Prayer
ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग स्वामी शारदानंद जी द्वारा लिखित खंड दो साधक भाव इसमें अवतरण का यानी कि इंट्रो प्रोडक्शन साधक भाव की आलोचना का प्रयोजन अभी इसमें हमने प्रथम पॉइंट कल देख लिया आचार्य दिगर साधक भाव लिपि बद्धो पावा जाए ना आचार्य लोगों का साधक भाव लिपिबद्ध मिलता हमको नहीं है अभी हम सेकंड पॉइंट देखते हैं यहां पर तहरा कोनो काले असंपर्क भक्तो मानव भावित चाहे ना अवतार या तो अपने इष्ट जिनकी हम पूजा कर रहे हैं जिनको कि हमने अपने ईश्वर के रूप में चुना है वह किसी भी तरह से अपूर्ण हो सकते हैं यह बात हम भक्त मानने को तैयार नहीं है क्यों इसके बारे में शारदानंद जी महाराज हमको कहते हैं ओई रूप होई बार कारण खजियार कठिन इस तरह का इस तरह से होने का कारण अभी यह जो पहला सेंटेंस है उन्होंने प्रथम पॉइंट के रिलेशन में कहा था प्रथम पॉइंट में कहा कि अवतार का या तो फिर आचार्यों का उनके साधक भाव का पूर्ण विवरण हमको मिलता नहीं है उन्होंने किस तरह से बचपन में साधनाएं की किस तरह की साधना करके सिद्धि प्राप्त की इन सबका विषद रूप से डिटेल डिस्क्रिप्शन हमको नहीं मिलता है अभी सेकंड पॉइंट स्टार्ट करते हैं महाराज जी यह करके कि ऐसा क्यों है इसके बारे में कोई भी कारण खोजना मुश्किल है क्या हम ठीक-ठीक बता पाएंगे कि भगवान कृष्ण या भगवान राम के बारे में बहुत ज्यादा डिटेल हमको नहीं पता है उनके साधक जीवन की यह और यदि नहीं पता है तो क्यों नहीं पता है यह कहना मुश्किल है भक्तो दिगर भक्ति आति सज्ज बोध होई ई सकल कथा लिपिबद्ध होई नाई भक्तों की भक्ति का भक्तों की भक्ति बहुत ज्यादा होने की वजह से ही शायद हो सकता है कि यह सब बातें लिपिबद्ध नहीं हुई है नरर असप असंपर्क करते संके चित हो आई तरा बोध होई ई सकल कथा लोक नयने अंतराले राखा जुक्ति जुक्तो विवेचना कोरिया छन मनुष्य की असंपर्क ऊपर में में आरोप करने से वे लोग संकुचित हुए थे इसीलिए लग रहा है कि यह जो बायोग्राफर थे उनके जीवनी कार् थे आचार्यों या तो फिर अवतारों के उन्होंने इसी वजह से शायद इस बात को लोगों से दूर रखने का प्रयास किया है क्या कहना चाहते हैं थोड़ा सा महाराज का सेंटेंस थोड़ा कॉम्प्लिकेटेड है किंतु इसके पीछे का भाव समझना आसान है कि हम हम यदि किसी की पूजा करें किसी की आराधना करें तो ऐसा हम क्यों करेंगे देखिए हम लोग मनुष्य जीवन में हमारे जीवन में किसी कोई रिस्पेक्टेड व्यक्ति को मिलना या तो कोई फिर धनी व्यक्ति को मिलना या तो फिर कोई विद्वान व्यक्ति यह सब तो हमने बहुत देख ली यदि हमने ग्रेजुएशन किया है तो हमारी कॉलेज में कोई ना कोई प्रोफेसर होगा जिसके ऊपर में हमारी बड़ी रिस्पेक्ट है हम कहते हैं कि उस प्रोफेसर का लाइफ भी बड़ा सरल सहज है और उनके पास में विद्या भी बहुत है यदि किसी के पास में पावर खोजना है शक्ति जो देखनी है तो बहुत सारे पॉलिटिकल लीडर हैं जिनके पास में बहुत सारा पावर होता है यदि किसी के पास में ऐश्वर्य देखना है तो बहुत सारे धनी लोग हैं कि जिनके पास में ऐश्वर्य है किंतु जस्ट बिकॉज कि किसी के पास में पावर है किसी के पास में ऐश्वर्य है या तो फिर किसी के पास में विद्या है या तो फिर कोई सहज सरल जीवन जी रहा है क्या हम उनकी पूजा करना शुरू कर देंगे हम उनको रिस्पेक्ट करेंगे हम उनकी बात सुनेंगे यदि हम तकलीफ में आ जाते हैं तो हम उनके पास में जाएंगे यह पूछने के लिए कि अच्छा अभी मेरे जीवन में मुझे कौन सा कार्य करना चाहिए यह जो आजकल कैरियर कंसल्टेंट हमको 10 जगह पे दिखते हैं कैरियर कंसल्टेंट क्या करते हैं उनके पास में इंडस्ट्री का बड़ा अच्छा नॉलेज होता है उनके पास में आप जाइए वह बता देंगे यदि आप ग्रेजुएशन करना चाहते हैं तो भविष्य में कौन सी स्ट्रीम में ग्रेजुएशन करने से आपको ज्यादा सैलरी मिलेगा कहां पर आपका ज्यादा डेवलपमेंट होगा वह सब आपको बता देंगे मन यदि थोड़ा सा डिप्रेसो गया है तो हम लोग यह इंस्पिरेशनल स्पीकर्स को सुनने को जाते हैं बहुत सारे इंस्पिरेशनल स्पीकर्स हैं उनको सुन कर के बड़ा आनंद आता है और उस क्षण तक हम लोग सब कुछ भूल जाते हैं आजकल ये सिनेमा स्टार है रॉक स्टार है उनको लोग कितने करोड़ों करोड़ों लोग सुनते हैं आजकल देखेंगे कि कोई नया एल्बम पब्लिश हुआ म्यूजिक का या तो कोई नया मूवी यह हुआ रिलीज हुआ कितने लोग कितने रुपया देकर के यह सब कुछ देखते हैं सुनते हैं किंतु यह मान कर के क्या हम उनकी पूजा करते हैं नहीं बिल्कुल नहीं शायद ही कोई पागल होगा कि कोई फिल्म स्टार है या तो रॉक स्टार है या तो क्रिकेटर है ना कि पॉलिटिशियन है ना कि अपना प्रोफेसर है ना कि कोई इंस्पिरेशनल टीचर है इनकी पूजा करता होगा इनके नाम का जप करता होगा रेयरली ऐसे कोई पागल आपको मिल जाएंगे किंतु यहां पे क्योंकि क्या बात है कि भले ही चाहे हम उनको रिस्पेक्ट करते हो हमारे मन में यह बात बड़ी क्लियर है कि जहां तक मनुष्यों के दोष गुण का प्रश्न है वह भी हमारे जैसे ही है कोई बहुत बड़ा इनोवेट है कोई बहुत बड़ा साइंटिस्ट है जैसे कि मान लीजिए आइंस्टाइन है तो क्या हम यह कहेंगे कि आइंस्टाइन के भीतर में कोई दैवी गुण थे नहीं उसके भीतर में भी वही ह्यूमन फेलिंग्स थी वही ह्यूमन मेरिटस थी जो कि आज मेरे में है हालांकि उसके पास में कंसंट्रेशन की बुद्धिमत्ता की एकाग्रता की क्रिएटिविटी की क्षमताएं मेरे से हजार गुनी होगी किंतु जहां तक प्योर ह्यूमन लेवल का प्रश्न आता है ही माइट नॉट बी बेटर देन आई एम या तो फिर ऐसा हो सकता है कि ह्यूमन लेवल पे मैं आइंस्टाइन से ज्यादा बेटर हूं आइंस्टाइन ने अपनी प्रथम पत्नी को डाइवोर्स दे दिया था और फिर अपनी
Albert Einstein
कजिन के साथ में मैरिज किया था एटलीस्ट मैं तो यह सब नहीं करने को जाता यह तो मैं आसानी से कह सकता हूं यानी कि किसी को हम कितना ही रिस्पेक्ट कर ें हम उसकी पूजा नहीं करेंगे उसके नाम का जप नहीं करेंगे उसके मंदिर नहीं बनाएंगे उनकी प्रतिमा का कंस क्रेशन नहीं करेंगे उनके नाम पर संघ की रचना नहीं करेंगे हजारों हजारों सालों तक ऋषि मुनि गायक कवि यह साधक उनका गुणगान गाएंगे उनके जीवन चरित्र की रचना ना करेंगे उनके ऊपर में कविताएं लिखेंगे ऐसा कभी नहीं होने वाला आज से मान लीजिए दो ढाई तीन 4000 साल पहले भगवान कृष्ण और भगवान राम के साथ में और हजार लोग आए होंगे बुद्धिमत्ता जिन में होंगी विद्वत्ता जिनमें होंगी सौंदर्य जिन में होगा शक्ति जिन में होंगी महा चक्रवर्ती होंगे वे लोग किंतु कहां किसके मंदिर है आज भगवान राम और भगवान कृष्ण के ही मंदिर दिखते हैं यह भगवान बुद्ध गौतम बुद्ध उनके साथ में हजार राजवंश थे अभी कि किंतु उनमें से सिर्फ एक ही राजकुमार है गौतम बुद्ध जिनके नाम पर आज हम एक पूरा धर्म संप्रदाय चलता है किंतु और किसी राजा के नाम पे और किसी साइंटिस्ट के नाम पे और किसी रॉकस्टार के नाम पे और किसी पॉलिटिशियन के नाम पर धार्मिक संप्रदाय स्टार्ट नहीं होते हैं तो यह डिफरेंस है कि यह कोई भी व्यक्ति जिनमें हजार चाहे वह उसने उपलब्धियां सिद्धियां प्राप्त की हो और एक अवतार या तो एक आचार्य या तो फिर जिनको कि हम अपना इष्ट मानते हैं उनमें इन दोनों में फर्क क्या है विद्वत्ता वगैरह वगैरह गुण हजार हो मनुष्य लेवल पे न ह्यूमन लेवल वह शायद मेरे