prayer
ओम स्थापकााय यज धर्मस्य सर्वधर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा लिखित जिस अध्याय का हम पाठ कर रहे हैं उस अध्याय का नाम है पहले तो हमको पता है कि लीला प्रसंग पांच पांच खंड में विभक्त है। उसमें से सबसे पहले खंड में ठाकुर की बाल्य जीवन का वर्णन है। द्वितीय खंड में ठाकुर ने दक्षिणेश्वर आकर के जो साधना की साधना में सिद्धि प्राप्त की उसका पूरा वर्णन है। यह पीरियड ऑलमोस्ट साधक भाव जो पीरियड है ऑलमोस्ट 1854 से लेकर के 1868 तक का चला है। मां की शोडशी पूजा तक 1870 टू 1873 तक का यह पीरियड है। इसके बाद का तृतीय खंड है ठाकुर का गुरु भाव। तो यह वह गुरु भाव वह अध्याय जो कि ठाकुर की सिद्धि प्राप्त करने से पहले के या तो फिर यहां के इसके आगे के हैं शोडशी पूजा के पहले के जो ठाकुर के गुरु भाव का जो वर्णन है उसका है। उसके बाद में चतुर्थ अध्याय है ठाकुर का गुरु भाव जो कि शोडशी पूजा के बाद का सब प्रसंग है और फिर गुरु भाव और नरेंद्रनाथ नरेंद्र के आने के बाद में भविष्य के स्वामी विवेकानंद के साथ में जो सब घटनाएं हुई ठाकुर ने किस तरह से अपने अंतरंग शिष्यों को इकट्ठा किया किस तरह से संघ का गठन किया यह सब आप देखेंगे कि उसमें वह सब उसमें आता है तो यह है एक ओवरऑल आउटलाइन। इसमें से हम जो पाठ कर रहे हैं वो है साधक भाव द्वितीय खंड। उसमें भी जो अवतरणी का है अर्थात कि इंट्रोडक्शन है
अवतारों की साधना का विशद विवरण लिखा हुआ नहीं मिलता है
वो। और इस इंट्रोडक्शन में भी देखिए कि हम जिस पॉइंट के बारे में डिस्कस कर रहे थे। अभी तक जो हम पॉइंट डिस्कस कर चुके हैं उसमें सर्वप्रथम तो था कि शरद महाराज कहते हैं कि बहुत कम अवतार पुरुषों का साधक भाव अर्थात कि किस तरह की साधना करके इन्होंने ईश्वर प्राप्ति की है। वह लिपिबद्ध है और यदि लिपिबद्ध है तो विस्तृत रूप से नहीं है तो फिर पहले तो यह ऑब्जरवेशन शरद महाराज ने किया। उसके बाद में शरद महाराज हमको उत्तर देते हैं कि क्या उनका खुद का क्या अनुमान है कि इस तरह के साधकों का या तो फिर अवतारों का जो उन्होंने साधना की उसका वर्णन क्यों लिपिबद्ध नहीं है क्यों रिटन डाउन नहीं है तो यह पहले तो है कि हिस्टोरिकल रिकॉर्ड का अभी आज जिस तरह से रिकॉर्ड प्रिजर्व होते हैं जिस तरह से ट्रांसमिट होते हैं इंफॉर्मेशन तो वो एक बहुत बड़ा पार्ट एक प्ले करता है कि हां हमने यह सब रिकॉर्ड जैसे फोटोग्राफ है अभी फोटोग्राफ जिस तरह से प्रिजर्व हुए हैं जिस तरह से मास्टर महाशय की डायरी है जिस तरह से यह ब्राह्म समाज के पत्र पत्रिकाएं हैं जितने ब्राह्म समाजी ठाकुर के पास में जाते थे तो वह सब वो ठाकुर के बारे में ठाकुर के साथ में जो वार्तालाप हुए वो अपनी पत्र पत्रिकाओं में लिखते हैं। एक बड़ा ही इंटरेस्टिंग इंसिडेंट है कि एक ब्राह्म समाजी भक्त ठाकुर को देख ठाकुर का दर्शन करने के लिए गया। फिर वह आकर के यह लोग पत्र उनके जो न्यूज़ पेपर वगैरह होते थे मैगजीन उसमें लिखते थे कुछ ना कुछ तो मटेरियल चाहिए लिखने के लिए तो दक्षिणेश्वर के परमहंस है वो हॉट मटेरियल है यानी कि उनके बारे में लिखने से वो सब वायरल हो जाता है आज की लैंग्वेज में तो यह भक्त गए ठाकुर के साथ में वार्तालाप किया फिर आकर के कहीं पर लिखा कि देखिए हमने बड़ा अच्छा लगा उनके साथ में बात करके और एक चीज अभी भी जैसे मेरे मन में है कि भक्त भगवान के भक्त और भगवान का क्या रिलेशन है? कितना प्रगाढ़ एक प्रेम और भक्ति भलोभासा या तो फिर यह बालक भाव या तो फिर यह मातृभाव यह किस तरह से भक्त और भगवान का यह रिलेशन होना चाहिए। तो ठाकुर ने हमको उदाहरण देकर के कहा कि ठाकुर खुद कहते हैं कि जैसे कि एक बिल्ली का बच्चा छोटा सा बच्चा अपनी मां की गोद में एक बिल्ली बिल्ली वो मां की गोद में जैसे कि जिस तरह से वह छुप जाता है। जिस तरह से बिल्ली अपने बच्चे को एकदम अपने दोनों हाथों में आवरुष्ट करके उसको कैसे आलिंगन दृढ़ आलिंगन बद्ध करती है। तो वैसे ही ठाकुर कहते हैं कि बिल्ली के बच्चे की तरह मैं भी अपने जैसे कि जगन माता की गोद में एक छोटा बच्चा होकर के एकदम में छुप जाता था और मैं इमेजिन करता था कि जगन माता स्वयं मुझे दृढ़ आलिंगनबद्ध करके मुझे प्रोटेक्ट कर रही है। मुझे स्नेह कर रही है। और ठाकुर के केस में यह तो इमेजिनेशन नहीं थी। उनको तो यह सब चीजें स्पष्ट दिखती थी। या तो स्पष्ट अनुभव करते थे। तो यह बात कि एक बिल्ली के बच्चे की तरह बिल्ली का बच्चा अपनी मां की गोद में किस तरह से आवृत होकर के किस तरह से एक सेफ्टी और सिक्योरिटी के भीतर में वह रहता है। मां अपने बच्चे को किस तरह से अपने आलिंगनबद्ध करके रखती है। बिल्ली अपने बच्चे को जिस तरह से वैसे ही हमको इमेजिन करना है कि मेरे और मेरे इष्ट के बीच में एक संतान और पिता या तो संतान और माता का संबंध है। जिस तरह से एक छोटा बच्चा अपनी मां की गोद में खेलता है। जिस तरह से छोटा बच्चा अपनी मां के पास में इतना सेफ और सिक्योर और लव्ड फील करता है। वही हमको ईश्वर के साथ में करना है। तो यह कितना सुंदर रिलेशनशिप यहां पे ठाकुर ने कहा है। और अह इसी का एक सूत्र है। अमेरिका में जब स्वामी जी प्रवचन दे रहे थे। मुझे पता नहीं कि अभी यह बात स्वामी जी ने कहां से उठाई। किंतु जिस तरह से ठाकुर ने उदाहरण दिया है। लगता है कि स्वामी जी जो अमेरिका में जो बात करते हैं ठाकुर के उदाहरण के अनुसार ही करते होंगे। ठाकुर स्वामी जी कहते हैं कि जीवन में प्रत्येक चीजों में हमको डिविनिटी या तो फिर दिव्यता का दर्शन करना है। वो किस तरह से? तो जैसे कि आप रास्ते में जाते हैं आप देखते हैं कि एक बिल्ली का बच्चा अपनी मां की गोद में बैठा हुआ है। या तो फिर एक मां बिल्ली अपने बच्चे को जिस तरह से स्नेह और प्रेम कर रही है। स्वामी जी कहते हैं वहां पर आप थोड़ी क्षण के लिए ठहर जाइए। और यह जो मां और बच्चे का प्रेम है उसमें आप दिव्यता का दर्शन कीजिए। तो यह जब सेंटेंस मैंने पहली बार पढ़ा था स्वामी जी का को लेक्चर में तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि स्वामी जी इस तरह का उदाहरण क्यों देते हैं? एक बिल्ली का बच्चा और एक मां उन दोनों के बीच में जो स्नेह है वह तो है। ठीक है। उसमें डिवाइन क्या है? किंतु फिर जब मैंने इस बात के साथ में ठाकुर की इस बात का संबंध बिठाया तब पता चला कि देखिए कि स्वामी जी बहुत सारे स्टेटमेंट ऐसे देते हैं जिसको कि यू कैन क्लियरली ट्रेस इट बैक टू ठाकुर। ठाकुर ने जो कहा है उसी में से जैसे कि स्वामी जी यह सब सेंटेंस बना रहे हो ऐसा लगता है। तो यह जो है मां और तो बेसिकली जो हम कहना चाहते थे कि अवतार पूर्व अवतारों का साधक भाव या तो फिर उनकी तपस्या उनकी जो कठिनता है योग पद्धतियां जो कि उन्होंने जिसका पालन करके सिद्धि प्राप्त की उसका वर्णन नहीं मिलता। तो एक तो यह रीजन हो सकता है कि इंफॉर्मेशन उस समय ट्रांसमिट करना, प्रिजर्व करना इतना थोड़ा सा कठिन था कंपेयर टू टुडे। और
साधक अपने इष्ट को अपूर्ण नहीं देखना चाहता
