप कल्पना उदय होती है, इसी लिए एक व्यक्ति को ब्रह्म-साक्षात्कार होने से भी अन्य सब भ्रम में पड़े रहते है
सोमार आार एवं जन साधारण व्यष्टि मन ओई विराट मने अंश ओ अंगीभूत होवाय आमादग के ओई एक ही प्रकार कल्पना अनुभव करते होइते छे तुम्हारा मेरा एवं जनसाधारण का व्यष्टि मन उसी विराट समष्टि मन का अंश और अंगीभूत होने की वजह से हम सबको वही एक ही प्रकार की कल्पना अनुभ अनुभूत होती है कोई जन नहीं आमरा प्रत्येक पशु टाके पशु भिन्न अन्न किशु बोल्या इच्छा में तो देखते बा कल्पना करते पारी ना इसीलिए हम प्रत्येक पशु को पशु के अलावा और कुछ बोल के अपनी इच्छा के अनुसार देखने या कल्पना नहीं कर पाएंगे। अभी यह बिल्ली है तो मुझे भी बिल्ली दिखेगी। आपको भी बिल्ली दिखेगी। यदि यह घोड़ा है तो मुझे भी घोड़ा दिखेगा। आपको भी घोड़ा दिखेगा। यदि यह यह सांप है, यह मछली है, यह जीवजंतु है, यह मॉस्किटो है तो हम सबको वही दिखेगा। ऐसा नहीं होगा कि यहां पे एक आदमी है मॉस्किटो से बचने के लिए मॉस्किटो नेट लगा रहा है। तो वहां पर है दूसरा आदमी। वह मॉस्किटो को पालने के लिए अपने साथ में शयन करने के लिए उनके लिए अच्छी व्यवस्था कर रहा है। हम सबको वो मॉस्किटो एक ही दिखता है। हम सबको पता है कि उसकी बाइट जो है वो वायरल फीवर लाकर खड़ी करेगी और हम सभी लोग हैं इससे मुक्त ही होना चाहते हैं। देखिए आजकल की ये जो जनरेटिव एआई है उसमें इस तरह की ये इमेज एडिटिंग टेक्निक वीडियो एडिटिंग टेक्निक की ये इमेज है उसमें इस एलिमेंट को हटा के दूसरा एलिमेंट रख दो। तो अब जैसे मैं यहां पे खड़ा हूं मेरे पीछे में समुंदर है। तो मैंने वो इमेज को एआई में अपलोड किया और कहा कि यहां समुंदर हटा के यहां पे एक स्काई स्क्रेपर रख दो। तो वह एआई इमीडिएटली समुंदर हटा के स्काई स्क्रेपर रख देगा। तो अभी क्या है? जनरेटिव एआई के भीतर में यह समुंदर है ना कि स्काई स्क्रेपर है। कोई फर्क नहीं पड़ता। वो मल्टीपल रियलिटीज खड़ा कर सकता है। अब यह वर्चुअल रियलिटी है। अभी यह ऑगमेंटेड रियलिटी है। देखिए कि एक ही गेम जो मल्टीप्लेयर गेम होती है उसमें क्या है कि प्रत्येक प्लेयर को डिफरेंट-डिफरेंट वो कॉस्मोस डिफरेंट-डिफरेंट यूनिवर्स वो खड़ा कर सकते हैं। भले ही चाहे सभी लोग एक ही गेम के पार्ट हो किंतु एक प्लेयर को एक तरह का वो पूरा गेमिंग एनवायरमेंट दिखता है। दूसरे प्लेयर को अपने ही तरह का दिखता है। तो यह जनरेटिव टेक्न एआई फिर यह मल्टीप्लेयर गेम्स वगैरह में देखेंगे कि हम सबकी अपनी-अपनी रियलिटीज है। हम सब अपनी-अपनी रियलिटीज खड़ी कर सकते हैं। किंतु वास्तविक जगत में यदि मैं समुंदर के किनारे खड़ा हूं। यहां पे सुबह को यदि मैं वॉकिंग के लिए जाता हूं और आपके साथ में मुलाकात हो जाती है तो आप मेरे पीछे में समुंदर ही देखेंगे। वो कोई स्काई स्क्रेपर नहीं देखेंगे। वो हो ही नहीं सकता। तो यहां पे कि बिकॉज़ कि हम सभी लोग एक ही विराट सत्ता को एक ही विराट सत्ता के भीतर में प्रकट हुई कल्पना को शेयर करते हैं। हम खुद उसके पार्टिसिपेंट