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Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 4 Jul 2025

prayer

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णायते नमः श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा कथित उसका द्वितीय खंड साधक भाव प्रथम चैप्टर साधक और साधना श्री रामकृष्ण देव की साधना का विवरण देने से पहले शरद महाराज भारतीय धर्म ग्रंथों में साधना के बारे में क्या लिखा गया है उसका एक आउटलाइन हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। उसमें से जो सबसे पहला पॉइंट है कि सर्वभूत में ब्रह्म दर्शन या तो फिर ईश्वर दर्शन यही है साधना की चरम समाप्ति और यह साधना की चरम उन्नति मनुष्य के भाग्य में उसी मनुष्य के भाग्य में उपस्थित होती है जिसने प्रचंड तपस्या की है और जिसने प्रचंड त्याग किया है। इसके ऊपर में हम लोग एक कंपाइलेशन मैंने बनाया है। वह हम देख रहे थे। ऑलरेडी हमने कुछ उपनिषदों के श्लोक देखे। तुरियनंद जी का एक वार्तालाप देखा और अभी आखिर में जो लास्ट इसका जो था कंपाइलेशन स्वामी जी का ज्ञान योग के ऊपर में एक लेक्चर है छोटा सा लेक्चर उसमें से हम एक पैसेज देख रहे थे। तो ए्थ वॉल्यूम में है पहला पैराग्राफ