दूसरा है कि साधक अपने इष्ट को अपूर्ण देखना नहीं चाहता। और फिर इसके बाद में जो दूसरा पॉइंट शरद महाराज लिखते हैं, कहते हैं कि साधक अपने इष्ट को क्यों अपूर्ण नहीं देखना चाहता? क्योंकि उसको लगता है कि यदि अपने इष्ट में अपूर्णता का दर्शन करेगा तो उसकी भक्ति को हानि होगी। उसको लगेगा कि मैं यह किन की पूजा कर रहा हूं जो कि खुद इस तरह की अपूर्णताओं से इस तरह की त्रुटियों से इस तरह के वो सब डेफिशिएंसी से भरे हुए हैं। मैं क्यों इनकी पूजा करूं यह बात भक्त में के मन में आएगी। यह बात एंटीिसिपेट करके यह अवतार के जो प्रमुख शिष्य गण है वह जब अवतार की बायोग्राफी वगैरह लिखते हैं तब वह अवतार की यह अपूर्णताओं को या तो फिर त्रुटियों को वो उसको कंप्लीटली नजरअंदाज कर देते हैं, प्रोजेक्ट नहीं करते और साथ-साथ में नहीं यह प्रोजेक्ट करना चाहते कि उनके इष्ट कभी अपूर्ण थे और साधना करके पूर्ण हुए हैं। तो यह पूरा एक शरद महाराज ने लिखा है। अभी शरद महाराज आगे कहते हैं कि देखिए कि आप यदि भक्त यह सोचता है कि मैं अपने इष्ट में अपूर्णता का दर्शन करूंगा तो मेरी भक्ति में हानि होगी। यह बात में इतना ज्यादा कुछ दम नहीं है। यह बात युक्ति संगत नहीं है। युक्ति युक्त नहीं है। क्यों? क्योंकि ऐसा लग रहा है कि देखिए कि यदि आप जितना अपने इष्ट के भीतर में मनुष्यत्व का दर्शन करेंगे उतना ही आप खुद साधना करके उनके जैसे होने का प्रयास करेंगे। अदरवाइज क्या होगा कि यदि मेरे इष्ट इतने परफेक्ट है, इतने संपूर्ण है, उनमें 1.01% भी कहीं पर कोई खामी, त्रुटि या अपूर्णता नहीं है, तो मुझे ऐसा लगेगा कि मैं उनके आसपास में कभी भी जा नहीं सकता साधना करके। तो बोलकर के मेरी साधन भजन करने की जो इच्छा है, वही पूरी खत्म हो जाएगी। तो यह सब डिस्कशन हमने यह ऑलरेडी कर चुके हैं और अभी थोड़ा सा आगे में देखते हैं कि आज शरद महाराज क्या कहते
प्रभु के साथ प्रेम का सम्बन्ध रखना है, आत्मीय भाव रखना है
हैं। शरद महाराज कहते हैं कि म उसी के तर्क में आगे कहते हैं कि ठाकुर का कहना है कि देखो तुम यदि अपने ईश्वर को या तो फिर अपने अवतार इष्ट को या तो फिर अपने गुरु को यदि इतना तुम ऐश्वर्यशाली यानी कि यह कहीं त्रिभुवन में बैठे हैं सर्व ऐश्वर्य से घिर करके इतना तुम उनके भीतर में एक डिवाइन पावर यदि देखना चाहोगे सुपर पावर पावर देखना चाहोगे तो होगा क्या कि तुम अपने इष्ट से दूर हो जाओगे। यह अपना अपनीपनी भाव थाकबेना। ठाकुर जो एग्जैक्टली कहते हैं अपना अपनी भाव अर्थात कि यह परस्पर जैसे कि वह मेरा स्वजन है। वह मेरे स्वजन है या वह मेरे अपने हैं। यह जो मेरा अपना होना यह भाव नहीं रहेगा। ऐसा लगेगा कि वह पराए है। जैसे कि एक प्रजा कोई नागरिक होता है। किसी प्रेसिडेंट या प्राइम मिनिस्टर को मिलने को जाता है। तो पहले तो वह जो सब वो सिक्योरिटी गार्ड को देखता है। फिर उसके बाद में इतने सारे जो उसके जो इनर सर्कल वाले जो खड़े होते हैं प्राइम मिनिस्टर के उनको देखता है। तो फिर क्या होता है कि उनके पास में जाते-जाते ऑलरेडी उसके मन में भय लगने लगता है कि प्राइम मिनिस्टर कहां पर रहते हैं। तो एक बहुत बड़े बंगले में रहते हैं। चारों ओर सिक्योरिटी वाले हैं। बंदूक ले खड़े हैं। वह कुत्ते भी होते हैं। बड़े-बड़े डेंजरस। उसके बाद में इतने सारे ब्यूरोक्रेट्स होते हैं। ब्यूरोक्रेट्स को आपको एक के बाद एक अपना आईडी दिखा के भीतर में जाना है। वो बाय दैट टाइम यदि आप किसी प्राइम मिनिस्टर का दर्शन हो आपका। आपके मन में इस तरह का एक भय बैठ जाता है कि अच्छा यह तो इतना बड़ा आदमी है। यदि मैं उनके साथ में एक भी गलत बात करूंगा तो मेरे से नाराज हो जाएंगे। पता नहीं मुझे किस तरह का दंड दे दे। पता नहीं मेरा करियर किस तरह से गड़बड़ कर दे। अभी जैसे कि माने इस तरह का भाव रहता ही है। जिसके पास में आप पावर देखते हैं उनसे आपको डर लगता ही लगता है। आप जैसे कि मान लीजिए आपके घर में अपनी मां के साथ में जिस तरह का वर्तन करते हैं। मां के साथ में कभी भी किसी तरह का भय रखे बिना एक स्नेह और प्रेम का जो रिश्ता बनता है, वह क्या अपने देश के प्राइम मिनिस्टर के साथ में हो सकता है? हां हम प्राइम मिनिस्टर को रिस्पेक्ट करते हैं। किंतु वह जो मां के साथ में आप जिस तरह से बिहेव करेंगे प्राइम मिनिस्टर के साथ में करेंगे। क्या ऐसा हो सकता है? आप अपने घर में जाएंगे मां को कहेंगे अच्छा चलो चाय बना दो मेरे लिए दूध बना दो। आप वो प्राइम मिनिस्टर के बंगलों में जाकर के कहने वाले हैं तुम मेरे लिए चाय बनाओ या ये के खाना बना दो। कभी नहीं कहेंगे। क्यों? क्योंकि उसके पास में पावर है और उसके प्रति अपना रिस्पेक्ट है। रिस्पेक्ट के भीतर में भय भी छुपा हुआ है। जबकि मां अपनी अपनी खुद की है। उसको हम चाहे जिस तरह से उसके साथ में झगड़ा भी कर सकते हैं। उसको प्रेम भी कर सकते हैं। पता है कि उसका मेरे प्रति जो प्रेम है वह कभी कम नहीं होने वाला है। तो ठाकुर यहां पर कहते हैं कि देखिए ईश्वर के भीतर में ऐश्वर्य देखना या तो ईश्वर के भीतर में यह डिवाइन पावर देखना इसकी यदि आप देखना चाहेंगे तो आपके और ईश्वर के बीच में एक दरार आकर के खड़ी हो जाएगी। एक सेपरेशन आकर के खड़ा हो जाएगा। इसके बाद में क्या होगा? आप भगवान से कुछ मांगेंगे। किंतु आप भगवान को प्रेम नहीं करेंगे। प्रेम के लिए प्रेम लव फॉर द सेक ऑफ द लव। वो नहीं होगा। आप जैसे अब अब मुझे ईश्वर ऐश्वर्य क्यों देखना है? सबसे पहली बात है मैं किसी के पास में सुपर पावर क्यों देखना चाहता हूं? अभी जैसे देखिए कि मां के साथ में मेरा जो रिश्ता है प्राइम मिनिस्टर के साथ में उस तरह का रिश्ता कभी नहीं होगा क्योंकि उसके पास में पावर है जबकि मां के पास में प्रेम है। किंतु ऐसा नहीं है कि हम लोग चाहते हैं कि सभी के पास में प्रेम हो। पावर किसी के पास में ना हो। अभी पाकिस्तान से कोई टेररिस्ट अटैक करेगा तो मैं तो अपनी मां को तो नहीं कहने जाने वाला हूं कि जाओ तुम जाकर के टेररिस्ट का अटैक का मुकाबला करो। वह तो मैं अपने प्राइम मिनिस्टर को ही कहने वाला हूं कि अपनी आर्मी को कहिए कि वह जाकर के मुकाबला करें। जिसके पास में पावर है उसके पास में दंड देने की क्षमता है। तो ये दंड देने की क्षमता वाले लोग भी चाहिए। ये समाज के जो असामाजिक तत्व है जो गुंडागर्दी जहां पे चलता है चोरी लूटपाट चलता है लोगों को चीट करके लोगों के साथ में अन्याय करके ये जो कुछ-कुछ कंपनियां उनको फ्रॉड आजकल ये डिजिटल फ्रॉड इतना सब कुछ चलता है तो यह जो समाज की जो अवस्था बुरी अवस्था है उसके ऊपर में हमको एक स्ट्रांग प्राइम मिनिस्टर चाहिए एक स्ट्रांग शासक चाहिए यह स्ट्रांग शासक क्या करेगा कि सबको कान कानून के अनुसार सबका काम चल रहा है वो देखेगा ेगा एक वीक प्राइम मिनिस्टर होता है तो देखिए कि उसके राज्य में सब तरह की गुंडागर्दी चलती है। गुंडा राज चलता है। माफिया राज चलता है। सब चलता है। फिर एक स्ट्रांग प्राइम मिनिस्टर होता है तो सभी जो जितने फ्रॉड करने वाले हैं जो माफिया है जो लोगों को शोषण करते हैं वे लोग सब वे लोग डर करके चलेंगे कि हां अभी यदि हम लोग इस तरह का कोई फ्रॉड