Skip to transcript
ClassesSaradakosh

Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 9 Sep 2025

prayer

ओम स्थापकाायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा लिपिबद्ध द्वितीय खंड साधक भाव उसका प्रथम चैप्टर साधक और साधना इसका हम अध्ययन कर रहे थे। ऑलरेडी क्वेश्चन आंसर स्टार्ट हो गया है। सर्वभूत में ईश्वर दर्शन यदि जीवन का आध्यात्मिक जगत का सर्वोच्च सत्य है तो वह हमें क्यों प्रत्यक्ष नहीं होता? क्यों ज्यादातर लोग इस जगत को विभिन्न चीजों में बिखरा हुआ सा दिखते हैं। तो इसके बारे में जो प्रश्नोत्तरी प्रारंभ हुई शरद महाराज का उत्तर है कि हम सर्वभूत में ईश्वर दर्शन नहीं कर रहे हैं क्योंकि हम लोग भ्रम में पड़े हैं। तो जब शरद महाराज ऐसा कहते हैं तो सामने काउंटर क्वेश्चन हो ही सकता है कि आपने ऐसा कैसे कह दिया कि जो अल्पसंख्यक ऋषि है उन्हीं को जो दिख रहा है वह सत्य है और बहुसंख्यक या तो मेजॉरिटी जो लोग हैं पृथ्वी पे उनको जो दिख रहा है वह गलत यह बात आप कैसे कर सकते हैं इसका प्रारंभ प्रश्न का प्रारंभ हमने किया था शरद महाराज उसका उत्तर देते हैं कि बहुसंख्यक व्यक्ति जहां विश्वास करबे ताहाई जे सर्वदा शतो होइबे ऐन किछु नियम नहीं कि बहुसंख्यक लोग जो कहते हैं वही बात हमेशा सत्य होगी ऐसा कहना कोई आवश्यक नहीं है कोई जरूरी नहीं है कोई नियम नहीं है इस तरह का ऋषि यह यहां तक हमने कल डिस्कस किया था इसके के बाद का जो सेंटेंस है वह बड़ा ही इंपॉर्टेंट है। तो क्या कहते हैं शरद महाराज? पहले तो सेंटेंस भी बहुत लंबा है। इसको हम पढ़ेंगे उसके बाद में थोड़ा सा चर्चा करेंगे। क्या कहते हैं

साधना में सिद्धि प्राप्त करना ही है वेदान्त के सत्य होने का प्रमाण

महाराज? ऋषि दग प्रत्यक्ष शत बोलते छ कारण ओ प्रत्यक्ष सहाय तारा सर्वविद दुख होस्त होते मुक्त होइया सर्व प्रकार भय शून्य और चिर शांति अधिकारी होइया छिलेन ऋषियों ने जो सत्य प्रत्यक्ष किया था किया है करेंगे भविष्य में उस प्रत्यक्ष सहाय से उनके सर्ववि दुखों के हाथ से मुक्ति प्राप्त हुए हैं और सब तरह के भय भयों से शून्य हुए हैं। भय शून्य हुए हैं और चिर शांति के अधिकारी हुए हैं। कोई भी चीज सही है या गलत। तो अब जैसे कि इंग्लिश में एक कहावत है टेस्ट ऑफ पुडिंग इज इन ईटिंग। पुडिंग अर्थात कि यह पेस्ट्री या केक जैसा एक मिठाई होता है। तो उसका टेस्ट क्या है? के एक पुडिंग अच्छा बनाया है। केक या पेस्ट्री अच्छी बनाई है। कोई भी मिठाई अच्छी बनी है। उसका टेस्ट क्या हो सकता है? क्या मैं इसको मेजरमेंट इस तरह से करूंगा कि हां मैंने किसी वो वो मेजर करने का कोई डिवाइस आता है। उसका कंसिस्टेंसी देखता है। उसका कलर देखता है। उसका वेट देखता है। उसके ऊपर में कितना अच्छा डिजाइन है वह देखता है। आप देखेंगे बहुत बार हम आश्रम में जब भी क्रिसमस होती है तो एक दिन होता है कि आश्रम में केक पेस्ट्री वगैरह आता है तो जीसस के सामने बेलूर मठ में आपने शायद देखा होगा बहुत सारे सेंटरों में भी ऐसा होता है कि जीसस के सामने फोटो सजा करके बहुत विभिन्न तरह की केक है, पेस्ट्रीज है वह वगैरह रख देते हैं। तो वो देखकर के आपको लगेगा अरे वाह कितना सुंदर यह सब है। अभी यह सब जब वह जीसस को भोग लगा देंगे उसके बाद में किचन में जाएगा और फिर एक बड़े थाले में वैसे तो मैं रात को खाता नहीं हूं किंतु एक 24 दिसंबर क्रिसमस ई को मैं रात को खाने के लिए किचन में जाता था। मैं राजकोट की बात कर रहा हूं। बेलूर मटकी भी क्योंकि उस समय यह जो जीसस को भोग चढ़ाई हुई केक है, पेस्ट्रीज है वगैरह सब आता था। अभी होता क्या है कि रात को खाना तो लिमिटेड है और क्योंकि सुबह को उठना है तो अभी वह बड़ा सा थाले में वो जो परोसने वाले हैं वह विभिन्न तरह की केक है पेस्ट्री से लेकर के आएंगे तो अभी मैंने ठीक करके रखा है कि ज्यादा से ज्यादा दो ही पीस खाने हैं। दो विभिन्न केक के दो विभिन्न पीस खाने हैं। दो टेस्ट लेने हैं। किंतु थाले में है 10-15 टाइप की यह केक है। पेस्ट्रीज है। उसके डिफरेंट पीसेस रखे हुए हैं। तो उसमें से मैं कौन सा सिलेलेक्ट करूं? तो क्या हम सेलेक्ट करेंगे कि जिसका कलर अच्छा है, जिसके ऊपर में डिजाइन अच्छे से बनाया हुआ है, वह सब तो देख के हम पसंद करेंगे। किंतु जैसे ही हमने ऐसा एक सिलेलेक्ट करके खाना शुरू किया, हमको ऐसा लगा कि अरे यह वाला नहीं लेकर के मैंने दूसरा वाला लिया होता तो अच्छा रहता। अभी बगल में जो साधु लोग बैठे हुए हैं वे लोग भी अपना कोई ना कोई ओपिनियन देते रहते हैं कि अच्छा यह वाला खाओ यह वाला अच्छा है। कोई साधु कोई ब्रह्मचारी तो साधु लोगों का क्या है? शुगर वगैरह बड़ा वे लोग अलर्ट रहते हैं। किंतु ब्रह्मचारी लोग बड़े बड़े उत्साह से वो लोग भोजन करते हैं उस दिन। तो वे लोग कहेंगे महाराज जी आप यह वाला केक लीजिए। यह वाला केक का टेस्ट अच्छा है। कोई ब्रह्मचारी का आ गया नहीं यह वाला का अच्छा है। तो अभी क्या है कि प्रॉब्लम क्या होता है? मैंने यह तो ठीक करके रखा है कि दो ही पीस लेने हैं। है 10-15 नजर के सामने तो अभी दो पीस खा के यदि मुझे संतुष्टि नहीं मिली यदि ऐसा लगा कि अरे नहीं पिछले बार तो इससे भी ज्यादा अच्छा था टेस्ट इस बार का टेस्ट म पिछली क्रिसमस में जो केक खाई थी उसका टेस्ट इस बार से ज्यादा अच्छा था तो अभी क्या है कि मैं तीसरा पीस नहीं खा सकता क्योंकि नियम किया है मैंने कि सुबह को उठना है और वैसे शुगर कंट्रोल में रखना है म शुगर इंटेक कंट्रोल में रखना है वगैरह-वगैरह तो फिर क्या है कि वह नजर के सामने इतना सब केक पड़ा हुआ होने से भी वह मुझे उठकर के चले जाना पड़ता है और फिर मैं ठीक करता हूं कि नेक्स्ट टाइम जो है मैं क्या करूंगा? पहले तो ब्रह्मचारी लोग खाना शुरू करेंगे फिर मैं उनको पूछूंगा कि अच्छा भाई बताओ तो कौन सा टेस्ट वो ज्यादा अच्छा है। फिर जो ब्रह्मचारी बोलेगा महाराज इसका टेस्ट अच्छा है तो फिर मैं खाऊंगा उसको। उसका शेप देख के उसकी डिजाइन देख के उसका कलर देख के मैं नहीं ले लूंगा। तो यहां पर केक जो खाया उसका असली टेस्ट क्या है? वो टेस्ट नहीं कि उसका कलर बड़ा सुंदर है। उसके ऊपर में बहुत विभिन्न तरह की वो डिजाइन बनाई है। वो नहीं वो आने से जो टेस्ट मिलता है वो टेस्ट ही वो केक की असली पहचान है। नहीं कि शेप और कलर और डिज़ाइन। तो इंग्लिश में जो कहावत है टेस्ट टेस्ट ऑफ द पुडिंग इज इन ईटिंग। अर्थात कि यह पुडिंग बोलकर के जो मिठाई है उसका टेस्ट क्या है? वह खाने में। तो यहां पर भी शरद महाराज कहते हैं कि ऋषि मुनि जो आपको कहते हैं कि हां ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या जीवो ब्रह्मवना पर सर्वभूत में एक ही ईश्वर है। एक ही ब्रह्म है। तो आपको यह जो सब वाक्य है उसका टेस्ट सही-सही में कैसे करेंगे? आप 1000 तरह की फिलॉसोफी खोल के बैठ जाइए। एक फिलॉसोफी आपको एक डायरेक्शन में ले जाएगी। दूसरी फिलॉसोफी दूसरी डायरेक्शन में ले जाएगी। एक संत महापुरुष शायद हो सकते हैं एक आपको फिलॉसोफी दिखाए दूसरे दूसरे प्रकार का दर्शन दिखाए। तो वह सब वाक्य की विडंबना में जाने की वजह आप सिर्फ एक काम कीजिए। जिन ऋषि मुनियों ने यह कहा है कि हां ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या या तो फिर जीवो ब्रह्मव ना पर यह जगत में जो कुछ है ब्रह्म के अलावा कुछ नहीं है तो उनका आप जीवन देखिए देखिए कि आम आदमी जिस तरह से संसार की प्रताड़ना प्राप्त करता है संसार में जिस तरह से कष्ट प्राप्त करता है एक आम आदमी के सामने एक चैलेंज आ जाएगी तो कितना इजीली वह हताश हो जाता है। कितना इजीली वह डर जाता है। कितना इजीली वह निराश हो जाता है। कितना इजीली वह रिएक्ट करना शुरू कर देता है। उसके सामने आप ऋषि मुनियों को देखिए। बाहर से ऐसा लगेगा जैसे कि उनके पेट का पानी भी नहीं हिल रहा है। वह जैसे कूल थे हमेशा इंग्लिश वर्ड कूल। तो जैसे कूल कूल थे पहले से वैसे ही चैलेंज के सामने भी कूल होकर के रहते हैं। शांति से चैलेंज को एक्सेप्ट करते हैं। भगेडू नहीं है। यह एक बात याद रखनी है। चैलेंज छोड़कर के भाग नहीं खड़े होते हैं। एस्केपिज्म नहीं है। चैलेंज को फेस भी करते हैं। एट द सेम टाइम हृदय और मन संपूर्ण रूप से उनका शांत रहता है। तो इसीलिए शरद महाराज कहते हैं कि ऋषियों के जो प्रत्यक्ष किया है, ऋषियों ने जो अनुभव किया है, उसकी उपलब्ध उसका प्रमाण क्या है? उसका प्रूफ क्या है? तो प्रूफ है ऋषियों का जीवन। क्या है जीवन? उसका सर्व

साधना में सिद्धि प्राप्त होने के 4 प्रमाण

प्रकार भय शून्य। सब तरह के भय से शून्य हो गए हैं। सर्ववि दुखे हस्त होते मुक्त। सब तरह के दुखों के हस्त से दुखों के हाथों से दुखों के चंगुल से उन्होंने मुक्ति प्राप्त कर ली है और चीर शांति के अधिकारी यह देखिए तीन क्राइटेरिया उन्होंने दिए हैं। पहला तो है सब तरह के दुखों से मुक्त होते हैं। उसके बाद में है सब प्रकार के भयों से शून्य होते हैं। तीसरा है चिर शांति के अधिकारी होते हैं। और क्या कहते हैं एवं और निश्चित मृत्यु मानव जीवन शकल प्रकार व्यवहार चेष्टा दी एक उद्देशो संधान पया छ यह निश्चित मृत्यु मानव जीवन है उसमें जितने भी व्यवहार है जितने भी हमारे कार्यकलाप है उसके एक उद्देश्य का भी संधान प्राप्त किया है। चार उन्होंने क्राइटेरिया दिए हैं। उसमें से पहले तीन क्राइटेरिया के बारे में सोचते हैं। चौथा जो क्राइटेरिया है वो थोड़ा सा थोड़ा सा अटपटा है। बहुत ज्यादा नहीं किंतु थोड़ा सा उसको अलग तरह से देखना होगा। पहले जो तीन है वह तो ठाकुर का जीवन देखकर के हमको बड़ा ही सहज रूप से समझ में आ जाता है।

