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Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : अवतरणिका || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 19 Mar 2025

prayer

ओम स्थापकाायच धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग का पाठ हम कर रहे हैं उसमें द्वितीय भाग साधक भाव उसकी अवतरणी

ईश्वर के दर्शन की आकांक्षा रखना अच्छा नहीं है. उससे ईश्वर से हम दूर चले जाएंगे

का और जो पॉइंट हमारा चल रहा है कि ठाकुर कहते कि यदि आप ईश्वर का दर्शन प्राप्त करना चाहते हैं या तो फिर आप ईश्वर का स्वरूप देखना चाहते हैं उससे एक ऐश्वर्य का भाव आ जाएगा। ईश्वर के जो सुपर पावर है डिवाइन पावर्स है उसके ऊपर में हमारा मन ज्यादा चला जाएगा और ईश्वर का जो मातृभाव है या तो फिर बालक भाव है, सख्य भाव है, यह शांत भाव है वगैरह भाव हमारी नजरों से दूर हो जाएंगे। जैसे कि वह मां यशोदा का बाल गोपाल के साथ में था या तो फिर यह सुदामा का अपने सखा कृष्ण के प्रति था। यह भाव दूर हो जाएंगे और एक इस तरह से हम उनको इमेजिन करना शुरू करेंगे जैसे कि वह कोई बहुत शक्तिशाली है। बहुत बड़े महल में बैठे और हमारे बीच में दूरी आ जाती है। तो यह सब ठाकुर एक बार समझाते हैं। किंतु फिर यदि ठाकुर साथ में यह भी कहते हैं कि कोई भक्त अतिशय जििद करता रहेगा कि नहीं आपको मुझे दर्शन दिलवाना ही होगा। ठाकुर यदि कहेंगे कि अरे वह तो मां की इच्छा होने से होगा। और यदि भक्त फिर से काउंटर आर्गुममेंट करेगा कि आपकी इच्छा और मां की इच्छा अभी एक हो गई है तो उसके बाद में फिर ठाकुर कहेंगे कि देखो मैं तो चाहता हूं कि तुम सबको सब तरह के दर्शन हो किंतु ऐसा होता कहां है? तो यहां तक हम आकर के रुके थे और फिर साथ में हमने यह देखा कि कोई भक्त इससे भी ज्यादा जििद करता है तो ठाकुर उसको फिर ज्यादा कुछ उसके भाव के ऊपर में या तो फिर उसकी जो जिस भाव प्रवाह को लेकर के वह साधना को लेकर के चल रहा है उसमें विघ्न नहीं खड़ा करेंगे। यदि उसको दर्शन चाहिए तो अच्छी बात है कि दर्शन उसको हो। अभी जैसे कि यह छोटा नरेंद्र का है कि एक बार ठाकुर ने उसको पूछा कि अच्छा बताओ तो तुमको क्या चाहिए? तो छोट नरेंद्र यानी कि नरेंद्र दो थे। एक तो अपना नरेंद्र जो कि भविष्य के स्वामी विवेकानंद फिर एक जूनियर नरेंद्र जिसको ठाकुर छोट नरेंद्र कहा करते थे। तो यह छोटा नारायण को पूछा ठाकुर ने कि अच्छा बताओ तुमको क्या चाहिए? तो वह कहता है शुद्ध भक्ति चाहिए मुझे बस और कुछ नहीं चाहिए। तो वहां पर मास्टर महाशय बैठे थे तो ठाकुर ने कहा कि अरे यह दो दिन का बच्चा है। इसको क्या समझ में आएगा शुद्ध भक्ति क्या है? किंतु साथ-साथ में ही क्या कहते हैं पता है कि देखो कि यह शुद्ध हृदय बालक है। उसके मन में यदि यह बात उदित हुई है, यह बात प्रकट हुई है कि मुझे शुद्ध भक्ति ही चाहिए और कुछ नहीं चाहिए तो उसका भी एक तात्पर्य है। इसका भी एक अर्थ है। अर्थात कि यदि कोई शुद्ध हृदय वाला पवित्र मन वाला एक निष्ठावान भक्त है और यदि वो ठाकुर के पास में आकर के जििद करता है कि आप मुझे ईश्वर का दर्शन करवा दीजिए तो उसके पीछे में भी एक गहन इंगित है। एक गहन राज छुपा हुआ है। तो ठाकुर कहते हैं आखिर में शरद महाराज

ठाकुर किसी का भाव भंग नहीं करते थे

कहते हैं कि ठाकुर का जो स्ट्रेटजी था या तो फिर ठाकुर का जो वर्ल्ड व्यू था किसी का भी भाव भंग नहीं करते थे। किस जो जो जिस तरह का भाव है उसको उस भाव में ही रहने देते थे। उसको उसी तरह की भाव की वो शिक्षा देते थे। जिससे कि क्या होगा कि उसको ईश्वर प्राप्ति का मार्ग उसके लिए सहज हो जाए। जिसके भीतर में शरणागति है उसको जबरदस्ती अद्वैत वेदांत का उपदेश देना तो उसको तो फिर और कितने समय लगेगा शरणागति आई है कितने सालों की कितने जन्मों की मेहनत के बाद में अभी शरणागति को रास्ता धर करके ईश्वर प्राप्ति करने की वजह ऐसा यदि कह दे कि अरे ये तो निम्न रास्ता है उच्च रास्ता है अद्वैत वेदांत तुम वहां पर चले जाओ तो और कितने जन्म उसको लग जाएंगे बेचारे को कि वो ब्रह्मचर्य तपस्या तप वो कठोरता करने में तो बेटर है कि यदि शरणागति ही आ गई है तो शरणागति का मार्ग पकड़ करके ईश्वर का दर्शन एक बार कैसे भी कर लो। वह जो ठाकुर का उदाहरण है कि काली घाट यदि गए हैं तो भिखारी को रुपया देते रहेंगे। दक्षिणा देते रहेंगे कि कैसे भी करके भीड़ में जाकर के धक्कामुक्की करके पहले तो मां काली का दर्शन कर दें। यानी कि क्या है कि आपकी दृष्टि से लगता है कि यह आइडियल है। यह आइडियल मार्ग है। यह आइडियल बिहेवियर है। बट इस तरह का आइडियल खोजने को मत जाइए। यह मुझे मैं यदि कालीघाट जाऊंगा, भिखारी को देखूंगा तो नेचुरली मेरे मन में दया आएगी। नेचुरली मुझे लगेगा कि मेरे लिए आइडियल यह है कि इस बेचारे गरीब आदमी को दुखी आदमी को मैं मदद करूं। किंतु आप उसको मदद करने के लिए जगत में नहीं आए हैं। या तो कालीघाट नहीं आए हैं। कालीघाट आए हैं मां काली का दर्शन करने के लिए तो कैसे भी करके पहले एक बार दर्शन कर लीजिए। तो यह ठाकुर की फिलॉसोफी है। जो जिस भाव को लेकर के रहता है उसको उसी भाव के माध्यम से ही पहले तो कैसे भी करके ईश्वर का दर्शन करवा देने दो। उसके मन में किसी भी तरह की द्विधा ना उत्पन्न करो। जैसे गीता में भी है कि पंडित लोग जो होते हैं ज्ञानी होते

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्

हैं वह लोग जो निम्न निम्न तो नहीं कहेंगे कहेंगे कि जिनका ज्ञान कम है ऐसे लोगों के मन में किसी भी तरह की द्विधा या संशय उत्पन्न नहीं करेंगे क्योंकि क्या है कि आध्यात्मिक जीवन में संशय एक बहुत बड़ा अंतराय है। यदि मेरे मन में संशय प्रकट हो गया कि ईश्वर है कि नहीं तो तो फिर मैं उससे आगे ही नहीं बढूंगा या तो फिर मैं जिस गुरु ने जो मंत्र मुझे दिया है वह मंत्र ठीक है कि नहीं ऐसा होने से ही मैं वहीं पर डूब जाऊंगा। वो जो ठाकुर की फेमस कहानी कि लंका में एक आदमी था उसको अपना जो भारत में आना था किंतु भारत के और लंका के बीच में तो समुंदर है। तो वह लंका के राजा विभीषण के पास में गया कि कहा कि मुझे भारत जाना है। मैं क्या करूं? तो हो सकता है नौका वगैरह नहीं अवेलेबल होगा। व्हाटएवर विभीषण ने उसको एक कागज पर एक मंत्र लिख के दे दिया कि कहा कि अपने कपड़े में उसको बांध करके तुम चले जाओ। तो यह आदमी है कि उस मंत्र को अपने कपड़े में बांध करके वो जा रहा है। बड़ा सा वो समुंदर के ऊपर में चलते-चलते जा रहा है। देखिए वो बीच में उसको संदेह हुआ कि ऐसा तो यह कौन सा तारक मंत्र है? तारक ब्रह्म मंत्र कौन सा है? यह कि मुझे समुंदर में डूबने नहीं देता। सर समुंदर में मुझे तैर करके तैरने की भी जरूरत नहीं है। चला करके मुझे ले जा रहा है। तो यह सोच करके उसके मन में क्यूरियोसिटी हुई। वह मंत्र खोल करके देखा तो भगवान राम का नाम लिखा था। तो साथ में उसके मन में संदेह आ गया। बस इतना ही बस राम का नाम लिखा है और कुछ नहीं। जैसे ही संदेह आया वहीं पर समुंदर में डूब गया। तो यह संशयात्मा

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति

विनश्यति जिसके मन में अपने इष्ट के प्रति गुरु के प्रति साधन पद्धति के प्रति संदेह है वो व्यक्ति ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाएगा। साथ में ही जैसे कि खास करके मेरा जो एक एटीट्यूड है कि सभी चीजों में एक पैराडॉक्स खड़ा करना, सभी चीजों में एक क्वेश्चन मार्क खड़ा करना, सभी चीजों को एक तरह से प्रश्नार्थ चिन्ह लगाना कि या यह ठीक है कि नहीं है, यह ठीक है कि नहीं है। तो देखिए कि दो बात है यहां पे। सबसे पहले तो मैं अपने खुद के बारे में कहूं कि ठाकुर मां स्वामी जी को इस हद तक मैंने अपना लिया है कि उनके प्रति मैं छोटा-मोटा क्वेश्चन करता हूं। मेरी भक्ति को कोई हानि नहीं होने वाली। वो एक चीज है। दूसरा है कि देखिए कि जो इस तरह से एकेडेमिक जिनका ट्रेनिंग होता है या तो फिर जिन लोगों को स्टडी लेकर के रहते हैं वह उन लोगों के लिए यह सब क्वेश्चन मार्क वगैरह ठीक है। एक आम भक्त है जिसको तो पूरा संसार का बोझा अपने सर पर लेना है। जिसको अपना पूरा फैमिली चलाना है। आप लोग गृहिणी है तो आपको खाना पकाना है बच्चों के लिए। वह सब कुछ करना है आपको। तो फिर आपके लिए इस तरह का संदेह संशय कि अच्छा इस किताब में जो लिखा है वह ठीक है कि नहीं वह आपके लिए बिल्कुल उचित नहीं है। जैसे कि कल हमारा क्लास समाप्त हुआ उसके बाद में जो दो-तीन प्रश्न आना शुरू हुए कि अच्छा हमारे पास में कथामृत का यह एडिशन है वह ऑथेंटिक है कि नहीं तो मेरा आप सबको यह विनती रिक्वेस्ट कि कौन सी चीज ऑथेंटिक है नहीं है वह सब बिल्कुल क्वेश्चन मत कीजिए। उद्बोधन कार्यालय से बंगाली में जो पब्लिश हुआ है और इन जनरल अपने ऑर्डर से जो पब्लिश होता है उसको 100% ऑथेंटिक मानना है। नेवर क्वेश्चन और नेवर डाउट एनीथिंग। वो डाउट और क्वेश्चन करने की लग्जरी कब आती है पता है? जबकि आप रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य में इतने गहराई से डूब जाएंगे कि आपकी सांसों के साथ में ठाकुर का नाम चलेगा या तो फिर ठाकुर के विचार चलेंगे। ठाकुर का चिंतन चलेगा। मन हृदय पूर्ण शरणागत हो गया है। तब कहीं जाकर के एकेडेमिक एक्सरसाइज के रूप में एक इंटेलेक्चुअल स्टिमुलेंट के रूप में आप इस तरह के क्वेश्चन कर सकते हैं। नॉट बिफोर दैट बिफोर दैट इस तरह की लग्जरी ठीक नहीं है। तो इसीलिए यहां पर ठाकुर का कहना है ठाकुर कहते हैं कि कारो भाव नष्ट करते नहीं रे। कारो भाव नष्ट करते नहीं। किसी का भाव नष्ट नहीं करना है रे। किसी का भाव नष्ट नहीं करना है। और उसके बाद में वह पूरा उदाहरण ठाकुर शरद महाराज हमको देते हैं। तो इसका डिटेल वर्णन हमने कल देख लिया है। आज हम इसके बारे में सिर्फ थोड़ा सा पाठ कर लेते हैं कि महाराज जी यहां पे एग्जजेक्टली क्या लिखते हैं और पाठ करने