करेंगे इस तरह का कोई गुंडागर्दी करेंगे तो फिर हमको दंड देने वाला वहां पर बैठा हुआ है। तो क्या है कि हमको दोनों तरह के लोग चाहिए। एक इस तरह का व्यक्ति जिसके पास में पावर हो जो जो लोगों को दंड दे सके। इस तरह की दंड देने की अथॉरिटी से समाज में शांति बनी रहती है। अपनी सरहदों पर सुरक्षा बनी रहती है। वरना तो वीक यदि बैठा होगा कोई प्राइम मिनिस्टर तो शत्रु भी बाहर के शत्रु भी आकर के आक्रमण करेंगे। भीतर के शत्रु भी आकर के आक्रमण करेंगे। उस समय अपनी मां कुछ नहीं करने वाली है उस सब चीजों में। जबकि मां के साथ में अपना बिल्कुल संबंध अलग है। जैसे कि वह अपना अपनीपनी भाव है। मां जैसे अपनी खुद की है। तो ठाकुर यहां पर कहना क्या चाहते हैं कि हम लोग यदि ईश्वर में एक दंड दाता पिता और स्नेहमई माता ऐसे दो स्वरूप है। एक पिता है जो कि दंड देता है। एक मां है जो कि स्नेह करती है। तो हम चाहते हैं ईश्वर में यह दंडदाता पिता देखने के। क्यों? क्योंकि इस तरह का जो एक ऑथॉरिटी फिगर है जिसके पास में पावर है वह पावर का इस्तेमाल करके मेरे लिए जो सब इस जगत में मुझे जो प्राप्त करना है वो मुझे प्राप्त करवा देगा। मुझे अच्छा करियर चाहिए। अच्छा फैमिली चाहिए। मेरी परीक्षा में अच्छे से मार्क्स आए। जो मैं इंटरव्यू देने के लिए जाऊं तो मेरा सिलेक्शन हो जाए। प्रमोशन की बारी आती है तो ऑफिस में जो पॉलिटिक्स हो रहा है उसमें मेरा ही विजय हो। यदि मेरा बिजनेस है तो मुझे यह कॉन्ट्रैक्ट चाहिए। मुझे यह ऑर्डर चाहिए। मुझे यह कस्टमर चाहिए। तो यह कस्टमर मेरी बात सुने। यह जो मुझे धन, ऐश्वर्य, वैभव, लोकमान्यता, सुख, शांति, उपभोग, भोग यह सब जो मेरी वासनाएं हैं वो वासनाओं को पूर्ति करने के लिए मुझे एक शक्तिशाली ईश्वर की जरूरत है। किंतु ठाकुर कहते हैं कि देखिए ईश्वर में आप शक्ति नहीं खोज करके प्रेम और भलो भाषा खोजिए। एक स्नेहमई माता को ईश्वर के रूप में अपनाइए। नहीं कि दंडदाता पिता को। ऐसा यदि आप करेंगे तो ईश्वर के साथ में जो आपका रिलेशन होगा वह आपको आध्यात्मिक जीवन में एक के बाद एक उच्च से उच्चतर सोपानों को पार करवाता हुआ आखिर में आपको निर्विकल्प समाधि या निर्वाण रूपी मानसरोवर और कैलाश तक पहुंचा देगा। ऐसा ठाकुर का थरी है और इसीलिए ठाकुर कहते हैं कि जैसे कभी कोई भक्त आकर के कहता है कि आप मुझे किसी ईश्वर का दर्शन करवा दीजिए या तो फिर मुझे इस तरह का कोई आध्यात्मिक अनुभूति करवा दीजिए तो ठाकुर कहते हैं कि देखो तुम यदि ईश्वर का ऐश्वर्य ही देखना चाहते हो ईश्वर का दर्शन ही करना चाहते हो इसके उससे होगा क्या तुम ईश्वर से दूर हो जाओगे बेटर है कि अपने हृदय में ईश्वर को बिठा करके जैसे वो ठाकुर ने उदाहरण दिया था। एक बिल्ली का बच्चा किस तरह से इतना कंफर्टेबल फील करता है अपनी मां की गोद में। वैसे ही अपने हृदय में यह तुम कल्पना करो कि तुम अपनी मां ईश्वर जगन माता के गोद में बैठे हुए हो और जगन माता तुमको स्नेह से तुम्हारा पालन कर रही है। तुम्हारी केयर कर रही है। यह जो है अपना-अपनी भाव वो सर्वश्रेष्ठ है। तो यह पॉइंट यहां पे ठाकुर कहते हैं और इसी के सिलसिले में देखिए कि वह जो हमने डिस्कस भी किया था कि किसी ने कहा था कि मां ने जो पागली मामी को श्राप दिया वह पागली मामी का श्राप देने वाली घटना गलत है। वह मुझे नहीं लगता कि ठीक है। तो इसके सिलसिले में हमने देखा था कि देखिए कि ईश्वर में आप संपूर्णता खोजेंगे। ईश्वर में यदि आप इस तरह का कोई डिवाइन पावर खोजेंगे कि निर्विकल्प समाधि के बाद में यदि इनमें कोई भी गलती नहीं हो सकती है तो फिर वही प्रॉब्लम आकर खड़ा हो जाएगा। इवन निर्विकल्प समाधि के बाद में यह जैसे सरफेस पे जो होता है ना देखिए असली गुस्सा एक चीज है। असली क्रोध एक चीज है। और ये सरफेस पे जो सब क्रोध होता है, गुस्सा होता है वो एक चीज है। पानी पे जैसे कि आपने एक रेखा दोरी तो मिट जाने में आपको कितना टाइम लगेगा? एक सेकंड मुश्किल से लगेगा, आधे सेकंड लगेगा। किंतु यदि गीली मिट्टी में आप रेखा दौड़ते हैं तो रेखा वहीं पर रह जाएगी कितने लंबे समय तक। तो वैसा ही अपना जो अशुद्ध मनुष्य या तो फिर यह जो आम आदमी होता है उसका मन यह गीली मिट्टी की तरह होता है। उसका ब्रेन यदि एक अहंकार या क्रोध या कामना वासना की रेखा एक बार पड़ी तो उसको मिटाना मुश्किल होता है। जबकि यह जो जो लोग निर्विकल्प समाधि निर्वाण या तो फिर प्राप्त कर चुके हैं या तो फिर जो अवतार पुरुष है उनका ब्रेन एक पानी की तरह होता है। उस पानी के भीतर में आप हजार रेखापात कीजिए। क्षण भर के लिए वह रेखापात दिखेगा। किंतु बाद में ही वह अदृश्य हो जाएगा। क्या हम यह देखना चाहते हैं कि यह जो अवतार पुरुष है या तो फिर यह पूर्ण ज्ञानी है उनका मन लोहे जैसा हो उनका ब्रेन कि उसमें कभी कोई रेखापात हो ही नहीं। तो यह मुझे लगता है कि यह थोड़ा सा इंपॉसिबल जैसा हो जाएगा। तो ये लोहे के ब्रेन की वजह आयरन ब्रेन की वजह बेटर है कि पानी का ब्रेन हो और उसके भीतर में रेखापात करने से इमीडिएटली वो चला जाए। तो ये थोड़ा सा बैकग्राउंड है। आज शरद महाराज
ईश्वर के ऐश्वर्य का दर्शन कर के ईश्वर के साथ आत्मीय भाव रहेगा नहीं
क्या लिखते हैं वो देखते हैं। अह पॉइंट का नाम है ठाकुर उपदेश। ठाकुर का उपदेश ऐश्वर्य उपलब्धि ते तुम भावे भलो भाषा थाके ना। यदि हम ईश्वर का ऐश्वर्य देखना चाहेंगे तो तुम ही आमी भाव तुम और मैं यह अपना अपनी जो भाव है स्नेह का जो बंधन है और भालो भाषा और प्रेम रहेगा नहीं। तो देखिए कि अरूपानंद जी अरूपानंद जी जब पहली पहली बार मां के पास में आते थे तो वह मां के साथ में बैठकर के वार्तालाप करते थे। मां को तुम करके पुकारते थे। अच्छा तुम क्या कर रही हो? तुम ही की कोर छो तुम ही यही तुम ही से तो तुम करके पुकारते थे। तो एक दिन उन्होंने बात में कहा मां को कि मां मैं आपको बोलने का प्रयास किया है मैंने किंतु आप मेरे मुंह में आता ही नहीं है। आपके बारे में तुम्हारे बारे में मैं तुमको तुम करके ही पुकारूंगा। ये मेरे मन में मेरे मुंह में तुम शब्द ही आता है। तो मां ने एग्जजेक्टली यही बात कही थी कि बाह बेटा शेटा ही भलो एटा ते अपना अपनीपनी भाव थाके अर्थात बाबा बाबा एटा ही भो एटाते अपना अपनीपनी भाव थाके यह कि तुम मुझे तुम करके पुकारते हो वो अच्छा है इससे यह अपना अपनी भाव अर्थात कि तुम मेरे हो मैं तुम्हारी मां तुम मेरे संतान हो मैं तुम्हारी मां हूं यह भाव बना रहेगा तो देखिए कि अपने पूरा जो रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य ईश्वर के साथ में इस तरह से एक निजस्व संबंध बनाना इस तरह से एक स्नेही जन का इस तरह से एक प्रेमी का संबंध बनाना जिससे कि उसके प्रति हमको किसी तरह का डर ना रहे उसके साथ में हम हृदय खोलकर के वार्तालाप कर सके और इनका आशीर्वाद हमारे पे सतत बरसता रहे। तो यह पॉइंट का टाइटल है। अभी शरद महाराज लिखते हैं भगवान शक्ति विशेष साक्षात परिचय कोनो परिचायक कोनो रूप दर्शन आदि लाभेर जनो आग्रहातिशय जानाईले ठाकुर से जनो तहार भक्त तहार भक्त दिग के अनेक समय बोलते यदि ठाकुर