स्वामी विवेकानंद: केवल ज्ञान ही हमें शाश्वत शांति देता है

वैसे हमने पढ़ ही लिया है किंतु फिर भी मैं एक बार फिर से पढ़ के बात कर लेते हैं हम ऑल रीजनिंग एंड्स ओनली इन फाइंडिंग यूनिटी आध्यात्मिक जगत में जितना भी तर्क कुतर्क आप करें जितना भी लॉजिक खंडन मंडन करें जितना भी तर्क आप रैशनलिटी को एंप्लॉय करें आखिर में तो एक एक इस तरह की यूनिटी कि जहां पे इस विश्व ब्रह्मांड में जो कुछ भी है वह सब कॉनसेप्चुअली एक जगह पे इकट्ठा हुआ सा हमको दिखाई देगा। सो वी फर्स्ट यूज़ एनालिसिस देन सिंथेसिस। इसलिए हम तो पहले सभी चीजों को बड़ी ही बारीकाई से बड़ी ही क्लोजली डिसेक्शन करेंगे। ऑटोप्सी करेंगे। जैसे कि अभी जैसे कि यह देखिए विज्ञान के जगत में पदार्थ का सही स्वरूप क्या है? व्हाट इज द ट्रू नेचर ऑफ दी मैटर? तो ये मैटर है। मैटर को आप डिवाइड करते ही जाइए। सब डिवाइड करते ही जाइए। मैटर बनता है मॉलिक्यूल का। मॉलिक्यूल बनता है एटम का। एटम बनता है ये न्यूट्रॉन इलेक्ट्रॉन प्रोटॉन का। और उसको भी यदि डिवाइड करेंगे तो इसके भीतर में भी क्वार्क और स्ट्रिंग ऐसा कुछ मिल जाएगा। और इसको भी यदि आप फर्दर डिवाइड करेंगे तो पता चलेगा कि ये क्वार्क या स्ट्रिंग या तो फिर ये सब एटॉमिक पार्टिकल्स या जो कुछ भी है वह सब एनर्जी से ही बना हुआ है। आइंस्टाइन का ये जो फेमस इक्वेशन है e = mc² एनर्जी अर्थात कि मास मल्टीप्लाई बाय द स्क्वायर ऑफ स्पीड ऑफ लाइट अर्थात कि मैटर और एनर्जी दोनों एक दूसरे में कन्वर्टेबल है। अभी इस जगत में आप जो कुछ भी देखेंगे यह मेरे चश्मे हैं या तो फिर यह मेरे वस्त्र है ना कि फिर यह माइक है जो कुछ भी देखेंगे इट इज नथिंग बट एनर्जी एनर् जैसे कि पानी है पानी को आप ठंडा करेंगे तो कैसे बर्फ के रूप में जम जाएगा सॉलिड हो जाएगा किंतु फिर जैसे ही उसका नॉर्मल टेंपरेचर में आएगा तो वह तरल हो जाएगा लिक्विफाई हो जाएगा तो वैसे ही यह जो कुछ भी आप सॉलिड देख रहे हैं। वह सब कुछ यह जो एनर्जी है एनर्जी को सॉलिडिफाई किया गया है। यदि इसके नेचुरल स्टेट में आ जाए तो यह माइक भी वही एनर्जी बन जाएगा। यह वस्त्र भी वही एनर्जी बन जाएंगे। यह पंचमहाभूत का जो देह है वह भी एनर्जी में कन्वर्ट हो जाएगा। देयर इज नथिंग बट एनर्जी इन द यूनिवर्स। और यह कोई मेटाफिजिक्स की बात नहीं है। यह प्रॉपर एक्चुअल फंडामेंटल साइंस है। इस साइंस का सबसे बड़ा उदाहरण है यह न्यूक्लियर बम या तो फिर यह एटम बम। एटम बम में होता क्या है? ये जो छोटे-छोटे जो अणु परमाणु होते हैं उन्हीं को आप एनर्जी में कन्वर्ट करते हैं। सोच लीजिए कि इतने से कुछ एटम्स को एनर्जी में कन्वर्ट करेंगे तो दुनिया का सबसे स्फोटक हथियार हो सकता है। इस माइक को यदि आप प्योर एनर्जी में कन्वर्ट करेंगे इसके भीतर में इतनी सारी एनर्जी सॉलिडिफाइड हुई है। इस यह यदि अपने प्योर एनर्जी फॉर्म में कन्वर्ट होगा तो पूरी पृथ्वी को ध्वंस कर देगा। इतनी एनर्जी इस माइक के भीतर में है। इतनी एनर्जी जब सॉलिडिफाई होती है तो इतना सा मैटर बनता है। इतना सा पदार्थ बनता है। तो यह सब क्या है कि यह साइंटिस्ट लोग द एटलीस्ट पिछले 2000 साल से खास करके 2000 साल यानी कि 3000 साल भी आप कह सकते हैं क्योंकि ये इजिप्ट है। मेसोपोटेमिया है। ये अपनी जो भारतीय इंडिक सिविलाइजेशन थी या तो फिर ये हान चाइनीस सिविलाइजेशन थी। वहां पे ये जो एंशिएंट चार ग्रेट सिविलाइजेशन थी वहां से यह मॉडर्न विज्ञान जिसको हम कहते हैं उसका प्रारंभ हुआ। वही मॉडर्न साइंस फिर धीरे-धीरे करके ग्रीस और रोम में वो वहां पे गया। वहां पे माइग्रेट हुआ। वहां से एक समय आया था। इस्लामिक गोल्डन एज चल रहा था। तो ये मिडिल ईस्ट आज का या तो फिर ईस्ट वेस्ट एशिया जिसको कहते हैं इराक ये जो खास करके ईरान है इराक है वो जो जगह थी वहां पे खलीफ रहता था और इस्लाम का गोल्डन एज था। तो जब यह यूरोप में डार्क एजेस प्रारंभ हुए यह कैथोलिक चर्च ने यह फ्री इंक्वायरीज को दबाना शुरू किया। प्रोक्यूट करना शुरू किया। तो फिर वहां से साइंस की जो टॉर्च है मशाल है लर्निंग की वो इस्लामिक जो खिलाफत थी वहां पे ट्रांसफर हुई और फिर ये इस्लामिक डार्क एजेस प्रारंभ हुए और यहां पे ये मोंगोल अटैक हुआ। तो ये मोंगोल अटैक में यह जो इस्लामिक गोल्डन एज का अंत आ गया। तो वहां से फिर यह यूरोप में रहने सा प्रारंभ हुआ। तो फिर से यह जो टॉर्च ऑफ लर्निंग है इट पास्ड बैक टू यूरोप और खास करके ये इटैलिक जो सिटी स्टेट थे वहां पे तो देखिए और वहां से यूरोप से लेकर के आखिर में अमेरिका में तो ये अमेरिका यूरोप में आजकल देखते हैं कि ये टॉर्च ऑफ लर्निंग है वो बड़े ही ब्राइटेस्ट रूप से वो प्रज्वलित हो रही है। तो यह है कि एक पूरा हमारा इतिहास कि हम लोग यह जो पूरा विश्व ब्रह्मांड है उसको जितना भी एनालाइज कर सके उसको जितना भी सब डिवाइड कर सके इतना हमने किया है और आखिर में e इक्व एमसी स्क्वायर इक्वेशन है वि सेस कि इस विश्व ब्रह्मांड में एनर्जी के अलावा और कुछ नहीं है। तो पहले एनालिसिस किया और फिर सिंथेसिस किया। सिंथेसिस इज इक्वल mc² इक्वेशन के रूप में। तो ये हमारी पिछले एटलीस्ट 3000 साल की वैज्ञानिक यात्रा जो है नेचुरल साइंस जो हम डेवलप कर रहे हैं उसका कंक्लूजन e = mc² इक्वेशन में आता है। इससे भी थोड़ा सा आगे जाएंगे तो फिर बाद में क्वांटम डायनेमिक्स डेवलप होता है। तो खैर वो ज्यादा कॉम्प्लिकेटेड हो जाएगा। किंतु e = mc² इज आप कह सकते हैं कि वन ऑफ द ग्रेटेस्ट अचीवमेंट इन सिंथेसिस इन ह्यूमन हिस्ट्री। तो यहां पे स्वामी जी कहते हैं पहले हम एनालिसिस करते हैं बाद में सिंथेसिस करते हैं। इन द वर्ल्ड ऑफ साइंस द फोर्सेस आर ग्रेजुअली नैरो डाउन इन द सर्च फॉर वन अंडरलाइंग फोर्स। विज्ञान के जगत में जितनी भी फोर्सेस है उन सबको धीरे-धीरे करके एक ही फोर्स के रूप में उसकी अंडरलाइंग एक ही फोर्स है। इस तरह से हम एनालिसिस करने का प्रयास करते हैं। इसको यदि साइंटिफिक लैंग्वेज में देखा जाए तो हमको पता है कि जिस तरह से यह मैटर एनर्जी है वैसे ही यह इंटरेक्शन होता है इन दोनों के बीच में। मैटर मैटर और मैटर के बीच में मैटर और एनर्जी के बीच में। तो देखिए कि विश्व ब्रह्मांड के भीतर में जो कुछ भी आप देखते हैं इसको आप इस तरह से दो बेसिक कैटेगरीज में डिवाइड कर पाएंगे। एक तो है मैटर एनर्जी। यानी कि ये जितनी भी एनर्जी है और जितना भी मैटर है वो एक बॉक्स में आएगा। दूसरा है कि मैटर और एनर्जी के बीच में जो इंटरेक्शन होता है, इस इंटरेक्शन को बेसिकली फोर्स कहा जाता है। तो ये फोर्स कौन-कौन सी है? एक तो इलेक्ट्रिसिटी था एक मैग्नेटिज्म है था नहीं है इलेक्ट्रिसिटी है मैग्नेटिज्म है स्ट्रांग न्यूक्लियर फोर्स है वीक न्यूक्लियर फोर्स है ग्रेविटी है और अभी एक नया फोर्स फंडामेंटल फोर्स वो हमने इन डिस्कवर किया है वो है कि कॉस्मिक एक्सपेंशन तो एंटीग्रेविटी तो जो भी है अभी जितनी भी फोर्स है सबको इक्वेशन के माध्यम से हम एक ही सेट ऑफ इक्वेशन से हम लोग डिस्क्राइब करना चाहते हैं। तो यह जेम्स क्लार्क मैक्सवेल जिसने यह डिस्कवर किया कि इलेक्ट्रिसिटी और मैग्नेटिज्म को एक ही सेट ऑफ इक्वेशन से आप डिस्क्राइब कर सकते हैं। दैट इज इलेक्ट्रोमैग्नेटिज्म। इसके बाद में इलेक्ट्रोमैग्नेटिज्म के साथ में स्ट्रांग न्यूक्लियर फोर्स, वीक न्यूक्लियर फोर्स ऐड हुई। और फिर अभी दो तरह की फोर्सेस कही जाती है। एक तो है कि क्वांटम लेवल की फोर्सेस यानी कि क्वांटम जो इक्वेशंस है क्वांटम डायनेमिक्स है इसके माध्यम से ये तीन फोर्सेस को आप यूनाइट कर सकते हैं। इलेक्ट्रोमैग्नेटिज्म, स्ट्रांग न्यूक्लियर फोर्स और वीक न्यूक्लियर फोर्स। किंतु यह जो ग्रेविटी जो है तो ग्रेविटी अभी तक क्वांटम डायनेमिक्स की झपट में आई नहीं है। उसके ग्रास्प में आई नहीं है। तो अभी का जो साइंटिस्ट लोगों का एक सबसे बड़ा होली ग्रेल जिसको कहते हैं ना कि उनके जीवन की एक ऐसी खोज वो यदि खोज मिल जाए उनको उनका गंतव्य स्थल उसका जो लक्ष्य है प्राप्त हो जाए तो बड़े ही उनके जीवन में खुशी प्राप्त होगी और उनके जीवन की ये चरम कहेंगे कि उपलब्धि प्राप्त होगी। वो क्या है? एक ही सेट ऑफ इक्वेशन के माध्यम से यह जो तीन क्वांटम डायनेमिक्स लेवल की जो फोर्सेस हैं और यह जो ग्रेविटी जो है जिसको कि क्लासिकल रिलेटिविटी के इक्वेशन के माध्यम से डिस्क्राइब कर सकते हैं। इन दोनों को एक करना जिसको कि कहते हैं ग्रैंड यूनिफाइड थ्यरी। तो दैट इज देयर होली ग्रेल राइट नाउ। और फिर यह जो जैसे कि अभी पिछले ही कुछ 20 साल में ऐसा कुछ एक नई फोर्स यह लोग कहते हैं कि फंडामेंटल फोर्स ऑफ नेचर है वि इज द कॉस्मिक कांस्टेंट। यानी कि ये यूनिवर्स जो है वो एक्सपंड हो रहा है। वैसे तो हम लोग सोचेंगे कि ये ग्रेविटी यदि है तो सभी पदार्थ जितने भी ग्रह, नक्षत्र, तारे वगैरह है वो तो पासपास में आने चाहिए। क्योंकि ग्रेविटी तो सबको पास में लेके आती है। किंतु एक कॉस्मिक कांस्टेंट एक ऐसी फोर्स है जो कि एंटी ग्रेविटी के रूप में काम करती है और इसको और दूर से दूर ले जाती है। बड़ा कॉम्प्लिकेटेड है यह इसके पीछे का रीजनिंग। किंतु देखिए कि मैटर और एनर्जी को तो हमने यूनिफाई कर दिया। बस अभी यह जो फोर्सेस है चार फोर्सेस और यह जो एंटी ग्रेविटी इसको यूनिफाई करना बाकी है। तो यह हो गया विज्ञान के जगत में यूनिटी जो है वह हमारी सर्च है। व्हेन फिजिकल साइंस कैन परफेक्टली ग्रेस द फाइनल यूनिटी इट विल हैव रीच्ड एन एंड फॉर रिचिंग यूनिटी वी फाइंड रेस्ट। जब यह भौतिक विज्ञान एक परफेक्ट फाइनल यूनिटी तक पहुंच जाएगा तब हम विज्ञान के अंत तक पहुंच जाएंगे। इस अर्थ में कि अब जैसे कि इक्वल mc² है। यह यह इक्वेशन खोज लेने से एग्जैक्टली समझ में आ गया कि