हमारी मुख्य पुस्तकें हमारे शास्त्र हैं। उन्हें उसी भाषा में पढ़ा जाना चाहिए जिसमें वे मूल रूप से लिखे गए थे

का भी देखिए अब अपना लिटरेचर में कभी-कभी इस तरह से होता है। मैं सोचता हूं कि इस इस पॉइंट के बारे में हमने डिस्कस जब कर ही लिया है, डिटेल में डिस्कस कर ही लिया है। तो पढ़ने की क्या जरूरत है? थोड़ा सा इसको स्किप करके रीडिंग स्किप करके नेक्स्ट पॉइंट की ओर चला जाना चाहिए। ऐसा मैं कभी-कभी सोचता हूं। किंतु एक्चुअली क्या है पता है? यह जो किताबें जो हम पढ़ रहे हैं, वह सिर्फ किताब नहीं है। वह शास्त्र है। जैसे कि गीता श्रीमद्भगवत गीता या तो फिर कठोपनिषद, प्रश्नोपनिषद, ईशोपनिषद जो जो 11 10 11 मुख्य उपनिषद है और यह ब्रह्मसूत्र है, प्रस्थानत्रय है। उसके पॉइंट के डिस्कशन के अलावा भी शास्त्र जो है या तो जो टेक्स्ट है उसका अपना एक चार्म है, पावर है, ब्यूटी है। क्योंकि वह शास्त्र है। वह आम किताबें नहीं है। अभी जैसे कि देखिए मेरी एक फेवरेट किताब है अह अपने ही लिटरेचर में से कहूं कि स्टोरी ऑफ़ एन इपोक ये स्वामी विजानंद जी महाराज की बायोग्राफी है। अतिर स्मृति यदि मुझे याद है एग्जैक्टली तो बंगाली यही टाइटल है। बड़ी ही सुंदर किताब है। इतना सुंदर किताब है कि वीरानंद जी महाराज काली कृष्ण महाराज वह तो जॉइ करने को जब आए थे वराह नगर मठ में उन्होंने जॉइ किया था सर्वप्रथम ही वाज़ द फर्स्ट ऑफ दिस नेक्स्ट जनरेशन ठाकुर के पास में आने वाले सर्वप्रथम थे डायरेक्ट डिसाइपल त्यागी संतानों की यदि श्रेणी में देखा जाए उसके बाद की जो जनरेशन है उनके बाद की त्यागी डायरेक्ट डिसाइपल के बाद की उस जनरेशन में यह काली कृष्ण महाराज शुद्धानंद जी वगैरह वो प्रथम हम थे। तो यह शुद्धानंद जी तो खैर वैसे थोड़ा बाद में आए किंतु काली कृष्ण महाराज ने वही वराह नगर मठ में जॉइ किया था। तो उनकी बायोग्राफी में वराह नगर मठ का वर्णन है और बाद में फिर यह आलम बाजार मठ की तपस्या है। स्वामी जी अमेरिका से आते हैं। फिर वो हिमालय मायावती जाते हैं। तो वह सब यात्राओं का वर्णन है। फिर जब डायरेक्ट डिसाइपल एक के बाद एक महासमाधि में लीन होते जाते हैं और सेकंड जनरेशन ने किस तरह से अपने संघ की बागडोर अपने हाथों में संभाली। अपने संघ का संचालन उन्होंने किस तरह से किया। उस तरह के बड़े ही इंसाइट पूर्ण एनालिसिस है और घटनाएं हैं। क्योंकि क्या है कि देखिए ये तो सब डायरेक्ट डिसाइपल के बारे में तो क्या है ठाकुर के लीला संगी थे सब लीला संगी लीला संगिनियां थी सब वो ठाकुर के साथ में आते थे ठाकुर के साथ में जाते थे तो वो तो सब देवमानव थे किंतु यह वीरानंद जी महाराज शंकरानंद जी महाराज जितन महाराज है सिद्धानंद जी है वो भी हमारे लेवल के हैं मनुष्य है हालांकि मनुष्य में भी सर्वश्रेष्ठ ऋषि के लेवल पर बैठे हैं किंतु है तो मनुष्य ही वो राजा महाराज महा महापुरुष महाराज, खोखा महाराज इनकी तरह डिवाइन लेवल पर तो नहीं बैठे हैं जो कि हम उनको अप्रोच ना कर पाए। तो उनके जीवन के बारे में पढ़ के बहुत इंसाइट भी मिलता है, आनंद भी मिलता है। अभी एक बात है कि यदि हम वो किताब का पाठ कर रहे होते स्टोरी ऑफ एन इपोक उसका तो मैं क्या करता एक के बाद एक पैराग्राफ मैं पहले से ही थोड़ा सा ठीक करके उसके बारे में जो पॉइंट्स है वो पॉइंट्स मैं आपको बता देता। एनालिसिस करके स्टोरीज वगैरह जो है बता देता। मैं वर्ड बाय वर्ड लाइन बाय लाइन उसको पढ़ता नहीं। किंतु वह एक किताब है। बहुत अच्छी किताब है। इंस्पिरेशनल बुक है। किंतु वह सिर्फ किताब ही है। जबकि लीला प्रसंग है। कथामृत है। स्वामी जी के जो कोलंबो टू अल्मोड़ा लेक्चर्स वगैरह है। मां की जीवनी है। गंभीरानंद जी महाराज का जिसका कि हम पाठ कर रहे हैं। वह सब सिर्फ किताबें नहीं है। शास्त्र है। और इसके यह जो शब्द है वह भी खास करके ओरिजिनल में ट्रांसलेशन में नहीं ओरिजिनल में। उसका यदि हम श्रवण भी करेंगे तो यह जो मंत्र पाठ जहां पर होता है तो वह किस तरह से वातावरण शुद्ध पवित्र हो जाता है वैसे ही इसका भी वही प्रभाव है। आप मान लीजिए ओरिजिनल में पढ़ने का एक जो देखिए कि बेनिफिट क्या है या तो फिर उपमा देकर के कहूं कि यदि मान लीजिए आप यज्ञ या होम कहीं पे हो रहा है। अभी इसके जितने भी मंत्र है घनपाठ वगैरह जो कुछ भी है नारायण सूक्तम पुरुष सूक्तम देवी सूक्तम सब कुछ तो ओरिजिनल संस्कृत में लिखा गया है। अभी यदि आप उसको ओरिजिनल संस्कृत में पाठ नहीं करके चेंटिंग नहीं करके उसका हिंदी गुजराती ना इंग्लिश अनुवाद का चेंटिंग करते तो कैसा वो लगता आपको अर्थ समझ में आ जाता किंतु उसका जो पावर है वो चला जाता तो वैसे ही यहां पे भी यह सब मंत्र है जो कि ओरिजिनल लिखे गए हैं बेंगोली में और इसका पाठ करना और श्रवण करना आवश्यक है। यह मंत्र का काम करता है। सुनकर के ही अपने भले ही चाहे हमको लैंग्वेज समझ में ना आए। ऐसा नहीं है कि मेरा कोई बांग्ला इतना अच्छा है। मेरा सब सुपरफिशियल ही है। किंतु यह पाठ करके बोल कर के श्रवण करके यह जो अपने मन के भीतर में एक पवित्र भाव जागृत होता है। मंत्र पाठ सुनकर के जहां पर मंत्र पाठ चल रहा है। वातावरण पवित्र होता है। ऐसा ही यह ओरिजिनल शास्त्र बेंगली में जो लिखे गए हैं, उसका यह

वैसे तो ठाकुर भक्तो को ईश्वर-दर्शन की आकांक्षा रखने को मना करते थे, किन्तु कल्पतरु दिन को उन्होंने सबको स्पर्श कर के ईश्वर-दर्शन करवाया