का कोई भक्त ठाकुर के पास में आकर के जििद करता है कि आप मुझे किसी एक ईश्वर का दर्शन करवा दीजिए मुझे किसी एक ईश्वरीय रूप का दर्शन करवा दीजिए। किसी एक ईश्वरीय स्वरूप का दिव्य स्वरूप का दर्शन करवा दीजिए। तो ठाकुर उनको क्या कहते ओगो ओई रूप दर्शन करते चावाटा भालो नहीं। अरे भाई इस तरह का दर्शन की आकांक्षा रखना अच्छा नहीं है। ओश्वर जो देख ले भय आशबे यदि आप ऐश्वर्य देखेंगे डिवाइन पावर्स देखेंगे ईश्वर में तो तुमको भय लगेगा। खावानो परानो भलो भाषाए तुम आमी भाव एटा आर थाकबे ना यदि डिवाइन पावर देखोगे देखना चाहोगे तो डर लगेगा फिर यह खिलाना पहनाना अपने भलो भाषाएं स्नेह से तुम ही आमी स्नेह से तुम और मैं यह भाव फिर रहेगा नहीं यदि हम ईश्वर में डिवाइन पावर देखना चाहेंगे तो फिर यह मैं ईश्वर को जैसे कि मां यशोदा है बाल गोपाल को वस्त्र पहनाती थी, कपड़े पहनाती थी। फिर बाल गोपाल को खिलाती थी। फिर उसकी संभाल रखती थी। जरूरत पड़े तो उसको डांटती भी थी। पिटाई भी कर देती थी। यदि वह बहुत ज्यादा वो तूफान करता है तो। तो इस तरह का जो स्नेह प्रेम है वह रहेगा
ईश्वर के दिव्य रूप दर्शन से भक्त को भय लगता है, इसके उदहारण
नहीं। देखिए यह जो ठाकुर कहते हैं कि ऐश्वर्य देखकर के भय आएगा। भय लगेगा। यदि हम इस तरह का कोई दर्शन कर ले तो इसके कितने सारे उदाहरण हैं। गीता में ही हम देखते हैं कि भगवान अर्जुन भगवान को कहता है कि तुम मेरे सखा हो यह बात तो मैं इतने दिनों से सोच रहा था। किंतु यदि जिस समय भगवान कृष्ण ने अर्जुन को अपना विश्वूप दर्शन करवाया। उसी समय अर्जुन किस तरह से भयभीत हो गया और फिर से उनको प्रार्थना करके उनके सखे का सौम्य स्वरूप धारण करने को कह रहा है। यह स्वामी जी के साथ में देखिए जितनी भी बार दर्शन हुए हैं उतनी भी बार उनको किसी ना किसी तरह का डर लगा है। हर बार नहीं किंतु कई इतने कैसे उदाहरण है? सर्वप्रथम जो भगवान बुद्ध का दर्शन हुआ वो बालक थे। अपने कमरे में स्टडी कर रहे थे। बैठे थे। उस समय एक सौम्य सन्यास सन्यासी उनके सामने आते हुए उनको दिखा। तो यह सौम्य सन्यासी कौन था पता नहीं कहां से यहां पे आ गया पता नहीं। नरेंद्र उठकर के भय से वहां से कमरे में से दौड़ के बाहर चला गया। बहुत सालों के बाद में उसने कहा कि मुझे ऐसा लग रहा है कि भगवान बुद्ध का दर्शन हुआ है। उसके बाद में देखिए कि जब वो नरेंद्र ठाकुर को पहली बार मिला नरेंद्र भविष्य का स्वामी विवेकानंद तो नरेंद्र ठाकुर को जब पहली बार मिला तो ठाकुर ने उसको स्पर्श करके उसके जितने जन्म जन्मांतर की बातें हैं सब जानना चाहा। उस समय नरेंद्र चिल्ला उठा। क्या चिल्ला उठा? ओगो हमार बाबा अच्छे हमार मां अच्छे। अरे तुम मेरे साथ में यह क्या कर रहे हो? मुझे किस तरह से यह हिप्नोटाइज कर रहे हो? क्या मेरे साथ में गड़बड़ कर रहे हो? मेरे बाबा है, मेरी मां है। अर्थात कि बाबा और मां को वह स्वामी जी इतना प्रेम करते थे कि यदि ठाकुर कुछ गड़बड़ कर दे तो फिर वो अपने मां और बाबा को यदि वह विस्मृत ना हो जाए या तो फिर मां और बाबा को छोड़कर के साधु बनकर के भाग ना जाना पड़े। यह डर नरेंद्र को लग गया था। तब ठाकुर हंसते-हंसते अपना वह जो माया जाल है उसको सिमित लिया और फिर कहा ठीक ठीक छे मने एक अनेक समय छे तो देखिए कि ठीक है ठीक है अभी तो और भी भविष्य में बहुत समय है तुम्हारा ब्रेन वाश करने का चिंता मत करो तो इसके बाद में देखिए कि जब वो नरेंद्र कहता था कि मुझे निर्विकल्प समाधि चाहिए वगैरह-वगैरह करके ठाकुर को कहता था अभी जिस समय निर्विकल्प समाधि नरेंद्र को मिल गई उस समय क्या हुआ नरेंद्र आंख खोल करके ये कहता है कि अरे मेरे हाथ कहां है? मेरे पैर कहां है? मुझे क्या कुछ अनुभूति नहीं हो रहा? किसी भी चीज का म अनुभूति नहीं हो रही। आई कैन नॉट फील एनी ऑफ़ माय हैंड्स और लेग्स और एनीथिंग। उस समय जो एक गुरु भाई थे वो दौड़ के ठाकुर के पास में गए। ठाकुर काशीपुर में की यह घटना है। नरेंद्र वहां पर ग्राउंड फ्लोर पे था। समाधि साधना करते-करते आखिर में नरेंद्र को वह निर्विकल्प समाधि प्राप्त हुई थी। किंतु निर्विकल्प समाधि की अवस्था में ही उसको शुरू-शुर में डर लग गया था और वह कहता है कि मेरे हाथ और पैरों को मैं फील नहीं कर पा रहा हूं। उस समय नरेंद्र का एक गुरु भाई दौड़ के ठाकुर उस समय फर्स्ट फ्लोर पे थे अपने बेडरूम में उनके पास में गया। कहा कि नरेंद्र कम ये कर रहा है। भयभीत हो गया है। तो ठाकुर कहता है कि भले साला उसके साथ में ऐसा ही हो। अब बड़ो आमा के पीड़ा पीढ़ी को छी लो। बड़ा मेरे पीछे में लगा था। बड़ा जिद कर रहा था कि मुझे कोई आध्यात्मिक अनुभूति दिलवा दो। तो अभी भले ही वह अभी सहन करे। आध्यात्मिक अनुभूति होने से क्या होता है उसको भी पता चले। तो राजा महाराज की एक घटना है। राजा महाराज भविष्य के स्वामी ब्रह्मानंद रामकृष्ण संघ के सर्वप्रथम प्रेसिडेंट ठाकुर के मानस पुत्र। तो यह राजा महाराज भी ठाकुर को बार-बार जिद करके कहते थे कि आप मुझे किसी भी तरह का दर्शन दिलवा दीजिए। किसी भी तरह की आध्यात्मिक अनुभूति करवा दीजिए। तो ठाकुर उस समय तो कुछ बोले नहीं किंतु एक दिन क्या हुआ यह राखाल बैठा हुआ था देखा कि ठाकुर मां के मंदिर की ओर जा रहे हैं। एकाएक देखा कि उस दिशा में से एक विराट शक्ति जैसे कि राखाल की ओर दौड़ी चली आ रही हो। यह विराट शक्ति यानी कि एक दिव्य शक्ति या तो फिर यह दिव्य दर्शन या तो फिर यह दिव्य अनुभूति जो भी है वह जैसे ही राजा महाराज की ओर आई दौड़ी तो राजा महाराज उठकर के खड़े होकर के भय के मारे वहां से भाग गए। तो देखिए कि वही राजा महाराज है जो कि ठाकुर को जीत करके कहते थे और राजा महाराज की कैपेसिटी तो देखिए हम लोग तो कहां और राजा महाराज कहा ठाकुर के मानस पुत्र होना वह तो कोई आम बात नहीं है। तो ऐसे राजा महाराज जैसे राजा महाराज स्वयं जब आध्यात्मिक अनुभूति उनकी ओर आ रही है। तब वह भय के मारे वहां से उठकर के भाग गए। तो यह देखिए कि ऐश्वर्य अनुभूति होने से आपको डर लगेगा। इससे बेटर है कि आपको एक कोई ऐश्वर्य की अनुभूति या तो दर्शन देखिए वह सब होगा। इट्स नॉट लाइक कि आध्यात्मिक जीवन में वह सब नहीं होने वाला है। बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात में देखिए राजा महाराज के जीवन में स्वामी जी के जीवन में कितनी ही अलौकिक घटनाएं कितने ही अलौकिक दर्शन वही राजा महाराज बैठे हुए बेलूर मठ के किनारे पे वहां पे वो गंगा के किनारे बेलूर मठ में देखा कि मां दुर्गा बाहर आकर के म गंगा नदी में से बाहर आ रही है। उसी समय राजा महाराज को लगा कि यह मां दुर्गा का इशारा है या तो संकेत है कि बेलूर मठ में दुर्गा पूजा हो। तो फिर उन्होंने जाकर के स्वामी जी को कहा स्वामी जी ने कहा कि हां मुझे भी इस तरह की कोई अनुभूति हुई है। दर्शन हुआ है। चलो बेलूर मठ में दुर्गा पूजा करते हैं। तो इस तरह के तो फिर बाद में हजार दर्शन होंगे। किंतु यह दर्शन किस तरह से यह लोग हजम कर पाए? तो इसलिए हजम कर पाए क्योंकि ईश्वर के साथ में उनका बालक, संतान और मां का संबंध था। वरना तो क्या