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Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : अवतरणिका || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 18 Apr 2025

prayer

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा कथित द्वितीय खंड साधक भाव उसकी अवतरणी का या तो फिर इंट्रोडक्शन यह हम पाठ पाठ कर रहे थे। कल

दैव और पुरुषार्थ के बारे में ठाकुर का मंतव्य

हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर हमको समझाते हैं कि दैव और पुरुषार्थ इन दोनों में किस तरह से सामंजस्य है। हमारे पास में ईश्वर ही पुरुषार्थ करने की शक्ति दे देते हैं और इस शक्ति का सहाय लेकर के यदि हम पुरुषार्थ सही दिशा में करें। ईश्वर प्राप्ति के लिए या तो फिर पुण्य कर्म करने में करें तो फिर ईश्वर हमारी शक्ति और बढ़ा देंगे। और यदि हम इसी पुरुषार्थ का इस्तेमाल कोई नेगेटिव कार्य में करें, बुरे कर्म में करें, पाप कर्म में करें, तो ईश्वर फिर हमारी शक्ति धीरे-धीरे करके कम कर देंगे। तो वह जो जितनी शक्ति ईश्वर ने हमें दी है इसको लेकर के कभी-कभी हम घमंड के मारे कहते हैं कि मैं तो अपनी इंडिविजुअलिटी या तो फिर अपना फ्री विल या तो फिर अपने खुद के बलबूते पे आगे बढ़ा हूं। बहुत सारे जो होते हैं अह खास करके अमेरिका में देखिए कि यह 20th सेंचुरी में कैलिफोर्निया खास करके वहां पे जितनी भी टेक कंपनीज़ है सिलिकॉन वैली आजकल जिसको कहा जाता है तो वहां पे इतनी सारी टेक कंपनीज़ एक के बाद एक वो स्टार्ट हुई और यह जितने भी स्टार्टअप फाउंडर्स थे वह सभी लोगों ने बिलियंस ऑफ डॉलर्स बना दिए सॉफ्टवेयर वगैरह लिख करके किंतु देखिए कि यह जो शक्ति उनको मिली है वह भी तो ईश्वर की ही देन है। वे लोग भले चाहे मुंह से कहते हो कि हम लोग अपनी खुद की मेहनत करके बिलियनर बने हैं ना किए फिर मिलियनर बने हैं। किंतु वो बिलियनर होने की शक्ति भी तो ईश्वर ने ही दी है। वह शक्ति का उन्होंने इस्तेमाल सही दिशा में किया तो उनको फिर वह फल मिल रहा है खाने को और फिर यदि आप गलत दिशा में करेंगे इस शक्ति का इस्तेमाल तो फिर वह उस तरह से बुरा फल मिलता। बहुत सारे लोगों को हम देखते हैं कि वो क्रिमिनल एक्टिविटी में वो कुछ ना कुछ करना शुरू कर देते हैं। एक बार मैंने दाऊद इब्राहिम की बायोग्राफी पढ़ी थी। मुंबई टू डोंगरी टू दुबई उसका टाइटल है। डोंगरी टू दुबई। वो डोंगरी बोल के मुंबई का वो एक सबर्ब है। वहां पे वो उसका बर्थ हुआ है। और फिर इंडिया में सब क्रिमिनल एक्टिविटी करके आखिर में दुबई भाग गया था। तो यह वो पढ़ा था मैंने। अभी देखिए कि उसके पास में टैलेंट है। वह बात की कोई यह नहीं है। किंतु टैलेंट का पूरा नेगेटिव इसने इस्तेमाल किया। तो अभी ईश्वर ने आपको जो टैलेंट दिया है पॉजिटिव डायरेक्शन में ले जाएंगे तो आप बिलियनर बन जाएंगे। अब नेगेटिव और फिर सिर्फ बिलियनियर होना बात वो नहीं है। देखिए कि आज सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री है, कंप्यूटर इंडस्ट्री है, सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री है, एरोस्पेस है, जेनेटिक्स है या तो फिर कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स है। इन सब ने इस जगत में कितना जो ई ऑफ लाइफ जिसको कहते हैं। यह मेडिकल एडवांस है। हमारा जीवन कितना सुखमय बनाया है। आज बहुत सारे इंडियंस जो पेरेंट्स होते हैं उनके लड़के विदेशों में रहते हैं। वहां पर जॉब करते हैं। तो मुझे याद है मैं छोटा था तो वो एक टेलीफोन हुआ करता था। तो वो टेलीफोन पे वो वायर वाला टेलीफोन जो पुराने ढंग का तो महीने में ना कि दो-तीन महीने में एक बार वहां विदेश से फोन आता था। तो सभी लोग टेलीफोन के पास में बैठे रहते थे। फिर फोन आएगा तो सब एक के बाद एक बात करेंगे। तो वह दो-ती महीने में एक बार बात होती थी तो ऐसा लगता था चलो भाई अपने इतने दूर रहते हैं स्वजन तो उनके साथ में आज हमको कुछ बात करने का मौका मिला। इससे पहले सिर्फ पत्र व्यवहार से ही हमको संतोष मान लेना पड़ता था। आज अभी WhatsApp है, यह Facebook है, जो सोशल मीडिया अह जो टूल्स है, आप इंस्टेंटली कभी भी 24 आवर्स उनके साथ में कनेक्टेड रह सकते हैं। सो अपनी टैलेंट का सदुपयोग करें तो देखिए कि आपको पुण्य प्राप्त होगा, दुरुपयोग करें तो आपको पाप कर्म में डूबना पड़ेगा। फिर उसका जो नेक्स्ट जन्म होगा इस जन्म में तो पाप कर्म करके हमको लगता है कि हम बड़े चतुर हैं। दूसरे लोग मूर्ख हैं जो कि गरीबी में रहते हैं या तो फिर साधारण मिडिल क्लास की तरह रहते हैं। यदि हम उनको पाप का रास्ता दिखाएं तो भी वह स्वीकार नहीं करते। उनको मूर्खों को यह समझ में नहीं आता कि थोड़ा सा गलत काम करने से हमको इतना