साधना में सिद्धि प्राप्त होने का प्रमाण : (1) सर्व दुःखों से मुक्ति

सर्वविद्ध दुखेर हाथ से मुक्त सब तरह के दुखों के हाथ से मुक्त हुए हैं। देखिए कि ठाकुर के भतीजे था भतीजा जो था अक्षय उसके मृत्यु के समय ठाकुर का आचरण देखिए। जिस तरह से उस बच्चे को ठाकुर स्नेह करते थे। उस तरह से आप अब यदि हम इस तरह से किसी को स्नेह करेंगे और उसका बिल्कुल युवावस्था में बाल्या अवस्था में मृत्यु होगा तो हमको कितना कष्ट होगा हमको कितना दुख होगा तो यहां पर ठाकुर वैसे तो एक थोड़ी और थोड़ी देर तक रोते हैं फिर किंतु कहते भी है कि इस तरह से मुझे कष्ट हुआ जैसे मेरे हृदय को जैसे गीला कपड़ा है उसको जैसे कोई सिकुड़ता है स्क्वीज करता है पानी निकालने के लिए तो कैसा कष्ट होगा? इस तरह का कष्ट यंत्रणा मुझे अपने हृदय में हुई थी। किंतु परक्षण ही उन्होंने हंसना भी शुरू कर दिया। क्यों? यह देख के कि यह सब कुछ मां काली की ही लीला है। मां काली जैसा चाहती है इस संसार में कठपुतली की तरह हम सबको नचाती है। कठपुतली की तरह हम सब लोग मां के आधीन होकर के रहते हैं। तो यह दुख जो है अत्यंतिक दुख है। नजर के सामने आने पर भी वह लोग निराश या हताश नहीं हो जाते। यहां पर हमको एक बड़ा ही फाइन डिस्टिंशन क्रिएट करना है। ऐसा नहीं है कि यह लोग जड़ है। ऐसा नहीं है कि लागणी शून्य है या तो फिर एक पशुवत उनका आचरण है। बहुत बार किसी किसी में हमको जड़ प्रकृति का कोई लक्षण दिखाई देता है। किसी का मृत्यु भी हुआ ना तो ऐसे लोगों को कोई दुख नहीं होता। कोई बड़ा प्रियजनों पर बड़ा कष्ट भी आ गया ना तो उन लोगों को लगता है वह उसी के लायक है। उसको भोगने दो। माने अपने पर कष्ट आता है तभी वे लोग रिएक्ट करेंगे। जब तक दूसरों पर कष्ट आता है वे लोग रिएक्ट ही नहीं करेंगे। मन में मन में हो सकता है कभी-कभी खुशी भी होगी। इस तरह के लोगों को हमने देखा होगा कहीं-कहीं पर दूसरों के कष्ट से खुशी होती है। तो इस तरह के तामसिक प्रकृति वाले लोगों की बात नहीं है। यहां पर सबसे पहले तो क्राइटेरिया सब तरह के दुखों से मुक्त होने के पहले जो क्राइटेरिया है कि दुख का अनुभव होना चाहिए। दुख का अनुभव नहीं होगा तो दुख से मुक्ति भी नहीं होगी। हम लोग जड़वत पशुवत राक्षसी तामसिक स्वभाव की बात नहीं हो रही है कि जहां पर जब तक मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है तब तक दूसरों को प्रॉब्लम होने दो कोई दिक्कत नहीं है। कोई आपत्ति नहीं है। इस तरह से नहीं पूरे विश्व संसार या तो फिर विश्व संसार छोड़ भी दीजिए। अपने जो प्रियजन है उनके प्रति उनका कष्ट देखकर के हमारे मन में यदि लागणी या सहानुभूति ना हो उनके प्रति एक स्नेह ममत्व प्रेम का भाव ना हो तो फिर आध्यात्मिक जीवन में हमने प्रवेश ही नहीं किया है। इसीलिए स्वामी जी बहुत बार कहते हैं ना कि तमस में से रजस में आना होगा। उसके बाद में सत्व में जाना है और उसके बाद में गुणातीत अवस्था में जाना है। यह तामसिक आदमी यदि ऐसा बोलता रहेगा कि मैं तो जड़ होकर के बैठा हूं। दूसरों के कष्ट मुझे अनुभव ही नहीं हो रहा है। बोलकर के मैं ब्रह्म ज्ञानी हो गया। ऐसा थोड़ी ना हम लोग मान लेंगे। जो आदमी घोर तामसिक है उसकी बात थोड़ी ना मानेंगे। आपको तो यह पूरी जो जर्नी है तमस टू रजस रजस टू सत्व वह वहां पर पार करके बाद में तो तुरय अवस्था में जाना है। बाद में तो गुणातीत अवस्था में जाना है। तो गुणातीत अवस्था का यह जो लक्षण उल्लेखित है कि सब तरह के दुख से मुक्ति तो यह पहले से ही यह क्राइटेरिया बंध गया है कि हम लोग सत में आ चुके हैं। सत्व में आकर के लोगों के कष्ट, लोगों के दुख, लोगों की जो यह जो है परिश्रम है वह देखकर के हमारे मन में करुणा उत्पन्न होती है। हम उनको यथासंभव सहाय करने का प्रयास करते हैं। यहां पर जब हम आ गए हैं, उसके बाद में यह गुणातीत अवस्था प्रारंभ होती है। इसके बाद में हम देखेंगे कि मेरे जो प्रियजन है उनको जो कष्ट मिल रहा है वो ईश्वर की ही इच्छा से यह सब कुछ हो रहा है। तो स्वामी जी का उदाहरण मां पिता पिताजी का मृत्यु हुआ। मां और भाइयों के लिए ना ही रहने के लिए जगह है ना ही खाने का कोई ठीक बंदोबस्त है। और यदि कुछ ठंडी गर्मी पड़ गया तो उस तरह के वस्त्रों का भी अभाव। रोटी, कपड़ा, मकान यही तो मनुष्य की बेसिक नेसेसिटीज है। अभी यही मां और भाइयों के प्रति स्वामी जी का प्रचंड स्नेह था। इसके बावजूद जब भी वो मां काली के पास में मांगने के गए कि मुझे क्या चाहिए? रोटी, कपड़ा, मकान दे दो मेरे भाइयों के लिए, मेरी बहनों के लिए, मेरी मां के लिए। तो बार-बार ज्ञान, भक्ति, वैराग्य, ज्ञान, भक्ति, वैराग्य यही शब्द उनके मुंह से निकले हैं। तो वह स्नेह था बोलकर के वह स्नेहातीत अवस्था में जाने का उन्होंने यह भाग्य प्राप्त हुआ है, ओपॉर्चुनिटी प्राप्त हुई है। वह परिश्रम करके स्नेह से स्नेहातीत अवस्था में गए हैं। यदि राक्षसी हृदय है, तामसिक हृदय है या तो फिर राजसिक हृदय है तो ऐसे लोगों का अपने खुद के प्रति ही ज्यादा से ज्यादा आकर्षण रहता है। वे लोग यही सोचते हैं कि जब तक यह पंचमहाभूत का मेरा देह है उसको सुख उपभोग मिलते रहे। जब तक इसकी वासनाओं की पूर्ति होती रहे तब तक जगत में जो कुछ होता है कोई फर्क नहीं पड़ता। ये ठाकुर कहते हैं ना वह एक व्यक्ति का उदाहरण देते हैं झाड़ू लगा रहा है तो किसी ने आकर के कहा अरे उसका मृत्यु हुआ तो झाड़ू लगा रहा है वो स्त्री ना पुरुष जो भी है उसने सोचा कि अच्छा यदि अभी दो तरह के रिएक्शन है जिसका मृत्यु हुआ है वह यदि उसका परिचित नहीं होगा तो वह बड़ा ही मुंह से तो दुख दिखाएगा झाड़ू लगाते लगाते अरे ये तो बहुत बुरा हुआ यह तो अच्छा आदमी था इस तरह का आदमी मर गया अरे रे क्या हुआ? ऐसा बोलकर के बोलता रहेगा, झाड़ू लगाता रहेगा। किंतु यदि यह परिचित स्नेह प्रिय व्यक्ति है तो फिर वह झाड़ू लगाना छोड़कर के जमीन पर बैठकर के विलाप करने लगेगा कि अरे बाप रे इसका मृत्यु हुआ। हाय रे क्या होगा? क्यों इस तरह के अच्छे आदमी के साथ ऐसा हुआ? तो दो तरह के रिएक्शन होते हैं। कोई भी ऐसा नहीं कहेगा मुंह से कि अच्छा हुआ मर गया। इस तरह के लोग भी होते हैं। किंतु इस तरह के लोगों के बारे में हम बात नहीं कर रहे हैं। तो ज्यादातर तो लोग वही कहेंगे मुंह से तो वही बोलेंगे। अरे यह तो बहुत बुरा हुआ। किंतु मुंह की बात मुंह पे ही रह जाती है। हृदय में नहीं जाती। जैसे ही हृदय में जाएगी तो कार्यकलाप बिल्कुल बंद हो जाएंगे। शोक की वजह से शोक के मारे कि अरे राम ऐसा हो गया। अरे भगवान क्या होगा अभी उसके जो पत्नी थी बच्चे थे वे तो अभी क्या होगा उनका? बोलकर के शोक होगा हृदय में। देखिए स्वामी जी को इस बात का अनुभव हो गया था। वैसे तो उनके बहुत सारे मित्र थे। किंतु जब पिताजी का मृत्यु हुआ और उस समय देखो कि जो उनके मित्र थे वैसा किसी ने उनको सामने से आकर के सहाय करूंगा। ऐसी कोई बात ही नहीं करता था। उस समय क्या हुआ था? कुछ-कुछ उनके मित्र थे जो कि बुरे रास्ते पर चले गए थे। तो उनको स्वामी जी के प्रति सहानुभूति प्रकट हुई थी। क्यों? क्योंकि कोई भी आदमी बुरे रास्ते पर जाता है तो या तो उसका चरित्र बहुत ही खराब होगा। इसकी वजह से जाएगा। संस्कार पूर्व जन्म के कहो ना इस जन्म के कहो जो भी है उसका अपब्रिंगिंग है बचपन है मां-पिताजी का नेगेटिव इन्फ्लुएंस है परिवारजनों का जो भी है एक बड़े ही बुरे संस्कार की वजह से या तो कोई जाता है या तो फिर कष्ट इस तरह का नजर के सामने आ जाता है कि कोई उसका लेजिटमेट उपाय नहीं दिख रहा है तब वे लोग बुरे रास्ते पर जाएंगे। तो जब स्वामी जी की ऐसी अवस्था हुई तो कुछ-कुछ मित्रों ने कहा जो स्वामी जी कहते हैं कि जिनको मैं बुरी चरित्र का बुरे रास्ते पर चले गए ऐसा मानता था वही कुछ लोगों ने वही कुछ मित्रों ने मेरे प्रति सहानुभूति जताई थी। तो यहां पे सर्वप्रथम जो सब तरह के दुखों से मुक्ति प्राप्त होती है उसका सबसे पहला क्राइटेरिया है कि सात्विक अवस्था में है। प्रियजनों के प्रति भी इन जनरल भी हृदय से उनके प्रति स्नेह है। हृदय से उनके प्रति करुणा है। वह होगी। उसी के बाद में ही यह गुणातीत स्नेहातीत करुणातीत अवस्था में हम जाएंगे। तभी हमको पता चलेगा कि अच्छा देखिए मैं जिसको स्नेह कर रहा था भले ही चाहे वह मेरा इतना प्रिय पात्र है किंतु ईश्वर ही है उसके भीतर में जो कि उसके भीतर में रहकर के यह सब कुछ करवाता है। तो यह हो गया सब तरह के दुखों के हाथों से मुक्ति। उसके बाद का क्राइटेरिया कहते हैं

साधना में सिद्धि प्राप्त होने का प्रमाण : (2) सब तरह के भय से मुक्ति

सब तरह के भय से सर्व प्रकार भय शून्य सब तरह से भय शून्य देखिए ठाकुर के बारे में कि जब भीतर में से यह भाव प्रकट होता था तो सामने कौन बैठा है कौन नहीं बैठा है वह चिंता नहीं करते थे वह सब फट करके उसके मुंह पर बोल देते थे वो एक जतिन कि कौन इसके घर गए थे ना वो किसी के एक बड़ा बड़ा आदमी आया वहां पे तो ठाकुर ने कहा तुम के राजा टाजा बोलते पार हो ना मैं तुमको राजा टाजा नहीं बोल पाऊंगा क्यों कनो शेटा मिथ्या होवे क्यों यह मिथ्या बात होगी और ठाकुर की बात भी सही है भले ही चाहे ठाकुर ने ऐसा कोई फॉर्मली हिस्ट्री का स्टडी ना किया हो वो बड़ा ही स्पष्ट रूप से समझते थे कि राजा उपाधि है वह कब प्राप्त होती है तो रघुकुल नीति सदा चली आई प्राण जाए पर वचन न जाए इस तरह की एक धर्म निष्ठा जो होती है प्रजा के प्रति एक लागणी होती है और खास करके यह विदेशी आक्रमणों के सामने सर झुका दिया और उनका दासत्व स्वीकार कर लिया ऐसा कभी ना हो तभी तो उसको राजा कहते हैं आजकल के उस समय के जो राजा थे वो राजा बने खिताब मिला था कंपनी उनको खिताब देती थी अर्थात कि यह पदवी देती थी राजा की क्यों ये लोग जो थे सबसे बड़े वो हितैषी थे ईस्ट इंडिया कंपनी के ब्रिटिश राज के सबसे बड़े वे लोग हिमायती थे या तो सबसे बड़े सपोर्टर थे। ऑन बिहाफ ऑफ ब्रिटिश राज। वे लोग कर वसूल करते थे, टैक्स उघराते थे। यह सब कुछ जितना अत्याचार ब्रिटिश राज जो करवाना चाहती थी जो वो सब यह राजाओं के माध्यम से होता था। तो जिसने अपना ईमान बेच दिया, जिसने अपना देश बेच दिया, जिसने अपना धर्म बेच दिया, क्षत्रिय धर्म तो उन लोगों को थोड़ी ना राजा-टाजा कह सकते हैं। तो किंतु क्या है इस तरह के धनी व्यक्ति को तो आप मुंह पर तो यह सब नहीं कह सकते। ठाकुर ने फटाक के मुंह पर कह दिया। रानी रासमणि वाला किस्सा तो बड़ा फेमस है। वो ठाकुर वो मंदिर में आई। ठाकुर को कहा गीत गाइए मां के तो ठाकुर गीत गा रहे हैं। यहां पे वो रानी रासमणि तो बिजी है ना। वो तो बड़ी धनपति थी। वो यहां पे मुकदमा चल रहा है। यहां पे कोर्ट केस चल रहा है। यहां पे यह प्रॉब्लम है। यहां पे यह है। यहां पे जमींदारी का यह है। वो आखिर आखिर में रानी रासमणि को मृत्यु तक माने आश्चर्य की बात है। दोनों तरह से आश्चर्य जब मृत्यु हुआ तो गंगा के किनारे पर ले गए। चारों ओर दीपमालाएं प्रकटाई हुई है। अभी एकाएक रासमणि बोल उठी कि अरे यह प्रदीप वगैरह बुझा दो। देखो कि मां स्वयं मुझे लेने के लिए आई है। तो ऐसा जब कहा तो हमको समझ में आता है कि देखिए कि मां काली के प्रति प्रचंड भक्ति होगी। तभी तो मां काली उनको स्वीकार करने के लिए उनको स्वर्ग लोक में ना जो भी है उनको मुक्ति दिलवाने के लिए मां काली स्वयं आई होगी। किंतु रासमणि के मुंह से कौन से शब्द पहले निकले पदो श पदो शई दिलेले नामा की होवे अर्थात कि यह जो जमींदारी खरीद की थी दिनाशपुर में दक्षिणेश्वर काली मंदिर को ठीक-ठीक चले इस अभी आजकल क्या है हम लोग एंडोमेंट फंड रखते हैं उस समय यह जमींदारी खरीद की जाती थी और जमींदारी में से जो टैक्स आता है हर साल उसमें से यह मंदिर वगैरह चलेंगे तो मंदिर के लिए जमींदारी तो खरीद की ₹3 लाख ना की ऐसा कुछ करके और हर साल उसके टैक्स में से मंदिर का खर्चा निकलना भी था किंतु रासमणि के मन में इस संपत्ति को जो देवोत्तर कर देना चाहिए वो देवोत्तर करने के लिए जैसे ही उसकी दो बच्चियां थी एक तो जगदंबा दासी छोटी थी और बड़ी थी पद्म पद्म मणि दास ने कि ऐसा कुछ पद्मा तो छोटी वाली लड़की ने वो साइन कर दी कि हां परिवार की ओर से मैं रानी रासमणि की बच्ची लड़की हूं और वैसे तो मैं उनकी वारसदार हूं किंतु इस करारनामा जो है एग्रीमेंट उसके ऊपर में मैं साइन करती हूं कि यह जो हमारी जमींदारी है वो काली मंदिर में देवोत्तर करके दे रहा है। अर्थात कि उसकी इनकम सिर्फ काली मंदिर के मेंटेनेंस में ही इस्तेमाल होगी। किंतु यह पद्ममणि जो है दासी उसने साइन करने से इंकार कर दिया था। तो रानी रासमणि के मन में आखिरी तक यह बात बनी रही थी और जब मां काली उनको स्वीकार करने के लिए आई मुक्ति देने के लिए आई जीवन के अंत में तो यही शब्द सबसे पहले निकले कि पदों ने साइन नहीं की है तो अभी क्या होगा अर्थात कि हमेशा हमेशा के लिए ये काली मंदिर के मेंटेनेंस की जो जमींदारी है प्रॉपर्टी है वह कोई ना कोई डिस्प्यूट में फंसी रहेगी तो यह बात इवन आखिर आखरी घड़ी में रासमणि के मन में थी। अभी आइडियली होना चाहिए कि देखिए उनकी भक्ति इतनी थी कि मां काली स्वयं उनको मुक्ति दिलवाने के लिए प्रकट हुई। यह तो एक बात है। दूसरा कि सांसारिक भावना भी इतनी प्रबल थी कि मुंह से सबसे पहले यही बात हुआ कि मेरी लड़की ने उसके ऊपर में साइन नहीं किया है। तो देखिए कि यह कंट्रास्ट था रानी रासमणि के जीवन में हमेशा। ऑन वन हैंड मां काली पर भक्ति भी है। ऑन दी अदर हैंड कि यह सांसारिक जो भी कुछ है सब उनके मन में घूम रहा था। तो ऐसा ही कुछ सोच रही होगी वो ठाकुर के सामने ठाकुर गीत गा रहे हैं और ऐसा कुछ सोचते-सचते वो वहां पर फूल पड़े थे। ये फूलों को इधर-उधर कर रही है। तो ठाकुर ने देखा और ठाकुर का तो है ना मन मुख एक करा। मन और मुख एक करना है। वाणी से जो बोलते हैं वह अपने मन में वही होना चाहिए। जो मन में है वही वाणी से बोलना है। तो ठाकुर ने जैसा ही देखा कि वैसे तो कहा है गान सुनना चाहती है किंतु हो बनकर बैठी है एब्सेंट माइंडेड अन्य मनस का तो देख के ही ठाकुर ने चांटा मार दिया उसके मुंह पर पटाख करके तो सभी उसके रक्षक वगैरह थे चौकीदार वह दौड़े-दौड़े आए ठाकुर को तो पीट ही देते हो सकता है मर्डर भी कर देते हैं किंतु रासमणि को पता है कि ठाकुर के भीतर में मां काली का आविर्भाव है ठाकुर के भीतर में सही सही में एक दैवी शक्ति विराजमान है बोल के फिर राजमणि ने कहा नहीं नहीं उनके ऊपर में इस तरह का अत्याचार करने की कोई जरूरत नहीं। तो बोलकर के ठाकुर उस दिन तो बच गए किंतु ठाकुर में क्या है ना ये प्रैक्टिकल सेंस नहीं है कि वो कब क्या बोलना है कब क्या नहीं बोलना है वो जो सच बात है फटाक करके मुंह पर बोल ही देंगे तो यह भय शून्यता सब तरह के भयों से शून्य किंतु देखिए ठाकुर का जो कंट्रास्ट भी कितना है वो जो कमर पुकुर जा रहे हैं पालकी में बैठकर के डकैत आ गए ठाकुर ने वो सब तरह के देवी देवताओं के नाम पुकारना शुरू कर दिए वो काली जगदंबा महावीर दुर्गा जो भी है म जो काम करें तो एक देखिए यहां पे भी ऐसा है कि भय शून्य होना अर्थात कि जड़ होने के बहुत सारे लोगों में भय नहीं होता है। ऐसा होता है ऐसा एक डिसीज भी है कि आप रास्ते पर जा रहे हैं। एकाएक आप रास्ता क्रॉस कर रहे हैं। एकाएक फुल स्पीड से सामने से कार आ रही है या वो ट्रक आ रही है तो फटाक करके अपना हृदय फट करके वह धबकने लगेगा और वन सेकंड में हम लोग जंप लगा के दूसरी ओर चले जाएंगे। क्योंकि क्या है इसको फाइट और फ्लाइट रिस्पांस कहते हैं। हमारे डीएनए में हमारी जो यह नर्वस सिस्टम है, अपना जो ब्रेन है, उसके भीतर में यह सब हार्ड वायर किया हुआ है। क्यों? क्योंकि जंगल में जब हम लोग शिकार करते थे, एकाएक सामने से शेर आ गया तो हम हमारे हाथ में यदि अस्त्र है, भाला है या तो फिर यह तीर है तो या तो हम उसका मुकाबला करेंगे और हाथ में अस्त्र नहीं है तो भाग खड़े होंगे। एक स्प्लिट सेकंड में हमको यह डिसीजन लेना है। तो यह सब हमारे भीतर में हार्ड वायर्ड ऑलरेडी है। तो अभी एक तरह का डिसीज होता है कि उसमें लोगों का यह फाइट और फ्लाइट रिस्पांस ना कि ये फियर वो होता ही नहीं है। वो वो पूरा जो एरिया है ना ब्रेन में वह बंद पड़ा हुआ है। तो वो तो एब्नॉर्लिटी है। उनको भय प्रकट करवाने के लिए उनको दवाई दी जाती है। अदरवाइज रास्ते पे जा रहे हैं। सामने से ट्रक आ रहा है तो फट करके विदिन स्प्लिट सेकंड वो जंप लगाना है वो नहीं लगा पाएंगे और एक्सीडेंट में मर जाएंगे तो इवोल्यूशन के लिए भय एक बहुत बड़ा एक आवश्यक गुणधर्म है क्राइटेरिया है तो जिनमें भय होता ही नहीं है जो एबनॉर्मल है ऐसे लोगों की बात नहीं है ठाकुर एशियस हो जाते थे नर्वस हो जाते थे हाजरा कुछ कहता था स्वामी जी कुछ कहते थे तो थोड़े टेंशन में आ जाते थे कि मां तुमने मुझे यह जो शब्द दर्शन दिखाया और नरेंद्र तो कहता है कि यह सब आपके मन की भूल है। हेलुसिनेशन है तो क्या यह नरेंद्र सही है? तुमने एक मुझे एक सरल भोला बालक जानकर के क्या तुमने मुझे मूर्ख बना दिया क्या? ऐसा बोलकर के वो नर्वस भी हो जाते थे। मां के पास में जाकर के प्रार्थना भी करते थे। यानी कि भय तो है भीतर में। नॉर्मल रिएक्शन है। उनका नर्वस सिस्टम, उनका डीएनए, उनका साइकोलॉजी, यह नॉर्मल मनुष्य का जिस तरह से काम करता है, उसी तरह से काम करता है। वही है कि ही हैड ट्रांसेंडेड दैट। यह जो नॉर्मल रिएक्शन है उसके परे चले गए हैं। तो अगेन जब हम यह कहते हैं कि सब तरह से भय शून्य है तो हमको यह समझना है कि भय तो है जड़ बुद्धि के नहीं है। मूर्ख नहीं है। किसी किसी को कोई लोग मूर्ख होते हैं। समझ में नहीं आता है कि बड़े आदमी के साथ में किस तरह से बात करना है। फिर ऐसे लोगों को हम लोग दूर ही रखते हैं। जब कोई बड़ा आदमी मिलने के लिए आता है। हमको यह डर लगता है कि मूर्ख की तरह कुछ बोल देगा तो बिना मतलब हम सबका नाम बिगड़ेगा। तो ऐसे लोगों को दूर ही रखो। तो क्या है कि इस तरह के वो जो मूर्ख है ऐसे लोगों की बात नहीं है। ठाकुर के नॉर्मल रिएक्शन था एंड ही हैड ट्रांसेंडेड इट। तो एक है स्वामी जी का तो पता ही है जगत प्रसिद्ध है कि वो टिकट चेकर था। उसको डांट दिया था। वहां पे वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में जाकर के वो खड़े होकर के बोलना शुरू कर दिए थे। वो वो एक कैसा है देखिए कि उनको कितनी बार सात ना आठ बार उनको बुलाया वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में नाइंथ सितंबर को अभी नाइंथ सप्टेंबर आ ही रहा है तो ये नाइंथ सप्टेंबर को उनको सात ना आठ बार बुलाया गया कि स्वामी जी आपका टाइम हो गया है आप आकर के बोलिए सब समय स्वामी जी इस बात को टालते रहे कहते रहे कि नहीं अभी नहीं बाद में अभी नहीं बाद में इस पहले इसका टर्न जाने दो पहले उसको बुला लो उसके बाद में मैं बोलूंगा तो प्रश्न हो सकता है कि क्या स्वामी जी भयभीत हो गए थे। स्वामी जी क्या नर्वस हो गए थे या तो फिर ठाकुर के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे थे जो भी है। इतनी बार तो उन्होंने टाला। फिर किंतु जब बोलना शुरू किए तो जैसे कि जीहवा पर सरस्वती स्वयं विराजमान है और इस तरह की वाणी छोटा सा भाषण किंतु इतने हजारों लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। तो यह शक्ति जो है वो आखिर में प्रकट हुई थी। भय शून्य होकर के बोले थे। किंतु पहले पहले शायद नर्वस थे। शायद ठाकुर के मां के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे थे। जो भी है वि इज अ नॉर्मल रिएक्शन एक्चुअली इतना घमंड नहीं था कि मैं अपनी शक्ति पर सब कुछ कर लूंगा। ऐसा नहीं है। ठाकुर की शक्ति से करना है। ठाकुर के आशीर्वाद की आदेश की प्रतीक्षा करनी है। सो एक नॉर्मल रिएक्शन है। उसके बाद में भय शून्य होना है। और है चिर

साधना में सिद्धि प्राप्त होने का प्रमाण : (3) शाश्वत शांति की प्राप्ति

शांति का अधिकारी। यह तो ऑफकोर्स ठाकुर मां स्वामी जी मां की ही बात ले लीजिए। मां कहती है कि देखिए दक्षिणेश्वर में नौबत में रहती थी तो ऐसा लगता था जैसे कि हृदय में आनंद का पूर्ण घट स्थापित किया है। इनस्पाइट ऑफ कि जितना भी कष्ट है छोटे से नहबत में रहना वहीं पर सोना है। वहीं पर ठाकुर के लिए आहार बनता है। वहीं पर सब कुछ करना है। इसके बावजूद मां जिस तरह के आनंद से वहां पर रहती थी वो शारीरिक कष्ट तो कम नहीं है बीमार हो जाती थी बार-बार ठाकुर का भी इतना सानिध्य प्राप्त नहीं होता था भक्तों के आपदार है जब कोलकाता से यह सब स्त्री भक्त आएगी तो उनके लिए आहार प्रस्तुत करना है पुरुष भक्त आएंगे उनके लिए भी आहार प्रस्तुत करना है सब कुछ मां करती है शारीरिक बीमारी भी बीच-बीच में लगी रहती है ब्लड डजेंट्री हो जाता है। जब जयराम बाटी जाती है तो पता चला कि घर में खाने को ही कुछ नहीं है। उनकी मां ने अपने बच्चों को अर्थात ही मां के भाइयों को अपने रिलेटिव्स के वहां पर रख के आई है। क्योंकि घर में ऐसा कुछ साधन ही नहीं है कि बच्चों की पढ़ाई लिखाई ठीक से करवा पाए। तो जय राम बाटी मां के घर जाती है तो खाने की समस्या वहां पर भी बीमार हो जाती है। रास्ते में पैदल चल के आती है वहां पर बीमार हो जाती है। दक्षिणेश्वर में बार-बार बीमार हो जाती है। इसके बावजूद मां क्या कहती है? हृदय में जैसे कि आनंद का पूर्ण घट स्थापित करके रखा है। तो यह जो आनंद है कष्ट में रहकर के भी आनंद अभी आप कहेंगे यह बिलियनर है। उसका लड़का है बड़े आनंद में रहता है। तो क्या इस तरह का आनंद चाहिए? नहीं। वो अभी क्या है कि उनको सब तरह की सुविधाएं उपलब्ध है। बीमार हो गए तो दुनिया के बेस्ट डॉक्टर अवेलेबल है। ठंडी गर्मी लग गया तो यह क्लाइमेट कंट्रोल यह घर है। गाड़ी है। एंटरटेनमेंट चाहिए तो दुनिया भर के टूरिस्ट प्लेस है। वहां पे पर्सनल जेट में बैठकर के वे लोग कभी यहां पे बैंकोंग चले जाएंगे। कभी यह पेरिस चले जाएंगे। कभी ये यहां पे चले आएंगे। वहां पे चले जाएंगे। तो क्या है कि अभी इन लोगों के पास में सब तरह की सुविधा है और आनंद में रहते हैं। ऐसा नहीं सुविधा हो या ना हो वो कोई प्रश्न नहीं है। सांसारिक जो कष्ट है वह तो स्वीकार करते ही है। इनस्पाइट ऑफ दैट इसके बावजूद यह लोग आनंद में रहते हैं। इसलिए कहते हैं कि चीर शांति के अधिकारी उनकी यह शांति है। वह उसके ऊपर में डिपेंड नहीं करती है कि आज अब मैं कुछ समय पहले न्यूयॉर्क टाइम्स में एक आर्टिकल पढ़ रहा था। एक ट्रैवल एजेंसी की या जो एक एजेंट है उसने यह आर्टिकल लिखा है। अभी यह ट्रैवल एजेंसी है वो मिलियनेर है, बिलियनर है उन लोगों के लिए जगत में यह जो विश्व प्रसिद्ध स्थान है पर्यटन स्थल वहां पर जाने का बंदोबस्त करती है यह ट्रैवल एजेंसी। तो उसका यह एजेंट वो एजेंट लिख रही है। वो एक लेडी थी वो लिख रही है ये मिलियनेियर जो होते हैं यह बिलियनर होते हैं। आपको ऐसा लगेगा कि ये लोग कितने मजे में रहते होंगे बाहर बाहर से। किंतु इनके साथ में आप काम करेंगे ना तो पता चलेगा यह लोग कंटीन्यूअस कंप्लेन करते रहते हैं। हर छोटी-छोटी बात में यह लोग कंप्लेन करते हैं। हमको यह नहीं मिल रहा है। हमको यह चाहिए। हमको वो चाहिए। उनकी डिमांड और उनकी कंप्लेन इन दोनों का कोई एंड नहीं है। तो देखिए कि इस तरह के वैभव और धन के मालिक होने के बावजूद यदि मन के भीतर में यह एक अभाव हमेशा बना रहता है तो फिर आपको क्या संतुष्ट कर सकता है? कुछ नहीं। यहां पर मां है कि इतने अभाव में रहकर के भी वह शांति से आनंद से रहती थी। अर्थात कि यह चीर शांति का अर्थ क्या है? चिर शांति हमको कब प्राप्त होगी? भले ही चाहे शारीरिक कष्ट हो ना कि शारीरिक सुविधा में रहे। दैहिक कष्ट हो ना दैहिक बीमारी हो ना कि हेल्दी हो। डज नॉट मैटर। हमारी शांति वही चीर काल की तरह एक ही धारा में बहती जाएगी। उसको कहते हैं चीर शांति का अधिकारी होना। तो इतने जो क्राइटेरिया है शरद महाराज कहते हैं। इसके बाद में जो

साधना में सिद्धि प्राप्त होने का प्रमाण : (4) निश्चित-मृत्यु मानव-जीवन में उद्देश्य की प्राप्ति

क्राइटेरिया है फोर्थ क्राइटेरिया वो थोड़ा सा कॉम्प्लेक्स है। क्या कहते हैं? निश्चित मृत्यु मानव जीवन शकल प्रकार व्यवहार चेष्टा दी एक उद्देश्य रो संधान पया छे निश्चित मृत्यु मानव जीवन के सभी प्रकार के जो व्यवहार और चेष्टा है उसके भी एक उद्देश्य का संधान प्राप्त हुए हैं। वो यक्ष प्रश्न फेमस कि जीवन का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है? तो युधिष्ठिर ने कहा कि मृत्यु जब अवश्यभावी है हम सबको जब पता है कि हम लोग मरने ही वाले हैं तो भी हम लोग बिहेव इस तरह से करते हैं कि हम लोग कभी नहीं मरने वाले। तो यह मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा आश्चर्य है। तो यहां पे जो जीवन निश्चित मृत्यु की ओर जा रहा है। उस जीवन के जितने भी कार्यकलाप है, इस जीवन की जितनी भी एक्शंस है, उसका एक उद्देश्य का संधान प्राप्त किया है। देखिए बहुत तरह के उद्देश्य हो सकते हैं इस जीवन के। हम लोग यदि यह सोचते हैं कि मैं अच्छे से जॉब करके अच्छी सी कैरियर बना करके अच्छा सा बैंक बैलेंस बना करके मेरे बच्चों को पढ़ाई लिखाई करवा करके उनका एक कैरियर बना करके जाऊंगा और उनको वारसे में इतनी धन संपत्ति देकर जाऊंगा तो मेरा जीवन फिर सफल हुआ। इस तरह से सोचने वाले लोग भी हैं। फिर इस तरह से भी लोग सोचते हैं कि कोई इस तरह से वर्ल्ड फेमस प्रोडक्ट बना देनी है। iPhone बना देना है। नया एक सॉफ्टवेयर बना देना है। एआई डेवलप कर देना है। साइंस की कोई नई थ्यरी डेवलप कर देनी है। जिससे कि मेरा नाम हमेशा के लिए अमर हो जाए। आइंस्टाइन है, न्यूटन है या जितने भी इस तरह के साइंटिस्ट है, इनोवेटर्स हैं, इनकी उनकी सेम पंक्ति में उनके सेम लेवल पर मेरा नाम बना रहे। इस तरह का उनके जीवन का एक उद्देश्य होता है। किसी किसी के जीवन का उद्देश्य होता है कि मुझे बहुत सारा पॉलिटिकल पावर चाहिए। पहले तो मैं चीफ मिनिस्टर बनूंगा। उसके बाद में प्राइम मिनिस्टर बनूंगा। उसके बाद में इंटरनेशनल लेवल पर मैं अपना पावर बढ़ाऊंगा। ऐसा तरह का इस तरह का भी जीवन का किसी किसी का उद्देश्य होता है। तो यह जो प्रश्न यह है ना कि हम लोग यह भूल जाते हैं कि जब मृत्यु समीप आएगा तो यह जो हमारा बैंक बैलेंस है, यह जो अपना इनोवेशन डिस्कवरी है या पॉलिटिकल पावर है ना कि अपनी जो कोई भी उपलब्धि है, सक्सेस है, फेलियर्स है, एक ही साथ में सब मिट्टी में मिल जाएगी। दूसरे जन्म में हम सिर्फ संस्कार लेकर के ही जाएंगे। स्मृति लेकर के नहीं जाएंगे। यह बात हम भूल जाते हैं। यह स्मृति अर्थात की मेमोरी इस जन्म की मेमोरी नेक्स्ट जन्म में नहीं जाएगी। सिर्फ इस जन्म के संस्कार ही जाएंगे। तो फिर मैं मेरे लिए क्या उचित है? मुझे मेमोरीज अच्छी चाहिए ना कि मुझे संस्कार अच्छे चाहिए। अच्छी स्मृति बनानी है कि हां, मैं वहां पर पर्यटन के लिए गया था। टूरिस्ट स्पॉट पे नॉर्थ पोल पे गया था। आजकल तो स्पेस टूरिज्म चलता है। तो मेरे पास में इतना पैसा है कि मैं स्पेस में जा सकता हूं। टूरिज्म एज अ टूरिस्ट हो के। मैंने स्पेसशिपिप में से मैंने पृथ्वी को देखा। स्पेसशिप में से मैंने चांद को देखा। स्टार्स देखे। बहुत अच्छी मेरी मेमोरी है। मैं प्राइम मिनिस्टर जब था या प्रेसिडेंट जब था तो इतने बड़े-बड़े धनपति लोग आकर के मेरे सामने वो नौकर की तरह खड़े रहते थे। मुझे इतना रिस्पेक्ट देते थे। वह संतोष जो है यह संतोष या तो फिर एोगेंस या तो यह जो सब मेमोरीज है वह तो मेमोरीज तो वहीं पर रह जाएगी। इसी जन्म में रह जाएगी। इस जन्म से अगले जन्म में नहीं जाएगी। क्या जाएगा? वह पोजीशन प्राप्त करके मैंने किस तरह के कर्म किए हैं। अच्छे कर्मों का अच्छा फल, बुरे कर्मों का बुरा फल। वही नेक्स्ट जन्म में जाता है। तो फिर जिसके भीतर में बुद्धि है वह सोचेगा कि मुझे स्मृति नहीं ले जानी है। संस्कार ले जाना है। अच्छे संस्कार आएंगे अच्छे कर्म करके। अच्छी स्मृति अच्छे कर्म करने से आएगी। कोई ठीक नहीं है। अच्छे कर्म करके अच्छी स्मृति बन सकती है। बुरे कर्म करके भी अच्छी स्मृति बन सकती है। आपने किसी पर अत्याचार किया उसका धन हड़प लिया तो फिर आपको लगेगा कि अरे वाह मैं बहुत खुश हो गया। ये मेरी बहुत अच्छी मेमोरी है। यह दूसरों के एक्सप्लइट किए हुए धन के ऊपर में मैं बहुत बड़ी होटल में जाकर के खाना खा रहा हूं। तो यह नेगेटिव कार्य करके पॉजिटिव स्मृति हमने खड़ी की है। किंतु संस्कार ऐसा कभी नहीं होगा कि बुरा कार्य करके अच्छा संस्कार बने। बुरा कार्य करके बुरा ही संस्कार बनेगा। अच्छा कार्य करके अच्छा ही संस्कार बनेगा। तो नेक्स्ट जन्म में जाना है संस्कार को नहीं कि स्मृति को। यह एक क्लेरिटी हो। यह क्लेरिटी इन लोगों को मिली है। जो निश्चित मृत्यु मानव जीवन है उसमें सब तरह के जो व्यवहार है, सब तरह की हमारी एकशंस है, सब तरह की हमारी चेष्टाएं हैं। उसके एक उद्देश्य का संधान प्राप्त हुआ है। मैं जो कुछ भी कर रहा हूं इस तरह से मैं करूं। मेरा उद्देश्य मेरे जितने भी व्यवहार है, मेरे जितने भी कर्म है, मेरे जितने भी वहीवट है, मेरा जितना भी जो कुछ भी है, उसका एक ही उद्देश्य हो कि सुसंस्कार मेरे मन पर पड़े। और यही सुसंस्कार मैं अपने नेक्स्ट जन्म में लेकर जाने वाला हूं और कुछ इस जन्म से जाने वाला नहीं। तो एक निश्चित मृत्यु मानव जीवन में एक उद्देश्य यह उद्देश्य उनको प्राप्त हुआ है। तो यह चार क्राइटेरिया शरद महाराज कहते हैं कि जब ऋषि मुनि यह कहते हैं कि ब्रह्म ही सत्य है। जगत में जो कुछ भी देख रहे हो वह नाम रूप का नाम रूप की लीला मात्र है। पीछे में तो वही ब्रह्म है। तो यह जब हम सोचते हैं, सुनते हैं और प्रश्न होगा कि यह जो ऋषि मुनि है यह गांजा चरस पी रहे थे ना कि और कुछ यह उनका मति भ्रम हो गया है। इस तरह से इसके लिए बोलते हैं। तो टेस्ट क्या है? तो टेस्ट है कि उनके जीवन में यह चार क्राइटेरिया दिखेगा। फिर से कौन सा चार क्राइटेरिया है? सब तरह के दुखों के हाथों से मुक्ति, सब तरह के भयों से मुक्ति, भय से मुक्ति, चिर शांति का अधिकारी होना। और यह निश्चित मृत्यु मानव जीवन में एक उद्देश्य की प्राप्ति होनी उद्देश्य निश्चित होना। तो यह चार क्राइटेरिया जिनमें होगा समझ लीजिए कि उनको सही-सही में ब्रह्म दर्शन हुआ है और वे लोग जो कह रहे हैं उसमें सही-सही सत्यता है। इसके बाद का जो सेंटेंस है वह भी इतना लंबा है और इसके ऊपर में भी इतना ही चिंतन करना होगा जो कि अभी हम कल करेंगे। आज ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: रानी रासमणि अपनी मृत्यु के समय जमींदारी के बारे में चिंतित हैं। इसे कैसे समझा जाए?

यहां पे क्या है ना कि ये कॉम्प्लेक्स मोटिवेशन होते हैं ना हम अपने खुद के कोई भी मोटिवेशंस को आप चेक करें तो कोई एक एक लाइन में ये मोटिवेशन नहीं जाते हैं तो मल्टीपल वो रीजनिंग होते हैं। अब यहां पे भी अब ठाकुर कहते हैं ना शास्त्र बालिते चीनीते मिशलाचे चीनी टुकुनी है वो अपना म बालिते शरिय दिए चीनी नहीं है अर्थात कि शास्त्र में शुगर और रेती दोनों मिश्रित है। रेती हटा करके वो शुगर ले लेना है। तो अपने मोटिवेशंस ना कभी 100% प्योर होते नहीं है। इस अर्थ में कि अह आ अब जब मैं पढ़ाई लिखाई करता हूं तो मुझे मैथमेटिक्स अच्छा लगता है इसलिए भी मैं पढ़ता हूं। मेरे मां-पिताजी यदि अच्छा मार्क्स आएंगे खुश होंगे यह भी एक मोटिवेशन रहता है। भविष्य में अच्छा कैरियर बने यह भी एक मोटिवेशन रहता है। आप यह नहीं कहेंगे कि मां-पिताजी की खुशी के लिए ही मैं पढ़ रहा हूं। या तो अच्छी कैरियर के लिए ही पढ़ रहा हूं। या तो प्रेम है मैथमेटिक्स में इसलिए पढ़ रहा हूं। आवर मोटिवेशंस आर नेवर सिंगल लाइन। वो मल्टीपल होते ही है। तो यहां पर भी जैसा आपने कहा कि वो उनकी पुत्री पर नाराजगी, मां का मंदिर ठीक से चले उसके लिए एक चिंता और इन जनरल एक सांसारिक पना और ठाकुर ने वैसे तो चांटा नहीं मारा ना। देखा कि उसके भीतर में संसारी पना है। माने वो बेचारी ट्राई कर रही है। देखिए वो ठाकुर का उदाहरण वो वो ये है ना स्क्विरल स्क्विरल दीवार पे चढ़ने का प्रयास कर रही है। किंतु पत्थर बांधा है पूंछ पे तो चढ़ने नहीं दे रही। तो ठाकुर ने सोचा चांटा मारूंगा तो शायद हो सकता है पत्थर टूट जाएगा वो चढ़ जाएगी दीवार पर जदी इफ इट इज पॉसिबल

प्रश्न: रानी रासमणि अपनी मृत्यु के समय जमींदारी की चिंता करती है ये आश्चर्यजनक है

देखिए मृत्यु के समय में तो यह सब कुछ फिर भूल जाना चाहिए आइडियली स्पीकिंग अब ठाकुर ने मृत्यु के समय में अब ठाकुर का खुद का देख लीजिए मां की चिंता वो अवश्य करते थे कोई प्रश्न ही नहीं है मां के लिए गहने बना दिए राम रामलाल को कहा कि तुम मां की ये जो है घर वो कामार पुकुर में रहेगी तो मां को हेल्प करना वगैरह सब कुछ किंतु जब मृत्यु आया तो जगदंबा को छोड़कर के और कोई नजर के सामने नहीं है। मां शारदा स्वामी विवेकानंद जो दो लोग उनके सबसे घनिष्ठ है उन दोनों की बात उनके मुंह पे नहीं है। फिर तो वो मां जगदंबा ही है। वो जो प्रेम स्नेह जो कुछ भी था वो पीछे रह गया। फिर मां ही मां है। है ना? तो वो तो आइडियल है ना। आपने मंदिर बनाया, मंदिर का कंसर्न है, सब कुछ है। किंतु जब मृत्यु आता है तो फिर सब भूल जाना चाहिए। वो मां पे ही छोड़ देना चाहिए। वो जो वही स्वामी जी की फेमस कहानी खीर भवानी जाकर के वो कहते हैं कि मैं यदि यहां पे होता तो मंदिर टूटने नहीं देता। तो मां ने कहा कि मंदिर बना है वह भी मेरी इच्छा से टूटा है वह भी मेरी इच्छा से। तो यह तो लेवल आना चाहिए ना आपके जीवन में। आप कौन होते हैं मंदिर बनाने वाले? आप कौन होते हैं मंदिर का मेंटेनेंस करने वाले? ना हो जाएगा। अभी देखिए हम मैंने यह उदाहरण को उसी कॉन्टेक्स्ट में कहा कि ब्रह्मज्ञानी का लक्षण क्या है? राइट? उस कॉन्टेक्स्ट में मैंने कहा है और इस कॉन्टेक्स्ट में मैंने कहा कि रासमणि इतनी एडवांस साधिका होने के बावजूद वह ब्रह्मज्ञान तक नहीं पहुंची थी। यही तो मैंने कहा ना ओम