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Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 2 Jul 2025

prayer

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णायते नमः स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा रचित श्री रामकृष्ण देव की जीवनी श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग का हम पाठ कर रहे हैं। द्वितीय खंड उसका प्रथम चैप्टर साधक और साधना महाराज जी हमको कहते हैं शरद महाराज कि ठाकुर की साधनाओं का विवरण करने से पहले आइए हम भारतीय शास्त्रों में साधना के बारे में क्या कहा गया है उसके बारे में थोड़ा सा एक आउटलाइन देख लेते हैं। तो ऑलरेडी जो सर्वप्रथम पॉइंट शरद महाराज ने हमको कहा कि सर्वभूत में ब्रह्म दर्शन या ईश्वर दर्शन एक आध्यात्मिक चरम उन्नति पर पहुंच जाने से आध्यात्मिक लक्ष्य पर जब हम पहुंच जाएंगे तब यह उपलब्धि हमको होगी और इसके बारे में फिर हमने विभिन्न जो रिसोर्सेज है रेफरेंसेस है उसको हमने देखा स्वामी जी का एक लेक्चर है। उसमें से एक बार हम देखेंगे कि स्वामी जी क्या कहते हैं इसके बारे में। कल हमने ऑलरेडी देखा था कि तुरियनंद जी महाराज का क्या कहना है। तो बड़ी सुंदर बात उन्होंने कही कि जो रियलाइजेशन है उसमें भी स्टेजेस है उसमें भी जैसे कि एक के बाद एक हायर लेवल्स ऑफ आध्यात्मिक उपलब्धियां है। जैसे कि चार पंखुड़ी वाला गुलाब हो सकता है। 10 वाला भी हो सकता है और 100 पंखुड़ी वाला गुलाब भी हो सकता है। सहस्त्रदल पद्म भी जैसे कि हो सकता है। तो जितना हम ऊपर में जाएंगे आध्यात्मिक उपलब्धि के उतना ही हमको माने इसका कोई अंत नहीं है। यदि कोई यह सोच लेता है कि हां मैंने आध्यात्मिक उपलब्धि कर दी है। तो फिर ऐसा आप कभी मत सोचिए। कोई कहेगा कि मुझे निर्वाण प्राप्ति हो गई है। कोई कहेगा कि हां मुझे ईश्वर दर्शन हो गया है। कोई कहेगा कि मुझे निर्विकल्प समाधि मिल गई है। ऐसा कभी मत सोचिए कि वो आपके आध्यात्मिक जीवन का अंत है। देखिए कुछ समय

यदि कोई यह दावा करे कि मैंने ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर लिया है, तो इसका प्रमाण क्या है? प्रमाण है सभी के प्रति उसका असीम प्रेम।

पहले जैसे हमारा एक साधक के बारे में बात हुआ था। मुझे याद है ऑलमोस्ट एक साल पहले की यह बात है कि एक साधक उसने ऐसा क्लेम किया कि मुझे निर्विकल्प समाधि हो गई है। तो इसके बारे में हम डिस्कस कर रहे थे कि यदि सही-सही में निर्विकल्प समाधि होती है तो इसका प्रूफ क्या है? यदि यह आदमी क्लेम करता है कि हां मुझे इस तरह से कोई इतनी उच्च आध्यात्मिक अनुभूति हुई तो फिर हम लोगों को तो हम लोगों को तो सिर्फ यही एक रहेगा ना कि उसकी बात ही मान ले क्योंकि उसके मन के भीतर में उसके हृदय के भीतर में झांक करके हम कहां देखने वाले हैं। किंतु देखिए कि उस समय भी जैसे हमने डिस्कस किया था कि किसी को इस तरह की उपलब्धि होती है तो उसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि वह सिर्फ ब्रह्मण या ईश्वर या तो फिर जो कुछ भी है आत्मन निर्वाण जिस चीज में भी वह बिलीव करता है वह सिर्फ अपने हृदय में ही नहीं पूरे जगत में उसको देखेगा और उसका जो व्यवहार है इतना मधुर और मिठास पूर्ण हो जाएगा कि उसके सानिध्य में आकर के ही जैसे कि हम उसके सामने नतमस्तक हो जाए। क्योंकि देखिए कि मनुष्य हमेशा प्रेम को वो रिसॉन्ड करता है। जैसे यह कुत्ते भी होते हैं। उसको भी थोड़ा बहुत रोटी आप डालेंगे तो आपके सामने एकदम वो झुक जाएगा। हमारे यहां पर लाइब्रेरी है तो वो लाइब्रेरी में मैं शाम को शाम को जाता हूं। तो अभी हुआ है ऐसा कि वहां पर एक कुत्ता है। वह कुत्ता लाइब्रेरी में ही रहता है और यह लोग जो हमारा स्टाफ है उसको बिस्किट खिलाते हैं। कुत्ते का बिस्किट खरीद करके उसके लिए रख दिया है। प्रतिदिन दो-तीन दो-तीन करके उसको देंगे। तो फिर उसका पैसा भी जैसे अभी हमको आश्रम से देना पड़ता है। तो मैंने कहा अरे लाइब्रेरी में कुत्ते को क्यों रखा है? वो भी किसी महाराज की इच्छा होगी कि रखे वो आ गया होगा तो उसको बिस्किट खिलाए तो वो कुत्ता अभी वहीं पर रहता है तो मैंने कहा बिस्किट बिस्किट कर दो बंद और उसको भगा दो यहां से ये लाइब्रेरी है लोग पढ़ने के लिए आते हैं किंतु देखिए कि वो कुत्ते का जो है कि आप बिस्किट बंद करें कि ना करें वो वहीं पर रहेगा उसकी जो यह लॉयल्टी और वफादारी है एक बार उसको पता चल गया है कि यहां से उसको थोड़ा बहुत प्रेम मिलता है तो वह बाहर जाएगा ही क्यों? और कुछ दिनों के बाद देखा कि यह स्टाफ वाले वैसे ही बिस्किट खरीद करके उसको खिलाते हैं। मैंने कहा अच्छा ठीक है रखो इसको यदि आप लोगों की बहुत इच्छा है तो तो क्या है कि देखिए कि प्रेम को पूरा जगत वशीभूत कर सकते हैं आप प्रेम के माध्यम से। आपके हृदय में दूसरों के प्रति सहानुभूति, करुणा, अनुकंपा है, दया है, करुणा है तो पूरा जगत जैसे कि आपके चरण तले आ जाएगा। शक्ति के माध्यम से आप जगत को जय कर सकते हैं। जैसे कि एलेग्जेंडर है, जैसे कि यह चंगेज खान है, जैसे कि यह हिटलर था, नेपोलियन था, यह ब्रिटिश एंपायर था। उन्होंने अपनी शक्ति के माध्यम से जगत को जय करना चाहा था। किंतु आखिर में देखिए कि जो भारत से जो यह बुद्धिज्म प्रसारित हुआ उसी ने तो इतने हजार साल तक लोगों के हृदय पर राज किया है। यह चंगेज़ खान का एंपायर कितने दिनों तक टिका जितने