अभी इसके आगे और कुछ नहीं है। मैटर और एनर्जी एक ही है। किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि साइंस रुक जाता है। इसके बाद में उसका प्रैक्टिकल एप्लीकेशन प्रारंभ होता है। न्यूक्लियर एक्सप्लोजन, न्यूक्लियर वेपंस, यह न्यूक्लियर रिएक्टर, न्यूक्लियर एनर्जी, न्यूक्लियर मेडिसिन, केमोथेरापी क्या-क्या सब कुछ है इसकी लाखों लाखों एप्लीकेशन है। किंतु थ्योरिटिकल जो चरम शिखर है, चरम उपलब्धि है, वह हमने उस इक्वेशन में प्राप्त कर ली है। तो वैसे ही विज्ञान का अर्थ इस अर्थ में नहीं कि अभी हम हाथ पर हाथ धर के बैठ जाए। हजार साल तक कुछ किया नहीं। विदेशी जितने भी आए जिसकी जितनी इच्छा हुई हमारी पिटाई करके चले गए। इस तरह से तामसिक अर्थ में नहीं इस अर्थ में कि थ्योरेटिकली जो बेस्ट थ्यरी हो सकती है वो हमने डेवलप कर दी है। बस अभी इसकी प्रैक्टिकल एप्लीकेशन ही रह गई है डे डे टू डे लाइफ में। ये जो हमारे अद्वैत वेदांत या तो फिर कहेंगे उपनिषद में ये जो एक बार महावाक्य हमने डेवलप कर लिए डिस्कवर कर लिए उसके बाद में उसका जो एक प्रैक्टिकल एप्लीकेशन होना चाहिए था वो प्रैक्टिकल एप्लीकेशन हमने नहीं किया हम लोग महावाक्य डेवलप करके खोज करके शांति से बैठ गए महावाक्य खोजना अपने आप में एक बड़ी सिद्धि है किंतु प्रॉब्लम यह है कि ह्यूमन सिविलाइजेशन जो है वह एक जगह पर शांति से कभी बैठती नहीं है। यह ह्यूमन सिविलाइजेशन यह है कि साइकिल की तरह है। या तो आप आगे चलाइए या तो यह पीछे जाएगी। जैसे आप उसको ब्रेक लगा देंगे तो साथ-साथ में ही वह गिर जाएगी। तो आपको आगे चलते ही रहना पड़ेगा। साइकिल को दो पहहिए की साइकिल होती है तो वह चलती ही रहनी चाहिए। वरना तो गिर जाएगी या तो फिर वह पीछे चलना रिवर्स डायरेक्शन में जाना शुरू हो जाएगा। तो वह एक बड़ी गलती हमने कर दी। तो जो भी है जहां तक थ्यरी का प्रश्न है स्वामी जी कहते हैं कि यह इवन भौतिक विज्ञान जो है वह जब यह फाइनल यूनिफाइंग थ्यरी को खोज लेगा तब वो अपने जो लक्ष्य है वह प्राप्त कर लेगा। फॉर रिचिंग यूनिटी वी फाइंड रेस्ट। जब हम यूनिटी को प्राप्त हो जाएंगे तभी हमको शाश्वत शांति मिलेगी। इस अर्थ में कि हमको एक इंटेलेक्चुअल सेटिस्फेक्शन मिलता है। हमको एक जीवन में एक बड़ी उपलब्धि जॉब सेटिस्फेक्शन कहते हैं ना आजकल वो जॉब सेटिस्फेक्शन मिलता है कि हां जो अब जैसे आइंस्टाइन हिमसेल्फ वो उसने एक बार जो एक प्रचंड मेहनत कर ली कि हां वो इंटेलेक्चुअल एडवेंचर था उसका इनिशियल उसका जो आईडिया था कि हां यदि मैं प्रकाश के किरण के साथ में ही प्रकाश के किरण की गति से ही मैं यदि अ गति मैं उड़ता हूं तो क्या मुझे प्रकाश का किरण स्थिर दिखाई देगा? आंसर इज वेरी सरप्राइजिंग कि नहीं। दूसरा कि ये तो उसकी एक ओरिजिनल इंसाइट थी। दूसरी एक इंसाइट थी कि एक लिफ्ट है। लिफ्ट आप आकाश में से गिर रहे हैं। तो ये जो आकाश में से गिरते समय या तो फिर यह जो लिफ्ट में आप जा रहे हैं बड़ी स्पीड से लिफ्ट नीचे जा रही है। उस समय आपको ऐसा महसूस होगा कि आप हवा में तैर रहे हैं। तो ये हवा में तैरना और ग्रेविटी में डिफरेंस क्या है? एक्चुअली देखिए बड़ा सरप्राइजिंग कि यह जो एस्ट्रोनॉट जाते हैं ना तो वेटलेसनेस की उनको ट्रेनिंग दी जाती है। पता है कैसे दी जाती है? स्पेस में जाना तो बड़ा मुश्किल है। आई मीन बड़ा ही भयानक प्रचंड आपका फिजिकल फिटनेस होना चाहिए। तभी तो आप स्पेस में जाएंगे और तभी तो आपको प्रथम वेटलेसनेस की फीलिंग प्राप्त होगी। किंतु पृथ्वी पे आपको वेटलेसनेस कैसे लगेगा? संभव ही नहीं है। ग्रेविटी तो पूरी पृथ्वी पर व्याप्त है। आप ऐसा हो ही नहीं सकता कि यहां पर ऐसा एक मशीन बना दिया। वहां पर स्विच ऑन करें उस कमरे में बैठकर के तो ग्रेविटी अदृश्य हो गई। आप हवा में तैरने लगे। ऐसा तो संभव ही नहीं है। किंतु यह जो आइंस्टाइन की जो ओरिजिनल इंसाइट थी कि एक ऐसी लिफ्ट जिसको बड़ी ही माने मैथमेटिकल इक्वेशन से जो फिगर प्राप्त होता है जो नंबर प्राप्त होता है उस नंबर उस गति से यदि लिफ्ट नीचे आ रही है तो उस लिफ्ट में यदि आप बेसेंगे तो आपको वेटलेसनेस का अनुभव होगा। जो लोग की स्काई स्क्रेपर यदि आपने देखे होंगे कभी उसकी मुलाकात ली होगी और वहां से लिफ्ट में नीचे आते होंगे ये लिफ्ट बड़ी स्पीड से चलती है तो स्पीड से लिफ्ट जब नीचे आती है ना तब आपको ऐसा लगेगा आप जैसे कि हवा में थोड़े से ये हो आपका वेट जो है थोड़ा सा कम लगने लगता है थोड़ा सा एक आपका वेट कम हुआ ऐसा लगता है तो ये मैथमेटिक्स तो हमको पता है तो मैथमेटिक्स की वजह से उसको यूज़ करके हमने क्या यह जो नासा के साइंटिस्ट क्या करते हैं? एक तो एक प्लेन होता है। बोइंग का ऐसा ही कोई जंबोजेट एक प्लेन लेते हैं। फिर बड़े ऊपर में हवा में जाते हैं इस प्लेन को लेकर के। फिर क्या करते हैं? वहां पे एस्ट्रोनॉट बैठे हुए हैं। तो अब उनको तो वेटलेसनेस का ट्रेनिंग देना है। एकदम हवा में ऊपर में चले जाएंगे। फिर सीधा यह जो प्लेन है ना जो हवा में जा रहा है। सीधा नीचे वो डाइव लगाएगा। अब जो प्लेन नीचे डाइव लगाता है साथ-साथ में ही प्लेन में वेटलेसनेस हो जाएगा। क्यों? क्योंकि यह जो आइंस्टाइन का इक्वेशन है कि लिफ्ट में आप जाए इनसाइड जो है लिफ्ट में नीचे जा रहे हैं तो आपको वेटलेसनेस की वो अनुभूति होगी। इस स्पीड के साथ में मैथमेटिकली जो प्रूव होती है इक्वेशन जो स्पीड हमको बताता है उस स्पीड के साथ में आपको नीचे गिरना है। किसी एक इंस्ट्रूमेंट में बैठकर के तो आपको वेटलेसनेस लगेगा। तो आप देखिए इस तरह के वीडियो यदि आप YouTube पर खोजेंगे तो आपको मिल जाएंगे कि यह वेटलेसनेस इन एरोप्लेन तो यह एरोप्लेन आप माने और कोई कच्चा वो हृदय का पायलट होगा ना वो तो इस तरह का प्लेन उड़ाने का प्रयास ही नहीं करेगा। इसको सीधा नोच ड्राइव लगाना है। सीधा वो प्लेन नीचे जाएगा। मतलब हाई स्पीड से वो जो अहमदाबाद में जो हुआ इस तरह से एक अनुभूति हो जाएगी। तो यहां पे उसके भीतर में जो एस्ट्रोनॉट बैठे होते हैं उनको कुछ सेकंड के लिए वेटलेसनेस का अनुभव होता है। वो जैसे हवा में उड़ते हैं इधर से उधर जैसे आप स्पेस स्टेशन के वीडियो देखते होंगे तो एस्ट्रोनॉट कैसे हवा में उड़ते हैं वैसे ही ये जो प्लेन सीधा जो नीचे जा रहा है उसमें कुछ सेकंड के लिए यह लोग एस्ट्रोनॉट हवा में उड़ते हुए दिखाई देंगे। पानी जब रिलीज करेंगे ग्लास में से तो हवा में वह बबल बनाई देगा। माने एग्जजेक्टली जो स्पेस एनवायरमेंट है पृथ्वी पे हम रेप्लिककेट कर सकते हैं। फिर वो जो फिर अगेन ये प्लेन जो है वो एक एग्जैक्ट लेवल पे जब पहुंच जाएगा अल्टीट्यूड पे हाइट पे तो फिर से वो नॉर्मल वो सीधा हो जाएगा। फिर नॉर्मल रूप से उड़ना शुरू करेगा। तो फिर ये वेटलेसनेस फट करके ये एस्ट्रोनॉट जो होते हैं सीधा वो जमीन पे आके पटकाएंगे। तो यह यह देखिए कि साइंस जो है हमको कितना इंसाइट देता है। साइंस जो है हमको क्या सेटिस्फेक्शन देता है। उसको यदि आप पॉजिटिव यूज़ करेंगे देखिए कि यह बार-बार यह जो आजकल कहा जाता है कि देयर इज़ नो प्लेनेट बी। जनरली होता है ना मैनेजमेंट की लैंग्वेज में कहते हैं देयर इज़ अ प्लान बी। अर्थात कियर इज़ वन प्लान ए आप मर्जर या एक्विज़िशन करना है, प्रोडक्ट आपको रिलीज़ करनी है। तो, आपने एक प्लान बनाया। मान लीजिए कि यह प्लान फेल हो गया। तो, हमें खास करके मिलिट्री में आपने अटैक का प्लान बनाया है। शत्रुओं के ऊपर में टेररिस्ट साइट के ऊपर में आखिरी घड़ी में हेलीकॉप्टर टूट गया। जैसे वह ओसामा बिन लादेन पे रेड करने को गए थे। तो एक हेलीकॉप्टर टूट गया। तो किंतु वहां पे प्लान भी रेडी था। दूसरा एक हेलीकॉप्टर स्टैंड बाय था तो वह नेवी सेल्स को उठा के वापस ले आया। वो वहां पर रह नहीं गए। स्ट्रेंड नहीं हो गए। तो क्या है कि हमेशा मिलिट्री प्लानिंग जो होता है एकदम वो जो कटिंग एज प्लानिंग जो होता है हमेशा प्लान बी, प्लान सी, प्लान डी रहते हैं। प्लान ए फेल हो जाएगा तो प्लान बी अप्लाई कर देंगे। प्लान बी फेल हो जाएगा तो प्लान सी अप्लाई कर देंगे। ऐसा आपको रिडंडेंसी रखनी पड़ती है। बड़ा लंबा आपको सोचना पड़ता है। तो यह जो आजकल लोग कहते हैं देयर इज नो प्लेनेट बी अर्थात कि ये दिस इज अर्थ है, पृथ्वी है, प्लेनेट ए है। यहां पे यदि एनवायरमेंटल डिजास्टर न्यूक्लियर डिजास्टर हो गया तो मनुष्य जाति यहीं पे समाप्त हो जाएगी। और कहीं पे दूसरा प्लान नहीं है कि वहां से यह फिर से मनुष्य जाति प्रारंभ हो। और इसीलिए आजकल के जो कुछ-कुछ इंडस्ट्रियलिस्ट है उन लोगों का यह विजन है कि मार्स के ऊपर में कॉलोनी बनाएंगे। तो पृथ्वी पृथ्वी पर डिजास्टर हो जाए तो मार्स पे किंतु मनुष्य जाति बची रहे और फिर वहां से ह्यूमन सिविलाइजेशन फिर से स्टार्ट हो। तो देखिए कि यह सब जो इंटेलेक्चुअल क्यूरियोसिटी है, एक साइंटिफिक अचीवमेंट है। उस लेवल पर यदि जाकर के आप डिस्कस करेंगे तो आपके हृदय को कितना सेटिस्फेक्शन मिलता है। इसलिए स्वामी जी कहते हैं फॉर रिचिंग यूनिटी वी फाइंड रेस्ट नॉलेज इज फाइनल। यदि यह फाइनल नॉलेज हमारे हाथ में आ जाता है तो हमको शांति ही मिलेगी। किंतु शांति का अर्थ तमस में नहीं परिणत होना चाहिए। सत्व और तमस दोनों बाहर से एक ही जैसे दिखते हैं। दोनों बोथ आर एट रेस्ट। दोनों स्टेशनरी है। दोनों स्थिर है, धीर है। किंतु यह नॉलेज जो है वो फाइनल उसका अर्थ यह नहीं कि हम तमस में चले जाए। सत्व की जो शांति है वह चाहिए। जहां पे कि परपेचुअली हम वी आर परपेचुअली रेडी फॉर एक्शन। वी आर ए ट्रेस्ट एट द सेम टाइम वी आर परपेचुअली रेडी फॉर एक्शन। ये जो हाई टेंस सिचुएशन है जहां पे एक्शन और यह इनएक्शन और रेदर एक्शन एंड सेरिनिटी बोथ बैलेंस ईच अदर परफेक्टली उस लेवल पे हम पहुंच जाएंगे।

