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Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 10 Feb 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा लिखित भाग दो साधक भाव उसका प्रथम चैप्टर साधक और साधना इसका जो आखिरी पॉइंट है कि इति

भक्ति मार्ग द्वारा निर्विकल्प समाधि

इति मार्ग से भक्ति मार्ग से किस तरह से निर्विकल्प समाधि प्राप्त होती है। तो कल हमने ऑलरेडी देख लिया कि किस तरह से शरद महाराज हमको समझाते हैं कि नेति नेति मार्ग से जगत का त्याग करके जगत के जो इंद्रियों के जो विषय वस्तु है उसका तो त्याग साथ में ही यथासंभव जगत का भी त्याग करके जब साधक अपना मन प्राण जीवन संपूर्ण रूप से साधना को समर्पित कर देता तो उस रास्ते से किस तरह से ब्रह्म ज्ञान प्राप्ति निर्विकल्प समाधि आत्म साक्षात्कार होता है तो वह तो एक जाना पहचाना मार्ग है अपने शास्त्र उपनिषद वगैरह में इसके बारे में काफी कुछ चर्चा की गई है। किंतु एक दूसरा भी मार्ग है निर्विकल्प समाधि या ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करने का वह है भक्ति मार्ग। तो यहां पर जो एक अपेरेंट फिलॉसोफिकल कंट्राडिक्शन जो है क्योंकि भक्ति मार्ग ज्यादातर तो कहें तो द्वैत वेदांत या तो विशिष्ट अद्वैत वेदांत के साथ में जुड़ा हुआ है। और यह दोनों फिलॉसोफी यह दोनों दर्शन शास्त्र निर्विकल्प समाधि या तो आत्मज्ञान या तो ब्रह्म ज्ञान इसको इस तरह से स्वीकार नहीं करते जितना कि वह ईश्वर सानिध्य उसको स्वीकार करते हैं कि सगुण ब्रह्म है। सगुण ब्रह्म के समीप जाकर के वैुंठ वास करना यही भक्ति मार्ग का जैसे कि सर्वोच्च धेय है। तो अद्वैत वेदांत में निर्गुण ब्रह्म है। विशिष्ट अद्वैत या तो द्वैत वेदांत में सगुण ब्रह्म है। तो निर्विकल्प समाधि का कांसेप्ट निर्गुण ब्रह्म के साथ में ही जुड़ा हुआ है। तो हाउ इज इट पॉसिबल? कि सगुण ब्रह्म की उपासना करते-करते आप निर्गुण ब्रह्म को प्राप्त करें। वह एक फिलोसोफिकल कंट्राडिक्शन जो कि हमने कल डिस्कस किया था और अल्टीमेटली हमने यह भी देखा था कि यह कंट्राडिक्शन हमको तभी दिखते हैं जब कि हमारी समझ जो है वह अपरिपक्व होती है। या तो फिर साधना की निम्न भूमि पर हम विचरण कर रहे हैं। जैसे ही साधना करते-करते एक के बाद एक माइलस्टोन क्रॉस करतेकरते इंद्रियों का संयम जितना होता जाएगा जितना अपना वैराग्य दृढ़ीभूत होता जाएगा जितना ही जगत के प्रति हमारे मन में विराग उत्पन्न होता जाएगा जितना ही यह चित्त प्रसाद है मैत्री करुणा मुदिता उपेक्षा अपने हृदय में पद्म फूल की तरह प्रस्फुटित होते जाएंगे जैसे ही यह पंच पंच कक्लेश या तो ड रिपु या तो अष्टपाश इन सब से हमारा मन मुक्त होता जाएगा। वैसे-वैसे देखेंगे कि यह जो अपेरेंट फिलॉसोफिकल कंट्राडिक्शंस हमको दिखते हैं, वह सब रिजॉल्व हो जाते हैं और अल्टीमेटली सत्य तो एक ही है। बस विभिन्न दर्शनकारों ने अपनी-अपनी भाषा में विभिन्न रूप से उसको लिपिबद्ध किया है और विभिन्न तरह की प्रकृतियों के साधकों के लिए विभिन्न तरह के साधन मार्ग डेवलप किए हैं। जिनका विल पावर बड़ा स्ट्रांग है उनके लिए ज्ञान मार्ग जिनके भीतर में सह हृदयता शरणागति है उनके लिए भक्ति मार्ग जिनका कि मन एकाग्र है उनके लिए योग मार्ग और जो कि कर्मी है राजसिक है उनके लिए कर्म योग का मार्ग तो यह विभिन्न साइकोलॉजिकल प्रोफाइल के लिए विभिन्न साधनाएं डेवलप की गई है। जैसे कि हम लोग यह कभी नहीं सोचते कि बुखार हुआ तो जैसे ही डॉक्टर कहेगा अच्छा ठीक है यह ब्लड टेस्ट करवाओ पता चलेगा कि इसको डेंगू है ना कि चिकनगुनिया है ना कि मलेरिया है ना कि और कुछ है कौन से टाइप का बुखार है तो अभी टेस्ट में पता चला कि यह डेंगू है तो उसको इस तरह का दवाई देंगे यदि पता चला चिकनगुनिया है तो उसको इस तरह का दवाई देंगे पता चला मलेरिया है ना ना कि टाइफाइड है ना कि और कुछ है तो उसका उस तरह से निदान करेंगे। यह कोई हमने धर्म के पथ थोड़ी ना बना के रखे हैं कि यह डॉक्टर है सिर्फ चिकनगुनिया का ही दवाई देता है। कहता है कि यही एक रोग है और यही सर्वश्रेष्ठ दवा है। बाकी कोई रोग है ही नहीं और बाकी कोई दवाई भी किसी काम की नहीं। इस तरह का स्ट्रेटिफिकेशन थोड़ी ना होता है। तो यहां पर भी अपने मन की भी वही अवस्थाएं हैं। इतने लंबे समय तक हम लोग एक स्ट्रेटिफिकेशन के भीतर में जीते आ रहे हैं। किंतु श्री रामकृष्ण के अवतरण के बाद में हमारे पास में एक लार्जर पिक्चर ऑफ स्पिरिचुअलिटी प्रकट होता है। हम लोग समझते हैं कि विभिन्न तरह के साइकोलॉजिकल प्रोफाइल के अनुसार विभिन्न रूप से जब डायग्नोस होता है यह भवर रोग उसके लिए विभिन्न ट्रीटमेंट के रूप में यह विभिन्न रोगों का योगों का यह आविष्कार हुआ है। और फिर ऐसा नहीं कि एक बार मैंने कर्म योग पकड़ लिया तो फिर मुझे जीवन भर कर्म योग ही चलाना है। मेरी खुद की मानसिक प्रवृत्ति के अनुसार अवस्था के अनुसार फिजिकल, मेंटल, फिटनेस के अनुसार विदिन वन डे में चारों योग में एक योग में से दूसरे योग में प्रैक्टिस चेंज कर सकता हूं। और यह योग सिर्फ चार नहीं है। यह चार जो मुख्य आप कहेंगे अंब्रेला विद इन दैट अंब्रेला देयर आर हज वैरायटी इतना वैविध्य है योगों का। तो देखिए यह सब हमने डिस्कस किया और साथ में ही शरद महाराज का जो आखिरी सेंटेंस था वह भी हमने देखा था।