है। हमको एक पशु उसी पशु के रूप में ही दिखेगा। अन्य और कुछ नहीं दिखेगा। वही जन आ यथार्थ ज्ञान लाभ करिया आमादे मध्य एक जन सर्व प्रकार भ्रमर हस्त होते मुक्ति लाभ कर ले ओ अपर शकले जेमोन भ्रमे पड़िया आे से रूपई थाके इसीलिए यथार्थ ज्ञान लाभ करके यदि हम सब में एक व्यक्ति सब तरह के भ्रमों के हाथों से मुक्ति लाभ कर भी ले तो भी बाकी सब जिस तरह से भ्रम में पड़े थे वह भ्रम में ही रहेंगे। यदि एक समुंदर की लहर है मैं एक लहर हूं तो आज यहां पर किनारे पर आके वो लहर प्रशमिमित हो गई। मैं लहर था। अभी आज मैं समुंदर के साथ में एकाकार हो गया हूं। अभी मेरा कोई अलग से अस्तित्व नहीं रहा है। समुंदर का जो प्रॉपर नेचर है सतचित आनंद वह मुझे साक्षात्कार हो गया है। किंतु इसका अर्थ तो यह नहीं कि बाकी सब लहरें भी समा जाएगी। बाकी सब लहरें भी एक ही साथ में खत्म हो जाएगी। यहां पर मैं सी शोर पर खड़ा रह के प्रतिदिन देखता हूं कि प्रत्येक क्षण एक नई लहर आकर के किनारे से टकराती है और फिर पानी में मिल जाती है। किंतु जैसे ही वह लहर पानी में मिल गई तो पीछे से दूसरी लहर दौड़ती हुई आ ही रही है। वह भी समुंदर के साथ टकराती है। किनारे के साथ टकराती है और वह भी पानी में मिल जाती है। सतत लहरें चलती ही रहती है। चलती ही रहती है। यदि एक लहर पानी के साथ मिल जाएगी, एक तरंग पानी के साथ एकाकार हो जाएगी, डज नॉट मीन कि नई-नई तरंगे प्रकट होना बंद कर दे। इसलिए महाराज कहते हैं कि यथार्थ ज्ञान लाभ प्राप्त करके यदि हम सच्चिदानंद रूपी सागर में एकाकार यदि हो भी जाएंगे, यदि हमको संपूर्ण रूप से ज्ञान हो जाएगा कि मेरा सही स्वरूप क्या है? मेरा यह जो क्षुद्र आमी यह स्मॉल आई मेरा यह अहम मेरा यह जो ईगो जिसको कि मैं एक इंडिपेंडेंट सत्ता के रूप में इंडिपेंडेंट एग्जिस्टेंस के रूप में स्वीकार कर रहा था वो सही नहीं है गलत है। यह अनुभव यदि मुझे हो भी जाएगा तो इसका अर्थ यह नहीं कि इसी समुंदर की सतह पर नई-नई तरंगों का बनना बंद हो जाएगा। ऐसा कभी होने वाला नहीं है।
विराट मन में जगत रूप कल्पना का उदय होने पर भी विराट मन स्वयं इस भ्रम का शिकार नहीं होता
आर एक कथा और एक बात विराट मने जगत रूप कल्पनार उदय होले ओ तनी आमाद गर मतो अज्ञान बंधने जड़ीभूतो होइया पड़े ना विराट मन के भीतर में जगत रूप कल्पना का उदय होने से भी वह विराट मन हमारी तरह अज्ञान बंधन में जड़ीभूत ना पड़ जाएगा। कारण सर्वदर्शी तनी अज्ञान प्रसुत जगत कल्पनार भीतरे और बाहरे अद्वय ब्रह्म वस्तु के ओतप्रोत भावे विद्यमान देखी ते पया था केके कारण जो सर्वदर्शी है वह अज्ञान प्रसूत जगत कल्पना के भीतर में और बाहर में अद्वय ब्रह्म वस्तु को ओतप्रोत भाव से विद्यमान देख सकता है। उहात ते उहा कोरते पारना बोलियाई आमादे कथा स्वतंत्र होया पड़े हम यह कर नहीं कर सकते बोलकर के ही हमारी बात अलग हो जाती है देखिए एक प्रश्न होता है कि समुंदर के भीतर में जो यह लहरें सतत प्रकट होती रहती है नाम रूप रूपी लहरें तो क्या समुंदर को कभी यह भ्रम नहीं हो जाएगा कि वह एक नहीं है वह एक इतनी सारी लहरों में बटा हुआ है यह भ्रम क्या समुंदर को खुद को नहीं होगा क्या? यह प्रश्न हो सकता है। लहर को तो यह भ्रम हो गया कि मैं समुंदर से अलग हूं और बाकी जो लहरें हैं उससे भी मैं अलग हूं। किंतु क्या समुंदर खुद इस भ्रम का क्या शिकार नहीं हो जाएगा कि अच्छा मेरी सतह पर यदि इतनी सारी लहर उठ ही रही है तो मान लीजिए मेरी सतह पर आज एक करोड़ लहरें हैं तो वो एक करोड़ लहरें और फिर मैं एक एक करोड़ एक यह इतने सारे अस्तित्व है क्या इस तरह का भ्रम समुंदर को खुद को नहीं होगा क्या तो फिर उसका प्रश्न उसका उत्तर है कि जो सर्वदर्शी है वह अज्ञान प्रसूत जगत कल्पना के भीतर में और बाहर में वही अद्वय ब्रह्म वस्तु को ओतप्रोत रूप से विद्यमान देख सकता है। जो कि सर्वज्ञानी है जो कि सर्वदर्शी है। वह समुंदर को स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि मैं जिस H2O का जो मेरा कंपोजशन है वही कंपोजशन इस लहरों का है। तो समुंदर लहरों को नीचे से देखता है शायद तो ऐसा दिखता होगा कि वही लहरें जो कि मेरे ही यह पानी से बनी है। मेरे से अलग नहीं है। ऐसा हमारा प्रॉब्लम यह है कि लहरों को हम ऊपर से नीचे देखते हैं। साइड में देखते हैं। साइड में इतनी सारी लहरें हैं वह डिफरेंट है। नीचे में जो समुंदर देखते हैं वह डिफरेंट है। तो हमारा व्यू पॉइंट जो है व्यू पॉइंट डिफरेंट है। तो इस व्यू पॉइंट की वजह से समुंदर को तो सब कुछ पानी का ही बना हुआ दिखता है। बस हम ही लोग हैं जो कि ऊपर से नीचे देखते हैं या साइड पे देखते हैं। हमारा पॉइंट ऑफ व्यू गलत है। बोल कर के हमको यह नाम रूप रूपी वैविध्य दिखाई देता है। देखिए कितना सुंदर सेंटेंस। शरद महाराज का एक माने हे फिलोसोफिकल सेंटेंस किंतु लिटरली भी कितना सुंदर दिखता है। सर्वदर्शी तिनी जो कि सर्वदर्शी है वो अज्ञान प्रसूत जगत कल्पना और भीतरे और बाहरे अज्ञान प्रसूत जगत कल्पना यह जगत कल्पना कैसी है? अज्ञान के माध्यम से उसकी प्रसुति हुई है। अज्ञान के माध्यम से जिसका प्रसव हुआ है, जन्म हुआ है। तो अज्ञान प्रसूत जगत कल्पना उसके भीतर में और बाहर में वही अध्वय ब्रह्म वस्तु को ओतप्रोत भाव से विद्यमान देख सकता है। वही अद्वय ब्रह्म वस्तु को ओतप्रोत भाव से विद्यमान देख सकता है। सूत्रे मणि गणा इव जैसे भगवान कृष्ण वो गीता में कहते हैं सूत्र एक ही है बस मणि जो है वो विभिन्न रूप से उसमें बने हुए है म उसको लगाया हुआ है तो ईश्वर एक ही है बस यह पूरा जगत जो है उसमें विभिन्न मणियों की तरह गुथाया हुआ है तो यहां पे भी जो ओतप्रोत भाव से अद्वय ब्रह्म वस्तु को ओतप्रोत भाव से विद्यमान देख सकता है अज्ञान प्रसूत जगत कल्पना के बाहर में भी और भीतर में भी उहा करीते ना पारी बुलियााई आमादर कथा स्वतंत्र हो या पड़े हमारा पॉइंट ऑफ व्यू डिफरेंट है समुंदर नीचे से ऊपर देखता है सब कुछ पानी का बना दिखता है हम लोग लहर के ऊपर में रहकर के समुंदर को नीचे में देखते हैं वो भी डिफरेंट दिखता है और अपने आसपास में जितने भाई बांधव हैं अपने ये विभिन्न लहरें उसको भी डिफरेंट देखते हैं ठाकुर जे मन बोली ठाकुर जैसे कहते थे शापेर मुखे बी रोए छे शाप ओई मुख दिए नित्य आहार आदि को छे शापे ताते किंतु किु हो ना सांप के ठाकुर जैसे कहते थे सांप के मुंह में विष है जहर है सांप उसी मुंह से प्रतिदिन आहार आदि करता है किंतु सांप को उससे कुछ नहीं होगा किंतु सांप जाके कामड़ाए कोई भी शेतार्थ खणात मृत्यु किंतु सांप जिसको दंसता है तो उसी विष से जिसको दस्ता है उसका ततक्षणात इमीडिएटली इंस्टेंटली मृत्यु हो जाएगा। वो जो ठाकुर वो उदाहरण देते हैं ना वो म वाटर स्नेक वाटर स्नेक ने एक मेंढक को गिला है। अभी ये वाटर स्नेक जो है वो मेंढक को अभी गले में फंस गया है। तो सांप को भी यंत्रणा हो रही है। गले में फंसा है तो बेचारे को कष्ट होगा ही। ना ही वह मेंढक को गिल पा रहा है ना ही मेंढक को बाहर फेंक पा रहा है। तो सांप को भी यंत्रणा है और मेंढक जो उसके गले में फंसा है उसको भी यंत्रणा है। यदि सांप के पेट के भीतर में चला जाएगा तो मृत्यु हो जाएगा तो चलो ये मामला ही खत्म हो गया। किंतु ना ही मर रहा है ना ही वह बाहर निकल कर के बच रहा है। सांप को भी यंत्रणा, मेंढक को भी यंत्रणा। तो हमारी इस तरह से वाटर स्नेक की तरह परिस्थिति है। यह मेंढक को गिल तो लिया है। अज्ञान जो है हमारे सर पर आकर सवार हो गया है। अभी हम अज्ञान से मुक्ति भी नहीं पा सकते अर्थात कि मुक्त भी नहीं हो जा सकते। ना ही यह अज्ञान इस तरह का है कि हमको मार भी नहीं देता। यह जितने भी 50 60 70 साल का जो जीवन है जीना ही है। जवाबदारी जो है वह सर पर आन पड़ी है। उसको तो निभाना ही है। ना ही हम सांसारिक जवाबदारी से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं ना ही हमको संपूर्ण रूप से मुक्ति मिल जाती अज्ञान रूपी अंधकार से वो हमारी हालत है वो वाटर स्नेक की तरह किंतु यहां पे जो सांप का उदाहरण ठाकुर देते हैं वो है कि ये समुंदर उसके भीतर में यह नाम रूप तो है किंतु समुंदर को नाम रूप से कोई फर्क नहीं पड़ता। समुंदर अपने सीने पर अपनी सतह पर लाखों करोड़ों लहरों को लेकर के खेलता रहता है। उसको कोई फर्क नहीं पड़ता। लहरें आएगी कि जाएगी। समुंदर की सतह में आप थोड़ा सा भी डीप में जाएंगे। यदि आपने इस तरह के टीवी शो देखे होंगे। थोड़ा सा भी आप गहराई में जाएंगे ना तो समुंदर के ऊपर में चाहे जितना भी तूफान मंडरा रहा हो, जितना ही यह हरीिकन है, जितना भी यह स्टम है, जितनी भी यह सुनामी है, सब सतह के ऊपर में है। थोड़े मीटर डीप में जाएंगे तो देखेंगे सब कुछ शांत है। पानी में अंडर करंट है। किंतु सतह ही की तरह सुनामी हरीिकन यह सब वहां पर आपको नहीं दिखेगा। वह सब सतह के ऊपर में ही दिखेगा। तो वैसे ही सांप के मुंह में तो जहर है। किंतु सांप उस मुंह से सब कुछ आहार ग्रहण करता है। उसको कुछ नहीं होगा। किंतु सांप जिसको काटेगा उसका मृत्यु अवश्य होगा। इसके बाद में भी इस टॉपिक में बहुत कुछ है जो कि अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ओम