दिन चंगेज खान जिंदा था उतने ही दिन जैसे ही उसका मृत्यु हुआ उसके जितने भी लड़के हैं आपस में लड़ने लगे। वह कोई एक ईस्ट एशिया लेकर के बैठ गया है। कोई वेस्ट एशिया लेकर के बैठ गया है। कोई सेंट्रल एशिया लेकर बैठ गया है। वो जैसे डिवीजन हो गए फिर डिवीजन आपस में ही झगड़ा कर रहा है। तो यह तो तो हमेशा की यही कहानी है कि एक बार आप शक्ति के माध्यम से एक एंपायर बनाएंगे। एक एक अपनी शक्ति का वर्ल्ड ग्लोबल प्रोजेक्शन करेंगे। कुछ ही दिनों में चंद घंटों में उसका सत्यानाश हो जाएगा। देखिए कि ये जियोलॉजिकल टाइम स्केल है। पृथ्वी 4 बिलियन साल पहले बनी थी। और देखिए ह्यूमन सिविलाइजेशन ऑलमोस्ट 10,000 साल से अस्तित्व में है। जो होमोसेपियंस जिसको हम कहते हैं आधुनिक मनुष्य वो ऑलमोस्ट 5 थाउजेंड इयर्स से पृथ्वी पर चल रहा है। सिविलाइजेशन 10,000 साल पुरानी है। यह जियोलॉजिकल टाइम स्केल है। उसमें आपने 200 300 साल एक एंपायर बनाया। यह मुगल लोगों ने आकर के राज किया वो कितने दिन तक टिकेगा? 200 300 साल एट द मोस्ट यह तो पलक झपक के ही वो जियोलॉजिकल टाइम स्केल में यह हवा हो जाएगा। देखिए हिंदू शास्त्र जो एक चीज समझते हैं जो कि दूसरे धर्मों को शायद समझने में दिक्कत ये हो रही है। हमारा जो यह टाइम स्केल है इतना विराट है। इतना विशाल है। सृष्टि स्थिति प्रलय की साइकिल को सीधे हम डायरेक्ट रेफर करते हैं। इससे कम में हमारा काम ही नहीं होता। तो इसीलिए कभी-कभी टू आवर डेट्रीमेंट कभी-कभी ऐसा होता है कि हम हिंदू जो है दूसरों को पैसिव लगते हैं। यदि हमारे पर कोई आक्रमण भी कर दे तो हम सभी लोग मिलकर के डट करके उत्तेजित होकर के उसका मुकाबला करने को जैसे कि हम यूनाइट नहीं होते हैं। यह उसका एक फ्लिप साइड है। पॉजिटिव साइड यही है कि यदि इतना लंबा टाइम स्केल अपने माइंड में नहीं बिठाएंगे तो हम आध्यात्मिक विकास कभी नहीं कर पाएंगे। स्वामी जी का यह हमेशा का एक्सपीरियंस था। विदेश में आप जाएंगे आप उनको स्पिरिचुअलिटी का उपदेश देंगे तो वे लोग कुछ इंस्टेंट कुछ प्राप्त करने की वह आशा रख के आएंगे। जैसे वह इंस्टेंट कॉफी है। जैसे यह इंस्टेंट ग्रेटिफिकेशन है, वैसे ही एक इंस्टेंट निर्वाण चाहिए। जैसे ही उनको कुछ समय में पता चले कि अरे यह तो सिर्फ ऐसा नहीं है कि आपको इंस्टेंटली नहीं मिलने वाला है। कुछ सालों में नहीं मिलने वाला है। कुछ जन्मों में नहीं मिलने वाला है। जन्म जन्मांतर की यह यात्रा है। तब लोग फ्रस्ट्रेट होकर के छोड़ देते हैं। उन लोगों का कमिटमेंट आध्यात्मिक जीवन में रहना थोड़ा सा मुश्किल है। हां, क्रिश्चियनिटी है वगैरह धर्म वहां पर फैले हैं। किंतु स्वामी जी ने उस समय भी कहा था कि यह जैसे कि वह एक धनवती महिला है। तो अभी उसके जो बैठक रूम है बैठक कक्ष उसमें अभी यह फैशन है कि एक जापानीज वास को रखें तो एक जापानीज वास रखा है तो वैसे ही फैशन है कि थोड़ा बहुत संडे को चर्च में चले जाए अच्छे से नए कपड़े पहन करके तो वह संडे को चर्च में जाते हैं तो जैसे ही चर्च से बाहर आए वह जो चर्च में जो सुना था वहीं का वहीं पड़ा रहता है। ज्यादा से ज्यादा थोड़ा सा डोनेशन दे देंगे जैसे कि अपनी कॉन्शियंस को वह ठंडा रख सके। तो यह है उनका धर्म। सभी ऐसे नहीं होते हैं। कोई-कोई हाईली एलिवेटेड सोल होते हैं। किंतु यह जो हिंदू धर्म का यह जो जन्म जन्मांतर का यह जो ये है सफर यह सृष्टि स्थिति प्रलय तक की ये जो सफर है हमारी यह हमको एक डीप पेशेंस देता है। इस पेशेंस की वजह से हिंदू हमेशा धर्म को पकड़ कर के रह सकता है। बहुत बार माने सभी देखिए कि जितने भी यह जो मेंटालिटी होती है ना मेंटालिटी का पॉजिटिव भी होता है, नेगेटिव भी होता है। अभी यह अमेरिकन लोगों की इंपेशेंट मेंटालिटी है। कभी-कभी मेरे कुछ रिलेटिव्स वहां पे अमेरिका से आते हैं तो उनके लड़कों को मैं देखता हूं। इतने इंपेशेंट होते हैं। एक अपने जो इंडियन लड़का है उसको आप एक जगह पर बिठा करके रखिए। कहिए कि थोड़ा सा बैठो यहां पे। वह बेचारा चुपचाप शांति से बैठा रहेगा। यह अमेरिकन लड़कों को देखता हूं कि एक सेकंड वो स्थिर होकर के नहीं बैठेंगे। इधरउधर नजर लगाएंगे, इधर दौड़ेंगे, उधर दौड़ेंगे, यह कुछ करेंगे, वो कुछ करेंगे। दे कंटीन्यूअसली वांट सम सॉर्ट ऑफ क्या कहेंगे कि ग्रेटिफिकेशन। दे कंटीन्यूअसली वांट सम सॉर्ट ऑफ एक्साइटमेंट। यह जो उनका एक्साइटमेंट सीकिंग नेचर है, वह उनको एआई डेवलप करवा दे सकता है। मनुष्य को चांद के ऊपर में भेज सकता है। मनुष्य को वह मार्स के ऊपर में भेज सकता है। एक एडवेंचरस एक डेविल में केयर ऐसा एक एटीट्यूड उनका होता है। रिस्क टेकिंग बिहेवियर उनका होता है। किंतु दिस रिस्क टेकिंग बिहेवियर इज़ सक्सेसफुल ओनली इन आउटर लाइफ। इनर लाइफ में यदि हमको डेवलप होना है तो एक डीप पेशेंस चाहिए। निष्फलता है या तो निराशा है या तो फिर सामने एक्साइटमेंट का अभाव है। यह सब चीजें हमको यह सहन करनी होगी। तो यह पेशेंस हिंदू में है। तो दोनों तरह से यह कटता है कि यह जो बाह्य जगत का युद्ध है उसमें हम बार-बार हारे हैं। ये छोटे से छोटे देश भी आकर के हमारे इंसल्ट कर जाते हैं। हम ठीक-ठाक उत्तर नहीं दे पाते। तो दिस इज अ फ्लिप साइड। दिस इज अ प्लस साइड। सो व्हाटएवर देखिए कि यह लॉन्ग टर्म जो टाइम फ्रेम है उसके भीतर में इस तरह से उसी के भीतर में हम ब्रह्म दर्शन कर सकते हैं। और जैसे वह साधक की बात चल रही थी कि वो किसी ने कहा कि मैंने देखा है सुना है इस साधक का साधक के बारे में कि वह क्लेम करता है कि ब्रह्म दर्शन ब्रह्म साक्षात्कार मुझे प्राप्त हुआ है। तो प्रूफ क्या है? तो प्रूफ यही है कि पूरा जगत जैसे कि उसके वश में आ जाएगा। यह जो आप ये इंपेशेंट जितनी प्रजाएं हैं एक्साइटमेंट सीकिंग जो प्रजाएं हैं वो जो एंपायर खड़ा करेंगे 200 300 साल में चला जाएगा। किंतु जो बुद्धिज्म जो स्प्रेड हुआ है पूरे ईस्ट एशिया में देखिए कि उन्होंने बुद्धिज्म को जैसे कि अपना लिया है। अभी यह लोग अह ना ही इंडिया क्लेम करेगा कि हमने बुद्धिज्म के माध्यम से ईस्ट एशिया पे विजय प्राप्त किया ना ही ईस्ट एशिया के ये जितने भी कंट्री है कंबोडिया है वियतनाम है म्यांमार है ना कि चाइना जापान कोरिया इंडोनेशिया मलेशिया ये नेपाल श्रीलंका ये जितने भी कंट्रीज हैं मंगोलिया ये लोग कभी भी यह बात को स्वीकार नहीं करेंगे कि भारत ने हमारे पे विजय प्राप्त किया है। क्यों? क्योंकि वे लोग समझते हैं कि बुद्धिज्म तो वैसे अपना ही तो है। इतने हजार साल की पुरानी हमारी ट्रेडिशन है। हमने जैसे कि उसको डोमेस्टसाइज कर ही दिया है। डोमेस्टिकेट कर ही दिया है। तो फिर अभी इसमें इंडिया का क्या रोल है? किंतु देखिए कि भारत की जो विचार सरणी है उसने किस तरह से साइलेंटली सली इन सब देशों में प्रवेश की है। तो यह बात है। आज भी देखिए कि स्वामी जी जिस तरह से वेदांत को विदेश में ले गए। एक बार हम लोग मिशन ऑफिस में चर्चा हो रहा था। मैं उस समय जॉइ करने के लिए गया था बेलूर मठ में। स्मरणानंद जी जनरल सेक्रेटरी महाराज थे और वह विदेश की टूर से उस समय लौटे थे। तो किसी ने पूछा अब और क्या है रात को नाइट क्लास होता है भोजन के बाद में तो मिशन ऑफिस में हम सब लोग बैठते थे जो जनरल सेक्रेटरी महाराज होंगे वो वहां पर कुर्सी पर बैठेंगे और उनके सामने दो एल शेप का वो था माने वो जो जिस कमरे में हम लोग बैठते थे तो एक साइड में मिशन ऑफिस के जितने भी सीनियर साधु सन्यासी महाराज हैं असिस्टेंट जनरल सेक्रेटरी महाराज वगैरह वे लोग बैठेंगे सब लोग जमीन पर बैठेंगे सिर्फ जनरल सेक्रेटरी महाराज ही कुर्सी पर बैठेंगे। तो बाकी सब साधु लोग जमीन पर बैठेंगे एक साइड और दूसरी साइड हम लोग जो नए जॉइ करने के लिए ब्रह्मचारी गए हैं बच्चे लोग हम लोग बैठेंगे। अभी देखिए हमारी नजर के सामने एक और बैठे हैं जनरल सेक्रेटरी महाराज दूसरी ओर जमीन पर बैठे हैं। यह सब असिस्टेंट सेक्रेटरी महाराज मिशन ऑफिस के जितने भी सब सीनियर मोस्ट साधु हैं मोस्ट इंटेलिजेंट साधु वो बैठे हैं वो सब लोग चर्चा कर रहे हैं। हम लोग बच्चे लोग सब चुपचाप सुनते थे। तो किसी ने प्रश्न किया कि अच्छा महाराज आप जाकर आए अमेरिका में तो आपका क्या अनुभव रहा कि स्वामी जी ने जो कहा कि विदेश में वेदांत फैलने का यह उपयुक्त समय है तो ऐसा तो कुछ लग नहीं रहा है विदेश के न्यूज़ पेपर आप पढ़ेंगे कि हमने वेदांत ने कोई जाकर के बहुत बड़ा तीर मार दिया हो वहां पे तो महाराज ने बड़ी अच्छी बात कही देखो कि ऐसा कुछ एक्साइट एक्साइटमेंट होने वाला कुछ है नहीं वहां पर न्यूज़ किंतु स्लो एंड स्टेडी हमारा प्रोग्राम ्रेस हो रहा है स्लो एंड स्टेडीली जैसे कि विदेश का यह जो कॉन्शियसनेस है कॉन्शियस है उसके भीतर में वेदांत और योग परकोलेट हो रहे हैं। तो मुझे यह सब सुन के मुझे ऐसा लगा था उस समय क्या है कि मैं थोड़ा हिस्ट्री का अभ्यास करता था तो मैंने सोचा कि देखिए कि जिस तरह से क्रिश्चियनिटी का एक वाइल्ड फायर की तरह स्प्रेड हुआ। इस्लाम का जिस तरह से हुआ था अप टू एन एक्सटेंट बुद्धिज्म का हुआ था इन सबके पीछे में कोई सेंट्रल ऑथॉरिटीज थी और उसकी वजह से बड़े व्यापक पैमाने पे यह सब फैला है। तो अपना हिंदूइज्म का हमेशा से यही एक ट्रबल रहा है कि इतना बड़ा देश है हमारा। इतनी एक सेंट्रल गवर्नमेंट भी है किंतु कोई सेंट्रल गवर्नमेंट की ओर से या तो कोई सेंट्रल अथॉरिटी की ओर से हिंदू धर्म को विश्व में फैलाना ऐसा मिशनरी अप्रोच हम ले नहीं बैठते हैं। हां अभी कुछ रिसेंटली कुछ ट्राई हुआ है कि योगा इंटरनेशनल डे एक सेलिब्रेट कर रहे हैं और लोग इसमें पार्टिसिपेट भी करते हैं। किंतु क्या है कि कंपेयर टू अदर वर्ल्ड रिलीजन हम लोगों की जो मिशनरी झील है बहुत ही कमजोर दिखाई देती है। तो यह एक मुझे उस समय लगा था कि जैसे कि जीएस महाराज स्मरणानंद जी महाराज जैसे कि एक तरह से डिफिट ही स्वीकार कर दे रहे हैं कि हां वो स्लो एंड स्टेडी ग्रोथ होगा। ओवर ए लॉन्ग पीरियड ऑफ टाइम होगा। अपने जो डिवोटी है वहां पे अमेरिकन डिवोटी उनके भीतर में देख रहा हूं कि काफी कमिटमेंट है किंतु यह सब साइलेंटली हो रहा है। कुछ फ्लशी कुछ एक्साइटमेंट एक्साइट एक्साइटेड होने वाला ऐसा कुछ वहां पे नहीं है। तो उस समय मुझे लगा था। लेकिन तो देखिए कि जैसे-जैसे यह जो हिस्टोरिकल टाइम स्केल आपके माइंड में फिट होता जाता है वैसे-वैसे ही समझ में आएगा कि चंगेज खान का एंपायर, एलेक्जेंडर का एंपायर, नेपोलियन या तो फिर ये ब्रिटिश राज या तो इवन जो दूसरे जिस लोगों ने ये जो शक्ति के माध्यम से अपना फैलावा किया है वे लोग कभी भी अपने को लॉन्ग टाइम पीरियड में टिका के नहीं रख पाएंगे। आप यह कह सकते हैं क्रिश्चियनिटी का या तो इस्लाम का उदाहरण देखकर के कि वे लोग भी तो वाइल्ड फायर की तरह ही फैले हैं एक्चुअली और वे लोग तो काफी डेवलप भी हो रहे हैं। अभी