होगा? इस तरह का प्रेम का संबंध नहीं बना करके सिर्फ ईश्वर का ऐश्वर्य ही देखना चाहेंगे। तो वह दर्शन के बाद में या तो फिर हमारे मन में भय प्रकट होगा या तो किसी तरह की विकृति प्रकट होगी। वही हृदय जो कि ठाकुर को कहता था कि मामा आपको इतने दर्शन होते हैं मुझे भी कोई दर्शन करवा दो तो पता नहीं ठाकुर ने क्या किया जादू चमत्कार वो हृदय को दर्शन हो गया तो फिर हृदय चिल्ला चिल्ला करके कहता है अरे रामकृष्ण चलो चलो हम गांवगांव जाते हैं शहर-शहर जाते हैं ईश्वर का नाम फैलाते हैं कीर्तन करते हैं तब ठाकुर कहे वो उसकी छाती पर हाथ मार के कहे शाला शांत हो गया शाला शांत हो जाओ तो बाद में ह्रदय कहता है कि मामा आपने ऐसा क्यों कहा कि मैं शांत हो जाऊं या तो फिर यह दर्शन चला जाए। तो ठाकुर ने कहा कि क्या तुम पागलपन कर रहे थे? मुझे तो इस तरह के दर्शन दिन में हजार होते हैं। फिर भी मैं अपने मन को संभाल करके रखता हूं। तुमको एक दर्शन क्या हुआ? तुम चिल्लाचिल्ला करके बोलना शुरू कर दिए कि चलो गांव-गांव जाते हैं। ईश्वर का नाम फैलाते हैं। क्या पागलपन है? तो देखिए कि यदि ईश्वर के प्रति एक गहरा प्रेम ईश्वर के प्रति एक भालोबासा वह यदि नहीं होगा और इस तरह का कोई दर्शन प्राप्त होगा तो या तो फिर हम डर जाएंगे या तो फिर माथा बिगड़ जाएगा। वही मथुर बाबू वो ठाकुर को कहते थे कि आपको इतने दर्शन होते हैं। मुझे कुछ करवा दो। तो फिर ठाकुर ने फिर से अपनी माया जाल से पता नहीं क्या उनको दर्शन करवा दिया। मथुर बाबू चुपचाप अपने कमरे में बैठे हैं। वह जो जमींदारी है, यह है, वो है। किसी भी तरह का काम नहीं कर रहे हैं। सब छूट गया है। आखिर में जाकर के उन्होंने ठाकुर को प्रार्थना की कि यह जो ऐश्वरीय भाव है जो कि मेरे सर पर उठा है। उसको हटाइए। यह सब आपके लिए ठीक है। हमारे लिए नहीं। मैं और हृदय नंदी भ्रुंगी की तरह आपकी सेवा करके रहेंगे। हमारे लिए इतना ही काफी है। तब कहीं जाकर के उसके सर के ऊपर में से भाव को हटा लिया। तो देखिए कि यदि हम इस चीज के लायक नहीं है दर्शन के या तो ईश्वरीय अनुभूति के तो यह ईश्वरीय अनुभूति या दर्शन या तो हमारे हृदय में भय का संचार करेंगे। हमको डरा देंगे या तो फिर हमको पागल बना देंगे। वो जो कृष्ण किशोर कृष्ण किशोर को भाव हो गया तो भाव में बैठा हुआ है तो फिर वो ओम ओम ओम बोल रहा है ओमकार का जप कर रहा है सतत तो किसी को उसके परिवार जनों ने डॉक्टर को बुलाया किसी वैद्यराज को बुलाया कि देखिए यह तो सब वो तो ब्राह्मण था तो ब्राह्मण को तो संध्या वंदना करनी होती है। फिर वह लोगों के घर जाकर के थोड़ा सा कुछ विधिविधान पूजा करनी होती है। तभी तो पैसा मिलेगा ना। वरना तो बैठ के कौन खिलाने वाला है? तो वो बैठा-बैठा ओम ओम कर रहा है। सर के ऊपर में भाव सवार हो गया है। तो वो उसके परिवार जनों ने एक वैद्यराज को बुलाया। तो वैद्यराज आकर के ट्रीटमेंट करना शुरू किया। तो कृष्ण किशोर क्या कहता है कि अरे तुम मेरा सब बाकी का सब ट्रीटमेंट करो तो करो। ठीक है? किंतु मेरा ओमकार का ट्रीटमेंट मत कर देना। मेरा ओमकार ठीक मत कर देना। वो जैसा है वैसा ही रहने दो। तो देखिए कि वो जो भाव होता है तो इस तरह की विकृतियां या तो फिर अस्वाभाविक बिहेवियर साथ में आ जाते हैं। और क्यों आते हैं? क्योंकि ईश्वर को हम ठीक से समझे नहीं है। इसीलिए यहां पर ठाकुर कहते हैं ओगो ओ रूप दर्शन करते चावाटा भालो नोए। इस तरह से दर्शन की आकांक्षा करना दर्शन का आग्रह रखना ठीक नहीं है। ऐश्वर्य जो देख ले भय आशबे यदि यह डिवाइन पावर ऐश्वर्य देखोगे तो भय आएगा डर लगेगा। खावानो परानो भालो भाषाएं तुम भाव एटा आर थाकबेना। यह ईश्वर को खिलाना, ईश्वर को पहनाना, कपड़े पहनाना, ईश्वर मेरे खुद के हैं। इस तरह से उनकी केयर करना यह भाव और रहेगा नहीं। आगे में शरद महाराज कहते हैं कतो समय ना आमरा तो खन
भक्त ठाकुर के पास ईश्वरीय दर्शन पाने की जिद करता है
मने भाबिते अच्छी ठाकुर कृपा करिया ओ रूप दर्शना आदि लाभ कर दी ना बोलियाई आमादग के ओ रूप बोलिया खान तो करते छ अभी जब ठाकुर ऐसा कहते हैं कि अरे दर्शन की आकांक्षा मत रखो फिर वरना तो यह भय आ जाएगा अपना अपनीपनी भाव नहीं रहेगा तो शरद महाराज कहते हैं कि बहुत बार हमको ऐसा लगता था कि ठाकुर की इच्छा नहीं है हमको इस तरह का दर्शन करवाने की इसीलिए वह हो सकता है कि इस तरह के झूठे-मठे वह एक्सक्यूज देते हैं। वो आपने वह बच्चा स्कूल में जाकर के टीचर जब पूछता है कि होमवर्क किया कि नहीं किया तो बच्चे ने होमवर्क किया नहीं था। वह पूरा दिन खेल में व्यस्त था तो फिर वह क्या झूठा बहाना देगा कि मुझे तो कल रात को बाहर जाना हुआ था कल दिन को इसलिए मैं नहीं कर पाया। घर में कोई बीमार हो गया इसलिए मैं होमवर्क नहीं कर पाया। ऐसा एक बहाना देता है तो बच्चा तो क्यों? क्योंकि उसने होमवर्क किया नहीं है तो होमवर्क करना नहीं चाहता है। उसको खेलना ज्यादा अच्छा लगता है। तो यहां पे भी ठाकुर की इच्छा नहीं है हमको दर्शन देने की या तो दर्शन का अनुभूति करवाने की। इसलिए ठाकुर इस तरह के झूठे-मठे एक्सक्यूज दे रहे हैं। बहानेबाजी कर रहे हैं। साहसे निर्भर करिया कोनो भक्त ज से समय प्राणर विश्वास सहित बलिदो बलितो आपनार कृपा ते असंभव संभव होइते पारे कृपा करिया आमा के ओ रूप दर्शना आदि करैया दीन ठाकुर ताहात ते मधुर नम्र भावे बोल तेन आमी की किु करिया दीते पारी रे मार जा इच्छा ताई होए अभी जब ठाकुर कहते हैं कि तुमको इस तरह का दर्शन करना ठीक नहीं है तुम्हारे लिए तो कोई भक्त सा कोई भक्त चुप हो जाता। यह मन में सोच के कि ठाकुर की इच्छा नहीं है मुझे अनुभूति करवाने की। या तो फिर कोई भक्त फिर साहस करके ठाकुर को फिर से कहता कि यदि आप आपकी कृपा से आपकी कृपा से असंभव भी संभव हो सकता है। कृपा करके मुझे इस तरह का दर्शन करवा दीजिए। प्राण के आवेग के साथ में किसी किसी भक्त की ठाकुर के ऊपर में इतनी श्रद्धा है, इतनी निष्ठा है कि वह मानता है कि ठाकुर चाहे तो असंभव को संभव कर दे। तो इसलिए फिर वह प्राण के आवेग के साथ में संपूर्ण निष्ठा के साथ में वह यदि ठाकुर को प्रार्थना करता है कि यदि आप चाहे तो असंभव को भी संभव कर सकते हैं। आप मुझे कृपा करके इस तरह के दर्शन या अनुभूति करवा दीजिए। तो ठाकुर उससे मधुर और नम्र भाव में कहते आमी की किशु करिया दीते पारी रे अरे मैं क्या कुछ करवा देने को सकता हूं मार जा इच्छा ताई होए मां की जो इच्छा होगी वही होगा यह मां जगदंबा की इच्छा होगी तभी तुमको दर्शन होगा क्योंकि यहां
ईश्वरीय भाव धारण करने के लिए कठोर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन आवश्यक है