प्रभाव है। तो, अभी यह पूरा जो डिस्कशन हमने किया था कल किसी का भाव भंग नहीं करने का। इसके बारे में अभी एक्चुअल क्या लिखा गया है इसका पाठ करते हैं। शरद महाराज लिखते हैं ओ रूप निर्बंधाती सोए पियाओ किंतु ठाकुर ताहार ओई रूप भ्रम पूर्ण दृढ़ विश्वास पांगिया ताहार भाव नष्ट कोरिया दीबार चेष्टा को ते ना इस तरह से बार-बार कोई जििद करता है कि ठाकुर आप मुझे ईश्वर का दर्शन करवा दीजिए किसी भी तरह का भाव मुझे दे दीजिए किसी भी तरह की अनुभूति दे दीजिए तो ठाकुर किंतु क्या करेंगे ठाकुर कभी-कभी थोड़े से यह होते आएंगे। कोई आपके साथ में जििद करता है तो कैसा एक थोड़ा सा एक भाव होता है कि अरे इतना जििद क्यों करता है? नाराजगी नहीं। किंतु क्या है कि मुझे जिद पसंद नहीं है इस तरह की जो जो मैं दे नहीं सकता उसके बारे में मैं इस तरह की जििद सुन के क्या करूं? तो जो भी है तो इस तरह से एक तरह से आपको कॉर्नर कर लिया जाता है तो इस तरह से कॉर्नर होने पर भी कभी-कभी नाराज होने पर भी ठाकुर किंतु जिसका इस तरह का भ्रम पूर्ण दृढ़ विश्वास है देखिए भ्रम पूर्ण दृढ़ विश्वास दृढ़ विश्वास है किंतु भ्रम पूर्ण है। तो यह भ्रम पूर्ण दृढ़ विश्वास भांग करके तोड़ करके किसी का भाव नष्ट करने की किसी का भाव तोड़ देने की वो प्रयत्न चेष्टा यानी कि प्रयत्न प्रयत्न कभी करते नहीं थे। देखिए कि यहां पे शरद महाराज ने ऐसा क्यों लिखा है? दृढ़ विश्वास के साथ में ब्रह्मपूर्ण यह तो वही बात आ गई कि जब नरेंद्र कहता है ठाकुर को कि यह अंधविश्वास है। तो ठाकुर क्या कहता है? ठाकुर क्या कहते हैं कि अरे विश्वास विश्वास है उसको अंध है देख देखता है इस तरह का आंख वाला विश्वास बिना आंखों का विश्वास ये क्या है श्रद्धा होती है वो श्रद्धा है उसको अंध या देखते देखने वाली श्रद्धा अंधश्रद्धा इसका तो कोई अर्थ नहीं है आप यदि ईश्वर पे विश्वास करते हैं भूत पे विश्वास करते हैं व्हाटएवर विश्वास विश्वास है तो यहां पे भी यदि ठाकुर ने उस समय वहां पे कहा है इस तरह से तो यहां पे इस तरह से क्यों कहा कि शरद महाराज कि भ्रम पूर्ण दृढ़ विश्वास अभी जैसे कि गिरीश घोष है। गिरीश घोष का तो जगजाहिर उदाहरण है कि ठाकुर को अवतार के रूप में घोषित किए थे। बार-बार जहांजहां जाते थे तू अवतार है। ठाकुर अवतार है। ऐसा बोलते रहते थे। इस बात से कभी-कभी ठाकुर नाराज भी हो जाते थे। कहते थे कि मुझे गुरु गुरु बाबा या कर्ता। गुरु अर्थात तो पता ही है गुरु बाबा अर्थात ये जो बाबा जी ऐसा कहते हैं ना हम किसी साधु को हम कहते हैं बाबा जी। और कर्ता यह बंगाली शब्द है। कर्ता यानी कि जो एक्शन लेता है। लिटरल मीनिंग ऐसा होगा। यह कर्ता उसको कहा जाता है जो कि जिनको कि हम गुरु के रूप में स्वीकार करते हैं। जैसे कि बंगाली में एक सेक्ट था बंगाल में जिसका नाम था कर्ता भजा। कर्ता अर्थात कि गुरु भजा अर्थात कि उनकी उपासना करना। यानी कि गुरु की उपासना करना। इसमें होता क्या है कि देखिए कि आप ईश्वर की उपासना करते हैं, गुरु से मार्गदर्शन लेते हैं, गुरु को श्रद्धा करते हैं। वह तो ठीक है। किंतु गुरु को ही आप ईश्वर बना देंगे। वह तो है तो मनुष्य तो उसकी पूजा करेंगे तो उसका मन घमंड से भर जाएगा। फिर वो अश्रंखल व्यवहार करना शुरू कर देगा। अनाचार दुराचार करना शुरू कर देगा। और इस तरह के कितने ही उदाहरण है आजकल का जो न्यूज़ पेपर खोल करके देख लेंगे थोड़ा Google सर्च कर लेंगे तो ऐसे बाबा जीियों की कमी नहीं है जो कि लोगों को व्हाटएवर ये सब तो हम पढ़ते ही हैं। तो इसलिए ठाकुर कहते हैं कि मुझे गुरु कर्ता और बाबा यह तीन जो कोई कहता है तो ऐसा लगता है जैसे कि कोई मेरे देह में कांटे मार रहा है। तो यहां पे है यह वही गिरीश घोष कि जहां तहां जाकर के कहता रहता है कि यह ठाकुर तो अवतार है। ठाकुर तो अवतार है। तो एक दिन नाराज होकर के ठाकुर गिरीश को कहते हैं वही फर्स्ट जनवरी 1886 कि अरे तुम यह जो सब मेरा प्रचार कर रहे हो अवतार कह के तो क्या है भाई इसके पीछे माजरा क्या है क्यों ऐसा कह रहे हो तो गिरीश सीधा साक्षात दंडवत उनके पैरों में गिर जाता है कहता है व्यास वाल्मीकि ज इयत्ता करते पारेना व्यास वाल्मीकि जिसके गुणगान गातेगाते थक जाते हैं गुणगान का अंत नहीं कर पाते हैं उसके बारे में उनके बारे में मैं क्या कहूंगा तो वैसे ही ठाकुर समाधि में चले गए और सबको स्पर्श करके चैतन्य हो चैतन्य हो बोलना शुरू कर दिया। तो देखिए कि ठाकुर का भी ऐसा है। पहले तो कहते हैं कि देखो कि इस तरह से तुम दर्शन मांगना या तो फिर भाव प्रकट करना या तो फिर भाव चाहना ईश्वर से यह सब मत करो। किंतु कोई जब बार-बार रिक्वेस्ट करता रहता है ठाकुर को। ठाकुर कहते हैं कि अरे वो तो मां की इच्छा से होगा। भक्त कहेगा कि आपकी इच्छा और मां की इच्छा एक हो गई है तो ठाकुर फिर हंस देते थे। फिर उसके ऊपर में और कुछ नहीं बोलते थे। देखिए ठाकुर का भी यह इस पर्टिकुलर कॉन्टेक्स्ट में यदि हम कहेंगे इस उदाहरण को कि इस उदाहरण को इस तरह से अप्लाई होगा कि ठाकुर नहीं चाहते कि किसी का भाव भंग हो। किंतु थोड़ा सा लार्जर कॉन्टेक्स्ट में देखिए। हमने तो रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य का अभ्यास किया है। यह जो ठाकुर के जीवन के जितने फेजेस है, जितने भी यह स्टेजेस है, उसका भी अभ्यास किया है। हमको पता है कि बाल्या अवस्था ठाकुर की वो फर्स्ट फेज है। फिर कोलकाता आकर के साधना की अप टू शोडशी पूजा वो सेकंड फेज है। शोडशी पूजा से जब पानीहाटी का उत्सव कैंसर प्रारंभ हुआ तब तक का आनंद पर्व है। बाल्य पर्व, साधन पर्व, आनंद पर्व और फिर है संघ पर्व। या तो फिर यह सभी को जिनको इकट्ठा करके ठाकुर ने भविष्य के अपने संघ का निर्माण किया वो पर्व। तो अभी यह संघ पर्व में और आनंद पर्व के बीच में डिफरेंस आप देखिए कि ठाकुर आनंद पर्व में सभी को डिसरेज करते थे कि तुम लोग मुझे गुरुकर्ता या बाबा मत कहो। मैं अवतार हूं। ऐसा कहना ठीक नहीं। किसी किसी को हिंट देते थे। किंतु जब कोई ओपनली ऐसा कुछ कहता था तो ठाकुर पसंद नहीं करते थे। किंतु जब से कैंसर हुआ जब से अंत्य लीला ठाकुर की प्रारंभ हुई ठाकुर ने सबके सामने अपने अवतारत्व का परिचय देना शुरू कर दिया था। तो यहां पे भी यदि शरद महाराज इस घटना को इस तरह से कहते हैं कि ठाकुर किसी का भाव भंग नहीं करना चाहते थे। हमको इस घटना को दो फेज में देखना चाहिए। एक तो आनंद पर्व में जबकि ठाकुर डिसरेज करते थे कि अरे यह सब दर्शन वगैरह मत मांगो या तो फिर भाव के पीछे में मत दौड़ो और वही ठाकुर जब संघ पर्व में अपने जो अंतिम अंत्य लीला में है उस समय ठाकुर किंतु स्वयं लोगों को स्पर्श करवा करके भाव दे देते थे स्पर्श करवा करके ईश्वर दर्शन दे दिया काशीपुर में कल्पतरु की घटना तो यहां पे भी देखिए कि कितना डिलीशियस कंट्रास्ट है किस तरह का पैराडॉक्स एक पर्व है आनंद पर्व जबकि ठाकुर अपना स्वरूप छुपाते हैं। भक्तों को थोड़ा सा संयमित करने को कहते हैं कि अपनी भावनाओं को अपना यह जो भक्ति है उस सबको आप तपस्या और साधन भजन की ओर आप रीडायरेक्ट कीजिए और वही संघ पर्व अंतिम पर्व है। जबकि ठाकुर सामने से स्पर्श करके अरे यह जो भक्त है उनकी तो बात छोड़ ही दीजिए। रामबाबू जैसे ही पता चला कि ठाकुर कल्पतरु हुए हैं दौड़े दौड़े वो किचन का में जो रसोइया है वह जो बागान का माली है ऐसे जो वर्कर भरकर है सबको खींच करके ले आए ठाकुर के चरणों में फेंक दिया और ठाकुर ने भी उनको स्पर्श करके जैसे ही स्पर्श किया किसी ना किसी को कोई ना कोई आध्यात्मिक अनुभूति होनी शुरू हो गई तो उस समय क्या ठाकुर भूल गए यह बात को कि इस तरह के आध्यात्मिक अनुभव मांगना दर्शन मांगना यह तो फिर भाव मांगना ठीक नहीं यही रामलाल दादा की बात है। रामलाल दादा यानी कि ठाकुर के जो मध्यम अग्रज है बड़े भाई रामेश्वर उनके पुत्र वह भी यानी कि ठाकुर उनके चाचा हुए रामलाल दादा के तो वो वहां पे वो पुजारी थे काली मंदिर में ठाकुर की सेवा भी करते थे और जिस दिन ठाकुर वो फर्स्ट जनवरी को अपने कमरे में से नीचे आए तो रामलाल दादा उनके पीछे पीछे में ही थे और उनको उस समय जब ठाकुर सबको स्पर्श कर रहे तो उनको भी स्पर्श कर दिया तो जैसे ही उनको स्पर्श किया रामलाल दादा बाद में लिखते हैं कि जब मैं अपना आंख बंद करके ईश्वरीय मूर्ति को देखना चाहता था तो कभी उनके हाथ दिखते थे, कभी पैर दिखता था तो कभी सर दिखता था। पूरी ईश्वरीय मूर्ति मेरे इष्ट की पूरी मूर्ति मुझे कभी नहीं दिखी। जिन किंतु जिस क्षण ठाकुर ने मुझे स्पर्श किया उसी क्षण वो संपूर्ण मूर्ति का दर्शन मुझे होने लगा। तो ये ये ठाकुर का आप कहेंगे तो कि किस तरह से हमको वो हमारे साथ में खेल करते हैं। किस तरह से हमको पटाते हैं। एक और कहते हैं कि दर्शन को मांगना नहीं है। दूसरी और है कि सामने से स्पर्श करके दर्शन दिलवा रहे हैं। यानी कि देखिए कि ठाकुर के जीवन के भी यह सब फेस है। एक फज़ है कि वह जो अपने भाव को अपने जो बह प्रकाश है उसको वो थोड़ा सा संयमित रखना चाहते हैं। क्यों? क्योंकि उनके जो त्यागी संतान है वह उनके पास में आएंगे। उनको वह साधन भजन तपस्या कठोरता की शिक्षा देंगे। ब्रह्मचर्य का उपदेश देंगे। जब उन लोगों का एक फाउंडेशन फिट हो जाएगा। उसके बाद में आप जाकर के जगत में कितना ही उसको प्रचार प्रसार कर दीजिए डज नॉट मैटर। जो स्वामी जी कहते हैं ना ठाकुर खुद कहते हैं कि पौधा जब छोटा होता है उसको आप चारों ओर से उसको घेर करके रखना है प्रोटेक्शन में। किंतु जब पौधा वही बड़ा हो जाता है, पेड़ हो जाता है, उसके साथ में आप चैन से एक हाथी को भी बांध देंगे तो भी हाथी खींचेगा भी तो पेड़ को कुछ नहीं होने वाला। तो वैसे ही डायरेक्ट डिसाइपल की जो तपस्या थी, ब्रह्मचर्य की जो साधना थी, त्याग की जो साधना थी, वह अभी इतनी दृढ़ीभूत नहीं हुई थी। वे लोग नया-नया आना शुरू हुए थे। उस समय यदि ठाकुर इस तरह से ओपनली अपने ऐश्वर्य का भाव दिखाते इस तरह से ओपनली वह अपनी शक्ति का प्रकाश करते कि मैं चाहूं तो स्पर्श करके लोगों को ईश्वर दर्शन करवा सकता हूं तो यह नर नरेंद्र खेतों ही इज अ यूनिक पर्सन किंतु एटलीस्ट ये बाबूराम महाराज हैं लाटू महाराज हैं राजा महाराज है वह क्या ठाकुर से कहते नहीं कि यदि आपके पास में स्पर्श करवा के ही ईश्वर दर्शन करवाने की शक्ति है तो झूठमठ का हमारे पास में इतनी तपस्या क्यों करवाते हैं दैट क्वेश्चन माइट हैव अराइज़्ड। तो दैट इज व्हाई ठाकुर ने अपने जो जो बाह्य प्रकाश गुरु पर्व जो है उसको दो फेस में बांट दिया है। फर्स्ट फज़ में है कि ठाकुर पहले तो इन लोगों से साधना करवा लेते हैं। सेकंड फेज में है कि अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं। तो यह भी कितना जैसे हमको पता है कि ठाकुर यह सब सोच समझ करके नहीं करते थे। जगन माता ही उनके लिए स्ट्रेटजी बना देती थी। अभी यहां पर हम आगे देखते हैं कि अनेक समय प्रत्यक्ष कोिया छ एवं तहां के बारंबार बोलीते सुनिया छची अच्छा ठाकुर ए रूप व्यवहार हमरा अनेक समय प्रत्यक्ष करिया छ एवं तहां के बारंबार बोलीते सुनिया छ कारो भाव नष्ट करते नहीं रे कारो भाव नष्ट करते नहीं तो पहले तो ठाकुर किसी का इस तरह से जो विश्वास है दृढ़ विश्वास उसको तोड़ते नहीं थे और उसके साथ में ही ठाकुर बार-बार बार कहते थे कि किसी का भाव नष्ट करना नहीं है रे। किसी का भाव नष्ट करना नहीं है। अच्छा

जब ठाकुर नरेन (स्वामी विवेकानंद) को अद्वैत साधना सिखाते हैं, तो नरेन कहते हैं, "मैं भगवान हूँ", ऐसा कहना पाप है।