रिसेंटली मैंने एक स्टैटिस्टिक्स पढ़ा था कि उसमें देखा कि क्रिश्चियन लोगों की संख्या है 2 बिलियन ये जो इस मुस्लिम है 1.5 बिलियन समथिंग हिंदू लोग हैं 80 करोड़ ना कि समथिंग लाइक दैट अभी एग्जैक्ट नंबर्स में भूल गया किंतु समथिंग लाइक दैट ऐसा ही था और उसमें भी सबसे ज्यादा फास्टेस्ट ग्रोइंग जो रिलीजन है वह है इस्लाम सबसे ज्यादा कन्वर्ट्स उसके वर्ल्ड वाइड अभी उसी के हो रहा है तो यह और स्टैंडर्ड रिसर्च था प्योर रिसर्च ना कि ऐसा किसी का था मैं बाद में शेयर करूंगा। तो देखिए कि इसको पढ़कर के हमको लगता है कि वे लोग एंपायर भी इस तरह से बनाए और रिलीजन भी इस तरह से स्प्रेड कर रहा है। तो हिंदू धर्म इस तरह से क्यों नहीं कर सकता? किंतु यह देखने वाली बात है कि यह जो कमिटमेंट है, एक इनर रियलाइजेशन है, एक आध्यात्मिक शांति है, आध्यात्मिक एक कहेंगे कि उपलब्धियां है, जो डेप्थ होती है, तो हमारे धर्म में अभी ऐसा क्लेम करना कि मैं हिंदू हूं तो मैं क्लेम करूंगा कि हमारे धर्म में सबसे ज्यादा है। तो इस तरह का क्लेम नहीं भी शायद हम करें। तो यह तो अवश्य कह सकते हैं कि हिंदू का धर्म के प्रति जो कमिटमेंट है वह शायद और किसी रेस का और किसी रिलीजन का नहीं होगा और क्यों नहीं हो सकता है? क्योंकि हमारे यहां पर यह जो आध्यात्मिक उपलब्धि प्राप्त करते हैं वे लोग सर्वभूत में वही ईश्वर वही आत्म तत्व वही ब्रह्म को खोजते हैं और देखते हैं और रियलाइज करते हैं। और इसी वजह से एक सही-सही ब्रह्म ज्ञानी के साथ में हमारी मुलाकात हो जाए। उस सही-सही एक आत्मज्ञानी ईश्वर दर्शन प्राप्त किए हुए महापुरुष का हमको दर्शन मिल जाए तो हम सीधे उसके सामने उसके पदानत हो जाएंगे। उसके सामने हम नतमस्तक हो जाएंगे। सीधा उसके सामने साष्टांग प्रणिपात हो जाएंगे। क्यों? क्योंकि उसके हृदय में हमारे प्रति जो स्नेह है वह अद्भुत होगा। इस तरह का स्नेह जैसे कि हमारे मां-बाप भी हमको नहीं कर पाएंगे। हमारे बंधु बांधव जो कि हमारे कितने लंबे सालों के साथी हैं वे लोग भी एक क्षण में एक ब्रह्म ज्ञानी हमको जितना स्नेह कर सकता है हमारे पे जितनी जितना आशीर्वाद बरसा सकता है हमारे पे जितनी करुणा बरसा सकता है ऐसा और कोई जागतिक संबंध सांसारिक संबंध वो सेटिस्फेक्शन वो भीतर से एक जैसे कि एक संतोष की प्राप्ति भीतर भीतर से हर्षोल्लास की प्राप्ति हमको कभी नहीं करवा पाएगा। तो इसलिए कि यदि कोई यह क्लेम करता है कि हां मुझे ईश्वर दर्शन हुआ है या तो मुझे ब्रह्म ज्ञान प्राप्त हुआ है तो उसका यही एकमात्र सबूत है कि उसके सामने जाकर के ही आपको वो जो स्नेह मिलेगा वही एकमात्र प्रमाण है। आपका हृदय सीधा बोल देगा कि हां यह ब्रह्मज्ञानी ही है। उसके बाद में आपको और किसी टेस्ट करने का और किसी एक्सपेरिमेंट करने की कोई जरूरत नहीं रहेगी। तो वो एक हमने ऑलरेडी देख लिया कि जैसे यहां पे हरि महाराज कहते हैं मेडिटेट विद आईज क्लोज्ड एंड आल्सो मेडिटेट विद आइज ओपन। आंख बंद करके भी ध्यान करो। आंख खुली रख के भी ध्यान करो। यह पूरा जगत है। उस पूरे जगत में वही इष्ट का दर्शन करो। जिस इष्ट को आप अपने मंदिर में या तो फिर अपने हृदय में दर्शन करते हैं। सी हिम एवरीवेयर पूरे जगत में उसको देखो। योर आइडिया स्टेम्स फ्रॉम सेल्फिशनेस। तो यह सब हमने ऑलरेडी कल देख

स्वामी विवेकानंद: सभी तर्क एकत्व की प्राप्ति में ही समाप्त होते हैं

लिया था। अभी आज स्वामी जी का जो एक प्रवचन है लेक्चर्स एंड डिस्कोर्सेज उसमें से ज्ञान योग के बारे में माने यह ज्ञान योग पुस्तक में से नहीं है। एक छोटा सा एक नोट है ज्ञान योग के बारे में। उसमें से यह एक छोटा सा पैसेज मैंने कंपाइल किया है। क्या कहते हैं स्वामी जी? ऑल रीजनिंग एंड्स ओनली इन फाइंडिंग यूनिटी। यह अपनी बुद्धि की दौड़ जितनी भी है उस वहीं पर समाप्त होगी जहां पर हम सर्वभूत में ईश्वर दर्शन प्राप्त करेंगे। यूनिटी अर्थात कि एकता यह एकता में ही सब तरह के जो मानसिक तर्क और कुतर्क की मायाजाल है जैसे ही हम एकत्व को प्राप्त करेंगे वैसे ही वह तर्क कुतर्क की मायाजाल छिन्नभिन्न हो जाएगी। सो वी फर्स्ट यूज एनालिसिस देन सिंथेसिस। तो इसीलिए पहले तो हम धीरे-धीरे करके रीजन के माध्यम से यह मायाजाल को छिन्नभिन्न करने का प्रयास करते हैं। नेति नेति ये ये इंद्रियों के जो विषय है वह मैं नहीं हूं। यह जो मेरी जो कामना वासनाएं हैं वह मैं नहीं हूं। मेरा जो यह परिवार जनों के प्रति यह जो आकर्षण है या तो फिर यह कहेंगे अटैचमेंट जो है वह मैं नहीं हूं। इस धीरे-धीरे करके मेरी यह नया मोबाइल खरीदना है, नया घर खरीदना है, नई गाड़ी खरीदना है। यह जो मेरे भीतर में जो डिजायर है, मुझे एक जॉब में अपना प्रमोशन चाहिए। लोग मुझे मैं ₹10 का डोनेशन करूंगा और ₹1000 के फोटो उसके छपवा करके दुनिया भर के न्यूज़ पेपर में उसको प्रिंट करवाऊंगा। यह जो मेरी प्रेस्टीज प्राप्त करने की इच्छा है वह भी मैं नहीं हूं। यह जो लोगों पर अत्याचार करके लोगों का शोषण करके मैं यदि कुछ अपना बेनिफिट उठा लूं वह मैं नहीं हूं। ऐसा करके एनालिसिस करके करके पहले तो यह माया का जाल जो है उसको छिन्नभिन्न कीजिए। देन सिंथेसिस उसके बाद में आएगा कि यह जो जिस अद्वय ब्रह्म वस्तु को आपने दर्शन किया है वही अद्वय ब्रह्म वस्तु ही पूरे जगत में फैला हुआ है। इति इति करके पूरे जगत को स्वीकार कीजिए। वही मोबाइल, वही कार, वही बड़ा घर, वही प्रेस्टीज, वही पोजीशन, पावर, प्रमोशन, यह बड़ा पे पैकेज, इस फैमिली, हैप्पीनेस यह सबको आप डिविनिटी में परिवर्तित कर दीजिए। डिविनिटी में परिणत कर दीजिए। दिव्यता के रंग से इसको रंग दीजिए। देखिए कि आप जो कुछ भी स्पर्श करेंगे उसका उसके भीतर में दिव्यता प्रवेश कर जाएगी। यदि आपको कार भी यूज करनी है तो उसका कुछ ना कुछ पॉजिटिव व्यूज खोज निकालिए। किसी को आप लिफ्ट दे दीजिए। किसी गरीब को हॉस्पिटल में ले जाइए। पावर पोजीशन है तो इसका इस्तेमाल कीजिए। लोगों को सहाय करने के लिए वही परिवारजनों के ऊपर में यह प्रयास कीजिए कि उनके भीतर में आध्यात्मिकता प्रवेश करें। ठाकुर ठाकुर का मां के साथ में विवाह हुआ तो पहले तो मां के साथ में कोई संबंध था ही नहीं जब ठाकुर साधना कर रहे थे वो नेति नेति वाला फेस था। फिर यह जो जब ठाकुर ने मां की उपासना की शोडशी के रूप में शक्ति के रूप में मां की उपासना करके मां के साथ में रहना प्रारंभ किया दक्षिणेश्वर में। तो ठाकुर ने क्या किया कि मां को शिक्षा देने की शुरुआत की। मां को आध्यात्मिक जीवन मां का किस तरह से गठित हो इसके ऊपर में उन्होंने ध्यान देने की शुरुआत की। नेति नेति फेज में मां बेचारी है जयराम बाटी में और ठाकुर यहां पर दक्षिणेश्वर में आत्मभाव में डूबे हुए हैं। साधना में मग्न है और फिर जब यह इति इति वाला फेज आया तो वही धर्मपत्नी को अपने पास में रखकर के उसका जीवन परिणत करने का ठाकुर ने प्रयास किया। तो वही चीजें जिसके पीछे में हम दौड़ते थे पहले तो उसको छिन्नभिन्न कर दो। उसके प्रति जो हमारा आकर्षण है और जब हमको कुछ ना कुछ आध्यात्मिक उपलब्धि प्राप्त हो जाए नॉट नेसेसरी निर्विकल्प समाधि हम लोगों के जीवन में वो प्राप्त होना अभी तो वह सपना ही तो है किंतु यदि मान लीजिए मास्टर महाशय की ही बात वो दक्षिणेश्वर आए हैं वही जो हम पाठ कर रहे हैं रिट्रीट के लिए क्रिसमस वेकेशन वेकेशन में तो ठाकुर ने उनको वहां पर बिठा के जो सब उपदेश दिए मास्टर महाशय ने जो साधना की उससे उनको कुछ ना कुछ तो प्राप्त हुआ ही होगा और उसके बाद में ठाकुर क्या कहते हैं अभी तुम घर जाओ और फिर यही जो बीवी बच्चे हैं वो जैसे कि ईश्वर के ईश्वर के ही स्वरूप है इस तरह से उनको तुम निहारो तो देखिए कि थोड़ा सा भी आध्यात्मिक उपलब्धि प्राप्त हुआ तो भी आप इति इति करके जगत में वापस आ सकते हैं तो यह हमको देखना है फिर किंतु फिर उसके बाद में ठाकुर क्या कहते हैं कि यह जानना कि जगत में कोई भी तुम्हारा नहीं है ईश्वर के अलावा। तो यह जो अविद्या का संसार था उसको विद्या के संसार में परिणत करना है। तो यह थी ठाकुर की शिक्षा। तो

स्वामी विवेकानन्द: एकत्व तक पहुँचकर हम शाश्वत शांति पाते हैं

यहां पे भी स्वामी जी कहते हैं फर्स्ट वी यूज़ एनालिसिस देन वी यूज़ सिंथेसिस। पहले तो हम अपनी बुद्धि तीव्र बुद्धिमत्ता से यह जगत में क्या आकर्षण है? किस चीज के प्रति हमारा आकर्षण है? किस चीज के प्रति हमारी वासनाएं जाती है वह समझ करके कामना वासना को काटे और फिर उसके बाद में वही चीज जो कि हमको एक नेगेटिविटी की ओर ले जाती थी उसी को हम दिव्यता के रंग से रंग दें। वो जैसे वह कहते हैं ना कि रमणी शंगे था केके ना कोरे रमोण स्त्री के साथ में रहता है किंतु किसी भी तरह का काम भाव स्त्री के साथ में नहीं होता। तो यह हो गया अपना आदर्श। इन द वर्ल्ड ऑफ साइंस द फोर्सेस आर ग्रेजुअली नैरो डाउन इनू द सर्च फॉर वन अंडरलाइंग फोर्स। यह जो विज्ञान का जगत है उसमें जितनी भी फोर्सेस है उसको एनालाइज करके करके जो अंडरलाइंग यूनिफाइंग फोर्स है उसका एक खोज करने का साइंटिस्ट लोग प्रयास कर रहे हैं। ये जो अंडरलाइंग यूनिफाइंग फोर्स इसको ग्रैंड यूनिफाइड थ्यरी जीयूटी ऐसा करके ये लोग कहते हैं। ये चार जो फोर्सेस हिस्टोरिकली चली आ रही है। हमारे साइंटिस्टों ने उसको अह एनालाइज़ करके खोज निकाला है। ग्रेविटेशन, इलेक्ट्रोमैग्नेटिज़्म, स्ट्रांग न्यूक्लियर फोर्स और वीक न्यूक्लियर फोर्स। यह चार बेसिक फोर्सेस है। किंतु जैसे-जैसे यह साइंस और मैथमेटिक्स और फिजिक्स का डेवलपमेंट होता गया, वैसे-वैसे पता चला कि ये जो स्ट्रांग न्यूक्लियर फोर्स और वीक न्यूक्लियर फोर्स इन दोनों को हम एक ही सेट ऑफ इक्वेशन से एक्सप्लेन कर सकते हैं। उसके बाद में आया पहले तो इलेक्ट्रिसिटी और मैग्नेटिज्म को अलग-अलग फोर्सेस माना जाता था। किंतु जेम्स क्लार्क मैक्सवेल बोल के वो जो एक ब्रिटिश साइंटिस्ट है उसने इन दोनों को यूनिफाई किया और उसको नाम दिया इलेक्ट्रोमैग्नेटिज्म और उसके बाद में ये जो न्यूक्लियर फोर्सेस है दो स्ट्रांग वीक और ये हो गया इलेक्ट्रोमैग्नेटिज्म इन तीनों को एक तरह के यूनिफाइड सेट ऑफ थरीज के माध्यम से अभी हम डिस्क्राइब कर सकते हैं। अभी प्रश्न यही रह जाता है कि एक ओर अभी ग्रेविटी रह गया है और दूसरी ओर ये स्ट्रांग वीक न्यूक्लियर फोर्सेस और इलेक्ट्रोमैग्नेटिज्म ये तीन है। ये जो तीन फोर्सेस है इसको आप क्वांटम डायनेमिक्स के माध्यम से एक्सप्लेन कर सकते हैं। किंतु ग्रेविटी जो है उसको एक्सप्लेन करने के लिए हमको रिलेटिविटी ही चाहिए। क्लासिकल रिलेटिविटी उसको क्वांटम डायनेमिक्स के भीतर में बिठाना मुश्किल है। एस सो फार अभी ऐसा है। किंतु साइंटिस्ट आर होपफुल कि रिलेटिविटी और क्वांटम डायनेमिक्स ये जो मोस्ट फंडामेंटल थ्यरीज है फिजिक्स की वो कहीं ना कहीं इस लेवल पे इवॉल्व होगी कि फिर हम यह जो