सच्ची आध्यात्मिकता चमत्कार नहीं, विशाल हृदय है

भक्त जगत और उसके भीतर में सर्व वस्तु और व्यक्ति को ईश्वर के साथ में संबंध युक्त देख करके आप आप अपना कर लेता है। आपनार कोरियालोन अपना कर लेता है। अपना लेता है। देखिए यह एक बहुत ही इंपॉर्टेंट स्टेटमेंट है। एक समय था मैं स्टूडेंट था तब मैं हमारे सिटी में एक लाइब्रेरी था तो लाइब्रेरी में जाकर के ये सब स्पिरिचुअल किताबें हैं, बायोग्राफीस है वगैरह पढ़ा करता था। तो उस समय मैं बड़ा ही एक इंप्रेस हो जाता था। एक मिरेकल के बारे में यदि कुछ लिखा जाता है। कोई सुपर नेचुरल पावर के बारे में यदि कहीं पे कुछ लिखा गया है तो मैं बड़ा इंप्रेस हो जाता था कि हां कि एक आम आदमी है उसके पास में तो लिमिटेड कैपेसिटी है। किंतु यह लोग जो है जो लोग कि मेडिटेशन करके स्पिरिचुअल लाइफ लीड करके यह सब डेवलप करते हैं। अपनी एक्स्ट्रा सेंसरी एबिलिटीज, एक्स्ट्रा सेंसरी परसेप्शनंस, एक्स्ट्रा सेंसरी एबिलिटीज। तो सही में लगता है कि हां ये लोग सच्चे स्पिरिचुअल है या तो सच्चे क्या कहेंगे कि सुपर ह्यूमन है। आजकल वो सुपरमैन वगैरह का जो क्रेज चला है सुपर हीरोज़ का। तो ये अपने इंडियन सुपर हीरो है। उन लोगों के सुपर हीरो है। हवा में उड़ सकते हैं वगैरह कर सकते हैं। तो हमारे सुपर हीरो भी कम नहीं है। हमारे सुपर हीरो के पास में भी यह योगिक शक्तियां है। तो ऐसा मैं बड़ा ही इंप्रेस हो जाता था। यह सब विवरण पढ़कर के। किंतु फिर जिस दिन से मैंने रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य का अभ्यास किया उसमें जितना गहराई से जाता उतना ही मुझे यह समझ में आता गया कि देखिए यह जो सुपर पावर्स जिसको हम कहते हैं लोगों को इंप्रेस तो कर सकते हैं किंतु आध्यात्मिक जीवन में वह प्रारंभ भी नहीं किया है। यदि आपके पास में इस तरह के सुपर पावर डेवलप हुए हैं। देखिए वही ठाकुर के एक गुरु भाई की कहानी भैरवी ब्राह्मणी के तीन शिष्य थे तो एक था चंद्र दूसरा था गिरिजा तीसरे थे ठाकुर तो ठाकुर के दक्षिणेश्वर आकर के ठाकुर को तंत्र साधना सिखाने से पहले ही भैरवी ब्राह्मणी के दो शिष्य हो चुके थे। भैरवी ब्राह्मणी को आदेश मिला था कि तुम्हारे तीन शिष्य होने वाले हैं। तो पहले चंद्र और गिरिजा को शिक्षा देकर के ही भैरवी दक्षिणेश्वर आई थी। तो बाय दैट टाइम ठाकुर को भैरवी ने तंत्र साधना में पारंगत करना प्रारंभ किया। उससे पहले ही उसके ये दो शिष्य हो ही चुके थे और एक बार हुआ ऐसा कि इन दोनों में से एक मैं नाम भूल गया। आइधर चंद्र और गिरिजा दक्षिणेश्वर आए और देखा एक बार क्या हुआ ठाकुर वो और वो यह गुरु भाई यह दोनों वहां पर यदुम मल्लिक ना किसी के गार्डन में गए होंगे रात को वापस आ रहे थे चारों ओर अंधेरा हो गया था तो ठाकुर यदि अंधेरे में चलते हैं पैर को ठोकर लगेगी गिर जाएंगे लगेगा तो ऐसा कुछ ना हो इसके लिए उनके गुरु भाई ने क्या किया उनकी पीठ में से प्रकाश का एक किरण निकाला और ठाकुर को कहा कि इस प्रकाश के किरण के सहारे आप दक्षिणेश्वर चले जाइए। तो ठाकुर ने देखा कि यह लोग यह सिद्धाई में ही पड़ा हुआ है। तो ठाकुर ने उसकी सिद्धाई हर ली थी। सिद्धाई अर्थात कि यह योगिक सिद्धि यह योगिक सिद्धि में ही यह पड़ा हुआ है। इससे आगे नहीं जा पा रहा है। सही सही ईश्वर दर्शन सही सही ईश्वर प्राप्ति आत्म साक्षात्कार उसको उससे तो अभी वह दूर ही है। बोलकर के उसकी योगिक सिद्धि ठाकुर खा गए थे और जिससे कि यह गुरु बाई का ईश्वर प्राप्ति की ओर का मार्ग जो है प्रशस्त हो गया था। तो अभी प्रश्न होगा कि यह जो योगिक सुपर पावर है वह यदि कोई साइन नहीं है यह यदि कोई आपका यह बैरोमीटर नहीं है यह दिखाता है कि हम आगे कितने बढ़े हैं तो फिर बैरोमीटर क्या है? व्हाट आर द साइन? व्हाट आर द मेजरमेंट यू नीड के उसके अनुसार हम मेजर कर पाए कि हां ये इतना आगे बढ़े हैं। तो वो यहां पे शरद महाराज हमको कहते हैं कि हृदय जब समुंदर की तरह विस्तृत हो जाता है। अपने स्नेह पास में अपने करुणा के इस तरंगों में सबको जैसे कि आवृत कर देता है। जब साधक का मन, साधक का हृदय तब देखिए कि वह सही-सही में ईश्वर प्राप्ति के रास्ते पे आगे बढ़ रहा है। और देखिए कि दूसरा यहां पर और एक चीज शरद महाराज कहते हैं कि ईश्वर के साथ में संबंध युक्त देख के जगत और जगत में जितना भी वस्तु और व्यक्ति जगत और तन मध्यगत सर्व वस्तु और व्यक्ति जो कि शरद महाराज की वाक्य रचना है। जगत और उसके मध्यगत सर्व वस्तु और व्यक्ति को ईश्वर के साथ में संबंध युक्त देखकर के अभी देखिए कि यह जो करुणा है साधक के मन में या सिद्ध के मन में कब प्रकट होगी जबकि वो सबको ईश्वर के साथ में तादात्म हुआ देखता है। यदि द्वैत मार्ग का पथिक है तो वह देखेगा कि सर्वभूत में ईश्वर विराजमान है और अद्वैत मार्ग का पथिक है तब वह देखेगा कि ब्रह्मन का ही सब कुछ बना हुआ है। जैसे कि समुंदर और उसकी लहरें जैसे कि मिट्टी और मिट्टी के बने विभिन्न बर्तन। अभी एक कुंजा बनाया है मिट्टी का। अभी यहां पे एक प्लेट बनाया है मिट्टी का। यहां पे एक जार बनाया है मिट्टी का। जो कुछ भी बना है आपको शेप डिफरेंट दिखेंगे। नाम और रूप डिफरेंट दिखेंगे। फंक्शनंस शायद डिफरेंट दिखेंगे कि यह एक चीज है कुंजा है जिसमें हम पानी भरते हैं। अभी समर सीजन आ रहा है तो मैं जब ट्रेनिंग सेंटर में था तो मैंने एक कुंजा परचेस किया था इस तरह से पानी रखने के लिए। उसका नेक जो होता है पतला होता है। लंबा होता है और उसमें पानी भर के आप रख सकते हैं। फिर आप जैसा डालेंगे ठंडा पानी निकलेगा। तो आप दो-ती घंटा पानी रहने से एकदम फ्रिज जैसा ठंडा हो जाता है। तो देखिए यह उसका मिट्टी का यह एक बर्तन है जिसका पपस है पानी भर के रखते हैं और पानी ठंडा रखता है। फिर जैसे वह पता है वो मैंने कई जगह पर देखा है कि वो बायोडिग्रेडेबल टी कप। तो यह चाय का कप बनाएंगे। वह मिट्टी का ही चाय का कप। तो पहली बार तो मैंने जब देखा मैं आई थिंक नॉर्थ इंडिया में ट्रैवल कर रहा था उस समय पहली बार मैंने जब देखा तो मुझे बड़ा डिसगस्ट हुआ। मैंने कहा अरे मिट्टी के कप में चाय पीना दूध ये मिट्टी का उसमें टेस्ट आएगा। चाय का तो टेस्ट ही नहीं आएगा। यह क्या सब नाटक लगा के रखा है। यदि बायोडिग्रेडेबल ऐसा ही एनवायरमेंट की चिंता करनी है तो वह जो पेपर के जो कप आते हैं इस एक तरह के वह रखो। यह मिट्टी के कप में क्या चाय पीना? तो ऐसा पहले तो दो-तीन बार ऐसा किया। फिर मैंने एक बार सोचा पी के देख लेते हैं। हां मिट्टी का थोड़ा सा टेस्ट आ रहा था किंतु इतना बुरा भी नहीं था। तो देखिए चाय बनाने के लिए भी आप कप बना सकते हैं। मिट्टी में से पानी भरने के लिए भी आप वो कुंजा बना सकते हैं। किंतु है तो आखिर में मिट्टी ही। नाम, रूप और फंक्शन अलग-अलग है। किंतु उसका जो बेसिक इंग्रेडिएंट है वो तो मिट्टी ही है। मिट्टी के अलावा और कुछ नहीं। तो वैसे ही मेरी नजर के सामने जितने भी लोगों को जितनी भी चीजों को मैं देखता हूं ब्रह्मन ही है। ब्राह्मण के अलावा और कुछ नहीं। बस नाम, रूप और फंक्शनंस, नेम, फॉर्म एंड फंक्शनंस आर डिफरेंट बट द बेसिक इंग्रेडिएंट इज द सेम। तो आप चाहे द्वैत वेदांत को फॉलो करते हो ना कि अद्वैत वेदांत को फॉलो करते हो। यदि सही-सही में आध्यात्मिक जीवन में प्रगति कर रहे हैं तो मनुष्य का हृदय महासागर की तरह विस्तृत हो जाएगा। और एक चीज और दूसरा कि जो कुछ भी देखता है वह अपने सामने वो वही ईश्वर या वही ब्रह्मण की एक-एक किरण मात्र है। ईश्वर के साथ में संबंध युक्त करके देखेगा। देखिए यह जो ईश्वर के साथ में संबंध युक्त करके देखना इसका क्या अर्थ है? इसके कुछ-कुछ उदाहरण ठाकुर के जीवन में हमको देखने को मिलते हैं। ठाकुर ने अपने मुंह से अपने बारे में जो ठाकुर की ऑटोबायोग्राफी एक किताब है। ठाकुर ठाकुर की निज मुख कहित का ऐसा कुछ है। मैं टाइटल भूल गया। तो वो किताब है मेरे पास में। उसमें क्या है? ठाकुर ने अपने बारे में जो कुछ भी कहा है वह लीला प्रसंग में हो या तो फिर यह कथामृत में हो सब जगह से कंपाइल करके ठाकुर के स्वमुख मुख कहित चरित्र माने ऑटोबायोग्राफी लिटरल ऑटोबायोग्राफी तो ऐसा कंपाइलेशन किया है। बड़ा सुंदर कंपाइलेशन है कि ठाकुर अपने मुंह से अपने बारे में क्या कहते हैं। तो और ठाकुर अपने बारे में काफी कुछ कहते रहते थे। कथामृत आप पढ़ेंगे तो बहुत बार ठाकुर का वह विवरण आएगा कि हां मेरे साधना के दिनों में ऐसा फिर मेरे पिताजी के बारे में खुदराम के बारे में फिर यह विभिन्न लोगों के साथ में जिनका ठाकुर का इंटरेक्शन होता था ये कृष्ण किशोर है गौरी पंडित है उन सबके बारे में आज तो हमको ठाकुर के विवरण की वजह से ही पता है अदरवाइज तो और कोई उपाय नहीं उनके बारे में जानने का तो यह सब कुछ ठाकुर अपने मुंह से जो कहते रहते थे उसका कंपाइलेशन है वो बंगाली में है वो किताब तो देखिए कि ठाकुर ने अपने मुंह से क्या कहा और यह सोर्स है यही लीला प्रसंग और कथामृत तो यह जो ईश्वर के साथ में संबंध युक्त देख करके भक्त उन व्यक्तियों को अपना लेता है। यह जो सेंटेंस है ठाकुर का ठाकुर के खुद के जीवन में देखिए कि किस तरह से प्रतिफलित होता है। किस तरह से एग्जिंपलीफाई होता है। ठाकुर कहते हैं कि मेरी कैसी-कसी सब