इसके बाद में वह पूरी घटना आती है अभदानंद जी महाराज की। शरद महाराज क्या लिखते हैं? पहले तो इस पैराग्राफ का टाइटल देते हैं। भाव नष्टकोरा संबंधे दृष्टांतो काशीपुर बागाने शिवरात्रि को था। भाव नष्ट करने के संबंध में एक दृष्टांत काशीपुर में बागान में शिवरात्रि की बात प्रबंधोक्त विषय शहीद शाखा तो संबंध ना थाकिले ओ कथाटी जोख पाड़ा गया छ तोखन एकटी घटनार उल्लेख करिया पाठक के बुझया देवा बालो अभी यह जो बात हम कर रहे हैं उसके साथ में साक्षात संबंध नहीं है किंतु इसी थीम के ऊपर में है बोलकर के जब यह बात खड़ी ही हुई है तब एक घटना का उल्लेख करके पाठक को यानी वाचक को समझा देना उचित है। समझा देने से अच्छा रहेगा। इच्छा और स्पर्श मात्र अपर शरीर मने धर्म शक्ति संचारितो कर बार क्षमता आध्यात्मिक जीवो ने अति अल्पो साधके भाग्य लाभ होया था केके इच्छा और स्पर्श मात्र से दूसरों के शरीर और मन में धर्म शक्ति संचारित कर करने की क्षमता आध्यात्मिक जीवन में बहुत कम साधकों के भाग्य में यह प्राप्त होती है। स्वामी विवेकानंदो काले ओ क्षमता भूषित होया प्रभु तो लोक कल्याण साधन करबेन ठाकुर ए कथा आमादिग के बारंबार बोलिया छिलेन स्वामी विवेकानंद भविष्य में इसी क्षमता से अलंकृत होकर के बहुत सारे लोगों का कल्याण करेंगे यह बात ठाकुर ने हमको बार-बार कही है। स्वामी विवेकानंदर मते स्वामी विवेकानंदर मतो उत्तम अधिकारी संसारे बिरोल प्रथम होते ठाकुर ओई कोथा सम्यक बुझिया वेदांतोक्त अद्वैत ज्ञाने उपदेश दिया ता चरित्र और धर्म जीवन एक भाबे गोठितो कोते छिलेन स्वामी विवेकानंद की तरह उत्तम अधिकारी इस संसार में विरल है आसानी से नहीं मिलते हैं पहले से ही यह बात समझ करके अच्छे से समझ करके शम्यक बुझिया ठीक-ठीक समझ करके ठाकुर ने वेदांतोक्त अद्वैत ज्ञान वेदांत में जो बताया गया है वेदांत में जो उल्लेखित है उस अद्वैत ज्ञान का उपदेश देकर के स्वामी जी के चरित्र और धर्म जीवन को एक भाव में गठित करने का प्रयास गठित करना प्रारंभ कर दिया था। ब्राह्म समाज प्रणाली ते द्वैत भावे ईश्वरपासनाय अभ्यस्तो स्वामी जी निकट वेदांतते सोहम भा उपासनाटा तो पाप बोलिया पर गणित होले हो ठाकुर तहां के तदनुशीलन कोइते नाना भाे चेष्टा करते उस समय स्वामी जी वहां पे जाते थे ब्रह्मो समाज में तो ब्रह्मो समाज की प्रणाली से द्वैत भाव से ईश्वर की उपा उपासना करने में अभ्यस्त स्वामी जी के सामने वेदांत का यह सोहम भाव उपासना उस समय पाप बोलकर के परिगणित हो रही थी। उनको पाप समान लग रही थी। किंतु फिर भी ठाकुर उनको ठीक-ठीक समझा करके अनुशीलन करते नाना भावे चेष्टा कोरिया चिलेन उनको वेदांत की साधना फॉलो करवाने के लिए ठाकुर ने प्रयास किया था। अभी देखिए कि यहां पर एक्चुअली क्या कहना चाहते हैं कि सोहम भाव कि मैं ही ईश्वर हूं। तो यदि आप द्वैत भाव का फॉलो कर रहे हैं। अभी देखिए कि एक्चुअली ब्रह्मो समाज तो द्वैत भाव वाला नहीं था। या तो फिर कहेंगे द्वैत भाव वाला था किंतु वे लोग निराकार के उपासक थे। यह कैसा हो गया पता है? यह लोग कहते हैं कि मूर्ति पूजा गलत है। तो मूर्ति पूजा गलत है तो किंतु मूर्ति के प्रति आपकी जो शरणागति है वह शरणागति आप कहीं फादर इन हेवन ना कि इस तरह के किसी को आप शिफ्ट कर दे रहे हैं। तो यह जो माने मूर्ति नहीं तो मूर्ति के जैसा कोई कांसेप्ट तो जिसको कि आप निराकार कहेंगे तो किंतु यह निराकार है तो द्वैत ही इसके प्रति आपको शरणागति ही व्यक्त करनी है। आपको यह नहीं कहना है कि आई एंड माय फादर आर वन। स्वामी जी अपने प्रवचन में कहते हैं कि देखिए जो सर्वश्रेष्ठ साधक होते हैं वही लोग यह कहने का साहस करते हैं कि आई एंड माय फादर आर वन। यह जीसस का कहना है। जीसस का कोट है। बाइबल में से है। वह कहते हैं कि मैं और मेरे पिता एक ही है। किंतु क्रिश्चियनिटी में इसको इस तरह से लिया गया है कि यह जीसस के पास में यह राइट है कहने का किंतु यह आम साधकों के पास में नहीं है। तो यहां पे स्वामी जी इस तरह से ब्राह्मो समाज का एक क्रिश्चियनिटी का और हिंदूइज़्म का जो मिश्रण पढ़ रहे थे, उसमें यह बात तो स्पष्ट थी कि ईश्वर अलग है, हम अलग हैं। ईश्वर के प्रति अपनी शरणागति को ही व्यक्त करना है। ईश्वर के प्रति अपनी श्रद्धा को ही व्यक्त करना है। किंतु जब यही स्वामी जी वेदांत में यह पढ़ते थे कि सोहम या तो फिर अहम ब्रह्मास्मि तो यह मैं ब्रह्मन हूं या तो मैं ईश्वर हूं। यह बात उनको पाप जैसी लगती थी। जैसे मान लीजिए कि आप यदि क्रिश्चियन है और जीसस की तरह ही आप यदि यह डिक्लेअ करना शुरू कर दें कि आई एंड माय फादर आर वन। मैं और मेरे पिता एक है तो फिर वह ब्लासफेमी के रूप में लिया जाएगा क्योंकि जीसस इज अ स्पेशल कैटेगरी ही इज द सन ऑफ गॉड जबकि हम लोग जो है एक कॉमन कैटेगरी में आते हैं। तो सन ऑफ गॉड जो है ईश्वर का जो पुत्र है वो यह डिक्लेअ कर सकता है कि मैं और मेरे पिता एक है। किंतु हम लोग जो कॉमन कैटेगरी में आते हैं, हम लोगों के पास में वह राइट नहीं है कि मैं और मेरे पिता एक है। यह बात करने का। तो स्वामी जी जब अमेरिका में अद्वैत वेदांत समझाते हैं तब कहते हैं कि द वे जीसस इज अ सन ऑफ गॉड वी आर ऑल अमृतस्य पुत्रा जैसे ईश्वर का संतान है जीसस वैसे हम सब भी उसी तरह से अमृतत्व के संतान है ईश्वर के संतान है यानी कि जितने भी कॉमन कैटेगरी के मनुष्य हैं सबको एलिवेट करके स्वामी जीसस की कैटेगरी में डालते हैं। किंतु यहां पे तो स्वामी जी का वो फिलॉसोफिकल इतना अभी सोफिस्टिकेशन डेवलप नहीं हुआ था। तो जब यह वेदांत में कही गई बात है कि मैं और ईश्वर एक ही है या तो फिर मोर टेक्निकली मैं और ब्रह्मन मैं और आत्मन जीवात्मन और आत्मन वो दोनों एक ही है। तो स्वामी जी को ऐसा लगता था कि जैसे हम पाप में पड़ रहे हैं। हम ब्लास फेमी कर रहे हैं। हम अपने को सन ऑफ गॉड यानी कि जीसस के समकक्ष ले जा रहे हैं। तो वह तो संभव कैसे हो सकता है? अभी यहां पर हमको पता है कि जो जिस अहम के बारे में हम बात करते हैं कि मैं और ईश्वर एक है या तो मैं और ब्राह्मण एक है वो अहम हो गया शुद्ध अहम। नहीं कि वह जो काम कांचन में जड़ित अहम। यह ईश्वर की साधना करके शुद्ध हुआ जो अहम है काम कांचन त्याग करके पूर्ण हुआ जो अहम है वह अहम की बात हो रही है नहीं कि यह काम कांचन से नेम एंड फेम से अहंकार घमंड से घिरे हुए ईगो के बारे में या तो अहम के बारे में स्मॉल आई एंड बिग आई लार्ज आई यह दोनों का डिफरेंस जो लोग वेदांत स्टडी करते हैं उनको पता है। तो स्वामी जी उस समय तो इतना सोफिस्टिकेशन नहीं डेवलप हुआ था। इतना डिटेल में स्टडी नहीं किया था। इसके लिए यदि वह मैं इस तरह से कोई कहता तो वह तो वही मैं समझते जिसके मन में यही कामिनी कांचन के भाव है। जिसके मन में ये अशुद्ध भाव है। जिसके मन में पाप भाव है। यही जो कर्म का जो कर्म में डूबा हुआ है। रजस और तमस में डूबा हुआ है। उसी अहम को तो स्वामी जी अहम समझते थे कि वही तो एक अहम होगा ना। और तो और क्या हो सकता है इससे आगे? तो इसलिए जब ठाकुर उनको कहते थे वेदांत का सोहम भाव इसकी उसके बारे में उपासना करना या तो फिर उसकी प्रैक्टिस करना यह सब कहते थे तब नरेंद्र को लगता था कि यह सब पाप है। किंतु इसके बावजूद ठाकुर उनके पास में यह सब प्रैक्टिस करवाते थे। स्वामी जी बोलते

ठाकुर किस तरह से स्वामीजी से अष्टावक्र संहिता का पाठ कराते

स्वामी जी कहते दक्षिणेश्वरे उपस्थितो होबा मात्र ठाकुर अपर शकल के जहां पढ़ते निषेध कोतेन से शकल पुस्तक आमा पढ़ते दतेन जैसे ही मैं दक्षिणेश्वर में उपस्थित होता साथ-साथ में ही ठाकुर बाकी सबको जो किताब पढ़ने के लिए निषेध करते थे जो किताब पढ़ने के लिए मना करते थे वही सब किताबें मुझे पढ़ने के लिए देते यानी कि सिर्फ इतना नहीं कि वह जो जो खाना है और किसी को खाना नहीं देना है। किंतु नरेंद्र के भीतर में ज्ञाना अग्नि है। वह जो खाना खाएगा तो उसको कुछ नहीं होगा। तो जो खाना बाकी के लिए निषेध है वह खाना नरेंद्र को खिलाते थे। वैसे ही बाकी के लोगों के लिए जो प्रोहिबिटेड बुक्स है वो किताब भी स्वामी जी को पढ़ने के लिए देते थे। अन्नान पुस्तके शही तहार घरे एक खानी अष्टावक्र संहिता झीलो। अन्य किताबों के साथ में ठाकुर के घर में एक अष्टावक्र संहिता थी के हो शेखानी बाहिर कोरिया पढ़ते छे देखते पायले ठाकुर ताहा के ओई पुस्तक पढ़ते निषेध कोरिया मुक्ति ओ तहार साधन भगवत गीता बा कोनो पुराण ग्रंथ पढ़ बार जनो देखा याते यदि कोई इस अष्टावक्र संहिता को खोलकर के पढ़ रहा है यह ठाकुर देखते तो ठाकुर उनको कहते कि तुम यह किताब मत पढ़ो पुस्तक तक पढ़ने में निषेध करते और फिर दूसरी किताबें रिकमेंड करते कौन सी तो मुक्ति और उसका साधन भगवत गीता या फिर और कोई पुराण ग्रंथ पढ़ने के लिए उनको रिकमेंड करते आमी किंतु तहार निकट जते ही जले वही अष्टावक्रो संहिता खानी बाहिर कोरिया पढ़ते बोली तेन मैं किंतु यह नरेंद्र बोल रहा है तो नरेंद्र का कोटेशन है स्वामी जी कहते हैं कि किंतु मैं जैसे ही उनके पास में जाता वैसे ही वह प्रोहिबिटेड बुक्स है वो बेंड बुक्स आज आजकल की लैंग्वेज बहुत सारी किताबें बैन हो जाती है। तो वैसे ही वह बैंड बुक्स जो है सब अष्टावक्र संहिता वगैरह बाहर करके स्वामी जी को पढ़ने के लिए कहते हैं। अथवा अद्वैत भाव पूर्ण अध्यात्म रामायण कोनो अंश पाठ कोते बोलीते या तो फिर अद्वैत भाव से परिपूर्ण अध्यात्म रामायण का कोई अंश पाठ करने को कहते आमी बोलीता ओ पढ़ की हो गए मैं कहता कि अरे यह सब किताबें पढ़ के क्या होगा आमी भगवान ई कथा मने कराओ पाप मैं भगवान हूं यह बात सोचना भी पाप है वही पाप कथा ई पुस्तक लिखा छे इस किताब में वही सब पाप की बातें लिखी है कि मैं भगवान हूं, मैं ईश्वर हूं। कैसे हो सकता है? मैं आत्मन हूं। कैसे हो सकता है? वो बई पुिए फैला उचित। देखिए वो सब किताबें जला देनी आवश्यक है। जला देनी चाहिए। देखिए ये स्वामी जी इस तरह का बात क्यों करते हैं वो थोड़ा आश्चर्य की ये है। आजकल का ये जो लिबरल वैल्यूस है ना वो लिबरल वैल्यूस में हम लोग कहते हैं कि ये लोगों के मन के ऊपर में कभी भी किसी भी तरह का बंधन नहीं डालना चाहिए। किसी भी किताब को बैन नहीं करना चाहिए। क्योंकि आजकल क्या है? सभी धर्मों में कोई एक धर्म का इसमें मोनोपोली नहीं है। यह हेरीपॉटर जब पब्लिश हुई थी, क्रिश्चियनिटी का उदाहरण इसलिए देते हैं कि वे लोग खुद अपनी निंदा कर सकते हैं या तो खुद अपना क्रिटिसिज्म कर सकते हैं। इसलिए क्रिश्चियनिटी का यदि एक उदाहरण दें तो हेरीपॉटर किताबें जब पब्लिश हुई तो बहुत सारे जो क्रिश्चियन ऑर्थोडॉक्स है उन लोगों ने कहना शुरू किया। क्रिश्चियनिटी में तो यह विच क्राफ्ट जिसको कहते हैं उसके बारे में तो अच्छी बात नहीं लिखी गई है। कहा गया है कि यह सब तो गलत है। ईश्वर के रास्ते से आपको दूर ले जाता है। जहां-जहां पे भी विच क्राफ्ट है जहांजहां पे भी लोगों को भ्रमित मोहित करके ईश्वर से दूर ले जाकर के और किसी शक्ति के पास में ले जाया जाता है। तो वह सब शैतानी शक्तियां है। यह क्रिश्चियनिटी का इतिहास में देखिए कि एक समय ऐसा आ गया कि कुछ लोगों ने ऐसा कहना शुरू कर दिया कि यह ईश्वर एक है और यह शैतान एक है। और शैतान कहां-कहां प्रकट होता है? जहां-जहां पे यह विच है, जहां-जहां पे दायन है, वहां वहां पे शैतान प्रकट होता है। बोल के वह विच ट्रायल हुए थे। वो सलेम अमेरिका में भी हुए थे और यह यूरोप में इंक्विजिशन भी हुआ था। और इसी इंक्विजिशन में इसी विच ट्रायल्स में हजारों स्त्रियों को मौत के घाट उतार दिया गया था। इस आशंका के साथ में कि वो विच है। वो दायन है। अभी एक्चुअली वो विच है कि नहीं वो पता नहीं। किंतु वो जो लोकल ऑथॉरिटीज होते थे चर्च की ऑथॉरिटीज वो अपना खुद का ईगो या तो फिर अपना खुद का जो किसी के साथ में वेयर होता है दुश्मनावट होती है तो बदला लेने के लिए कभी-कभी इस तरह से लोगों पर झूठ-मूठ का आक्षेप लगाते थे कि यह यह स्त्री है वो विच है। अभी खास करके स्त्रियों के ऊपर में यदि उनकी भोग दृष्टि पड़ी होगी तो वह सोचते होंगे कि यह स्त्री मेरे लिए कुछ करती क्यों नहीं है? बोल के अभी किसी स्त्री के भीतर में आत्मसम्मान होगा तो फिर वह कहेगी कि वह मैं आपकी बात नहीं सुनूंगी। तो फिर उसके ऊपर में इस तरह का विच होने का आक्षेप लगाया जाता था। फिर उनको जिंदा जलाया जाता था। इस तरह से हजारों हजारों स्त्रियों को यूरोप और अमेरिका में जिंदा जलाया गया था। यह बड़ा ही कलंकपूर्ण चैप्टर है क्रिश्चियनिटी के भीतर में जिसको कि यह विच ट्रायल्स या तो फिर इंक्विजिशन कहते हैं। और ये इंक्विजिशन के साथ-साथ में यही सब बातें जुड़ी हुई थी कि मेरा एक जो नैरो आउटलुक है, मेरा एक जो नैरो इंटरप्रिटेशन है, ऑर्थोडॉक्स इंटरप्रिटेशन है, बाइबल या चर्च के प्रति वही सही है। बाकी सब गलत है। बोलकर के मेरे भाव के विरुद्ध भाव वाली कोई भी किताब यदि प्र पब्लिश होती है तो उसको जला दो। इस किताब को बैन कर दो और इसका जो ऑथर है उसको जिंदा जला दो। अभी यह जो क्रिश्चियनिटी में जिस तरह से इस तरह से हो रहा था तो नजिज्म भी यूरोप में देखिए कि ये हिटलर है, स्टालिन है जो कि महा भयानक राक्षस 20थ सेंचुरी के उनके विरुद्ध में या तो उनकी आईडियोलॉजी के अगेंस्ट में जो कोई किताब लिखता तो वो किताब बैन कर दी जाती और उसके जो ऑथर है उनको जलाया जाता या तो फिर उनके ऊपर अत्याचार होता। यदि ऑथर हाथ में नहीं आता है तो किताबें जला देते। ऐसा बुक बर्निंग बहुत जगह पे आप थोड़ा सा सर्च करके देखेंगे कि बुक बर्निंग इन नाज़ जर्मनी तो इस तरह के वीडियो है कि बहुत सारी किताबों को इकट्ठा करके यह लोग जला रहे हैं। क्यों? ये किताब जलाने का उत्सव। क्यों? क्योंकि ये नाज़ आईडियोलॉजी है। नजिज्म जो है वही एक असली आईडियोलॉजी है। वही सही है। बाकी सब गलत। यह जो फेनेटिसिज्म है, धर्म जुनून जिसको कहेंगे या तो जुनून जिसको कहेंगे कि मैं सही बाकी सब गलत और जो मेरे सामने आता है उसको मार डालो। मैं अकेला राज्य करूंगा। मैं अकेला भोग करूंगा। वो पूरा एक माइंडसेट है। यूरोप में भी है अमेरिका में भी है। फेनेटिकल माइंडसेट। तो ये फेनेटिकल माइंडसेट वाले जो होते हैं वे लोग कहते हैं कि किताबों को बैन कर दो। किताबों को यह कर दो। तो आज का जो एक लिबरल एटीट्यूड फिर एक उसके अगेंस्ट में आया है। यह लिबरल एटीट्यूड कहता है कि किसी भी तरह की किताबों को बैन नहीं करना चाहिए। किसी भी तरह की किताब कोई भी किसी भी तरह की किताब पढ़ सकता है। उसको वो फ्रीडम होना चाहिए। यदि आप ऐसा कहेंगे कि यह व्यक्ति यह किताब नहीं पढ़ सकता या नहीं पढ़ना चाहिए। उसको तो साथ-साथ में ही अब जो जो मिडीवल एटीट्यूड था इंक्विजिशन वाला विच बर्निंग वाला या तो फिर जो नज़ एटीट्यूड था बुक बर्निंग वाला लोगों के ऊपर में अत्याचार करने वाला उसी एटीट्यूड में अब वापस चले जा रहा है। तो अभी आजकल हम लोग यह लिबरल एटीट्यूड थोड़ा सा सीखे हैं। हम लोग कभी नहीं कहेंगे कि कोई किताब को बैन कर दो या तो फिर कोई किताब को नहीं पढ़ना चाहिए किसी को। ले आप जो भी पढ़ना चाहे पढ़िए। आपका तो खुद का एक डिस्क्रिमिनेशन है। अपनी खुद की इच्छा के साथ में। आपका तो खुद का एक ये क्या कहेंगे कि एक डिसीजन मेकिंग पावर है। एक मैच्योरिटी है। आपको जो अच्छा लगे वो कीजिए। उसमें यह पढ़ना चाहिए नहीं पढ़ना चाहिए। यह मेंटल सेग्रगेशन आप क्यों खड़ा करते हैं? वैसे मेरा भी इस तरह का एक लिबरल एटीट्यूड है। तो जब हम यह पढ़ते हैं स्वामी जी की बात कि मैं भगवान हूं बोलकर के वो तो बात ही पाप वाली बात है और इस इस तरह की किताब को जला देना चाहिए। ए वही पुड़िए फैला उचित तो फिर हमको वही सब हिस्ट्री पढ़कर के जो हमने सीखा है वही सब लगता है कि अरे यह तो फनेटिकल माइंडसेट है और इंक्विजिशन वाला माइंडसेट है स्वामी जी का देखिए एक समय था यहां पे ऑफ कोर्स स्वामी जी को हम ना ही इंक्विजिशन के साथ में इक्वेट करेंगे ना ही हम नाजिज्म के साथ में इक्वेट करेंगे किंतु स्वामी जी ने खुद ने कहा है बातबात के जीवन में कि मेरे एक समय ऐसा था मेरे जीवन में एक एक इस तरह का जुनून था कि रास्ते के जिस साइड पे थिएटर है ना उस साइड पे मैं चलता नहीं था। क्यों? क्योंकि यह थिएटर में सब पाप का काम होता है। वहां पे वह जो सब भो वस्तुओं का सब प्रदर्शन होता है। तो मैं उस गली उन्हें उस रास्ते को छोड़कर के सामने वाले रास्ते पर जाकर के मैं चलता था। किंतु बाद में स्वामी जी कहते हैं कि इस तरह की स्त्रियां जिसका चरित्र निम्न कक्षा का माना जाता है। आज इन स्त्रियों के साथ में रहने पर भी बात करने पर भी मुझे किसी भी तरह का घृणा बोध नहीं होती। किसी भी तरह की घृणा नहीं होती। तो देखिए कि इवन स्वामी जी के जीवन में भी यह एक ट्रेजेक्टरी है। वो यंग थे जब वह इस तरह के ठाकुर के पास में आते थे। उनके बड़े स्ट्रांग ओपिनियंस थे कुछ-कुछ चीजों के बारे में। किंतु बाद में स्वामी जी के ओपिनियन बड़े लिबरल हुए थे। तो इसीलिए यहां पे स्वामी जी कहते हैं कि वह सब किताबें पढ़ने की क्या जरूरत है। उसमें तो लिखा है जो कि मैं भगवान हूं। वह सब तो पाप की बातें हैं और इस तरह की किताबों को जला देनी चाहिए। ठाकुर तहाते हसीते हसीते बोलीते ठाकुर उसमें हंसते हंसते बोलते आमी की तो केके पढ़ते बोलची मैं क्या तुमको पढ़ने को बोल रहा हूं एक टू पढ़े आमा के सुनाते बोलची थोड़ा सा पढ़ के तुम मुझे सुनाओ ऐसा मैं कह रहा हूं खानिक पढ़े आमा के सोना ना थोड़ा सा पढ़ के मुझे सुनाओ ना ताते तो आर तो के मने करते होवे ना तू ही भगवान उसमें तो तुमको यह ऐसा कहने की बात नहीं है कि तुम भगवान हो काजे अनुरोध पिया अल्पविष्ट पिया तहां के सुनाई ते हो तो तो इस तरह से जब ठाकुर एक ट्रिक खड़ा करते स्वामी जी को ब्रेन वाश करते तब स्वामी जी कहते कि अब जब ठाकुर इस तरह का अनुरोध कर ही रहे हैं तब फिर मुझे ठाकुर को पढ़ के सुनाना पड़ता और फिर ठाकुर को पढ़कर सुनाएंगे और उनका तो फोटोग्राफिक मेमोरी है। उसमें यह सब याद ना रह जाए ऐसा तो होने वाला नहीं है। तो इस तरह से स्वामी जी अद्वैत वेदांत उनके पास में से सीखते थे।

