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Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 13 Feb 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग द्वितीय भाग स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा प्रणित द्वितीय भाग साधक भाव उसका प्रथम अध्याय साधक और साधना इसका हम पाठ कर रहे थे।

भक्त संसार की हर वस्तु और व्यक्ति को ईश्वर से जोड़कर उन्हें अपना बना लेता है

ऑलरेडी हमने देख लिया कि किस तरह से यह निर्विकल्प समाधि कैसे प्राप्त होती है। इसमें जो इंपॉर्टेंट टॉपिक हमने डिस्कस किए हैं विदिन दिस पॉइंट शरद महाराज जैसे हमको कहते हैं कि भक्त जगत और जगत के भीतर में जो कोई भी व्यक्ति या वस्तु है इस व्यक्ति या वस्तु को इस ईश्वर के साथ में संबंध युक्त देख के इन सभी व्यक्ति या वस्तुओं को अपना कर लेता है। और फिर साथ में यह भी कहा कि यह अपना कर लेने के पथ में जो लोग बाधा या अंतराय रूप होते हैं भक्त उनको दूर परिहार करते हैं। और इसके बाद में कहा कि ईश्वर के कोई एक रूप के भीतर में भक्त अपने को ढाल देता है। अनुराग और ध्यान से तन्मय हो जाता है। उस रूप के भीतर में और उन्हीं की प्रीति के लिए समस्त कार्य का अनुष्ठान करता है। तो यहां तक हमने ऑलरेडी देखा और साथ में इसके रिलेटेड कुछ कहानियां भी देखी कि किस तरह से श्री रामकृष्ण महावीर हनुमान के भाव की साधना कर रहे थे। तो उनके शारीरिक लक्षण दैहिक लक्षण सब महावीर हनुमान की तरह हो गए। आंखें चंचल होने लगी। फल खाने लगे। फल मूल खाने लगे। अनेक समय पेड़ के ऊपर में ही डालियों पर बिताते थे। रघुवीर रघुवीर करके चित्कार करते थे। और यहां तक कि उनकी करोड़ रज्जु का आखिरी हिस्सा पूंछ की तरह 1 इंच बढ़ गया था। इस हद तक ठाकुर ने अपने को तदाकार कारित कर दिया था। तत आकार आकारित कर दिया था महावीर हनुमान के भाव में और आखिर में उनको मां सीता का दर्शन हुआ। कितना सुंदर जो वर्णन है ठाकुर कहते हैं जब मां का दर्शन हुआ था प्रेम दुख करुणा और सहिष्णुता से उनका चेहरा परिपूर्ण था। अपूर्व ओजस्वी गंभीर भाव उनके चेहरे पर था। इस तरह की दिव्य आध्यात्मिकता उनके भीतर में से परिस्फुट हो रही थी कि देवी की मूर्ति में भी इस तरह का गंभीर भाव यूजुअली देखने को नहीं मिलता। तो वह एक कहा और जैसे ही वह सोच रहे थे कि कौन है यह स्त्री उस समय एक हनुमान कहां से हुप करके आकर के इस स्त्री के चरणों में गिर पड़ा और ठाकुर के हृदय में से ही उनका मन ही बोल दिया कि यह है सीता जन्म दुखिनी सीता जनक राज नंदिनी सीता राम मय जीविता सीता तब ठाकुर मां मां मां करके जैसे ही मां सीता के चरणों में लूटने को गए वैसे ही मां उनके हृदय में आकर के प्रवेश कर दी और ठाकुर को इस तरह से आनंद और विस्मय से अभिभूत हो गए और बाह्य ज्ञान चला गया समाधि में मग्न हो गए। और यह पूरा वर्णन के आखिर में ठाकुर एक बड़ी सिग्निफिकेंट बात करते हैं कि जन्म दुखिनी सीता का सर्वप्रथम दर्शन किया था बोलकर के ही लग रहा है कि मुझे आ जन्म दुख भोग करना पड़ रहा है। अभी यह ठाकुर ने किस तरह से कहा वो समझ में नहीं आता क्योंकि हमको तो पता है कि मां का ही वर्णन कि ठाकुर किस तरह सब समय एक प्रफुल्लित बालक की तरह रहते थे। बड़े हो ना कब माने बूढ़े हो ना कि बालक स्त्री हो ना पुरुष सभी के साथ में उनका बड़ा ही आनंदमय व्यवहार था। तो ठाकुर ने यह दुख भोग कहा किस हिसाब से कहा देखिए तपस्या के समय तो उनको दुख भोग करना पड़ा था किंतु वो दुख तो दुख नहीं लगता है। मां को मां का दर्शन प्राप्त करने की व्याकुलता जो है इस व्याकुलता के आवेश में जमीन पर गिर के अपना चेहरा मिट्टी में रगड़ना यह तो कोई दुख कष्ट नहीं है। यह तो प्रेम के आवेग की एक निशानी है। तो जो भी है यह जो कूट प्रश्न जैसे होते हैं वह कूट श्लोक महाभारत की कहानी में है ना कि व्यास देव ने गणेश भगवान गणपति को कहा कि आप मेरे लिपिक बनिए। मैं महाभारत के श्लोक एक के बाद एक बोलता जाऊंगा। आप लिपि लिपिबद्ध करते जाइए। तो गणेश जी ने क्या कहा कि मैं लिखने को तो तैयार हूं किंतु एक शर्त आपको सतत कंटीन्यूस अनर्गल बोलते जाना होगा। यदि आपके बोलने में कहीं पर इंटरप्शन हुआ आप रुक गए तो फिर मैं लिखना छोड़ के चला जाऊंगा। तो व्यासदेव कहते हैं अच्छा ठीक है तो सामने मैं शर्त रखता हूं कि आप जो भी लिखते हैं समझ करके लिखिए कि मैं क्या कह रहा हूं समझ में आए तब लिखिए तो ठीक है यह परस्पर शर्त हुई दोनों की अभी यह गणेश जी लिखने को बैठे हैं वेदव्यास जो है एक के बाद एक मंत्र बोल रहे हैं किंतु कभी-कभी उनको भी तो सोचना पड़ेगा वेदव्यास को भी कि इसके बाद का मंत्र क्या होगा श्लोक क्या होगा तो क्या करेंगे श्लोक नया कंपोज करने के लिए समय जब लेते हैं उससे पहले वाला श्लोक कूट श्लोक होगा और ऐसा कूट श्लोक होगा गणेश जी को सोचने में थोड़ा सा समय चला जाएगा कि इसका अर्थ क्या है तो जब तक वह अर्थ सोचते हैं इसका तब तक यह वेदव्यास जो है नया श्लोक कंपोज कर लेंगे तो ऐसे हर पांचवा ना कि ऐसा कोई श्लोक महाभारत में कूट श्लोक है तो यहां पे भी ये एक कूट श्लोक की तरह ठाकुर ने जो कहा कि मैं आजन्म दुख भोग किया इसका क्या अर्थ है वह तो अभी इसके बहुत सारे इंटरप्रिटेशन हो सकते हैं। तो एनीवे इसके बाद जो है शरद महाराज एक नया टॉपिक प्रारंभ करते मतलब विदिन दिस टॉपिक ही एक नया थीम प्रारंभ करते हैं। क्या कहते हैं

