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Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 10 Sep 2025

prayer

ओम स्थापकायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री राम कृष्ण लीला प्रसंग द्वितीय भाग साधक भाव प्रथम चैप्टर साधक और साधना

हमारी सही सम्पद क्या है: स्मृति या संस्कार? -- अच्छी यादें क्षणभंगुर है, अच्छे संस्कार हमेशा के लिए है

कल हम देख रहे थे कि किस इस तरह से प्रश्नोत्तरी के माध्यम से स्वामी शारदानंद जी महाराज रामकृष्ण लीला प्रसंग के लेखक वो किस तरह से प्रश्नोत्तरी के माध्यम से हमको समझा रहे हैं कि सर्वभूत में ईश्वर दर्शन ही मनुष्य जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है और इस तरह से ऋषि मुनियों ने यह दर्शन किया भी है। तो फिर अभी अह प्रश्न होता है कि यह जो अल्पसंख्यक ऋषियों ने जो दर्शन किया क्या वह सही है ना कि वह भ्रम है क्योंकि हम तो देखते हैं कि आज विश्व की पॉपुलेशन है 700 करोड़ उस समय होगी शायद 400 करोड़ ना कि उसके आसपास में तो इसमें से हो सकता है कि लाख दो लाख लोगों ने इस तरह से ब्रह्म दर्शन किया सर्वभूत में बाकी और किसी ने नहीं किया। तो यह एक दो लाख जिनको कि यह ब्रह्म दर्शन हुआ है वह लोग सही है। आप ऐसा कैसे कह सकते हैं? यह भी तो पॉसिबल है कि कोई मानसिक रोग का भोग बनकर के मानसिक विकार का भोग बनकर के उनको हेलुसिनेशन हो रहा हो ना कि भ्रम हो रहा हो। तो शरद महाराज कहते हैं कि देखिए इस तरह से यदि इनको भ्रम होता तो फिर इनके जीवन में यह जो आमूल परिवर्तन आया है फाउंडेशनल चेंजेस सब उनके जीवन में फंडामेंटल चेंजेस जो आए हैं वो किस तरह से आते देखिए उनके जीवन में क्या हमको दिखने को मिलता है। चार क्राइटेरिया शरद महाराज ने हमारे सामने कल रखे थे। क्या कहा था? चार क्राइटेरिया में कि एक तो सब तरह के दुखों के हाथों से उनको मुक्ति मिलती है। यह देख प्रथम क्राइटेरिया है। दूसरा है कि सब तरह के भय से यह शून्य हो जाते हैं। मुक्ति मिलती है। तीसरा है कि चीर शांति के अधिकारी हुए हैं। और चतुर्थ है कि निश्चित मृत्यु मनुष्य जीवन मनुष्य जीवन कैसा है जिसमें कि मृत्यु निश्चित है। तो इस तरह के निश्चित मृत्यु मनुष्य जीवन में उन्होंने एक उद्देश्य खोज निकाला है। मनुष्य जीवन की सार्थकता कहां पे है? मनुष्य जीवन का एम एंड ऑब्जेक्टिव क्या हो सकता है? यह उन्होंने खोज निकाला है। कल हम बात कर रहे थे स्मृति और संस्कार दो चीज होती है। हम सबको अच्छी स्मृति चाहिए। आज कोई भी आप कोई तीनचार मित्र मिलकर के बातें करेंगे तो वे लोग यही सब अच्छी स्मृति सब वो दोहराएंगे कि हां उस दिन हम लोग वहां पर इस प्रसंग में गए थे। हमको इतना आनंद आया था। या तो फिर यहां पर हम हॉलिडे सेलिब्रेट करने के लिए गए थे। वो टूर पर गए थे तो वहां पर हमको यह आनंद आया था। यानी कि एक ओर है इंद्रियों के सुख दूसरी ओर है यह अच्छी स्मृतियां। इसी को लेकर के तो यह लोग जीते हैं। किंतु इनको तो यह पता नहीं है या तो फिर पता है तो यह लोग नजरअंदाज कर देते हैं। क्या कि इस जन्म में से दूसरे जन्म में आपकी अच्छी स्मृतियां या तो आपने जो इंद्रियों के सुखों का उपभोग किया उससे आपको जो सेटिस्फेक्शन मिला उससे जो आपको फन आज की लैंग्वेज में कहते हैं फन। यह फन जो आपको मिला वह तो नेक्स्ट जन्म में कैरी फॉरवर्ड नहीं होने वाला है। अगले जन्म में वही कैरी फॉरवर्ड होगा जो कि इस जन्म के अच्छे संस्कार जो आपके बने हैं या तो फिर बुरे संस्कार बने हो। अच्छे कर्म का अच्छा फल, बुरे कर्म का बुरा फल। तो वही संस्कार ही कैरी फॉरवर्ड होने वाले हैं। अच्छा हमने कल यह बात की थी। उसके बाद में मैं सोच रहा था आपको बहुत सारी जगह पर इस तरह के यह विवरण देखने को मिलेंगे कि किसी किसी को पहले के जन्म की स्मृति याद आ गई है। अगले जन्म में उन्होंने क्या किया था। यह पूर्व जन्म की घटनाएं उनके मन में जागृत हो गई है। इस तरह से आपने शायद टीवी में भी देखा होगा, मूवीज में भी देखा होगा, न्यूज़ पेपर में भी पढ़ा होगा। भगवान बुद्ध की तो यह फेमस है कि पूर्व जन्म की जितनी भी कहानियां थी उनकी वह सब उनको निर्वाण के समय में आखिर में याद आ गई थी। तो क्या है कि जैसे-जैसे वह सब स्मृतियां जागृत होती गई तो साथ में ही उस स्मृति के साथ में एसोसिएटेड जो संस्कार है वह भी कटते गए। तो इस बात का हम यहां पर कैसे कहेंगे कि सिर्फ संस्कार ही कैरी फॉरवर्ड होते हैं। स्मृति नहीं होती है कैरी फॉरवर्ड। तो इसका सॉल्यूशन मैंने इस तरह से सोचा है कि संस्कार डालने के लिए संस्कार बनाने वाली जो स्मृतियां है वह हो सकता है कि शायद सूक्त रूप में कैरी फॉरवर्ड होती हो किंतु हमको वो हमारे लिए एक्सेसिबल नहीं है। कंप्यूटर की लैंग्वेज में कहें तो यह जो मशीन लेवल की यह जो सब फाइल है वह ऑपरेटिंग सिस्टम लेवल की फाइल वह यूजुअली वो यूजर यूजर जो होता है उसके लिए एक्सेसिबल नहीं है। उसके लिए आपको एडमिन राइट्स चाहिए। तो यहां पर भी हो सकता है कि यह जो संस्कार करने वाली संस्कार रूपी रेखा दौड़ने वाली जो स्मृतियां है अपने मन में वो शायद कैरी फॉरवर्ड होती हो किंतु वो एक्सेसिबल तभी होगी जबकि हम उस लेवल पर सुपर कॉन्शियस के उस लेवल पर पहुंच पाए। एनीवे यह एक जैसे वो गीता में भी कहते हैं ना कि गहना कर्मणो गति ही यह कर्म कर्म के संस्कार और पुनर्जन्म यह सब गहन बातें हैं। जब तक एक्सपीरियंस नहीं होगा तब तक उसके बारे में कुछ भी निश्चित रूप से कहना मुश्किल है। तो व्हाटएवर तो कल महाराज ने यह तो एक

आध्यात्मिक जीवन का आधार है सत-चरित्र

हमारे सामने आर्गुममेंट रखी कि यह जो अल्पसंख्यक ऋषि है उनके जो अनुभव है उनको आप हेलुसिनेशन कह के डिसमिस नहीं कर सकते हैं। देखिए हेलुसिनेशन लोगों को होता है। ऐसा नहीं है कि नहीं होता है। स्क्रीजोफेनिया है। यह सब जो बीमारी है उसमें यह तो प्रूव हो चुका है कि लोगों को हेलुसिनेशन अर्थात कि भ्रम चीजें दिखाई देती है। जो नहीं है वह भी दिखाई देता है। किंतु क्या है कि उन लोगों में और ऋषि मुनियों ने आप डिफरेंस कैसे प्रकट करेंगे? तो इस तरह के लोग जिनको यह भ्रमित चीजें दिखाई देती है उनका आप जीवन देखेंगे तमस में डूबा हुआ है। यह लोग सब समय एक तरह का निम्न चरित्रवान लोग होते हैं। उनके मन में भय है। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह वगैरह सब आहार, निद्रा, भय और मैथुन यही सब उनके मन में भर-भर करके पड़ा हुआ है। अर्थात कि आध्यात्मिक जीवन में कोई व्यक्ति है और यह कोई भ्रमित व्यक्ति है। इन दोनों का जो डिफरेंस है उनकी गुणराजी के माध्यम से उनके चरित्र के माध्यम से हम आकलन कर सकते हैं। असेस कर सकते हैं। जिसका चरित्र शुभ्र है, पवित्र है, निर्मल है। इस तरह के व्यक्ति को यदि कुछ दर्शन होता है तो उसका एक सब्सटेंशियल फाउंडेशन होना चाहिए। और जिस तरह का व्यक्ति जो कि पशु भाव से भरा हुआ है, जिसके मन में दूसरों के प्रति ईर्ष्या है, दूसरों के प्रति हिंसा है, दूसरों के प्रति क्रोध है, वह सब समय अपने को खुद को कोसता रहता है। इस तरह के चरित्र वाले व्यक्ति को यदि भ्रम दिखता है, तो उसको हम कोई ईश्वरीय आदेश या तो ईश्वरीय दर्शन के रूप में कभी स्वीकार नहीं कर सकते। उसको सही-सही में मानसिक बीमारी हुई है। यह हमको मानना होगा। यानी कि यहां पे शरद महाराज एक फंडामेंटल क्राइटेरिया हमारे सामने रखते हैं। आध्यात्मिक जीवन का फाउंडेशन वो है चरित्र। चरित्र के फाउंडेशन के ऊपर में आपके दर्शन वगैरह बने हुए हैं। तो उसमें कुछ सत्यता है। उसमें कुछ ऑथेंटिसिटी लेजिटिमसी है। किंतु असत चरित्र दुष्टचरित्र दुष्ट चरित्र इसके ऊपर में यदि आपके मन के इस तरह के विज़ंस बने हुए हैं तो उसमें कोई स्पिरिचुअल लेजिटिमसी नहीं है। कोई भी तरह की स्पिरिचुअल ऑथेंटिसिटी उसमें नहीं है। तो इस इतना हमने कल देखा। अभी आज शरद महाराज

आध्यात्मिक ज्ञान का प्रमाण है सात्त्विक सद्गुण

आगे क्या कहते हैं? तदभिन्न यथार्थो ज्ञान मानव मने सर्वदा सहिष्णुता संतोष करुणा दीनता प्रवृत्ति सद्गुण राजीर विकास कोरिया उहा के अद्भुत उदारता संपन्नो कोरिया था के ऋषि दगने ओ रूप असाधारण गुण और शक्ति परिचय आमरा शास्त्र पया था की एवं तहां दग पदानुसरण चलिया जारा सिद्धि लाभ करे तहां दर भीतरे ओ शोकोले परिचय एकनो देखते पाई इस चार के अलावा तदभिन्न इस ऊपर में जो चार क्राइटेरिया कहे गए हैं इसके अलावा यथार्थ ज्ञान यदि आध्यात्मिक जीवन का यथार्थ ज्ञान होता है तो यह यथार्थ ज्ञान मानव मन में हमेशा सहिष्णुता संतोष करुणा दीनता वग वगह सद्गुण राशि का विकास करके उसको अद्भुत उदारता संपन्न करता है। ऋषियों के जीवन में इस तरह के असाधारण गुण और शक्ति का परिचय हमको शास्त्र में मिलता है और उनके पदानुसरण करके उनकी आज्ञा का पालन करके जो आध्यात्मिक साधना करता है जो लोग सिद्धि लाभ करते हैं उनके जीवन में भी इस तरह के गुणों का परिचय हम देख पाते हैं। यह शरद

स्वामी सारदानंद की पुस्तक लीला प्रसंग की साहित्यिक जटिलता

महाराज की शास्त्रीय लेवल की लैंग्वेज यह सेंटेंस इतना कॉम्प्लिकेटेड कभी-कभी लगता है कि फिर हम बहुत बार ऐसा होता है ना कि इस तरह का लंबा सेंटेंस या तो इस तरह से कंपोज किया गया सेंटेंस जिसका कि अर्थ सहज रूप से समझ में नहीं आता है तो वो सेंटेंस पढ़कर के ही हम वहीं पर छोड़ देते हैं। बहुत बार मुझे कोई-कोई भक्त कहते हैं कि महाराज लीला प्रसंग ठाकुर का कोई अच्छा जीवन होगा तो हमको बताइएगा अच्छा जीवन हमको उनकी लाइफ बायोग्राफी पढ़ने की बड़ी इच्छा है तो फिर मैं कहूंगा अरे लीला प्रसंग है तो इससे अच्छा जीवन क्या हो सकता है वो जो ऑथेंटिक जो ठाकुर का बायोग्राफी तो लीला प्रसंग ही है तो फिर वे लोग कहेंगे अरे महाराज उसमें इतना कॉम्प्लिकेटेड लैंग्वेज है कुछ समझ में नहीं आता तो अभी क्या करेंगे देखिए अब जैसे भगवान बुद्ध का है भारत में जो है कि संस्कृत साहित्य या तो संस्कृत की तरह का एक लिटरल लिटरेरी साहित्य यह यदि बनता है तो फिर क्या है कि उसका हमेशा के लिए उसका एक वैल्यू रहता है। भगवान बुद्ध ने ये पाली है वगैरा जो एक लोकमान्य माने जो लोगों में जो फेमस या तो फिर कहेंगे लोकप्रिय भाषाएं थी उसमें बोलना शुरू किया और फिर इस भाषा भगवान बुद्धि की वाणी को इसी तरह की सहज भाषा में जो लिपिबद्ध भी किया गया तो उसका यह एक परिणाम आया कि बुद्धिस्ट लिटरेचर भारत में ज्यादा दिन टिक नहीं पाया। यह स्वामी विवेकानंद का असेसमेंट है। हालांकि मैं मेरी दृष्टि से तो बहुत सारा बुद्धिस्ट टीचिंग अच्छे से लिटरेरी फॉर्मेट में अवेलेबल है और काफी कुछ संस्कृत में भी अवेलेबल है। तो व्हाटएवर अभी देखिए कि कथामृत कथामृत में ठाकुर ने इसी तरह से लोक भोग्य बंगाली जनप्रिय बंगाली में बात की है। इस तरह से कोई कॉम्प्लिकेटेड लिटरेरी बेंगली में नहीं बोल के जो एक आम आदमी भी सह समझ पाए एक इस तरह का लाटू महाराज जैसे देखिए लाटू महाराज है लिटमस टेस्ट माने यदि लाटू महाराज जिस चीज को समझ पाते हैं उस चीज को समझने में कोलकाता के किसी भी व्यक्ति को मुश्किल नहीं होनी चाहिए। क्यों? सबसे पहली बात तो लाटू महाराज स्वयं बंगाली नहीं थे। वो बिहार से ना कि छपरा वहां से गए थे। तो क्या है कि उनकी लैंग्वेज बंगाली ओरिजिनल लैंग्वेज नहीं थी। वो वहां पर जाकर के सीख लिए थे। वो तो एक बात है। दूसरे कि वो व्यावहारिक दृष्टि से निरक्षर थे। इस अर्थ में कि फॉर्मल स्कूलिंग उन्होंने नहीं किया था। तो जिनका एक फॉर्मल एजुकेशन नहीं हुआ है जिसका बेंगली लैंग्वेज भी नहीं है ओरिजिनल मातृभाषा उनको यदि ठाकुर की बात समझ में आए तो कोलकाता में जो ठाकुर का टारगेट ऑडियंस था उस समय का यह स्कूल यूनिवर्सिटी के या तो फिर ब्रिटिश राज्य के संपर्क में आए हुए वेस्टर्नाइज्ड वेस्टर्न कल्चर के संपर्क में आए हुए ये जो मिडिल क्लास एजुकेटेड यूथ तो उनको तो समझने में कोई दिक्कत नहीं ही होनी चाहिए। चाहिए मिडिल क्लास जितने भी लोग थे उस समय कोलकाता के यह चाहे ब्राह्म समाज के फॉलोअर्स हो ना कि वह कोई भी हो इवन गहिणी भी हो सामान्य अभी गोलाप मां है योगेन मां है गोपाल की मां है अघोरमणि देवी है इस तरह के जिन लोगों का एजुकेशन के साथ में ऐसा कोई नाता नहीं रहा है वेस्टर्न कल्चर के साथ में कोई नाता नहीं रहा है ऐसे लोग भी ठाकुर की बात को सहज रूप से समझ पाए तो इसी लैंग्वेज को कथामृत में लिपिबद्ध किया गया है। किंतु फिर यही जब स्वामी जी ने यह कहा कि भगवान बुद्ध का लिटरेचर संस्कृत में अवेलेबल नहीं होने की वजह से शायद भारत में उनके साहित्य का अवसान हुआ। भारत में यह साहित्य टिक नहीं पाया। तो बोलकर के ही शायद हो सकता है कि शरद महाराज ने इसको साधु बांग्ला में इस लीला प्रसंग ग्रंथ की रचना की है। साधु बांग्ला अर्थात कि इसमें बहुत सारे शब्द जो है वह संस्कृत से डिराइव हुए हैं और सेंटेंस स्ट्रक्चर जो है बहुत ही ज्यादा फॉर्मल है। तो इसलिए आप ओरिजिनल बेंगली में लीला प्रसंग और कथामृत दोनों की लैंग्वेज को कंपेयर करेंगे तो कथामृत में छोटे सेंटेंस है। सेंटेंस का जो लेंथ है वो शॉर्ट है। और जो सेंटेंस में जो शब्द यूज किए गए हैं वो सहज बेंगली शब्द है। चलती बांग्ला जिसको कहते हैं पॉपुलर बंगाली में वो सब शब्द लिखे गए हैं और ठाकुर ने बोले हैं और इसी तरह से मास्टर महाशय ने लिखे हैं। जबकि लीला प्रसंग कंपेयर टू दैट सेंटेंस का लेंथ भी लंबा है। शब्दों जो सिलेलेक्ट किए गए हैं। बहुत सारे शब्द संस्कृत में से डिराइव हुए हैं। और फिर जिस तरह से सेंटेंस स्ट्रक्चर क्र क्रिएट किया गया है, वह बहुत ही ज्यादा फॉर्मल है। तो, क्या है कि अभी शरद महाराज का यह एक एम होगा कि इसके इस तरह की लैंग्वेज जो कि फॉर्मल है, संस्कृत बेस्ड है, उसका लंबे समय तक एक लिटरेरी वैल्यू रहेगा। ऐसा शायद उन्होंने सोचा होगा। तो जो भी है यदि आपको सहज लैंग्वेज में ठाकुर की बातें पढ़नी है जीवनी तो बहुत सारी लोकल लैंग्वेज में उसको सहज रूप से लिखा भी गया है। मुझे पता है गुजराती में ठाकुर की एक बायोग्राफी अवेलेबल है गुजराती लैंग्वेज में। गुजराती लैंग्वेज में लीला प्रसंग का ट्रांसलेशन तो अवेलेबल है ही है जो कि गुजराती बड़ा ही डिफिकल्ट है पढ़ने में। किंतु एक सहज गुजराती में लिखी हुई बायोग्राफी भी अवेलेबल है। तो ऑलमोस्ट सभी लैंग्वेज में सरल करके सरल करके ठाकुर की बायोग्राफी को लिखा गया है। तो एनीवे ये जो सेंटेंस है

आध्यात्मिक ज्ञान का प्रमाण है सात्त्विक सद्गुण

वो क्या कहना चाहते हैं शरद महाराज कि यदि आध्यात्मिक ठीक-ठीक ज्ञान हो जाता है तो फिर क्या होता है? पता है हम में यह सद्गुण राशि का जन्म होता है। यह सद्गुण राशि में से उन्होंने कुछ सद्गुण यहां पर गिनाए हैं। सहिष्णुता, संतोष, करुणा और दीनता। इस तरह के सद्गुण हमारे जीवन में प्रकट होते हैं। यदि हम ठीक-ठीक आध्यात्मिक रास्ते पर चल रहे होते हैं तो यह तो एक बात कही है। दूसरी बात कही है कि ऋषि मुनियों के जीवन में इसी तरह के सद्गुण प्रकट हुए थे। और फिर तीसरी बात कही है कि यदि इन ऋषि मुनियों के पदानुसरण करके इन ऋषि मुनियों की आज्ञा का पालन करके इन ऋषि मुनियों का वो टीचिंग्स हम लोग अप्लाई करके अपने जीवन में आध्यात्मिक रास्ते पर चलेंगे तो हमारे जीवन में भी इस तरह की सद्गुण राशि का उदय होगा ही होगा। तो यह यहां पर महाराज कहना चाहते हैं और

सात्त्विक सद्गुण : (1) सहिष्णुता

यह जो सद्गुण जो उन्होंने गिनाए हैं सहिष्णुता हमको पता है ठाकुर की वह फेमस घटना कि जब उस एक आदमी ने ईर्षान्वित होकर के कि ठाकुर मथुर बाबू के बहुत ज्यादा प्रिय हो गए हैं तो फिर यह चमचागिरी करके यह सब उन्होंने मथुर बाबू की कृपा प्राप्त की है वगैरह वगैरह ईर्ष्या से उसने ठाकुर के श्री अंग पे पैरों से आघात किया था तो ठाकुर उस समय भाव में थे तो पता नहीं चला किंतु जब भाव में से सामान्य भूमि पर वापस आए उच्च भूमि से सामान्य भूमि पर तो देखा कि पूरे देह में इस तरह के घावों के निशान पड़े हुए हैं। आघात के निशान हुए हैं। तो किसी ने कहा कि मथुर बाबू को कंप्लेन करें। किंतु ठाकुर ने कहा नहीं उसको जाने दो। तो यह ठाकुर की बड़ी फेमस कहानी है ही है। स्वामी जी का भी देखिए। कि देखिए स्वामी जी के जीवन में ये सहिष्णुता है वो थोड़ी सी हमको छुपी हुई दिखती है क्योंकि स्वामी जी मतलब क्या कि अभी मां और ठाकुर के जीवन में सहिष्णुता के बारे में बोलेंगे तो हमको अनेक उदाहरण मिलेंगे। मां के जीवन में तो सहिष्णुता अर्थात कि यह फॉरबियरेंस। सहिष्णुता का अर्थ है फॉरबियरेंस अर्थात कि यदि कोई अपने पे अत्याचार करता है तो जहां हो सके जहां तक हो सके उसको सहन करना। तो यह मां के जीवन में तो इस तरह के उदाहरण की कमी ही नहीं है। एक के बाद एक सब कितने ही पागल भक्त आते थे मां के पास में और उनके खुद के परिवार जन मां के ऊपर में जो आपदार अर्थात कि यह डिमांड वगैरह सब करते थे। उसकी तो अनेक कहानियां है हमारे सामने। किंतु स्वामी जी के जीवन में देखिए स्वामी जी म ऑफ कोर्स स्वामी जी को हम किस तरह के उदाहरण में स्वामी जी का हम नाम लेंगे आत्मश्रद्धा प्रचंड विल पावर प्रचंड संकल्प शक्ति इस तरह का कुछ हमको उदाहरण देने हैं गुण गुण गुणावली के गुणराज्य के तो हम स्वामी जी का उदाहरण देंगे किंतु ये फोरपीयरेंस यह सहिष्णुता स्वामी जी के जीवन में यह भी बहुत था स्वामी जी बहुत अमेरिका में जब प्रारंभ में स्वामी जी गए थे उस समय स्वामी जी के साथ में जिस तरह का डिस्क्रिमिनेशन चलता था जिस तरह से कुछ-कुछ लोग स्वामी जी को काला आदमी समझ कर के और अमेरिका में तो रेसिज्म बड़ा स्ट्रांग था यह गोरे आदमी है यह काला आदमी है अफ्रीका से वह जो सब स्लेव्स थे गुलाम थे अमेरिका में लाया गया था यह शुगर प्लांटेशन वगैरह में काम करने के लिए खेत में काम करेंगे घर में काम करेंगे तो इस तरह तरह से काले गुलामों को यह अफ्रीकन गुलामों को अमेरिका में लाया गया था। अभी वह उनको मुक्ति तो मिली यह गुलामी में से किंतु यह रेसिज्म जो है वो इतना आसानी से जाने वाला नहीं था। तो स्वामी जी वैसे भी तो स्किन से थोड़े डार्क थे। तो बहुत सारे लोग उनको काला आदमी समझ कर के अफ्रीकन समझ करके वह अपनी रेस्टोरेंट में नहीं आने देते थे। उसके उनके बाल काटने नहीं देते। बाल नहीं काटते थे। माने वो बार-बार शॉप में जाएंगे वह मना कर देगा कि नहीं आपके बाल में नहीं काटूंगा शेव नहीं करूंगा वगैरह-वगैरह तो इस तरह का डिस्क्रिमिनेशन स्वामी जी को काफी सहन करना पड़ा था। फिर इसलिए स्वामी जी एक जगह किंतु देखिए कि स्वामी जी का जो लिटरेचर है, उनके लेटर्स है, उनके प्रवचन है, इन सब में यह सब चीजें वो बिल्कुल रेयरली कभी मेंशन करते हैं। ज्यादातर तो अमेरिकन जो स्त्रियां थी जो अल्पसंख्यक स्त्रियां जिन्होंने कि स्वामी जी को उनको बड़ी श्रद्धा पूर्वक अपनाया हो। अपने घर में जगा दी हो। स्वामी जी के फॉलोअर्स हुई है। स्वामी जी की फ्रेंड्स हुई है। स्वामी जी के कार्य में सहाय करने के लिए आगे आई है। ऐसी स्त्रियों और पुरुषों के बारे में ही उनकी प्रशंसा करके ही स्वामी जी अपने पत्रों में या तो प्रवचन में कहते हैं। किंतु यह जो डिस्क्रिमिनेशन है जो कि उनके साथ में बहुत सारे लोग करते थे। रेयरली कभी वह उसका उत्तर देते होंगे। जैसे देखिए पादरी लोग जो स्वामी जी के ऊपर में आक्रमण करने को आते थे उसका तो उत्तर स्वामी जी को देना ही होगा क्योंकि वह हिंदू धर्म पर आक्रमण था और हिंदू धर्म का बचाव स्वामी जी को करना होगा किंतु उनको एक एशियन है एक अफ्रीकन है ऐसा मानकर के जो लोग डिस्क्रिमिनेशन करते थे वो तो क्या है एक पर्सनल अटैक था तो स्वामी जी ये पर्सनल अपने को डिफेंड करने के बारे में थोड़े से उदासीन ही थे उसको थोड़ा सा वह नेगलेक्ट ही करते थे। किंतु एक जगह पर उन्होंने कहा है कि मैं जब अपने जहां पर भी वह रह रहे हैं वहां से बाहर निकल कर के रास्ते पर मैं चलता हूं। या तो मैं किसी दुकान में जाता हूं। कुछ परचेस करने के लिए या तो प्रवचन के लिए जाता हूं। किसी हॉल में वगैरह। तो जब भी मैं रास्ते पर चलने की बारी आती है, मैं हमेशा यह जो एक अमेरिकन डिवोटी होती है, लेडी डिवोटी, उसमें से किसी को साथ में रखता हूं। तो इसका परिणाम क्या होता है? अदरवाइज यदि स्वामी जी अकेले चलते रास्तों पे तो लोग उनके उनको पत्थर मारते। यह शुरू शिकागो में तो वही हुआ। एक बार स्वामी जी वहां से जा रहे थे रास्ते से बिल्कुल शुरूशुर में वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन के पहले की बात है। लोगों ने कुछ लड़कों ने उनके ऊपर में पत्थर मारे थे। तो यहां तक स्वामी जी के साथ में हुआ है अन्याय। तो स्वामी जी कहते हैं इसीलिए मैं एक अमेरिकन लेडी डिवोटी को साथ में रखता हूं। बाहर जाने के समय वह यदि मेरे साथ में होती है तो लोग मेरे ऊपर इस तरह का अब्यूज नहीं डालते मेरे सर के ऊपर में। ना ही मेरा अपमान करेंगे ना ही मुझ पर पत्थर मारेंगे। तो यहां तक स्वामी जी को एक बार कहना पड़ा था। तो देखिए कि यह फोर बियरंस है। स्वामी जी श्राप भी दे सकते थे। स्वामी जी भारत आकर के अमेरिकनों की निंदा भी कर सकते थे। किंतु ऐसा नहीं करके स्वामी जी अपने पत्रों में लिखते हैं कि यहां पे जो सफेद कलर का जो शुभ्र कलर का जो बर्फ गिरता है तो इतना ही शुभ्र यहां की स्त्रियों का चरित्र है। तो ऐसा करके और फिर क्या कहते हैं कि अमेरिका इज द हेवन फॉर वमेन एंड मासेस। जनसाधारण और स्त्रियों के लिए तो अमेरिका स्वर्ग है। और भारत में क्या होता है? 10 साल की बच्ची का किस तरह से गर्भाधान हो, किस तरह से उसकी शादी हो, इसी सब चीजों में वहां के पंडित लोग फंसे हुए हैं। बोल के उस भारत को निंदा मतलब भारत के यह जो दुष्टचरित्र वाले जो सब कार्य थे भारत के ये जो दुर्गुण थे उनकी निंदा करना और कंपेयर टू अमेरिका इस सब मामलों में कितना एडवांस फॉरवर्ड लिबरल है उसकी प्रशंसा करना यह स्वामी जी के लेटर में आपको सबसे ज्यादा से ज्यादा दिखेगा। तो देखिए कि इतनी उदार हृदयता हम में सहिष्णुता ना हो तो नहीं आएगी। फोर बियरेंस यदि ना हो तो नहीं आएगी। तो वह तो एक फोर बियरेंस है।

सात्त्विक सद्गुण : (2) संतोष

संतोष है। देखिए अगेन यदि स्वामी जी का ही उदाहरण ले मां और ठाकुर के जीवन में संतोष बोल के आपको हजार उदाहरण दिख जाएंगे। मां किस तरह से नबत में रहती थी। उसके बावजूद मां की कोई डिमांड नहीं थी। मां ने गहने नहीं मांगे थे ठाकुर के पास से। ठाकुर ने ही मां के लिए गहने बना दिए थे। तो फिर देखिए कि किसी भी तरह की यह मटेरियल चीजों की डिमांड नहीं करके ईश्वर ने जो दिया है उससे संतुष्ट होकर के रहना ये मां के जीवन में तो अद्भुत घटनाएं है ही है। किंतु अगेन यदि स्वामी जी का उदाहरण हम लेते हैं तो देखिए कि स्वामी जी के जीवन में भी यह संतोष अर्थात कि यह एंबिशन का अभाव देखिए अगेन दिस इज़ वेरी कंट्राडिक्टरी इन स्वामी जीसस लाइफ राइट कि अमेरिका गए क्यों स्वामी जी भारत के लिए मदद मांगने के लिए तो यह तो एक जीवन की एंबिशन थी कि वहां से पैसा लाएंगे और पैसा भारत में लाएंगे और जो भारत के ये जो कोटि-कोटि बेचारे पद दलित दीन प्रतिदिन जिनको कि कुच पैरों के तले कुचड़ा जा रहा है, ऐसे लोगों को सहाय करेंगे। यह स्वामी जी की इच्छा होने की वजह से ही एंबिशन होने की वजह से ही वह अमेरिका तो गए। किंतु कहते हैं ना कि संतोष अर्थात कि जो चरित्र होता है बेसिक चरित्र उसको आप बहुत ज्यादा आप उसको यह नहीं कर सकते। वह अल्टीमेटली आ ही जाएगा। वो ठाकुर की कहानी है ना कि मुसलमानों ने पकड़ करके एक मां काली के जो साधक को मुस्लिम बना दिया तो कहा कि अल्लाह अल्लाह जप करो तो वो अल्लाह अल्लाह जप कर रहा है बीच-बीच में किंतु काली का नाम आ जा रहा है तो वो मुल्ले लोगों ने पकड़ा उसको कि क्यों तुम बीच-बीच में काली का नाम लेते हो तो वो बेचारा साधक कहता है कि काली मेरे गले तक है इसलिए म पूरे देह में काली ही काली है। अभी जोर जबरदस्ती ये मंत्र दिलवाया है। आपने दूसरा वाला बोल के मुझे लेना पड़ रहा है उसका नाम। तो यहां पे भी स्वामी जी का आकंठ माने गले तक वो तो संतोष भरा हुआ है। वो कुछ उन्होंने जो देखा सांसारिक ये कष्ट बोलकर के वे लोग आए हैं। वो सांसारिक कष्ट अर्थात कि उनके खुद के संसार का नहीं यह बाकी लोगों के संसार का। तो वो कष्ट देखकर के वो अमेरिका आए हैं। किंतु संतोष जो है भीतर में तो क्या होता है पता है? कितनी बार ऐसा हुआ है कि स्वामी जी को प्रवचन वो पैसा देकर के लोग उनका टिकट परचेस करते थे प्रवचन का और इस तरह से वह पैसा इकट्ठा करते थे स्वामी जी तो जो पैसा मिलता है टिकट सेल करके उनके लेक्चर का बहुत बार ऐसा हुआ है कि लोकल कोई चैरिटी में उन्होंने यह पैसा दे दिया है। अभी कोई एक चैरिटी है लोकल जो कि गरीब लोगों की गरीब बच्चों की विधवाओं की सहाय करती है। स्वामी जी के नजर में आया तो फटाक करके उन्होंने अपने प्रवचन में टिकट सेल करके जो पैसा मिला था सब उनको दे दिया। बोला कि तुम लोग रखो तुम लोग यहां के गरीब बच्चों की संभाल रखो। अभी सोचिए जगत का सबसे धनी देश अमेरिका वहां पे स्वामी जी इतना कष्ट करके खून पसीना एक करके प्रवचन दे रहे हैं। उसमें से जो अल्प कुछ आय होती है अल्प कुछ बेनिफिट प्रॉफिट होता है उनको यह टिकट सेल के पैसों का वो भी वह हाथ में से निकाल देते हैं। वह भी वहां के गरीब लोगों को वो दे देते हैं। तो यह क्या है पता है? क्योंकि भीतर में ऐसा कोई डिमांड एज सच नहीं है कि मैं भारत में इतने रुपए ले ही जाऊंगा। भारत में यह सब करना ही करना है। क्योंकि अल्टीमेटली स्वामी जी को भले ही चाहे वह एक्सपीरियंस बाद में हुआ हो। खीर भवानी स्वामी जी अमेरिका से आने के बाद गए थे। खीर भवानी में मां का भग्न मंदिर जब देखा तो उन्होंने कहा कि मां मैं यदि वहां पर रहता तो मैं यह मंदिर को टूटने नहीं देता। तब मां ने दर्शन देकर कहा था बेटा तुम मेरी रक्षा करोगे कि मैं तुम्हारी रक्षा करूंगी। मंदिर बना है मेरी इच्छा से टूटा भी है मेरी इच्छा से। तो वो शरणागति का जो भाव जो कि एक ओवर्ट एक एग्जांपल में हमको दिखाई देता है वो तो वैसे अमेरिका से वापस आने के बाद में यह अनुभूति यह दर्शन हुआ था स्वामी जी को किंतु ऑलरेडी क्योंकि निर्विकल्प समाधि तो प्राप्त कर ली है ना तो वो तो कोई छोटी-मोटी चीज तो है नहीं तो वो निर्विकल्प समाधि से जनित उसमें से प्रकट हुआ यह सहिष्णुता है संतोष है यह गुण तो ऑलरेडी विद्यमान है ही है उनके भीतर में तो गुण इस तरह से बाहर आ जाते हैं कि ठीक है भारत की जो दुर्दशा है वह भी मां की ही इच्छा से हुई है। यदि भारत की दुर्दशा दूर होनी होगी तो वह भी मां की इच्छा से ही होगी। मैं तो एक इंस्ट्रूमेंट मात्र हूं। मैं तो सिर्फ एक निमित्त मात्रम भवसव्य साचिन निमित्त मात्र हूं मैं। तो यहां पर भी स्वामी जी के जीवन में यह सहिष्णुता है, संतोष है,

सात्त्विक सद्गुण : (3) करुणा

करुणा है। अगेन मां के जीवन में करुणा का अभाव नहीं है। ठाकुर के जीवन में तो दो एग्जांपल हमने स्पष्ट देखे हैं कि जनसाधारण के प्रति करुणा कि देवघर जा रहे थे। गरीब एक जगह में देखा लोकालिटी गांव में कि इतने लोग गरीब है तो ठाकुर ने मथुर बाबू को कहा कि जब तक उनको पहनने के लिए वस्त्र सर में डालने के लिए तेल नहीं दोगे तब तक मैं यहां से मैं खुद नहीं जाऊंगा पेट भर उनको भोजन करवाओ। तो मथुर बाबू कहता है कि अरे बाबा वो तो ठाकुर को बाबा करके पुकार देता है। तो अरे बाबा हम लोग तो इतनी लंबी यात्रा के लिए जा रहे हैं। पता नहीं कहां पे कितना खर्च होगा। मैं यदि इस तरह से इनडिनेटली पैसा खर्च करना शुरू कर दूंगा तो बाद में यदि पैसों का अभाव हो जाएगा तो क्या करेंगे? तो यह सब प्रैक्टिकल चीजें हैं। दुनियादारी वाला जो थिंकिंग लॉजिक है वह तो ठाकुर के सर में जाने वाला नहीं। जिद करके बैठ गए तो मथुर बाबू ने सबको यह भोजन करवाया, वस्त्र दिया, तेल दिया, सर में डालने के लिए, बालों में डालने के लिए। फिर वह मथुर की जमींदारी में ठाकुर गए थे। वहां पर भी ठाकुर के कहने से मथुर बाबू ने सबके लिए आहार वस्त्र की व्यवस्था की थी। यह तो जनसाधारण के प्रति और जो आध्यात्मिक जिज्ञासु है आध्यात्मिक मुमुक्षु है उनके प्रति करुणा का तो ठाकुर के जीवन में अभाव ही नहीं था। मरते दम तक अर्थात कि उनको कैंसर हो गया है। वह डॉक्टर सरकार ट्रीटमेंट करने के लिए आ रहे हैं। और इस तरह के डॉक्टर सरकार वैसे तो बड़े ही साहिबी अर्थात कि ये म वेस्टर्न भाव से वो भावित है। भावापन्न है डॉक्टर सरकार। किंतु इवन इस तरह के डॉक्टर सरकार में उन्होंने मुमुक्षत्व का एक बीज देखा तो फिर ठाकुर ने अपने गले की बीमारी को नजरअंदाज करके कंटिन्यूस उनके साथ में वार्तालाप कर रहे हैं और डॉक्टर सरकार भी वो ठाकुर की बातों से इतने मोहित हो जाते हैं कि पहले तो बोला कि किसी के साथ बात नहीं करना। किंतु फिर पता चला कि उन्होंने ही ठाकुर के साथ में बैठकर के चारप घंटे बात कर ली है। तो बड़े ही बेचारे शोभित हो गए। लज्ज लज्जित हो गए और क्या कहते हैं कि अभी ठीक है मैं जब आता हूं तो मेरे साथ बात करनी है किंतु और किसी के साथ बात नहीं करनी। मास्टर महाशय उनके घर जाते हैं डॉक्टर सरकार के घर में उनको बुलाने के लिए उनको कंसल्ट करने के लिए तो डॉक्टर सरकार क्या कहते हैं? देखो कि परमहंस महाशय की वजह से मेरा जो प्रैक्टिस में मुझे नुकसान हो रहा है। अभी एक दिन मैंने ठीक किया है। अपॉइंटमेंट दिया है कि मैं यह चारप घर में जाऊंगा। रोगी का पेशेंट की ट्रीटमेंट करने के लिए। तो जब भी किसी के घर जाएंगे तो उनको विजिटिंग चार्ज तो मिलेगा ही मिलेगा। तो अभी उन्होंने टाइम भी ठीक कर दिया होगा कि एक पेशेंट के घर में आधा घंटा दूसरे के घर में आधा घंटा और फिर यहां से वहां घोड़ा गाड़ी में जाने में इतना टाइम। तो यह पूरा उन्होंने अपने माइंड में शेड्यूल बना दिया होगा। अनफॉर्चूनेटली होता क्या है कि जैसे ही ठाकुर के घर में आते हैं, काशीपुर में आते हैं तो ठाकुर के साथ में इतना लंबा वार्तालाप चलता है कि और किसी के घर जाने का उनको समय ही नहीं मिलता। तो फिर डॉक्टर सरकार क्या कहते हैं कि मैं अभी देखिए प्रॉमिस तो किया है पेशेंट तो मेरा है। मैं यदि उसको ट्रीट नहीं करूंगा तो मेरा प्रैक्टिस गड़बड़ हो जाएगा। वे लोग दूसरे डॉक्टर को खोज लेंगे। अर्थात मुझे उनके घर पर जाना तो है किंतु मैं उस समय जा रहा हूं जिस समय का अपॉइंटमेंट नहीं है। बाद के समय में जा रहा हूं। तो फिर तो यह एथिकल नहीं होगा कि मैं उनसे रुपया लूं। यानी कि मैं उनको फ्री ट्रीटमेंट मुझे देनी पड़ती है परमहंस महाशय की वजह से। तो देखिए कि ठाकुर की ये आध्यात्मिक करुणा कितनी प्रचंड थी। यह गिरीश घोष गिरीश घोष के मां ने खुद ने कहा है कि ये ठाकुर को कैंसर क्यों हुआ? तो मां ने कहा कि गिरीश के पाप अपने सर पर लेकर के ही तो ठाकुर को कैंसर हुआ। यह देखिए वो जगदंबा दासी मथुर बाबू की द्वितीय पत्नी अभी उसका बड़ी ही बीमारी उसकी चल रही है। मथुर बाबू ने आकर के ठाकुर को विनती करके कहा मेरी पत्नी का मृत्यु होगा। तो फिर अभी प्रॉपर्टी तो रासमणि की है ना। तो उसकी पुत्री के साथ में विवाह है बोलकर के ही तो मथुर बाबू का उस प्रॉपर्टी पे मैनेजमेंट एडमिनिस्ट्रेशन करने का अधिकार था। पत्नी का मृत्यु होगा तो कालीवाड़ी का एडमिनिस्ट्रेशन उनके हाथ से जाएगा। तो मथुर रोते-रोते ठाकुर को कहता है कि देखिए बाबा कालीवाड़ी का एडमिनिस्ट्रेशन मेरे हाथ में से चला जाए। इस बात का मुझे दुख नहीं है। दुख इस बात का होगा कि मैं आपकी सेवा नहीं कर पाऊंगा। तो फिर ठाकुर ने उनकी जो साधना समाप्त हुई थी 1867 के आसपास में उसी के समय यह घटना हुई है। ठाकुर ने मथुर की पत्नी की बीमारी अपने पर ले ली और छ महीने उन्होंने बहुत ज्यादा रोग से भोगा था। तो यह जो ठाकुर की करुणा है उसका तो यह पूरे जीवन भर उनका आध्यात्मिक करुणा विलय करने में ही गया है। उसको बांटने में ही गया है। किंतु स्वामी जी का भी देखिए कि स्वामी जी वहां पर चाहते तो निर्विकल्प समाधि में बैठकर के पूरा जीवन बिताते। किंतु एक तो दो चीज है। एक तो है कि ठाकुर को पता है कि नरेंद्र का एक तो उर्ध्वगति वाला मन है। हमेशा एक ईश्वर की ओर ब्रह्म साक्षात्कार की ओर वो मन धावित होता है। प्रगति करता है। यह तो एक बात है। ठाकुर ने अल्टीमेट एक्सपीरियंस जो है स्पिरिचुअल वर्ल्ड का उसको ताला बांध करके वो चाबी तो अपने पास में रख ली। वो तो एक बात है। दूसरा कि स्वामी जी का खुद का नेचर देखिए स्वामी जी के नेचर में कैसा ये स्प्लिट था। एक उनका ये जो माइंड है वन पार्ट ऑफ हिज माइंड इट ट्रैवल्स टुवर्ड्स द गॉड। यानी एक एक पार्ट है जो कि ईश्वर की ओर जाता है। दूसरा जो पार्ट है किंतु लोगों के यह दुख है, कष्ट है, उनकी समस्या है, उनका यह जो जीवन के जो संग्राम है उसको देखकर के करुणा से भावित होकर के करुणा से प्लावित होकर के उनको सहाय करने की ओर दौड़ता है। तो स्वामी जी के जीवन में भी यह स्प्लिट था और इसी वजह से इस स्प्लिट को सबसे ज्यादा यह स्प्लिट है या कंट्राडिक्शन है हमको कहां दिखता है? क्लासिकल एग्जांपल क्या है? तो वह अल्मोड़ा की गुफा का कि स्वामी जी ने सोचा था कि वहां पर बैठकर के निर्विकल्प समाधि में मग्न हो जाएंगे। उसी में जीवन बिता देंगे। किंतु फिर पता चला कि उनकी बहन का मृत्यु हुआ है। अपघात मृत्यु हुआ है। तो अभी होना दो चीज चाहिए। यदि स्वामी जी के मन में यह ब्रह्म साक्षात्कार की बात इतनी स्ट्रांगली बैठ जाती तो वो वही वो सब ये जो सब न्यूज़ है उसको इग्नोर करके गुफा में ही बैठे रहते। ब्रह्म साक्षात्कार करके 21 दिन में शरीर चला जाता। या तो फिर यदि अपनी बहन के ऊपर में इतना प्रेम है तो वह दौड़े-दौड़े कोलकाता चले आते हैं। अभी मां को तो सांत्वना देनी है। घर की भी परिस्थिति बुरी है। एक बहन ने यदि आत्महत्या की तो दूसरी ना करेगी इसका क्या गारंटी है? और यह सो तो सब था उनके मन में। तो दो चीज वो कर सकते थे। तो निर्विकल्प समाधि में ही और ज्यादा गहराई में चले जाते। कहेंगे कि ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या करके या तो फिर दौड़े-दौड़े कोलकाता चले आते। तो यह दोनों चीज नहीं करके उन्होंने सोचा कि यदि मेरी बहन की ही यह दुरावस्था है तो जगत में यह कोटि-कोटि बहनाएं हैं मेरी इनकी क्या दुरावस्था होगी। भारत में यह जो यह सतत एक तरह का पॉवर्टी हमारे सर के ऊपर में छाया हुआ है। यह हजार साल की यह जो तमस यह निद्रा में जो भारत देश सोया हुआ है। उसमें से भारत को जगाना होगा। भारतवासियों को नई दिशा दिखानी होगी। तो यह करुणा से पर्वश होकर के स्वामी जी अल्मोड़ा की गुफा में से हिमालय में से फिर से धरती पर आगमन किए। लिटरली एंड मेटाफोरिकली दोनों लिटरली हिमालय में से नीचे उतर के आए। मेटाफोरिकली वो स्पिरिचुअल हाइट से यह नॉर्मल प्लेन पे आए। और फिर भारत का भ्रमण करके उन्होंने धीरे-धीरे करके उपनिषदों की आत्मश्रद्धा का जो मैसेज है उसको फैलाने का शुरू प्रारंभ किया। तो यह करुणा है इसका भी हमको इनफ एग्जांपल मिलता है और

सात्त्विक सद्गुण : (4) दीनता

दीनता है। देखिए दीनता यह थोड़ा सा कॉम्प्लिकेटेड है। अभी ठाकुर के जीवन में दीनता को आप किस तरह से डिफाइन करेंगे? दीनता का अर्थ क्या? यह दीनहीन भाव है कि मैं कुछ नहीं हूं। मेरे से कुछ नहीं होने वाला है। मैं पापी हूं। मैं निकम्मा हूं। क्या इसका आप अर्थ करेंगे ना कि दीनता का अर्थ करेंगे हंबलनेस। इनफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स एंड हंबलनेस और ह्यूमिलिटी दो तरह के इसके अर्थ होते हैं। उसमें से यह दीनहीन भाव है। इस अर्थ में इसको नहीं लेना। इंफोरिटी कॉम्प्लेक्स के अर्थ में नहीं लेना क्योंकि रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर का जिसने ऊपर ऊपर से भी अभ्यास किया हो वो आपको स्पष्ट करके बता देगा कि हमारे लिटरेचर में किसी के भी जीवन में ठाकुर मां स्वामी जी ये 15 अन्य डायरेक्ट डिसाइपल या तो फिर यह जो उनके बाद की जो जनरेशन है यह महापुरुष जो सब रामकृष्ण संघ में जो प्रकट हुए हैं रंगनाथानंद जी हो ना कि भूतेशानंद जी हो शंकरानंद जी हो शुद्धानंद जी हो, विरजानंद जी हो, किसी के भी जीवन में आपको दीनहीन भाव नहीं दिखाई देगा। दीनता यानी कि ह्यूमिलिटी, हंबलनेस दिखाई देगी। किंतु यह इनफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स अपने पे ही डाउट करना मैं ही पापी हूं। मेरे से क्या होने वाला है? मैं तो इस तरह का भाव जो है आपको कभी नहीं दिखाई देगा। तो दीनता शब्द का ठीक-ठीक हमको अर्थ करना है। मिसअंडरस्टैंड नहीं करना कि ये खास करके ये क्रिश्चियनिटी में मैं पापी हूं वाला भाव कि आई एम अ सीनर और या तो फिर यह वैष्णव कुछ कुछ भाव है उसमें से कि मैं दीन हूं। मैं हीन हूं। मैं ईश्वर की करुणा के बिना मैं पूरा मैं नरक में जाऊंगा। इस तरह का भाव इस दीनता का नहीं है। इट्स सिंपल हंबलनेस, सिंपल ह्यूमिलिटी। ठाकुर का देखिए कि गुरुकर्ता बाबा अर्थात कि गुरु यानी कि वो गुरु कर्ता अर्थात कि टीचर और बाबा अर्थात कि कोई महापुरुष साधु। ठाकुर कहते हैं कोई मुझे गुरु करके पुकारता है, बाबा करते करके पुकारता है या कर्ता करके पुकारता है तो मुझे ऐसा लगता है जैसे कि मेरे देह में कोई कांटे चुभो रहा है। क्यों? क्योंकि इस तरह का भावना आपको घमंड की ओर ले जाता है। आप देखे ही होंगे इस तरह के लोगों को आपने कि बहुत ज्यादा नाम हो गया है। पॉपुलैरिटी बहुत हो गई है। बहुत सारे चेले चपाटे हो गए हैं। तो फिर अभी इस ये इस तरह के लोग घमंड के मारे चारों ओर घूमते हैं। तो आपने यह नवेल्स में भी इस तरह के चरित्रों के बारे में पढ़ा होगा, टीवी में भी देखा होगा, मूवीज में भी देखा होगा। इस तरह के लोगों की कमी नहीं है। थोड़ी सी भी सक्सेस यदि मिल जाती है तो सर में इस तरह की हवा भर जाती है कि फिर आप अपने को इस तरह से मानने लगते हैं जैसे कि मेरे अलावा इस जगत में कोई है ही नहीं। ठाकुर एक एग्जांपल देते हैं। आई डोंट नो कि यह एग्जांपल कितना ठीक होगा इस कॉन्टेक्स्ट में। फिर भी अभी मुझे याद आया है तो बताता हूं। वहां पर कामार पुकुर के साइड में ही गांव में ही एक स्त्री थी जो कि उसको शायद कोई अनुभूति हुई होगी। अभी यह उस समय की तथाकथित नीची जाति की स्त्री थी। वो लोअर कास्ट वूमन थी। उसको कोई अनुभूति हुई है और बहुत सारे लोग उसके पास में आते थे उसका आशीर्वाद लेने के लिए। तो उस वहां का जो जमींदार था वो यह देखकर के नाराज हो गया कि यह इस तरह की तथाकथित निम्न जाति की स्त्री ये उच्च तथाकथित उच्च जाति के उच्च वर्ण के लोगों को आशीर्वाद देती है और वे लोग भी इसके चरण स्पर्श करते हैं। यह तो बहुत बुरा है। जाति प्रथा यदि चली जाएगी तो जमींदार की जमींदारी जमींदार का यह जो ऑथॉरिटी यह सब तो खतरे में आ जाएगा। तो उसने क्या किया? एक दुष्ट आदमी को इस स्त्री के पास में भेज दिया। अभी देखिए कि यदि उस स्त्री को कोई अनुभूति सही में हुई होती तो उसके मन में ना कोई विकार प्रकट नहीं होते। उसके मन में यह दीनता, करुणा, सहिष्णुता वगैरह वह सब भाव खड़े होते। किंतु शायद ऐसा हो सकता है कि यह जो उच्च वर्ण वाले मेरे पैर छू के मुझे प्रणाम करते हैं। बोलकर के उसके मन में शायद घमंड प्रकट हुआ होगा। और इस घमंड की वजह से मन में कुछ ना कुछ शायद विकृतियां आई होगी जो भी है इसके बारे में ठाकुर तो बोलते नहीं मैं अनुमान करता हूं किंतु इसके बाद की जो घटना है वो बड़ी स्पष्ट है। ठाकुर कहते हैं कि इस दुष्ट चरित्र वाला जो व्यक्ति है उसके पल्ले में पड़कर के उसकी वो मायाजाल में फंस कर के यह स्त्री बाद में प्रेग्नेंट हुई थी और उसकी यह जो आध्यात्मिक शक्तियां थी सब खत्म हो गई थी। तो क्या है कि देखिए जब हमको कोई अनुभूति प्राप्त होती है तो मन में घमंड होता है कि मैं कोई एक चीज हूं। ठाकुर देखिए ठाकुर के जीवन में थोड़ा सा कंट्रास्ट किस तरह का कंट्रास्ट मास्टर महाशय को बीच-बीच में पूछते हैं। एक दो बार नहीं काफी बार पूछते हैं। पहली ही बार जब वो मास्टर महाशय के जो साथ में वार्तालाप हो रहा था। उसी समय ठाकुर पूछते हैं अच्छा कि तुम्हार आमा की की रकम मने होए। तुम मुझे किस तरह से देखते हो? मेरे बारे में तुम्हारी क्या धारणा है? क्या मैं मतलब ठाकुर पूछना चाहते थे कि मास्टर महाशय ठाकुर को अवतार के रूप में देखते हैं ना कि एक संत महापुरुष के रूप में देखते हैं? तो मास्टर महाशय उत्तर देते हैं। ठाकुर पूछते हैं मुझे कितना आना ज्ञान हुआ है? 12 आना 16 आना कितना ज्ञान हुआ है मुझे? तो मास्टर महाशय तो वह भी तो लिटरेचर के आदमी है ना। वह भी तो कोई कम आदमी नहीं है और नए-नए आए हैं। मन के संदेहों का अभी तो संपूर्ण रूप से भंग नहीं हुआ है। तो मास्टर महाशय कहते हैं कि कितना आना ज्ञान आपको हुआ है यह तो मुझे नहीं पता किंतु आपकी तरह की यह जो प्रेम है, करुणा है, ईश्वर के ऊपर में श्रद्धा है, यह चैतन्य महाप्रभु जिस तरह से उनके जीवन में थी, इस तरह की आपके जीवन में दिखाई देती है और किसी के जीवन में ऐसी मैंने देखी नहीं है। तो ठाकुर यह बात सुनकर के हंसने लगे, खुश हो गए। तो यह प्रसंग जब हम पढ़ते हैं तो हमको प्रश्न होगा कि क्या ठाकुर उनके मुंह से अपनी प्रशंसा सुनना चाहते थे क्या? किंतु नहीं ठाकुर में यह जो दीनता कहिए वो थी दीनता इस अर्थ में कि कोई उनकी प्रशंसा करें तो पसंद उनको नहीं होता था। किंतु यहां पर ठाकुर यह जो प्रश्न करते हैं वो किस अर्थ में करते हैं? क्योंकि अपने भक्तों को ठाकुर कैटेगरीज में बांटते थे। उसमें से कोईकोई भक्त ठाकुर को एक संत महापुरुष समझ करके उनके पास में आते थे और उनके पास में पास में से आशीर्वाद या शिक्षा या तो उपदेश या मंत्र दीक्षा ग्रहण करके वो चले जाते थे कि हां इसके आधार पर मैं अपना जीवन गठित करूंगा। कोई कोई हो सकता है कि ठाकुर को अवतार मान तो ले किंतु फिर अपने अवतार को अवतार स्वयं उनको जिस तरह से उनका जीवन ट्रांसफॉर्म करने को कह रहे हैं वह ट्रांसफॉर्म नहीं करेंगे। बस लीप सर्विस देते रहेंगे। हां ठाकुर अवतार है। ठाकुर अवतार है। किंतु फिर उस अवतार के आदर्श पे चल के काम कांचन त्याग नहीं करेंगे। जबकि यह थर्ड कैटेगरी हाईएस्ट कैटेगरी कि ठाकुर को अवतार स्वीकार करके ठाकुर के आदेशों का पालन करके अपने जीवन को परिवर्तित करें। तो ठाकुर यह देखते थे कि उनके बारे में इनकी क्या धारणा है। इस धारणा के ऊपर में से उनको पता चलेगा कि उनकी आध्यात्मिक प्रगति कितनी होने वाली है और इनको किस तरह से भविष्य में ट्रेन किया जाए। तो यह महिमा चरण मोस्ट प्रोबेबबली मास्टर महाशय ठाकुर चैतन्य महाप्रभु की अवस्था का वर्णन करके वो बार-बार इंगित कर रहे हैं कि उनके जीवन में भी इस तरह की घटनावली हुई है। अर्थात कि वह भी क्या एक अवतार है क्या? किंतु यह महिमा चरण मोस्ट प्रोबेबबली वही था वहां पे। तो वह इस बात में कोई ज्यादा एक्सेप्ट नहीं करता इस बात को या तो इस बात पर ज्यादा कोई वह मंतव्य प्रकट नहीं करता। तब मास्टर महाशय लिखते हैं कि देखिए कि ठाकुर ने इतनी हिंट दी है। इसके बावजूद यह जो भक्त है ठाकुर को सिर्फ एक संत महापुरुष ही मानता है। इससे आगे नहीं। तो यहां पे दीनता का क्या अर्थ है? ठाकुर यह नहीं चाहते कि आप उनको गुरु है या बाबा है या कर्ता है बोल के झूठमठ का सम्मान दें। ठाकुर चाहते हैं कि उनके भीतर में जो महाशक्ति है उसको समझ करके उसका स्वरूप समझ करके उसको ठीक-ठीक समझ करके आप अपना जीवन परिवर्तित करें। तो ठाकुर यदि परिचय भी देते हैं ठाकुर के जीवन का अंतिम पर्व आत्म प्रकाश से अभयदान तो यह कल्पतरु यदि रामचंद्र की लैंग्वेज में कहे तो ये कल्पतरु ठाकुर क्यों हुए क्यों अपनी सिद्धियों का अपनी शक्तियों का चमत्कार का प्रदर्शन किया इस इसलिए नहीं कि लोग उनको अवतार मान करके उनकी पूजा करें ठाकुर कहते हैं ना घरघर में इस फोटो की पूजा होगी बात यह नहीं है कि ठाकुर अपने फोटो की पूजा करवाना चाहते थे। बात यह नहीं है कि ठाकुर अपनी आध्यात्मिक शक्तियों का प्रदर्शन करवाना चाहते थे। यह बात है कि ठाकुर चाहते थे कि लोग उनकी बात सुनकर के अपने जीवन को परिवर्तित करें। यह काम कांचन के प्रति उनका मन सतत धावित हो रहा है। वहां से उसको वापस ले आ करके यह ईश्वर्य तत्व है। ईश्वर के प्रति शरणागति है, साधना है, त्याग है, ब्रह्मचर्य है। इस सब के प्रति उनका मन आगे बढ़े। यह ठाकुर चाहते थे। शक्तियों का प्रदर्शन सिर्फ अपने शिष्यों के जीवन को परिवर्तित करवाने के लिए नहीं कि अपने खुद को प्रशंसा प्राप्त करवाने के लिए। तो यह हो गया दीनता। दीनता एक ऐसा गुण है कि जिसके बारे में चर्चा करने के समय बहुत ही अलर्ट रहना है। दीन हीन होना, इनफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स में जाना ऐसा बिल्कुल नहीं। बस है कि झूठ-मुठ की प्रशंसा से दूर रहना। इस सेंटेंस के बारे में और भी थोड़ा सा चर्चा करेंगे अभी हमारे नेक्स्ट क्लास में। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ओम