पे एक दूसरा भी प्रश्न है जो कि यहां पर शरद महाराज ने नहीं लिखा किंतु रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य पढ़कर के हमको इस इस बात का बड़ा ही एक अच्छे से अनुभव है। हम सभी लोग यह बात जानते हैं कि किसी भी तरह की दिव्य अनुभूति, दर्शन या तो फिर भाव इसको टिकाने के लिए या तो फिर इसको धारण करने के लिए तपस्या का होना आवश्यक है। ब्रह्मचर्य का होना आवश्यक है। अपनी इंद्रियों पे प्रचंड संयम जरूरी है। यदि अपनी इंद्रियों पर संयम नहीं रहेगा। ब्रह्मचर्य की एक 100% ब्रह्मचर्य नहीं तो एटलीस्ट कुछ हद तक अपनी इंद्रियों पर कंट्रोल नहीं रहेगा और यदि इस तरह का भाव या दर्शन या अनुभूति होगा तो इसके परिणाम से मनुष्य और गहरे गड्ढे में डूबेगा। यह नरेंद्र जो अपना इन्वेस्टिगेटर अपना शेरॉक होम्स वो नरेंद्र यह सब इन्वेस्टिगेशन करता था। तो नरेंद्र ने बाद में कहा है कि ठाकुर के कीर्तन में जिन लोगों को बहुत ज्यादा भाव होता था जिन लोगों के उनको समाधि वगैरह भाव समाधि वगैरह हो जाता था ऐसे लोगों का इन्वेस्टिगेशन करके मैंने देखा है मैंने खोज निकाला है कि बाद में यही लोग विषय वासना के भीतर में इतना गहराई से डूब जाते हैं कि उससे तो कोई न विकृति के भीतर में चले जाते हैं। देखिए यह विषय वासना का कितने लेवल होते हैं। एक तो नॉर्मल लेवल होता है। विषय वासना होती ही है मनुष्य में। ये दृष्टि के विषय हो, जीहवा के विषय हो, स्पर्श के विषय हो, कर्ण के विषय हो ना कि काम वासना के विषय हो। यह तो मनुष्य के भीतर में एक डीएनए है। अपना जेनेटिक बंधारण जिस तरह से है वो है। उसको आप जो भी कहिए उसको तो अब थोड़ा उसको पूर्ति तो आपको करना पड़ेगा। यह एक नॉर्मल लेवल हो गया। उसके बाद में एक सुपर नेचुरल लेवल है कि आपने अपनी विषय वासनाओं पे संपूर्ण रूप से संपूर्ण नहीं तो कुछ हद तक संयम पा लिया है। कंट्रोल पा लिया है। फिर एक विकृत लेवल आता है जो कि एक नॉर्मल लेवल से भी बहुत ज्यादा जिन लोगों में विषय वासनाएं होती है। यह लोगों का मन विकृत हो जाता है। मां ने एक बार एक साधु के बारे में कहा था। यह ज्ञान महाराज ना कि कोई एग्जैक्टली नाम ज्ञान महाराज ही थे। तो मां ने कहा कि वह यहां पर रहता था। आखिर आखिर में उसके भीतर में इतना यह वासना का उदय हुआ। वह कहता है कि आमोदर नदी यदि दूध की बनी होती तो पूरी नदी में पी जाता। यह उसके जैसी बात हो गई कि निरंजन महाराज बहुत ज्यादा घी खाया करते थे। तो ठाकुर ने उनको डांट करके कहा था कि क्या शेष लोके देर बहु बेटी तुम बेर करवे ना कि अर्थात कि लोगों के घर में जाकर के लोगों की स्त्रियों को खींच करके बाहर निकालोगे क्या? उनके ऊपर में अत्याचार करने के लिए। तो यह जब वह विषय वासना एक हद से जब बढ़ जाती है तो वह विकृति का स्वरूप धारण करती है। तो नरेंद्र ने यही इन्वेस्टिगेशन करके खोज निकाला था कि जो लोगों के भीतर में भाव होता है और जिनके जीवन में संयम या तो तपस्या या तो फिर इंद्रिय दमन की शक्ति नहीं होती वे लोग फिर विषय वासना की नॉर्मल बाउंड्रीज को क्रॉस करके विकृति में चले जाते हैं। और इसीलिए स्वामी जी हमेशा बिलूर मठ में कहते थे कि ये मधुर भाव के भजन है। यह वो सब यहां पर बंद कर दो। शिव का शिव के भजन से भरपूर हो जाओ। अद्वैत वेदांत के भाव से भरपूर हो जाओ। स्वामी जी कहते हैं कि ये भारत में क्या खोलकरताल नहीं बजते हैं। क्या खोलताल नहीं मिलते हैं। ये सब समय यह मेली भाव अर्थात कि यह स्त्री भाव मधुर भाव यह सब क्या है? तो यह माने यह बात इस पॉइंट का उल्लेख यहां पर नहीं है। किंतु रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य में इसका एंपल उल्लेख है। माने बहुत जगहों पर उल्लेख है कि यह ईश्वरीय भाव कि यदि उसको धारण करने की आपके भीतर में क्षमता नहीं होगी और यह भाव या तो फिर अनुभूति हो जाएगी तो फिर बड़ा डेंजर होगा। यहां पे किंतु ठाकुर यह करके बात को घुमा देते हैं। कहते हैं कि मां की इच्छा होने से होगा। तो यह मां की इच्छा होना या तो फिर जिसको कहते हैं कि एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया मुझे भाव हो मुझे दर्शन हो उसके लिए मेरी एलिजिबिलिटी क्या है? दो एलिजिबिलिटी होगी। एक तो है मेरा पुरुषार्थ कि मैं तपस्या करके अपने मन में अपने मन को भाव को धारण करने के लिए सक्षम बनाऊं। यह एक क्राइटेरिया है। दूसरा है कि यह ऐश्वरीय आदेश या तो फिर ऐश्वरीय इच्छा। मां की इच्छा होगी तो मुझे भाव होगा। या तो फिर दर्शन होंगे या तो फिर अनुभूति होगी। तो यह दोनों क्राइटेरिया अपने साहित्य में हमको देखने को मिलते हैं। पहले तो तपस्या करके अपने मन को, अपने क्षमताओं को, अपनी इंद्रियों को इतना दृढ़तर बनाओ कि कोई भी दर्शन अनुभूति होने से हम इसको धारण कर पाए। यह हमको विकृति की ओर ना ले जाए। दूसरा कि मां की इच्छा होना, मां का आशीर्वाद होना अवश्य आवश्यक है। इसके अलावा जगत में कुछ भी नहीं होता।
जब भक्त ठाकुर के पास ईश्वरीय दर्शन प्राप्त करने के लिए जिद करता है, तो ठाकुर कहते है माँ जगदम्बा की कृपा होगी तो दर्शन होगा
तो इसीलिए ठाकुर ताहाते मधुर नम्र भावे बोली तेन यदि कोई ठाकुर के पास में जाकर के जिद करता हट करता कि आप मुझे ईश्वर का दर्शन करवा ही दीजिए आपके हाथ में सब कुछ है तो ठाकुर बड़े ही मधुर नम्र भाव से कहते आमी की किशु करिया दीते पारी रे अरे मैं क्या कुछ करने को हूं रे मार जा इच्छा ताई हो मां की जा इच्छा होगी वही होगा ओ रूप बलि ले जदी से खान तो ना हो या बली तो अपनार इच्छा होले ही मार इच्छा होइबे ठाकुर ता ते अनेक समय ताहा के बुझया बोते आ तो मने को रे तो देर शकले सब रकम अवस्था सब रकम दर्शन हो किंतु ता हो कोई और यदि ऐसा कहने के बाद में भी कि हां मां की इच्छा होगी तब होगा और फिर ऐसा कहने के बाद में भी कोई भक्त जाकर के और ज्यादा जििद करता कि आपकी इच्छा और मां की इच्छा एक हो गई है। आप यदि चाहे तो दर्शन भी हो सकते हैं। आप यदि चाहे तो मां भी इच्छा कर सकती है। तो आप कृपा करके दर्शन करवाइए। तो ठाकुर उसको समझा पटा करके कहते कि अरे मैं तो चाहता हूं कि तुमको तुमको सबको सब तरह की आध्यात्मिक अनुभूतियां हो। सब तरह की अवस्था हो। सब तरह के दर्शन हो। किंतु कहां पे होता है? देखिए ये ठाकुर भी यहां पे सब चालाकी करते हैं। कहते हैं कि मैं तो मेरी तो इच्छा है कि तुम सबको हो दर्शन किंतु यह दर्शन होता कहां है? ये गिरीश घोष गिरीश घोष ने आखिर आखिर में कहा था ठाकुर की बीमारी के बारे में ठाकुर ने कहा ना कि मां की जो इच्छा है वही होगा। तब गिरीश कहता है आपकी इच्छा और मां की इच्छा एक हो गई है। देखिए यह भी एक पथ है कि ठाकुर के ऊपर में इतना भरोसा कर दिया है आपने कि फिर अपना अपने को अपना कहने वाला कुछ नहीं बचा है। वह भी एक पथ है गिरीश का पथ। वो कहता है कि और गु की गु बोबोध होए। वो डॉक्टर सरकार को कहते हैं कि ठाकुर की विष्ठा क्या विष्ठा के स्वरूप में लगती है? नहीं लगेगी। विष्ठा विष्ठा के रूप में बोध नहीं होगी। क्यों? कि जिनको मैंने ईश्वर के अवतार के रूप में गिन लिया है, वह सिर्फ मैं मुंह से नहीं बोलता हूं। मन, प्राण, बुद्धि सब मिलकर के मैं उनको कहता हूं कि वह मेरे इष्ट है। तो इसीलिए कि यहां पे जब कोई भक्त ठाकुर को कहता कि आपकी इच्छा और मां की इच्छा एक हो गई है। उस समय किंतु ठाकुर कहते हैं कि मेरी तो इच्छा है कि तुम सबको दर्शन हो। तो सबको कुछ ना कुछ अनुभूति हो। किंतु यह होता कहां है इसके सामने फिर भक्त और भी उहात ते ओ भक्तों ज कांतो ना होइया बिश्लाईते थाकी तो ताहा होले ठाकुर ता ते आर किु ना बोलिया स्नेह पूर्ण दर्शन और मृदुमंदो हास्य द्वारा ताार प्रति निजो भो भाषाए परिचय मात्र दिया निरबो था कितेन इतना कहने के बाद में भी यदि कोई भक्त शांत नहीं होता बार-बार जििद करता रहता तो ठाकुर फिर उसको स्नेह पूर्ण दर्शन देकर के और मंदमंद हास्य के द्वारा उसके प्रति अपना प्रेम भालोसा का परिचय देते और किंतु फिर वो मौन हो जाते निरव हो जाते अथवा बोलीतेन या तो फिर कहते कि बोलबो बाबू मार जा इच्छा ताई हो मैं क्या कहूंगा भाई मां की जो इच्छा होगी वही होगा तो यह अपने संग
ईश्वर के साथ निःस्वार्थ प्रेम का सम्बन्ध बांधना है
संघ में अपने ठाकुर की इच्छा के म ठाकुर के मत के अनुसार यह दर्शन को मांगना या तो फिर यह भाव होना या तो फिर यह आध्यात्मिक अनुभूति होना देखिए यह भी एक ऐश्वर्य है। यह ऐश्वर्य भी नहीं चाहिए। ईश्वर के साथ में हमारा जो वही सुदामा और कृष्ण का संबंध सुदामा कृष्ण के पास में गए कुछ मांगा नहीं किंतु एज ए बाय प्रोडक्ट सब कुछ मिल गया। अभी यदि हम बोलेंगे कि हम सुदामा की तरह स्ट्रेटजी करके ईश्वर को कहेंगे कि ईश्वर तुमको सिर्फ तुम मुझे सिर्फ दर्शन दो या तो फिर मुझे प्रेम दो आशीर्वाद दो और कुछ नहीं चाहिए तो हमारे साथ में ऐसा होने वाला नहीं है। क्यों? क्योंकि सुदामा जो उसके हृदय में जो ईश्वर कृष्ण के प्रति जो शक्य भाव है मित्रता है वो जेनुइन है। वो सही-सही में मित्रता के अलावा और कुछ नहीं चाहता। जबकि हम ज्यादातर इस तरह के जो कहानियां पढ़कर के जो अपनी स्ट्रेटजी बनाते हैं, वह कहेंगे कि मुझे कृष्ण के साथ साथ में मित्रता का सक्य भाव रखना है, मातृभाव रखना है और कुछ नहीं चाहिए। प्लान करके करेंगे तो वह भी सफल नहीं होगा। जेनुइनली यू विल हैव टू बिलीव इन दैट। जेनुइनली संतान भाव की यदि आप साधना करते हैं तो मानना होगा बिल्ली के बच्चे की तरह अपनी मां की गोद में बैठे हुए हैं। मां आपको स्नेह कर रही है। जेनुइनली यदि मातृभाव होगा तो मां यशोदा की तरह मां जैसे कृष्ण को डांटती भी थी। मारती भी थी। यदि वो तूफान करता है वो गोपियों की वो वो घड़ा तोड़ के घट तोड़ करके उसमें से वो दूध वो छास वगैरह वो सब नष्ट कर देता है वो माखन चोरी करता है गोपियां कंप्लेन करने को आती तो ये डांटती भी जेनुइन दैट लव हैस टू बी देयर फॉर दैट साधना टू बी सक्सेसफुल तो आज यहीं तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम
प्रश्न: ठाकुर भक्तो को कहते है तुम दर्शन प्राप्ति की आशा मत रखो. किन्तु वह खुद माँ काली के पास कितना रोते थे उनके दर्शन प्राप्त करने के लिए. यह विरोधाभास क्यों?
कृष्णपणमस्तु ना उसका उसका रीजन है ना कि ठाकुर तो हृदय देख सकते थे ये जो ठाकुर हृदय देख के बहुत सारे भक्त होते हैं ना कि वो माने दिखावा तो बहुत करते हैं भक्ति का किंतु थोड़ी सी भी तपस्या नहीं थोड़ा सा भी कुछ नहीं ये जो हमने ऑलरेडी डिस्कस किया कि यदि ब्रह्मचर्य नहीं होगा और यदि यह अनुभूतियां आ जाएगी या तो भय होगा या तो विकृति आ जाएगी। इतने सारे जो उदाहरण हमने देखे यह हृदय का, यह मथुर बाबू का, इवन राजा महाराज और स्वामी जी का कि समय से पहले यह सब होने से भयानक एक परिस्थिति खड़ी होती है और इसलिए उनको शांत करने के लिए यहां पे जो शरद महाराज ने डायग्नोसिस किया है ठीक ही किया है कि लोगों को शांत करने के लिए सब बहानेबाजी करते हैं। अदरवाइज जब समय आएगा तो सब दर्शन सब हो
प्रश्न: ठाकुर अपने दर्शनों का वर्णन करते है, उसका हमारे लिए क्या तात्पर्य है? क्या हम भी उस दर्शन प्राप्ति के लिए एम्बिशन रखे? हमें भी भविष्य में दर्शन होंगे ऐसी आशा रखे?
जाएंगे। ना सात्विक एंबिशन तो होना ही चाहिए ना। ठाकुर ने खुद कहा है कि मैं चाहता था कि मैं भक्तों का राजा हूं। स्वामी जी ने जो सब ग्रैंड स्टेटमेंट दिए हैं, आई हैव ए मैसेज फॉर द वेस्ट, द वे बुद्धा हैड अ मैसेज फॉर द ईस्ट। तो, यह जो एक ग्रैंडियोस ग्रैंडियोसिटी जो उनके है भीतर में कि जगत को परिवर्तन कर देंगे। यह सब तो एक सात्विक एंबिशन तो है ही है। उसमें तो कोई प्रश्न ही नहीं है। बिना एंबिशन के आदमी कुछ नहीं कर सकता। ईश्वर दर्शन करने की एंबिशन भी दैट वी शुड हैव। वही है कि शॉर्टकट नहीं अपनाना है जो इस पूरी जो बात में से जो समझ में आता है कि ठाकुर को प्रार्थना करके कैसे भी करके दर्शन प्राप्त कर लो और कोस्पोंडिंग ब्रह्मचर्य वगैरह सब भूल जाए दैट शुड नॉट हैपन गो थ्रू इट प्रॉपर पाथवे अभी जैसे कि मुझे लख आई वांट टू बी अ बिलियनर आज की लैंग्वेज में यदि कहा है तो ओके देयर इज़ अ लेजिटिमेट पाथ यू स्टडी हार्ड यू गो टू हावर्ड स्टैनफोर्ड एंड यू पुट इन योर एकेडमिक परफॉर्मेंस एंड देन यू गेन एन एडमिटेंस इंटू सम मल्टीीनेशनल और यू स्टार्ट योर ओन फाउंड योर ओन स्टार्टअप। देयर इज़ अ लेजिटिमेट वे ऑफ़ बिकमिंग अ बिलियनियर। नथिंग रोंग विथ दैट। बट यदि मैं कहूं मुझे परीक्षा नहीं देनी, पढ़ाई लिखाई नहीं करनी, चोरी चपाटी करके या तो फिर चीटिंग करके बिलियनियर हो जाना है। सो दैट इज रोंग। सो स्वामी जी ठाकुर यह नहीं कहते कि बिलियर मत हो। वो कहते हैं डोंट इट टेक अ शॉर्टकट। बिना एस्पिरेशन के फिर आदमी और वेजिटेबल में क्या फर्क रह गया? ना देखिए स्वामी जी तो सपना दिखाते हैं ना
प्रश्न: स्वामीजी हम को करैक्टर बिल्डिंग करने को कहते है, उसके बाद जो होगा उसकी बात नहीं करते, भविष्य का एम्बिशन नहीं दिखाते।
हमको कि 100000 मेन एंड वमेन फायर विद द जेल ऑफ होलीनेस शैल गो टू द लेंथ एंड ब्रेड्थ ऑफ द कंट्री एंड ब्रिंग टू द मैसेज ऑफ दिस होलीनेस एंड एस्पिरेशन एटसेट्रा ये जो 100 थाउजेंड मेन एंड वुमेन जो कि भारत के देश गांवगांव शहर शहर घरघर
“A hundred thousand men and women, fired with the zeal of holiness, fortified with eternal faith in the Lord, and nerved to lion’s courage by their sympathy for the poor and the fallen and the downtrodden, will go over the length and breadth of the land, preaching the gospel of salvation, the gospel of help, the gospel of social raising-up — the gospel of equality.” -- Swami Vivekananda
घूम लेंगे फायर्ड विद द झील ऑफ होलीनेस ये जो पवित्रता की अग्नि से मंत्र से वह शक्तिमान होकर के वो घर-घर में यह शांति पवित्रता का मैसेज फैलाएंगे। हाउ इज दिस पॉसिबल? यदि यह एंबिशियस स्टेटमेंट नहीं है तो आई डोंट नो व्हाट इज दैट? वो मिशन स्टेटमेंट होता है ना वो कंपनी के है। वो बिल गेट्स कहता है आई वांट टू पुट अ डेस्कटॉप अपॉन एवरी डेस्ट। तो यहां पे स्वामी जी कहते हैं आई वांट टू सेंड अ प्रीचर टू ए्री होम। इफ दिस इज नॉट ए मल्टीीनेशनल कंपनी स्टेटमेंट ऑफ एस्पिरेशन और एंबिशन देन व्हाट इज इट? आई डू नॉट नो।
प्रश्न: स्वामीजी कहते है हम अमृत के संतान है, ईश्वर की दिव्य शक्तियों के वारसदार है. किन्तु यहाँ ठाकुर कहते है ईश्वर की दिव्य शक्तियों के दर्शन की अपेक्षा नहीं रखनी. उनसे सिर्फ प्रेम का सम्बन्ध रखना है. तो हम यह दोनों क्यों नहीं कर सकते. सिर्फ एक का चुनाव क्यों करना है?
