Invocation
ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठा राम कृष्णाय ते नमः श्री राम कृष्ण लीला प्रसंग स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा लिखित द्वितीय खंड साधक भाव उसकी अवतरण का साधक भाव की आलोचना का प्रयोजन अभी शरद महाराज स्वामी शारदानंद जी जिस तरह से लीला प्रसंग लिखते हैं इंग्लिश नाम है इस किताब का द ग्रेट मास्टर तो जिस तरह से द ग्रेट मास्टर लीला प्रसंग लिखी गई है उसमें आप देखेंगे कि सभी पैराग्राफ को महाराज जी ने एक-एक टाइटल दिया हुआ है तो जिस तरह से कथामृत पाठ करने से आपको पता चलेगा कि परिच्छेद दिए हुए हैं मास्टर महाशय ने जिससे कि क्या होता है एक छोटा सा परिच्छेद जिसमें कि एक टॉपिक कवर होता है और उसको एक टाइटल दिया गया है तो बहुत बड़ी किताबों में इस तरह से पैराग्राफ या परिच्छेद के टाइटल देने से जब हम हमको भविष्य में कोई भी पॉइंट रेफर करना है कोई भी टॉपिक देखना है तो यह पैराग्राफ या परिच्छेद के लिस्ट में से हम उसको आसानी से खोज सकते हैं तो कथामृत भी इसी तरह से लिखा गया है और लीला प्रसंग भी तो अभी भी जिस पैराग्राफ का पाठ करेंगे उसका टाइटल है आचार जो दिगर साधक भाव लिपि बद्धो पावा जाना आचार्यों का साधक भाव लिपिबद्ध मिलता नहीं है क्यों हमने कल ही इस टॉपिक का विस्तृत रूप से डिस्कशन किया था कि आचार्य है या तो फिर जैसे अवतार पुरुष है बहुत कम लोगों का साधक भाव अर्थात कि उनके साधना का विवरण उनके साधक जीवन का विवरण मिलना मुश्किल है भक्त यही सोचते हैं कि मैं जिसको इष्ट के रूप में या गुरु के रूप में मैंने जिनका वर्ण किया है जिनका सिलेक्शन किया है वह हमेशा से परिपूर्ण ही है उनमें कभी कोई भी अपूर्णता थी ही नहीं इसीलिए मैं उन परे मैं मेरी उनके ऊपर में भक्ति है और इसीलिए वह इष्ट है तो फिर साधना करने की क्या आवश्यकता है यदि वह हमें से पूर्ण थे अपूर्ण होते तो साधना करते और यदि अपूर्ण थे कभी तो व मेरे इष्ट होने के योग्य किस तरह से है इस तरह का एक डाउट भक्त के मन में आता है इसलिए शरत महाराज ने यह डिस्कशन से साधक भाव का प्रारंभ किया है महाराज जी लिखते हैं जगते आध्यात्मिक इतिहास पाठे देखीते पावा जाए लोक गुरु बुद्ध और श्री चैतन्य भिन्न अवतार पुरुष सकले जी बने साधक भावे कार्ज कलाप विस्तृत लिपि बथ नाई जगत के आध्यात्मिक इतिहास का पाठ करके देख सकते हैं कि लोक गुरु बुद्ध और श्री चैतन्य के अलावा अन्य अवतार पुरुष के जीवन में साधक भाव का साधक साधना का विस्तृत लिपिबद्ध साधना का विस्तृत लेखन नहीं है विवरण नहीं मिलता है ज उद्दा अनुराग उत्साह हृदय पोषण करिया तरा जीवने सत्तो लाभे अग्रसर होया लेन जे आशा निराशा भय विस्मय आनंदो व्याकुलता तरंगे पड़िया तहरा कखन उल्लो सितो एवं कखन मु जमान होया लेन अथ च निज गंतव्य लखे नियतो दृष्टि नियतो स्थिर दृष्टि राखी ते विस्मृत होई नाई तद विषय विषद आलोचना तहा दिगर जीवन इतिहास से पावा जाए ना यह शरत महाराज का लेखन है इसलिए यहां पर प्रत्येक सेंटेंस एक एक पैराग्राफ जितना लंबा मिलेगा महाराज जी क्या लिखते हैं जिस उद्दा अनुराग और उत्साह को हृदय में पोषण करके अवतार या आचार्यों ने अपने जीवन में सत्य लाभ के लिए अग्रसर हुए थे जिस आशा निराशा भय विस्मय आनंद व्याकुलता के तरंग में पड़कर के वह कभी उल्लास होते तो कभी महमान अर्थात कि डिप्रेसो जाते निराश हो जाते किंतु फिर भी अपने गंतव्य लक्ष्य के ऊपर में स्थिर दृष्टि रखने में वह कभी भी विस्मृत नहीं हुए हैं उस विषय की विषद आलोचना उनके जीवन इतिहास में मिलती नहीं है यहां पर बेसिकली जो महाराज कहना चाहते हैं जब हम साधन भजन करते तब हमारे जीवन में सतत आशा निराशा भय विस्मय आनंद व्याकुलता के तरंग में हम पढ़ेंगे ही पढ़ेंगे क्योंकि उस दिन जो हमारी आलोचना हो रही थी हमारे हमेशा हमारे मन में यह प्रश्न आएगा ही आएगा कि यदि मैं कठोर तपस्या कर रहा हूं ईश्वर प्राप्ति के लिए या तो सत्य लाभ के लिए निर्वाण प्राप्ति के लिए कि मुक्ति के लिए तो फिर मैं प्रग प्रगति कर रहा हूं कि भी नहीं वह किसको पता क्या मैं गलत रास्ते पर तो नहीं जा रहा हूं क्या मेरी साधना सफल हो रही है कि विफल हो रही है इस बात का प्रमाण क्या है क्योंकि यह प्रश्न भी तो होता है कभी-कभी कहा जाता है ना कि फल की आशा रखे बिना कर्म करते जाइए किंतु यह प्रश्न भी तो होगा कि कर्म ठीक-ठीक हो रहा है कि नहीं वह भी तो हमको देखना है एक व्यक्ति चोर है वह चोरी करता है व वो सोचता है कि मैं बहुत कर्म कर रहा हूं किंतु चोरी करके या तो अनीति पूर्ण कार्य करके वह कोई अपने कर्म का फल काटने वाला नहीं है वो तो ऊपर से और हजार कर्म के भीतर के बंधन में पड़ जाएगा तो यह भी तो समझ में होना चाहिए कि मुझे किस तरह का कर्म करना है जो कर्म मैं कर रहा हूं उससे मेरे बंधन कटते हैं ना कि बंधन बढ़ते हैं इतना तो एक कॉमन सेंस हम में होना चाहिए तो बहुत और दूसरी बात क्या है कि बहुत बार धर्म के नाम पर हम अधर्म का आचरण कर बैठते हैं जैसे कि क्रिश्चियनिटी के इतिहास में क्रिश्चियनिटी का डिस्कशन करना आसान है क्योंकि इसका क्रिटिसिजम उन्होंने खुद किया है वरना तो फिर दूसरे धर्म वाले दूसरे धर्म पर बोलेंगे कि अच्छा आप लोग ऐसा बुरा कर रहे थे तो उन धर्मों को ब बुरा लग जाता है तो एटलीस्ट क्रिश्चन लोगों का है कि उन्होंने अपना क्रिटिसिज्म अपने से किया है इसके लिए हम वह क्रिटिसिजम को उठा कर के सकते हैं क्रिश्चियनिटी के इतिहास में दो बहुत ही भयावह हादसे हुए थे देयर वेर टू ग्रेट डिजास्टर इन द हिस्ट्री ऑफ क्रिश्चियनिटी इनक्विजिशन एंड क्रुसेड्स और भी बहुत सारे थे वैसे किंतु यह दोनों का नाम आज सबसे इस तरह से लिया जाता है कि अभी आप भगवान जीसस को फॉलो कर रहे हैं ना कि शैतान को फॉलो कर रहे हैं जीसस को फॉलो कर रहे हैं तो आप में भक्त में इस तरह के गुण दिखने चाहिए शैतान को यदि फॉलो कर रहे हैं तो आप में इस तरह के गुण होंगे आपको विच यानी कि चुड़ैल ठहरा दिया जाएगा करार कर दिया जाएगा और फिर उसकी हत्या कर दी जाएगी और फिर है कि यह धर्म भूमि है जेरूसलम उसको विधर्मी हों के हाथ से मुक्त करवाने के लिए चलो युद्ध करते हैं यानी कि धर्म करते-करते भी हम देखिए कि अधर्म के रास्ते पर चले जाते हैं कभी-कभी तो एक सच्चा साधक है उसको तो एलर्ट रहना है कि मैं ठीक-ठीक साधना ही कर रहा हूं तो मैं साधना करते-करते कहीं अनाचार दुराचार में तो नहीं फस जा रहा हूं अच्छा अभी यह वेदांत और वैष्णव भक्ति शास्त्र या तो फिर भक्ति मार्ग और ज्ञान मार्ग इन दोनों को जब तक आप फॉलो करते हैं तब तक तो यह साधनाएं अपने आप में काफी प्योर है किंतु यह शक्ति साधना करते-करते इस तरह की भयावह साधनाएं हैं उत्कट साधनाएं हैं कामिनी कांचन के बीच में रह कर के कांचन तो पता नहीं किंतु एटलीस्ट कामिनी के साथ में रह कर के करने वाली वह साधनाएं है तो कब पैर फिसल गया कब हम लोग कुछ उल्टा ही कुछ कर बैठे वो तो हमको अलर्ट रहना होगा तो वो अलर्ट किस तरह से रहेंगे अभी जैसे बाहर के जगत में तो यह सब चीजें मेजर करना आसान है कि मैं आज ठ घंटे की नौकरी करता हूं या तो फिर इस तरह से प्रोग्रामिंग करता हूं या तो फिर मैं अच्छा बिजनेस करता हूं तो इसके सामने जो मुझे रिटर्न मिलता है वह बड़ा मेजरेबल रिटर्न होता है यह मेरा सैलरी आज 15000 था फिर 1 साल के बाद में 20000 हुआ अर्थात कि मैं अच्छा काम कर रहा हूं बोलकर के ही मेरा सैलरी बढ़ा बिजनेस में अच्छा कर रहा हूं बोलकर के ही प्रॉफिट बढ़ा यदि बिजनेस ठीक नहीं करता तो प्रॉफिट कम हो जाता तो यह एकदम क्लियर मेजरमेंट की यूनिट है बाहर के जगत में किंतु आंतरिक जगत में आप किस तरह से अपने को मेजर करेंगे कि हां आज मैं एक साल से चलिए कि प्रतिदिन आधा घंटा जप करता हूं प्रेसिडेंट रिवर्ड प्रेसिडेंट महाराज से मैंने दीक्षा ली है मंत्र लिया है प्रतिदिन में एटलीस्ट आधे घंटे का जप करता हूं और प्रतिदिन एटलीस्ट आधा घंटा कथामृत का पाठ करता हूं तो एक साल के बाद में मुझे कुछ बेनिफिट हुआ है कि मैं वैसे ही टाइम वेस्ट कर रहा हूं या तो फिर मुझे अपनी मेथड को रिफाइन करने की आवश्यकता है किस तरह से मैं कम से कम साधना करके मैक्सिमम बेनिफिट पा सकूं वो तो मुझे एक अलर्ट रहना होगा तो वो मेजरमेंट का यूनिट क्या है तो चलो हम कह सकते हैं कि आत्म संतोष है मन शांत हो जाएगा विषय वासना से मन वापस आ जाएगा या तो फिर अपने इंद्रियों के प्रति जो आकर्षण है वो कम हो जाएगा भीतर में त्याग वैराग्य बढ़ने लगेगा सत चर्चाएं जहां पर हो रही है वह चर्चा सुनने का हमको आनंद आएगा वह सुनने के लिए हम लोग अलर्ट रहेंगे जैसे कि अभी मैं अ सोशल मीडिया है या तो फिर यह मोबाइल पर वीडियो वगैरह देख रहा हूं youtube0 जो अपना हिस्ट्री है वह एक मेजरमेंट है कि जद मैं यह धार्मिक लेक्चर है या तो फिर यह भजन है या तो फिर ऐसा ही कुछ धार्मिक साहित्य उसको मैं ज्यादा देखता हूं ना कि और कोई चीजें ज्यादा देखता हूं वह एक माने दिस इज अ मेजरेबल यूनिट मैंने जाऊ थोड़ा सा धार्मिक प्रोपोर्शन भी इसमें रहे तो जैसे कि यह साधना सदन के लेक्चर है सर्वप्रिया अंद जी के लेक्चर है वगैरह वगैरह का हेल्दी मिक्सचर होना चाहिए अदर वाइज लाइफ कहां से कहां चला जाएगा पता नहीं तो इसके लिए हिस्ट्री आप देखकर खोल कर के देख सकते हैं कितना प्रोपोर्शन मैंने क्या देखा क्या सुना तो किंतु यह इवन आफ्टर दिस मेजरमेंट भी हमको कभी-कभी संदेह तो हो ही जाता है कि सही सही में इतना एक घंटा जो देता हूं वह ठीक हुआ है कि नहीं हुआ है कि इससे भी ज्यादा मुझे करने की जरूरत है तो वह जो साधना करते-करते हमारे हृदय में जैसे महाराज लिखते हैं कि अनुराग और उत्साह को हृदय में पोषण करके हम साधना तो प्रारंभ करते हैं किंतु साधना करते-करते क्या होता है आशा निराशा भय विस्मय आनंद और व्याकुलता के तरंग में हम पढ़ते हैं कभी आशा बढ़ जाएगी यहां पर मेरे साथ में खास करके ऐसा होता है कि मैं सुबह को मंगल आरती के बाद में जब कमरे में आता हूं या तो फिर यह यहां पर बीच है वहां पर वॉकिंग के लिए जाता हूं तो मेरा एक लक्ष्य होता है यदि मैं वॉकिंग कर रहा हूं तो मेरे इतने मंत्र का जप होना चाहिए मेरा शरीर तो चल रहा है मन में मैं जप कर रहा हूं या तो कोई सुबह का क्लास हो है तो उसके कोई टॉपिक के बारे में सोच रहा हूं तो शुभ चिंतन चलना चाहिए वह मेरा आशय है सिर्फ आशय हेल्थ का नहीं है फिटनेस नहीं है मेंटल फिटनेस भी इतना ही होना चाहिए किंतु जैसे कि मनुष्य का मन होता है चलते-चलते कोई दूसरा विचार आ गया किसी के ऊपर में क्रोध आ गया किसी के ऊपर में नाराजगी आ गई किसी के ऊपर में वितृष्णा आ गई तो यह सब भी बीच-बीच में आ जाएगा उस समय मेरा जो विल पावर कितना स्ट्रांग है कि मैं अपने मन को उस सब नेगेटिव भाव से निकाल कर के फिर से पॉजिटिव भाव में लगाऊं इसके ऊपर में मेरा मॉर्निंग वॉक है या तो बैठ कर के मैं जो करता हूं अपने कमरे में उसकी सफलता का जो सीक्रेट है वह मेरे विल पावर में है किंतु दोपहर को मैं फिर जब सोचूंगा कि अच्छा आज सुबह मेरा कैसा गया तो कभी-कभी बहुत अच्छा लगेगा आज बड़ बहुत ही अच्छा लगा मुझे वॉकिंग करते करते बड़ा सुंदर चिंतन हुआ कभी-कभी ऐसा होता है कि मन इस तरह से भटक गया कि मैं अपने विल पावर का इस्तेमाल करके इसको फिर से एकाग्र करने में सक्षम हो ही नहीं पाया तो फिर मैं बड़ा निराश हो जाऊंगा अरे मुझे तो प्राय 20 साल हो गया इस संग में साधु हुए और इसके बावजूद मेरे साथ में ऐसा होता है कि कोई भी एक ऐसा दुष्ट विचार आकर के मेरे मन को इस तरह से जकड़ लेता है कि क्या मैं अपने को उसमें से छुड़ा ही नहीं पा रहा हूं हे राम मेरा क्या होगा तो कभी-कभी निराश हो जाता हूं तो कभी-कभी आशा से मन भर जाता है कि अच्छा आज का दिन तो बड़ा सुंदर गया बड़ा शुभ चिंतन हुआ मैं कुछ लिखता हूं तो वोह भी बड़ा अच्छे से लिखा मैंने फिर यह मैंने जो क्लास किया क्लास करना करने का भी एक सेटिस्फेक्शन होता है फिर मेरा साधना है उसमें भी बड़ा सुंदर तो कभी-कभी आशा आ जाती है कि हां इस तरह से यदि और दो-तीन साल चला तो निर्वाण प्राप्ति निश्चित है या तो फिर ठाकुर को आकर के दर्शन देना ही होगा किंतु दो-तीन दिन ऐसा चला फिर एक दो दिन ऐसा मैं गड्ढे में गिरा मेरा मन कि हरे राम मतलब हमको लगेगा कि अरे इतने सालों की साधना के बाद में भी फिर ऐसा हो रहा है तो कैसे चलेगा क्या होगा और कितने करोड़ करोड़ जन्म फिर से आना पड़ेगा फिर से वही वो पीपीटीसी से फिर से स्टार्ट करना पड़ेगा वही ब्रह्मचारी से फिर से स्टार्ट करना पड़ेगा किसको पता तो ये आशा निराशा भय विस्मय कभी-कभी विस्मय से मन चकित हो जाता है कि अरे ठाकुर की मेरे पर इतनी कृपा है यह बात खास करके बेलूर मठ में मैं जब था तो मुझे बार-बार यह मेरे मन में बात आती थी बेलूर मठ में यदि आपने वोह जो मेन टेंपल श्री राम कृष्ण देव का देखा होगा तो बिल्कुल गंगा के किनारे है और जब मैं हमलोग मंगलारती के बाद में आधा एक घंटा हम लोग सभी लोग वहां पर बैठते हैं मंदिर में फिर जदी आप बाहर आएंगे गंगा के किनारे देखिए कि गंगा के सामने वाले ट तट के ऊपर में सूर्योदय होता है तो वह सूर्य की पहली किरण वो मंदिर के ऊपर में गिरेगी फिर जो गंगा का किनारा है वहां पर सभी मंदिर है मां शारदा देवी का समाधि मंदिर है स्वामी ब्रह्मानंद जी का समाधि मंदिर है और थोड़ा सा आगे जाएंगे तो रिवर्ड प्रेसिडेंट महाराज वाइस प्रेसिडेंट महाराज का क्वार्टर्स है फिर वहां पर समाधि घाट है वहां पर सभी सीनियर साधुओं का का अग्नि दाह हुआ है तो यह और फिर बीच में फिर स्वामी जी का समाधि मंदिर है तो इतना सुंदर पवित्र वातावरण सूर्य की पहली किरणें वहां पर गिर रही है और एक खुला बड़ा सा मैदान है घास से ग्रीनरी से भरा हुआ और यह जो फूल के ये जो छोटे-छोटे पौधे होते हैं वो वहां पर लगाए हुए हैं वहां का जो गार्डनिंग इंचार्ज जो स्वामी जी है वो बहुत मेहनत करते हैं बड़ा सुंदर रूप से गार्डन को सजाए हुए हैं तो जब मैं वहां पर मेन टेंपल के सामने खड़े रहकर के सूर्य देवता को प्रणाम करता हूं और सामने यह खुला ग्रीन गार्डन फिर यह मंदिर और फिर यह गंगा और उसके बाद में यह सूर्योदय तो मन में सही में यह विस्मय होता है आश्चर्य होता है कि इतने कितने कितने जन्म के पुण्य किए होंगे तब कहीं जाकर के इस जगह पर खड़े रह कर के इतनी पवित्र जगह पर खड़े रह कर के इतना पवित्र दर्शन करने का सौभाग्य मुझ मिला है तो वह विस्मय भी होता है और कभी-कभी भय भी होता है कि अरे इतनी पवित्र जगह पर रह कर के भी यदि हम अपना उद्धार ना कर पाए इतनी सुंदर जगह पर रह कर के भी दिव्य वातावरण में रह कर के भी यदि हम अपने मन को परिशुद्ध ना कर पाए पवित्र ना कर पाए निर्मल ना कर पाए तो फिर और कहां पर जाकर कुछ होने वाला नहीं है तो ऐसा क्यों हुआ वो भय भी हमको होता है आनंद और व्याकुलता यह व्याकुल लता कितना इंपॉर्टेंट फैक्टर है यह हमेशा कि हां मुझे मंगलारती के समय में मुझे मंदिर में खास करके मैं फिर से यह बेलूरमठ के बारे में बता रहा हूं मैं एक मने ईगर होकर के मने व्याकुल होकर के मैं राह देखता था वहां पर बेलूरमठ में सुबह का वातावरण और संध्या का वातावरण बिल्कुल ऐसा लगेगा कि जैसे आप स्वर्ग में है क्यों क्योंकि वहां पर उस समय भक्तों को आने की मनाई है पूरा मठ जसे सिर्फ साधुओं के लिए ही है मंगल आरती के बाद के वह जो दो घंटे हैं वहां तक का और संध्या आरती के बाद से लेकर के पूरा रात हमारे लिए है तो बहुत सारे साधुओं को तो मैं देखता हूं रात को खाने के बाद में या तो 101 बज गया तो वे लोग आसन लेकर के मां के समाधि मंदिर में जाएंगे वहां पर बैठेंगे पूरी रात जप करेंगे ऐसे में कितने साधुओं को देखता था तब इस तरह से मैं बैठ नहीं था किंतु मैं एटलीस्ट गंगा के किनारे टहल होता था संध्या को मेरा जो संध्या आरती के बाद का बाद से लेकर के दो घंटा जब तक यह रात का खाने का घंटा ना लग जाए तब तक दो घंटा मुझे पक्का गंगा के किनारे पे ही बिताना है मैं रूम में कभी जाऊंगा नहीं क्योंकि मुझे पता था मेरा पोस्टिंग यहां पर टेंपररी है कभी भी यह लोग मुझे हटा देंगे तो ठाकुर की कृपा से 4 साल रहने को मिला किंतु मैंने ठीक किया था प्रत्येक दिन गंगा के किनारे जितना मैं बिता पाऊं वहां पर ही बिताना है यह जो दिव्य वातावरण है पूरा अपने भीतर में इसको भर देना है तो फिर पूरा जीवन भर का वो जो कहते हैं कि स्टोरेज करके जाना है यहां से तो वो एक व्याकुलता होती थी कि कब सुबह को मैं मंगलारती में जाऊं कब मैं शाम को आरती में जाऊं कब आरती समाप्त हो कब मैं गंगा के किनारे जाकर के बिल्कुल आनंद से मैं अपना समय बिताऊ तो वो व्याकुलता होती है और फिर साथ में ही जैसे कि आनंद मिलता है उस समय मेरा जो शाम का समय था मैं मेरा ऑफिस का काम समाप्त करके कंप्लीट वर्क जो एडिट कर रहा था उसको छोड़ कर के मैं सबसे पहले तो जाता था यूनिवर्सिटी वहां पर कैंटीन बड़ा सुंदर है बेलूर मठ में आपको ना ही ठीक से चाय पीने को मिलेगा ना ही ठीक से खाने को मिलेगा सब कुछ तपस्वी हों के लिए है वहां पे अभी हम लोग यंग है थोड़ा सा कुछ अच्छा चाहिए खाने के लिए तो मैं वहां पर यूनिवर्सिटी कैंटीन में चला जाता था सुंदर कॉफी है बड़ा सुंदर नाश्ता है वो नाश्ता करते-करते कॉफी पीते पीते वहां पर गप लगाया फिर एक दो साधुओं को लेकर के वहां पर वो वॉकिंग किया और फिर मैं संध्या आरती में आया और संध्या आरती के बाद में गंगा के किनारे टहलना चार साल मैंने ऐसा किया है जो मेरे मन में व्याकुलता होती थी कि कब मैं जाकर के यहां से निकलू ऑफिस में से और देखिए कि मेरा काम भी मेरे पसंद का था ऐसा नहीं कि काम मेरे लिए कोई बर्डन था स्वामी जी का कंप्लीट वर्क्स एडिट करना इससे शुभ कर्म और क्या हो सकता है तो प्रत्येक दिन मेरे लिए व्याकुलता और आनंद से भरा हुआ था कि मैं वो काम कर रहा हूं वो जो जिस काम को प्राप्त करने के लिए लोग कितनी तपस्या करते हैं व कार्य करने का मुझे एक आशीर्वाद मिला है स्वामी जी का एक शुभ अवसर मिला है और वोह बेलूरमठ का वातावरण है तो यह जो साधक जीवन जो होता है वह आशा निराशा भय विस्मय आनंद और व्याकुलता में से पसार होता है कभी-कभी एक डिप्रेशन भी चला आता है कि अरे इतना सुंदर वातावरण है इतने सारे महापुरुष यहां पर रहते हैं उनके साथ में काम करके भी क्या मेरे मन में इतना कचरा पड़ा हुआ है मैं उसको साफ नहीं कर सकता क्या वो निराशा आ जाती है वह डिप्रेशन आ जाता है किंतु फिर ही दूसरे ही दिन फिर से नई आशा से नए उमंग से दिन का प्रारंभ करते हैं तो यह साधक का जीवन है यदि आप यह कहते हैं कि मेरे जीवन में हमेशा सब कुछ पॉजिटिव ही होता रहा है मेरे मन में कभी भी कु विचार नहीं आए हैं मेरा मन कभी भी भटका नहीं है हमेशा ईश्वर पे साधना पे एकाग्र रहा है तो यह संभव ही नहीं है यहां पर देखिए कि आचार्य अवतारों के बारे में भी शारदानंद जी महाराज ने इस तरह का विवरण दिया है तो यह क्या है हम सबको भरोसा दे दिलवा आता है आज मैं साधना कर रहा हूं मन में डिप्रेशन आया मन में निराशा आ गई मन में भय आ गया मन में इस तरह से एक वितृष्णा जैसा आ गया कि छोड़ो इन सब चीजों को मैं होता तो है नहीं कुछ झुठ मुटका में क्यों टाइम वेस्ट करूं तो हमको सभी को यह बात याद रखनी है कि ये तरंग जो है आज ऊपर है तो कल नीचे हैं तो परसों फिर से ऊपर जाएंगे ही जाएंगे इस आशा को मन में रख कर के साधक जीवन को हमको कंटिन्यू करना है तो यहां पर फिर महाराज लिखते हैं कि इस सब तरंग में पढ़ कर के भी अपने गंतव्य लक्ष्य जो है ईश्वर प्राप्ति या आत्म दर्शन यह जो आत्म साक्षात्कार यह जो हमारा टारगेट है उसके ऊपर में स्थिर दृष्टि रखना यह आचार्य लोगों ने कभी भूला नहीं है भले ही चाहे आज मेरी साधना अच्छी हुई कि बुरी हुई आज मेरे मन में शुभ विचार आए कि अशुभ विचार आए आज मैंने कोई अच्छा कार्य किया कि अच्छा कार्य नहीं किया डज नॉट मैटर क्योंकि हमको कल के बारे में हमेशा सोचना है यह मन में स्थिर रख कर के चलना है कि मेरा जो गंतव्य लक्ष्य जो है मेरा जो टारगेट है वह है भगवान श्री राम कृष्ण का दर्शन या तो फिर आत्म साक्षात्कार या तो फिर निर्वाण प्राप्ति तो यहां पर गंतव्य लक्ष्य के ऊपर में स्थिर दृष्टि रखने में यह लोग कभी भी विस्मृत नहीं हुए हैं और किंतु इस विषय की विषद आलोचना डिटेल डिस्कशन तहा दिगर जीवन इतिहास पावा जाए ना उन लोगों के जीवन के इतिहास में मिलता नहीं है आज मैं जितना ही फ्रेंकली कन्फेस कर दूं जितना ही फ्रेंकली में एक्सेप्ट कर दूं कि हां ऐसा नहीं हुआ कि एक सप्ताह से मेरे मन में अशुभ विचार ही आते रहे हैं तो आपको कोई फर्क नहीं पड़ने वाला किंतु यदि भगवान कृष्ण आज कहीं जाकर के या तो जिन इष्ट को आप फॉलो कर रहे हैं वह यदि एक बार कह दे कि हां मेरे जीवन में भी एक समय ऐसा आया था कि यह अशुभ विचारों से मेरा मन भर गया था फिर साधना करके मैंने इसको दूर किया मैं अपने टारगेट है गंतव्य जो है लक्ष्य जो है उसके ऊपर में स्थिर दृष्टि रख कर के मैंने अपना जीवन साधक जीवन चालू रखा था तो यह सीरियस प्रश्न अपने मन में आ जाएगा कि जिनका मन जिनके वश में नहीं है इस तरह के व्यक्ति को क्या हम इष्ट के रूप में फॉलो करें कि ना करें तो इसलिए महाराज जी इतना बड़ा पैराग्राफ इसके लिए लिखते हैं अथवा जीवन शेष भागे अनुष्ठा विचित्र कार्य कलाप सही तहा दिगर बाल्य आदि कालेर शिखा उद्यम और कार्ज कलाप एकटा स्वाभाविक पूर्वा पर कार्ज कारण संबंधो खू जीते पावा जाए ना सबसे पहले तो यह नहीं मिलता है कि किस तरह की आशा निराशा भय विस्मय आनंद और व्याकुलता की तरंग में पड़कर के उसके बावजूद तरंग में पड़ने के बावजूद अपने गंतव्य लक्ष्य के ऊपर में स्थिर दृष्टि रख कर के उन्होंने अपना साधक जीवन बिताया इसका यदि इतिहास नहीं मिलता है तो साथ में दूसरा एक इतिहास भी नहीं मिलता है क्या कि उनके जीवन के आखिरी समय में उन्होंने जो विचित्र कार्यकलाप किए अद्भुत कार्य किया दिव्य कार्य किया उसके साथ में उनके बाल्य आदि काल का शिक्षा और उद्यम और कार्यकलाप का एक स्वाभाविक रिलेशनशिप पूर्वा पर कार्य कारण संबंध य पूर्व और अपर पहले और बाद का कार्य और कारण मैंने यह कार्य किया तो यह कारण मिला यह संबंध हमको मिलता नहीं है यहां पर महाराज जी क्या कहना चाहते हैं कि यदि आज मान लीजिए कि बिल गेट्स है या तो फिर ये जैसे सेम ओल्ट मैन है या तो फिर जो भी आज अपने-अपने क्षेत्र के महान व्यक्ति है अपने-अपने क्षेत्र के जो एक्सपर्ट है विराट कोहली है क्रिकेटर व्हाट एवर आज उनको यदि हम सफलता के चरम शिख घर पर बैठे हुए पाते हैं तो फिर इसके जो बायोग्राफर होते हैं वह हमेशा हमको उस समय ले जाएंगे कि जब यह लोग स्ट्रगल करते होते हैं स्टीव जॉब्स का बायोग्राफी वोल्टर आइ जक्सन बोलकर के एक सफल लेखक है उसने लिखा है उसमें उसने लिखा है कि स्टीव
Steve Jobs
जॉब्स जब यंग था स्ट्रगल कर रहा था तो यह जो एलएसडी वगैरह ये जो ड्रग्स होती है उसका भी सेवन करता था भारत में आया था भारत में जो नीम करोली बाबा म प्रोबेबली उनको जाकर के मिला था और भारत में आकर के यह आध्यात्मिकता की खोज उसने की थी फिर वह अमेरिका गया और फिर उसने यह एल कंपनी स्थापक स्थापना करके वो इतना सक्सेसफुल हुआ तो यह जो एल की स्थापना या तो उसका खुद का जो सक्सेस है उसके पीछे का इतिहास क्या है बचपन में वह क्या कर रहा था युवावस्था में वह क्या कर रहा था भारत में आकर के उसने क्या किया उसके जो पर्सनल रिलेशनशिप है उस उसमें वह किस तरह का है उसकी बीवी के साथ में किस तरह से बिहेव करता है अपने मित्रों के साथ में किस तरह से बिहेव करता है यानी कि कोई भी बायोग्राफर होगा वो जिस व्यक्ति की बायोग्राफी लिखता है उसका एक संपूर्ण साइकोलॉजिकल एक हमको नक्शा देने का प्रयास करेगा एक संपूर्ण साइकोलॉजिकल चरित्र देने का प्रयास करेगा जिससे हम समझ पाए कि अच्छा यह यह सब फैक्टर थे जिस फैक्टर की वजह से यह व्यक्ति इतना सफल हुआ उसमें सिर्फ उसकी खुद की प्रचे टा उसकी खुद की जो जो हार्ड वर्क कैपेसिटी है उसके अलावा भी बहुत सारे फैक्टर होते हैं वह किस तरह के एटमॉस्फियर में किस तरह के एनवायरमेंट में यह सब कर रहा था तो व उस समय था 1980 का 1990 का कि जबकि अमेरिका में यह टेक्नोलॉजी सभी क्षेत्रों में डेवलप हो रही थी सभी क्षेत्रों में इनोवेशन डिस्कवरीज हो रही थी उसके उस विदन दैट कांटेक्ट इसका जो कंपनी है एल वह सक्सेसफुल हुआ था तो सब तरह से बायोग्राफर हमको एक बड़ा सुंदर एक उसका बायोग्राफिकल उसका जो अ कैरेक्टर है हमको दिखाने का प्रयास करेगा इंटरनल फैक्टर क्या थे उसके मानसिक साइकोलॉजिकल एक्सटर्नल फैक्टर क्या थे उस समय का कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर किस तरह का था इनोवेशन डिस्कवरी जो एटमॉस्फियर है व किस तरह का था फिर यह सब करते-करते उसकी सक्सेस तक हमको ले जाएंगे यानी कि यहां पर महाराज जी लिखते हैं पूर्वा पर पूर्व और अपर पहले का और बाद का कार्य कारण पहले यह कार्य उसने किया तो यह कारण उसका स्पष्ट हुआ तो यह पूर्वा परर कार्य काण संबंध जिस तरह से हमको मॉडर्न बायोग्राफी में देखने को मिलता है यदि ऑनेस्टली लिखी गई है बहुत सारे लोग अपनी खुद की बायोग्राफी कमीशन करवाते हैं आज मैं बड़ा सक्सेसफुल हो गया हूं किंतु भूत काल में बहुत सारा मैंने दो नंबरी कार्य किया है तो उस सबको छुपाने के लिए मैं किसी ऑथर को पैसा देक के एक बड़ा पॉजिटिव बायोग्राफी में अपना लिखूंगा लिखवा आंगा तो वो जद छोड़ दे ऑनेस्ट बायोग्राफी जदी हम देखेंगे यह वाल्टर आइजक्स वो बड़ा ही ऑनेस्ट पर्सन है अभी कितना ऑनेस्ट है पता नहीं किंतु एटलीस्ट वो क्लेम करता है कि उसकी बायोग्राफी में वो पॉजिटिव नेगेटिव सभी देखता है तो उसने और भी दो-तीन बायोग्राफी लिखी है आइंस्टाइन की बायोग्राफी लिखी है जैसे कि उसने तो जो अच्छे बायोग्राफर होते हैं आपको सब कुछ दिखाने का प्रयास करेंगे कि आखिरी जीवन में जिस व्यक्ति ने इतनी प्रचंड सफलता प्राप्त की पूरे विश्व में उसका नाम हो गया है तो शुरुआत के दिनों में वह कैसा था उसके व सत कार्य किस तरह के थे कु कार्य किस तरह के थे उसने यह अच्छा किया यह बुरा किया यहां पे सफल हुआ था यहां पे फेल हुआ था पूरा हमको उसका हिस्ट्री ट्रेस करके बताएंगे तो दि इज अ वेरी गुड साइकोलॉजिकल स्टडी जो लोग साइकोलॉजी के स्टूडेंट होते हैं उन लोगों के लिए इस तरह की बायोग्राफी बड़ी काम की होती है कि हां चलो कि हमको पता चला अभी जैसे एजुकेटर्स जो होते हैं जो लोगों को बच्चों को पढ़ाना होता है उन लोगों के लिए बड़ा ये यूजफुल है कि हां तो इस तरह से क्या आप सक्सेस होते हैं तो वेरी गुड हमारा स्कूल का सिलेबस भी इस तरह से हमको मॉडिफाई करना चाहिए तो यह जो सक्सेस के जो पैरामीटर्स है वो सबको यहां पे अप्लाई किया जाए जाए आजकल वे लोग अमेरिका में क्रिएटिविटी पर बहुत भार देते हैं तो क्रिएटिविटी शुड बी अ करिकुलम इन अवर स्कूल तो यह जिस तरह से यह कॉर्पोरेट जगत में सेकुलर लोगों के है तो वैसे ही यह आध्यात्मिक जगत में भी है जैसे कि नरसिंह मेहता का बायोग्राफी कुछ काम धाम नहीं कर रहे थे अपने भाई के घर पर पड़े थे भाई के घर का खाना खा रहे थे और फिर शादी भी किया फिर अलग से रहने को भी गए तो घर में वह टूटा फूटा घर है खाने का कुछ नहीं है उसका बड़ा भाई सब कुछ कर रहा है बड़े भाई ने एक दिन आकर के कह दिया कि पिताजी का श्राद्ध करना है तुम आ जाना और फिर यह निमंत्रण देते देते नरसिंह मेहता को 10 गाली भी देता गया कि किसी काम का नहीं है दिन भर यही सब भजन गाता रहता है तो नरसिंह मेहता की पत्नी से रहा नहीं गया तो उसने कह दिया कि हर साल आप करते हैं इस साल पिताजी का श्राद्ध हम करेंगे तो ठीक है करो पैसा फैसा तो है नहीं ब्राह्मणों को बुला कर के लड्डू खिलाना हो होगा क्या है इतनी क्षमता कि ब्राह्मणों को बुला कर के लड्डू खिलाओगे तो उसने कैसे भी करके वो उसकी पत्नी ने कहा कि ना अभी अब इतना कटु वचन जब अपने पति के बारे में वो बोलेगा उसका बड़ा भाई तो वो कौन पत्नी ये सहन कर पाएगी व उस समय ये अपने मेहता जी वो भाव में पड़े थे नरसिंह मेहता जब भाव में से बाहर आए और पत्नी ने कहा कि पिताजी का श्राद्ध करना है तोव बड़े टेंशन में आ गए अरे घर में कुछ है नहीं चूहे दौड़ रहे हैं उसमें लड्डू कहां से बनाएंगे घी कहां से लाएंगे तो पत्नी ने कहा नहीं नहीं कहां से भी जुगाड़ कीजिए जाइए तो अभी देखिए कि यह जो भक्त के हृदय की पुकार सुनते हैं भगवान स्वयं यहां पे नरसिंह मेहता घी खरीदने के लिए बाजार में गए पैसा फैसा तो है नहीं भिक्षा मांग रहे हैं कोई दे नहीं रहा है उस समय वैकुंठ में से भगवान स्वयं वहां पे आए नरसिंह मेहता का स्वरूप लिया और उसके घर गए उसकी पत्नी के सामने जाकर के कहा कि देखिए यह सब रसोय आए हैं सब खाने की चीजें लेकर के आए हैं उनकी पत्नी आश्चर्यचकित हो गई यह फकीर नरसिंह मेहता इतना सब कहां से लेक आए फिर वही खाना बनने लगा इतना उसकी खुशबू पूरे गांव में फैल गई सभी गांव वाले दौड़े-दौड़े आए सोच र है इस फकीर के घर में इतना सुंदर खाना इतना सुंदर सब व्यवस्था किसने किया किस तरह से हो सकता है किंतु खैर भगवान आए हैं उन्होंने की है व्यवस्था सबका खाना समाप्त हो गया फिर भगवान अंतरध्यान हो गए और असली नरसिंह मेहता आए खाली हाथ बोल रहे हैं कि मुझे तो कुछ मिला नहीं गांव में तो उनकी पत्नी कहती है किस तरह का मजाक कर रहे हैं आप अभी तो आप आए थे सब रसोइयों को लेकर के खाने की चीजें लेकर के पूरे गांव को खिलाया संतुष्टि से और आप कह रहे हैं फिर से आकर के कहते हैं कुछ नहीं मिला तब नरसिंह मेहता को पता चला कि भगवान स्वयं उनका देह धारण करके पृथ्वी पर आकर के उनकी लाज की रक्षा की है किंतु भगवान के आने से पहले की जो पूरी कहानी थी कि व गरीब थे अपने भाई के घर पर रहते थे भाई उनको बार-बार गाली देता था चुपचाप सुन लेते थे पत्नी से नहीं रहा गया पत्नी को ऐसा बोलना पड़ा वो जो हिस्ट्री है वो हिस्ट्री का भी यहां पे एक इंटीग्रल इंपॉर्टेंस है अदर वाइज आप इस क्यों क्यों भगवान को आना पड़ा क्यों भगवान आए यह प्रश्न का उत्तर आपको नहीं मिलेगा किंतु बहुत सारे अवतारों के जीवन में ऐसा होता है भगवान राम ने लंका पे यु चढ़ाई करके लंका प आक्रमण करके युद्ध किया रावण को हरा दिया किंतु जो राम बाण में जो शक्ति थी वह राम बाण की शक्ति उन्होंने अपने गुरु वशिष्ठ के आश्रम में रह कर के तपस्या करके किस तरह से प्राप्त की क्या हम यह मान ले कि राम बाण की जो शक्ति थी वह भगवान राम के साथ में जन्म से थी या तो फिर भगवान राम ने तपस्या करके उस शक्ति को अर्जन किया था भगवान कृष्ण के पास में जो सुदर्शन चक्र था वो सुदर्शन चक्र क्या जन्म से उनके साथ में था क्योंकि वो विष्णु के अवतार थे या तो फिर उन्होंने तपस्या करके उस सुदर्शन चक्र को प्राप्त किया है इस प्रश्न का उत्तर हमारे पास में नहीं है इसलिए महाराज जी यहां पर लिखते हैं कि अवतारों के जीवन के आखिरी समय में वह जो दिव्य कार्य करते हैं या तो रावण का वध करना या तो फिर महाभारत के युद्ध में पांडवों को नीति की शिक्षा देना पांडवों को युद्ध में विजय प्राप्त करवाने में जिनका मार्गदर्शन देना वो राम है या कृष्ण है उन्होंने किस तरह की साधनाएं की थी कि आज वही भगवान कृष्ण उनके पास में इतनी प्रखर मेधा शक्ति है युद्ध का इतना सुंदर ज्ञान है या तो फिर भगवान राम के पास में वही नीतिमत्ता है वही पुरुषोत्तम भगवान राम जिनके राम बाण कभी भी विफल नहीं जाता है तो वह आखिरी जीवन की शक्तियां उसके साथ में उनके बाल्य जीवन का क्या संबंध पूर्वा पर कार्य कारण संबंध क्या है वह हमको खोज करके मिलता नहीं है अभी महाराज जी लिखते हैं दृष्टांत स्वरूपे बोला जाते पारे फॉर एग्जांपल दृष्टांत के रूप में हम कह सकते हैं वृंदावन गोपीजन वल्लभ श्री कृष्ण की रूपे धर्म प्रतिष्ठापना श्री कृष्ण परिणत होई लेन ताहा परिष्कार बुझा जायना वृंदावन के गोपीजन वल्लभ गोपियों के हृदय के राजा जो भगवान कृष्ण उन्होंने वह वृंदावन के गोप बालक से चालू करके अपनी यात्रा का प्रारंभ करके आखिर में धर्म प्रतिष्ठापना में किस तरह से परिणत हुए थे वह एकदम परिष्कार यानी कि स्पष्ट रूप से स्पष्ट रूप से हम समझ नहीं पाते हैं ऐसा कोई सिस्टम नहीं है ऐसा कोई यह नहीं है स्टेप बाय स्टेप कि हां वो वहां पर थे वृंदावन में हमको वैसे कहानी तो पता है कि वह जो पहलवान थे उसको मारने के लिए वह मथुरा में जाकर के उनका
Krishna
वध किया था फिर वो हाथी का वध किया था वगैरह वगैरह फिर जाकर के कंस को मार दिया और फिर राज्य उसका छीन लिया यह सब हमको आउटलाइन तो पता है किंतु वो हाथी का वध किया पहलवान का वध किया यह अभी जो भगवान कृष्ण इवन जब बालक भी थे तो बालक को मारने के लिए कंस ने जो इतने सारे राक्षस भे थे वो तो वो राक्षसों का वध पतना का वध वगैरह जो कर सके वो कौन सी शक्ति थी उनमें क्या शक्ति जन्म से आई थी कि साधन भजन करके प्राप्त हुई थी साधना की थी तो किस तरह साधना की थी यह सब विषद वर्णन होगा विषद वर्णन बहुत सारे बहुत सारे क्षेत्र में है भी सही किंतु फिर भी देखेंगे कि जनसाधारण के यहां पर तो परसेप्शन की बात है जैसे कल प्रश्न हुआ था कि भगवान राम जो योग वासिस्ट रामायण है उसमें वैसे तो काफी विषद वर्णन है तो उस वर्णन को हम ग्रहण क्यों नहीं करते हैं तो उसका उत्तर भी जैसे हमने कल डिस्कस किया था कि देखिए कि परसेप्शन क्या है और इसके साथ-साथ भगवान के बहुत सारे एस्पेक्ट होते हैं ऐसा नहीं है कि उन्होंने साधना नहीं की है या तो फिर इवन साधना की है आप आधर और कुछ नहीं कह पाएंगे उनके बहुत सारे एस्पेक्ट होते हैं जैसे कि हमने कल डिस्कस किया कि कल्पतरु दिन को को हम यदि काशीपुर में होते तो हम क्या करते आपके पास में 1015 मिनट मुश्किल से एक दो मिनट स्प्लिट सेकंड आपको वो डिसीजन मेकिंग का था कि मैं यहां पे छत पे रहकर ठाकुर के बिस्तर है उसको धूप में दूं या तो फिर दौड़ कर के जाकर के ठाकुर का ठाकुर के चरण को स्पर्श करके ठाकुर को प्रार्थना करूं कि ठाकुर मुझे भी स्पर्श करके तो देर चैतन्य हो तुम लोगों को चैतन्य प्राप्त हो ये आशीर्वाद दे दे दे वो मैं ले लूं मैं क्या करूंगा वो स्प्लिट सेकंड का डिसीजन था तो हम ठाकुर के लिए दोनों है ठाकुर के लिए त्यागी संतान भी थे जिनको कि उन्होंने साधना करने का उपदेश दिया तपस्या करने को कहा और उनके यह गृहस्थ भक्त भी थे जिन्होंने यह नगर कीर्तन करके यह जो रामचंद्र दत्त था उसने ठीक किया कि ठाकुर के आशीर्वाद मिल ही गए हैं ठाकुर के दर्शन हो ही गए हैं तो अभी और क्या चाहिए जीवन में ठाकुर के तो दोनों तरह के भक्त थे क्योंकि ठाकुर के मल्टीपल एस्पेक्ट थे किंतु उनके जो भक्त थे वो तो एक-एक एस्पेक्ट ग्रहण करने को ही समर्थ थे ऐसा इवन नरेण का भी साहस नहीं कि आज सन्यास ले लिया तो कल गृहस्थाश्रम में चला गया दोनों तरह के जो ठाकुर का जो एस्पेक्ट है दोनों तरह से उसको उन्होंने देख लिया ना ही नरेंद्र ने ऐसा किया स्वामी विवेकानंद ने ना ही यह गिरीश घोष का यह सामर्थ्य था गिरीश घोष के लिए गिरवा रखा था वस्त्र किंतु उसके हाथ में दिया नहीं तो वो जो सर्वश्रेष्ठ भक्त थे ठाकुर के वे लोग भी एक-एक एस्पेक्ट को लेकर के ही आ आगे बढ़े हैं तो जो जनसाधारण में परसेप्शन है भगवान कृष्ण का कि अभी इस पूतना का वत करते हैं अभी वह पहलवान का वत करते हैं अभी वह अर्जुन के सारथी होकर के उसको कहते हैं कि भले ही चाहे कर्ण के हाथ में अस्त्र नहीं है उसका वध कर दो क्योंकि अभी आज की क्षण के लिए यही तुम्हारा धर्म है भले ही चाहे जो युद्ध का नियम यह कहता हो कि जिस शत्रु के हाथ में अस्त्र ना हो उसका वध करना निषिद्ध है नॉट मैटर उसका वध कर दो तो यह पूरा जो हम इसको देखते हैं आज भगवान श्री कृष्ण को जनसाधारण जिस दृष्टि से देखते हैं उस दृष्टि में तो हमको भगवान कृष्ण का भक्तिमय स्वरूप ही ज्यादा दिखता है तो इसके बारे में जो फरदर प्रश्न होंगे कि यदि मल्टीपल एस्पेक्ट एक साथ में देखना शुरू कर दे तो क्या वह भयानक नहीं होगा हमारे लिए तो उसके बारे में बाद में महाराज जी बताते हैं ार हद उदार जीवने 30 वसर यशर पूर्वे कथा दटी एकटा मात्र जानी ते पारा जाए भगवान जीसस कृष्ट के महद और उदार जीवन के उसमें जो 30 साल के पहले बाद में उन्होंने जो किया किंतु जो 30 साल के पहले के जो पहले की जो बातें हैं वह एक या दो बातें ही जान सकते हैं उनकी जो उम्र 30 साल की हो गई थी उसके बाद से यह गोस्पेल वगैरह उनके बारे में लिखने का शरू शत हुआ कि जीसस इस गांव से दूसरे गांव जा रहे हैं अपने फॉलोअर्स को इकट्ठा कर रहे हैं किंतु उनके बचपन की कौन सी बातें हमको पता है बचपन के जन्म के बारे में तो पता है कि बेथलेहम में जन्म हुआ वही वह पशुशाला में जन्म हुआ था और जो तीन वाइजमैन थे इटन जो ऋषि थे वह आकर के उनको आशीर्वाद दिए थे यह इतना पता है फिर वो जो एक बात वोह पता है कि मंदिर में यह सब जो दुकानदारी चल रही थी मंदिर में में ये जो पैसा देने वाले लोगों का वो चल रहा था सब एक उन्होंने एंक्रोचमेंट आज के लैंग्वेज में कहे तो वो जो एंक्रोचमेंट हो गया था तो सबको भगा भगाया था जीसस ने वहां से मंदिर में से वो एक बात पता है किंतु वो कहां रहे थे किस तरह से साधना की थी वो तो ज्यादा कुछ नहीं पता और फिर देखिए कि स्वामी जी का विजन है कि वो जो क्रीट बोलकर के जो टापू है द्वीप आइलैंड वहां से आ रहे थे एकाएक स्वामी जी को दिखा कि वहां की जो बुद्धिस्ट मोनेस्ट्री है वहां पे जीसस ने रह कर के साधना की थी कोईकोई कहता है कि जीसस यहां पर तिबेट में भी आए थे और इसके रिलेटेड एक बात भी अपने साहित्य में ही है यह मोस्ट प्रोबेबली त्रिगुणा तीता अंद जी वही स्वामी जी को कहते हैं कि वो वहां की एक मोनेस्ट्री में गए वहां पर जीसस का चित्र देखा तो वो इस बात को उन्होंने बड़ी सीरियसली स्वीकार कर ली स्वामी जी किंतु नाराज हो गए कहा कि अरे कोई भी किसी का भी चित्र वो लिख दिया किसी ने दौर दिया हो तुमको इस इस बात पर विश्वास कैसे हो गया कोई विजन होना चाहिए या देखिए या तो कोई हिस्टोरिकल को रिलेटिव डॉक्यूमेंट होने चाहिए या तो अपना खुद का विजन होना चाहिए गड़बड़ करने वाले लोग तो बहुत सारी हजार बातें करते हैं तो वो किस तरह से हम मान लेंगे कि हां वो जीसस का चित्र है स्वामी जी लिखते हैं तुमने किस लिए किस तरह से जाना कि वो जीसस का जीशू का चित्र है घि शु का नहीं है घि शु अर्थात कि एक इस तरह से मैंने स्वामी जी कहते हैं कि दूसरे किसी व्यक्ति का नहीं है यह तुमको कैसे पता चला फिर स्वामी जी कहते हैं कि तुम यह सब बातों को आंख बंद करके स्वीकार कर लेते हो इस बात से तुम्हारी बुद्धि पर मैं निराश निराशा जन्म आई मैं निराश हो गया हूं तुम्हारी बुद्धि पे क्योंकि क्या है कि धार्मिक व्यक्तियों के जीवन के बारे में सत्य जितना चलता है असत्य भी इतना ही चलता है तो सत्य क्या है असत्य क्या है किसको स्वीकार करना किसको अस्वीकार करना वो अपना खुद का एक डिस्क्रिमिनेशन होना चाहिए जिसस तिबेट में आए थे इसके बारे में आपको कोई सॉलिड एविडेंस चाहिए जस्ट एक मठ के भीतर में जस्ट एक चित्र है और एक यूरोपीय रशियन ट्रेवलर था उसने अपनी किताब में कुछ लिखा है तो इन दोनों के कोरबेन कैसे हो गया ये रशियन ट्रेवलर तो अभी का है पिछले 100 200 साल का और जीसस तो आए होंगे यहां पे एटलीस्ट 2000 साल पहले तो कोई पूर्वा पर संबंध नहीं है यहां पे कि हां वह सही में आए थे बोलकर के यानी दोनों चीजें है कि एक तो कि इन सब चीजों अवतार पुरुषों के बचपन की कहानियां साधना की कहानी स्टडी किस तरह से करते हैं जिस तरह से यह सब बहुत डिटेल में नहीं मिलता है दूसरी ई और बहुत सारी अंधश्रद्धा एं भी चलती है बहुत सारे फेक न्यूज भी चलते हैं आज की लैंग्वेज में तो किसको स्वीकार करना किसको अस्वीकार करना वह एक सेंस ऑफ एक य एक शार्प दृष्टि हमारी होनी चाहिए तो इसलिए महाराज यहां पर लिखते हैं कि जीसस के इतना उदार जीवन जिसका की आलेखन जिसका कि चितार हमको गोस्पेल में मिलता है तो साथ में ही उनके बचपन के जीवन की बहुत कम ही बातें पाई जाती है आचार्य शंकर दिग्विजय दिग्विजय काहिनी मात्र ही सविस्तार लिपि बद्धो ए रूप अन्यत्र सर्वत्र आचार्य शंकर के दिग्विजय की कहानी ही बड़े विस्तार से लिपिबद्ध है किंतु उनकी साधना किस तरह से हुई इस तर इसके बारे में बहुत ज्यादा डिटेल हमको नहीं पता है देखिए हमको यह तो पता है कि शंकराचार्य अपने घर से यात्रा प्रारंभ करके ओमकारेश्वर गए थे ओमकारेश्वर में एक गुफा में उनको उनके गुरु गौड़ गोविंद पादा चार्य का दर्शन हुआ गोविंद पाद तो बहुत ही दीर्घायु थे बहुत सालों से सैकड़ों सालों से समाधि में मग्न थे किंतु जैसे ही यह बालक शंकर उनकी गुफा में प्रवेश किया वैसे ही वह समाधि में से आकर के उनको कहते हैं कि अरे तुमने मुझे इतनी राहत दिलवाई मैं इतने दिनों से तुम्हारी राह देख रहा था इतनी देरी से क्यों आए फिर ऐसा करके उन्होंने शंकर को सिखाने का प्रारंभ किया किंतु ये जो इनिशियल स्टोरी जो है कि हां इन गुरु और शिष्य का मिलन कैसे हुआ इसके बाद की जो डिटेल जो है वो डिटेल हमको इतनी नहीं मिलती फिर वही है कि भगवान शंकराचार्य ने 16 साल की आयु में सब कुछ अपना साधना भी समाप्त कर दी ये व्याख्या जो करनी थी टीका जो लिखनी थी भाष्य जो लिखना था प्रस्थान त्रय के ऊपर में वो भी लिख लिया और बाकी के 16 साल विभिन्न शहरों में जाकर के विभिन्न पंडितों से वाद विवाद करके उनको हरा कर के सनातन धर्म की अद्वैत धर्म की स्थापना की तो बाकी के जो 16 साल है शंकर दिग्विजय कहानी वो तो बड़ा ही फेमस है सबको पता है किंतु पहले 16 साल में किस तरह से साधना की थी इसके बारे में बहुत ज्यादा कुछ हमको देखने को नहीं मिलता है ए रूप अन्नत सर्वत्र और इसी तरह बाकी सब अवतारों के साथ में आचार्यों के साथ में है अभी इसके बाद का जो पैराग्राफ है उस वह भी बड़ा लंबा है तो उसको अभी हम कल देखते हैं आज यही तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण [प्रशंसा]
प्रश्न: अवतारों की साधना इसलिए नहीं लिखी गई क्योंकि पुरुषार्थ या स्वयं के प्रयास को उचित महत्व नहीं दिया गया। यही कारण है कि जब स्वामीजी कहते हैं कि फुटबॉल खेलना गीता पढ़ने से बेहतर है, तो कई लोग इसका विरोध करते हैं।
मस्तु देखिए देखिए स्वामी जी को सबसे पहला दर्शन हुआ था भगवान बुद्ध का यह जो बुद्धिस्ट ट्रेडिशनल क्लियर है आत्म दीपो भव अपना खुद का कल्याण अपने हाथ में है आपको नहीं भगवान पर विश्वास रखना है देवी देवताओं प यह तो मतलब सनातन परंपरा जिस तरह से वैदिक परंपरा चली आ रही है वैसी ये श्रमण प्रथा भी उतनी ही पुरानी है भगवान बुद्ध के पहले यह जो श्रमण प्रथा ऑलरेडी थी भगवान बुद्ध ने वो श्रमण का दर्शन भी किया था हालांकि अभी मैं भगवान भगवान कह रहा हूं अपना एक इंटरप्रिटेशन बिठा रहा हूं किंतु यदि भगवान शब्द हटा भी दे बुद्ध को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला आप चेष्टा करके मेहनत करके निर्वाण प्राप्त कीजिए तो दैट ट्रेडिशनल देयर इन अवर हिंदू मतलब विद इन दिस इंडियन सबकॉन्टिनेंट तो यह नया नहीं है वही है कि जो सिंथेसिस किस तरह से अक्रॉस द ट्रेडिशनल में अपने लिटरेचर में व्हिच इज वेरी सरप्राइजिंग ये लोग मिलकर के ठाकुर को भगवान डिक्लेयर कर ही देते कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था जो उनको फॉलो करने वाले हैं फॉलो करेंगे ही करेंगे किंतु इसके बावजूद यह जो वराह नगर मठ की स्थापना सन्यास संघ की प्रारंभ विचार वेरी सरप्राइजिंग इ इवेंट्स किंतु जद हिस्ट्री पढ़े तो फिर लगेगा नहीं इतना सरप्राइजिंग नहीं है वो बुद्धिस्ट ट्रेडिशनल देयर यह जो शंकराचार्य को प्रच्छन्न बुद्ध क्यों कहते हैं क्योंकि अब ईश्वर को ईश्वर को अस्वीकार नहीं करते हैं किंतु मुक्ति के लिए जो स्व चेष्टा करनी है वह स्व चषक मतलब त्याग के ऊपर में जो प्राधान्य है वह अद्वैत ट्रेडिशनल बार-बार कहते हैं कि अद्वैत ट्रेडिशनल करो क्यों जिससे कि यह त्याग की महिमा हम भूल ना जाए यह भागवत वगैरह का ज्यादा पाठ करके भक्ति में यदि ज्यादा चले जाएंगे फिर एक दिन प्रश्न आएगा कि ब्रह्मचर्य की क्या जरूरत है भक्ति ही यदि सब कुछ है तो फिर हम पूरा रास्ता ही भटक जाएंगे तो यह ब्रह्मचर्य त्याग यह ट्रेडिशनल के समय से महावीर के समय से शंकराचार्य से पूरी ठाकुर तक आई है तो ट इज कि एक और यह है ब्रह्मचर्य त्याग तपस्या साधना दूसरी और संपूर्ण शरणागति नवधा भक्ति यह तो फिर यह जो भाव है मधुर भाव दास भाव शांत भाव य दोनों का कितना सुंदर मिश्रण अपने संग में है आपको देखिए
प्रश्न: त्याग और शरणागति एक साथ रह सकते हैं। ठाकुर की साधना और उनका अवतारत्व दोनों ही महत्वपूर्ण हैं।
जब हम दवाई लेते हैं तो कोई भी डॉक्टर ऐसा नहीं कहता कि एक ही दवाई से आपके सब रोग दूर हो जाएंगे यदि बुखार हुआ है तो यह दवाई लो यदि कैंसर हुआ है तो दूसरी तरह की मेडिसिन लो यदि पेट में दर्द हो रहा है तो तीसरे तरह की मेडिसिन लो जिस तरह का डिसीज है उस तरह का मेडिसिन प्रिस्क्रिप्शन है तो कर्मयोग करो यदि मन एकाग्र हो गया है तो राजयोग करो यदि मन में एक तपस्या का मने यदि विल पावर बढ़ गया है तो यह ज्ञान योग करो या तो फिर यह यदि मान लीजिए कि बहुत ज्यादा में डिप्रेशन में चला गया हूं तो भक्ति योग करो यानी जो मन की जो विभिन्न अवस्थाएं हैं डायग्नोज करके उसके अनुसार आप योग कीजिए दैट इज द बेस्ट वे ऑफ लुकिंग एट दिस
प्रश्न: शुरुआत में अवतार की अपूर्णता या मनुष्य-भाव हमें अच्छे नहीं लगते लेकिन साधना में आगे बढ़ने के बाद वही हमारे मन को भाते है
मेरा जो एक अनुभव जाता है कि कोई भी किसी को स्वीकार तब करता है जबकि उनको कुछ अनुभूति होती है अभी जैसे मैं एक एग्जांपल दूं आपको वो लीमड़ी के जो बापा थे ना तो एक डिवोटा थे वहां पर दरबार लिमडी के दरबार लोगों का क्या है पूरा एकदम तो एक रहता है रफ एंड टफ नेचर फिर वह स्वामीनारायण के प्रति ज्यादा उनका होता है तो यह दरबार किंतु बाबा को बहुत मानते थे तो एक एक वैसे ही मेरा एक बार उनके साथ में बात हो रही थी बापा के जाने के बाद की बात है मृत्यु के बाद की तो उन्होंने कहा कि एक दिन ऐसा था मैं बड़ा डिप्रेशन में था ना कि ऐसा कुछ अहमदाबाद में था और उसी समय बापा के साथ में एक्सीडेंटली माने एक मुलाकात हो गई और मेरे मन का जो प्रश्न था उन्होंने उसी का जैसे कि एक उत्तर दे दिया बिना पूछे तब से लेकर मेरी उनके ऊपर बड़ी श्रद्धा हो गई है तो क्या है मेरा खुद का जो अनुभव जाता है राम कृष्ण विवेकानंद भावधारानी तो मेरे लिए है फिर आप फर्द एक्सप्लोरेशन जो करेंगे वह करेंगे किंतु जो इनिशियल एंट्री होती है ना वह हमारे किसी प्रॉब्लम का सोल्यूशन करके आती है दैट इज व्हाट अट्रैक्ट्स अस द मोस्ट एक बार भीतर में आ गए फिर ज्यादा फर्द अट्रैक्शन होता है या रिपलिंग होता है दैट इज वो बाद की बात है किंतु इनिशियल एंट्री ज्यादातर लोगों की इस तरह से होती है अभी क्या है कि हमारी मूवमेंट बड़ी यंग है पुरानी जो मूवमेंट होती है उसमें क्या बचपन से ही आप मान लीजिए जैन है तो जैन धर्म को आप फॉलो करेंगे उसमें क्या होता है पता है कि बाह्य आचरण सब तरह का रहता है किंतु भीतर में बहुत सीरियस एक डाउट रहता है या तो फिर जैसे हिडन नास्तिक हम कहते हैं ना कि बाहर के रूप से तिलक फिलक सब करते मंदिर में जाते हैं किंतु ऐसा कोई सीरियस उसमें विश्वास नहीं होता है तो यदि आप यंग मूवमेंट है या तो कन्वींस होकर के जिसमें प्रवेश किए हैं वह प्रवेश तब होगा जब कि आपका कोई सॉल्यूशन भीतर से आपको मिलता है फिर उसको फर एक्सप्लोर करेंगे