स्वामी विवेकानंद: केवल धर्म ही हमारी चेतना सहित ब्रह्मांड के सभी तत्वों को एकत्व प्रदान कर सकता है

रिलीजन द मोस्ट प्रिशियस ऑफ ऑल साइंसेस लॉन्ग एगो डिस्कवर्ड दैट फाइनल यूनिटी टू रिच विच इज द ऑब्जेक्ट ऑफ ज्ञान योगा। रिलीजन अर्थात कि यह जो सबसे श्रेष्ठ साइंस है उसने लाखों हजारों साल पहले खोज निकाला था कि यह जो फाइनल यूनिटी है वही है उसको प्राप्त करना ही ज्ञान योग का हेतु है। अभी देखिए कि साइंटिस्ट लोगों का तो एक लिमिटेशन होता है कि ये वो फोर्सेस को यूनाइट करेंगे। मैटर एनर्जी को यूनाइट करेंगे। डायमेंशन को यूनाइट कर देंगे। डायमेंशंस कौन-कौन सी है? तो अप डाउन ये आगे पीछे ऊपर नीचे यह जो स्पेस डायमेंशन है और फिर एक टाइम की डायमेंशन है। बहुत लंबे समय तक तो हमको पता ही नहीं था कि ये दोनों डायमेंशन को आप एक ही सेट ऑफ इक्वेशन से आप डिस्क्राइब कर सकते हैं जो कि जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी में हमको मिलता है। स्पेस टाइम अभी आजकल हम कहते हैं। ऐसा नहीं कहते स्पेस अलग, टाइम अलग। एक्चुअली एक ही डायमेंशन के ये विभिन्न ये पहलू है। तो आप डायमेंशन को यूनाइट कर सकते हैं। फोर्सेस को यूनाइट कर सकते हैं। मैटर एनर्जी को यूनाइट कर सकते हैं। भविष्य में होगा कि डायमेंशन फोर्सेस एंड मैटर मैटर एनर्जी सभी को आप एक ही सेट ऑफ इक्वेशन से आप शायद हो सकता है कि डिस्क्राइब कर पाए। किंतु यह जो पूरा प्रयास जो है वो एक मेजर एक फैक्टर है उसको छोड़ देता है। वो है कॉन्शियसनेस। अभी देखिए कि ऑलरेडी साइंटिस्ट लोगों को यह तो अंदाज आ गया है कि जो फिजिक्स है वह प्योर फिजिक्स नहीं है। आपको कॉन्शियसनेस को उसके भीतर में डालना ही होगा। यह बहुत बड़ा डिस्कवरी है। जिस डिस्कवरी को हम बहुत कम लोग समझ पाते हैं। भारत में तो इस डिस्कवरी को हमको काफी बड़े पैमाने पे लोगों को बताना चाहिए। वेदांत का जो बेसिक प्रीमाइस है कि सर्वम खलु इदम ब्राह्मण अर्थात कि जगत में जो कुछ भी देख रहे हैं ये मैटर एनर्जी स्पेस टाइम फोर्सेस इलेक्ट्रोमैग्नेटिज्म वीक स्ट्रांग न्यूक्लियर फोर्स जो स्पेस टाइम जो कुछ भी आप देख रहे हैं इट इज़ ऑल नथिंग बट ब्रह्मण और यह ब्रह्मन और यह दूसरा है कॉन्शियसनेस तो यह कॉन्शियसनेस और यह मैटर एनर्जी स्पेस टाइम और यह फोर्सेस ऑल कैन बी डिस्क्राइब विद द ओनली वन सेट ऑफ इक्वेशन। यदि हमारे में वो क्षमता है तो एक ही सेट ऑफ इक्वेशन से एक ही सेट ऑफ मैथमेटिकल फार्मूला से हम कॉन्शियसनेस को भी डिस्क्राइब कर पाएंगे। और इसका प्रारंभ ऑलरेडी हो चुका है। जब यह क्वांटम डायनेमिक्स के यह लोग एक्सपेरिमेंट कर रहे थे तब इनको पता चला कि ऑब्जर्वर जो होता है उसका बहुत बड़ा रोल है। यदि ऑब्जर्वर नहीं है या तो फिर ऑब्जर्वर क्या ऑब्जर्व करता है उसके ऊपर में एक्सपेरिमेंट का आउटकम जो है वो डिपेंड करता है। एक बड़ा ही क्रूड एग्जांपल बड़ा फेमस एग्जांपल है। किंतु थोड़ा सा क्रूड है। तो व्हाटएवर कहते हैं एक बिल्ली है। जैसे कि फॉर एग्जांपल एक बॉक्स के भीतर में आपने रखी है उसको। अभी ये बिल्ली यदि जिंदा है या मर गई हमको पता नहीं है। क्यों? क्योंकि जब तक आप बॉक्स खोल करके देखेंगे नहीं तब तक यह बिल्ली की यह जो दो स्टेट है जिंदा और मृत्यु यह दोनों सुपरपजीशन में होते हैं। और यह सुपरपजीशन का अर्थ यही है कि बिल्ली एक साथ में जिंदा भी है और मुर्दा भी है। जब तक आप बॉक्स खोल के देखेंगे नहीं, अपनी आंखों से उसको ऑब्जर्व नहीं करेंगे कि वह जिंदा है या मुर्दा है तब तक वह सुपरपजीशन में रहेगी। और जैसे ही आपने बॉक्स खोल करके देखा साथ-साथ में ही यह वेव फंक्शन कोलैप्स होता है और बिल्ली आइदर डेड और अलाइव वो परफेक्टली प्रूव हो जाता है। हालांकि यह सब एटॉमिक पार्टिकल के लेवल पे सही है। नहीं कि बिल्ली के लेवल पे किंतु ये थ्यरी एग्जैक्टली परफेक्टली काम करती है। सब एटॉमिक पार्टिकल का अर्थ तो आप समझते ही हैं। इलेक्ट्रॉन और न्यूट्रॉन और उससे भी जो छोटे-छोटे जो भी क्वार्क या तो फिर ये स्ट्रिंग जो भी है उस लेवल पे ये थ्यरी सही है। जैसे कि इलेक्ट्रॉन होता है सुपरपजीशन में होता है। उसका वो जो अप स्पिन डाउन स्पिन एक साथ में चलता है। जब तक आप उसको इंस्ट्रूमेंट से ऑब्जर्व नहीं करेंगे तब तक दोनों स्पिन उसका रहेगा। जैसे इंस्ट्रूमेंट से यदि आप देखेंगे नहीं तब तक वह उसका दोनों स्पिन अप और डाउन रहेगा। जैसे ही आपने उसको ऑब्जर्व किया साथ-साथ में ही वह उसका वेव फंक्शन कोलैप्स होगा। आइदर अप्स रहेगा उसका स्पिन या तो डाउन रहेगा। दैट मींस कि विदिन साइंटिफिक सर्कल ये परफेक्टली मैथमेटिकली साइंटिफिकली प्रूव है कि ऑब्जर्वर का रोल है। जब तक ऑब्जर्वर एक चीज को माइक्रोस्कोप यस यस। सो जब तक यह ऑब्जर्वर है माइक्रोस्कोप या इस तरह के किसी इंस्ट्रूमेंट से उसको ऑब्जर्व नहीं करता है तब तक यह आप प्रूव नहीं कर पाएंगे कि उसका एग्जैक्ट उसका क्या स्टेट है। तो देखिए कि ये जो है कि रोल ऑफ कॉन्शियसनेस रोल ऑफ ह्यूमन माइंड ऑलरेडी ये जो क्वांटम डायनेमिक्स के भीतर में एस्टैब्लिश्ड है। तो यहां पे स्वामी जी कहते हैं कि देखिए कि यह जो सबसे प्रिशियस साइंस है विज्ञान के आध्यात्मिकता जो कि इस जगत का सबसे प्रिशियस साइंस है। सबसे इंपॉर्टेंट साइंस है। उसने लॉन्ग एगो खोज निकाला था कि ये फाइनल यूनिटी खोजना यही इस विज्ञान का अंतिम धेय है। तो ये फाइनल यूनिटी क्या होगी? तो ये देखिए कि यहां पे जैसे विभिन्न विभिन्न एलिमेंट्स को हमने यूनाइट किया नेचुरल साइंस में मैटर एनर्जी या तो फिर कहेंगे कि ये इलेक्ट्रोमैग्नेटिज्म स्ट्रांग न्यूक्लियर फोर्स वीक न्यूक्लियर फोर्स फोर्सेस को यूनाइट किया डायमेंशन को यूनाइट किया स्पेस और टाइम को या तो फिर हमने यूनाइट किया ये सब चीजों को एक साथ में मिलकर के ये मैटर एनर्जी स्पेस टाइम और फर्सेस ये तीनों को जिसे इकट्ठा किया साथ में ही कॉन्शियसनेस का रोल विज्ञान में ऑलरेडी एक्सेप्टेड हो चुका है। यहां पे ह्यूमन लेवल पर आप देखिए कि पहले तो हम लोग सोचते थे कि हम सभी लोग डिफरेंट-डिफरेंट मनुष्य हैं। यह पेड़ है, यह पौधा है, यह आदमी है, यह नर है, यह नारी है, यह बच्चा है, यह बूढ़ा है, यह स्त्री है, यह पुरुष है, यह समुंदर है, यह हवा है, यह आकाश है, यह बादल है। इस तरह से जो कुछ हम सोचते थे धीरे-धीरे पता चला कि सभी के भीतर में वही एक ही दिव्य सत्ता विराजमान है। वो नर हो, नारी हो, बूढ़ा हो, बच्चा हो, अफ्रीकन हो, यूरोपियन हो, इंडियन हो, चाइनीस हो, अमेरिकन हो, जो कुछ भी हो, सभी के भीतर में वही एक ही चेतन तत्व है। यहां तक तो सांख्य हमको लेकर आया और सांख्य के बाद में यदि आप वेदांत के लेवल पर जाकर देखेंगे तो कहेंगे कि जिसको सांख्य पुरुष कहता है सभी मनुष्य सभी जीवंत वस्तुओं के भीतर में जो एक पुरुष है वो पुरुष इज नथिंग बट आत्मन या तो ब्रह्मन और ब्रह्मन एक ही है। एक के अलावा दूसरा और कुछ नहीं है। एक ही आत्मन है। एक [गला साफ़ करने की आवाज़] ही ब्रह्मण है या कहेंगे एक ही ईश्वर है जो कि विभिन्न पशुओं में मनुष्यों में उसके प्रकाश की एक-एक किरण की वजह से हम लोग अपने आप को एक जीवंत इंडिविजुअल महसूस करते हैं। किंतु थोड़ा सा एनालिसिस सिंथेसिस करके देखेंगे तो हम सबके भीतर में एक ही अद्वय ब्रह्म वस्तु विराजमान है। एक ही चेतन तत्व विराजमान है। तो जिस तरह से साइंटिफिक फील्ड में यह यूनिटी आई है, उसी तरह से यह आध्यात्मिक क्षेत्र में भी यह यूनिटी है। और एक समय ऐसा आएगा कि जिस तरह से आप मैथमेटिकली प्रूव कर सकते हैं कि यह साइंस की यह थ्यरी इस तरह से प्रूव हुई है। फिर उसको प्र एप्लीकेशन कर सकते हैं। सिर्फ प्रूव करने से तो होगा नहीं। आपको स्पेसशिप बनाना होगा। आपको क्वांटम कंप्यूटर बनाने होंगे। आपको आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस डेवलप करना होगा। आपको यह इलेक्ट्रॉनिक्स डेवलप करना होगा। न्यूक्लियर रिएक्टर डेवलप करने होंगे। आपको तो कितना सब कुछ पूरी सिविलाइजेशन आज जो खड़ी है वो पूरी सिविलाइजेशन तो यह साइंस और टेक्नोलॉजी की गिफ्ट के ऊपर में ही तो खड़ी है। जब भारत को इंडिपेंडेंस मिला था हमारी यह जो एवरेज एज थी 35 के आसपास में। माने एक एवरेज भारतीय 30 35 साल तक की उम्र से ज्यादा जीने की अपेक्षा नहीं कर सकता था। दिस वाज़ वेरी माने आप आज हम यह बात सोचते हैं तो हमको आश्चर्य होती है कि अच्छा आज टुडे आज का भारतीय एवरेज एज हमारी 60 प्लस है। 65 ना 68 के आसपास है। यह जो डेवलप्ड कंट्रीज है उनमें तो और भी ज्यादा है। 70 723 के आसपास में होगी। तो हम आज कंफर्टेबली यह एक्सपेक्ट करते हैं कि हम अप टू 70 तो आराम से जी लेंगे। उस समय था इंडिपेंडेंस यानी कि आज से बेयरली 70 इयर्स एगो कि 30 म 25 30 हुआ तो बूढ़े हो गए और 35 हुआ तो मर गए। ये एवरेज इंडियन की ये लाइफ स्पान था। तो देखिए कि नो नो वंडर कि ठाकुर और स्वामी जी इतने जल्दी चल बसे। वो 35 तो वैसे ही एवरेज एक्सपेक्टेड एज थी। उसके अनुसार ठाकुर 50 साल तक जिए थे। स्वामी जी 40 साल तक जिए थे। ऑलरेडी वे लोग ओवर एक्सटेंडेड ओवरड्राफ्ट करके वो जी रहे थे। तो देखिए कि वहां से लेकर के आज विदिन 70 इयर्स हमारी एवरेज एज नियरली डबल हो जाए वो क्यों संभव हुई है? क्योंकि यह जो मॉडर्न मेडिसिन है, यह जो मॉडर्न खेती है, अभी हमारी पॉपुलेशन वह 30 करोड़ की थी उस समय आज 150 करोड़ की है। नियरली फोर टाइम्स नियरली फाइव टाइम्स हमने यह जंप लगाया है। सात मयरली इन 70 इयर्स विश्वास करके देखिए कि मनुष्य के पूरे जीवन म पूरी मनुष्य सभ्यता के इतिहास में पपुलेशन इंक्रीस जो होती है मुश्किल से 10% ने 20% इस तरह से होती है। ओवर ए पीरियड ऑफ़ सेंचुरी हमने लेस दैन सेंचुरी हमने 500 टाइम्स इंक्रीज़ हुई है पॉपुलेशन। तो एवरेज ऐज इंक्रीस होना पपुलेशन फाइव टाइम्स मल्टीप्लाई हो जाना ये सब कैसे संभव है? यह उच्च फस उच्च किस्म की यह जो खेती है यह जो ग्रीन रिवॉल्यूशन यह वाइट रेवोल्यूशन यानी दूध जो मिलता है आज इतना माने पर्याप्त मात्रा में ग्रीन रिवॉल्यूशन यानी कि फसल इतनी होती है हम लोग नेट इंपोर्टर से टुडे वी आर द नेट एक्सपोर्टर ऑफ फूड ग्रेन यह सब साइंस की वजह से ही तो हुआ है। आज जो कंफर्ट है उस समय के राजा महाराजा इस तरह के कंफर्ट की अपेक्षा नहीं करते थे। आज हम ईजीली यह फैन है, इलेक्ट्रिसिटी है, यह ट्रांसपोर्ट सिस्टम है, यह डिजिटल यह जो गैजेट्स है, ये हम ये ये सब फिर ये एजुकेशन सिस्टम है। वो राजा महाराजा 10 पंडितों को रख के अपने राजकुमार को शिक्षा देते थे। आज आपको ऑनलाइन किसी भी आप कोई भी लेक्चर सुनना चाहे, कोई भी नॉलेज प्राप्त करना चाहे, इट इज एट योर फिंगर टिप। अभी तो एआई डेवलप हो गया है। एआई को आप क्वेश्चन कीजिए। दुनिया भर के आपको आंसर दे देगा। जिसको पढ़ाई लिखाई की यह जो इच्छा है उसके लिए तो एक अनंत महासागर खुल गया है उसके सामने। तो राजा महाराजा जिस तरह के कंफर्ट जिस तरह की ये एक मटेरियल बेनिफिट की अपेक्षा नहीं करते थे वो आज एक आम आदमी कर रहा है। दिस इज नथिंग बट अ गिफ्ट ऑफ साइंस। तो फिर यदि साइंस जैसी एक सामान्य चीज को आप प्रैक्टिकल एप्लीकेशन करें तो इतने सारे उसके फल मिल सकते हैं। तो विज्ञान या तो फिर यह जो साइंस है आत्मा का विज्ञान, ब्राह्मण का विज्ञान उसको यदि प्रॉपर प्रैक्टिकल एप्लीकेशन की जाए तो ह्यूमन सोसाइटी जो है मनुष्य समाज है कहां से कहां चला जाएगा। जस्ट इमेजिन करके देखिए कि हम मां के साथ में रह दक्षिणेश्वर में रह रहे हैं। हम लोगों का सबका एक-एक फैमिली एक्सपीरियंस है। फैमिली एक्सपीरियंस है। वर्क प्लेस एक्सपीरियंस है। लाइफ एक एक्सपीरियंस है। जस्ट इमेजिन के हम गुरु भाइयों की तरह नरेंद्र, राखा, लाटू, बाबूराम, तारक, काली इनकी तरह दक्षिणेश्वर में रह रहे हैं। एंड दिस इज़ एक्चुअली अ प्रैक्टिकल एप्लीकेशन ऑफ़ हाईएस्ट वेदांत। कि पिताजी है ठाकुर की तरह, मां है मां शारदा देवी की तरह और भाई-बहन है यह सब। यह अपने ये नरन ये लाटू उनकी तरह और फिर अपना कार्य है वर्क प्लेस एक्सपीरियंस है कि पंचवटी के नीचे बैठकर के समाधि में मग्न हो जा रहा है। दिस इज एक्चुअली अ प्रैक्टिकल हम वी कैन रियलिस्टिकली एक्सपेक्ट वो जो जीवन उन्होंने जिया भीतर में से प्रचंड शांति है। बाहर में प्रचंड कर्म है। स्वामी जी जब अमेरिका गए तो क्या कष्ट करना पड़ा था उनको। वहां पर सभी लोगों के साथ में कितना फाइट करना पड़ा था। यह जितने भी ये मिशनरी पागल है उनके साथ में तो कर्मक्षेत्र में तत्परता स्वामी जी जब वापस आते हैं तो गांवगांव शहर शहर उनका स्वागत होता है। राजा महाराजा उनके रथ को खींचने के लिए वह तत्पर रहते हैं। यह जो अपने ब्रिटिश गवर्नमेंट के इवन वाइससरोय वगैरह लोग भी रामकृष्ण मिशन से थोड़ा सा यह समझ करके चलते हैं कि जैसे बाकी सबको ट्रीट करते हैं। इस तरह से रामकृष्ण मिशन को आप नहीं ट्रीट कर सकते। वो जो अमेरिकन एंबेसडर, उसकी वाइफ यह लोग सीधे पहुंच जाएंगे वायसरॉय के पास में कंप्लेन करने के लिए। तो देखिए कि जो प्रेस्टीज हमको मिला था बाह्य जगत में ऑल ऑफ दिस इज अ प्रैक्टिकल एप्लीकेशन ऑफ वेदांत। आज हम अपना जीवन देखते हैं। बुरा नहीं है। नहीं कहेंगे कि बुरा है। किंतु यदि दक्षिणेश्वर में जन्म हुआ होता, ठाकुर और मां हमारे मां-पिताजी होते और स्वामी जी की तरह हमने कर्म किया होता तो जीवन में कितना सेटिस्फेक्शन मिलता। कितना हमको कंटेंटमेंट प्राप्त होती है। सो दिस प्रैक्टिकल एप्लीकेशन ऑफ वेदांत इन टू आवर डे टू डे लाइफ इट इज एंटायरली पॉसिबल। इट इज एक्चुअली दैट इज द रीजन फॉर व्हिच दिस साइंस ऑफ़ वेदांत इज क्रिएटेड। तो इसीलिए देयर इज बट वन सेल्फ

स्वामी विवेकानंद: आत्मन् कि महिमा

इन द यूनिवर्स ऑफ व्हिच ऑल ओवर सेल्व्स आर बट मैनिफेस्टेशंस। इस विश्व ब्रह्मांड में एक ही आत्मन है। एक ही स्व मेरा जो नेचर है स्वभाव वही एक ही है। और इसके ये जो मैनिफेस्टेशन है विभिन्न विभिन्न ये पेड़ पौधे पशु पंखी मनुष्य आसमान समुंदर यह सब उसी के मैनिफेस्टेशन है। द सेल्फ हाउएवर इज इनफाइनाइटली मोर देन ऑल ऑफ ह मैनिफेस्टेशंस। किंतु जैसे कहते हैं ना कि टोटल इज़ ग्रेटर दैन इट्स सम माने सम इज़ ग्रेटर दैन इट्स पार्ट्स अर्थात कि मैं 1 + 1 2 करता हूं तो टू का वैल्यू एक्चुअली ये जो दो एक है उससे ज्यादा है नॉट ए मैथमेटिक्स किंतु मैथमेटिक्स की लैंग्वेज में वो दोनों इक्वल ही होंगे किंतु अध्यात्म का जो मैथमेटिक्स है स्पिरिचुअल मैथमेटिक्स है उसमें 1 + 1 यदि टू करेंगे तो टू का वैल्यू जो है वो वन दो एक है उससे कहीं ज्यादा है दोनों दोनों इकट्ठा भी यदि हो जाए तो उससे भी कहीं ज्यादा है। व्हिच इज वेरी सरप्राइजिंग कि यह मैथमेटिक्स उस मैथमेटिक्स जैसा नहीं है। द सेल्फ हाउ एवर इज इनफाइनाइटली मोर देन ऑल ऑफ इट्स मैनिफेस्टेशंस। ये विश्व ब्रह्मांड को यदि आप एक कर दें तो भी इसके भीतर की ये जो शाश्वत शक्ति है अनंत आत्मन है वो उससे भी बड़ी है। यह किस तरह से है पता है? एक शशि महाराज ने एक बार ठाकुर को मैथमेटिक्स की लैंग्वेज में एक्सप्रेस करने का प्रयास किया था। क्या कहा? ठाकुर कौन है? तो ये जो जितने भी गुरु भाई हैं ये जितने भी गुरु भाई स्वामी जी का कंप्लीट वक्स है स्वामी जी की जो उपलब्धि है, सभी गुरु भाइयों की जो आध्यात्मिक उपलब्धि है, वह सब आप ऐड करते जाइए, मल्टीप्लाई करते जाइए तो आपको ठाकुर की आध्यात्मिक उपलब्धि मिलेगी। किंतु हम सबको पता है कि गुरु भाइयों की इंक्लूडिंग स्वामी जी जितनी भी आध्यात्मिक उपलब्धि रामकृष्ण संघ के आज के जितने भी साधक हो हमारा जो भी साधक जीवन हो सबको मल्टीप्लाई करके आप एक बॉक्स में रखिए ये और सामने आप ठाकुर को रखिए वो जो यह होती है ना वो वेइंग वो स्केल होता है तुला जिसको कहते हैं त्राजू गुजराती में क्या तो यह जो स्केल जो होता है स्केल के एक साइड में आप रखिए आप इतना सब कुछ जितना भी रामकृष्ण संघ की आज तक की जो आध्यात्मिक उपलब्धि है सामने में किंतु रखिए ठाकुर को वैसे तो शशि महाराज कहते हैं कि यह दोनों इक्वल होने चाहिए किंतु हम सबको पता है ठाकुर के साइड वाला जो स्केल है वह सीधा नीचे आ जाएगा और यह वाला जो स्केल है वह सीधा ऊपर चला जाएगा। हम लोग जहां पे बैठे हैं वो एक कहानी है ना कि भगवान कृष्ण को वेट कर रही है यह रुक्मणी वगैरह रानियां तो एक एक साइड में स्केल के एक साइड में भगवान कृष्ण को बिठाया है फिर एक साइड में है कि वो जितने भी हीरा माणिक जहावर जवाहरात जो भी है ज्वेलरी वगैरह सब कुछ सामने रखा है किंतु फिर भी भगवान कृष्ण का जो यह है साइड वो जो स्केल वो ऊपर ही नहीं आ रहा है तो फिर किसी ने एक तुलसी का पत्ता रख दिया जैसे ही तुलसी का पत्ता रखा सीधा वह स्केल नीचे आ गया भगवान कृष्ण का ऊपर चला गया यानी कि क्या है कि वह भाव भक्ति के माध्यम से हमको भगवान मिलते हैं नहीं कि वो सोना माण खिरा जवाहरात से तो यहां पे भी यहां पे स्वामी जी क्या कहना चाहते हैं एक ओर आप आत्मन के जितने भी मैनिफेस्टेशन थे मनुष्य समग्र मनुष्य जाति पूरा विश्व ब्रह्मांड उसको एक साइड में रख दीजिए और दूसरी साइड में यह स्केल से आप मेजर कीजिए वेट कीजिए दूसरी साइड में आप आत्मन को रखिए तो आत्मन का जो वेट है वह पूरे विश्व ब्रह्मांड से कहीं ज्यादा होगा। ऑल इज द सेल्फ सेल्फ और ब्राह्मण जो कुछ भी है वह सब आत्मन है या ब्राह्मण है। द सैंड द सीनर द लेम द टाइगर इवन द मर्डरर एस फार एस दे हैव एनी रियलिटी कैन बी नथिंग एल्स बिकॉज़ देयर इज नथिंग एल्स। जो कुछ भी है सब आत्मन या ब्राह्मण है। संत हो ना कि पापी हो एक यह लैंब अर्थात कि भेड़ बकरी हो ना कि फिर यह भेड़ बकरी को खाने वाला शेर हो। इवन यह हत्यारा हो जो कुछ भी आप देख रहे हैं जहां तक उनका अस्तित्व जाता है वहां तक इस विश्व ब्रह्मांड में आत्मन या ब्राह्मण के अलावा और कुछ नहीं है। दैट वि एकिस्ट इज वन सेज इज कॉल इट वेरियसली। जो कुछ भी एग्जिस्ट करता है, जो कुछ भी रहता है, वह एक ही है। यह जो साधु है, संत है, ऋषि मुनि है, वह लोग विभिन्न नाम से उसको पुकारते हैं। एकम सत विपरा बहुधा वदंती। तो आत्मन एक है। जो साधु है, संत है, ऋषि है, वह उनको विभिन्न नाम से पुकारते हैं। नथिंग कैन बी हायर देन दिस नॉलेज एंड इन दोस प्यूरिफाइड बाय योगा, इट कम्स इनफ्लेशेस टू द सोल। यह जो नॉलेज है कि मेरे भीतर में वही आत्मन है। इसके अलावा और कोई और कोई ज्ञान इससे ऊपर नहीं हो सकता है। और जिन्होंने योग के माध्यम से अपने चरित्र को प्यूरिफाई किया है। अपने कैरेक्टर को प्यूरिफाई किया है। उनको यह फ्लेश माने एक इंसाइट या तो फिर विज़डम के रूप में प्राप्त होता है। द मोर वन हैज़ बीन प्यूरिफाइड एंड प्रिपयर्ड बाय योगा एंड मेडिटेशन। द क्लियरर आर दिस फ्लशेस ऑफ रियलाइजेशन। जितना आपने योग और वेदांत और ध्यान इसके माध्यम से अपने चरित्र का प्यूरिफिकेशन किया हो, अपने संस्कार को सुसंस्कृत किया हो, उतना ही यह जो फ्लेशेस ऑफ रियलाइजेशन कितना सुंदर शब्द है। यह जो फ्लेशेस ऑफ रियलाइजेशन का कैसे करेंगे ट्रांसलेशन? एक फटाक करके वो ठाकुर कहते हैं एक बार बड़ा सुंदर ठाकुर का उदाहरण है। ठाकुर कह रहे हैं कि मैं ध्यान करने को बैठा था। किंतु फिर मैंने सोचा कि मुझे अच्छा नहीं लग रहा है। क्यों? क्योंकि यह भी तो एक कल्पना के अलावा और कुछ नहीं है। उन्हें यदि दब करे देखिए दिन ताले होए। जब आप ध्यान करते हैं तो आप जैसे मां काली के चरण कमल है या मां काली है या हमारे लिए जैसे ठाकुर दक्षिणेश्वर में बैठे हुए हैं तो यह क्या होगा कि एक तो कल्पना करने जैसा ही हुआ कल्पना करने के लिए तो आपको अपनी एनर्जी है अपनी माइंड जो ये है माइंड को आपको लगाना पड़ेगा किंतु यदि फटाक करके आपको कोई दिखा दे ईश्वर यदि आपको फटाक करके दिखा दे तब तो वो तो कहीं पर हमको सेटिस्फेक्शन होगा। आप कल्पना करके मेहनत करके एक कंस्ट्रक्ट खड़ा कीजिए कि मैं दक्षिणेश्वर में बैठा हुआ हूं। ठाकुर यहां पर बैठे हुए हैं। किंतु ये कंस्ट्रक्ट को मेंटेन करने के लिए आपकी मेंटल एनर्जी जाती है। जबकि यह जो फटाक करके आपको दिखा दे दृश्य विज़न दिखा दे। जैसे ठाकुर को कितने विज़न हुए हैं। वहां पे पंचवटी में बैठे थे। तो देखा कि सामने से मां सीता आ रही है और पेड़ के ऊपर में से हनुमान जी ने जंप लगाया और मां सीता के सामने प्रणत हो गए। तो फटाक करके ठाकुर को दर्शन हो गया। विज़न दिख गया। ऐसे तो विज़न की परंपरा ठाकुर के जीवन में कितनी चली आ रही है। तो ठाकुर कहते हैं दब करे यदि देखिए देन दब करे यानी कि फटाक करके इन अ फ्लैश यदि भगवान दिखा दे कोई दर्शन दिखा दे तो तो कोई बात बनेगी। मैं यहां पर बैठकर के कल्पना कर रहा हूं। भगवान के श्री चरण की कल्पना कर रहा हूं। भगवान के श्री वदन की कल्पना कर रहा हूं। भगवान की वाणी की कल्पना कर रहा हूं। उसमें क्या उसमें तो कोई रस नहीं मिलता है। फटाक करके यदि ईश्वर दिखा दे तो वो बात बनेगी। यह जो ठाकुर का शब्द प्रयोग है दप करे देखिए दे। यह जो दब करे देखिए देवा उन्हें फटाक करके इन अ फ्लश भगवान हमको कुछ दर्शन दे देते हैं। उसी बात को यहां पर स्वामी जी कहते हैं कि वह फटाक करके कैसे दिखाई देंगे? वो इट्स अ फ्लेशेस ऑफ रियलाइजेशन। यह फ्लेशेस ऑफ रियलाइजेशन कब आएगा? जबकि हमारा मन यह योग वेदांत ध्यान साधना तपस्या ब्रह्मचर्य इसके माध्यम से यदि हमारा मन सुसंस्कृत हुआ है तब कहीं जाकर के हमको यह फ्लेशेस ऑफ रियलाइजेशन होगा दब करके ईश्वर हमको कुछ दिखा देंगे। तो आज यहीं तक यह स्वामी जी का यह पूरा पैसेज आज यहां पर समाप्त होता है। कल से अभी हम यह जो शरद महाराज है इसके बाद का जो पॉइंट हमारे सामने रखते हैं। इसके बाद में एक्चुअली क्या होता है? शरद महाराज एक के बाद एक क्वेश्चन आंसर से हम जब यह कहना शुरू हुआ कि सब कुछ एक है तो हमको फिर विभिन्नता दिखाई क्यों देती है? यदि एकम सत है तो बहुधा हमको क्यों दिखाई देता है? विभिन्नता यह जो वैविध्य हमको क्यों दिखाई देता है? इस माने जो सेंट्रल क्वेश्चन है वेदांत का इसके बारे में चर्चा कल से प्रारंभ होगी। अज्ञान क्या है? भ्रम क्या है? माया क्या है? यानी कि हार्ड कोर वेदांत वह कल से स्टार्ट होगा। हम पूरा प्रयास करेंगे कि इसको जितना डीपली इसमें जा सके उतना जाए। एट द सेम टाइम प्रॉपर वेदांत सीखना यानी कि स्टेप बाय स्टेप शंकराचार्य की व्याख्या लेकर के वो यह स्थान नहीं है। लीला प्रसंग में ठाकुर की लीला है। उसी के ऊपर में ही हम ध्यान ज्यादा रखेंगे। जहां तक वेदांत की आवश्यकता होती है, उतना ही हम उसके भीतर में जाएंगे। इसके बाद में जैसे कि यह साधक भाव यदि समाप्त हो जाता है तो इसके बाद का स्टेप जैसे मैंने सोच के रखा है कि वेदांत सार नामक जो टेक्स्ट बुक है वो हम प्रारंभ करेंगे प्रॉपर वेदांत में जाने के लिए और उसके बाद में यदि ठाकुर की इच्छा होगी यह क्लास कंटिन्यू होगा तो एक के बाद एक उपनिषद हम लेंगे तो आज यहीं तक अभी कल तो नहीं अभी मंडे को फिर से मिलते हैं ओम ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: परंपरागत रूप से, वेदांत की यात्रा आत्म-साक्षात्कार, ब्रह्म-साक्षात्कार के साथ समाप्त होती है। क्या यह सच है कि स्वामी विवेकानंद पहले व्यक्ति थे जिन्होंने कहा था कि आत्मसाक्षात्कार के बाद सेवा या धर्म प्रचार आता है?

ना एक्चुअली फैक्ट इज एग्जैक्टली ऑोजिट यह जो फिनोमिना है इट्स अ वेरी वेल नोन माने सिर्फ भारत में ही नहीं भगवान बुद्ध का तो वर्ल्ड फेमस उदाहरण है कि निर्वाण प्राप्ति के बाद में वो ढहल रहे थे चक्रण उसको कहते हैं संक्रमण तो टहलते टहलते वह सोच रहे हैं कि अभी क्या किया जाए? निर्वाण प्राप्ति के बाद में देह त्याग कर दिया जाए। जैसे ठाकुर की वह कहानी है कि वो मकरध्वज तैयार करना है कांच की बोतल में। तो एक बार वैद्य ने मकरध्वज तैयार किया उसके भीतर में फिर कांच की बोतल रहे कि टूट जाए। वो किसी एक भक्त ने आकर समाचार दिया कि वह लड़के ने आत्महत्या कर दी। तो कुछ लोग बड़े यह हो गए। मायूस हो गए। तब ठाकुर ने कहा कि मकरध्वज तैयार हो गया है। अभी बोतल रही कि गई क्या फर्क पड़ता है? तो इसी तरह का डायलेमा भगवान बुद्ध के हृदय में था। फिर उन्होंने सोचा कि नहीं कि देयर आर मेनी साधक एस्पांट्स हु स्टैंड ऑन द प्रिसिपाई ऑफ निर्वाण। किंतु ये जो फाइनल लिप जो है लिप ऑफ फेथ वो कैसे लेना नहीं समझ में आता। तो मैं उनको सिखाऊंगा। सो दैट ही रिटर्न फ्रॉम निर्वाण इन ऑर्डर टू प्रीच टू द वर्ल्ड। यह बड़ा ही वेल नोन फिनोमिना है। और देखिए कि इसका सबसे जो स्टैंडर्ड एक्सप्रेशन है आउटसाइड ऑफ इंडिया वे जो हिस्टोरियन आर्नोल्ड टोयन बी अभी ये आर्नोल्ड टोयनबी जो हिस्टोरियन है जनरली आपको हिस्ट्री हिस्टोरियंस जो दिखते हैं वो किस तरह के दिखते हैं या तो कोई एक पीरियड को लेकर के रिसर्च करेंगे। जैसे मिडिवल यूरोप है या मिडिवल इंडिया है या वैदिक इंडिया है। इस तरह का वे लोग कुछ स्टडी करेंगे या तो कोई देश को लेके स्टडी करेंगे। हिस्ट्री ऑफ़ ब्रिटेन हिस्ट्री ऑफ़ अफ्रीका वगैरह-वगैरह ये आर्नोल्ड टोयनबी का जो कांसेप्ट था कि वी व्हाट इज द मो उसका जो इंसाइट है, इंसाइट क्या है? व्हाट इज द बेसिक यूनिट ऑफ़ अह ह्यूमैनिटी। तो वो है सिविलाइजेशन। नॉट ए नेशन, नॉट एन इंडिविजुअल, नॉट ए फैमिली बट सिविलाइजेशन इज द मोस्ट फंडामेंटल यूनिट ऑफ ह्यूमैनिटी। और आपको सिविलाइजेशन का स्टडी करना है। हाउ द सिविलाइजेशन राइज़ एंड फॉल इसके माध्यम से आप ह्यूमैनिटी को बेस्ट समझ पाएंगे। ये उसका सेंट्रल इंसाइट है। जैसे आइंस्टाइन का इनसाइट था कि व्हाट हैपेंस? कि मैं प्रकाश की किरण के साथ में उसी स्पीड से गति करता हूं। दैट वाज़ हिज फ्लैश ऑफ इंसाइट। ये लिफ्ट है। लिफ्ट में मैं यदि ये नीचे आता हूं तो मुझे वेटलेसनेस अनुभव होगा। व्हिच इज़ नथिंग बट ग्रेविटी हमने लॉस ऑफ ग्रेविटी। सो ग्रेविटी इज नथिंग बट एक्सीलरेशन वि आर की इनसाइट उसके मैथमेटिक्स के पीछे जो कि एक आम आदमी भी समझ सकता है। तो वैसे ही यह आर्नोल्ड टोयनबी का की इंसाइट था कि सिविलाइजेशन इज द फंडामेंटल यूनिट ऑफ ह्यूमन ह्यूमैनिटी ह्यूमन स्पीशीज और सिविलाइजेशन राइज़ एंड फॉल ऑफ सिविलाइजेशन इज़ द मोस्टेंट स्टडी दैट वी कैन डू इन ह्यूमैनिटीज़। और यह स्टडी करते-करते उसने पूरा एनालिसिस किया है 12 वॉल्यूम ना कि इतने वॉल्यूम का उसका है स्टडी ऑफ हिस्ट्री वन ऑफ मोस्ट सेमिनल वर्क इन ह्यूमैनिटीज फिर ये जो उसने दो वॉल्यूम में उसको ये किया है माने एवरेज किया है जो कि मैंने पढ़ा है दो वॉल्यूम वाला नहीं कि फुल 12 वॉल्यूम वाला तो इसमें देखिए कि वो स्टेप बाय स्टेप हमको समझाता है कि किस तरह से उसने ये 22 या 24 सिविलाइजेशन को डिसाइड किया कि इतनी सिविलाइजेशन अभी तक हमको पता करता है और यह प्रत्येक सिविलाइजेशन का राइज कैसे होता है? फॉल कैसे होता है? यह सस्टेन कैसे होती है? और वह कहता है कि चैलेंज जो है चैलेंज को फेस करके सिविलाइजेशन राइज होता है। यह तो नेचुरल थिंकिंग है। किंतु एक लेवल के बाद में भी उसका जो ये होना चाहिए ना कि ब्लूम होना चाहिए। वो प्रस्फुटित होनी चाहिए। यानी कि जनरल लेवल और ग्रेटनेस के लेवल। तो ग्रेटनेस के लेवल पर कब जाएगी? जब सिविलाइजेशन में एक हायर रिलीजन डेवलप होगा। जैसे कि वेस्टर्न सिविलाइजेशन में क्रिश्चियनिटी डेवलप हुई। ये ईस्टर्न सिविलाइजेशन में हिंदूइज़्म, इस्लाम, बुद्धिज्म डेवलप हुआ। तो जब ये सिविलाइजेशन के साथ में रिलीजन मिक्स होता है तब वो सिविलाइजेशन नॉर्मल लेवल सिविलाइजेशन से ग्रेट लेवल सिविलाइजेशन पे जाती है। तो यहां तक तो फिर भी हमको समझ में आता है। फिर उसका जो बड़ा ही डीप इनसाइट क्या है? वो कहता है कि रिलीजन स्टार्ट कैसे होता है? तो रिलीजन स्टार्ट होने के पीछे नो डाउट कोई एक महापुरुष का हाथ होता है। किंतु यह महापुरुष रिलीजन स्टार्ट कब करता है? उसके जीवन में दो फज़ होते हैं। एक तो है रिट्रीट यानी कि वह जगत से दूर चला जाएगा। क्योंकि यह रिट्रीट इज द मोस्ट फंडामेंटल पार्ट ऑफ रिलीजन। यदि आप जगत से रिट्रीट नहीं करेंगे, अभी वह रिट्रीट जिसको कहता है, हम इसको कहेंगे कि इंद्रियों का रिट्रीट यानी कि यह जो कामना वासना से अपने मन को सिकुड़ लेना। यह जो आवृत चक्षु है या तो फिर यह जो प्रत्याहार है योग का प्रति आहार इंद्रियों के जो आहार है उसको रिवर्स कर दो प्रति आहार इसको खिला दो। सो दिस इज वी कॉल्ड रिट्रीट वैराग्य इज द मोस्ट फंडामेंटल क्वालिटी ऑफ एनी एस्पांट। तो यह कहता है कि फर्स्ट ऑफ ऑल यह जो महापुरुष जो धर्म को प्रारंभ करेंगे ही विल गो इनू रिट्रीट। अब जैसे कि जीसस डेजर्ट में गए रिट्रीट में उनको टेंप्टेशन मिलेगा या जीसस को ये शैतान ने आकर के टेंपट किया कि मैं तुमको पूरे जगत का राजा बना दूंगा ये वो तपस्या छोड़ दो वगैरह-वगैरह यदि यह महापुरुष वो टेंप्टेशन के सामने जीत जाते हैं देन ही विल अटेन सम डिवाइन एक्सपीरियंस एंड देन ही विल रिटर्न एंड व्हेन ही रिटर्न्स ही विल स्टार्ट दिस हायर रिलीजन तो यह कहता है कि जितने भी महा अब जो धर्मों का प्रारंभ हुआ है सबके जीवन में आपको यही पैटर्न दिखाई देगी। रिट्रीट टेंप्टेशन विक्ट्री ओवर टेंप्टेशन एंड देन रिटर्न एंड व्हेन दे रिटर्न दे स्टार्ट ए हायर रिलीजन। भगवान बुद्ध का एकदम स्पष्ट है कि वो राजकुमार थे छोड़कर के वन में गए। जब ध्यान वो साधना करने का प्रारंभ किया। जिस रात को निर्वाण प्राप्त होने वाला था। वह मारा आकर के दुनिया भर के प्रलोभन दिखाता है। भय दिखाता है। भगवान बुद्ध डरे नहीं। निर्वाण प्राप्त हुआ। फिर वहां से वह रिटर्न आए और बुद्धिज्म का प्रारंभ हुआ। अपने हिंदू धर्म में इसकी बहुत सारी कहानियां ठाकुर के ही जीवन में देखिए कि ही रिट्रीटेड फर्स्ट ऑफ ऑल दक्षिणेश्वर में रहकर के प्रचंड साधना की। कितने टेंप्टेशन आए वो भैरवी ब्राह्मणी जिस तरह की साधना ठाकुर के पास में करवाती थी। वीरासन में सिद्धि प्राप्त की। वीर भाव में सिद्धि प्राप्त की। वो सब टेंप्टेशन को जय करके ठाकुर रियलाइज दी अल्टीमेट एंड देन ही रिटर्न शोडशी पूजा करके ठाकुर वापस आए और केशवसेन को तो सबसे पहले पकड़ा और केशवसेन के माध्यम से कोलकाता के सबको पकड़ा तो यानी कि देखिए कि उसको तो अभी ये आर्नोल्ड टोयनबी को ठाकुर का लाइफ इतना कुछ पता होगा मुझे पता नहीं उसने हालांकि ठाकुर के बारे में लिखा है ही माइट हैव बीन समवट फेमिलियर किंतु ये पैटर्न जो है वो कहता है इट इज यूनिवर्सली रेप्लिकेटेड सिविलाइजेशन का स्टडी स्टडी, रिलीजन का स्टडी, महापुरुष का स्टडी यह पैटर्न बार-बार रिपीट होता आ रहा है। और इसी पैटर्न पे सिविलाइजेशन राइज एंड फॉल होती है। फॉल कब होती है? जबकि यह रिलीजन में करप्शन प्रवेश करता है। सो उसका जो इंसाइट है व्हिच इज वेरी वेल नोन। और यह उसने यह सेकंड वर्ल्ड वॉर के टाइम में यह सब लिखना शुरू किया था। सो दीज़ आर वेल नोन आइडियाज कि रिट रिट्रीट एंड रिटर्न। आप थोड़ा सा एआई सर्च कर लीजिए। उसका पूरा थीसिस आपको मिल जाएगा। आजकल तो यह सब चीजें उस समय तो इतना मैं सेंट्रल लाइब्रेरी है वड़ोदरा का शायद आपने देखा होगा वहां पर जाकर वो बड़े-बड़े बुक शेलफ वो धूल खाए हुए वहां से वो सब किताबें निकालता था वो जब लाइब्रेरियन के पास में लेके आता है वो भी सोचता है ये किताब कहां से निकाली अरे हमारी जो लाइब्रेरी है ना हमने किताबें लेना बंद कर दिया है बहुत सारे लोग आते हैं हमको किताब डोनेट करनी है बड़े महाराज बोलते ले लो ले लेना मत बिल्कुल जगह ही नहीं है रखने की ना ही कोई उसको लेता है किताबें [हंसी] ट्रांजैक्शन ही नहीं है लाइब्रेरी में। ये जो

प्रश्न: मृत/जीवित बिल्ली के बारे में

फेमस विश्वम दर्पण दृश्यमान नगरी तुल्यम विश्व क्या है? अपने मन में उठती हुई कल्पना तरंगों के अलावा और कुछ नहीं है। हार्ड कोर वेदांत को यदि आप देखेंगे तो साइंस खास करके क्वांटम डायनेमिक्स इस लेवल तक आ गया है। वह कहता है कि ये वेव फंक्शन कोलेप्स है। खास करके इट इज नथिंग बट प्योर वेदांत। और हम लोग बहुत कम आज जो आध्यात्मिक लोग हैं ये इस बात को सब पता है कि इवन साइंस इटसेल्फ एक्सेप्ट्स दिस बेसिक प्रीमाइस ऑफ वेदांत। अब ये जो साइंटिफिक जोक्स होता है ना वो सिर्फ साइंस का एक जोक है तो इसी के बारे में बिल्ली के बारे में ही तो दो साइंटिस्ट बात कर रहा है कि इस तरह से वो हाई डिस्कशन सब चल रहा है या वो बिल्ली की उसके भीतर में है तो फिर वो डेड है कि अलाइव है उसमें वो जो कौन सा इक्वेशन किस तरह से वेव फंक्शन कोलैप्स होता है लुई डी ब्रोगली की थ्यरी ये थ्यरी वो थ्यरी वो दोनों डिस्कस कर रहे हैं वहां पे वो एक और एक एक लड़की खड़ी है बार टेंडर वो वो तो वेट्रेस अभी उसकी बुद्धि कैसी होगी? अब यह दो साइंटिस्ट ये वो तो वेट्रेस तो वेट्रेस कहती है अरे यह सब थ्यरी की आपको क्या जरूरत है? वो आपको बिल्ली मर जाएगी तो ऐसी बदबू आएगी फटाक करके पता चल जाएगा जिंदा है कि मुर्दा [हंसी] बिल्ली मरेगी तो बदबू तो आएगी ना। वे फंक्शन कोलैप्स की कोई जरूरत नहीं है। बदबू से ही पता चल जाएगा। देखिए ठाकुर का ऐसा सिमिलर जोक सुनना है तो वह फेमस जोक है ठाकुर का कि एक पंडित नौका में जा रहा था। वो पंडित वो नौका वाले को पूछता है कि तुमने सांख्य पढ़ा है? तुमने वेदांत पढ़ा है? वो यह पढ़ा है पंचदशी? वो नौका वाला बोलता है ना ही सांख्य पढ़ा ना ही पंचदशी पढ़ा। कुछ नहीं। पतंजल योग कुछ नहीं पढ़ा। फिर वो तूफान आता है। नौका डूब रही है। वो नौका वाला पंडित जी को पूछता है। पंडित जी तैरना आता है। तो पंडित जी बोल तैरना नहीं आता। बोला मुझे तैरना आता है। [हंसी] इसको वर्ल्डली विज़डम। फोक विज़डम जिसको कहते हैं ना [हंसी]

प्रश्न: ठाकुर बहुत व्यावहारिक थे। स्वामीजी कहते थे कि हमें खेत में काम करने के लिए तैयार रहना चाहिए और अगले ही पल वेदांत का प्रचार करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए।

अपने ऑर्डर में उसको कहते हैं कि जूता सिलाई से चंडी पाठ पूरा स्पेक्ट्रम आपको आना चाहिए। इसीलिए स्वामी जी कहते हैं ना कि हाईएस्ट ब्रह्मज्ञान को जब तक आप प्रैक्टिकल एप्लीकेशन नहीं करेंगे तब तक आपका सिविलाइजेशन डेवलप नहीं होगा। जिसने ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया है। देखिए स्वामी जी का कितना इनसाइटफुल स्टेटमेंट है कि ऐसा एक भी युग नहीं गया। ऐसा एक भी समय नहीं गया कि भारत की धरातल पर एक ब्रह्मज्ञानी विचरण ना करता हो। ऐसा एक भी समय नहीं गया। किंतु एट द सेम टाइम 1000 साल की गुलामी हमको क्यों भुगतनी पड़ी है? तो अभी जैसे ये जो रिट्रीट एंड रिटर्न ये जो कांसेप्ट है ना वो 1000 साल में ब्रेक हो गया। जिन्होंने रिट्रीट किया ब्रह्म टेंप्टेशन क्रॉस करके ब्रह्म ज्ञान प्राप्त किया। दे चूज़ नॉट टू रिटर्न। ठाकुर के वह जो फेमस एग्जांपल कि वह एक दीवाल है। दीवाल के सामने वह वहां पर बहुत बड़ा मेला चल रहा है। चार पांच मित्र है। वह जो भी दीवार पर उठता है वो हां करके हंसते-हंसते उस सामने चला जाता है। एक ही है कि जो कि वापस आकर सबको बताता है कि चलो दीवाल क्रॉस करो तो आनंद मिलेगा। सो दैट मॉडल वाज़ ब्रोकन इन इंडिया फॉर 1000 ईयर। रामानुज की कहानी सिंपल। वो गुरु ने मंत्र दिया। बोलता है कि किसी को बताना मत वरना तुमको ब्रह्मज्ञान नहीं होगा। तो सबको चिल्ला चिल्ला के बता रहा है।

प्रश्न: वेदांत सार पुस्तक के बारे में

एक्चुअली देखिए कि वेदांत सार जो है ना हमको ट्रेनिंग सेंटर में सबसे पहला टेक्स्ट सिखाया गया था क्योंकि यह साइंटिफिक वे में एक लॉजिकल एक्सप्लेनेशन में पूरा वेदांत आपको बता देता है और सर्वप्रियनंद जी का वेदांत सार पे पूरा लेक्चर सीरीज है जो कि आप रेफर कर सकते हैं। सो वि इज एकदम स्टैंडर्डाइज फैशन में सिस्टमेटिकली यदि आपको वेदांत समझना है दैट इज वेदांत सर सब कुछ माने इंटर इंटरेक्शन इंटर रिलेशनशिप ओवरऑल एक जो अद्वैत वेदांत का सार है आपको यहां पे मिल जाएगा व्हिच इज अ परफेक्ट एंट्री पॉइंट फॉर अद्वैत वेदांत यू कैन ऑलवेज कम बैक टू दिस फ्रेम फ्रेमवर्क अब जैसा कि मांडुक्या में जाएंगे तो मुंडक में जाएंगे तो फिर यह जो वो जो है ना सबस्टेट्स ऑफ ऑफ माइंड कि स्वप्न जागत सुशुप्ति तुरीय वगैरह वगैरह और प्रत्येक उपनिषद का अपना-अपना एक डेवलपमेंट है। तो बट वंस वी गेट दिस फ्रेमवर्क इसमें सभी कांसेप्ट एक साथ में इंटीग्रेटेड वे में जानने को मिल जाएंगे। देन यू गो डिपर बाय उपनिषद एंड शंकराचार्यस डेफिनेशंस।

प्रश्न: रामकृष्ण - विवेकानंद साहित्य के बारे में

और यह जैसे महाभारत के बारे में कहते हैं ना कि इस जगत में ऐसा कुछ भी नहीं है जो कि महाभारत में उसका रिफ्लेक्शन ना हो और महाभारत में जो नहीं है वह जगत में नहीं है। आई कैन विद कॉन्फिडेंस सेम थिंग अबाउट रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर कि इस जगत में ऐसा कुछ नहीं है कि जिसका रिफ्लेक्शन आपको रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर में ना मिले और जो रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर में नहीं है वह जगत में ही नहीं है। क्योंकि इस युग के लिए यह तीन आए हैं और तीनों का हमको पता है स्टैंडर्ड वह डिवीज़न ऑफ़ लेबर एक अह ठाकुर का पर्सनल स्पिरिचुअलिटी स्वामी जी का सिविलाइजेशनल अंडरस्टैंडिंग मां का जो ह्यूमैनिटी के लेवल का जो है इंटरपर्सनल रिलेशनशिप तो पूरा सिविलाइजेशन इज़ रिप्रेजेंटेड। आप आर्नोल्ड टोयनबी को पढ़िए और फिर ठाकुर मां स्वामी जी को पढ़िए। इट्स अ परफेक्ट प्रोग्रेशन कि आप कुछ भी छूटेगा नहीं आपका।