श्री रामकृष्ण कुमारी के भीतर जगदम्बा का दर्शन करते है

अवस्थाएं गई थी। थोड़ा सा भी कुछ स्टिमुलेशन मिलने से ही मेरे मन में उद्दीपना प्रकट हो जाती थी। स्टिमुलेशन अर्थात कि ईश्वर के बारे में थोड़ा बहुत कीर्तन सुन लिया। कोई सिंबल देख लिया ऐसा कुछ देख लिया ईश्वर के बारे में कहीं कुछ आभास भी मिला उनको तो फट करके उनका मन जो है वो उच्च भूमि में वो आरूढ़ हो जाता था तो उसको कहते हैं थोड़ा सा स्टिमुलेशन मिलने से ही मेरे मन में इतनी उद्दीपना होती थी जनरली लोगों को क्या होता है शराब बराब पिएंगे तो फिर उनको इस तरह का स्टिमुलेशन होता है तो ठाकुर वो जो मास्टर महा महाशय एक बार अपने एक रिलेटिव ना कि एक फ्रेंड को ठाकुर के पास ले आए थे और क्या कह के ले आए थे तुमको उच्च कक्षा का यदि बहुत अच्छी क्वालिटी का स्ट्रांग तुमको शराब मध्यपान करना है तो चलो मैं तुमको ले जाता हूं ऐसा बोल के ठाकुर के पास ले आए थे तो यह जो ये है दिव्य सुरा ये ज्ञान सुरा अर्थात कि दिव्य उन्माद वे लोग शराब पी के उन्माद ग्रस्त होते हैं ठाकुर जो है यह दिव्य भाव का पान करके उन्माद ग्रस्त होते थे। एक बार ठाकुर कोलकाता गए थे तो सीढ़ी उतर रहे थे। किसी भक्त के घर में गए थे तो फर्स्ट फ्लोर पर गए होंगे। सीढ़ी उतर रहे हैं। तो उतरतेउतरते भाव से आविष्ट हो गए। भाव में मग्न हो गए। तो अभी भाव में आते हैं तो पैर जो थे उनके थोड़े लड़खड़ाते थे। माने सीधे चल नहीं पाते थे। एक साल का बच्चा कैसे चलता है? वो इस तरह से ठाकुर भाव में आकर के चलते थे। पैर ठीक से पड़े नहीं अपनी जगह पे। तो अभी ठाकुर ऐसा करके सीढ़ी उतर रहे हैं। भाव में आकर के और लड़खड़ा रहे हैं। पैर इधर से उधर जा रहे हैं। तो नेचुरली भक्तों को तो डर लगेगा। ठाकुर कहीं गिर ना जाए। तो किसी एक ठाकुर के ही त्यागी संतान ने ठाकुर का हाथ पकड़ लिया। तो जैसे कि ठाकुर को उतरने में सहायता हो। तो ठाकुर ने नाराज होकर के हाथ छुड़वा लिया अपना। तो ठीक है अब ठाकुर की जैसी इच्छा वो भक्त भी बेचारा क्या बोलेगा फिर ठाकुर थोड़े नीचे उतर आए कैसे भी करके फिर थोड़ा सा शांत हुआ उनका भाव उनका मन जो है उच्च भूमि में से थोड़ा सा नॉर्मल लेवल पर आया तब ठाकुर ने अपने भक्त को कहा कि देखो उस समय तुम हाथ पकड़ते ना मेरा तो सब लोग क्या सोचते पता है कि इन्होंने शराब पी रखी है और शराब पीकर के मद में इतने मद मस्त हो गए हैं इतने मदमस्त हो गए हैं कि उनके पैर ठीक से नहीं पड़ रहे इसलिए लड़खड़ा रहे हैं। इसलिए मैंने अपना हाथ छुड़ा लिया कि जैसे लोगों को लगे कि मैंने शराब नहीं पिए। तो देखिए वो दिव्य सुरापान है और यह सांसारिक सुरापान है। तो यहां पर ठाकुर कहते हैं मेरी कैसी-कसी सब अवस्थाएं गई है। थोड़ा सा भी कुछ उद्दीपन होने से फटाक के मेरा मन जो है वह ईश्वरीय भाव में मत्त हो जाता था। ठाकुर कहते हैं मैंने सुंदरी पूजा की। 14 साल की लड़की की सुंदरी पूजा की। किंतु देखिए कि यदि आप 14 साल की लड़की की इस तरह से पूजा करते हैं या इसके सानिध्य में आते हैं तो सहज रूप से काम भाव तो प्रकट होने ही वाला है। किंतु ठाकुर कहते हैं कि सुंदरी पूजा करके मैंने देखा कि बिल्कुल साक्षात मां जगदंबा को ही जैसे कि मैंने उनमें दर्शन किया। पैसा देकर के मैंने उनको प्रणाम किया। देखिए यह सुंदरी पूजा करके जो मन जो है इतना उच्च अवस्था में उदित हो गया था। इतनी उच्च अवस्था में आसित हो गया था कि सांसारिक जो अब देखिए ये तो ठाकुर है। राइट? अभी कोई एक सामान्य साधक ऐसा कहता तो हमको थोड़ा आश्चर्य होता। ठाकुर के साथ में प्रॉब्लम क्या है कि उनके जीवन में अद्भुत घटनाओं का और दूसरा कि काम कांचन से परे जाने का इतने उदाहरण है। इतने उदाहरण है कि यह जो एक उदाहरण वो हमको ज्यादा कुछ एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी नहीं लगता। हम सोचेंगे अच्छा ठीक है चलो ये तो ठाकुर है ठाकुर के साथ में ऐसा होना ही है। ठाकुर के मन में कहां काम भाव प्रकट होने वाला है? ठाकुर का मन कहां सांसारिक भूमि पे आने वाला है। ठाकुर स्त्री को देखकर के कहां उसके प्रति काम भाव का उनके मन में कुछ होने वाला है। यह तो ठाकुर है। ठाकुर ये तो सब चीजें तो सामान्य है। और इसीलिए यही शरद महाराज हमको वर्न करते हैं इसकी अवतरणिका में साधक भाव की कि देखिए ठाकुर को ठाकुर की साधना का वर्णन जब हम पढ़ते हैं ठाकुर की यह जो दिव्यता का हम जब अभ्यास स्टडी करते हैं तब ना ठाकुर को आप अवतार के रूप में मत देखिए वरना तो क्या होगा कि ठाकुर की जो कोई भी सिद्धियां है ना हम उसको बहुत ही सामान्य रूप से लेना शुरू कर देंगे वैुंठ में भगवान विष्णु विष्णु बैठे हुए हैं। कैलाश पर भगवान शिव बैठे हुए हैं। वे लोग तो जो चाहे कर सकते हैं। वह तो शिव है, विष्णु है। उससे हमारा क्या लेना देना? वो हजार चमत्कार भी कर दे तो हम इससे इंप्रेस नहीं होने वाले। भगवान किस काम के चमत्कार नहीं करेंगे तो। यानी कि उनका जो पावर है हमारी नजर में बहुत ही सामान्य हो जाता है। तो अवतार के साथ में भी ऐसा होता है। अवतार ने सिद्धि प्राप्त कर ली। स्त्री को देखकर के उनके मन में कोई भी विकार पड़ा तो यह तो अवतार है। वो तो करेंगे ही ऐसा। तो यह क्या है कि ट्रिविलाइजेशन इंग्लिश में कहते हैं कोई अब जैसे अमेरिका में क्या होता है? आजकल कोई भी इंडियन है कोई भी कॉम्पिटिटिव एग्जाम पास करता है ना तो अमेरिकन लोग इंप्रेस नहीं होते। वे लोग क्या अरे वो तो इंडियन है। वो तो उसका और कोई कामधाम ही नहीं है। उसका कोई लाइफ ही नहीं है। माने ना ही उसको एंजॉयमेंट करना है ना ही उसको कोई एंटरटेनमेंट चाहिए। बस वो तो दिन भर वो रटता रहता है। दिन भर मुखस्थ करता रहता है। बोल के वो तो कॉम्पिटिटिव ये जो स्पेलिंग भी है नेशनल जियोग्राफी का उसमें ज्यादातर आप देखेंगे इंडियन लड़के ही वो इंडियन जो बच्चे होते हैं लड़के लड़कियां वही वो टॉप पे आते हैं। तो अभी क्या है? अमेरिकन लोगों ने इंडियन लोगों की जो एटेनमेंट है, हमारी जो सक्सेस है, उसको ट्रिविलाइज करना शुरू कर दिया है। अच्छा यह तो इंडियन है। वो तो यह सब करेगा ही। तो क्या है कि हम लोग भी कहीं ऐसा ना हो जाए कि ठाकुर की सिद्धियों को ट्रिविलाइज करना शुरू ना कर दे। ठाकुर ने जो किया अरे वो तो ठाकुर है वो तो करेंगे ही करेंगे। कौन सी बड़ी तोप मार दी है। तो ऐसा कहीं ना हो जाए। इसलिए शरद महाराज कहते हैं साधना का वर्णन जब हम पाठ करते हैं, अभ्यास करते हैं, ठाकुर को एक मनुष्य के रूप में ही देखिए या तो कहिए कि चलो अवतार है किंतु मनुष्य के गुणधर्म भी उनमें भरे हुए हैं। ईश्वरीय गुण यदि है तो मनुष्य के भी गुण है। ईश्वरीय गुण उनको ईश्वर के प्रति आकर्षित करते हैं। जबकि मनुष्य के गुण उनके पास में साधना करवा के साधना में सिद्धि प्राप्त करवाते हैं। सो ये एक अंडरस्टैंडिंग के साथ में इसको हम पढ़े कि कहां एक कुमारी युवती के भीतर में काम भाव का दर्शन करना है। वह नहीं करके जैसे कि वही ईश्वर वही ब्राह्मण का ही एक शेप है। यह कुमारी युवती वही उसके भीतर में ईश्वर विराजमान है। बोल के ठाकुर के मन में ईश्वरीय भाव का उद्दीपन हुआ। साक्षात जगदंबा के रूप में देखकर के उसको पैसा देकर के ठाकुर ने प्रणाम किया। और क्या

वेश्याओं और अभिनेत्रियों में माँ जगदम्बा के दर्शन — श्री रामकृष्ण की अद्भुत दृष्टि

कहते हैं? रामलीला देखने को गया था। देखा कि सीता है, राम है, लक्ष्मण है, हनुमान, विभीषण ये जितने भी जो सजे हैं वो भांड जिनको कहते हैं अर्थात कि एक्टर्स उस समय क्या एक्टर लोगों का ये जो एक्टर या एक्ट्रेस होते थे जो कि इस तरह से नाटक करते थे। उनका चरित्र अच्छा नहीं होता था। समाज में बड़ी ही निम्न दृष्टि से उनको देखा जाता था। तो अभी लोग क्या है कि धार्मिक नाटक देखने को तो जाएंगे। अ बहुत अच्छा अभिनय हुआ है। इसकी प्रशंसा भी करेंगे और फिर वह जो पात्र का अभिनय जो कर रहे हैं अभिनेता या अभिनेत्री पैसासा भी दे देंगे, प्रशंसा भी करेंगे। किंतु क्या है? उनके प्रति अच्छा भाव कोई भी पोषण नहीं करेगा। उनके चरित्र के प्रति सभी लोग संदिग्ध ही रहेंगे। उनके सब लोग उनकी निंदा ही करते रहेंगे। तो ठाकुर कहते हैं कि देखिए मैं रामलीला देखने को गया था। जितने भी अभिनेता या अभिनेत्रियां हैं जिन्होंने मां सीता का भगवान राम का लक्ष्मण का या तो फिर विभीषण का पात्र अभिनय किया था। मैं उन सब की पूजा करने लगा। ये देखिए लिटरल ठाकुर किस तरह से ठाकुर खुद जब अभिनय करने को गए थे भगवान शिव का तो समाधस्त हो गए थे। उनके भीतर में भगवान शिव का आवेश हुआ था। तो ठाकुर यहां पर देखिए कहां ठाकुर कि शुद्ध पवित्र मन जिनका है पूरा जीवन की जिन्होंने ईश्वर को समर्पित कर दिया है वह जब अभिनय करेंगे और उनके मन के भीतर में जिनका अभिनय कर रहे हैं वही साक्षात शिव उनके भीतर में आविर्भूत होंगे। कहां यह भगवान रामकृष्ण और कहां यह अभिनेता या अभिनेत्रियां जिनका ना ही चरित्र है समाज में निम्न दृष्टि से देखा जाता है। किंतु ठाकुर ने जैसे कि उनको भी जो पात्र का वो अभिनय कर रहे हैं ऐसे ही देखा जैसे कि वो वो पात्र स्वयं है। यहां पे वो जो शरद महाराज कहते हैं ना कि भक्त क्या करता है? जगत और जगत के भीतर में जो कोई भी वस्तु या व्यक्ति है उसको ईश्वर के साथ में संबंध युक्त देख करके उनको अपना कर लेता है उनको अपना लेता है। तो यह जो बात शरद महाराज की देखिए एग्जैक्टली यहां पे ठाकुर के जीवन में जो अभिनेता या अभिनेत्री भगवान राम मां सीता का अभिनय कर रहे हैं ठाकुर उनकी पूजा करने लगे। और ठाकुर कहते हैं मैं कुमारी पूजा करता था और जब भी कुमारी पूजा करता था उनके भीतर में साक्षात जगदंबा का दर्शन करता था। देखिए ठाकुर को इस तरह से कुमारी पूजा करते देखकर के यह हृदय ठाकुर का भांजा ठाकुर का सेवक उसके मन में भी यह विचार प्रकट हुआ। ठाकुर कुमारी पूजा करते हैं तो मैं भी कुमारी पूजा करूंगा। तो उसका क्या परिणाम आया? वो तो जग जाहिर है। हृदय को वहां से भगा दिया गया दक्षिणेश्वर काली मंदिर से। तो देखिए कि आपके मन का क्या भाव है उसके अनुसार आपको उसका फल मिलने वाला है। कुमारी पूजा करके यदि कामना वासना से अभी कुमारी के प्रति यदि काम भाव नहीं है तो यह पूजा करने के समय मन में कोई काम भाव रहेगा कि हां यह पूजा सफल होगी तो मेरे संसार में यहां पर मैं सफल होऊंगा। यहां पर मुझे इतना धन प्राप्ति होगा। यहां पर मुझे मेरे साथ में कुछ शुभ होगा। कुछ कल्याणकर होगा। मुझे कहीं पर कुछ लाभ होगा। शुभ लाभ। बहुत सारे घर में जाएंगे ना तो दरवाजे पर लिखा होता है वो शुभ लाभ। तो यह कुमारी पूजा इस आशय से करता है कि मेरे साथ में कुछ शुभ होगा। मुझे कुछ लाभ होगा। ठाकुर तो करते हैं पूजा संपूर्ण रूप से ईश्वर को समर्पित होने के लिए। नहीं कि शुभ और लाभ के लिए। तो देखिए कि कुमारी पूजा ठाकुर जब करते थे उनको कुमारी को साक्षात जगदंबा के रूप में देखते हैं। एक दिन ठाकुर बकुलतला के नीचे में ख बकुलतला अर्थात कि बकुल नाम का एक पेड़ है। वहां दक्षिणेश्वर में अभी आज है कि नहीं पता नहीं। मुझे नहीं लगता कि आज होगा। तो जो भी है यह दक्षिणेश्वर आप गए होंगे तो आपने वो यदि वो माइंड में आपके माइंड में होगा यहां पर ठाकुर का कम यहां पे द्वादश शिव मंदिर है गंगा के किनारे पूरा चलता है द्वादश शिव मंदिर बीच में चांदनी है उसको क्रॉस करके जाएंगे तो ठाकुर का कमरा है और माने यह जो गंगा के किनारे जो उद्यान पथ है उसके किनारे यह सब स्ट्रक्चर है थोड़ा सा ठाकुर के कमरे से आगे जाएंगे तो मां का नौबत है उससे थोड़ा थोड़ा सा आगे जाएंगे तो यह यह है पंचवटी है और आइदर पंचवटी से पहले ना कि पंचवटी के बाद में ही बकुलतला है। मैं एग्जैक्ट भूल गया और इससे थोड़ा सा आगे जाएंगे तो फिर झाऊ तला देखने को मिलेगा। तो ठाकुर कहते हैं कि मैं बकुल तला अर्थात कि बकुल के पेड़ के नीचे में खड़ा था। नील बसन पहन करके एक स्त्री वहां पर खड़ी है। यह स्त्री कौन थी? तो थी वेश्या अर्थात कि प्रॉस्टिट्यूट। अभी देखिए कि पहले तो इस तरह की स्त्रियों के प्रति अपने मन में सहानुभूति होनी ही चाहिए। क्योंकि ऐसा तो नहीं है कि जानबूझकर के कोई इस तरह का कार्य करें। सांसारिक सब आप विपद आन पड़ने पर ही यह सब होता है। तो जो भी है किंतु समाज उनको बड़ी ही निम्न दृष्टि से देखता है। तो यहां पर ठाकुर कहते हैं कि मैं वहां पर बकुल के पेड़ के नीचे मैं खड़ा था। देखा कि नील वसन पहन करके एक इस तरह की एक स्त्री वहां पर खड़ी थी। ठाकुर कहते हैं दप करके मां सीता और उद्दीपन होए गो माने फट करके मां सीता का उद्दीपन हो गया। कहां मां सीता की पवित्रता, कहां मां सीता की शुद्धता, कहां मां सीता की दिव्यता और कहां यह चरित्रहीन एक स्त्री नील वसन पहन के खड़ी हुई है। देखिए यह जो ईश्वर के भीतर में आपका मन संपूर्ण रूप से यदि डूब जाता है। आध्यात्मिक पथ जो है धीरे-धीरे आप क्रॉस करके करके आध्यात्मिक मंजिलों को आप जैसे क्रॉस करते जाएंगे वैसे ही आप देखेंगे कि संसार में किसी के प्रति आप निम्न दृष्टि से नहीं देख पाएंगे। संसार में किसी के प्रति आप क्रोध या घृणा प्रकट नहीं कर पाएंगे। संसार में किसी के प्रति आप विद्वेष भाव पोषण नहीं कर पाएंगे। सब जैसे कि अपने लगेंगे। मास्टर महाशय का एक बहुत ही सुंदर विवरण है। मास्टर महाशय कहते हैं कि मन होता है क्योंकि दक्षिणेश्वर आकर के ठाकुर की जो दिव्यता है उन्होंने अनुभूत की कि ये पेड़ है, पौधे हैं, फूल है, यह जो रास्ता है, लाल सुरकी का बना यह उद्यान पथ है, यह मंदिर है। सब जगह पे ठाकुर की दिव्यता जैसे कि प्रसारित हो गई है। ठाकुर मास्टर महाशय लिखते हैं कि ऐसा मन में लगता है कि बस इस उद्यान में एक कोने में खड़े रहकर के गंगा जी बह रही है। उसकी कल कल ध्वनि सुने। यह पंखियों का कलरव सुनते जाए बस और कुछ नहीं करना है। यहीं पर पत्थर की तरह खड़े रहना है। और कहते हैं कि पेड़ों के साथ में वार्तालाप करने को जी कर रहा है। पेड़ों के साथ में अपना सुख दुख शेयर करने को अपने मन की बातें करने को जी कर रहा है। क्योंकि यह पेड़ सिर्फ पेड़ नहीं है। ठाकुर के साथ में एसोसिएटेड है। ठाकुर इस पेड़ के नीचे में इस पेड़ की छांव में खड़े हैं। ठाकुर ने इस पेड़ों का दर्शन किया है। इस पेड़ों को स्पर्श किया है। अर्थात कि सब कुछ ठाकुर की दिव्यता से महिमामंडित हो चुका है। तो मास्टर महाशय इतना सुंदर यह वर्णन है ये जो पत्थर होकर के खड़े रहने का मां एक बार कहती है कि किसी ऋषियों के बारे में कि ये ऋषि लोग क्या करते हैं? जब मैं युग युगांतर तक मां कहती है कि पत्थर की तरह वे लोग साधना में वो जो पद्मासन में बैठकर के युग युगांतर तक तपस्या करते जाते हैं। ये ये कांसेप्ट जब सुनने में आता है तो कितना सुंदर लगता है। जैसे कि ये ईश्वर के अलावा इस जगत में और कुछ नहीं है। तो यहां पे भी कहां एक निम्न चरित्र की स्त्री को देखकर के मन में दो चीज होगी। या तो काम भाव प्रकट होगा या तो मन में घृणा प्रकट होगी। ठाकुर के मन में ना ही घृणा प्रकट हुई ना ही काम भाव प्रकट हुआ। सहानुभूति प्रकट हो सकती है। यदि कोई सामान्य साधक हो तो किंतु ठाकुर तो कोई सामान्य साधक नहीं है। वो तो असामान्य साधक है। हे साधक मनुष्य के गुण है किंतु असामान्य साधक है। मां सीता का उद्दीपन हो गया। माने कहां जस्ट इमेजिन कि दोनों में कंट्रास्ट कितना बड़ा है। स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि जब तक मां सीता रहेगी माने जब तक भारतीय संस्कृति रहेगी तब तक मां सीता की कहानी जीवित रहेगी। भले ही चाहे जितने भी पुरुष हैं सबके लिए हमेशा के लिए भगवान राम आदर्श स्थापित करके गए हैं। जितनी भी स्त्रियां हैं सबके लिए हमेशा के लिए मां सीता आदर्श स्थापित करके गई है। यह स्वामी विवेकानंद का मां सीता के चरित्र के प्रति एक उनके प्रति उनकी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। क्या कहते हैं को रामः कौन है राम? सीता ही तो है जिनका कि सर्वश्रेष्ठ चरित्र है जिनको कि हमको सही में जिनकी आराधना करनी है वो सही में मां सीता इतना उच्च आध्यात्मिक जीवन में जिनका स्थान है साधकों के हृदय में वो मां सीता का उद्दीपन एक निम्न चरित्र की स्त्री को देखकर के ठाकुर के मन में हुआ माने ये सब कुछ ईश्वर का बना है। हम लोग जो मुंह पे ही बोलते रहते हैं जो लोग वेदांत के क्लास लेते हैं मैं मायसेल्फ इंक्लूडेड हम लोग जो बोलते रहते हैं सर्वम खलवम इदम ब्रह्म जो कुछ भी है सब ब्रह्मन ही है ब्रह्मन के अलावा और कुछ नहीं तो देखिए कि हमारे लाइक्स एंड डिसलाइक्स कितने स्ट्रांग होते हैं। थोड़ा सा भी लोगों के प्रति हमारा किसी ने हमारा कुछ बुरा किया या किसी ने कुछ कटु वचन किया कहा या तो फिर हमारे साथ में थोड़ा सा अन्याय किया फट करके उसके प्रति विद्वेष भाव अपने मन में प्रकट हो जाता है। उस समय हम एक क्षण के लिए भी नहीं सोचेंगे कि अरे यह भी तो वही ब्राह्मण ही है। इसके भीतर में वही ईश्वर विराजमान है। हम एक क्षण के लिए नहीं सोचेंगे। किंतु यह है ठाकुर। ठाकुर कहते हैं वह स्त्री को मैं भूल गया कि वह एक निम्न चरित्र की स्त्री है। वह बात मैं भूल गया। साक्षात सीता लंका से उद्धारित होकर के भगवान राम के पास में जा रही है। वही मुझे दर्शन हुआ। और यह दर्शन होने के बाद में समाधस्थ हो गया। और कितना लंबा समय मैंने समाधि में बिताया। तो देखिए और एक बार इसी इसी तरह की और एक कहानी कि ठाकुर चैतन्य लीला अभिनय देखने को जाने वाले थे। तो अभी गिरीश घोष ठाकुर के पास में आ रहा है। नया-नया ठाकुर को इनवाइट किया है। तो ठाकुर सब भक्तों के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं। अभी वह जो भक्त तथाकथित भक्त वह भद्र लोग वह पता है ना वह स्वामी जी को लेटर लिखा था एक भद्रलोग ने कि हम लोग तो ठाकुर की तिथि पूजा जो सेलिब्रेशन हो रहा है जन्मतिथि उसमें जाना तो चाहते हैं किंतु इस तरह की सब स्त्रियां आती है चरित्रहीन इसके लिए हम लोग अपने घर की स्त्रियों को लेकर के दक्षिणेश्वर नहीं जा सकते। स्वामी जी ने लेटर में लिखा रिप्लाई किया कि अपने घर की स्त्रियों को लेकर के आप अपने घर में ही रहिए। ठाकुर आए हैं पतित नारायण के लिए, चंडाल नारायण के लिए, दरिद्र नारायण के लिए नहीं कि तुम्हारे जैसे तथाकथित भद्र लोगों के लिए तो यहां पे भी वार्तालाप चल रहा है कि चैतन्य लीला दर्शन देखने के लिए ठाकुर जाएंगे। गिरीश घोष ने निमंत्रण किया है। तो अभी इस तरह का ही जो एक था वो वहां पर ठाकुर को कहता है कि किंतु महाशय आपको पता है यह जो चैतन्य लीला वगैरह जो अभिनय करते हैं और खास करके ये गिरीश घोष के वहां पर जो लोग अभिनय करते हैं वह सब तो निम्न चरित्र की स्त्रियां है। वे लोग तो वैश्याए हैं। वे इस तरह की स्त्रियां अभिनय करती है। तो ठाकुर ने साथ-साथ में ही कहा आमी तादेर मां आनंदमई देखबो मैं उनको मां आनंदमई के रूप में देखूंगा। देखिए ठाकुर का जो कांसेप्ट है कितना क्लियर है कि जगत में आप किसी के प्रति घृणा करेंगे ही क्यों? उसका जो कर्म का प्रवाह है वह उसके प्रवाह के अनुसार उसका जो जर्नी है गॉड वर्ड्स जर्नी ईश्वर की ओर जाने का जो जर्नी है आध्यात्मिक यात्रा भले ही चाहे वह आध्यात्मिकता में विश्वास करें ना करें दैट इज समथिंग एल्स किंतु यह जन्म जन्मांतर का मार्ग खा के सभी लोगों की अकल आज नहीं ना कल कल नहीं ना परसों इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में ठिकाने तो आनी ही वाली है स्मार्ट व्यक्ति वह है कि यह बढ़कर के सुन सुन के देख के ही मेक्स स्मार्ट चॉइस। तो वो तो एक बात है। अभी वो मूर्ख है। जन्म जन्मांतर का मार खाएगा। फिर कहीं जाके उसकी अकल ठिकाने आएगी। सो दैट इज अप टू हिम और हर हु आर वी टू जज देम। जब तक वह हमारा बुरा नहीं करते हैं तब तक हम उसको जज करने को क्यों जाए? और यहां पे भी एक बात है कि यह प्रश्न सहज रूप से हो ही सकता है कि सभी के भीतर में ईश्वर का दर्शन करें। सभी के भीतर में ब्रह्म साक्षात्कार करें तो फिर इस तरह का कोई व्यक्ति हमको हानि पहुंचाने को आएगा तो हम क्या करें तो ठाकुर की ही कहानी है बहुत सारी कहानियां है वो हाथी नारायण महावत नारायण एक आदमी रास्ते में खड़ा है पागल हाथी आ रहा है तो वो सोचा कि इसके भीतर में भी तो वही नारायण है तो खड़े रह के नारायण का स्तव करने लगा हाथी ने उसको उठाकर के पटक दिया एक साइड पे जब उसको हश आया तो फिर उसके गुरु गुरु ने पूछा कि अरे भैया वो पागल हाथी जा रहा था। तुम रास्ते में क्यों खड़े थे? तो शिष्य ने उत्तर दिया कि गुरु जी आप ही ने तो कहा है सबके भीतर में नारायण का दर्शन करना। तो गुरु ने कहा कि अरे वो तो महावत भी तो नारायण है। उसने जब कहा कि रास्ते से हट जाइए तू हटा क्या? महावत नारायण की बात क्यों नहीं सुनी? क्यों हाथी नारायण की बात सुन रहा है? या तो हरि नारायण के रास्ते में खड़ा है। सो क्या है कि आत्मरक्षा तो करनी ही है। हाईएस्ट लेवल पर जब हम पहुंच जाते हैं तब आत्मरक्षा का कोई प्रश्न नहीं आता। किंतु जब तक हम सामान्य लेवल पर है आत्मरक्षा तो करनी ही है। तो जो भी है यहां पे ठाकुर कहते हैं यदि इस तरह की स्त्रियां थिएटर में अभिनय करती है तो मैं उनको मां आनंदमई के रूप में देखूंगा। फिर कहते हैं वे लोग चैतन्य देव का साज सजे हैं तो क्या है? चैतन्य देव के पात्र का अभिनय कर रहे हैं तो क्या है? यह जो नकली जो फल होता है ना नकली सीताफल उसको देखकर के असली सीताफल का उद्दीपन होता है। यह पता है बहुत सारे घर में आजकल तो अभी ऐसा नहीं होता। पहले मैंने देखा था यह मोम के बने हुए फल रहते थे। एक डाइनिंग टेबल है। डाइनिंग टेबल में ग्लास का एक प्लेट जैसा रखा है। और उसमें ये मोम के बने हुए फल जो है वो वहां पर रखे हैं। आप जैसे ही आप डाइनिंग टेबल देखेंगे और देखेंगे उसके सेंटर में ही यह क्रिस्टल का यह प्लेट है और उसके ऊपर में इतने सुंदर फल चकमकित हो रहे हैं और माने इस तरह के फल आप बाजार में मिलना मुश्किल है तो आप बड़े खुश हो जाएंगे। तो क्या है एक एपेटाइजर के रूप में या डेकोरेशन के रूप में वो कोर्क होता है कि ये जो वैक्स होता है इसके यह डुप्लीकेट फल बना करके बड़े ही सुंदर रूप से कलर फलर करके डाइनिंग टेबल में रखे जाते थे। जैसे ये नकली फूल होता है ना मैंने कहा था ना कि एक एक लड़के ने मुझे कहा था ये फूल के बारे में फूल इतने सुंदर है कि एग्जजेक्टली वो जो प्लास्टिक की तरह दिखते हैं। तो मैं अभी ये अपना वो जज करने का क्राइटेरिया भी रिवर्स हो गया है। प्लास्टिक के फूल इतने सुंदर है कि ओरिजिनल की तरह दिखते हैं। ऐसा नहीं। ये ओरिजिनल फूल इतने सुंदर है कि एग्जैक्ट प्लास्टिक के जैसे दिखते हैं। तो देखिए ठाकुर यहां पे कहते हैं कि वो जो नकली फल होते हैं सीताफल होता है उसको देखकर के असली सीताफल की उद्दीपना होती है। उसको देखकर के मुंह में पानी आ जाता है। नकली को देखकर के एपेटाइजर का काम करता है। आज की लैंग्वेज में कहे तो तो वैसे ही यह भले ही चाहे इस तरह की स्त्रियां चैतन्य देव का चरित्र का अभिनय कर रही है किंतु नकली चैतन्य देव को भी देखकर के असली चैतन्य देव का उद्दीपन होगा। फिर कहते हैं एक

