Skip to transcript
ClassesSaradakosh

Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : अवतरणिका || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 14 Apr 2025

prayer

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा लिखित हम स्वामी अभेदानंद जी महाराज की घटना देख

अभेदानन्दजी में अपनी शक्ति का संचार कर विवेकानन्द ने उनके लिए और खुद के लिए कितना बड़ा खतरा मौल लिया था.

रहे थे कि किस जिस तरह से स्वामी जी को स्पर्श करके उनके भाव प्रवाह में एक तरह का परिवर्तन हुआ और वह द्वैत साधना से अद्वैत साधना की और उनका पूरा प्रवाह बदल गया। प्रवाह जैसे कि एक तरह से अनएक्सेक्टेड टर्न हो गया। तो अभी इसके बाद में फिर ठाकुर ने स्वामी जी को पुकारा अपने कमरे में और स्वामी जी को कहा कि तुमने जो कुछ जमा होने से पहले ही तुमने खर्च करना क्यों शुरू कर दिया है? ऐसा करके और फिर क्या कहा कि छ महीने का गर्भ बच्चे का गर्भपात होता है। इस तरह से उसके साथ में हुआ है उसकी साधना के साथ में कि वह जिस भाव को लेकर के आगे बढ़ रहा था वह भाव में प्रीमेच्योर अभी उसका गर्भपात हो गया है। और किंतु साथ-साथ में ठाकुर ने यह भी कहा कि उनका अदृष्ट अच्छा है, नसीब अच्छा है। तो यह किस तरह से यह दो कंट्राडिक्टरी बातें ठाकुर ने कही। उसके बारे में हमने पिछली बार देखा भी था। थोड़ा बहुत स्पेककुलेशन हमने अपना किया था। अभी इससे आगे थोड़ा सा पढ़ते हैं कि ठाकुर आखिर शरद महाराज आखिर में क्या कहते हैं। इसके पहले की एक दो लाइन पढ़ लेता हूं। जो ठाकुर ने स्वामी जी को कहा था। ठाकुर ने क्या कहा कि रे क्या रे एक टू जमते ना जमते ही खर्च थोड़ा सा जमा मतलब थोड़ा सा पूंजी इकट्ठा हुआ नहीं हुआ इसके पहले ही तुमने खर्च करना शुरू कर दिया यानी कि स्वामी जी को तो भविष्य में बहुत सारा महत कार्य करना है विदेश में जाकर के भारत में भी इसके लिए उनके पास में आध्यात्मिक शांति शक्ति का एक संचय चाहिए। आध्यात्मिक स्पिरिचुअल पावर चाहिए। तो यह स्पिरिचुअल पावर उनके पास में आने से पहले ही यदि वह खर्च करना शुरू कर देंगे तो फिर भविष्य में जो उनको महत कार्य करना है उसमें व्याघात हो सकता है। यहां पर देखिए कि दोनों तरह से दोनों लोगों को तकलीफ हुई है। यहां पे एक तो अभेदानंद जी का जो था कि वो द्वैत के प्रवाह के अनुसार चल रहे थे। वह द्वैत साधना में विघ्न खड़ा हुआ और स्वामी जी के साथ में कि वह जो शक्ति का संचय कर रहे थे उस शक्ति संचय में संचय होने से पहले ही यदि खर्च कर दें तो यह तो ऐसा हुआ ना कि वो एफडी हम रखते हैं फिक्स डिपॉजिट और कहते हैं कि 5 साल के बाद में या 6 साल के बाद में यह डबल हो जाएगा। तो अच्छा ठीक है। हम इस आशा में बैठे हैं कि 5 साल के बाद एफडी जो हमने मान लीजिए कि ₹1 लाख रखा है तो 5 लाख 5 साल के बाद में वह 2 लाख हो जाएगा। अभी हुआ ऐसा किंतु नियम कैसा है फिक्स्ड डिपॉजिट का कि आप जो जो जिस पीरियड के लिए डिपॉजिट करते हैं मान लीजिए 5 साल के लिए डिपॉजिट किया है तो 5 साल से पहले आप उसको विड्रॉ नहीं कर सकते हैं। किंतु यदि मान लीजिए 3 साल के बाद में फिक्स डिपॉजिट रखने के 3 साल के बाद में मुझे एकदम आवश्यकता पड़ी और मैं चाहता हूं कि मुझे मेरा पैसा जो है वापस चाहिए बैंक से। कोई बहुत बड़ा एक्सपेंस आ गया है। हो सकता है कोई मेडिकल इमरजेंसी आ गई हो ना कुछ भी हो तो मुझे एफडी तोड़नी पड़ेगी। तो 3 साल के बाद में यदि एफडी तोड़ते हैं तो वो जो डबल होने वाला था 5 साल के बाद में वो तो होगा ही नहीं। वो 3 साल का जो इंटरेस्ट है वह भी शायद हाथ में से जाएगा। अभी आज के लेटेस्ट रूल क्या है वो मुझे पता नहीं। किंतु यह मेरी अपनी ओर से स्पेकुलेशन करके कह रहा हूं। तो यहां पर भी स्वामी जी के साथ में ऐसा ही हुआ कुछ या तो फिर कहेंगे कि होने वाला था और शायद ठाकुर ने उसको यह दुर्घटना होने से बचा लिया कि जो पूंजी जमा कर रहे थे वह एक उसका एक मैच्योरिटी लेवल आ जाए स्पिरिचुअल साधना का स्पिरिचुअल शक्ति का उसके बाद में यदि वह खर्च करते हैं तो कोई दिक्कत नहीं है। उसके पहले यदि उसको खर्च करना शुरू करें तो प्रॉब्लम यह होगा कि उस समय जबकि वो उनके पास में इतना आध्यात्मिक संचय नहीं है तो उसका जो असर इफेक्टिवनेस है वह भी इतना नहीं रहेगा जो एक इंटेंडेड उसका जो असर है उसका जो इंपैक्ट होने वाला था वह शायद उसमें कुछ गड़बड़ हो जाए और इतना ही नहीं इस समय यदि यह हाथ में से चला गया तो भविष्य में उसको दोबारा इकट्ठा करने के लिए हो सकता है कि और भी ज्यादा समय लगे शायद ना भी हो पाए किसको पता तो यहां पे जितना नुकसान अभेदानंद जी को हुआ था उतना ही नुकसान शायद स्वामी जी को भी हो सकता था। इसलिए देखिए कि यहां पे ठाकुर का जो सबसे पहला कंसर्न है कि पूरे भविष्य में पूरे विश्व में धर्मचक्र प्रवर्तन करना है। तो वैसे तो ठाकुर के जन्म से यह कार्य प्रारंभ हो गया है। किंतु एक जो एक एजेंट चाहिए ठाकुर को अपना क्योंकि उनकी जो वाणी है वह घर-घर तक पहुंचाए। उनका जीवन का जो अमर संदेश है, उनके जीवन के यह जो प्रेरक प्रसंग है, वह घर-घर पहुंचाए। इस तरह का कोई उनको एक चाहिए था अर्जुन या तो फिर कहेंगे कि राजा अशोक या तो फिर क्रिश्चियनिटी में जैसे कि था कॉनस्टेंटाइन किंग एपरर कॉनस्टेंटाइन। तो इस तरह का कि जो कि अवतार के मैसेज को घर-घर तक पहुंचाए। इस तरह के थे यहां पे स्वामी विवेकानंद। तो यदि उनको यदि पहले से ही यह जो पूंजी जमा करने से पहले ही खर्च कर दी और भविष्य में फिर से उतनी पूंजी जमा ना कर पाए तो फिर कितना भयानक नुकसान पूरे विश्व को होगा। तो यह खतरा स्वामी ठाकुर को पता था। इसीलिए उन्होंने स्वामी जी को ऐसा कहा कि उसके बाद में क्या कहते हैं? आगे निजे भीतर भलो करे जोमते दे तो कोथाई की भाबे खर्च करते होवे ता बुझते पारवी सबसे पहले अपने भीतर में अच्छे से आध्यात्मिक शक्ति है जप की संख्या है ईश्वर के जो आशीर्वाद है उसको तुम पहले तो कलेक्ट करो उसका एक प्रॉपर निधि गठित करो उसका एक प्रॉपर कलेक्शन करो उसके बाद में ही तो तुमको पता चलेगा कि किस तरह से कहां पे और किस तरह से खर्च करना है वह तुम समझ पाओगे। अभी जैसे कि देखिए कि पावर वीक होता है और जैसे कि अपने घर में कभी हमने देखा होगा जब इलेक्ट्रिसिटी फ्लक्चुएशन होता है तो हम यह जो इलेक्ट्रिकल जो गैजेट्स होते हैं लैपटॉप है ना कि मोबाइल है ना कि टेलीविजन है तो हम क्या करेंगे? उसका स्विच ऑफ कर देंगे। यानी कि इलेक्ट्रिसिटी के फ्लक्चुएशन से यह जो अपने डिजिटल या तो फिर इलेक्ट्रिकल गैजेट्स है उसमें किसी ना किसी तरह का माल फंक्शन खड़ा होने की संभावना है। वह बिगड़ जाने की संभावना है। तो यहां पे भी यदि स्वामी जी की जो यह डायनेमो है स्पिरिचुअल डायनेमो उनके भीतर में उनकी यह जो स्पिरिचुअल एनर्जी है वह तो अभी ठीक से वह डायनेमो स्टार्ट नहीं हुआ है। अभी तो डायनेमो अभी बचा ही है। तो अभी यदि यह इलेक्ट्रिसिटी फ्लक्चुएट होना शुरू हो गया तो जिसको स्पर्श किया है उसके भीतर में सिर्फ बात यह नहीं है कि प्रॉपर इंपैक्ट नहीं होगा क्योंकि इलेक्ट्रिसिटी का वॉल्यूम कम है। उसमें फ्लक्चुएशन भी हो सकता है। तो वह परमानेंट डैमेज भी हो सकता है। इसलिए ठाकुर यहां पे कहते हैं कि पहले तो तुम ठीक-ठीक उस डायनेमो को स्पिरिचुअल डायनेमो को तुम एक्टिवेट करो। उसको प्रॉपर्ली फंक्शन होने दो। उसके बाद में जहांजहां पर यह स्पिरिचुअल करंट भेजोगे तो कितनी अमाउंट में भेजना है एग्जजेक्टली किस तरह से उसको फाइन ट्यून करके स्टेबल करंट पहुंचाना है जिससे कि वो जिस गैजेट में जा रहा है करंट वो गैजेट डैमेज ना हो जाए यह तो तुम बाद में समझोगे ना अभी तो डायनेमो स्टार्ट नहीं हुआ है और पहले से ही सबको करंट पहुंचाना शुरू कर दिए हो और एक्चुअली यही तो अभेदानंद जी ने कहा ना कि स्वामी जी को जैसे स्पर्श किया वैसे ही मुझे ऐसा लगा कि मुझे जैसे कि बिजली का करंट लगा है। एग्जैक्टली यही शब्द अभेदानंद जी यूज करते हैं। इसलिए यहां पर ठाकुर कहते हैं और इसीलिए हम यह इलेक्ट्रिक करंट का यह डायनेमो का जो उपमा है उदाहरण है उसको लेकर के इसको हम समझ सकते हैं। तो इसीलिए ठाकुर कहते हैं कि पहले तो अच्छे से तुम डायनेमो को स्टार्ट करो। फंक्शन होने दो। उसके बाद में कहां-कहां पर यह बिजली पहुंचानी है, कैसे पहुंचानी है, किस तरह से स्टेबल यह इलेक्ट्रिसिटी इलेक्ट्रिक जनरेशन जाना चाहिए तो वह तो बाद में समझ सकोगे। माई बुझिए देवन मां जगदंबा ही समझा देगी। क्योंकि जगदंबा की शक्ति जब अपने हृदय में अवतरित होती है तो मां जगदंबा स्वयं बता देगी कि इस शक्ति का कहां पे किस तरह से व्यय करना है और भीतर तोर भाव ढुकिए और की अपकार टाटा कोरली बोल दे कि उसके भीतर में यानी कि काली महाराज के भीतर में तुमने अपना भाव प्रवेश करवा करके किस तरह का उसका नुकसान किया। किस तरह का उसका अपकार किया देखो तो सोच के तो थोड़ा देखो वो एतो दिन एक भाव दिए जा लो शेटा शोभ नष्ट होए गो वो इतने दिन एक भाव लेकर के विकास कर रहा था आध्यात्मिक जीवन में प्रगति कर रहा था वो भाव यानी कि द्वैत भाव ईश्वर के प्रति शरणागति का भाव यह नष्ट हो गया छोए माश गर्भ जेनो नष्ट होलो 6 महीने का गर्भ का जैसे कि गर्भ नष्ट हो गया गर्भपात हो गया जा हो बार होए छ किंतु फिर ठीक है अभी जो होना सा तो हो गया एक होते हठात अमों आर कोरिशनी अभी से इस तरह का एकाएक किसी पे तुम अपना यह जो शक्ति का प्रयोग है यह मत करना जा छोड़ाटार अधेष्टो भलो जो भी है लड़के का नसीब अच्छा है तो यह सब हमने पिछली बार सब डिस्कस किया था अभी अभी और थोड़ा सा आगे पढ़ते हैं। स्वामी जी बोली