भक्ति मार्ग द्वारा निर्विकल्प समाधि की प्राप्ति

कि किस तरह से यह जो रूप है उसके ध्यान में आप तन्मय होते हैं। जगत को संपूर्ण रूप से भूल जाते हैं। जैसे कि यह महावीर हनुमान के दास्य भाव की साधना करने के समय महा रघुवीर की आराधना करने के समय ठाकुर के साथ में जो हुआ था जगत को जो भूल गए थे। तो किस तरह से यह पूरी प्रक्रिया कार्य करती है। यह और ज्यादा टेक्निकल डिटेल में शरद महाराज अभी जाते हैं। क्या कहते हैं? रूपे ध्यान तन्मय होइया रूप के ध्यान में तन्मय होकर केमोन कोरिया जगत अस्तित्व भूलिया निर्विकल्प अवस्था पहुंचीते पारा जाए ए बार आमरा ताहार अनुशीलन करबो रूप के ध्यान में तन्मय होकर के किस तरह से भक्त जगत का अस्तित्व भूल करके निर्विकल्प समाधि में पहुंच सकता है। इस बार हम इस बात का अनुशीलन करेंगे। देखिए प्रारंभ में भी हमने थोड़ा सा डिस्क डिस्कशन किया था कि भक्ति योग वो जिस वेदांत की जो ब्रांचेस के साथ में कनेक्टेड है जैसे कि विशिष्ट अद्वैत या तो फिर द्वैत वेदांत। इसमें सगुण ब्रह्मण की कल्पना की गई है। नहीं कि निर्गुण ब्रह्म की। निर्गुण ब्रह्मण की कल्पना या तो निर्गुण ब्रह्म का विवरण अद्वैत वेदांत में है। किंतु अद्वैत वेदांत ज्ञान मार्ग है। ट्रेडिशनली स्पीकिंग यह है अद्वैत वेदांत और उसके साथ में एसोसिएटेड साधना ज्ञान योग और यह है द्वैत या विशिष्ट अद्वैत वेदांत और उन दोनों के साथ में एसोसिएटेड भक्ति योग की साधना। अभी भक्ति योग से आप निर्विकल्प समाधि अर्थात कि निर्गुण निराकार ब्रह्म में स्थित कैसे हो यह फिलॉसोफिकल कंट्राडिक्शन लगता है। किंतु देखिए रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य का जिसने भी थोड़ा सा अध्ययन किया है श्री रामकृष्ण देव को जो भी फॉलो करते हैं उन सबके भीतर में इस तरह का फिलॉसोफिकल कंफ्लिक्ट कभी नहीं रहता कि यह ज्ञान मार्ग है। वहां पे निर्गुण ब्रह्म है। यह भक्ति मार्ग है। वहां पर सगुण ब्रह्म। तो सगुण ब्रह्म निर्गुण ब्रह्म में कैसे रूपांतरित होगे? यह फिलॉसोफिकल एक्रोबेटिक्स या तो फिर ये कंटोरशन लेकर के हम लोग ज्यादा टेंशन नहीं लेते हैं। तो यहां पे देखिए कि रूप के ध्यान में तन्मय होकर के किस तरह से जगत का अस्तित्व भूल करके निर्विकल्प अवस्था में पहुंचा जा सकता है। हम इस बार इस बात का अनुशीलन करेंगे। क्या कहते हैं महाराज जी आगे? पूर्वे बोलिया छ पहले कहा है भक्त ईश्वर कोनो एक रूप के निजो इष्ट बोलिया परिग्रह कोरिया तारे चिंता और ध्यान करते थके भक्त ईश्वर के किसी एक रूप को अपना इष्ट समझ करके उसको स्वीकार करके परिग्रह करके उन्हीं की चिंता वो ध्यान करता रहता है। प्रथम प्रथम ध्यान करी बार काले ये तो हमने ऑलरेडी देख लिया अ किस तरह से कोई भी एक रूप की आप चिंता करते हैं। अब जैसे महावीर के रूप की चिंता की या तो फिर यहां पर देखिए थोड़ा सा एक समझिए कि किस तरह से रूप की चिंता होती है। रघुवीर की आराधना करनी है तो महावीर होकर के करनी है। भगवान कृष्ण की आराधना करनी है तो गोपियों के मधुर भाव से या तो फिर मां यशोदा के वात्सल्य भाव से करनी है। तो यहां पे दोनों ओर से है रघुवीर के रूप की कल्पना भी आप सिद्धि कर सकते हैं और फिर महावीर हनुमान के दास्य भाव का आधार लेकर के भी रघुवीर को प्राप्त कर सकते हैं। भगवान कृष्ण के रूप की कल्पना आप सिद्ध कर सकते हैं। भगवान कृष्ण के जितने भी यह लाक्षणिकताएं उनकी यह जो आध्यात्मिक विलास आध्यात्मिक संपद है वह सीधी आप अपने भीतर में उसको आरोपित कर सकते हैं। या तो फिर मां यशोदा के वात्सल्य भाव या तो राधा रानी के श्रीमती राधा रानी के मधुर भाव से भी आप उनको प्राप्त कर सकते हैं। यानी कि सीधे रूप की कल्पना करें ना कि फिर कोई एक भाव लेकर के उनके साथ में संबंध स्थापित करें। तो यहां पे आइदर और किस तरह से भी आप उनके तक इष्ट तक पहुंचे। किंतु जब तक हम इष्ट तक पहुंचते हैं चिंता और ध्यान करतेकरते कोई भी एक भाव का सहारा लेते लेते हम इष्ट तक पहुंच तो जाएंगे ही प्रथम प्रथम ध्यान कर बार काले तीन ओई इष्ट मूर्ति सर्बाय संपूर्ण छवि मानस नयोने सम्मुख आते पारे ना भक्त जब प्रथम प्रथम ध्यान करता है। उस समय भक्त इष्ट मूर्ति के सर्व अवयव संपूर्ण छवि शबायोबो संपूर्ण छबी सर्व अवयव संपूर्ण छवि मानस नयन सामने आ नहीं ला सकता है। मानस नयन अर्थात कि मनः चक्षु मानस चक्षु अपने मन के भीतर में ईश्वर का संपूर्ण अवयव संपूर्ण चित्र वो प्रकटित नहीं कर सकता है। कॉम्प्लिकेटेड सेंटेंस अगेन किंतु बड़ा सिंपल उसका मीनिंग है। अब जैसे कि मैंने भगवान श्री रामकृष्ण देव की छवि के सामने देखतेदेखते ध्यान करने का प्रयास किया। अभी कुछ समय के बाद में मैं जब आंखें अपनी नत कर आंखें झुका देता हूं। देखिए मैं यहां पे मेडिटेशन के क्लास लेता हूं। मैं सबको एकदम स्पष्ट रूप से वार्निंग देता हूं कि कभी भी आंख बंद करके ध्यान मत कीजिए। हमेशा आंखों को झुका के रखनी है। आंखें कभी भी संपूर्ण रूप से बंद नहीं होनी चाहिए। ठाकुर की वह फेमस कल्पतरु छवि आप देखिए। ऐसा करके जो ठाकुर खड़े हैं देखेंगे कि उनकी आंखें खुली है। स्वामी जी की भी यह ध्यान की यह जो ध्यान की छवि है जिनको कि हम शराइन में रखकर के पूजा करते हैं। इस ध्यान मग्न छवि को भी आप एकदम ठीक से निरीक्षण कीजिए। स्वामी जी की आंखें खुली है। आंखें बंद नहीं की जाती। भगवान बुद्ध की भी मूर्ति देखेंगे तो आंखें खुली रहेगी। ध्यान मग्न मूर्ति को आप देखेंगे। हमेशा आंख को झुकाना है नहीं कि आंख को बंद करना। दूसरा कि जब अपने इष्ट की कल्पना करते हैं तो हृदय में करनी है। कभी भी अपने सर के भीतर में नहीं करनी। एक्सट्रीमली डेंजरस। तो यहां पे अभी देखिए कि आप जैसे-जैसे यह सब मेडिटेशन की किताबें या आध्यात्मिक शास्त्रों का आप स्टडी करते जाएंगे तो ऐसा कैजुअली कह लिखा हुआ मिलेगा कि मन में यदि रूप की कल्पना देखते हैं मन में यदि इष्ट का दर्शन करते हैं तो कभी-कभी हमको लगता है मन अर्थात कि ब्रेन ही और बहुत बार फिर यह आज्ञा चक्र जो है उसके ऊपर में ध्यान करने के बारे में भी लिखा है। अपना ठाकुर का तो फेमस किस्सा है कि जब वह आज्ञा चक्र के ऊपर में अपनी दो भ्रमर के बीच में ध्यान एक केंद्रित नहीं कर पा रहे थे तब तोतापुरी ने कांच का एक टुकड़ा लेकर के यहां पर चुभो दिया दोनों आंखों के बीच भ्रमर के बीच में और कहा कि यह जो पेन हो रहा है उसके ऊपर मन को एकाग्र करो। किंतु क्या है वह तोतापुरी और ठाकुर के लिए ठीक है। अपने लिए बिल्कुल ठीक नहीं है कि हम लोग भ्रू मध्य पे आज्ञा चक्र पे ध्यान करें या तो फिर मन के भीतर में हम लोग इष्ट मूर्ति का दर्शन करें। हमारे लिए भयानक खतरा है। यदि ऐसा कुछ करने को जाएंगे। ध्यान करते हैं। आंखें हमेशा झुकी हुई होनी चाहिए। नहीं कि बंद होनी चाहिए। और यदि इष्ट मूर्ति का दर्शन करना है उनको इमेजिन करना है तो हृदय में ही करना है नहीं कि मन के भीतर में एक समय आएगा कि नेचुरल इवोल्यूशन होगा हृदय में से मन में ऑटोमेटिक वो माने यह अनाहत चक्र है हृदय यह है विशुद्ध चक्र गले के ऊपर में सेंटर में और यह है आज्ञा चक्र तो यह अनाहत चक्र से विशुद्ध चक्र से यह आज्ञा चक्र एक ऑटोमेटिक इवोल्यूशन होगा। यदि हम कंसिस्टेंट रहते हैं अपनी साधना में तो किंतु जब तक वो नेचुरल इवोल्यूशन