ग्रेविटी को भी एक यूनिफाइड थ्यरी के भीतर में लेके आएंगे। तो यह साइंटिस्ट लोगों का लॉन्ग टर्म सपना है कि ये चारों थ्यरीज एक साथ में आ जाए। एक ही सेट ऑफ फिजिकल इक्वेशन के माध्यम से मैथमेटिकल इक्वेशन के माध्यम से हम उसको डिस्क्राइब कर पाए। तो यह है साइंटिफिक ट्रेजजेक्टरी। तो जिस तरह से साइंस में भी यह यूनिटी खोजने का प्रयास चल रहा है फंडामेंटल फोर्सेज के बीच में तो वैसे ही आध्यात्मिक जगत में भी यह यूनिटी खोजने का प्रयास चल रहा है। यह जो बाहर के जो कुछ भी आपको दिख रहा है, पशु, पक्षी, पेड़, पौधे, मनुष्य, जानवर, ग्रह, तारे, नक्षत्र जो कुछ भी दिख रहा है, स्पेस, टाइम, मैटर, एनर्जी इन सबको आप कैसे एक सिंगल यूनिफाइंग कांसेप्ट के भीतर में सिंगल यूनिफाइंग एक्सपीरियंस या तो इंट्यूशन के माध्यम से डिस्क्राइब कर सकते हैं। दैट इज आवर सर्च। और यह सर्च परिणत जब हुई जब यह पता चला कि यह ब्राह्मण ही है जो कि इस पूरे जगत का जो सबस्ट्रेटम है या तो कहेंगे यह पूरा जगत जैसे कि ब्राह्मण का ही विभिन्न विभिन्न मैनिफेस्टेशन है। जैसे कि समुंदर बना है पूरा पानी का किंतु उस पर कितनी ही विभिन्न तरह की लहरें बह रही है। यहां पे हमारी लाइब्रेरी जो है एग्जैक्ट समुंदर के सामने है। बस रोड क्रॉस करेंगे वह सामने समुंदर दिखाई देगा। तो उसकी टेरेस पर कभी-कभी मैं वॉकिंग करता हूं। तो जो समुंदर की लहरें हैं वह कभी-कभी मैं देखता रहता हूं। मंत्रमुग्ध होकर के आप हिप्नोटाइज हो जाएंगे यदि लंबे टाइम तक देखेंगे तो। तो क्या है कि यह जो पूरा लंबा जो बीच है तो चारों ओर से वह लहरें आकर के बीच के साथ टकरा रही है। वो इतना सुंदर दृश्य होता है। लहरों का शेप है। लहरों की ये जो लेंथ है उसका यह जो टकराव करने से यह जो फैन चारों ओर फैलता है। प्रत्येक लहर का एक यूनिक ये रहेगा। फिंगरप्रिंट रहेगा। प्रत्येक लहर का एक यूनिक पैटर्न रहेगा। किंतु समुंदर के पानी तो एक ही है। लहरों चाहे एक पत्थर के साथ टकराए फिर हजार तरह से उसका विभाजन हो। उसकी जो है फैन उसका जो सफेद है वो फैले किंतु पानी तो वही है तो जैसे कि यह पोटर है एक कुम्हार कुम्हार वो जो क्या करता है मिट्टी के ये सब कोई यह बनाता है घड़ा बनाता है ये घटी बनाता है मिट्टी के खिलौने बनाता है मिट्टी का कितना सब कुछ बनाता है किंतु है तो भीतर में मिट्टी ही वो माने मिट्टी आप उसको कितने तरह जो सोने का गहना है उसको आप ब्रेसलेट भी कह सकते हैं। आप नेकलेस भी कह सकते हैं। उसको आप जैसे कि यह कुछ भी कह सकते हैं। पायल कह सकते हैं या तो चूड़ियां कह सकते हैं। और साथ में आप उसको सोना भी कह सकते हैं। वो गलत कुछ नहीं होगा। सोना ही उसको वैल्यू देता है। वरना लोहे की यह ब्रेसलेट या तो लोहे का यह नेकलेस बनाएंगे। उसकी थोड़ी ना कुछ कीमत रहने वाली है। शेप वही है किंतु उसके पीछे का जो मैटर है वो संपूर्ण रूप से चेंज हो गया है। एक सोने का ब्रेसलेट और एक लोहे का ब्रेसलेट। सामने से यदि देखेंगे तो एग्जैक्ट सेम कलर दिखेगा। लोहे के ब्रेसलेट को आप सोने का वो गोल्डन एक कलर भी यदि कर देंगे और जो जो ये जो है ज्वेलर्स उसकी दुकान में जाएंगे दोनों को साथ-साथ में रखेंगे कोई डिफरेंस आपको नहीं लगेगा। पहनने से भी कुछ पता नहीं चलेगा। किंतु जो ये जो जहूरी है माने ये जो ज्वेलर है जिसको पता है कि उसके भीतर का जो पदार्थ कौन सा है वो इमीडिएटली कह देगा कि यह जो सोने का ब्रेसलेट है उसकी कीमत लोहे के ब्रेसलेट से 100 गुना ज्यादा है। सीधा वो आपको कह देगा। तो भीतर में जो पदार्थ है उसी की कीमत है। उसके ऊपर में आप जितना शेप डाल दीजिए उससे ज्यादा कुछ फर्क नहीं होने वाला। तो यहां पे स्वामी जी कहते हैं कि इवन साइंस के भीतर में भी यह विभिन्न तरह के जो फिनोमिना है उस जो विभिन्न फोर्सेस है उसको एक ही सेट ऑफ फिजिक्स के इक्वेशन के माध्यम से एक्सप्लेन करने का प्रयास हो रहा है। व्हेन फिजिकल साइंस कैन परफेक्टली ग्रेस द फाइनल यूनिटी इट विल हैव रीच्ड एन एंड फॉर रिचिंग यूनिटी वी फाइंड रेस्ट। नॉलेज इज फाइनल। इतना सुंदर स्टेटमेंट जब यह फिजिकल साइंस है, फिजिक्स है, वो यह ग्रैंड यूनिफाइड थ्यरी उसको खोज लेगा तब यह फिजिक्स का अंत आ जाएगा। इस अर्थ में नहीं क्या फिजिक्स का एप्लीकेशन अंत आ जाएगा। इस अर्थ में कि जो थ्योरिटिकल फ्रेमवर्क है, इट हैज़ रीच्ड इट्स परफेक्शन। आज आप फिजिक्स के माध्यम से कल आपने इंटरनल कंबस्शन इंजन बना दिया जो कि गाड़ी को चलाता है, कार को चलाता है। दूसरे दिन फिजिक्स के माध्यम से आपने यह जो रॉकेट है स्पेसशिपिप है वो बना दिया जो कि आपको गाड़ी यदि आपको यह मान लीजिए विशाखापट्टनम से कोलकाता लेकर जाएगी तो यह रॉकेट आपको मनुष्य को पृथ्वी से चांद या ये जो मंगल ग्रह के ऊपर में ले जाएगा। एप्लीकेशन देखिए कि कितनी वास्ट हो गई। फिर परसों दिन पता चला कि यही फिजिक्स ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस डेवलप कर दिया है। यही फिजिक्स ने यह नैनो टेक्नोलॉजी है या तो फिर यही फिजिक्स ने यह जो क्वांटम कंप्यूटर है उसको डेवलप कर दिया है। इसकी एप्लीकेशन कभी रुकने वाली नहीं है। किंतु जो थ्योरिटिकल फ्रेमवर्क है जो कि इस जगत को डिस्क्राइब करता है वो उसका अंत आ गया। तो वैसे ही देखिए कि जैसे ही फॉर रिचिंग यूनिटी वी फाइंड रेस्ट नॉलेज इज फाइनल। जब हम इस यूनिटी तक पहुंचते हैं तो यह जो हमारी इंटेलेक्चुअल क्यूरियोसिटी होती है, मुमुक्षुत्व जो होता है, उसका अंत आता है। जब हमको ज्ञान प्राप्त होता है, तब हमको सही-सही शाश्वत शांति प्राप्त होती है। शाश्वत सुख प्राप्त होता है। उससे पहले नहीं देखिए मुमुक्षुत्व का अंत है ज्ञान में और ज्ञान की परिसप्ति है आनंद में। तो यह मुमुक्षत्व ज्ञान और आनंद यह एक साइकिल है। किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि आनंद प्राप्त करने के बाद में हमारा सिविलाइजेशन स्टॉप हो जाएगा। यह बात नहीं है। वही है कि फिर उस आनंद के 1000 आप प्रैक्टिकल एप्लीकेशनेशंस खोज सकते हैं। हमारे वैदिक युग के साथ में जो एक सबसे बड़ा प्रॉब्लम यही हुआ था कि हमको एक बार ज्ञान और शाश्वत शांति प्राप्त हो गई तो हमने सोच लिया कि हां यह इतिहास का भी अंत आ गया। ह्यूमन सिविलाइजेशन अपनी चरम शिखर तक पहुंच चुकी है। इसके बाद में फर्दर इवोल्यूशन की कोई आवश्यकता नहीं है या संभावना नहीं है। इसीलिए जब यह एक्चुअली हमको करना क्या था? हमको स्प्रेड होना था। जितना हम स्प्रेड होकर के पूरे विश्व में अपने सनातन वैदिक धर्म का प्रचार करते उतना ही हमारे लिए अच्छा होता। यह जो नॉलेज इज फाइनल या तो फिर कहेंगे इन यूनिटी वी फाइंड रेस्ट। यह जो स्पिरिचुअल रेस्ट हमको मिलना था नहीं कि एक्टिविटी में रेस्ट लाना है। यह जैसे ही कोई अपने गांव से बाहर गया कि उसको नाथ बाहर कर दो। उसका हुक्का पानी बंद कर दो। यह काला पानी जिसने भी क्रॉस किया उसको वापस किसी मंदिर में प्रवेश ना करने दो। इस तरह की यह जो मानसिक संकुचितता भारत में प्रवेश कर गई थी। यही कारण है कि जब विद हम लोग यदि वहां पर नहीं जाएंगे तो वे लोग अपने यहां पर आएंगे। यह इतिहास का सिंपल नियम है। एक्सपेंशन इज लाइफ कॉन्ट्रक्शन इज डेथ। या तो आप विदेश में जाइए प्रचार करने के लिए या तो विदेशी लोग आएंगे हमारे पे अत्याचार करने के लिए। यह प्रचार और अत्याचार यही दो चीजें संभव है। इसके बीच में यह जो नॉलेज इज फाइनल एंड यूनिटी इज रेस्ट। यह सिर्फ आध्यात्मिक जगत में ही संभव है। नहीं कि जागतिक सांसारिक जगत में। यह जो डिस्टिंशन है वह शायद हम लोग भूल गए बोल के वी रेस्टेड अपॉन आवर लोरेंस। जैसे इंग्लिश में कहते हैं कि जो सफलता मिली इस आध्यात्मिक सफलता के सहारे हमने सोचा कि बस अभी पूरा सिविलाइजेशनल जो बाकी का बचा है लाइफ स्पान वही शांति और आनंद से गुजारेंगे जो कि कभी संभव नहीं है। तो यह जो क्लेरिटी है यह क्लेरिटी जिस तरह से हमको स्वामी जी देते हैं। कभी-कभी हम दूसरे एक्सट्रीम में चले जाते हैं। कभी-कभी हम सोचते हैं कि यह जो बाह्य जगत में सक्सेस है, वही सब कुछ है। जब तक मैं मिलियनेियर नहीं हो जाऊंगा, जब तक मैं बिलियनर नहीं हो जाऊंगा, जब तक मैं अमेरिका का प्रेसिडेंट नहीं हो जाऊंगा, तब तक मैं शांति से नहीं जीऊंगा। किंतु कोई भी मिलियनर बिलियनर अमेरिका का प्रेसिडेंट ये इसको देखिए। आपको नहीं लगेगा कि उनके जीवन में यह शाश्वत शांति प्राप्त हुई है। वे लोग जितना एजिटेटेड रहते हैं, वे लोग अभी यह जो ईलॉन मस्क और डोनाल्ड ट्रंप का युद्ध चल रहा है, इससे दो बड़े व्यक्ति जगत में मिलना मुश्किल है। एक है जगत का सबसे बड़ा धनपति और दूसरा है जगत का सबसे शक्तिशाली पॉलिटिशियन। अभी यह दोनों लड़ रहे हैं। तो देखिए कि बाहर के जगत में आप 200 बिलियन डॉलर आपके पास में होंगे। आज आधे म 70% जो देश है इस यूनाइटेड नेशन में जो रजिस्टर्ड है उनका 200 बिलियन का टोटल नेशनल जीडीपी नहीं होगा। इतना तो एक अकेले आदमी के पास में है। तो इतना धन प्राप्त करने के बाद में भी ना ही उसको शांति है ना ही वह उस सामने वाले पगले को शांति है। तो देखिए कि बाहर के जगत में आपको बहुत ज्यादा धन प्राप्त कर दिया। बहुत ज्यादा पावर प्राप्त कर दिया। इससे शांति नहीं मिलने वाली। आध्यात्मिक जगत में ही मिलेगी। किंतु साथ-साथ में ही जो गलती हमने कर दी कि आध्यात्मिक जगत में शांति प्राप्त करने के बाद में बाह्य जगत में जो एक्सपेंशन है उसको अटका दे। उसको स्टॉप कर दे। इस तरह का पगलापन भी फिर से कभी नहीं करना है। भीतर में शांति है। बाहर में कर्म तत्परता है। जैसे कि वो अपने रंगनाथानंद जी का वो एक फेमस एक्सप्रेशन था। काम इन द मिड्स ऑफ द हरिकन काम इन द आई ऑफ द स्टम। यह जो स्टम होता है गोल-गोल घूमने वाला हरीिकन उसके उसकी जो आई होती है उसका जो सेंटर है उसको आई कहते हैं। तो वो सेंटर में उसकी आंख जो है वहां पर आपको किंतु बिल्कुल शांति दिखाई देगी। यदि हम में वह साहस है उस स्टम के बीच में जाकर खड़े रहने का तो वैसे ही यह जो जगत पूरा चल रहा है और चारों ओर आपको फिर मन में शांति महसूस करनी है। देखिए भगवान महावीर का एक बड़ा सुंदर ऑब्जरवेशन है। मैंने बहुत साल पहले पढ़ा था। सो उसका जो वेरिफिकेशन या फ़क्चुअल वो एग्जैक्टली ऐसा ही है। ऐसा मैं गारंटी नहीं दे पाऊंगा। बहुत-ब साल पहले पढ़ा था। किंतु वह हमेशा मेरे मन में बैठकर के रहा है। वो जिस राजधानी में वो जो भगवान महावीर प्रिंस थे, राजकुमार थे वो जहां पर उनका इतना आदर सत्कार चल रहा था वहां पे वो राजकुमार अर्थात आप समझ ही लीजिए जहां पे भी जाएंगे उनको सबसे ज्यादा हाईएस्ट सम्मान मिलेगा। तो वह एक राजकुमार के तौर पर उस राजधानी में रह रहे थे। बाद में वह भिक्षु हुए। बाद में उनको कैवल्य प्राप्त हुआ और फिर वही राजधानी में वापस आकर के उसकी गलियों में वह भिक्षा मांग रहे हैं। तब वह कहते हैं कि इस गली में मैं राजकुमार होकर घूमता था। उस समय मुझे जितनी शांति नहीं मिली थी उतनी शांति इसी गलियों में भिक्षा मांग करके मुझे मिल रही है। तो देखिए कि दिस इज इंडिया कि आपने सब तरह का जो बाह्य अवलंबन है बाह्य जो कि आपका ये जो है एटेनमेंट है उसको त्याग कर दिया। भीतर में शांति प्राप्त कर ली किंतु फिर वह शांति प्राप्त करके बैठे नहीं है। वह घर-घर जाकर के वही जो उन्होंने धर्म तत्व प्राप्त किया उसको वो फैला रहे हैं। देखिए एक बड़ा

कहानी: उच्च भाव में स्वामी विवेकानन्द

सुंदर एक ये है इंसिडेंट स्वामी जी के ही जीवन में है। एक बार स्वामी जी के छोटे भाई महेंद्रनाथ वो वराह नगर मठ में गए। तो देखा कि जितने भी गुरु भाई हैं ना सब डर के मारे एक जगह पर खड़े हैं वो एक साथ में मिलकर के और देख रहे हैं कि स्वामी जी के सामने तो इन्होंने सोचा महन बाबू ने कि क्या इतने राजा महाराज सब वगैरह क्यों डर डर करके स्वामी जी की ओर देख रहे हैं। तो उन्होंने जाकर के देखा तो स्वामी जी जैसे कि उनका मन पता नहीं कहां चल गया है। उनकी आंखें भी पता नहीं कैसी वह दिख रही है। जैसे कि अनंत को देखती है और वहां पे वह टहल रहे हैं एक कोने से दूसरे कोने की ओर वो जो एक कॉर्नर से दूसरे कॉर्नर की ओर वो टहलते ही जा रहे हैं वॉकिंग करते ही जा रहे हैं करते ही जा रहे हैं किसी के सामने नहीं देख रहे हैं जैसे कि वो वॉकिंग समाधि इस तरह से वो किसी कोई माने पता नहीं कोई एग्जॉल्टेड स्टेट में वह मग्न हो गए होंगे। तो वह महीन बाबू कहते हैं राजा महाराज को कि मुझे स्वामी जी को एक मैसेज देना है। वह तो उनके छोटे भाई थे। घर में वह लो सूट वगैरह चल रहा था। कोर्ट केस वगैरह मुझे उनको एक मैसेज देना है। तो वो बोल राजा महाराज कहते हैं भाई ये नरेंद्र की जो परिस्थिति है वो किसी की बात नहीं सुन रहा है। टहलता ही जा रहा है। टहलता ही जा रहा है। पता नहीं उसका माइंड कहां गायब हो गया है। तुम जाकर के उनसे बात करो। यदि तुम्हारी बात सुनकर के वह वापस यदि पृथ्वी पर उनका मन आए तो वह महीन बाबू जाकर के उनसे बात करने का प्रयास करते हैं। स्वामी जी कोई उनके सामने लक्ष्य ही नहीं देते हैं। वो एक कॉर्नर से दूसरे कॉर्नर जो मशीन की तरह वो जो टहल देई जा रहा है। तो यहां पर महीन बाबू ने फिर आखिर में जोर-जोर से चिल्लाना शुरू किया। गाली देना शुरू किया। ऐसा ऐसा विकट एक उन्होंने हल्लागुल्ला शुरू किया कि आखिर में कहीं से जाकर के स्वामी जी का मन बाह्य जगत की ओर आया। अभी यह जो हुआ इसका फिर यह महिन बाबू एनालिसिस कर रहे हैं। कहते हैं कि भगवान बुद्ध का भी ऐसा हुआ था। निर्वाण प्राप्त करने के बाद में वो वहां पर टहल रहे थे। एक एक कॉर्नर से दूसरे एक एक पॉइंट से दूसरे पॉइंट की ओर बोधगया यदि जाएंगे तो वह जो भगवान बुद्ध निर्वाण प्राप्त करने के बारे बाद में जहां पर टहले थे वो वहां पर पत्थर के उनके वो पद चिन्ह है तो कमल की तरह और वह टहलते टहलते भगवान बुद्ध सोच रहे थे कि निर्वाण शाश्वत शांति प्राप्त करने के बाद में निर्वाण प्राप्त करने के बाद में देह को रखा जाए ना कि त्याग कर दिया जाए। तब उन्होंने सोचा कि नहीं ऐसे कुछ लोग तो है इस जगत में जिन्होंने निर्वाण प्राप्ति तक पहुंच तो गए हैं किंतु आखिरी कुछ बैरियर्स है बोलकर के वो वहां पे आखिरी मुकाम जो है आखिरी मंजिल है वहां तक क्रॉस ओवर नहीं कर पा रहे हैं। तो यह सोचा स्वामी बुद्ध ने कि जा चलते हैं वाराणसी चलते हैं। जहां पर उनके जो पांच साथी थे उनके साथ में तपस्या कर रहे थे। किंतु बाद में उन्होंने सोचा कि भगवान बुद्ध कहीं यह मटेरियलिज्म में प्रवेश कर गए हैं। उन्होंने अपनी तपस्या भंग कर दी है। वह लग्जरी में चले गए हैं। बोल के उन्होंने बुद्ध का संग त्याग करके वो वाराणसी कहीं जाकर के वह तपस्या कर रहे थे। तो भगवान बुद्ध उनके पास में गए और जो निर्वाण प्राप्ति का उनका जो अनुभव था यह जो उनका जो लर्निंग था वो उनको सिखाया। तो देखिए दिस इज दी आइडियल। भीतर में शांति प्राप्त करनी है किंतु बाहर में कर्म तत्परता बनी रहनी चाहिए। जब तक यह दोनों साथ-साथ चलेंगे तब तक हम जो कुछ भी कार्य भी करेंगे वह हमेशा के लिए होगा और हमारे भीतर में जो सेटिस्फेक्शन प्राप्त होगा इस तरह का कार्य करके यह सेटिस्फेक्शन हमको बिलियनियर होकर के भी नहीं मिलेगा। मोस्ट पावरफुल पॉलिटिशियन होकर के भी कभी नहीं मिलने वाला है। तो यहां पे देखिए स्वामी जी का सुंदर स्टेटमेंट फॉर रिचिंग यूनिटी वी फाइंड रेस्ट नॉलेज इज फाइनल। रिलीजन द मोस्ट प्रिशियस ऑफ ऑल साइंसेस लॉन्ग एगो डिस्कवर्ड दैट फाइनल यूनिटी टू रीच व्हिच इज द ऑब्जेक्ट ऑफ ज्ञान योगा। जो आध्यात्मिक विज्ञान है, आध्यात्मिकता है। मोस्ट प्रिशियस ऑफ ऑल साइंसेस जितने भी विज्ञान ले लीजिए फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी, नैनो टेक्नोलॉजी, एआई, क्वांटम डायनेमिक्स, क्वांटम क्रोमोडायनेमिक्स सब ले लीजिए। सबसे प्रिशियस जो है ह्यूमन सिविलाइजेशन के लिए वो है धर्म या तो आध्यात्मिकता या तो योग वेदांत। उसके अनुसार हमने लॉन्ग एगो बहुत हजारों सालों पहले यह खोज निकाला है कि यह जो फाइनल यूनिटी है यह जो ब्रह्म साक्षात्कार है या तो सर्वभूत में ब्रह्म दर्शन है उसको प्राप्त करना यही ज्ञान योग का अंतिम लक्ष्य है। ओके। इसके बाद में और भी बहुत कुछ है जिसको कि अभी हम कल ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु