prayer
जय राम बाटी में एक लड़का आया तो मां उसको पूछती है दीक्षा लेवी अर्थात दीक्षा ले लोगे क्या तो यह लड़का बोलता है मुझे पता नहीं मां कि क्या होती है दीक्षा क्या है ये सब तो मां कहती है ना ना दीक्षा ले ही लो ना अभी और क्या है अभी तो दीक्षा लेके ही जाओ देखिए कि और कितने ऋषि मुनि तपस्या करके भी जगदंबा की कृपा प्राप्त नहीं करते हैं और ऐसे कितने ही साधु भक्त हैं जो कि जाकर के मां को कितनी विनती करते हैं तब तब कहीं जाकर के मां दीक्षा देती है। एक गया था भक्त तो वहां पर मां के पास में जाकर बोलने लगा कि मां मुझे दीक्षा दो। तो मां ने एकदम स्पष्ट रूप से उसके मुंह पर कह दिया कि नहीं दीक्षा नहीं दूंगी या तो फिर ऐसा कुछ कहा होगा कि उद्बोधन में जाकर ले लो जो भी है। अभी वह भक्त इतना निराश हो गया कि वह फिर मां के दरवाजे के सामने जय राम भाटी गए होंगे तो देखा होगा कि मां का जो कमरा है वहां पे एक वरांडा जैसा है। तो वरांडे में बैठकर के उसने रोना शुरू कर दिया और इतना रो रहा है। इतना रो रहा है। मां बेचारी वहां अपने कमरे में अस्थिर हो गई। तो मां ने वह एक उनके जो त्यागी संतान है बुलाकर के कहा उस लड़के को बोलो चला जाए बिना मतलब यहां पर बैठे रो रहा है मेरे कमरे के सामने बोल दिया तो कि दीक्षा नहीं दोगी क्यों फिर अभी बिना मतलब रो रहा है तो बोलो उसको चला जाए तो अब यह त्यागी संतान ये जो वहां पर जो महाराज रहते होंगे साधु वो बेचारे गए तो सही इस लड़के को बोलने के लिए किंतु इतना हृदय तोड़कर के वह रो रहा है रो रहा है तो महाराज जी को बेचारे को कहने का भी साहस नहीं हुआ कि तुम जाओ अभी यहां से मां मना कर रही है यहां पर बैठ के रोने की तो वह बेचारे ऐसा सोच ही रहे हैं। तब मीन वाइल उन्होंने देखा कि मां ने अपने कमरे का दरवाजा वैसे तो बंद कर दिया था। किंतु थोड़ा सा खोल के जैसे एक छोटी बच्ची छुपके छुप के किसी को देखती है ना वैसे ही वो मां वो थोड़ा सा खोल करके वह रोते हुए लड़के को देख रही है। तो अभी वह महाराज जी को पता लगा कि हां अभी मां का हृदय पिघला है। अभी इसके ऊपर में कृपा करेगी। तो मां ऐसा करके थोड़ी देर तो देख रही है। किंतु फिर दरवाजा बंद कर दे रही है। फिर थोड़ी देर के बाद में यह त्यागी संतान को बुलाया। कहा कि अच्छा ठीक है। बोलो इस लड़के को कि दूसरे दिन सुबह को उसके दीक्षा दे वो जाएगी। तो देखिए कि यहां पे इस बेचारे को कितना रोना पड़ा? कितना रोना पड़ा। तब कहीं जाकर मां की कृपा हुई और यहां पर वह लड़का है। उसको यह भी नहीं पता कि दीक्षा क्या है? दीक्षा लेने की जरूरत है। मां के पास में से दीक्षा लेने का कितना प्राधान्य महत्ता है। कितनाेंस है। कुछ उसको बेचारे को नहीं पता। इसके बावजूद मां उसको सामने से कहती है कि दीक्षा लोगे क्या? दीक्षा लो ही लो ना। क्या है उसमें? मैं देती हूं, मैं कहती हूं ले लो। तो ऐसा करके देखिए कि कृपा के राज्य में वैसे तो ऊपर ऊपर से लगेगा कि कर्म का सिद्धांत कार्य करता है। किंतु ठाकुर का स्पष्ट रूप से कहना है कि ऐसा भी एक समय आ जाएगा। जबकि कर्म का सिद्धांत टूट जाएगा और ईश्वर की कृपा ही हमारे लिए सर्वस्व होकर रह जाएगी। ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री रामकृष्ण देव का जीवन चरित्र श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग इसका पाठ कर रहे थे लेखक है स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वितीय खंड साधक भाव और इसका प्रथम चैप्टर साधक और साधना जो हमारा पॉइंट चल रहा है दो तरह के साधन पथ है
ज्ञान मार्ग में तपस्या के अनुरूप फल मिलता है, भक्ति मार्ग में ईश्वर कृपा से.
नेति नेति और इति इति साधन पथ देखिए इसके बारे में हमारा जो कल परसों भी थोड़ा सा डिस्कशन हुआ भक्ति मार्ग और ज्ञान मार्ग इन दोनों में वैसे तो डिफरेंस बहुत है किंतु और एक जो डिफरेंस है यह जनरल ली हम लोग ज्ञान मार्ग को कर्म के सिद्धांत के अनुसार देखते हैं कि एक के बाद एक इंद्रियों के जो सुख और उपभोग है जिसके प्रति हमारा मन लालायित होता है उसको हमको त्याग करना है तो और जैसे-जैसे त्याग करते जाएंगे वैसे वैसे ही यह जो माया का जो पर्दा है वह क्षीण से क्षीणतर होता जाएगा ज्यादा से ज्यादा ट्रांसपेरेंट होता जाएगा और त्याग करके एक लेवल पर जब हम पहुंचेंगे देखेंगे कि जो माया का पर्दा है वह बिल्कुल ही टूट चुका है कट चुका है और जो अद्वय ब्रह्म वस्तु जो कि हमको माया के पर्दे के उस पार प्रतीत होती थी वह एक्चुअली हमारे ही हृदय में आकर के समासित हो जाती है। हमको ज्ञान होता है कि अहम ब्रह्मास्मि जीव ब्रह्म ऐक्य जो कि उपनिषद का प्रतिपादित विषय है। तो यह जो पूरा जर्नी जो है उसके लिए आपको त्याग करने होगा, साधना करनी होगी, तपस्या करनी होगी और जैसे-जैसे त्याग साधना तपस्या करते जाएंगे वैसे-वैसे ही देखेंगे कि ईश्वर प्राप्ति या तो फिर कहेंगे बेटर वर्ल्ड अद्वैत वेदांत के कॉन्टेक्स्ट में ब्रह्म साक्षात्कार ब्रह्म ज्ञान की ओर ज्यादा से ज्यादा आगे बढ़ेंगे। तो यह है कि जैसा कर्म वैसा फल। यदि हम विषयों की ओर दौड़ेंगे तो निश्चय है कि हम लोग ईश्वर या तो फिर ब्रह्म साक्षात्कार के रास्ते से पीछे पड़ जाएंगे और जितना ही त्याग तपस्या करेंगे उतना ही ब्रह्म साक्षात्कार पास और पास में आता जाएगा। अभी यहां पे इति इति साधन पथ या तो फिर जिसको भक्ति मार्ग कहते हैं देखिए कि यहां पर कृपा का सिद्धांत कार्य करता है। अद्वैत वेदांत में जनरली हम कर्म के सिद्धांत को पकड़ेंगे तो फिर यह भक्ति मार्ग में कहेंगे कृपा का सिद्धांत। यहां पे ठाकुर खुद कहते हैं कि जब कोई उनके पास में कोई ब्राह्मण भक्त ना वगैरह यह कोई आए तो ठाकुर ने और उन्होंने कहा कि और किसी साधु को वो मिलकर आए हैं। वह उनको कहते हैं कि सर्वप्रथम इंद्रिय इंद्रियों के विषयों का त्याग करो। उसके बाद में सब होगा। तो फिर ठाकुर उसके उत्तर में कहते हैं पता है यह सब ज्ञानी लोग हैं वेदांती लोग हैं। उन लोगों का कहना है कि बिना इंद्रियों के विषयों के त्याग के इंद्रिय सुख के त्याग के ज्यादा कुछ होगा नहीं। किंतु यदि हम ईश्वर के श्री पाद पद्म में अपने को संपूर्ण रूप से शरणागत कर दे तो फिर ईश्वर ही देखेंगे कि हमारे साथ में क्या होना है। आमी जंत्रो तुम जंत्री ठाकुर जैसे कहते हैं कि तुम हो यह गाड़ी चलाने वाली और मैं हूं गाड़ी। मैं हूं यंत्र और तुम हो इंजीनियर। तो क्या है कि यह शरणागति का रास्ता है। कृपा का रास्ता है। वह है इति इति मार्ग की मुख्य साधना। अभी ऐसा नहीं है कि इति इति मार्ग पर कर्म का सिद्धांत कार्य नहीं करता है। ऑब्वियसली है कि जितना ही आप अभी आप शरणागत होंगे तभी तो माने एटलीस्ट यह कर्म तो करना पड़ेगा शरणागत होने का। तभी तो इस कर्म का फल मिलेगा कि हां ईश्वर की कृपा। अभी किंतु ठाकुर इससे भी एक स्टेप आगे जाकर कहते हैं कि कृपा के राज्य में कोई नियम कानून नहीं है। अब मैंने इतना पुरचरण किया, इतना जप किया, इतना चढ़ावा दिया, इतना मैंने मंदिर का परिक्रमा किया, तीर्थ यात्रा किया, पूजा पाठ किया। यह सब कुछ किया। किंतु यह ऐसा नहीं है कि यह जो ₹50 दिया और यह 2 किलो आलू लेके आ गया जो भी मार्केट रेट है अभी आजकल तो इतना रुपया देने से इतना केजी आलू मिलता है। यह इस तरह का कोई ट्रांजैक्शन यहां पर नहीं है। हजार पुरश्चरण तपस्या या तो जप ध्यान करें। हो सकता है कि कुछ ना हो और हो सकता है कि ईश्वर किसी के ऊपर में इस तरह से प्रसन्न हो जाए कि उसके हाथ में सब कुछ जैसे कि पहले ही दिन थमा दे। जैसे कि ठाकुर ने वह छोटे बच्चे का उदाहरण देकर के कहा कि उस उसकी मां ने उसको नई धोती पहनाई है। तो वह पहन करके वह खुशी के मारे चारों ओर घूम रहा है। अभी आप जाकर कहेंगे कि अच्छा यह तो बड़ा सुंदर धोती है। आप मुझे दे दो तो आपको नहीं देगा। जििद करेगा कहेगा मेरी मां ने दी है मैं क्यों तुमको देने को जाऊं ऐसा करके घूमता रहेगा किंतु एकाएक उसके मन में ऐसी इच्छा हुई कि जो कोई मतलब अनजाना आदमी भी क्यों ना हो भिखारी ही क्यों ना हो उसने मांगी भी ना हो एकाएक उसके हाथ में धोती निकाल के थमा दी और निकल गया वहां से तो क्या है कि बच्चे की इच्छा आप डिमांड करेंगे तो नहीं देगा और कभी नहीं भी डिमांड करेंगे तो भी हाथ में दे देगा तो जय राम भाटी में एक
कृपा का राज्य है नियम-कानून से परे: माँ सारदा की अयाचित करुणा की कहानी
लड़का आया तो मां उसको पूछती है दीक्षा ने भी अर्थात दीक्षा ले लोगे क्या? तो ये लड़का बोलता है मुझे पता नहीं मां कि क्या होती है दीक्षा क्या है ये सब तो मां कहती है ना ना दीक्षा ले ही लो ना अभी और क्या है अभी तो दीक्षा ले ही जाओ देखिए कि और कितने ऋषि मुनि तपस्या करके भी जगदंबा की कृपा प्राप्त नहीं करते हैं और ऐसे कितने ही साधु भक्त हैं जो कि जाकर के मां को कितनी विनती करते हैं तब कहीं जाकर के मां दीक्षा देती है। एक गया था भक्त तो वहां पर मां के पास में जाकर बोलने लगा कि मां मुझे दीक्षा दो। तो मां ने एकदम स्पष्ट रूप से उसके मुंह पर कह दिया कि नहीं दीक्षा नहीं दूंगी या तो फिर ऐसा कुछ कहा होगा कि उद्बोधन में जाकर ले लो जो भी है। अभी वह भक्त इतना निराश हो गया कि वह फिर मां के दरवाजे के सामने जय राम भाटी गए होंगे तो देखा होगा कि मां का जो कमरा है वहां पे एक वरांडा जैसा है। तो वरांडे में बैठकर के उसने रोना शुरू कर दिया और इतना रो रहा है। इतना रो रहा है। मां बेचारी वहां अपने कमरे में अस्थिर हो गई। तो मां ने वह एक उनके जो त्यागी संतान है बुलाकर के कहा उस लड़के को बोलो चला जाए बिना मतलब यहां पर बैठे रो रहा है मेरे कमरे के सामने बोल दिया तो कि दीक्षा नहीं दोगी क्यों फिर अभी बिना मतलब रो रहा है तो बोलो उसको चला जाए तो अभी यह त्यागी संतान ये जो वहां पर जो महाराज रहते होंगे साधु वो बेचारे गए तो सही इस लड़के को बोलने के लिए किंतु इतना हृदय तोड़ के वह रो रहा है रो रहा है तो महाराज जी को बेचारे को कहने का भी साहस नहीं हुआ कि तुम जाओ अभी यहां से मां मना कर रही है यहां पर बैठ के रोने की तो वह बेचारे ऐसा सोच ही रहे हैं। तब मीन वाइल उन्होंने देखा कि मां ने अपने कमरे का दरवाजा वैसे तो बंद कर दिया था। किंतु थोड़ा सा खोल के जैसे एक छोटी बच्ची छुपके छुप के किसी को देखती है ना वैसे ही वह मां वो थोड़ा सा खोल करके वह रोते हुए लड़के को देख रही है। तो अभी वह महाराज जी को पता लगा कि हां अभी मां का हृदय पिघला है। अभी इसके ऊपर में कृपा करेगी। तो मां ऐसा करके थोड़ी देर तो देख रही है। किंतु फिर दरवाजा बंद कर दे रही है। फिर थोड़ी देर के बाद में यह त्यागी संतान को बुलाया। कहा कि अच्छा ठीक है बोलो इस लड़के को कि दूसरे दिन सुबह को उसकी दीक्षा दे वो जाएगी तो देखिए कि यहां पे इस बेचारे को कितना रोना पड़ा कितना रोना पड़ा तब कहीं जाकर मां की कृपा हुई और यहां पर वह लड़का है उसको यह भी नहीं पता कि दीक्षा क्या है दीक्षा लेने की जरूरत है मां के पास में से दीक्षा लेने का कितना प्राधान्य महत्ता कितनाेंस है कुछ उसको बेचारे को नहीं पता इसके बावजूद मां मां उसको सामने से कहती है कि दीक्षा लोगे क्या? दीक्षा लो ही लो ना। क्या है उसमें? मैं देती हूं, मैं कहती हूं ले लो। तो ऐसा करके देखिए कि कृपा के राज्य में वैसे तो ऊपर ऊपर से लगेगा कि कर्म का सिद्धांत कार्य करता है। किंतु ठाकुर का स्पष्ट रूप से कहना है कि ऐसा भी एक समय आ जाएगा। जबकि कर्म का सिद्धांत टूट जाएगा और ईश्वर की कृपा ही हमारे लिए सर्वस्व होकर रह जाएगी। तो यह दो रास्ते हैं। एक तो है कि आपको नियम कानून बना करके उसके भीतर में रह के एक के बाद एक विषयों का त्याग करना है। और दूसरा है कि ईश्वर के ऊपर में संपूर्ण निर्भर होकर रहना है। फिर ईश्वर जैसा कहे जैसा चाहे वैसा होगा। तो यह दो रास्ते नेति नेति और इति इति साधन पथ जिसको कि बेसिकली हम ज्ञान मार्ग और भक्ति मार्ग
एक साधक ज्ञानी हो न भक्त, त्याग तो उन्हें करना ही होगा.
कहते हैं। इसके बाद में किंतु शरद महाराज और एक इंपॉर्टेंट पॉइंट हमारे सामने रखते हैं। क्या कहते हैं कि देखिए आप ज्ञान मार्ग के पथिक हो ना कि भक्ति मार्ग के पथिक हो। संसार के बारे में जो आम लोगों की धारणा है उसको तो आपको त्याग करना ही होगा। उसके बिना आपका काम चलेगा नहीं। अर्थात कि संसारी लोग संसार के बारे में क्या सोचते हैं? उनके जीवन का लक्ष्य क्या है? तो वही है ना कि बिगर एंड बेटर एंड मोर। यानी कि और ज्यादा बड़ा कैरियर होना चाहिए। और ज्यादा पैसे होने चाहिए। और ज्यादा प्रतिष्ठा होनी चाहिए। तो यह जो कालचक्र है उसी में तो यह संसारी लोग फंसे हुए हैं। तो इस कालचक्र से किंतु आपको मुक्त होना होगा। इसके मुक्त हुए बिना जो कि घोर संसारी है जो कि घोर विषयों के मायाजाल में फंसा है उनके ऊपर में ना ही ज्ञान मार्ग तो छोड़ ही दीजिए। उस रास्ते पर जाने के लिए तो बेचारे कहां वो एक भोगी आदमी कहां एक ज्ञानी वह तो आसमान जमीन का फर्क है किंतु जो भोग में डूबा है उसके ऊपर में ईश्वर की कृपा होना भी बड़ा मुश्किल है असंभव नहीं देखिए
जीवन में एक बार ईश्वर की कृपा अवश्य आती है — धन्य वही हैं जो उस मौके का फायदा उठा लेता है
क्या है कि ईश्वर सबको लाइफ लाइन तो देते ही देते हैं बीच-बीच में ये जैसे वो पास पास खेलते हैं ना पास खेलने की रमत आती है तो वो दो ये होते हैं तो उसको आप फेंकेंगे ना दोनों को तो फिर जो नंबर आएंगे उसके अनुसार आपकी यह जो यह जो है कुटी जिसको वो एक के बाद एक आगे बढ़ेगी पासा जिसको कहते हैं तो आपको वह फेंकने होते हैं। कभी वन आएगा कभी टू आएगा कभी वह पूरा 8 10 आ जाएगा। तो जीवन का जो यह रमत है ना वह इसके पासा फेंकने की तरह है। एक बार तो कभी ना कभी आपको यह फुल नंबर आ ही जाएंगे। अर्थात कि क्या है कि यह जो भोगी है, कामुक व्यक्ति है, गुनहगार है, इवन टेररिस्ट है कि जो भी है मनुष्य देह धारण किया है तो कभी ना कभी हमारे सामने एक अपॉर्चुनिटी आएगा कि इस मार्ग को छोड़कर के अच्छे मार्ग पर जाने का। गिरीश घोष का उदाहरण तो सर्वजन विदित है। गिरीश कहता है कि ऐसा एक भी पाप नहीं है कि जो कि मैंने ना किया हो। किंतु जिस दिन ठाकुर के साथ में उनकी मुलाकात हुई उसी दिन देखिए कि देखिए इस तरह से तो ठाकुर के साथ में मुलाकात कितने लोगों की हुई होगी किंतु उन लोगों का जीवन तो परिवर्तित नहीं हुआ किंतु गिरीश घोष ही सेस दी अपॉर्चुनिटी अर्थात कि उसने यह मौका जब आया हाथ में तो मौके का फायदा उठा के उसने अपनी लाइफ को रीइजीनियर कर दिया रिफॉर्म कर दिया तो यह मौके तो वैसे ईश्वर सबको देते हैं। किंतु इस मौके का फायदा उठाने की एक जो कैपेसिटी है वह हम में होनी चाहिए। अर्थात कि ग्रेस जो है ईश्वर की करुणा जो है वह तो संसार में सबके ऊपर है। भले ही चाहे कितना ही बड़ा पापी कितना ही बड़ा लोभी ना कि कितना ही बड़ा गुनहगार क्यों ना हो। ऐसे कितने ही भयावह पाप उसने ना किए हो। उसके जीवन में एक तो अपॉर्चुनिटी आएगा अपने को रिफॉर्म करने की। पाप के रास्ते से अपने को मोड़ करके पुण्य के रास्ते पर ईश्वर प्राप्ति के रास्ते पर चलने की। होता क्या है कि ज्यादातर लोग इतने मूड हो चुके हैं कि उनको यह अपॉर्चुनिटी शायद दिखती नहीं है और यदि दिखती है तो उसका लाभ उठाने की एक जो कॉमन सेंस होनी चाहिए वह इनमें होती नहीं है। जबकि 1% लोग इवन महापापी होने के बावजूद जब अपॉर्चुनिटी सामने आती है तो पता नहीं कहां से उनके भीतर में अपॉर्चुनिटी का लाभ लेने की एक क्षमता प्रकट हो जाती है। अभी आप कह सकते हैं कि यह क्षमता प्रकट करना भी तो ईश्वर के ही हाथ में है। वह भी तो ईश्वर की करुणा की ही निशानी है। तो जो भी है यह एक अनंत डिबेट है कि हमारे पास में अपना खुद का एक विल पावर है कि नहीं। हमारी खुद की एक क्या कहेंगे कि एक कैपेसिटी है कि नहीं। अपने खुद के हिसाब से कार्य करने की एक इंडिविजुअलिटी कहो ना कि पुरुषार्थ करने की क्षमता ना कि जो भी है। यह एक अनंत डिबेट है। क्या मैं संपूर्ण परवश हूं? जो भी ईश्वर कराते हैं वही मैं करता हूं ना कि मेरा खुद का एक रिस्पांसिबिलिटी है मेरे जीवन के बारे में अपने को रिफॉर्म करने के बारे में वो एक अनंत डिबेट है इसका अंत पता नहीं कैसे आएगा कब आएगा किंतु इतना तो हम कह सकते हैं कि आप कितने ही चाहे पापी तापी क्यों ना हो एक बार तो ईश्वर की करुणा का आस्वादन आपको जीवन में मिलने ही वाला है। फिर उसको लेकर के आप अपने जीवन में आगे बढ़े। वह आपके हाथ में जैसे वह ठाकुर उदाहरण देते हैं ना वह जो छिप होता है वह जो एक प्रकार का समुद्र में समुद्र का प्राणी तो उसके भीतर में रेती का एक दाना गिरता है। फिर यह जो है कि उस दाने को लेकर के समुंदर की सतह पर जाकर बैठ जाता है और उसके बाद में उसके आसपास में वो एंजाइम्स वगैरह सीक्रेट करता है। तो फिर कुछ समय के बाद में जब बाहर आएगा और वह जो शेल जब ओपन होगा तब पता चलेगा कि वह रेती का एक दाना है वह अभी मोती में परिवर्तित हो गया है। तो क्या [नाक से की जाने वाली आवाज़] है कि यह रेती का दाना यानी कि ईश्वर की करुणा का एक बीज हम सबके हृदय में कभी ना कभी प्रस्फुटित होता ही है। उसके बाद में टू से द अपॉर्चुनिटी उस ओपोरर्चुनिटी को पकड़ करके उसमें आगे बढ़े ना बढ़े वो अपनी क्षमता के ऊपर में है। अपनी क्षमता भी और बाद में कहे तो ईश्वर की करुणा भी। तो देखिए कि ईश्वर की करुणा सबके जीवन में है। नेति नेति इति इति कर्म अर्थात कि मैं जितना मेहनत करके त्याग करूंगा वही होगा। यहां पर ईश्वर की करुणा हमको आगे बढ़ने में सहाय करेगी। किंतु दोनों रास्ते में आपको यह जो सांसारिक विपर्य जो है सांसारिक यह जो प्रलोभन जो है उससे तो आपको मुक्त होना ही होगा। यदि आप उससे मुक्त होने का ईश्वर आपको एक अपॉर्चुनिटी देंगे। भले ही चाहे सांसारिक प्रलोभन में बहुत डूबे हो ईश्वर एक अपॉर्चुनिटी अवश्य देंगे। इस ओपोरर्चुनिटी का लाभ उठा के हम बाहर आ सकते हैं। तो जो भी है क्या कहते
नित्य-परिवर्तनशील और निश्चित-मृत्यु मानव जीवन में जगत की अनित्यता का ज्ञान सहज ही उपस्थित होता है
हैं महाराज? जगत संबंध उल्लेखितो स्वार्थ पर भोग सुक लखो साधारण धारणा परिहार के इ शास्त्रों वैराग को बोलिया निर्देश करिया छे जगत के बारे में उल्लेखित स्वार्थ पर अर्थात कि स्वार्थ से परिपूर्ण भोग सुख लख जिसका कि लक्ष्य भोग और सुख के प्रति ही है। इस तरह की साधारण धारणा के परिहार को ही परिहार अर्थात कि त्याग को ही शास्त्र वैराग्य बोलकर के निर्देश करते हैं। तो यह हो गया वैराग्य की डेफिनेशन। उसके बाद में क्या कहते हैं? नित्य परिवर्तनशील निश्चित मृत्यु मानव जीवन जगोते अनित्यता ज्ञान सहज आश्या उपस्थित होय। यह जो नित्य परिवर्तनशील निश्चित मृत्यु मानव जीवन है उसमें जगत की अनित्यता का ज्ञान सहज रूप से ही आकर के उपस्थित होता है। सुंदर शब्द सब नित्य परिवर्तनशील यह जगत कैसा है? तो सतत बदलता रहता है। इवन हम लोगों में भी देखिए हम लोगों को अपने बचपन की यादें बातें याद करने का बड़ा एक अच्छा लगता है। क्यों? बचपन में हम लोग फिट होते थे। बचपन में हमको बड़ों का लाड प्रेम मिलता रहता था। जो डिमांड करेंगे मां-बाप मां-पिताजी जो है वो फटाफट लाकर के वह फुलफिल करेंगे। हमको प्रेम से रखेंगे। बड़े होने से क्या है कि सब रिस्पांसिबिलिटी अपने सर पर हैं। अभी हमको रिस्पांसिबल होना है दूसरों के लिए। तो क्या है कि यह ट्रांसफॉर्मेशन है। जगत में भी आता है। हमारे जीवन में भी आता है। तो यह संसार है नित्य परिवर्तनशील है। दूसरा है निश्चित मृत्यु। और इस संसार का क्या कैरेक्टरिस्टिक है? तो निश्चित मृत्यु। ऐसा कोई नहीं है इस संसार में कि जो कि हमेशा के लिए जिए। जो कि हमेशा के लिए हेल्दी एंड पावरफुल होता रहे। भले ही चाहे वह अमेरिका का प्रेसिडेंट हो ना कि चाहे ही वह ट्रिलियनर हो। आजकल तो ट्रिलियनर बनना शुरू हो गए हैं। तो वो ट्रिलियनर हो ना कि अमेरिका का प्रेसिडेंट हो ना कि कोई बहुत बड़ा युद्ध का सेनापति हो ना कि कोई राजा महाराजा हो ना कि वो बड़े पॉप स्टार ना ये लोग हो। मृत्यु तो सबके जीवन में है। ऐसी कोई मेडिकल टेक्नोलॉजी अभी तक नहीं आई जो कि हमको हमेशा के लिए जिंदा रखने में मदद करें। हां, अभी यह जो नई-नई टेक्नोलॉजी जिस तरह की है कि अपनी कॉन्शियसनेस को वो फिर माइक्रोपर में अपलोड करना फिर वो सब ये अभी पता नहीं कितना सफल होगा कितना नहीं होगा। फिर उसमें माइक्रोपर में अपलोड की हुई हमारी कॉन्शियसनेस को आप जीवित भी बोलेंगे ना कि वह एक तरह का एलएलएम ही होगा। वह तो अभी ठाकुर जाने पता नहीं। किंतु एज ऑफ नाउ निश्चित मृत्यु मानव जीवन यह पक्का है। उसमें इस तरह के जीवन में जगत की अनित्यता का ज्ञान सहज से सहज रूप से आके उपस्थित होता है। तजन जगत संबंधीय साधारण धारणा त्याग कोरिया नेति नेति मार्गे जगत कारण अनुसंधान कोरा प्राचीन जुगे मानबेर प्रथमे उपस्थित होया छिलो और इसीलिए जगत के जगत संबंधीय अर्थात कि जगत के संबंध में जगत के बारे में जो साधारण धारणा है उसका त्याग करके नेति नेति मार्ग से जगत कारण का अनुसंधान करना प्राचीन युग में मनुष्य के सामने प्रथम ही उपस्थित हुआ था। बोलिया बोध होए लगता है कि ऐसा ही हुआ था। जगत यदि अनित्य है। जगत की जो भी चीजें हैं वह सब नश्वर है। मृत्यु हम सबके जीवन में है। कल हम खुश थे तो आज दुखी है। आज दुखी है तो कल और ज्यादा खुशी होंगे। खुशी होंगी। ऐसा यह जो हंसी, खुशी, सुख, दुख, हास्य, अश्रू, यह जो दिन और रात जिस तरह से परिवर्तन होते हैं, वैसे ही हमारा मन जो है हमारे मन की यह जो सब इमोशंस है, भाव जो है हमारे मन के, वह तो परिवर्तित होते ही रहेंगे। तो इस तरह के परिवर्तन से बेटर है कि मैं जगत को त्याग करके मैं त्याग का रास्ता अपनाऊं और इस नित्य परिवर्तनशील जगत के परे जाकर के अपरिवर्तन क्या है? अपरिवर्तनशील अद्वय पदार्थ क्या है? उसका मैं अनुसंधान करूं। जगत में यदि मृत्यु है तो यह मृत्युमय जगत के परे मृत्युंजय कोई है कि नहीं? जगत यदि परिवर्तनशील है तो इस जगत के परे अपरिवर्तनशील अचल अटल निष्क्रिय इस तरह का कोई अद्भुत तत्व है कि नहीं इसका मैं अनुसंधान करूं यह बात हम सबके मन में उदित होती ही होती है और इसीलिए जगत त्याग करके जगत मिथ्या है जगत असत्य है यह जगत है स्वप्नवत है इस तरह का नेति नेति मार्ग मनुष्य के सामने सहज रूप से आकर के उपस्थित होगा। यह तो हम समझ सकते हैं श्री जन इसीलिए भक्ति और ज्ञान उभय मार्ग समकाले प्रचलित थाकिले ओ भक्ति पथेर शपल विभाग संपूर्ण परिपुष्टि होइबार पूर्वे ही उपनिषदे ज्ञान मार्ग सम्यक परिपुष्टि होबा देखते पावा जाए इसीलिए भक्ति और ज्ञान दोनों मार्ग है एक साथ में प्रचलित हुए तो थे किंतु भक्ति मार्ग के जितने भी विभाग है उसकी संपूर्ण परिपुष्टि होने के पहले ही उपनिषद के ज्ञान मार्ग की सम्यक परिपुष्टि हमको देखने को मिलती है। जगत परिवर्तनशील है, अनित्य है, मृत्युमय है। तो इसके परे अपरिवर्तनशील, मृत्युंजय ऐसा पदार्थ कौन सा है? यह यदि मुझे खोजना है तो सबसे पहले मुझे जगत के साथ में पूरा नाता तोड़ना होगा। यह तो एक लॉजिकल कंक्लूजन बनता है। और यह इस तरह के लॉजिकल कंक्लूजन लाने वाले जो लोग जो होंगे उनका मन और बुद्धि भी तो प्रचंड तीव्र होगा। उनकी संकल्प शक्ति भी बहुत ही दृढ़ होगी। बोल के उन्होंने जगत का त्याग करके इंद्रियों का संयम करके ज्ञान मार्ग अपनाया और सतित आनंद अपना सही स्वरूप जो है उसकी प्राप्ति की। तो यह लॉजिकली हमको ऐसा लगता है कि यह मार्ग जो जिस तरह से संपूर्ण विकसित होना था उसकी यह जो फिलॉसोफिकल अंडरस्टैंडिंग है, उसकी जो थ्योरेटिकल फ्रेमवर्क है, उसकी जो साधन पद्धति है, यह सब कुछ पहले डेवलप हो गया। जबकि एक ईश्वर है। अभी ईश्वर का स्वरूप कैसा है? इसके उसको लेकर के दुनिया भर के मतमतांतर उसके बाद में पहले तो पत्थर या तो फिर यह पहले तो हम किसकी आराधना करते
सत्ययुग – शान्त भाव, त्रेतायुग – दास्य भाव, द्वापरयुग – मधुर भाव
थे? जैसे ये नेचुरल फोर्सेस है। बिजली गिरती है, बारिश होती है। अग्नि जो आग लगती है, फिर ये जल है, यह पृथ्वी है, यह वायु है। इस तरह के जो देवता है या तो फिर फोर्सेस ऑफ नेचर जिसको कहेंगे प्रकृति की शक्तियां प्रकृति के यह परिबल उसको हम पहले आराधना करते थे। इस आशा में कि अग्नि की आराधना करेंगे तो यह दावानल जो होता है फॉरेस्ट फायर या तो और कुछ वह आकर के मेरे घर को खा नहीं जाएगा तो उसकी आराधना करेंगे यह जो इंद्र देवता की आराधना करेंगे वृंदावन में जैसे कि इन्होंने देखा कि यह इंद्र की आराधना नहीं करने से फिर इतना बारिश बरसाया इतना बारिश बरसाया इस आशा में कि यह सभी गोप गोप बालिकाएं जो है सब भस जो है जो सब है कि वो फ्लड में सब तैर के चले जाएंगे मर जाएंगे किंतु भगवान कृष्ण थे कि जिन्होंने सबकी रक्षा की तो पहले तो हम इस तरह की कराल सब शक्तियों की आराधना करते हैं इस आशा में कि यह शक्तियां हमको परेशान ना करें। किंतु इसके बाद में धीरे-धीरे करके प्रेममय ईश्वर की आराधना होनी शुरू हुई। यह जो भगवान कृष्ण और इंद्र की जो कहानी है इट्स अ परफेक्ट इलस्ट्रेशन कि किस तरह से ईश्वर की भय के मारे जो आराधना करते थे उनको अभी हम प्रेम से आराधना करते हैं। तो यह भय के देवता और प्रेम के देवता यह जो ट्रांसफॉर्मेशन है उसमें तो जाने में हमको थोड़ा सा समय लगा। उसके बाद में प्रेममय ईश्वर या प्रेममय ईश्वरी उनकी आराधना करने के लिए जो विभिन्न भावों की ये एक के बाद एक इवोल्यूशन हुआ डेवलपमेंट हुआ उसमें भी समय लगा। शुरू शुरू में ऋषियों का शांत भाव था। इसके बाद में सुदामा या महावीर हनुमान का सख्य भाव या तो दास्य भाव था। किंतु बाद बात बादबात में आप देखिए कि राधा रानी का भगवान कृष्ण के प्रति मधुर भाव प्रकट हुआ। मां यशोदा का यह भगवान कृष्ण के प्रति मातृभाव प्रकट हुआ। तो जो कि ये मातृभाव है। महा यह जो मधुर भाव है जो कि भाव की परी माने वो सर्वोच्च परिपूर्णता जहां पर पहुंचती है। वह धीरे-धीरे करके हुई। यदि हम अपने हिंदू धर्म के इतिहास को तीन हिस्सों में बांट दें। एक पहला हिस्सा है यह उपनिषदों का युग। दूसरा है कि रामायण का युग। तीसरा है भगवान श्री कृष्ण का महाभारत का युग। तो देखेंगे कि भाव किस तरह से डेवलप हुए। सबसे पहले उपनिषद वेद की वैदिक युग में ऋषियों का शांत भाव था। इसके बाद में देखेंगे कि रामायण में खास करके हमको यह दास्य भाव की परिपूर्णता देखने को मिलती है महावीर हनुमान में। अभी जब भगवान कृष्ण का युग प्रारंभ हुआ वो सतयुग फिर यह त्रेता युग भगवान राम का और फिर यह भगवान कृष्ण का द्वापर युग। तो यह द्वापर युग में हमको आखिर में मां यशोदा का मातृभाव और राधा रानी का हमको मधुर भाव देखने को मिलता है। तो देखिए कि इतना लंबा समय लगा कि अदर वाइज देखिए कि जहां तक नेति नेति मार्ग से इंद्रियों के संयम करके ब्रह्म ज्ञान सतचित आनंद ब्रह्म साक्षात्कार प्राप्त करने का जो मार्ग है वह तो सतयुग में ही ऋषि मुनियों ने खोज निकाला था। किंतु यह मधुर भाव या तो फिर महाभाव है। वहां तक आते-आते हमको यह द्वापर युग लग गया। त्रेता युग में भी सतयुग में भी यह बात हुआ नहीं समाप्त। फिर त्रेता युग में भी हुआ नहीं। आखिर में द्वापर युग तक हमको आना पड़ा यह महाभाव या तो मधुर भाव की परिपूर्णता प्राप्त करने के लिए। तो यहां पर इसलिए महाराज लिखते हैं कि वैसे तो सतयुग में यदि देखें उपनिषदिक युग में देखें कि ज्ञान और भक्ति वैसे तो हमको दोनों साथ में दिखता तो है किंतु बहुत बार भक्ति के पीछे एक तरह का भय रहता है कि यदि यह इंद्र की आराधना नहीं करेंगे तो इस तरह का संकट हमारे जीवन में खड़ा होगा। यदि इस देवता को तर्पण ना कि यह जो भी उसका प्राप्य है वह नहीं देंगे तो हमारे जीवन में इस तरह की मुसीबत खड़ी करेगा। तो एक भय के मारे भक्ति वहां पर हमको थोड़ी बहुत दिखती है। ये ब्रह्म साक्षात्कार ब्रह्म ज्ञान वाला मार्ग संपूर्ण रूप से विकसित हो तो गया है किंतु भक्ति के मार्ग में थोड़ा सा भय दिखता है। और इसीलिए उसके बाद में ये त्रेता युग और फिर द्वापर युग में भक्ति की परिपूर्णता मधुर भाव या तो फिर महाभाव में होती हुई दिखती है। इसीलिए महाराज कहते हैं कि भक्ति विभाग के सभी भक्ति पथ के सभी विभागों की संपूर्ण परिपुष्टि होने से पहले ही उपनिषद में ज्ञान मार्ग की सम्यक परिपुष्टि होती हुई देख सकते हैं। अच्छा तो यह हो गया वैराग्य या तो फिर त्याग के बारे में शरद महाराज को जो कहना है। किंतु अभी देखिए कि स्वामी जी के जो कंप्लीट
स्वामी विवेकानंद - “मृत्यु भी मुझे भयभीत नहीं कर सकता”
वक्स है उसमें से एक सुंदर पैसेज मैंने कलेक्ट किया है। कॉस्मोस माइक्रोकोजम स्वामी जी का जो यह प्रवचन था जिसका हमने ऑलरेडी पाठ किया है। मैं जब राजकोट में था तब यह पूरा प्रवचन हमने देखा था। इस प्रवचन में से एक पैसेज जो है मैं यहां पर थोड़ा सा पाठ करता हूं। देखिए कि यहां पर वैसे तो स्वामी जी बात कर रहे हैं पुनर्जन्म की कि हमको ऐसा क्यों नहीं होता कि पहले पहले के जितने जन्म है उन सबकी यादें इस जन्म में नहीं आती। प्रॉब्लम यही है कि देखिए वैसे ही तो अपनी जो मेमोरी है वह शॉर्ट है। कल क्या खाना खाया था बहुत बार आज हम भूल जाते हैं। तो फिर पिछले जन्म में क्या खाया होगा क्या किया होगा वो कैसे याद रहेगा। किंतु फिर भी साथ-साथ में ही हमने यह भी देखा था कि मेमोरीज शायद यह एक जन्म से दूसरे जन्म नहीं जाती। किंतु संस्कार का जो लेखाजोखा है वह अवश्य इस जन्म से उस जन्म तक जाता है। तो यह हमने स्पष्ट रूप से देखा था। संस्कार माने आप संस्कार को भूलना चाहे। चलो मेमोरी को तो हम भूल गए। किंतु मैं यह भी चाहता हूं कि मैं संस्कार को भी भूल जाऊं। जो झूठ-मूठ के जो संस्कार मिले थे पहले पहले जन्म में मैं चाहता हूं कि उसको भी भूल जाऊं। किंतु संस्कार को भूलना आसान नहीं है। यह जैसे कि आप एक रेती में एक ड्राइंग करते हैं तो रेती में ड्राइंग करने से आपने ऐसा करके किया तो फटाक करके मिट गया। किंतु आप अपनी नोटबुक में वो पेन से ड्राइंग करते हैं। तो यह पेन से किया हुआ ड्राइंग इसको इरेज़ करना आसान नहीं होता। उसके लिए फिर आपको यह स्पेशल केमिकल है या तो यह स्पेशल इरेजर है उसको लेकर के मेहनत करनी होगी। तो रेती में बनाया हुआ ड्राइंग वो हमारी मेमोरीज है और फटाक करके वो आप इसको इरेज कर सकते हैं। किंतु यह पेन लेकर के नोटबुक में किया हुआ ड्राइंग यह हमारे संस्कार है और इसको काटने के लिए आपको तपस्या करनी पड़ेगी। तो यह जो सब डिस्कशन था स्वामी जी का चल रहा था। इसी सिलसिले में स्वामी जी क्या कहते हैं? ऑलदो वी हैव सीन दैट इट इज नॉट नेसेसरी फॉर द थ्यरी दैट देयर शैल बी द मेमोरी ऑफ पास्ट लाइफ्स येट एट द सेम टाइम वी आर इन अ पोजीशन टू असर्ट दैट देयर आर इंस्टेंसेस व्हिच शो दैट दिस मेमोरी डस कम। अच्छा यह जो पुनर्जन्म की थ्यरी को एस्टैब्लिश करने के लिए स्वामी जी जो सब आर्गुममेंट देते हैं और पुनर्जन्म की थ्यरी क्यों सही नहीं है इसको लेकर के जब यह आर्गुममेंट होती है कि आपको पहले जन्म की बात याद है खास करके ये क्रिश्चियनिटी वेस्टर्न यूरोप यूरोप और अमेरिका यहां पे जो स्वामी जी गए थे और पुनर्जन्म का सिद्धांत बता रहे थे तो ये लोग सबसे पहले वही आर्गुमेंट करते थे कि कहां स्वामी जी यदि आप कहते हैं कि हमारा यह जो जन्म है वह पिछले लाखों लाखों जन्म की श्रृंखला में एक जन्म है और भविष्य में और पता नहीं कितने लाखों जन्म होने वाले हैं। तो फिर आप यह तो बताइए कि इसके पीछे का लॉजिक क्या है। मैं यह तो समझ सकता हूं कि आज का जो मेरा दिन है वह अकेला दिन नहीं है। क्योंकि मुझे पता है कि मेरे पिछले कितने ही दिन गए हैं। मुझे बचपन से लेकर के बहुत सारी स्मृतियां मेरे मन में पड़ी हुई है। यह एक बात है। दूसरा कि मैं बहुत सारे वृद्ध लोगों को पहचानता हूं। अर्थात कि मैं जब धीरे-धीरे करके मेरा जो एजिंग होगा, मेरी यह जो उम्र बढ़ती रहेगी, तो मैं उनके जैसा वृद्ध होऊंगा। यानी कि भविष्य है वह मुझे लॉजिकली समझ में आता है और भूतकाल जो है उसकी तो मेरी मेमोरी ही है। यहां पर आप जो पुनर्जन्म के सिद्धांत की बात कर रहे हैं ना ही मुझे पहले के जन्म की कोई मेमोरी है ना ही भविष्य में जन्म होंगे। इसका कोई लॉजिकल उत्तर मिलता है। तो इसको लेकर के स्वामी जी कहते हैं कि देखिए पुनर्जन्म का सिद्धांत जो है उसको प्रूव करने के लिए यह नेसेसरी नहीं है कि आपको पिछले सब जन्म की मेमोरी चाहिए। होने से अच्छा है किंतु कोई आवश्यक नहीं है। वी आर इन ए पोजीशन टू असर्ट दैट देयर आर इंस्टेंसेस व्हिच शो दैट दिस मेमोरी डस कम। स्वामी जी कहते हैं कि कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि पहले जन्मों की मेमोरी एकाएक अपनी नजर के सामने फ्लैश हो जाती है। एंड दैट ईच वन ऑफ अस विल गेट बैक दिस मेमोरी इन दैट लाइफ इन विच ही विल बिकम फ्री। ऐसा होगा कि पिछले पिछले जन्मों की मेमोरीज जो है एकाएक इस जन्म में कभी ना कभी फ्लैश हो जाएगी। अब यह कैसा है पता है? मैंने तो ऐसे किसी को देखा नहीं इस तरह की बात करते हुए ना ही भक्त ना ही साधु कि उन्होंने कभी कहा हो कि मुझे मेरे पिछले जन्म की कोई बात याद आई है किंतु यहां पर अगेन यह मेमोरी को एक्चुअल मेमोरी नहीं गिन के यदि संस्कार गिने तो देखिए कि यह जन्म मृत्यु जरा व्याधि का चक्र हमारे साथ में बार-बार होता ही आ रहा है। प्रत्येक जन्म में हमको संसार की अनित्यता है। वह तो हमको दिखाई ही दी है। प्रत्येक जन्म में जो गए हैं हमारे प्रत्येक जन्म में हमने सुख भोग इंद्रियों के विषय रसास्वादन करने के लिए मेहनत तो बहुत किया है किंतु ज्यादातर समय देखा है कि जितना मेहनत की है उतना परिणाम नहीं मिलता। दूसरा कि जो परिणाम मिलता है वह आज हमको अच्छा लगता है तो कल वहां पर कोई दुर्घटना हो जाएगी। सब कुछ जैसे कि खत्म हो जाएगा। मेहनत करके पढ़ाई लिखाई करके बड़ा सा कैरियर बनाया। अच्छा सा कैरियर उसमें से बड़ा मकान लिया। बड़ी सी गाड़ी ली। 10 लोगों की प्रशंसा प्राप्त की। यह सब हुआ। एकाएक पता चला कि अपना कोई एक प्रियजन है। उसका मृत्यु हो गया। या तो फिर पता चला हम ही को इतना भयानक रोग हो गया है कि अभी जीवन भर इससे कष्ट पाना होगा। यह जो पैसा वगैरह जो कुछ था कुछ भी इस कष्ट से हमको बचा नहीं पाएगा। तो यह जो डिजास्टर जो है दुर्घटनाएं जो है प्रत्येक जीवन में प्रत्येक लाइफ में हमने देखी है वो जो लाखों लाखों हमारे जो जीवन गए हैं लाखों लाखों लाइफ्स जो कि हम जिए हैं सब समय इस तरह की डिसअपॉइंटमेंट इस तरह के फ्रस्ट्रेशन इस तरह के डिसपेयर हमारे सामने आकर खड़ी हुई है और यह जो डिस्पेयर है डिसअपॉइंटमेंट है। उसने हमारे संस्कारों पर एक गहन छाप छोड़ी है। तो स्वामी जी कहते हैं कि यह जो डिस्पेयर जो है एकाएक इस जीवन में हमारे सामने आकर खड़ी हो जाती है। इवन यंग लड़का भी होगा जिसने कि अभी तो जीवन का सुख या दुख देखा ही नहीं है। एकाएक उसके मन में वैराग्य का भाव प्रकट हो जाएगा कि नहीं मुझे यह सब नहीं चाहिए। ठाकुर की वह फेमस कहानी कि राजा का एक लड़का है। अपने मित्रों के साथ में खेल रहा है। तो वह एकाएक कहता है मैं धोबी बनता हूं। तुम लोग मेरी पीठ के ऊपर में कपड़े धो। इस तरह का खेल खेलते हैं। तो राजा के लड़के के मन में एकाएक ऐसी बात कैसे कहां से आ गई कि वह धोबी होना चाहता है। किंतु फिर देखिए कि पिछले जन्म में वह धोबी होगा। इसने कपड़े धोए होंगे बोलकर के। इवन जो इस जन्म में उसने कुछ ना कुछ सुकृति की होगी बोलकर के ही तो इस जन्म में राजा के लड़के के रूप में जन्म मिला है। किंतु जो धोबी के संस्कार जो है वो कभी ना कभी तो एक बार तो दिखाई देंगे। बोलकर के राजकुमार होने के बावजूद वह कहता है कि मैं धोबी का खेल खेलना चाहता हूं। तो यह जो संस्कारों की छाप जो है हमारे मन के भीतर में इतनी गहराई पूर्वक चली जाती है कि यह संस्कार कभी ना कभी बाहर आ जाएंगे। जीवन के प्रति वितृष्णा, जीवन के प्रति वैराग्य, जीवन में यह जो भोग की चीजें हैं, उसके प्रति वितराग यह सब कभी ना कभी तो हमारे सामने आकर उपस्थित होगा ही होगा। तो यह एक बात दूसरी बात बड़ा ही इंपॉर्टेंट स्वामी जी कहते हैं कि देखिए यदि आप प्योर मेमोरीज की भी बात करते हैं ना कि मैंने इस दिन क्या किया था क्या खाना खाया मैंने कौन सा कर्म किया था मैं कौन था क्या था मेरे परिवारजन कौन थे इस तरह की जो जनरल मेमोरीज की भी बात करते हैं ना वो भी हमारे सामने आकर उपस्थित होगी कब होगी जो कि हमारा आखिरी जन्म होगा भगवान बुद्ध की फेमस घटना कि निर्वाण प्राप्ति से पहले उनकी नजर के सामने से जैसे चलचित्र चलता है ना मूवी जैसे चलती है उनके जितने भी पुराने जन्म थे पिछले जन्म थे सबकी बात उनके नजर के सामने एक के बाद एक आती गई और जितने भी संस्कार बने थे प्रत्येक घटना के वो संस्कार कटते गए और फिर आखिर में जब आखिरी संस्कार कट गया तब कहीं जाकर के उनको निर्वाण प्राप्ति हुई। तो स्वामी जी कहते हैं कि दो तरह से पिछले जन्म की बात हमको याद आती है। एक तो जो एकदम गहराई में संस्कार के रूप में बन के बैठी है। एकदम गहराई में जीवन के प्रति जो डिसअपॉइंटमेंट बनके जो बैठी है वह कभी-कभी बाहर आ ही जाएगी। एकाएक वैराग्य का अटैक होगा ही होगा हमारे ऊपर में और फिर आखिरी जन्म जब होगा तब हमको यह सब याद आएगा। देन अलोन यू विल फाइंड दैट दिस वर्ल्ड इज बट ए ड्रीम। तभी तुमको पता चलेगा कि यह जगत स्वप्न मात्र है। देन अलोन यू विल रियलाइज इन द सोल ऑफ योर सोल दैट यू आर बट एक्टर्स एंड द वर्ल्ड इज अ स्टेज। तभी तुमको पता चलेगा अपने हृदय के अंतरतम में इन द सोल ऑफ योर सोल कि आप लोग सिर्फ एक्टर है और यह जगत है, स्टेज है, रंगमंच है और हम सब अभिनेता हैं। देन अलोन विल द आइडिया ऑफ नॉन अटैचमेंट कम टू यू विद द पावर ऑफ थंडर। और तभी एक विज वज्रपात की तरह यह वैराग्य का विचार वैराग्य हमारे मन में आकर के उपस्थित होगा। देन ऑल दिस थस्ट फॉर एंजॉयमेंट दिस क्लिंग ऑन टू लाइफ एंड दिस वर्ल्ड विल वेनिश फॉर एवर। और तभी यह सब इंद्रियों के सुख भोग के प्रति हमारी तृष्णा है। वह यह जो जीवन को पकड़ कर के रहने की इच्छा है जीजीविषा और यह जगत स्वयं वह हमेशा के लिए वेनिश हो जाएगा। अदृश्य हो जाएगा। देन द माइंड विल सी क्लियरली एस डे लाइट। हाउ मेनी टाइम्स ऑल दिस एकिस्टेड फॉर यू। और फिर दिन के उजाले की तरह स्पष्ट रूप से हम देखेंगे कि पहले कितने जन्म में यह सब हमारे सामने आकर के उपस्थित हुआ है। हाउ मेनी मिलियंस ऑफ टाइम्स यू हैड फादर्स एंड मदर्स। कितने लाखों लाखों बार तुम्हारे मां और पिताजी हुए थे। सनंस एंड डॉटर्स, हस्बैंड्स एंड वाइफ्स, रिलेटिव्स एंड फ्रेंड्स, वेल्थ एंड पावर। लाखों लाखों बार तुम्हारे मां और पिताजी थे। पुत्र और पुत्रियां थी। हस्बैंड और वाइफ्स थे। मित्र और परिवारजन थे। वेल्थ एंड पावर था। बट दे केम एंड वेंट। वो आए और गए। मेरा 1 लाख जन्म पहला वाला जो जन्म था उसमें कौन मेरे मां-पिताजी थे मुझे पता नहीं। या तो थे तो उनके साथ में इस जन्म में तो कोई संपर्क नहीं रहा। उसमें मेरा कौन हस्बैंड या वाइफ था? कौन पुत्र पुत्रियां थी? कौन मित्र और सगे संबंधी थे? वह तो उस जन्म के साथ में ही चले गए। दूसरे जन्म आया तो फिर दूसरे जन्म में देखेंगे कि फिर से कोई हमारा नया मां और नए पिताजी फिर से कोई नया पुत्र पुत्री फिर से कोई नया संबंधी और फिर से कोई नया फेम एंड पावर किंतु उस जन्म के साथ में वह भी चले गए। यह जिसको हम मेरा मेरा मेरा करके कहते हैं वह सब तो दो दिन के लिए है। इस जन्म के लिए है। इस जन्म में मृत्यु होगा। तो फिर जब नया जन्म होगा तो कौन नए मां-पिताजी होंगे, नए भाई-बहन होंगे, नए पुत्र पुत्रियां होंगी, नए परिवार जन ये मित्रगण होंगे। नए तरह से दूसरे टाइप का नेम एंड फेम आएगा। तो यह तो कितनी लाखों बार गया है और आया है। जब यह सब ज्ञान होगा, तभी हमारी यह संसार के प्रति वासना चली जाएगी। हाउ मेनी टाइम्स यू वेयर ऑन द टॉप मोस्ट क्रेस्ट ऑफ द वेव? कितनी बार तुम यह जो महात तरंग है उसके शीर मोर पे सवार थे। शीर्ष पे सवार थे। यह कभी-कभी होता है ना कि बहुत फॉर्च्यून खिल जाता है। तो बहुत पुण्य किया है। तो सक्सेस के बाद में सक्सेस आती जाती है। आज मैं फर्स्ट नंबर से पास हो गया। कल कैंपस प्लेसमेंट हो गया। कल कहीं जाकर के कंपनी में फटाफट करके प्रमोशन हो गया। उसके बाद में मैंने जो प्रोडक्ट डेवलप की थी वो प्रोडक्ट हिट हो गई या तो फिर मैं पॉलिटिक्स में हूं और सीधा कहां वो मैं आम कार्यकर्ता था आज मैं सीएम हो गया परसों मैं पीएम हो गया उसके बाद में के दिन में मैं यूएन में लेक्चर दे रहा हूं और जितने भी वर्ल्ड लीडर है खड़े होकर के तालियां बजा रहे हैं। ऐसा कितनी बार हुआ है कि सफलता की इस तरंग के टॉप पे आप सवार थे। एंड हाउ मेनी टाइम्स यू वेर डाउन एट द बॉटम ऑफ डिस्पेयर? और कितनी ही बार ऐसा हुआ है कि पूरे गहराई में गड्ढे में तुम लोग पड़े हुए थे। डिस्पेयर रूपी हताशा रूपी गड्ढे में तुम लोग पड़े हुए थे। व्हेन मेमोरी विल ब्रिंग ऑल दिस टू यू। जब अपनी याद शक्ति साधना करते-करते पहले जन्म की बातें जितनी जितनी याद आती जाएगी वैसे ही यह मेमोरी जो है यह सब आपके सामने लाती जाएगी। देन अलोन विल यू स्टैंड एस अ हीरो? तभी तुम लोग एक हीरो की तरह खड़े रहोगे एंड स्माइल व्हेन द वर्ल्ड फ्रों्स अपॉन यू। और फिर जब जगत में कोई भी कष्ट मिलता है तो तुम लोग हंसोगे। देन अलोन विल यू स्टैंड अप एंड से तभी तुम लोग खड़े होकर कहोगे आई केयर नॉट फॉर दी इवन ओ डेथ। हे मृत्यु मुझे तुम्हारी भी कोई परवाह नहीं। कितने ही मृत्यु हो चुके हैं। कितने ही जन्म हो चुके हैं। कितनी ही बार सक्सेस हो चुका हूं। कितनी ही बार फेल हो चुका हूं। लाखों लाखों जन्म लाखों लाखों परिवारजन, लाखों लाखों सक्सेस, लाखों लाखों फेलियर मैंने देख लिए हैं। और क्या देखना है? और क्या दिखाओगे? हे मृत्यु, तुम्हारा भी मुझे भय नहीं है। वो टेररर्स हैशऊ फॉर मी? मेरे लिए तुम्हारा ऐसा कौन सा डर है? तुम्हारे पास में ऐसा कौन सा डर है जिसको कि दिखा करके तुम मुझे डराओगे। दिस विल कम टू ऑल। यह जो प्रचंड वैराग्य मृत्यु के प्रति भी निर्भयता यह हम सबके जीवन में आएगा। तो यह है वैराग्य का स्वामी जी का पूरा पैसेज। इसके बाद में शरद महाराज एक नया टॉपिक चालू करते हैं जिसको कि अभी हम लीला प्रसंग के नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: जीवन में हमारी वास्तविक खोज क्या होनी चाहिए?
आशल खोज शेटा हो जैसे देखिए एक बार पता चला कि जीवन के माने जो सांसारिक जीवन है इसके परे और कुछ है तो फिर क्या है कि चार रास्ते हमको स्वामी जी ने बताए हैं और रेदर की ठाकुर मां स्वामी जी का यह अपना संघ है उसमें हमको पता है कि चार रास्ते हैं। वह जो अपना लोगो जो है उसी में आपको दिखा होगा कि यह जो वेव्स जो है वह कर्म योग का प्रतीक है। वो कमल जो है वह भक्ति योग का प्रतीक है। कुंडलिनी है। वह राज योग का प्रतीक। और यह जो सूरज है वह है ज्ञान योग। तो कर्म, ज्ञान, भक्ति, ध्यान इन चारों रास्तों से हमको यह जो अद्वय वस्तु है, मृत्युंजय पदार्थ उसको प्राप्त करना है। भक्ति मार्ग है। देखिए कि आप दीक्षा ले सकते हैं अपने संग गुरु से। ज्ञान मार्ग है अर्थात कि अपने जीवन में त्याग और वैराग्य को बढ़ा सकते हैं। कर्म मार्ग है कि निस्वार्थ सेवा कर सकते हैं। आपके आसपास जो भी आश्रम है वहां जाकर के एज ए वलंटियर आप काम कर सकते हैं। तो और राजयोग है। थोड़ा बहुत मेडिटेशन करने का प्राणायाम करने का प्रयास कर सकते हैं।
प्रश्न: उपनिषद कहते हैं कि हमारी यात्रा अनेकता से एकता की ओर है
यह आपने ठीक ही कहा कि चाहे सुख हो ना कि दुख हो, चाहे जीवन के अच्छे अनुभव हो, ना कि चाहे बुरे अनुभव हो। हमको हमेशा याद रखना है कि इन सबके परे एक ईश्वर है। माने माने जगदंबा है ना कि नारायण है। जिसको भी हमको विश्वास हो। किंतु देखिए कि यह सब करना ना यह सब आखिरी माने वो शरद महाराज का वो फेमस ठाकुर को कहते हैं सर्वभूत में ईश्वर दर्शन करना है। ठाकुर कहते हैं वो तो आखिरी बात है। आखिरी घड़ी की बात है। वो तो शुरू में तो होने वाला नहीं है। शुरू में क्या है? जैसे वो राजा महाराज का वो फेमस कि स्वामी जी कहते हैं कि वर्क इज वरशिप। मैं कहता हूं कि वर्क एंड वरशिप। यानी कि दिन में एक समय आपको फिक्स रखना है। आधा घंटा एक घंटा कि सत्संग करना है या कोई भी साधना करनी है। वह आप फिक्स रखिए और फिर दिन में जो होता है वह होने दीजिए। इवन मेरे से भी कहां यह सब याद रहता है। अभी मैं ऑफिस में जाकर बैठूंगा। अभी हमारा यह नेशनल यूथ डे का प्रिपरेशन चल रहा है। तो यह शोभा यात्रा वगैरह तो क्या है? कॉलेज में जाना है, गवर्नमेंट ऑफिसरों को मिलना है। तो उस समय यह थोड़ी ना याद रहता है कि यह गवर्नमेंट ऑफिसर जो बैठा है मेरे सामने वो वो उसके भीतर में वही ठाकुर बैठे हैं। ऐसा थोड़ी ना याद रहेगा। किंतु क्या है कि दिन आप जैसे भी निकलता है निकालिए। आप दिन के प्रारंभ में और दिन के अंत में दो समय एक ऐसा रखिए कि आप सब भूल करके वही ईश्वर चिंतन करें और फिर ईश्वर पे ही छोड़ दीजिए कि एक दिन तो आएगा कि अभी आप दिन के दौरान भी ईश्वर दर्शन करेंगे। किंतु उसके लिए टेंशन मत लीजिए। अदरवाइज क्या होगा कि मैं यह नहीं कर पा रहा हूं बोलकर के एक नया मुसीबत खड़ा होगा। [हंसी]
प्रश्न: स्वामी विवेकानंद कहते है: Think always: "I am Brahman". Every other thought must be cast aside as weakening. Cast aside every thought that says that you are men or women. Let body go, and mind go, and gods go, and ghosts go. हम यह कब सिद्ध कर पाएंगे ?
देखिए इसको डिस्कार्ड नहीं करना है। इसको प्रैक्टिस करना है किंतु टेंशन नहीं लेना है कि होता क्यों नहीं है। राइट? अभी आप करने का प्रयास करेंगे। 5 मिनट के बाद में पता चला कि वही भूत और वही दानव आकर खड़े हो गए हैं। तो फिर टेंशन लेंगे बोलेंगे अरे मेरे से कुछ नहीं होगा तो एक हीन भावना आकर खड़ी हो जाएगी। ऐसा नहीं होना चाहिए।
प्रश्न: स्वामीजी के अनुसार समस्त स्मृतियों का पुनः स्मरण वैराग्य लाता है; पर जब हमारी स्मृति ही selective और अपूर्ण है, तब वह वैराग्य में कैसे सहायक हो सकती है?
यह जो मेमोरी फिल्टर की पहले तो तीर्थ यात्रा के डिसअपॉइंटमेंट एक्सपीरियंस की बात वो आपने ठीक ही कहा बहुत बार तीर्थ यात्रा पे जाते हैं तो पॉजिटिव की जगह डिसअपॉइंटमेंट ही ज्यादा मिलती है एक्सपीरियंस ठाकुर का खुद का देखिए वो वहां वो गए थे वो वाराणसी वृंदावन वगैरह तो वह राजा बाबू वगैरह के साथ में बैठे थे तो वहीं पे वो बिजनेस की बातें कर रहे हैं वो मथुर बाबू और उसके मित्र कि मैंने बिजनेस में इतना नुकसान हुआ, इतना लाभ हुआ। तो ठाकुर रोते-रोते मां को कहते हैं कि इससे तो अच्छा मैं दक्षिणेश्वर में था। वहां पे तो यह संसार की बातें नहीं सुननी पड़ती थी। [हंसी] तो इस तरह का डिसपॉइंटिंग एक्सपीरियंस ठाकुर को भी हुआ। किंतु एट द सेम टाइम देखिए कि यह जो आप कह रहे हैं ना कि ये मेमोरीज को हम फिल्टर करते हैं और किस तरह से हम पॉजिटिव मेमोरीज बेटर फिल्टर करें रेदर देन कि डिसअपॉइंटमेंट। या तो फिर मेमोरी से बेटर सीख ले कि यह जो मेमोरी है उससे मुझे वैराग्य आना चाहिए। नहीं कि इस तरह की मेमोरी खड़ी हो जाए। जैसे कि जिसको कि मैं जो जो मेमोरी मुझे संसार में बांध दे। तो यह क्या एक्चुअली अपने मूड पे बहुत कुछ है। अभी आप पॉजिटिव मूड में होंगे ना तो आपको पॉजिटिव चीजें याद रहेगी। अब जैसे मैं ही खुद मैं मैं ट्रेनिंग सेंटर की बात करता हूं। ट्रेनिंग सेंटर मेरे लिए बिटर स्वीट मेमोरी है। इस अर्थ में कि कष्ट भी बहुत हुआ। वहां का क्लाइमेट, वहां का खानापीना, रूटीन बहुत ही मुझे कष्ट में दिन बिताने पड़े थे। वो मैंने फर्स्ट ईयर तो मेरा बहुत ही मुश्किल से निकला था। हमेशा आई आई यूज्ड टू बी फिजिकली सो टायर्ड। माने रात को नींद नहीं आती थी और दिन भर वो क्लासेस का रूटीन रहता था। एट एनी टाइम आप मुझे देखेंगे ना ऐसा ही लगेगा कि मैं आई विल ड्रॉप डाउन। अभी यहीं पर गिर जाऊंगा। यहीं पे वो एक था। एट द सेम टाइम वह जो एक आनंद था वहां पर कि ट्रेनिंग सेंटर का अपना एक आनंद है। आप शास्त्र पढ़ रहे हैं। ठाकुर मां स्वामी जी के बारे में डिटेल में जान रहे हैं। साधना करने के लिए आपका मन फ्री है। किसी भी तरह का ड्यूटी किसी भी तरह का रिस्पांसिबिलिटी नहीं है। मित्र है आपके जिनके साथ में आप गप लगाते हैं। सो पॉजिटिव मेमोरीज और नेगेटिव मेमोरी दोनों है। अभी मेरा होता क्या है? जब भी मैं टीसी के बारे में सोचता हूं ना डिपेंड होता है मेरे किस मूड में हूं। यदि मैं थोड़ा सा मेरा मूड डाउन है ना तो वही सब याद आएगा। अरे यार सब समय टायर्ड रहते थे। सब समय थके हुए रहते थे। मुझे पेट का रोग भी वहां पर लग गया था। बहुत तकलीफ दिया उसने वो मेरे मूड पे। और यदि मूड अच्छा रहेगा मान लीजिए मैं सुबह को जप ध्यान कर रहा हूं और एकाएक टीसी की बात याद आ गई। तो पता है मुझे क्या याद आएगा कि हां गंगा के किनारे बैठे थे। खुला नील आसमान था। वहां पे बैठ के जप कर रहे हैं। जगत जैसे कि भूल गए हैं। कोई रिस्पांसिबिलिटी नहीं है। सो दैट डिपेंड्स ऑन माय मूड कि मुझे कौन से समय कौन सी मेमोरीज याद आती है। मेमोरीज जैसे कि मैं यहां पे मेडिटेशन सिखाता हूं। मैं कहता हूं मेमोरी कैन बी यूटिलाइज एस अ पावरफुल एड फॉर मेडिटेशन जिसको कि मैं हैप्पीनेस मेडिटेशन कहता हूं। अब कोई एक हैप्पीएस्ट मेमोरी आपके जीवन की खोज निकालिए। एंड कंसंट्रेट अपॉन इट। अब जैसे मेरे जीवन की एक बहुत ही हैप्पी मेमोरी है कि फर्स्ट टाइम मैं दक्षिणेश्वर गया था। तो अगेन कि मैं बेलूर मठ में था वो नौका में बैठकर के हम लोग दक्षिणेश्वर जा रहे हैं। यू कैन इमेजिन के वो कितना ब्यूटीफुल होगा। वो मैं नौका के एकदम सामने बैठा था। विशाल गंगा है। नील आसमान है। गंगा नौका जा रही है। जा रही है। और एक्साइटमेंट कि फर्स्ट टाइम दक्षिणेश्वर जा रहा हूं। राइट? तो वह पहले उन मंदिर का वह शिखर दिखता है। फिर वह द्वादश शिव मंदिर दिखते हैं। फिर वह चांदनी का घाट दिखता है। तो जैसे-जैसे पास में आते हैं वैसे-वैसे ही वो एक्साइटमेंट बढ़ती जाती है। फिर आप चांदनी के घाट पे आप पदार्पण करेंगे। भीतर में जाएंगे। पहली बार मां काली का दर्शन करेंगे। वही मां काली जिसके सामने सामने ठाकुर रोए थे, हंसे थे। वही वहां पे ठाकुर ने वो 80 लेके गला काटने को सोचा था। सो ऑल ऑफ दिस इज़ दैट। नाउ दिस इज वन ऑफ द बेस्ट मेमोरी इन माय लाइफ। सो लेट मी कंसंट्रेट अपॉन इट एज अ मेथड ऑफ मेडिटेशन। सो दैट वी कैन डू। आप जहां पे भी तीर्थ यात्रा पे या पिकनिक के लिए गए हैं थिंक ऑफ द हैप्पीएस्ट मेमोरी एंड देन कंसंट्रेट अपॉन इट एंड इमेजिन कि उस मेमोरी जब एक्चुअल घटना घट रही थी। उस समय जो आनंद मुझे मिल रहा था दैट हैप्पीनेस इज अगेन स्प्रेडिंग थ्रू आउट माय बॉडी।
प्रश्न: हमारे जीवन में अनुभवों की कमी नहीं है, फिर भी उनसे हमें वैराग्य क्यों नहीं होता?
नहीं दिस इज अ वेरी रिलेवेंट क्वेश्चन कि जैसे स्वामी जी ने कहा कि लाखों बार हमारे मां-पिताजी हुए। लाखों बार हम लोग एट द टॉप मोस्ट ऑफ द क्रेस्ट ऑफ द वेव एंड लाखों बार हम लोग हताशा की खी में गिरे हुए हैं। तो व्हाई डोंट वी लर्न वैराग्य फ्रॉम दैट? दिस इज़ अ वेरी क्लियर। प्रॉब्लम क्या है कि अपना मूड चेंज होता रहता है। आज मैं हताश हूं ना। हताशा में एकाएक यह सब संस्कार खड़े हो जाएंगे और वैराग्य आ जाएगा। किंतु जिस क्षण यह मनुष्य का मन जो है कितना लोभी है। जिस क्षण थोड़ा सा भी खुशी मिला फट करके हम यह जितनी भी हताशा निराशा है भूल जाएंगे। फिर से ये संसार के पीछे दौड़ना शुरू कर देंगे। सो बात यह नहीं है कि हताशा नहीं आती। हताशा आती है। वैराग्य नहीं आता ऐसा भी नहीं है। वैराग्य आ जाता है। प्रॉब्लम क्या है? वैराग्य टिकता नहीं है क्योंकि अपना मूड तो कंटीन्यूअस चेंज होता है। डाउन जब है तब वह जितने भी बार डाउन थे अप थे वो मेमोरी याद आती है। किंतु जैसे ही थोड़ा सा ही अप हुआ वैसे ही सब भूल के इसी संसार के सब गोल आ गए सामने। चलो नेक्स्ट नेक्स्ट डे यह करना है उसके बाद में यह करना है उसके बाद में वही जो घरे में पड़े हुए हैं हम लोग तो क्या है कि एक बार यदि वैराग्य आता है ना फिर इसी तरह से कोई सत्संग है संस्था है उसके साथ में अपने को जोड़ देना है कि क्योंकि क्या है कि इंडिविजुअल के ऊपर में आप डिपेंड रहेंगे अपने खुद के ऊपर में आप इसको कैरी फॉरवर्ड नहीं कर पाएंगे किंतु एक सत्संग ग्रुप का पार्ट है या आश्रम में रेगुलर जाते हैं तो जैसे ही वहां पे जाएंगे ना वैसे ही वह रिइंफोर्स होगा। सो दिस रिइंफोर्समेंट इज नेसेसरी। इंडिविजुअल पे रहने से ना अपना मूड के अनुसार चेंज होता रहेगा। अभी हमको मूड से बाहर आना है। हमको वैराग्य को रिइंफोर्स करना है। दैट इज डिपेंडेंट दैट इज पॉसिबल ओनली व्हेन वी हैव सम एक्सटर्नल हेल्प। सो उसको आपको मेहनत करके एक एक्सटर्नल सिस्टम खड़ा करना है। व्हिच विल वर्क एज अ स्कैफोल्डिंग फॉर योर वैराग्य।
प्रश्न: भक्ति और ज्ञान में मानो कांटे की टक्कर है; लेकिन अंततः तो भक्ति और शरणागति ही विजयी होती हैं। स्वामीजी इतने महान ज्ञानी थे, फिर भी अपने जीवन के अंत में उन्होंने शरणागति की ही बात कही
डिपेंड मुझे ऐसा नहीं कह के कि शरणागति आखिर में जीतेगी। हम कहेंगे कि डिपेंड ऑन साधक। उसकी किस तरह की पर्सनालिटी है। यदि वह भक्ति मार्ग माने उसका भक्ति की ओर ज्यादा रुझान है तो हो सकता है उसके जीवन में भक्ति विल प्ले ग्रेटर पार्ट। यदि ज्ञान की ओर रुझान है तो होगा कि ज्ञान प्लेज़ अ ग्रेटर पार्ट। अभी देखिए स्वामी जी को छोड़कर अभी हम इवन ग्रेटर पर्सन की बात करें भक्ति ज्ञान मार्ग के इवन ग्रेटर पर्सोनिफिकेशन तो है तोतापुरी ठाकुर के ही गुरु अभी उनको भी शक्ति को स्वीकार करना पड़ा था। सो दैट इज दैट किंतु एट द सेम टाइम देखिए कि पर्सनालिटी इटसेल्फ प्लेस अ ग्रेटर पार्ट कि यदि आपका ज्ञान की ओर है टेंडेंसी देन अल्टीमेटली नॉलेज विल बी और भक्ति की ओर है तो इस युग में प्रॉब्लम क्या है ठाकुर ने कह दिया है ना कि कली में अन्नगत प्राण है तो वो चाहे तोतापुरी हो ना कि चाहे स्वामी जी हो ना कि अपने तुरानंद जी हो माने सम ऑफ द ग्रेटेस्ट ज्ञान मार्गी इन आवर ऑर्डर तो तीनों को भी शक्ति को स्वीकार करना पड़ा था किंतु ठाकुर उन्होंने पहले ही डेफिनेशन दे दिया है कलयुग का कि कली में अन्नगत प्राण अभी सतयुग में क्या होगा त्रेता में क्या होगा द्वापर में क्या होगा दैट इज अ डिफरेंट मैटर वहां पे ऋषि मुनि तपस्या करते भी थे तपस्या करके वो ईश्वर माने आत्म साक्षात्कार प्राप्त करते भी थे और उनको ऐसा कोई क्लेम करने की आवश्यकता नहीं पड़ी कि अल्टीमेटली तो हमको यह कृष्ण या काली के शरणागत होना होगा। सो युग का भी एक प्रभाव है। माने साधक की पर्सनालिटी का एक प्रभाव है। युग का प्रभाव है। कली में अन्नगत प्राण [हंसी]
प्रश्न: जिन महापुरुषों ने त्रेता या द्वापर युग में इन भावों का विकास किया होगा, उनके जीवन का संघर्ष कितना गहन और कठिन रहा होगा!
स्वामी जी कहते ही है ना देखिए साधना को सालों सालों तक डेवलप करना फिर साधना सफल होती है। स्वामी जी खुद कहते हैं ना कि ये भगवान बुद्ध को आज सब पहचानते हैं। किंतु ऐसे कितने हजारों लाखों बुद्ध आकर चले गए जिन्होंने पूरा जीवन साइलेंटली स्ट्रगल किया है। हो सकता है कि निर्वाण प्राप्ति के लिए प्रचंड तपस्या की हो। किंतु उनके बारे में किसी को नहीं पता। किंतु उन्होंने जो साधन मार्ग डेवलप किया है, वह साधन मार्ग के रास्ते पर चल के अल्टीमेटली भगवान बुद्ध 12 साल में सफल हो भी गए और उनके पास में इतना समय था बाद में कि वो अपने मार्ग का प्रचार करें। सो अभी ठाकुर का ही देखिए ना ठाकुर ने 12 साल साधना करके सिद्धि प्राप्त की। किंतु उनके पीछे तोतापुरी की कितनी तपस्या है। कितने साल तपस्या करके तोतापुरी ने ज्ञान मार्ग में सिद्धि प्राप्त की और ठाकुर को तीन दिन में सिखा दिया। किंतु 3 दिन के पीछे 30 साल होंगे। भैरवी ब्राह्मणी ने कितनी तपस्या होंगी? उनकी सबकी तपस्या का कंसंट्रेटेड बेनिफिट ठाकुर को मिला है। सो दैट इज देयर कि ऐसे लाखों बुद्ध लाखों तोतापुरी, लाखों भैरवी ब्राह्मणी जिन्होंने जीवन पूरा तपस्या में बिता दिया जिनको कुछ नहीं पता। मतलब जिनके बारे में किसी को कुछ नहीं पता। शोल्डर्स ऑफ जॉइंट्स। किसी ने पूछा न्यूटन को हाउ वेर यू एबल टू सी सो फार? ही सेज़ आई हैव बीन स्टैंडिंग ऑन द शोल्डर्स ऑफ जॉइंट्स। है ना? हम हमारे जीवन में देखिए ठाकुर मां स्वामी जी ने पूरा खाना तैयार कर दिया है। हमको बैठ के खाना ही है। एक्चुअली देखिए मैं हमेशा कहता हूं कि रामकृष्ण संग में जप ध्यान करना बड़ा सहज है। यह कथामृत है। मां की बातें हैं। उनको पढ़ते जाइए। वही जप ध्यान तुल्य ही है। उससे ज्यादा फिर कुछ करने की चिंता ही नहीं करनी आपको। ठाकुर का नाम और ठाकुर की वाणी इनमें कोई डिफरेंस नहीं है। [हंसी] ओम