ठाकुर की दूर-दर्शन की शक्ति

तेन स्वामी जी ने कहा जब ठाकुर ने इतना सब कुछ उनको कहा तो स्वामी जी फिर ठाकुर के सामने तो वो कुछ नहीं बोल पाए किंतु जब यह गुरु भाइयों के साथ में जो डिस्कस कर रहे थे उस समय स्वामी जी ने कहा कि आमी तो एक बार ओबाग मैं तो एक मैं तो संपूर्ण रूप से स्पीचलेस हो गया। मेरे निशब्द हो गया। मेरे मुंह से एक शब्द भी नहीं आ पाया। जब मैंने ठाकुर की यह बात सुनी तो पूजा समोय नीचे आमरा जा कोरे छ ठाकुर समस्त तो जानते पेरे छ पूजा के समय में हमने वहां पे पूजा घर में जो जो किया ठाकुर सब जान पाए थे यानी कि यह भी तो ठाकुर का एक टेलीविजन है टेलीविजन यानी कि दूरदर्शन वो जो संजय जिस तरह से धृतराष्ट्र को बताता है कि किस तरह से धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में किस तरह का युद्ध हो रहा है। किस तरह से पांडव और कौरव युद्ध कर रहे हैं। किस तरह से उनकी सेना खड़ी है। तो वह जिस तरह से संजय का वह जो टेलीविजन था, दूरदर्शन था, दूरदर्शन की कैपेसिटी यहां पे जैसे कि ठाकुर के पास में भी इस तरह से दूरदर्शन की कैपेसिटी है। पूजा घर में जो हुआ था सब समझ गए थे। वो कि कोरी तार ओ रूप भरनाय चुप कोरे रेलूम। तो अभी ठाकुर ने इस तरह से मुझे डांटा तो फिर मैं क्या कहता मैं चुप करके रह गया सब कुछ मैंने चुपचाप सुन लिया फले देखा गो अभेदानंदो जे भाव सोहाए पूर्वे धर्म जीवो ने अग्रशोर होइते छिलो ताहार तो एक बारे उच्छेद होइया जाोई आार अद्वैत भाव ठीक ठीक धरा ओ बुझा काल सापेक्षो होए वेदांत दोहाई दिया से कोखन कोख खोन सदाचार विरोधी अनुष्ठान शकोल कोरिया फैलीते लागीो अच्छा इसको ट्रांसलेट करने से पहले यह जो ठाकुर की दूरदर्शन की कैपेसिटी थी इसके बारे में वह जो फेमस घटना है कि उस समय वहां पे सुरेश मित्र अपने घर में दुर्गा पूजा का आयोजन कर रहा था ठाकुर उस समय मोस्ट प्रोबेबबली श्याम पुकुर में थे और श्यामपुकुर में अभी क्या है ठाकुर को तो कैंसर हो गया है अदरवाइज तो सुरेश तो ठाकुर का पक्का भक्त है। जब भी इस तरह का कोई बड़ा पूजा अनुष्ठान करेगा दुर्गा पूजा जैसा तो ठाकुर को भी वह आमंत्रण देगा। ठाकुर के साथ में सब भक्तगण भी उसके घर जाएंगे। भजन कीर्तन होगा। कितना सुंदर वातावरण होगा। तो अभी किंतु इस समय तो ठाकुर को कैंसर है। ठाकुर जा नहीं पाएंगे। तो क्या करें? तो किंतु देखिए कि भक्त के हृदय की पुकार भगवान किस तरह से सुनते हैं। वह वहां पर मां दुर्गा की मूर्ति के सामने मां मां बोल के रो रहा है। और यह उसकी रोना उसकी जो रुलाई है, उसका जो रोदन है, वह ठाकुर के कानों में वहां पर गया। अभी भले ही चाहे कितने ही कैंसर के कैंसर से ग्रस्त हो, किंतु यह बाहर का तो आवरण है। एटा तो खोलटा। ठाकुर जैसे कहते हैं यह तो आवरण मात्र है। सही तो इसके भीतर में जो हमारी अंतरात्मा है वही तो एक सही है। तो फिर ठाकुर ने वहां पर जाकर के सूक्ष्म देह से वहां उपस्थित होकर के उसको आशीर्वाद दिया। फिर वह जब अपने उस समय तो वह भाव में चले गए थे। किंतु फिर भाव भंग हुआ जब वह सामान्य कॉन्शियस लेवल पर आए। उन्होंने बाकी सब भक्तगण जो सामने बैठे थे उनको कहा कि देखिए कि सुरेश मित्र वह अपने घर में प्रतिमा के सामने बैठा हुआ रो रहा है और उसके चारों ओर यह दिया वो जो दिया वगैरह है वह जल रहा है। तो जैसे ही मुझे उसके जो उसकी जो पुकार सुनाई दी वैसे ही जैसे वह श्याम पुकुर से उसके घर पर एक आलो रास्ता यानी कि प्रकाश का पथ तैयार हो गया और उस प्रकाश पथ से जाकर के मैंने अर्थात कि ठाकुर ने वहां पर उपस्थित होकर के उसको आशीर्वाद दिया और फिर ठाकुर कहते हैं कि जाओ जाओ तुम सभी लोग जाओ वह बेचारा अकेला रो रहा है मैं तो नहीं जा पाऊंगा किंतु तुम जाकर करके उसको मन को शांति दो। तो यह भक्तगण सोच रहे हैं कि ठाकुर को यह दर्शन हुआ होगा तो ठीक है। अभी देखिए कि यह जो हमने पिछली बार भी एक बार डिस्कस किया था कि यह वर्ल्ड ऑफ कॉन्शियसनेस चेतना का जगत है। एंड दिस इज द वर्ल्ड ऑफ मैटर। पदार्थ का जगत है, भौतिक जगत है। तो चेतना के जगत में हमको जो दर्शन होता है, जो उसमें अनुभूतियां होती है, वह चेतना के जगत तक ठीक है। और भौतिक जगत में यह जो फिजिक्स, केमिस्ट्री वगैरह जो साइंस है, वह वहां तक ठीक है। हम किंतु यानी कि यहां पे है साइंस ऑफ कॉन्शियसनेस जो कि हम योग और वेदांत के माध्यम से समझते हैं। और यहां पे है साइंस ऑफ नेचर। नेचुरल साइंस या तो फिर साइंस ऑफ मैटर जिसको कि हम फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी के माध्यम से समझते हैं। तो अभी एक ऐसा हमारा अनुभव रहता है कि यह दोनों जगत तो बिल्कुल डिफरेंट ही है। इन दोनों में कनेक्शन कहां से आ गया? जब दोनों के बीच में कनेक्शन खड़ा होता है तब हम उस बात को चमत्कार के रूप में गिनते हैं। और पिछली बार मैंने इस तरह से हमने जो डिस्कस किया था दो उदाहरण देखे थे कि जब वो मां शारदा देवी जयराम बाटी में बीमार थी। उस समय मां जगत धात्री ने जगदंबा ने स्वयं जाकर के मां की मां को श्यामा सुंदरी देवी को औषध देकर के कहा था कि यह औषध अपनी बेटिया को शारदा देवी को खिलाना तो वह ठीक हो जाएगी। अभी देखिए कि एक्चुअल कुछ मटेरियल पदार्थ किसी के हाथ में देना वो तो यही कॉन्शियस वर्ल्ड से ये मैटर मटेरियल वर्ल्ड में क्रॉसओवर हो गया। तो दिस इज़ मिरेकल म कॉन्शियस वर्ल्ड में विज़न होता है। वह ईजीली समझ सकते हैं। जो लोग ड्रग चरस वगैरह लेते हैं जो एलएसडी वगैरह लेते हैं उन लोगों को भी इस तरह का अनुभव होता है। सपने में भी हम लोग देखते हैं कि हम कहां-कहां जाकर के क्या-क्या करते हैं। तो मानसिक जगत अपना यह सब अपने देह को छोड़कर के 10 जगह पर घूमता है। 10 तरह का अनुभव होता है। वो दैट इज वेल एक्सेप्टेड। किंतु यह मानसिक जगत से यह भौतिक जगत में चले आना और दूसरा उदाहरण देखा था कि ठाकुर ने रामलल्ला की वह धातु की मूर्ति को वो गंगा के भीतर में तैरते हुए देखा था स्विमिंग करते हुए और स्विमिंग यानी कि ऐसा नहीं कि धातु की मूर्ति को पानी में रख दिया तो वह फ्लोट हो रही है वो किंतु फ्लोटिंग नहीं वो एक्चुअली दोनों हाथ पैर लगाकर के स्विमिंग कर रही है। तो ऐसा तो कैसे हो सकता है? रोबोट स्विम कर सकता है। धातु की मूर्ति कैसे स्विम कर सकती है? तो यहां पे भी देखिए कि चेतना के जगत में ठाकुर को कोई अनुभूति होती है, दर्शन होता है। वह तो एक चीज है। किंतु ठाकुर सूक्ष्म देह से सुरेश मित्र के घर गए, घर में जाकर के उसको आशीर्वाद देकर के वापस आए। यह तो ऐसा नहीं लगता कि यह चमत्कार है या तो फिर हम भक्त लोग ऐसा सोचने लगे कि चलो ठाकुर को दर्शन हुआ है तो दर्शन में कुछ भी हो सकता है। किंतु जब वो सुरेश मित्र के घर गए आश्चर्यचकित हो गए कि ठाकुर ने जो वर्णन किया था वहां का एग्जैक्टली वैसा ही सब कुछ है। वही वो मां दुर्गा की मूर्ति वही जो चारों ओर यह दीपक टिमटिम कर रहे हैं। प्रज्वलित हो रहे हैं। और उसके सामने सुरेश मित्र बैठकर के रो रहा है। ठाकुर ने जिस तरह का वर्णन किया था एग्जैक्टली उसी के साथ में मैच हो रहा है। तो भक्तगण बड़े ही आश्चर्यचकित हो गए थे। अच्छा यह जैसे

मथुर बाबू की दुर्गा पूजा और ठाकुर का आशीर्वाद

कि दुर्गा प्रतिमा की बात है तो और भी एक सुंदर इंसिडेंट है कि वह अपना मथुर बाबू मथुर बाबू ने दुर्गा पूजा की और वह जो दुर्गा पूजा जो चलती है चारप दिन जितना भी वह षष्ठी से लेकर के फिर यह दशहरा तक विसर्जन तक तो फिर वह बड़ा ही आनंद से समय बीता जान बाजार का घर था मथुर बाबू का ठाकुर भी आए थे तो ठाकुर तो जहां पर रहेंगे वह आध्यात्मिक वो जो करंट है वो तो चारों ओर फैलने वाला है। तो मथुर बाबू उस समय अपनी जो उनकी जो यह है अपने जीवन के सर्वोच्च शिखर पर वो बैठे थे। बाद में फिर क्या है कि वह बहुत बीमार हो गए थे और वह ठाकुर को बीच-बीच में बुलाते भी थे कि आप मुझे अपना दर्शन देने के लिए यहां पे आइए। तो ठाकुर जाते नहीं थे। तो अभी क्या है कि अभी फिजिकली नहीं जाते थे। किंतु मानसिक प्रेजेंस तो इस तरह से उनकी होगी ही। तो जो भी है उस समय ठाकुर ने कहा था कि वो जब उसको युवान अवस्था थी जब वह युवान था मथुर बाबू उस समय उसने बहुत सारे वो सब भोग वगैरह किए थे तो फिर नेचुरली ये भोग करेंगे तो शरीर में रोग लगने ही वाला है इसलिए उसको आखिर आखिर में बहुत भुगतना पड़ा था ऐसा ठाकुर ने कहा था तो वो बाद की बात है जबकि वह बीमार हो गए और उसके पहले क्या है कि ठाकुर के परिचय में नहीं आए थे तो जब से ठाकुर के परिचय में आए तब से लेकर के यह जो दुर्गा पूजा का जो समय है वह उनके लिए सर्वोच्च सिद्धि का समय था। फिजिकली भी इतना कोई बुरा नहीं था और फिर यह ठाकुर के आशीर्वाद उनको प्राप्त है। तो सब तरह से वह अपने जीवन के शीर्ष पर वो सवार थे। तो अभी यह दुर्गा पूजा चल रही है। पैसा खर्च हो रहा है। भक्तगण आ रहे हैं। पंडित के वह जो मंत्रो उच्चारण है पूरे घर में फैल रहे हैं। ठाकुर स्वयं नारायण स्वयं घर में उपस्थित है। तो इससे ज्यादा और क्या चाहिए? वह कहता है कि मेरे पास में इतना धन है कि यह दुर्गा में दुर्गा पूजा में प्रतिदिन कर सकता हूं। यह जो आनंद है इस आनंद को अभी मैं तोड़ना नहीं चाहता। अभी तक जीवन में मैंने जो कुछ भी किया सो किया। किंतु यहां से आगे मैं चाहता हूं कि यही आनंद प्रतिदिन वो मेरे घर में मेरे हृदय में बहता रहे। यह नारायण स्वयं मेरे पर खुश होकर के प्रसन्न होकर के मेरे घर में निवास कर रहे हैं। आध्या शक्ति स्वयं दुर्गा के प्रतिमा के रूप में उपस्थित है। और जहां पर नारायण पूजा करेंगे तो आध्या शक्ति तो जीवित हो ही जाएगी। जीवंत हो ही जाएगी। तो उसमें कोई प्रश्न नहीं है कि प्रतिमा के भीतर में प्राण संचार हो गया था और भयानक आध्यात्मिकता से पूरा घर जैसे कि जमझम कर रहा है तो मथुर कहता है कि बस अभी यह प्रवाह जीवन भर चलने दो। यहां पर दशहरा का समय आ गया और जो पंडित जी पूजा कर रहे थे उन्होंने जाकर के मैसेज दिया उनको मथुर बाबू को कि अभी विसर्जन का समय आ गया है तो यजमान उपस्थित होकर के जो विसर्जन की क्रिया है उसको समाप्त करें उसके बाद में फिर मूर्ति को जाकर के ले जाकर के गंगा में उसको डूबा दिया जाएगा। गंगा में उसको विसर्जन दिया जाएगा। अभी जैसे ही यह समाचार मथुर बाबू के पास में आया तो मथुर बाबू तो थोड़े नाराज हो गए। उन्होंने कहा कि देखो विसर्जन विसर्जन करने की कोई जरूरत नहीं है। जैसे ही पूजा चलती है चलने दो। वो ब्राह्मण पंडित को बोल दीजिए। आपको जितना वह चाहिए आपको पुरस्कार जो भी है आपका वह मैं आपको देता रहूंगा। धन की चिंता मत करिए। पूजा के उपकरणों की चिंता मत कीजिए। जो लगता है खरीद लो और यह पूजा चलने दो। यह आध्यात्मिक आनंद अभी हमेशा के लिए उसको एज इट इज बहने दो। मैं इसमें किसी भी तरह का विघ्न नहीं देखना चाहता। तो इस यह मैसेज जब वह पंडित जी के पास में आया पुजारी के पास में तो वह तो बेचारे बड़े ही आश्चर्यचकित हो गए। वह थोड़े से चौकन्ने भी हो गए कि जो शास्त्रीय विधि से जो आप पूजा करते हैं उसमें तो है कि दशहरा को आपको विसर्जन करना है। तो फिर अभी मथुर बाबू ऐसा कहेंगे विसर्जन नहीं करना है तो क्या शास्त्र विधि का भंग नहीं हुआ तो फिर उन्होंने मथुर की जो पत्नी है वगैरह को कहा कि जाइए अपने उनको समझाइए यजमान को कि इस तरह से शास्त्र विधि का उल्लंघन करके पूजा नहीं होती है। तो जो भी गए उनको समझाने के लिए सब लोग विफल हो गए। तो फिर आखिर में ठाकुर पे यह जिम्मा दिया गया कि कोई एक है इस जगत में अभी मथुर तो बड़ा धनी है। जमींदार है। वैसे तो किसी की बात सुनने वाला नहीं है। कोई उसको धमकी भी नहीं दे सकता। किंतु एक व्यक्ति यदि कोई है इस जगत में जिनकी बात मथुर सुनेगा तो वह है बाबा। यह सब लोग ठाकुर को बाबा करके पुकारते थे मथुर के घर में। तो फिर ठाकुर को कहा गया कि आप जाइए जाकर के उसको समझाइए। तो फिर ठाकुर गए देखा कि वह मथुर वहां पे वह बैठा हुआ है अपने कमरे में और चेहरा लाल है गुस्सा है क्योंकि 10 लोग आकर के कहते हैं तो कि प्रतिमा का विसर्जन कर दो विसर्जन कर दो और वो चाहता नहीं है तो वो सोच करके ही बैठा है अभी जो नेक्स्ट जो भी आएगा मुझे यही बात कहेगा तो मैं एकदम डांटूंगा उसको किंतु जब ठाकुर स्वयं आते हैं तो फिर ठाकुर के साथ में तो एकदम सस्मान व्यवहार करना है तो फिर ठाकुर ने इतना सम्मान पूर्वक उनको कहा कि बाबा क्यों आए हैं हालांकि उसको समझ में आ गया होगा कि क्यों आए तो फिर ठाकुर ने कहा कि देखो कि प्रतिमा का विसर्जन कर रहे हैं तो मां तो स्वयं तो तुम्हारे घर से नहीं जा रही है। मां तो जो है तुम्हारे हृदय में ही सदाकाल वो रहेगी। सदाकाल तुम्हारे हृदय में ही विराजित रहेगी। विराज करेगी। तुम उसकी चिंता मत करो। प्रतिमा का जो विधि पूर्वक शास्त्रीय प्रणाली अनुसार विसर्जन करना है तुम कर दो। उसके बाद में तो फिर मैं हूं ना। ठाकुर ने ऐसा नहीं कहा। यह मैं कह रहा हूं कि ठाकुर तो है ना उसके बाद में। भाई चिंता किस बात की है? जहां पर ठाकुर है वहां भी मां है। तो फिर जब ठाकुर ने इस तरह से कहा तो फिर मथुर मान गया और फिर वो पूजा का वो जो मूर्ति का विधिवत विसर्जन हुआ। तो यहां पे भी देखिए

स्वामीजी के स्पर्श ने अभेदानंदजी के आध्यात्मिक मार्ग को द्वैत से अद्वैत में बदल दिया। इसका उनके व्यवहार पर हानिकारक प्रभाव पड़ा। swamiji's touch forcefully changed abhedanandaji's spiritual path, from dvaita to advaita. this had detrimental effect on his behaviour.

कि जो स्वामी जी और मेन हमारा था क्या था कि ठाकुर वहां पर दूरदर्शन से देख पाए थे। तो उसमें से यह सब बात निकली। सो एनीवे अच्छा अभी इसके बाद का जो पूरा सेंटेंस है उसको मैं अभी ट्रांसलेट करता हूं कि यह जो स्वामी जी ने जिस तरह से अभेदानंद जी को स्पर्श किया उसके परिणाम से देखा गया कि अभेदानंद अर्थात काली महाराज जिस भाव की सहाय से अपने पूर्व जीवन में अपने पूर्व धर्म जीवन में आगे बढ़ रहे थे विकसित हो रहे थे उसका तो संपूर्ण रूप से विनाश हो ही गया उच्छे खेद हो गया, हो ही गया। किंतु साथ-साथ में ही ऐसा है कि अद्वैत भाव तो ठीक-ठीक समझने के लिए आपको समय लगेगा। काल सापेक्ष यहां पर महाराज जी लिखते हैं अद्वैत भाव को समझना और उसको अंगीकार करना उसके अनुसार अपने जीवन को ढालना यह तो काल सापेक्ष है। समय सापेक्ष है। इसके लिए समय लगता है। स्वामी जी को ठाकुर किस तरह से स्टेप बाय स्टेप अद्वैत साधना की ओर ले गए थे। वही अष्टावक्र संहिता जब पहली बार पढ़ने को दी थी तब स्वामी जी कह रहे हैं कि अरे इसमें तो सब पाप की बात लिखी है। मैं ईश्वर हूं या मैं ब्राह्मण हूं ऐसा कहना तो पाप है। इस किताब को जला दो। ऐसा करके स्वामी जी का जो स्ट्रांग ओपिनियन था वहां से लेकर के काशीपुर बागान में देखिए कि किस तरह से उनको निर्विकल्प समाधि प्राप्त हुई थी। तो यह तो एक पूरा ट्रेजेक्टरी था। यह ट्रेजजेक्टरी के अनुसार ही चलना है। आप फटाक करके एक को निकाल करके दूसरा बिठा देंगे तो विकृतियां तो आने ही वाली है। तो इसलिए महाराज लिखते हैं कि अद्वैत भाव को ठीक-ठीक समझना समय सापेक्ष है। इसीलिए फिर देखा गया कि वेदांत का वेदांते दोहाई दिया। यानी कि वेदांत का नाम लेकर के काली कभी-कभी सदाचार विरोधी अनुष्ठान शकल करिया फैलीते लागी काली महाराज कभी-कभी सदाचार विरोधी आचरण करने लगे थे ठाकुर ताहा के एक होइते अद्वैत भा उपदेश कोते ओ शने ता ओू कारकलाप भूलते थाकिले ओ अभेद दान ंद ओई भाव प्रणोदित होइया जीवन प्रत्येक कारुने यथाजथ भा अग्रसर होवा ठाकुर शरीर त्यागे बहु काल परे साधित होइया छिलो उस दिन से लेकर के ठाकुर जब भी काली कोई भी सदाचार विरोधी अनुष्ठान करता कार्य कार्य करता तो ठाकुर उसको सस्नेह है उसको उस जो कार्य है उसकी गलती उसकी त्रुटि दिखा देते उसको शांति से अद्वैत भाव का उपदेश देते और यह सब करते किंतु फिर भी अद्वैत भाव से ठीक-ठीक अपने जीवन को प्रेरित करना अद्वैत भाव को अपने जीवन के प्रत्येक कार्य में उसको प्रवेश करवाना अद्वैत भाव से अपने शरीर मन प्राण को भर देना यह बात काली महाराज के जीवन में ठाकुर की महासमाधि के बहुत समय बाद में लंबे समय के बाद में साधित हुई थी। वह उस लंबे समय तक उनके जीवन में यह अद्वैत भाव को लेकर के कुछ ना कुछ गड़मथल कुछ ना कुछ कंफ्यूजन बना रहा था। अभी यहां पर देखिए कि यहां पर तो वैसे शरद महाराज इस तरह का कुछ कहते नहीं है कि सदाचार विरोधी ऐसा तो कौन सा आचरण काली महाराज ने कर दिया था कि जिसकी वजह से ठाकुर थोड़े से परेशान रहते थे। ठाकुर को उनको समझाना पड़ता था। तो यहां पे तो नहीं लिखा किंतु हमको पता है वह फेमस मछली पकड़ने वाली घटना कि काली महाराज बड़े वो जो फिशिंग रोड आता है ना वो मछली पकड़ने वाला वो जो जो एक रोड रहता है यानी कि एक लकड़ी रहता है। लकड़ी के अंत में एक डोरी लगाई होती है। रस्सी होती है। रस्सी के अंत में एक हुक होता है। अभी यह हुक के ऊपर में एक कीड़ा रखा जाता है। कीड़ा ना कि ऐसा कुछ जो कि मछली को खाना अच्छा लगता है। फिर इसको पानी में डाला जाता है। अभी यह कीड़ा खाने के लोभ में मछली उसमें मुंह मुंह में डालेगी तो मुंह में यह हुक भी आ जाएगा। और जैसे ही मछली अपने को अपना मुंह छुड़ाने का प्रयास करेगी यह वो हुक हिलेगा। हुक हिलेगा तो रस्सी हिलेगी। रस्सी हिलेगी तो जो लकड़ी जिनके हाथ में है उसको पता चलेगा कि मछली इसमें पकड़ा गई है तो फिर वह रस्सी को खींच करके लकड़ी के माध्यम से वह मछली को पकड़ लेगा। तो यह मछली पकड़ने का एक तरीका है। फिशिंग रोड के माध्यम से मछली पकड़ना। और जैसे कि जनरली मछुआरे जो होते हैं मछुआरे इस तरह से मछली नहीं पकड़ते। वे लोग जाल फेंकते हैं। जाल बिछाते हैं। जाल फेंकेंगे। फिर वो ठाकुर का जो फेमस उदाहरण है कि जो मछलियां होती है जाल में फंस जाती है उसमें से किस तरह की मछलियां होती है एक तो एक तो है कि नित्य सिद्ध वो कभी भी जाल में फंसती ही नहीं है क्योंकि उनको पता है कि इस एरिया में मछुआरे जाल डालते हैं। कोई है कि मुक्त है यानी कि मेहनत करके जब जाल में फंस गई है तो बड़ी ही मेहनत करके कैसे भी करके वह जाल में से अपने को बचाती है। फिर एक है कि जो कि अपना मुंह जो मिट्टी में डालकर के मुंह छुपा करके रहती है। इस तरह से कि जैसे कि वह सोचती है कि यदि मैं जाल के सामने या मछुआरे के सामने नहीं देखूंगी, तो मैं बच जाऊंगी। किंतु इससे तो बचने वाला है नहीं। जब मछुआरे का समय हो गया जाल खींचने का वो जाल खींचेगा और इस तरह की मछली जाल के साथ में चली जाएगी। वह मर जाएगी। तो यह जनरली मछली पकड़ने का तरीका है क्योंकि यह फिशिंग रोड के माध्यम से आप मछली पकड़ते हैं तो मुश्किल से एकद मछलियां तीन-चार मछलियां पकड़ी जाएगी। आपको वेट करना पड़ेगा जबकि जाल फेंक करके आप बहुत सारी मछलियां पकड़ सकते हैं। यानी कि कमर्शियल आपका उद्देश्य है तो आप जाल फेंक करके मछली पकड़िए और अपने खुद के आनंद के लिए या तो अपने खुद के खाने के लिए मछली पकड़ते हैं तो फिशिंग रोड के माध्यम से पकड़िए। तो अभी यह काली महाराज थे। वह फिशिंग रोड के माध्यम से मछली पकड़ने में बड़े ही माहिर थे। और वहां पर काशीपुर में दो पोंड थे। ये तालाब थे। तो दोनों तालाब में वो इस तरह से वो मछ फिशिंग रोड के माध्यम से मछलियां पकड़ा करते थे। अभी यह बात ठाकुर के पास में गई तो ठाकुर ने काली महाराज को बुलाया। कहा कि देखो तुम जिस तरह से मछली पकड़ रहे हो यह ठीक नहीं है। यह एक तो आनंद के लिए वह सब करने के लिए मछलियों को नहीं पकड़ना चाहिए। यह मछलियों की हत्या करने के बराबर है। तो काली महाराज फिर वो जैसे अद्वैत भाव उन में प्रवेश हुआ था। तो फिर वो जो गीता का जो फेमस श्लोक है य एनम वत्त हंतारम यनम्यते हतम उभत न विजानी तो नायम हती न ह्यते यानी कि जो यह सोचता है कि मैंने किसी की हत्या की है और जो यह सोचता है कि किसी ने मेरी हत्या की है तो यह दोनों लोग नहीं जानते कि आत्मन ना ही हत्या करता है ना ही आत्मन की हत्या होती है। यदि मेरा स्वरूप यह देह नहीं है और देह के जो विकार नहीं है मन के विकार काम क्रोध मद लोभ मोह अष्टपाश यह पंच कक्लेश यह सब यदि मेरे अंग नहीं है मेरा सही स्वरूप नहीं है मैं यदि आत्मन हूं तो ना ही और आत्मन तो एक ही है यह मल्टीप्लीसिटी भी तो नहीं है यह विभिन्न देह है विभिन्न मन विभिन्न जीवात्मा है यह सब तो माया का जो आवरण लगा है बोल के ही तो हमको दिख रहा है वरना तो बस एक ही अजर अमर भी कहना उचित नहीं है। समय और काल के परे एक ही आत्मन है जो कि सबके भीतर में प्रकाशित हो रही है। तो आत्मन कैसे किसी का वध कर सकता है? आत्मन के भीतर में ना ही काम, क्रोध वगैरह कोई विकार है और आत्मन एक ही है। एक ही आत्मन दूसरा किसी का वध करने योग्य सामने कुछ है ही नहीं कि जो कि इसका वध करें। यानी कि जो यह सोचता है कि मैं आत्मन हूं, वह ना ही वध करता है, ना ही उसका वध होता है। तो यह गीता का श्लोक वो काली महाराज ने कह दिया कि ना ही मैं मछली की हत्या करता हूं ना ही मछलियों की हत्या हो रही है। तो फिर ठाकुर को उनको समझाना पड़ा कि देखो यह सब तो तुम कब बोल पाओगे? जब तुमको आत्मन साक्षात्कार हुआ है। जब तक हम माया के राज्य में हैं। जब तक यह काम, कांचन, क्रोध उस सब से हमारा मन भरा हुआ है, तब तक तो हमको यह जगत के नियम है, उसका पालन करना ही होगा। यदि हम काम कांचन से भरे पड़े हैं और फिर कहते हैं कि मैं तो आत्मन हूं और फिर मैं इस तरह से बिहेव करना शुरू कर दूंगा कि आत्मन के भीतर में स्त्री पुरुष कोई भेद ही नहीं है तो स्त्रियों के साथ में पुरुषों के साथ में मैं उसी तरह से वर्तन करूंगा जो कि मेरी इच्छा होगी। मैं स्वेच्छाचार करूंगा। तो पूरा 100% पॉसिबिलिटी है कि हम इस तरह के पाप में पड़ जाए कि फिर वहां से निकलना मुश्किल हो जाए। तो पहले तो आत्म साक्षात्कार करो फिर कहो कि ना ही मैंने किसी की हत्या की है ना ही किसी की हत्या हो रही है वो तुम बाद में कहना पहले तो आत्म साक्षात्कार करना होगा ऐसा कहने के बाद में ठाकुर और भी एक चीज कहते हैं देखिए कि यह जैसे कि एक हुक के भीतर में कुछ अच्छा ये ये जो कीड़ा वगैरह है वो मछली को देना और मछली यह समझ ले कीड़ा खा रही है वो कीड़े की बजाय वह हुक खा लेती है तो पता है यह किस तरह का है यह किस तरह का एक तरह से धोखा है। जैसे कि अपने घर में कोई मेहमान आए हैं। उनको हम खाने में जहर परोसते हैं। तो वह कितना बड़ा वह मतलब जो अपने शास्त्र विधान है कि अतिथि देवो भव इसके सामने कितना बड़ा अपराध होगा। अतिथि तो आता है आपके घर में यह सोच कर के कि हां आप उसकी सेवा करेंगे। आप उसको सम्मान देंगे। उसकी वजह जैसे वो लाक्षा ग्रोह बनाया था ना वो महाभारत में कि पांडवों को बुलाया गया और अभी बहुत अच्छे से बड़ा सुंदर महल है वो बड़ा सुंदर महल बनाया गया किंतु यह जो महल था पूरा इनफ्लेमेबल मटेरियल्स का बना हुआ था और इनके भीतर में कौरवों के भीतर में पाप था कि जब पांडव लोग रात को सो जाएंगे तब पूरे महल को जला देंगे और साथ में पांडवों की भी हत्या कर देंगे तो यह तो उस तरह का पाप हुआ अधर्म हुआ अधर्म नीति हुई तो इस तरह तरह से धोखा करके कभी भी मछलियों को मत पकड़ो। इतना ठाकुर ने काली महाराज को कहा था। और फिर जब ऐसा हुआ कि ठाकुर यह सब बोल रहे थे तो उस समय काली महाराज शुरू-शुर में तो कुछ आर्गुममेंट कर रहे थे। किंतु बोलते बोलते ठाकुर को खांसी हुई और कफ हुआ। कफ में से खून बहने लगा क्योंकि मुंह में से खून निकलने लगा। क्योंकि गले का कैंसर था तो पहले तो काली डर गया। बोला कि महाशय आप इस तरह से बोलिए मत। इतना मैं समझ गया ठीक है कि आप जो कह रहे हैं तो उस समय तो उसने वैसा करके बात घुमा ली किंतु कुछ दिनों के बाद में उस उन काली महाराज को ऐसा लगा कि नहीं ठाकुर जो कह रहे हैं वह ठीक है फिर वह ठाकुर के पास में आकर के स्वीकार करता है कि हां मुझे अभी आपकी बात समझ में आ रही है तो जो भी है यह एक इंसिडेंट हमारे सामने है कि जहां पे अभदा शरद महाराज जो कहते हैं वह ठीक-ठीक हमको लगता है कि सदाचार विरोधी आचरण कर रहे थे और बड़ा लंबा लंबा समय लगा समझने के लिए कि अद्वैत भाव ठीक ठीक किसको कहते हैं? जब शरणागति जो होती है, शरणागति का जो भाव है, वह ऐसे समझना आसान है कि हां अपना जो घमंड है, अपना ईगो है, उसको संपूर्ण रूप से ईश्वर के सामने बलि प्रदत्त कर दो। जैसे कि यह गिरीश घोष है। ऐसा नहीं है कि शास्त्र वगैरह का बहुत गहरा ज्ञान था। हालांकि गिरीश का ज्ञान बड़ा गहरा था। ऐसा नहीं है। बुद्ध चरित वगैरह जो लिखा था चैतन्य चरित नाटक वगैरह वो तो उसने बड़े सुंदर ही लिखे थे और बड़े सुंदर गीत भी वो बना देता था। तो ऐसा नहीं है कि धर्मशास्त्र क्या है गिरीश को पता नहीं था। किंतु क्या है कि वो इस तरह से वो साधना करने के लिए तो यह सब नहीं करता था ना। इनिशियल उद्देश्य था कि लोगों का एंटरटेनमेंट करना है। तो जो भी है वह गिरीश घोष जब ठाकुर को पावर ऑफ एटर्नी देता है तब कुछ भी होता है उसके जीवन में उसके घर में मृत्यु भी हो जाती है तो उसका भी शोक वो नहीं कर सकता। क्यों? क्योंकि सब समय भीतर में से यह अवेयरनेस, अलर्टनेस जागृत है कि हां जो कुछ भी करना है ठाकुर को निवेदित करके निवेदन करके ठाकुर की आज्ञा के अनुसार करना है। शोक भी यदि करना है तो ठाकुर की परमिशन लेनी है। उसके पहले मैं शोक भी नहीं कर पाऊंगा। अपने घर में परिवार जनों की प्रियजनों की मृत्यु है। मृत्यु हुई है। उसके अगेंस्ट में मैं शोक भी नहीं कर सकता हूं। तो यह जो है कि शरणागति वैसे समझना आसान है। भले ही चाहे उसका पालन करना बड़ा कठिन हो इंटेलेक्चुअली आप समझ सकते हैं। किंतु जो अद्वैत भाव है जैसे कि यह गीता में कहा कि हम यदि किसी की हत्या करते हैं तो हम यदि यह समझेंगे कि मैंने हत्या की है वह भी गलत है। जिसने यह समझा कि मेरी हत्या हुई है। यह भी गलत है। यह आत्मन कि जिसको कि ना ही तलवार काट सकती है, ना ही अग्नि जला सकता है, ना ही पानी भीगा सकता है। वही आत्मन ही मैं हूं। तब यह समझना कि मैं यह देह या तो फिर यह पंचमहाभूत पंच ज्ञानेंद्रिय पंचकर्मेंद्रिय का जो बना देह है पंचप्राण का पंच तन मात्रा का वो देह मैं नहीं हूं। इसके परे जो आत्मन है वो मैं हूं। वो जो देवता और यह असुर यह जो कहानी है कि शुक्राचार्य के पास दोनों गए। एक बार कहा गया कि तुम ही हो ब्रह्मण अहम ब्रह्मास्मि तत्वम मसी तो यह असुर लोग है राक्षस लोग दानव लोग बड़े खुश हो गए कि यह देह ही ब्रह्मन है देह ही आत्मन है और इसी की परिपुष्टि करनी है इसी के भोग राग करने हैं और उसमें वह पूरे भोग राग में डूब गए जबकि यह इंद्र है इंद्र ईशा है वो जो उन्होंने जाकर के तपस्या की पता चला कि लगता नहीं है कि यह पंचमहाभूत का बना हुआ देह ईश्वर हो सकता है आत्मन हो सकता है वो इतने हजार साल तक तपस्या लगी पता चला कि यह नहीं है। ठीक कि देह आत्मन है। फिर वह अपने गुरु के पास में आया। गुरु ने कहा कि फिर से वही बात तत्वमसी तो फिर से वह तपस्या की। फिर देखा कि नहीं यह देह नहीं देह के परे कुछ है जो कि जिसको कि हम मन बुद्धि चित्त अहंकार अंतःकरण कहते हैं। तो पूछा फिर से गुरु के पास में आकर क्या अंतःकरण आत्मन है? तो फिर से वही उत्तर कि तत्वमसी तो फिर से तपस्या की आखिर में इतने हजार साल तपस्या करके अपना जो अस्तित्व है मेरा जो अवेयरनेस है उस उसको मैं अपने देह अपने अहंकार से सेपरेट कर सकता हूं। यह अपना जो रियल नेचर है उसको यह जो अनरियल नेचर है अवास्तविक अपना स्वभाव है उससे सेपरेट करना वो लंबी साधना मांग लेता है। उसके लिए संपूर्ण रूप से ब्रह्मचर्य का पालन करना होगा। तीव्र मेधा शक्ति चाहिए और एक इंसिसिव एक सेल्फ क्रिटिसिज्म, सेल्फ डायग्नोसिस, सेल्फ एग्जामिनेशन की फैकल्टी चाहिए। सतत मुझे अपने आप को एग्जामिन करते रहना होगा। सतत मुझे अपनी इंद्रियों पर संपूर्ण रूप से संयम रखना होगा। तब कहीं जाकर के धीरे से मैं यह जो मेरा रियल नेचर और अनरियल नेचर जो है उसको मैं सेपरेट कर पाऊंगा। तो वो मेधा शक्ति वो इंद्रिय संयम यह सब स्वामी जी में था। तो बोल करके उनको स्टेप बाय स्टेप ठाकुर ने यह अद्वेद भाव का उपदेश दिया था। जबकि यह अभेदानंद जी में इतना स्ट्रांग इंद्रिय संयम तो होगा किंतु मेधा शक्ति इतनी स्ट्रांग नहीं थी। बोलकर के ठाकुर को उनको समझाना पड़ता था कि तुम यह तरीके से जो सोच रहे हो वह तुम्हारा देह भाव ही बोल रहा है। नहीं कि तुम्हारा आत्मभाव। तो इस तरह से यह पूरा प्रसंग यहां पर समाप्त होता है और फिर इसके बारे में और भी बहुत सारा डिस्कशन हमने अभेदानंद जी के बारे में पहले वाले लेक्चरों में कर ही दिया है कि किस तरह से बाद में उन्होंने संघ छोड़ा और वह सब किंतु खैर वो सबको अभी रिपीट करने की जरूरत नहीं है। अभी इसके बाद का जो पॉइंट है नर लीलाएं समस्त कारजो साधारण नरे न्याय होए। नर लीला में पूर्व सभी तरह का कार्य एक सामान्य नर की तरह ही होता है। एक सामान्य व्यक्ति की तरह ही होता है। अच्छा तो इसको अभी हम कल से प्रारंभ करेंगे। आज हम यहीं तक रोकते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु