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Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 23 Mar 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग का पाठ इस सप्ताह करेंगे द्वितीय अध्याय का प्रथम चैप्टर साधक और साधना इसका आखिरी पॉइंट इति इति मार्ग से

भक्ति मार्ग द्वारा निर्विकल्प समाधि की प्राप्ति

निर्विकल्प समाधि का विवरण यह पॉइंट हमारा चल रहा है। शरद महाराज ने कहा कि मुख्यत्व हमको दो मार्ग देखने को मिलते हैं आध्यात्मिक जगत में नेति नेति का मार्ग और इति इति का मार्ग। नेति नेति मार्ग अर्थात कि ज्ञान योग त्याग की साधना और इति इति मार्ग अर्थात कि भक्ति योग ईश्वर के प्रति शरणागति प्रार्थना और ईश्वर के साथ में कोई भी एक संबंध बना करके वो भाव आराधना करना तो यह दो मुख्यत्व मार्ग दिखते हैं। अभी नेति नेति मार्ग से या ज्ञान मार्ग से निर्विकल्प समाधि प्राप्त होती है। यह तो जग जाहिर है। शंकराचार्य का जो पूरा शास्त्र के ऊपर में उपनिषद ब्रह्मसूत्र और गीता इसके ऊपर में जो उनकी जो व्याख्या है जो उनका भाष्य है उससे तो यही प्रतिपादित होता है कि अल्टीमेट जो एम है ज्ञान पथ का नेति नेति मार्ग का वह है ब्रह्म ज्ञान प्राप्ति कर्म और ज्ञान शंकराचार्य कहते हैं दो चीज है जब तक हम कर्म के क्षेत्र में है तब तक ज्ञान प्राप्त नहीं होगा। जिस क्षण ज्ञान प्राप्त हो गया कर्म संपूर्ण रूप से हमारे चित्त में से अदृश्य हो जाएगा। चित्त भी अदृश्य हो जाएगा। वैसे किंतु खैर तो वो शंकराचार्य का जो नेति नेति पथ और यहां पे किंतु देखिए कि जिस तरह से ट्रेडिशनल फिलॉसोफीस का डेवलपमेंट हुआ है शंकराचार्य कहते हैं निर्गुण निराकार ब्रह्म वही अल्टीमेट रियलिटी है और उसको प्राप्त करने के लिए एकमात्र पथ है ज्ञान पथ जबकि मधवाचार्य और रामानुजाचार्य इन दोनों का कहना है कि अल्टीमेट रियलिटी है सगुण गुण ब्रह्म और उनको प्राप्त करने का पथ है मार्ग है भक्ति या तो फिर शरणागति। तो यह तो दो ट्रेडिशनल पथ चले आ रहे हैं। यहां पर शरद महाराज जो क्लेम करते हैं या तो फिर हमको ठाकुर के जीवन में जो देखने को मिलता है वह यह है कि भक्ति मार्ग से आप निर्गुण निराकार ब्रह्मण की प्राप्ति कर सकते हैं। तो पहले तो यह शास्त्र सम्मत ही नहीं हुआ। उपल दृष्टि से तो हमको ऐसा ही दिखता है कि भक्ति मार्ग से सगुण ब्रह्म प्राप्ति होगी और ज्ञान मार्ग से निर्गुण ब्रह्म प्राप्ति। यह दो मार्ग तो समझ में आते हैं। भक्ति मार्ग से निर्गुण ब्रह्म प्राप्ति कैसे होगी? ये तो फिलॉसोफिकल ही कुछ हमको मिस एअलाइनमेंट दिखता है। फिलॉसोफिकल कंफ्यूजन ही दिखता है। किंतु देखिए कि ये जो फिलॉसोफिकल स्ट्रेटिफिकेशंस है, फिलॉसोफिकल स्ट्रेट जैकेट्स है कि यह द्वैतवाद है, यह विशिष्ट अद्वैतवाद है, यह अद्वैतवाद है, यह अजातिवाद है। यह वाद जो है सब वह तो बाद में डेवलप हुए हैं। अपने उपनिषद में देखिए इस तरह का हार्ड एंड फास्ट डिक्लेरेशन कि भक्ति मार्ग से निर्गुण निराकार ब्रह्म नहीं प्राप्त हो सकते। ये तो यह सब जो उपनिषद में नहीं है। बादबाद में यह सब बना दिए गए हैं। तो ठाकुर उपनिषद को फॉलो करते हैं। नहीं कि फिर यह सब स्ट्रेट जैकेट फिलॉसोफीस को। तो वो एक हमने देखा कि किस तरह से फिर शरद महाराज स्वामी शारदानंद जी महाराज लीला प्रसंग के लेखक क्या कहते हैं? भक्त जगत और जगत के भीतर में सर्व वस्तु और व्यक्ति को ईश्वर के साथ में संबंध युक्त देख के अपना लेता है। अपना कर लेता है। एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट स्टेटमेंट है। इति इति मार्ग या तो फिर भक्ति मार्ग से आप जैसे साधना करेंगे ईश्वर के ऊपर में आपकी शरणागति तो प्रकट होगी ही होगी। ईश्वर के प्रति आपकी भक्ति है, आपकी प्रार्थना है, वह सब ईश्वर की ओर धावित होगी ही होगी। किंतु जिस तरह से नेति नेति मार्ग या तो ज्ञान मार्ग कहता है कि जगत मिथ्या है। शंकराचार्य कहते हैं जगत मिथ्या है। गपादाचार्य उससे भी एक स्टेप आगे जाकर कहते हैं जगत स्वप्नवत है। जिस तरह से आप स्वप्न में जगत देखते हैं वैसे ही जागृत अवस्था में जो देखा हुआ यह जगत है तुर्य अवस्था में हमको पता चलेगा। वो स्वप्नवत ही था। तो वह तो और एक स्टेप ऊपर जाकर के अजातिवाद जगत की कभी रचना हुई ही नहीं थी। यहां तक कह लेते हैं तो वह क्या है? नेति नेति मार्ग है। त्याग का मार्ग, सन्यास का मार्ग, वैराग्य का मार्ग। जगत को छोड़कर के यह गिरी कंदराओं में जाकर के गुफा में बैठकर के नदी के तट पर विराजित होकर के हिमालय में भ्रमण करके हमको निर्गुण निराकार ब्रह्म की प्राप्ति करनी है। किंतु यह जो इति इति मार्ग है संसार में ही रहकर के संसार के साथ में जो कुछ भी जुड़ा हुआ है यह बंधु परिवार वर्ग पेड़ पौधे जीव जंतु जो कुछ भी है उन सबके भीतर में ईश्वर का ही दर्शन करके उनके साथ में मैत्री करुणा मुदिता और उपेक्षा का एक संबंध बांधना है। उनको उनके भीतर में भी ईश्वर का ही दर्शन करना है। तो इसके रिलेटेड हमने देखा भी सही कि ठाकुर की किस तरह की सब अवस्थाएं गई थी। एक नील वस्त्र पहनी हुई एक ऐसी स्त्री को देखा जिसका चरित्र अच्छा नहीं था। शी वाज ए प्रॉस्टिट्यूट। तो जैसे ही ठाकुर ने उसको देखा वैसे ही ठाकुर के मन में उसके प्रति मां सीता का उद्दीपन हुआ। आप देखिए कहां पवित्रता स्वरूपिणी मां सीता स्वयं और कहां यह एक स्त्री जिसका चरित्र अच्छा नहीं है। तो यह जो कंट्रास्ट है इट कैन नॉट बी बिगर। इससे बड़ा कंट्रास्ट हो नहीं सकता किसी दो व्यक्ति के भीतर में। इसके बावजूद ठाकुर को उसके भीतर में मां सीता का उद्दीपन होता है। मां सीता का दर्शन होता है। क्यों? क्योंकि जिस मां सीता को ठाकुर अपने हृदय में दर्शन करते थे। जिस मां सीता का ठाकुर ने अपनी आंखों से दर्शन किया। हमको पता है मां सीता वो गंगा में से प्रकट हुई। ठाकुर की ओर आ रही है। ठाकुर ने देखा कि इतना सुंदर स्वरूप है। देवी मूर्ति नहीं है क्योंकि त्रिनयना नहीं है। दो ही नयन है। दो ही नेत्र है। यानी कि है तो मानवीय मूर्ति किंतु चेहरे पर जो करुणा है जो चेहरे के ऊपर में ईश्वरीय दिव्यता झलक रही है। वो बहुत सारी देवी मूर्तियों में भी नहीं देखने को मिलती। तो कौन है ये स्त्री? ठाकुर यह सोच ही रहे हैं। उसी बीच में एक हनुमान कहां से हुप करके आकर के स्त्री के चरणों में लौट पड़ा। और तब ठाकुर को म भीतर में से ही यह बात प्रकट हुई। यह है जन्म दुखिनी सीता। पवित्रता रूपणी मां सीता स्वयं और वही मां सीता आकर के ठाकुर के हृदय में प्रवेश कर गई। आप सोचिए कि इतना बड़ा कंट्रास्ट हो नहीं सकता है। कहां यह नील वसन परिहिता स्त्री और कहां यह मां सीता जगत जननी मां सीता। तो इस स्त्री के भीतर में भी ठाकुर को मां सीता का दर्शन होता है। यानी कि ईश्वर के ही एक-एक किरण से यदि भक्ति मार्ग के हिसाब से आप देखें तो सभी के हृदय में वही ईश्वर विराजित है। ईश्वर की ही एक-एक किरण से इस विश्व में सब कुछ गठित हुआ है। तो यह क्या है? इति इति मार्ग है। और इस इति इति मार्ग से साधना करके फिर हमको किस तरह से निर्विकल्प समाधि प्राप्त होती है। यह फिर हमको शरद महाराज बताते हैं। तो इसके साथ में ही हमने यह भी देखा कि जैसे-जैसे किसी एक रूप के प्रति माने मेथड क्या है? किस तरह से यह भक्ति मार्ग से निर्विकल्प समाधि या तो फिर निर्गुण निराकार ब्रह्मण की ओर जाया जाता है। आप आराधना कर रहे थे सगुण ब्रह्म की और एकाएक आन पड़े निर्गुण ब्रह्मा। तो यह कैसे स्विच हो जाता है? तो यह स्टेप बाय स्टेप शरद महाराज हमको बताते हैं। पहले तो कहते हैं ईश्वर के कोई भी एक गुण या एक रूप की कल्पना जब उनके प्रति अनुराग पूर्वक ध्यान करके उसमें जब तन्मय हो जाएंगे तो फिर इसी रूप और इसी कल्पना की प्रीति के लिए सब कुछ कार्य करना इस भक्त का जीवन का लक्ष्य हो पड़ता है। तो इसके रिलेटेड हमने यह इंसिडेंट भी ठाकुर की यह जो महावीर भाव अह महावीर की दास्य भाव से जो साधना की पद्धति ठाकुर ने जो अपनाई थी वह भी हमने देखा कि किस हद तक ठाकुर दास्य भाव में तन्मय हो गए थे कि उनके देह में भी यह इवोल्यूशन जैसे कि स्पीड अप हो जाता है। इस तरह से उनके देह में भी यह सब परिवर्तन हमको दिखाई दिए थे। उनकी पूंछ का जो हिस्सा जो करोड़ रज्जू का जो आखिरी भाग है वह पूंछ की तरह 1 इंच जितना बढ़ गया था। तो ये भी हमने देखा कि किस तरह से रूप या गुण की कल्पना करते-करते उसके भीतर में साधक इस हद तक तल्लीन हो जाता है कि फिर उस गुण और रूप का अपने देह के भीतर में भी आविर्भाव होता है। बाहर में भी इसी रूप और गुण का उसको दर्शन होता है। तो यह भी हमने एक देखा और फिर अभी हम देखेंगे जैसे-जैसे इस रूप या गुण की कल्पना करते करते हम इसमें तन्मय और तल्लीन हो जाएंगे तो इस मूर्ति का हम अपने हृदय में आविर्भाव देखेंगे। हम जब ध्यान करते हैं जैसे कि हमारे क्लास में मैंने बताया था ध्यान के क्लास में ठाकुर कहते हैं दो तरह के ध्यान है। एक तो है शिव योग दूसरा है विष्णु योग। शिव योग का अर्थ क्या है? जब हम भ्रू मध्य में ध्यान करते हैं और उस समय अपने स्वरूप का चिंतन करते हैं। यह हो गया निराकार ध्यान या तो हो गया शिव योग। और विष्णु योग क्या है? जब अपने हृदय में हम ईश्वर की कल्पना करते हैं तो यह हो गया विष्णु योग। तो यह विष्णु योग के माध्यम से अपने हृदय में ईश्वर की जब कल्पना करते हैं तो होता क्या है? सर्वप्रथम तो ईश्वर का एक हाथ दिखता है, एक पैर दिखता है, कहीं सर दिखता है, कहीं कमर से ऊपर दिखते हैं तो कभी [गला साफ़ करने की आवाज़] उनके दो चरण दिखते हैं। तो फिर क्या है कि इस तरह से देखतेदेखते कभी संपूर्ण मूर्ति जो है उसका दर्शन नहीं होता। किंतु जैसे-जैसे हम ध्यान में साधना में आगे बढ़ते जाएंगे, यह संपूर्ण मूर्ति का भी दर्शन हो जाएगा। तो इसके रिलेटेड हमने रामलाल दादा की कहानी भी देखी थी कि किस तरह से उनको भी मानस नयन के सामने हृदय में ध्यान करतेकरते कभी हाथ दिखते थे, कभी पैर दिखते थे, कभी उनको सर दिखता था। किंतु संपूर्ण ईश्वर का दर्शन नहीं होता था। जबकि उन्होंने प्रथम फर्स्ट जनवरी 1886 को कल्पतरु दिन या तो फिर कहेंगे अभयदान ठाकुर का जो अभयदान का जो दिन है आत्म प्रकाश अभयदान वो जो उस दिन को ठाकुर ने जैसे ही उनको स्पर्श किया वैसे ही उन्होंने देखा कि हृदय में संपूर्ण इष्ट मूर्ति का दर्शन होता है। तो क्या है? यह तन्मयता की ओर की यह यात्रा है। सगुण ब्रह्म की उपासना करते-करते निर्गुण ब्रह्म तक कैसे पहुंचा जाता है? तो यह तन्मयता की या तो फिर एकाग्रता की यात्रा है। जितना हमारा मन एकाग्र होता जाएगा, जितना हमारा मन अपने इष्ट के श्री चरणों के ऊपर में इष्ट के ऊपर में आकृष्ट होता जाएगा। साथ-साथ में ही अपने मन से जो बाकी सब विचार है, बाकी जो सब डिस्ट्रैक्शन है, बाकी जितना भी यह बाकी की चीजें हैं, दूर होती जाएगी। ईश्वर ही एकमात्र रहते जाएंगे। साथ-साथ में ही एकाग्रता भी अपनी बढ़ती जाएगी। तो, यह एक हमने देखा था कि किस तरह से रामलाल दादा के जीवन में इस तरह से दिखाई दिया। और इसके बाद में नेक्स्ट स्टेप के ऊपर में भी हम गए थे वो हमने देखा खास करके कि किस तरह से ईश्वर के कोई भी एक रूप को इष्ट बोल करके इष्ट मान करके उनकी ही चिंता और ध्यान करना होता है। पहले पहले तो जब हम ध्यान करेंगे तो यह इष्ट मूर्ति सर्व अवयव संपूर्ण छवि मानस नयन के सामने आती नहीं है। कभी उनका हाथ कभी पैर वगैरह दिखता है। किंतु अभ्यास के परिणाम से जब ध्यान गंभीर होता है। इस मूर्ति सर्व अवयव संपूर्ण छवि मनुष्य के या तो भक्त के मानस नेत्र के सामने समयसमय उपस्थित होती है। ध्यान जब क्रमशः गंभीरतर होता जाता है। तब यह छवि जब तक मन चंचल नहीं होता तब तक स्थिर रूप से अवस्थान करती है। बाद में ध्यान की गंभीरता जितनी ही बढ़ती जाती है। यह मूर्ति चलती है, फिरती है, हास्य करती है, कथा वार्तालाप करती है और फिर जब ध्यान अत्यंत चरम पर पहुंच जाता है, इस मूर्ति को स्पर्श भी कर सकते हैं। तब इस मूर्ति को अर्थात कि अपने इष्ट के स्वरूप को हम संपूर्ण रूप से जीवंत बोलकर के हमको प्रतिभाषित होता है। तब हमको यह पता चलता है। हमको यह अनुभूति होती है कि यह इष्ट संपूर्ण रूप से जीवंत है। नरण ने ठाकुर को जो प्रश्न किया कि महाशय आपने ईश्वर का दर्शन किया है तो ठाकुर ने कहा कि सिर्फ देखा ही नहीं उनके साथ में वार्तालाप भी किया है और इतना ही नहीं तुमको भी मैं वही दर्शन करवा सकता हूं तो वह ईश्वर के साथ में वार्तालाप करना ईश्वर के साथ में नृत्य कीर्तन करना उनको स्पर्श करना ईश्वर जैसे कि जीवंत प्रतीत होते हैं यह जगत जो है वह धसा की तरह एक फोग की तरह दिख दिखने लगेगा जब ईश्वर स्वयं हमारे सामने आकर के इस तरह से मधुर लीला करते हैं तब और फिर क्या कहते हैं शरद महाराज जब इस इष्ट की मूर्ति को संपूर्ण रूप से जीवंत बोलकर के हमको अनुभूति होती है तब भक्त चक्षु को मुद्रित करके या उन्मिलित करके ध्यान करें ना क्यों वो उस मूर्ति को उस मूर्ति की सर्व प्रकार की चेष्टा को समभाव प्रत्यक्ष कर सकता है। शब्द बड़े-बड़े हैं किंतु उसका जो मीनिंग है बड़ा ही सहज है। हम आंख खोल के ध्यान करें ना कि आंख बंद करके ध्यान करें। यह एक बार हमारा तन्मयता पूर्वक इस इष्ट मूर्ति के ऊपर में मन लग गया और यह जो इष्ट है एक बार जीवंत हो गए तो हमको सर्व रूप से वह जीवित ही दिखेंगे। फिर हम आंख बंद करके ध्यान करें ना कि आंख खोल करके ध्यान करें। इस इष्ट को हम इस तरह से देखेंगे जैसे कि वह संपूर्ण रूप से जीवित है। तो इस बारे में हमने एक एग्जांपल ऑलरेडी देख लिया कि किस तरह से रामलाल दादा को वह जो कल्पना करते थे अपने इष्ट की अपने इष्ट को हृदय में विजुअलाइज करने का प्रयास करते थे तो क्या है कभी हाथ दिखेगा कभी पैर दिखेगा वगैरह वगैरह जब ठाकुर ने स्पर्श किया तो संपूर्ण इष्ट मूर्ति हृदय में दिखने लगी किंतु वह तो वहीं पर अटक गए यहां पे तो शरद महाराज कहते हैं कि हम अपने इष्ट को चलते फिरते वार्तालाप करते यहां तक कि हम उनको स्पर्श भी कर सकते हैं। यहां तक हम उनको जीवंत देखते हैं। तो रामलाल दादा के साथ में ऐसा हुआ कि नहीं पता नहीं। हृदय में एक बार संपूर्ण मूर्ति का दर्शन किया। किंतु फिर देखिए अपने संघ में आध्यात्मिकता का तो कोई ये लिमिटेशन नहीं है। तारेबाड़ा तारेबाड़ा जैसे बांग्ला में कहते हैं। इससे भी आगे और है। इससे भी आगे और है। वो जो वो जो ब्रह्मचारी है वो कठुआारे को कहता है। वो जो जंगल में लकड़ी काटने को जाता है। और आगे बढ़ो और आगे बढ़ो। पहले देखोगे तुम लकड़ी काटते हो ऐसे सामान्य पेड़ों को और थोड़ा सा आगे बढ़ोगे तो चंदन के पेड़ दिखाई देंगे। उसको काट के बेचोगे और ज्यादा पैसा कमाओगे। फिर और थोड़ा सा आगे बढ़ो तो रूपा का यह जो माइन है यह जो सिल्वर माइन दिखाई देगी। और आगे बढ़ोगे तो देखोगे कि यह तुमको गोल्डन माइन दिखाई देगी। और आगे बढ़ोगे तो यह डायमंड माइन दिखाई देगी। और यह फिर आज की लैंग्वेज में और थोड़ा सा आगे बढ़ोगे तो यह रेयर अर्थ जो यह सब एलिमेंट्स है वो सब दिखाई देंगे। तो यह क्या है कि जितना आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ेंगे उतनी ही उपलब्धियां बढ़ती जाएगी और रामकृष्ण संघ एक ऐसा है कि यहां पे उपलब्धियों की कोई लिमिटेशंस नहीं। उपलब्धियों का कोई अंत नहीं। तो रामलाल दादा तो यहां पर आकर के रुक गए कि हृदय में इष्ट का दर्शन हुआ। फिर बस वहां तक किंतु यह इष्ट चलते हैं, फिरते हैं। उनको

गोपाल माँ (अघोरमणी देवी) की कहानी

स्पर्श कर सकते हैं। उनके साथ में वार्तालाप कर सकते हैं। यह अनुभूति किसको हुई है? माने ठाकुर को छोड़कर के ठाकुर तो है ही है। सर्व अनुभूतियों के राजा भाव राज्य के राजा। किंतु इसके ठाकुर के अलावा भी एक भक्त है। वह है गोपाल की मां। गोपाल की मां की कहानी बड़ी ही सुंदर श्रुति मधुर कहानी है। वह एक पहले तो वह बाल विधवा थी। बहुत जीवन में तपस्या किया है। वह जो एक कठोर निष्ठा पूर्वक एक विधवा का जीवन जीना वह कि उन्होंने जी के दिखा दिया है। उस समय देखिए कि यह विधवा पुनर्विवाह को लेकर के काफी कुछ रिफॉर्म मूवमेंट चला था और एक तरह से अनिवार्य भी है कि एक बार एक स्त्री विधवा हो जाती है। फिर दुनिया भर के जो नीति नियम है समाज उनके ऊपर में बिठा देता है कि अच्छा खाना नहीं खाना है। सफेद वस्त्र पहनने हैं। बालों को काट देना है छोटा करके और यह फिर वगैरह-वगैरह शुभ प्रसंग में नहीं जा सकते। बहुत दुनिया भर का ऐसा सब कुछ विधवाओं के साथ में रहता है। हालांकि पुरुष जब उसकी पत्नी का मृत्यु हो तो उसके ऊपर में ऐसे कोई नियम नहीं। स्त्रियों के ऊपर में दुनिया भर के नियम तो खैर वो भी क्या करें? तो इस तरह से विधवाओं के जो भी कठोर नियम थे उस समय के यह जो क्रूल जो सोसाइटी थी वो सब नियमों का पूर्ण निष्ठा पूर्वक इस अोरमणि देवी ने पालन किया था। बहुत बाद की बात है। जब निवेदिता और ये जो निवेदिता जब अघोरमणि देवी का दर्शन करने को गई गोपाल की मां का दर्शन करने को तो इतनी प्रभावित हो गई कि गंगा के किनारे एक छोटी सा छोटा सा घर है। वहां पर बैठकर के सतत अनवरत जप करती रहती है। और म जीवन में इतनी निष्ठा और पवित्रता है। तो निवेदिता जब स्वामी जी के पास वापस आई वह बड़ी ही खुश होकर के उनका उनकी प्रशंसा कर रही है। तब स्वामी जी ने कहा था कि आ यू हैव सीन दैट ओल्ड इंडिया द इंडिया ऑफ प्रेयर्स एंड टियर्स इंडिया ऑफ फास्ट्स एंड विजिल्स दैट इंडिया हैज़ गॉन नेवर टू बी रिटर्न कि तुमने उस पुराने भारत का दर्शन किया है। अश्रुओं का भारत, प्रार्थना का भारत, फ़स्ट एंड विजिल्स, उपवास और तपस्यामय वह भारत। वो भारत चला गया। अभी कभी वापस नहीं आने वाला। तो खैर म दोनों ओर से है यहां पे आप विधवाओं के अभी आजकल के समाज में आप देखेंगे कि इस तरह की कठोरता किसी पर नहीं की जाती। किंतु कठोरता नहीं होती है। तो वैसे तो बहुत अच्छा है। किंतु सामने से चलकर के तपस्या कौन करता है? ये तो आपके ऊपर में तपस्या बिठा दी गई। 100 स्त्रियों पर इस तरह से तपस्या करने को कहा। उसमें से एक स्त्री ने कठोरता की तो उसको यह सब अनुभूतियां हुई। बाकी को नहीं हुई। अभी वो 99 स्त्रियों के लिए यदि यह सब नियम हटा दे तो वह जो एक स्त्री वो कंपलसरी तपस्या कर रही थी वह नहीं करके अभी उसको यह दर्शन भी कम हो जाएंगे। सो देयर आर मेनी ट्रेड ऑफ्स है यह सब चीजों में सोसाइटल इंजीनियरिंग जिसको कहते हैं सामाजिक व्यवस्था वो कभी कोई एक सिंपल रूल को फॉलो नहीं करती है जितनी भी आप तपस्या कठोरता बिठाइए उतनी ही पवित्रता बढ़ती जाएगी उतना ही ईश्वर की ओर आगे जाएंगे किंतु साथ में बहुत सारी स्त्रियों के साथ में क्रूरता भी होती है और यदि क्रूरता को हटाने का प्रयास करेंगे और सिर्फ स्त्रियों के प्रति क्यों पुरुषों के साथ में भी यही जब कठोरता है, सामाजिक बंधन है उसको हटाने का जैसे ही प्रयास करेंगे वैसे ही देखेंगे कि चरित्र की शिथिलता आन पड़ती है। वही जयराम भाटी की कहानी कि वो ब्राह्मण भोजन चल रहा है। एकाएक देखा ब्राह्मण लोगों ने कि दो ब्रह्मचारी परोसने के लिए पंगत में प्रवेश किए। तो वैसे ही हाहाकार हो उठा। यह तो क्वालपाड़ा के ब्रह्मचारी होंगे शायद। ये लोग पहचानते होंगे वो चिल्लाने लगे अरे यह कौन सी जात के हैं हमको परोस रहे हैं हमारी जात जाएगी आपको शर्म नहीं आती नॉन ब्राह्मण के द्वारा ब्राह्मण भोजन में आप परोसवाती है ऐसा बोल के वो खड़े हो गए मां तो बेचारी अभी क्या सोचे क्या ना सोचे फिर वो वहां का एक जो जमींदार का एक रिप्रेजेंटेटिव था उसको रिक्वेस्ट की जमींदार तो था मां का वो मंत्र शिष्य और यह रिप्रेजेंटेटिव जो था। वह भी था मां का मंत्र शिष्य। तो फिर इन लोगों ने जो गांव के जो कुछ बड़े लोग हैं उन्होंने मीटिंग फिटिंग करके यह सब ब्राह्मण लोगों को बुलाया कहा कि अच्छा गलती हो गई है। आप बताइए कि क्या करने से आप वापस जाकर भोजन करेंगे? तो उन्होंने कहा कि मां को थोड़ा सा दंड देना होगा। ₹25 ना कि ऐसा कुछ जमाना बांग्लादेश बोले उतना कुछ देना होगा। तो फिर इतना रुपया दिया तब कहीं जाके यह लोग बैठे भोजन के लिए। अभी यह कहानी पढ़ के निश्चय हम लोगों को तिरस्कार होता है। किस तरह के ब्राह्मण है कि मां शारदा का जगत जननी का इस तरह से अपमान करते हैं। किंतु अगेन यह दोनों ओर से कटता है। यदि ये लोग निष्ठा पूर्वक रहते हैं तो उनके जीवन में एक तरह की पवित्रता है। पवित्रता की उन्होंने रक्षा की है। युग युगांतर से ये पिछले 1000 साल में भारत पे जो सतत आक्रमण होते रहे तो किसने ये पवित्रता को मेंटेन किया किसने ये ट्रेडिशन को मेंटेन किया किसने यह अपने शास्त्रों को मेंटेन किया तो यही ब्राह्मण लोगों ने ही किया है। सो इट्स बोथ वे तो एनीवे यह है अघोरमणि देवी ब्राह्मण विधवा है। बाल विधवा है। कठोरता करके दुनिया भर के नियमों का पालन करके वो वहां पर रहती है। गंगा के किनारे एक ठाकुरवाड़ी है। यानी कि ठाकुर अर्थात कि मंदिर है। मंदिर के संलग्न एक बागान जैसा है। जैसे ये दक्षिणेश्वर है ठाकुर म कालीबाड़ी तो वैसे ही वो ठाकुरवाड़ी अर्थात कि वैष्णव परंपरा के भीतर में वो आता है। तो इस तरह से ठाकुरवाड़ी है। कामारटी बोल के एक जगह है। वहां पे वहां पे एक कमरा है। कमरे में रहती है। कठोरता करती है। पैसा ज्यादा है नहीं। थोड़ा बहुत जो गहने थे वह बेच के जो रुपए आए तो वह कंपनी के कागज में लगा दिए। कंपनी के कागज अर्थात कि यह ईस्ट इंडिया कंपनी की ये जो सिक्योरिटीज होती है उसमें वह डाल के वह इन्वेस्ट करके रखे थे। तो उसमें से जो थोड़ा बहुत इंटरेस्ट आ जाएगा उससे उसका काम चलता था। तो इस तरह से

गोपाल माँ श्री रामकृष्ण का प्रथम दर्शन करती है

तपस्या कर रही है। फिर एक दिन कहीं से पता चला कि वहां दक्षिणेश्वर में एक परमहंस रहते हैं। बहुत उनका नाम सुनने में आ रहा है। तो जाकर के ठाकुर का दर्शन किया। प्रथम दर्शन ठाकुर का। ठाकुर बड़े खुश हो गए और ठाकुर ने कहा कि आप कुछ देखकर के ही ठाकुर कहते हैं अच्छा मुझे कुछ खाने को दो। मेरे लिए खाने को क्या लाई हो? तो ये ब्राह्मणी ये बेचारी सोचती है कि अरे ये किस तरह के यह साधु है? मैं साधु का म कुछ अच्छी बातें सुनने के लिए आई हूं इनके पास में। कहीं वो धार्मिक बातें करेंगे। कहीं ये भक्ति की बातें करेंगे। नस बस खा मुझे यह खाना है। मुझे यह खाना है। बस यही सब बातें वो किंतु क्या है? जब वापस आ रही है सोचती है कि फिर यहां पर नहीं आऊंगी। किंतु वह स्वयं कहती है जब वह ठाकुर का कमरा छोड़कर के निकल रही है साथ में ही जैसे कि ठाकुर ने उनको आकर्षित करना प्रारंभ किया है। इस तरह से उनको आकर्षित कर रहा है कि जैसे कमरा छोड़ के निकल नहीं पा रही है। कैसे भी करके अपने को खींच करके घसीट करके कमरे से बाहर तो निकाला किंतु कुछ ही दिनों के बाद में फिर से लगा कि नहीं उनका दर्शन करने को जाना चाहिए। तो दर्शन करने को गई पैसा वैसा तो है नहीं तो जो थोड़ा बहुत बहुत ही अल्प मात्रा में एक दो पैसे थे तो वह सूखा बासी संदेश ऐसा लेकर के गई ठाकुर के पास में जैसे ही गई तो ठाकुर पहले ही पूछते हैं मेरे लिए क्या लाई हो खाने को अभी यह बेचारी सोचती है कि यह तो सुखाद संदेश है बासी संदेश है ठाकुर को तो भक्तगण इतना अच्छा अच्छा चीज खाने को देते हैं मेरा यह बासी संदेश कैसे खाएंगे किंतु अब वो ठाकुर बार-बार बोल रहा है खाने को दो मेरे लिए क्या लाई हो तो फिर बेचारी वो बासी संदेश देती है और ठाकुर बड़े प्रेम से खा जाते हैं तो उसकी आंखों में अश्रू आ जाते हैं। देखो ठाकुर मैंने इतना जो सामान्य चीज है उसको भी इतना भाव के साथ में ग्रहण करते हैं। फिर ठाकुर कहते हैं कि देखो तुमको इस तरह से पैसा खर्च करके संदेश लाने की जरूरत नहीं है। कुछ नारियल के लड्डू बना करके रखो। जब भी आओ तो वह लेके आना और फिर तरकारी वगैरह बना करके लेके आना। ठाकुर को तो वह पांच फोड़न वाली तरकारी बहुत अच्छी लगती है। तो तो ये बैगुन आलू और यह वड़ी यह सब बना के वो जो डाटा वगैरह डाल के जो तरकारी होती है बें सब स्वादिष्ट वो बना के लेके आना। तो ये गोपाल की मां अघोरमणि देवी वो बार-बार सोचती है कि यह किस तरह के साधु है बिना खाने बस एक ही बात है खाना खाना खाना मेरे लिए यह खाना बनाऊं मेरे लिए यह खाओ म यह खाना चाहता हूं बस किंतु जब भी वो वहां से जाने का प्रयास करती है हर बार देखती है कि ठाकुर इस तरह से आकर्षित करते हैं कि उनको वापस आना ही पड़ेगा तो यह तो इस तरह से कुछ समय तक चला एक दिन की बात है कि

गोपाल माँ प्रथम बाल गोपाल का दर्शन करती है

अभी यह ब्राह्मणी का जो रूटीन वगैरह जो होता है अह जो कठोरता करती थी तो वो संस्कार है तपस्या करने के तो सुबह को रात को 2:00 बजे उठकर के शौच वगैरह समाप्त करके जप करने के लिए बैठ जाती थी और 8 9:00 बजे तक यानी कि ऑलमोस्ट 6 टू से आवर्स कंटिन्यूस जप करती रहेगी। उसके बाद में स्नान वगैरह करके वह जो मंदिर है विग्रह की सेवा है वहां पर जाकर के जो थोड़ा बहुत सहाय कर सकती थी तो वह करती थी तो यह ब्राह्मणी का रूटीन था तो एक दिन की बात है ठाकुर के दर्शन करने के बाद की ही कि सुबह को 8 के आसपास हो गए होंगे यह जप समाप्त करके जो जप को ईश्वर को समर्पित करना होता है तो प्राणायाम करने का प्रारंभ किया है। तो उसी समय देखा कि बा उस पास में ठाकुर बैठे हुए हैं। तो ये बेचारी अघोरमणि देवी सोच रही है कि अरे ये ठाकुर आए कहां से? आए थे तो वो तो रहते हैं दक्षिणेश्वर में। एकाएक यहां पर आकर के कैसे उपस्थित हो गए और संपूर्ण रूप से माने कोई ऐसा नहीं कि दर्शन हो रहा है तो कुछ माने ऐसा नहीं जीवंत ठाकुर बैठे हैं। जिस तरह से दक्षिणेश्वर में अपनी खाट के ऊपर में बैठे रहते हैं। एग्जजेक्टली वैसे ही यहां पे आकर के बैठे हैं। ऐसा लगेगा नहीं कि यह इल्यूजन है ना कि हेलुसिनेशन है। बिल्कुल जीवंत लग रहे हैं। और हाथ फिर इस तरह से किया है। यह इस तरह का मुद्रा का अर्थ पता है ना बाल गोपाल की मूर्ति का यदि दर्शन किया होगा तो देखेंगे कि वो घुटनों के बल जो बाल गोपाल चलता है और ऐसा करके हाथ करता है। हाथ में रखा है लड्डू। तो गोपाल को लड्डू बहुत पसंद है। तो इस तरह से हाथ करके उसमें लड्डू रखा है। तो देखा ठाकुर बिल्कुल इस तरह से हाथ करके बैठे हैं। यानी कि हाथ में लड्डू है। बाल गोपाल की मुद्रा में बैठे हैं। अभी देखिए कि ये अघोरमणि देवी थी तो विधवा अपना खुद का तो संतान था नहीं किंतु साधना करती थी मातृभाव की। ईश्वर को भगवान कृष्ण को बाल गोपाल के रूप में देखती थी। स्वयं मां यशोदा है और बाल गोपाल की आराधना कर रही है। उनसे प्रेम कर रही है। उनकी केयर कर रही है। वही जो मातृभाव की साधना जो होती है ईश्वर को संतान के रूप में देखना। भगवान कृष्ण को बाल गोपाल के रूप में देखना। तो यह उनका गोपाल मंत्र था। गोपाल मंत्र का वह सतत जप करती थी। अभी एकाएक जब देख रही है कि यह जप समाप्त करके छ सात घंटा तो जप किया ही है। उस दिन सुबह को भी जप समाप्त करके आंख खोल के जैसे ही देखा बगल में ही ठाकुर बैठे हैं। वो विस्मित हो गई कि अरे यह ठाकुर सही में है कि मन का भ्रम है। बोलकर के जैसे ही हाथ बढ़ाकर के ठाकुर को स्पर्श किया साथ में ही ठाकुर अदृश्य हो गए और 10 महीने का बाल गोपाल उनकी जगह पर प्रगटित हो गया। बिल्कुल वह जो घुटनों के बल जो गोपाल चलता है ना वह मूर्ति आपने देखी होगी और हाथ इस तरह से है लड्डू मां मां से आहार खाने को मांग रहा है तो बिल्कुल ही इस तरह की मुद्रा में बाल गोपाल प्रकट हो गया और मां को कहता है कि मां ननी दो अर्थात कि मां मक्खन दो। जैसे ही गोपाल के यह शब्द सुने यह वृद्धा बेचारी जोर से चित्कार कर उठी और माने देखिए कि जीवन भर जिस बाल गोपाल की आराधना की है जब एक बार नजर के सामने आ जाए तो मन के भीतर में किस तरह का एक उन्मादित भाव प्रकट होगा। ये स्वामी जी को हमने देखा बहुत फिलोसोफी लगाते थे। बहुत बड़ी-बड़ी बातें करते थे। ठाकुर ने जैसे ही स्पर्श किया जैसे ही विश्व शून्य में मिलित होने लगा यह दर्शन होने से ही स्वामी जी चिल्ला उठे अरे तुम क्या कर रहे हो मेरे मां है मेरे बाबा है विश्व प्रसिद्ध विश्ववरेणीय महावीर स्वम ये महादेव स्वम स्वामी जी स्वयं जब प्रथम दर्शन होता है तो इस तरह से चिल्ला उठते हैं वो प्रथम दर्शन कहां इससे पहले जब भगवान बुद्ध का दर्शन हुआ था बालक थे अपने कमरे में बैठे हैं पढ़ाई कर रहे हैं। देखा एक सौम्य सन्यासी मूर्ति एक सन्यासी उनके सामने आ रहा है। तो चित्कार करके उठकर के भाग गए थे। बाद में उनको लगा कि भगवान बुद्ध का उनको दर्शन हुआ है। तो यह विश्व प्रसिद्ध स्वामी जी स्वयं पहले दर्शन के समय इस तरह से भय के मारे चिल्ला उठे थे। निर्विकल्प समाधि हुई थी वो काशीपुर में तो चिल्ला रहे। मेरे हाथ कहां है? मेरे पैर कहां है? मुझे कुछ अनुभूति क्यों नहीं हो रही? तो किसी ने जाकर के ऊपर में ठाकुर को कहा कि नरन इस तरह से चिल्ला रहा है। ठाकुर ने बोला वो मुझे बड़ा परेशान करता था। थाक शाला एक नहीं भावे। [हंसी] अभी साला इसी भाव में रहो कुछ समय मुझे बड़ा परेशान करता था अनुभूति के लिए समाधि के लिए। तो देखिए कि स्वामी जी जैसे स्वामी जी की यह अवस्था तो यह बेचारी तो एक अनपढ़ बाल विधवा है। वृद्धा हो चुकी है जीवन भर जिस गोपाल का जप किया है। एकाएक वही बाल गोपाल इस तरह से वो बाल मुद्रा में नजर के सामने प्रगटित हो और बोले कि मां मक्खन दो खाने के लिए तो बेचारी का कैसा रिएक्शन होगा? वो तो चित्कार कर उठी और ऐसा जोर से चित्कार किया आसपास में कोई था नहीं थैंकफुली वरना तो सब लोग इकट्ठा हो जाते हैं। वो तो बेचारी चित्कार कर उठी और साथ में ही रोना शुरू कर दिया कि देखो मैं तो एक दुखिनी कांगालिनी ब्राह्मणी हूं। मैं तुमको क्या खिलाऊंगी? यह मक्खन वगैरह मैं कहां से पाऊंगी? तो किंतु यह तो बाल गोपाल है। बाल गोपाल का तो कोई लॉजिक होता नहीं है बच्चों का। बच्चों को आप कहेंगे बच्चा यदि कोई जििद करेगा कहेगा कि मुझे यह चाहिए आप कहेंगे अरे घर में पैसे हैं नहीं यह सब कहां से लेके आए तो बच्चा जििद जिद्दी बच्चा थोड़ी ना सुनता है लॉजिक को वो ठाकुर की कहानी है ना ये काम वाली का बच्चा अपने जिस घर में काम करती है वह जो मालिक है और मालिक का लड़का और यह काम वाली बाई का लड़का यह दोनों के बीच में झगड़ा होता है तो यह काम वाली बाई का लड़का बोलता है वह मालिक के लड़के को कि तुम मुझे ज्यादा परेशान करोगे तो अपनी मां को बोल दूंगा। अभी उस बच्चे के भीतर में वह लॉजिक नहीं है कि उसकी मां का कोई बेचारी का सोशल स्टेटस नहीं है। यानी कि उसके बच्चे का कोई सोशल स्टेटस नहीं। जबकि यह मालिक का लड़का है। उसके पास में पूरा पावर है। इसके बावजूद ये बच्चे के मन में यह सब सांसारिक लॉजिक नहीं चलता है। तो यह तो फिर बाल गोपाल है। बिल्कुल शिशु है और वह भी बड़ा तूफानी है। तो अपने बाल गोपाल की कहानियां तो सुनी है। कितना सब परेशान करता है मां यशोदा को गोपियों को। तो यहां पे कौन सुनने वाला है? तो बार-बार बोल रहा है कि मुझे मक्खन चाहिए। खाने को दो। ये वो फिर रोना शुरू कर देगा। तूफान करेगा तो यह ब्राह्मणी बेचारी क्या करेगी? वो भी रोते-रोते फिर वो जो ठाकुर के लिए वो जो ठाकुर ने कहा था ना कि नारियल के लड्डू बना के रखना तो वो बना के रखे थे सूखे नारियल के लड्डू वो कुछ निकाले और फिर बाल गोपाल को खाने को दिए। और फिर क्या कहती है पता है कि बेटा गोपाल मैं तुमको इतनी खराब चीज खाने को दे रही हूं। बोलकर कि तुम मुझे इस तरह का खराब खाना मत खिलाना। तो जो भी है अभी बेचारी ने जीवन में बड़ी तपस्या की है। तो यह सब तो उनके मन में भी रहेगा। तो फिर ठीक है। अभी फिर से जप करने का प्रयास कर रही है। किंतु जप कौन करने देगा? ये शिशु गोपाल है तो वो तो इतना तूफानी है, इतना मिसवियस है कि कैसे उसके गोद में बैठ जाएगा, कभी सर के ऊपर में उठेगा, कभी माला खींच लेगा, कभी वो बालों को खींचेगा, कभी कुछ ना कुछ करेगा। तो फिर अभी जप कौन करेगा? फिर यह अघोरमणि देवी ने यह बच्चे गोपाल को अपनी गोद में लिया और पागलिनी की तरह दक्षिणेश्वर दौड़ के आ रही है। देखिए ऑलरेडी शरद महाराज ने कहा ना कि जैसे जैसे ध्यान तन्मयता बढ़ती जाती है वैसे वैसे ही जो मूर्ति जो इष्ट को हम फोटोग्राफ में दर्शन करते हैं वही इष्ट हृदय में प्रकट होंगे और फिर पहले शायद हाथ दिखेगा पैर दिखेगा सर दिखेगा वगैरह-वगैरह बाद में संपूर्ण इष्ट मूर्ति दिखेगी और फिर यहां तक तो रामलाल दादा पहुंच गए किंतु भाव तन्मयता जैसे-जैसे गहराई की ओर जाता जाएगा वैसे वैसे ही यह इष्ट मूर्ति जीवंत हो जाएगी। जीवंत होकर के हिलेगी, चलेगी, इधर-उधर माने मूवमेंट करेगी। उसके साथ में आप वार्तालाप कर सकते हैं। यहां तक कि आप उनको स्पर्श कर सकते हैं। तो यह सब कुछ अभी देखिए कि यह बेचारी दुखिनी ब्राह्मणी के साथ में हो रहा है। गोपाल जैसे कि बिल्कुल एक छोटे शिशु की तरह चारों ओर दौड़ा कर रहा है। कभी उनकी गोद में उठता है। कभी उनके बाल खींचता है। कभी जप की माला खींच लेता है। कभी चिल्लाता है। कभी डिमांड करता है मक्खन खाना है। खाने को दो वगैरह-वगैरह स्पर्श कर सकती है, वार्तालाप कर सकती है, हंसीज़ाक कर सकती है। गोपाल को डांट पी सकती है और गोपाल सामने में रोएगा भी सही डांट सुनकर के। तो ऐसे कि जैसे कि बिल्कुल जीवंत ईश्वर उनकी नजर के सामने प्रगटित हुए हैं। फिर यह अघोरमणि देवी यह बाल गोपाल को अपनी गोद में लेकर के पागलिनी की तरह दक्षिणेश्वर की ओर जा रही है। अभी देखिए

गोपाल माँ बाल गोपाल को लेकर श्री रामकृष्ण के पास दक्षिणेश्वर आती है

दक्षिणेश्वर में ठाकुर के कमरे में एक लेडी डिवोटी थी जो कि शरद महाराज उनको पहचानते थे। तो शरद महाराज लीला प्रसंग में यह वर्णन करते हैं। कहते हैं कि पहली बार जब गोपाल का दर्शन होने से यह ब्राह्मणी अघोरमणि देवी ठाकुर के कमरे में आई उस दिन का वर्णन वो जो लेडी डिवोटी वहां पर प्रेजेंट थी। उसने हमको बताया है। ऐसा बोलकर के यह वर्णन शरद महाराज लीला प्रसंग में करते हैं। क्या कहते हैं? यह लेडी डिवोटी क्या कहती है? वह कहती है कि मैं ठाकुर के कमरे में झाड़ू लगा रही थी। उस समय एकाएक देखा कि गोपाल गोपाल बोलकर के कोई चिल्ला रहा है। अब यह लेडी डिवोटी तो अघोरमणि देवी को पहचानती थी। क्योंकि अघोरमणि देवी बाय दैट टाइम रेगुलर ठाकुर के पास में आती थी। तो उन्होंने सोचा कि यह ब्राह्मणी है। इतनी कठोरता करती है। इतना सब उसके माने नियम विचार है। एक दिन ठाकुर को सर्व कर रही है। किसको? ठाकुर को स्वयं सर्व कर रही है। भात राइस सर्व करने के समय वो जो लकड़ी का वो जो हाथा होता है ना जिससे सर्व करना होता है ठाकुर के हाथ को स्पर्श हो गया। तो उसने क्या किया वो हाथा तो फेंक ही दिया किंतु जिस हांडी में से जो सर्व कर रही थी ठाकुर को वो हांडी का भात भी उसने नहीं खाया। बोला स्पर्श हो गया है बोल के यह भात नहीं खाऊंगी। अब दूसरा भात मेरे लिए बनाना है। माने नारायण स्वयं को स्पर्श करने वाली चीज वह फेंक करके दूसरा भात बनाएगी। ऐसा सब उसकी वो सब कठोरता का पालन कर रही है। यहां पर जगत जननी स्वयं नहबत में बैठी है। जगत जननी ठाकुर के लिए आहार बनाती है। फिर जो चूल्हा होता है ना वो मिट्टी का चूल्हा। वो मिट्टी का चूल्हा आपने गांव में देखा होगा कि वो मिट्टी का वो ऐसा एक यू शेप का रहता है। चारों ओर से बंद उसके भीतर में आप यह लकड़ी है या फिर चारकोल है या गोबर है यह आप डाल के उसको जलाएंगे ऊपर में हांडी रखेंगे तो उसको उन कहते हैं बांग्ला में वो मिट्टी का चूल्हा। तो जिस मिट्टी के चूल्हे में ठाकुर के लिए भात बनाया है। अभी अघोरमणि देवी के लिए भात बनाना है तो तीन बार तो इस मिट्टी के चूल्हे पे आपको गोबर लगाना होगा और फिर यह गंगाजल छिटकना होगा। तब वो उस चूल्हे पर बनाया हुआ भात यह अघोरमणि देवी आहार करेगी। इतना सब उनका विचार था। यह ऑर्थोडोक्स ही उनकी थी। अभी यही ऑर्थोडॉक्स ब्राह्मण बुढ़िया चिल्ला चिल्ला के गोपाल गोपाल बोल के दौड़ी आ रही है। तो यह जो लेडी डिवोटी वो सोच रही है कि अरे यह हो कौन सकता है? माने ये इस तरह से चिल्ला क्यों रही है? पता तो चल गया कि ये अघोरमणि देवी है। फिर जैसे ही अघोरमणि देवी ने कमरे में प्रवेश किया आश्चर्य की बात वो साड़ी कहां पर वो खुल जा रही है। वो ठाकुर के लिए वो कहीं से वो दही या इसका जुगाड़ करके लाई है और फिर ठाकुर को खिलाना चाहती है। और जैसे ही ठाकुर ने अघोरमणि देवी की यह अवस्था देखी ठाकुर स्वयं जैसे कि भाव में चले गए और अघोरमणि देवी की गोद में इस तरह से बैठ गए जैसे कि वो बालक गोपाल अपनी मां की गोद में मां यशोदा की गोद में बैठता है। तो यह जो लेडी डिवोटी ये वर्णन कर रही है वो कहती है कि अभी तक मैंने ठाकुर को भाव में किसी स्त्री को स्पर्श करते हुए नहीं देखा। सुना था कि उनकी जो गुरु थी ठाकुर की ये भैरवी ब्राह्मणी उनके भीतर में कभी-कभी मां यशोदा का आवेश होता था और वो ठाकुर को गोपाल भाव से अपनी गोद में बिठाती थी। किंतु वो तो भैरवी ब्राह्मणी ठाकुर की गुरु अभी ये जो रिसेंट जो घटनावली है ठाकुर ने भाव में किसी स्त्री को स्पर्श किया हो ऐसा तो मैंने कभी नहीं देखा। यह पहली बार देख रही हूं कि ठाकुर भाव में आकर के अघोरमणि देवी की गोद में इस तरह से जाकर बैठे हैं जैसे कि यह शिशु एक अपनी मां की गोद में बैठता है और इस तरह से भाव चलता ही गया चलता ही गया दोनों भाव में मग्न है। कितनी देर के बाद में ठाकुर के भाव का उपशम हुआ और वह जब अपनी खाट पे जाकर के फिर से बैठे और यहां पे भैरव ये जो अघोर मणि देवी ये विधवा ब्राह्मणी वो इतने आनंद में उतफूल होकर के पूरे कमरे में नाचती नाचती घूमती है। ब्रह्मा नाचे विष्णु नाचे ऐसा करतेकरते वो कुछ गान गातेगाते चारों ओर नाचती घूमती है। और फिर देखिए कि आंखों में से अश्रुधारा बह रही है। ठाकुर के मुंह में वह जो दही वगैरह ले आई थी। ठाकुर को यह खिला रही है। इस तरह से भाव में मग्न है कि इस तरह का भाव जैसे आपने कभी देखा नहीं। और ठाकुर भी हंसते-हंसते इसी लेडी डिवोटी को कहते हैं देखो देखो आनंद से भरपूर हो गई है। उसका मन अभी गोपाल लोक में चला गया है। तो वास्तविक उस दिन गोपाल की मां सही में गोपाल लोक में चलकर के एक जैसे कि एक अन्य तरह की वो हो गई थी। कहां यह ऑर्थोडॉक्सी कहां यह विचार यह कहां यह उनके नीति नियम कहां यह कठोरता कहां यह तपस्या सब कुछ अदृश्य होकर के जैसे कि मां यशोदा के भाव से संपूर्ण परिपूर्ण हो गई थी। इसके बाद में क्या होता है वह अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: ऐसे भी रूढ़िवादी लोग थे जिन्होंने माँ से भी दंड वसूली की. किन्तु कुछ ही रुपियो में उन्होंने अपना आत्म-सन्मान बैच दिया!

यू आर राइट किंतु देखिए स्वामी जी ने भी कहा है कि दो तरह के इंडियन आजकल जो दिखते हैं एक तो है कि जिसका करोड़ रज्जू पूरा टूट गया है पूरी वेस्टर्न कल्चर को संपूर्ण रूप से अपना लिया है और इंडिया का जो कुछ भी है सब गलत है। ऐसा बोलने वाले जो लोग हैं उससे तो यह ऑर्थोड ऑर्थोडॉक्स लोग कहीं बेटर है। उनका यह जो बैकबोन है इतना स्ट्रांग है अभी तक ऑर्थोडॉक्सी को पकड़ के रहे हैं। आपने ठीक ही कहा कि वह सब ब्राह्मण ₹25 में अपने को बेच दिया। किंतु सामने यह अघोरमणि देवी है। माने मां स्वयं जिस चूल्हे पर खाना बनाती है उस चूल्हे को तीन बार गोबर लगाना होगा। तीन बार गंगाजल छिटकना होगा। तब उनका खाना बनेगा। ठाकुर को स्वयं परोसते परोसते जो पात्र टच हो गया हाथा जो टच हो गया हाथा तो फेंका ही गंगा में वह पात्र में से भात भी नहीं खाएगी दैट इज अनदर एक्सट्रीम लेवल ऑफ ऑस्टेरिटी एंड ऑर्थोडॉक्सी

प्रश्न: स्वामीजी ने कहा की -- the India of prayers and tears, of vigils and fasts, that is passing away, never to return! लगता है की भारत से विराग का आदर्श चला ही जा रहा है. हमारे आश्रमों में भी अभी प्रवृत्ति ही ज्यादा दिखाई देती है.

ना किंतु आप यहां पे थोड़ा दो कांसेप्ट को मिक्स कर रहे हैं। स्वामी जी जो कहते हैं द इंडिया ऑफ प्रेयर्स एंड फास्ट्स प्रेयर्स एंड टियर्स फास्ट्स एंड विजिल्स दैट डजंट मीन एक्सक्लूसिवली ज्ञान मार्ग क्योंकि भक्ति मार्ग अोरमणि देवी तो भक्ति मार्ग की ही साधिका थी। शरद महाराज का जो बेसिक पॉइंट है कि भक्ति मार्ग से आप निर्विकल्प समाधि की ओर कैसे जा सकते हैं? दैट इज द पॉइंट। और यह पॉइंट प्रारंभ करने से पहले शरद महाराज ने कहा कि भक्ति मार्ग हो कि ज्ञान मार्ग हो त्याग तपस्या वैराग्य इज कॉमन टू बोथ। सो दैट इज दैट कि बिना वैराग्य तपस्या के वो ईश्वर की ओर आप आगे नहीं बढ़ सकते। चाहे ज्ञान मार्ग से हो कि चाहे भक्ति मार्ग से हो। किंतु यहां पर जो स्वामी जी बेसिकली जो कहना चाहते हैं कि इस लेवल की ऑस्टेरिटी जो है ना अभी मिलना मुश्किल है। आप देखिए इवन मां को देखिए मां से ज्यादा पवित्र कौन हो सकता है। एट द सेम टाइम अघोरमणि देवी जिस तरह से विधवा का जीवन बिताती थी। इवन मां भी इस तरह की कठोरता नहीं की है। वो जो हमने ऑलरेडी देखा कि पूरा सफेद वस्त्र नहीं पहनती थी। वो लाल बॉर्डर वाली साड़ी को बॉर्डर फाड़ करके पतली लाल बॉर्डर वाली साड़ी मां पहनती थी। हाथों में चूड़ियां पहन करके रखी है। खाने-पीने में इस तरह का कोई ऑस्टेरिटी मां ने नहीं किया। जब कामरार पुकुर में रहती भी थी तो बहुत सारे लोग कहते थे मां ने बाल नहीं कटवाए। विधवाओं की तरह नहीं रहती है। तो अभी चलो मां के बारे में तो यह है कि मां तो नित्य सधवा है। किंतु इवन बाद में भी भारत में अभी ऐसा हो ही नहीं सकता कि विधवाओं को इतनी कठोरता करनी पड़े। सो दैट वे अप टू एन एक्सटेंट वो कठोरता है वो इंपोज की गई है। आप अपनी चॉइस से करें। दैट इज वन थिंग। बहुत सारा कुछ इंपोज किया गया है। सो स्वामी जी कहते हैं कि इस तरह का भारत कभी वापस नहीं आएगा। यानी दोनों अर्थ से आप कह सकते हैं। एक तो लोगों के ऊपर में आप इंपोज नहीं कर सकते कि अब विधवा को इसी तरह का लाइफ लीड करना है। एक चीज दूसरा कि ये जो ईश्वर प्राप्ति के लिए जो सिंसियरिटी होती है उसके लिए जो वंटियरली तपस्या करते हैं वो तपस्या भी वापस नहीं आएगी। माने इवन रामकृष्ण मिशन का ही आप देख लीजिए। ठाकुर मास्वामी जी ने जो तपस्या की वो बाद की जनरेशन में कोई नहीं कर पाएगा। वीरानंद जी ने जो तपस्या की वो हम लोग नहीं कर पाएंगे। यानी कि उत्तरोत्तर जिसको हम हार्ड कोर तपस्या कहते हैं वो तो डाउन जाने ही वाला है। सो दैट इज व्हाट बेसिकली स्वामी जी मींस।

प्रश्न: हमारी तपस्या का स्वरूप भी बदल रहा है. बात सही है की परंपरागत तपस्या की तरह ही कर्मयोग में भी उतनी ही तपस्या है. परन्तु गोपाल माँ की तरह परंपरागत तपस्या अभी चली जा रही है.

ना यू आर राइट। स्वामी जी ने स्वयं तो कर्म योग का प्रचलन इसलिए किया आपने परफेक्टली कहा वो चेहरा पूंजी में अपने प्रभानंद जी हो ना कि फिर ये जो कल्याण महाराज हो अपने कनखल के कल्याणानंद जी हो कनखल के सो यू आर राइट अब जैसे राजकोट में भूतेश आनंद जी ने तपस्या की है नागपुर में आप देखेंगे भास्करेश्वर आनंद जी का है यहां पे आप बेलगांव में देखेंगे पुरुषोत्तमानंद जी है सो दे आर ग्रेट साधुस इन दिस जनरेशन कि यू आर राइट के सुबह को 2:00 बजे से 9:00 बजे तक जप नहीं किया है बट अदरवाइज उनके लाइफ का यह जो ऑस्टेरिटी है व्हिच वाज़ नॉट ए बिटलेस देन व्हाट दे डीड सो यू आर राइट दैट वेयर इसलिए स्वामी जी ने कर्म योग का प्रचलन किया

प्रश्न: हम हमेशा सोचते रहते है की इतना सा responsibility चला जाये बस हम कर्म समाप्त कर सिर्फ साधन-भजन ले कर रहेंगे। परन्तु responsibility कभी समाप्त नहीं होती। हमारे लिए तो अभी स्वामीजी अपने प्रवचन God in everything में जो कहते है, इसी संसार के भीतर रह कर साधना करनी है. स्वामीजी ने ठीक ही कहा की -- the India of prayers and tears, of vigils and fasts, that is passing away, never to return!

ना यू आर राइट आप देखिए ना अभी आप अपने प्रेसिडेंट महाराज को ही देखिए म सपोज टू बी कि 90 प्लस है तो एक जगह पे बैठ के जप ध्यान करना है वो नहीं एव्री मंथ उनके लंबी-लंबी जर्नी होती है जहां पे भी जाएंगे प्रेसिडेंट महाराज आपको उत्सव में वो वो फंक्शन में इनोगेशन में दिख जाएंगे। सो ऐसा यू आर राइट। अब जैसे शरद महाराज ने ही कहा कि भक्त क्या करता है? संसार के सभी चीजों को ईश्वर के साथ में जोड़कर के सभी के भीतर में ईश्वर विद्यमान है। ऐसा भाव रख के सबके साथ में वर्तन करता है। अदरवाइज उस नील वसंत पहनी हुई स्त्री के भीतर में मां सीता का दर्शन सच ए कंट्रास्ट। राइट? सो म जगत के भीतर में ईश्वर का दर्शन करना। यह तो ठाकुर ने ही प्रारंभ कर दिया है। और गोपाल की मां की कहानी समाप्त नहीं हुई। यह तो प्रारंभ हुई है। बाद में शी हरसेल्फ विल कम टू द सेम कंक्लूजन। उनका जो इवोल्यूशन हो रहा है कि ये जितनी आचार निष्ठा थी, जितनी तपस्या थी सब कहां वो बह जाएगी। पहले यह सब कह दिया जिससे कि अभी बाद का जो ट्रांसफॉर्मेशन है दैट यू कैन फाइंड अ कंट्रास्ट। ये सॉलिड कंट्रास्ट उनके लाइफ में है। सो फ्रॉम ठाकुर हिम ऑनवर्ड्स ये अघोरमणि देवी ऑनवर्ड्स दैट युग हैज़ स्टार्टेड। वो बात है यहां तक कि उन्होंने जप की माला गंगा में फेंक दी कि जरूरत क्या है जप करने की? जिस गोपाल का दर्शन इतना साक्षात हो रहा है तो जप करने की क्या जरूरत है? फिर ठाकुर ने कहा कि देखो तुमको चा तुम यदि चाहती हो तो इसके लिए जप करो। इसके कल्याण के लिए। तो फिर उन्होंने सोचा कि दिन भर में बैठ के क्या करोगी? तो फिर एक दूसरी माला परचेस की और ठाकुर के कल्याण के लिए जप कर रही है। सो हां माने ऑलरेडी निवेदिता जिन गोपा अघोरमणि देवी को मिली शी इस ऑलरेडी रिफॉर्म्ड अोरमणि शी इस ऑलरेडी ट्रांसफॉर्म्ड ओरिजिनल को यदि मिलती तो क्या होता ओरिजिनल अघोरमणि देवी उनसे बात भी नहीं करते [हंसी] दैट अरमणि देवी आल्सो गॉन ये ट्रांसफॉर्मेशन हम करेंगे डिस्कस अ कंप्लीट ट्रांसफॉर्मेशन कि जब से यह दर्शन हुआ तब से

प्रश्न: ठाकुर भी कही एकांत में छुप कर तपस्या करना नहीं चाहते थे. उन्होंने भी भक्तो को आमंत्रण दिया। उस निल वसन पहनी हुई स्त्री में माँ सीता का दर्शन किया।

और सिर्फ देखा नहीं दब करके दर्शन हुआ माने इट्स नॉट एजमशन और ए बिलीफ दैट ही इज सीइंग मदर इन हर दर्शन हुआ माने ऐसा करके बोल दब करे दर्शन हो म ऐसा करके दर्शन हुआ व्हिच इज इवन ग्रेटर ठाकुर तो कोई लॉजिक पे भरोसा करके नहीं चलते थे ना उनको तो मां सब कुछ दिखा देती थी मास्टर महाशय ने कहा है ना कमजोर लोगों की तरह उनको किताबों पर भरोसा रखने की जरूरत नहीं है। मां उनको सब दिखा देती है। [हंसी] तो दिखा उनको ठाकुर का तो रिवर्स था ना वो वो वृंदावन काशी में बैठे थे। राजा बाबू की बात सुन रहे फिर बोले मैं कहां पे आ गया तो मां को कहते तू यमा के कोथाई नहीं ली। मैं कहां पे लेके आ गई मुझे? वह यहां पे यही सब विषय की बात सुननी पड़ती है। एटलीस्ट दक्षिणेश्वर में ये तो नहीं सुनना पड़ता था। [हंसी] और ठाकुर प्रैक्टिकल भी बहुत है। एक बार हृदय बहुत अत्याचार कर रहा था। सोचा मैं चला जाऊंगा कहीं तो सोचा हिमा यही वो काशी ना कहीं पे चला जाऊंगा फिर सोचा कि कपड़े तो साथ में ले जाने पड़ेंगे अच्छा ठीक है कपड़े ले जाएंगे फिर सोचा पैसा भी तो साथ में चाहिए किंतु पैसा तो मैं स्पर्श नहीं करता इसलिए फिर मैं नहीं जाना हुआ [हंसी] नहीं जाता हूं जाने दो कौन पैसा लेके जाएगा

प्रश्न: आखिर में तो हम जहां है वही रह कर हमें साधन-भजन कर लेना है. माँ भी तो संसार में रही.

इसीलिए ठाकुर मां स्वामी जी तीनों को एक साथ में समझ समझना है। हम सिर्फ ठाकुर को पढ़ेंगे तो अब देखिए ठाकुर के भीतर में सब था। किंतु वो क्या है कि मैनिफेस्ट वही होता था जो कि उस पर्टिकुलर सिचुएशन में रहते थे। मां रहती थी संसार में रहती थी। सो उस तरह से मैनिफेस्ट हुआ है। स्वामी जी पूरा ग्लोब ट्रोटर थे तो उस तरह से मैनिफेस्ट हुआ है। सो दैट वी हैव टू टेक थ्री एस्पेक्ट ऑफ द सेम रियलिटी। [हंसी] ना मैं इसीलिए प्लान किया था कि पूरा पांच दिन कंटीन्यूअस मिले तब स्टार्ट करेंगे क्योंकि अभी उनका पूरा ट्रांसफॉर्मेशन आखिर में स्वामी जी के साथ में फाइट वो सब होने वाला है। [हंसी] ओम