नहीं होता है जोर जबरदस्ती कभी भी अपना मन अपना ब्रेन अपना हेड या तो फिर आज्ञा चक्र के ऊपर में कभी भी ध्यान नहीं करना। ध्यान हमें ठाकुर ने खुद ने कहा है ध्यान करना है तो हृदय में करना है। डंका मारा जाएगा। ठाकुर कहते हैं डंका मारा जाएगा अर्थात कि अ वेरी पॉपुलर प्लेस हृदय में ध्यान करना। तो ध्यान हृदय में ही करना है। सो यहां पे शरद महाराज लिखते हैं कि भक्त जब अपने इष्ट के ऊपर में ध्यान करता है तो प्रथम प्रथम भक्त को और हृदय में ध्यान करता है। नहीं कि बाहर में अब जैसे कि मैं मंदिर में बैठकर के ठाकुर का जो यहां पर तो मार्बल इमेज है तो यह मार्बल इमेज के ऊपर में मैं ध्यान कर रहा हूं। मान लीजिए कुछ समय के बाद में मेरा मन अंतर्मुख होने लगा। तो जो जिस मार्बल इमेज को मैं शाइन के भीतर में दर्शन कर देख रहा हूं अपनी आंखों से और उनके ऊपर में जो मैं ध्यान कर रहा हूं अभी मेरी आंखें झुक गई और वही ठाकुर जो शाइन में बैठे हैं अभी मेरे हृदय में आकर के बस गए। मेरी आंखें झुकी हुई है। ठाकुर जिस तरह से शाइन में बिठाए गए हैं। जिस तरह से पुजारी महाराज ने ठाकुर को वस्त्र पहनाए हैं। जिस तरह से ठाकुर के चारों ओर पुष्प से सज्जित किया गया है वेदी को और गर्भगृह को जिस तरह से वहां पर खुशबू आ रही है। धूप या अगरबत्ती की जिस तरह से पूजा के उपकरण सब सजाए गए हैं ठाकुर के सामने तो मान लीजिए इसी गर्भगृह को इसी शाइन को मैं कॉपी पेस्ट करके अपने हार्ट में देखना शुरू करता हूं। मेरी आंखें झुकी हुई है और मेरा ध्यान हुआ मेरा मन मेरे हार्ट में एकाग्र हुआ है अनाहत चक्र के ऊपर में। अभी किंतु प्रॉब्लम क्या होता है कि मैं जब आंख खोलकर के गर्भगृह में श्राइन में ठाकुर को देखता हूं तो ठाकुर तो मुझे संपूर्ण दिखेंगे। एक सर है, दो हाथ है, दो पैर है। पुजारी महाराज ने सुंदर वस्त्र पहनाए हैं। तो बड़े सुंदर रूप से बैठे हुए हमको देखने को मिलेंगे। किंतु जैसे ही ठाकुर की इस मूर्ति का मैं हृदय में स्थापित करने का प्रयास करता हूं तो कभी क्या होगा? ठाकुर का सर दिखता है तो हाथ नहीं दिखते। हाथ दिखते हैं तो पैर नहीं दिखते। सर से कमर तक दिखते हैं तो पैर अदृश्य है और पैर दिखते हैं तो सर गायब है। ऐसा कभी-कभी होता है। क्यों? क्योंकि दो चीज एक तो अपनी कल्पना जो है इतनी विकसित नहीं हुई है। दूसरा है कि हमारा मन जो है वह डिस्ट्रैक्टेड है। तो कभी-कभी ऐसा होगा कि मैं हृदय में ध्यान करने के समय में ठाकुर का संपूर्ण दर्शन नहीं कर पाऊंगा। उनकी मूर्ति जो है या तो वह मान लीजिए मैं इमेजिन करता हूं दक्षिणेश्वर में ठाकुर बैठे हैं अपनी खाट के ऊपर में मैं उनके सामने जमीन पर बैठा हूं और फिर मैं ठाकुर का ही ठाकुर के ही ऊपर में ठाकुर को देख रहा हूं ठाकुर के ऊपर में ध्यान कर रहा हूं उस समय शायद हो सकता है कि ठाकुर का दोनों हाथ दोनों पैर सर संपूर्ण रूप से बैठे हुए मुझे न दिखे है। यह तो एक है। दूसरा कि कभी-कभी ध्यान में दर्शन होते हैं। जब दर्शन होते हैं तब भी कभी-कभी ऐसा होगा कि संपूर्ण ईश्वर का दर्शन होने की वजह सिर्फ यह जो वरा भय मुद्रा है उनकी ईश्वर की वर और अभय मुद्रा यही एक दर्शन हो या तो फिर उनके श्री मुख का ही दर्शन हो या तो उनके किसी आयुध का दर्शन हो भगवान कृष्ण का दर्शन होता है तो सुदर्शन चक्र का ही हो सिर्फ मान लीजिए तो इस तरह से मां काली का दर्शन होता है तो मान लीजिए सिर्फ खड़ग दिखा है या तो उनके पाए अर्थात कि उनके जो आलता परे हुए लाल कलर वाले जो पैर है वही दिखते हैं तो कभी-कभी इष्ट का कोई एक आयुध या तो कोई एक अवयव इतना ही दिखेगा। संपूर्ण इष्ट जो है हम ना ही उनका दर्शन कर पाएंगे ना ही हम उनको अपने मानस नयन के सामने ला पाएंगे। ऐसा हो सकता है। और फिर क्या होगा? फिर से मैं पूरा सेंटेंस पढ़ता हूं। यशरथ महाराज के लिखने की स्टाइल पूरा एक पैराग्राफ जितना यह सेंटेंस है। पहले ही कहा है भक्त ईश्वर के कोई एक रूप का अपने इष्ट समझ करके परिग्रह कर करके स्वीकार करके उन्हीं की चिंता और ध्यान करता रहता है। प्रथम प्रथम ध्यान करने के समय भक्त इष्ट मूर्ति का सर्व अवयव संपूर्ण छवि मानस नयन के सामने नहीं ला पाता है। कभी-क कोखन उहार होस्तो कभी उस मूर्ति का हाथ कोखन पद कभी पैर एवं कोखनोबा मुखखानी मात्र ताहार सम्मुख उपस्थित हो और कभी सिर्फ इस इष्ट मूर्ति का चेहरा मात्र उनके सामने उपस्थित होता है भक्त के सामने उहाओ आभार दर्शन मात्र ही जेनो लय होइया जाए और यह जो होता है मानस नयन से हम जब उनको देखने का प्रयास करते हैं तो दर्शन मात्र से ही जैसे कि इष्ट की छवि है वह लय हो जाती है विलीन हो जाती है सम्मुख स्थिर भावे अबोस्थान कोरेना अपने सामने स्थिर रूप से अवस्थान करती नहीं है अभ्यास फले ध्यान गंभीर होले ओई मूर्ति शर्माबायोबो संपूर्ण छवि मानस चौखेर सम्मुखे समय समय उपस्थित होए अभ्यास के फल से अभ्यास के परिणाम से ध्यान गंभीर होने से इस मूर्ति की सर्व अवयव संपूर्ण छवि मानस चक्ष के सामने मानस चक्षुओं के सामने समयसमय उपस्थित होती है। जैसे जैसे जब हम ध्यान करना प्रारंभ करेंगे यदि मैं मंदिर में नहीं बैठा अपने कमरे में भी सिर्फ बैठा हूं। मेरी नजर के सामने ठाकुर का एक फोटो रख दिया है। 10-15 मिनट मैंने आंखें खोल के ही ठाकुर के फोटो के सामने ही ध्यान किया है। ठाकुर के फोटो को नजर के सामने रखकर के फोटो के ऊपर में ही ध्यान किया है। किंतु अभी जैसे-जैसे मेरा समय बीतता जाता है। हो सकता है कि मैं अंतर्मुख होता जाता हूं। आंखें ढल जाती है और ठाकुर की यह जो फोटो या छवि है मेरे हृदय में उपस्थित होती है। शुरू शुरू में शायद ऐसा हो सकता है कि संपूर्ण ठाकुर मुझे हृदय में न दिखे। मेरे मानस नयन के सामने संपूर्ण ठाकुर न दिखे। कभी उनका चेहरा ही दिखेगा। कभी हाथ ही दिखेगा। कभी चरण युगल ही दिखेंगे। कभी आयुध दिखेगा, कभी वाहन दिखेगा। अभी आयुध और वाहन ठाकुर के पास में तो है नहीं। किंतु यदि भगवान राम भगवान कृष्ण वगैरह की करेंगे इस तरह से ध्यान तो उनके युद्ध भी है वगैरह तो हो सकता है वह सब सिर्फ दिखे। किंतु ध्यान जैसे-जैसे गंभीर से गंभीरतर होता है, गंभीरतम होता है, तब हम देखेंगे कि यह जो फोटो या छवि में हम अपने इष्ट को निहार रहे थे, इष्ट का दर्शन कर रहे थे। जब आंखें ढल जाती है और हृदय में जब यह आकर के उपस्थित होते हैं तो संपूर्ण अवयव सर्व अवयव संपूर्ण छवि हृदय में उपस्थित होती है। ध्यान क्रमे गंभीरतर होइले ओई छोबी जो तो क्षण ना मौन चंचल होए तो तो क्षण स्थिर भावे सम्मुखे अवस्थान कोरे ध्यान जैसे गंभीरतर होता जाता है तब धीरे-धीरे देखेंगे कि इष्ट की यही छवि इष्ट का यही स्वरूप जब तक अपना मन चंचल नहीं होता तब तक स्थिर रूप से हमारे सामने ने हमारे हृदय में अवस्थान करती है। मन चंचल होने से तो अभी आप कुछ नहीं कर सकते हैं। किंतु जब तक मैं आंख खुली रखकर के फोटोग्राफ में ठाकुर का दर्शन करता था उस समय जिस तरह से ठाकुर संपूर्ण अवयव के साथ में दिखते थे। सर्व अवयव संपूर्ण दिखते थे और स्थिर रूप से नजर के सामने रहते थे। ऐसा नहीं कि मैं आंख खोल के ठाकुर के फोटो का ध्यान कर रहा हूं। तो अभी मेरा मन हजार चंचल भी होगा। फोटो में तो ऐसा एटलीस्ट नहीं होगा कि ठाकुर का सिर्फ चेहरा ही रह गया। हाथ और पैर अदृश्य हो गए। या