राजा महाराज काली मंदिर में जाते है इस लिए स्वामीजी उन्हें डांटते है

यह जो स्वामी जी का इस तरह का जो भाव है ना कि यह जो है वह पाप है। इसको जला देना चाहिए। थोड़ा सा एक उनका था कि जो नियम हमने लिया है या तो फिर जिस तरह की प्रतिज्ञा हमने की है उसको फॉलो करना चाहिए। थोड़ा सा एक क्या कहेंगे कि धर्मजनूनी भाव था स्वामी जी का। तो उसी सिलसिले में राजा महाराज अभी राजा महाराज और स्वामी जी दोनों ब्राह्म समाज में साथ में गए थे। उन्होंने ब्राह्म समाज का जो प्रतिज्ञा पत्र था उसके ऊपर में साइन किया था कि हां निराकार ईश्वर की उपासना करेंगे मूर्ति पूजा नहीं करेंगे वगैरह-वगैरह जो कि क्रिश्चियन मिश्रित वो जो भाव था ब्रह्मो समाज का उसका उसमें जॉइ करने के लिए आपको इस तरह का प्रतिज्ञा पत्र साइन करना पड़ता है। तो स्वामी जी ने भी किया था राजा महाराज ने भी किया था। अभी जब राजा महाराज और स्वामी जी दोनों ठाकुर के पास में आए तो अभी जो प्रतिज्ञा पत्र साइन किया है तो अभी यह साइन किया है वह तो कोई हवाहवा में तो साइन नहीं है वो जो कहते हैं ना कि वो प्राण जाए पर वचन न जाए वो रघुवंश नीति सदा चली रघुकुल नीति सदा चली आई प्राण जाए पर वचन न जाए तो यह तो रघुकुल नीति के ही तो यह क्षत्रिय के ही तो राम के ही तो वंशज है अपने स्वामी जी तब साइन किया है तो साइन तो हमने हवाहवा में झूठमठ का नहीं किया साइन के अनुसार ठाकुर यदि वह खुद काली खुद तो काली मंदिर में नहीं जाएंगे। ठाकुर खाली काली मंदिर में जाते हैं तो स्वामी जी दूसरों को कहेंगे वो अभी भी काली मंदिर में जाते हैं। बाद में खैर फिर उनको काली को स्वीकार करना पड़ा। तो जिस दिन काली को स्वीकार किया होगा उस दिन वो प्रतिज्ञा पत्र सब हवा हो गया होगा। किंतु अभी यह जो पहले पहले के दिनों की बात है स्वामी जी ये सब चीजों को बड़ा सीरियसली लेते थे। तो एक दिन उन्होंने देखा कि राजा महाराज अभी राजा महाराज तो बड़े सॉफ्ट नेचर के हैं। तो उन्होंने साइन भी अभी वह साइन करने के लिए भी नरेंद्र ले गया होगा। अभी यहां पर राजा ठाकुर के पास में आए हैं तो ठाकुर ने कहा कि मंदिर में जाना है। भगवान का शरणागति का भक्ति का रास्ता तुम्हारे लिए उचित है। तो वह राजा महाराज उसी रास्ते पर जा रहे हैं। अभी जैसे ही स्वामी जी ने देखा कि राजा महाराज काली मंदिर में जा रहे हैं तो वैसे ही नाराज हो गए। राजा महाराज को पकड़ा कि अरे तुमने तो ब्राह्म समाज का प्रतिज्ञा पत्र साइन किया है। उसमें तुमने लिखा है वहां पे जो उनके नियम के अनुसार यह मूर्ति पूजा गलत है वगैरह-वगैरह और तुम काली मंदिर में जा रहे हो। यह क्या तुम्हारा मन मन मुख एक नहीं कर रहे हो। ठाकुर तो ऐसा कहते हैं ना कि सब कुछ दे दिया। भक्ति अभक्ति सब दे दिया। मैं सत्य नहीं दे पाया। तो तुम मन मुख एक नहीं करते हो। ठाकुर की ही आज्ञा का तुम विरोध मतलब पालन नहीं करते। तो माने अभी तो राजा महाराज दोनों ओर से सैंडविच हो गए हैं ना। ठाकुर ने कहा है एक और कि हां भक्ति का मार्ग तुम्हारे लिए श्रेष्ठ है। दूसरी ओर ठाकुर ही कहते हैं कि मन मुख एक करना। अभी उन्होंने वो प्रतिज्ञा पत्र साइन किया है तो अभी क्या करें? क्या ना करें? तो राजा महाराज इस तरह से वो बेचारे सैंडविच हो गए। बड़े टेंशन में आ गए। तो ठाकुर की नजर के सामने से तो कुछ भी छुपा हुआ नहीं है। तो ठाकुर ने इमीडिएटली नरेंद्र को बुलाकर के कहा कि देखो राजा जिस रास्ते से जा रहा है राखाल जिस रास्ते से जा रहा है भक्ति के मार्ग से उस रास्ते पे उसको जाने दो। तुम उसको परेशान मत करो। तो अभी जब ठाकुर ने रिक्वेस्ट किया तो नरेंद्र ने फिर उसको छोड़ दिया। राजा महाराज को छोड़ दिया कि अच्छा ठीक है जाओ तुम यदि मंदिर में जाना चाहते हो तो जाओ। तो अभी देखिए कि स्वामी जी का तो यह पूरा ट्रेजेक्टरी है कि यहां पर जो है कि यह मैं ईश्वर हूं यह कहना पाप है। फिर वो जो ब्राह्म समाज का प्रतिज्ञा पत्र साइन किया था। अच्छा इसी सिलसिले में एक इंटरेस्टिंग

स्वामीजी थियोसोफिकल सोसाइटी के सदस्यता पत्र पर हस्ताक्षर करने से मना कर देते है

बात है कि स्वामी जी का माय प्लान ऑफ कैंपेन में हमने देखा कि जब वो अमेरिका जाने के लिए प्रस्तुत हो रहे थे और वो ये जो था थियोसोफिकल सोसाइटी वाले चेन्नई में वगैरह जहां पे भी होंगे उनके साथ में मुलाकात की होगी तो उनके पास में जाकर के कहा कि आप तो भारत के बड़े ही हितषी हैं तो आप मुझे कोई रिकमेंडेशन लेटर परिचय पत्र लिख दीजिए जो कि मैं अमेरिका जा रहा हूं। तो इन लोगों ने क्या कहा कि आप यदि हमारी सोसाइटी ज्वाइन कीजिए हमारा यह जो प्रतिज्ञा पत्र है उसके ऊपर साइन कीजिए कि हां मैं आपका एक मेंबर हूं। उसी समय स्वामी जी ने एकदम स्पष्ट रूप से कह दिया कि देखिए कि जिस बातों पर मैं विश्वास नहीं करता हूं उस किसी भी तरह की बात को मैं स्वीकार नहीं करूंगा। आपका किसी भी तरह का सदस्यता स्वीकार नहीं करूंगा। किसी भी तरह के प्रतिज्ञा पत्र पर मैं साइन नहीं करूंगा। तो यह जो स्वामी जी का एकदम स्पष्ट जो था कि टेंपरेरी बेनिफिट लेने के लिए उनका परिचय प्रत प्राप्त करने के लिए कोई प्रतिज्ञा पत्र साइन कर देना। यह माने सत्य के आदर्श के विरोध में तो है ही है। किंतु साथ-साथ में ही देखिए कि यहां पे इसका लिंक है। यह ब्राह्म समाज का प्रतिज्ञा पत्र साइन किया था। उसको तोड़ने के लिए अपने मन में वो स्वामी जी को तो एक झरनी करनी पड़ी है। वो वहीं जाकर के कि वह तीन बार वह काली मंदिर में जाते हैं। तीनों बार रोटी कपड़ा की रोटी कपड़ा मकान की जगह ज्ञान भक्ति वैराग्य मांग कर के आते हैं। तब उनकी अकल ठिकाने आती है कि इस तरह का प्रतिज्ञा पत्र इस तरह का ईश्वर मूर्ति में भीतर में हो ही नहीं सकता। निराकार ही सत्य है। साकार गलत है। अद्वैत गलत है। यह सब जो साइन किया मैंने वह किसी काम का नहीं है। उसको छोड़ो और ठाकुर के बताए हुए रास्ते पर आगे चलो। तो वह जो उस ब्राह्म समाज का थिंकिंग के साथ में ब्रेकअप करने के लिए स्वामी जी को जो स्ट्रगल में से गुजरना होगा वो बात यह नहीं है कि ब्राह्म समाज का वो थिंकिंग है स्वामी जी ने उसको स्वीकार किया है। तो स्वामी जी का वो इंटीग्रिटी था कि जिसको वो सत्य मान के समझे हैं तो फिर बिना आर्गुममेंट के बिना कोई साक्षात अनुभव के बिना कोई डायरेक्ट एक्सपीरियंस के उसको तोड़ नहीं देना है। हवा के साथ में अभी मुझे आज ठाकुर मिल गए। लगा कि ठाकुर ठीक बोल रहे हैं। तो ठाकुर की बातों को फॉलो करना शुरू कर दिया। कल कहीं जाकर पौहारी बाबा मिल गए। पौहारी बाबा की बात अच्छी लग रही है। तो उनको जाकर के मैंने फॉलो करना शुरू कर दिया। नॉट लाइक दैट। जो अपने मन के भीतर में ठीक-ठीक लगता है। सब तरह के टेस्ट करके आपको उसको स्वीकार करते हैं। तभी तभी उसको स्वीकार करना है। और एक बार स्वीकार करने के बाद में कितना ही जंजावात, कितना ही तूफान, कितना ही तकलीफों का सामना क्यों ना हो जाए उसको फिर छोड़ना नहीं है। तो दैट इज आवर स्वामी जी। तो आज यहीं तक अभी कल फिर से देखते हैं आगे ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम

प्रश्न: अद्वैत वेदांत को स्वामीजी पाप क्यों कहते है?

कृष्णपणमस्तु देखिए कि यदि आप ईश्वर को ईश्वर के रूप में उपासना करते हैं तो तो आप तो भक्त हैं ना वो जो भगवान भगवान कृष्ण की जो कहानी है कि भगवान कृष्ण ने नारद को एक बार मन में संदेह हुआ कि भगवान के सबसे बड़े भक्त कौन है? तो कृष्ण के पास गए तो कृष्ण ने कहा कि अक्षय एक काम करो तुमको टेस्ट करना है तो ये मेरे चरण की रज लो। तुम ऐसा जाकर के इनको कहो कि भगवान कृष्ण बीमार है और उनको तभी ठीक हो सकते हैं जब आप अपने चरणों की रज देंगे। तो वो यह रिक्वेस्ट लेकर के वो वहां पर गए अंतःपुर में जहां पर सब भगवान कृष्ण की रानियां थी और नारद ने कहा कि आपके चरणों की रज दीजिए तो भगवान कृष्ण है वह ठीक हो जाएंगे। तो यह लोग तो बेचारी बड़ी टेंशन में आ गई कि अरे अपने चरणों की रज भगवान कृष्ण यदि धारण करेंगे तो हम पाप में गिरेगी। वह भगवान है। हम इंसान हैं। और फिर नारद मुनि समझ गए कि वो अपने चरणों की रज नहीं देना चाहती क्योंकि वह पाप में नहीं पड़ना चाहती। अभी वह जब यही नारद मुनि गए वृंदावन में गोपियों से कहा कि आपके चरणों की रज दीजिए तो गोपियों ने चरणों की रज दे दी। यह बात का थोड़ा सा भी विचार नहीं किया कि ईश्वर को अपने चरणों की रज देकर के हम पाप में पड़ेगी। वह कहती है कि भगवान कृष्ण की यदि भगवान कृष्ण ठीक हो जाते हैं। उसी से हम लोगों का भी ठीक हो जाएगा। हमको अपना खुद का कोई यह नहीं है। तो देखिए कि वो जो प्रथम वाला उदाहरण है वो रुक्मणी वगैरह रानियों का वो भक्त अलग है भगवान अलग है। इसको द्वैत भाव कहते हैं। वह कभी अपने चरणों की रज ईश्वर को दे ही नहीं सकती। वो पाप में पड़ने को कहेंगे। जबकि यह गोपियों का है कि भगवान कृष्ण और वह एकाकार हो गए हैं। यानी कि अपने चरणों की रज कृष्ण धारण करेंगे तो एकत्व की अनुभूति की वजह से उनको कोई पाप नहीं लगेगा और लगेगा तो डज नॉट मैटर क्योंकि उनका खुद का अलग से कोई अस्तित्व नहीं है। कृष्ण के भीतर में ही उनका अस्तित्व है। तो वह जो द्वैत वाला है कि उसकी दृष्टि से स्वामी जी कहते हैं कि मैं ईश्वर हूं। यह कहना पाप में पड़ने के बराबर है।

प्रश्न: ठाकुर की उत्तम गुरु, अधम गुरु में और एक केटेगरी जुड़ दे सकते है, छल कर के शिष्य को सिखाना. तुम नहीं पढ़ना चाहते तो मेरे लिए पढ़ लो.

अभी चाणक्य की लैंग्वेज में कहेंगे तो साम दाम दंड भेद और उनका प्रारंभ ऐसे हुआ था। दैट मींस देयर इज होप फॉर अस। यह जो वाली को

प्रश्न: स्वामीजी की सत्य निष्ठा से हमें भी भरोसा मिलता है.

प्रोटेक्ट करने की बात सुग्रीव को प्रोटेक्ट करने की बात सुग्रीव को राजा बनाने की बात तो अभी वचन दे दिया है तो फिर वाली का वध करना है तो पीछे से तीर मार के किंतु वध कर दिया। तो अभी यहां पर ना बड़ा इंटरेस्टिंग पैराडॉक्स खड़े होते हैं कि आप नीति क्या कहती है और धर्म क्या कहता है या तो फिर सत्य वचन क्या है धर्म क्या है वो जो अर्जुन इसका वध कर्ण का वध माने पूरा महाभारत आप देख लीजिए इंटरेस्टिंग पैराडॉक्स से भरा हुआ है युद्ध के क्षेत्र में जिसका जिसका वध करवाया द्रोणाचार्य का कर्ण का तो सबके भीतर में आपको इतना थिंकिंग मटेरियल मिलेगा क्योंकि और यह थिंकिंग मटेरियल किसके लिए है जो कि सत्य को फॉलो करता है। जो फिर अपॉर्चुनिस्ट ही है उसके लिए यह सब कोई मीनिंग नहीं है। किंतु इफ यू आर वेरी इंटीग्रेटेड देन यह पैराडॉक्स आपके सामने आएंगे ही आएंगे। इन दैट केस हाउ टू रिजॉल्व ना। उसका रीजन क्या है ना कि हम

प्रश्न: ठाकुर ने अष्टावक्र संहिता पढ़ने से सबको मना कर दिया था. तो हमारे लिए कौन सी किताब पढ़ना मना है?

लोग जो पढ़ते हैं उसको इतना सीरियसली लेते नहीं है। जबकि उन लोगों का था कि जो पढ़ेंगे सीरियसली ले लेंगे तब प्रॉब्लम खड़ा होगा। आप नोवेल की तरफ पढ़ते जाइए सब कुछ क्या फर्क पड़ता है? अष्टावक्र संहिता पढ़ के रख दिया। ठीक है। उसमें जो लिखा है वो थोड़ी ना हम कुछ करने वाले हैं। करने को जाएंगे तो प्रॉब्लम खड़ा होगा। [हंसी] पढ़ने दो। इसको भी आनंद लेने दो। क्या है?

प्रश्न: जैसे स्वामीजी थिएटर वाले रस्ते को अवॉयड करते थे, वैसे ही ठाकुर स्त्रीओ से दूर रहते थे, किन्तु बाद में गिरीश घोष के साथ थिएटर देखने के लिए भी जाते थे.

यहां पे देखिए पैराडॉक्स कैसा खड़ा होता है। सब किस तरह के इंटरे इंटरेस्टिंग पैराडॉक्स खड़े होते हैं। अ देखिए कि वही जिस थिएटर में नरेंद्र जाना नहीं चाहता था उसी थिएटर वाले गिरीश के साथ में उनका बेस्ट फ्रेंडशिप था। नर वो ठाकुर पूछते हैं किसी को कि नरेंद्र यहां पे नहीं आता क्या करता है? तो बोला है वो गिरीश के वहां पे पड़ा रहता है। तो वो एक था। दूसरा कि ठाकुर जब थिएटर में जाते थे तो ठाकुर कहते हैं कि सबको मैंने ईश्वरीय रूप में देखा। माने सबके भीतर में मैंने ईश्वरी का दर्शन किया। वो जो ठाकुर रास्ते से जा रहे हैं तो जहां पर वो रेड लाइट एरिया है तो ठाकुर कहते हैं सब मैंने कहा मां का दर्शन हुआ। फिर मैंने कहा मां तुम इस भाव में इस वेश में यहां पे खड़ी हो। यानी कि ठाकुर एक्चुअली देखते थे कि उनके भीतर में मां जगदंबा है। सो यह दोनों चीजें हैं कि एक तो है कि कामिनी का कोई स्त्री उनके सामने आती है तो ऐसा लगता था कि वह एकदम उसका विशाल सब कुछ है उसके जो भव्य उपकरण इस तरह से उनको लगता था दैट वाज़ वन भाव। और फिर इसी तरह की स्त्री के भीतर में ठाकुर वो ईश्वर का भी दर्शन जगन माता का भी दर्शन करते थे। सो दैट बोथ वेर टुगेदर। और ठाकुर कहते हैं कि यदि कोई आपके मन को लुभाने के लिए आए तो आप क्या अपने को उसके वश में हो जाएंगे? क्या आप उसके साथ में झगड़ा करेंगे? सो दैट इज देयर। अब किस डायमेंशन माने क्या एस्पेक्ट क्या डिफरेंट है? यदि इस तरह की स्त्री आपको प्रलोभित करने को आए तो आपको उसके सामने एकदम डट करके खड़ा हो जाना है। अपना उसका मुकाबला करना है। किंतु इस तरह की स्त्री के भीतर में कम इसके प्रति कंपैजन रखना है। ऐसा नहीं होना चाहिए कि उसके प्रति यह हो गया कि अब मतलब कि घृणा का भाव कंपैजन रखना है और साथ में अपने को बचा के चलना है। दैट बोथ एस्पेक्ट आर देयर।

प्रश्न: साधना करने के समय ठाकुर स्त्रीओ से दूर रहते थे, किन्तु बाद में स्त्रियों को उपदेश देते थे.

ऑफकोर्स ठाकुर किंतु मुझे ऐसा लगता है ना कि एस फ एस ठाकुर इस कंसर्न ठाकुर के हृदय में कंपैजन पहले से ही था। अनंत कंपैजन था। जैसे कि उनके बचपन के दिनों का देखें तो अभी जैसे गरीब लोग हैं। गरीब लोगों को अनपढ़ लोगों को जो भागवत पाठ वगैरह नहीं आता है। तो वे लोग क्या करेंगे कि इसको बुलाएंगे किसी पंडित को। अभी यह पंडित वो गरीब लोगों की बस्ती में जाएगा। वह नाट्य करके पाठ करेगा और इस तरह से नाटक करेगा क्योंकि अपना घमंड उसके मन में प्रकट हो गया है। तो तो ठाकुर ऐसे लोगों का अभिनय ऐसा भयानक करते थे। ऐसी भयानक कटाक्ष करते थे कि लोगों का घमंड बिल्कुल चकनाचूर हो जाता था। किंतु साथ में ही लिखा है कि यदि इस तरह का व्यक्ति ठाकुर की शरण में आ जाता था तो वह शरणागत ठाकुर माने वह जो शरणागतों के प्रति अपूर्व निष्ठा रखने वाले ठाकुर उसको एकदम छोड़ देते थे। उसकी मजाक नहीं करते थे बाद में। तो वो पहले से ही था ठाकुर के भीतर में। वो एक बड़ा अच्छा उदाहरण है कि वो वहां पे ठाकुर जा रहे हैं। क्या कहेंगे कि कामरारु में ही रास्ते से जा रहे हैं और उस समय थोड़ा सा पूर जैसा आया है। पानी बढ़ गया है। तो पानी में से तो वो मछलियां है। मछलियां तैरते तैरते ठाकुर के पैर में पास में आ गई। तो ठाकुर ने देखा कि एक मछली उनके पैरों के आसपास में तैर रही है। तो ठाकुर ने उस मछली को उठाकर के तालाब में जाकर के फेंक दिया। फिर आकर के वापस आकर के ठाकुर ने इसको कहा अपने हृदय को कि हृदय ठाकुर का भांजा उसको कहा कि देखो हृदय एक बड़ी मछली मेरे पैरों के आसपास घूम रही थी तो मैंने उसको तालाब में जाकर के फेंक दिया। तो हृदय एकदम नाराज हो गया। अरे मामा आपने यह क्या कर दिया कि आपने इतनी सुंदर मछली आपके हाथ में आती उसको पका करके खाते आपने उसको फेंक क्यों दिया? तो ठाकुर कहते हैं अरे वह मेरे पैरों के आसपास में घूम रही थी। मैं थोड़ी ना उसको मार सकता हूं। म वो शरणागत हो गई थी। तो शरणागत को तो मारेंगे नहीं ठाकुर। सो दैट भाव वाज़ ऑलरेडी देयर इन अ वन वे और अनदर।

प्रश्न: ठाकुर ने कहा था -- जो राम जो कृष्ण वही रामकृष्ण, किन्तु तुम्हारी वेदांत की दृष्टी से नहीं.

इसका ना एक इंटरेस्टिंग माने एग्जैक्टली यह नहीं। किंतु उसी के रिलेटेड एक इंटरेस्टिंग डिस्कशन इसी लीला प्रसंग में हम पढ़ेंगे। साधक भाव में ही पढ़ेंगे कि जब शरद महाराज कहते हैं यह प्रूव करना चाहते हैं ना कि अवतार का साधक भाव हमको लिपिबद्ध करना चाहिए। उनके भीतर में अपूर्णता है। अपूर्णता उनको ज्यादा हमारे नजदीक ले आती है। इफ वी थिंक दे ही इज परफेक्ट देन ही विल बी फार अवे। तो ऐसा करते-करते वो अभी प्रश्नोत्तर चलता है। वो प्रश्न खड़ा करेंगे उत्तर देंगे। तो एक प्रश्न होता है कि देखिए कि शंकराचार्य का आपने उदाहरण दिया कि यह गीता में से गीता की भूमिका है। शंकराचार्य ने लिखा है उसमें कि अवतार जन्म लेते हुए से ईश्वर जन्म लेते हुए से ईश्वर यह सब करते हुए से जान पड़ते हैं। किंतु वो ऐसा है नहीं। माने देखिए शंकराचार्य इज अ परफेक्ट अद्वैत वेदांती। उनसे बड़ा कोई अद्वैत वेदांती हो नहीं सकता। अभी हाउ विल ही जस्टिफाई अवतार तत्व माने अभी ये ठाकुर को जिस तरह से कह डिस्क्लेमर डालना पड़ा कि वो तुम्हारी वेदांत की दृष्टि से नहीं उसका रिवर्स डिस्क्लेमर जो शंकराचार्य को डालना पड़ा है कि ईश्वर आते हैं किंतु आते हुए से लगते हैं। इज नॉट एग्जैक्टली ईश्वर इज टेकिंग ह्यूमन फॉर्म। ह्यूमन फॉर्म लेते हुए से दिखते हैं। तो यदि यहां पर देखिए कैसा इंटरेस्टिंग पैराडॉक्स खड़ा होता है। ये ईश्वर मनुष्य जन्म लेते हुए से दिखाई पड़ते हैं। जात ईव तो इव एज इफ जात बर्थ लेते हुए एज इफ दिखाई पड़ते हैं। तो वो तो परिपूर्ण ही है। तो उनका साधक भाव चर्चा करने का लाभ ही क्या है? अल्टीमेटली शंकराचार्य को ही फॉलो करके हम कह रहे हैं। तो फिर उसका जो रिजवाइंडर देते हैं शरद महाराज डेंजरस वो कहते हैं कि देखिए कि जिस तरह से शंकराचार्य कहते हैं कि ईश्वर जन्म लेते हुए से दिखते हैं। इसकी वजह से ठाकुर ईश्वर ही है। मनुष्यत्व नहीं है। दिखता है किंतु नहीं है तो वह बात तो हम सबके बारे में कहते हैं। हम सब भी तो जन्म लेते हुए से दिखते हैं। अद्वैत वेदांत की दृष्टि से हम लोग कहां सत्य हैं? तो जो ठाकुर में अपूर्णता नहीं है तो हमारे में भी नहीं [हंसी] है। यानी कि यदि वो कैसा काटते हैं कि यदि आप कहता चाहते हैं कि ठाकुर के तो हम पास में भी नहीं फरक सकते। वो कहां हम कहां कहां साधना करके हम प्राप्त करेंगे। वो तो पूर्ण परिपूर्ण ही है और यह शंकराचार्य खुद कहते हैं कि अवतार तो हो ही नहीं सकते अद्वैत वेदांत की दृष्टि से। शंकराचार्य को खुद को पूरा इंटेलेक्चुअल जिम्नस्टिक करना पड़ा था। तो इस दृष्टि से अभी आप समझाइए तो तो पूरा उसको रिवर्स कर दिया कि हम भी तो जात इव हम भी तो ऐसा जन्म लेते हुए से दिखते हैं ना हम कहां जन्म लिए हैं प्योर अद्वैत वेदांत की दृष्टि [हंसी]

प्रश्न: ठाकुर भले ही चाहे कहते रहे की ईश्वर-दर्शन की आकांक्षा मत रखो, किन्तु सतत जिद करते रहने से ठाकुर वह भी वरदान दे देंगे।

से ना फिर मूड देख के जिद करनी पड़ेगी। वो भी एक बात है। वो यदि वो पहली जनवरी को जिद की होती तो सब वहीं पे फटाफट मिल जाता। यह जो स्वामी जी हाजरा को लेकर के ठाकुर के पास जाते हैं कि इसका कुछ कर देना पड़ेगा आखिर आखिर में तो ठाकुर कहते हैं अरे इसका तो मने घनघोर तमस में डूबा है मैं क्या करूंगा इसका बोल के मना कर देते हैं तो नरेंद्र लगता है पीछे नहीं इसका कुछ करना ही पड़ेगा तो हाजरा को जो फिर ठाकुर ने जो आशीर्वाद दिया हाजरा की जो मुक्ति दैट इज ड्यू टू नरेंद्र हां नेचुरली ठाकुर ने जब यह कह दिया नरेंद्र ने इतना जििद किया तो ठाकुर ने जब कह दिया कि हां इसका भी हो जाएगा तो फिर तो होना ही चाहिए और दे एंटायरली ड्यू टू नर यह पूरा जिद करके कैसे भी करके ठाकुर के पैरों में डाल के हजरा को छोड़ा इसके पहले छोड़ा नहीं उसको योग से भी और हठ योग हठ योग हठ योग टू

प्रश्न: ठाकुर को भी माँ काली का जो प्रथम दर्शन हुआ था वह भी तो उन्होंने माँ के सामने गला काट देने की जिद कर के पाया था. उस समय तो उनके कोई गुरु नहीं थे.

ना यहां पे एक है कि ठाकुर के गुरु तो थे आई मीन केनाराम भट्टाचार्य से उन्होंने शक्ति मंत्र प्राप्त किया था अदरवाइज तो वो मां की उपासना नहीं कर पाते, पूजा नहीं कर पाते। सो ह गुरु वास देयर। वही है कि केनाराम भट्टाचार्य के बारे में हम लोग जैसे भूल ही गए हैं। अदरवाइज ह ठाकुर स्वर्स्ट गुरु। मंत्र दीक्षा तो ली है ना। अभी जैसे अपने संघ में ही देखिए ना अपने गुरु क्या थोड़ी ना हमको साधना करवाते हैं। रामकृष्ण मिशन के जो प्रेसिडेंट महाराज होते हैं मंत्र देकर छोड़ देते हैं। फिर तो अपने ऊपर है। क्योंकि दो चीज पहले तो ठाकुर जिद

प्रश्न: एक तरफ ठाकुर कहते हैं कि कभी किसका भाव नष्ट नहीं करना, दूसरी तरफ वह नरेन को अद्वैत वेदांत सिखाने के लिए छल करते हैं। क्या यहाँ इन दोनों के बीच कोई विरोधाभास नहीं है?

नहीं करते कि तुम पढ़ो ही पढ़ो। ठाकुर ट्रिक करते हैं। सो नरेंद्र वह ट्रिक में फंस भी जाता है। सो दैट इज वन थिंग। सेकंड कि ठाकुर संस्कार देखते थे कि इसका संस्कार है अद्वैत का। क्योंकि अद्वैत के लिए जो प्रीरिक्विजिट है दैट इज ब्रह्मचर्य। इफ ही हैज़ परफेक्ट ब्रह्मचर्य देन ही इज़ अ ऑथेंटिक एलिजिबल कैंडिडेट फॉर अद्वैता। ठाकुर का खुद का देखिए। ठाकुर चांदनी के घाट पे बैठे थे। तोतापुरी नौका से आए। जैसे ही देखा कि ही इज़ एन एलिजिबल कैंडिडेट। इंस्टेंटली समझ गए। सो ठाकुर भी समझ गए ही इज एन एन एलिजिबल कैंडिडेट। अभी जैसे ठाकुर ने कहा जब तोतापुरी ने कहा ठाकुर को कि तुम अद्वैत साधना करोगे तो ठाकुर कहते मैं अपनी मां को पूछ के आता हूं। तोतापुरी हंसने लगे। सोचे कि बच्चे की तरह अपनी मां को पूछने को जाते हैं। वो पता नहीं कि जगदंबा उनकी मां है। स्वामी जी का प्रॉब्लम था। वो इस तरह से मां में विश्वास नहीं करते थे कि जाकर पूछ के आए। बोले ठाकुर ने सोचा मुझे उसको परमिशन दे देनी पड़ेगी।

प्रश्न: कल्पतरु दिन को ठाकुर ने अपने त्यागी शिष्यों को स्पर्श कर के ईश्वर-दर्शन नहीं करवाया

और और देखिए कि वो काशीपुर वाला पर्व पहले यदि आ जाता ना तो फिर क्या है कि ये डायरेक्ट डिसाइपल के माइंड में भी यदि हो सकता है। स्वामी जी के माइंड में तो नहीं किसी किसी के माइंड में संदेह हो सकता है कि ठाकुर के पास में यह शक्ति है स्पर्श करके ईश्वर दर्शन करवा दे तो फिर हम ईश्वर दर्शन के लिए तपस्या कर क्यों रहे हैं? दैट क्वेश्चन माइट हैव अराइज़्ड इवन द माइंड ऑफ डायरेक्ट डिसाइपल। किंतु काशीपुर होते-होते डायरेक्ट डिसाइपल का इतना ये हो गया था कि ठाकुर के वचनों में विश्वास और तपस्या में एक आनंद ये इतना बैठ गया था कि बाद में ठाकुर जो भी लीला कर रहे हैं उनके मध्य उनके मार्ग में कोई अभी रुकावट नहीं आने वाली इन दिस सेंस ठाकुर इज अ एमेलगमेशन ऑफ

प्रश्न: कुछ संत इतने चमत्कार करते हैं कि उनके शिष्यों की संख्या बहुत बढ़ जाती है। लेकिन उनके जाने के बाद सब बिखर जाता है। लेकिन ठाकुर ने ऐसा संगठन बनाया कि वह हमेशा चलता रहेगा।

बुद्धा एंड कृष्णा भगवान कृष्ण के चमत्कार उनकी दया उनकी कृपा के जो वो कहानियां है उसके ऊपर में पूरा अपना हजारों साल का हिंदू धर्म बना हुआ है किंतु कोई इंस्टीट्यूशन नहीं है। ऑन दी अदर हैंड भगवान बुद्ध कहते हैं आत्मदीपो भव अपनी तपस्या करके अपनी वह मुक्ति प्राप्त करनी है। और उन्होंने इंस्टीटशंस बनाए जहां पे ये तपस्वी लोग रहकर के तपस्या करेंगे। नाउ ठाकुर के भीतर में दोनों का देखते हैं कि वो कल्पतरु ठाकुर है वो जो कि भगवान कृष्ण की परंपरा में इस तरह का चमत्कार करते हैं कि हजारों सालों तक उनकी वो जो दया माया या दया फिर कृपा का आसारा लेकर के भक्तगण रहेंगे और बुद्ध की तरह इंस्टीट्यूशन भी स्टार्ट किया। सो दिस इज यूनिक कॉम्बिनेशन ऑफ बोथ। इस अर्थ में ना वी आर नियरर टू

प्रश्न: ठाकुर के पास अपने संघ को बनाए रखने के लिए दीर्घकालिक योजना थी

क्रिश्चियनिटी इस अर्थ में कि एक तो पॉपुलर एक्सप्रेशन भी है और एक इंस्टीट्यूशनल बिल्ड अप भी है। क्रिश्चियनिटी में देखिए ऑर्डर्स है सब। ये फ्रांसिस्कन ऑर्डर है। फ्रायर्स का है। डिस्कास्ट कार्मेलाइट है। ये वो सोसाइटी ऑफ़ जेसुएट्स है। सोसाइटी ऑफ़ जीसस। तो वो ऑर्डर्स भी है व्हिच अह परफॉर्म देयर पर्टिकुलर स्पेसिफिक ड्यूटीज एंड उनका एक पर्टिकुलर एक ये है। फिर एक इन जनरल एक है पूरा सोसाइटी में फैला हुआ क्रिश्चियनिटी। सो अपना भी ये जो ड्यूल एस्पेक्ट है सिर्फ मोनेस्टिसिज्म नहीं सिर्फ एक पॉपुलर एक्सप्रेशन नहीं बोथ है। सो हाउ इट विल वर्क आउट विद इन इंडियन सोसाइटी ओवर अ पीरियड ऑफ़ टाइम इट विल बी इंटरेस्टिंग टू वॉच। ये इंस्टीट्यूशन जो होना विद इन एनी पर्टिकुलर रिलीजन। देखिए कि क्रिश्चियनिटी और बुद्धिज्म दोनों ही भीतर में है। इवन इस्लाम में भी नहीं है। ऐसा मोनेस्टिक इंस्टीट्यूशनलिज्म और सिखिज्म में भी नहीं है। जैनिज्म में है। जैनिज्म में है, बुद्धिज्म में है, क्रिश्चियनिटी में है। एस फार एस आई अंडरस्टैंड कि एक सस्टेंड लेवल पे इंस्टीट्यूशनल बिल्ड अप हुआ है ओवर ए लॉन्ग पीरियड ऑफ़ टाइम। थाउजेंड्स एंड थाउजेंड्स ऑफ इयर्स। माने मठ मंदिर वगैरह तो हो गया। किंतु एक इंस्टीट्यूशन इज़ समथिंग कंप्लीटली डिफरेंट। सो हां एंड इट इ हैज़ एन ऑर्गेनिक लाइफ ऑफ इट्स ओन सेल्फ परपेचुएटिंग अभी एक मठ बना है तो वहां पर मठाधिपति गए तो फिर मठ का क्या होगा कुछ ठीक नहीं है किंतु एक सेल्फ परपेचुएटिंग इंस्टीट्यूशन शंकराचार्य ने प्रारंभ तो किया किंतु वो ऐसा कुछ हो नहीं पाया माने डिसेंट्रलाइज हो गया माने इस तरह से डेवलप नहीं हुआ जिस तरह से होना चाहिए था दैट वे क्रिश्चियनिटी बुद्धिज्म जैनिज्म टू एन एक्सटेंट एंड आवर ऑर्डर