एक्चुअली दिस इज नॉट अ होल ऑफ द कन्वर्सेशन। दिस इज अ पार्ट ऑफ द कन्वर्सेशन गिवन हियर टू इलस्ट्रेट अ पॉइंट। एक जो एक लार्जर पॉइंट है उसको इलस्ट्रेट करने के लिए उपमा के रूप में इस कन्वर्सेशन को दिया है। अभी ठाकुर जो बार-बार कहते हैं कि मुझे इस बात का दर्शन हुआ। यह दर्शन हुआ। कल मां को देखा कि वो एक वैश्या के रूप में खड़ी है। तो मैंने मां को कहा कि अरे तुम यहां पे इस भाव में खड़ी हो। तो यह तो एक म घूमते फिरते ठाकुर को दर्शन होता है और ठाकुर इस बात को छुपाते भी नहीं है। यदि ठाकुर यह चाहते हैं कि हम दर्शन की आकांक्षा ना करें तो ठाकुर छुपाते ये सब बातों को। आप किसी के सामने खाना खा रहे हैं बढ़िया सा आम खा रहे हैं और वो बोलेंगे आप कि वो उसके मन में यह लालच ना प्रकट हो। दिस इज नॉट पॉसिबल। या तो तुम अपने घर में छुपके से खाओ या तो फिर उसके सामने खाते हो तो शेयर करो। ये इतना कॉमन सेंस तो ठाकुर में भी है। सो इट्स नॉट लाइक कि ठाकुर नहीं चाहते कि हम दर्शन ना करें। बट जो लार्जर पॉइंट यहां पे जो शरद महाराज इलस्ट्रेट करना चाहते हैं। दो कि अवतार का साधक भाव का क्यों लिखा नहीं गया? तो यह सब एक रीजन है कि अवतार में अपूर्णता नहीं देखना चाहते। फिर अवतार कहेंगे कि आप इस तरह का ऐश्वर्य मत देखो वगैरह-वगैरह। एंड सेकंड कि हम लोग शॉर्टकट ना अपनाएं। सो इन ऑर्डर टू इलस्ट्रेट दैट दिस कन्वर्सेशन इज गिवन। दिस इज नॉट एन एब्सोल्यूट ऑल इन ऑल कन्वर्सेशन इस अर्थ में कि आइदर और यह जो स्नेहमई माता तुम दंड दाता पिता वो जो कविता का जो लाइन है वो सिर्फ दोनों पार्ट है कि स्नेहमई माता और दंडदाता पिता ये दोनों ईश्वर में है। होने ही चाहिए। अदरवाइज ईश्वर किस काम के हैं? हां। सृष्टि स्थिति सृष्टि का सर्जन पालन संहार नहीं करेंगे तो वो ईश्वर किस काम के दैट इज इंप्लाइड बट वी शुड नॉट लुक आफ्टर माने गो आफ्टर इट कि मुझे वो पार्ट नहीं चाहिए भगवान शिव भगवान शिव का तांडव नृत्य भगवान शिव का रुद्र स्वभाव भगवान शिव का प्रलय के देवता होने के बावजूद हम एक भोलेनाथ के रूप में उनको नाम दिया है। जो ब्रह्मांड का संहार करते हैं वो भोलेनाथ कैसे हो सकते हैं? और रावण जैसा रावण तपस्या करके उनके आशीर्वाद ले जाए। यह कैसे हो सकता है? सो इट इन ऑर्डर टू इलस्ट्रेट अ पॉइंट। तो वही
प्रश्न: दंडदाता पिता और स्नेहमयी माता यह जो कहा, किन्तु जब पगली मामी मारने को आयी तब माँ सारदा ने भी उसे श्राप दिया था. तो इसका का अर्थ है?
है कि जो हम इस पूरा डिस्कशन कर रहे हैं कि अवतार को कभी पूर्ण है। इस तरह से नहीं समझना है। वो पूर्ण है इस अर्थ में कि जैसे वो पानी का बना हुआ उनका ब्रेन है। आप जो जितना भी रेखापात करेंगे क्रोध का वगैरह का तो दूसरी ही क्षण वो मिट जाएगा। इस अर्थ में उनको पूर्ण करना है। नहीं कि उनका ब्रेन वह लोहे का बना है। किसी भी तरह का रेखापात होगा ही नहीं। इस अर्थ में नहीं। देखिए कि जब वो पंचमहाभूते फांदे ब्रह्म पड़े का। जब भगवान राम को पता था कि वह रावण को सीता का अपहरण करना ही है। वह सीता मैया को वहां पे जाना है। भगवान राम रावण पे आक्रमण करेंगे। वह उनका राक्षसों का संहार करेंगे। अब जैसे भगवान राम वहां पर थे अयोध्या में तो नारद आया। नारद मुनि आकर के भगवान राम को कहते हैं कि वह वहां पर रावण बैठा हुआ है। रावण का संहार करने के लिए आपका जन्म हुआ है। फिर भी आप यहां पे क्यों कुछ नहीं कर रहे हैं? बैठे-बैठे अयोध्या में बैठे हैं। तो राम क्या कहते हैं कि उसके कर्मों का क्षय होने दो। फिर उसका वो वध का जुगाड़ होगा। तो कर्म का क्षय हो गया। जिस क्षण उसने सीता मैया का अपहरण किया। तो यह सब लीला थी कि रावण का वध करने के लिए ही आना हुआ है। उसके कर्म के क्षय तभी होंगे जब मां सीता का अपहरण करेगा। जैसे ही मां का अपहरण किया वैसे ही उसके संहार का आयोजन स्टार्ट होगा। तो यह सब क्या है? लीला के भीतर में यह सब चलता रहता है। वो जो ठाकुर कहते हैं ना जटिला कुटीला ना थक ले लीला पुष्टाई होए ना। ये कोई माने वही राक्षस है। भूत पिशाच है। जला झगड़ा करने वाला कोई नहीं है। तो लीला में आनंद नहीं आएगा। तो वैसे ही ये सब लीला के पार्ट है। वो पागली मामी राधु यह मां का संसार यह काली मामा यह जो पागल भक्त आते थे वो वो सब पार्ट ऑफ माया यह नहीं होता मां चुपचाप वहां पे वो जय राम बाटी में बैठी रहती तपस्या करती करती तो हमारे पास में मसाला नहीं मिलता ना बातें करने का क्लास कैसे चलता [हंसी] हमारा मैं यदि रोज सुबह को उठकर के वही बोलता रहूंगा कि जय राम बाटी में मां बैठी है समाधिस्थ है वो सब कुछ चारों ओर शांति है तो कितने दिन क्लास
प्रश्न: हमें कोई भी निर्णय लेने में कितना सोचना पड़ता है. ठाकुर, माँ, स्वामीजी को तो बस दर्शन हुआ और उसी से सब प्रश्नो का समाधान हो गया. v
सुनेंगे? किंतु यहां पे देखिए अब अब जैसे देखिए एक एक जो लेबरर होता है वो लेबरर यदि एक घंटा काम करेगा वो ₹100 मिलेगा ज्यादा से ज्यादा। एक सीईओ होता है पर आवर उसको माने मिलियन डॉलर नहीं ऐसा कुछ मिल जाएगा। आपको लगेगा चलो सीईओ हो जाते हैं। किंतु वो सीईओ होने की जो यात्रा है वो कितनी कठिन है। आपको प्योर टैलेंट के बेस पे आपको वो आईवी लीग यूनिवर्सिटी में एडमिशन लेना है। आपका जीपीए स्कोर ना वो सब एकदम स्ट्रेटोस्फीयर में होने चाहिए। तब वो एडमिशन मिलेगा। तो वो दर्शन पाने की जो यात्रा है दैट इटसेल्फ उनको मार दिया है। बाद में तो सब बैठकर के उनको बोनस वो म वो ठाकुर कहते हैं ना पेंशन खा वो अभी वो उसने तपस्या इतनी कर ली है। बैठे-बैठे पेंशन खा रहे हैं अभी। इसलिए तो एस्पिरेशन इसीलिए तो ये सब एस्पिरेशन जो आपने कहा ना कि एस्पिरेशन नहीं एस्पिरेशन इज देयर एंबिशन इज देयर