prayer
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्वधर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णायते नमः श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा रचित भाग दो उस साधक भाव इसका प्रथम अध्याय फर्स्ट चैप्टर इसका हम पाठ कर रहे हैं साधक और साधना इसमें शरद महाराज स्वामी शारदानंद जी महाराज हम हमारे सामने भारतीय आध्यात्मिक धारा का एक आउटलाइन हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। उसमें से हमने कुछ-कुछ पढ़ लिया है। जहां तक हम कल पहुंचे थे कि सर्वभूत में सभी व्यक्तियों
हमें ब्रह्मज्ञान क्यों नहीं हो रहा? उत्तर है हम भ्रम में पड़े है.
में सभी पदार्थों में पूरे विश्व में ब्रह्म दर्शन करना या तो फिर ब्रह्मानुभूति करना यही आध्यात्मिक सिद्धि का आध्यात्मिक साधना का चरम लक्ष्य है। तो फिर प्रश्न होगा कि यह अनुभूति या अनुभव क्यों नहीं हो रहा है? तो उत्तर है कि हम भ्रम में पड़े हैं। तो कल क्या कह रहे थे शरद महाराज? भ्रम के बारे में प्रश्न हुआ कि यह सर्वभूत में ईश्वर दर्शन क्यों नहीं हो रहा? उत्तर में क्या कहते हैं? तोरा भ्रम में पिया छो। तुम लोग भ्रम में पड़े हो। जतो ना ओ भ्रम दूरीभतो हो ततोण केमन कोिया ओ भ्रम धरते प जब तक यह भ्रम दूर नहीं होता है तब तक कैसे समझ पाओगे कि हम भ्रम में पड़े हैं यथार्थ वस्तु और अवस्थार सहित तुलना कोियाई आमरा बाहरे और भीतरे भ्रम धरिया था की जो सही सही वस्तु है या अवस्था है उसके साथ में तुलना करने से ही हम अपना भ्रम बाहर का और भीतर का समझ पाएंगे पूर्वोक्त भ्रम धरते होले तोमा देर ओ रूप ज्ञानेर प्रयोजन यह ऊपर में बताया हुआ भ्रम कि हमको सभी चीजें अलग-अलग दिखती है। मेरा जो मैं है मेरा जो स्वभाव है या माय ट्रू नेचर जो है मुझे ऐसा लगता है कि यही देह तक ही सिकुड़ा हुआ है। सीमित है। और बाकी के जितने भी लोग हैं सब मेरे से भिन्न-भिन्न है। सूरज, चांद यह प्रकृति, नदी, पहाड़, जंगल, वन, वृक्ष, पेड़, पौधे, यह फूल, फल, वेजिटेबल्स सब कुछ अलग-अलग मुझे दिखाई देता है। क्योंकि मैं भ्रम में पड़ा हूं। और जब तक मैं इस तरह के किसी व्यक्ति के सत्संग ना करूं जो कि भ्रम से बाहर आ गया है तब तक मैं यह समझ नहीं पाऊंगा कि मैं भ्रम में पड़ा हूं। ठाकुर की वह जो उपमा है ठाकुर कहते हैं कि यदि आपको वैद्य बनना है तो आपको वैद्य का संग करना होगा। अप्रेंटाइज शिप करनी होगी। तभी तो पता चलेगा कि यह कफ की नाड़ी है, पित्त की नाड़ी है। यदि वह सिलाई का काम ना कि वह विविंग का काम सीखना है तो आपको जो व्यूअर है उसका संग करना पड़ेगा। उसकी अप्रेंटाइजशिप करनी पड़ेगी। तब तो पता चलेगा यह कौन से नंबर का धागा है। उसका जो स्ट्रेंथ है उसके भीतर में कितने थ्रीड है वो कैसे पता चलेगा। जब आप एक व्यूअर का संग करेंगे जो कि धागा बुनता है तभी तो हमको पता चलेगा। तो जब तक हम ऐसे किसी महापुरुष का सत्संग ना कर ले जो कि इस भ्रम से मुक्त हुआ है तब तक हमको ऐसा ही लगेगा कि यह वेजिटेबल अलग है और मैं अलग हूं। वह स्वामी जी की वह जो कहानी है कि एक बार और और देखिए कि सिर्फ मुंह से बोलने से नहीं होगा कि हां अभी मैं ये पेड़ पौधे पशु पक्षी मनुष्य चांद सितारे सबके साथ में मैं एक हो गया हूं। ऐसा बोलने से तो होगा नहीं। सही-सही में अनुभूति होनी चाहिए। स्वामी जी की कहानी अमेरिका में वेदांत के ऊपर में लेक्चर दे रहे हैं। कहते हैं कि यह जो समस्त जगत है इट इज मायसेल्फ ओनली। बस मुझे पता नहीं है कि यह मेरा सही स्वरूप है। यह मेरा आत्मन है। तो फिर एक वो एक एक आदमी उसने प्रश्न किया कि अच्छा स्वामी जी आप यह कहते हैं कि सब कुछ ब्राह्मण है। तो यह जो वेजिटेबल है वो वो भी क्या ब्राह्मण है और मैं भी ब्राह्मण हूं। यानी कि हम दोनों क्या एक ही है? यह क्या मेरा ही स्वरूप है क्या? ऐसा आप कैसे कह सकते हैं? मुझे तो ऐसा लग रहा है आपके कहने से कि यह वेजिटेबल भी मैं ही हूं। व्हिच इज रियली फनी। तो स्वामी जी कहते हैं कि वो स्टिक अ नाइ स्टिक अ नाइफ इन योर लेग एंड देन यू विल फाइंड द डिफरेंस। यानी कि चाकू जो है उस वेजिटेबल में मारो और चाकू अपने पैर में मारो। अभी पता चल जाएगा कि वो वेजिटेबल और अपने में क्या डिफरेंस है। यानी कि सिर्फ बोलने से तो होगा नहीं कि वह वेजिटेबल मैं ही हूं। सही-सही में अनुभूति होनी चाहिए कि अपने पैर में जब मैं चाकू मारता हूं तो वह जो दर्द होता है वही दर्द यदि मैं उस वेजिटेबल के ऊपर में यह आलू के ऊपर में मारूंगा तो उतना ही दर्द होगा और यह सब थ्यरी नहीं है ठाकुर की सही-सही कहानियां है कि एक बार ठाकुर एक फ्रेशली मूव्ड लोन म एक लोन यानी कि यह जो ग्रास होता है ना वो उसका उसके निरीक्षण कर रहे थे। अभी ठाकुर का मन तो पता है दक्षिणेश्वर की यह घटना है कि कहां उनका मन किस ऊंचाई में उठ जाता है। तो इस लोन के साथ में यह ग्रास के साथ में उनका ऐसा तादात्म हो गया कि जब कोई एक लोन के ऊपर में चल रहा है। एकाएक ठाकुर चिल्ला उठे। लोगों ने दौड़ के आकर देखा तो उनकी पीठ के ऊपर में इस तरह से घाव हो गए हैं। इस तरह से यह जख्म हो गए हैं जैसे कि कोई सही-सही में उनकी पीठ पर पैर रख के चला हो। तो क्या है कि उसका निरीक्षण करते-करते ही उसके साथ में तादात्म हो गया। उसके साथ में एक रूप हो गए। तो यह अनुभूति जब तक नहीं होगी तब तक सिर्फ बोलने से तो होगा नहीं। किंतु एटलीस्ट हमारी थरी जो है वह क्लियर होनी चाहिए कि जो जगत आप देखते हैं यह ग्रास है ना कि वह आलू है। यह दोनों उदाहरण एक हम लोग सही-सही में उसी के साथ में एक रूप है। मेरे भीतर में जो आत्मन है या ब्राह्मण है वही आलू या तो फिर वही ग्रास के साथ में वह उस ग्रास के भीतर में वही आत्मन है। तो यह अनुभूति जब होगी तब यह जो सर्वभूत में ईश्वर दर्शन या तो सर्वभूत में ब्रह्म दर्शन या तो फिर सर्वभूत में ब्रह्मानुभूति यह जो थरी जो है वह सही सही में प्रैक्टिकल होगी। इसके बाद में महाराज जी
practical vedanta: "सर्व भूत में ईश्वर दर्शन" को व्यवहार में कैसे लाया जाए
आगे क्या कहते हैं? प्रश्न है अच्छा ओ ओ ओ रूप भ्रम हो बार कारण की एवं कोबे होत बा आमादे ए भ्रम आशिया उपस्थितो होलो अच्छा इस तरह का भ्रम होने का कारण क्या है और कब से यह भ्रम हमारे मन में आकर के उपस्थित हुआ नेचुरली इस तरह का प्रश्न तो होगा ही होगा कि इतना इंपॉर्टेंट फैक्टर जो है ह्यूमन लाइफ में ह्यूमन सिविलाइजेशन में इवोल्यूशन ऑफ स्पीशीज में तो हमको समझ में क्यों नहीं आ रहा है? यह करोड़ोंकरोड़ों साल की हमारी यात्रा है। हमने इस यात्रा में तो यही देखा कि यह ट्राइब है उस ट्राइब के साथ में लड़ती है। इस देश का उस देश के साथ में युद्ध होता है। हां, प्रेम है, करुणा है, सहानुभूति है। यह जो लार्ज हार्टेडनेस है, यह उदार हृदयता है। इस तरह की कहानियां भी है हमारे ह्यूमन सिविलाइजेशन में। इतिहास के पन्ने खोल के देख लेंगे तो महापुरुषों की कोई कमी नहीं है। किंतु यह जब गुड एंड इविल यह अच्छा और बुरा यह दोनों हमको साथ-साथ में देखने को मिलते हैं। जब भगवान राम थे तो यह रावण भी था। जब यह भगवान कृष्ण थे तो यह कंस भी था। जब यह भगवान रामकृष्ण थे तो यह ब्रिटिश एंपायर भी था। ब्रिटिश राज भी था। यानी कि एक महाशक्ति जबकि यह अच्छाई की ईश्वरीय शक्ति की यह प्रेम की महाशक्ति जबजब जन्म लेती है साथ-साथ में ही यह प्रचंड शैतानी शक्ति भी जन्म लेती है। तो हम तो यह दोनों को साथ-साथ में देख रहे हैं। तो हम ऐसा कैसे कह दें कि यह जो अच्छाई की जो शक्ति है वही सही है और यह जो बुराई की जो शक्ति है वह गलत है। वह सिर्फ भ्रम ही है। अच्छा यदि यह ब्रिटिश एंपायर जो था उसने जो अत्याचार भारत पे किया उसकी वजह से करोड़ों-करोड़ों लोगों को भुखमरी का अनाहार का दुष्काल का फेमिन का सामना करना पड़ा। तो इसका उत्तर भगवान रामकृष्ण ने या स्वामी विवेकानंद ने क्या दिया है? यह तो कहते हैं कि प्रेम की शक्ति से जगत जय करने को। स्वामी जी कहते हैं कि इंडिया मस्ट ककर द वर्ल्ड वि आवर स्पिरिचुअलिटी। आध्यात्मिकता की शक्ति से जगत पर विजय प्राप्त करनी है। नहीं कि गन बोट से नहीं कि कैनन से नहीं AK-47 से ना ही यह इंटरकॉन्टिनेंटल बैलस्टिक मिसाइल से नहीं यह एयरक्राफ्ट कैरियर से। तो नेचुरली है कि एक और हम यह सब देखते हैं। एटम बम भी देखते हैं। हाइड्रोजन बम भी देखते हैं और यह केमिकल बायोलॉजिकल यह वेपंस भी देखते हैं। उसके सामने जब हम यह कहें कि यह पूरा जगत मेरा ही एक स्वरूप है जिसको कि अभी मैं पहचान नहीं पाया तो भीतर में से तो प्रश्न होगा ही होगा। क्या यह जो उपदेश या तो यह जो संदेश है क्या कुछ ही लोगों तक सीमित है क्या आज मैं श्री रामकृष्ण देव के उपदेशों का पालन करने की चेष्टा कर रहा हूं आप लोग भी शायद कर रहे हैं थोड़ी बहुत जित जिसमें जितनी कैपेसिटी है तो हम लोग यदि यह कहे कि जो मेरा इस देह के भीतर में जो आत्मन है वह श्री रामकृष्ण देव के दूसरे जो भक्त है। उनके भीतर में भी वही आत्मन है। तो ठीक है। यह कहना कोई मुश्किल बात नहीं है। किंतु क्या मैं ऐसा कह सकता हूं कि हिटलर के भीतर में भी वही आत्मन है जो कि मेरे भीतर में है। यह जितने भी राक्षस ये जितने भी सुसाइड बमबर, टेररिस्ट यह जो आते हैं अपने पड़ोसी देशों से तो क्या वे लोगों के भीतर में भी वही आत्मन है जो कि मेरे भीतर में है। यह अपने दुश्मन देश के यह जो सब सेनापति वगैरह है उनके भीतर में भारत का अहित चाहने वाले लोगों के भीतर में भी क्या वही आत्मन है? यह जब इस लेवल का जब चैलेंज हम फेस करते हैं, तब हमको इस तरह के उपदेशों के ऊपर में संदेह हो इस बात में कोई आश्चर्य की बात नहीं है। मां कहेगी शायद कि मेरे बेटे के भीतर में वही आत्मन है जो कि मेरे भीतर में है। तो उसके लिए यह कहना बहुत मुश्किल नहीं होगा। किंतु मां क्या यह कह पाएगी कि मेरा बेटा जो सैनिक होकर के सरहद पर युद्ध करने के लिए गया है, वह जिस दुश्मन के साथ में युद्ध कर रहा है, उसके भीतर में भी वही आत्मन है जो कि मेरे भीतर में है। तो यह कहना कि मेरे दुश्मन के भीतर में भी वही आत्मन है जो कि मेरे भीतर में है। मेरा दुश्मन और मैं जो भिन्न-भिन्न दिख रहे हैं। वास्तविकता में एक ही है। यह हम कैसे कह सकते हैं? तो देखिए कि यह जो एकिस्टेंशियल चैलेंज है उसका उत्तर देने के लिए ही तो हिंदू लोगों का मुख्य धर्म ग्रंथ है। प्रस्थान त्रय में जो एक प्रस्थान है श्रीमद्भगवत गीता इसी के लिए लिखा गया है। जब अर्जुन ने यह सोचना शुरू किया कि हिंदू धर्म शास्त्र तो यह कहता है कि यह जो कौरव है यह जो मेरे दुश्मन है जिनके साथ में मैं युद्ध करने के लिए कुरुक्षेत्र में मैंने प्रवेश किया है वे लोगों के भीतर में तो वही आत्मन है तो मैं एक काम करता हूं। मैं युद्ध क्षेत्र छोड़कर के सन्यास ले लेता हूं। भले ही चाहे उन्होंने मेरा राज्य हड़प लिया हो। भले ही चाहे उन्होंने मेरी पत्नी का अपमान किया हो। भले ही चाहे उन्होंने मेरा भविष्य बर्बाद कर दिया हो, भले ही चाहे उन्होंने मैं राजकुमार था तो सड़क पर एक भिखारी की तरह मुझे लाकर रख दिया हो। डज नॉट मैटर। मैं उनको क्षमा करता हूं और क्षमा करके युद्ध के मैदान में से चला जाता हूं। तब भगवान श्री रामकृष्ण कहते हैं कि यह जो सर्वभूत में ईश्वर दर्शन का जो तुम्हारा कांसेप्ट जो है उसकी तुम गलत एप्लीकेशन यहां पर कर रहे हो। यदि दुश्मन है तो उसका तो वध करना ही है। किंतु तुम यह कैसे कर पाओगे? यदि तुम उनके भीतर में भी ब्राह्मण दर्शन करोगे और साथ-साथ में तुम इसका वध भी कर पाओगे तो यह कैसे चलेगा? माने यह एकदम कंट्राडिक्टरी नहीं दिखते हैं क्या? यह बिल्कुल अपेरेंटली ऑोजिट नहीं दिखते हैं क्या? किंतु नहीं है। देखिए कि भगवान रामकृष्ण ने श्री रामकृष्ण ने जब एक घास के साथ में ग्रास के साथ में अपना तादात्मय अनुभव किया तो उन्होंने ऐसा नहीं कहा। ठाकुर ने ऐसा नहीं कहा कि इस घास को कभी काटना मत। यह इसके भीतर में मेरी वही आत्मन है जो कि इसके भीतर में है। ऐसा तो उन्होंने कभी नहीं कहा। जो घास को रेगुलरली काटा जाता है वैसे ही काटा जाता है। यह ठाकुर तो मछली भी खाते थे। वह जो फेमस कहानी है कि जब कैंसर हो गया था तो डॉक्टर ने कहा कि वह गुगली ना कि ऐसा कोई जानवर होता है उसका सूप बना करके उसका जो जूस बना करके ठाकुर को खिलाना है। तो अभी वह पानी में रहता है। उसके ऊपर में एक शेल जैसा होता है। हार्ड शेल तो पत्थर से उस शेल को पहले तोड़ना होता है। फिर उसके भीतर का यह जो जानवर है उसको उठाकर के गर्म पानी में डाल के उबालना होता है। फिर उसका जो जूस बनेगा सूप बनेगा वो ठाकुर को पिलाना है। तो मां ने पहले जाकर के तो ठाकुर को कहा कि इस तरह से पत्थर से मार के उसकी हत्या में नहीं कर पाऊंगी। वह तो जीवंत प्राणी है। वह घाट के ऊपर में चलता चलता मैंने देखा है। तो साथ-साथ में ही ठाकुर ने कहा शेकी आमी खाबो अमरजन बनावे। यह तुम क्या कह रही हो? मैं खाऊंगा मेरे लिए बनाना। तो यह जीव हत्या ना करना क्योंकि उस जीव के भीतर में मेरा ही आत्मन है। दैट इज अ रॉन्ग एप्लीकेशन ऑफ सर्वभूते ईश्वर दर्शन। हे मां जय राम भाटी जब भक्त लोग जाते थे तो सिंह वाहिनी में वहां जो बकरा का बलिदान दिया है उसका मांस बना के मां अपने लड़कों को खिलाती थी। यदि कोई कहेगा कि मां मैं मांस या मछली नहीं खाता तब मां कहेगी उनके एक शिष्य की कहानी है ग्वालपाड़े के ही मोस्ट प्रोबेबबली वर्दा महाराज तो वो उनको कहते हैं कि मां मैंने मछली खाना बंद कर दिया है अभी उनको कुछ उस समय मलेरिया ना कि ऐसा कुछ बीमारी हुई थी काफी वीक हो गए थे तो मां ने कहा बेटा तुम मछली क्यों नहीं खाओगे मैं बनाऊंगी तुम खाना पहले तो वह कहते हैं कि मैंने बहुत दिनों से बंद कर दिया है मछली खाना ना अभी मैं फिर से मछली खाना शुरू करूंगा तो मुझे वोमिट जैसा होता है क्योंकि उसकी गंध या उसका टेस्ट मैं बहुत दिनों से मैंने नहीं किया तो मां कहती है तुम चिंता मत करो मैं बनाऊंगी तुम खाना ऐसा करके मां फिर प्रतिदिन एक मछली रंध करके उनके थाले में देती थी और वह खाते थे तो उनको फिर मां जिस तरह से बनाती थी तो फिर खाने में फिर वोमिट जैसा उनको नहीं हुआ था तो देखिए कि यह जो सर्वभूते ईश्वर दर्शन है कौन कांसेप्ट क्या है उसको समझना है और फिर इसका मिस एप्लीकेशन ना हो। इसका गलतफहमी से हम कोई एक मिसकसेप्शन अपने माइंड में ना खड़ा कर दें। वह भी देखना है। देखिए कि अपने हिंदू धर्म शास्त्र है। पहले तो आए उपनिषद बाद में आया गीता। यह दोनों जैसे कि ये जो सर्वभूत में ईश्वर दर्शन वाले कांसेप्ट को दो पहलुओं से देखते हैं। एक तो है कि थ्योरिटिकल पहलू है या तो फिर कहेंगे कि स्पिरिचुअल एस्पेक्ट है कि मुझे साधन भजन करके त्याग तपस्या करके सबके मेरे भीतर में मेरा सही नेचर जो है यह इंद्रियों के जो सेंसरी इनपुट है वो नहीं है। यह मन बुद्धि चित्त अहंकार यह नहीं है। मेरी यह कामना वासनाएं हैं। यह नहीं है। ये ब्रह्मचर्य ही ईश्वर प्राप्ति का या तो ब्रह्म साक्षात्कार का सही रास्ता है। यह यह प्रैक्टिस करके समझ करके उन्होंने पहले तो ब्रह्म साक्षात्कार प्राप्त किया और जैसे ही ब्रह्म साक्षात्कार करने के बाद में निर्विकल्प समाधि से जैसे ही नीचे आए वैसे ही उन्होंने साथ-साथ में यह भी अनुभव किया कि जो ब्राह्मण जिसका दर्शन उन्होंने अपने भीतर में किया था जो उनका सही स्वरूप है वह उनको समझ में आया था वही ब्राह्मण पूरे विश्व में सचराचर सभी के भीतर में फैला हुआ है। तो वह था उपनिषदों का संदेश या तो फिर उपनिषदों का उपलब्धि। किंतु उसका प्रैक्टिकल एप्लीकेशन हमको गीता में देखने को मिलता है। एक और भगवान कृष्ण कहते हैं कि मैंने ही मैं ही इस जगत का सृष्टि करता हूं। जगत का संहार करता हूं। तुम जो कुछ भी करते हो सब मुझे अर्पण करके करो। निमित्त मात्रम भवस्य साचिन तुमको तो सिर्फ निमित्त होना है इस जगत में जो कुछ भी करने वाला है करता है वह मैं हूं यानी कि देखिए कि एक हायर आई और लोअर आई जब हम जगत के साथ में कोई भी कार्य करते हैं मैं ब्राह्मण हूं यह अनुभूति मुझे कब होगा हायर स्टेजेस ऑफ कॉन्शियसनेस में होगा किंतु जब मैं वो हायर स्टेजेस ऑफ कॉन्शियसनेस में हूं उस समय जगत के साथ में व्यवहार करना मुश्किल हो जाता है क्योंकि उस समय या तो मैं भाव में पड़ा रहूंगा या तो समाधि में मग्न होऊंगा। जैसे कि मास्टर महाशय ठाकुर हमको कथामृत में कहते हैं कि चैतन्य देव की तीन अवस्थाएं होती थी। अंतर्दशा अर्धबाह्य दशा और बाह्य दशा। अंतर्दशा में वह भगवान प्राप्त भगवान के प्रेम में या तो भाव में आकर के मग्न हो जाते थे। समाधस्थ रहते थे। अर्धबाह्य दशा में वह ईश्वर के गुणगान कीर्तन करते थे। उद्दाम नृत्य करते थे और बाह्य दशा में भक्तों के साथ में वार्तालाप करते थे। तो यह बाह्य दशा में जब तक हम नहीं आएंगे तब तक जगत के साथ में किसी भी तरह का संपर्क ही हम नहीं रख पाएंगे। अर्धबाह्य दशा या तो अंतर्दशा में ईश्वर प्रेम से ईश्वर के ज्ञान से या तो ब्रह्म साक्षात्कार से या तो निर्वाण में हम इतने गहराई में डूबे होंगे कि जगत हमारे सामने शून्य सा प्रतीत होगा। किंतु जब हम बाह्य दशा में आते हैं, लोअर स्टेजेस ऑफ कॉन्शियसनेस में आते हैं, तब हम जगत के साथ में इंटरेक्शन कर सकते हैं। जब किंतु हम लोअर कॉन्शियस लेवल पर आते हैं। उस समय यदि मैं कहूं कि समग्र विश्व मेरा ही एक-एक स्वरूप है। तो वह क्या है? ठीक नहीं होगा, सही नहीं होगा। वह कॉन्शियसनेस के हायर लेवल पर वह बात सही है। अर्धबाह्य दशा या तो अंतरर्दशा में यह बात सही है। जबकि मैं ब्रह्मन के भीतर में या तो ब्रह्म ज्ञान में इस तरह से स्थित हो गया हूं कि एस सच बाहर का जगत मेरी दृष्टि से ओझल हो गया है या तो अदृश्य हो गया है। बाहर का जो जगत है मुझे कांसेप्ट्स के रूप में समझ में आता है। या तो फिर ब्रह्मन ही है सब कुछ। ऐसा स्पष्ट प्रतियमान होता है। उसके बाद में मुझे पेड़पधे यह आलू सब्जी आलू टमाटर या तो फिर यह आम या कि एप्पल ये सूर्य चंद्र नक्षत्र पृथ्वी पेड़ पौधे यह नहीं दिखेगा। मुझे फिर ब्रह्मन ही दिखेगा। जैसे कि मैं समुंदर के समुंदर का निरीक्षण करता हूं। समुंदर में मुझे क्या दिखता है? वैसे तो सिंपल जलाशय पानी है, जल है और उसकी तरंगे भी है। दोनों वैसे मुझे दिखती है। किंतु छोटा बच्चा शायद ऐसा समझेगा कि यह जल है वह अलग है समुंदर का और उसके ऊपर की लहरें अलग है। किंतु हम लोगों को पता है कि जो जल जो कि समुंदर बनाता है उसी जल की ही यह लहरें हैं। भले ही चाहे शेप डिफरेंट हो। तो वैसे ही अब जैसे कि छोटा बच्चा उसको आप खिलौने की दुकान में ले जाइए तो प्लास्टिक के खिलौने हैं तो वह देखेगा यह कार है यह गुड़िया है या कि यह गेम है ना कि यह और कुछ है। हजार तरह के खिलौने उसको दिखेंगे। किंतु हमको तो क्या दिखता है? वही एक प्लास्टिक है जिसको कि डिफरेंट-डिफरेंट शेप दिए हुए हैं। वही प्लास्टिक को शेप देकर के यह प्लास्टिक की कार बनाई है। वही प्लास्टिक को रिशेप करके यह और कुछ बंदूक बनाई है। वही प्लास्टिक को रिशेप करके यह गुड़िया बनाई है। वही प्लास्टिक को रिशेप करके यह एरोप्लेन बनाया है। तो हमको प्लास्टिक ही दिखेगा। बच्चे को सब कुछ अलग-अलग दिखेगा। किंतु प्लास्टिक देखने के लिए बच्चे में से हमको बड़ा होना होगा। वैसे ही कि बाह्य दशा में जब हम होते हैं तब हमको सब कुछ अलग-अलग ही दिखेगा। जब हम अर्ध बाह्य दशा या अंतर्दशा में होते हैं तभी हमको सब कुछ ब्रह्मन दिखेगा। किंतु इसीलिए गीता क्या कहती है कि जब हम बाह्य दशा में होते हैं तब हमको इस तरह से यह स्वीकार करना है। इस तरह से समझना है कि ईश्वर ने ही यह समग्र जगत की रचना की है। ईश्वर ही समस्त जगत चला रहे हैं। हमको सिर्फ निमित्त मात्र होना है। यदि दूसरों का संहार करने की भी आवश्यकता आन पड़े तो पहले तो आवश्यकता क्यों है? भगवान कृष्ण अर्जुन को ऐसे किसी का संहार करने को नहीं कहते जो कि धर्म के पथ पर चल रहा हो। जो अधर्म के पथ पर चल रहा है उसी का संहार करने के लिए भगवान कृष्ण कहते हैं। तो अधर्म के पथ पर जो चल रहे हैं उनका यदि संहार करना होगा तो वह इस तरह से हमको समझना है कि हम निमित्त मात्र हैं। ईश्वर ने ही यह सब कराल वदन वो भगवान कृष्ण का विश्वूप दर्शन जो था उसमें हमने देखा कि उनके कराल वदन के भीतर में यह दुश्मन की पूरी सेना जो है कौरवों की पूरी सेना उनके मुंह के भीतर में प्रवेश कर रही है। यानी कि काल के मुख में प्रवेश कर रही है। तो वह तो पहले से ही भगवान ने उनकी हत्या कर ही दी है। इनको तो अर्जुन को तो सिर्फ निमित्त होना है। यानी कि लोअर लेवल कॉन्शियसनेस पे जब हम होते हैं तब हम गीता का श्रीमद्भगवत गीता का यह जो मैसेज है उसका अनुसरण करना है और अर्धबाह्य दशा या तो अंदर अंतर्दशा यानी कि हायर लेवल ऑफ कॉन्शियसनेस पे होते हैं। तो यह जो उपदेश है उपनिषदों का वह हमारे लिए 100% सही महसूस होता है। तो क्या है कि यह सब भ्रम
भ्रम होने का कारण क्या है? उत्तर है अज्ञान
हमारे मन में बहुत सारे आ जाते हैं इस तरह के उपदेश सुनने से क्योंकि क्या है हमारे पास में वह फ्रेमवर्क नहीं है कि विदिन दैट फ्रेमवर्क हम सभी प्रश्नों का उत्तर दे पाए। इसलिए जब यह मुख्य उपदेश कि सर्वभूत में ब्रह्म दर्शन ही है आध्यात्मिक जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि तो इसके बारे में जो प्रश्न होगा वो यहां पे एक के बाद एक शरद महाराज समाधान कर रहा है। क्या हुआ पहला प्रश्न? इस तरह का भ्रम होने का कारण क्या है? और कब से यह भ्रम हमारे मन में उपस्थित हुआ? उत्तर क्या है? भ्रमर कारण सर्वदा ता जहां देखी ते पावा जाए एकने ओ ताहााई अज्ञान जहांजहां पर भी भ्रम होगा सब जगह पे भ्रम का जो कारण देखने को मिलता है यहां पे भी वही है अज्ञान एक बच्चा है वह यदि खिलौने की दुकान में जाकर के देखता है कि यह एरोप्लेन है यह हेलीकॉप्टर है यह बंदूक है यह सैनिक है यह गुड़िया है यह गेम है यह खिलौने है तो उन बच्चे बच्चे को तो पता नहीं है। वह तो अज्ञानी है। किंतु पिता को तो ज्ञान हो गया है। पिताजी सबके भीतर में वही प्लास्टिक ही देखते हैं। देखिए जब यह दुकान वाला पैसा मांगेगा तो वो बच्चा कहेगा बच्चा शायद सोचेगा कि यह विमान है और यह कार है। एरोप्लेन है और कार है। तो बच्चा शायद ऐसा सोचेगा कि एरोप्लेन का जो प्राइस है वह तो नेचुरली कार की प्राइस से तो ज्यादा ही होगा। तो जब यह दुकान वाला ज्यादा पैसा मांगेगा तो बच्चा सोचेगा अच्छा यह एरोप्लेन का तो ज्यादा रुपया होना ही चाहिए दे देना चाहिए किंतु पिताजी इमीडिएटली सामने कहेंगे कि कार भी प्लास्टिक की बनी है। एरोप्लेन भी प्लास्टिक का बना है। मैं क्यों इन दोनों के एरोप्लेन का ज्यादा रुपया दूं कार की वजह जितने रुपए में मैंने कार परचेस की है प्लास्टिक की उतने ही रुपयों में मुझे यह प्लास्टिक का एरोप्लेन दे दो। जो यह प्लास्टिक का एरोप्लेन बनाए हैं उसने वह वही तो किया है ना जो प्रोसेस प्लास्टिक की कार बनाने में गई है। एक मोल्ड बनाया है। मोल्ड के भीतर में यह लिक्विड प्लास्टिक को डाला है। फिर जैसे यह ठंडा हो गया वो बाहर का मोल्ड हटा दिया तो उसके भीतर में यह कार जो जिस शेप का यह मोल्ड है उस शेप का यह खिलौना बन जाएगा। तो आप यदि यह एरोप्लेन का मोल्ड बनाए ना कि कार का मोल्ड बनाए ना कि यह टैंक का मोल्ड बनाए ना कि ये गुड़िया का मोल्ड बनाए क्या फर्क पड़ता है मोल्ड बनाने का और जो लिक्विड प्लास्टिक डालने का जो कॉस्ट है वह तो सेम ही होगा। तो आप किस तरह से कह सकते हैं कि इसका प्राइस इससे ज्यादा है। मैं तो एक ही प्राइस में सब कुछ खरीदूंगा। तो यह जिसको ज्ञान हो गया है वह यह कहेगा। किंतु बच्चे को तो ज्ञान नहीं हुआ। उसका तो जगत का जो एक्सपीरियंस है वह सोचता है कि हां मेरे पिताजी के पास में कार तो है किंतु मेरे पिताजी एरोप्लेन अफोर्ड नहीं करने वाले हैं। एक पर्सनल एरोप्लेन ना ही मैंने अपने खुद के घर में देखा है पिताजी के पास में ना ही मैंने अपने मित्रों के पास में देखा है। मैंने तो यह देखा है कि मेरे पास में कार है। मेरे मित्रों के पास में कार है। यानी कि कार इज रिलेटिवली अफोर्डेबल। जबकि यह प्लेन है। इट मस्ट बी रिलेटिवली कॉस्टली। तो अभी यह रियल कार और रियल प्लेन में यदि यह डिफरेंस है तो नेचुरली यह प्लास्टिक की कार और प्लास्टिक के खिलौने में भी तो यही डिफरेंस होना चाहिए। ये किंतु बच्चा इसको पता नहीं है कि जगत कैसे कार्य करता है। ना ही इसको ये मैन्युफैक्चरिंग मेथड्स पता है कि यह रियल एरोप्लेन और रियल कार का जो कॉम्प्लेक्सिटी है उसमें जमीन आसमान का डिफरेंस है। जबकि यह प्लास्टिक की कार या प्लास्टिक का एरोप्लेन बनाना है तो मोल्ड बना करके मोल्ड का शेप चेंज करके वही लिक्विड प्लास्टिक डाल दीजिए। एक ही प्रोसेस में दोनों बन जाएंगे। बच्चा समझ नहीं पा रहा है। उसके भीतर में अज्ञान है। बोल के यह वही यदि दुकान वाला ज्यादा रुपया मांगेगा प्लास्टिक के एरोप्लेन के लिए तो बच्चा शायद दे भी दे। तो यहां पे भी शरद महाराज कहते हैं कि भ्रम का कारण सर्वत्र जो देखने को मिलता है। यहां पे भी यही है। बच्चे को भ्रम का कारण है अज्ञान मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस का। यहां पर हमारा कारण भ्रम का कारण है अज्ञान इस जगत की प्रोसेस का यह किस तरह से कॉन्शियसनेस कार्य करती है उस प्रोसेस का अज्ञान यहां पे भी यही अज्ञान की वजह से हमको समझ में नहीं आता कि मेरे भीतर में भी वही ब्रह्मण है जो कि आपके भीतर में है ओई अज्ञान जखन जे कोखन जे उपस्थित होइलो ताहा की रूपे जानबे बोलो यह अज्ञान कहां से कब से उपस्थित हुआ? यह कैसे जानोगे? बताओ। बच्चे के भीतर में ये अज्ञान कहां से आया? आप कह सकते हैं बचपन से आया, बर्थ से आया, जन्म से आया। किंतु ऐसा कहना भी तो गलत होगा ना। हम कहेंगे कि बच्चा अभी बड़ा नहीं हुआ है। इसके लिए उसके भीतर में अज्ञान है। यह प्लास्टिक का प्लेन और प्लास्टिक की कार इन दोनों की प्राइस सेम होनी चाहिए। जबकि यह एक्चुअल एरोप्लेन और एक्चुअल कार इन दोनों की प्राइस में आसमान जमीन का अंतर होना चाहिए। यह अज्ञान है। वह बच्चे के भीतर में कब से आया? किस तरह से हम इस बात का उत्तर देंगे? जन्म से आया। क्या हम ऐसा कहेंगे कि मेरा बच्चा जन्म से ही अज्ञानी बनकर के पैदा हुआ है। हम ऐसा नहीं कहेंगे। हम ऐसा कहेंगे कि यह बच्चा है उसको अभी नॉलेज प्राप्त करने में देरी है। देखिए एक ही बात है किंतु बोलने के दो तरीके हैं। कोई भी मां ऐसा नहीं कहेगी कि मेरा बच्चा जन्म से ही अज्ञानी बनकर के पैदा हुआ है। कोई भी मां ऐसा ही कहेगी कि मेरे बच्चे को तो अभी स्कूल में भी जाना है। कॉलेज में भी जाना है। जॉब भी करनी है, संसार की जवाबदारी भी उठानी है। तब तो कहीं जाकर के उसको यह सब समझ में आएगा। छोटे बच्चे को क्या आप अज्ञानी थोड़ी ना कहेंगे? तो यहां पे भी शरद महाराज कहते हैं कि यह अज्ञान कहां से आया वो कैसे कहोगे बताओ? अज्ञान भीतर जत क्षण पहिया छो तण उहा जानी बार चेष्टा बथा जितना समय हम जब तक हम अज्ञान के भीतर में पड़े हुए हैं तब तक यह जानने की चेष्टा किसी काम की नहीं है। वृथा प्रयत्न मात्र है। यदि आप बच्चे का साइको एनालिसिस करने को जाएंगे कि इसको यह एक्चुअल कार और एरोप्लेन का मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस क्यों नहीं पता है। चलो मैं उसका साइको एनालिसिस करके जानने का प्रयास करता हूं। ये पूरी एक्सरसाइज के अंत में आपके हाथ में कुछ नहीं आएगा। राइट? क्योंकि यह प्रैक्टिकल है। हमको समझ में आता है कि बच्चे को जब तक ज्ञान नहीं होता तब तक यह अज्ञान दूर नहीं होगा। यह इतना तो समझ में आता है। किंतु ये बच्चे के भीतर में अज्ञान आया कहां से? यह यदि साइकेट्रिस्ट के पास में ले जाकर के खोजने का प्रयास करें तो यह प्रयास संपूर्ण रूप से विफल जाएगा। स्वप्न जतो क्षण देखा जाए ततो क्षण सत्य बोल्या प्रतीति हो जब तक हम स्वप्न देख रहे हैं तब तक हमको यह स्वप्न सही सही है सत्य है ऐसी प्रतीति होती है कल हमने वह जो राजा जनक की कहानी देखी थी दुश्मन ने राज्य पे आकर के हमला किया हरा दिया राज्य से तड़ी पार कर दिया उसको एग्जाइल में कर्जाल कर दिया और यह बेचारा राजा जनक वह कहां दर-बदर भटक रहा है भिक्षा मांगने के लिए। हाथ में एक थोड़ी सी भिक्षा आ भी गई तो एक पंखी ने झपट मार के उसको चुरा ली। तब वह बेचारा हाहाकार करता हुआ जमीन पर गिर पड़ा। सोच रहा है, कह रहा है, रो रहा है कि कहां मैं इतना माने प्रोस्पेरस, इतना वेल्थी, इतना माने फेमस, पॉपुलर राजा था। आज मैं कहां मुझे भिक्षा में दो मुट्ठी अन्न भी प्राप्त नहीं है। किंतु जैसे ही यह घड़ी आई वैसे ही उसकी नींद खुल गई। तो अभी जब नींद खुल जाती है तब यह बेचारा इतना कंफ्यूज हो गया है कि यह सही है कि वह सही है। तो यानी कि जब तक हम स्वप्न देखते हैं तब तक यह स्वप्न सत्य सत्य बोलकर के ही भ्रम होता है। निद्रा भंगे जागृत अवस्थार सहित तुलना कोरियाई उहा के मिथ्या बोलिया धारणा होय जब नींद टूट जाती है। जागृत अवस्था के साथ में उसकी तुलना करते हैं। कंपैरिजन करते हैं कि हां यह ड्रीम स्टेट था। यह वेकिंग स्टेट है। तभी कहीं जाकर के वह ड्रीम स्टेट जो था वह हमको मिथ्या बोलकर के भान होता है। धारणा होती है। ये ऐसा हो गया कि यह बच्चा जब बड़ा हो जाएगा तब हम बचपन के किस्से यदि उसको कभी-कभी सुनाएंगे तो यह हंसेगा कि मैं ऐसा मूर्ख भी था। में मेरी मां कभी-कभी मुझे कहती थी कि तुम जब छोटे थे तब ऐसा करते थे तो मैं मुझे ऐसा आश्चर्य होता था कि ऐसा भी समय था मैं ऐसा मूर्ख था या तो ऐसा नादान था ना कि ऐसा सरल था आज उस तरह की चेष्टा जो कि मैं बचपन में किया करता था। मैं सपने में भी नहीं सोच सकता कि इस उम्र में मैं वह चेष्टाएं करूंगा। वो सब क्रियाकलाप करूंगा जो कि मैं बचपन में करता था। किंतु वह वह अवस्था अज्ञान की अवस्था थी। यह अवस्था ज्ञान की अवस्था है। यह मुझे कब पता चला? मैं बड़ा हुआ तभी तो पता चला। एक बच्चे को आप यदि कहेंगे एक छोटा बच्चा है अभी जन्म लिया है एक साल का हुआ है। उसको आप कहेंगे कि तुमको यदि यह टॉयलेट वगैरह जाना है तो तुम बाथरूम में जाना। अपनी ये जो नेपी जो पहनी हुई है डायपर उसमें मत करना। तो वो बच्चा समझ ही नहीं पाएगा। राइट? वो उसको यही समझ में आता है क्योंकि उसकी यह बुद्धि ही नहीं विकसित हुई है कि टॉयलेट जाने के लिए आपको बाथरूम में जाना है। डायपर में नहीं करना है। किंतु यही बच्चा जब बड़ा हो जाएगा तब यह बच्चा सोचेगा कि अच्छा मैं ऐसा भी एक समय था कि मैं डायपर में यह टॉयलेट वगैरह करता था। मैं बाथरूम में नहीं जाता था। टॉयलेट में नहीं जाता था। वो उसको आश्चर्य भी होगा। हो सकता है कि एंबरेसमेंट भी हो। शर्म भी आए। बच्चे जब हम होते हैं तब ऐसीऐसी सब हरकतें करते हैं जो कि हम हमारी मां जब हमको याद करवाती है बड़े होकर के तो हमको थोड़ी शर्म भी आती है। हम थोड़े से नाराज होकर के कह देते हैं कि ये सबके सामने ऐसी बातें मत किया करो कि तुम मैं जो करता था बचपन में मेरे मित्रों को सुनाने की क्या जरूरत है? वे लोग मेरी मजाक करेंगे। अभी ऐसा फिर से कभी मत करना। ऐसा अम्मा मां को नाराज होकर बोल भी देते हैं। तो अभी देखिए कि मैं जब बच्चा था मुझे शर्म नहीं आ रही थी वह सब क्रियाकलाप हरकतें करने में। किंतु इस उम्र में मैं सपने में भी नहीं सोच सकता कि मैं इस तरह की हरकत करूंगा। तो देखिए कि यह जो अज्ञान की अवस्था वो हमको कब पता चलेगा कि हम अज्ञान में है। तभी पता चलेगा जब कहीं हमको ज्ञान हो गया है। जब तक हमको ज्ञान नहीं होता तब तक हम समझ नहीं पाएंगे कि उस समय हम अज्ञान में थे। जब तक नींद से जग नहीं जाएंगे तब तक पता नहीं चलेगा कि वह स्वप्न था। बोलीते पारो कह सकते हो स्वप्न देखी बार काले कनो कनो कोनो कोनो व्यक्ति आमी स्वप्न देखते छ ए रूप धारणा थाकीते देखा जाए कह सकते हो कि स्वप्न देखने के समय कभी-कभी किसी किसी को मैं स्वप्न देख रहा हूं। इस तरह की धारणा होती है। ऐसा हो भी सकता है। इस तरह से जो चित्र विचित्र चीजें हो रही है स्वप्न में कि कभी-कभी संदेह हो जाता है। एक तो हमने इतना तो जीवन जिया है तो क्या पॉसिबल है? क्या पॉसिबल नहीं है? ये इसका तो एक तो एक माइंड में बैठा हुआ है हमारे मन के भीतर में सपना में मैं यदि सुपरमैन बन के उड़ रहा हूं तो शायद ऐसा हो सकता है कि मेरी सबकॉन्शियसनेस से एक आवाज तो ऐसी आए कि जाग मने कभी ना ही किसी को उड़ते देखा है ना ही मैंने कभी अपने खुद के जीवन में कभी उड़ा है इस तरह से सुपरमैन के कपड़े पहन करके तो मैं अभी किस तरह से उड़ रहा हूं यह तो मुझे कुछ गड़बड़ लग रही है इस तरह का एक संदेह या तो फिर एक आशंका या तो फिर एक अंदाज, एक आभास हमको शायद स्वप्न में हो सकता है। मैं स्वप्न देख रहा हूं। इस तरह की धारणा शायद कभी-कभी हो सकता है। हो सकती है शेखाने ओ जागृत अबार स्मृति होते ही ता देर मने ओ भाेर उदय होइया था केके किंतु यह जो संदेह है यह आभास जो है यह शक जो है यह धारणा जो है वह कहां से आई कि मैं कभी उड़ ही नहीं पा मैं सुपरमैन जो मैं बना हूं सपने में वह मुझे कुछ गड़बड़ लग रही है। यह संदेह या तो फिर यह आभास मुझे कहां से मिल रहा है? मैंने यह पूरा आज ये 40-50 साल का जीवन बिताया। इस 40-50 साल के जीवन में मैं कभी उड़ा नहीं हूं हवा में। तो यह जो नॉलेज या तो फिर यह मेमोरी मेरे माइंड के भीतर में बैठी हुई जो है वह मेमोरी कभी-कभी जागृत होकर के सपना में कहेगी कि इतने 50 साल में तो तुम कभी हवा में उड़ नहीं पाए हो। अभी यह एकाएक तुमने सुपरमैन के कपड़े पहन के हवा में उड़ना शुरू कर दिए। हाउ इज दैट पॉसिबल? दाल में कुछ ना कुछ काला है। जैसा वो कहते हैं कभी-कभी हम समथिंग इज रॉन्ग हियर। कुछ ना कुछ गड़बड़ हो रहा है। तो किंतु यह जो गड़बड़ हो रहा है, यह संदेह कहां से आया? मेरा 50 साल का जो अनुभव है इस जीवन का उसी में तो यह संदेह आया ना कि अभी तक तो मैं कभी हवा में उड़ा नहीं। एकाएक में कैसे उड़ने लगा? तो यह जागृत अवस्था की जो मेमोरी जो है उसी में से तो यह संदेह प्रकट हुआ। अर्थात अज्ञान का मुकाबला तभी होगा जब कि हमको ज्ञान प्राप्त हो। जब तक हम ज्ञान प्राप्त नहीं करते हैं तब तक हमको यह समझ में नहीं आएगा कि मैं अज्ञानी हूं। और इसीलिए गुरु का रोल क्या है? आज यदि बच्चे को कोई कहे कि तुमको यह इसके भीतर में डायपर में टॉयलेट नहीं करना है। तुमको यदि यह हो कि टॉयलेट जाने की अवस्था तो तुमको मां को बता देना है। मां तुमको बाथरूम में ले जाएगी। वो तो कम गड़बड़ माने वो क्लीन क्लीनिंग वगैरह कम करना पड़ेगा। वो ठाकुर की कहानी है ना कि अ एक बच्चा अपनी मां को कहता है कि मां मुझे मैं नींद में यदि मुझे शौच जाने का आवश्यकता हो तो तुम मुझे नींद में से उठा देना। यानी कि मैं कहीं नींद में ही नींद में शौच ना कर लूं। तो मां क्या कहती है कि बेटा वो तुमको यदि वह शौच का वेग जब प्रारंभ होगा वही वेग ही तुम्हारी नींद उड़ा देगा। तुम उसे मुझे कहने की जरूरत नहीं है। तो क्या है कि किंतु ये तो थोड़ा बच्चा बड़ा हो गया है कि उसको समझ में आ रहा है कि शोध जाने के लिए मुझे बाथरूम में जाना होगा। छोटा बच्चा है। एक साल का है बेचारा। 6 महीने का है, 2 महीने का है, 3 महीने का है। वह तो बोल ही नहीं पाएगा। ना ही उसको यह अकल है कि मुझे वो शौच जाने के लिए मुझे बाथरूम में जाना है। तो मां है धीरे-धीरे बच्चे को ट्रेन करती है। टॉयलेट ट्रेनिंग जिसको कहते हैं ना आजकल कि वो धीरे-धीरे बच्चे को समझाएगी कि हां तुमको यदि यह क्रिया करनी है तो तुम पहले तो मुझे बताओ। मैं तुमको बाथरूम में ले जाऊंगी। तो यह क्या है कि यह सत्संग एक गुरु एक शिक्षक की यही भूमिका है कि मैं अज्ञानी हूं। उस समय वह आकर के मुझे कहते हैं कि तुम अज्ञानी हो। तुमको ज्ञान की आवश्यकता है। अभी यह शिक्षक के कहने से ही क्या यह हम लोग ज्ञानी हो जाएंगे? क्या? मां जब पहली बार बच्चे को टॉयलेट ट्रेन करना स्टार्ट करती है तो बच्चा क्या पहले ही दिन से मां को कहना शुरू कर देगा कि हां अभी तुम मुझे बाथरूम में ले जाओ। ऐसा नहीं होगा। वो कितने ही दिन जाएंगे, कितने ही वो फेल अटेमप्ट होंगे। मां बच्चे को सिखाती है कि अच्छा तुम बाथरूम जाना है मुझे कहना। बच्चा कहता है हां हां मैं कहूंगा किंतु फिर वो जब बाथरूम होती है तो बेचारा खुद भूल जाता है मां को बताने को। ऐसे विफल प्रयत्न कितने ही होंगे किंतु एक दिन अवश्य आएगा। आज जो हम एडल्ट हैं कोई भी इस तरह से वो टॉय ये डायपर पहन के नहीं घूम रहा है। हां अभी वृद्ध हो गए हैं और फिर शरीर के फंक्शनंस के ऊपर में अपना कंट्रोल चला गया है तो वो एक अलग बात है। फिजिकली और मेंटली जो फिट होता है वह कभी डायपर पहन के नहीं घूमेगा। हमको इतनी तो अकल है कि कौन सी क्रिया करने के लिए कहां पे जाना है। तो यह जो ज्ञान हमको प्राप्त हुआ ज्ञान प्राप्त करवाने में इंस्ट्रूमेंटल कौन था? तो वो थी हमारी मां। तो यह ब्रह्म ज्ञान भी जब हमको प्राप्त होगा तो इंस्ट्रूमेंटल है हमारे गुरु हमारे इष्ट। यह गुरु या तो इष्ट हमको पहले तो शब्द से बताना शुरू करेंगे कि तुम्हारी जो अवस्था है वह अज्ञान की अवस्था है। तुम अपने को जो दूसरों से सेपरेट समझते हो वो तुम्हारा भ्रम है। तो हम कहेंगे हम हजार प्रश्न खड़े करेंगे। ऑब्वियसली जैसे बच्चा प्रश्न करेगा क्यों मुझे बाथरूम जाने की जरूरत है? मैं जहां पर बैठा हूं वहां पर तो मजे से ही हूं। अभी मित्रों के साथ में खेल रहा हूं। छोटे-छोटे दूसरे बच्चों के साथ में नाना नानी की गोद में बैठा हुआ हूं। क्यों मैं उनको छोड़कर के बाथरूम जाऊंगा? ऐसा हजार प्रश्न बच्चा करेगा क्योंकि बच्चा नादान है। उसके बच्चे के प्रश्न सुनकर के मां को शायद हंसी भी आएगी। स्नेह भी प्रकट होगा। तो यहां पे भी हम लोग इस तरह के हजार प्रश्न करेंगे कि क्यों मैं भ्रम में हूं? भ्रम कहां से स्टार्ट हुआ? भ्रम का कारण क्या है? कौन सा लॉजिक पे यह भ्रम काम कर रहा है? गुरु समझाने का प्रयास तो करेंगे। किंतु जब तक हम सिंसियरली एक एफर्ट लगाना शुरू नहीं करेंगे तब तक हम इस भ्रम से मुक्त नहीं होंगे। और फिर दूसरा क्या है पता है? एक लर्निंग डिसेबिलिटी भी होती है। जैसे कि यहां पर सेरेब्रल पालसी क्लीनिक है। उस सेरेब्रल पालसी सीपी क्लीनिक में बच्चे 12 साल के 15 साल के 18 साल के तक हो जाते हैं। किंतु फिर भी ना उनका यह जो फिजिकल बॉडीली फंक्शनंस के ऊपर में कंट्रोल नहीं होता है। तो उनकी मां को उनको बड़े होने के बाद में भी इस तरह से संभाल लेनी पड़ती है। जैसे कि वह अभी भी टोडलर है। अभी भी बेबी है। तो मां के लिए तो कष्ट है ही है। मैं तो वहां पे जाता हूं और मैं सीरियसली इन मां को देख कर के यह जो मदर्स जो सब आती है वहां पे उनको देख के लगता है मेरे से हजार गुना विल पावर या तो फिर एक चीयरफुलनेस इनमें है। मेरा यदि इस तरह का बच्चा होता और उसको इस तरह से केयर करनी पड़ती जैसे कि वह बेबी या टोडलर है तो मैं तो एकदम फ्रस्ट्रेट ही हो जाता। इन लोगों में आप देखेंगे कि वो 70 के आसपास ये बच्चे आते हैं तो मां सब समय साथ में रहती है। तो उनकी जो चेयरफुलनेस देखेंगे यू विल रियली फील इंप्रेस्ड एंड इंस्पायर्ड आल्सो वी आई फील इंस्पायर्ड एंड इंप्रेस आल्सो तो देखिए कि वो एक जिसमें लर्निंग डिसेबिलिटी है वह तो अभी प्रश्न ही नहीं है। उसके साथ में आप ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। किंतु एनी पर्सन हु इज रीज़नेबली फिट फिजिकली एंड मेंटली ही कैन इजीली फॉलो दिस पाथ लेड डाउन बाय आवर गुरु और इष्ट एंड वी ऑल कैन अटेन ब्रह्म ज्ञान। यह गुरु या इष्ट द्वारा जो पद हमको प्रदर्शित किया जाता है उसको फॉलो करके हम सहज रूप से ब्रह्म ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। यदि यह ना होता ब्रह्म ज्ञान प्राप्ति यह इसका रास्ता असंभव यदि होता तो क्या है पता है यह जगत ही चलना रुक जाता। क्योंकि स्वामी जी ने भी कहा है कि प्रत्येक युग में माने भारत में ऐसा एक भी युग नहीं गया। जबकि भारत की मिट्टी पर एक ब्रह्मज्ञानी के चरण चिन्ह न पड़े हो, चरण स्पर्श ना हुआ हो। तो ऐसा और दूसरा क्या है कि जैसे हमने इवन यह वेस्टर्न स्कॉलर्स जो है आर्नोल्ड टोयनबी वगैरह उन लोगों का भी देखा कि इवन वे लोग स्वीकार करते हैं कि धर्म या तो अध्यात्म या तो फिर यह स्पिरिचुअल एनलाइटनमेंट। यही है मनुष्य सभ्यता का आधार स्तंभ। यदि मनुष्य सभ्यता में से आप भगवान बुद्ध भगवान कृष्ण भगवान राम कृष्ण ये अखंडानंद जी विज्ञानानंद जी अद्भुतानंद जी सुबोधानंद जी इस तरह के महापुरुषों को हटा ले तो यह मनुष्य सभ्यता जैसे कि यह पत्तों के महल की तरह टूट करके जमीन पर आर्म गिरेगी। यह डिसइीग्रेट हो जाएगी। यह महापुरुषों ने ही अपनी आध्यात्मिकता से इस भूमि में सिंचन करके इस भूमि को अभी भी फर्टाइल रखा है। अदर वाइज तो यह जो भूमि है इसके ऊपर में किसी भी सिविलाइजेशन रूपी फसल कभी भी पैदा नहीं होगी, प्रकट नहीं होगी। तो इसीलिए यह असंभव कार्य नहीं है। बस वही है कि एक कॉमटेंट या तो फिर यह एक आत्म साक्षात्कार प्राप्त किए हुए एक ऋषि का या तो गुरु का या तो इष्ट का संग प्राप्त होना चाहिए। वही जो कथामृत में मास्टर महाशय का विवरण है। ठाकुर की महासमाधि के बाद में मास्टर महाशय वरा नगर मठ में जाते हैं। नरेंद्र के साथ में मुलाकात होती है। नरेंद्र की व्याकुलता देखकर के मास्टर महाशय मुग्ध हो जाते हैं। ईश्वर दर्शन प्राप्त करने की जो व्याकुलता है। ठाकुर कहते हैं ना सर के ऊपर में आग लगी है। तो फिर आदमी कैसे मारामारा वह पानी खोजने के लिए घूमता है। उस तरह की व्याकुलता जब तक नहीं होगी तब तक ईश्वर दर्शन नहीं होगा। एक गुरु अपने शिष्य का चेहरा मुंह सर पानी के नीचे वो दबा के रखते हैं। तो सांस लेने की जो तकलीफ है तो शिष्य कितनी चेष्टा करता है कि वह पानी से बाहर निकल कर के सांस ले। सांस यह हवा के लिए ऑक्सीजन के लिए वह कितना तड़प रहा है। तो इतनी ही तड़प इतनी ही व्याकुलता उत्कंठा जब ईश्वर प्राप्ति के लिए होगी तो हमको अवश्य ईश्वर प्राप्ति होगी। तो यही वो व्याकुलता उत्कंठता उत्कंठा या तो फिर यही तड़प वो जो नरेंद्र कहता है मास्टर महाशय को कि जीवन में वेदांत ने जो कहा सब मुझे मिला है। मनुष्यत्व मुमुक्षत्व महापुरुष संश्रयः तो मनुष्यत्व मनुष्य देह भी प्राप्त हुआ है। मुमुक्षत्व अर्थात कि ईश्वर प्राप्त करने की व्याकुलता भी प्राप्त हुई है। महापुरुष संश्रयः ठाकुर जैसे महापुरुष का संग प्राप्त हुआ है। सत्संग प्राप्त हुआ है। शिष्यत्व प्राप्त हुआ है। फिर भी मुझे क्यों ईश्वर दर्शन नहीं हो रहा है? फिर भी क्यों मुझे आध्यात्मिक अनुभूति एकदम सतत एक धारी क्यों नहीं बह रही? ऐसा नहीं है कि नरेंद्र को आध्यात्मिक अनुभूति नहीं हुई। बाय द टाइम वराह नगर मठ की स्थापना हुई तो हमको तो ऑलरेडी पता है कि काशीपुर के दिनों में नरेंद्र को निर्विकल्प समाधि मिल ही चुकी थी। किंतु क्या है कि जब तक हम बाह्य दशा में वापस आ जाते हैं उस समय इंटरप्शन होता है। नरेंद्र के मन में शायद ऐसा होगा कि क्यों नहीं मैं सब समय अर्धबाह्य दशा या तो अंतरर्दशा में ही रहूं। क्यों मुझे बाह्य दशा में आना पड़ता है? क्यों मुझे अपने गुरु भाइयों की यह चिंता करनी पड़ती है? क्यों घर की इतनी फिक्र है? और गोइंग बियों्ड गुरु भाई और अपना खुद का घर उनके जो समग्र संसार की यह जो उनका जो रिस्पांसिबिलिटी उनको लेनी थी वो उनके सर पर थी तो वो तब तक नहीं होगी यह सब समाधान संकट का समाधान तब तक नहीं होगा जब तक यह नरेंद्र ये बाह्य दशा में ना रहे यदि ठाकुर ने उसको अनुभूति को ताला लगाकर के चाबी अपने पास में ना रखी होती तो ठाकुर वो मां के बारे में कहते हैं ना चोचादौड़ मारवे यानी कि वो कामार पुकुर में मां और ठाकुर की कहानियां सुनते-सुनते सो पड़ती थी। तो वह सब बाकी स्त्रियां मां को कहती है कि अरे ठाकुर इतनी अच्छी-अच्छी बातें करते हैं। तुम सो क्यों जाती हो? तो ठाकुर कहते हैं उसको यदि अपना सही स्वरूप याद आ गया तो सीधी वो अपना जो वैुंठ लोक है वहां पर दौड़ लगाएगी। तो यहां पे भी स्वामी जी को बाह्य जगत में बाह्य दशा में रखना था जिससे कि जगत के कल्याण के लिए वह चेष्टा करें, उद्यम करें। तो यह उद्योग पर्व महाभारत का उद्योग पर्व तो यहां पर रामकृष्ण मिशन में भी वो उद्योग पर्व प्रारंभ करना था। समाधि पर्व आनंद पर्व साधन पर्व वह सब हो गए। अभी उद्योग पर्व प्रारंभ होना है तो नरेंद्र उद्योग करें इसलिए उसके मन को बाह्य दशा में रखा है। बाह्य दशा में है तो आध्यात्मिक आनंद में इंटरप्शन तो होने ही वाला है। तो नरेंद्र चाहता था कि इवन बाह्य दशा में भी अनइंटरप्टेड ब्रह्म ज्ञान ब्रह्म आनंद प्राप्त होता रहे। सतचित आनंद प्राप्त होता रहे। वि इज थ्योरेटिकली इंपॉसिबल। जब तक बाह्य दशा में है तो यह सच्चिदानंद में व्याघात तो होने ही वाला है। इंटरप्शन होने ही वाला है। अर्धबाह्य दशा या अंतरर्दशा में ही अनइंटरप्टेड सच्चित आनंद का प्रवाह बहेगा। बाह्य दशा में यह संभव नहीं है। किंतु यह नरेंद्र की जो व्याकुलता थी, इससे यह मास्टर महाशय कैसे मुग्ध हो जाते हैं कि हां नरेंद्र की इस व्याकुलता देखिए कि हम सबके भीतर में यह होनी चाहिए ईश्वर दर्शन के लिए ईश्वरीय आनंद प्राप्त करने के लिए। तो एक रीज़नेबली हमारा एक एटीट्यूड होना चाहिए। मनुष्यत्व मुमुक्षत्व महापुरुष संश्रय ये इसके साथ में यह फिजिकल और मेंटल फिटनेस होनी चाहिए। यदि इतना होता है तो गुरु के आदेश के अनुसार गुरु के उपदेश के अनुसार चलकर के ईश्वर दर्शन ना हो। आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त ना हो। ऐसा तो संभव ही नहीं है। शेखा ने जागृत अवस्थार स्मृति हो तार मने भा उदय होया था के स्वप्न में भी कभी-कभी यह लगता है कि मैं स्वप्न देख रहा हूं किंतु वह स्वप्न देख रहा हूं वह ज्ञान भी जागृत अवस्था की जो स्मृति है उसमें से प्रकट होता है। जागृत अवस्थाए जगत प्रत्यक्षो करबार काले कारो काहारो अद्वय ब्रह्म वस्तुर स्मृति ओ रूपे होते देखा जाए तो जिस तरह से स्वप्न में कभी-कभी आभास मिल जाता है कि मैं सुपरमैन बनकर उड़ सकता ही नहीं यहां पर कुछ दाल में कुछ ना कुछ तो काला है तो वैसे ही यह जागृत अवस्था में कभी ना कभी ऐसा संदेह हो जाता है कि मैं अपनी नजरों से इस संसार को जो देख रहा हूं मुझे नहीं लगता कि यह या तो संसार का सही स्वरूप है या तो फिर यह मेरा सही स्वरूप है। यह काम, कांचन, काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, मान, अभिमान, शील, कूल, लज्जा, घृणा, भय इस अष्टपाश में, पंच कक्लेश में जो मैं डूबा हुआ जो मैं अपना जो नेचर है, स्वभाव है, मुझे नहीं लगता कि यह मेरा सही स्वभाव है। मेरा सही स्वभाव तो मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा, सत, चित आनंदमय होना चाहिए। नहीं कि यह नेगेटिव टाइप का पॉजिटिव ही होना चाहिए। तो यह अंदाजा यह आभास या तो फिर यह संदेह जागृत अवस्था में कभी-कभी हो जाता है। इसके बाद का अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: आपने शिशु का उदाहरण दिया। ऐसा लगता है कि आप कह रहे हैं कि शिशु अज्ञानी है और हमें उसे बाहर से ज्ञान देना होगा।
किंतु देखिए पहली बात तो कि यह कहना कि बच्चा अज्ञानी है। यह मुझे तो उचित नहीं लग रहा। आई मीन किस तरह से आप यह शब्द प्रयोग बच्चे के बारे में करेंगे। आप कहेंगे कि बच्चे को नॉलेज नहीं ज्ञान नहीं है। यह ज्ञान का अभाव और अज्ञान यह दोनों मुझे डिफरेंट लग रहे हैं। अगेन आई एम नॉट फॉलोइंग एनी स्क्रिप्चर। आई एम जस्ट फॉलोइंग माय इंट्यूशन। यह कहना कि बच्चा अज्ञानी है। यह किसी भी रूप से वो ठीक नहीं लग रहा। हम कहेंगे कि बच्चे का स्कूलिंग अभी प्रारंभ नहीं हुआ है। ट्रेनिंग प्रारंभ नहीं हुई है। उसको ज्ञान नहीं मिला है। सो दैट इज वन थिंग कि ज्ञान का अभाव और अज्ञान दो आर फंडामेंटली डिफरेंट। वन सेकंड यह कैसा है पता है? जैसे ठाकुर ने कहा ना कि 1000 साल का अंधेरा कमरा है। उसमें जैसे ही आपने लाइट का स्विच ऑन किया फट करके उसके भीतर में ज्ञान वो प्रकाश फैल जाएगा। यानी कि आपने ठीक ही कहा कि ज्ञान तो ऑलरेडी है। बस उसको बता देना है कि यह नॉलेज तुम्हारे भीतर में है। राइट? तो अभी देखिए कि तीन तरह से हम इसको डिस्क्राइब कर सकते हैं। एक तो हम कहेंगे कि बच्चा अज्ञानी है। वह तो मुझे इंट्यूटिवली ठीक नहीं लग रहा है। ऐसा कहना मच मोर प्रैक्टिकल है कि बच्चे के भीतर में ज्ञान नहीं है। सो दैट इज वन स्टेप हम ऊपर आए। सेकंड स्टेप यदि वेदांत की दृष्टि से होगा तो वेदांत कहेगा कि ज्ञान ऑलरेडी है। उसको यह ज्ञान करवाना है कि तुम ऑलरेडी ज्ञानी हो। सो दैट इज अ वेदांतिक स्टेप। राइट? अभी देखिए कि यह ज्ञान कि बच्चे को हो कि तुमको कहने से ही कि अहम ब्रह्मास्मि यह मंत्र गुरु ने शिष्य को दिया तो शिष्य इमीडिएटली यह समझ गया कि मैं ब्रह्मन हूं। किंतु गुरु अभी यह आइडियल हमारे स्क्रिप्चर में ऑलरेडी लिखा हुआ है कि जो अधिकारी शिष्य होगा और ब्रह्मवेत्ता गुरु होगा। तो जब यह ब्रह्मवेत्ता गुरु अधिकारी शिष्य को जब बताएगा कि तत्व मसी श्वेतकेतु तो इमीडिएटली श्वेतकेतु को ज्ञान हो जाएगा। किंतु हमारे शास्त्र में ऐसा नहीं लिखा कि ब्रह्मवेत्ता ना कि कितना ही बड़ा यह टीचर हो। एक छोटे बच्चे को एक बेबी को कहेगा और बेबी को ज्ञान हो जाएगा। दिस इज नॉट पॉसिबल। व्हाई? बिकॉज़ बेबी इज़ फिजिकली एंड मेंटली नॉट येट कैपेबल ऑफ रियलाइजिंग दैट ट्रुथ। बेबी को तो ग्रो होना पड़ेगा। एक अधिकारित्व की पोजीशन में जाना पड़ेगा। तब तो कहीं जाकर के गुरु कहेगा और वह ज्ञान होगा। तो सिमिलरली हमारे साथ में वही है। हमारा मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार को सुसंस्कृत करना है। वो बेबी स्टेट में से एडल्ट स्टेट तक जाना है। तब जब कहीं जाकर के गुरु हमको कहेंगे कि तत्व मसी श्वेत के तो तो हमको वो इमीडिएटली ज्ञान होगा। सो एक्चुअली स्क्रिप्चर्स का जो कहना है वहां तक जाने के लिए किंतु एक जो स्टेज प्रीवियस स्टेज है जो कि स्क्रिप्चर नहीं बता रहा है दैट वी हैव टू ग्रो एडल्ट फ्रॉम बेबी बेबीहुड टू एडल्टहुड तक हमको जाना है बाद में तो वो ब्रह्मवेत्ता हमको कहेगा ऐसा कौन सा स्क्रिप्चर है वो कहता है कि बेबी को ब्रह्म ज्ञान हुआ है आई डोंट नो आई मीन वो उसकी जो कहानी है कि गर्भ में वो ये सीख करके आया था आई थिंक अभिमन्यु की कहानी व्हिच इज रेयर आई थिंक राइट अदरवाइज ऐसी वो भी वो ब्रह्मज्ञान तो सीख के नहीं आया था वो युद्ध कला सीख करके आया था वैसे ये मदालसा की जो कहानी है कि वो गर्भ में जब बच्चा होता है तभी से वो ब्रह्म ज्ञान का वो जो चिंतन मनन है वो प्रारंभ कर देती है तो गर्भ में से ही बच्चा यह सीख करके सीख करके तो शायद नहीं किंतु उसका टेंडेंसी उस तरह का हो के वो प्रारंभ हो तो बट बट एनीवे ये जो एक्सेप्टेड स्क्रिप्चर माने इन जनरल कंसेंससेस जो है स्क्रिप्चर्स का माने ये अभिमन्यु मदालसा ये सब कुछ रेयर केसेस को छोड़ दें और उसका भी आप एक इंटरप्रिटेशन कर सकते हैं। एक्सेप्टेड कंसेंसस इज कि एक अधिकारी शिष्य ब्रह्मवेत्ता गुरु के पास जाएगा तब तत्वमसी श्वेतकेतु का कुछ असर होगा। द व्हाट इज लेफ्ट अनसेड दैट फ्रॉम बेबीहुड टू एडल्टहुड तक आपको जाना है। ना दैट इज
प्रश्न: हम भी एक बच्चे की तरह हैं। यदि आप हमें कहते हैं कि तत्वमसि श्वेतकेतु तो हमें भी ब्रह्म ज्ञान नहीं होगा!
व्हाट ना कि हमको ये स्पिरिचुअल बेबीहुड में से स्पिरिचुअल एडल्टहुड तक जाना है। जप ध्यान त्याग तपस्या करके जो मन को सुस संस्कृत जब तक नहीं करेंगे तब तक हम उस लेवल पर पहुंचेंगे नहीं कि वो उपदेश ग्रहण करने के लिए समर्थ हो जाए। किंतु देखिए
प्रश्न: स्वामीजी कहते हैं कि शिक्षा आपके भीतर पहले से विद्यमान पूर्णता की अभिव्यक्ति है education is manifestation of perfection already within you । इसका क्या अर्थ है?
इवन ठाकुर मां स्वामी जी के खुद के जीवन में वह जब बेबी थे माने एक साल के दो साल के तीन साल के थे तब ऐसा कोई अभी देखिए ठाकुर की बात अलग है कि वो कुछ ना कुछ आध्यात्मिक वो सब उनके आसपास में फिनोमिना प्रकट हो रहे थे। जैसे कि एक बार चंद्रामणि देवी ने कमरे में जाकर देखा तो बच्चे रामकृष्ण की बजाय बच्चे गदाई बेबी गदाई की जगह एक कोई पुरुष भगवान शिव शायद जैसे वो वहां पे सोए हुए हैं। तो किंतु क्या है कि वी डू नॉट नो कि वेदर बेबी गदाई वाज़ एबल टू एक्सपीरियंस दैट और अंडरस्टैंड दैट फिनोमिना हिमसेल्फ। दैट फिनोमिना इज़ हैपनिंग अराउंड हिम। बट व्हाट वाज़ हिज़ ओन परसेप्शन ऑफ़ दैट फिनोमिना। राइट? राइट? बेबी होता है तो बेचारा वो खाने पीने, मां की गोद में रहना यही तो उसका परसेप्शन होता है। वही तो उसका अंडरस्टैंडिंग होता है। इफ एनी मिरेकल्स आर हैपनिंग अराउंड हिम वेदर द बेबी हिमसेल्फ इज अवेयर ऑफ इट ऑ नॉट वी डू नॉट नो। राइट? आई आई गेस नॉट पॉसिबल। ठाकुर ने तो पंचमहाभूत का देह धारण किया था। तो हाउ मच अ बेबी इज़ एबल टू पर्सव द वर्ल्ड? हाउ मच इज़ बेबी एबल टू अंडरस्टैंड द वर्ल्ड। सो श्री रामकृष्ण वाज़ंट फार ग्रेटर देन दैट। हो सकता है कि एक साल के जब थे तब तीन साल की कॉन्शियसनेस उनमें होगी। यहां तक कुछ मानने में आ सकता है। नॉट पॉसिबल कि वो एक ऑलरेडी एक ब्रह्मज्ञानी की कॉन्शियसनेस उनमें एक साल में ही होगी। सो दिस ग्रोइंग अप प्रोसेस जो है दैट वी एवरीवन विल हैव टू गो थ्रू इट। कि साधन भजन करके मन को सुसंस्कृत करना ही। अब अब जैसे देखिए ना हम स्पिरिचुअलिटी की तो बात ही छोड़ दीजिए। इवन आइंस्टाइन आइंस्टाइन ने थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी खोज निकाली। फ्रॉम वेयर दिस थ्यरी केम। जैसे किसी भी किताब में उसने पढ़ी नहीं है। किसी भी टीचर ने उसको बताई नहीं है। किसी भी प्रोफेसर ने किसी क्लास में उसको डिस्क्राइब नहीं किया है। फ्रॉम वेयर दिस थ्यरी केम। सो न्यूटन को किसी ने पूछा हाउ वेर यू एबल टू सी आई मीन अंडर फाइंड आउट दिस लॉज़ ऑफ ग्रेविटेशन एटसेटरा। सो न्यूटन का रिप्लाई बड़ा सुंदर है। बाय थिंकिंग अपॉन इट अगेन एंड अगेन एंड अगेन फॉर अ लॉन्ग पीरियड ऑफ़ टाइम। एंड देन सडनली दिस फ्लेशेस ऑफ रियलाइज़ेशन स्वामी जी का जो फेमस फ्रेज़ है, दिस फ्लैशेस ऑफ रियलाइज़ेशन स्टार्ट होगा। सो इफ दिस इज पॉसिबल इन द लाइफ ऑफ साइंटिस्ट अभी आज ही मैं जीपीटी5 का लाइव स्ट्रीम देख रहा था। नाउ अभी एआई इस लेवल तक पहुंच गया है कि आई मीन फ्रैंकली विदिन 3 साल चार साल हुआ जीपीटी को ल्च किए हुए ना कि ये एआई रिवॉल्यूशन प्रारंभ हुए। है ना? तो हां सो थ्री फोर इयर्स विद इन दिस मेनी इयर्स हम आज इस जीपीटी फाइव का जो कैपेबिलिटीज वो लाइव स्ट्रीम में दिखा रहे थे इफ वी हैव रीच हियर वेयर डिड दिस कम फ्रॉम ऐसा तो था नहीं कि इतिहास के पन्ने खोल के एआई के बारे में पढ़ा है नहीं दिस इज़ ऑल वी हैव डिस्कवर्ड एंड इन्वेंटेड सो ये ओपन एआई के साइंटिस्ट जो कर सकते हैं हाउ कैन वी से दैट कि हम लोग नहीं कर सकते अगेन अनदर थिंग जो एक मुझे सही में इंप्रेस करता है ना ये अमेरिकन कंपनियां इन लोगों का इंजीनियर का जो आप रेशियल प्रोफाइल देखेंगे ना वो कितना डवर्स है मतलब वो एक चाइनीस है एक अमेरिकन है एक कोरियन है एक इंडियन है एक फ्रेंच है एक इंग्लिश है ब्रिटिश है तो सभी देश के जो बेस्ट टैलेंट है वो अमेरिका में इकट्ठा हुआ है और ये जो टॉप कंपनीज़ है वहां पे सो ये जो रेशियल डायवर्सिटी जो है ना इट रियली इंप्रेसेस मी दिस इज़ इज़ अनदर पॉइंट एक्चुअली कि दो पॉइंट है यहां पे। एक तो है कि सी दे हैव अ कैपेबिलिटी टू इन्वेंट समथिंग व्हिच इज नॉट देयर। सो इफ दे कैन इन्वेंट एआई म ये एल्गोरिदम तो हम लोग क्यों नहीं ये जो अपनी जो चार दीवारी जो है कॉन्शियसनेस की उसके परे जाकर के ब्रह्म साक्षात्कार क्यों नहीं कर पाएंगे? तो तो हमको मतलब वो यदि जागतिक जगत में आपको इनोवेशन करनी है या तो फिर वो एक्सप्लोरेशन करनी है, ब्रेक थ्रू लाना है। दिस इज़ इनर वर्ल्ड में आपको ब्रेक थ्रू लाना है, डिस्कवरी करनी है, जर्नी करनी है। नथिंग फंडामेंटली डिफरेंट बिटवीन देम। दैट इज वन थिंग। सेकंड कि ये जो भारत देश जो है ना इवन जो रामकृष्ण मिशन जो है इट्स लाइक ए दिस ग्लोबल कंपनी मल्टीीनेशनल कंपनी कि सब तरह की माइंडसेट सब तरह की साधन पद्धतियां सब तरह की ये रेशियल प्रोफाइल यहां पे उपलब्ध है माने रिप्रेजेंटेड है। देखिए बाह्य दशा में
प्रश्न: आप अंतर्दशा, अर्धबाह्यदशा और बाह्यदशा के बारे में बात कर रहे थे। क्या ठाकुर या स्वामीजी बाह्यदशा में भी आनंद का अनुभव करते थे? स्वामीजी ने बाह्यदशा में इतनी मेहनत की कि उनका स्वास्थ्य खराब हो गया। इसके बावजूद वे कहते हैं कि मैं गरीबों की मदद करने के लिए बार-बार जन्म लेने को तैयार हूं। इसका मतलब है कि उन्हें उस दशा में भी आनंद की अनुभूति होती होगी।
आनंद की अनुभूति नहीं होती है वह नहीं है। बाह्य दशा में आनंद में इंटरप्शन होता है। इट इज लाइक के मेरे पास में 10 करोड़ का बैंक बैलेंस है और किसी के पास में बैंक बैलेंस बिल्कुल ज़ीरो है। तो अभी जिसके पास में 10 करोड़ का बैंक बैलेंस है वह सब समय गर्व अनुभव करेगा। वो ये सब बैक ये सब स्टेटम ऑफ ह साइकोलॉजी वो कि मैं करोड़पति हूं। मैं धनी हूं। मैं पॉपुलर हूं। मैं फेमस हूं। मैं पावरफुल हूं। उसके प्रत्येक बिहेवियर में वो एक गर्व जो है वह प्रगटित होगा। और जो गरीब है वह सब समय सहमासमा सा वो अपना सर नीचा करके झुका करके टेंशन में स्ट्रेस में रहेगा। प्रत्येक क्षण प्रत्येक बिहेवियर में उसकी गरीबाई प्रकट होगी और इसके प्रत्येक क्षण में प्रत्येक बिहेवियर में उसका यह जो गर्व है वह प्रकट होगा। किंतु मान लीजिए यह गरीब व्यक्ति और यह धनी व्यक्ति दोनों एक गाड़ी में बैठकर के जा रहे हैं। गाड़ी में एक्सीडेंट हुआ हट एक तो फॉर वन मोमेंट यह गरीब यह भूल जाएगा कि मैं गरीब हूं। यह धनी यह भूल जाएगा कि मैं धनी हूं। क्योंकि इतना बड़ा इंटरप्शन हुआ बैंक बैलेंस की बात ही सर से निकल जाएगी। तो वहां पे यह इंटरप्शन है। दैट इज व्हाट आई एम ट्राइंग टू से। अदरवाइज यह धनी का गर्व और गरीब का यह गरीबाई प्रत्येक सेकंड प्रत्येक बिहेवियर में वह प्रकट होगा। माने आप किसी पॉलिटिशियन को देखिए ना ऐसा छाती निकाल करके ऐसा ऐसा चलेगा किसी के साथ में धमकी देकर बात करेगा उसके तो बॉडीगार्ड है कौन क्या बिगाड़ लेने वाले हैं आप उसका प्रत्येक प्रत्येक बिहेवियर में उसका वो पावर प्रकटित होगा किंतु इसी आदमी के मुंह पे आप चांटा मारिए वो फॉर वन मोमेंट वो उसी तरह बिहेव करेगा जो गरीब मुंह गरीब आदमी के मुंह पे आप चांटा मारते हैं तो ये जगत हमको जब चांटा मारता है तो हम भूल जाते हैं फॉर वन मोमेंट कि मैं ब्रह्मज्ञानी हूं ना कि मैं आम आदमी हूं। देखिए मुझे एक बड़ा डिफिकल्ट डिसीजन क्या करना था पड़ा पता है अभी दो-ती महीने पहले अभी वो जो वहां की प्रिंसिपल मैडम है वो मुझे कहती है कि महाराज यह बच्चे अभी 18 साल के कुछ हो गए हैं तो क्या उनको हम यह डिस्चार्ज कर दें क्योंकि फिर नए बच्चे को भी तो लेना है ना और क्या है कि बिय्ड वन एज आप फिर उनको ट्रेन नहीं कर सकते हैं जो भी ट्रेन होना है वह छोटी उम्र में ही होना है 17 18 हो गए उसके बाद में जो है है आपको डीएल करना है। तो मैंने कहा यह तो उचित है। मने कहा कि एक डिस्चार्ज का एज फिक्स कर दीजिए। ऐसा आप मत रखिए। माने इनडेफिनेटली बच्चों को मत रखिए। एक डिस्चार्ज का एज ठीक कीजिए। 16 18 माने देखिए 12th के बाद में ये अपना ग्रेजुएशन अपना जो स्कूल सिस्टम है 12th के बाद में उसको डिस्चार्ज कर देते हैं। भले उसने पास किया ना किया स्कूल सिस्टम से वो निकल गया। तो वैसे ही वो 12th तक पहुंचने में 18 साल तक होता है बच्चा स्कूल में। तो यहां पे भी ऐसा रखिए अप टू 18 रखिए उसके बाद में उसको डिस्चार्ज कर दीजिए। तो फिर वह मुझे कहती है कि महाराज एक काम कीजिए यह अनाउंसमेंट आप ही कीजिए। जो जो मां आती है सब उनके सामने आप ही ये अनाउंसमेंट कीजिए। मैं नहीं करना चाहती क्योंकि यह जो मदर्स जो यहां पे आती है यहां पे जो कम्युनिटी उनको मिलता है इसलिए वह आती है जो सहानुभूति प्रेम जो मिलता है क्योंकि घर में ना इस तरह के बच्चे का और इनकी मां का कोई वैल्यू नहीं है। पल-पल अपमान का सामना करना पड़ता है। तो उससे बचने के लिए ये लोग यहां पे आते हैं। नहीं कि उनको कोई आशा है कि बच्चा ट्रेन होगा। अभी उनको भी पता चल गया है कि बियोंड वन पॉइंट कुछ नहीं जाना है। वे लोग सहानुभूति के लिए सिंपैथी के लिए यहां पे आते हैं। किंतु डिस्चार्ज करने की जो बात है आप ही कीजिए। आप भी कीजिए अनाउंस। तो मैंने सोचा मैं अभी तक ये अनाउंसमेंट किया नहीं है। मैं पोस्टपोन कर रहा हूं क्योंकि मैं भी समझ रहा हूं कि वो कह दें ये कहना कि अभी मत आओ। तो यू नो और ये भी है कि नए बच्चों को अपॉर्चुनिटी मिलनी चाहिए। अपनी तो कैपेसिटी लिमिटेड है जगह की भी और रिसोर्सेज की। सो दीज़ आर द डायलेमा वी आर फेसिंग हियर। हां ना ऐसा कर ही सकते हैं कि एक एलुमनाई एसोसिएशन जैसा कर सकते हैं। हमारी स्कूल है स्कूल में है इस तरह से एलुमिनाई एसोसिएशन तो सिंपली क्लीनिक का भी कर सकते हैं। लेट अस सी फॉर नाउ आई एम सिंपली पोस्टपोनिंग द डिसीजन। इज़िएस्ट वे आउट। क्योंकि क्या है एक्चुअली यदि इस तरह का कुछ करेंगे ना तो इसका बर्डन हमारे प्रिंसिपल मैडम पे ही पड़ेगा तो टू ऑर्गेनाइज द मीटिंग फिर वो फिर खाने पीने की व्यवस्था करनी होगी वो जो रेगुलर जो एडमिन ड्यूटी है उसमें से कुछ निकालना पड़ेगा सो शी विल हैव टू डिसाइड आई विल नॉट टेक डिसीजन फॉर दैट इफ शी कैन मैनेज देन इट इज ओके सो क्योंकि टीचर्स के ऊपर में ही तो सब पूरा बर्डन है वहां पे ओम