सारा रुपया मिलता है। सही काम करने से आपको क्या मिलता है? तो फिर किंतु देखिए कि जो लोग सही काम करके मिडिल क्लास ही रह गए या तो फिर इस जगत में ज्यादा कुछ ना हो पाया उनका किंतु नेक्स्ट जन्म है वह वैसे ठीक ही रहेगा। कोई बुरा नहीं होने वाला है। अच्छा ही होगा। और जबकि यह जिन लोगों ने दुराचार करके अत्याचार करके या तो फिर मिथ्याचार करके यदि पैसा कमा लिया इस जन्म में तो उनको ऐसा लगेगा कि हां हम लोग बड़े चतुर हैं। दूसरे लोग झूठ-मूठ की नीतिमत्ता की बातें करते हैं। ऑनेस्टी इंटीग्रिटी की बातें करते हैं। जबकि मैं बड़ा चतुर हूं। कैसे भी करके मैं रुपया बना दे रहा हूं। तो इस जन्म में तो आनंद होगा। किंतु नेक्स्ट जन्म में देखिए फिर जितना भी पाप कर्म किया है उस सबको आपकी दुर्गति जो है वह नेक्स्ट जन्म में पता चलेगी। अभी क्या है कि नो डाउट हम हिंदू लोग इस तरह से मानते हैं। बहुत सारे धर्म होते हैं जो कि अगले जन्म को स्वीकार भी नहीं करते। किंतु फिर वहां पे फिर स्वर्ग और नर्क का कांसेप्ट होता है। हेल एंड हेवन होता है। यदि आप अच्छा कर्म करेंगे, पुण्य कर्म करेंगे तो आप हेवन में जाएंगे, स्वर्ग में जाएंगे और यदि दुष्कर्म करेंगे, पाप कर्म करेंगे तो हेल में जाएंगे, नर्क में जाएंगे। तो आइदर आपका दूसरा जन्म होने वाला है जो कि अच्छा जन्म होगा या तो दूसरा जन्म बुरा होगा या तो फिर आप स्वर्ग में जाए कि नर्क में जाए। कोई भी फिलॉसोफी को आप पकड़िए। सभी धर्म आपको एक ही बात कहेंगे कि अच्छे कर्म का परिणाम अच्छा होता है। बुरे कर्म का परिणाम बुरा होता है। तो हमारे यहां पे किंतु यह फिलॉसोफी थोड़ा सा ज्यादा सोफिस्टिकेटेड है। हम लोग कहते हैं कि अच्छा कर्म का अच्छा परिणाम का अर्थ क्या है? जो धर्म में स्वर्ग की कल्पना की गई है। वहां पर ऐसा कहा जाएगा कि वहां पर बड़ा ही सुंदर महल में रहने को मिलेगा। बहुत सारे भोग विलास करने को मिलेंगे। बहुत सारी वहां पे खाद्य पदार्थ इंद्रिय सुख के पदार्थ रहेंगे। बड़ा आनंद से समय बीतेगा। इस तरह के स्वर्ग की वे लोग कल्पना करते हैं। हम लोग जो है थोड़ा सा सोफिस्टिकेटेड है। हम लोग कहते हैं कि देखिए यदि अच्छा कर्म करेंगे तो ईश्वर हमको और ज्यादा शक्ति देंगे। पृथ्वी पर ही और ज्यादा शक्ति पाकर के हमारे पास में और ज्यादा अच्छे कर्म करने का वह एक ऑप्शन है। और पता नहीं करते-करते अच्छे कर्म करते-करते सोसाइटी को कुछ पॉजिटिव कंट्रीब्यूट करते-करते एकाएक आध्यात्मिकता का नशा लग गया और फिर बस वो फिर ईश्वर चिंतन ईश्वर प्राप्ति के विचार सद ग्रंथ पाठ फिर यह तीर्थ यात्रा यह रिट्रीट अटेंड करना किसी भी आश्रम में मंदिर में नियमित जाना यह सब एक बार सात्विक सब हैबिट लग गई तो फिर वो हमको जन्म जन्मांतर की यह हमारी यात्रा रहा है। उससे हमको छोड़कर के ठाकुर क्या कहते हैं? किसान यदि चाहता है तो गाय के गले में जो रस्सी बांधी है वह रस्सी छोड़ देगा। यानी कि गाय को संपूर्ण रूप से मुक्त कर देगा। यह मां काली जो इतनी सारी पतंग जगाती है, काइट्स उड़ाती है, उसमें से एक दो काइट को काट करके एक दो पतंगों को काट करके वह कैसे हाथ ताली बजाती है, तो वैसे ही हम लोगों को भी यदि एक जन्म में आध्यात्मिकता की अच्छी हैबिट लग गई, तो फिर वह सीधा हमको मुक्ति के मार्ग की ओर ले जाएगा। तो, यह हमारी कल्पना है। वि इज मोर सोफिस्टिकेटेड देन द कांसेप्ट ऑफ हेवन। अपने यहां पर भी स्वर्ग है। किंतु अपने यहां पर कहते हैं ना क्षण पुण्य मर्त्य लोके विषती यानी कि यदि पुण्य कर्म अच्छा हमने किया है तो पुण्य कर्म का भोग करने के लिए हम स्वर्ग में जाएंगे। किंतु यह पुण्य कर्म जैसे ही एग्जॉस्ट हो गए वैसे ही पृथ्वी पर आ जाएंगे और फिर मुक्ति के लिए हमको प्रयास करना होगा। यानी कि स्वर्ग भी यदि है तो वह इंपरमानेंट है। वह क्षणिक भर के लिए है। जो परमानेंट है वह है मुक्ति या तो फिर मोक्ष। तो मोक्ष के लिए प्रयास करना है। नहीं कि स्वर्ग के लिए। यह स्वामी जी कहते हैं कि अमेरिका में वह जो बॉम्ब शेल स्टेटमेंट देते थे ना तो स्वामी जी कहते हैं कि इवन कि मुक्ति स्वर्ग की इच्छा भी पाप है। स्वर्ग की इच्छा करना भी पाप है। तो वहां पर लोग बड़े आश्चर्यचकित हो जाते थे। बचपन से यही सुना है कि हमको हेवन में जाना है। वहां पर हमको रहना है। आनंद मनाना है। और यहां पर स्वामी जी कहते हैं कि इवन स्वर्ग की भी कामना मत करो। तो क्या है जीवन का अल्टीमेट उद्देश्य? इट इज समथिंग वि इज बिय्ड स्वर्ग। हेवन या तो स्वर्ग के भी परे है मुक्ति या तो फिर मोक्ष। मोक्ष की कामना करो नहीं कि स्वर्ग की कामना। तो यह पूरा जो था हमने डिस्कस कल किया था। अभी और एक नया पॉइंट आज देखते हैं। गंभीर शरद महाराज शारदानंद जी महाराज क्या कहते हैं?

मानव की अपूर्णता स्वीकार करके अवतार पुरुष मुक्ति का मार्ग खोजते है

मानवे असंपर्णता स्वीकार करिया अवतार पुरुष मुक्ति पथ आविष्कार करा मनुष्य की असंपता को स्वीकार करके अवतार पुरुष मुक्ति का पथ आविष्कार करते हैं डिस्कवर करते हैं। देखिए यदि भगवान विष्णु अपने सही स्वरूप में पृथ्वी पर आएंगे तो फिर उनको मुक्ति प्राप्त करने के लिए ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं है। मां वह बस वह जैसे ही वह ठाकुर की तरह बाद बात बाद में जब ठाकुर सिद्ध हो गए थे उस समय की बात जैसे ही जपमा माला हाथ में ली वैसे ही समाधि में चले गए जब भी नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि जप माला उसी से इतना उद्दीपन होता है वो एक कहा ठाकुर एक बात कहते हैं कोई एक गांव से जा रहा था किसी ने कहा कि इस गांव के मिट्टी में से ना कि कहां में से वो खोल तैयार होता है तो जैसे ही वह यह सुना कि उद्दीपन हो गया खोल तैयार होता है यहां के कुछ पदार्थ ार्थों में से कौन सा भूल गया मैं? तो वह अभी यह खोल जो है वह चैतन्य देव के कीर्तन में काम लगता है। चैतन्य देव का कीर्तन करते-करते भाव और समाधि होते हैं। तो ऐसा उद्दीपन हो गया कि सीधा वह समाधि में चला गया। तो इसलिए जो अवतार पुरुष अपनी या तो नारायण स्वयं पूरी शक्ति के साथ में जन्म ग्रहण करेंगे तो फिर उनको मुक्ति का रास्ता तो उनके लिए बड़ा ही सहज हो जाएगा। किंतु फिर क्या है ना कि वह जो उनका मुक्ति का रास्ता है हम जनसाधारण के लिए नहीं है। हम जनसाधारण को तो चाहिए कि हम जो हमारा मन जो है रजस और तमस का प्राधान्य है हमारे मन में। अवतार यदि शुद्ध रूप से जन्म ग्रहण करते जिनमें कि सत्व का प्राधान्य 100% होता और वह सत्व के प्राधान्य से वह साधना करते वो मुझे किस काम की है? मुझे तो उस साधना से कोई मैं अपने को तो रिलेट भी नहीं कर पाऊंगा। कहते हैं आज जन्म 100% ब्रह्मचर्य पालन करो। जैसे ही आंख बंद करोगे तो सिद्धि समाधि लग जाएगी। जैसे ही गुरु के मुख से यह महावाक्य श्रवण करोगे तत्वमसी श्वेत के तो या तो फिर अहम ब्रह्मास्मि तो प्रज्ञानम ब्रह्म। इस तरह से कुछ गुरु के मुंह से जैसे ही महावाक्य सुना बस वैसे ही लग गई समाधि वैसे ही हो गया ब्रह्म ज्ञान। किंतु प्रॉब्लम यह है कि यह 100% ब्रह्मचर्य पालन करना। मन के भीतर में किसी भी तरह का विकार जन्म नहीं लेने देना। संपूर्ण रूप से काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह यह जो मत्सर षडरिपु है या तो फिर अष्टपाश है। अपने मन में तनिक भी उसको जगह नहीं देना। यह तो नहीं हो सकता है। मैं तो आम आदमी हूं। आम आदमी की तरह स्ट्रगल करता हूं। तो फिर जैसे ही महावाक्य सुना वैसे ही समाधि लग गई वैसे ही ब्रह्म ज्ञान हो गया। इस तरह की साधना मुझे किस काम की है? मुझे तो उस तरह की साधना चाहिए। इस तरह के व्यक्ति को मुझे देखना है जो कि मेरी तरह ही उसके मन में तमस रजस का प्राधान्य था। ऐसा नहीं है कि सत्व नहीं है। हम लोगों में जितने भी भक्त हैं हम लोगों में सभी में थोड़ा बहुत सत्व है। बोल कर के ही तो हम ठाकुर के पास आए हैं। किंतु तमस और राजस का प्राधान्य है। यह तो हमको स्वीकार करना पड़ेगा। तो जिन जिस साधक के भीतर में तमस और रजस का प्राधान्य है वह किस तरह से साधना करके सिद्धि प्राप्त करें वह मुझे देखना है। उसी के पास में से तो मैं सीख पाऊंगा ना जो सत्वप्रधान है वह जैसे ही आंख बंद करेगा जैसे ही ईश्वर का नाम पुकारेगा वैसे ही उसको दर्शन होना शुरू शुरू हो जाएंगे। वैसे ही उसको समाधि लगनी शुरू हो जाएगी। अश्रु कंपलक होने लगेगा। वह भाव महाभाव का उदय होगा। तो यह देखकर के इनके प्रति मेरी श्रद्धा तो होंगी किंतु मैं उनका अनुसरण नहीं कर पाऊंगा। बोलकर के ही जब नारायण मनुष्य देह धारण करके पृथ्वी पर अवतरण करते हैं। वैसे तो वह होते हैं सत्व प्रधान ही किंतु फिर भी उनके भीतर में तमस और रजस का एक अंश रह जाता है। जो मां की कहानी है कि पहले तो ब्रह्मा जी ने चार कुमारों को जन्म दिया। सोचा कि सृष्टि का प्रारंभ करेंगे। किंतु ये सनद, सनंदन, सुकुमार जो भी चार कुमार है उनको पहले से ही समझ में आ गया था कि यह जगत मिथ्या है। ब्रह्म सत्य है। पहले से ही ब्रह्मचर्य और तपस्या करके उन्होंने कुछ ही समय में ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके इस लोक में से चल बसे। तब ब्रह्मा जी ने सोचा, इस तरह से तो सृष्टि होगी नहीं। इतने शुद्ध, पवित्र लोगों को यदि जन्म देंगे, तो सृष्टि कैसे चलेगी?" फिर उन्होंने 12 प्रजापतियों को जन्म दिया और यह फिर 12 प्रजापति ने धीरे-धीरे करके संसार का प्रारंभ किया। तो हम लोग तो वो प्रजापति की संतानें नहीं की वो चार कुमारों की तो हमारे भीतर में वो रजस तमस का प्राधान्य होना ही होना है। तो हम लोगों के लिए जो है कि देखिए अवतार या तो ठाकुर यह 100% परफेक्ट नहीं थे। इस बात के हमारे पास में यथेष्ठ प्रमाण है। एक बार ठाकुर ने कहा था कि वह पंचवटी के नीचे में उनके मन में एकाएक विकार का जन्म हुआ या तो फिर ऐसा लगा उनको कि मेरे मन में विकार प्रकट होने वाला है। ऐसा उनको एक अंदेशा हुआ। संदेह हुआ। साथ-साथ में ही उन्होंने मां जगदंबा को प्रार्थना करते क्या कहा कि मां यदि मेरे मन में विकार प्रकट होगा तो यह छुरी मैं अपने गले में मार दूंगा। फिर मैं इस देह को नहीं रखूंगा। देखिए यह दृढ़ प्रतिज्ञा जब ठाकुर करते थे तो वह हम तो इतना तो मैं उनसे सीख सकता हूं कि मेरे मन में भी यदि जब भी विकार प्रकट होता है तो मैं भी अभी मेरे मेरे में इतना साहस नहीं है कि मैं अपने गले में छुरी मार दूं। किंतु आई नीड टू डिवाइस सम पनिशमेंट फॉर मायसेल्फ कि चलो इस दिन