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Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 9 Feb 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण भवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग इसका पाठ इस सप्ताह करेंगे द्वितीय भाग लीला प्रसंग का साधक भाव इसमें प्रथम चैप्टर साधक और साधना। इसका अंत अभी हमारा आ चुका है। लास्ट पॉइंट जो बचा है कि किस तरह से भक्ति के मार्ग से निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर सकते हैं। यह थोड़ा सा डिफिकल्ट टॉपिक है। किंतु देखिए कि शरद महाराज ने बड़े ही सुंदर रूप से इस टॉपिक को समझाया है। अ जनरली हम सबको पता

ज्ञान मार्ग से निर्विकल्प समाधी प्राप्ति कैसे होती है

ही है कि किस तरह से ज्ञान के मार्ग से हम लोग ब्रह्म ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। ये पूरा जितना भी ये अपना शास्त्र है, अपने उपनिषद है, अपने जितने भी भारतीय संस्कृति है। बड़े स्पष्ट रूप से कहते हैं कि निर्विकल्प समाधि आध्यात्मिक जीवन की सर्वोच्च अनुभूति है और इसको प्राप्त करने के लिए ज्ञान का मार्ग बड़ा ही प्रशस्त मार्ग है। जैसे कि कैवल्य उपनिषद में है कि न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागे न के अमृतत्व मानसहु न कर्म से न प्रोजेनी या तो फिर धन से सिर्फ और सिर्फ मात्र रनाउंसिएशन त्याग के माध्यम से ही मनुष्य अमृतत्व को प्राप्त करता है। तो यह बड़ा ही फ़ेमस अह है अपने अह संस्कृति में और फिर गीता में जैसे है कि नहीं ज्ञानेन सदृश्यम पवित्रम इह विद्यते ज्ञान की तरह मनुष्य को पवित्र करने वाला और कुछ नहीं है। तत स्वयं योग संसिद्धम कालेनात्मनी विति जिस तरह से सिर्फ और सिर्फ उसी के माध्यम से कालेन एक समय आएगा आत्मनी विंदति आत्मज्ञान हमको प्राप्त होगा। तो यह भारतीय संस्कृति, भारतीय साहित्य, भारतीय आध्यात्मिकता आप देखिए कि त्याग और ज्ञान यह जो रास्ता है विवेक का रास्ता, अमृतत्व का रास्ता इसी के माध्यम से ब्रह्म ज्ञान प्राप्त होता है। यह हमारे शास्त्रों में बहुत ही स्पष्ट रूप से कहा गया है। किंतु यहां पे जो पॉइंट शरद महाराज हमको कहना चाहते हैं वो है कि भक्ति के माध्यम से भी हम लोग निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर सकते हैं। अभी यहां पे देखिए यह जो स्टेटमेंट है उस स्टेटमेंट में एक अपेरेंट कंट्राडिक्शन यह है कि भक्ति की जो फिलॉसोफी है वो फिलॉसोफी जैसे कि द्वैत वेदांत या तो विशिष्ट अद्वैत वेदांत वो इस निर्विकल्प समाधि का कांसेप्ट है उसको शायद स्वीकार ही नहीं करती। क्यों? क्योंकि निर्विकल्प समाधि का अर्थ क्या है? वो जो ठाकुर की फेमस उदाहरण देकर बताएं तो एक सूरज है आकाश में जमीन पे एक घट है पृथ्वी पे और इस घट घट के भीतर में पानी रखा है। पानी के भीतर में सूरज का प्रतिबिंब हो रहा है। अभी यह सूरज का प्रतिबिंब पानी के भीतर में है। अभी मैं घट को तोड़ दूंगा तो क्या होगा? यह प्रतिबिंब क्या उड़कर के सूरज के भीतर में जाकर समाहित हो जाएगा? नहीं प्रतिबिंब इज जस्ट अ रिफ्लेक्शन म बोथ आर सिनोनिम तो कोई एक्सप्लेनेशन नहीं हुआ बट एनीवे इस ये इंटू इटिव है इसका जो एक्सप्लेनेशन है मनुष्य को भीतर से सहज रूप से समझ आ जाता है। अभी जैसे वो सर्कस या म्यूजियम वगैरह होता है ना हम लोग वहां पर जाते हैं तो चारों ओर मिर्स लगाए होते हैं। ऐसा होल ऑफ मिरर जैसा होता है। कोई कॉन्वेक्स मिरर होता है, कोई कॉनकेव होता है। तो किसी मिरर में देखेंगे तो आप लंबे दिखाई देंगे। किसी मिरर में देखेंगे तो मोटे दिखाई देंगे। तो किसी मिरर में देखेंगे तो डिस्टोर्टेड दिखाई देंगे। अभी यह मिरर को आपने तोड़ दिया। तो क्या हुआ? क्या वो रिफ्लेक्शन आपके भीतर में आकर मिल गया? नहीं। वह रिफ्लेक्शन ही था। और जैसे मिरर तोड़ा रिफ्लेक्शन विलीन हो गया। था ही नहीं था और नहीं था। दोनों इज़ अ कंट्राडिक्शन इन टर्म किंतु हम लोग इस एग्जांपल से सहज रूप से समझ सकते हैं। वह चाहे सूरज का रिफ्लेक्शन पानी के भीतर में हो कि हमारा रिफ्लेक्शन आईने के भीतर में है भी सही और नहीं भी है। ऐसा आप नहीं कह सकती कि यह मेरे मन का भ्रम है। क्योंकि आप तो स्पष्ट रूप से रिफ्लेक्शन को देख सकते हैं। एट द सेम टाइम हमको पता है कि जैसे ही यह मिरर टूटा यह रिफ्लेक्शन अदृश्य हो गया। इस रिफ्लेक्शन का मेरे ऊपर में कोई असर नहीं होने वाला। यदि मैं चाकू ले मिरर के ऊपर में जोर से अटैक करूं तो क्या ऐसा होगा कि मुझे इससे कोई आघात होगा। चाकू से मिरर के ऊपर में आप स्क्रैचेस करते हैं। तो ऐसा है क्या कि वो स्क्रैचेस मेरे रिफ्लेक्शन पे हो रहे हैं। बोलकर के मुझे कोई स्क्रैच होगा? नहीं होगा। वी बोथ आर इंडिपेंडेंट एंटिटीज एट द सेम टाइम दैट रिफ्लेक्शंस कंप्लीटली डिपेंडेंट अपॉन मी। एक दूसरे से स्वतंत्र भी है। एट द सेम टाइम रिफ्लेक्शन मेरे पे डिपेंडेंट भी है। मैं ऐसा हाथ उठाऊंगा तो रिफ्लेक्शन भी ऐसा हाथ उठाएगा। मैं ऐसा करूंगा तो रिफ्लेक्शन भी ऐसा करेगा। सो इट्स कंप्लीटली डिपेंडेंट अपॉन मी। एट द सेम टाइम इट इज़ इंडिपेंडेंट ऑफ़ मी। एट द सेम टाइम इट इज़ नथिंग बट एन इल्यूजन। रिफ्लेक्शन इल्ल्यूजन के अलावा कुछ नहीं। तो देखिए कि अद्वैत वेदांत भी ऐसा ही कहता है कि हमारे भीतर में जो रिफ्लेक्टेड कॉन्शियसनेस है यह रिफ्लेक्टेड चैतन्य है। जिस क्षण यह मिट्टी का घड़ा यानी कि हमारे संस्कार हमारे संस्कार जब तक बने हुए हैं, तब तक वह रिफ्लेक्शन को धारण किए हुए हैं। जिस क्षण संस्कार टूट जाएंगे। वैसे ही यह रिफ्लेक्शन पानी जो है वह पानी है वह बह जाएगा और रिफ्लेक्शन जो है वह पूरा हवा में विलीन हो जाएगा वह डिसीपेट हो जाएगा। तो देखिए कि यह अद्वैत वेदांत है। जैसे ही संस्कार टूटे कि साथ में ही मैं जो ओरिजिनल सन है जो सूर्य है वही मेरा वास्तविक स्वरूप है। उस वास्तविक स्वरूप में मैं स्थित हो जाऊंगा। हां यदि इति इति करके कि इस जगत में अभी भी जन कल्याण के लिए मुझे रहना है। जन कल्याण क्या सभी के भीतर में तो अभी वही आत्मन है। तो वही आत्मन को मैं यदि सबके भीतर में देखता हूं तो फिर मैं वापस आऊंगा। किंतु उस समय क्या होगा? जैसे हमने लास्ट टाइम डिस्कस किया था कि हायर डायमेंशनल रियलिटी मेरे भीतर में ओपन होगी। बाहर से तो मैं दिख रहा हूं 5 1/2 फुट और यह 65 68 केजी जो मेरा वेट है इतना हाइट इतना वेट और इतना लिमिटेड मेरा मन बुद्धि चित्त अहंकार और आंख वगैरह मन बुद्धि चित्त अहंकार नहीं किंतु ये इंद्रियां कर्मेंद्रियां ज्ञानेंद्रियां ये बाहर से तो लिमिटेड दिख रहा है किंतु भीतर में एक हायर डायमेंशनल स्पेस है। इसके भीतर में असली सूर्य छुपा हो सकता है। माने दैट इज द पावर ऑफ ये जीवन मुक्त। तो यह हमने ऑलरेडी डिस्कस किया। अभी देखिए

द्वैत या विशिष्ट अद्वैत वेदांत मार्ग से ईश्वर साक्षात्कार

द्वैत वेदांत जो है या तो फिर विशिष्ट अद्वैत वेदांत है उन लोगों का किस तरह से फिलॉसोफी चलता है कि अब जैसे कि एक उपमा हम ले कि एक बर्थडे पार्टी है और एक बच्चे की मां ने केक मंगवाई है। किंतु अभी प्रॉब्लम यह है कि पता नहीं कितने उसके फ्रेंड जो है उसके लड़के के वह पार्टी में आने वाली है। आने वाले हैं। तो इस मां ने क्या किया? एक मैजिकल केक मंगवाया। इस तरह का मैजिकल केक कि इसमें से आप जितने भी पीस करते रहे वह केक जो है कभी भी समाप्त नहीं होगा। वो बाइबल में ऐसा है ना एक पात्र है पात्र में से वो जीसस फिश ना कि ऐसा कुछ ब्रेड ना फिश जो भी है वो बांट रहे हैं। तो बांटते बांटते कभी अक्षय पात्र जिसको कहते हैं। कभी समाप्त ही नहीं होता। वो बाइबल में भी है। अपने यहां पे भी अक्षय पात्र का है। तो ऐसा ही मान लीजिए एक मैजिकल केक का उदाहरण हम लेते हैं कि इस मां ने मैजिकल केक ऑर्डर की। अभी मान लीजिए कि 100 आए इस उसके बच्चे के फ्रेंड तो उसने केक में से 100 टुकड़े करके करके वो सबको बांटा। किंतु देखिए मैजिकल केक है तो 100 टुकड़े बांटने के बावजूद केक का जो साइज है वह ऐसा का वैसा ही रहता है। जैसे ही टुकड़ा काटते हैं और बांटते हैं सीधा वो उसका साइज ओरिजिनल की तरह हो जाता है। अभी देखिए कि 100 फ्रेंड आए तो 100 टुकड़े किए उसके और सबको बांटे ओरिजिनल वैसे का वैसा ही फिर एकाएक ऐसा हो गया 1000 और फ्रेंड आ गया तो फिर उस केक में से 1000 पीस करके उसको बांटे तो फिर भी देखिए 10100 को बांटे हैं ओरिजिनल वैसे का वैसा है उसके बाद में हुआ ऐसा कि 1 लाख आ गए उसके फ्रेंड तो उसमें से वह 1 लाख दूसरे पीस किए वह सबको बांटे 1000 1 लाख 10000 यह इतने अभी भी ओरिजिनल वैसे का वैसा ही है। तो अभी देखिए कि यह द्वैत वेदांत या विशिष्ट द्वैत की उपमा है। ईश्वर जो है उनका जो सब्सटेंस है वो सब्सटेंस जो है वह सबको बांटते हैं। किंतु वो ईश्वर सेपरेट है और जो पीस केक का जो पीस है जो कि सबको बांटा गया है। सब्सटेंस एक है। अभी ये चॉकलेट केक है तो चॉकलेट केस के पीस किए हैं केक के तो वो चॉकलेट केक ही वो उनको मिलेगा। ऐसा नहीं कि स्ट्रॉबेरी केक मिलेगा ना कि ऐसा कोई केक मिलेगा। सबको चॉकलेट केक ही मिलने वाला है। उसका जो इंग्रेडिएंट है, मटेरियल है वो सेम है। एट द सेम टाइम जब एक बार आपने केक को काट करके एक पीस एक लड़के को दिया। अभी यह लड़का वह पीस जो है अपने पास में वह ओरिजिनल केक के साथ में लाकर रखेगा तो वह क्या ओरिजिनल केक के साथ में वो मिक्स हो जाएगा क्या उसके साथ में मर्ज हो जाएगा क्या नहीं होगा वो साथ-साथ में रख सकता है किंतु वो मर्ज कभी नहीं होगा तो देखिए कि यहां पे भी द्वैत या विशिष्ट अद्वैत ये बड़ा ही क्रूर उदाहरण दे रहा हूं। दिस इज नॉट अ सोफिस्टिकेटेड वेदांत सम्मत उदाहरण। यह बड़ा ही एक क्रूर उदाहरण है सहज रूप से समझने के लिए कि इतने सारे जितने भी केक के पीस हमने बांटे बांटते ही जाइए। ओरिजिनल वैसे का वैसा ही रहेगा। ओरिजिनल केक और जो पीस काटा है उसमें से उन दोनों का बेसिक इंग्रेडिएंट एक ही है। किंतु वही बात है कि वह पीस को आप वापस लेकर के कैसे ओरिजिनल केक के बगल में रख सकते हैं। वह दोनों मर्ज कभी नहीं होंगे। तो यह देखिए कि भक्ति मार्ग जो है वह बेसिकली द्वैत या विशिष्ट अद्वैत फिलॉसोफी के साथ में जुड़ा हुआ है। वहां पर यह निर्विकल्प समाधि का कांसेप्ट ही नहीं है। तो यह एक आप कह सकते हैं कि भक्ति मार्ग को फॉलो करके फिलॉसोफिकली आप वे लोग कहेंगे कि निर्विकल्प समाधि हमारा उद्देश्य ही नहीं है। असंभव है। शायद वे लोग ऐसा ना कहे किंतु ऐसा कहेंगे कि श्री कृष्ण के साथ में वैुंठ लोक में निवास करना यही हमारा उद्देश्य है। श्री कृष्ण नहीं हो जाना है। ठाकुर जैसे कहते थे कि चीनी खेते बालो बाशी मां चीनी होते चाइना। मैं शुगर खाना मुझे अच्छा लगता है। मां मैं शुगर होना नहीं चाहता। तो वैसे ही यह भक्ति मार्ग के जो है आचार्य वे लोग वही कहेंगे कि ईश्वर के साथ में लीला संभोग करना है। लीला विलास करना है। नहीं कि हमको ईश्वर हो जाना है। तो यह फिलॉसोफिकल मिसमैच है। जब शरद महाराज यहां पर यह कहते हैं कि भक्ति के मार्ग से आप किस तरह से निर्विकल्प समाधि को प्राप्त करेंगे। किंतु देखिए यह

श्री रामकृष्ण के जीवन में विभिन्न साधन पद्धतियाँ और दर्शन शास्त्रों का समन्वय

सब फिलॉसोफिकल कंस्ट्रेंट जो है इसके बारे में हमने अपने लास्ट क्लास में भी डिस्कस किया था कि यह कंस्ट्रेंट एट द एंड ऑफ द डे वो सब लिमिटेड है। इस तरह से सोचना कि ब्राह्मण का लड़का ब्राह्मण ही होगा। शूद्र का शूद्र ही होगा। वैश्य का क्षत्रिय का क्षत्रिय ही होगा। ऐसा एक वाटर टाइट रिजिड कंपार्टमेंटलाइजेशन करके स्ट्रेटिफिकेशन करके हमने अपनी पूरी संस्कृति को अपने पूरे देश को डूबा दिया था 1000 साल तक तो फिलॉसोफी या तो आध्यात्मिक जीवन में भी ऐसा है ठाकुर का कैसा मुक्त मन था कभी भक्ति में विचरण करते हैं कभी ज्ञान में कभी योग में नील आकाश में पंखी की तरह जिसके ऊपर में मन आया उसके ऊपर में उस साधना को उन्होंने उसका इस्तेमाल किया। उस साधना में उन्होंने अपने मन को डूबाया। देखिए ठाकुर खुद कहते हैं कि आप कुआं खोदने को जाएंगे पानी के लिए और आप 10 जगह पर कुएं खोदते रहेंगे तो क्या होगा कि अल्टीमेटली आपको कहीं से भी पानी नहीं मिलेगा। इससे बेटर है कि एक जगह कुआं खोदो और जब तक पानी नहीं आता है तब तक खोदते रहो। यानी कि क्या है यह निष्ठा जो है जो साधन पद्धति हमने अपनाई है जिस साधन पद्धति को हमने अपना जीवन प्रदान किया है जिस गुरु को हमने अपनाया है जिस इष्ट के प्रति हमारी श्रद्धा है तो फिर उनको फॉलो करके उस पाथ में जो आने वाली सर्वोच्च सिद्धि है उसे प्राप्त कर लो बाद में जहां पर भी जाना हो जाओ तो ठाकुर वैसे कहते तो है यह बात किंतु रामकृष्ण कृष्ण संघ में बाद में देखिए कि हम लोगों के लिए ज्ञान, भक्ति, कर्म, ध्यान यह चार रास्ते जो है वो चारों रास्ते एक दूसरे के पूरक है। एक दूसरे के एक्सक्लूसिव नहीं है। एक दूसरे के ऑोजिशन में नहीं है। वो एक दूसरे के कॉम्प्लीमेंटरी है। सुबह को मेरा माइंड फ्रेश है। तो चलो मैं थोड़ा बहुत उपनिषद का स्टडी करता हूं। यह स्मरण मनन निधिद्यासन करता हूं। महावाक्य विचार करता हूं। शाम को अभी मैं काम करके थक गया हूं। तो चलो मैं कथामृत खोल के या तो मां का जीवन खोल के उसको पढ़ता हूं। तो यह देखिए कि अवस्था के अनुसार परिस्थिति के अनुसार मैं अपनी साधन पद्धति को अपनाता हूं। और फिर क्या है? मन का भी ऐसा है कि बहुत सारे साधु बीच-बीच में मायावती है, ओमकारेश्वर है वगैरह जो तपस्या की जगह है वहां पर जाकर के थोड़ी तपस्या करते हैं। अभी यह कनखल है। वहां पर वह साधना सदन तो वहां पर ज्ञान सत्र चलता है। वो 40 दिन में पूरा प्रस्थानत्रय वे लोग सिखाएंगे। बड़े कॉमटेंट आचार्य होते हैं। ट्रेडिशनल आचार्य प्योर संस्कृत में सिखाएंगे। तो मैं भी सन्यास के बाद में वहां पर गया था। तो बीच-बीच में ऐसा जाकर ज्ञान सत्र अटेंड करते हैं। तो क्या है कि इस तरह से यह रिट्रीट जो है वो रिट्रीट में जाकर के प्योर ज्ञान का हम आनंद उठाते हैं। कभी यह वृंदावन जाकर के यह झूलन उत्सव वगैरह अटेंड कर दिया तो भक्ति के भीतर में हमने अपने को डूबा दिया। तो क्या है कि ज्ञान कर्म भक्ति ध्यान रामकृष्ण संघ के जो भी यह साधक हैं हम लोगों को यह कोई ऑोजिट नहीं लगते हैं। एक्सक्लूसिव नहीं लगते हैं। हमको तो यह सब कॉम्प्लीमेंट्री ही लगते हैं। तो देखिए कि विद दिस आईडिया इन आवर माइंड ट्रेडिशनल दृष्टि से देखेंगे तो भक्ति के माध्यम से निर्विकल्प समाधि वांछित नहीं है। माने वे लोग चाहेंगे नहीं जो भक्ति मार्ग को फॉलो करते हैं कि हमको निर्विकल्प समाधि चाहिए ऐसा वे लोग चाहेंगे ही नहीं फिलॉसोफिकल कंस्ट्रेंट भी है और डिजायर भी उसके लिए नहीं किंतु हम लोगों के लिए रामकृष्ण ट्रेडिशन को फॉलो करते श्री रामकृष्ण के संतान गणों को यह सब एक्सक्लूसिविटी जो है वह हम लोगों को पसंद नहीं आती ठाकुर कहते हैं ना क्यों क्यों शनाइए शुद्ध प जाए कोई कोई शहनाई का सिर्फ एक ही राग बजाता है। मैं तो सब राग रागिनियां बजाता हूं। तो हमारे लिए भी ना ही फिलॉसोफिकल कंस्ट्रेंट है ना ही हमारे डिजायर में ऐसा कुछ है कि नहीं मुझे सिर्फ रामकृष्ण लोक में जाकर के रामकृष्ण के साथ में ही निवास करना है। भगवान रामकृष्ण के साथ में एकीकृत नहीं हो जाना, एकीभूत नहीं हो जाना निर्विकल्प समाधि में। हम लोगों के साथ में ऐसा ना ही फिलॉसोफिकल कंस्ट्रेंट है ना ही इस तरह का कोई इंटेलेक्चुअल लिमिटेशन है। सो विद दिस क्लेरिटी इन फ्रंट ऑफ अस शरद महाराज अभी जब हम सबको हमको समझाते हैं कि भक्ति मार्ग से किस तरह से निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर सकते हैं। क्या कहते हैं शरद

निर्विकल्प समाधि के दो मार्ग: ज्ञान और भक्ति

महाराज? भक्ति मार्ग के इति इति साधन पथ बोलिया आमरा निर्देश कोरिया छी भक्ति मार्ग को हम लोग इति इति साधन पथ बोलकर के निर्देश किए हैं। अभी इस बात को कि ठाकुर के इति इति के साथ में नहीं कंफ्यूज कर देना है। ठाकुर कहते हैं कि नेति नेति करके निर्विकल्प समाधि तक जाना है और इसके बाद में इति इति करके कि यह जीव जगत है वही ब्राह्मण का ही बना हुआ है। ऐसा करके वापस आना है। वो ठाकुर का इति इति और यहां पे शरद महाराज जो यहां पर कहते हैं कि भक्ति मार्ग को इति इति दिस आर टू डिफरेंट कांसेप्ट्स। इन दोनों को इक्वल नहीं करना है। यहां पे यह इति इति क्या है? ओरिजिनल जो नेति नेति था ठाकुर का कि नेति नेति करके निर्विकल्प समाधि प्राप्त करनी। यहां पर शरद महाराज का कहते हैं कि इति इति करके भी निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर सकते हैं और फिर वही इति इति करके अब वापस भी आ सकते हैं। यानी कि दो मॉडल हमारे पास में बन गए हैं। एक मॉडल है नेति नेति और निर्विकल्प समाधि और फिर इति इति करके जगत में वापस आना और दूसरा भक्ति का मॉडल है इति इति करके ही निर्विकल्प समाधि प्राप्त करना और फिर वही इति इति के माध्यम से ही जगत में वापस आना जीवन मुक्त होकर के रहना। सो यह ज्ञान का मॉडल है। यह भक्ति का मॉडल है। यह दोनों मॉडल जो है बोथ आर कॉम्प्लीमेंट्री टू ईच अदर। एक्सक्लूसिव नहीं है, ऑोजिट नहीं है। तो भक्ति मार्ग को इति इति साधन पथ बोल के हमने निर्देश किया है। कारण ओ पथर पोथिक जगत अनित्यता प्रत्यक्ष करले वो जगत करता ईश्वर विश्वासी होइया ततृत जगत रूप कार्य शत ओ वर्तमान बोलिया विश्वास करिया थाकेन कारण इति इति पथ का पथिक जगत की अनित्यता को प्रत्यक्ष करके भी जगत्ता ईश्वर पे विश्वासी होकर के ततृत अर्थात कि ईश्वर कृत जगत रूप कार्य सत्य और वर्तमान है बोल के विश्वास करता है। देखिए टिपिकल शरद महाराज किंतु बेसिक कांसेप्ट बड़ा ही सिंपल है। सर्वप्रथम तो इसके पहले ही यह जो पॉइंट हमारा चल रहा है, इसके पहले वाले पॉइंट में शरद महाराज ने वैराग्य को डिफाइन किया है। वैराग्य क्या है? वैराग्य है कि जगत के विषय के जितने भी वस्तु है इन सबका त्याग करना वह है वैराग्य। अभी शरद महाराज वहां पर ही कहते हैं कि वह चाहे ज्ञानी हो ना कि भक्त हो। यह ज्ञान मार्ग हो कि भक्ति साधना हो। कोई भी आपको ऐसा नहीं कहेगा कि विषयों का भोग करके आप ईश्वर को प्राप्त कर सकते हैं। कोई भी ऐसा नहीं कहेगा। यह विषयों के भोग के प्रति विराग या तो त्याग या तो फिर उसके प्रति रनाउंसिएशन प्रत्येक धर्म का होलमार्क कोई भी धर्म आप ले लीजिए वो चाहे इस्लाम हो ना कि क्रिश्चियनिटी हो ना कि जुडाइज्म हो ना कि सिखिज्म हो ना कि जैनिज्म ना बुद्धिज्म ना कि अपना क्लासिकल वैदिक रिलीजन या तो फिर यह शंकराचार्य वाला यह मॉडर्न हिंदूइज़्म। आप जो कोई धर्म को आप ले लीजिए सब धर्म का जो फाउंडेशन है वह आपको अप टू एन एक्सटेंट इंद्रियों के विषयों का त्याग करवाएगा ही करवाएगा इस्लाम में हार्ड कोर मोनेस्टिसिज्म नहीं है किंतु इंद्रियों के विषयों के विमुख होना वह तो आवश्यक है ही है और बुद्धिज्म जो है कि पूरा मोनेस्टिसिज्म के ऊपर में ही बना है। भगवान बुद्ध ही एक साधु थे। अपने रामकृष्ण मिशन में मोनेस्टिसिज्म इज अ कोर किंतु क्या है कि म फॉर्मल मोनेस्टिसिज्म कोर नहीं है। ठाकुर ने सन्यास धारण सन्यास लिया था। सन्यास ग्रहण किया था। किंतु सन्यासियों के बाह्य चिन्ह उन्होंने कभी नहीं रखे। बोलकर के रामकृष्ण संघ में गृहस्थ हो ना कि त्यागी दोनों को इक्वल दृष्टि से देखा जाता है और दोनों के लिए इक्वल सम्मान है। जबकि बुद्धिज्म ओरिजिनली मोनेस्टिक रिलीजन ही था। जो भी आता था सबका सर मुंडा करके वे लोग वो बेखूब बना देते थे। भिखू भिखनी बना देते थे। सो किंतु उसका फिर एक बड़ा डेंजरस इफेक्ट भी हुआ इंडियन सिविलाइजेशन के ऊपर में जो कि हमने काफी बार चर्चा भी की है। तो बेसिकली देखिए कि कोई भी पाथ हो, कोई भी धर्म हो, आध्यात्मिकता का कोई भी रास्ता हो यदि वह जेन्युइन रास्ता है तो वह विषयों के विराग से ही पसार होगा। विषयों का त्याग ही उसके जो फंडामेंटल कांसेप्ट में एक होंगे। किंतु जबकि त्यागी जो है ज्ञान मार्गी जो है वह क्या करता है इन अ वे थ्रोइंग द बेबी अलोंग वि द बाथ वाटर ऐसा एक उसका रहता है वो बाथ टब में एक बच्चे को बिठाया है स्नान करवाने के लिए फिर स्नान हो गया तो पानी जैसा फेंका साथ में बच्चे को ही फेंक दिया तो ऐसा थोड़ा सा त्यागी का एटीट्यूड रहता है कि विषयों का त्याग करना है इंद्रियों के विषयों का त्याग करना है कामिनी कांचन का त्याग करना है तो साथ-साथ में संसार भी त्याग त्याग कर दो। यह जो है थोड़ा सा एक हार्ड कोर एक फनेटिक एटीट्यूड त्यागी का रहता है। और यह एटीट्यूड गलत भी नहीं है। ठाकुर खुद कहते हैं काजल की कोठरी में आप रहेंगे और कहेंगे मुझे काजल नहीं लगा। मुझे काली मां नहीं लगेगी तो ऐसा कहीं संभव है क्या? वह तो काली मां तो लगने ही वाली है। यदि त्याग ठीक-ठीक करना है तो संसार को छोड़ना ही होगा। किंतु थ्योरेटिकली यह थोड़ा सा एक्सट्रीम स्टेप है। थ्योरेटिकली आप कह ही सकते हैं कि मैं संसार में भी रहूंगा और किंतु संसार के भोगों का भीतर में मैं डूबूंगा भी नहीं। तो जैसे राजा जनक ये जो ब्राह्म समाज वाले बार-बार उदाहरण देते हैं कि राजा जनक ने दोनों तलवार घुमाई थी। सन्यास की भी, संसार की भी, त्याग की भी और भक्ति की भी। तो ठाकुर कहते हैं कि भैया उसके लिए राजा जनक ने सर नीचे करके पैर ऊपर करके शीर्षासन में कितनी तपस्या की थी वह पता है तुम लोगों को? तो ठाकुर जैसे कहते हैं पहले से दूध में से मक्खन निकाल लो फिर यह मक्खन को दूध में रखो तो कोई आपत्ति नहीं। किंतु दीज़ आर आप कहेंगे कि दीज़ आर द डिटेल्स। हाईलाइट जो है थ्योरिटिकल हाईलाइट तो यही है कि आपको त्याग करना है तो संसार में भी कर सकते हैं। संसार के विषयों का त्याग करना है नहीं कि संसार का। तो यह थ्योरेटिकल पॉसिबिलिटी इज ऑलवेज देयर। तो यहां पर शरद महाराज यही कहते हैं कि जो त्याग भक्ति मार्ग जब पथिक है जो जो भक्त है वह जगत की अनित्यता का प्रत्यक्ष दर्शन करता तो है किंतु साथ-साथ में यह जगत करता ईश्वर पे उसका इतना विश्वास है कि सृष्टि के संसार की रचना भी तो ईश्वर ने ही की है। कामिनी की रचना भी तो ईश्वर ने ही की है। ये कांचन की रचना धन वैभव ये स्त्री पुरुष इन सबको तो ईश्वर ने ही बनाया है। तो इनके प्रति अपना आकर्षण त्याग करके संसार में रहना है क्योंकि यह संसार ईश्वर की ही सृष्टि है। तो यह कह यह हो गया एक भक्त का थिंकिंग। अभी देखिए इसके बारे में बहुत कुछ कह ही सकते हैं। आप यदि जेनुइन साधक हैं तो इतने सारे साधकों का एक्सपीरियंस हमारे सामने है जो कि हमको ऐसा कहता है कि संसार में रहो और सांसारिक चीजों के प्रति हमारा हमारी वासना न प्रकट हो ऐसा ऑलमोस्ट असंभव है। किंतु खैर थ्योरेटिकली तो यह है। दूसरा कि जो तीव्र वैराग्य सबका होता नहीं है। ईश्वर को अभी का अभी प्राप्त करना है। वह तो सबके लिए पॉसिबल भी नहीं है। ज्यादातर लोगों के लिए 99% लोगों के लिए तो लॉन्ग रोड ही एक लंबा रास्ता ही उचित है फॉलो करना। तो भक्ति मार्ग संसार में भी रहो। सांसारिक चीजों के प्रति भले थोड़ा बहुत आकर्षण रहे किंतु साथ में ईश्वर के प्रति ईश्वर के प्रति श्रद्धा शरणागति आपकी बनी रहे। यह है ज्यादातर 99% लोगों के लिए यही रास्ता है। भक्त जगत और

भक्त सभी में ईश्वर-दर्शन कर सभी को अपना बना लेता है

तन मध्य तन मध्यगो सर्व वस्तु और व्यक्ति के ईश्वर सहित संबंध जुक्त देख्या आपनार कोरियालोन भक्त जगत और उसके भीतर में सर्व वस्तु और व्यक्ति को ईश्वर के साथ में संबंध युक्त देखकर के अपना लेता है। देखिए यह चीज कब संभव है? ओरिजिनल जो ठाकुर का मॉडल है नेति नेति निर्विकल्प समाधि और इति इति एक बार जगत का और जगत के विषयों का संपूर्ण रूप से त्याग किया। इसके बाद में निर्विकल्प समाधि प्राप्त की। यह कैसा हो गया? ठाकुर कहते हैं कि दूध को मंथन करके, दही को मंथन करके मक्खन पहले निकाल लो। फिर उसको वही दही या दूध में वापस रखो तो कोई दिक्कत नहीं। तो नेति नेति करके मंथन करना है। निर्विकल्प समाधि है कि मक्खन तैयार हो गया है। उसका आस्वादन करना है और फिर इति इति कि वही मक्खन को उठा के आप दूध या दही में रखिए तो उसके साथ में मिश्रित नहीं होगा। तो किंतु जैसे ठाकुर ने कहा कि सबको राजा जनक होना है कि संसार में रहकर ईश्वर प्राप्ति करनी है। किंतु राजा जनक ने शीर्षासन करके जो पहले एक बार ईश्वर प्राप्ति कर ली बाद में तो वह संसार में वापस आए। तो यह ठाकुर का एक स्टैंडर्ड मॉडल है। पहले तपस्या कर लेना है और ईश्वर प्राप्ति या आत्म साक्षात्कार कर लेना है। फिर इति इति करके जगत में वापस आना है। किंतु यह जो मॉडल है बहुत ही कम लोग इसको अपना पाते हैं। नेति नेति निर्विकल्प समाधि इति इति यह बहुत ही कहेंगे कि जिसका विल पावर स्ट्रांग है उन्हीं के लिए यह मॉडल है। 99% लोगों के लिए ये इति इति निर्विकल्प समाधि इति इति पहले से ही मान लो स्वीकार कर लो धारणा कर लो कि विश्वास कर लो कि ये जगत और जगत में जो कुछ भी है ईश्वर ने ही बनाया है। ईश्वर ही है। एक तरह से हमको ये इस तरह से दिखता है। यह समुंदर के ऊपर में लहरें दिखती है। लहरें पानी की ही बनी है। अलग से तो नहीं बनी किंतु फिर भी लहरों का शेप अलग-अलग है बोलकर के ये जो नाम रूप रूपी यह है माइक है यह मेरे चश्मे हैं यह मेरे वस्त्र है यह मेरी उंगलियां है यह मैं हूं ये किंतु यह माइक ये ना वस्त्र ना कि मेरे चश्मे ना कि मेरी उंगलियां ना कि मैं सब कुछ ब्रह्मण ही है। बस नाम रूप रूपी मुखौटा पहना है। यह नेम एंड फॉर्म रूपी मास्क पहना है। यही एक डिफरेंस है। तो इति इति निर्विकल्प समाधि और फिर निर्विकल्प समाधि के बाद में ऑब्वियसली आप फिर यदि वापस आते हैं तो काजल की कोठरी में रहकर के भी आपको काजल नहीं लगेगा। तो देखिए और यह जो मार्ग है ना इति इति निर्विकल्प समाधि इति इति इसी के साथ में स्वामी जी का यह निष्काम सेवा का मार्ग भी इसी के साथ में जुड़ा है। आप क्यों लोगों की सेवा करेंगे? साधना के रूप में यह शिव ज्ञान जीव सेवा क्यों करेंगे? यदि मुझे त्याग ही करना है तो मुझे लोगों का सब कुछ त्याग करना है। नेति नेति मार्ग में कुछ भी चाहिए नहीं। वही ठाकुर की फेमस उपमा कि आप काली मंदिर गए तो क्या आप भिखारियों को दान करना शुरू करेंगे ना कि कैसे भी करके धक्कामुक्की करके मां काली का दर्शन कर लेंगे बाद में बाहर आकर के आप दान करेंगे क्लासिक नेति नेति निर्विकल्प समाधि इति इति मॉडल किंतु स्वामी जी कहते हैं कि देखिए जाने से पहले ही यदि बहुत भीड़ होता है वहां पर आप यदि गए होंगे काली घाट देखा होगा भयानक भीड़ होता है तो फिर वही मां काली इन भिख भिखारियों के भीतर में रह रही है। ऐसा विश्वास करके उन भिखारियों की भी यदि आप सेवा करेंगे तो वही मां काली की ही सेवा करना हुआ। वही मां काली की ही आराधना करना हुआ। तो यह इति इति निर्विकल्प समाधि इति इति यह वाला मॉडल है। शिव ज्ञान जीव सेवा वाला मॉडल है। यानी कि यह भक्ति मार्ग और कर्म मार्ग ये दोनों इस वाले मॉडल को फॉलो करते हैं कि आप विश्वास करके डीप यह श्रद्धा रख के अपने भीतर में कि यह जो संसार है ईश्वर की ही सृष्टि है। ईश्वर ही एक रूप से यह सब कुछ बने हुए हैं। और यदि मैं इनकी आराधना करता हूं इनकी सेवा करता हूं। ये चंडाल नारायण ये मूर्ख नारायण दरिद्र नारायण तो वही वो जो वैुंठ में जो नारायण बैठे हैं उनकी उपासना करने के समान ही शिव ज्ञान जीव सेवा का फल है। तो ये क्लासिक इति इति माने ये रामकृष्ण संघ का इति इति निर्विकल्प समाधि इति इति मॉडल तो यहां पे देखिए कि शरद महाराज कहते हैं कि भक्त जगत और जगत के भीतर में सर्व वस्तु और व्यक्ति को ईश्वर के साथ में संबंध युक्त देख करके आपनार कोियालोन अपना लेता है। अपना कर लेता है। देखिए यह जो आपनार कोरियालोन यह कितना बड़ा शस यह इसके भीतर में पावर है। ये इसको हम जो बीच-बीच में महावाक्य कहते हैं, यह भी एक महावाक्य है। यह मां की जितनी भी कहानियां पढ़ेंगे, कल यहां पर मुझे मंदिर में बोलना था, तो मैंने वही जितन महाराज की कहानी विशुद्धानंद जी की कहानी कही थी। तो यहां पर भी मैंने कही है कि जितन महाराज एक जयराम भाटी गए जा रहे हैं। पहले तो सब ने डिसरेज ही किया है। विशुद्धानंद जी तो हमारे एट्थ प्रेसिडेंट थे आठवें प्रेसिडेंट रामकृष्ण संघ के तो उस समय तो वह स्टूडेंट ही थे। तो जय राम भाटी जाने को सोच बैठे हैं। सब लोग मना कर रहे हैं। मत जाओ मत जाओ। क्यों जा रहे हो जय राम भाटी? रास्ता बड़ा दुर्गम है। डकैत का भय है। और दूसरा कि यह जो रेवोल्यूशनरी लोगों के प्रति यह जो सीआईडी की जो नजर है बड़ी तीक्ष्ण है। तुम वहां पर जाओगे पता नहीं वे लोग सीआईडी वाले तो बीच-बीच में आके वो मां को पूछते हैं मां वहां पे कि आपके घर में कौन-कौन बाहर से आकर रह रहा है। माने एक अरेस्टमेंट जैसा चलता ही था। क्वालपाड़ा में भी होता था। जयराम भाटी में भी होता था। एक भक्त मां का तो एक उस समय के एक बड़े पुलिस ऑफिसर को ले आया जय राम भाटी। तो मां खुद इसका वर्णन करती है। यह जो बहुत बड़ा पुलिस ऑफिसर है तो और छोटे से देहाती गांव में आया है तो उसका तो घमंड देखो तो जूते पहन कर के ही मां के घर का वो जो वो वरांडा है उसके ऊपर में चढ़ गया। जूते पहन के टहल रहा है। अभी जो भक्त इस पुलिस ऑफिसर को ले आया था वह मां को सुना जैसे मां सुने इस तरह से वो पुलिस ऑफिसर की प्रशंसा कर रहा है कि अरे सर आप तो बहुत बड़े हैं। आप तो बड़े ग्रेट है ये ये करके आमा के सुनाए और प्रशंसा कर रहा है। आमा के सुनी और प्रशंसा कर रहा है। मुझे सुनाते सुनाते वो उसकी प्रशंसा कर रहा था। मां कहती है। इसके बाद में ये पुलिस ऑफिसर किंतु देखिए वो भक्त जो जितना भी चमचागिरी करता हो पुलिस ऑफिसर के भीतर में थोड़ा तो सत्व था। उसने बड़ी विनम्रता से मां को पूछा कि मां ये जो पुलिस वाले आते हैं यहां पे और सबके नाम लिख के जाते हैं कि कोई लड़का कोलकाता से आया है तो वो रेवोल्यूशनरी है कि नहीं? क्रांतिकारी है कि नहीं वगैरह। तो आपको क्या इससे डर तो नहीं लगता ना? तो ये भक्त जो है वो पहले ही बोल उठा। अरे मां को किस बात का डर तो जगत जननी स्वयं ये वो वो सब तो मां किंतु उसको काट के भक्त को बीच में काट के कहती है कि हां बाबा खूब भय होए हां बेटा बहुत डर लगता है तो मां तो बाली का भाव था ना एक और जगत जननी दूसरी ओर बाली का भाव तो मां कहती है बहुत डर लगता है जब पुलिस वाले आते हैं तो ये पुलिस ऑफिसर बड़ा विनम्र होकर कहता है नहीं मां अब फिर से आप डर मत कीजिएगा वे लोग आपको ज्यादा हैरेस नहीं करेंगे देखिए उन लोगों को अपना काम करना है पुलिस वालों को। ऐसा नहीं है कि वह पुलिस ऑफिसर आया बोल के वो वहां के पुलिस वाले आकर के जो भी कोलकाता से आते हैं उसका नाम पता ना लिखे ऐसा नहीं होगा। किंतु ऐसा भरोसा देकर गया है कि मां को हैरेस नहीं करेंगे। जो गेस्ट आए उन्हीं को हैरेस करेंगे। तो ऐसा वो भी एक है। जितन महाराज गए हैं। तो पुलिस वाले भी हैरेस कर सकते हैं कि ये क्रांतिकारी है। उस समय के तो क्रांतिकारी सब स्वामी जी से प्रभावित थे। तो वही तो क्रांतिकारी जो स्वामी जी से प्रभावित थे वह मां को दर्शन करने को जाएंगे। तो यह एक डर है। तो जितन महाराज रास्ते में सोच रहे हैं कि यदि कोई जाकर के मुझे इंट्रोड्यूस करवाए तो बहुत अच्छा रहेगा। मां को बताएं कि मां यह लड़का है आपका भक्त है। डिवोटी है कोलकाता से आया है। तो आपका दर्शन करना आपसे दीक्षा लेना चाहता है। कोई ऐसा इंट्रोड्यूस करवाए तो तो मां मेरे पर विश्वास करेगी ना। वरना आप किसी अनजाने के कोई अनजाना आपके घर में आता है तो हम कैसे रिएक्ट करेंगे? सबसे पहला प्रश्न क्या करेंगे कि कौन हो तुम? कहां से आए हो? क्या काम है? वही तो प्रश्न करेंगे। तो ऐसी आशंका मन में रख के जितन महाराज वो वहां पर गए। देखिए एक्सपेक्टेशन क्या था? कि मां पूछेगी कौन हो? कहां से आए हो? अभी मैं कल मंदिर में बोल रहा था तो इंग्लिश में बोल रहा था। तो मैंने कहा इंग्लिश में के फर्स्ट एक्सपेक्टेशन क्या था कि हु आर यू डब्ल्यू एचओ हु आर यू किंतु ऐसा नहीं होके जैसे ही जितन महाराज ने मां का दर्शन किया मां ने कहा कि हाउ आर यू एच ओ डब्ल्यू हाउ आर यू नहीं कि हु आर यू बोले हाउ आर यू कैसे हो बेटा के आो बाबा भो आो तो यात्रा कोो म समस्या हो नहीं तो मने अच्छे हो तो बेटा कोई समस्या तो नहीं हुई तो बैठो यहां पे बैठो तुम्हारे लिए कुछ खाना लाती हूं। तो जितन महाराज कहते हैं कि ऐसा नहीं पूछा कि कौन हो? कहां से आए हो? पूछती है मां कि कैसे हो? क्या अच्छे हो तो कि नहीं? माने एक मां जब अपने घर अपना खुद का बच्चा आता है तो किस तरह से उसको आकार करती है। उसको स्वागत करती है। उसको स्नेह करती है। वैसे ही मां ने मेरे साथ में किया। जितन महाराज कहते हैं मैं पूरा अभिभूत हो गया। मां की करुणा के बारे में सुना था किंतु यह प्रत्यक्ष प्रमाण मिला। तो देखिए यह जगत को अपना लेना है। देखिए भक्त जगत और जगत के भीतर में सर्व वस्तु और व्यक्ति को ईश्वर के साथ में संबंध युक्त देख के आपनार कोरियालोन अपना लेता है। अपना बना लेता है। तो देखिए कि यह जो

त्याग के मार्ग पर चलकर भी यदि हृदय में विद्वेष हो, तो इससे बुरा और कुछ नहीं

इति इति निर्विकल्प समाधि इति इति यह एक रास्ता है। भक्त देखता है कि सभी के भीतर में ईश्वर ही बसे हुए हैं। कर्म योगी है वह देखता है कि वही नारायण जो वैुंठ में है यही नारायण यहां पर दरिद्र नारायण होकर के विराज कर रहे हैं। यहां पर चंडाल नारायण होकर के विराज कर रहे हैं। और इनकी सेवा वही नारायण की उपासना के ही समान है। तो देखिए कि यह इति इति वाला मार्ग जो है इति इति निर्विकल्प समाधि इति इति यह जो मार्ग है वह हमारे लिए सहज मार्ग है। ज्यादातर लोगों के लिए सहज मार्ग है। कुछ चंद मुट्ठी भर लोग हैं कि जिनके लिए यह नेति नेति निर्विकल्प समाधि इति इति वाला मॉडल काम करेगा कि प्रचंड त्याग शुरू में ही सब विषयों के जितने भी यह है इंद्रियों के जितने भी विषय है संपूर्ण रूप से उसको त्याग करो और फिर विध्वत सन्यास ग्रहण करो निर्विकल्प समाधि प्राप्त करो और फिर जगत में वापस आओ इवन हम लोग भी रामकृष्ण संग संघ के साधु भी हम लोग भी अपने को यह नेति नेति वाला मार्ग पे एलिजिबल नहीं सोचते हैं। हम सबके लिए आज जो भी रामकृष्ण संघ के साथ में जुड़ा हुआ है वो त्यागी हो ना कि संसारी हो सन्यासी हो ना कि गृहस्थ हो हम सबके लिए यह इति इति निर्विकल्प समाधि इति इति यही मॉडल है। बस वही है कि हम लोग जो है त्याग को थोड़ा सा ज्यादा प्राधान्य देते हैं और गृहस्थ जो है त्याग को थोड़ा सा कम प्राधान्य देते हैं। बस इतना ही है। तो किंतु यह जगत को त्याग करना संपूर्ण रूप से इसके साथ में अपने मन को विच्छेद कर देना यह तो कहीं किसी के भी लिए संभव नहीं है। मैंने कहां पे यह पढ़ा था? आई थिंक स्वामी जी में ही पढ़ा था कि भूल गया तो जो भी है कोई गया था हिमालय में देखा कि वहां पे एक साधु रहता है गुफा में तो गुफा के चारों ओर यह जो मनुष्य की हड्डियां बिखर के स्प्रेड करके रख दी है। तो अभी आप किसी साधु की गुफा में जाएंगे हिमालय में कहीं निर्जन जगह पे और सामने देखेंगे कि मनुष्य की हड्डियां बिखरी पड़ी है तो आपके मन में सबसे पहले क्या बात आएगी कि या तो नर भक्षी साधु है आदमी को मार करके खा जाता है तो ऐसा सोच करके वे लोग भाग खड़े होंगे वो भैरव ना कि तांत्रिक वहां पर रहता है किंतु ऐसा कुछ नहीं गुफा में जो रहते हैं उनको एकांत चाहिए उनको परेशान करने वाला कोई नहीं चाहिए जाकर के कि साधु बाबा जी आप अभी कि हमारा संसार का यह दुख दूर कर दीजिए। वह दुख दूर कर दीजिए। यह बीमारी का दवाई दे दीजिए। वगैरह-वगैरह ठाकुर कहते हैं ना मैंने यदि दवाई देना शुरू किया होता तो यहां पे एक बहुत बड़ा हस्पताल हो जाता। तो देखिए कि इस तरह से लोग आकर के परेशान ना करें। बोलकर के तो यह हिमालय गए। अभी हिमालय भी जाकर के लोग यदि परेशान करें तो गुफा के आसपास में यह मनुष्यों की हड्डियां बिखर करके रख दी है। जैसे कि कोई जाकर यही सोचे कि कोई महा भयानक भैरव ना कि ऐसा ही कोई तांत्रिक यहां पर रहता है। तो देखिए कि वो भी एक रास्ता है। जगत के साथ में संपूर्ण रूप से संबंध विच्छेद कर देना। अभी जस्ट कुछ दिन पहले यह जो बोधि धर्म उसके उसके बारे में मैं पढ़ रहा था। भारत से ये जो बुद्धिज्म बौद्ध धर्म को जो चाइना में ले गया था उसके पहले भी कुछ लोग गए थे किंतु इसका नाम काफी प्रोमिनेंट है तो एक जगह पे बैठ एक गुफा में बैठकर के एक दीवार के सामने देखता रहता है अपनी पीठ गुफा के दरवाजा जो है गुफा का जो गेट है माने ओपनिंग है उसकी ओर अपना पीठ करके पीछे की ओर घूम करके यह जो गुफा की दीवार है उसके सामने वह देखता रहता है एक जगह जगह पर बैठकर के 9 साल तक देखिए कि 9 साल तक एक दीवाल के सामने देखते रहना यानी कि आपका मन आपका बुद्धि चित्त अहंकार संस्कार सबको किस हद तक काट दिया होगा तब कहीं जाकर कि ऐसा संभव है। और फिर कहा जाता है कि आज का जो जैन बुद्धिज्म है उस उसका प्रवर्तन इसी ने किया है। ही इज़ द फर्स्ट पेट्रियर। तो देखिए कि यह भी एक रास्ता है कि आप संपूर्ण रूप से जगत से अपने को विच्छेद कर देते हैं। संपूर्ण रूप से जगत का त्याग कर देते हैं और कहीं गुफा में जाकर के नहीं ऐसा करके आप बैठ जाते हैं। वाल्य वालियो लुटारो वाल्मीकि ऋषि की कहानी वही है कि लुटारा थे और फिर लोगों को लूटते थे। नारद मुनि को लूटने गए तो नारद मुनि ने कहा किन के लिए पाप कर रहे हो? तो कहा हमारे मां पिताजी के लिए तो जाकर पूछ के आओ तुम्हारे पाप में वह हिस्सेदार होंगे कि नहीं तो पूछने को गए तो मना कर दिया कि हमको खिलाना तुम्हारा धर्म है यदि खिलाने के लिए तुम पाप करते हो तो पाप तो तुम ही को लगेगा उससे हमको क्या है तो उसको वैराग्य हो गया लुटारे को और वह ऋषि बनकर के तपस्या कर रहा है। कितनी तपस्या की कि सर के ऊपर में जटा झूठ बंध गई और उनके ऊपर में कि चींटियों ने अपना पूरा घर बना लिया। तो देखिए कि एक जगह पर बैठकर के इतना स्थिर होकर के बैठना जगत के साथ में इस तरह से विच्छेद कर देना कि आपके ऊपर में चींटियां अपना दर बना दे तो देखिए कि वह भी एक रास्ता है किंतु पूरे विश्व में चंद गिनेचुने लोग हैं जो कि संपूर्ण रूप से अपने को जगत से विच्छेद कर सकते हैं। जगत का त्याग कर सकते हैं। ज्यादातर लोग इंक्लूडिंग जो रामकृष्ण संघ के साधु हैं हम लोग जगत का त्याग करना ऐसा सोचते नहीं है। हम लोग सोचते हैं कि कामिनी कांचन का त्याग करना है। जगत के जो इंद्रियों के विषय जो है जो कि यह जगत हमको ऑफर कर रहा है इसका त्याग करना है और जगत में रहकर के जगत की सेवा करनी है। तो यह जो है इति इति निर्विकल्प समाधि इति इति यह रास्ता हम सबके लिए है। आज बस वही है त्यागी लोगों के लिए त्याग का महिमा विशेष रूप से है। जबकि गृहस्थ लोगों के लिए भक्ति का महिमा विशेष रूप से है। अदरवाइज इसी जगत में रहना है। जगत ईश्वर का ही बना हुआ है। ईश्वर सहित संबंध युक्त ईश्वर के साथ में संबंध युक्त है। देख के अपनार करिया लोन अपना लेना है अपना बना देना है तो देखिए हृदय ओपन होना चाहिए हृदय के भीतर में लोगों के प्रति करुणा होनी चाहिए जो पापी तापी जिनका जो हमारे से अनफॉर्चूनेट है जो हमारे से निम्न कक्षा के उनके प्रति हमारी करुणा होनी चाहिए दोनों ओर से जगत में सभी के प्रति सहानुभूति होनी चाहिए और जो हम जो लोग अह लेस फ़ॉर्चूनेट है हमसे उनके प्रति यह करुणा तो होनी ही चाहिए। तो यह सहानुभूति और करुणा जो जैसे योग शास्त्र में कहा है चित्त प्रसाद मैत्री करुणा मुदिता उपेक्षा जो हमारे समकक्ष है उनके साथ में मैत्री होनी चाहिए। जो जो हमारे से लेस फॉर्चूनेट है उनके प्रति करुणा होनी चाहिए। हमारे से ज्यादा फॉरर्चूनेट है उनके प्रति मुदिता अर्थात कि ईर्ष्या का अभाव होना चाहिए और जो हमारे दुश्मन है उनके प्रति उपेक्षा का भाव रखना है तो यह चार है चित्त प्रसाद मैत्री करुणा मुदिता उपेक्षा तो यह जगत ईश्वर का ही बना है सभी के भीतर में ईश्वर है ऐसा समझ करके स्वीकार करके हृदय जो है अपना समुंदर की तरह हो जाना चाहिए हमारे भीतर में से जितना भी द्वेष है, जितना भी कटु भाव है, जितना भी ईर्ष्या है, जितना भी क्रोध है, जितना भी लोगों के प्रति विद्वेष भाव है, वह सबको काट देना है। जैसा ही लोगों के प्रति मेरे मन में विद्वेष रहा, मैं साधन पथ में आगे बढ़ने के लिए बिल्कुल ही डिसक्वालीफाई हो गया हूं। आप वह नेति वाला पाथ में चल रहा हूं। ऐसा वो जो अपने माइंड में सोच के बैठे हैं कि लोगों के प्रति मुझे विद्वेष पैदा करना है क्योंकि मैं नेति नेति मार्ग का पथिक हूं। इस तरह के लोग साधकों को मैंने देखा है। देखा है और यह भी देखा है कि कैसे वह मुंह के बल गिरते हैं। कैसा भगवान वही ठाकुर उनको डंडा मारते हैं। ऐसा मैंने स्पष्ट रूप से देखा है। लोगों के प्रति विद्वेष रखना और यह भीतर भीतर में घमंड रखना कि मैं तो त्याग के मार्ग का पथिक हूं। लोगों के साथ में मेरा क्या लेना देना है? इस तरह के लोग बार-बार साधन पथ में गिरते हैं। मुंह के बल गिरते हैं और ठाकुर इनको कभी भी सिद्धि प्राप्त नहीं होने देंगे। वो नेति नेति मार्ग ही अलग है। उस ये जो वराह नगर मठ की तपस्या स्वामी जी क्या कहते हैं? भूत भी भाग जाता वहां से। ऐसी तपस्या हम लोग करते थे। तो ऐसी तपस्या का 1% भी करने का कैपेसिटी नहीं और फिर लोगों के प्रति विद्वेष रखना कि आई एम सुपीरियर टू देम। मैं साधक हूं। मैं त्यागी हूं और वे लोग जो है किसी काम के नहीं। तो ऐसे लोगों का आध्यात्मिक जगत में कभी कुछ होने वाला नहीं। हृदय विशाल हो जाना चाहिए। सबके प्रति करुणा रखनी है। पापी तापी चंडाल नारायण जो भी है वही फेमस घटना स्वामी जी का फेमस रिप्लाई ठाकुर की जन्मतिथि अभी दक्षिणेश्वर में सेलिब्रेट होने वाली है। स्वामी जी अमेरिका गए हैं। स्वामी जी वर्ल्ड फेमस हो चुके हैं। तो ठाकुर की तिथि पूजा का सेलिब्रेशन अभी तो बहुत बड़े पैमाने पर होना है। तो ऐसा चल रहा है पूरा आयोजन और यह तथाकथित भद्र लोग यह जो जेंटलमैनली पीपल वह एक एक था एक भद्र लोग उसने स्वामी जी को लेटर लिखा कि हम तो जाना चाहते हैं हमारे घर की स्त्रियों को लेकर के किंतु जाना नहीं जाएंगे नहीं क्यों क्योंकि वहां पर वैश्याएं आती है दक्षिणेश्वर में तो स्वामी जी कहते हैं कि आप लोगों को जाने की कोई जरूरत नहीं है। ठाकुर आए ही है उन लोगों के लिए जिन लोगों का चरित्र अच्छा नहीं तथाकथित ऐसे लोगों के लिए ही ठाकुर आए हैं या आप लोगों के लिए ठाकुर नहीं आए आप मत जाइए आप घर में ही बैठे रहिए तो देखिए कि मैं शुद्ध हूं पवित्र हूं दूसरे निम्न चरित्र के हैं। मैं त्यागी हूं मैं साधक हूं। दूसरे लोग निकम में है। यह घमंड जो है जैसे ही भीतर में प्रकट हुआ और हम लोग सोच रहे हैं कि नेति नेति मार्ग में चल रहा हूं। मैं त्यागी हूं। मैं ज्ञानी हूं। मेरे में यह उपनिषद का पाठ करता हूं। उपनिषद स्टडी करता हूं। लोगों के प्रति विद्वेष तो कुछ होने वाला नहीं। ये खिचड़ी जो हमारे मन में बैठ गई ना कॉनसेप्चुअल खिचड़ी ये इसकी वजह से यह सब होता है। सही-सही नेति नेति मार्ग, सही-सही उपनिषद का मार्ग, सही-सही ज्ञान और विवेक का मार्ग वो आप जो तपस्या करनी होती है उस रास्ते पे। भूत भी भाग जाएंगे। ऐसी तपस्या करनी है तो वह नहीं। सब तरह के कंफर्ट से अपने को घिर के रखना है और घमंड दिखाना है। ज्ञानी का गृहस्थ के सब कंफर्ट भोग करना है और घमंड रखना है ज्ञानी का तो ऐसा तो होने वाला नहीं इसलिए झूठमठ का कॉनसेप्चुअल कंफ्यूजन लेकर के कॉनसेप्चुअल मिसअंडरस्टैंडिंग ले नहीं रहना है आज जितने भी रामकृष्ण के फॉलोअ है रामकृष्ण संघ के मेंबर्स हैं सभी लोग यह इति इति मार्ग वाले ही है नेति नेति वाला कोई नहीं है बस वही है कि हम त्यागी लोग हैं तो त्यागी के जीवन में यह त्याग का महात्म्य ज्यादा है। जिन्होंने सन्यास का मार्ग लिया है, उनके जीवन में त्याग का प्राधान्य है। जिन्होंने गृहस्थ आश्रम का मार्ग लिया है, उनके जीवन में भक्ति का प्राधान्य है। बस इतना ही इससे ज्यादा बड़ा और कोई डिफरेंस नहीं है। ऐसा घमंड बिल्कुल किसी को नहीं कर लेना है। मैंने यह सिर्फ मैं त्यागियों के बारे में नहीं कह रहा। गृहस्थ के बारे में भी ऐसा कहता हूं। कोई कोई आश्रम में देखा है बहुत सालों से कुछ-कछ भक्त आते हैं और आते हैं इतने सालों से तो उनके मन में घमंड एक ऐसा बैठ जाता है कि आजकल के ये जो नए-नए साधु ब्रह्मचारी आए हैं उससे तो कहीं ज्यादा हमारी तपस्या है तो मुझे लिटरली किसी ने कहा कि आपका जन्म होने से पहले मैं इस आश्रम में आ रहा हूं। तो मैंने कहा अच्छा तो ठाकुर के और ज्यादा नजदीक आप पहुंच गए। अच्छी तो बात है किंतु मुझे लगता नहीं कि यह सेंटेंस बोलने के बाद में आप कहां उतना ऊपर से कितना नीचे गिरेंगे। तो देखिए कि यह घमंड जैसे भी अपने मन में प्रकट हुआ कि मैं त्यागी हूं। मैं ज्यादा पवित्र हूं और दूसरे लोग निकम्मे हैं। अपवित्र है। किसी काम के नहीं है। साथ में ही हम हजार स्टेप्स नीचे आकर के गिरेंगे। इसलिए हृदय को उदार बनाना। आध्यात्मिक जीवन का सर्वप्रथम लक्षण ही यही होना चाहिए। एक उदार हृदय लोगों के प्रति सहानुभूति अनुकंपा करुणा सह हृदयता यदि अपना हृदय बंद हो गया है। लोगों के प्रति विद्वेष है तो समझ लीजिए कि हमारा उर्ध्वगति नहीं अधोगति ही हो रहा है। इसके बाद का भी हम नेक्स्ट क्लास में। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: एक ओर ठाकुर का वचन कि “मैं दवाएँ देने लगता तो दक्षिणेश्वर अस्पताल बन जाता”; दूसरी ओर रामकृष्ण मिशन हर ओर अस्पताल खोल रहा है—यह कितना अद्भुत विरोधाभास है। इसी कारण, राष्ट्रनिर्माण के स्तर पर स्वामीजी का मार्ग ही हमारा पथ होना चाहिए।

किंतु यहां पे यह भी एक अनफॉर्चूनेट फैक्ट है ना कि ठाकुर जो प्योर नीति नीति मार्ग पर चल के जिस लेवल पर पहुंचे थे हम लोग हॉस्पिटल चला के उस लेवल पर पहुंचने की कोई अपेक्षा नहीं रख सकता। सो दैट इज आल्सो ए अनफॉर्चूनेट फैक्ट ऑफ बेसिकली क्या है कि अपना लिमिटेशन है। हम लोग ठाकुर के जैसे होने को जाएंगे तो हरीश जैसी दशा हो जाएगी। हरीश कैसे पागल हो गया था। हम लोग भी पागल हो जाएंगे। हमको यह अपनी लिमिटेशन स्वीकार करके विद इन दैट लिमिटेशन जो मैक्सिमम हो सकता है वो करना है। सो दैट इज व्हाई स्वामी जी ने यह पाथ दिखाया। गुरु भाई जैसे गुरु भाइयों ने प्योरली उस पाथ को फॉलो नहीं किया। देखिए वो संघ होकर के रहे थे। अकेले नहीं रहे थे। ठाकुर खुद क्या कभी ऐसा होते हैं कि ठाकुर के वो जो दो गुरु भाई थे चंद्र और गिरिजा वो भैरवी ब्राह्मणी के दूसरे दो शिष्य वो तीनों लोग साथ में रहे हो संभव ही नहीं है। ठाकुर अकेले ही रहने वाले थे क्योंकि उनकी वो कैपेसिटी थी। सो गुरु भाइयों की तक वो कैपेसिटी नहीं थी कि अकेले रह के साधना करके वो करें प्राप्त। सो किंतु देखिए शिव ज्ञान जीव सेवा को वराह नगर मठ के दिनों में तो उतना वो मतलब एप्लीकेशन नहीं हुआ था। वो बाद में हुआ था। इफ वी टेक वराह नगर मठ एस एन आइडियल फॉर मोनेस्टिक्स। सो इवन देन इट वाज़ नॉट अप टू द आइडियल ऑफ़ ठाकुर माने अप टू द पावर ऑफ ठाकुर ठाकुर की जो कैपेसिटी थी तपस्या करने की साधना करने की वो भी तो इन लोगों में नहीं थी। सो अपने संघ का जो हाईएस्ट आइडियल जो आज माना जाता है वराह नगर मठ वहां पर यह कैपेसिटी नहीं थी ठाकुर के रास्ते को फॉलो करने की आज हम किस खेत की मूली

प्रश्न: क्या हम "नेति नेति" और "इति इति" का समन्वय कर रहे है अपनी साधन पद्धति में?

नेति नेति इज अ कॉमोनेंट ऑफ इति त्याग जो है इज अ पार्ट एंड पार्सल ऑफ भक्ति मार्ग ज्ञान भक्ति कर्म ध्यान यह जो अपना लोगो है सो ये कॉम्बिनेशन ऑफ फोर योगास दैट इज इज़ आवर पाथ टुडे। सो इसको हम इति कह ही सकते हैं। इति इति वि ये जो कहते हैं ना कैपिटलिज्म विद चाइनीस कैरेक्टरिस्टिक। सो ये नेति नेति विद इति कर कैरेक्टरिस्टिक है।

प्रश्न: अर्थात हमारा मार्ग 100% "नेति नेति" वाला नहीं, ठीक?

हो भी नहीं सकता है। इंपॉसिबल। बाल ब्रह्मचर्य कभी भी वीर्यपात ना हुआ हो। कौन कह सकता है? कौन आज साहस करेगा ऐसा क्लेम करने का? वो ठाकुर ही कर सकते हैं।

प्रश्न: आपने आध्यात्मिक जीवन में पतन की बात कही। Deepak Chopra जैसे व्यक्ति, जो वेदांत पर विस्तृत लेखन करते हैं, उनका नाम भी Epstein files में सामने आया। तो वेदांत से उन्हें वास्तविक आध्यात्मिक विकास क्या मिला? दूसरा, हम जो साधक हैं—हमारा कितना विकास हो रहा है, इसका measurement क्या है? और क्या ऐसे कोई early warning system हैं, जो हमें बता सकें कि हम पतन की ओर जा रहे हैं?

देखिए ट्रेडिशनल तो जो माइल ये जो कहते हैं ना माइलस्टोन ट्रेडिशनल माइलस्टोन तो बड़ा ही क्लियर है त्याग। जितना आपका मन भीतर से ही त्याग की ओर जाएगा। जितना मन विषयों से दूर होता जाएगा आप समझ ही पाएंगे कि यह विषय की ओर मेरा आकर्षण था अभी नहीं है। सो दैट इज द परफेक्ट यू कैन से अ यू कैन से अ मेजरमेंट यूनिट कि आप माइलस्टोन है कि आप मेजर कर सकते हैं। बट दिस इज़ फिर भी ये तो है ही है। परफेक्ट ही है। सेकेंडरी जैसे अभी शरद महाराज कहते हैं सबको अपना लेना है। यह जो हृदय जो विशाल होता है, दूसरों के प्रति द्वेष जितना खत्म होगा, दूसरों के प्रति सहानुभूति जितनी बढ़ती जाएगी, उतना ही देखेंगे कि आप स्पिरिचुअल लाइफ में आगे बढ़ रहे हैं। और मेरी दृष्टि से हमारे लिए यह मच मोर रिलेवेंट है। क्योंकि त्याग जो है ना इट रिक्वायर्स लॉन्ग पीरियड ऑफ टाइम फॉर इट टू शो इट्स इफेक्ट। तो 10 साल माने पहले 10 साल में यहां तक पहुंचे। फिर दूसरे 10 साल में यहां पर पहुंचे। माने वो डिकेड लेवल पे वो मेजरमेंट मूव होता है। जबकि ये जो हृदय की उदारता है ना ओवर ए पीरियड ऑफ टाइम म विद इन इयर्स यू कैन मेजर कि हां मेरा भीतर में देखिए मैं मेरे खुद की बात बताता हूं। मैंने आपको पहले भी यह मेरा रांची वाला उदाहरण पहले भी बताया है। माने हु कैन बी मोर सेल्फलेस देन आई एम घर छोड़कर के संघ छोड़कर के मैं रांची में गया हूं। मेरे जितना सेल्फलेस कौन हो सकता है? एट द सेम टाइम यह जो गांव वालों की स्टाफ वालों की छोटी-छोटी मिस्टेक पर मैं बड़ा ही क्रोधित हो जाता था और मैं सब समय सोचता हूं अरे मैं इतना त्याग करके यहां पे आया हूं। उनको कुछ नहीं करना है। सिर्फ इतना करना है फिर भी नहीं कर पाते हैं। तो मैं उसी टाइम में समझ गया था कि यह ठीक नहीं हो रहा है। मैं लोगों की सेवा करने को आया हूं। यदि मेरे भीतर में क्रोध है दिस इज नॉट गुड। माने मेरे लिए भी ठीक नहीं है। उन लोगों के लिए भी शायद इवेंचुअली ठीक नहीं होगा। मैंने वो डॉक्टर का उदाहरण दिया था ना 20 साल उसने काम किया फिर हमको छोड़कर के एक एनजीओ में जाकर डायरेक्टर हो गया और पैसों के लिए झूठ-मूठ का रिपोर्ट बनाता है। तो देखिए कि एट वन पॉइंट यदि करुणा भी है ना हृदय में विशालता ये सब नहीं आएगी तो ये टॉक्सिक हो जा सकती है। सो मेरी दृष्टि से दिस इज मच मोर रिलेवेंट मच नियरर मेजरमेंट यूनिट हृदय विशाल होना चाहिए। लोगों के प्रति जो विद्वेष है ना उसको कम होना चाहिए। और फिर इस मेजरमेंट यूनिट को आप दूसरों के प्रति अप्लाई कीजिए। फटाक करके आपको समझ में आएगा कौन कहां पे है। अब किस कौन कितना त्यागी है वो तो वही जानता है। ठाकुर जानता है। अब जैसे ये सब जितना खुल रहा है उतना पता चल रहा है। पेंडोरास बॉक्स जितना खुलता है और अमेरिका तो फिर भी डेमोक्रेसी इतना आया है बाहर। यहां पे कितना होगा भगवान जाने। तो क्या है कि वो तो आप जानते हैं ठाकुर जानते हैं। किंतु हमको दिख क्या रहा है कि लोगों के प्रति सहानुभूति कितनी है देखिए माया और आकर्षण नहीं एक मेरे जो फेवरेट लोग हैं उनके प्रति तो मेरा बड़ा ये प्रेम है किंतु बाकी सब मैं मैं एक आश्रम में जाता था एक भक्त मुझे कहते थे कि देखिए महाराज मुझे ऐसा एक अनुभव हुआ कि एक वो मेरे साथ में सब समय विद्वेष रखते हैं तो मुझे बहुत बुरा लगा था। मैंने कहा उनका नेचर ही ऐसा होगा। तो बोला नहीं नहीं नहीं वो जो है उनका एक फेवरेट ग्रुप है। उस ग्रुप में मैं नहीं था बोल के मेरे साथ ऐसा करते थे। तो मैंने कहा अभी क्या बोलना है इसके बारे में? तो म आपके फेवरेट है उनके प्रति आपका ये है। दैट इज ना सबके प्रति आपका एक समान सहानुभूति। दैट इज द कि वन मेजरमेंट यू कैन एक्चुअली मेजर।

प्रश्न: बहुत से लोग शिकायत करते हैं कि उन्हें हर तरफ से धोखा मिला है। तब मन में आता है—कभी अपने आप को भी देखा है? इस लिए में पूछता हूँ - क्या कोई external help है, जिससे हम जान सकें कि हमने कितना आध्यात्मिक विकास किया है?

देखिए स्वाध्याय इसीलिए है ना यह क्लास ये स्वाध्याय ये आत्म सेल्फ रिफ्लेक्शन आत्मचिंतन ये हुए तो सभी इसी के लिए है कि इवेंचुअली हम किसी दलदल में ना फंस जाए। आपने जैसा कहा वो एकदम ठीक कहा। देखिए मैं खुद एक एट वन पॉइंट में यह सोच रहा था कि यह भी बुरा है, वह भी बुरा है, यह भी बुरा है। किंतु ऑफ कोर्स कि मैं तो ठाकुर मां स्वामी जी को पढ़ रहा हूं। बोल के मेरे में इतना तो अकल है कि उन्हीं के भीतर में वही ब्राह्मण है जो कि मेरे भीतर में है। तो हाउ कैन एवरीवन बी रॉन्ग एंड ओनली आई एम राइट? तो फिर मैं अपने को कोर्स करेक्शन करने लगता हूं। सो स्वाध्याय आत्मचिंतन देखिए जो आप अध्यात्म मार्ग के पथिक हैं ना तो आपके लिए कोई एक्सक्यूज नहीं है। आप घोर संसारी है तो आप एक एक इंजर्ड माइंडसेट माने सो क्या कहते हैं वो आजकल वो कहते हैं ना वो एक पॉलिटिकल टर्म है। मैं भूल गया। पॉलिटिक्स ऑफ ग्रीवेंस माने कि है ना कि मेरे साथ में अन्याय हुआ है। अन्याय का बदला मुझे लेना है। दैट इज सॉर्ट ऑफ अ पॉलिटिक्स आज पॉलिटिक्स ऑफ आउटरेज एंड पॉलिटिक्स ऑफ़ ग्रीवेंस। तो आप पॉलिटिशियन है वो तो कि मैं तो दैट इज वन मैटर। इफ यू आर अ साधक देन यू हैव नो एक्सक्यूज। मैं मैं लिटरली ऐसा एक पहचानता हूं एक साधक को कि मुझे कहता है कि मैं ठाकुर के पास जाकर रोता हूं। तो आपको लगेगा यह कितना बड़ा साधक है। किंतु ठाकुर के पास जाकर रोते क्यों हैं कि सभी लोग इतना अन्याय कर रहे हैं किंतु मुझे इससे मुझे तुम बचा लो। तो थोड़ा सा अपनी ओर भी देख लो कि भाई ना देखिए गिरीश का सबसे बड़ा था कि वो जो एक इनफोरिटी कॉम्प्लेक्स उसमें नहीं था कि मेरे पॉलिटिक्स ऑफ ग्रीवेंस कि कि मेरे साथ में अन्याय हो रहा है तो मुझे उसका बदला लेना है उस तरह का कुछ नहीं था। अभी जस्ट आज मैं वो एक इकोनॉमिस्ट में एक आर्टिकल पढ़ रहा था ये एस्टेन के ही बारे में कि देखिए दो लोगों का नाम बाहर आया। एक तो जो कि शेमलेस है। यह ईलॉन मस्क है, डोनाल्ड ट्रंप है। वह मतलब पूरे शेमलेस है। सब तरह का उन्होंने करके रखा है और इसमें भी नाम आ गया तो कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वह कादव कीचड़ में ही डूबे हुए हैं। किंतु जो लोग अपने को बड़े शरीफ बना करके वो पेश कर रहे थे, लोगों का क्रोध उन्हीं की ओर ज्यादा है। तो वो बोल रहे हैं कि इसका फॉल आउट क्या होने वाला है? क्या सबके ऊपर में इक्वल होगा? नहीं होगा। जो लोग पहले से ही कादव में ही डूबे हैं कोई किसी भी तरह का वो दिखावा नहीं करते कि हां मैं आइडियल यह वो फिर यह जेंडर फेंडर वगैरह जो नाटक नहीं करते थे वे लोग बड़े मजे से आए किंतु वे लोग बोलते हैं कि जेंडर वाला वो एक जो पागलपन चला था ना वो बड़ा उछलउछल करके करते थे। अभी जब पता इसमें नाम आ गया तो अभी कोई मुंह दिखाने को नहीं रहे। है ना? गिरीश ने ऐसा कोई दावा किया ही नहीं है कि मैं बहुत बड़ा आइडियलिस्ट हूं। वो कहता है मेरे जैसा पापी देखने को नहीं मिलेगा। अभी देखिए उसके लिए शरणागति का रास्ता अ परफेक्ट रास्ता है।

प्रश्न: गिरिश में कोई hypocracy नहीं थी

अल्टीमेटली वो शरणागति दिखाएगा ना तो लोगों को यही लगेगा दिस इज़ अनदर फॉर्म ऑफ हिपोक्रेसी। जैसा वो त्याग का दिखावा करता है वो शरणागति का भी दिखावा करेगा। गिरीश तो दिखावा करता ही नहीं था ना। जो है सब नंगम नंगा सबके सामने खुला। अभी बताओ क्या करना? देखिए ठाकुर को ठगने वाले तो कितने होंगे ना गिरीश इज़ गिरीश मस्ट हैव कम एज अ सरप्राइज एस अ फ्रेश ब्र ब्रिज ऑफ़ फ्रेश एयर कि मुंह पे बोलता है कि नहीं होगा बाकी करूंगा हो जाएगा बोल के नहीं करने वाले ठाकुर को कितने मिले होंगे भावेर घरे चोरी करा माने मुख में एक मुख में राम बगल में छोरी बोले ब्रम स्वीकार कर लो कि मैं पापी हूं व्हिच इज अ बेटर कॉन्फेशन क्रिश्चियनिटी में कन्फेशन का कांसेप्ट है कि भाई स्वीकार कर लो कि मैंने मैंने पाप किया है। नाउ ओनली योर पाथ टू सेल्वेशन विल ओपन। आप स्वीकार ही नहीं करेंगे। मन में पाप भरा है। मुंह पर आप साधु की बातें करते हैं तो आपका कहीं पर कोई स्थान नहीं है। इससे बेटर है कि पापी जो स्वीकार कर लिया है कि मैंने पाप किया है। ना अभी आप बताइए कि क्या करना है?

प्रश्न: एक साधक के रूप में हमारा मन होता है कि हम अपने रिश्तेदारों से दूर रहें। लेकिन आप सहानुभूति और करुणा की बात करते हैं। कठिनाई यह है कि इससे हम कई सामाजिक बंधनों और दायित्वों में खिंच जाते हैं।

ना ठाकुर ने खुद कहा ना कि देखो ये रामलाल एरा सब होलो पर जरा पर छिलो तारा होलो अपनार और जरा छिलो अपनार तारा होलो पर माने जो पराए थे वो हुए अपने और जो थे अपने वो हुए पराए तो ठाकुर तो स्पष्ट रूप से कहते हैं कि सांसारिक कोई जवाबदारी आप नहीं रखेंगे तो जो तथाकथित अपने हैं वह तो पर होने ही वाले हैं। यू कैन नॉट डू एनीथिंग। और जो तथाकथित पर है वह होए हैं अपने। ठाकुर की महासमाधि के बाद में ठाकुर ने स्पष्ट रूप से समझ ही गए थे कि रामलाल दादा मां की संभाल नहीं रखने वाले हैं। पर अब ये जो त्यागी संतान जो है उनके वही संभाल रखने वाले हैं।

जैसे-जैसे हम आध्यात्मिक होते जाते हैं, लोगों को हम boring लगने लगते हैं।

ना बिल्कुल सही बात है। देखिए जो संसारी होता है वह कैसे भी करके उसको मायाजाल खड़ी करनी है। अपने को सेल करना है उसको एट द एंड ऑफ द डे। हमको अपने को सेल नहीं करना। सो नेचुरली है कि वह जो एक मर्चेंडाइज को जिस तरह से सजाते सजाते हैं वह तो हम यहां पे करने वाले नहीं है। सो ऑब्वियसली वी आर गोइंग टू बी बोरिंग पर्संस बट द वैल्यू ऑफ़ मर्चेंडाइज विल इंक्रीस मेनी फोल्ड। दैट इज अ थिंग।