से बहुत ज्यादा आगे नहीं है जिनको कि हम षड रिपु कहते हैं या तो फिर जिनको कि हम पंच क्लेश कहते हैं काम क्रोध या तो फिर यह काम और कांचन जिसके प्रति जिनकी आस्था बहुत ज्यादा है ऐसे लोग लोग को हम कभी भी उनकी पूजा नहीं करेंगे कभी भी उनको रिवीर नहीं करेंगे जबकि यह आचार्य यह इष्ट बुद्ध है जीसस है राम है कृष्ण है फिर यह गौरांग महाप्रभु है इन सबके मंदिर बनते हैं हनुमान जी के मंदिर बनते हैं मां जैसे कि मां दुर्गा का मंदिर बनता है हालांकि मां दुर्गा तो अवतार नहीं है शी इज गॉडेस हर सेल्फ बट एनीवे तो इन लोगों के मंदिर बनते हैं इन लोगों की पूजा होती है पूजा क्यों होती है क्योंकि हम लोग मानते हैं कि वह ह्यूमन लेवल पे हमारे से बहुत ज्यादा सर्वश्रेष्ठ है उनके भीतर में हमारी जो फेलिंग्स है हमारी जो कमजोरियां है ह्यूमन लेवल पे वो उनके भीतर में नहीं है यदि हमारे सामने कोई भी प्रलोभन की चीज आ जाए तो फट करके हमारी इंद्रियां हमारा मन इसके प्रति आकर्षित हो जाएगा जो कि हमारे इष्ट है जिनके कि हमने मंदिर बनाए हैं जिनके मंदिरों की बड़ी-बड़ी प्राण प्रतिष्ठा होती है जिनके नाम के त्यौहारों पर लाखों करोड़ों लोग आनंद मनाते हैं पूजा होती है उनके भीतर में उस तरह की फेलिंग्स कमजोरियां नहीं होगी जो कि बाकी सब लोगों में भले ही चाहे कितनी ही सिद्धि प्राप्त कर ली हो वह और हम आइंस्टाइन और मैं यदि हम दोनों को डायबिटीज हो गया है डॉक्टर ने कहा है कि मीठा नहीं खा खाना है और फिर हम दोनों एक टेबल पर बैठे हैं हमारे सामने वह मिठाई की प्लेट लाकर के रख दी अभी हम दोनों में से क्या यह कह पाएंगे कि जस्ट बिकॉज कि वो इतना बड़ा साइंटिस्ट है उसका विल पावर मेरे से स्ट्रांग होगा नहीं हो भी सकता है नहीं भी हो सकता है इट इज अ मैटर ऑफ डिबेट सही सही में एक्सपेरिमेंट करके देखना होगा किंतु यदि मेरे इष्ट है भगवान श्री राम कृष्णा और मैं और वो हम दोनों को एक साथ में बिठाया जाए और फिर हमारे सामने कोई भी प्रलोभन की चीज लाई जाए तो 90 पर केसेस में ऐसा होगा कि मेरा मन प्रलोभन हो जाएगा मेरा मन कमजोर हो जाएगा उस चीज को ग्रहण करने के लिए मैं शायद कुछ ना कुछ करूं किंतु भगवान श्री राम कृष्ण पर मुझे 100% भरोसा है 100% केसेस में उनका मन कभी भी प्रलोभन नहीं होगा यह विश्वास है बोलकर के तो मैं उनके नाम पर यहां पर सब कुछ छोड़ कर के आया हूं तो अभी मान लीजिए कि ऐसा कहीं पर इस तरह की किताब लिखी जाए एक्चुअली इस तरह की किताबों का कमी नहीं है एक कालिस चाइल्ड बोलकर के एक पागल ने एक किताब लिखी है तो उसमें इस तरह का बहुत सारा वर्णन है कि किस तरह से भगवान राम कृष्ण विभिन्न प्रकार के प्रलोभन से जड़ित थे तो ऐसा बोलने वाले लोगों की कमी नहीं है हालांकि किंतु देखिए कि मेरे मन में यह मामला बड़ा स्पष्ट है कि नहीं श्री रामकृष्ण देव इस तरह के किसी भी प्रलोभन में नहीं पड़ेंगे नहीं फसें तो अभी मान लीजिए कि वोह तो किसी पागल ने यह लिखी है कालिस चाइल्ड किंतु शारदानंद जी महाराज स्वयं यहां पे ऐसा कुछ लिखना शुरू कर दे कि एक ऐसा समय था जबकि ठाकुर का मन उनके वश में नहीं था या तो फिर ठाकुर इस तरह की हरकत किया करते थे जो कि सामान्य तौर पर हमारे जैसे आम आदमी करते हैं तो क्या हमको फिर ठाकुर पर वह विश्वास रहेगा ठाकुर पर वह श्रद्धा रहेगी एक तो ब बत बड़ा प्रश्न आ जाता है इसीलिए यहां पर जो शारदानंद जी महाराज पहले तो हमारे सामने एक प्रपोजिशन स्थापित किया साधक भाव की आलोचना का प्रयोजन क्या है क्योंकि यह जो पूरा द्वितीय खंड है श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग का इसमें सब तरह की साधनाएं का वर्णन है कि ठाकुर ने किस-किस तरह की साधना की थी और जद यदि शारदानंद जी महाराज ठाकुर की साधना का वर्णन करते हैं तो साथ में यह भी प्रश्न को सॉल्व करना होगा कि दूसरे अवतारों के जीवन की साधना का विषद वर्णन क्यों नहीं है और फिर उसके सामने आपको एक के बाद एक आर्गुमेंट देनी होगी तो यहां पर सर्वप्रथम उन्होंने एक सॉल्यूशन हमारे सामने प्रपोज किया है कि कोई भी भक्त अपने इष्ट देवता को अपूर्ण असंपर्क तो इसलिए शायद हो सकता है कि यह साधक भाव की आलोचना दूसरे अवतारों के जीवन में ना हो हालांकि इस प्र मैं पर्सनली इस प्रपोजिशन को स्वीकार नहीं करता शरद महाराज भी नहीं करेंगे किंतु शरद महाराज जो भी उसका रीजन दे मेरा जो खुद का मानना ऐसा है कि देखिए कि हम लोग भगवान श्री राम कृष्ण देव को या तो फिर किसी भी इष्ट में हम विश्वास करते हो उनके ऊपर में हमारा विश्वास क्यों होता है हम लोग यह कोई लेखा जोखा करके कोई अपने इष्ट को स्वीकार नहीं करते मैं यह कभी नहीं सोचता यदि मैं क्रिश्चियन हूं या तो फिर मैं बौद्ध हूं मैं यह नहीं सोचता कि यह जो हमारे ध के फाउंडर है उनके जीवन में अच्छे कितने कार्यकलाप है बुरे कितने हैं दोनों का बैलेंस क्या है बैलेंस में जो अच्छा वाला है उसका पॉजिटिव बैलेंस है ना कि बुरे वाले का ने ज्यादा है वो नेगेटिव बैलेंस है उस तरह से लेखा जोखा करके मैं किसी को भी स्वीकार नहीं करता जनरली किसी को हम इष्ट के रूप में स्वीकार करते हैं तो वह होता है कि हमारे मन में कुछ ना कुछ समस्या होती है उस समस्या का सॉल्यूशन जैसे कि या तो फिर उनके साथ में वार्तालाप करके यदि हम जीवित है फॉर्चूनेटली जैसे कि मास्टर महाशय बलराम बसु वगैरह का या तो फिर जैसे हम लोगों के साथ में है आजकल की उनकी किताब पढ़ कर के हमको कोई ना कोई डायरेक्शन मिली जैसे कि हम अंधेरे में भटक रहे थे एकाएक ऐसी एक गाइडिंग लाइट हमको मिली कि चलो अभी हम उजाले की ओर फिर से आ गए हैं तो ऐसा कोई चमत्कार जभी अपने जीवन में होता है पहले मटेरियल फिजिकल चमत्कार होते थे कि हां एक बास्केट में में से इतनी सारी ब्रेड निकालनी शुरू की कि जिससे कि बहुत ज्यादा लोग खा पाए या तो फिर एक राक्षस था या तो कंस था जो कि बहुत ही एक दुराचारी राजा था उसका वत कर दिया तो फिर चलो उनको लोग स्वीकार करना शुरू करें ये तो बाह्य चमत्कार है किंतु आंतरिक चमत्कार भी होते हैं आंतरिक चमत्कार में हमारे मन की जो समस्याएं होती है हमारे मन हमारा मन जो एक गड़ मथल में पड़ा होता है कि मैं यह कर कि क्या करूं कि रास्ता नहीं मिलता है अंधेरे में भटकते रहते हैं डिप्रेशन में चले जाते हैं तो उस समय जैसे कि मास्टर महाशय का था कि वह आत्महत्या करने के लिए गए थे क्योंकि पिताजी के साथ में नहीं पट रहा था अपना एक अलग से घर किया था उनकी पत्नी के साथ में भी कुछ ना कुछ प्रॉब्लम चल रहा था तो वह बड़े ही डिप्रेसो गए थे सोचा कि मैं आत्महत्या करूंगा तब कहीं जाकर के एकाएक ठाकुर मिल गए और ठाकुर की वाणी ने ने उनके हृदय पर एक इस तरह का चमत्कारिक असर किया एक देवी असर किया कि उनके मन का जो अंधेरा है सब दूर हो गया अभी चाहे आप मुंह से कुछ भी बोले हो ठाकुर या तो फिर मास्टर महाशय ने मुंह से जो कुछ भी बोला हो उनके हृदय में जो प्रतिक्रिया हुई है वही असली प्रतिक्रिया है उनके हृदय का अंधेरा दूर हुआ और ठाकुर के श्री चरणों को उन्होंने अपने सर पर रखा तो यह आंतरिक या तो बाह्य कोई चमत्कार होता है तब हम कहीं जाकर करके किसी को इष्ट के रूप में स्वीकार करते हैं तो यह इसलिए नहीं कि यह लेखा जोखा करके ना कि ऐसा कुछ करके किंतु यहां पर