जिस दिन मेरे मन में इस तरह का विकार प्रकट हुआ है उस दिन मैं आधा घंटा ज्यादा बैठकर के जप करूंगा। हो सकता है 1000 जप एक्स्ट्रा करूं या तो फिर उस दिन में खाना ना खाऊं या तो फिर उस दिन में थोड़ा ज्यादा स्वाध्याय करूं। इस तरह का एक डिसिप्लिनरी एक्शन जिसको कहते हैं वह तो मैं डिवाइस कर सकता हूं। अभी यह डिसिप्लिनरी एक्शन तैयार करना जब भी मेरे मन में विकार होता है। यह मैंने कहां से सीखा? जो कि शुद्ध सत नारायण स्वयं पृथ्वी पर आते हैं तो उनके मन में कोई विकार प्रकट होता ही नहीं। उनको हमको यह सिखाने की जरूरत होती ही नहीं कि विकार प्रकट होने से अपने को डिसिप्लिन करना है। यह बात ना ही उनके जीवन में हमको पढ़ने को मिलती ना ही मैं यह सीखता। तो होता क्या? जब भी मेरे मन में विकार प्रकट होता है, मैं विकार का वशवर्ती होकर के जैसे कि मेरा मन मुझे गुलाम की तरह नचा रहा है, इस तरह का आचरण करने लगता। मुझे यह समझ में ही नहीं आता कि मुझे अभी इस परिस्थिति से इस विष चक्र से कैसे छूटना है। वरना तो अभी विकार आया, मैं उसका वश हो गया। जैसे ही वश हो गया तो मेरी जो संकल्प शक्ति है, विल पावर है, कमजोर हुआ। नेक्स्ट टाइम जब विकार प्रकट होगा तो यह कमजोर संकल्प शक्ति और ज्यादा ईजीली उसके कंट्रोल में आ जाएगी। फिर माने यह विषमय चक्र चालू रहेगा। किंतु एक बार मैंने अवतार के जीवन में देख लिया कि ठाकुर इस तरह से अपना देह प्राण त्याग करने तक का संकल्प कर दे रहे हैं। तो आई कैन लर्न ए लिटल फ्रॉम दिस कि मैं अपने गले में छोरी नहीं मार सकता। वह साहस मेरे में नहीं है। किंतु और कोई माइल्ड पनिशमेंट है व्हिच आई नीड टू डिवाइस फॉर मायसेल्फ। और ऐसा करके करके मैं अपनी संकल्प शक्ति को दृढ़ से दृढ़तर बनाता जाऊंगा। फिर यह वर्चुअस साइकिल हो जाएगी। एक पॉजिटिव फूड फीडबैक लूप हो जाएगी। अभी इस बार मैंने अपने संकल्प शक्ति को थोड़ा सा दृढ़ीभूत किया। थोड़ा सा स्ट्रांग किया। अभी नेक्स्ट टाइम जब विकार होगा तो पहले से ही मैं तैयार होकर के बैठा हूं। विकार मैं 100% मन से दूर नहीं कर पाऊंगा। किंतु उसका सामना करते-करते मेरी संकल्प शक्ति विल पावर और थोड़ा सा स्ट्रेंथन होगा। अभी नेक्स्ट टाइम और स्ट्रेंथन होगा। दिस वर्चुअस साइकिल वो स्टार्ट हो जाएगी। तो यह सब कुछ तो हमको अवतार के जीवन से सीखना है ना। और कोई आम आदमी आकर के मुझे कुछ बोलेगा कि अच्छा भाई मैं तुमको एक बहुत अच्छा रास्ता दिखाता हूं। देखिए मोटिवेशनल स्पीकर की आज कमी नहीं है। YouTube खोलेंगे या तो पेपर में एडवर्टाइज देखेंगे। 1000 मोटिवेशनल स्पीकर है। आपको उपदेश देने के लिए तैयार है। किंतु इन लोगों को कौन इतना सीरियसली लेता है? यह लोग हजार चीजें बोलते रहेंगे। हम सुनेंगे भी सही। किंतु ऐसा नहीं है कि हम लोग इनकी बात सुनकर के अपना लाइफ ट्रांसफॉर्म करें। सुन लिया अच्छा लगा और फिर भूल गए। एक कान में से गया दूसरे कान में से निकल गया। तो ऐसा यह ज्यादातर मोटिवेशनल स्पीकर के साथ में होता है। किंतु ठाकुर की तो बात ही अलग है। ठाकुर को देखकर के हमको एक भरोसा मिलता है। अवतार पुरुष को देखकर के मन में एक सध्यारा मिलता है कि यदि इनकी सलाह का जैसे ठाकुर ने कहा कि आमी 16 टांग को तोरा एक टांग को मैंने 16 आना किया है तुम लोग एक आना करो। इतना यदि एक आनाक भी मैं यदि करूंगा उसका पालन तो फिर मेरा जीवन तो धन्य हो जाएगा। लेट मी ट्रांसफॉर्म माय लाइफ। यह सध्यारा मिलेगा। मैं अपने जीवन को ट्रांसफॉर्म करने का प्रयास करूंगा। तो अभी यह पूरा जो पॉइंट है इसको यहां पर शरद महाराज डिस्कस करते हैं। कहते हैं कि मनुष्यता मनुष्य की असंपर्णता को स्वीकार करके अवतार पुरुष मुक्ति का नया रास्ता डिस्कवर करते हैं। खोज निकालते हैं। आविष्कार करते हैं। हमारी असंपर्णताएं उनमें है। रजस और तमस का एक अंश उनमें है। और इस अंश को इस अंश के ऊपर में किस तरह से विजय प्राप्त किया जाए। इस अंश को किस तरह से पराजित किया जाए और साधन भजन में एक्सेल हुआ जाए। साधन भजन में सर्वश्रेष्ठ आसन ग्रहण किया जाए वो हमको वो अवतार बताते हैं। क्या लिखते हैं महाराज? नरोदे धारण कोरिया नरोब तो लीलाए अवतार पुरुष दग के आमादग न्याय अनेकांश दृष्टिहीनता अल्पज्ञता प्रवृत्ति अनुभव करते होय नर देह धारण करके नरवत लीला में अवतार पुरुष को हमारी तरह ही बहुत अंश तक दृष्टिहीनता और अल्पज्ञता वगैरह का अनुभव करना होगा। अब यह दृष्टिहीनता का अर्थ क्या है? अंधा होना माने लिटरली अंधा होना ऐसा नहीं। बहुत बार हम लोग जो एक्शन लेते हैं, जो कार्य करते हैं, उसका क्सकुएंस क्या होगा? उसका परिणाम क्या होगा? वह हमको समझ नहीं आ रहा है। अभी जैसे ठाकुर का ही देखिए कि अभी हम लोग पहले तो हमारा ही उदाहरण परीक्षा आ रही है सामने और मैं पढ़ाई लिखाई नहीं करता हूं। कहीं ना कहीं अपने मित्रों के साथ में भाग जा रहा हूं। कुछ मूवी देखने के लिए या तो फिर ऐसा कुछ ना कुछ करने के लिए। अभी परीक्षा में अच्छे नंबर नहीं आए। पूरा करियर जो है वो चौपट हो गया। अभी यह मेरी बुद्धिहीनता है। मेरी अंध म इसको कहेंगे कि अल्पदृष्टि है। जो कि मुझे समझ में नहीं आने देती कि देखो जब परीक्षा होती है कैसे भी करके हार्ड वर्क करके हमको कार्य कर लेना है। जो दो

दो किसानों की कहानी: मेहनत करने का फल

