prayer
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा लिखित साधक भाव उसका जो अवतरणी का है कि अवतार जीवन में साधना का क्या प्रयोजन है उसके बारे में शरद महाराज जो डिस्कशन कर रहे हैं उसमें से अभी हम आखिरी दो पॉइंट तक पहुंच गए हैं। अभी यह जो दो पॉइंट है इस चैप्टर
अवतार मनुष्य न होते तो उनकी साधना और तपस्या का कोई अर्थ न रहेगा
के आखिरी दो पॉइंट। इसमें शरद महाराज स्वामी शारदानंद जी महाराज हमको समझाते हैं कि ईश्वर नर देह धारण करके पृथ्वी पर जन्म ग्रहण करते हैं तो इसका प्रयोजन क्या है? अभी देखिए कि एक प्रयोजन उन्होंने इसके पहले वाले दो पॉइंट में हमको समझा दिया है। इस दो पॉइंट में शारदानंद जी महाराज क्या कहते हैं कि यदि ईश्वर पृथ्वी पर जन्म ग्रहण करते हैं, मनुष्य देह धारण करते हैं, तो मनुष्य देह की जो लिमिटेशंस है, जो असंपता है, उसमें से कुछ-कुछ वो ग्रहण करते हैं। हमको पता है कि मनुष्य देह या तो फिर मानव मन सत्व, रज, तमस इन तीन गुणों से बंधा है। पंच कक्लेश से बंधा है। षड रिपु से बंधा है। अष्टपाश से बंधा है। कामिनी कांचन के प्रति माया मोह तृष्णा से बंधा है। तो यह बंधन यह जो मन के जो हमारे बंधन है और इसके अलावा भी यह जितने भी जन्म जन्मांतर के हमारे कर्म गए हैं तो प्रत्येक जन्म में हमने जो कर्म किया है उसका अच्छा ना कि बुरा फल वह भी हमारे मन के साथ में जड़ित है। तो यह जो बंधन में पिंजरे में बद्ध मन है, वह मानव शरीर की मनुष्य अवतार की या तो मनुष्य जाति की पहचान है। तो ईश्वर यदि स्वयं मनुष्य का देह धारण करेंगे तो यह जो पंच क्लेश ना कि षडरिपु ना कि अष्टपाश उसका कुछ ना कुछ अंश उनको ग्रहण करना पड़ेगा। तभी तो वह मनुष्य कहलाएंगे। अदरवाइज तो वह ईश्वर ही है। यदि वह सर्वत्र व्यापी है ना कि यह पंचमहाभूत का मनुष्य देह धारण किया है। फर्क कुछ नहीं है। भीतर से तो वह ईश्वर ही है। तो उनको साधन करने की शुरुआत में यह अष्टपाश का कुछ ना कुछ अंश ग्रहण करना होगा और इस अंश से वह साधन भजन करके मुक्ति प्राप्त करेंगे। तो यदि ऐसा ना होता तो हम लोग ठाकुर की साधना या तो अवतार की साधना को देखकर के हताश ही होते। हमको कोई उद्यम या उत्साह हमारे भीतर में प्रवेश नहीं करता क्योंकि हम लोग सोच लेते कि अरे वह तो भगवान स्वयं है। वो 24 घंटे बैठकर के जब ध्यान करें तो करेंगे। वह यदि अपने मन में से यह जो काम भाव है उसको संपूर्ण दूरीभूत कर दे यदि संपूर्ण रूप से निकाल दे तो वह निकाल सकते हैं। हमारा मन तो काम भाव से भरा हुआ है। यदि यदि किसी सामने किसी को देखेंगे जिसका सौंदर्य अच्छा है तो उसको देखकर के ही हमारे मन में काम भाव प्रकट होता है। यदि अ दूसरों के ऊपर में अपना अधिकार जमाने की बात है। दूसरे लोग यदि हमारी प्रशंसा करते हैं तो हमारा हृदय कैसा वो खुशी से फूल उठता है। कैसा खुशी से वो मग्न हो जाता है। और यदि कोई हमारी निंदा करें या हमारे साथ में झगड़ा करें तो हम कैसे मायूस हो जाते हैं, उदासीन हो जाते हैं, दुखी हो जाते हैं। तो यह जो बाह्य जगत में जो कुछ चल रहा है वह तो मेरा मन जैसे कि एक मिरर की तरह एक आईने की तरह उसको रिफ्लेक्ट करता है। तो मेरे मन को मुझे ये जगत की ओर जो आईना है उससे हटा के ईश्वर की ओर घुमा देना है। ईश्वर को रिफ्लेक्ट करना चाहिए मेरा मन नहीं कि इस जगत को रिफ्लेक्ट करना चाहिए। तो किंतु इसीलिए कि बिकॉज़ कि मैं इन सब चीजों में इतना फंसा हुआ हूं। इसलिए मैं जब साधन भजन करता हूं तो मुझे लगता है कि यह साधन भजन करने की मेरी क्षमता बस यह थोड़ी सी ही है। इससे ज्यादा नहीं है। तो जब मैं अवतार को साधन भजन करते देखूंगा और जैसे कि अब
श्रीरामकृष्ण के सेवक ह्रदय राम की कहानी
हृदय जब हृदय शुरू-शुर में काली मंदिर में आया देखा कि ठाकुर को देखा कि उस समय तो ठाकुर यंग ही थे। उनकी उम्र 20 साल के आसपास की ही थी। जब वो पहली बार कोलकाता आकर के काली मंदिर में मां काली के पुजारी का पद ग्रहण किया था। उन दिनों की बात तो हृदय ने देखा कि ठाकुर वैसे तो हृदय और ठाकुर सब समय साथ-साथ में रहते थे। किंतु बीच-बीच में ठाकुर पता नहीं जब हृदय कुछ काम करने के लिए मंदिर में जाता या तो दोपहर को भोजन करने के लिए जाता तो देखता कि हृदय देखता कि मामा कहां गायब हो गए हैं। ठाकुर हृदय के मामा थे। उनकी तो फिर क्या है कि वह सोचता था मामा कहां गायब हो गए हैं। तो फिर उनको खोजते-खोजते एक बार देखा कि वो पंचवटी की ओर जा रहे हैं। तो हृदय ने सोचा कि ये मामा वहां पर क्यों जा रहे हैं? एक बार पीछा करके देखा तो आश्चर्यचकित हो गया। जो दृश्य उसने देखा। ठाकुर ने वस्त्र है। फिर यह जो जनेऊ है वह दोनों को निकाल कर के संपूर्ण रूप से दिगंबर होकर के वहां पर इमली का पेड़ था। उसके नीचे में बैठकर के ध्यान कर रहे थे। तो हृदय को लगा कि यह पागल हो गए हैं ना क्या मामा उनके? क्योंकि इस तरह ध्यान करना है तो करो। किंतु इस तरह से दिगंबर होकर के इस जंगल में बैठकर के ध्यान करने की क्या जरूरत है? तो फिर वह ठाकुर के पास जाकर के खड़े होकर के पूछने लगा कि यह क्या हो रहा है? क्यों दिगंबर होकर के ध्यान कर रहे हो? तो फिर ठाकुर ने कहा कि देखो यह जो अष्टपाश है लज्जा, घृणा, भय, जाति, शील, कुल, मान, अभिमान इन सब से मुक्त होकर के साधना करनी चाहिए। ध्यान करना चाहिए। तभी तो यह ध्यान ठीक-ठीक होगा। तो हृदय सोचता है कि इस तरह की बात तो उसने कभी सुनी नहीं है। हालांकि उसका बुद्धि लिमिटेड था तो वैसे भी उसने ज्यादा कुछ सुना नहीं था। किंतु जो भी है देखिए कि ठाकुर को इस तरह से ध्यान करते हुए देखकर के हृदय को ऐसा तो लगेगा कि वह जब ध्यान करने को बैठता है तो वह तो डिफरेंट तरह का करता है। सब कुछ वो जो बहुत दिनों की बात बाद की बात है। उस समय वराह नगर मठ एस्टैब्लिश हो चुका था। यह सब गुरु भाई वहां पर रहते थे और एक दिन हृदय वहां पर आया तो हृदय क्या करता था तो वह गलीगली जाकर के कपड़े बेचता था कपड़ों का सेल्समैन था और साथ में उसका छोटा बच्चा अभी माने कहां वो युगावतार की सेवा कर रहा था एक समय था मथुर बाबू स्वयं मथुर बाबू यानी कि उस समय के कोलकाता के जो सबसे धनी और जिनको कि गणियामान्य प्रतिष्ठित व्यक्ति कहते हैं वो और इतना भव्य काली काली मंदिर उसमें जैसे कि उसका एक माने उसका जैसे कि इतना सम्मान था वही हृदय अभी घर-घर जाकर कपड़े बेचता है तो जो भी है वो आया वरा नगर तो राजा महाराज बैठे थे तो राजा महाराज स्वामी ब्रह्मानंद तो राजा महाराज ने उनको देखकर के कहा हृदय को कि अरे तुम तो पहले एकदम गुंडे की तरह सशक्त थे लंबे चौड़े थे अभी ये तुम्हारे शरीर को क्या हो गया दुबले पतले हो गए छाती वो जो चेस्ट होता है पूरी वह भीतर में चली गई है वह चेहरा पूरा सूख गया है। क्या माजरा क्या है? क्या ऐसा ऐसा क्यों हुआ तुम्हारे साथ में? तो हृदय कहता है कि अरे देखिए एक रात में तीन-चार भैरवी चक्र करेंगे तो ऐसा ही होगा ना। अभी राजा महाराज इस बात को सुन के नाराज हो गए। बोले अरे तुम्हारा लड़का यहां पर खड़ा है क्या? उसके सामने पागल की तरह बात कर रहे हो। तो जो भी है भैरवी चक्र का यही अर्थ है कि वो स्त्रियों के साथ में मिलकर के साधना करना। फिर वह साधना कहां वह काम साधना में परिणत हो जाएगी कुछ ठीक नहीं है। एक रात में तीन-चार भैरवी चक्र यानी कि तीन-चार जगह पर जाकर वह करेगा ऐसा तो फिर उसका शरीर और मन के साथ में क्या होगा? तो देखिए कि एक आम आदमी जब साधना करने को बैठता है तो उसके मन में जो चारों ओर से कामना वासना का यह प्रवाह आकर के ऐसा तूफान मचाएगा कि कुछ ही क्षणों के बाद में यह साधक खड़ा होकर के बोलेगा कि इससे अच्छा है कि मैं कोई काम करूं। काम को लेकर के रहूंगा। मेरा दिमाग ठीक रहेगा। वरना आंख बंद करके बैठता हूं। अपने मन में से सभी विचारों को निकाल देता हूं। ईश्वर को लाने का प्रयास करता हूं तो ईश्वर तो आते नहीं है। यह शैतान घुस जाता है खाली मन के भीतर में। इसलिए बहुत सारे लोग कहते
जिस क्षण हम साधना करने के लिए अपने मन को संसार से उठा लेते हैं, लाखों विचलित करने वाले, विनाशकारी विचार हमारे मन पर आक्रमण कर देते हैं।
हैं कि एम्प्टी माइंड इज अ डेविल्स वर्कशॉप। खाली दिमाग जो होता है शैतान का घर होता है। जैसे ही आध्यात्मिक साधना में हमने पैर रखने की शुरुआत की वैसे ही इस समस्या का हमको सामना करना पड़ेगा। जब तक हम एक सामान्य जीवन जी रहे हैं। मैं यदि स्टूडेंट हूं तो सुबह को उठकर के मेरा तो यही टेंशन है कि आज स्कूल में जाना है। होमवर्क जो दिया था वो मैंने किया कि नहीं यह जो सब्जेक्ट मैटर मुझे सीखने को मिल रहा है वहां पर उसको मैं ठीक से समझ पा रहा हूं कि नहीं। कि कुछ दिनों के बाद में परीक्षा आ रही है तो परीक्षा में मेरा क्या वो परसेंटेज क्या मार्क्स आएंगे उसका मुझे चिंता करना है। शाम होती है तो फिर यह फ्रेंड सर्कल होता है। देखिए बच्चों का भी एक सोशल लाइफ होता है। स्टूडेंट्स का ये कॉलेज स्टूडेंट्स का स्कूल स्टूडेंट का ये जो सोशल लाइफ को लेके ये बड़े टेंशन में रहते हैं। उनका मित्र फिर उस मित्र के साथ में क्या बात करनी है? उसने उसको क्या कहा? उसने उसको क्या कहा? वो खेलतेखेलते वह झगड़ा हो गया। यह सब यह जो समर कैंप कर रहा था देखिए हम लोग बड़े होते तो हम लोग तो सब भूल जाते हैं ना यह सब चीजें कि बचपन में होती थी और मैं तो साधु हूं तो वैसे ही ये तो ऐसा बच्चों के साथ ऐसा कोई संपर्क जनरली नहीं रहता। ये समर कैंप में मुझे सब याद आ गया। ये दो लड़के आकर मुझे रोते-रोते कहते हैं इसने मुझे मारा। तो दूसरा कहता है नहीं पहले इसने मारा इसलिए मैंने मारा। तो यह सब जो होता है स्टूडेंट लाइफ में तो जब तक यह सब चलता रहता है तब तक बेनिफिट यह है कि आपका मन जो भी है टेंशन है भविष्य की चिंता है उसी को लेकर रहेगा किंतु जैसे ही आप आंख बंद करके ईश्वर का नाम गुणगान करने का प्रयास कीजिए। जैसे ही आप अपने मन में से यह स्कूल की चिंता ना कि नौकरी की चिंता ना कि बिजनेस की चिंता ना कि घर परिवार की चिंता फाइनेंस की चिंता बैंक बैलेंस कितना है यदि बीमारी है घर में यह सब चिंताओं से अपने मन को मुक्त करने का प्रयास करके देखिए देखिए क्या होता है माने भगवान तो दूर की बात है यह चिंताएं भी अच्छी लगेगी इस तरह के भयावह विचार आकर के मन में बैठ जाएंगे यदि यदि हम सिंसियर हैं, सिंसियरली अपने मन को चिंता मुक्त करने का प्रयास करते हैं, तो यह क्राइसिस हमको करनी ही पड़ेगी फेस। और यह क्राइसिस दिन प्रतिदिन जो सिंसियर साधक प्रतिदिन बैठकर के एटलीस्ट एक घंटा साधना करता है। देखिए कि आध्यात्मिक जीवन के जो पथिक है उनको हम दो विभाग में बांट सकते हैं। मैंने जो मेरा खुद का ऑब्जरवेशन है रामकृष्ण मिशन में ऑलमोस्ट मैं 20 साल से हूं। साधुओं को देखता हूं, भक्तों को देखता हूं। सबको देखता हूं। मेरा जो ऑब्जरवेशन है यह जितने
साधकों की दो श्रेणियाँ
भी लोग यहां पर हैं इंक्लूडिंग अस साधु साधु भक्त सब मिलकर के दो कैटेगरी में आप बांट सकते हैं। एक कैटेगरी है कि जो लोग प्रतिदिन नियमित रूप से एटलीस्ट एक घंटा साधन भजन करते हैं। जप ध्यान करते हैं। ये साधन भजन में मैं किताबों का पढ़ना या तो कर्म योग ये या तो फिर आरती अटेंड करना इन सबको इंक्लूड नहीं कर रहा हूं। रामकृष्ण संघ की साधन की व्याख्या बड़ी विशाल है। इस व्याख्या में यदि आप दिन के 24 घंटे इसमें डाल सकते हैं। कर्म योग यानी कि दिन के दौरान जो कुछ करते हैं वह सब ईश्वर को अर्पण करके करना है। यदि पुजारी महाराज पूजा करते हैं। अकाउंटेंट महाराज अकाउंट देखते हैं। डॉक्टर महाराज डिस्पेंसरी चलाते हैं। एडिटर महाराज एडिटिंग करते हैं। भंडारी महाराज भंडार देखते हैं। सब कुछ ईश्वर को अर्पण करके करना है। तो यह तो पूरा दिन साधना हो ही गया। फिर जैसे कि स्वाध्याय योग है जो ईश्वर का जो किताबें हैं ठाकुर मां स्वामी जी की वह पढ़ना वह भी साधना है। फिर यह भक्ति योग है। मंदिर में तो उत्सव आरती, संध्या आरती, मंगल आरती चलती ही रहती है। तो यह ऐसी ब्रॉड डेफिनेशन को नहीं ले रहा हूं। यहां पे मैं सिर्फ जप ध्यान को ले रहा हूं। मेडिटेशन को सिर्फ ले रहा हूं। तो ब्रॉडली टू कैटेगरी में आप सबको बांट सकते हैं। एक कैटेगरी के प्रथम कैटेगरी के साधक थे कि प्रतिदिन नियमित रूप से एटलीस्ट एक घंटा जप ध्यान करेंगे। और दूसरी कैटेगरी है कि यह नहीं करेंगे। यानी कि एटलीस्ट एक घंटा प्रतिदिन बैठकर के जप ध्यान ये लोग नहीं करेंगे। बाकी सब कुछ करेंगे। जैसे भक्त हैं वलंटियर है तो आश्रम में आकर के सेवा दी है। फिर यह संध्या आरती अटेंड करते हैं। संध्या आरती आधा पौना घंटा तो निकल ही जाती है। प्राय सभी आश्रमों में यदि आप जाएंगे संध्या आरती के बाद में भजन भी होते हैं। प्रवचन भी होते हैं। तो यह सब आप अटेंड करेंगे। आपका एकद घंटा आराम से निकल जाएगा। किन आप घर जाकर के कथामृत पढ़िए। बहुत अच्छी बात है। हमारे कुछ कुछ रामकृष्ण संघ के आश्रमों में साधुओं में तो यह है ही है प्रथा कि प्रतिदिन रात को खाने के बाद में सभी साधु लोग इकट्ठा होकर के ठाकुर मां स्वामी जी की कोई भी पुस्तक का पाठ करते हैं। तो यह अपनी प्रथा मैंने बहुत सारे भक्तों के घर भी देखी है कि वे लोग भी रात को आहार के बाद में घर के जितने भी है हस्बैंड वाइफ बच्चे बच्चियां जो भी है नाना नानी पोतापोती सभी लोग बैठकर के एक साथ में कथामृत का पाठ करते हैं तो दिस इज वेरी गुड किंतु यह सबको छोड़कर के एक्सक्लूसिवली जब ध्यान करना मिनिमम 1 घंटा बैठकर के ऐसा करने वाले मैंने देखा कि कुछ ही लोग हैं बहुत ज्यादा नहीं है। बहुत सारा हम लोगों के भीतर में श्रद्धा होती है ठाकुर के प्रति भक्त है तो साधुओं के प्रति श्रद्धा होती है। ऐसे बहुत सारे राजकोट का मैंने देखा और जनरली सभी आश्रमों में मैं देखता हूं यहां पे भी कि कुछ भक्त हैं नियमित रूप से संध्या आरती मंगल आरती में आएंगे। यहां पे भी विशाखापट्टनम में भी मैं देख रहा हूं कि कुछ-कुछ डिवोटी रेयरली वे लोग संध्या आरती मंगल आरती मिस करेंगे। इतना नियमित उनको देखकर के मुझे शर्म आती है कभी-कभी मुझे कभी-कभी लगता है अरे सुबह हुआ अभी इतने अर्ली मॉर्निंग उठकर के मंगल आरती जाना है चलो आज थोड़ा सा सो ले किंतु फिर याद आता है अरे वो डिवोटी वहां पर बैठा हुआ है वो अपना घर छोड़कर के बैठा हूं मैं साधु होकर के नहीं जा पा रहा हूं तो फिर लज्जा के मारे हमको भी जाना पड़ता है तो देखिए कि इतना रेगुलैरिटी मेंटेन करने वाले डिवोटी है अपने ऑर्डर में कोई कोई डिवोटी है कि बहुत पढ़ाई लिखाई करते हैं। मुझे यदि कोई प्रश्न होगा तो मैं उनको प्रश्न करूंगा। अच्छा इस किताब में उसके बारे में क्या लिखा है तो मुझे फटाक करके उत्तर दे देंगे। तो ऐसे भी डिवोटी है। किंतु वो सबको छोड़कर के सिर्फ जब ध्यान वाला क्राइटेरिया यदि हम रखें तो मैंने देखा है कि जब ध्यान प्रतिदिन एटलीस्ट एक घंटा नियमित रूप से करें। उन लोगों का कैटेगरी ही डिफरेंट है। बाकी आप सब कुछ कर लीजिए और साथ में यह कर लीजिए। यह पूरा कैटेगरी आपका डिफरेंट कैटेगरी है। वह आपको पूरा राजमार्ग की तरह है ईश्वर की ओर ले जाने का। आपके भीतर में जो इवोल्यूशन होता है आध्यात्मिक जीवन का, ईश्वर के प्रति शरणागति का और ये जो मन की वासनाएं तृष्णाएं हैं उनसे मुक्त होने का वो पूरा एक अलग लेवल पर होता है। इस तरह के भक्त या तो साधु जैसे-जैसे समय पसार होता जाएगा, उनके भीतर में से ना एक उनका वर्तन, उनका वाणी, उनका व्यक्तित्व उसमें से एक तरह का प्रकाश फैलने लगेगा, ओजस फैलने लगेगा और आप स्वतः उनकी ओर आकर्षित होंगे देखकर के कि हां इनके उन्होंने सही में अपने जीवन में कुछ ना कुछ पाया है। तो यह दो कैटेगरी आप देखिए। प्रतिदिन मिनिमम एक घंटा जब ध्यान करना और आप यह नहीं करके आधा घंटा करेंगे बीच-बीच में करेंगे कभी छूट जाएगा और फिर बाकी सब आप कर रहे हैं तो यह सेकंड कैटेगरी को आप
यदि हम नियमित रूप से एक घंटा जप-ध्यान करें, तो हम पाएंगे कि बुरे विचार हमारे मन पर आक्रमण कर हमारी साधना को नष्ट करने का प्रयास करते हैं।
देखिए। यह दोनों कैटेगरी उसमें से जो प्रथम कैटेगरी की जो बात कर रहा हूं प्रतिदिन नियमित बैठकर के यह लोग जब ध्यान करेंगे उनको यह बात बहुत अच्छे से पता है कि यदि मैं सिंसियरली आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ने को जाता हूं तो यह विश्वामित्र ऋषि जो थे उनके जैसी कहानी हम सबकी होती है। वह इंद्र भयभीत हो जाता है। फिर वह अप्सराओं को भेजता है कि ऋषि की तपस्या भंग करो वरना तो फिर मेरा इंद्रासन चला जाएगा। तो यह जो सनातन कहानी है हम सबके मन के भीतर में उसका वह जो एक रिप्ले होना शुरू हो जाता है। ठाकुर की वह कहानी है कि
कहानी: काम-कांचन श्रीरामकृष्ण को लुभाने के लिए उनके सामने प्रकट होते है
पंचवटी के नीचे खड़े थे बैठे थे और देखा कि एक गोरा खलासी उनके सामने प्रकट होता है। उसके हाथ में बड़ा सा एक थाल है। थाला है। इस थाले के ऊपर में संदेश पूरा ढग करके संदेश रखे हुए हैं। सोना मोहर रखी हुई है। जवाहरात रखे हुए हैं, वस्त्र रखे हुए हैं और उसके पास में दो सुंदरी स्त्रियां है और नाक में नथ पहनी हुई है। यहां तक का ठाकुर का इतना डिटेल डिस्क्रिप्शन और फिर यह कहता है गोरा खलासी। यह साधना भंग करो तो यह जो कुछ भी है ऐश्वर्य धन वैभव मान सुख जमीन जायदाद राजस राजसत्व पूरे विश्व का सब कुछ तुमको दे दूंगा तो ठाकुर कहते हैं कि मैं रोते-रोते मां को पुकारने लगा और मां ने आकर के फिर इन सबको भगा दिया वहां से तो भगवान बुद्ध की कहानी है कि वह आखिरी घड़ी में निर्वाण प्राप्त होने से पहले वो मारा रूपी कि जो मन को लुभाने वाला राक्षस है वह आकर के पहले डर दिखाता है फिर प्रलोभन देता है वो सबसे वो भगवान बुद्ध निर्लिप्त रहे तो उन्होंने निर्वाण प्राप्त कर लिया तो क्या है कि आध्यात्मिक जगत में जैसे ही प्रवेश करते हैं अपने मन को जगत से दूर करने का जैसा ही प्रयास प्रारंभ करते हैं प्रतिदिन मिनिमम एक घंटा जब ध्यान मेडिटेशन करने का प्रयास करते हैं वैसे ही यह जैसे कि राक्षसी आसुरी शक्तियां जागृत हो जाएगी। इससे पहले इस बात का हमको पता ही नहीं चलेगा। जैसे मैंने कहा एक नॉर्मल डिवोटी की तरह प्रतिदिन आप यदि मंदिर में आइए। संध्या आरती मंगल आरती हो सके तो वह प्रतिदिन अटेंड कीजिए। क्लासेस अटेंड कीजिए। प्रवचन अटेंड कीजिए। साधु संग कीजिए। तीर्थ यात्रा कीजिए। यह आजकल तो रिट्रीट चारों ओर हो रहा है। रिट्रीट अटेंड कीजिए। यह सब है क्या कि आपको मन को एक तरह से कन्विंस करने का प्रयास है कि हां मैं अपने आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ रहा हूं। किंतु यह सब तो है तो एक्सटर्नल जगत में बाह्य जगत में एक्सटर्नल वर्ल्ड में और जब तक आप इस एक्सटर्नल वर्ल्ड में डूबे रहेंगे अपने आपको यह कन्विंस करने का अपने आपको यह पटाने का यह प्रयास करते रहेंगे कि हां मैं रिट्रीट अटेंड किया। मैं क्लासेस अटेंड करता हूं। मैं आरती अटेंड करता हूं। वहां पर जो आश्रम के जो उत्सव है वह अटेंड करता हूं। यह तो मैं कितना अच्छा सा मेरा आध्यात्मिक जीवन है। इस तरह से जितना आप अपने मन को पटाने का प्रयास करेंगे, उतना ही यह जो आसुरी शक्तियां है, वह खुश रहेगी कि आप सही-सही में एक आंतर जगत है, इनर वर्ल्ड है, इनर कॉस्मोस है, उसमें आपने प्रवेश किया ही नहीं है। जैसे ही आप प्रवेश करेंगे, जैसे ही अपने मन को इस बाह्य अवलंबनों से जैसा ही काट करके भीतर में झांकने का प्रयास करेंगे, वैसे ही यह आसुरी शक्तियां जागृत हो जाएगी और साथ-साथ में ही आपके मन के ऊपर में ऐसा भयानक आक्रमण करेगी कि आप
कहानी: कश्मीर में एक तांत्रिक स्वामीजी पर जादू-टोना करता है
जैसे वह जो स्वामी जी के साथ में हुआ था ना कि कश्मीर गए थे। एक तांत्रिक का चेला स्वामी जी के पास में आता है। तो वह तांत्रिक बड़ा नाराज हो गया। सोचा कि स्वामी जी मेरे चेले को चुरा रहे हैं। तो फिर स्वामी जी के पर पता नहीं क्या जादू टोना किया। स्वामी जी को कश्मीर से मां को मां के पास आकर केक आकर के मां के पास आकर के स्वामी जी कहते हैं मां आ के हाकते हाकते पालीते हो लोग। माने वो माने वो शौच करतेकरते भाग करके यहां पे आना पड़ा। ऐसी परिस्थिति स्वामी जी की हो गई थी। तब मां ने कहा कि शक्ति मानते हो वही की। माने ये ठाकुर तो गढ़ भांगते ऐसे नहीं ठाकुर तो गढ़ते ऐसे छे तो ये देखिए कि ये जो जैसे ही भीतर में प्रया प्रवेश करने का यह प्रयास किया हमने हम सबके साथ में इस तरह की आसुरी शक्तियां जागृत होकर के आ जाएगी हमारे मन को प्रलोभित करने का प्रयास करेगी और हम उस समय साधना को छोड़कर के दौड़ कर के भाग करके वहां से निकल कर के चले जाएंगे आएंगे। तो यह सब हमने फेस किया है। अभी यह सब फेस करके जब हम ठाकुर को देखते हैं, लीला प्रसंग पढ़ते हैं, कथामृत पढ़ते हैं और वह पढ़कर के हमको यह दिखता है कि अरे ठाकुर तो एक बार
कहानी: जप-ध्यान करते समय दिव्य शक्तियां श्रीरामकृष्ण की रक्षा करती हैं
जप करने को बैठते हैं तो फिर होता क्या है? जैसे कि उनके अंग प्रत्यंग जितने भी जॉइंट है ठाकुर के शरीर के इन सबके जैसे कि कोई लोक लगा दे रहा है कोई ताला लगा दे रहा है ऐसे खट खट करके ताला लगते लगते उनके सभी जो जॉइंट्स सभी ये जो संधि है ये जो अंग वो सब जैसे कि लॉक हो जाएंगे ठाकुर स्थिर होकर के बैठ जाएंगे और जब तक ध्यान समाप्त नहीं होगा तब तक वैसे ही बैठे रहेंगे जैसे ही ध्यान समाप्त होता है तो यह जितने भी ताले हैं फिर से खटखट करके खुलना शुरू होंगे और तभी ठाकुर थोड़ा बहुत मूवमेंट कर पाएंगे खड़े हो पाएंगे। यहां तक कि ठाकुर देखते हैं कि मेरी ही तरह का और एक सन्यासी मेरे सामने त्रिशूल लेकर के बैठता है और यह सन्यासी कहता है कि ठीक ठीक जप करो। अपने मन को एकाग्र रखो वरना तो यह त्रिशूल तुम्हारे सीने में मार दूंगा। तो इस तरह से वह सन्यासी आकर के ठाकुर को भय दिखाता है। यह जो काली मंदिर में प्रवेश करने के समय मां काली के गर्भ ग्रुप में प्रवेश करने के जो सीढ़ी है यदि आप दक्षिणेश्वर गए होंगे मां काली के मंदिर का दर्शन किया होगा तो आपने यह सीढ़ी ऊपर में उठते उठते यदि पीछे में जो यह है जहां पे वो क्या कहेंगे उस नाट मंदिर जो नाट मंदिर है पीछे में तो नाट मंदिर की छत के ऊपर में एक भैरव की मूर्ति देखी होगी तो वह ठाकुर जब जब भी यह मां के मंदिर में प्रवेश करते हैं तो वह भैरव को देखकर के मां को प्रार्थना करके कहते हैं कि मां यह भैरव जिस तरह से स्थिर होकर के पत्थर की मूर्ति है तो पत्थर की मूर्ति तो कभी हलन-चलन नहीं करने वाली है। तो इस तरह से संपूर्ण रूप से स्थिर होकर के मैं बैठूं और मैं अह ध्यान करूं, जप करूं ऐसा मुझे आशीर्वाद दो। तो इस तरह से ठाकुर मां को प्रार्थना करते हैं और सही-सही में हम हमने देखा है कि ठाकुर कहते हैं कि सर के ऊपर में आकर के चिड़िया अपना खोसला बना देती थी। इस तरह से वो वो जप करते थे। इतना स्थिर होकर के वह जप कर सकते थे। इतना स्थिर होकर के ध्यान कर सकते थे। कथामृत में एक वर्णन है। ठाकुर मास्टर महाशय को कहते हैं कि देखो अभी मैं माला के ऊपर में जप कर ही नहीं सकता। जैसे ही मैं माला लेकर के एक जप करने का प्रयास करूंगा फट करके मेरा मन समाधि में मग्न हो जाएगा। बोलकर के ठाकुर प्रयास करते हैं हाथ में माला लेकर के जप करने का देखा कि साथ-साथ में ही वह समाधि में डूब गए। तो देखिए कि एक और हमारा मन है। जैसे ही अपने मन को जगत के बाह्य अवलंबनों के विचारों से दूर करके ईश्वर में परोने का प्रयास किया। वैसे ही ऐसी आसुरी शक्तियां आकर के हमारे मन को ऐसा तोलपाड़ कर देगी, ऐसा तहसनहस कर देगी कि हम लोग मेरा खुद के साथ में मैं अपना खुद का अनुभव बताता हूं। शुरू शुरू में जैसे मैंने कहा था एक बार कि हम लोगों को मैंने बेलूर मठ ज्वाइन करने के लिए गया था। तो हमारा नियम क्या था कि वहां पे स्वामी जी का मंदिर है। पीछे में गंगा बह रही है। संध्या आरती के बाद में स्वामी जी के मंदिर का समाधि मंदिर का जो फर्स्ट फ्लोर है गंगा की ओर मुंह करके सबको आसन लेकर के वहां पर जप ध्यान करने को बैठना है। एक घंटा मिनिमम बैठना है। नहीं बैठेंगे तो हमारे पीछे वो मॉनिटर बैठा रहता है। हमारे में से ही एक ब्रह्मचारी वो जाकर के सुहितानंद जी को बोलेगा सुहितानंद जी हमारे इंचार्ज थे उस समय तो सुहितानंद जी बुला के कह देंगे कि यदि तुम एक घंटा नहीं बैठ पाते हो तो तुम घर चले जाओ तो उस समय मैंने पहली बार इस बात को फेस किया था एक घंटा आपका शरीर तो बैठता है किंतु आपका जो मन है पूरे जगत में दौड़ता है। अच्छा जब तक पूरे जगत में दौड़ता रहता है तब तक फिर भी आपको कोई हानि नहीं है। किंतु आप सिंसियरली उस दौड़ते हुए मन को पकड़ करके एक ठिकाने पर बिठाने का प्रयास कीजिए। यह कैसा है पता है? एक छोटा बच्चा जो होता है यह समर कैंप की अगेन उदाहरण देता हूं। ये जैसे वो रिसेस होती है कि वो क्लास के आगे पीछे का समय होता है। छोटे-छोटे बच्चे बड़े बच्चे फिर भी थोड़ा सा मैच्योर हो जाते हैं किंतु डिसिप्लिन हो जाते हैं। छोटे-छोटे बच्चे खड़े होकर के पूरे होल में दौड़ना शुरू करेंगे। उनको यदि आप पकड़ कर के एक जगह पर बिठाएंगे तो ऐसा मुंह करके ऐसा वो जैसे कि आपने उनके ऊपर में कितना अत्याचार किया है। ऐसा दुखी होकर के बैठे रहेंगे। फिर जैसे ही उनको मौका मिला आपकी नजर इधर-उधर हुई फिर से वह खड़े होकर दौड़ना शुरू करेंगे। तो यह मन भी ऐसा है। यदि आप पकड़ कर के बार-बार उसको एक जगह पर बिठाएंगे तो थोड़ा नाराज हो जाएगा। जैसे ही आपका यह जो एकाग्रता है थोड़ी सी भी भंग होगी फिर से दौड़ना शुरू करेगा। किंतु इस इनिशियल स्ट्रगल से पार होकर के आपने यदि सिंसियरली आप सक्सेसफुल हुए अपने मन को एक जगह पर बिठाने के बाद में क्या होगा कि सही-सही में यह आसुरी शक्तियां आएगी और उस समय आपको ऐसा लगेगा कि यह आसुरी शक्तियां हमारे मन को जिस तरह से तहस-नहस कर रही है। इससे बेटर है कि वह कान में वह ईयरफोन लगा करके कोई भजन सुनते-सुनते लेट जाए या तो कोई किताब पढ़ते रहे ना कि वह कहीं वो कोई YouTube पर कोई क्लास सुने कोई आध्यात्मिक प्रवचन सुने ना कि फिर यदि थोड़ी ज्यादा पॉसिबिलिटी है संभावना है मंदिर आसपास में है तो कहीं मंदिर में जाकर के बैठे इज मच बेटर देन कि यह खाली मन के भीतर में यह सब फालतू के विचार आते हैं। उलट-पुलट विचार आते हैं। उससे वह सब चीजें बड़ी बेटर है। किंतु देखिए कि आध्यात्मिक जीवन आप यह जो आसुरी शक्तियां है जो हमारे मन को विचलित करने का प्रयास करती है। उसके साथ में युद्ध करके जब तक आप इस आसुरी शक्तियों पर विजय प्राप्त नहीं करेंगे तब तक आध्यात्मिक जीवन में बहुत ज्यादा कुछ आगे बढ़ने की संभावना नहीं है। आप अपने जागतिक जीवन में चाहे जो कुछ भी कर लीजिए माने जो धर्म शास्त्र में कहा गया है सभी चीजों का अनुष्ठान कर लीजिए अपने घर में विधि विधान कर लीजिए यह पूजा वो पूजा यह कथा आजकल तो कथाएं चलती है तो इस कथा में चले जाइए अपने घर में कथाएं बिठाइए फिर यह विधि करवाइए अपने घर में साधुओं को आमंत्रित कीजिए साधकों को आमंत्रित कीजिए मंदिर में जाइए व्हाटएवर
धर्म जगत के बाह्य अवलम्बन हमारी संकल्प शक्ति को बढ़ाते है, परन्तु जप-ध्यान ही आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त कराते है
पूजा पाठ तीर्थ यात्रा उत्सव दान दक्षिणा जो कुछ भी है योग अपने धर्मशास्त्र में लिखा है सबका अनुष्ठान कर लीजिए देखिए कि आप बहुत ज्यादा आगे नहीं बढ़े हैं जब तक इस आसुरी शक्ति मन को बाकी सभी विचारों से मुक्त करके मन को खाली करके संपूर्ण रूप से बाकी सब विचारों को हटा करके ईश्वर के ऊपर में या तो आत्मन के ऊपर में जो भी हमारी श्रद्धा है साकार निराकार द्वैत अद्वैत भगवान राम भगवान कृष्ण भगवान महावीर मां दुर्गा मां काली या तो फिर भगवान राम कृष्ण हु एवर इज योर इष्ट जो भी अपने इष्ट है उनके ऊपर में मन को एकाग्र नहीं कर पाएंगे टू द एक्सक्लूजन ऑफ एवरीथिंग एल्स बाकी सब चीजों से मन को हटा करके तब तक हम आध्यात्मिक जीवन में एक स्टेप भी आगे नहीं बढ़े हैं। या तो फिर मैं कहूंगा बहुत ज्यादा आगे नहीं बढ़े क्योंकि बाकी सब चीजों का भी तो एक तात्पर्य है। अपने मन की शुद्धि करता है। अपने मन को स्ट्रांग करता है। विल पावर को परिपुष्ट करता है। तो वो सब चीजों की आवश्यकता है ही है। किंतु वो जो परिपुष्ट विल पावर है उसको आपको एक बार तो युद्ध क्षेत्र में भेजना ही होगा। पता है यह जो बाकी सब एक्टिविटी है और एक्चुअल जब ध्यान है उसमें डिफरेंस क्या है? मान लीजिए मैं प्रतिदिन नियमित रूप से स्वाध्याय करता हूं। प्रतिदिन नियमित रूप से संध्या आरती अटेंड करने का प्रयास करता हूं। जो कुछ भी धर्म शास्त्रों में लिखा गया है। सभी चीजों का मेहनत पूर्वक माने ऑनेस्टली उसको सिंसियरली अनुष्ठान करने का प्रयास करता हूं। दिस इज लाइक ए जिमनेशियम। आप जिम्नेशियम में जाते हैं बॉडी बिल्डिंग करने के लिए तो अच्छा है। आपने प्रतिदिन आप क्लास अटेंड करते हैं संध्या आरती व्हाटएवर तो आपका जो देह है परिपुष्ट होगा। यानी जिन जिम में जाएंगे तो देह स्ट्रांग होगा। बॉडी स्ट्रांग होगा। मसल मसल बनेंगे। फिर वह इंस्ट्रक्टर है आपको बताएगा कि आपको प्रोटीन ज्यादा लेना है। फिर यह जो फैटी आइटम्स है, यह ऑयल है, शुगर है उसको कम कर देना है। एवरीडे हाफ एन आवर वन आवर आपको जिम में आकर के एक्सरसाइज करनी है। योगासन करना है वगैरह-वगैरह। इंस्ट्रक्टर आपको गाइड करेगा। आप उसके अनुसार फिजिकली फिट होते जाएंगे। किंतु फिर वहीं तक है। एक्चुअली आपका उसका टेस्टिंग कि आपने कितना बॉडी बिल्डिंग किया। वो टेस्टिंग कब होगा कि सरहद के ऊपर में शत्रुओं का आक्रमण हुआ। आप जाकर के शत्रुओं के साथ में युद्ध करते हैं। तब कहीं जाकर के आपको सही-सही में टेस्टिंग होगा कि हां मैंने जो मसल बनाए हैं वो कितने बने हैं। मेरा स्ट्रेंथ कितना बना है। मैं कितने शत्रुओं का वध कर दे पा रहा हूं। मैं कितना मेरा स्टेमिना है। कितना मैं कंटीन्यूअस फाइट कर सकता हूं। वो तो युद्ध के क्षेत्र में ही पता चलेगा। यह वह आपको जिम्नेशियम में आपका कंपटीशन हो जो मस वो जो होता है ना बॉडी बिल्डिंग कंपटीशन होता है वो बहुत बार मैंने वो जो बच मैं जब छोटा था स्कूल में था मुझे ये सब बड़ा इंटरेस्ट था कैसे वो बॉडी बिल्डर्स सब एक सब लाइन में खड़े हैं स्टेज के ऊपर में फिर वो जो जज होता है वो मेजर टाइप से मेजर करता है कि किसका मसल कितना ज्यादा है तो वो सब वो सब क्या है कि वो सिर्फ प्रदर्शन मात्र ही है युद्ध क्षेत्र में पता चलेगा कि आपके जो मसल बनाए हैं। वो कार्य कर रहे हैं ना कि वैसे वैसे बने हैं। बाद में मैंने एक डॉक्यूमेंट्री देखा था कि यह जो बॉडी बिल्डिंग का क्रेज ऐसा हो गया है ना कि कुछ-कुछ लोग क्या करते हैं वो इसके इंजेक्शन लेते हैं। कोई ड्रग्स के ना क्या बोलते हैं? मैं भूल गया उस इंजेक्शन को। तो इंजेक्शन लेंगे ना तो आपका मसल बिल्ड अप होना शुरू होगा। किंतु आपका जो शरीर है ना वो उसके ऊपर में बड़ा ही भयानक इसका असर होगा। तो देखिए कि यह कैसी बात हो गई कि आप ऐसा वह बॉडी बिल्डिंग कंपटीशन में जा रहे हैं। स्टेज के ऊपर में खड़े हैं। सभी लोग दर्शक देखकर के अवाक हो जाएंगे। अरे बाप रे इतने जबरदस्त मसल इसने बनाए हैं। पता नहीं कैसा वो सुपर ह्यूमन उसका स्ट्रेंथ होगा। किंतु एक सामान्य आदमी भी आकर के उसको एक पंच उसके मुंह पे मारेगा तो सीधा वो मुंह के बल जाकर के गिरेगा। क्यों? क्योंकि उसका शरीर जो है भीतर से खत्म हो गया है। वो इंजेक्शन लेते-लेते यह ड्रग्स लेते लेते उसका जो हेल्थ है बिल्कुल खत्म हो गया है। इसलिए ये ब्रूसली की बात पता है ना एक समय था ब्रूसली बड़ा ही पॉपुलर था। कहते थे कि माने उसके जैसा वो फिजिकल फिट व्यक्ति और दूसरा नहीं है जगत में। वो क्या हुआ? बड़ी छोटी उम्र में ही वह पता नहीं हार्ट फेल हो गया ना कि क्या क्योंकि वह इतना ज्यादा वो यह सब चीजों के पीछे में पड़ा था कि वह अल्टीमेटली उसका जो बॉडी के ऊपर में इतना भयानक असर हुआ कि छोटी ही उम्र में वो हार्ट फेल होकर के मर गया। तो उसका खैर वो कंट्रोवर्सी भी है कैसे मरा वगैरह-वगैरह। किंतु देखिए कि आप मूवी में या तो जिम्नेशियम में ना कि स्टेज के ऊपर में आपके मसल का प्रदर्शन करते हैं। वह कोई काम का नहीं है। युद्ध क्षेत्र में पता चलेगा कि आपने सही-सही कितना स्ट्रेंथ बिल्ड अप किया है। तो यहां पर भी ऐसा है कि आप जितना भी आप साधन माने जो बाह्य अवलंबन को लेकर के जितनी साधनाएं करते हैं स्वाध्याय है, पूजा पाठ है वगैरह-वगैरह जितना भी कुछ है रिट्रीट है, कथा है वगैरह-वगैरह इससे आपके मसल बिल्ड अप होंगे इस अर्थ में कि आपका विल पावर स्ट्रेंथन होगा। बहुत स्ट्रेंथन होगा। किंतु यह विल पावर जो स्ट्रांग हुआ है, मस्कुलर हुआ है, उसका टेस्ट क्या है? जब आप 1 घंटा मिनिमम जब ध्यान नहीं करेंगे तब तक आपको पता ही नहीं चलेगा कि मेरा विल पावर कितना स्ट्रांग हुआ है। तभी तो आप जब अपने मन को खाली करके बाकी सब विचारों से बाकी सब अवलंबन से हटा करके सिर्फ ईश्वर है या आत्मन है इसके ऊपर में एकाग्र करेंगे तब तो पता चलेगा कि जब यह आसुरी शक्तियों का आक्रमण हो रहा है तब यह मानस धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में जब आप अपना विल पावर उस आसुरी शक्तियों के साथ में युद्ध करेगा तब तो पता चलेगा कि कौन जीतता है कौन हारता है वो वो जो पुरानी टीवी सीरियल थी ना वह महाभारत रामायण वो दो तीर सामने-सामने आते हैं भगवान राम का और रावण का और फिर इसमें से एक तीर जीत जाता है दूसरा हार जाता है तो वो गिर जाता है तो इस तरह से दो तीर सामने-सामने आएंगे आसुरी शक्तियां प्लस अपना विल पावर तो पता चलेगा कि आसुरी शक्तियां जीतती है ना कि विल पावर जीतता है तो ये देखिए कि हम सबके जीवन में जो सिंसियर साधना करता है जो आगे बढ़ने का प्रयास करता है जो अपने मन को बाह्य अवलंबन से धीरे से वापस लेकर के ईश्वर में परोने का प्रयास करता है। उन सबको पता है कि किस भयानक जो विपत्तियां है, आपदाएं हैं, उसका हमको सामना करना है। हम लोग फिर ऐसे साधक जो कि दिन प्रतिदिन इस तरह से संग्राम कर रहे हैं। वह जाकर के फिर भगवान कृष्ण भगवान राम को देखेंगे कि सहज रूप से युद्ध क्षेत्र में जीत जा रहे हैं। जितने भी राक्षसों को भगवान कृष्ण के पास में भेजा गया वह पुतना हो ना कि त्रुणावर्त हो ना कि वह फिर वो जो हाथी थे वहां पे मथुरा गए थे वो पहलवान थे वो सबको जैसे कि भगवान कृष्ण जैसे हम सहज रूप से हरा दे रहे हैं तो फिर हमको लगेगा कि अरे उन लोगों की साधना का वर्णन सुनकर के हमको फायदा क्या है? हमको डिप्रेशन ही प्राप्त होगा और कुछ होगा नहीं। तो यह हो गया एक रीजन कि हमको अवतार का जो मनुष्य भाव है उसको अपनी नजर के सामने रखना है। क्योंकि जिस तरह की यह जो युद्ध क्षेत्र में मानसिक युद्ध क्षेत्र में फाइट करके हमको अपने मन को जो जिस तरह से इस आसुरी शक्तियों से बचाना है वैसे ही अवतार को भी यही कार्य करना है। यदि अवतार ऐसा नहीं करते तो अवतार ने जो साधना की है उसके बारे में पढ़ने का हमारे लिए कोई प्रयोजन नहीं रह जाएगा। यह एक पॉइंट शरद
शिव होकर ही शिव की पूजा कर सकते है. मनुष्य ईश्वर का मनुष्य भाव ही समझ पाएगा.
महाराज हमारे सामने रखते हैं। किंतु साथ-साथ में ही शरद महाराज एक दूसरा ही बड़ा ही इंपॉर्टेंट पॉइंट हमारे सामने रखते हैं कि अवतार ईश्वर का जो अवतार जो है या तो फिर अवतार होने का प्रयोजन क्या है? उसका एक दूसरा एक पॉइंट है। शरद महाराज कहते हैं कि देवो भूत्वा देवम यजेत यदि देव की पूजा करनी है तो आपको देवता होना होगा। शिव होकर के ही आप शिव की पूजा कर सकते हैं। यह कांसेप्ट इतना इंपॉर्टेंट है कि शरद महाराज कहते हैं कि यदि मान लीजिए मुझे ईश्वर की आराधना करनी है तो मुझे निर्विकल्प समाधि प्राप्त करके ईश्वरत्व प्राप्त करना होगा। उसके बाद में ही मैं ईश्वर की आराधना कर सकता हूं। ये देखिए कि कितना इंपॉर्टेंट स्टेटमेंट है। राजा महाराज का जो स्टेटमेंट उसके साथ में इसको कंपेयर कीजिए। राजा महाराज स्वामी ब्रह्मानंद जी क्या कहते हैं कि जब तक हम निर्विकल्प समाधि प्राप्त नहीं करते हैं तब तक तो आध्यात्मिक जीवन का प्रारंभ ही नहीं हुआ है। यानी कि देखिए कि हम लोग यह जो सोच रहे हैं, जब तक कि आप प्रतिदिन एक घंटा बैठकर के जब ध्यान करने का प्रयास ना करें, तब तक आप सिंसियरली कुछ कर ही नहीं रहे हैं। तो राजा महाराज इससे 100 गुना आगे जाकर के कहते हैं कि जब तक आप निर्विकल्प समाधि प्राप्त नहीं करते तब तक तो आध्यात्मिक जीवन का प्रारंभ ही नहीं हुआ है। तो यहां पर भी शरद महाराज कहते हैं शारदानंद जी कहते हैं कि देवो भूत्वा देवम यजेत ईश्वर की आराधना करनी है तो हमको स्वयं ईश्वर होना होगा। निर्विकल्प समाधि प्राप्त करके देवत्व प्राप्त करना होगा। तभी कहीं जाकर के हम देवता की पूजा कर सकते हैं। जब तक हम मनुष्य भाव में है, जब तक हमारा मन अष्टपाश से, डरीपु से, पंचक्लेश से, काम कांचन से घिरा हुआ है, तब तक हम ईश्वर के भीतर में मनुष्य भाव ही दर्शन करेंगे। अवतार तो छोड़ दीजिए। हम ईश्वर के भीतर में भी मनुष्य भाव देखेंगे। इसीलिए देखिए कि ईश्वर को हमेशा मनुष्य की तरह ही उसकी उनकी रूप कल्पना की गई है। ईश्वर कौन है? तो जैसे मनुष्य के दो हाथ है, दो पैर है, एक सीना है, एक सर है, दो कान है, दो आंख है, नाक है, मुंह है, जो मनुष्य का देह है, उसी तरह के ईश्वर की भी कल्पना की गई है। किंतु मान लीजिए कि यह आजकल जिस तरह से डिस्कवरी हो रही है, एस्ट्रोनॉमी में, कॉस्मोलॉजी में अभी रिसेंटली कुछ साइंटिस्टों का दावा है कि एक प्लेनेट है। उसके ऊपर में उनको जीवन के लक्षण दिखाई दिए हैं। तो अभी मान लीजिए कि इस कॉस्मोस में और एक ग्रह है। वहां पे और एक प्रजाति का जन्म हुआ है जो कि माने अभी ये जो साइंस में यह सब कल्पनाएं चलती है। तो एक जगह पे ऐसा विवरण मैंने पढ़ा कि मान लीजिए एक ऐसा प्लेनेट है जो कि पूरा समुंदर से घिरा हुआ है। तो वहां पर जो इंटेलिजेंट लाइफ डेवलप होगी तो वह एक मछली के आकार की ना कि एक ऑक्टोपस के आकार की ही रहेगी। वह मनुष्य देह धारण नहीं करेगी। हमारे तरह का बाईपेडल फॉर्म हमारे देह को कहते हैं। बाईपेडल यानी कि दो पैर पर चल सके। इस तरह का आकार नहीं धारण करके मछली का आकार धारण करेगी। क्योंकि वह समुंदर में मछली को तैरना ज्यादा सुविधा रहता है। तो मान लीजिए कि उनके जो देवता होंगे तो वह तो मछली के आकार के होंगे। यदि और कोई ग्रह है वहां पे पूरा जो है वो गैस से घिरा हुआ है। जैसे कि जुपिटर है। जुपिटर को कहते हैं गैस जॉइंट। यानी कि कोई सॉलिड जमीन जैसा है ही नहीं। वो सब गैस के लेयर से वन आफ्टर अनदर। सेंटर में जाएंगे तो गैस के लेयर और सॉलिड होते जाएंगे। जैसे बाहर आते जाएंगे गैस के लेयर है वह लाइट होते जाएंगे तो वहां पर मान लीजिए कि पक्षियों के रूप में प्रजाति का जन्म होता है तो उनके इंटेलिजेंट लाइफ का तो उनके जो ईश्वर होंगे पक्षियों के देह के होंगे। हालांकि देखिए कि अपने हिंदू धर्म में तो सभी तरह के देवी देवताएं हैं। उनका आकार हम सभी देवी देवताओं को दिया गया है। क्योंकि हमारा हिंदू धर्म जो है इस सब चीजों में काफी एडवांस है। किंतु बाकी सब धर्म देखिए कि जनरली मनुष्य का आकार ही देवताओं को दिया जाता है। तो फिर देखिए कि मनुष्य होने के बाद में हम देवता को मनुष्य के रूप में ही कल्पना कर पाते हैं। उसके बाद में यदि हम देवता का सही स्वरूप दर्शन करते हैं। जैसे कि गीता में श्रीमद्भगवत गीता में जब अर्जुन ने भगवान कृष्ण का विश्वूप दर्शन देखा विश्वूप अर्जुन ने जब दर्शन किया तब वो बेचारा इतना डर गया कि उसने कहा कि आप अपना जो सही सौम्य स्वरूप है उसमें वापस आ जाइए। क्यों? मनुष्य होकर के अर्जुन भगवान कृष्ण के मनुष्य स्वरूप को ही वह ठीक-ठीक समझ पाता है। उसके साथ में मित्रता कर सकता है। उनको गुरु के रूप में स्वीकार कर सकता है। भगवान कृष्ण यदि अपना सही स्वरूप दिखा दे तो अर्जुन जैसा अर्जुन बेचारा डर के मारे भगवान को स्तुति करने लगेगा। यह
कहानी: स्वामी विवेकानंद आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त होने से डर जाते है
स्वामी जी को ही देखिए और सब किसी को नहीं कि जब ठाकुर ने पहली बार उनको स्पर्श कर दिया तो स्वामी जी को ऐसी सब निराकार अनुभूतियां होने लगी कि स्वामी जी डर के मारे चिल्ला उठे कहे उठे कि अरे मेरे मां है पिताजी है आप मेरे साथ में यह सब क्या कर रहे हैं फिर वो जो काशीपुर गार्डन में निर्विकल्प समाधि के बारे में ठाकुर को बार-बार वो प्रार्थना कर रहे हैं। ठाकुर ने अच्छा कहा ठीक है चलो तो एक बार जब नरेंद्र को निर्विकल्प समाधि या तो निराकार अनुभव होना शुरू हुआ तो एकदम डर गया वह आंख खोल करके बोल रहा है अरे मेरे हाथ कहां है मेरे पैर कहां है ऐसा करके तो यह जो बाकी गुरु भाई थे दौड़ते दौड़ते ठाकुर के पास गए काशीपुर में ठाकुर तो फर्स्ट फ्लोर के वो शयन कक्ष में रहते थे और यह बाकी लड़के लोग नीचे होल में रहते थे तो जब ठाकुर के पास दौड़ते दौड़ते गए कि नरेंद्र को इस तरह से कुछ अनुभूति हो रही है उसका हाथ पैर नहीं दिख रहा है तो ठाकुर ने कहा भले साला बड़ा मुझे परेशान करता था निर्विकल्प समाधि के लिए तो भले वो इसी अवस्था में रहे थोड़ा उसको भी पता चले यह निराकार अनुभव क्या है तो स्वामी जी जैसे स्वामी जी अर्जुन जैसा अर्जुन महायोद्धा ईश्वर का जो सही स्वरूप है या तो फिर निर्विकल्प समाधि ना कि निराकार यह देखकर के डर जाते हैं उनको सहन नहीं कर पाते तो हम जैसे लोगों की तो क्या बात है इसलिए हम लोगों के लिए हमेशा ईश्वर के मनुष्य जो देह है उसी में दर्शन करना हमको अच्छा लगता है। भगवान शिव तांडव नृत्य करेंगे तो पूरे विश्व ब्रह्मांड में प्रलय आ जाएगा। उस समय भगवान शिव का किस तरह का आप रुद्र मूर्ति होगा आप सोच करके देख लीजिए। किंतु जितने भी भक्त हैं उन सबके घरों में आपको भगवान शिव का कौन सा मूर्ति दर्शन होता है? तो वह कैलाश पर आराम से बैठे हुए हैं। आनंद से पास में मां पार्वती बैठी हुई है। सर के ऊपर में से जटा में से गंगा निकल रही है। और वह जो नाग है उनके गले में पड़े हुए हैं। लगता है गले में नाग है। लगता है व्या व्याघ्र चर्म पहना हुआ है। किंतु चेहरे का भाव कैसा सौम्य और शांत है। तो हम लोगों को मनुष्य को इस तरह से ईश्वर को मनुष्य रूप में ही देखने की आदत लगी हुई है। हमारी जो कैपेसिटी है वही देखने की है। तो इसलिए मनुष्य होकर के मनुष्य की पूजा ग्रहण करने के लिए ईश्वर मनुष्य देह धारण करते हैं। देवो भूत्वा देवम यजेत यदि ईश्वर की सही-सही आरा सही-सही ईश्वर के सही-सही रूप में आपको आराधना करनी होगी तो आपको निर्विकल्प समाधि प्राप्त करके ईश्वर होना होगा। तभी आप जो जगत कारण ईश्वर है उनकी आराधना कर पाएंगे। किंतु हम जैसे आम साधकों के लिए ईश्वर का जो विश्वूप है ना ही उसकी हम कल्पना कर सकते हैं। ना ही वह यदि गलती से भी नजर के सामने आ गया तो हमारा हार्ट फेल हो जाएगा। तो हम लोगों के लिए हमारी पूजा ग्रहण करें। इसके लिए ईश्वर मनुष्य देह धारण करके पृथ्वी पर अवतरण करते हैं। तो वो जो हृदय वाली बात
कहानी: आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त होने से ठाकुर का सेवक ह्रदय अद्भुत आचरण करता है
हृदय को ठाकुर को कहता है बीच-बीच में। मामा मुझे भी भाव हो ऐसा कुछ कर दीजिए। तो पता नहीं वो ठाकुर ने क्या जादू चमत्कार किया होगा। हृदय को सही-सही में भाव हो गया। और फिर हृदय चिल्ला-चिल्ला करके ठाकुर को कहता है कि अरे मामा चलो हम लोग गांव-गांव घर-घर जाते हैं। ईश्वर का नाम फैलाते हैं। ऐसा करके ऐसा चिल्लाने लगा। ठाकुर ने कहा, अरे साला मुझे रोज कितने दर्शन होते हैं। मैं चुपचाप शांत रहता हूं। तुमको कहीं ना एक दर्शन हो गया। तुम इस तरह से चिल्ला रहे हो। फिर ठाकुर ने उसकी छाती पर हाथ करते हुए हाथ रखकर के कहा कि शाला शांत हो जा। देशाला के शांत करे मां देशाला के शांत करे तो माने मां जो भी चमत्कार किया होगा मां काली ने वो भाव फिर से खींच लिया तब हृदय रोने लगा कि मां मामा आपने इस तरह से मेरा भाव वापस क्यों ले लिया आपने मां से मुझे विच्छेद क्यों करवा दिया मां काली से तो ठाकुर ने कहा कि अरे मैंने मां काली को वापस थोड़ी ना ले लिया है मां तो तुम्हारे हृदय में ही रहती है ऐसा करके उसको पटाया तो देखिए कि यह जो आम आदमी है उसको यदि सही सही में यह शब्द दर्शन वगैरह होने लगे तो हम लोग डर जाएंगे, भयभीत हो जाएंगे। वह जो स्वामी जी की कहानी छोटे थे अपने कमरे में बैठे हैं। एकाएक भगवान बुद्ध की उनको दर्शन हुआ तो चिल्ला के घर से बाहर निकल गए। अभी वह तो मनुष्य देह लेकर के आए हैं भगवान बुद्ध। फिर भी तो वो स्वामी चिल्ला करके भाग गए वहां से तो सही-सही वो विश्वूप यदि दिखा देते तो क्या होता? तो इसके लिए एक दूसरा इंपॉर्टेंट पॉइंट है कि ईश्वर मनुष्य देह धारण करते हैं इसलिए क्योंकि मनुष्य उनकी पूजा कर सके। अभी ठाकुर की पूजा करना आसान है। मां शारदा देवी की पूजा करना आसान है। क्यों? क्योंकि उनके जो गुणधर्म है, उनकी जो कार्यावली है, उनका जो मन है, उनकी जो साधन भजन की क्षमता है, वह सब हमने अपनी दृष्टि से अपनी आंखों से नहीं एटलीस्ट किंतु हमने बड़ा ही विश्वसनीय सूत्रों से उनके बारे में देखा है, सुना है, जाना है और उनको हमने अपनाया है। तो इसके लिए ठाकुर की पूजा करना हमारे लिए बड़ा ही आसान है। मन को चित्त को शुद्ध करने का बड़ा ही आसान तरीका है। श्री रामकृष्ण रूपी जिम में जाएंगे तो इजीली हम अपना विल पावर रूपी मसल बना पाएंगे। फिर किंतु अल्टीमेटली तो इस विल पावर रूपी मसल को लेकर के हमको वे जो साधन रूपी जब ध्यान रूपी युद्ध क्षेत्र है उसमें प्रवेश तो करना ही है। वो तो आपको छुटकारा नहीं है। उससे आपको निस्तार नहीं मिलने वाला है। किंतु एटलीस्ट जहां तक बॉडी बिल्डिंग का प्रश्न है। जहां तक अपनी जो क्षमता है मन को एकाग्र रखने की अपनी जहां तक ये क्षमता जाती है मन को निर्विकार रखने की उस क्षमता में बढ़ावा हम ठाकुर की पूजा करके या तो कोई भी अवतार की पूजा करके आसानी से कर सकते हैं। तो ये दूसरा पॉइंट शरद महाराज हमको बताते हैं। इस दो पॉइंट के भीतर में शरद महाराज अवतार के आने का प्रयोजन बताते हैं। यह जो दो पॉइंट है, दूसरा जो पॉइंट, इसका जो पैराग्राफ़ है, उस पैराग्राफ़ के साथ में ही फिर अह लीला प्रसंग का यह जो चैप्टर है द्वितीय खंड का जो प्रथम चैप्टर कि अवतरणी का साधक भाव की आलोचना का प्रयोजन। तो, ये चैप्टर इन दोनों पॉइंट से आखिर में समाप्त होता है। तो, अभी नेक्स्ट क्लास में हम दोनों पॉइंट पढ़ लेंगे। आखिरी वाले दो पैराग्राफ पढ़ लेंगे और फिर एक दिन बैठकर के हम क्या करेंगे जो पूरा जो चैप्टर हमने पढ़ा उसका समरी एक बार डिस्कस कर लेंगे क्योंकि इस चैप्टर में इतने सारे पॉइंट शरद महाराज ने दिए हैं तो और प्रति पॉइंट के ऊपर में डिटेल डिस्कशन तो हमने किया ही है किंतु एक समरी डिस्कशन जो है वह एक आवश्यक है क्योंकि इसके बाद का जो चैप्टर है वह सही-सही में साधना क्या है साधना के क्या मूल तत्व है? भारत में किस तरह से साधन तत्वों का डेवलपमेंट हुआ है? साधना की थ्यरी का डेवलपमेंट हुआ है। और इस थ्यरी के साथ में वेदांत साधना है, शक्ति साधना है, भाव साधना है। ये सब का थ्योरिटिकल डेवलपमेंट क्या है? और ठाकुर के जीवन में वास्तविक रूपा इसका रूपांतरण कैसे देखने को मिलता है? प्रैक्टिकल एप्लीकेशन क्या देखने को मिलती है? यह दो ब्रिज जो है इसके बाद के चैप्टर में शरद महाराज खड़ा करेंगे। इसके लिए इसके बाद के जितने भी चैप्टर है बड़े ही इंपॉर्टेंट है। साधना की दृष्टि से और वेदांत को समझने की दृष्टि से योग वेदांत को समझने की दृष्टि से। तो अभी इसके नेक्स्ट क्लास में आखिरी दो पैराग्राफ पाठ करके उसके बाद के क्लास में एक समरी। तो आज यहीं तक अभी नेक्स्ट क्लास कल होगा। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम
प्रश्न: विचार मार्ग साधना कैसे काम करती है?
कृष्णपणमस्तु देखिए विचार मार्ग हो ना कि भक्ति मार्ग हो ना कि कोई भी साधन भजन जप ध्यान की जो भी पद्धति हो जप हो ध्यान हो विचार हो सबका उद्देश्य एक्चुअली एक ही है अह योग की डेफिनेशन क्या है? योग चित्तवृत्ति निरोध। योग का अर्थ है चित्त की वृत्तियों का निरोध। अभी जैसे ही आप चित्त की वृत्तियों का निरोध करने का प्रयास करेंगे, इमीडिएटली यह चित्त की वृत्तियां 10 गुनी पावरफुल होकर के आपके ऊपर में प्रति आक्रमण करेगी। इस समय इस आक्रमण के साथ में लड़ने के लिए मेरे पास में क्या है? एक वेपन है जप। तो मैं सतत जप करता रहूं तो मेरा मन बाकी सब चीजों से निकल कर के जप के ऊपर में आ जाए। फिर जप से जब मेरा मन भर जाए तो फिर मैं जप को भी हटा दूं और मेरा मन जो है चित्तवृत्ति से निरोध हो जाए और आत्मन में स्थित हो जाए। यह तो जप का रास्ता हो गया। योग का रास्ता क्या है कि शरीर में जो चक्र है अनाहत चक्र मान लीजिए उसके ऊपर में मैं ध्यान करता हूं। तो फिर यह वृत्तियों का आक्रमण होता है। उसके साथ में लड़ने के लिए या तो फिर उससे मुक्ति पाने के लिए मैं अपने मन को रीडायरेक्ट करता हूं। अनाहत चक्र के ऊपर में मेरा मन अनाहत चक्र पर ही केंद्रित है। और जब वृत्तियों का जो आक्रमण कम हो जाएगा या तो वृत्तियों का जो स्ट्रेंथ है वो शिथिल हो जाएगा तब फिर मैं ये अनाहत चक्र में से विशुद्ध आज्ञा चक्र में जाकर के कुंडलिनी जागृत हो जाएगी। ब्रह्मरंद्र से निकल जाएगी। सहस्त्रार पद्म से निकल जाएगी। विचार मार्ग क्या है कि मैं आत्मन हूं। यह देह के साथ में रिलेटेड जगत के साथ में रिलेटेड जो भी वृत्तियों का आक्रमण है उससे मेरा कोई लेना देना नहीं मेरा कोई वास्ता नहीं ब्रह्मन के भीतर में किसी भी तरह का विकार नहीं है। अजर अमर अनादि अनंत यह ब्राह्मण मैं स्वयं हूं। तो ये विचार मार्ग से वृत्तियों को निरोध करते हैं। और जब वृत्तियां चली जाएगी तो विचार भी चला जाएगा। फिर वही ब्रह्मन के भीतर में मन स्थित हो जाएगा। यानी कि मैकेनिज्म एक ही है कि चित्तवृत्ति निरोध यह आपको करना है। जैसे ही चित्त की वृत्तियों का निरोध हुआ तो वैसे ही अल्टीमेट सत्ता जो है आप ईश्वर में मानते हैं तो ईश्वर निर्वाण में मानते हैं तो निर्वाण केवली स्थिति में मानते हैं तो केवली स्थिति ब्रह्मन आत्मन फादर इन हेवन व्हाटएवर दैट अल्टीमेट रियलिटी है। उसी में इंस्टेंटली अपना मन मर्ज हो जाएगा। तो बात वही है कि चित्त की वृत्ति का निरोध करना है और यह निरोध कैसे होगा माने काउंटर हमको चाहिए देखिए एक तो है प्योर विल पावर जो कि एकदम ट्रेडिशनल फॉर्म का योगा है चित्तवृत्ति निरोध यहां पे ही आपको रुक जाना है। मैं जब पहली-पहली बार राजयोग पढ़ रहा था तो मैंने सोच लिया कि प्यरेस्ट ऑफ योगा कि किसी भी तरह का साधन भजन का सहाय नहीं लेकर के सीधा-सीधी चित्त की वृत्तियों को काट देंगे। सीधा आत्म साक्षात्कार कर लेंगे। तो ऐसा मैंने करने का प्रयास किया था। वो कहने की जरूरत नहीं है कि अब 5 मिनट ऐसा करते हैं। फिर 5 घंटे के बाद में पता चला अच्छा मैं तो चित्त की वृत्तियों का निरोध कर रहा था ना ये पांच घंटा कहां चला गया बीच में। तो क्या है कि वो प्यूरेस्ट ऑफ योग साधना वो करना संभव ही नहीं है। या तो फिर हम लोग उसके लिए एलिजिबल नहीं है। शंकराचार्य स्वामी जी कर पाएंगे शायद। हम नहीं। तो हमको सामने एक शस्त्र शस्त्र चाहिए। तो दूसरे विचार आते हैं तो उस विचार से हटा करके अब जैसे एडिक्शन क्या है? बहुत ज्यादा शोक हमारे जीवन में आ गया। बहुत ज्यादा एक ग्रीफ है। बहुत ज्यादा संताप है हमारे जीवन में आ गया। किसी प्रिय व्यक्ति का मृत्यु हो गया ना कि जो जॉब थी हमारी उस छूट गई। अभी घर में खाने को कुछ नहीं है। अभी इस तरह की परिस्थिति में आदमी शराब पीता है। क्यों पीता है? ये ड्रग्स लेता है। क्यों लेता है? क्योंकि यह शराब नहीं पिएगा, ड्रग्स नहीं लेगा। अपने मन को मार नहीं देगा। तो यह मन राक्षस की तरह आकर के उसका वध करने को आएगा। तो बेटर है साला मन को ही मार दो। तो फिर यह पूरी झंझट ही खत्म हो गई। स्पिरिचुअलिटी इज ऑलमोस्ट सिमिलर। मन को ही मारना है। बट और एडिक्शन ही खड़ा करना है। राइट? बट शराब की जगह जप का एडिक्शन खड़ा करना है कि जप में मन ऐसा डूब जाए कि बाकी सब चीजें चली जाए। विचार मार्ग में मन ऐसा डूब जाए अहम महावाक्य विचार में मन ऐसा डूब जाए कि फिर बाकी सब चीजें चली जाए। सो मैकेन मैकेनिज्म इज वन द वेपंस टूल्स आर मेनी। मास्टर महाशय एक रिलेटिव किसी अपने
प्रश्न: एडिक्शन की बात से याद आया ठाकुर कालीपद घोष को कहते है मेरे पास बड़ा स्ट्रांग शराब है!
फ्रेंड को लेके आए थे। वो कहा कि तुमको यदि एकदम स्ट्रांग शराब पीना है तो चलो मैं ऐसी दुकान पे ले जाता हूं। सबसे स्ट्रांग शराब मिलता है। तो उसका मित्र आकर के बोलता है कहां है शराब? ये ठाकुर बैठे हैं। मास्टर महाज ठाकुर को कहते हैं तो ठाकुर हंसना शुरू कर देते हैं। किसी ने प्रश्न किया मैं कहां पढ़ा था? यह भूल गया। पढ़ा है मैंने कहीं पे। नींद में और समाधि में क्या डिफरेंस है? नींद से जगोगे तो मन तमस से भरा हुआ होगा। समाधि से जगोगे तो मन सत्व से भर जाएगा। तो आपको मन को भुलाना है। शराब पीकर के मन को भुलाएंगे तो कभी तो नशा उतरने वाला है। तब पूरा तमस से भर जाएगा मन। समाधि से वापस या तो फिर मंदिर से वापस आकर के रिट्रीट से वापस आकर के मन सत्व से भर
प्रश्न: जैसा कि ठाकुर कहते हैं, जब बहू गर्भवती होती है, तो सास उसका कर्म कम कर देती है। क्या आप ऐसे किसी साधक से मिले हैं जो बहुत सक्रिय थे, कर्म योग कर रहे थे, लोगों की सेवा कर रहा थे, लेकिन अब उनके कर्म दूर हो गए हैं और वो आंतरिक जीवन की ओर मुड़ गये है?
जाएगा। ठाकुर कहते हैं ना कि कीर्तन में जब पहले तो बोलते हैं जोर-जोर से नीताई अमार माता हाथी नीताई अमार माता हाथी यानी नीताई है मेरा मत्त हाथी मत्त हस्ती नीताई है मत हस्ती फिर जैसे-जैसे वो कीर्तन में वो भाव बढ़ता जाता है तो फिर वो माता हाथी माता हाथी और फिर आखिर में हां बोल के समाधि उदाहरण देना मेरे सामने उदाहरण है। नाम नहीं दे के बताऊंगा कि एक महाराज को देखा इतनी सेवा कर रहे हैं। इतनी सेवा माने एग्ेंपलरी डिस्पेंसरी देख रहे हैं। फिर उनको कैंसर हुआ। तो अभी क्या है देखिए एक तो डॉक्टर है फर्स्ट ऑफ ऑल। तो लाइफ पूरा उन्होंने एक इंटेलेक्चुअल एडवेंचर में बिताया है। यानी उनका एक इंटेलेक्चुअल क्यूरियोसिटी कर्म करने की क्षमता आपकी जबरदस्त होगी। तब कहीं जाकर आप एमबीबीएस पास कर पाएंगे। अदरवाइज तो वो होगा नहीं। वी ऑल नो कि कितना डिफिकल्ट है। सो दैट वे फिजिकली एंड मेंटली बड़े एक्टिव रहे हैं। डिस्पेंसरी हॉस्पिटल देखे हैं पूरा जीवन तो अगेन आपको बड़ा एक्टिव रहना पड़ता है। क्या-क्या तरह की क्राइसिस आती है। उन्होंने एक बार बताया था क्या-क्या सब बड़ी हॉस्पिटल होती है तो कोर्ट केस चालू हो जाते हैं। पेशेंट आकर के मारने की धमकी देता है। क्योंकि क्या है मेडिकल तो आप गारंटी नहीं देख सकते ना कि आप यह पेशेंट बच जाएगा। मर भी जाएगा। कुछ भी हो सकता है। देयर इज़ नो सच गारंटी। सब उन्होंने क्राइसिस फेस किया है और विद फ्लाइंग कलर्स उन्होंने पास किया है फर्स्ट रैंक से। अभी किंतु जब कैंसर होता है तो क्या है कि आपका शरीर का काम करने का क्षमता ऑलमोस्ट आपका वो धीरे-धीरे करके डिक्लाइन होना शुरू होता है और एट वन एट वन पॉइंट तो बहुत ज्यादा डिक्लाइन स्टार्ट हो जाता है। तो दो चीज हो सकती है कि जिन्होंने बड़ा ही एक्टिव लाइफ लीड किया है और जब इस तरह का शारीरिक रोग कि जो आपके शरीर और मन को बिल्कुल अवश्य कर दे। शरीर को एटलीस्ट मन की बात नहीं। शरीर को इस तरह से अवश्य कर दे तो दो चीज होगी। या तो इतना भयानक रिग्रेट और यह एक पश्चाताप और यह शोक आकर के खड़ा होगा कि वो आदमी बेचारा डिप्रेशन में चला जाएगा। और दूसरी बात है कि यदि आपने सही सही कर्म योग किया है। डिस्पेंसरी चलाया है रोगियों की सेवा करने के लिए। नहीं कि मेरा खुद का नेम एंड फेम बढ़ाने के लिए, नहीं कि मुझे मेरा खुद का वो जो प्रमोशन पाने के लिए या कररियर एडवांस करने के लिए। सही में कर्म योग किया है तो दिस विल गिव यू एन अपॉर्चुनिटी कि फिर आपका मन जितना एक्टिव था ना उतना ही वह शांत हो जाएगा और शांत ऐसा हो जाएगा कि लोग माने पीपल विल वंडर कि अरे यह इतने एक्टिव थे अभी इतने शांत भी हो सकते हैं। हाउ इज दिस पॉसिबल हम सभी लोग देखते हैं जो आदमी पहले से शांत है वो शांत है। जो एक्टिव है सो एक्टिव है। एक्टिव थे और फिर ये किसी डिजास्टर एक्सीडेंट की वजह से अभी शांत हो के बैठना पड़ता है। तो ही हैज़ मेक दिस सक्सेसफुल ट्रांजिशन व्हिच इज वंडरफुल। तो यह उदाहरण नजरों से देखा है किंतु अगेन नाम नहीं देना उचित है किंतु देखा है मैंने यह इहाने शिष्य तुम्हें
प्रश्न: ठाकुर जब ध्यान करने को बैठते और वह सन्यासी त्रिशूल लेकर उनको डरता की जब तक ध्यान समाप्त न हो जाए तब तक खड़े नहीं होना है, यह एक सीधा-सदा विल पावर नहीं लगता. यहाँ और ही कोई शक्ति काम कर रही है.
शरीरम तगस्त प्रलय चयात इस आसन पे मैं बैठूंगा और जब तक मुक्ति प्राप्त नहीं होगी लब्ध बोधिम बहुकल्प दुर्लभम तब तक मैं खड़ा नहीं होऊंगा एक्चुअली आपने जो कहा आई विल एग्री विद इट के यह पूरा डिफरेंट कैटेगरी है ही है और सबसे बड़ा उदाहरण है गिरीश घोष ठाकुर ठाकुर ने जब ऐसा कहा कि सुबह शाम मां का नाम लेना तो बोला सुबह शाम नहीं हो पाएगा मेरे पास में वह कब सोता हूं कब उठता हूं ठीक नहीं है। अच्छा ठीक है। खाने से पहले एक बार नाम ले लेना। तो मैं कब एब्सेंट माइंडेड अवस्था में खाता हूं। कोर्ट केस का टेंशन है। वह सब खाने से पहले नहीं होगा। अच्छा ठाकुर ने कहा मेरे पर बकलमा दे दो। मुझे वो पावर ऑफ एटर्नी दे दो। तो गिरीश घोष सोचता है तो बड़ा अच्छा है। वो सुबह को विल पावर आपको खड़ा करके आपको सुबह शाम नाम लेना। बेटर है आपको विल ये दे दो आपका वो बकलमा पावर ऑफ एटरनी। किंतु आखिर में गिरीश घोष क्या कहता है? वो जो सुबह शाम वाला स्वीकार कर लिया होता तो अच्छा रहता। ये शरणागत होना इतना भयानक रूप से आपका यह
प्रश्न: जो आसुरी शक्तियों के बारे में अपने बताया, जो हमें जप-ध्यान करने में बाधा डालती है, वह क्या हमारे पिछले जन्म के कर्म है?
है। बहुत सारा पीछे का कर्म देखिए तमस रजस और सत्व यह आदि गुण है। जैसे ही वो मनुष्य का या तो फिर यह जन्म हुआ है। तभी से वह हमारे भीतर में है। तीनों गुणों का एक साथ में रहते ही है। फिर जैसे-जैसे हमारे कर्म जाते जाएंगे वैसा-वैसा या तो फिर यह तमस स्ट्रेंथन होगा, रजस स्ट्रेंथन होगा कि सत स्ट्रेंथन होगा। तो दोनों तरीके से है जन्म के अब जैसे वो मां ने कहानी बताई ना कि वो चार कुमारों का जन्म भगवान ब्रह्मा जी ने दिया। चार कुमारों को जन्म तो उन्होंने संसार नहीं करके सीधा ईश्वर प्राप्ति की ओर ईश्वर प्राप्ति की साधना करके ईश्वर की ओर दौड़ लगा दी। तो फिर ब्रह्मा ने सोचा कि इस तरह से तो सृष्टि चलेगी नहीं तो फिर प्रजापतियों को जन्म दिया तो अभी जैसे कि आपने जीवन धारण किया है उसका अर्थ ही है कि तमस्त रजस का एक अंश है वरना तो जीवन धारण होगा ही नहीं तो वह तो एक आदि कारण है। दूसरा है कि अब हमारे कर्म उसको स्ट्रेंथन करते हैं या वीक करते हैं। तो दोनों फैक्टर है। हमको दोनों फैक्टर से मुक्ति प्राप्त करनी है।
प्रश्न: जैसा कि आपने जिम के बारे में बताया - केवल मांसपेशियों का निर्माण ही पर्याप्त नहीं है। हमें युद्ध के मैदान में अपनी फिटनेस का परीक्षण करना होगा। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, है ना?
उसका नेक्स्ट स्टेज है। उसका नेक्स्ट स्टेज है। देखिए सोल्जर्स को ट्रेन ये कैंटोनमेंट होता है ना हमारे मैं जहां पे रहता था उस शहर में कैंटोनमेंट था तो प्रतिदिन सुबह को वो यहां पे भी यहां पे तो नेवी का बहुत बड़ा यह है ना बेस है तो मैं सुबह को मॉर्निंग वक करने को जाता हूं तो सब सेलर्स को देखता हूं नेवल कमांडो सब जोगिंग करने के लिए वो फॉरमेशन में जाते हैं तो आपको एक्सरसाइज तो करना ही पड़ेगा अदरवाइज आप डायरेक्ट इन लोगों को बिना ट्रेनिंग के वो भेज देंगे आपको वहां कारगिल में तो तो ठीक होगा नहीं तो पहले यहां पर वह ड्रिलिंग होगा फिर परेड होगा फिर वह वेपंस ट्रेनिंग होगा डिसिप्लिन होगा कमांड कंट्रोल का ट्रेनिंग दिया जाएगा तब तो उनको जाके वो भेजेंगे सरहद पे सो जो बाकी जो कुछ भी है दैट इज अ फर्स्ट स्टेज और यह है सेकंड स्टेज किंतु यह भी तो बहुत बड़ा स्टेप है ना आप कितने लोग जिम में जाते हैं कितने लोग मॉर्निंग वॉक को जॉगिंग को जाते हैं ये विशाखापटनम का पपुलेशन 2530 लाख से कम नहीं होगा। किंतु यह जो गवर्नमेंट ने यह जो जगह डिफाइन की है कि वह ट्रैफिक रोक देते हैं कि जिससे कि जोगिंग करने के लिए सुविधा हो। मैं मुश्किल से हजार एक लोगों को देखता हूं। सो इवन दैट इज अ बिग स्टेप फॉर एवरीवन। बट यह याद रखना है कि इवन बिगर स्टेप इज देयर कि आपको एक्चुअली बैठकर के प्रतिदिन एटलीस्ट एक घंटा जब ध्यान करना है।