शरत महाराज को कुछ ना कुछ आर्गुमेंट देनी है इसलिए उन्होंने इस आर्गुमेंट को दिया है कि हम अपनी असंपर्क जोरियां हम अपनी वीकनेस हम अपनी यह जो कुकर्म है अपने यह जो दुराचार है वह अपने इष्ट पर आरोपित होते देखना नहीं चाहते हैं इसलिए हम यह स्वीकार नहीं करना चाहते हैं कि हमारे इष्ट कभी भी असंपर्क बारे में बहुत ही कम उनकी साधना हों का वर्णन है अथवा ईते पारे महापुरुष चरित्रे सर्वांग संपूर्ण महान भाव शकल साधारण सम्मुख उच्चा दर्श धारण करिया तहा दिगर ज तोटा कल्याण साधि तो करी बे ओई शकल भावे उपनी तो होई ते तरा ज अलौकिक उद्यम करिया छ ताहा त तोटा कर बेना भाभिया उहा देर विवरण लिपि बद्ध करा तरा अनावश्यक बोध करिया छन यह तो एक कारण दिया कि हम लोग यह नहीं चाहते कि उनके भीतर में असंपर्क एक दूसरा भी कारण देते हैं महाराज जी कि मनुष्य की असंपर्क चरित्र का जो सर्वांग संपूर्ण भाव जो है वह मनुष्य के सामने रखने से मनुष्य जिस तरह से उससे प्रे प्रेरित होता है उससे जो उसके हृदय में जो शांति मिलती है उतनी शांति या तो फिर उतनी प्रेरणा उसको यही महापुरुष की साधना का वर्णन करके शायद ना मिले यह सोच कर के शायद हो सकता है कि उन्होंने साधना का विवरण ना दिया हो ऐसा जैसे कि अभी ठाकुर के बारे में ज्यादातर तो लीला प्र कथामृत आप देखिए कि उनके वही दिनों का विवरण है जिस दिनों ठाकुर ने संपूर्णता प्राप्त कर ली थी शोड़ी पूजा करके अपने भक्तों को उन्होंने पुकारा था सब भक्त आकर के उनके चारों ओर मिलित हो गए थे और फिर उनमें से एक मास्टर महाशय थे मास्टर महाशय जब ठाकुर के पास आए थे तो ठाकुर की साधना भी संपूर्ण हो गई थी और वह लोक कल्याण में संपूर्ण रूप से लगे थे और दूसरी एक बात है कि एक जो बात थी जैसे ब्रह्म समाज वाले कहते हैं कि जैसे उन लोगों को तो केशव सेन का एक महात्म प्रतिपादित करना है महात्म एस्टेब्लिश करना है तो वे लोग कहा करते थे कि आप ऐसा मत सोचिए कि सिर्फ ठाकुर ने सिर्फ केशव सेन ने ठाकुर के पास में से कुछ सीखा है ठाकुर भी केशव सेन के पास में बहुत कुछ सीखे हैं बोल कर के वो अपना दिखाते रहेंगे कि केशो के ये गुण था जो कि ठाकुर ने लिया वगैरह वगैरह तो यहां पर देखिए कि यही शरत महाराज यही लीला प्रसंग में कहते हैं कि हां हम स्वीकार करते हैं कि ठाकुर ने केशव से कुछ सीखा है तो हमको बड़ा आश्चर्य होगा केशव कौन है ठाकुर कौन है केशव के पास में एहसासो क्या था कि ठाकुर सिख है दूसरी बात है कि यह जो ठाकुर की ववन जो गुरु थे जिनके पास में से ठाकुर ने सीखा तोतापुरी है कि भैरवी ब्राह्मणी इवन केशव का कोई मुकाबला उनके साथ में भी नहीं है तो वो ठाकुर का गुरु कैसे बन सकता है तो फिर शरत महाराज आगे कहते हैं कि देखिए यह जो आधुनिक समाज है अंग्रेजी शिक्षित मध्यम वर्ग के युवाओ है उनके साथ में किस तरह से बात करना उनका क्या साइकोलॉजी है उनका क्या माइंड सेट है यह ठाकुर ने केशव के साथ में बात करके सीखा था इसीलिए अल्टीमेटली यह जो मिडिल क्लास एजुकेटेड यंग लड़के ठाकुर के पास में आना शुरू हुए तो वह लोगों को ठाकुर इमीडिएट उनकी साइकोलॉजी पकड़ करके उन्हीं की लैंग्वेज में बात करना ठाकुर ने चालू कर दिया था स्वामी जी के साथ में भी ऐसा हुआ था देखिए कि यहां पे भारत में स्वामी जी थे तो उन्होंने तो ब्रिटिश इंग्लिश सीखा था ब्रिटिश लोगों के साथ में उनका वार्तालाप था जो थोड़ा बहुत विदेशियों के साथ में इंटरेक्शन होता है वह तो ब्रिटिश लोगों के साथ में था किंतु जबी आप अमेरिका जाएंगे देखेंगे कि अमेरिकन कल्चर अमेरिकन लैंग्वेज का जो नुआंस है जो प्रोनाउंस एशन है वो वगैरह ब्रिटिश लोगों से काफी डिफरेंट है और यदि आप ब्रिटिश लैंग्वेज में ब्रिटिश भाषा में ब्रिटिश डायलेक्ट में ब्रिटिश माइंडसेट के साथ में उनके साथ बात करेंगे ना तो उनको इतना पसंद नहीं आएगा क्यों क्योंकि ब्रिटिश के साथ में युद्ध करके तो उन्होंने अमेरिका को जीता था अमेरिका का वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस तो ब्रिटिश लोगों के साथ में ही था तो इसलिए वे लोग ब्रिटिशर को इतना पसंद नहीं करते थे किंतु हुआ क्या कि स्वामी जी जब शिकागो पार्लिमेंट में गए तब देखा कि अभी उसको तो एक दो महीना बाकी है चालू होने को और दूसरी बात है कि उनके पास में पैसा भी नहीं है कि वह शिकागो में रुके तो फिर वह जो मिस सेन बोन थी उसके साथ में वह बोस्टन वगैरह चले गए वहां पर कुछ समय रुके और वहां का यह जो हाई सोसाइटी है उ उसके साथ में स्वामी जी ने इंटरेक्ट किया और उनके पास में से अमेरिकन डायलग अमेरिकन माइंड सेट सीख लिया और जब वो वर्ल्ड पार्लिमेंट ऑफ रिलीजन में आकर के अमेरिकन सिस्टर्स एंड ब्रदर्स करके संबोधित किया तो सब लोगों ने खड़े होकर के ताली बजाना शुरू कर दिया स्टैंडिंग ओवेशन दिया तो हाउ वाज दिस पॉसिबल नो डाउट कि 90 पर बेस तो बन ही गया है स्वामी जी के माइंड में किंतु वो जो 1 पर जो होता है कि हां एक लोकल डायलेक्ट लोकल माइंडसेट लोकल ट्रेडिशनल करर के यदि उनको बताया जाए तो लोकल लोग बड़ा आसानी से प्रभावित हो जाएंगे तो वो जो 1 पर जो स्वामी जी के एजुकेशन में बाकी रह गया था वह जो बोस्टन वगैरह जाकर के वह समाप्त हो गया तो यहां पे ठाकुर के साथ में भी 99 पर जो करना था युग धर्म की स्थापना करने के लिए वह उन्होंने सीख लिया था बस जो एक चीज 1 पर 1 पर जो बचा था कि आधुनिक योग लोगों के सा जो कि उनका जो मेन जो आने वाला था उनके फॉलोअर्स वो मिडल क्लास एजुकेटेड यूथ उनके साथ में किस तरह से इंटरेक्ट किया जाए वो उन्होंने केशव से सीख लिया था तो बोलकर के वो इवन ट पीरियड भी समाप्त हो गया था बाय द टाइम यहां पर जब मास्टर महाशय ठाकुर के पास में आए थे और जब मास्टर महाशय ने ठाकुर के पास में आकर के उनकी वाणी सुनकर के कथामृत लिखा तो हमको कितना अच्छा लगता है कितना आनंद आता है अपना मन कैसी दिव्यता से भर जाता है किंतु मान लीजिए कि यही मास्टर महाशय यदि दक्षिणेश्वर में उस समय उपस्थित होते 1860 के डिकेड में जबकि ठाकुर ये सब सा नाए कर रहे थे और उस समय उन्होंने ठाकुर की प्रतिदिन की वाणी प्रतिदिन की साधना प्रतिदिन का यह जो इसके आगे के वो जो पैराग्राफ में व जो बड़ा सुंदर जो वर्णन किया है ना शरद महाराज ने आशा निराशा भय विस्मय आनंद और व्याकुलता के तरंग में पढकर के कभी उल्लास और कभी निराश हुए हैं तो इस तरह की साधना का वर्णन यदि मास्टर महाशय दिन प्रतिदिन करते तो क्या हमको वह इतना इंस्पायर कर यह एक प्रश्नार्थक मास्टर महाशय जो कुछ लिखते हैं बड़ा सुंदर रूप से लिखते हैं इसलिए यदि इस तरह का वर्णन होगा तो मैं तो बड़ा आनंद से पढ़ूंगा किंतु मैं क्या है कि मेरा तो पूरा लाइफ ही इसी में लगा है बाकी जो जनरल पब्लिक है सामान्य जो भक्त है जिनके पास में दिन में आधा घंटा मुश्किल से मिलता है यह सब कुछ बातें सुनने को अपने को प्रेरित करने को अपने मन को आनंद उल्लास से भरने को वे लोग क्या इस तरह की बातें सुनना पसंद करेंगे कि हां आज ठाकुर साधना कर रहे थे एकाएक ऐसा कुछ हुआ जिससे कि वह या तो फिर नाराज हो गए या तो फिर डिप्रेसो गए आशा निराशा में पड़ गए वे लोग क्या ऐसी बातें कर सुनना पसंद करेंगे हो सकता है कि नहीं उनको तो यही चाहिए कि भाई मेरे जीवन की यह समस्या है उसका सोल्यूशन दे दो बाकी सब बात में है तो इस तरह से इसलिए यहां पर ये जो शरत महाराज कहते हैं कि हो सकता है कि महापुरुष चरित्र का जो सर्वांग संपूर्ण भाव है जो कि उनके आखिरी आखिरी समय में प्रकट होता है वह उच्चा दर्श धारण करके लोगों का जितना कल्याण होगा हो सकता है कि उन लोगों ने वही इष्ट ने किस तरह के अलौकिक उद्यम करके अपने जीवन का चरित्र का गठन किया था साधना में संपूर्णता प्राप्त की थी यह पढ़ कर के शायद हो सकता है कि भक्तों को इतना आनंद ना मिले इतनी प्रेरणा ना मिले उनको ऐसा थोड़ा सा सुपरफ्लुअस लगे तो यह कारण भी हो सकता है कि महापुरुष के साधना का विवरण इतना मिलना मुश्किल है भक्तो आपना ठाकुर के सर्वदा पूर्ण देखीते चाहन भक्त अपने ईश्वर को अपने इष्ट को हमेशा सर्वांग संपूर्ण ही देखना चाहता है नर शरीर धारण करिया छन बोलिया तहा ते जे नरो सुलभ दुर्बलता दृष्टि और शक्ति हीनता कोन काले किछु मात्र वर्तमान छलो तहा स्वीकार कोरीते चाहे ना जदी अपने इष्ट ने नर शरीर धारण किया है इसलिए उनके भीतर में जो नर सुलभ दुर्बलता नर सुलभ दृष्टि और शक्ति हीनता कभी भी किसी काल में वर्तमान है यह वह भक्त देखना नहीं चाहता बाल गोपालेर मुख गह वरे तरा विश्व ब्रह्मांड प्रतिष्ठित देखीते सर्वदा प्रयास होन एवं बालकर असंबद्ध चेष्टा दर भीतरे परिणत वयस्क बुद्धि और बहु दर्शिता परिचय पाई बार केवल मात्र प्रत्याशा राखे ना किंतु सर्वज्ञ सर्व शक्तिमता एवं विश्व जनिन उदारता और प्रेमेर संपूर्ण प्रतिकृति देखी बार जन्नो उद ग्रीव होईया उठे बाल गोपाल के मुंह में वे लोग सिर्फ विश्व ब्रह्मांड देखने के लिए सब समय प्रयास होते हैं इतना ही नहीं किंतु यही बालक की जो बाल सुलभ चेष्टा एं हैं बाल सुलभ वो जो नटखट उसके जो आचार है अपनी मां को परेशान करेगा गोपियों के जाकर के वह दही मक्खन चुरा लेगा यह सब उसकी जो क्रियाकलाप है उस सबके भीतर में वह एक बड़े भगवान जो भगवान कृष्ण बाद में जो धर्माचार्य विश्व आचार्य अवतार वरिष्ठ के रूप में जो उभरे थे बाद में तो वही भगवान कृष्ण की एक तरह की दिव्य प्रतिकृति थ वह वही बाल गोपाल के भीतर में देखना चाहते हैं वही भगवान कृष्ण की बुद्धि और बहु दर्शिता यानी कि उनका विजडम इसका परिचय पाने की आशा व बाल गोपाल में रखते हैं और साथ में ही वही भगवान कृष्ण की सर्वज्ञ जो कि सर्व सब कुछ जानते हैं भगवान कृष्ण सर्व शक्तिमता जिसमें कि सब तरह की शक्ति है और विश्व जनिन उदारता पूरे विश्व को अपने हृदय में समाहित करने की उनकी जो उदारता है और प्रेम की संपूर्ण प्रतिकृति उनका हृदय मनुष्य के लिए जो प्रेम से भरा है यह सब गुण वो एक बालक के भीतर में देखना चाहता है देखिए यहां पे शरत महाराज ने अवतार के बारे में चार गुण कहे हैं कौन से वो गुण है सर्वज्ञ एक अवतार है या तो एक इष्ट है उनको सब पता है जितने भी भूतकाल भविष्य वर्तमान सब उनको पता है यह जो ठाकुर है मास्टर महाशय ठाकुर के पास में गए थे और ठाकुर के अभी जो जो चैप्टर का हम पाठ कर रहे हैं कि वह 1883 की जो क्रिसमस की छुट्टियों के दौरान ठाकुर के साथ में रहे रहे थे उस दिनों की घटनाएं तो जब वहां से जाने का समय आया उस समय ठाकुर ने कहा था कि मुझे तो तुम्हारे बारे में सब कुछ पता है जानते हो तो तुम यह बात तो मास्टर महाशय कहते हैं हां मुझे पता है कि आप मेरे बारे में सब जानते हैं क्या क्या जानते हैं इस इतना नहीं कि उनका क्या बैंक बैलेंस है ना कि फिर उनके और क्या सीक्रेट है किंतु उनके जन्म जन्मांतर के जो कार्यकलाप है जो संस्कारों का लेखा जोखा है क्या-क्या उन्होंने कुकर्म सत्कर्म किए थे उसका असर उनके चरित्र पर कैसे पड़ रहा है और भविष्य में यह जो रिवर्स करने की जो बात है जितने भी संस्कार जितने भी कर्म को वह सब ठाकुर जानते हैं तो यह मास्टर महाशय ने स्वीकार किया था जैसे कि नरेण है तो नरेण का भूतकाल वर्तमान भविष्य सब कुछ ठाकुर को पता चल गया था तो यह देखिए कि हमारे संस्कार क्या है हमारे भूतकाल के जन्मों का कर्मों का क्या लेखा जोखा है यह सब कुछ इन अवतार को पता रहता है सर्वशक्ति मत्ता अभी देखिए सर्वशक्ति मत्ता इस शब्द का आप दो तरह से अर्थ कर सकते हैं एक तो बाह्य शक्ति है फिजिकल स्ट्रेंथ है फिजिकल फोर्स है जिसके माध्यम से भगवान कृष्ण ने एक के बाद एक राक्षसों का दमन किया था जिसके माध्यम से भगवान राम ने रावण का वध किया था तो यह बाह्य शक्ति भी है और एक आंतरिक शक्ति भी है हमारे कर्म को खत्म कर देने की शक्ति इन लोगों में है जैसे कि यह कल्पतरु दिन का उदाहरण जिसको जिसको ठाकुर ने स्पर्श किया उसके सबके कर्म ठाक ने काट दी है बस वही एक आशीर्वाद देकर के कि तो मादर चैतन्य हो तो यानी कि हमारे कर्म को काटने की शक्ति इनके पास में है और इससे बड़ी शक्ति और कोई हो नहीं सकती है आज आप कहेंगे कि राम बाण में इतनी शक्ति थी तो हम कहेंगे कि हमारे पास में एटम बम है उसमें भी इतनी शक्ति है कर सकते हैं इस तरह का क्लेम हालांकि करना नहीं चाहिए किंतु करना चाहते हैं तो कर सकते हैं किंतु भगवान राम ने जो पूरी पृथ्वी के संस्कार हरण कर लिए इस तरह की शक्ति आज बताइए कि कौन सी टेक्नोलॉजी के पास में है ना ही एटम बॉम से हम लोगों के संस्कार दूर करने वाले हैं ना ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से यह दूर होगा ना ही तो यह जेनेटिक एडिटिंग टेक्निक है क्रिस्पर उससे यह सब होने वाला है आज के पास आज के दिन हमारे पास में ऐसी कोई शक्ति नहीं है कोई टेक्नोलॉजी नहीं है इसका दूर-दूर तक कोई आभास मात्र नहीं है कि हां भविष्य में ऐसा कुछ हो सकता है कि लोगों के संस्कारों को काटे हमारा जन्म जन्मांतर का लेखा जोखा है उसको इस बैलेंस को जीरो कर दे बैलेंस अपना ये जो अकाउंट क्लोज कर दे इस तरह की कोई भी टेक्नोलॉजी आज अस्तित्व में नहीं है और नहीं लगता कि जिस तरह से हमारा डेवलपमेंट हो रहा है टेक्नोलॉजिकल कि भविष्य में इस तरह की कोई टेक्नोलॉजी होगी तो यह शक्ति सिर्फ अपने अवतार या इष्ट के पास में ही है तो इस दृष्टि से वह सर्वशक्ति मन सर्वशक्तिमान है वो दूसरा तीसरा दिया है विश्व जनीनो सबके लिए उनके हृदय में अपूर्व प्रेम इ सबके प्रति उनकी उदारता उनके पास में जो जाएगा जो मांगेगा वह उनको मिल जाएगा तो यह उदारता देखिए यह रिस्पेक्ट आप किसको कब देंगे आप भय के मारे आप सत्ता का लोभ दिखा करके पैसों का लोभ दिखा करके लोगों से प्रेस्टीज या तो फिर रिस्पेक्ट अर्न नहीं कर सकते हैं पा नहीं सकते हैं आप जब दूसरों को रिस्पेक्ट देंगे तब दूसरे आपको रिस्पेक्ट देंगे यह मां के साथ में इस तरह की कहानियां कितनी सारी है कि वह जो एक मजदूर थी वह मां के पास में आई वह जो हमेशा मां के पास में आती थी वह जो भक्त होते थे तो भक्तों क्या करते थे कि मां को देने के लिए सब्जी आटा वगैरह वह आसपास के गांवों से शहर से भेजा करते थे तो यह मजदूर महिला है बूढ़ी महिला वह सब समय अपने सर के ऊपर में सब्जी वगैरह लेकर के मां के पास में आती थी अभी इस बार जब वह मां के पास में आई तो मां ने उनको पूछा कि अरे मां आप इतने दिनों से आई क्यों नहीं है हमें तो सो दूसरे दूसरे मजदूरों के पास में से चीजें भेजते हैं भक्त तुम कहां पे थी तब यह मजदूर बेचारी बड़ी ही निराश हो कर के बोलती है कि मेरा बच्चा था जो कि रोजगार करने योग्य था युवान लड़का मेरा अभी कुछ दिन हुआ उसका मृत्यु हो गया है मैं बड़ी संपद में में मैं बड़ी विपद में पड़ी हूं अभी मुझे खुद मेहनत करके और ज्यादा मेहनत करके काम करना पड़ रहा है घर में खाने को भी कुछ नहीं है ऐसा करके वह अपना वह राम कहानी सुनाने लगी तो जैसे ही मां ने यह बात सुनी तो वैसे ही मां इतनी ये हो गई अभिभूत हो गई अपने सर पर हाथ रख के बोलती है अरे मां तुम्हारे साथ में ऐसा हुआ बोलकर के मां खड़ी थी वो बैठ गई और फिर जोर से रोने लगी डाक छेड़े काने ने डाक छेड़े कादा बांग लाते बोले चित्कार करके रोने लगी अभी मां चित्कार करके रोती है तो देख कर के सामने वह मजदूर है उसने भी चित्कार करके रोना शुरू किया जब कोई हमारे प्रति यह सिंपति है सहानुभूति है जो यह जो कंपेज है वह हमारे प्रति प्रदर्शित करता है तो हमारा हृदय भी तो सामने रिस्पॉन्ड करेगा अब यह दोनों चित्कार करके रो रहे हैं तो सब जैसे कि घर वाले सब दौड़े-दौड़े आए यह राधू माकू यह जो सेवक महाराज थे वहां पे सब दौड़े दौड़े आए पूछ रहे है कि मां क्या अभी देख रहे हैं कि दोनों सामने सामने बैठ के रो रहे है तो कोई कुछ बोलने को भी मतलब सब लोग चुपचाप खड़े हैं देख रहे हैं कि क्या हो रहा है कुछ समय के बाद में मां का भी रोना थमा फिर मजदूर का भी थमा फिर मां ने किसी को कहा कि जाओ इसके सर पर डालने के लिए तेल और उसको खाने के लिए कुछ मुड़ी और एक नया वस्त्र उसको दो तब कहीं जाकर के यह सब मिला तो यह मजदूर इतना खुश होकर के वहां से गई अब अभी जिसने यह वर्णन लिखा है वह कह रहे हैं कि उस वृद्ध महिला का चेहरा उस समय यदि आपने देखा होता तो पता चलता कि कितना शांति कितनी एक जैसे कि प्रशांत उसका हृदय हो गया है तो देखिए कि हमको लगेगा कि मां ने उसको जो दिया एक नया वस्त्र दिया सर के ऊपर में डालने के लिए तेल दिया खाने के लिए जो मुड़ी यानी कि यह जो मुरमुरा यह जो दिया उसका तो कोई वैल्यू नहीं है फिर भी यह वृद्ध महिला इतनी खुश हो कर के गई क्यों क्योंकि बात वो नहीं है कि मटेरियल क्या उसको मिला बात यह है कि मां की सहानुभूति मिली तो यह जो उदार हृदयत है हम लोग यह जो अभी देखिए मां के जीवन में ही देखिए कि यह जो उदार हृदयत जो हमको मां के आखिरी जीवन में देखने को मिलती है वही उदार हृदयत हम बालिका मां के जीवन में देखना चाहते हैं किस तरह से कि उस समय में अकाल पड़ा था जयराम मराटी के आसपास में और व किसी के पास में खाने के लिए नहीं था तो जो मां के पिताजी है
Ramachandra Mukhopadhyay - ma Sarada’s father
राम रामचंद्र ऐसा ही कुछ नाम है तो उन्होंने क्या किया कि उन्होंने फिर यह ठीक किया कि उनके पास में जो स्टोर किया हुआ जो अनाज पड़ा है उसमें से खिचड़ी बनाएंगे सबको खिलाएंगे कहा कि हम स इवन कहा कि हमारे परिवार जन भी वही खिचड़ी खाएंगे बस वही वो उनकी बिटिया शारदा के लिए अच्छे चावल का कुछ भात बना कर के देंगे अभी यह देखिए कि वही लड़की शारदा छोटी बच्ची अपने जब भी यह जो भूखे लोग आते थे चारों ओर से तो गरम-गरम जो खिचड़ी है अभी भूख इतनी लगी है कि खिचड़ी ठंडी हो इतना भी उनसे राह नहीं देखी जाती एक गरीब लड़की वहां पे आई उसके बाल कैसे बिखर गए थे कपड़े फटे हुए थे चेहरा मलीन हो गया था पता नहीं कितने दिन की भूखी होगी तो जब उसको कहा गया कि अरे यहां पे किचन में आओ खाना तैयार है तो नहीं जैसे ही उसने देखा कि वहां पर गाय को खाने के लिए खड़ वगैरह रखा है वही खाना उसने शुरू कर दिया इतनी भयानक भूख की उसको यह लगी थी उसका कष्ट था उसको तो यह जो लोग जब खाना खाने को बैठते यह राह नहीं देख पाते कि खिचड़ी ठंडी होगी कि नहीं तो यही बच्ची शारदा अपने छोटे-छोटे हाथों से वोह खिचड़ी को ठंडी करती हवा डालते डालते हैं और यह लोग सब खाते हैं तो वही जो उदारता मां के जीवन में हमको आखिरी समय में देखने को मिलती है वही उदारता जैसे कि हम यही बच्ची शारदा के भीतर में देखना चाहते हैं और आखिरी जो गुण शरद महाराज कहते हैं प्रेम यानी कि सबके प्रति अनंत करु अभी देखिए कि उदारता और प्रेम इन दोनों में डिफरेंस ऊपर ऊपर से शायद नहीं लगेगा अभी जैसे कि यह वृद्ध महिला के बारे में मां की उदारता की बात कही तो फिर प्रेम हम किसको कहेंगे अभी जैसे कि देखिए कि शरत महाराज के साथ में शरत महाराज जब भी मां को प्रणाम करने को जाते थे तो मां बड़ा घुमता टान थी किंतु फिर आखिरी आखिर में ऐसा हुआ कि मां का जैसे कि एक तरह से बालीका भाव हो गया और फिर मां फिर जैसे कि एक छोटी बच्ची एक आदर करके कहती है कि मैं दवाई नहीं खाऊंगी यह टेंपरेचर लेने के लिए थर्मोमीटर वगैरह यह सब मुझे नहीं चाहिए फिर यह जो बीमार आदमी के लिए जो खाना बनता है डाट वह भी तो बड़ा ही मतलब सुपाच्य होता है इजली डाइजेस्टेड होता है किंतु उसका कोई टेस्ट नहीं होता तो मां कहती मैं इस तरह का खाना नहीं खाऊंगी तब किसी ने कहा कि जाए हम क्या शरद महाराज को जाके कंप्लेन करें तो मां ने कहा जाओ शरद को करो कंप्लेन शरद भी आएगा तो भी मा नहीं मानूंगी किंतु जब शरद महाराज स्वयं आए तब मां जैसे कि एकदम बच्चे की तरह शरद महाराज अपने पिताजी है उस तरह से उनको कहती है कि देखो बाबा यह सब लोग जोर जबरदस्ती करके मुझे इस तरह का खाना लाते हैं यह दवाई देते हैं यह थर्मोमीटर देते हैं मैं क्या करूं तो शरद महाराज जैसे एक बच्ची को समझाते हैं इस तरह से वो जैसे मां के साथ में व्यवहार किया अपने हाथों से खाना खिला दिया अपने एकदम शांत किया तब कहीं जाकर के मां को थोड़ी शांति आई अब जैसे कि यह गोपाल की मां है गोपाल की मां यानी कि अघोर मणि देवी जब वह ठाकुर के पास में आती थी तो देखिए कि ये वो गोपाल का नाम का जप तो करती थी किंतु ठाकुर के पास में जब आना ना शुरू किया तब सही सही में इस बाल गोपाल का उनको दर्शन होने लगा यह बाल गोपाल कहीं इधर दौड़ता है उधर दौड़ता है कहीं यह तूफान करता है यहां पर कहीं कुछ मिस चफ करता है फिर यह गोपाल की मां अघोर मणि देवी उसके पीछे में दौड़ती है जब ठाकुर के पास में आते हैं तो ठाकुर के भीतर में यह बाल गोपाल प्रवेश कर जाता है तब ठाकुर भी खुद भाव में आ जाते हैं और वही अघोर मणि देवी के गोद में जाकर के बैठते हैं अभी इस घटना का जिस महिला ने वर्णन किया है लेडी डिवटी ने मुझे नाम नहीं लिखा गया उनका मुझे ऐसा लगता है कि योगिन मा या गोलाप मा होगी तो इन्होंने ये जो वर्णन किया है वे लोग कहते हैं कि ठाकुर इवन भाव में आकर के भी बड़े रेयरली किसी स्त्री को स्पर्श करते थे किंतु यहां पर जैसे ही ये बाल गोपाल ठाकुर के शरीर में प्रवेश कर गया साथ-साथ में ही ठाकुर के भीतर में वो बाल गोपाल भाव प्रकट हुआ और यह अघोरम देवी की गोद में जाकर के बैठ गए ज से कि बिल्कुल एक वोह खुद गोपाल हो और यह मां यशोदा हो तो यह जो प्रेम है महाभा जिसको कहते हैं यह जो सभी भावों का संगम जब होता है तब यह महा भाव होता है तो यह महाभा है उसको कि हम शायद यह प्रेम का नाम दे सकते हैं तो देखिए कि महाराज जी कहते हैं कि जब अवतार का जीवन का अंत आता है या तो वह जब पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित हो जाता है अपनी सिद्धियों में तब चार तरह की शक्तियां उनमें प्रकट होती है एक तो सर्वज्ञ होता हमारे सभी संस्कार को जानने की क्षमता सर्वशक्ति मत्ता यानी कि हमारे संस्कार को काट देने की शक्ति विश्व जनीनो और प्रेम या तो फिर महाभा यह चार शक्तियां उस इष्ट में अवतार में प्रकट होती है जो कि उनके जीवन के आखिरी समय में किंतु हम जो है हम जो भक्त है सा न भक्त हम जब इसी अवतार की बाल्य लीला का विवरण पढ़ते हैं हम वही उदारता वही महा भाव वही सर्वशक्ति मत्ता वही सर्वज्ञ इस बालिका या तो बालक के भीतर में आरोप करने का प्रयास करते हैं भगवान कृष्ण की बाल्य लीला में इस अवत इस राक्षस का वध किया क्यों उन्होंने बचपन में इतने जो कंस वो जो वृंदावन में थे यह पतना वगैरह जितने भी राक्षस को वो भेजता था कंस वहां से तो तो सबका वो बाल्य अवस्था में ही वत क्यों करते थे क्योंकि हम देखना चाहते हैं कि जो पूर्ण भगवान कृष्ण जो थे जो कि जिनके पास में इतनी शक्ति थी वही शक्ति उनके बचपन में ही होगी और यह उसी शक्ति से उन्होंने राक्षस का वध करने की शुरुआत की थी वही जो उदारता जो कि सबके प्रति करुणा मां के जीवन में हमको आखिर में देखने को मिलती है वही उदारता करुणा वो बच्ची शारदा के भीतर में भी होगी जो कि हम उसके भीतर में देखना चाहते हैं तो यह भक्त का एक आग्रह रहता है कि हम पूर्ण वयस्क या तो संपूर्ण सिद्धि प्राप्त अवतार की सिद्धियां उनकी बाल्य अवस्था में भी देखना चाहते हैं अतो एव निज ऐश्वर्य रूप के निज ऐश्वर्य स्वरूप के सर्वसाधारण के धरा नादिवार जन्नई अवतार पुरुषेर साधन भजना आदि मानसिक चेष्टा एवं आहार निद्रा क्लां व्याधि देह त्याग प्रवृति शारीरिक अवस्था निचर मिथ्या भान करिया थाके य रूप सिद्धांत करा तहा देर पखे विचित्र नोहे और इसीलिए कि क्योंकि हम भक्त लोग यह देखना चाहते हैं कि बालक कृष्ण या बालिका शारदा या तो बालक श्री राम कृष्ण गदाई इनके भीतर में भी वही बुद्धिमत्ता वही शक्ति वही उदारता होगी जो कि परिणत वयस में थी उनकी उनकी बड़ी उम्र में थी तो यह लोगों को किंतु यह लोग दिखाना नहीं चाहते यह जो अवतार गण है जब पृथ्वी पर आते हैं तो छुप कर के आते हैं वे लोग अपनी दिव्यता का प्रकाश शुरू से ही नहीं करना चाहते जिससे कि क्या हो कि हम उनकी पूजा करना ही शुरू कर दें और उनके कहे हुए उपदेशों का पालन करना छोड़ दे यह ना हो इसके लिए अपना मनुष्यवकाशा अवतार गण अपनी बचपन में अपनी यह दिव्य शक्ति है उसको छुपा कर के रखते हैं अतब निजो ऐश्वर्य स्वरूप के इसीलिए अपने ऐश्वर्य स्वरूप को सबके सामने प्रकट न करवा देने के लिए ही अवतार पुरुष साधन भजन जैसी मानसिक चेष्टा और साथ-साथ में ही आहार निद्रा क्लांत व्याधि देह त्याग वगैरह शारीरिक व अवस्थाओं का झुठ मुठ का ये एक ढोंग किया करते हैं इस तरह का सिद्धांत करना हमारे लिए कोई भी आश्चर्य नहीं है जैसे कि ठाकुर को कैंसर हुआ था तो वही गिरीश घोष वगैरह यह कहते थे कि ठाकुर तो यह सर्फ की ढोंग ही करते हैं क्यों क्योंकि इस ढोंग करके उनको कलकत्ता आना है कलकत्ता के भक्तों को इकट्ठा करना है उनको आशीर्वाद देना है संघ की स्थापना करनी है इसलिए जिस क्षण भक्तों को आशीर्वाद देना हो जाएगा संघ की स्थापना हो जाए गी ठाकुर वैसे ही अपनी बीमारी को छोड़ कर के कलकता दक्षिणेश्वर वापस चले जाएंगे और फिर वही आनंद की हार्ट जो इतने दिनों से दक्षिणेश्वर में बैठी हुई थी जो एक निर्मल महा भाव वहां पर प्रवाहित हो रहा था उस महा भाव का आनंद लेने के लिए हम लोग फिर से दक्षिणेश्वर चले जाएंगे ऐसा सोचने वालों की कमी नहीं थी तो यहां पर शरत महाराज यही कहते हैं कि हम लोग तो हमेशा यही सोचेंगे कि भगवान पकड़ना अपने को पकड़ने देना नहीं चाहते हैं हम लोग समझ ले कि उनका स्वरूप क्या है यह हम नहीं चाहते हैं वो जो ठाकुर कहते हैं ना वो बुढी खेला एक तरह की रमत है जिसमें बूढ़ी बोल कर के कोई है जिसको कि आप स्पर्श कर दे तो वह रमत खत्म हो जाएगी वह खेल खत्म हो जाएगा तो यह बूढ़ी नहीं चाहती कि कोई उसको स्पर्श करे बूढ़ी चाहती है कि सब समय यह खेल चलता रहे जैसे कि ठाकुर कहते हैं कि मां हजारों लाखों पतंगे चगा है यह काइट फ्लाइंग करती है उसमें से हो सकता है एकटा दूट केटे हैसे हाथ ऐसे दाव मा हाथ चापड़ी एक दो पतंग को काट कर के यानी कि उसको मुक्ति देकर के जो मां हंसती हंसती ताली बजाती है किंतु बाकी करोड़ों करोड़ों पतंगे अभी भी बद्ध है वो जो दोरी से बंधी हुई है मां के हाथ में तो भगवान नहीं चाहते कि सभी लोग एक साथ में मुक्त हो जाए सभी लोगों को अपना सही स्वरूप समझ में आ जाए वरना तो यह माया का संसार कैसे चलेगा जैसे मां खुद कहती है कि सृष्टि की रचना के समय में भगवान ने भगवान ब्रह्मा ने चार कुमारों का सर्जन किया किंतु यह चारों कुमार समझ गए कि संसार का कोई संसार असार है ब्रह्म ज्ञान ही सर्वस्व है तो उन्होंने साधना करके फिर से ब्रह्मण के पास में चले गए तब कहीं जाकर के ब्रह्मा ने प्रजापति हों की रचना की प्रजापति हों के मन में कामना वासना रखी उन्होंने जाकर के संसार की रचना करके संसार का प्रारंभ किया तो यह ईश्वर भी चाहते हैं कि संसार चलता रहे सब लोग जद मुक्त हो गए तो संसार चलेगा नहीं यह खेल चलेगा नहीं तो किसी ने पूछा था ठाकुर को कि उनको तो लगता है खेल है किंतु हमारी जान जा रही है तो खैर अभी क्या करेंगे ईश्वर को तो यही ईश्वर तो यही चाहते हैं कि संसार चलता रहे एक दो लोगों को मुक्ति मिले यह दो एक दो लोग भाग्यवान कौन है कि ईश्वर की महिमा का गुणगान सुन कर के उनकी शक्ति या सिद्धि का गुणगान सुन करर के वो ईश्वर के शरणागत नहीं होते हैं उनके प्रति यह प्रेम भालोबासा उनके प्रति यह एक श्रद्धा भक्ति लेकर के वे लोग उनके शरणागत होना चाहते हैं ऐश्वर्य देख करर के तो कोई भी उनके सामने झुक जाएगा किंतु उनकी यह जो उदार करुणा है उदार स्वरूप है और महाभा है उसको देख कर के यदि आप उनके शरणागत होते हैं तभी आप धन्य है तो इसलिए महाराज कहते हैं कि ईश्वर नहीं चाहते कि सबको बचपन से ही पता चल जाए कि मैं अवतार हूं और इसीलिए वे लोग मनुष्य के साथ में जो कुछ भी होता है नर लीला में सब कुछ होना है और जो मृत्यु भी होगा जन्म भी होगा आहार भी होगा उनको थकान भी लगेगी उनको वो बीमार भी होंगे वो सब कुछ साधन भजन भी करना पड़ेगा यह सब कुछ नर लीला में ऐसे ही होता है जैसे एक सामान्य इंसान के साथ में होता है आमा देर काले आमरा सो चखे देखिया छी कतो विशिष्ट भक्तो ठाकुरे शारीरिक व्याधि संबंध है ओ रूपे मिथ्या भान बोलिया धारणा कोरिया लेन हम लोगों ने अपनी खुद की आंखों से देखा कि कितने अच्छे-अच्छे भक्त थे जिन्होंने देखा कि यह ठाकुर का जो कैंसर है वह इस तरह का एक मिथ्या एक ढोंग ही है एक नाटक ही है एक तरह का एक दिखावा ही है जैसे ही उनकी लीला समाप्त होगी कलकत्ता की वैसे ही वह दक्षिणेश्वर फिर जाएंगे ऐसा हमने अपनी आंखों से देखा है इसके बाद में नया पॉइंट चालू होता है जिसको कि हम कल देखते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु ठाकुर ने कहा है ना कि किसी ने जाकर
प्रश्न: महाभारत में यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा कि संसार में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है। उन्होंने उत्तर दिया - जब मृत्यु निश्चित होती है, तब भी लोग भगवान को भूल जाते हैं और सांसारिक कार्यों में लिप्त हो जाते हैं। क्या ठाकुर की शिक्षा में भी इसका कोई समतुल्य है?
के आत्महत्या कर दी तो ठाकुर ने क्या कहा कि वो जैसे वो जो मकर ध्वज होता है तो मकर ध्वज को वो वैद्य है एक बोतल के भीतर में रखता है मकर ध्वज तैयार करता है फिर जो भीतर का मकर ध्वज तैयार हो गया तो बोतल को रखा ना कि उसको तोड़ दिया कोई फर्क नहीं पड़ता वैसे ही ईश्वर प्राप्ति जीवन का उद्देश्य है जब तक ईश्वर प्राप्ति नहीं होती जब मृत्यु होता है तो जन्म फिर से लेना पड़ेगा और यदि ईश्वर प्राप्ति हो गई है तो मृत्यु आए तो भी क्या कोई फर्क नहीं पड़ता जीवन का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है इस तरह से इस तरह से एगजैक्टली तो नहीं किंतु ठाकुर ने यह जो कहा ना कि लखो गुड़ी भीतर एकटा दूट केटे हेश दाव मा हाथ चापड़ी यह जो मां का जो विचित्र वर्तन है तो वह कभी भी अभी इस तरह के राम प्रसाद के बहुत सारे भजन है कि जो मां काली का जो इस तरह का जो कांड है वो उनको समझ में नहीं आता यह बड़ा आश्चर्यजनक लगता है तो इस तरह के भजन ठाकुर बहुत गाते रहते थे तो एक को दो को मुक्ति देक बा बाकी को क्यों बंधन में रखती है यह एक बड़ा आश्चर्य की बात है ठाकुर के लिए ठाकुर के लिए यानी कि राम प्रसाद के लिए जो कि ठाकुर वह भजन गाते थे वो नहीं वो नहीं मैंने उससे भी बड़ा आश्चर्य है मां काली का ये कांड पैरेलल है किंतु ठाकुर की खुद की दृष्टि में यदि देखें कि सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है तो वो यह माहाकाली का यह सब कांड होगा पैरेलल आप खोज सकते हैं कोई प्रश्न नहीं किंतु ठाकुर की देखिए दो तरह से हैं आश्चर्य जगत में बहुत सारे हैं और दूसरे दूसरे शास्त्रों के साथ में मैच हो जाए इस तरह के आ आश्चर्य ठाकुर के जीवन में है जैसे कि केशव सेन के एक संबंधी को कैशव सैन को मिलने को गए एक बूढ़ा संबंधी था बैठ कर के ताश खेल रहा था ठाकुर ने कहा इस उम्र में कहा ना कि व ईश्वर का नाम लेगा ना किय ताश खेल रहा है और कहता है कि मैं बिना काम किए बैठ नहीं सकता हूं तो इस तरह के आश्चर्य मिलेंगे किंतु ठाकुर की खुद की दृष्टि में सबसे बड़ा आश्चर्य कौन सा है देखिए यक्ष ने युधिष्ठिर को जो प्रश्न किया युधिष्ठिर ने अपनी बुद्धि से उस प्रश्न का उत्तर दिया यही प्रश्न यदि यक्ष ठाकुर को करता तो ठाकुर यह जो मां काली का यह जो कांड है उसको उत्तर देते हैं माने आश्चर्य बहुत सारे हैं जगत में किंतु सर्वश्रेष्ठ आश्चर्य कौन सा है तो यह है ए व्यापर जैसे मानव भाई ने कहा या तो फिर ये केशव सेन का रिलेटिव वो उसका पैरेलल अवश्य है किंतु जद ठाकुर को यदि यह प्रश्न यक्ष करता तो मुझे ऐसा लगता है ठाकुर का पूरा पढ़ कर के कि यह महाकाली का जो यह कांड है उसको ठाकुर सबसे बड़ा आश्चर्य के रूप में बताते हैं व उसका एक रिफ्लेक्शन है यस यस यस क्योंकि यह जो मनुष्य है मनुष्य की बुद्धि भी तो आखिर में ईश्वर के पास से ही तो आती है यदि ईश्वर चाहे तो सबको मुक्त कर दे किंतु मुक्त करना नहीं चाहते ट इज द बिगेस्ट थिंग बंदी ई पतंग है यानी ठाकुर इस प्रश्न को थोड़ा लिवेट कर देते हैं हायर लेवल पर मनुष्य के पास में ले जा करके सीधे भगवान के पास ले जाते हैं यह जो ठाकुर ने कहा ना कि पंचभूत फाद
प्रश्न: यदि आप सांसारिक लाभ चाहते हैं तो ठाकुर के पास मत आइए
ब्रह्म पड़े काधे जैसे आपने कहा बिल्कुल ठीक है कि पंचभूत के इस शरीर धारण करके भगवान राम भी मां सीता के लिए रोए थे अभी पता है सबको कि यह पहले से ही सब ठीक है लीला है रावण ने भी वही किया जो कि राम की इच्छा थी मैंने एक एक लीला के रूप में ही सब कुछ हो रहा है द होल वर्ल्ड इज अ स्टेज जैसे वो नरेण कहता है तो ठाकुर क्या कहते हैं पता है कि कहीं पर विद्या का खेल है कहीं पर अविद्या का खेल है तो यह विद्या का खेल और अविद्या का खेल भी तो मां की इच्छा से ही चलता होगा यानी कि एक तरह से देखें देखिए अद्वैत वेदांत की दृष्टि से देखें तो सब कुछ माया है जो हो रहा है नहीं हो रहा इस सबका कोई फर्क नहीं पड़ता हमको अपनी मुक्ति प्राप्त करके इस जगत से निकल लेना है और यदि भक्ति की दृष्टि से देखें तो यह कि सब कुछ लीला है ईश्वर की इच्छा से इष्ट अनिष्ट अच्छा बुरा ये जैसे वह स्वामी जी का हम पढ़ रहे थे कि गुड एंड इविल आर द टू एस्पेक्ट ऑफ द सेम कोइन टू फेसेस ऑफ द सेम कोइन आप ऐसा मत समझ लीजिए कि मैंने बहुत अच्छा कार्य किया तो जगत में से अनिष्ट चला गया जैसे स्वामी जी खुद कहते हैं कि रूमेटिज्म का जो पेन होता है गर्दन से निकला तो अपनी बैक में गया और कमर में से निकला तो घुटनों में गया वो जाने वाला नहीं है इधर-उधर आप थोड़ा मैनेज कर पाएंगे पेन मैनेजमेंट कर पाएंगे पेन विल ऑलवेज रिमन तो इस जगत में अच्छा बुरा चलेगा ही चलेगा अवतार को भी इसका वो सब उठाना पड़ेगा किंतु पूरा जीवन जो है उनका वो हमको एक उर्ध्व दृष्टि प्रदान करता है आज अवतार नहीं आते तो हम में से कितने लोग एक सत चरित्र जीने का प्रयास करते कितने लोग यह सोचते कि नहीं इस जगत में पागल की तरह पैसों के पीछे दौड़ने की वजह थोड़ा सा अपने को इस सबसे रिट्रीट करें ईश्वर पर भरोसा रखें और एक सादा सीधा सरल तपस्या मय जीवन जिए ये प्रेरणा हमको कौन देता तो वोह जो उर्ध्व दृष्टि देने के लिए वो कैलास मान सरोवर का नक्शा देने के लिए डायरेक्शन देने के लिए जैसे कि अवतार आते हैं यह जो
प्रश्न: माँ और शरत महाराज का रिश्ता कितना अद्भुत था
महा भाव है ना महाभा का क्या अर्थ है कि सभी भाव का समन्वय उसमें है शांत भाव है दासी भाव है सख्य भाव है मातृ भाव है संतान भाव है सब भाव मधुर भाव सब महा भाव में सब आ जाते हैं तो महा भाव में क्या है कि कब कौन सा भाव प्रकट होगा कभी मां के भीतर में मातृ भाव प्रकट होता है कभी बालिका भाव प्रकट होता है सिर्फ शरत महाराज क्या वही अपने ये जो गौरेश्वर नंद जी राममय महाराज तो राममय महाराज तो मां के सामने बिल्कुल बच्चे मां तो बिल्कुल बच्चे की तरह कभी उसके सामने उनके सामने घुमता नहीं देती कुछ नहीं किंतु वो रोटी बनाते हैं तो नलिनी ने एक बार कह दिया मां और रामई महाराज दोनों साथ में मिलकर रोटी बना रहे हैं और नलिनी ने कह दिया वो वो दोनों रोटी बेल रहे हैं और नलिनी रोटी सेक रही है तो रोटी सेकते सेकते नलिनी ने क्या कहा कि मां आप जिस तरह से रोटी बेल रही है उससे अच्छा तो रामम महाराज कर रहे हैं तो मां एकदम बालिका भाव में आकर के कहती है यह दो दिन का बच्चा अभी उसको गले को दबाए तो दूध निकलेगा माने ये बंगाल में इस तरह से कहते हैं छोटा बच्चा दूध पीता है तो गला दबाए तो उसके मुंह से दूध निकलेगा तो उसको गला दबाए तो उसके मुंह से दूध निकलेगा मैं यहां पे रोटी बेलते बेलते बूढ़ी हो गई और तुम बोल रहे हो ना कि राम भाई मेरे से अच्छी रोटी बेलता है जाओ मैं रोटी नहीं बेलगी ऐसा बोल कर के माने से बंद कर दिया तो राममय महाराज टेंशन में पड़ गए बहुत सारे डिवोटा बैठे थे यदि रोटी नहीं बनाएंगे तो कैसे खिलाएंगे तो फिर रामई महाराज नलिनी पर गुस्सा करते हैं अरे तुमको कैसे पता कि यह रोटी मैंने बेली है वो माने बेली है हम तो तुमको साथ में देते हैं तुमको अकल है नहीं कुछ फालतू की बातें करती हो फिर मां की माफी मांगी तब कहीं जाकर के मां थोड़ी ठीक हुई तो अभी देखिए कि मां को तो सब पता है कि इतने सारे भक्त आए हैं सबको खिलाना है तो व अभी इस तरह से नाटक करेगी तो नहीं चलेगा और रामई महाराज तो बच्चे हैं उनके यदि वो अच्छी रोटी बेलती है तो मां को तो बड़ा प्रसन्नता होनी चाहिए देखो मेरा बच्चा इतना अच्छा कार्य कर रहा है किंतु नहीं यानी कि ये कभी मातृ भाव कभी बालिका भाव कभी देवी भाव कभ गुरु भाव ना किंतु वे लोग भी तो सीखते हैं इससे
प्रश्न: माँ का भाव परिवर्तन होते रहने से सेवकों को परेशानी हो जाती होगी
कि भाव का वैविध्य कैसे होना शरत महाराज जो बच्चे का भाव उनके सामने सब समय रखते थे तो कहीं भी वो पिता का भाव भी उनके मन में जागृत होना है तभी तो महा भाव की ओर वो जाएंगे तो एक डाइवर्सिटी और भाव जो उनके भीतर में डेवलप हो इसके लिए तो शायद ये लोग ऐसा करते होंगे किसको पता मने ये तो अपनी बुद्धि से हम लोग कह रहे हैं अब अब जैसे कि हरि महाराज का है हरि
प्रश्न: क्या आप किसी को जानते हैं जिसका हृदय साधना करते हुए उदार हो गया हो?
महाराज को ठाकुर ने कहा कि एक पवित्र जीवन जीओ तो इवन स्वामी जी ने भी यही कहा अमेरिका जाने से पहले हरि महाराज कह रहे प्रवचन बहुवचन मेरे से होगा नहीं तो स्वामी जी ने कहा वहां जाकर पवित्र जीवन जीना वेदांत की साधना करते थे कठोरता करते थे त्याग तपस्या करते थे वही वहां पर जाके करना तो उस मा यह बात लेकर के हरि महाराज स्वामी तुर्या जी अमेरिका गए किंतु जब अमेरिका से वापस आए और उनके जो आखिरी आखिरी समय के जो वार्तालाप है उसमें देखिए कि हरि महाराज का हृदय कैसे खुल गया है स्वामी जी के जो यह जो शिव ज्ञान है जीव सेवा का भाव उन्होंने कितना संपूर्ण रूप से अंगीकार कर लिया है तो वो जो वेदांत कठोरता से यह सर्वजनिन उदारता पूरे जगत के प्रति करुणा और प्रेम यह इवोल्यूशन उनके जीवन में एकदम स्पष्ट दिखता है हालांकि बाकी सब गुरु भाई देखेंगे जैसे कि इवन अखंडानंद जी है तो वह पहले से एक दिखता है जब स्वामी जी अमेरिका थे तभी से अखंडानंद जी यह सब करते आ रहे है किंतु दिस इज वन पर्सन कि जो कि एकदम कठोर आचार्य वेदांती थे वहां से एकदम उनका हृदय जो विस्तृत हुआ यह जो यदि ट्रेस करना है उनके जीवन में स्पष्ट रूप से ट्रेस होता है ना यह बात सही है सही है आत्मस्थानंद
प्रश्न: मैंने सुना है कि संघ गुरु बनने के बाद कुछ साधु बहुत उदार बन गए थे।
जी के बारे में वगैरह के बारे में सब लोग कहते हैं और एक अखंडानंद जी के बारे में अखंडानंद जी वैसे शिव ज्ञान से जीव सेवा वगैरह करते थे किंतु लोगों के प्रति उनकी जो देखने की दृष्टि थी कि आपको यदि आध्यात्मिक साधना करनी है तो आपको भी कठोरता करनी होगी तो जब वह प्रथम प्रथम बार वाइस प्रेसिडेंट बन कर के दीक्षा देते थे तो उनका ऐसा नियम था कि वह पति-पत्नी को जद दीक्षा देंगे तो दोनों को ब्रह्मचर्य का पालन करना है तो यह लोग सब जाकर के भक्त लोग जाकर के महापुरुष महाराज वो प्रेसिडेंट है उनके पास जाकर कंप्लेन किया कि यह गंगाधर महाराज तो हमको ऐसा कह रहे हैं कि आपको ब्रह्मचर्य का पालन करना होगा किंतु अभी होगा नहीं दो चीज होगी या तो हम झुठ मुठ का बोल दे कि हां हम पालन करेंगे या तो फिर सिंसियर कहे कि पालन करेंगे किंतु यह टूटेगा बाद में यह वचन दोनों केसेस में गलत गलत है तो फिर यह जब कंप्लेंट महापुरुष महाराज के पास में गई महापुरुष महाराज ने अखंडानंद जी को बुलाकर कहा कि भाई तुमने जिस तरह से तपस्या की है भक्त लोग नहीं कर पाएंगे तो फिर यह अखंडानंद जी ने और ज्यादा उदार होक के सबको दीक्षा देना शुरू किया दैट एग्जांपल इज देयर यह जो आपने कहा ना यह हमने
प्रश्न: स्वामीजी में सीखने की अद्भुत क्षमता थी। हम भी उनके जैसे विद्वान कैसे बन सकते हैं?
एक्चुअली अनुभव किया है कंप्लीट वर्क्स एडिट कर रहे हैं तो अमेरिकन अमेरिका में जो लेक्चर देते हैं स्वामी जी न्यूयॉर्क में यह जो ज्ञान योग के वगैरह तो एक्चुअल अमेरिकन एक्सप्रेशन यूज करते हैं अमेरिकन डायलेक्टिक्स यूज करते हैं क्या कहेंगे कि हां व मतलब डायलेक्ट यूज करते हैं किंतु जब ब्रिटेन में जाएंगे तो ब्रिटिश एक्सप्रेशन ब्रिटिश डायलेक्ट इसको यूज करेंगे आईडियली ऐसा होना चाहिए कि जब अमेरिका में अमेरिकन फ्रेजस अमेरिकन डायलेक्ट यूज करते हैं तो अमेरिकन स्पेलिंग यूज करना है ब्रिटेन में ब्रिटिश स्पेलिंग यूज करना है किंतु हमको कहा गया कि यूनिफॉर्म चाहिए तो अभी हम लोग ऐसा एक फंस गए थे यह सब चीज को लेकर के टेक्निकल है जो टेक्निकल इंग्लिश जानेगा उसी को समझ में आएगा कि ब्रिटिश इंग्लिश अमेरिकन इंग्लिश य फ्रेजस एक्सप्रेशन डायलेक्ट स्पेलिंग बहुत डिफरेंस है तो आप किस तरह से यूनिफॉर्म लाएंगे आपको तो पूरा तोड़ देना पड़ेगा स्पिरिट को या तो अमेरिकन इंग्लिश को ब्रिटिश पर थोप दीजिए या तो ब्रिटिश को अमेरिकन पर थोप दीजिए या तो फिर एक नया ही कुछ खिचड़ी बना दीजिए सो वी हैव एक्चुअली फेस्ड दिस स्वामी जी वाज लाइक मतलब इजली फ्रॉम वन डायलेक्ट टू अनदर डायलेक्ट वो माइग्रेट हो जाते थे तो वो एक चीज है दूसरा कि स्वामी जी के पास में ऐसी कौन सी सिद्धि थी तो स्वामी जी ने खुद ने कहा है कि यदि मेरा एजुकेशन मेरे हाथ में होता तो मैं सर्वप्रथम एकाग्रता सीखता कंसंट्रेशन सीखता विद एंड आफ्टर वर्ड्स विद दिस पावर ऑफ कंसंट्रेशन एनी सब्जेक्ट आई वांट टू लर्न आई वुड मास्टर इट इन वेरी शॉर्ट टाइम एंड वेरी इजली तो ये फार्मूला तो स्वामी जी ने हमको दे दिया है प्रॉब्लम इज दैट के हम लोग अपनी एजुकेशन सिस्टम इस फार्मूला को डालते नहीं है अब सोच लीजिए कि वो बाल मंदिर से ही पहली दूसरी तीसरी कक्षा से ही प्राइमरी स्कूल में ही बच्चों को मेडिटेशन सिखाया जाए तो यह सेकेंडरी या तो फिर यह जो ग्रेजुएट लेवल का एजुकेशन उसमें वह सब स्किल्स कितनी काम लगेगी