किसानों की कहानी हमको ठाकुर बताते हैं कि एक अभी वो बारिश का समय आ रहा है। वह जो नहर जा कैनाल जो पास में से जा रही है उस नदी में से एक कैनाल बनाना होगा जिससे कि उनके खेत में पानी आए। तो दो किसान है एक दोनों किसान कैनाल बना रहे हैं। वो ग जमीन में खोदते-खोदते खुदाई करते-करते। अभी एक किसान है कि दो पर हो गया। सूरज सर के ऊपर आ गया। वह सोचता है अभी मैं कल नहर बनाऊंगा। अभी आज मैं चला जाता हूं घर। खाने का टाइम हो गया है। बोल करके वह घर चला जाता है। गरम-गरम रोटी खाता है। दोपहर को विश्राम करता है। अभी हुआ ऐसा कि उसकी कैनल या तो नहर उस दिन तो ना बनी। हो सकता है दूसरे दिन कुछ झड़ वृष्टि आ जाए तो दूसरे दिन भी ना बने। तीसरे दिन और कुछ हो गया तो तीसरे दिन भी ना बने। बोल के बारिश का सीजन आ गया बोल के जब नहर बनेगी ही नहीं तो क्या होगा कि उसका जो क्रॉप है उसका जो पाक है, फसल है वह नष्ट हो जाएगी। जबकि जो दूसरा वाला किसान है वह जब दोपहर होगी तभी वह सोचता है कि नहीं जब वह कैनाल खोदने का कार्य स्टार्ट किया ही है तो खुदाई करके कैनाल को अपने खेत तक ले ही जाना है आज चाहे कुछ भी हो जाए तो अभी वह रात तक परिश्रम करता रहा पानी उसके खेत तक आ गया तब कहीं जाकर के वह अपने घर गया बीवी को कहता है अभी वह तुम लग शरीर पर लगाने के लिए तेल दो फिर स्नान करके वह खाना खाने को बैठेगा अभी देखिए देखिए उस दिन उसने परिश्रम करके पानी खेत तक ले आया। उसके बाद में नेक्स्ट डे कोई भी व्यवधान आए परसों दिन कोई भी व्यवधान आए उसके बाद तो उसको कोई फर्क नहीं पड़ता। उसने अपना कार्य कर लिया है। उसकी वो दूरदृष्टि थी। जबकि वह दूसरा किसान था। वह शॉर्ट साइटेड था। उसको यह समझ में नहीं आया कि भविष्य में मेरी जो आज की एक्शन है, उसका कंजिकुंस क्या है? उसका परिणाम क्या है? यह जो बड़े-बड़े युद्ध होते हैं, उसमें क्या होता है? सभी लोग शॉर्ट साइटेड सोचते हैं। जो कि वेपंस मैन्युफैक्चरर होते हैं उनको बड़ा आनंद आता है। युद्ध होगा तो हमारे शस्त्र बिकेंगे। पॉलिटिशियन होते हैं उनको भी आनंद आता है। जब युद्ध होगा तो क्या है कि गवर्नमेंट की पॉपुलैरिटी बढ़ जाती है। तो नेक्स्ट इलेक्शन में हम लोग जीत जाएंगे। पॉपुलेशन में भी कभी-कभी वो जो ये फैल जाता है वो मेनिया एक तरह का वॉर मेनिया कि हां मारो शत्रुओं को मारो करो हमला। किंतु जब एक्चुअल युद्ध शुरू होगा और फिर जो खुनामरकी होगी, ब्लैक आउट होगा, ब्लैक मार्केट होगा, इकोनमी टूट जाएगी तब सभी लोग पछताएंगे। तब वह लोग और फिर क्या है? तब पूरे दुनिया भर को दोष देंगे। वह अपने को दोष नहीं देंगे। यह नहीं सोचेंगे कि भाई हमारी शॉर्ट साइटेडनेस की वजह से यह युद्ध स्टार्ट हुआ है। तो यह शॉर्ट साइटेडनेस के बहुत सारे एग्जांपल हमको दिखते हैं। अभी नेचुरली ठाकुर में हमारी तरह क्रिमिनल शॉर्ट साइटेडनेस तो नहीं था किंतु अल्प मात्रा में तो शॉर्ट साइटेडनेस तो था ही था। उसका एक उदाहरण हमको पता है कि वह जो 1885 1885 के ग्रीष्म महीने में जब गर्मी बहुत पड़ रही थी तो बहुत सारे लोग ठाकुर के लिए वह ठंडा शरबत ना कि बर्फ लाकर के देते थे और ठाकुर बड़े आनंद के साथ में उसको खाते थे। किंतु फिर जब गले का रोग प्रारंभ हुआ तो ठाकुर रोते-रोते मां को कहते हैं कि मां अभी मैं फिर से बर्फ नहीं खाऊंगा। तुम मेरे गले का रोग मिटा दो। तो अभी क्या है कि देखिए हमारी शॉर्ट साइटेडनेस और ठाकुर की शॉर्ट साइटेडनेस इन दोनों को कंपेयर करने का कोई अर्थ नहीं है। वो कहां आसमान जमीन का डिफरेंस है। किंतु देखिए कि एक उदाहरण तो हमको उनके जीवन में ऐसा मिला कि जिससे हम हमको एक सध्या रहा हो कि उन्होंने जो तपस्या की है उसका मेरे जीवन में कुछ रिलेवेंस है। यदि ठाकुर 100% परफेक्ट होते हैं तो उनकी तपस्या का मेरे साथ में कोई रिलेवेंस ही नहीं होता। मेरा मैं उनसे क्या सीखूंगा? मेरे जीवन में कामिनी कांचन से मेरा मन भरा हुआ है। क्रोध ये जो सब ये जो घृणा ये सब विकार मेरे मन में भरे हुए हैं। छोटी-छोटी बातों में मुझे बुरा लग जाता है। थोड़ा सा भी कोई मेरी प्रशंसा करता है तो घमंड जागृत हो जाता है। कोई मेरे से कमजोर होता है तो उसका शोषण करने की वृत्ति जागृत हो जाती है। कोई मेरे से ज्यादा श्रेष्ठ कार्य करता है तो उसको सराहने की बजाय उसके प्रति मेरे मन में ईर्ष्या का उद्भव होता है। अभी इस तरह का कचरा मैं अपने मन में भर करके आध्यात्मिक जीवन में आया हूं। और फिर मैं देखूंगा कि ठाकुर के जीवन में एक 1% भी ब्लेमिश नहीं है। 1% भी असंपूर्णता नहीं है। तो फिर उनकी साधना का मेरे साथ में कोई रिलेवेंस नहीं रहेगा। यह जो अद्वैत विज्ञान जो है ये ज्ञान मार्ग है वो मेरे लिए संपूर्ण रूप से पहले से ही बंद हो जाएगा। भक्ति मार्ग अच्छा है मेरे लिए कि चलो ठाकुर के शरणागत हो जाओ तो उसी से सब हो गया। किंतु देखिए शरद महाराज स्पष्ट रूप से कहते हैं ठाकुर हमको शरणागति और पुरुषार्थ श्रद्धा और तपस्या दोनों सिखाने को आए हैं। सिर्फ एक बात सिखाने के लिए नहीं। हम लोग हिंदू धर्म में इस तरह का क्लेम कभी नहीं करते कि जो ईश्वर के अवतार हैं वह संपूर्ण है। उनके प्रति सिर्फ श्रद्धा भक्ति ही रखनी है और कुछ नहीं करना है। देखिए कि वैष्णव धर्म के सर्वोच्च इष्ट भगवान कृष्ण उन्होंने भी हमको तपस्या करने के लिए गीता में उपदेश दिया है। तो यदि वो तपस्या का कोई आवश्यकता ही नहीं रहता। भगवान कृष्ण गीता लिखेंगे ही क्यों? वो गीता उनके श्री मुख से प्रकट होगी ही क्यों? श्रीमद् भागवत ही इनफ है। उनके प्रति श्रद्धा शरणागति रखो। हो गया। गीता तो देखिए कि उसमें ज्ञान की कितनी सारी बातें हैं। तो गीता का कोई प्रयोजन ही नहीं रहता। यदि हमको तपस्या करने की आवश्यकता ना होती। तो इसलिए यहां पे लिखा है दृष्टिहीनता। दृष्टिहीनता बेसिकली मींस शॉर्ट साइटेडनेस। या तो फिर अल्पदृष्टि। फिर यहां पे लिखा है अल्पज्ञता। ज्ञान जिनका ज्ञान अल्प है इनको कहते हैं अल्पज्ञता। अभी देखिए कि हमको तो पता है ठाकुर तो थे निरक्षर। उसमें भी जब मास्टर महाशय वह जमीन के ऊपर में वह जो पृथ्वी और वह चांद दौड़ करके ड्रॉ करके दिखा रहे हैं कि किस तरह से चांद के गुरुत्वाकर्षण से पृथ्वी पर यह भरती ओठ आती है तो ठाकुर इमीडिएटली कहते हैं थाक थाक हमारा माथा टन टन को रहने दो रहने दो मेरा सर घूम रहा है या तो फिर मेरे सर में कोई हथौड़ा मार रहा हो ऐसा लग रहा है तो वो एक दूसरा हमको सदियारा मिलता है कि मेरी भी बुद्धि अल्प है मैंने भी तो कोई विज्ञान विज्ञान में कोई बहुत बड़ा तीर नहीं मार लिया है। अल्प बुद्धि लेकर के ही हम ठाकुर के पास में आए हैं। और उसमें भी लाटू महाराज जैसे उनके सेवक को देखा तो और भी ज्यादा हमको सध्यारा मिला। अभी ठाकुर स्वयं निरक्षर और

कहानी: श्री रामकृष्ण स्वामी अद्भुतानन्द को अक्षर ज्ञान सीखा रहे है

फिर वो और भी निरक्षर लाटू महाराज को अक्षर ज्ञान सिखा रहे हैं। ठाकुर कहते हैं बोल क तो लाटू महाराज कहते हैं का। ठाकुर कहते हैं अरे नहीं रे का नहीं क। तो लाटू महाराज फिर से कहते हैं का? तो ठाकुर नाराज होकर कहते हैं अरे तुम ये तो क को ही का बोलोगे तो का को और क्या बोलोगे तो रहने दो तुमको पढ़ाई लिखाई करने की जरूरत नहीं है तो ये सिर्फ सेवा के माध्यम से सिर्फ शरणागति के माध्यम से लाटू महाराज ने ईश्वर ज्ञान ब्रह्म साक्षात्कार प्राप्त किया वो भरोसा हमको है। ठाकुर खुद कोई ऐसे बहुत अभी देखिए ठाकुर की सब अवस्थाएं अलग-अलग होती थी। बाह्य दशा में वो वार्तालाप करते थे। भक्तों के साथ में अर्धबाह्य दशा में वो नृत्य कीर्तन करते थे। मत्त होकर के अंतर्दशा में वह समाधिस्थ हो जाते थे। कभी पंडितों के साथ में वार्तालाप करते हैं। कभी बालकवत व्यवहार करते हैं। तो यह सब ठाकुर की विभिन्न अवस्थाएं थी। ठाकुर जैसे कहते हैं जीहवा पर जब सरस्वती का वास होता है तो मां रास फैले दे। अर्थात कि मां जो शब्दों का भंडो है वह हमारे जीहवा के ऊपर में ढाल देती है। पंडित के भी साथ में जब बात करेंगे तो पंडित भी महामूरख हो जाएगा उनके सामने। वो भी उसका भी वाणी बंद हो जाएगा। तो ठाकुर में वो सब था। किंतु जागतिक दृष्टि से देखें कि बहुत बार हमको ठाकुर के भीतर में इस तरह की विज्ञान है, नेचुरल वर्ल्ड है। उनके प्रति अल्पज्ञता देखने को मिलती है। 1% 2% बट इट इज देयर जो कि हमको सध्यारा देती है कि हां फिर हमारे लिए भी एक रास्ता है। तो इसलिए यहां पर कहते हैं शरद महाराज कि नर देह धारण करके नरवत लीला में अवतार पुरुष को हमारी तरह ही बहुत अंश तक दृष्टिहीनता और अल्पज्ञता वगैरह अनुभव करते करनी होती है। ताहा दग न्याय उद्यम करिया ताहा दग के ओ शकले होते मुक्त कर बार पथ आविष्कार करते होय एवं जतो दिन ना ओ पथ आविष्कृत होय ततो दिन तहा दग अंतरे निज देव स्वरूप आभास कखनो कखनो अल्प खण जन उदित होइले ओ उहा आभार प्रक्षन्न होइया पड़े हमारे तरह ही उनको उद्यम करके मेहनत करके पुरुषार्थ करके इस अल्पज्ञता और दृष्टिहीनता के हाथों में से मुक्ति पाने का रास्ता खोजना पड़ता है। और जितने दिन तक इस रास्ते का आविष्कार नहीं होता है। यह रास्ता उनको नहीं मिलता है। उतने दिन तक उनके अंतर में भी उनका जो देव स्वरूप है उसका आभास कभी-कभी अल्प क्षण के लिए उदित होकर के भी थोड़ी ही देर के बाद में फिर से वह ढक जाता है। कभी-कभी उनको ऐसा लगता है मां कहती है ना कि मैं मैं तो कौन हूं वही वह राम चाटुज्य की राम चाटुज्य में जो मैं वही वो राम राम चाट उनकी बिटिया थी उनकी लड़की थी और वही मैं गांव में घुमा करती थी। आज इतने बड़े लोग आकर के मुझे प्रणाम करते हैं। अभी जिज्ञासा कोरी क्यों वकील क्यों वो हकीम? मैं जब पूछती हूं तो कोई कहता है कोई कोई वकील है तो कोई हाकिम यानी कि डॉक्टर है। तो यह वकील डॉक्टर ऐसे बड़े-बड़े लोग आकर के मुझे प्रणाम क्यों करते हैं? तो देखिए कि एक सेवक महाराज मां को पूछते हैं कि मां तुमको तुम्हारा स्वरूप क्या सब समय याद रहता है? तो मां कहती है कि यदि ऐसा होता तो यह सब का कार्य जो है वह कौन करता? मां को तो संसार भी देखना है। ठाकुर की पूजा भी करनी है। यह सब जय राम बाटी के दिनों की बातें हैं। भक्तों का भक्तों को उपदेश भी देना है। सब कुछ करना है। तो फिर मैं मुझे यदि सब समय मेरा स्वरूप यदि पता रहता तो यह सब कार्य होता कैसे? किंतु साथ-साथ में ही मां कहती है यदि इच्छा होती है उस समय मैं यदि अपने मन को एकाग्र करती हूं तो इमीडिएटली मेरा दिव्य स्वरूप मेरी नजर के सामने आ जाता है। किंतु सब समय ऐसा होता नहीं है। सब समय ऐसा करने की आवश्यकता भी नहीं है। तो ठाकुर के जीवन में भी हमने देखा कि आनंद पर्व जबकि वह मां शारदा देवी की शोडस पूजा समाप्त करके शारदा देवी की शक्ति से शक्तिमान होकर के धर्मचक्र प्रवर्तन कर रहे थे कोलकाता में घर-घर जाकर के सबको आनंद का तपस्या त्याग का उपदेश दे रहे थे। उस समय यदि कोई उनको कहता कि महाशय आप तो अवतार है तो ठाकुर नाराज हो जाते। कहते गुरु कर्ता और बाबा यह तीन शब्द सुनकर के ऐसा लग रहा है जैसे कि कोई मेरे शरीर में कांटे चुभो रहा हो। किंतु जब आत्म प्रकाश पर्व प्रारंभ हुआ। उनको कैंसर हुआ और कैंसर के बाद में जब काशीपुर श्यामपुकुर गए उस समय उन्होंने फिर अपने अंतरंग शिष्यों में फिर कहना शुरू कर दिया था। और कहने की मेथड भी कैसी थी? वह काली पूजा का काली पूजा की रात गिरीश घोष ने जैसे ही पुष्पणम किया वैसे ही समाधि में चले गए। वही कल्पतरु दिन जैसे ही गिरीश को पूछा तुम मेरा इस तरह से प्रचार क्यों करते हो? गिरीश ने उत्तर दिया तो साथ में ही समाधि में चले गए। स्वामी जी के मन में संदेह हुआ आखिरी समय में तो स्वामी जी को उत्तर दे दिया जय राम जय कृष्ण श्री राम कृष्ण जो राम जो कृष्ण वही राम कृष्ण तो ठाकुर ने आत्म प्रकाश पर्व में अपने सही स्वरूप का अंदाज देना सबको प्रारंभ कर लिया था किंतु उससे पहले आनंद पर्व जब चल रहा था तब ठाकुर स्पष्ट कहते थे मां मुझे बेहोश करके रखना मत मैं भक्तों के साथ में भक्त हम भक्ति भक्तों थकते चाहिए भक्ति और भक्त लोगों को रह के रहना चाहता हूं। आमी चीनी खेते चाहे मां चीनी होते चाहिए ना मैं ईश्वर होना नहीं चाहता। ईश्वर के साथ में भाव महाभाव का संबंध रखना चाहता हूं। तो ठाकुर के जीवन में भी देखिए कि वह भक्त होकर के मां के संतान होकर के रहना वो ज्यादा पसंद करते थे। रेदर देन कि मां जगत जननी के साथ में एकीभूत हो जाना। अपनी डिनिटी का जैसे ही एहसास होगा तो वैसे ही वह तो एकत्व की ओर चले जाएंगे। किंतु जब तक यह दूरी एक बनी रहती है तब तक भले ही वह अपने को मां के संतान के रूप में देखे किंतु भक्तों को लेकर के जो भक्ति का आनंद है जो वो जो एक है वह उनको चाहिए था अपने जीवन में। सो इसलिए कि मां और ठाकुर ऐसा अल्प मात्रा में अल्प समय के लिए तो होता है कि हां मेरे मुझे मेरा जो देवत्व है उसका अंदाज आता है किंतु फिर से वह ढक जाता है। किंतु यहां पे शरद महाराज बड़ा एक डिस्टिंक्शन करते हैं कि यह मुक्ति प्राप्त करने के पहले की अवस्था है। अर्थात कि साधना करके साधना का जो चरम शिखर है निर्विकल्प समाधि या तो ईश्वर दर्शन उसके पहले की बात उन्होंने हमको यहां पे कही है। इसके बाद में क्या कहते हैं ए रूपे बहुजन हिताय माया आवरण स्वीकार करिया लोया तहां दिग के आमाद दिगे न्याय आलोक आंधारे राज्य भीतर पोत आतड़ाईते होए इसी तरह से बहुजन हिताय हम सबके कल्याण के लिए माया का आवरण स्वीकार करके उनको हमारी ही तरह प्रकाश और अंधेरे में आलोक अंधारे राज्य भीतर देखिए कितना सुंदर शब्द है यह प्रकाश और अंधकार का यह राज्य है यह माया का जगत उसमें बहुत हाथड़ाईते हो आंख बंद अंधेरे में आप जा रहे हैं तो हाथ लंबा करके आप जिसज चीज को स्पर्श करेंगे कभी लगेगा कि यह बेड है यह दीवाल है कभी पता चलेगा यह दरवाजा है तो जब दरवाजे को हाथ ने स्पर्श किया तब हम दरवाजा खोलकर के बाहर बाहर निकले तो इसी तरह से वह अनुमान करके उनको इस आलो आंधारे प्रकाश और उजाले के राज्य में अनुमान करतेकरते एक्सपेरिमेंट करतेकरते उनको मुक्ति का रास्ता खोजना होगा और यह भी क्यों कि हमारे कल्याण के लिए वह माया का आवरण स्वीकार करते हैं। तबे स्वार्थ सुख चेष्टार लेश मात्र तहा देर भीतरे ना थाका तारा जीवन पथे आमादगे गर अपेक्षा अधिक आलोक देखते पान अभी देखिए कि हमारे कल्याण के लिए उन्होंने माया का आवरण स्वीकार तो किया है किंतु हम लोगों के भीतर में जो स्वार्थ है वो स्वार्थ इन लोगों में नहीं रहता है। निस्वार्थ होती है। सत्व का प्राधान्य होता है। हम लोगों में स्वार्थ है, रजस तमस का प्राधान्य है। उनके जीवन में सत्व का प्राधान्य है। निस्वार्थ रहती है। इसीलिए स्वार्थ सुख चेष्टा का लेश मात्र एक अंश भी उनके भीतर में ना रहने से वे लोग जीवन पथ में हमारे से ज्यादा उजाला देख सकते हैं। हमारी आंखें स्वार्थ के बंधन से वह बंध हो गई है। वह स्वार्थ की अब जैसे वह गांधारी ने उनके ध्रृतराष्ट्र के साथ में विवाह किया तो फिर ध्रृतराष्ट्र तो अंध है तो अंधपति के साथ में वह किस तरह से वह देखते हुए तो उन्होंने अपनी आंखों के ऊपर में पट्टी बांध दी। तो अभी उन्होंने वंटियरली पट्टी बांधी है। हम लोगों में यह जो स्वार्थ सुख है इतना स्ट्रांग होता है कि यह चल तो रहे हैं प्रकाश वाले रास्ते पे किंतु आंख के ऊपर में स्वार्थ रूपी जो पट्टी बांधी हुई है हमको उजाला नहीं दिखता है। जबकि अवतार होते हैं उनकी आंखें इस तरह से वह बंद नहीं हो गई है। वह हमारी तरह अंधे नहीं हो गए हैं। बोलकर के जब वो प्रकाश के रास्ते पर धर्म आध्यात्मिकता के रास्ते पर चलते हैं उनको अपना डेस्टिनेशन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। जीवन पथे आमादगे गैर अपेक्षा अधिक आलोक देखते पान जीवन पथ में हमसे ज्यादा प्रकाश देख सकते हैं। एवं अभ्यंतण समग्र शक्ति पुंजो सहज एक मुखी कोरिया अचरे जीवन समस्या समाधान करतः लोक कल्याण साधने निजुक्त होएन हमारे से ज्यादा प्रकाश भी देख सकते हैं। साथ-साथ में ही उनके शरीर के भीतर में अभ्यंतण भीतर में जितनी भी शक्ति है समग्र शक्ति पुंज उसको सहज से ही सहज अवस्था में ही एक मुखी करिया कितना सुंदर शब्द है। एकाग्र शब्द हमने सुना है। एक मुखी शब्द हम एटलीस्ट मैंने वो यहां पर पहली बार पढ़ा। उन सभी शक्तियों का एक ही डायरेक्शन में उनको घुमा करके उन शब्द शक्तियों का चेहरा एक ही डायरेक्शन में लेकर के एक मुखी करके अचीरे ही कुछ ही अल्प समय में ही जीवन समस्या का समाधान करके लोक कल्याण के साधन में नियुक्त होते हैं। उनको हमारी उनकी आंखें हमारी तरह अंधी नहीं हो गई है। स्वार्थ पर स्वार्थ परवश होकर के इसलिए जीवन पथ में स्पष्ट देख सकते हैं कि वह सूरज है। वही ध्रुव तारा है और यही हमारे इष्ट है। इष्ट तक की ही हमको यात्रा करनी है। फटाफट करके वहां पर चले भी जाएंगे। अभी मान लीजिए 10 कि.मी. का रास्ता है तो मैक्सिमम आप 1 घंटे में 2 घंटे में आप 10 कि.मी. का रास्ता पार कर पाएंगे। यदि आपको रास्ता ठीक-ठीक दिखता है तो किंतु यदि आंखों पर पट्टी बांधी हुई है आंख बंद करके हम चल रहे हैं तो क्या होगा अभी इधर जंगल में घुस जाएंगे कभी वो गिर जाएंगे गिर करके पड़ेंगे तो फिर खड़े होने में देरी होगी फिर दूसरी ओर कहीं पर चले जाएंगे कभी-कभी रिवर्स चलना शुरू कर देंगे जब तक डेस्टिनेशन स्पष्ट नहीं दिखता है तब तक रास्ता कितना छोटा सा भी क्यों ना हो हम अपने गंतव्य स्थान तक डेस्टिनेशन तक नहीं पहुंचेंगे बहुत समय लगेगा जैसे-जैसे डेस्टिनेशन तक आगे बढ़ेंगे वैसे ही आंखों के ऊपर में जो पट्टी बांधी हुई है वह ट्रांसपेरेंट होती जाएगी। थोड़ा-थोड़ा दृष्टि हमको ईश्वर देना शुरू कर देंगे और यदि आखिरी पड़ाव तक लास्ट 1 कि.मी. की जर्नी है अपना डेस्टिनेशन क्लियर देख पाएंगे। तो किंतु अवतार के बारे में ऐसा है कि जन्म से ही उनको डेस्टिनेशन क्लियर दिखता है। तो 10 कि.मी. क्रॉस करने के लिए हमको एक जी पूरा जीवन लग जाएगा। हजार जीवन लग जाएंगे। जबकि यह अवतार एक ही घंटे में वह 10 कि.मी. क्रॉस कर लेंगे। क्योंकि उनको डेस्टिनेशन स्पष्ट दिखता है। तो अभी क्या होता है? डेस्टिनेशन स्पष्ट दिखता है। इसकी वजह से अवतार पुरुष अपने भीतर में जितनी भी शक्ति है सभी शक्तियों को एक ही कार्य करने के लिए फोकस कर देते हैं। समग्र शक्ति पुंज सहज ही एक ही मुख करिया। समग्र शक्ति पुंज को सहज ही एक मुख करके अचरेई जीवन समस्या समाधान करतः थोड़े ही क्षण में जीवन समस्या का समाधान करके लोक कल्याण साधन में नियुक्त होते हैं। अभी जैसे देखिए मान लीजिए कि यहां पे यह पढ़कर के ऐसा लगता है कि अवतार पुरुष के पास में तपस्या या साधना की शक्ति बहुत ज्यादा है। बोलकर के अपने डेस्टिनेशन तक एक ही जीवन काल में 10 12 साल की साधना में ही ठाकुर ने निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर ली। हमको निर्विकल्प समाधि प्राप्त करने में पता नहीं कितने हजार जन्म लग जाएंगे। तो यहां पर एक इंप्लिकेशन ऐसा है कि नॉट नेसेसरी कि ठाकुर के भीतर में साधना तपस्या की शक्ति हमारे से ज्यादा है। दो उनके पास में बेनिफिट है। एक तो है कि उनको डेस्टिनेशन स्पष्ट दिखता है। दूसरा कि वह अपनी शक्तियों को एकाग्र कर सकते हैं। फोकस कर सकते हैं। जैसे कि यह प्रकाश का किरण वैसे आप प्रकाश का किरण फेंकेंगे तो वह चारों ओर फैल जाएगा। हमको उजाला देगा। किंतु उससे ज्यादा और कुछ नहीं। और यही प्रकाश की किरण को आप फोकस करेंगे लेजर बना देंगे तो लेजर लाइट जहां पर भी पड़ेगा उस चीज को वह जला देगा तो उनकी जो हमारी शक्तियां है वो यह जो बल्ब होता है लाइट का यह ट्यूबलाइट या जो प्रकाश का बल्ब होता है उसकी तरह बिखरी होती है प्रकाश देती है किंतु उससे ज्यादा और कुछ नहीं करती जबकि ईश्वर की शक्ति फोकस होती है वो फोकस शक्ति से जो साधना करेंगे उसमें फटाफट करके वो सिद्धि प्राप्त कर लेंगे तो उनके पास में दो बेनिफिट है हमारे से। एक तो उनको डेस्टिनेशन स्पष्ट दिखता है। दूसरा कि उनको अपनी शक्तियों को एक मुखी करने की एकाग्र करने की क्षमता है। हमारे पास में है कि डेस्टिनेशन दिखता नहीं है। और यदि पता अंदाज आ भी जाए कि इस डायरेक्शन में जाना है। हमारे डिस्ट्रैक्शन इतने सारे हैं। कभी यह न्यूज़ पेपर पढ़ना है। कभी मित्रों के साथ गप लगाना है। कभी यह करंट अफेयर्स के साथ में अपडेट होना है। कभी यह काम हो गया। कभी वह काम हो गया। कभी इस ऑब्लिगेशन में उसका मेरे पर ऑब्लिगेशन है तो मुझे उसको ऑब्लिगेशन फुलफिल करना है। यह सांसारिक ये सब रिस्पांसिबिलिटीज रहती है कि उसके घर में प्रसंग था तो मेरे घर में प्रसंग था तो वो रिलेटिव्स आए थे। अभी उनके घर में प्रसंग है तो मुझे जाना पड़ेगा। ऐसा बोल के इतने सारे डिस्ट्रैक्शन से हम फंसे हुए हैं। मैरिज सेरेमोनी जब यह वो जो मैरिज सीजन चलता है देखिए कि कितने सारे लोग कि मैरिज में जाना पड़ेगा कि हमारे घर में मैरिज होगा तो वे लोग आएंगे। अभी इसलिए उनके घर में मैरिज है तो मुझे जाना है। तो ये परस्पर ये जो रिस्पांसिबिलिटी का पालन करना यह करते-करते अपना जीवन इतना डिस्ट्रैक्शन से भरा हुआ है कि ईश्वर साधना करने के लिए अपने पास में समय ही नहीं मिलता है। जबकि ठाकुर का था वो ठाकुर कहते हैं ना किसी एक भक्त के बारे में। इसका बड़ा अच्छा स्वभाव है। यह ले तुम्हारा तुम्हारी चीज तुम्हारे पास में यह मेरी चीजें दे दो मुझे। बस यहीं पर हो गया नाता खत्म। और कोई लेनदेन नहीं। तुम्हारे घर में प्रसंग है तो मुझे जाना है। मेरे घर में प्रसंग है तुमको आना है। तुमको यह काम था तो मैंने हेल्प किया। अभी मेरा यह काम है तो तुम हेल्प कर दो। बोल के ये जो पूरा संसार अपने सर पर खड़ा करना यह कुछ नहीं है। यह ले तेरा यह दे मेरा। बस बात करो खत्म। तो यह जो संसार के प्रति विराग है अपनी फिर यह सब जो मन को संसार के प्रति उठा के एक ही डेस्टिनेशन के प्रति लगाना यह क्षमता उनमें है। अभी ऐसा नहीं कि यह सब क्षमताएं हमारे पास में नहीं है। हमको ये सब चीजों में विश्वास नहीं आता है। हमको लगता है यह सोशल ऑब्लिगेशन है। ये प्रसंग है समाज के वो मैं नहीं जाऊंगा तो लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे कि अरे वो तो अकेला पड़ जा रहा माने वो तो हमको कोई हेल्प नहीं करता तो उसको उसको जब हेल्प की जरूरत पड़ेगी हम लोग नहीं जाएंगे तो ऐसा डर हमारे मन में बैठ जाता है तो इस सब डरों से ये सब चीजों से अपने मन को मुक्ति देनी है। अपने मन को ईश्वर की ओर लगाना है। किंतु वही बात है कि यह सब बोलना और करना इन दोनों में बड़ा डिफरेंस है। बोल तो हम देते हैं। मैं भी बोल देता हूं करना मेरे लिए भी इतना संभव नहीं है। मुझे भी यहां पर ड्यूटी होती है। किंतु जब यह सब कार्य करते हैं तो फिर यह कर्म योग को ले आना है। जो कुछ भी करते हैं श्री राम कृष्णपणमस्तु श्री रामकृष्ण को ही अर्पण कर करके हमको यह सब करना है। तो वो सब साधना का रास्ता है। किंतु अवतार के जीवन में हमको किस तरह से क्या सीखना है वह इस पैराग्राफ में शरद महाराज ने हमको अच्छे से बताया। अभी इसके बाद में नया टॉपिक चालू होता है जिसको कि अभी हम लीला प्रसंग के नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। आजी ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु