Skip to transcript
ClassesSaradakosh

Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : अवतरणिका || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 20 Mar 2025

prayer

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा लिपिबद्ध भाग दुई भाग दो ठाकुर की साधना का वर्णन है साधक भाव। उसका अवतरणी का हम देख रहे हैं। हमारा जो

ठाकुर कहते है की जो साधक जिस भाव का आश्रय ले कर साधना करते है, उस भाव में विघ्न नहीं खड़ा करना है

पॉइंट चल रहा है कि ठाकुर का जो मुख्य एक उपदेश है कि किसी का भाव भंग नहीं करना है। इसका क्या अर्थ हुआ? हम सब अपनी साइकोलॉजी के अनुसार, अपनी क्षमता के अनुसार, अपने कर्म के प्रवाह के अनुसार अपनी-अपनी एक साधन पद्धति हम लोग एक फॉलो करते हैं। उस साधन पद्धति को फॉलो करके हमको ईश्वर ज्ञान ईश्वर का दर्शन होगा या तो आत्मज्ञान प्राप्त होगा या तो ब्रह्म ज्ञान प्राप्त होगा या तो ब्रह्म निर्वाण प्राप्त होगा। व्हाटएवर जो भी हमारी साधना के अंत में सर्वोच्च पॉइंट है वहां तक हम पहुंच जाएंगे। तो जिसका जो भाव है जिसकी जो कैपेसिटी है जिसकी जो साइकोल साइकोलॉजी है जिसका जो प्रोफाइल है उसके अनुसार उसको साधना करने दो। कभी भी जाकर के किसी को ऐसा मत कहो कि तुम जिस तरह की साधना कर रहे हो या तो तुम जिस ईश्वर को फॉलो कर रहे हो या तो जिसको तुमने इष्ट माना है या तो जो तुम्हारे गुरु है वह ठीक नहीं है या तो फिर उनके भीतर में कोई सत्व नहीं है या तो उनके भीतर में कोई शक्ति नहीं है जो कि तुमको तुम्हारे जो सर्वोच्च गंतव्य पथ है जो तुम्हारा अल्टीमेट एम है तुम्हारे रास्ते का तुम्हारी जर्नी का वहां तक तुमको नहीं पहुंचा पाएंगे ऐसा कह के किसी के मन में भी भ्रम नहीं खड़ा करना है तो यह भाव जो है उसके बारे में ठाकुर पूरा यहां पे शरद महाराज एक पूरा उदाहरण देते हैं। और इसी भाव के साथ में देखिए कि एक

ठाकुर, माँ द्वारा कुल-गुरु प्रथा का सन्मान

पॉइंट मैंने अपने साहित्य में खास करके लक्ष्य किया है कि बंगाल में खास करके इस तरह की प्रथा होती है जिसको वे लोग कुलगुरु कहते हैं। अर्थात कि अब जैसे एक फैमिली फिजिशियन होता है कि आपके फैमिली में कोई भी बीमार होता है तो उसको उस फैमिली फिजिशियन के पास में ले जाइए। फैमिली डॉक्टर के पास में ले जाइए। जिससे क्या होगा कि वह आपके परिवार का फैमिली का वो जो हिस्ट्री है वह जेनेटिक हिस्ट्री है। आप यदि पिताजी को डायबिटीज है तो लड़के को डायबिटीज की संभावना है। वो पूरा एक वो सब मेडिकल हिस्ट्री उनको पता होता है। वह जो फैमिली डॉक्टर को तो उसके अनुसार वह आपको प्रॉपर ट्रीट कर सकता है। तो बंगाल में खास करके इस तरह से फैमिली गुरु की कुल गुरु की प्रथा है। उस समय थी एटलीस्ट जिस समय यह सब साहित्य लिखा गया था। तो उस समय मैंने बार-बार देखा है अपने साहित्य में ठाकुर ठाकुर के बारे में तो नहीं किंतु खास करके मां और राजा महाराज कि यदि कोई दीक्षा लेने को आता है तो यदि यह पता चले इनको कि इनके कोई कुल गुरु है तो पहले ही कहेंगे कि कुल गुरु के पास से ही दीक्षा क्यों नहीं लेते फिर दूसरी बात कहेंगे कि अच्छा यदि हमारे पास में दीक्षा ली है तो या तो राजा महाराज या तो मां वह तो उनके कुल गुरु हुए तो या तो फिर वह उनके गुरु हुए तो तो भले ही यहां पे बेलूर मठ में या तो मां के पास में जयराम बाटी में आपने वह फिर गुरु है तो उनको प्रणामी भी देनी है। उनको कुछ फल सब्जी वगैरह जो कुछ भी है आपको उनको कुछ ऑफरिंग तो करना है। बहुत सारे डिवोटी रेगुलर बेसिस पे कुछ ना कुछ ऑफरिंग करते रहते हैं। तो भले ही चाहे आप यहां पे आकर के दक्षिणा दे, प्रणामी दे वगैरह कुछ भी दे, ऑफरिंग देते रहे। किंतु आपके जो कुल गुरु है उनका वह जो आपको देना होता है नियम के अनुसार उनको प्रणामी देनी होती है उनको ऑफरिंग देना होता है वो आप बंद मत कीजिएगा क्योंकि ठाकुर और मां और स्वामी जी यह लोग तो कोई पुरानी प्रथाओं को तोड़ने के लिए नहीं आए थे। पुरानी प्रथाओं के फाउंडेशन के ऊपर में ही नई जो विचार पद्धति है उनकी नई विचार पद्धति भी नहीं कहेंगे। ऐसा कहेंगे वही सनातन वेद वेदांत की जो विचार सरणी है उसको आधुनिक भाषा में उन्होंने व्यक्त किया है प्रोजेक्ट किया है तो वह पुराने फाउंडेशन के ऊपर में ही इसको बनाना है। इसके लिए जहां पर भी यह लोग पता चले कि किसी भी भक्त का या तो फिर किसी दीक्षार्थी का जो दीक्षा प्राप्त करना चाहता है उसका कोई कुल गुरु है तो पहले कहेंगे कि या तो उससे दीक्षा लो कुल गुरु के पास से या तो फिर कुल गुरु को जो उनकी प्रणामी नियमित रूप से देनी चाहिए आपके परिवार की ओर से आपकी फैमिली की ओर से वह देते रहिए। तो मुझे उस समय थोड़ा आश्चर्य होता था कि इतने कुल गुरु की रिस्पेक्ट करने की क्या जरूरत है? अभी यह बात है कि किसी को भी रिस्पेक्ट देना, किसी का भी हक छीन नहीं लेना। अस्तेय जिसको कि कहते हैं वह तो अपने ठाकुर मा स्वामी जी रामकृष्ण भावधारा में वह तो एक अपने डीएनए में ही यह है। अपनी ब्लूप्रिंट में ही यह है। उसका तो कोई प्रश्न ही नहीं है। किंतु यहां पर जब हम यह पढ़ते हैं कि किसी का भी भाव नष्ट नहीं करना है। तो उसके साथ में उस बात को भी हम जोड़ सकते हैं कि अभी उनके फैमिली का जो एक भाव रहा है तभी तो उनको फैमिली के गुरु के रूप में स्वीकार

ठाकुर के बड़े भाई रामकुमार रानी रासमणि द्वारा निर्मित काली मंदिर में अन्नभोग की शास्त्रीय अनुमति देते है

किया होगा। अभी जैसे रानी रासमणि है। अभी रानी रासमणि के भी कुछ फैमिली गुरु थे। उनके कुल गुरु थे जो कि ब्राह्मण थे। किंतु जब यह काली मंदिर की प्रतिष्ठा करने की बात आई तो सब चारों ओर यह संदेह उठने लगा कि रानी रासमणि तो ब्राह्मी या तो क्षत्रिय इस तरह की उच्च जाति की नहीं है। वह तो कैवर्त है। कई वर्त यानी वह मछली पकड़ने वाले इस तरह की कोई कास्ट उस समय की रही होगी। जो भी है उतना डिटेल में मैं नहीं जाना चाहता। किंतु वो उच्च कास्ट की नहीं है। हाई कास्ट की नहीं है कि जिनके द्वारा बनाए हुए मंदिर में जो जो लोग अपने को स्टैंडर्ड ब्राह्मण कहते हैं वे लोग आकर के उसमें पूजा करें। तो फिर अभी और यह ब्राह्मण जो थे जो अपने को बड़ा माने सन्माननीय समझते थे। अपने सभी नियम का पालन करना है। ऐसा समझते थे। वे लोग क्या करते थे? रानी रासमणि जैसी इतनी चरित्रवान भक्तिमती महिला को तो वह नीच कुल की समझते ही थे। नीच जाति की समझते ही थे। साथ-साथ में उनके जो ब्राह्मण गुरु हैं उनको भी शूद्र के लेवल पर रखते थे। वरना तो आप शूद्र के गुरु होने को ही क्यों जाएंगे? शूद्र के गुरु हुए मतलब आप ब्राह्मण होने के बावजूद शूद्र तुल्य है। इस तरह का उस समय भेदभाव था। तो उस समय ऐसा हुआ कि यह अभी क्या है कि रानी रासमणि अपने गुरु की परमिशन लेकर के यदि वहां पर काली मंदिर की ओनर या तो फिर मालिक होकर के वही काली मंदिर में अन्न भोग दे तो वह अन्न भोग ग्रहण करने को कौन आएगा? बाकी सब तो आ जाएंगे किंतु यह जो तथाकथित लब्ध प्रतिष्ठित जो प्रेस्टीजियस ब्राह्मण कास्ट है वे लोग तो नहीं आएंगे तो इसका कोई विधान उनके कुलगुरु की ओर से नहीं हो पा रहा था तो फिर उस समय रामकुमार थे वहां पे ठाकुर के बड़े भाई झामापुकुर बोलकर के कोलकाता में एक जगह है वहां पर उनकी चतुष पाठी चल रही थी वह टोल संस्कृत पाठशाला तो वहां से एक विधान आया कि यदि रानी रासमणि यह पूरी संपत्ति काली मंदिर पूरा अपने कुलगुरु के नाम कर दे या तो किसी ब्राह्मण के नाम कर दे तो और फिर अपने को सिर्फ वहां की व्यवस्थापक के रूप में रखें तो फिर वहां पर अन्नभोग दिया जा सकता है और वहां पर दिए हुए अन्नभोग को ग्रहण करने के लिए बाकी सब ब्राह्मण लोग भी आएंगे। अभी यहां पर रानी रासमणि ने एग्जजेक्टली वही किया कि काली मंदिर अपने कुलगुरु के नाम कर दिया और वह खुद वहां की व्यवस्थापक होकर के रही और फिर जब यह प्रश्न आया कि मां काली की पूजा कौन करेगा तब उस समय किंतु रानी रासमणि को ठीक-ठीक समझ में आ गया था कि उनके जो कुलगुरु है उसमें वह विद्वत्ता भी नहीं है। वह ब्रह्म तेज भी नहीं है। वह शास्त्र ज्ञान भी नहीं है। वह साधन भजन करने की जो एक निष्ठा है वह भी नहीं है। यानी कि अपने कुलगुरु के किसी भी वह सदस्य को या किसी वारसदार को वो काली मंदिर में काली के पुजारी के रूप में नियुक्त नहीं करना चाहती थी। किंतु फिर जब रामकुमार के बारे में उन्होंने सोचा कि हां उन्होंने इस तरह से सुंदर एक विधान दिया एक रेजोल्यूशन लाकर के एक सॉल्यूशन लाकर के दिया कि काली मंदिर में इस तरह से अन्न भोग देंगे तो बाकी ब्राह्मण लोग ग्रहण करेंगे। तो फिर उसके बाद में रासमणि ने क्या किया कि वही रामकुमार को ही रिक्वेस्ट की कि आप ही यहां पर आकर के मां काली का पूजक पद ग्रहण कीजिए। किंतु जब यह शरद महाराज यह पूरी घटना का वर्णन करते हैं लीला प्रसंग में उसमें किंतु वह स्पष्ट लिखते हैं कि अपने कुल गुरु को जो विदाई आदाय बंगाली में कहते हैं विदाई आदाई का अर्थ है जब ब्राह्मण गुरु अपने घर आते हैं तो उनको जो दक्षिणा दी जानी चाहिए उनको जो सम्मान देना चाहिए उनको जो रिस्पेक्ट देना चाहिए तो शारदानंद जी महाराज लिखते हैं भले ही चाहे उन्होंने रामकुमार को पूजक के पद पे प्रतिष्ठित किया। पूजक का पद दिया। किंतु अपने कुल गुरु की जो विदाई आदाय है उसको उन्होंने अक्षुण रखा। अर्थात कि एज इट इज बनाए रखा। तो ये शरद महाराज स्पेसिफिकली यह पॉइंट आउट करते हैं कि भले ही चाहे अपने कुलगुरु को छोड़कर के रामकुमार अभी यहां पर रामकुमार यदि आते हैं तो वहां पे तो पूरा एक फैमिली प्रथा ही थी ना। भारत तो क्या है कि अपने भारत में जिस तरह से यूरोप में गिल्ड वगैरह हुआ करते थे। भारत में फैमिली है। तो यदि आप एक व्यक्ति को ले आएंगे तो उसके पीछे पूरा परिवार तो आने ही वाला है। तो यहां पे भी जैसे ही रामकुमार को लाए तो बाद में ठाकुर तो थे ही थे। फिर ये हृदय था। फिर ये वो जो रामलाल दादा थे जो कि रामेश ठाकुर के जो मध्यम जो बड़े भ्राता थे उनके लड़के तो फिर लक्ष्मी दीदी थी। फिर मां थी। सब तो आकर के काली मंदिर में रहने वाले हैं। तो यानी कि अपने कुल गुरु को जो पद मिलना चाहिए था कुल गुरु का जो परिवार वहां पर आकर के कोई एक होगा कि वह मां काली की पूजा करेगा। दूसरा होगा कि वहां पर वस्त्र अलंकारों का जिम्मा लेगा। जिस तरह से यह हृदय ले रहा था और कोई होगा कि राधाकांत के मंदिर की पूजा करेगा और कोई होगा कि वहां पर भोग रंधेगा। तो अपने कुल गुरु के फैमिली को संपूर्ण रूप से साइड करके रामकुमार और फिर बाद में रामकुमार का फैमिली उनको जो काली मंदिर में उन्होंने जो एक प्रतिष्ठा पूर्ण एक स्थान दिया तो इसके बावजूद किंतु शरद महाराज यह पूरा डिटेल कहने के बाद में किंतु स्पष्ट पॉइंट आउट करते हैं कि अपने कुल गुरु को जो ऑफरिंग देना है, प्रणामी देनी है, रिस्पेक्ट देनी है, उसमें रानी रासमणि ने कहीं पर भी थोड़ी सी भी कमी नहीं आने दी। तो क्यों यह सब कि यह कुल गुरु है तो उसका तो एक रीजन है कि आपके फैमिली के साथ में जुड़े हुए हैं। आपके भाव के साथ में वह माहितगार है। आप किस तरह की साधना कर सकते हैं उसके अनुसार वह आपको गाइड करते हैं तो वह भी तो आपका एक भाव है। तो किसी का भी भाव नष्ट नहीं करना है। यदि आपने श्री रामकृष्ण को भी अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया तो आपके जो कुल गुरु है उनके प्रति आपकी जो रिस्पेक्ट है वो एज इट इज बने रहनी चाहिए। रिस्पेक्ट ही नहीं उनको जो प्रणामी देनी है, डोनेशन देना है, वह भी इतना ही बने रहना चाहिए।

हिन्दू धर्म की उदारता और आशीर्वाद के माध्यम से प्रचार-प्रसार

तो यह एक अपने साहित्य में जो एक उदार हृदयता है, हम लोग तो कभी सोच भी नहीं पाएंगे कि जाकर के किसी को कन्वर्ट करें। कन्वर्ट करने का अर्थ क्या है? हम जाकर के कहते हैं कि आप जिस रास्ते को फॉलो करते हैं, आप जिस रास्ते पर चल रहे हैं, आप जिस धर्म को फॉलो कर रहे हैं, आप जिस साधन पद्धति को फॉलो कर रहे हैं, उसमें कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ खामी है, कुछ ना कुछ शॉर्ट कमिंग्स है। और मैं आपको एक नया रास्ता दिखाता हूं। वि इज बेटर देन योर्स। ऐसा कह के ही तो आप लोगों को कन्वर्ट करेंगे। किंतु स्वामी जी जब अमेरिका गए योग और वेदांत का प्रचार किया देखिए उन्होंने क्या कहा। इट इज नॉट लाइक दैट अ क्रिश्चियन हैज़ टू कन्वर्ट इंटू बुद्ध हिंदूइज़्म और अ हिंदूइज़ टू बी कन्व्टेड इंटू क्रिश्चियनिटी। नो अ क्रिश्चियन हैज़ टू बिकम अ बेटर क्रिश्चियन। अ मुस्लिम हैज़ टू अ बुद्धिस्ट हैज़ टू बिकम अ बेटर बुद्धिस्ट। दिस इज़ द पाथ ऑफ़ वेदांत। वेदांत नेवर सेज़ दैट चेंज योर इष्ट। वेदांत ऑलवेज सेज़ व्हाटएवर द पाथ यू आर फॉलोइंग फॉलो इट वि ग्रेट इंटीग्रिटी वि ग्रेट फेथ एंड ग्रेट निष्ठा। यही तो वेदांत कहता है और तो कुछ नहीं कहता। इसीलिए देखिए कि हिंदूइज़्म में कन्वर्जन नहीं है। और कन्वर्जन नहीं है बोलकर के ही तो हम इतने साल टिके रहे। जैसे कि माय प्लान ऑफ कैंपेन में स्वामी जी का जो प्रवचन है लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा उसमें दिया हुआ भारत में स्वामी जी किस तरह से कहते हैं कि बुद्धिज्म का पतन क्यों हुआ? बुद्धिज्म का पतन हुआ क्योंकि बुद्धिज्म वास दी फर्स्ट मिशनरी रिलीजन। यह जो राजा अशोक ने एक बार बुद्धिज्म अपनाया। फिर जो क्षत्रिय का जो माइंडसेट रहता है कि वह जगत जय करना है। तो पहले तो अपनी आर्मी से जगत को जय किया। फिर जब अपने धर्म को जो नए धर्म को अपनाया तो वही वो चक्रवर्ती वो जो एक वॉरियर का माइंडसेट है अभी अपने धर्म को चारों ओर फैलाएंगे धर्म से जगत का जय करेंगे तो वही अशोक चारों ओर यह एंबेसी भेज रहा है बुद्धिस्ट भिक्षुओं को भेज रहा है कोई गया श्रीलंका जो उनकी जो लड़की थी वो संघमित्रा मोस्ट प्रोबेबबली उसको श्रीलंका भेजा इस तरह से वह चारों ओर एंबेसी भेजी बुद्धिज्म में लोग कन्वर्ट वर्ट होने लगे। किंतु स्वामी जी ने साथ-साथ में ही क्या कहा? ऐसे लोगों को कन्वर्ट किया गया जो कि अभी भी बुद्धिज्म के या तो फिर भगवान बुद्ध के महत उदार भाव है। भगवान बुद्ध की वह जो एक जिसको कहेंगे कि कॉस्मोपॉलिटन या तो इगलिटेरियन जो उनकी जो पॉइंट ऑफ व्यू है भगवान बुद्ध का कि ईश्वर के ऊपर में या तो किसी शास्त्र के ऊपर में या तो किसी पंडित के ऊपर में या तो फिर किसी पुजारी के ऊपर में भरोसा नहीं करके अपना रास्ता अपने से बनाइए। अपने ही प्रयास करके परिश्रम करके अष्टांग योग का आश्रय लेकर के मध्यम पंथा का आश्र लेकर के आप स्वयं अपना निर्वाण प्राप्त करें और सभी के लिए यह निर्माण का द्वार ओपन है। कोई जात कोई नात कोई क्लास कोई यहां वो कैटेगरी इस तरह से कोई प्रभेद नहीं है। ब्राह्मण का निर्वाण के ऊपर में जितना अधिकार है उतना ही शूद्र और वैश्य का है। एक किसान का जितना अधिकार है उतना ही एक राजा का अधिकार है निर्वाण के ऊपर में। तो यह सबके लिए एक समान व्यवस्था सबके लिए इक्वलिटी यह भगवान बुद्ध का जो महत उदार भाव था आप है और आपका परिश्रम है। बस इसके अलावा इस जगत में आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्ति करने के लिए और कुछ बीच में नहीं है। तो यह भाव वे लोग नहीं ले पाए जिनको कि कन्वर्ट किया गया था प्रलोभन दिखा करके। अभी यहां पे बुद्धिज्म ने जो कन्वर्ट किए तो एटलीस्ट उन्होंने लोगों को धमका करके लोगों को मार करके लोगों की हत्या करके इस तरह से तो कन्वर्ट नहीं किया। चलो पीसफुली ही कन्वर्ट किया। किंतु फिर भी इसमें भी तो होता है ना। पीसफुली में भी जैसे देखिए राजा रामचंद्र अपने भगवान राम वो जब वो मथुरा ये जो अयोध्या से जब साउथ इंडिया की पूरे भारत की जब यात्रा की उनसे भी प्रभावित होकर के यह जो वैदिक संस्कृति पूरे भारत में फैली और सिर्फ पूरे भारत में नहीं पूरे जो यह जो साउथ ईस्ट एशिया है ईस्ट एशिया है सब जगह पर फैली किंतु वे लोग भगवान राम से आकर्षित होकर के मोहित होकर करके उन्होंने इस हिंदू धर्म को या तो फिर गंगा के तट की जो वैदिक संस्कृति है उसको अपनाया था। तो और फिर ऐसा नहीं है कि सबको कन्वर्ट करना ही है। यदि एक वन में जाते हैं एक प्रजा को एक यदि एक उसको देखते हैं गांव को तो ऐसा नहीं कि सबको कन्वर्ट हो जाना है। वह कहीं पर वो एक दो कन्वर्ट होंगे। कहीं पे कोई कन्वर्ट यानी कि उनको अपने इष्ट के रूप में स्वीकार करेंगे। जो लोग नहीं करते हैं उसको नहीं वो नहीं करते हैं। वह जैसे भरद्वाज वगैरह मुनि है तो उन्होंने कहा राम को कि हम तो आपको दशरथ के बेटे के रूप में ही पहचानते हैं। हम तो आपको परम ब्रह्म वो जो परबह्म जो जो ईश्वर स्वयं मनुष्य का देह धारण करके आए हैं। ऐसा हम आपको नहीं मानते। तो भगवान राम हंसते-हंसते तथास्तु बोलकर के वहां से चले गए। तो जिसका जो भाव है उसके अनुसार उसको ट्रीट करना है। तो बोलकर के हिंदू धर्म इतना टिका रहा क्योंकि हिंदू धर्म के जो कोर प्रिंसिपल थे वो वैसे के वैसे बने रहे। जबकि बुद्धिज्म में जैसे स्वामी जी ने कहा कि ऐसे लोग आ गए जो कि बुद्धिज्म या तो फिर भगवान बुद्ध के प्रति इतना उनका कमिटमेंट नहीं था या तो उनको इतना समझ नहीं पाते थे। व्हाटएवर तो बोलकर के वह अपनी अंधश्रद्धाएं ले आए। अपने वो जो कपोल कल्पित भूत पिशाच दैत्य राक्षस उनकी कहानियां लेके आए और सब बुद्धिज्म में लाकर डाल दिया और उसी की वजह से बुद्धिज्म में जो पतन आया जो डिटेरेशन आया उसने बुद्धिज्म को भारत में से समाप्त कर दिया। यही बात देखिए कि ठाकुर इनको कहते हैं अपने वह केशव सेन को कि तुम ब्राह्म समाज में देखकर के शिष्य नहीं करते हो तो इसलिए वह तुम्हारा ब्राह्म समाज तोड़ के चले जाते हैं और तुम्हारे फॉलोअ को भी ले जाते हैं। ऊपर में से तुमको गाली देकर जाते हैं। जबकि उस समय जैसे हमने देखा कि लाटू महाराज वह काउंट करते थे कि ब्राह्म समाज का अध कोई फंक्शन होता है तो वहां पे इतनी घोड़ा गाड़ी है वहां पे पार्किंग लॉट में और यहां पे वो जो दक्षिणेश्वर में ठाकुर का वो जन्म तिथि ना कि ऐसा कुछ होता है तो इतनी घोड़ा गाड़ी पड़ी है डिवोटी लोग आए हैं तो वो उसमें ब्रह्मो समाज की घोड़ा गाड़ियों की संख्या हमारे ठाकुर की घोड़ा गाड़ियों माने ठाकुर को दर्शन करने आने वाले लोगों की जो संख्या है उससे कहीं ज्यादा थी एट द सेम टाइम आज देखिए कि ब्राह्म समाज का नाम इसलिए लिया जाता है क्योंकि उसको रामकृष्ण संघ के लिटरेचर में उसका नाम है। वह यदि नहीं होता तो उनको कौन याद करता कौन जानता बंगाल में जो एक सीमित दायरा था उनका उसी में वे लोग रह जाते। तो यह किसी का भाव भंग नहीं करना। यह बात हमारे संघ में देखिए कि हमारे संघ में ही नहीं यह हिंदू धर्म के डीएनए में है। हिंदू धर्म के रक्त प्रत्येक बूंद में है। हिंदू धर्म की रक्त की प्रत्येक बूंद

जब स्वामीजी कहते है की "अपनी आध्यात्मिकता तथा दार्शनिकता से हमें जगत को जीतना होगा," तो क्या यह ठाकुर के उपदेश "किसी का भाव भंग नहीं करना है" उसका विरोधाभासी नहीं है?

में है। अभी इसके साथ में आप यदि स्वामी जी का वो स्टेटमेंट कंट्रास्ट करेंगे। स्वामी जी कहते हैं कि मैं सिर्फ यह नहीं चाहता कि भारत में हिंदू धर्म का जागरण हो। मैं चाहता हूं कि हिंदू धर्म पूरे विश्व पर विजय प्राप्त करें। किंतु यह विश्व पर विजय प्राप्त करना है अपनी आध्यात्मिकता से। नहीं कि यह आर्मी लेकर के जाना है। नहीं कि लोगों को डराधमका करके करना है। तो क्या यह स्वामी जी का जो विज़न था वो क्या इस तरह से ठाकुर का जो विज़न है कि किसी का भाव भंग नहीं करना है। उसके विरोध में नहीं था क्या? यह प्रश्न हो सकता है क्योंकि स्वामी जी ने तो वहां जाकर के एक्टिवली प्रीच किया है। एक्टिवली योग और वेदांत का उपदेश दिया है और उससे प्रभावित होकर के कोई-कोई लोगों ने अपने किस किसी को तो स्वामी जी ने ये ब्रह्मचर्य दीक्षा सन्यास दीक्षा भी दी है और बाद में स्वामी जी इस तरह के स्टेटमेंट भी देते हैं कि पूरे विश्व के ऊपर में हमको हमारे हिंदू धर्म को या तो फिर हमारी यह जो फिलॉसोफिकल पद्धतियां है योग और वेदांत उनको विजय प्राप्त करना है। तो वह क्या उनके भाव का भंग नहीं हुआ? तो एक्चुअली देखिए कि जैसे कि कन्वर्जन की तीन मेथड यदि कही जाएगी। एक तो है कि जो जो वेस्टर्न कुछ रिलीजन है कि जोर जबरदस्ती करके लोगों को कन्वर्ट करना है। आपके पास में ऑप्शन नहीं है। अभी आपका राजा अभी यह शासनकर्ता है जिन्होंने युद्ध में विजय प्राप्त की है। अभी वह जो बोलेंगे वह आपको करना पड़ेगा। वो जो ठाकुर की कहानी है ना कि एक पुजारी को एक साधक को पकड़ कर के अल्लाह मंत्र दे दिया। तो अभी वह अल्लाह मंत्र जप कर रहा है। बीच-बीच में काली का नाम आ जा रहा है। तो सब मुल्ला लोग जाकर के उसको पकड़ते हैं। क्यों काली का नाम लिया? तुमको तो अल्लाह मंत्र दिया है। तो यह बेचारा क्या कहता है? काली मेरे गले तक आ गई है। क्या करूं? अल्लाह बोलते बोलते बीच में काली आ जाती है। तो उसको तो बेचारे को गले तक काली आ गई है। फिर भी जोर जबरदस्ती दूसरा मंत्र दिलवाया गया। तो वह तो एक कन्वर्जन की एक मेथड है जो कि ज्यादा सक्सेसफुल कभी नहीं होती। वहां भीतर में जो कन्वर्ट होते हैं वही लोग आपस में इतना झगड़ा करेंगे इतना ब्लड शेड होगा कि फिर वो पूरा धर्म ही उससे डूब जाएगा। और आप थोड़ा सा भी इतिहास पढ़ें तो इस बात का आपको साक्षी मिलता है। आपको अनेक प्रूफ मिल जाएंगे। यथेष्ठ प्रूफ मिल जाएंगे। तो वह तो एक मेथड हो गई। दूसरी एक हो गई कि बुद्धिज्म की मेथड है। ब्लड शेड नहीं जोर जबरदस्ती नहीं गाली देकर के क्रिटिसाइज किंतु एटलीस्ट यह बात है कि वे लोग क्रिटिसाइज करते थे कि हां आपका जो धर्म है वह गलत है और हमारा धर्म है वह सही है। अहिंसा के रास्ते से उन्होंने कन्वर्जन किया। किंतु एक एक तरह का जो मिशनरी हिल था उनमें कि लोगों को कन्वर्ट करना है। फिर वो जो साम दाम दंड तो नहीं किंतु भेद साम दाम और भेद दंड को छोड़ दिया जाए तो एटलीस्ट बाकी के तीन रास्तों का सहारा उन्होंने अवश्य लिया और जबकि हिंदूइज़्म का जो स्प्रेड हुआ है उसमें साम, दाम, दंड, भेद ये चारों का सहारा नहीं लिया गया। सिर्फ ईश्वरीय प्रेरणा से यह कन्वर्जन हुआ है। महापुरुषों के पूत चरित्र से महापुरुषों का यह जो होली उनका जो बिहेवियर है, नेचर है, उनकी पवित्रता है, उनकी साधुता है, उनकी सहृदयता है, उनकी जो सिद्धि है साधना में उसको देखकर के लोग आए हैं। ठाकुर का जो कहना है कि जब फूल खिलता है तो भ्रमर अपने से आती है। तो हिंदू धर्म में भी साधना साधन और सिद्धि का ऐसा एक पुष्प प्रस्फुटित हुआ है कि उसकी सुवास के आकर्षण से सभी लोग यहां पे आए हैं। तो यह कन्वर्जन का तीसरा एक मेथड हो गया। यदि हम फिर से इसको कहें तो एक तो है दंड का मेथड। दंड देकर के कन्वर्ट करना। दूसरा है साम, दाम और भेद। इसके माध्यम से कन्वर्ट करना। दंड नहीं है किंतु साम दाम और भेद तो है ही है। तीसरा है कि फूल प्रस्फुटित होता है। उसकी सौरभ से यह सब मधुमक्खियां आती है। आपको आकर्षण से दिव्य आकर्षण से लोगों को इकट्ठा करना है। तो यह कन्वर्जन भगवान रामकृष्ण स्वामी विवेकानंद ने किया। स्वामी जी जब यह कहते हैं कि पूरे पूरे विश्व में भारत की आध्यात्मिकता का विजय होगा तो इस तरह से कि हमको पूरे विश्व में योग और वेदांत रूपी श्री रामकृष्ण मां शारदा स्वामी विवेकानंद के जीवन और उपदेश रूपी जो सौरभ पूर्ण पुष्प है उसको प्रस्फुटित करना है और उस पुष्प की सौरभ से खुशबू से फोरम से बाकी सब भक्त यहां पर

स्वामी विवेकानन्द को स्पर्श कर के स्वामी अभेदानन्द के साधन-प्रवाह का मार्ग परिवर्तित हो गया

आएंगे तो यह जो पूरा पॉइंट है उसको डिस्कस करने के लिए यहां पर शरद महाराज हमको एक उदाहरण देते हैं। कहते हैं कि स्वामी विवेकानंद इनको कि ठाकुर अद्वैत मार्ग में उनको ट्रेन कर रहे थे। अभी यह द्वैत अद्वैत हमको पता है कि द्वैत भाव का मुख्य जो ये है फिलॉसोफी कि ईश्वर है और मैं भक्त हूं और मुझे ईश्वर के प्रति शरणागत होना है या तो फिर ईश्वर के साथ में यह सख्य भाव मधुर भाव दास्य भाव या तो फिर संतान भाव मातृ भाव इस तरह से कोई ना कोई भाव से उनके साथ में संबंध बांधना है। जबकि अद्वैत वेदांत कहता है मैं ही आत्मन हूं। मैं ही ब्रह्मन हूं। अहम ब्रह्मास्मि या तो फिर शिवोहम या तो सोहम और मेरे भीतर में जो ब्रह्म साक्षात्कार ब्रह्म है उसका साक्षात्कार कब होगा? जबकि मैं कठोरता का पालन करके तपस्या करके इंद्रियों के जितने भी विषय है उन सब से 100% मुक्त हो जाऊं। तब मेरे भीतर का जो दिव्य मेरे भीतर की दिव्यता है डिविनिटी है वह प्रस्फुटित होगी। तो यह हो गया अद्वैत वेदांत। स्वामी ठाकुर स्वामी जी को अद्वैत वेदांत के रास्ते पर ट्रेन कर रहे थे और बाकी भक्तों को द्वैत के। किंतु जैसे हुआ एक दिन कि जो घटना का पाठ करेंगे हमको पता है काली महाराज को स्पर्श करके स्वामी जी ने उनका भाव भंग किया। दूसरे रास्ते पर ले आए। तो उसी बात को हम आगे पढ़ते हैं। अभी कल हमने देख लिया कि किस तरह से ठाकुर स्वामी जी को अष्टावक्र संहिता पढ़ने को कहते हैं। आज थोड़ा सा आगे देखते हैं। स्वामी जी के ओई भाबे गठितो कोते थाकिले ओ ठाकुर तहार अन्नानो बालक दिग के कहा के ओ शाकारोपासना कहा के निराकार शगुण ईश्वर उपासना कहा के श्रद्धा भक्ति भीतर दिया का आ कहा के बा ज्ञान मिश्रा भक्ति भीतर दिया अन्न नाना भावे धर्म जीवन अग्रसर कराया दीते छिलेन अभी स्वामी जी को अद्वैत वेदांत की शिक्षा तो ठाकुर दे रहे थे किंतु इसके बावजूद ठाकुर जो उनके अन्य बालक दग अन्य जो बालक जो ठाकुर के पास में आते हैं त्यागी संतान ठाकुर के पास में आते हैं उसमें से किसी को साकार उपासना किसी को निराकार सगुण ईश्वर उपासना किसी को शुद्ध भक्ति के माध्यम से किसी को फिर ज्ञान मिश्र भक्ति के माध्यम से या तो फिर अन्य रूप से उनका धर्म जीवन गठित करने के बारे में वह आगे आगे बढ़ रहे थे। अभी यहां पर जितनी भी यह उपासना है चार उपासनाओं का उन्होंने उल्लेख किया है। साकार उपासना यानी कि पता है कि मां काली के मंदिर में जाकर के मां काली की मूर्ति की पूजा करना या तो फिर उनके सामने प्रार्थना करना। फिर निराकार सगुण ईश्वर उपासना है। वह कैसा है? वही शरणागति का ही भाव रखना है। भक्ति और प्रार्थना ही रखनी है। किंतु नजर के सामने मूर्ति की कल्पना नहीं करनी है। कोई एक निराकार भाव रखना है। जैसे कि वो अभी निराकार का आप इमेजिनेशन कैसे करेंगे? निराकार इमेजिनेशन करते-करते वो कहीं ना कहीं वो कोई ना कोई एक कंक्रीट फॉर्म तो आ ही जाएगा। जैसे कि आप मान लीजिए अनंत आकाश है। अनंत आकाश को मैं ईश्वर के रूप में देखता हूं। या तो फिर पूजा करता हूं या प्रार्थना करता हूं। तो अनंत आकाश का का तो मैंने एटलीस्ट वो किया एटलीस्ट इमेजिनेशन किया तो जो भी है उस समय यह निराकार का बहुत चला था या तो फिर यह जो मूर्ति पूजा जो है पौतलिकता ये लोग कहते थे ये जो उसके विरुद्ध में बहुत सारा कुछ चल रहा था तो चलो भाई निराकार ईश्वर की उपासना करनी है किंतु सगुण रूप से भक्ति के ही माध्यम से वह तो वह भी संभवित है अपने हिंदू धर्म में सब तरह की उपासनाओं का बहुत सारी उपासनाओं का वर्णन है जो अपनी साइकोलॉजी के अनुसार वह उसको फॉलो कर सकता है। तो फिर तो यह तो हुई किसी को शुद्ध भक्ति की शुद्ध भक्ति यानी कि वही शरणागति प्रार्थना ईश्वर के साथ में कोई ना कोई भाव का संबंध और फिर किसी को ज्ञान मिश्रित भक्ति यानी कि साथ-साथ में ही तपस्या या तो फिर दर्शन शास्त्रों का अभ्यास वगैरह करवा करके साथ में भक्ति। तो इस तरह से चार दूसरे प्रकार की ये जो साधन पद्धतियां है उसको ठाकुर अपने त्यागी संतानों के पास में से उसका अनुष्ठान करवाते थे उसका आश्रय दिलवाते थे ए रूपे स्वामी विवेकानंद प्रमुख बालक भक्तगण दक्षिणेश्वरे ठाकुर निकट एकत्र शयन उपवेषण आहार बिहार धर्म चर्चा प्रवृत्ति करिले ओ ठाकुर अधिकारी भेदे ताहाद दिग के नाना भाबे गठित करते छिल मिलेन और इसी तरह से स्वामी विवेकानंद यानी कि उस समय के नरेंद्र वगैरह बालक भक्तगण दक्षिणेश्वर में ठाकुर के पास में एक साथ में शयन करते थे। एक साथ में उपवेशन करते थे। यानी कि बैठते थे। आहार और विहार करते थे। धर्म चर्चा करते थे। वगैरह सब करते थे। किंतु फिर भी ठाकुर अधिकारी भेद से उनको उनके धर्म जीवन को विभिन्न रूप रूप से गठित करते थे। उनका जो स्पिरिचुअल लाइफ है ही यूज्ड टू बिल्ड इट अप इन डिफरेंट वेज़। यानी कि यह कंट्रास्ट यहां पे शारदानंद जी महाराज हमारे सामने रखते हैं। यह जितने भी बालक भक्त हैं, त्यागी संतान है ठाकुर के वे लोग एक साथ में ही शयन करते थे। ठाकुर के कमरे में या तो बाहर में जो वरांडा है वहां पे एक साथ में ही आहार करते थे। एक साथ में ही गप लगाते थे। एक साथ में ही कहीं पे वह कोलकाता से दक्षिणेश्वर आते जाते थे। सब एक साथ में ही वार्तालाप करते थे। एक साथ में ठाकुर के सामने बैठकर के उनके कथामृत का अमृतमय वाणी का श्रवण करते थे। किंतु इसके बावजूद इन सब की जो साइकोलॉजी थी इन सब का जो प्रोफाइल था इन सब की जो कर्म प्रवाह के अनुसार साधन भजन करने की जो क्षमता थी उस क्षमता उस कैपेसिटी के अनुसार ठाकुर उनको अपनेप रास्ते का उदा उनको वो विभिन्न रूप से उनका धर्म जीवन गठित कर रहे थे। विभिन्न रूप से उनके पास में साधनाएं करवा रहे थे। अभी वह एक्चुअल इंसिडेंट स्टार्ट होता है कि वह काली महाराज के साथ में क्या हुआ। 1886 क्रिस्टाब्दे मार्च मार्स 1886 का मार्च महीना 1886 की साल का मार्च महीना काशीपुर बागाने ठाकुर गलो रोगे दिन खी होइया पड़ी ते छैन काशीपुर के बागान में बागान में गार्डन हाउस में ठाकुर को गले का कैंसर हुआ था उसके लिए ट्रीटमेंट के लिए लाया गया था और दिन प्रतिदिन उनका देह क्षीण होता जा रहा था धीरे-धीरे करके करके उनकी लीला समाप्ति का अवसर पास में आ रहा था। किंतु जेनु पूर्वापेक्षा अधिक उत्साह भक्त दग धर्म जीवन गठने मनोनिवेश करिया छे विशेषत हो स्वामी विवेकानंदर किंतु उनका देह धीरे-धीरे करके जराशाई हो रहा था। उनके मृत्यु का समय वापस आ रहा था। इसके बावजूद पहले के पहले से ज्यादा उत्साह से उन्होंने अपने त्यागी संतानों का भविष्यत धर्म जीवन आध्यात्मिक जीवन गठन करने में उन्होंने अपने मन को लगाया था और उन सब में भी खास करके स्वामी विवेकानंद के स्वामी जी या तो फिर नरेंद्र किस तरह से साधना करता है। किस तरह से वह जप ध्यान करता है। मेडिटेशन करता है। किस तरह की उसको स्पिरिचुअल एक्सपीरियंस होते हैं। उसको किस तरह से गाइड करना है। यही सब बातों को ठाकुर एकदम एकदम ध्यान से निरीक्षण करते थे और प्रति पदक्षेप ऑन एववरी स्टेप नरेंद्र को वो गाइड करते थे। आभार स्वामी जी के साधन मार्ग उपदेश दिया एवं तदनुयाई अनुष्ठाने सहायता मात्र कोरियाई ठाकुर खान तो छिले ना साथ-साथ में ही स्वामी जी को साधन मार्ग का उपदेश देकर के और उसके अनुसार अनुष्ठान करने के में सहायता करने से ही मात्र ठाकुर वो शांत नहीं हो जाते थे। चुप नहीं हो जाते थे। नरेंद्र का धर्म जीवन तो गठित करना ही है। नरेंद्र को आध्यात्मिक साधन भजन का उपदेश तो देना ही है। यह तो देखना ही है कि ठाकुर ने अपने कहे हुए वचनों का उपदेश का वह पालन कर रहा है। उसके इस तरह से उसके ऊपर नजर रखनी है। किंतु सिर्फ इतना ही नहीं और भी बहुत कुछ क्या नित्य संधार पर अपर शकल के सराइया दिया तहां के निकट डाकिया एकाद क्रमे दुई तीन घंटा काल धरिया तहां सहित अपौर बालक भक्त दिग के संसारे पुनराय फिरते ना दिया की भाबे परिचालितो ओ एकत्र राखते होइबे तद विषय आलोचना ओ शिक्षा प्रदान करते छिलेन सिर्फ इतना ही नहीं कि नरेंद्र अपना धर्म जीवन गठित करें। स्पिरिचुअल लाइफ बिल्ड अप करें। किंतु साथ-साथ में ही प्रतिदिन शाम को संध्या के समय बाकी सबको अपने कमरे में से बाहर निकाल करके सिर्फ नरेंद्र को वहां पर बुला करके एकांत में उसको अपने सामने बिठा करके दो 3 घंटे तक सतत अप टू टू टू थ्री आवर्स कंटिन्यूस ठाकुर उसके साथ में वार्तालाप करते थे। कहते थे कि किस तरह से ठाकुर की महासमाधि के बाद में बाकी जो त्यागी संतान है बाकी जो यह सब लड़के थे जिन्होंने जिनके मन में वैराग्य का भाव उत्पन्न हुआ था वह अपने घर कहीं वापस ना चले जाए फिर से वही संसार की मायाजाल में ना डूब जाए और वह सब इकट्ठे होकर के रहे उसके बारे में ठाकुर नरेंद्र को उपदेश देते थे। देखिए कि यहां पे एकदम स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ठाकुर ने स्वयं अपने संघ का निर्माण किया है। बात बाद बात बाद में कोई-कोई लोग थे जो कि नरेंद्र को गाली देते थे या तो स्वामी जी के ऊपर में ये आक्षेप डालते थे कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में तो यह लड़के लोग सब अपने घर तो पहुंच ही गए थे। यह नरन ही है कि जो सबको उकसा करके सबका ब्रेन वाश करके वापस वरा नगर मठ में ले आया है। किंतु देखिए कि जो स्वामी जी ने ऐसा किया भी तो वह ठाकुर के कहने के अनुसार किया है। भक्त दग प्राय शकले ही तोख ठाकुर ए रूप आचरण भाबिते छिलेन निज संगो सुप्रतिष्ठित करब जन ठाकुर गरोग रूप एकटा मिथ्याभान करिया बसिया रहया छ जब ठाकुर इतने उत्साह के साथ में नरेंद्र को मेडिटेशन आध्यात्मिक जीवन योग के बारे में उपदेश देते थे साथ-साथ में ही उसको अकेले बिठा के दो-ती घंटे तक सतत उसके उपदेश देते रहते थे बताते रहते थे कि उनकी महासमाधि के बाद में संघ का गठन किस तरह से करना है। तो यह देखकर के बहुत सारे लोग इनके मन में एक ऐसा एक भाव आया कि ठाकुर यह गले में जो रोग हुआ है या तो कैंसर हुआ है वह सब एक मायाजाल रचे हुए हैं। वह एक झूठ-मूठ का उन्होंने एक प्रदर्शन कर रहे हैं। जिसका कि एक ही मात्र उद्देश्य है कि संघ की प्रतिष्ठा। जैसे ही संघ की प्रतिष्ठा हो जाएगी वैसे ही वह अपना गले का रोग है वह जो कैंसर है उससे बाहर आ जाएंगे और पहले की तरह ही फिर से सुस्थ हो जाएंगे हेल्दी हो जाएंगे स्वामी विवेकानंद केवल दीनदीन प्राण प्राण बुझते छिले ठाकुर जेनो भक्तो द निकट होइते बहु काले जनो विदाई ग्रहण करब मतो शकल आयोजन ओ बंदोबस्तो करते छे किंतु नरेंद्र के मन में नरेंद्र प्रति दिन प्राण प्राण नरेंद्र के मन में प्रतिदिन प्राण प्राण में उसको यह अनुभव हो रहा था। समझ में आ रहा था कि ठाकुर जैसे कि अपने भक्तों के पास में से हमेशा के लिए बहु काले जनों विदाई ग्रहण कर जन विदाएं ग्रहण करने के लिए यह सब आयोजन वो बंदोबस्त कर रहे हैं। देखिए इंटरेस्टिंगली यहां पे शरद महाराज जो लिखते हैं भक्तों के पास में से बहुकाले जनो विदाई ग्रहण कर बार मतो अर्थात कि बहुकाल के लिए लंबे समय के लिए विदाई ग्रहण करने की ठाकुर जैसे कि सब आयोजन व्यवस्था कर रहे हैं। यहां पे वह यह नहीं लिखते कि चिरकाले जन्म हमेशा के लिए। एक्चुअली मृत्यु क्या है कि मृत्यु तो अपने जो जितने भी यह जो अपने सगा संबंधी हैं, रिलेटिव्स हैं, प्रियजन है उनसे तो हमेशा के लिए बिछड़ जाना। तो किंतु चिरकाल नहीं लिख के बहुल लिखा है। इसका क्या अर्थ है कि ये जितने भी लड़के हैं जो त्यागी संतान है उन सबको ठाकुर की लीला के नित्य संगी है। जितनी बार ठाकुर लीला के लिए पृथ्वी पर अवतार ग्रहण करेंगे तो यह सभी लड़के उनको उनके साथ में आना ही है। तो यह जो उनका था कि यह शरद महाराज को उस समय भी अंदाज आ गया था कि वे लोग ठाकुर के साथ में पहले भी आए हैं। इस बार भी आए हैं। भविष्य में ठाकुर जब बहु काल के बाद बहुत दिनों के बाद जब वापस आएंगे तब भी उनको ठाकुर के साथ में आना होगा। इसलिए उन्होंने चिरकाल नहीं लिखकर के लिखा है बहुकाले जनो बड़े लंबे समय तक विदाई ग्रहण करने के लिए ठाकुर जैसे कि यह सब आयोजन कर रहे हैं। तिन उई धारणा शकल समय राखी ते पारिया छिलेन किना संदेहो अभी स्वामी जी को सिर्फ अपने प्रति दिन प्राणप्राण में यह महसूस होता था अनुभव होता था कि ठाकुर बहुत लंबे बहुत लंबे समय के लिए जा रहे हैं। किंतु बाद में ही देखिए शरद महाराज कितना सुंदर एक सेंटेंस लिखते हैं कि स्वामी जी भी यह धारणा सब समय के लिए अपने मन में रख पाए थे कि नहीं वो संदेह है क्योंकि ठाकुर की जो दिव्यता थी वो बाहर का जो कैंसर है कैंसर ये जो पिंजरा ही है ना ठाकुर क्या कहते हैं खोलटा वो जो ब्राह्म समाजियों के साथ में मुलाकात थी हो ही रही थी उस समय एक ब्राह्म समाज जी ने कहा कि वह काशी में गए थे तो वह भास्करानंद ना कि त्रैलंग्य स्वामी दोनों में से एक के वहां पर दर्शन करने के लिए गए। देखा उन्होंने कहा ठाकुर को आकर के कि आपका फोटोग्राफ हमने उनके घर में देखा। तो ठाकुर क्या कहते हैं? खोलटा ये खोल अर्थात कि यह बाह्य आवरण फोटो रखा है बाह्य आवरण का। भीतर का जो अनंत तत्व है वह तो एक अलग ही है दिव्य तत्व। तो यहां पर भी ठाकुर जब बात करेंगे ठाकुर जब उपदेश देंगे तो यह बाह्य आवरण है। यह खोलटा जो है वह कहां पड़ा रहेगा कि जिसको कैंसर हुआ है जिसको कि यह जिसमें कमजोरी आ रही है जिसका कि दिन प्रतिदिन क्षय हो रहा है। यह बाह्य आवरण कहां पड़ा रहेगा? भीतर की दिव्यता पूर्ण रूप से जैसे कि प्रकट होगी। तो इसीलिए स्वामी जी वैसे प्राण प्राण में अनुभव तो करते थे। समझ तो रहे थे। ठाकुर लीला संकेलन के लिए वो लीला संवरण की ओर अभी अग्रसर हो रहे हैं। अपनी लीला का अवसान की ओर अग्रसर हो तो रहे हैं। किंतु यह स्वामी जी भी स्वामी जी जैसे स्वामी जी भी यह बात को सब समय मन में रख पाते थे कि नहीं संदेह है क्योंकि ठाकुर की यह जो डिविनिटी है उसके सामने बाह्य आवरण अच्छा हो कि बुरा हो सुस्त हो कि असुस्थ हो उसका कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। साधन बले स्वामी जी भीतर तो स्पर्श सोहाए अपरे धर्म शक्ति संक्रमण कर बार खमतार इसत उन्मेश होइया छे साधना करके स्वामी जी के भीतर में उस समय मात्र स्पर्श करके दूसरों के भीतर में धर्म शक्ति संक्रमण करने की क्षमता का थोड़ा सा उदय हुआ है उन्मेश होया छ उन्मेश अर्थात कि उदय हुआ है स्पर्श करके ही स्वामी जी उनके भीतर में अपनी जो स्पिरिचुअल पावर पावर है उसको वह ट्रांसमिट कर सकते हैं। इस क्षमता का प्रारंभ स्वामी जी में उस समय हो चुका था। त मध्यम निजे भीतर ओई रूप शक्ति उदय स्पष्ट अनुभव करले ओ कहा कि वो ओ भा स्पर्श करिया ओ विषय सत्ताशत ए परंत निर्धारण करे नहीं उन्होंने अपने भीतर में इस शक्ति के उदय की स्पष्ट अनु इस शक्ति के उदय का स्पष्ट अनुभव किया तो था किंतु किसी को इस तरह से स्पर्श करके इस बात की सत्य असत्यता का निर्धारण अभी तक किया नहीं था। उन्होंने यह एक्सपेरिमेंट करके नहीं देखा था कि जो मुझे लग रहा है, जो मुझे ऐसा फील हो रहा है कि मेरे भीतर में इस तरह की टच करके ही स्पिरिचुअलिटी ट्रांसमिट करने की जो कैपेसिटी जो जन्म ले रही है उसको मैं एक्सपेरिमेंट करके प्रूव करूं कि नहीं तो इस तरह का एक्सपेरिमेंट अभी तक उन्होंने नहीं किया था। किंतु नाना

स्वामी विवेकानन्द स्पर्श कर के लोगो में आध्यात्मिक शक्ति संचार करने की शक्ति अद्वैत वेदांत के अनुसार साबित करते है

भावे प्रमाण पया वेदांत अद्वैत मते विश्वासी होइया तर्को जुक्ति सोहाए ओई मत बालक ओ गृहस्थ भक्त दिगर भीतर प्रविष्टो कराई बार चेष्टा करते छिले किंतु यह तो प्रमाण तो आपको मिलता है जब आपके भीतर में शक्ति का प्रारंभ होगा शक्ति का उदय होगा तो फिर आपको फील तो होगा कि हां मेरे भीतर में इस तरह की शक्ति का जन्म हो रहा है और फिर साथ-साथ में ही उनको अद्वैत मत के ऊपर में विश्वास था यदि आप यह कहते हैं कि सभी के भीतर में वही एक आत्मन है। तो स्वामी जी की खुद की आत्मन भी तो उनके गुरु भाइयों में बाकी सबके भीतर में है। तो इस हिसाब से भी शक्ति का ट्रांसमिशन होना कोई असंभव बात नहीं है। वही जैसे ठाकुर का है। ठाकुर ने मां को कहा कि मैं खा नहीं पा रहा हूं। तो मां ने क्या कहा कि इतने सारे लोगों के मुंह से तो तुम खाते हो। यानी जो डायरेक्ट डिसाइपल जो जितने भक्त थे वो जो खाना खा रहा है तो एक तरह से तो ठाकुर ही तो खाना खा रहे हैं। उनके भीतर में भी तो ठाकुर विराजमान है। हम लोग द्वैत की दृष्टि से यदि देखें तो ठाकुर उन लोगों के भीतर में सभी में विराजमान थे। अद्वैत की दृष्टि से देखें तो हमारे भीतर में जो आत्मन है वही आत्मन सबके भीतर में है। तो ये आत्मन यदि एक है तो शक्ति का भी तो समानांतर होना चाहिए। आपके भीतर में शक्ति ऑलरेडी है। मैं ट्रांसमिट नहीं कर रहा हूं। जो सूक्त शक्ति है उसको मैं जागृत करवा दे रहा हूं। इतना ही तो है। शक्ति का तो ट्रांसमिशन नहीं हो रहा है। यदि आप फोन करके मुझे कहेंगे कि अच्छा मैं तुमको ₹1000 ट्रांसफर कर रहा हूं। किंतु ट्रांसफर करने का कोई मीडियम नहीं है तो हम क्या करेंगे? अरे पैसा कहां से आएगा? ₹1000 यदि यूपीआई पेमेंट वगैरह नहीं है तो किस तरह से पैसा भेजेंगे? किंतु आप मुझे फोन करके यह कहेंगे कि अच्छा महाराज आपको पता नहीं आपके पास में ₹1000 ऑलरेडी पड़ा हुआ है। देखिए आपके वह कप बोर्ड में है और मैं जाकर कब को कप बोर्ड खोल के देखूं तो सही में ₹1000 पड़ा हुआ है। मुझे नहीं पता था उनको पता था। तो अभी देखिए कि दोनों तरह से ₹1000 मेरे पास में आए। एक तो उन्होंने फिजिकली ट्रांसमिट किया। दूसरा है कि मुझे पता नहीं था कि मेरे पास में है जो उन्होंने मुझे पता बता दिया। दिस ट्रांसफर बाय मटेरियल मींस एंड ट्रांसफर बाय नॉलेज। तो अद्वैत वेदांत कहता है कि आपको तो सिर्फ ज्ञान ही देना है। यह तत्व ज्ञान या तो ब्रह्म ज्ञान हमारे भीतर में है ही। गुरु को तो सिर्फ यह ज्ञान जागृत कर देना है। तत्व मति श्वेत केतो हे श्वेत केतों तुम वही हो तो तुम्हारे भीतर में भी वही अनंत अजर अमर आत्मन है। या तो फिर यह समय अवकाश के परे बियों्ड स्पेस एंड टाइम कोजेशन बिय्ड कोशन दिस आत्मन इज विद इन यू। हमको तो सिर्फ उनको यह ज्ञान ही करवा देना है। तो यहां पर भी स्वामी जी यदि यह अद्वैत भाव का आश्रय लेकर के आर्गुममेंट करते हैं तो क्या कहेंगे कि मैं अपनी स्पिरिचुअल अपनी स्पिरिचुअल पावर आप में ट्रांसमिट नहीं कर रहा हूं। आपके भीतर में जो ऑलरेडी स्पिरिचुअलिटी है वो मैं उसको जागृत करवा देने में आपको सहाय कर रहा हूं। अभी नरेंद्र का था कि जिस बात पर विश्वास हो जाए उसको फिर पूरा जी जान लगा के पुश करना। तो वैसे ही स्वामी जी के भीतर में यह शक्ति का उदय जब उन्होंने अनुभव किया कि हां स्पर्श मात्र से स्पिरिचुअल ट्रांसमिशन में कर सकता हूं तो दुनिया भर की थ्यरी का आश्रय लेकर के उन्होंने दूसरों के सर पर अपना मत बिाने का प्रयास प्रारंभ किया तो अभी अगेन क्या है बचपन का उत्साह है तो इसलिए तो तुम आंदोलन है वही विषय लैया भक्तो भीतर कोखन कोखन विषम गंडोगोल चोलीते छिलो और उस समय समय जब स्वामी जी ने इस तरह से बोलना शुरू किया तो भक्तों के भीतर में इसको लेकर के एक बड़ा ही चर्चा का प्रारंभ हुआ कि ये नरेंद्र यह सब क्या कह रहा है तुम आंदोलन एक तुम एक विषम आंदोलन एक विषम गंडगोल एक बड़ा आंदोलन चालू हुआ आंदोलन यानी कि चर्चा चालू हुई विषम गंडगोल माने हल्लागुल्ला होने लगा भक्तों के भीतर में कारण क्यों स्वामी जी स्वभाव छिलो जखन जहा सत्य बोलिया बुझतेन तोखनी ताहा हाकिया डाकिया शकल के बोलते एवं तर्क युक्ति सहाय अपर के ग्रहण करते चेष्टा करते तो स्वामी जी का स्वभाव ही था कि जिसको वो जिस समय सत्य समझते थे उसी समय चिल्ला चिल्ला करके हां डाकिया चिल्लाचिल्ला करके सबको बोलते और तर्क युक्ति की सहाय से दूसरों को उसके ऊपर में विश्वास करने का प्रयास करते अभी वही वो ठाकुर के साथ का जो वो ठाकुर का जो है किसी का भाव भंग नहीं करना तो स्वामी जी भी भाव भंग नहीं करते हैं। यह सब वह बचपन का उत्साह है। तो व्यावहारिक जगत शत जे अवस्था ओ अधिकारी भेदे नाना आकार धारण करे बालक स्वामी जी ताहा तखनो बुझते पारे ना किंतु यह जो एक बड़ा ही मैच्योर स्टेटमेंट यहां पे शरद महाराज देते हैं कहते हैं एक तो अंतिम सत्य है एक एब्सोल्यूट ट्रुथ है दूसरा है कि व्यावहारिक सत्य है जहां पे वही अल्टीमेट एब्सोल्यूट ट्रुथ विभिन्न रूप से विभिन्न परिस्थिति ियों में विभिन्न व्यक्तियों में विभिन्न भाव के अनुसार वह विभिन्न रूप से प्रकट होता है। यह बात अभी भी स्वामी जी को समझ में नहीं आ रही थी। व्यवहारिक जगत शत जे अवस्था और अधिकारी भेदे अवस्था और अधिकारी भेद के अनुसार विभिन्न आकार धारण करता है। बालक स्वामी जी यह तो बालक थे तो बालक स्वामी जी ताहा तखनो बुझते पारे नहीं ये बचपन का उत्साह होता है। बचपन के उत्साह को लेकर के सबके साथ में आर्गुममेंट करते थे। किंतु वह समझ नहीं पाए थे उस समय कि सिचुएशन के अनुसार एलिजिबिलिटी के अनुसार जो एब्सोल्यूट ट्रुथ है इट टेक्स डिफरेंट फॉर्म। जैसे कि ये सूर्य का प्रकाश है वो तो सफेद ही है। किंतु जब ये जो अपने वातावरण में ये जो ह्यूमिडिटी होती है पानी के जो बिंदु होते हैं जो वाटर ड्रॉपलेट जब बारिश होता है तो हवा में वो जो वाटर ड्रॉपलेट्स हुए हैं उसके ऊपर में जब यही सफेद प्रकाश गिरेगा तो वह किस तरह से वह स्प्लिट हो जाएगा और रेनबो का स्वरूप धारण करेगा। इंद्रधनुष के सप्त रंगों का स्वरूप धारण करेगा। हालांकि सूर्य प्रकाश एक ही कलर का है। सफेद जिसके भीतर में सभी रंग मिले हुए हैं। किंतु जब ये अलग-अलग एंगल से ये वाटर ड्रॉपलेट के ऊपर में वो रिफ्लेक्ट करेगा तब वो उसके अलग-अलग रंग दिखाई देंगे। तो वैसे ही यह व्यवस्था और यह अवस्था और अधिकारी भेद के अनुसार अल्टीमेट जो ट्रुथ है वह डिफरेंट-डिफरेंट विभिन्न आकार धारण करता है। हम यह नहीं कह पाएंगे कि यह आकार यह रंग जो है आप ऐसा कभी नहीं कह पाएंगे यह जो लाल रंग है, पीला रंग है, नीला रंग है। उसमें से यह सब रंग गलत है। सिर्फ सफेद रंग ही सत्य है। या तो फिर हम यह कभी नहीं कह पाएंगे कि लाल रंग ही सत्य है। पीला रंग या नीला रंग गलत है। तो वह सब एक ही रंग के विभिन्न प्रकाश थे। तो वह बात स्वामी जी नहीं समझ पा रहे थे तो जो कि वो बाद में समझेंगे। वो तो भारत भ्रमण वगैरह जो उन्होंने किया उसमें जो स्वामी जी को एकदम अच्छे से समझ में आ गया कि किस तरह से भारत की ये जो विशाल पवित्र भूमि है उसमें लाखों लाखों तरह की साधनाएं लाखों तरह के भाव लाखों लाखों विभिन्न धर्म पथ विद्यमान है। इसलिए स्वामी जी के भीतर में जो उदारता जो प्रकट हुई थी तो मुझे लगता है कि उसके लिए उनको शायद यह भारत भ्रमण करना पड़ा था। जो भी है आज यहीं तक कल फिर से देखते हैं आगे कि पूरी आगे स्टोरी में क्या होता है। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।

प्रश्न: स्वामीजी ने पश्चिम में बहुत से लोगों का धर्मांतरण नहीं किया, क्योंकि हमारा ध्यान मुख्यतः व्यक्तिगत आध्यात्मिकता पर है। दूसरी ओर, बहुत से भारतीय अन्य धर्मों में परिवर्तित हो गए हैं, क्योंकि वे धर्म सामाजिक प्रतिष्ठा और सफलता भी प्रदान करते हैं।

यहां पर देखिए सबसे पहले तो हमारी जो कन्वर्जन की मेथड है वह सामदा दाम दंड भेद वाली है नहीं हम लोगों का है कि फूल प्रस्फुटित हुआ तो सौरभ से आकर्षित होकर के लोग आए तो ऑलरेडी अपना एक दायरा सीमित था किंतु जो लोग आए वह इतने कमिटेड थे कि वे लोग ईजीली छोड़कर चले भी नहीं गए हैं। अभी हमको लगता है कि भारत में आखिरी 200 300 साल में बहुत कन्वर्जन हुए हैं। किंतु साथ में देखिए कि ये जो आप रिलीजन प्लस ये जो मॉडल कह रहे हैं ना कि स्पिरिचुअलिटी प्लस वाला मॉडल कि सिर्फ स्पिरिचुअलिटी नहीं है। वो एक सोशल एक सिक्योरिटी एक सोशल एक्सपेंशन सोशल एंबिशन भी ये लोग देते हैं। व्हिच इज मोर ऑन अट्रैक्टिव टुवर्ड्स मेनी स्ट्रेट ऑफ पीपल जो कि जो स्पिरिचुअल है उनके लिए स्पिरिचुअलिटी है। किंतु बाकी सबको एक्स्ट्रा कुछ चाहिए। तो यह जो ज्वार आया एक जो टाइडल वेव आया क्रिश्चियनिटी और इस्लाम का उसमें देखिए कि हिंदू को आज यदि देखिए कि स्वामी जी ने तो फिर भी कहा कि मनु यदि वापस आ जाएगा तो वही सब सिस्टम देखने को मिलेगी। 70% 75% वी आर स्टिल हिंदू। किंतु यह क्रिश्चियनिटी और इस्लाम बाकी जहां पर भी गया वह लोकल सभ्यता को संपूर्ण रूप से उन्होंने उड़ा दिया है। जैसे यह पूरा वो इजिपशियन जो ओरिजिनल जो चार संस्कृति थी कि नाइल रिवर वैली सिविलाइजेशन ये सिंधु रिवर वैली सिविलाइजेशन हुवांग हो सिविलाइजेशन और ये मेसोपोटेमियन सिविलाइजेशन तो मेसोपोटेमियन अर्थात कि आज का ईरान आज का इराक तो देखिए कि वो सिविलाइजेशन उड़ गई पूरा इस्लाम आ गया। ये नाइल रिवर सिविलाइजेशन पूरी उड़ गई। उसकी जगह पे इस्लाम आ गया। यह जो यह सिविलाइजेशन थी वांगो रिवर वैली सिविलाइजेशन ये चाइनीस सिविलाइजेशन वहां पे पूरा बुद्धिज्म आ गया। यानी कि जो चार एंशिएंट मोस्ट सिविलाइजेशन है उसमें सिर्फ हिंदूइज़्म ने ही अपना ओरिजिनल चरित्र बना करके रखा है। ये चाइनीस सिविलाइजेशन को बुद्धिज्म रूपी एक मिशनरी रिलीजन खा गया। ये इराकी सिविलाइजेशन और ये नाइल जो नॉर्थ अफ्रीका है उसको इस्लाम खा गया। और इसके बाद में जब क्रिश्चियनिटी आया तो आप देखिए कि ये नॉर्थ अमेरिका साउथ अमेरिका या तो फिर ये ऑस्ट्रेलिया वहां के जो एबोरिजिनल लोग आज कहते हैं आजकल या तो फिर नेटिव पपुलेशन कहते हैं। उन सबको 100% कन्वर्ट कर दिया। आज उनका रिलीजन नाम मात्र का है। वो एक डायवर्सिटी के रूप में आजकल जो चलता है ना तो वो डायवर्सिटी के रूप में वो सब रिलीजन रखे हुए म्यूजियम के रूप में। बाकी चलता तो क्रिश्चियनिटी ही है। यानी कि यह जो दोनों मिशनरी तीनों मिशनरी रिलीजन क्रिश्चियनिटी, इस्लाम और बुद्धिज्म उन्होंने पूरी-पूरी सिविलाइजेशन को खा गए हैं। किंतु एक हिंदूइज़्म एक बच्चा है उस लेवल का आज से 10,000 साल पहले जो ओरिजिनल चार्ट थी सिविलाइजेशन उसमें से सिर्फ हिंदूइज़्म ही बचा है जिसने कि अपना ओरिजिनल स्वरूप को मेंटेन करके रखा है। सो दोनों तरीके से कि देखिए कि पहले तो हमने कन्वर्ट साम दाम दंड भेद की वजह से नहीं किए। लोग आकर्षित होकर आए हैं और बिकॉज़ कि लोग आकर्षित होकर आए हैं। लोगों के भीतर में इंटीग्रिटी इतनी है कि वह लोग ईजीली कन्वर्ट होंगे नहीं। ज्यादा से ज्यादा 25%ेज आज हुए हैं कन्वर्ट किंतु 75% तो दे आर स्टिल हिंदू। और ये 75 कम नहीं है। 150 करोड़ की पपुलेशन में 75% यानी कि जगत के दूसरे जो वर्ल्ड रिलीजन है उसके समकक्ष हम बैठे हैं। भले ही वे लोग चाहे जियोग्राफिकली स्प्रेड आउट होंगे। हम लोग ज्योग्राफिकली लिमिटेड है। किंतु एस फार एस पपुलेशन नंबर इज कंसर्न टोटल नंबर ऑफ फॉलोअर्स। तो हिंदूइज़्म इज ऑन पार विद बुद्धिज्म, इस्लाम एंड क्रिश्चियनिटी। सो दैट इज़ वन थिंग। दूसरा कि जो आपने कहा स्पिरिचुअल प्लस जो एक पैकेज देना है। तो वो स्प्लिट कहां से हुआ? स्प्लिट हुआ कि बुद्धिज्म ने ये स्प्लिट किया। अदरवाइज़ वैदिक संस्कृति में देखिए कि क्षत्रिय क्षत्रिय का कार्य करेगा। ब्राह्मण ब्राह्मण का कार्य करेगा। वो जो एक सोशल इंजीनियरिंग था ऑलरेडी बुद्धिज्म की वजह से यह स्प्लिट आया। बुद्धिज्म कहता है वी विल गो फॉर प्योर स्पिरिचुअलिटी। तो दिस स्प्लिट नाउ हैज़ बीन फुलफिल। माने ये जो वापस जो इकट्ठा हुई है स्वामी जी ने किया है। ये शिव ज्ञान से जीव सेवा या तो फिर ठाकुर का है कि ब्रह्म शक्ति शक्ति अभेद वो जो आत्मनो मोक्षार्थम जगत हितायच यानी कि स्पिरिचुअलिटी प्लस यह पैकेज जो है दैट अगेन वी हैव रिजरेक्टेड। देखिए कर्म मनुष्य को करना ही है। कर्म क्या है पता है? हम लोग सोचते हैं इट इज हम एंबिशन फुलफिल करते हैं या तो फिर कहेंगे कि वासनाओं की पूर्ति करते हैं। दैट इज वन थिंग बट ह्यूमन नेचर इज़ एक्टिव। रजस तो हमारे स्वभाव में है। यू विल हैव अभी आज जैसे देखिए वो सुनीता विलियम्स स्पेस में 9 महीना रही। राइट? अभी वो वो जो भी हुआ होगा एक्सीडेंट वो 10 दिन का जो था उनका जो मिशन वो 9 महीना रह के आई। बट सी दिस पीपल एंजॉय द चैलेंज है ना जो डरपोक होगा वो तो वहां पर हार्ट फेल हो जाएगा कुछ दिनों के बाद में 101 दिन के बाद में किंतु दिस पीपल थ्री वो चैलेंज बिकॉज़ इट इज ह्यूमन नेचर कि टू एक्सप्लोर द स्पेस एक्सप्लोर द मून एक्सप्लोर द मार्स मार्स हमको विश्व ब्रह्मांड में फैलना है कॉस्मोसिस आवर होम अर्थ तो एक छोटा सा एक रजकण मात्र है वी आर टू एक्सपंड इनू एंटायर यूनिवर्स वो जो 16थ 17थ सेंचुरीज में यह जो ओशन एक्सप्लोरेशन चला था द सिमिलरली नाउ वी आर गोइंग टुवर्ड्स स्पेस एक्सप्लोरेशन तो दिस इज़ ह्यूमन नेचर यू विल हैव टू गिव देम अ पावरफुल माने मदानगी वाली फिलॉसोफी देनी होगी या फिर जिसको मुझे डर लग रहा है मैं यह काला पानी ये भारत में जो एक भयानक एक चीज पिछले जो 200 300 सालों में प्रकट हुई थी कि जो काला पानी क्रॉस करेगा उसको फिर वो नाथ के बाहर कर देंगे। ये स्वामी जी काला पानी क्रॉस करके विदेश में गए। वापस आए तो उनको काली मंदिर में नहीं प्रवेश करने दिया। अभी जो मां काली जो कि पूरे विश्व ब्रह्मांड का सृष्टि स्थिति प्रलय करती है वो वो जो आप यदि भारत को छोड़कर विदेश गए तो मां काली के ब्रह्मांड से बाहर हो गए क्या आप ये किस तरह का पागलपन भारत में चला था। सो जो कि एक वर्ल्ड एफमिंग जो फिलॉसोफी होती है, मर्दानगी वाली फिलॉसोफी होती है, इट पुशेस यू आउटसाइड टू एक्सप्लोर टू ककर टू टू लर्न टू टू आवर पर्स टू डेवलप आवरसेल्फ टू इवॉल्व। दैट इज दिस वर्ल्ड एफमिंग फिलॉसोफी। एंड दिस इज व्हाट स्वामी जी हैज़ ब्रिंग टुगेदर टुडे। अवर्स इज़ अ वर्ल्ड एफमिंग फिलॉसोफी। नॉट अ वर्ल्ड नेगेटिंग फिलॉसोफी जो कि ये पिछले 1000 साल में हिंदूइज़्म हो गया था। वो फिर से जाएगी भी सही। इतना

प्रश्न: सुनीता विलियम्स कहती हैं कि वह स्पेस मिस करती है.

एक्सीडेंट होने के बाद में लोग बोलेंगे अच्छा अभी दूर से ही रामराम है। वो फिर से चली जाएगी नेक्स्ट मिशन में। अभी मैंने एक रिसेंटली आर्टिकल पढ़ा था। ये जो भारत ने वो जो चार एस्ट्रोनॉमर्स को रेडी किए हैं ना एस्ट्रोनॉट्स को कि वो गंगायान मिशन के लिए। तो कोई बोल रहा है कि पब्लिक से इनको छुपा करके क्यों रखते हैं? इनको भी पब्लिक में आने दो इंटरव्यू इंटरव्यू देने दो लोगों को इंस्पायर होने दो तो डोंट नो कि व्हाई कि ये इतना एक बार को बता दिया कि हां ये चार अपने एस्ट्रोनॉट है किंतु इसके बाद में आगे कुछ हुआ नहीं उसका वो ट्रेनिंग ले रहे होंगे कि व्हाटएवर

प्रश्न: स्वामीजी ने जो कहा था expansion is life उसकी अभी शरुआत भी नहीं हुई है.

रेदर देखिए कि आप भारत को एज ए होल देखिए माने इंडिपेंडेंस के समय आज से 70 साल पहले जो परिस्थिति थी अकाल आता था लाखों लाखों लोग मर जाते थे नाउ वी आर आर सेंडिंग दैट एस्ट्रोनॉट्स इन द स्पेस। सो दैट एक्सपेंशन इज़ देयर ऑलरेडी। वही है कि वी लोग इसको स्वामी जी के साथ में इक्वेट नहीं करते। अगेन वही बात है कि हम लोग अपना स्टैंप नहीं लगाना चाहते कि दिस इज़ विवेकानंदास कंट्रीब्यूशन। दिस इज़ रामकृष्ण मिशनंस कंट्रीब्यूशन। हम लोग है कि आईडिया देकर के चले जाते हैं। नाउ यू टेक दिस आईडिया एंड यू कैन डेवलप इट योरसेल्फ। तो वो जैसा आपने कहा ना कि हिंदू धर्म की यदि एक तरह से वीकनेस देखा जाए कि हम लोग कभी भी अपना नाम नहीं करना चाहते। अदरवाइज आप फ्रीडम मूवमेंट में देखिए ना कि जितने भी प्रथम पंक्ति के फ्रीडम फाइटर्स थे वैनगार्ड्स जितने भी थे ईच एंड एवरीवन ऑफ देम वेर इंप्रेस्ड बाय ठाकुर मा एटलीस्ट स्वामी जी सो दैट आवर कंट्रीब्यूशन इज देयर बट दैट कंट्रीब्यूशन इज़ हिडन लाइक ए मॉर्निंग ड्यू ऑन अ रोज वो रोज को पता भी नहीं चलेगा कि मॉर्निंग ड्यू आकर के वो जो सुबह का ओस आकर के मुझे सुपुष्ट करता जा रहा है। वह अपना खिल करके लोग जब गार्डन में आएंगे वह तो फूल को ही देखेंगे। खिले हुए फूल को वह लोग फिर यह नहीं देखेंगे। वह आजकल देखेंगे सुंदर पिचाई है। सत्य नाडेला है या तो फिर अपना यह जो स्पेस मिशन है, इसरो है हम लोग यह देखेंगे। बट भीतर में से भारत देश को जब उसकी सबसे बुरी अवस्था थी उस समय सुपुष्ट किसने किया? दैट इज आवर फिलॉसोफी।

प्रश्न: हिंदुओं को अपने देश और धर्म पर गर्व होने लगा है। इस तरह हम भारतीय स्वामीजी के आत्म-श्रद्धा के संदेश को अपना रहे हैं। देखिए, कितने लोगों ने महाकुंभ में पवित्र डुबकी लगाई! दूसरी ओर यूरोप दिन-प्रतिदिन डूबता जा रहा है।

अच्छा पहले तो यूरोप के बारे में वे लोग जो बोलते हैं वह इसमें इतना गलत भी नहीं है क्योंकि रशिया का जो पर कैपिटा जीडीपी होगा वह $1000 के आसपास का होगा जबकि यूरोप का जो पर कैपिटा जीडीपी है नियरली $50 $55000 यानी कि उनका इकोनमी रशिया से एटलीस्ट 10 गुना ज्यादा हेल्दी है। वही है कि उन लोगों का यह जो सेकंड वर्ल्ड वॉर का जो भयानक एक्सपीरियंस है तो वह डिफेंस में स्पेंडिंग नहीं करते हैं। दे आर वाइस कि वह जो स्पेंडिंग होता है वह हायर एकेडमिक्स में इंडस्ट्रियलाइजेशन में लगाया है। इसलिए देखिए कि आज जो नोबेल प्राइज जितना मिलता है उसमें यूरोप और अमेरिका का सबसे ज्यादा हिस्सा है। रशियन लोगों को नोबेल प्राइज मिला रेयरली मिलता होगा और जो मिलता भी होगा तो वह रशियन यह वेस्टर्न इंस्टीट्यूशन में स्टडी करता होगा जो कि इंडिया की भी सेम हालत है। तो दैट इज़ वन थिंग कि दे आर वेरी पावरफुल वेरी रिच। वही है कि वह डिफेंस पेंडिंग नहीं करते हैं। डोनाल्ड ट्रंप को गुस्सा क्यों आता है यूरोप पे? क्योंकि डिफेंस पेंडिंग उनका 1% ना 1% इतना ही है। जबकि आइडियली स्पीकिंग योर डिफेंस पेंडिंग शुड बी 3 टू 4% एटलीस्ट 2 टू 3% चाइना और रशिया का 20-30% है। यानी कि उन्होंने अपनी प्रजा को बैंककरप्ट करके जितना पैसा ही डिफेंस में डाल दिया। व्हिच इज़ रॉन्ग एक्चुअली। इंडिया का प्रॉब्लम है कि अपना जो डिफेंस पेंडिंग है उसमें कैपिटल एक्सपेंडिचर की वजह मैन पावर में सैलरी देने में ज्यादा चला जाता है। वि इज आल्सो रॉन्ग एक्चुअली आपने बहुत बड़ी आर्मी खड़ी की है। अभी क्या है लोगों को नौकरी तो देनी होगी वरना लोगों में असंतोष आ जाएगा। बोल के हमने बहुत बड़ी आर्मी खड़ी की है। किंतु युद्ध होगा तो आर्मी का नहीं वेपन सिस्टम चाहिए। लेटेस्ट वेपन सिस्टम चाहिए। उसके लिए फाइटर प्लेन चाहिए। ड्रोन चाहिए। लेटेस्ट टेक्नोलॉजी जिसको कि कैपिटल एक्सपेंडिचर बोलते हैं। जो नहीं करके हम लोग सैलरी में ज्यादा दे रहे हैं। अभी ये चाइना वो जो सिक्स्थ जनरेशन फिफ्थ जनरेशन स्टिल्थ फाइटर लेके आ जाएगा तो अपने 10 लाख 1 लाख सैनिक क्या करेंगे? सो दैट इज़ वन थिंग। सेकंड इज़ कि अभी देखिए

भारत को अंध-श्रद्धा से बचाने वाले पहले थे रामकुमार (श्री रामकृष्ण के बड़े भाई)

कि खास करके स्पिरिचुअलिटी का कि भारत में जो जागरण हो रहा है। देखिए कि हु इज़ एट द रूट ऑफ दिस? फनीली इनफ कि हु इज़ एट द रूट ऑफ दिस मॉडर्न रेनेस ऑफ़ स्पिरिचुअलिटी और हिंदूइज़्म कि वह रामकुमार है। अह लीला प्रसंग में आप पढ़ेंगे वो खास करके जो रानी रासमणि वाला प्रसंग देखेंगे कि वो कईवर तो है यानी कि सो कॉल्ड नीच जाति की है कोर्ट अनकोट उसको लेकर के वो अन्नभोग दे सकती है। बोल कर के कोई यह एक्सेप्ट ही नहीं करेगा। उस समय रामकुमार थे। उन्होंने कहा एक विधान दिया एक जजमेंट दिया कि अपना काली मंदिर अपने कुलगुरु के नाम कर दीजिए और फिर आप व्यवस्थापक होकर के यहां पे कीजिए। बोलकर के काली मंदिर का निर्माण हुआ। बोलकर के ठाकुर वहां पे आए और यह पूरा ये नवजागरण प्रारंभ हुआ। तो उस समय ये शरद महाराज लिखते हैं कि भारत की ये जो जाति प्रथा नाथ प्रथा इतनी भयानक रूप से इतने विषैले रूप से हमारे जो गले को पकड़ करके रही थी कि ये जो आम आदमी जो होता है ना एजुकेटेड मिडिल क्लास जो कि उस समय होने चालू हो गया था। तो उन लोगों को ना धर्म पर विश्वास ही नहीं आ रहा है क्योंकि अभी एक तो यूरोपियन एनलाइटन वैल्यू ली हुई है। यूरोप में जैसा बोलते हैं कि सभी का समान अधिकार है। ह्यूमन राइट्स होना चाहिए। लिबरल होना चाहिए। यहां पे आप सुबह को उठकर के बोलते हैं चाय पी के कि ये नीचे जाती है। ये ये है ये वो है। तो फिर इस तरह के हिंदू धर्म पे किसको विश्वास आएगा? यू हैव टू रिफॉर्म हिंदूइज़्म। रिफॉर्म शब्द अभी गलत लग रहा है हमको। बट दिस इज एक्चुअली व्हाट रामकृष्ण विवेकानंद डिड दे रिफॉर्म हिंदूइज़्म फंडामेंटली ये जो जितने भी ये जो सब ड्रॉस लगा हुआ था जितना भी कचरा हमने पिछले 1000 साल में जमा किया था उसमें से निकाल कर के ये जो वेदांत रूपी आत्मज्ञान रूपी जो जेम्स जो है जो रत्न है उसको हमने बाहर निकाला अभी आम आदमी देखिए कि क्यों वो हिंदू धर्म की ओर आकर्षित हो रहे हैं। अभी भारत को छोड़ ही दीजिए। ये जो 60 और 7 स्वामी जी से जो स्वामी जी अमेरिका गए अमेरिकनों को आकर्षित कर दिया। कि ये जो अपने पढ़े लिखे लोग तो छोड़ ही दीजिए। अमेरिकनों को आकर्षित किया और फिर स्वामी जी ने ही यह 60ज और 70ज में एक के बाद एक जो यहां से सब जा रहे थे परमहंस योगानंद है रमण महर्षि है ये नीमकरली बाबा है ये जितने भी है वो महर्षि जो जितने भी महर्षि कितने लोग हां तो या तो अमेरिका गए हैं या तो फिर भारत में ही रह के जैसे नीमकरली बाबा तो अमेरिका से बीटल्स या स्टीव जॉब्स वे लोग भारत आए हैं। सो वो क्या लेने को आए हैं? वह नाती जाति प्रथा, यह अंधश्रद्धा, यह काला पानी क्रॉस नहीं करना है। यह सती प्रथा, यह बाल्य विवाह प्रथा यह सब यदि आज भी होता, तो कौन स्वीकार करता? यह सबको हटाकर के वेदांत के मूल रत्नों को लोगों के सामने लेकर आए बोलकर के विदेशियों ने अपनाया और विदेशियों की देखादेखी अपना जो एजुकेटेड मिडिल क्लास है, उन्होंने अपनाया। सो दैट बिगिनिंग वाज़ डन बाय रामकुमार। क्योंकि काली मंदिर की प्रतिष्ठा हुई अन्नभोग जो हुआ और जो मंदिर सक्सेसफुल हुआ देयर इज़ अ कंट्रीब्यूशन ऑफ़ रामकुमार रामकुमार के कंट्रीब्यूशन [हंसी] यहां तक कि ठाकुर जाकर के रामकुमार को कहते हैं कि अपने पिताजी तो शूद्र के पास में से भिक्षा नहीं लेते थे। अशुद्र याजक यह शब्द यूज किया है। अपने पिताजी तो अशुद्र याजक थे। याजक यानी कि किसके पास में लेना? अशुद्र के पास। जो शूद्र नहीं है उसके पास में। अपने पिताजी अशुद्र याजक है और तुम यहां पे आकर के शूद्र के घर में पूजा करके अन्न खा रहे हो। तुमको शर्म नहीं आती है। ठाकुर डांटते हैं अपने बड़े भाई को। यानी कि वी कैन लेजिटिमेटली से कि रामकुमार ने ठाकुर को कन्वर्ट किया। और कैसे कन्वर्ट किया? देखिए पहले तो हजार युक्तियां दी कि देखो कि यह शास्त्र में लिखा है उसके अनुसार माली की तो ब्राह्मण की है। तो ठाकुर कहते हैं वो तो बालक गदाधर वो भी तो कम नहीं था नरेंद्र से आर्गुमेंट करने में। तो वो तो कहता है आपने ट्रिक करके ये सब करवाया है। थोड़ी ना इसका है। वो तो पैसा तो इसका लगा है रास मणि का। तो फिर वो रामकुमार वो उसकी साइकोलॉजी समझते हैं तो बालक गधाधर की तो कहते हैं अच्छा देखो तुमको यह शास्त्र की जितनी भी ट्रिक है उसके ऊपर में विश्वास नहीं है भले चलो किंतु तुम यह तो बात मानते हो कि गंगा का पानी शुद्ध जल जो है एकदम शुद्ध पवित्र है तो बालक गदाई कहता है कि हां हां 14 साल की उम्र थी उस समय 14 15 साल की वो कहता है हां हां यह बात तो एकदम पक्की है कि गंगा का जो जल है वह एकदम अति व शुद्ध पवित्र है तो वो रामकुमार कहता है अच्छा तुम एक काम करो काली मंदिर में से यह भिक्षा ग्रहण करो यह माने अनाज नहीं की पका हुआ खाना किंतु ये जो राइस वगैरह लेकर के गंगा के पानी में पका करके यहां पंचवटी के पंचवटी तो नहीं था गंगा के किनारे बैठ के खाओ तब शरद महाराज लिखते हैं कि जो युक्ति तर्क बालक गदाधर को भ्रमित न कर पाए वो गंगा की भक्ति ने उनके ऊपर में विजय प्राप्त कर ली। बालक गदाई कहता है कि अच्छा ठीक है गंगा का पानी तो शुद्ध है। उसमें पका करके मैं यहां पर बैठकर खा सकता हूं। सो यह जो बालक गदाधर का वो जो ब्रेन वाश किया वह तो रामकुमार ने किया है ना वो बाद में भी बाद में भी यहां तक

प्रश्न: शुरू शुरू में ठाकुर काली मंदिर का अन्न खाते-खाते रोते थे, कहते थे -- माँ किसका अन्न खिला रही हो.

कि अरे वो वो तो शुरू शुरू की बात तो छोड़ ही दीजिए जब ठाकुर को साधना में सिद्धि प्राप्त हो गई मथुर बाबू के साथ में नॉर्थ इंडिया भ्रमण करने को गए हैं। दैट वाज़ अह ठाकुर को निर्विकल्प समाधि तोतापुरी का आगमन वग़ैरह हुआ 19 1865 वग़ैरह के आसपास में। और यह नॉर्थ इंडिया भ्रमण किया उन्होंने 1868 यानी कि सिद्धि निर्विकल्प समाधि के दो-तीन साल के बाद में। उस समय जब नॉर्थ इंडिया गए गंगा माई के साथ में साक्षात्कार हुआ तो क्या बोलते हैं कि कई वर्ष का अन्न मैं कितने दिन खाऊंगा? अभी मैं गंगा माई के साथ में काशी में ही रह जाता हूं। रामकुमार वाज़ मोर लिवर देन ठाकुर। और फिर शरद महाराज क्या कहते हैं कि देखिए ठाकुर में ऐसी अपूर्णता देखकर के आपके मन में प्रश्न नहीं होता कि हम इनको अवतार के रूप में क्यों स्वीकार कर रहे? यानी ये जो मॉडर्न हिंदूइज़्म का रहनेसा हुआ है वो स्वामी जी नहीं ठाकुर नहीं रामकुमार

प्रश्न: स्वामीजी हिंदू धर्म के अंधविश्वासों के खिलाफ आवाज उठाने से कभी पीछे नहीं हटे

है। वो जो वर्ल्ड फेमस घटना है ना कि वो गौशाला के लिए वो डोनेशन लेने को आया। तो स्वामी जी कहते हैं यहां लाखों लाखों लोग भूखे मर रहे हैं। उनके लिए कुछ करो। तो वह आदमी कहता है गाय हमारी माता है। इसके लिए मैं यह सब कर रहा हूं। तो स्वामी जी कहते हैं गाय का ही लड़का ऐसा होगा मोटी बुद्धि वाला। तो आज आप ऐसा बोलने को जाइए देखिए क्या होता है। और दूसरा जो आपने यह जो

प्रश्न: आजकल वेदांत का बहुत प्रचार हो रहा है।

न्यू एज स्पिरिचुअलिटी के बारे में कहा अभी देखिए कि इसका प्रारंभ तो अमेरिका में हुआ था कि ये जो 60 और 70ज का यह जो हिप्पी मूवमेंट था या तो फिर ये काउंटर कल्चर इसको कहते हैं। आजकल का जो न्यू एज स्पिरिचुअलिटी उसके रूट्स है काउंटर कल्चर में ये 60ज के उस समय में। तो अभी ये काउंटर कल्चर का जो ये जो स्पिरिचुअलिटी दैट वाज़ मोर ओरिएंटेड टुवर्ड्स हिंदूइज़्म। हिंदू साधु सन्यासियों का प्रीचर्स का बहुत बोलबाला था। तो ये ये कहां से आया? फर्स्ट प्रीचर ऑफ हिंदूइज़्म तो स्वामी जी थे। और उसमें भी ये न्यू डिस्कवरीज में मेरी लुईस एक जगह पे लिखती है कि कैलिफोर्निया खास करके ये जो काउंटर कल्चर का ये जो सेंटर है ना दैट इज़ कैलिफोर्निया। अभी आजकल कैलिफोर्निया के साथ में बहुत सारे प्रॉब्लम है। बट एट दैट टाइम इट वाज़ दी यू नो शाइनिंग बेकन ऑफ लिबरलिज्म एंड इंटेलेक्चुअलिज्म। तो उस समय स्वामी जी जब कैलिफोर्निया में प्रवचन दे रहे थे तो फर्स्ट रो में बैठे हुए ऐसे कितने लोग थे कि एकदम डिलीजेंटली जो स्वामी जी बोल रहे कंटिन्यूस लिख रहे हैं। फिर मेरी लुईस कहती है कि जब स्वामी जी चले गए और जो न्यू एज स्पिरिचुअलिटी का वह जो सब प्रारंभ हुआ लोग बोलना शुरू किए लिखना शुरू किए मोस्ट ऑफ देम वेर स्वामी विवेकानंदस आइडियाज कि ये लोग जो बैठकर के लिख रहे थे वही है कि दे डिडंट क्रेडिट स्वामी जी किंतु यह बात तो सही है कि ये योगानंद परमहंस जैसे कितने सारे प्रीचर वो 60 के उस समय गए और ये दीपक चोपड़ा वगैरह ये जो ये जो महषि का ये जो ट्रांसेंडेंटल मेडिटेशन है। मैंने अभी कुछ दिनों पहले में यह वो किताब का नाम दिया था ना अमेरिकन वेदा उसका ऑथर है फिलिप गोल्डबर्ग। उसने ये बड़ा ही सुंदर रूप से ये अमेरिकन जो मॉडर्न न्यू एज स्पिरिचुअलिटी की हिस्ट्री है उसका एनालिसिस किया है। सो और आज का जो मिडिल क्लास जो कि जैसा आपने कहा श्री ना कि बाकी यह ब्रह्मा कुमारीज इनको पसंद करता है। दैट इज एन इको ऑफ़ द सेम काउंटर कल्चर मूवमेंट न्यू एज स्पिरिचुअलिटी। हमको मंदिर में जाते हैं तो तुमको यह विधि करके यह अंगूठी पहन लो। वो नहीं चाहिए। अभी हमको एक हायर आइडियाज चाहिए। लिबरल आइडियाज चाहिए जो सुनकर के आई विल फील एलिवेटेड, आई विल फील हैप्पी, आई विल फील पीसफुल। सो माने यह जो पूरा कि अंधश्रद्धा से एक हायर थिंकिंग की ओर दैट वास स्टार्टेड अगेन बाय स्वामी जी। माने देखिए कि यह जो भगवान बुद्ध ने भी भगवान बुद्ध ने भी वही किया। शंकराचार्य ने भी वही का किया जो हमने पढ़ा माय प्लान ऑफ कैंपेन में कि वह जो वैदिक संस्कृति में जो आ गया डिक्लाइन एंड फॉल तो बुद्ध के जो उनका जो एलिवेटेड महत चरित्र है उसकी वजह से लोग आए। शंकराचार्य का भी सेम कि वो बुद्धिज्म में डिक्लाइन आया। शंकराचार्य और रामानुजाचार्य जो आचार्य गण वो अपनी बुद्धिमत्ता अपनी वो जो चरित्र की महानता से लोगों को आकर्षित करके आए। सेम हिस्ट्री इज बीइंग रिपीटेड कि हम लोग तो कभी तलवार लेकर के AK-47 लेकर के कन्वर्ट करने को नहीं जाते हैं। आवर आइडियाज एंड आवर कैरेक्टर। दीज़ आर द आवर वेपंस। ना देखिए इसका उदाहरण है। माने यह

प्रश्न: क्या कोई अन्य घटना है जब स्वामीजी ने मात्र स्पर्श से आध्यात्मिकता का संचार किया हो?

टच तो फिर भी आपको एक फिजिकल कांटेक्ट चाहिए था। बाद में स्वामी जी की जो हायर माने इवॉल्यूशन हुआ। अमेरिका में एक जगह पर प्रवचन दे रहे थे। दे रहे थे। लोग मंत्रमुग्ध होकर के सुन रहे थे। स्वामी जी का माइंड कहां पे एकदम उठ गया था। लोग कंप्लीटली हिप्नोटाइज हो गए थे। एकाएक स्वामी जी प्रवचन को ब्रेक करके स्टेज में से उतर कर के बाहर निकल गए। तो स्वामी जी के जो फ्रेंड्स थे वो तो बड़े ही दुखी हो गए कि अरे स्वामी जी आपने क्या किया? लोग इस तरह से हिप्नोटाइज हो गए थे। मंत्रमुग्ध होकर के आपको सुन रहे थे और आपने ब्रेक क्यों कर दिया? तो स्वामी जी कहते मेरे पास में उस समय इस तरह का पावर आ गया था कि इन लोगों को हिप्नोटाइज करके मैं जो चाहे वो करवा सकता हूं। किंतु दिस इज नॉट द आइडियल ऑफ वेदांत। इसलिए मैंने अपना प्रवचन तोड़ करके मैं बाहर आ गया। यानी कि काशीपुर में तो स्पर्श करना पड़ता था। यहां पर तो अपनी वाणी के प्रभाव से ऐसे हजारों लोगों को मंत्रमुग्ध कर देते थे। और सबसे बड़ा उदाहरण है कि वह वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में जैसे ही प्रवचन समाप्त हुआ तो बाद में एक लेडी डिवोटी यह लिखती है अपने रेमिनेशंस में मिसेज ब्लोजेट इफ आई रिमेंबर करेक्टली। वह कहती है कि जैसे ही प्रवचन समाप्त हुआ सैकड़ों महिलाएं वो बेंच क्रॉस करके स्वामी जी की ओर जा रही है स्टेज के ऊपर में उनका दर्शन कर पाए नजदीक से उनको स्पर्श कर पाए उनको उनके साथ बात कर पाए इस आशा से तो यह मिस डिवोटी लिखती है कि इफ यू कैन रेजिस्ट दिस अटैक देन आई विल टेल यू यू आर रियली ए गॉड यह जो महिलाएं उनको मिलने के लिए जा रही है इस आक्रमण को यदि तुम रेजिस्ट कर पाओगे तो मैं कहूंगी तुम सही में ईश्वर को