बबूल के पेड़ में श्यामसुंदर का स्मरण — भाव में डूबा भक्त

भक्त रस्ते में जा रहा था। देखा कि बबूल का पेड़ है। उसको देखकर के यह भक्त भावाविष्ट हो गया। क्यों? देखिए ये एसोसिएशन कैसे काम करता है। ये यहां पे कहते हैं ना अपने शरद महाराज कि जगत में सब कुछ को ईश्वर के साथ में संबंध युक्त करके देखना है। सब कुछ को ईश्वर के साथ में एसोसिएट कर देना है। तो एक भक्त है रास्ते में जा रहा है। बबूल का पेड़ है। अभी बबूल के पेड़ की लकड़ी जो होती है थोड़ी स्ट्रांग मानी जाती है। तो यह क्या सोचता है? इस पेड़ की मैं लकड़ी बनाऊंगा। इस लकड़ी को मैं कोदाल के साथ में जोडूंगा। यह कोदाल जो होता है ना मिट्टी को काटने के लिए कोदाल बनाते हैं। उसका जो यह हैंडल जो होता है लकड़ी का तो यह बबूल की पेड़ की लकड़ी का हैंडल बना करके इस तरह की कोदाल के साथ में मैं संयुक्त करूंगा और फिर श्याम सुंदर के बागान में इस कोदाल से मिट्टी को खोद के सुंदर बगीचा बनाऊंगा। यह बगीचा बन सकता है। किस तरह से उसके माइंड में एसोसिएशन चलता है? तो यह सोच कर के यह भक्त भाव विहवल हो गया। भाव में चला गया। ईश्वर का उद्दीपन हो गया। देखिए यह कहानी जब सुनते हैं तो ठाकुर की वो दूसरी कहानी याद आ जाती है। हृदय एक बछड़े को लेकर के गाय का जो बछड़ा होता है उसको लेकर के बुल जिसको कहते हैं बेल। बेल को बेल का बछड़ा लेकर के ठाकुर के पास में आया। ठाकुर ने कहा ये बछड़े का क्या करोगे? तो हृदय कहता है बछड़े को मैं सिहोड़ ले जाऊंगा। उसका गांव वहां पे ये बछड़ा बड़ा होगा और फिर बड़ा जब होगा खेत में यह लंगल लांगल टानबे यानी कि खेत जोतेगा वो जो हल लगता है ना हल से कैसे ये जो ये होता है बुल या तो फिर ये बेल बेल की पीठ पे हल जोत देते हैं। हल लगा देते हैं। फिर हल से यह खेत जोता जाता है। तो हृदय कहता है बड़ा होगा तो यह खेत में हल जलाएगा। तो ठाकुर कहते हैं कि मैं चक्कर आकर के गिर गया कि क्यों इतना लंबा सांसारिक थिंकिंग करता है। तो ये सांसारिक लोग जो होते हैं उन लोगों का सब कुछ इस तरह से संसार के साथ में एसोसिएट करके देखते हैं और यह सुनकर के ठाकुर को चक्कर आ जाते हैं। ठाकुर गिर जाते हैं। यहां पे इसी तरह का लंबा लॉजिक जिस तरह से वो एक लंबा कॉम्प्लिकेटेड लॉजिक था। तो यह एक लंबा कॉम्प्लिकेटेड लॉजिक है। बबूल का पेड़ है। उसकी लकड़ी निकालेंगे। काट करके फिर उसमें से कोदाल का हैंडल बनाएंगे। फिर यह कोदाल जो है श्याम सुंदर के बागान में ले जाएंगे। भगवान के बागान में वहां पे बागान में मिट्टी काटेंगे। सुंदर गार्डन बनाएंगे। फल पौधे लगाएंगे और इसके लिए यह बबूल का गाछ है। पेड़ है तो उसको समाधि हो गई। या तो भाव विवल हो गया। देखिए कि यहां पे है सांसारिक एसोसिएशन जो सांसारिक आदमी है उसकी भी इसी तरह की कैलकुलेटिंग बुद्धि होती है कि इस चीज में से मैं कैसे कोई ना कोई बेनिफिट निकाल पाऊं। यहां पे है एक साधक है। साधक की सब समय एक साधना के साथ में उसका थिंकिंग चलता रहता है कि किस तरह से कौन सी चीज को मैं ईश्वर के साथ में एसोसिएट करके देखूं। तो यह कुछ कहानियां और भी कुछ कहानियां है जो कि अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: ठाकुर भाव में मदहोश हैं, फिर भी उन्हें इस बात का पूरा होश है कि लोग क्या कहेंगे; इसलिए वे किसी को अपना हाथ पकड़ने नहीं देते। उनमें दिव्यता और व्यावहारिक समझ—दोनों का अद्भुत संगम है।

ठाकुर कहते हैं ना मैं ईश्वर का दर्शन हुआ नहीं बोलकर के मिट्टी में गिर करके अपना मुंह मिट्टी में घिसता था। तो अब देखिए कि जो आदमी मिट्टी में गिर के अपना मुंह मिट्टी में घिस सकता है, रगड़ सकता है वो किस हद तक ईश्वर के भाव में आविष्ट होगा। तो ठाकुर कहते हैं कि सब लोग देखने के लिए मुझे वो खड़े इकट्ठा हो जाते थे और आपस में बातें करते उसके पेट में शूल वेदना हो रही है। इसलिए ऐसा कर रहा है। ऑन वन हैंड ठाकुर मां के लिए रो भी रहा है। मिट्टी में मुंह भी रगड़ रहा है। एट द सेम टाइम वो सुन पा रहा है कि लोग वो इस तरह की बातें कर रहा है। किंतु यहां पे देखिए कि आप जो कहते हैं ना कि प्रैक्टिकल सेंस दैट इज समथिंग डिफरेंट और यह जो है कि ईश्वर के भाव में इतने आवेश हो जाना एट द सेम टाइम टू बी अवेयर ऑफ व्हाट इज हैपनिंग अराउंड दैट इज अ डिफरेंट कांसेप्ट मुझे ऐसा लग रहा है क्योंकि यहां पे क्या है कि ठाकुर चाहे कितने भी भाव में आ जाते लोक लज्जा है मां का खुद का जीवन आप देखिए कि कहां वो भाव में सब तुरानंद जी कहते हैं ना कि कंठ देश से मां का मन नीचे ही नहीं आता था। विशुद्ध चक्र विशुद्ध चक्र से मां का मन नीचे ही नहीं आता था। तो इतना उच्च भाव में रहकर के भी वो मां संसार में लोग क्या कह रहे हैं? कौन क्या कह रहा है? सब एक एक ये क्या कहेंगे घड़ते ऐसे भांगते नहीं कि एक जो कन्वेंशन होता है उसको फॉलो किए हैं इन लोगों ने। राइट? सो वो अवेयरनेस कि लोग क्या कहते हैं वो दैट इज ऑलवेज देयर इवन दो कि वो लोग ठाकुर का पैता यानी कि जनोई निकाल कर के ध्यान करते हैं तो हृदय ने देख लिया तो आकर के ठाकुर से झगड़ रहा है कि कितने जन्मों के बाद में ब्राह्मण देह प्राप्त होता है। तुम और जो कि हो कि जनोई फेंक करके ध्यान करते हो तो ठाकुर कहते ऐसे अष्टपाश से मुक्त होकर के ध्यान करना है। एट द सेम टाइम ठाकुर जाहिर में यह सब करने को नहीं जाते थे। एस फार एस पॉसिबल ये सब सीक्रेट ही रहता था उनका। अब जब एकदम हाथ से बाहर चली जाए बात और वहां पे जैसे वो शिव मंदिर के सामने खड़े रह के शिव महिमन स्तोत्र वो कर रहे हैं कर रहे हैं। आंखों में से अश्रुधारा बह रही है। सब लोग इकट्ठा हो गए। फिर मथुर बाबू खुद आकर के तलवार लेकर खड़े हो गए कि कोई ठाकुर को डिस्टर्ब करेगा तो उसका मैं सर काट दूंगा। तो वो ठाकुर कहते हैं कि भावावेश में आ जाकर के मैं किसी के कंधे पे किसी की छाती पर मैं पैर रख देता हूं। बाद में किंतु मुझे लज्जा होती है कि मैंने ऐसा क्यों किया। सो भावावेश में आने के बावजूद एट वन पार्ट ऑफ ह ब्रेन इज अवेयर कि चारों ओर क्या हो रहा है। सो दैट इज समथिंग यूनिक। मैंने इट्स अ स्टडी इन कॉन्शियसनेस कि कॉन्शियसनेस इतनी कॉम्प्लेक्स है कि यू कैन नेवर रिड्यूस इट टू समथिंग कि वन ट्रैक कॉन्शियसनेस हो ही नहीं सकती कि मैं यह करता हूं तो आई एम कंप्लीटली अब्सॉर्ब इन दैट योर कॉम्प्लिकेशंस और कॉम्प्लेक्सिटी ऑफ़ कॉन्शियसनेस विल मेक यू अवेयर ऑफ़ मेनी थिंग्स पैरेलली। सो इट्स अ इंटरेस्टिंग स्टडी इन कॉन्शियसनेस। अह आपने जो कहा कि बी प्रैक्टिकल दैट इज़ समथिंग ऑन अ फिलॉसोफिकल लेवल कि आपको हाईएस्ट लेवल ऑफ़ स्पिरिचुअलिटी में भी जाना है। एट द सेम टाइम यू शुड बी प्रैक्टिकल।

प्रश्न: ठाकुर की तरह, जिसे हम बुरा मानते हैं, उसमें दिव्यता कैसे देखें? कभी-कभी हमें लगता है कि ऐसी शिक्षाएँ दैनिक जीवन में अव्यावहारिक हैं।

देखिए ये सबको ना हमको पहले तो एक कॉन्टेक्स्ट में रखते हैं कि कॉन्टेक्स्ट क्या है? कॉन्टेक्स्ट ऐसा है कि व्हाट इज द प्राइस एट द एंड ऑफ दिस साधना? दैट इज ब्रह्म ज्ञान। राइट? व्हिच इज़ द हाईएस्ट ऑफ़ ऑल प्राइसेस इन द वर्ल्ड। तो, अब जैसे देखिए कि जो लोग आईआईटी जी है, वह क्रैक करते हैं। इट्स वेरी डिफिकल्ट एग्जाम टू क्रैक। किंतु बाय सीइंग द प्राइस एट द एंड ऑफ दिस होल एंडेवर वे लोग अटेमप्ट करते हैं। अब कोई-कोई सुसाइड भी कर लेता है। ये कोटा फैक्ट्री का तो हमने सब सुना ही है वहां पे। तो बट व्हाट इज द प्राइस? कीपिंग द प्राइस इन फ्रंट ऑफ अस मेनी पीपल अटेमप्ट। सो दैट इज वन थिंग कि टू पुट द होल थिंग इनू ए कॉन्टेक्स्ट। दूसरा है कि देखिए यह तो मध्यम मार्ग है। फिर भी भगवान बुद्ध का चरित्र पाठ करने से हमको पता चलेगा कि क्या तपस्या उन्होंने नहीं की। माने एक बार खाना दिन में अल्प आहार करना। कभी-कभी आहार ही नहीं करना और फिर जो प्रचंड तपस्या करना ठाकुर के खुद के जीवन की जो तपस्या है वेदांत साधना शक्ति साधना यह जो भाव साधनाएं एक के बाद एक यानी कि यदि ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करना है तो रास्ता जो है भयानक रास्ता है। बहुत ही अल्प लोग एलिजिबल होते हैं उस रास्ते पर चलने के लिए। तो क्या है कि इन लोगों ने अपने हृदय में करुणा भर के हमारे लिए एक मध्यम रास्ता दिखाया। भगवान बुद्ध का जो मध्यम मार्ग है कि यह करुणा जो है कंपैजन इस मध्यम मार्ग का एक इंपॉर्टेंट एस्पेक्ट है। ठाकुर का भी देखिए कि स्वामी जी ने शिव ज्ञान जीव सेवा वो तो चलो एक थोड़ा सा एब्स्ट्रैक्ट कांसेप्ट हो जाता है। किंतु मां का जीवन देखिए कि सब तरह के पगलों के साथ में मां ने काम किया है। इस मच मोर प्रैक्टिकल एस्पेक्ट ऑफ शिव ज्ञान जीव सेवा। तो ये कंपैजन करुणा दूसरों के प्रति ये सहृदयता एट एनी कॉस्ट जो कि हमको मेंटेन करनी है वि इज बेसिकली अ सिंपलर वे टुवर्ड्स ब्रह्मज्ञान। सो फर्स्ट ऑफ ऑल दिस कॉन्टेक्स्ट इज क्लियर कि एक्चुअली ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना है तो उसके लिए तो प्रचंड साधना करनी होती है। यह जो सह हृदयता रखना सर्वभूत में नारायण दर्शन करना एक्चुअली दिस इज़ अ इज़ियर पाथ। सो लेट अस हैव दिस क्लेरिटी इन आवर माइंड। और ऑब्वियसली है कि इज़ियर पाथ बोल के इतना भी तो इजी नहीं कि जो कि हम आसानी से कर पाए। राइट? लुकिंग एट द प्राइस इजी तो कुछ होने वाला नहीं इस रास्ते पे। सो दैट इज वन थिंग। डॉक्टर होना है तो आप कितना ही अच्छे से अच्छा टीचर पकड़ लीजिए। आप थोड़ा तो मेहनत करना ही पड़ेगा। बिना मेहनत के तो डॉक्टर होने वाले नहीं है। यदि आपको एम्स में एडमिशन लेना है तो प्रचंड तपस्या करनी है। किंतु इवन आपकी यह जो ये जो पेड जो सब होती है ना वो जो सेल्फ फाइनेंस उसमें भी मेहनत तो करना ही पड़ेगा डॉक्टर होना है। सो दैट इज दैट क्लेरिटी के साथ में और यू आर राइट कि दिस इज डिफिकल्ट। देखिए मेरा जो खुद का अनुभव मैं आपको बता रहा हूं कि यह सेल्फ रिफ्लेक्शन करना है हमको कि यदि मेरे हृदय में उसके प्रति करुणा नहीं है तो मेरा सब कुछ खत्म हो जाएगा। आध्यात्मिक जीवन में वैसे ही तपस्या करने का कोई कोई कैपेसिटी नहीं। जब हम ठाकुर मां स्वामी जी को पढ़ते हैं और उनको छोड़ दीजिए। के बाद बात की ये जो वीरानंद जी फिर ये बाकी की जनरेशन को हम देखेंगे विशुद्धानंद जी वगैरह तो उनके जितना भी कैपेसिटी अपना नहीं है। सो व्हाटएवर लिटल हम लोग कर रहे हैं उसमें ये एक पॉसिबल है। असंभव सा नहीं है। दैट इज वन मोस्टेंट थिंग। बाकी की चीजें तो बिल्कुल असंभव ही है। राइट? जो हम पढ़े हैं तो वो तो असंभव ही है। कंप्लीटली आउट ऑफ आवर रीच। दिस इज़ पॉसिबल। डिफिकल्ट है बट पॉसिबल है। सो रिफ्लेक्शन करना है कि देखिए कि दिस इज एन इज़ियर पाथ। यदि ये इज़ियर पाथ पे भी मैं नहीं चल सकता। सो एंड व्हाट क्वालिफिकेशन डू आई हैव ऑन द पाथ ऑफ साधना। राइट? फिलको मैं बिल्कुल डिसक्वालीफाई हो जाऊंगा। सो इस तरह से अपने मन को समझाना है कि यह तो करना ही करना है। कैसे भी करके एम्स में एडमिशन नहीं मिला। सेल्फ फाइनेंस में जा रहे हैं। अभी यहां पे भी यदि कुछ नहीं कर पाए तो पैसा डूबेगा। जो भी डाला है इसमें। सो दैट देखिए मैं कहूंगा कि जिसके प्रति गुस्सा आ रहा है रेदर देन उसके बारे में सोचने अपने बारे में सोचिए कि मेरे हृदय में गुस्सा प्रकट हो क्यों रहा है? एब्स्ट्रैक्ट थिंकिंग थोड़ा सा अब सामने कोई भी है प्रॉब्लम क्या है ना जैसा हम उसका सोचेंगे ना फट करके फिर से गुस्सा आ जाएगा। लॉ ऑफ एसोसिएशन है ना तो उसके बारे में सोचिए ही मत। दैट वी हैव टू डू कि मेरे हृदय में गुस्सा प्रकट ही क्यों हो रहा है? आई नीड टू रीइंजीियर माय हार्ट कि इट रिएक्शनंस जो है इट शुड बी अंडर माय कंट्रोल। सो थिंक ऑफ योरसेल्फ कि मैंने स्पिरिचुअल लाइफ में जो इन्वेस्टमेंट किया है इफ एट ऑल आई नीड एनी रिटर्न आउट ऑफ दिस देन आई विल हैव टू रीइजीनियर मायसेल्फ। और यह पाथ ऑफ रीइजीनियरिंग है डिफिकल्ट किंतु असंभव नहीं है।

प्रश्न: क्या स्वाध्याय और प्रार्थना जैसी साधनाएँ हमारे मन का द्वेष मिटाकर करुणा जगाती हैं?

50% 50% ओनली 50% 50% आपको एक्चुअल रीइजीनियर करना होगा। माने यह तो एक लॉजिकल कंक्लूजन माने एक थिंकिंग यही है कि जितना सूरज की ओर जाएंगे उतना पृथ्वी से दूर होते जाएंगे। ठाकुर की माने लैंग्वेज में जितना प्रकाश डालेंगे उतना अंधेरा दूर होता जाएगा। व्हिच इज अ लॉजिकल थिंकिंग। तो वह तो है ही है बट अदर देन दैट मेरा जो एक्सपीरियंस जाता है यू विल हैव टू एक्टिवली रीइजीनियर योरसेल्फ यह जो भीतर में जो प्रकट हो रहा है उसके सामने देखना होगा यह जो इंद्रियों को रिवर्स करना होगा हार्ट को एनालाइज करना होगा देखना होगा सोचना होगा समझना होगा कि यह प्रकट हो रहा है एंड आई नीड टू एक्टिवली कट इट ऑफ माने कॉस्ट बेनिफिट एनालिसिस वगैरह जो करते हैं कि अदरवाइज यदि मैं यह नहीं करूंगा तो प्रॉब्लम क्या होगा ना कि साधना का मार्ग जो है ना बड़ा लंबा मार्ग है। आई नीड टू सम हाउ एक्सलरेट इट। सो इफ आई कैन डू दिस देन माय पाथ विल बी एक फास्टर माने शॉर्टर।

प्रश्न: आप सही कह रहे हैं। मैंने भी कई लोगों को देखा है जो बहुत भक्तिभाव वाले दिखते हैं, लेकिन साथ ही बहुत भ्रष्ट भी होते हैं। इसलिए हमें वास्तव में अपने आप को re-engineer “पुनर्निर्मित” करने की आवश्यकता है।

किंतु यहां पे मैं एक डिस्टिंशन ड्रॉ करूंगा। आप जो कह रहे हैं दैट इज़ एथिक्स इज़ अ मैटर ऑफ़ एथिक्स। दैट इज़ समथिंग डिफरेंट। ऑफ़ कोर्स एट द एंड ऑफ़ दैट एवरीथिंग इज़ कनेक्टेड। बट व्हाट हियर वी आर स्पेसिफिकली टॉकिंग अबाउट इज कंपैशन। सो इवन अनएथिकल लोगों में देखेंगे कि भिखारी सामने आ गया तो फटा करके रुपया निकाल दिया या फटा करके दान दक्षिणा दे दिया। नजर के सामने कुछ ऐसा आने से ही वे लोग कर देंगे। एब्स्ट्रैक्ट थिंकिंग नहीं कर पाते ये लोग। ये लॉजिकल माने उनका लाइफ इलॉजिकल है। ये बात समझ नहीं पाते कि ग्रीड इतना स्ट्रांग है कि एक ओर दान भी कर रहे हैं। दूसरी ओर भ्रष्टाचार भी कर रहा है। यदि आप भ्रष्टाचार नहीं करेंगे तो दान करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। ये लॉजिक नहीं फिट बैठ रहा है। बट हियर स्पेसिफिकली वी आर टॉकिंग अबाउट कंपैजन एंड इफ यू वांट टू डेवलप कंपैशन यू विल हैव टू एक्टिवली रिफ्लेक्ट अपॉन योरसेल्फ कि हां कि मेरे मन में विद्वेष प्रगटित हो रहा है एंड आई नीड टू कट इट ऑफ अदरवाइज स्पिरिचुअल लाइफ में मैं ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाऊंगा आप दोनों हां माने एक और साधना है जो कि जब अब गुरु ने मंत्र दिया तो मंत्र जप कर रहे हैं मंदिर में व्हाटएवर हम लोग कर रहे हैं सो दैट इज वन थिंग एट द सेम टाइम ये कंपैजन जो है यानी कि विद्वेष भाव यदि मान लीजिए चलो कंपैजन के लेवल तक भी ना जाए एटलीस्ट विद्वेष भाव को हृदय में से हटाना है। देखिए दूसरों के साथ में अपना रिलेशन है ना एक समय था कि मैं सोचता था कि इसका कोईेंस नहीं है। आध्यात्मिक जगत में आप योग प्रैक्टिस कीजिए, प्राणायाम प्रैक्टिस कीजिए, ध्यान प्रैक्टिस कीजिए। दैट इज अ मेन थिंग। यह लोगों के साथ में अपना रिलेशन कैसा है? क्या है? व्हाट डस दैट मैटर? किंतु ओवर अ लॉन्ग पीरियड ऑफ़ टाइम ठाकुर मां स्वामी जी को स्टडी करके भी और मेरे खुद के जीवन से भी मैंने यह अनुभव किया है कि दूसरों के साथ में अपना जो रिलेशन है दैट प्लेस अ एक्सट्रीमलीेंट पार्ट। ये जो अपना फ्रेमवर्क है स्पिरिचुअलिटी, कम्युनिटी लाइफ एंड सिविलाइजेशन वो तीनों अपनी लाइफ में स्पिरिचुअल लाइफ को इफेक्ट करता है। वी कैन नॉट जस्ट कट ऑफ दिस सिविलाइजेशनल एंड कम्युनिटी एस्पेक्ट आउट ऑफ द स्पिरिचुअलिटी। क्योंकि हम लोग ठाकुर की तरह नेति नेति मार्ग पर चलने को हमारा एलिजिबिलिटी ही नहीं है कि जगत को भूल गए माने रोते-रोते मिट्टी में जमीन पर गिर करके मिट्टी में मुंह हमने अपना ये कर रहे हो घिस रहे हो वो कैपेसिटी अपना नहीं है। ठाकुर ने कहा ना कि लोगों को पता चलने दो कि यह ईश्वर के आवेश में आकर के पागल हो गया है। तुम कीर्तन करो रो-रो कर के ठाकुर को ईश्वर को पुकारो। किंतु देखिए यह इतना सहज उपाय कौन कर सकता है? किसको देखा आपने कि रो-रो करके चीखते चिल्लाते ईश्वर को पुकारे क्योंकि यह लोक लज्जा इतनी भीतर में स्ट्रांग है। राइट? अभी देखिए दिस इज़ विद इन अ रियल्मो पॉसिबल। जो इंपॉसिबल है वो साधना तो आप छोड़ ही दीजिए। तंत्र साधना ठाकुर ने की। एक स्त्री के गोद में जाके बैठे और वहां पे जाके मंत्र जप कर रहे। फॉर अस दिस इज़ विद इन द रियल्म ऑफ़ इंपॉसिबल। भूल ही जाइए। वो करने का अपना कैपेसिटी ही नहीं है। बट व्हाट इज विद इन द पॉसिबल रो-रो करके ईश्वर को पुकारना वो हम लोक लज्जा से नहीं करते हैं। सो माने जो इंपॉसिबल है वो कर नहीं सकते हैं। जो पॉसिबल है करना नहीं चाहते हैं। तो फिर रह क्या गया है? राइट? सो ये जो विद्वेष ना खड़ा हो लोगों के साथ में यह जो अपना रिलेशनशिप का यह एक एस्पेक्ट है इट नीड्स टू बी वेरी केयरफुली इंजीनियर्ड।

प्रश्न: करुणा हमारी आध्यात्मिक प्रगति का मापदंड है। इसके बिना लोग काफी क्रूर हो जाते हैं।

देखिए ऐसा करके यदि ईश्वर की ओर आगे बढ़ते हैं तो इट इज वेल वर्थ इट। यहां पे माया मिली ना राम ऐसा हो जाता है ना। अब जैसे रमण महर्षि ऐसा बोले कि जगत के साथ में कोई लेना देना नहीं तो वो उनको जजता है। अपने जैसा कोई बोले जगत के साथ में लेना देना नहीं तो ना ही भगवान मिले ना ही जगत में किसी के साथ अच्छा हुआ।

प्रश्न: जगत रमण महर्षि को भी नहीं छोड़ता। मैंने कहीं सुना था कि रमण महर्षि ने पास की एक किराने की दुकान से उधार लिया हुआ था! उनको भी उसकी चिंता थी!

अब ठाकुर जैसे ठाकुर सेल्फ कॉन्शियस है कि मेरा हाथ मत पकड़ो। लोग बोलेंगे शराबी है।

प्रश्न: मुझे ज्ञान का अपच हो गया था, लेकिन अब मैंने करुणा का महत्व समझ लिया है।

और दूसरा देखिए हम यहां पे स्वामी जी को नहीं पढ़ रहे हैं। माने स्वामी जी मारका मारा ही इज़ अ म ही इज़ अ स्टैंडर्ड पर्सन फॉर दिस कंपैजन एंड एवरीथिंग। राइट? हम लोग तो स्टडी कर रहे हैं वन ऑफ द मोस्ट ऑर्थोडॉक टेक्स्ट इन आवर लिटरेचर रामकृष्ण लीला प्रसंग वि इज डेडिकेटेड सोलली टू स्पिरिचुअलिटी एंड टू नथिंग एल्स और वो भी हम जो चैप्टर स्टडी कर रहे हैं दैट इज अबाउट ठाकुर साधना राइट इसमें जब ये लिखा है स्वामी जी जो ये राजस्थान में जाके ये सब बोले कि अरे भाई इतना गरीबी है चलो लोगों को हेल्प करो दैट इज वन थिंग ये तो दक्षिणेश्वर में ठाकुर के साधना के दिनों का वर्णन है उसमें ऐसा लिखा है हां हां यस यस यस मेरे अवगुण चित्त ना धरो

प्रश्न: मैंने कहीं पढ़ा था कि जिस गायिका ने स्वामीजी के सामने “मेरे अवगुण चित्त न धरो” गाया था, उसका जीवन पूरी तरह बदल गया। उसने गाना छोड़ दिया और एक छोटी-सी कुटिया में एक संन्यासिनी की तरह रहने लगी, और अब केवल भगवान के लिए ही गाती थी।

अरे स्वामी जी अमेरिका में ऐसा कहते हैं वो कि एक यंग लड़की मेरे पास में आई थी तो कृष्ण की बात सुनकर के उसने सब त्याग कर दिया एक आइलैंड पे जाकर के रहने लगी पूरा जीवन कृष्णा आराधना में उसने बिताया एक अमेरिकन लड़की के बारे में स्वामी जी कह रहे हैं तो इफ के अमेरिकन लड़कियों के ऊपर में यदि यह इफेक्ट हो सकता है स्वामी जी का तो ये तो फिर भी इंडियन है। ओ दैट इज सरप्राइजिंग। मुझे नहीं पता था। देखिए यदि मिले थे। ओम