तो फिर वह जो उनकी यह जो हस्त मुद्रा है ना जिस तरह से वह ध्यान में बैठे हैं वह ध्यान अपने मंदिर में जो फोटो रखते हैं ठाकुर का जनरली तो यह जो मुद्रा में ठाकुर बैठे हैं वो मुद्रा ही रह गई बाकी के ठाकुर अदृश्य हो गए। आंख जब खुली रख करके फोटो के सामने या मंदिर में मूर्ति के सामने देखते हैं तब तक यह समस्या नहीं है। जब तक आंख खुली रखकर के ध्यान करता हूं तब तक यह भी समस्या नहीं कि मन चंचल होने से भी ठाकुर उठकर के खड़े होकर चले नहीं जाते वहां से। हजार मेरा मन चंचल हो। ठाकुर वहां पे स्थिर रूप से बैठे हुए दिखते हैं। ऐसा कभी नहीं होगा कि थोड़ा सा मन चंचल हुआ तो फोटोग्राफ में से ना कि वो मार्बल की मूर्ति में से ठाकुर उठ के खड़े होकर चले गए। आजकल यह जनरेटिव एआई आता है ना उसमें आप कोई एक फोटो को डालिए। फिर कहे इसको एनिमेट कीजिए। तो यह यदि कार्टून है तो कार्टून को एनिमेट कर देगा। यह मार्बल इमेज है तो मार्बल इमेज को एनिमेट कर देगा। ये जनरेटिव एआई ये जो वीडियो जनरेशन का यह कमाल है। किंतु थैंकफुली ये रियल लाइफ जो है वो एआई जनरेटेड स्टिमुलेशन नहीं है। यहां पे ठाकुर इस मार्बल इमेज में बैठे हैं तो हमेशा वैसे ही बैठे रहेंगे। फोटोग्राफ में यदि बैठे हैं तो हमेशा वैसे ही बैठे रहेंगे। तो आंख खुली रखकर के ध्यान करने का यह फायदा है। किंतु जैसे ही आपकी आंखें झुक गई और हृदय के भीतर में ठाकुर को लाकर बिठाया तो वह फिर पूरा जनरेटिव एआई पूरा वहां पे हृदय में चालू हो जाता है। थोड़ा सा ही मन चंचल हुआ। ठाकुर के हाथ पैर गायब हो गए। सिर्फ चेहरा रहा या तो फिर ठाकुर एनिमेट हो गए और खड़े होकर के चले गए और कहीं पे सब कुछ हो सकता है हृदय में ठाकुर को हृदय में स्थिर होकर के बैठे रहना बैठे रहे और उनके सर्व अवयव संपूर्ण रहे वह एक बहुत बड़ा चैलेंज है। बाह्य जगत जो है वो फिजिकल रियलिटी है और अपना जो इमेजिनेशन है वो जनरेटिव एआई की तरह है। ये जनरेटिव एआई में कुछ भी हो सकता है। जैसे ही अपना मन जो है विक्षिप्त हुआ सब तरह की गड़बड़ चालू हो गई। किंतु यहां पर शरद महाराज कहते हैं कि ध्यान जब गंभीर से गंभीरतर होता है तब मन की चंचलता प्रशित हो जाती है। मन का इधर से उधर दौड़ना बंद हो जाता है। उस समय हम देखेंगे कि यह जो इष्ट है स्थिर रूप से सर्व अवयव संपूर्ण होकर के अपने हृदय में अवस्थान करते हैं। परे ध्यान गंभीरता तारोतम में ओई मूर्ति चोला फेरा हसो कथा कहा एवं चर में उहार स्पर्श पर्यंत ओ भक्तर उपलब्धि होए बाद में ध्यान की गंभीरता जैसेजैसे बढ़ती जाएगी तो ध्यान की गंभीरता के आधार पे तारोतम में हमारी ध्यान की गंभीरता कितनी है उसका का आधार लेकर के इस मूर्ति का चलना फिरना हास्य करना वार्तालाप करना और आखिर में जो चरम उपलब्धि है मूर्ति को स्पर्श भी कर सकते हैं। मूर्ति के स्पर्श करने का सद्भाग्य भी भक्त को उपलब्ध होता है। देखिए यहां पे दो तरह की रियलिटी है। एक तो है कि मन जब चंचल रहता है तो इष्ट मूर्ति अपने हृदय में स्थिर होकर बैठेगी नहीं इधर-उधर गायब हो जाएगी। किंतु जब स्थिर होकर के अपना मन ठाकुर का दर्शन करता है हृदय में तो फिर ठाकुर जो वार्तालाप करते हैं चलना फिरना फिरना जो करते हैं हम उसको जो स्पर्श कर सकते हैं वो सब क्या है आध्यात्मिक लेवल पर एलिवेट हो गया है यानी कि यह जो इष्ट मूर्ति का जो चलना फिरना है दो तरह से होता है। एक तो हमारा मन अशांत या चंचल होने पर यह जो मूर्ति जो है स्थिर नहीं रह पाती वो एक है और जब अपना मन इस लेवल पर स्थिर हो जाए कि मूर्ति में जैसे कि प्राण प्रतिष्ठा हो गई है और मूर्ति जीवंत हो चुकी है तो वो जो मूर्ति का चलना फिरना है और अशांत मन के भीतर में जो मूर्ति इधर से उधर हो जाती है इष्ट की छवि वो तो दोनों में आसमान जमीन का आसमान पाताल का डिफरेंस है। वो तो हम समझ ही सकते हैं। जैसे-जैसे मन स्थिर होता जाता है वैसे ही देखेंगे कि आंख खुली रखकर के ठाकुर को मैं जो मंदिर में देखता हूं वह तो मार्बल की इमेज में संगमरमर की इमेज में सिर्फ बैठे ही हुए हैं। किंतु जब वो मरुणमई प्रतिमा और चिन्मय प्रतिमा वो जो कथामृत के वो पहले ही वार्तालाप में है। मास्टर महाशय कहते हैं ठाकुर को कि लोगों को बता देना उचित है कि वो लोग कहीं मृणमय प्रतिमा की उपासना नहीं करते। चिन्मय प्रतिमा की उपासना करते हैं। मृणमय अर्थात कि मिट्टी से बनी और चिन्मय अर्थात कि चेतन तत्व से बनी। तो यहां पे भी आंख खुली रखकर के जो हम मूर्ति की ठाकुर की मूर्ति का जो ध्यान करते हैं वो मृणमय नहीं है। अपने संघ में तो ज्यादातर आप देखेंगे या तो फोटोग्राफ है या तो संगमरमर की मूर्ति है। मेरे ख्याल से मैं गया नहीं हैदराबाद किंतु मैंने सुना है कि वहां पर अष्ट धातु की मूर्ति है। तो यही तीन तरह की मूर्तियां हमको देखने को मिल जाएगी। तो यह आंख खुली रखकर के जो स्थिर बैठे हुए ठाकुर का ध्यान करते हैं। यदि हम उनको अपने हृदय में बिठाए और अपना ध्यान गंभीर से गंभीरतम होता जाता है। अपना मन स्थिर से स्थिरतम होता जाता है। तब हम देखेंगे यह जो स्थिर मूर्ति ठाकुर की एनिमेट हो गई है। चलना फिरना करती है, हास्य करती है, वार्तालाप करती है और इस उपलब्धि के चरम शिखर पे भक्त उनके चरण युगल स्पर्श करके उनके आशीर्वाद भी ग्रहण कर सकता है। तखन ओई मूर्ति के शब प्रकारारे जीवंत बोलिया देखी ते पावा जाए उस समय उस मूर्ति को सब तरह से जीवंत देख के हमको समझ में आता है एवं भक्तो चखु मुद्रितो बा उन्मिलित कोरिया ध्यान कर ना केनो ओई मूर्ति रोई प्रकार चेष्टा आद सोम भावे प्रत्य कोरिया के और फिर भक्त आंख खोल करके या बंद करके मुद्रितो बा उन्मिलितो बंद करके या खोल करके ध्यान करें ना क्यों ना करें उस मूर्ति की उस प्रकार की चेष्टा सब तरह प्रत्यक्ष होती है। देखिए जैसे-जैसे हम ध्यान हमारा ध्यान गहन से गहनतम होता है और मूर्ति है जिनमें कि प्राण संचार होता है। प्राण प्रतिष्ठा होती है। सर्व रूप से जीवंत हो जाती है। उसके बाद में भले ही चाहे हम आंख झुका के हृदय में ध्यान करें ना कि आंख खोल करके मंदिर में देखें उनको यह मूर्ति हमको जीवंत ही दिखेगी। या तो फिर ठाकुर का जैसे वह केस हुआ कि वहां पर पंचवटी के नीचे में बैठे हैं और ठाकुर कहते हैं कि ऐसा नहीं कि मैं ध्यान कर रहा हूं या चिंतन कर रहा हूं। ऐसा कुछ नहीं। बस वैसे ही बैठा था और सहसा एकाएक देखा कि सामने वह मां सीता की मूर्ति आन प्रकट हुई है। तो ये नजर के सामने जीवंत इष्ट मूर्ति का प्रागट्य होना वह कब होगा? जब तो पहले हम अपने हृदय में इस मूर्ति को प्राण प्रतिष्ठा करते हैं। इस इष्ट की मूर्ति के साथ में इष्ट के इस रूप के साथ में हमारा एकाकारित्व हो जाता है। उनके ऊपर में संपूर्ण रूप से हमारी श्रद्धा भक्ति आकर के उपस्थित होती है। तब हम जब आंख भी खोलेंगे तो हृदय में जो प्राण प्रतिष्ठा की हुई इष्ट की छवि है वह जीवंत होकर के हमको चारों ओर विचरण करती हुई दिखेगी। फिर यह इष्ट हमको सिर्फ आंख झुका के हृदय में ही नहीं दिखेंगे। वहां तो दिखेंगे ही दिखेंगे। किंतु आंख खोल के जो कुछ कार्य कर रहे हैं इस जगत का सब में यही इष्ट का दर्शन होगा। तो इतना तो हमको शरद महाराज कहते हैं। अभी इसके ऊपर में बहुत सारा चिंतन हम लोग कर सकते हैं। मैंने यहां पर काफी कुछ कंपाइल किया है।

कल्पतरु दिवस पर रामलाल दादा के ईश्वर दर्शन

सर्वप्रथम तो ठाकुर के जो भाई के पुत्र थे रामलाल चट्टोपाध्याय हमारे रामलाल दादा वो ठाकुर की सेवा करते थे। काली मंदिर में पुजारी भी थे और बाद में साथ-साथ में ही ठाकुर की सेवा भी करते थे। और इनके बारे में और भी कुछ-कुछ चीजें हैं। ठाकुर बीच-बीच में कहते हैं कि रामलाल अभी मेरा इतना केयर नहीं करता है। मेरी इतनी देखभाल नहीं करता। वो वो भी पुजारी हो गया। तो बामुनेर दोले मिशेज है। बामुंदेर दोले मिशेज है। अर्थात कि यह पुजारी ब्राह्मण लोगों का एक दल था। एक ग्रुप था वहां पे काली मंदिर में तो अभी वह खुद तो पुजारी हो गए हैं काली के रामलाल दादा तो यह जो जितने भी ब्राह्मण पुजारी थे उनके दल में जाकर के अभी मिल गए हैं तो ठाकुर कहते हैं मेरी अभी इतनी केयर नहीं रखता है तो यही रामलाल दादा मां का पेंशन रुकवा दिया था तो एनीवे हमारे लिए तो पूजनीय ही है क्या करेंगे ठाकुर के भतीजे जो है तो किंतु देखिए कि यही रामलाल ठाकुर का फर्स्ट जनवरी 1886 कल्पतरु दिन के रूप से फेमस है। और शरद महाराज जैसे करते हैं आत्म प्रकाश अभयदान तो शरद महाराज का जो फ़ूलेशन है तो वह आत्म प्रकाश से अभयदान के दिन कल्पतरु के दिन रामलाल दादा भी वहां पर उपस्थित थे ठाकुर के साथ में और ठाकुर के ही पीछेछे चलकर के वह गार्डन में आए थे और ठाकुर ने जैसे ही गिरीश को कहा कि तोमादेर आर की आर की बोल तोमादेर चैतन्य हो और मैं क्या कहूंगा? तुम सबको चैतन्य प्राप्ति हो। उस समय ठाकुर जब सबको स्पर्श कर रहे थे तो यही रामलाल दादा ठाकुर के पीछे में खड़े थे और खड़े-खड़े सोच क्या रहे हैं पता है कि सबको ठाकुर इस तरह से आशीर्वाद दे रहे हैं और आमार शुद्ध गमछा बोया शार हो माने गमछा बोया अर्थात कि ठाकुर जब शौच के लिए जाएंगे तो एक पात्र में जल लेकर के ठाकुर के साथ में जाना होता है उसको कहते हैं गाड़ू और गमछा यानी कि यह जो एक गमछा यानी एक टॉवेल जैसा रहेगा। तो ठाकुर के लिए हाथ धोने का पात्र और यह टॉवेल उनके हाथ स्वच्छ करने के लिए यही वहन करना मैंने किया है ठाकुर का। तो यही वहन करना क्या मेरे जीवन का सार हुआ? सबको ठाकुर आशीर्वाद दे रहे हैं। मुझे कुछ नहीं मिलेगा। तो ये रामलाल दादा उनके पीछे खड़े-खड़े यह सोच रहे हैं। देखिए उनका बुद्धि और यह गुरु भाइयों का बुद्धि। गुरु भाइयों के मन में बड़ा स्पष्ट है। ठाकुर के लिए गाड़ू गमछाओ यदि वोन करते हैं तो भी उनका जीवन धन्य हो गया। किंतु रामलाल दादा का ऐसा था कि ये गाड़ू गमछा लेकर के मैंने वहन किया उनका तो यही क्या मेरे जीवन का सार है? तो ठाकुर के ठाकुर तो अंतर्यामी है। फट करके उनके मन की बात समझ ली। तो कहते हैं अरे रामलाल तू ही आए। अरे तुम भी आओ बोलकर के रामलाल दादा को स्पर्श कर दिया। अभी रामलाल दादा को जो दर्शन वगैरह हुआ यही लीला प्रसंग में शरद महाराज ने वर्णित किया है। रामलाल दादा खुद शरद महाराज को बताए हैं बाद में और जिसको कि शरद महाराज फिर लीला प्रसंग में लिखते हैं कहते हैं कि रामलाल दादा का क्या कहना है? जैसे ही ठाकुर का स्पर्श हुआ। इससे पहले इष्ट मूर्ति का ध्यान जब मैं करता था तो उनके श्री अंग का कुछ अवयव ही मेरी नजर के मानस नयन में देख सकता था। देखिए एग्जैक्ट यही शब्द यूज़ किया है। मानस नयन जो शब्द शरद महाराज ने ऊपर में किया है यूज़ मानस नयन यही शब्द यहां पे रामलाल दादा यूज़ करते हैं। हालांकि ये शरद महाराज ने लिपिबद्ध किया है बोलकर के हो सकता है शरद महाराज ने अपना शब्द बिठा दिया हो। किंतु शब्द वही है। मानस नयन के सामने इष्ट मूर्ति का कुछ अवयव ही देख पाता था। श्री अंग का थोड़ा ही भाग देख पाता था। जब मैं पाद पद्म देखता था तब चेहरा नहीं दिखाता था और जब चेहरे से कमर तक दिखता था तो फिर उनके श्री चरण नहीं देख पाता था। तो इस तरह से जो कुछ देखता था उसको सजीव बोलकर के भी मन में नहीं होता था। ऐसा ही लगता था कि फोटोग्राफ में जिस तरह से देखता हूं वही जैसे कि मेरी इमेजिनेशन आधा अधूरा मेरी नजर के सामने निर्जीव रूप से प्रदर्शित कर रही है। किंतु जैसे ही ठाकुर ने स्पर्श किया सर्व अंग संपूर्ण इष्ट मूर्ति हृदय पद्म में सहसा आविर्भूत होकर के संपूर्ण रूप से जीवित हो उठी झलमल हो उठी आध्यात्मिक प्रकाश से झलमल हो उठी देखिए यह उसी तरह की लैंग्वेज है जिस तरह की लैंग्वेज शरद महाराज ने हमको कही थी ऊपर के पैराग्राफ है और अगेन यह बात भी सच है कि शरद महाराज स्वयं इसका विवरण लिखते हैं रामलाल दादा का तो हो सकता है कि रामलाल दादा की जो कामार पुकुर की वो जो गांव की लैंग्वेज थी रूरल डायलेक्ट उसको सुसंस्कृत करके यहां पर लिखा हो कि जो भी है एग्जजेक्टली उसी टाइप का विवरण है कि जैसे ही ठाकुर ने रामलाल दादा को स्पर्श किया साथ में ही सर्व अंग संपूर्ण संपूर्ण जीवंत इष्ट की छवि उनके हृदय पद्म में आविर्भूत हुई और आध्यात्मिक प्रकाश से झलमल कर उठी। यहां पे देखिए यह जो कीवर्ड यहां पे यूज किया है हृदय पद्म में आविर्भूत हुई। इट्स अ वेरी इंपॉर्टेंट कीवर्ड। यूजुअली हम दर्शन के बारे में पढ़ते हैं तो दर्शन कहां होता है? ऐसा लिखा नहीं जाता। हम बाय डिफॉल्ट अनुमान कर देते हैं कि दर्शन मन में ही होते हैं और हो सकता है कि यह अपने हेड के भीतर में ही दर्शन हो। वी डू नॉट नो सभी दर्शनों का क्या ये है और यह जो हृदय की लिमिटेशन हमारे लिए है ठाकुर के लिए नहीं। सो वि ऑल दिस काव्याट ऑल दिस कंडीशनिंग हमको यहां पर स्पष्ट रूप से लिखा हुआ मिलता है कि हृदय पद्म में जीवंत इष्ट मूर्ति का सर्व अंग संपूर्ण जीवंत इष्ट मूर्ति का प्रकाश से झलमल कर रही देवी प्रकाश से झलमल कर रही इष्ट मूर्ति का दर्शन रामलाल दादा को हुआ था। अभी यह दर्शन होने के बाद में भी उन्होंने बदमाशी की है। वह सब अलग बातें हैं। देखिए यह आध्यात्मिक जीवन किस तरह का है। पर्सनली आई एम वेरी प्रजुडाइज अगेंस्ट हिम। ठाकुर के साथ में तो जो किया सो किया। मां के साथ में जो किया उसका कोई एक्सक्यूज नहीं है। सो अदरवाइज किंतु अपने लिटरेचर में देखेंगे खास करके राजा महाराज की स्मृति कथाओं में तो रामलाल दादा का बड़ा सुंदर वर्णन है। जब भी राजा महाराज के पास आते हैं राजा महाराज उस समय तो प्रेसिडेंट है। स्वामी जी चल बसे थे। तो राजा महाराज बड़े ही उत्साहित हो जाते हैं। खुश हो जाते हैं। रामलाल दादा को विनती करते हैं। ठाकुर के समय के भजन गाइए। रामलाल दादा गाते हैं। फिर रामलाल दादा और राजा महाराज और बाकी सब भक्त म सन्यासी वो नृत्य करते हैं। ऐसे बहुत सारे विवरण है। सो दैट इज वन थिंग किंतु एनीवे आध्यात्मिक जीवन है बड़ा कठिन। देखिए इष्ट का दर्शन होने के बाद में भी मन से जो कपटता है मन की जो बदमाशी है वो जाती नहीं है वो क्योंकि क्या है ठाकुर ने खुद ने कहा था ना हृदय को कि तुम्हारे पूरे कामार पुकुर में को मैं सोने से मढ़ करके जा सकता हूं किंतु इससे आप लोगों को कुछ होगा नहीं यहां पे दोनों तरह से एक तो मटेरियल वेल्थ भी ठाकुर दे सकते हैं आध्यात्मिक वेल्थ भी ठाकुर दे सकते हैं इसके बावजूद मन पवित्र नहीं होगा यह जो राजा महाराज को जो प्रश्न किया गया फेमस प्रश्न कि ठाकुर ने तो आपको सब कुछ दे ही दिया है। फिर आप क्यों इतनी तपस्या करते हैं? तो राजा महाराज कहते हैं निजेर कोरेने जनो इसको अपना लेने के लिए अपना कर लेने के लिए। किंतु यह अपना करने की जरूरत ही क्या है? जो अपना है उसको आ अपना क्या करना? किंतु देखिए यह सब नंसेस है। यह जो उधार में मिली हुई कोई भी चीज है ना हमको डाइजेस्ट नहीं होती है। कुछ दिन चलेगा काम किंतु फिर उधार तो चुकते करना ही होगा। ठाकुर ने स्वयं इष्ट मूर्ति का दर्शन करवा दिया है। इसके बाद में भी मन के जो अंकट मंकट है यह मन की यह जो सब कॉम्प्लेक्सिटीज है वह इतनी इजीली दूर नहीं होती है। तो मन की कॉम्प्लेक्सिटी तभी दूर होगी जब हम स्वयं तपस्या करके स्वयं जब ध्यान करके स्वयं कठोरता करके यथासंभव हम अपने को शुद्ध चरित्र करें और यहां पर दर्शन से भी बहुत देखिए कथामृत में यह वर्णन है मास्टर महाशय वराह नगर मठ में आते हैं ठाकुर की महासमाधि के बाद में उस समय नृत्य गोपाल जो है नृत्य गोपाल या नृत्य गोपाल मैंने दोनों नाम सुने हैं। सो व्हाटएवर ज्ञानानंद अवधूत बाद में अपने को कहलाता था। तो उसका विवरण चल रहा उसका वार्तालाप चल रहा है मास्टर महाशय और नरेंद्र के बीच में भविष्य के स्वामी विवेकानंद। तो यह नरेंद्र मास्टर महाशय कहते हैं कि देखो यह नृत्य गोपाल को तो इतने सब अनुभव होते थे, दर्शन होते थे। तो साथ-साथ में ही नरेंद्र कहता है कि अरे उससे क्या क्या हो गया कि दर्शन किया तो क्या हो गया? ये उससे तो ये अपने ये जो हरि महाराज है, तुरियनंद जी है, शशि महाराज है, शरद महाराज है, लाटू महाराज उससे लाख दर्जे अच्छे हैं। तो मास्टर महाशय साथ-साथ में ही कहते हैं हां तुम्हारी बात सही है। ठाकुर ने खुद ने कहा था साधु सावधान। ये इसी को कहा था और साथ में ही ठाकुर ने यह भी कहा था कि वो वो एकानंकार लोक नहीं। वो यहां का लोग नहीं है। वो पराया है। अंतरंग नहीं है। ऐसा ठाकुर ने कहा था। तो देखिए कि जब मास्टर महाशय और नरेंद्र वराह नगर मठ में ही दोनों का स्पष्ट थिंकिंग था कि चाहे जितने भी दर्शन हो अनुभूति हो आध्यात्मिक मन की पवित्रता जब तक नहीं आती है यह सब कुछ सरफेस के ऊपर में ही है। तो यह ध्यान और दर्शन के बारे में इसके बाद में जो हम एक लंबा विवरण है यह गोपाल की मां का किस तरह से गोपाल की मां को बाल गोपाल का दर्शन हुआ था वो वर्णन हम इसी जो शरद महाराज का शारदानंद जी का जो पूरा नैरेटिव है उसके साथ में टैग करके उसके साथ में लिंक करके देखेंगे तो अभी वह होगा अपने नेक्स्ट क्लास में लीला प्रसंग का जब नेक्स्ट क्लास आएगा तब ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: मैंने सुना है की मूर्ति का ध्यान न हो पाए तो लीला-ध्यान करना चाहिए। क्या ये सही है?

अपना जो फेमस है कथामृत पढ़ते-पढ़ते जप करना कथा और कहिनी दोनों है। कथा अर्थात कि वार्तालाप और कहिनी अर्थात कि उनका स्टोरीज। तो यदि उनका दर्शन ना हो तो ये स्टोरीज तो है ही है। वार्तालाप तो है ही है। अक्षर देह भी तो देह ही तो है। तीर्थ यात्रा देखिए तीर्थ यात्रा क्या है? पहले तो अभी आजकल तो सब व्हीकल में जाते हैं। अदरवाइज आप पैदल चलते-चलते तीर्थ यात्रा कीजिए। जितना चलते हैं साथ-साथ में ही इष्ट का चिंतन करते जाइए। सो यह पैदल चलना ये रास्ते का कष्ट उठाना यह सब भी तो एक तरह से ईश्वर चिंतन ही तो है। खुदीराम ने स्वयं तीर्थ यात्रा की थी। जहां-जहां तीर्थ यात्रा पे गए, कहां पे ये शालिग्राम मिला, कहां इष्ट का दर्शन हुआ। तो वो तीर्थ यात्रा इटसेल्फ इज अ वेरी पावरफुल मेथड ऑफ मेडिटेशन। अ जैसे आप घर छोड़कर निकल गए तीर्थ यात्रा पे मतलब घर का जो भी झमेला समाप्त हो गया अब एक पूरा एक नया ही जगत आपकी नजर के सामने खुलता है और उस समय तो यह सब मोबाइल मोबाइल नहीं था कि आप कहां बैठे अमरनाथ में मैसेज आ रहा है घर में यह नहीं है वो नहीं है तो ऐसा तो था नहीं उस समय घर छोड़ा माने मामला खत्म सो दैट इज व्हाट अल्टीमेटली मेडिटेशन और आध्यात्मिक जीवन है कि जो चीज हमको दिन प्रतिदिन खाए जा रही है उससे संपूर्ण रूप से ये हो जाओ, मुक्त हो जाओ, एक नए ही जगत में प्रवेश करो। दैट इज व्हाट अल्टीमेटली स्पिरिचुअलिटी इज।

प्रश्न: एक और रामलाल दादा कहते है, ठाकुर के लिए लोटा और गमछा वहन करना ही क्या मेरा जीवन है, दूसरी और त्यागी संतानगण जब ठाकुर सब को स्पर्श कर चैतन्य करवा दे रहे थे, तब भी ठाकुर के बिस्तर को धुप में देने में व्यस्त थे. सेवा ही उनके आध्यात्मिक जीवन की सार्थकता थी, नहीं की ईश्वर-दर्शन।

यह जो है यह बड़ा मतलब वेल नोन है। इस घटना को हम सभी लोगों को पता ही है कि किस तरह से उसी दिन यह अंतरंग के भीतर में दो डिवीजन हो गए। अंतरंगों के भी अंतरंग और अंतरंग में बहिरंग। ये डिवीजन के पीछे में जो सार है माने जो फाउंडेशन है वह है शरणागति। संपूर्ण रूप से ठाकुर को शरणागत हो गए हैं। बोलकर के अभी अपना अलग से अस्तित्व नहीं रहा। ठाकुर की जो आध्यात्मिक संपद है सब हमारी ही है। अपने को अलग से कुछ नहीं है। दूसरा कि काम कांचन त्याग। दिस इज द मोस्ट फंडामेंटल डिफरेंस बिटवीन। यह जो त्यागी संतान है और बाकी सबके बीच भीतर में मन जब संपूर्ण रूप से वासना रहित हो जाता है तो इवन आध्यात्मिकता को भी इस तरह से देखिए जब तक मन के भीतर में वासना है ना तो जैसे सभी चीजों के प्रति यह वासना रहती है काम कांचन के प्रति जिस तरह की वासना रहती है उसी तरह की वासना आध्यात्मिकता के प्रति भी रहती है वि इज वेरी फैसिनेटिंग देखिए आध्यात्मिकता कोई मटेरियल चीज नहीं है और आध्यात्मिक वस्तुओं की कामना करना कोई कामना के भीतर में नहीं है। यह तो हमने ठाकुर और स्वामी जी के जीवन में देखा है। ठाकुर स्पष्ट कहते हैं कि मैं भक्तों का राजा हूं। यह मेरी इच्छा थी। स्वामी जी ने स्पष्ट रूप से कहा कि द वे बुद्धा हैड ए मैसेज फॉर द ईस्ट आई हैव ए मैसेज फॉर द वेस्ट। तो यह जो भक्ति की कामना कामना के भीतर नहीं है। ठाकुर ने कथामृत में स्पष्ट रूप से लिखा है। एट द सेम टाइम आप भक्ति की कामना कामना के माध्यम से करते हैं या निष्काम होकर करते हैं। दैट मेक्स ए डिफरेंस। किस तरह से ये डिफरेंस खड़ा होता है? आई डू नॉट नो। किंतु यह आईडिया जो है वो आईडिया अपने साहित्य में बड़ा क्लियर है कि दो तरह के भक्त थे। एक भक्त थे। एक तरह के भक्त कि ठाकुर के पास में आकर के आध्यात्मिकता मांगते थे। दूसरे तरह के भक्त है आकर के ठाकुर को शरणागत हो गए। ठाकुर को समर्पित हो गए। उन्होंने ठाकुर के पास में जो आध्यात्मिकता यदि मांगी भी होगी स्वामी जी जैसे फॉर एग्जांपल स्वामी जी काशीपुर के अध्याय का जब आप वर्णन सुनेंगे तो स्वामी जी कहते हैं कि ठाकुर को कहते हैं कि सबको कुछ ना कुछ अनुभूति हो रही है। मुझे भी तो कुछ होना चाहिए। अह और दूसरा है कि स्वामी जी की भूख जो है इतनी गहन है कि वह छोटी मोटी अनुभूति से तो होगा नहीं उनको संतुष्टि तो तो निर्विकल्प समाधि की अनुभूति ही चाहिए। तो ये लोग मांगते हैं ठाकुर से आध्यात्मिक अनुभूति जिस तरह से दूसरे मांगते हैं इन्होंने भी मांगी है। बट व्हाट इज द डिफरेंस बिटवीन? ये दो मांग के बीच में डिफरेंस क्या है? वे लोग अपने को सेपरेट रख के मांगते हैं। यहां पर संपूर्ण रूप से शरणागत होकर के संपूर्ण रूप से समर्पित हो के मांगते हैं। सो आई आई डू नॉट नो कि इसका फिलॉसोफिकल इंप्लिकेशन क्या है? किंतु जो दिख रहा है वो बड़ा स्पष्ट है कि अलग से इनका अस्तित्व नहीं है। संपूर्ण रूप से शरणागत संपूर्ण रूप से समर्पित हो गए हैं। समर्प अब जैसे देखिए कोई एक बच्चा अपनी मां के पास में मांगता है रुपया तो बच्चे का मांगना मां के पास में दैट इज वन थिंग और बाहर वाला कोई आकर के उस स्त्री के पास में रुपया मांगता है कोई भी हो कितना भी अच्छा रिलेटिव हो कितना भी अच्छा मित्र क्यों ना हो बच्चा जो है और मां जो है वो ऑलमोस्ट दे आर वन एंटिटी और दूसरे जो भी है वह थोड़े से पराए हैं। सो दिस डिफरेंस इट इज देयर बिटवीन देम।

प्रश्न: क्या हम ऐसा कहे की ठाकुर के साथ में रहना सर्वोच्च है

ठाकुर के साथ में होना काम कांचन त्याग करके दैट इज वेरीेंट मास्टर महाशय भी तो साथ में थे बलराम बाबू भी तो साथ में थे किंतु उन सबके और त्यागी संतानों के बीच में यह बहुत बड़ा डिफरेंस है दैट इज काम कांचन त्याग माने सिर्फ मुंह से बोलने से तो नहीं हुआ कि मैं शरणागत हूं। राइट? अब नाग महाशय नाग महाशय के बारे में इतनी सुंदर सब कहानियां है वह मां के पास में आए तो मां ने जो शाल शालपाता जो कहते हैं जिसमें खाना दिया वो शालपाता खा गए साथ-साथ में मां का आशीर्वाद माने उनका प्रसाद समझ करके बट एट द सेम टाइम नाग महाशय इज नॉट वन ऑफ द 16 सो दैट डिस्टिंशन इज वेरी क्लियर इन आवर ऑर्डर मास्टर महाशय जैसे मास्टर महाशय कथामृत लिख दिया वो उनकी कि हम श्राइन में पूजा नहीं करते। तिथि पूजा नहीं उत्सव मनाते उनका।

प्रश्न: किसी भक्त से सुना है की मन की वासनाए तो कम हुई है, परन्तु ईश्वर दर्शन नहीं हुए. तो क्या दर्शन के लिए व्याकुल होना चाहिए की इतना काफी है?

यहां पर है ना यह दोनों देखिए पहली बात तो है कि चरित्र के ऊपर में आध्यात्मिक जीवन है। ये बात में तो कोई डाउट नहीं है। जो लोग डायरेक्ट एक्सपीरियंस के पीछे में दौड़ते हैं ना आप देखेंगे बहुत सारा लिटरेचर लिखा गया है। यह भ्रामरी वगैरह जो प्राणायाम है यह जो सब योगिक तांत्रिक क्रियाएं हैं। यह सब क्या है? सॉर्ट ऑफ ए शॉर्टकट कि आप चरित्र का गठन नहीं करके डायरेक्ट एक्सपीरियंस के पीछे में दौड़ते हैं। किंतु यह सब करने के बाद में आखिर में क्या होगा? तो ठाकुर की वही कहानी कि एक दो भाई है। एक भाई घर छोड़ के चला गया। बहुत दिनों के बाद वापस आया। बोलता है देखो मैं इतना पावरफुल हो गया हूं। ये नदी पे चलकर के जा सकता हूं अगले दूसरी ओर। तो यह दूसरा भाई जो घर में था बोलता है मैं 10 पैसे का नौका लेकर नदी को पार कर दूंगा। तुमने इतने साल वन में तपस्या करके पाया क्या? सो आप डायरेक्ट अनुभूति के पीछे में जाएंगे तो वो अनुभूति एस सच कोई वैल्यूुएबल नहीं रहेगी। किंतु इफ यह अनुभूति चरित्र गठन के चरित्र गठन रूपी फाउंडेशन के ऊपर में खड़ी है तो वो थाउजेंड टाइम्स मल्टीप्लाई हो जाएगी। यहां पे अनुभूति को आप जीरो जीरो जीरो गिन लीजिए। चरित्र गठन को वन रखिए। सो सिर्फ जीरो है तो कोई वैल्यू नहीं। चरित्र गठन अकेला है तो अगेन उसकी वैल्यू वन है व्हिच इज मोर देन ज़ीरो बट वह वन ही है। नाउ कंबाइन वन एंड ज़ीरो। नाउ अभी जितने भी चरित्र गठन के बाद में जितनी अनुभूतियां ऐड करते जाएंगे दैट इज 10 टाइम्स आपका वैल्यू बढ़ता जाएगा आध्यात्मिकता की।

प्रश्न: किसी महाराज के प्रवचन में सुना था की अष्टांग योग में यम-नियम ही मुख्य है. बाकि सब तो होता रहेगा।

देखिए यहां पर मैं बहुत सारे साधकों का साधुओं का एज वेल एस डिवोटियों का अनुभव बताऊं ना शुरू में आपको चरित्र गठन के लिए स्ट्रगल करना पड़ता है। द्वेष प्रकट होना मन में बड़ा स्वाभाविक है। ईर्ष्या प्रकट होनी बड़ी स्वाभाविक है। और बहुत बार ना हम इसको डिटेक्ट ही नहीं करते। हम इसको इग्नोर करके नेचुरल स्थिति में रहते हैं। नेचुरल क्या? मन में जो आता है उसको आने देते हैं। जिस तरह से ये हमको कठपुतली की तरह नचाता है हम नाचते रहते हैं। ये एक नेचुरल स्टेट है। किंतु जैसे-जैसे हम सेल्फ रिफ्लेक्शन करते जाएंगे जैसे-जैसे पता चलेगा कि यह सिचुएशन मेरे मन में द्वेष भाव खड़ा करती है। यह सिचुएशन मेरे मन में ईर्ष्या का भाव खड़ा करती है। यह सिचुएशन मेरे मन में काम भाव खड़ा करती है। तो यह ईर्ष्या, द्वेष, काम, यह सब चीजों को मुझे डिटेक्ट करना होगा और फिर इसको काटना होगा। कैसे भी करके मुझे काटना होगा। यह स्ट्रगल मुझे इनिशियल करनी ही पड़ेगी और यह आध्यात्मिक जीवन की सबसे कठिन स्ट्रगल है। एक बार इस स्ट्रगल में हम सक्सेसफुल होना शुरू हो जाए। देखिए, मैं आपको बताता हूं। समथिंग वेरी पर्सनल। मैं जब राजकोट से यहां पे आया, मेरा मन बहुत ही ज्यादा क्या कहेंगे? एजिटेटेड था। क्योंकि आई वाज वेरी डेडिकेटेड टू माय वर्क देयर। माने पब्लिकेशन मेरे लिए इतना प्रिय सब्जेक्ट है और इसके बावजूद कुछ-कुछ घटनाएं ऐसी हुई अ सीरीज ऑफ इवेंट्स कि जिसकी वजह से मुझे उसको छोड़ना पड़ा। नहीं छोड़ने से काम चल जाता। किंतु फिर मैंने सोचा कि देखिए इस सिचुएशन में मैं जो रहता हूं ना मेरा प्रॉब्लम कहां हो गया था? माय लव फॉर पब्लिकेशन। यह एक मेरे लिए अटैचमेंट की तरह हो गया था। अब पब्लिकेशन के ऊपर में जब अटैचमेंट कोई भी चीज के ऊपर में आपका अटैचमेंट है ना द्वेष, ईर्ष्या और काम ये तीनों आने ही वाले हैं। अटैचमेंट से ये तीन प्रकट होते ही हैं। तो मेरे लिए दो ऑप्शन थे। मैं बना रहूं यहां पे एट द सेम टाइम मैं कितना ही प्रयास करूं मैं ईर्ष्या द्वेष से मुक्त नहीं हो पाऊंगा। यह तो मैं समझ लिया था। यदि ईर्ष्या द्वेष से मुक्त होना है तो मुझे पब्लिकेशन छोड़ना पड़ेगा। सो मैं छोड़ के यहां पे आया। बट एट द सेम टाइम मुझे यह पता है कि दिस इज द एंड ऑफ माय करियर इफ आई कैन यूज़ दैट वर्ड इंस्टीट्यूशन में कैरियर होता है वेदर वी लाइक इट ऑ नॉट एंड दिस इज द एंड ऑफ रोड फॉर मी ये छोटा सा सेंटर है हियर मेरा कोई काम नहीं है मेरे लिए टू बी वेरी फ्रैंक सो दिस इज अ एंड ऑफ रोड फॉर मी यदि वहां पे रहता तो एक ब्राइट फ्यूचर था यहां पे नहीं है तो सब कुछ सोच समझ करके मैं यहां पे आया हूं मन से यह जो क्रोध है ईर्ष्या है इसको दूर करने का बहुत प्रया प्रयास किया है। सब कुछ माने जितना हो सके ह्यूमनली पॉसिबल ठाकुर की तरह अपने बालों से वो रसिक मेहतर का टॉयलेट क्लीन करना वो तो पॉसिबल नहीं है। किंतु ह्यूमनली जो पॉसिबल है सब किया है। अभी देखिए ऑलमोस्ट डेढ़ साल होने को आए। आई रियली फील पीसफुल। मैं ऐसा अभी मेरे मन में कुछ नहीं। किसी भी चीज के प्रति अट्रैक्शन नहीं। किसी भी चीज के प्रति अटैचमेंट नहीं। इफ आई कैन से मॉर्निंग क्लास जो मैं रेगुलर करता हूं। यह जो एक अटैचमेंट यदि कहे तो कह सकते हैं। किंतु थैंकफुली इसके साथ में कोई ईर्ष्या द्वेष जुड़ा हुआ नहीं है। तो अभी ऐसा कुछ नहीं मेरे जीवन में जो कि मुझे ईर्ष्या या द्वेष मेरे मन में प्रकट करें। अभी मैं जो जप करने को बैठता हूं या ठाकुर मां स्वामी जी का स्टडी करता हूं। आई रियली फील पीसफुल। तो क्या है ना वो स्ट्रगल एक बार आपको कर लेनी है। सेल्फ सैक्रिफाइस करना पड़े तो कर लेना है। फिर क्योंकि अल्टीमेटली मेरे जीवन में तो यही अल्टीमेट है ना। साधु होने को आकर के यदि मैं करियर के बारे में सोचूंगा तो तो फिर साधु होने का कोई अर्थ ही नहीं रहा। ये तो बिल्कुल ही उल्टा हो गया। सो एक बार स्ट्रगल करके आपको यह अचीव कर लेना है। उसके बाद में देखिए जब ध्यान वगैरह सहज रूप से चलते जाएंगे फिर कोई टेंशन नहीं है। किंतु देखिए सेल्फ रिफ्लेक्शन जब करते हैं बहुत ही ब्रूटल होकर करना है। बहुत ही ऑनेस्ट होकर करना है। यदि आप अपने से छुपाएंगे ना ट्रुथ को तो आप आगे बढ़ ही नहीं पाएंगे। जैसे हमारा ये जो रिसेंट डिस्कशन हुआ है कि हृदय की उदारता। अब अब, अब जैसे जगत में 700 करोड़ लोग हैं। मैं 700 करोड़ लोगों के प्रति हृदय की उदारता रख सकता हूं। बस यह सात लोगों के प्रति नहीं रखूंगा। यह सात लोगों ने मेरा अहित करने का प्रयास किया है। यह सात को छोड़कर 700 करोड़ के प्रति मेरी हृदय की सहानुभूति है। तो चलेगा ना सब स्टैटिस्टिकली तो क्या है? ये सात लोग इनसिग्निफिकेंट है। किंतु प्रैक्टिकली स्पीकिंग यही सात लोग ही मैटर करते हैं। वो 700 करोड़ मैटर नहीं करते। अब जैसा जिसके साथ मेरा कोई रिलेशन ही नहीं उनके प्रति मैं एब्स्ट्रैक्ट सहानुभूति रख सकता हूं। व्हिच इज नथिंग इन देयर। किंतु जो साथ के साथ में मेरा संबंध है, जिस साथ के साथ में घर करना है और जिस साथ के प्रति मेरा सस्पिशन है, उनके प्रति हृदय की सहानुभूति लेके आइए। दैट इज द रियल साधना। तो यह ब्रूटली ऑनेस्ट होना है आपके साथ में। आप यदि मन को मनाना ऐसा शुरू कर दें कि स्टैटिस्टिकली स्पीकिंग सात इज नथिंग। 700 करोड़ है इन जिनके प्रति है। सो आप अपने को ही मूर्ख बनाते हैं एट द एंड ऑफ द डे।

प्रश्न: स्वामी रंगनाथनंदजी कहते थे की वो अगले जन्म में रामकृष्ण मिशन में साधु होना चाहते है. साधु जीवन तो ईश्वरप्राप्ति का साधन (means) मात्र है किन्तु उनके लिए तो साधु जीवन ही लक्ष्य (end) हो गया.

या तो कहेंगे मीन अल्टीमेटली कन्वर्ट्स देमसेल्फ इनू एंड। मींस को थ्रू तो गुजरना ही है। राइट? बट इवेंचुअली मींस विल कन्वर्ट इनू एंड इन इटसेल्फ। अब अब मैं रंगनाथानंद जी किचन में काम करते थे तो इवेंचुअली प्रेसिडेंट हुए। नो डाउट। मान लीजिए वो हाइपोथेटिकली सोच के देखिए किचन में ही काम करते-करते सिद्धि प्राप्त हो गई। वही किचन में ही जीवन भर निकाल दिया। तो शुरू में जो साधना थी अल्टीमेटली सिद्धि में परिणत हो गई और वही लाइफ स्टाइल बन गई। वहीं पर नेति नेति करके वहीं पे इति होकर के आ गए वापस। सो बाहर ठाकुर खुद कहते हैं ना केरानी माने वह जो दुकान वाला है वह यदि सिद्धि प्राप्त हो जाती है वो जेल में यदि जाता है तो जेल में से बाहर निकल कर के धई कोरे नाचबे ना कि वो आ के किराने गिरी को माने वो नाचेगा ना कि फिर से वही किराने गिरी चालू कर देगा सो यदि किचन में रहते रहते स्वामी जी का कंप्लीट वर्क्स 50 बार पढ़कर के सिद्धि प्राप्त कर दी तो वही किचन में ही कंटिन्यू हाइपोथेटिकली स्पीकिंग ही वाज़ रिवार्डेड फॉर हिज ह डेडिकेशन बट सपोज के नहीं रिवार्ड होते हैं। रिवॉर्ड नहीं मिलता। किचन में ही रहते हैं। बट ये किचन विल बिकम स्वर्ग फॉर हिम। ओम