prayer
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग भाग दो चैप्टर वन साधक ओ साधना इसका एक जो इंपॉर्टेंट पॉइंट हम डिस्कस कर रहे थे शरद
वेदांत कहता है कि यह जगत भ्रम है — पर भ्रम हम सबको एक ही तरह का कैसे दिखाई देता है?
महाराज कहते हैं कि हम सबको इस जगत में भ्रम एक ही तरह का क्यों दिखाई देता है? एक्चुअली देखिए कि यह जो प्रश्न है दो कॉम्प्लीमेंट्री क्वेश्चंस है हमारे सामने। एक तो है कि जागृत अवस्था में हम सबको एक ही तरह की अनुभूति होती है। यह एक हमारे सामने प्रश्न है और दूसरा प्रश्न है कि यदि ब्राह्मण ही सब कुछ है तो फिर अ हमको यह वैविध्य क्यों दिखता है इस जगत में मनुष्य मनुष्य के बीच में मनुष्य पेड़-पौधों के बीच में मनुष्य और यह पशु पक्षियों के बीच में यह वैविध्य क्यों दिखता है यदि ब्रह्मन ही सब कुछ हुए हैं या तो फिर कहेंगे सिर्फ ब्राह्मण ही है और कुछ नहीं है जो कुछ भी है वह सब भ्रम ही है तो फिर यह ब्रह्मन और माया ब्रह्मन ही है। माया नहीं है। माया यदि मिथ्या है। माया यदि भ्रम है। इट इज ए कहेंगे कि एक एक तरह का हेलुसिनेशन या एरर है। तो फिर हमको वैविध्य क्यों दिखता है? यह एक प्रश्न है। दूसरा कि माया का जो जगत है, आप कहते हैं कि जिस तरह से जागृत और स्वप्न दो अवस्था में जो डिफरेंस है, वही डिफरेंस यह जागृत अवस्था और तुरीय अवस्था में है। तो यदि ऐसा होगा तो जा जैसे कि हम सबके स्वप्न अलग-अलग होते हैं। स्वप्नों में कोई कंसिस्टेंसी नहीं होती है। स्वप्न में कोई एकरूपता नहीं होती है। तो फिर यह जागृत अवस्था में इतना सारा कंसिस्टेंसी इतना सारा एक लॉजिकल प्रोसेशन जो हमको दिखाई देता है लॉजिकल प्रोसेशन ऑफ इवेंट्स यह कर्म का सिद्धांत जो है वह जो हमको दिखाई देता है जागृत अवस्था में ऐसा क्यों यानी कि यह दोनों कॉम्प्लीमेंट्री क्वेश्चन है। इस क्वेश्चन का एक उत्तर हमने कल देखा भी था कि जिस तरह से स्वप्न में इनकंसिस्टेंसी जो है वह तो एकदम स्पष्ट दिखाई देती है किंतु जागृत अवस्था में जो इनकंसिस्टेंसी है वह बड़ा ही रेयरली दिखाई देता है और कुछ भाग्यवान लोगों को ही दिखाई देता है और जिनको दिखाई देता है उसमें से कुछ अल्प ही है जो कि इस कंसिस्टेंसी का सहारा लेकर के वैराग राग्य के जगत में पदार्पण करें। अभी जैसे कि यह सब जग विख्यात घटनाएं हैं। भगवान बुद्ध को जब यह एक जब अपने घर से बाहर निकले तब उनको यह इनकंसिस्टेंसी यह दिखाई देना शुरू हो गई। वृद्ध व्यक्ति दिखाई दिया, बीमार व्यक्ति दिखाई दिया, मृत व्यक्ति दिखाई दिया। तो भगवान बुद्ध सोचते हैं यह जो मेरी युवानी है यह जो मेरी धन संपत्ति है यह जो सुख और वैभव जिसमें मैं पल बढ़ा रहा हूं यह सब चंद दिनों के लिए ही तो है। यह सब तो क्षणभंगुर ही तो है। इसके बाद में क्या मैं भी वृद्ध हो जाऊंगा। मैं भी बीमार हो जाऊंगा। मैं भी मृत्यु पाऊंगा। मेरा भी मृत्यु होगा। तो क्या यह जीवन जो जीवन मृत्यु की ओर सतत धावित हो रहा है उसमें मैं क्या शाहमृग की तरह वो जो ऑस्ट्रच की तरह अपना सर जो है रेती में डाल के छुप करके अपने को संभाल करके बच करके रहूंगा छुप करके रहूंगा क्या मृत्यु से ठाकुर की जैसे कि कल हमने वो कहानी देखी थी तीन तरह की मछलियां होती है वो जाल में फंसती है वो मछुआरे की जाल में फंसती है। एक तरह की मछली है कि फंसने के बाद में इतना वह छूटने के लिए मुक्ति प्राप्त करने के लिए परिश्रम करती है। वो दौड़धाम करती है कि कहीं ना कहीं से उसको जाल में से निकलने का रास्ता मिल जाता है। वह जाल में से निकल जाती है। तो यह हो गए मुक्त जीव। उसके बाद में जो है मुमुक्षु जीव के जाल में फंसे हैं। यह भान तो हो गया है। अंदाजा तो आ गया है हमको किंतु निकलने का जो प्रयास है वह कम पड़ जा रहा है। बोलकर के प्रयास तो करते हैं निकल नहीं पाते। और तीसरे हैं बद्ध जीव जो कि यह समझने के बावजूद कि हम जाल में फंसे हैं। वह रेती में अपना मुंह छुपा के रहेंगे। यह सोचते हैं कि यदि हम मछुआरे से छुप के रहेंगे तो मछुआरा हमको छोड़ देगा। किंतु ऐसा तो होने वाला नहीं है। मछुआरा जब अपनी जाल खींचेगा तो वो वो मछलियां भी जो कि रेती में मुंह छुपा के बैठी है वे लोग भी सतह पर आएगी और ऑक्सीजन के अभाव में उनका भी मृत्यु होगा। तो यह जो इनकंसिस्टेंसी है कुछ ज्यादातर लोग तो इसको इग्नोर ही करते हैं जो कि बद्ध जीव है। कुछ-कुछ लोगों को पता चल जाता है कि हां इस जागृत अवस्था में भी यह स्वप्न अवस्था में तो बहुत ज्यादा इनकंसिस्टेंसी है। किंतु जागृत अवस्था में भी यह डिस्कंटिन्यूटी है। और इसका सहारा लेकर के वैराग्य के रास्ते पर चलना शुरू तो करते हैं। किंतु इतनी शक्ति नहीं होती कि एक जन्म में मुक्ति प्राप्त कर ले और तीसरे होते हैं अल्पसंख्यक जो कि परिश्रम करके एक ही जन्म में मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं। तो देखिए कि यह हमने पूरा एनालिसिस कल एक देखा था कि इनकंसिस्टेंसी जिस तरह से स्वप्न अवस्था में है वैसे ही जागृत अवस्था में भी दिखाई देगी। वह एक पार्ट ऑफ इक्वेशन था। दूसरा एक पार्ट ऑफ इक्वेशन है कि यदि ब्रह्मण ही
सृष्टि में इतना वैविध्य क्यों है? -- ब्रह्मन् में सजातीय या विजातीय भेद नहीं, लेकिन स्वगत भेद है
है और कुछ नहीं है तो हमको वैविध्य क्यों दिखता है? तो इसका उत्तर भी यही शरद महाराज का तृतीय पार्ट में भाव मुखे रहने का क्या अर्थ है? इस प्रश्न का डिस्कशन जब शारदानंद जी करते हैं, उसमें वह एक टॉपिक डिस्कस करते हैं। वो टॉपिक में उसका सहारा लेकर के हमने इसको समझने का प्रयास किया था कि किस तरह से तीन तरह के भेद होते हैं। एक तो है सजातीय, दूसरा है विजातीय, तीसरा है स्वगत भेद। अभी विजातीय भेद सबसे पहले क्या है? यह अब जैसे कि एक मनुष्य है और यह माइक है और यह बिल्डिंग है और यह समुंदर है। यह पेड़ है। यह पानी का ग्लास है। तो इन सबके भीतर में कुछ भी सिमिलरिटी नहीं है। इस सबके भीतर में विजातीय भेद है। किंतु मान लीजिए कि इस तरह की दो माइक होगी। मेरे जैसे 10 मनुष्य होंगे। यह 10 तरह के पेड़ होंगे। तो, यह 10 तरह के पेड़ में सजातीय भेद है। अर्थात कि एक ही स्पीशीज के डिफरेंट-डिफरेंट स्पेसिमेंस है। 10 तरह के मनुष्यों में सजातीय भेद होगा। सभी तो मनुष्य ही है किंतु अलग-अलग तरह के मनुष्य है। यह जो भी कहिए आप कि एक ही स्पीशीज के जो डिफरेंट-डिफरेंट एग्जांपल है उसको आप सजातीय भेद कहेंगे। तो देखिए कि ब्रह्मण के भीतर में ना ही विजातीय भेद है ना ही सजातीय भेद है। इस अर्थ में कि विजातीय भेद हो ही नहीं सकता। ऐसा नहीं हो सकता कि पृथ्वी पर ब्रह्मन की हम ब्रह्म साक्षात्कार के लिए प्रयास कर रहे हैं। तो यह कोई दूसरा ग्रह है। उसमें दूसरे तरह के जो ये एलियन रेसेस जो होते हैं ना एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल तो वे लोग कहीं शैतान की आराधना कर रहे हैं। आराधना यदि करनी ही है। यदि साक्षात्कार कहीं पर किसी को करना ही है तो ब्रह्म साक्षात्कार ही होगा। क्योंकि ब्राह्मण ही एकमात्र है जो जो कि अल्टीमेट रियलिटी है। ऐसा हो ही नहीं सकता कि ब्राह्मण के अलावा ऐसा कोई एंटिटी है जिसकी आराधना या तो फिर जिसका साक्षात्कार करने के लिए प्रयास किया जाए। हां लोग शैतान की आराधना करते हैं। हजार देवी देवताओं की आराधना करते हैं। किंतु फिर वह ब्राह्मण के ऊपर में माया का आवरण लग के जो फिर यह वैविध्य प्रकट होता है उसी के एक-एक अंश है। अदर वाइज ब्रह्मन जो है अल्टीमेट रियलिटी वो एक ही है। दैट मींस कि देयर इज ओनली वन स्पीशीज। जैसे कि पृथ्वी पे एक ह्यूमन स्पीशीज है। फिर ये हॉर्स स्पीशीज है। फिर ये एप स्पीशीज है। यह पशुपं है। ये डिफरेंट-डिफरेंट स्पीशीज है। तो किंतु ब्रह्मन इज ओनली वन स्पीशीज। ब्रह्मन एक ही है। ब्रह्मन के अलावा और कुछ नहीं है। तो विजातीय भेद नहीं हो सकता। सजातीय भेद नहीं हो सकता। इस अर्थ में कि जैसे में मनुष्य ह्यूमन स्पीशीज के 10 लोग हैं तो स्पीशीज तो एक है किंतु स्पेसिमेन जो है वो 10 अलग-अलग है। तो ब्रह्मन में स्पीशीज भी एक है। स्पेसिमेन भी एक है। अर्थात कि ब्रह्म रूपी जो अल्टीमेट रियलिटी एक ही है। एक के अलावा और कोई रियलिटी नहीं और 10 तरह के ब्राह्मण नहीं। ना पृथ्वी का ब्राह्मण अलग, यह मार्स का ब्राह्मण अलग या तो फिर इवन पृथ्वी पर जो विभिन्न विभिन्न धर्म है, सब लोग आज चिल्ला के कहते हैं कि हम जिस देवी देवता की पूजा करते हैं, हम जिस अल्टीमेट रियलिटी प्राप्त करने का प्रयास करते हैं, वही सर्वश्रेष्ठ है। और फिर स्वामी जी कहते हैं ना कि यह दो ट्राइबल लोग पहले के हजारों साल पहले की जो कहानी वैसे तो अभी भी आज भी वही है कहानी कि दो ट्राइब झगड़ा करती है जो ट्राइब जीत जाती है उसके देवता भी जीत जाते हैं और जो हारी हुई ट्राइब के देवता के ऊपर में फिर माइथोलॉजी जो लिखी जाती है पौराणिक कहानियां जो लिखी जाती है किदंतिया जो लिखी जाती है उसमें क्या होगा कि विजेता ट्राइब जो है उसके देवता ने हरी हुई ट्राइब के देवता पर आक्रमण किया। उनको हरा दिया। तो ऐसा करके यह सब पौराणिक घटनाएं लिखी जाती है। किंतु ब्राह्मण के बारे में यदि देखें तो ब्राह्मण एक ही है। ऐसा नहीं कि क्रिश्चियन लोगों का ब्राह्मण अलग ये हिंदू लोगों का ब्राह्मण अलग ये सिख बौद्ध लोगों का अलग ऐसा नहीं। आप यदि कहेंगे कि हां ब्राह्मण ही है। ब्राह्मण के अलावा और कुछ नहीं। विजातीय भेद हो ही नहीं सकता। तो प्रश्न होगा सजातीय भेद है कि नहीं है जो कि मच मोर लॉजिकल आज हमको लगता है। यह शैव है तो भगवान शिव की आराधना करते हैं। यह शाक्त है तो यह देवी की आराधना करते हैं। यह क्रिश्चियन है तो वो उनका जो भी कुछ है यह फादर इन हेवन यह जीसस ये होली घोस्ट ये ट्रिनिटी उसकी आराधना करते हैं। ये जो इजिपशियंस थे फेरोस के समय में वो अपने देवी देवता रा और ये आइसिस उसकी आराधना करते थे तो फिर हमको लगेगा कि जिस तरह से देवी देवता अलग-अलग है तो वैसे ही क्या ब्राह्मण अलग-अलग है ये हिंदुओं का अलग ये इनका अलग शाक्त का अलग शव का अलग वेदांतियों का अलग तो भी नहीं ना ही विजातीय भेद ना ही सजातीय भेद किंतु ये जो स्वगत भेद है वह स्वगत भेद ब्रह्मन में है। इस अर्थ में कि देखिए कि एक समुंदर में बहुत सारी लहरें उठती है। प्रत्येक लहर का अपना नाम और रूप अलग होता है। साइज शेप अलग-अलग होते हैं। उसकी हाइट उसकी स्ट्रेंथ उसमें जो मास ऑफ वाटर जो है क्वांटिटी ऑफ वाटर जो है वो शायद अलग-अलग होगी। शायद नहीं पक्का है क्योंकि प्रत्येक लहर में यहां पे ये आश्रम तो समुंदर के किनारे ही है तो हमारा जो एक बिल्डिंग है लाइब्रेरी बिल्डिंग समुंदर के एग्जैक्ट ऑोजिट में है तो कभी-कभी मैं वहां पर छत पर जाकर टहलता हूं तो मैं वहां छत से देखता हूं। अभी मैं समुंदर के किनारे जब टहलता हूं तो क्या एक तो फ्लैट तरह का समुंदर दिखता है ना और जो लहर एक ही लहर दिखेगी जो कि नजर के सामने आ रही है किंतु यह बिल्डिंग की छत के ऊपर में से तो समुंदर में बहुत सारी लहरें दिखेगी। सामने आ रही लहर भी और पीछे में आ रही लहरें भी। तो उस समय यह जो तथ्य है वेदांत का एकदम स्पष्ट प्रतिभाषित होता है कि आप थोड़ा सा दूर देखेंगे तो शांत प्रशांत समुंदर दिखाई देता है। किंतु जैसे-जैसे किनारे की ओर आपकी नजर आना शुरू होगी, कितने सारी लहरें और विभिन्न विभिन्न शेप की विभिन्न विभिन्न वो कंपो उसका साइज की वो क्वांटिटी उसमें वाटर क्वांटिटी कितनी है? इस तरह की लहरें आपको समुंदर के किनारे आकर के टकराती हुई सी दिखेगी। तो क्या है? समुंदर तो एक है किंतु समुंदर की लहरों में नाम रूप से भेदभाव है। डिफरेंशिएशन है तो स्वगत भेद इसको कहते हैं। एक ही बॉडी है उसके भीतर में जो विभिन्न विभिन्न नाम रूप रूपी जो अंग है उसमें आपको डिफरेंस दिखाई देता है। तो यहां पे शरद महाराज हमको एक्सप्लेन करते हैं कि भले ही चाहे ब्रह्मण रूपी जो रियलिटी है वह एक ही है। एक के अलावा और कुछ नहीं है। अद्वितीय है। किंतु यह जो नाम रूपी डिफरेंशिएशन है, दैट इज बिकॉज़ ऑफ दिस स्वगत भेद बट नॉट बिकॉज़ ऑफ सजातीय भेद और विजातीय भेद। तो इतना हमने
एक अनंत, असीम सामष्टि-मन में जगतरूप कल्पना उदित हुई है -- सारदानन्दजी के इस विचार पर विवेकानन्द का प्रभाव
शरद महाराज की ये जो डेफिनेशन थी जगत के बारे में वो वहां पे अभ्यास किया था। किंतु इसके साथ में ही एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट स्टेटमेंट शरद महाराज देते हैं कि वि इज़ वेरी यूनिक। मैंने जब पहली बार पढ़ा था, मुझे बड़ा ही यूनिक लगा था। वह क्या है कि यह विशाल जो एक विराट मन है, महत तत्व है, उसके भीतर में यह जगत रूपी कल्पना का उदय हुआ है। तो मैंने सोचा कि यह जगत रूपी कल्पना का एक विराट मन में उदय होना यह क्या शरद महाराज का खुद का है ना कि उन्होंने स्वामी जी में से लिया है। यूजुअली हम शरद महाराज को ऐसे कोई फिलॉसोफर के रूप में नहीं गिनते। ठाकुर और मां इन दोनों के जीवन का उनका बड़ा ही गहरा अध्ययन है और फिर किताब लिखने में भी उनका बड़ा ही सिद्ध हस्त है। किंतु शरद महाराज को एज अ इंडिपेंडेंट फिलॉसोफर के रूप में इस तरह से तो मैंने सोचा नहीं था। तो मैंने जब स्वामी जी को पढ़ना इस तरह से खोजना शुरू किया तो स्वामी जी इस पर्टिकुलर स्टेटमेंट के बारे में क्या कहते हैं? मुझे रेफरेंस तो काफी मिले। किंतु जो एग्जैक्ट जो शरद महाराज कहते हैं वह एग्जैक्ट मुझे ऐसा कुछ नहीं मिला। तो कहां पर सिमिलरिटी है, कहां पर डिफरेंस है शरद महाराज और स्वामी जी के बीच में। तो यह थोड़े से मैंने पैसेज जो है कंप्लीट वर्क्स में से कलेक्ट किए हैं। उसमें से पहला पैसेज है यह रियल एंड अपेरेंट मैन। यह ज्ञान योग का यह प्रवचन है। उसमें से यह पैसेज लिया है। एक्चुअली इसके पीछे का जो आईडिया है इसको हमने ऑलरेडी काफी डिटेल में डिस्कस किया है। जब हम राजयोग के जो लेक्चर थे राजयोग के दो कुछ क्लासेस हमने लिए उसमें यह आइडियाज ऑलरेडी स्वामी जी ने जो डिस्कस किए थे। यही जो आईडिया है उसका कुछ अंश वहां पर आ जाता है। हमने काफी डिटेल में डिस्कस किया था बोल करके मैं थोड़ा सा ऊपर ऊपर से इसको ले लूंगा। प्रारंभिक एक्सप्लेनेशन जो है क्या कहते हैं स्वामी जी पहले तो मैं थोड़ा सा पढ़ लेता हूं फिर हम उसका डिस्कशन करेंगे द होल ऑफ दिस यूनिवर्स अकॉर्डिंग टू द हिंदू फिलॉसोफर्स कैन बी रिजोल्वड इनू वन मटेरियल वि दे कॉल आकाश यह पूरा जो विश्व ब्रह्मांड है यूनिवर्स है वह हिंदू दर्शनकारों की दृष्टि से उनके मत अनुसार एक ही मेट एक ही पदार्थ में रिजॉल्व हो सकता है और यह पदार्थ है आकाश। अर्थात कि जो कुछ भी आप देख रहे हैं यही आकाश का बना है। अभी देखिए कि यह कांसेप्ट कोई आज की मॉडर्न साइंस के अनुसार कहीं असंभव नहीं है। ऑलरेडी जितने भी एलिमेंट्स हैं इस जगत पे वो ऑर्गेनिक हो ना कि इनऑर्गेनिक हो। यह ह्यूमन बॉडी हो ना कि यह और कुछ भी है। स्टार्स है, प्लेनेट्स है, वाटर है, अर्थ है, विंड है, यह फायर है। जो कुछ भी आप कहो फायर नहीं फायर इज एनर्जी। बट एनीवे जिस चीज में से अग्नि प्रकट होता है वो लकड़ी हो ना कि कोयला हो ना कि डायमंड हो ना कि जेम्स हो कुछ भी हो इस जगत में सब कुछ आप पीरियडिकल टेबल जो है उसमें विभिन्न एलिमेंट्स है उसमें से ही सब कुछ बना है एच एच ई वो जो हम लोग बचपन में ये याद करते थे ना पीरियडिक टेबल मुझे पहले दो तो याद है एच एचई एल आई आई थिंक ये पहले तीन याद है हाइड्रोजन जिसमें की एक प्रोटॉन और एक इलेक्ट्रॉन होता है हीलियम ियम जिसमें कि दो प्रोटॉन और दो इलेक्ट्रॉन होते हैं। फिर लिथियम जिसमें कि तीन प्रोटॉन होते हैं। इस तरह से वो पूरा पीरियडिकल टेबल है। जैसे ही ये एटम के सेंटर में नंबर ऑफ प्रोटॉन बढ़ते जाएंगे अ उतना ही ये ये उसका वो जो हेवियर एलिमेंट बनता जाएगा। लाइटेस्ट एलिमेंट है हाइड्रोजन और फिर हैवी एलिमेंट्स में तो बहुत सारे हैं ये यूरेनियम है आइंस्टाइनियम है फिर बहुत सारे हैं जो कि जो कि रेडियोएक्टिव एलिमेंट कहे जाते हैं फिर उसमें से ये रेडियोएक्टिव डिक होगा यूरेनियम प्लूटोनियम वगैरह-वगैरह तो ये पूरा ये पीरियडिकल टेबल अर्थात कि ये जो कितने 70-80 एलिमेंट्स हैं उसी का पूरा जगत बना है उसको आप फर्दर एनालिसिस कीजिए उसके तीन ही एक्चुअली बेसिक पार्ट पार्टिकल है इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन जिसका ये एलिमेंट्स बने हैं और फिर ये इस इसको सब एटॉमिक पार्टिकल कहते हैं। सब एटॉमिक पार्टिकल का एनालिसिस करेंगे तो वैसे तो आपको बहुत तरह के विभिन्न टाइप के सब एटॉमिक पार्टिकल मिल जाएंगे। किंतु आज का मॉडर्न साइंस कहता है कि अल्टीमेटली यह सब एटॉमिक पार्टिकल भी या तो वो स्ट्रिंग के बने हैं या तो यह क्वार्क के बने हैं। तो बेसिकली ये जितना भी मैटर है वो उसके कंस्टीटुएंट एलिमेंट में आप डीकंपोज कर सकते हैं। बिल्डिंग ब्लॉक जो है जीवन के वो कुछ ही है। एक ही है जिसको कि हम मैटर कहेंगे। और इससे भी थोड़ा सा आगे जाएंगे। पहले पढ़ लेते हैं फिर डिस्कस करते हैं। एवरीथिंग दैट वी सी अराउंड अस फील टच टेस्ट इज सिंपली अ डिफरेंशिएटेड मैनिफेस्टेशन ऑफ दिस आकाश। जो कुछ भी हम अपने आसपास देखते हैं, स्पर्श कर सकते हैं, अनुभव कर सकते हैं, टेस्ट कर सकते हैं। यह सब कुछ आकाश के ही विभिन्न क्स्टिटुएंट्स है। आकाश के ही विभिन्न तरह के कॉम्बिनेशंस परम्यूटेशंस है। इट इज ऑल परवेडिंग फाइन। यह आकाश जो है आकाश से ही सब बना है और एकदम फाइन स्टेट में आकाश होता है। उसका जो ओरिजिनल प्योर स्टेट होता है। ऑल दैट वी कॉल सॉलिड्स, लिक्विड्स और गैसेस, फिगर्स, फॉर्म्स और बॉडीज द अर्थ, सन, मून एंड स्टार्स एवरीथिंग इज कंपोस्ट ऑफ दिस आकाश। जो जो कुछ भी है जिसको कि हम सॉलिड कहते हैं, लिक्विड कहते हैं, गैस कहते हैं। मनुष्य की आकृति है। यह शरीर है, देह है, सूर्य है, पृथ्वी है, तारे हैं, चांद है। सब कुछ आकाश का ही बना है। अगेन वेरी सिंपल अंडरस्टैंडिंग आज के साइंस के अनुसार कि पूरा विश्व मैटर का ही बना है। व्हाट फोर्स इज इट? व्हिच एक्ट्स अपॉन दिस आकाश एंड मैन्युफैक्चर दिस यूनिवर्स आउट ऑफ इट? एस किंतु यह आकाश में से जो विश्व का जो गठन हुआ विश्व जो वर्ल्ड बिल्ड अप हुआ उसके पीछे में कोई तो एनर्जी या तो फोर्स तो चाहिए वो फोर्स क्या है? तो कहते हैं अलोंग वि आकाश एकिस्ट यूनिवर्सल पावर ऑल दैट इज पावर इन द यूनिवर्स। मैनिफेस्टिंग एस फोर्स और अट्रैक्शन ने इवन एस थॉट इज बट अ डिफरेंट मैनिफेस्टेशन ऑफ दैट वन पावर वि द हिंदू कॉल प्राण आकाश के साथ-साथ में ही एक दूसरा पदार्थ का अस्तित्व है जिसको कि हम यूनिवर्सल पावर या तो वैश्विक शक्ति कहते हैं। इस जगत में यह पावर अर्थात कि एनर्जी और फ़ आज की लैंग्वेज में यदि कहे तो फ़ इस जगत में जो कोई भी है जो कि अट्रैक्शन यानी कि ग्रेविटी के रूप में जो मैनिफेस्ट होती है। इवन एज अ थॉट हमारे मन के भीतर में जो विचारों के रूप में जो प्रकट होती है, यह सब डिफरेंट-डिफरेंट मैनिफेस्टेशन ऑफ एक ही शक्ति के डिफरेंट मैनिफेस्टेशन है। जिसको कि हम हिंदू कहते हैं प्राण। दिस प्राण एक्टिंग ऑन आकाश इज क्रिएटिंग द होल ऑफ दिस यूनिवर्स। यह आकाश और आकाश के ऊपर में प्राण जब कार्य करेगा तो फिर यह पूरे विश्व ब्रह्मांड का प्रारंभ होगा। अभी देखिए आज की मॉडर्न फिजिक्स की लैंग्वेज में प्राण जो कांसेप्ट है उसके एक्चुअली दो तरह के साइंस में कहते हैं कि एलिमेंट्स है एक तो है फोर्स दूसरा है एनर्जी एनर्जी यानी कि बेसिक एनर्जी फोर्स यानी कि दो पदार्थ है मैटर के बने हुए उसके आस दोनों पदार्थ के बीच में जो इंटरेक्शन होता है उसको कहते हैं फोर्स अभी ज्यादा डिटेल में नहीं जाएंगे किंतु अह कीपिंग माइंड कीपिंग इन माइंड दिस वेरी अह इंपॉर्टेंट डिफरेंस कि फोर्स और एनर्जी मॉडर्न साइंस में काफी डिफरेंट रूप से ट्रीट की जाती है। अह बेसिकली जो कुछ भी फोर्स और एनर्जी आप इस जगत में देखते हैं, वह प्राण की ही बनी है। अभी देखिए कि प्राण और आकाश किस तरह से एक दूसरे के साथ में मिले हैं। आइंस्टाइन का इक्वेशन है e = mc² अर्थात कि एनर्जी इक्वल्स ट्वाइस द स्पीड ऑफ़ लाइट इंटू द मास। अभी आप कहेंगे कि एनर्जी और मास एक दूसरे में कन्वर्टेबल है तो है। एटम बम है वो कि मास को एनर्जी में कन्वर्ट करता है। और आज ही मैंने एक न्यूज़ आर्टिकल पढ़ा। उसमें यह एनर्जी प्योर एनर्जी को मास पार्टिकल में कन्वर्ट करने का एक एक्सपेरिमेंट सक्सेसफुल हुआ है। फर्स्ट टाइम के लैब में इस लेबोरेटरी में मनुष्यों के द्वारा टेक्नोलॉजी के माध्यम से एनर्जी में से मैटर प्रकट की गई। तो दिस इज अ साइंटिफिक अंडरलाइन एक्सप्लेनेशन कि अब स्वामी जी जो कहते हैं अभी यह मॉडर्न फिजिक्स को कुछ समय के लिए रख दे साइड पे और सिर्फ स्वामी जी का यह कांसेप्ट ले कि आकाश और प्राण तो हमको यह स्पष्ट रूप से दिखता है कि यह दो एलिमेंट है। स्वामी जी की दृष्टि से आकाश है। जो कुछ भी एन मैटर देखते हैं वो और प्राण है। जो कोई भी एनर्जी आप देखते हैं एनर्जी और फोर्स स्वामी जी वैसे दोनों को इक्वेट तो कर रहे हैं किंतु मेरी दृष्टि से सिर्फ एनर्जी ही होना चाहिए फोर्स नहीं बट एनीवे दैट इज अ डिफरेंट डिस्कशन। अभी आगे स्वामी जी कहते हैं इन द बिगिनिंग ऑफ ए साइकिल दिस प्राण एज इट वेयर स्लिप्स इन द इनफाइनाइट ओशन ऑफ आकाश। यह कल्प के प्रारंभ में एक अह कल्प होते हैं ना? यह सृष्टि स्थिति प्रलय की साइकिल होती है। उसको कल्प कहते हैं। तो यह कल्प के प्रारंभ में अर्थात कि सृष्टि के प्रारंभ में यह प्राण जो है वह एक इनफाइनाइट ओशन ऑफ आकाश आकाश रूपी एक अनंत महासमुंदर है। उसके भीतर में यह प्राण शयन कर रहा है। यह वही बात हो गई कि यह जो विष्णु है, वह का यह जो कारण जगत में यह विश्व ब्रह्मांड में कहां वह विष्णु है, वह शेष राज शेषनाग के ऊपर में शयन कर रहा है। वैसा ही एक इमेजिनरी एक सीन स्वामी जी हमारे सामने खड़ा करते हैं कि आकाश रूपी इनफाइनाइट ओशन में यह प्राण शयन कर रहा है। कल्प के प्रारंभ में इट एग्जिस्टेड मोशनलेस इन द बिगिनिंग। प्रारंभ में विदाउट एनी मूवमेंट मोशनलेस स्थिर अटल निश्चल होकर के प्राण पड़ा हुआ था। देन अराइजेस मोशन इन दिस ओशन ऑफ आकाश बाय द एक्शन ऑफ दिस प्राण। किंतु जब सृष्टि का प्रारंभ कैसे होता है? तो यह प्राण है वो अचल अटल निष्क्रिय होकर पड़ा था। उसमें जैसे कि प्राण का संचार होता है ना कंट्राडिक्शन लैंग्वेज का कि प्राण में प्राण का संचार होता है। प्राण इटसेल्फ इज प्राण। बट एनीवे यह जो हायर कांसेप्ट जब डिस्कस करने को जाते हैं तो हमारी लैंग्वेज छोटी पड़ जाती है। तो वह प्राण आप कह सकते हैं कि एक तरह से निष्प्राण होकर पड़ा था। अभी उसमें प्राण का संचार हुआ। तो जैसे ही यह प्राण का संचार होता है, वही प्राण फिर आकाश पर कार्य करता है और फिर यह आकाश पूरे विश्व ब्रह्मांड में परिवर्तित होता है। एंड दिस प्राण बिगिंस टू मूव टू वाइब्रेट आउट ऑफ दिस ओशन कम द वेरियस सेलेस्टियल सिस्टम्स सनंस मूनस स्टार्स अर्थ ह्यूमन बीइंग्स एनिमल्स प्लांट्स एंड द मैनिफेस्टेशन ऑफ ऑल द वेरियस फोर्सेस एंड फिनोमिना यह प्राण में निष्क्रिय होकर के निष्प्राण होकर के पड़ा था उसमें जब प्राण का संचार होता है तो फिर वह यह आकाश पर कार्य करता है और यह आकाश फिर आखिर में यह डिफरेंट तरह की सेलेस्टियल सिस्टम है। जैसे कि सूर्य है, तारे हैं, चंद्र है, पृथ्वी है, मनुष्य है, पशु पक्षी है, पेड़-पौधे हैं। वह विभिन्न स्वरूपों में और विभिन्न फोर्सेस जो है उसमें वह परिणत होता है। एव्री मैनिफेस्टेशन ऑफ पावर देयर फॉर अकॉर्डिंग टू देम इज दिस प्राण। अर्थात कि यह ऋषि मुनियों की दृष्टि से यह शक्ति का जितना भी यह प्रादुर्भाव है, यह मैनिफेस्टेशन है, वह प्राण का ही मैनिफेस्टेशन है। एव्री मटेरियल मैनिफेस्टेशन इज आकाश। और यह जो भौतिक जितना भी मैनिफेस्टेशन है, वह आकाश में से हुआ है। शक्ति और पदार्थ। शक्ति है प्राण का मैनिफेस्टेशन, एनर्जी और फोर्स। और यह मैटर है आकाश का मैनिफेस्टेशन। व्हेन दिस साइकिल विल एंड ऑल दैट वी कॉल सॉलिड विल मेल्ट अवे इनू द नेक्स्ट फॉर्म द नेक्स्ट फाइनर और द लिक्विड फॉर्म दैट विल मेल्ट इंटू द गैसियस एंड दैट इन फाइनर एंड मोर यूनिफॉर्म हीट वाइबेशंस एंड ऑल विल मेल्ट बैक इंटू दी ओरिजिनल आकाश एंड व्हाट वी नाउ कॉल अट्रैक्शन रिपल्शन एंड मोशन विल स्लोली रिजॉल्व इंटू दी ओरिजिनल प्राण जब इस कल्प का अंत आएगा। जब यह प्रलय प्रारंभ होगा तब जितने भी पदार्थ है अब स्वामी जी यह जो अपना जो ओरिजिनल वैदिक कांसेप्ट है ना कि यह आकाश आकाश में से पृथ्वी पृथ्वी में से जल ये जो पूरा है पंचमहाभूत जिसको कहते हैं वो एक के बाद एक कैसे प्रकट हुए तो स्वामी जी उसी स्टेप के माध्यम से कहते हैं कि जब ये प्रलय प्रारंभ होगा तो यह आकाश जो है मैटर जो है वो जल में परिणत होगा लिक्विड फॉर्म में फिर वो गैस में परिणत होगा अर्थात कि वायु में और फिर ये वायु जो है वो धीरे-धीरे करके ये हीट वाइब्रेशन है उसमें परिणत होगा। तो क्या है कि और फिर यह जो हीट वाइबेशंस है वो तन मात्रा है जो उसमें परिणत होंगे। तन मात्राएं सर्वप्रथम तन मात्रा जो है आकाश उसमें परिणत होगा। अभी देखिए यह पूरा जो कांसेप्ट है यह स्वामी जी वेदांत वेदांत और सांख्य बेसिकली सांख्य का यह जो सृष्टि का यह जो प्रारंभ है उसके बेस के ऊपर में लेते हैं। वेदांत ने भी इसी के आधार पर लिया है किंतु स्वामी जी वेदांत या सांख्य की कॉम्प्लेक्सिटी को थोड़ा सा हटा करके यह मॉडर्न साइंस जो है उसके साथ में मिलाना चाहते हैं। इसका एक परिणाम यह आया है कि स्वामी जी का यह जो एक्सप्लेनेशन है उसमें फोर्स और एनर्जी जो कि आज के मॉडर्न साइंस में एकदम फंडामेंटली डिफरेंट गिनी जाती है। वो उन दोनों को जैसे ना कि स्वामी जी में मिक्स हुआ सा दिखता है। तो यह एग्जैक्टली मॉडर्न साइंस की दृष्टि के अनुसार भी स्वामी जी की डेफिनेशन जो है वह फिट नहीं बैठती। और फिर यदि आप वेदांत या सांख्य के साथ में इसको कंपेयर करेंगे तो उनकी यह जो एक्सप्लेनेशन है कि किस तरह से पुरुष और प्रकृति दोनों के मिलन से सर्वप्रथम महत तत्व प्रकट हुआ। महत तत्व में से अहंकार प्रकट हुआ। अहंकार के यह जो सात्विक जो पार्ट है सात्विक राजसिक पार्ट उसमें से मन प्रकट हुआ। पंच ज्ञानेंद्रिय पंचकर्मेंद्रिय और फिर उसका जो तामसिक राजसिक पार्ट है उसमें से यह तन मात्राएं और यह पंचमहाभूत प्रकट हुए तो उसको भी ना एग्जैक्टली फॉलो नहीं करता। ऊपर ऊपर से करता हुआ सा दिखता है। किंतु आप ट्रेडिशनल सांख्य और वेदांत का स्टडी करेंगे तो स्वामी जी का एक्सप्लेनेशन आपको थोड़ा सा डिफरेंट डिफरेंट लगना शुरू होगा। तो यह जब मैं पढ़ता था ओरिजिनली पहली पहली बार तो मुझे यह प्रश्न सतत होता रहता था कि स्वामी जी किसको एग्जजेक्टली फॉलो कर रहे हैं? क्या अपनी यह जो हिंदू कॉस्मोलॉजी है जो कि सांख्य और वेदांत में कही गई है कि क्रिएशन ऑफ यूनिवर्स इस तरह से होता है। क्या उसको फॉलो कर रहे हैं ना कि मॉडर्न साइंस को फॉलो कर रहे हैं जो कि कहता है कि बेसिकली मैटर एनर्जी एक ही है। किंतु जब यह ग्रॉस लेवल पे जब आप आएंगे तो बेसिकली आपको मैटर, एनर्जी, फोर्स और डायमेंशन, स्पेस एंड टाइम यह आपको चार बेसिक एलिमेंट्स दिखेंगे। तो यह जो स्पष्टता जो मॉडर्न साइंस में है, इस तरह की स्पष्टता भी हमको स्वामी जी में नहीं दिखती। तो व्हाट इज बेसिकली स्वामी जी ट्राइंग टू अचीव? कि यह अपनी ये जो हिंदू कॉस्मोलॉजी है, उसका कुछ एलिमेंट्स लेकर के मॉडर्न कॉस्मोलॉजी है उसके साथ में फ्यूज कर देना चाहते हैं। तो इसका अर्थ क्या है? क्या स्वामी जी मॉडर्न लोगों को अच्छे से समझ में आए बोल के मॉडर्न कॉस्मोलॉजी का सहारा ले रहे हैं? ना कि शुगर कोटेड यह मेडिसिन अब मेडिसिन आप लेंगे ना मेडिसिन का जो टेस्ट होता है बड़ा ही वह बिटर टेस्ट होता है तो उसके ऊपर में शुगर का आवरण लगा देते हैं तो यह शुगर वो जो शुगर कोटेड पील जब आप गिलते हैं जब स्वेलो करते हैं तो ईजीली वो अपनी जीहवा से वो स्किड हो के भीतर में चली जाएगी उसका टेस्ट बिटर नहीं लगेगा जब भीतर में जाएगी तो ऊपर का शुगर जो है वो वो लेयर वो वो मेल्ट हो जाएगा और उसका जो बिटर मेडिसिन है वो अपनी ब्लड स्ट्रीम में फैलेगी। किंतु उसका बिटर टेस्ट हमको मुंह में डालने के समय नहीं लगेगा। तो यह स्वामी जी ये हिंदू कॉस्मोलॉजी को मॉडर्न कॉस्मोलॉजी से शुगर कोट कर रहे हैं। क्या कर रहे हैं? म दिस इज वन ऑफ द एक्सप्लेनेशन कि अल्टीमेट एक्सप्लेनेशन है कि स्वामी जी झूठ तो कुछ बोलेंगे नहीं। किसी को लुभा करके पटा करके कि ट्रिक करके किसी को कुछ एक्सप्लेन करेंगे नहीं। स्वामी जी का यह जो कॉस्मोलॉजिकल कांसेप्ट है क्रिएशन ऑफ द यूनिवर्स वो ठाकुर की अनुभूति और उनकी खुद की अनुभूति उसी के बेस पर ही होना चाहिए। ऑलरेडी हमको पता है कि ठाकुर को बहुत विभिन्न तरह के दर्शन होते थे। हमको यह भी पता है कि स्वामी जी को ब्रह्म योनि का दर्शन हुआ था। ये अप इनवर्टेड ट्रायंगल, अपसाइड डाउन ट्रायंगल, रिवर्स ट्रायंगल जिसमें से कि एक के बाद एक विश्व ब्रह्मांड की उत्पत्ति हो रही थी। तो स्वामी जी को यह सब दर्शन हुए हैं और उसी दर्शन के ऊपर में ही उन्होंने इस तरह से यहां से वेदांत से योग से और मॉडर्न कॉस्मोलॉजी से एलिमेंट्स लेकर के अपनी यह जो यूनिक एक्सप्लेनेशन है उसको एस्टैब्लिश किया है। तो अगेन कि पहला ऑप्शन है कि स्वामी जी सिर्फ हिंदू कॉस्मोलॉजी को ही फॉलो कर रहे हैं। मॉडर्न साइंस का शुगर कोटिंग किया है। यह थ्यरी मुझे ठीक नहीं लगती क्योंकि स्वामी जी का जो नेचर है उसके साथ में ये कंसिस्टेंट नहीं है। सत्य रक्षा सत्य वचन जो है इनका सबसे फंडामेंटल है ठाकुर मां स्वामी जी का तो सत्य रक्षा के लिए सत्य वचन के लिए जो सेकंड एक्सप्लेनेशन है कि यह जो स्वामी जी की एक्सप्लेनेशन है यह ठाकुर के विज़ और उनके खुद के विज़ के ऊपर में बनी है। तो यहां तक हम आए। इसके बाद में क्या कहते हैं? देन दिस प्राणा इज सेड टू स्लीप फॉर ए पीरियड। यह कल्प का अंत आ गया। प्रलय हुआ। उसके बाद में प्राण जो है कुछ समय के लिए सोता है। प्राण निष्प्राण हो जाता है। इट्स अ कंट्राडिक्शन इन टर्म्स। अगेन टू इमर्ज एंड टू थ्रो आउट ऑफ ऑल दिस फॉर्म्स एंड व्हेन दिस पीरियड विल एंड द होल थिंग विल सबसाइड अगेन। कुछ समय के बाद में प्राण में फिर से प्राण संचार होगा। फिर से नींद से जागृत होगा। फिर से यह सृष्टि स्थिति प्रलय का जो स साइकिल है प्रारंभ होगा और जब यह साइकिल एंड आएगा अह अंत आएगी तो फिर से सब कुछ यह ओरिजिनल आकाश और प्राण में आकर के सबसाइड हो जाएंगे। दस दिस प्रोसेस ऑफ क्रिएशन इज गोइंग डाउन एंड कमिंग अप ऑस्केलेटिंग बैकवर्ड्स एंड फॉरवर्ड्स। ऐसे ही यह सृष्टि स्थिति प्रलय की साइकिल चलती रहेगी, चलती रहेगी, प्रारंभ होगी, अंत आएगी, आगे बढ़ेगी, पीछे बढ़ेगी। ऑस्किलेशन चलता रहेगा। इन द लैंग्वेज ऑफ़ मॉडर्न साइंस इट इज़ बिकमिंग स्टैटिक ड्यूरिंग वन पीरियड एंड ड्यूरिंग अनदर पीरियड इट इज़ बिकमिंग डायनेमिक। आधुनिक विज्ञान की भाषा में कहें तो यह जो साइकिल है कभी रुक जाती है कभी चलना प्रारंभ हो जाती है। स्टैटिक एंड डायनेमिक। एट वन टाइम इट बिकम्स पोटेंशियल एंड द नेक्स्ट पीरियड इट बिकम्स एक्टिव। कभी-कभी वह अपने पोटेंशियल फॉर्म में रहती है। कभी-कभी एक्टिव फॉर्म में। दिस ऑल्टरेशन हैज़ गॉन ऑन थ्रू इटरनिटी। यह जो चक्र है सृष्टि स्थिति प्रलय का हमेशा के लिए चलता आ रहा है। अब ये इटरनिटी शब्द भी यहां पे यूज़ करना गड़बड़ गलत होगा। इसलिए क्योंकि इटरनिटी शब्द जो है इट इज़ पार्ट ऑफ द स्पेस टाइम डायमेंशन। स्पेस टाइम के परे क्या है? उसके बारे में इटरर्निटी शब्द यूज़ करना वो पूरा एक क्या है कि फिलॉसोफिकल कंट्राडिक्शन हो जाएगी। किंतु अगेन इतने हायर लेवल कांसेप्ट पे ये लैंग्वेज की ये जो शॉर्टकमिंग है वो हमारी नजर में आ ही जाएंगे। येट दिस एनालिसिस इज ओनली पार्शियल। किंतु यह जो एनालिसिस है वह पार्शियल ही है। अधूरा ही है। देखिए अभी यह आकाश और प्राण के परे क्या है? वह स्वामी जी बताते हैं। एक्चुअली ब्रह्मन नहीं ब्रह्मन के बाद में भी हमको पता है कि महत और अहम यह दो एलिमेंट है। तो यहां पर स्वामी जी इन दोनों को मिक्स करके एक ही तत्व बताते हैं। क्या कहते हैं? दिस मच हैज़ बीन नोन इवन टू मॉडर्न फिजिकल साइंस। अभी यह जो सृष्टि स्थिति प्रलय की साइकिल है, यह मैटर और एनर्जी है, यह स्पेस, टाइम, डायमेंशन है, यह फोर्सेस है। इतना तो आज के साइंटिस्ट को भी पता है। बियों्ड दैट। किंतु इसके परे द रिसर्च ऑफ फिजिकल साइंस कैन नॉट रीच। किंतु यह जो सृष्टि के प्रारंभ में क्या हुआ जिसको कि आजकल हम बिग बैंग कहते हैं उसके पहले क्या हुआ? यहां पर तो मॉडर्न साइंस भी नहीं जा पाएगा। और एक्चुअली देखिए कि स्वामी जी जब यह सब कुछ सिखा रहे थे। उस समय बिग बैंग रूपी थ्यरी का भी आविष्कार नहीं हुआ था। वे लोग तो यही समझते थे कि यूनिवर्स स्टैटिक है। उस समय ऐसा कोई एक रेडिकल आईडिया देना कि यूनिवर्स का प्रारंभ हुआ है और फिर यूनिवर्स का अंत भी आएगा, क्रिएशन भी है। यानी कि यह सृष्टि भी है और अंत भी है, प्रलय भी है। व्हिच इज वेरी रेडिकल आईडिया। अभी धर्म में है। धर्म कहता है कि भगवान ने सृष्टि की रचना की। किंतु उस समय का यूरोपियन साइंस वो इतना सेुलर था। आज एक्चुअली साइंस को सेुलर होना ही पड़ेगा। वो तो सब तो एक्सपेरिमेंट बेस है। तो उस समय का साइंस भी आज का साइंस भी वो धर्म को तो स्वीकार नहीं करेगा ना कि ये जैसे भगवान ने सृष्टि की रचना की वैसे ही ये मैटर और एनर्जी फोर्सेस और डायमेंशन मिलकर के ये कॉस्मोस या यूनिवर्स की रचना करेंगे। यह प्रारंभ होगा अंत आएगा। यह तो एकदम असंभव सी बात वे लोग समझते थे। ओनली लेटर ऑन कि आइंस्टाइन की जो डिस्कवरीज है उसके बेस पे धीरे-धीरे करके बाद में जो आज की जो मॉडर्न बिग बैंग थ्यरी है उसका डिस्कवरी हुआ है। वो भी एक बड़ी इंटरेस्टिंग कहानी है। किंतु खैर उसमें जाएंगे तो बड़ी लंबी बात चल जाएगी। किंतु स्वामी जी जब यह कहते हैं कि आज का मॉडर्न साइंस यह तो स्वीकार करता है कि कल्प का प्रारंभ और अंत है। वहां पर ही इज एक्चुअली प्रेडिक्टिंग द फ्यूचर कि भविष्य का साइंस स्वीकार करने वाला है। नहीं कि वो 18थ सेंचुरी 19th सेंचुरी का साइंस स्वीकार करता है। बट द इंक्वायरी डज़ नॉट स्टॉप इन क्सकुएंस। किंतु इसके परिणाम स्वरूप कि अच्छा अह कि सृष्टि और स्थिति और प्रलय तो होता है। क्रिएशन और डिस्ट्रक्शन तो होता है। यह किंतु इसके परे क्या है? अह प्रारंभ में क्या है? प्रारंभ के पहले क्या था? अंत के बाद में क्या है? यह जो स्पेस और टाइम तो ब्रह्मांड के भीतर में ही है। तो बिय्ड स्पेस एंड टाइम क्या है? तो इसके बारे में स्वामी जी कहते हैं, वी हैव नॉट येट फाउंड दैट आउट। वी हैव नॉट येट फाउंड दैट वन बाय नोइंग वि एवरीथिंग एल्स विल बी नोन। हमने अभी तक साइंस ने इस तरह का कुछ भी नहीं खोज निकाला जिसको जानने से सब कुछ जाना जा सकता है। यह हमारा उपनिषद का फेमस स्टेटमेंट कि ऐसा क्या है जिसको जानने से सब कुछ जाना जा सकता है। तो वो तो है ब्रह्मण। किंतु यहां पर स्वामी जी ब्राह्मण के पहले जो है या तो फिर ब्राह्मण के बाद की जो एंटिटी है महत उसके बारे में बात कर रहे हैं। वी हैव नॉट येट फाउंड वी हैव रिजॉल्व द होल यूनिवर्स इनू टू कंपोनेंट्स इनू व्हाट आर कॉल्ड मैटर एंड एनर्जी और व्हाट द एंशिएंट फिलॉसोफर ऑफ इंडिया कॉल्ड आकाश एंड प्राणा। हमने यह जो विश्व ब्रह्मांड का जितना भी वैविध्य है सब कुछ मैटर और एनर्जी या तो फिर आकाश और प्राण में हमने लेकर तो आए हैं कि हां इसी दो चीजों का सब कुछ होना चाहिए। किंतु फिर आकाश और प्राण किससे बने हैं? वो किस में मर्ज हो जाते हैं? तो कहते हैं द नेक्स्ट स्टेप इज टू रिजॉल्व दिस आकाश एंड प्राणा इनटू देयर ओरिजिन। अभी नेक्स्ट स्टेप है कि इवन आकाश और प्राण को भी उसका जो ओरिजिनल तत्व है उसमें लय कर देना है। बोथ कैन बी रिजोल्व इनू द स्टिल हायर एंटिटी वि इज कॉल्ड माइंड। आकाश और प्राण को भी उससे भी परे उससे भी एक उच्च तत्व है जिसमें यह मर्ज हो जाएंगे। और यह तत्व है माइंड। या तो फिर सांख्य की लैंग्वेज में कहेंगे महत्व। यह जो शरद महाराज ने हमको कहा कि एक विराट असीम अनंत मन में जगत रूपी कल्पना का उदय हुआ है। तो देखिए कि उसी बात को स्वामी जी यहां पर इस तरह से करते हैं। क्या कहते हैं कि विश्व ब्रह्मांड में जो कुछ भी है सब कुछ आकाश और प्राण में रिजॉल्व हो जाएगा। उसमें मिल जाएगा और आकाश और प्राण जाकर के यह मन है वैश्विक मन कॉस्मिक माइंड या तो कॉस्मिक कॉन्शियसनेस यूनिवर्सल कॉन्शियसनेस उसमें जाकर के मर्ज हो जाएंगे। इट इज आउट ऑफ दिस माइंड। इस मन के भीतर में से इस महत तत्व के भीतर में से इस कॉस्मिक कॉन्शियसनेस के भीतर में से द महत द यूनिवर्सली एकिस्टिंग थॉट पावर दैट दिस टू हैव बीन प्रोड्यूस्ड आउट ऑफ दिस माइंड इस मन के भीतर में से इस महत के भीतर में से एक यूनिवर्सली एकिस्टिंग थॉट पावर पूरे विश्व ब्रह्मांड में फैले हुए थॉट पावर में से आकाश और प्राण का उदय होता है प्रादुर दुर्भाव होता है। थॉट इज स्टिल फाइनर मैनिफेस्टेशन ऑफ बीइंग देन आइदर आकाश और प्राण। आकाश और प्राण भले ही चाहे सूक्ष्म हो किंतु सूक्ष्म से भी सूक्ष्मत है। यह थॉट या तो फिर कहेंगे कि यूनिवर्सल थॉट। या तो कहेंगे यूनिवर्सल कॉन्शियसनेस और महत्व। इट इज थॉट दैट स्पिल्स इटसेल्फ इनू दिस टू। दैट स्प्लिट्स इटसेल्फ इनू दिस टू। यह थॉट है, महत है जो कि अपने को आकाश और प्राण रूपी दो विभिन्न तत्वों में विभाजित करता है। स्प्लिट करता है, विभाजित करता है। द यूनिवर्सल थॉट एकिस्टेड इन द बिगिनिंग एंड दैट मैनिफेस्टेड चेंज्ड इवॉल्व इटसेल्फ इनू दिस टू आकाश एंड प्राण। यह जो यूनिवर्सल थॉट है, यह कॉस्मिक कॉन्शियसनेस है। विराट जो है, वह सबसे प्रारंभ में उसका ही अस्तित्व था। और उसी में से यह आखिर में चेंज होकर के मैनिफेस्ट होकर के इवॉल्व होकर के यह दो आकाश और प्राण बने। एंड बाय द कॉम्बिनेशन ऑफ दिस टू द होल यूनिवर्स हैज़ बीन प्रोड्यूस्ड। और आखिर में आकाश और प्राण के कॉम्बिनेशन से एक दूसरे के भीतर में इंटरेक्शन से यह पूरा विश्व ब्रह्मांड बना है। मैटर, एनर्जी, फोर्सेस और डायमेंशन। यदि आज का जो मॉडर्न साइंस की लैंग्वेज में सब कुछ यदि आपको उसके कंस्टीट पार्ट में डिॉल्व करना है तो बेसिकली ये फोर एलिमेंट होंगे। स्पेस टाइम, मैटर, एनर्जी और फोर्सेस। तो इसमें यह तो यह स्पेस टाइम मैटर एनर्जी और फोर्सेस जो है वह बने हैं आकाश और प्राण के और आकाश और प्राण बना है महत्व का महत तत्व या तो यह यूनिवर्सल कॉन्शियसनेस तो यह जो एक लेक्चर है रियल और अपेरेंट मैन उसमें से यह पैसेज लिया है किंतु और एक दूसरा लेक्चर है वेदांत फिलॉसोफी जिसमें कि स्वामी जी यह जो महत तत्व है उसके बारे में कुछ-कुछ और एक्स्ट्रा इंफॉर्मेशन देते हैं। क्या कहते हैं? नाउ देयर इज समथिंग बिय्ड आकाश एंड प्राण। यह वेदांत फिलॉसोफी नाम का लेक्चर है। फर्स्ट वॉल्यूम में है। उसमें से यह दो-तीन लाइन मैंने ली है। क्या कहते हैं स्वामी जी? आकाश और प्राण के परे भी कुछ है। पहले तो आकाश और प्राण का फिर से एक्सप्लेनेशन देते हैं उस लेक्चर में। और किंतु कहते हैं कि इन दोनों के परे कुछ है। बोथ कैन बी रिजोल्व इनू अ थर्ड थिंग कॉल्ड महत। द कॉस्मिक माइंड। ये दोनों उसको आप विलय कर सकते हैं एक तीसरी एंटिटी में तीसरे तत्व में जिसको हम कहेंगे महत या तो कॉस्मिक माइंड। दिस कॉस्मिक माइंड डस नॉट क्रिएट आकाश एंड प्राण बट चेंजेस इटसेल्फ इनू देम। यह कॉस्मिक माइंड में से आकाश और प्राण बनते नहीं है। किंतु यह कॉस्मिक माइंड ही आकाश और प्राण में रूपांतरित होता है। जैसे कि यह मकड़ी है। मकड़ी में से जाल बन रही है। मकड़ी की यह जो स्पाइडर है और स्पाइडर में से यह जो स्पाइडर वेव जो निकलती है, इस तरह से नहीं। यहां पे कहते हैं कि दूध का दही में परिणत होना। तो यह दूध जिस तरह से दही में परिणत होता है, वैसे ही यह महतत्व कॉस्मिक माइंड जो है आकाश और प्राण में परिणत होता है। ट्रांसफॉर्म होता है। यह वेदांत फिलॉसोफी में उसके बाद में और एक लेक्चर है द चीफ सिंबल। इसमें एक सेंटेंस है महत के बारे में क्या कहते हैं? द यूनिवर्सल थॉट इज महत। यह जो यूनिवर्सल थॉट है जिसमें यह आकाश और प्राण विलीन हो जाते हैं, उसको कहते हैं महत। द सांख्यस कॉल इट यूनिवर्सल कॉन्शियसनेस। सांख्यन जो है उसको कहते हैं यूनिवर्सल कॉन्शियसनेस। या तो फिर वैश्विक चित्त चित्त मंस कॉन्शियसनेस। तो ये वैश्विक चित्त ये तो एक इंडिविजुअल जो होता है कॉन्शियसनेस एक यून यूनिवर्सल कॉन्शियसनेस होता है। वो जो स्वामी जी ने कहा ना कॉस्मोस मैक्रोपोकोजम एंड माइक्रोकोपज्म इस तरह से। इसके बाद में एक और एक लेक्चर है स्टडी ऑफ सांख्य फिलोसोफी। इसमें थोड़ा सा और एक्सप्लेनेशन है। यू मस्ट रिमेंबर दैट द फर्स्ट मैनिफेस्टेशन ऑफ दिस प्रकृति इन द कॉस्मोस इज व्हाट द सांख्य कॉल्ड महत्व। आपको याद रखना है कि प्रकृति में से जब जगत की विश्व की रचना होती है तो सर्वप्रथम तत्व जो प्रकट होता है वो है महत्व। वी मे कॉल इट इंटेलिजेंस। हम इसको बुद्धि के नाम से भी पहचान सकते हैं। द ग्रेट प्रिंसिपल इट्स लिटरल मीनिंग महत्व का जो उसका जो लिटरल अर्थ है, शाब्दिक अर्थ वो है महान तत्व। महत्व है महान तत्व। द फर्स्ट चेंज इन प्रकृति इज दिस इंटेलिजेंस। आई वुड नॉट ट्रांसलेट इट बाय सेल्फ कॉन्शियसनेस। यह जो प्रकृति का सर्वप्रथम ट्रांसफॉर्मेशन है महत तत्व। इस महत तत्व को मैं सेल्फ कॉन्शियसनेस के रूप में ट्रांसलेट नहीं करूंगा। बिकॉज़ दैट वुड बी रॉन्ग। वह गलत होगा। कॉन्शियसनेस इज़ ओनली अ पार्ट ऑफ़ दिस इंटेलिजेंस। कॉन्शियसनेस जो है वो कॉस्मिक यह जो इंटेलिजेंस है उसका एक ही पार्ट है। महत इज़ यूनिवर्सल। महत यूनिवर्सल है। इट कवर्स ऑल द ग्राउंड्स ऑफ सबकॉन्शियसनेस, कॉन्शियसनेस एंड सुपरकॉन्शियसनेस। यह महत्व जो है वह सबकॉन्शियसनेस, कॉन्शियसनेस और सुपर कॉन्शियसनेस तीनों को कवर करता है। सो एनी वन स्टेट ऑफ कॉन्शियसनेस एज अपाइड टू दिस महत वुड नॉट बी ए सफिशिएंट। यानी कि यदि हम महत को कहेंगे कि महत है कॉन्शियसनेस तो भी गलत नहीं होगा। वो है सबकॉन्शियसनेस वो भी गलत होगा। सुपरकॉन्शियसनेस तो वह भी गलत होगा। इट कवर्स ऑल दिस ऑल दिस स्टेट्स। इन नेचर फॉर इंस्टेंस यू नॉट सर्टेन चेंजेस गोइंग ऑन बिफोर योर आईज वि यू सी एंड अंडरस्टैंड बट देयर आर अदर चेंजेस सो मच फाइनर दैट नो ह्यूमन परसेप्शन कैन कैच देम प्रकृति में आप बहुत सारे परिवर्तन बदलाव देखेंगे आपकी अब जैसे कि यह ऋतु जो चेंज होती है ना तो यह पत्तों का जो कलर है बदलता जाता है। अब जैसे ऑटम यह प्रारंभ होती है ऋतु तो यह पत्तों का कलर जो है वह लीले में से पीला ऑरेंज होना शुरू हो जाता है। यह समुंदर में बढ़ती ओठ आती है। हमारा जो एज एजिंग जो प्रोसेस है वृद्धावस्था आप हमारे 2 साल के तीन साल पहले पुराने पिक्चर देखिए और आज का पिक्चर देखिए। आपको स्पष्ट डिफरेंस दिखाई देता है। तो प्रकृति में बहुत सारे बदलाव हैं जो कि नजर से दिखते हैं। किंतु बहुत सारे बदलाव ऐसे भी है जिसको कि ना ही आप अपनी नजरों से पहचान पाएंगे ना ही यह टेलीिस्कोप या माइक्रोस्कोप से पहचान पाएंगे। ना ही यह फोटो लेकर के पहले वाला फोटो आज का फोटो उसको कंपेयर करके पहचान पाएंगे। इस तरह के बदलाव बड़े ही सूक्ष्म होते हैं। दे आर फ्रॉम द सेम कोज, द सेम महंत इज सेम महत इज मेकिंग दिस चेंजेस। इस तरह के सूक्ष्म बदलाव है वो भी इसी तरह से इस महत से ही बनते हैं। ये थोड़ा सा कॉम्प्लिकेटेड है। किंतु एटलीस्ट आज हमने पढ़ लिया। अभी इसके बारे में और थोड़ा सा ज्यादा डिस्कशन हम अभी आने वाले क्लासेस में करेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: इस गान का अर्थ क्या है -- ब्रह्माण्ड जब नहीं था, मुंडमाला कहा से मिली
हा ब्रह्मांडो छिलोना जखन तखन मुंडो माला कोथाई पेली वो जो मास्टर महाशय ये गान गाते हैं वो जो एक वेदांती जो है वो वेदांत समझा रहा है तो एक्चुअली ठाकुर ठाकुर का तो बड़ा क्लियर है ना कि यह जो ईश्वरीय तत्व है उसको किसी विज्ञान में आप फिट नहीं बिठा सकते। तो ठाकुर की ही इस बात को मास्टर महाशय कहते हैं ब्रह्मांड छिलोना जखन तखन मुंडमाला कोथाई पेली अर्थात कि ब्रह्मांड प्रारंभ होने से पहले तो मां काली थी मां काली यानी कि शक्ति और यह भगवान शिव यानी कि ब्राह्मण यह ब्राह्मण और शक्ति दोनों के मिलन से ही तो ब्रह्मांड प्रारंभ होता है। किंतु मां काली के गले में तो मुंडमाला है। अर्थात कि मनुष्य के कटे हुए सर की माला। तो ब्रह्मांड ही जब नहीं था तो यह मुंडमाला अर्थात कि मनुष्य के कटे हुए सर की माला कहां से मिली? क्योंकि मनुष्य तो ब्रह्मांड के प्रारंभ होने के बाद में ही प्रारंभ होते हैं। माने उनका जन्म होता है। तो सो जब अब मास्टर महाशय ने ऐसा कहा तो सामने वाला जो वेदांत ही बड़ा गुस्सा हो गया। वो कहता है कि ये सब बातें छोड़ो। वेदांत अलग है और यह अलग है। किंतु देखिए कि यह आपकी बात सही है। वेदांत यह जो हिंदू कॉस्मोलॉजी या मॉडर्न साइंस हम जितना भी इसको स्टडी करें अल्टीमेटली ईश्वर किस तरह से कार्य करते हैं, क्यों करते हैं, कैसे करते हैं? उसका 100% अंडरस्टैंडिंग हमको कभी नहीं मिलेगा।