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Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 30 Jun 2025

prayer00:09:00 सभी में ईश्वर को देखना ही साधना की परम उपलब्धि है

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिने अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः आज का क्लास लीला प्रसंग स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा रचित श्री रामकृष्ण देव की ऑथेंटिक बायोग्राफी हम जो पाठ कर रहे थे साधक भाव उसकी अवतरणिका हमने देख ली। अभी प्रथम अध्याय फर्स्ट चैप्टर हम प्रारंभ ऑलरेडी हमने कर दिया है साधक और साधना। इस चैप्टर का जो मेन थीम है शरद महाराज पहले तो प्रारंभ करते हैं यह कह के कि ठाकुर की साधनाओं का विवरण देने से पहले आइए चलिए भारत में साधना के बारे में क्या कहा गया है इसके बारे में एक विहंगावलोकन कर लेते हैं। एक ओवरऑल आउटलाइन हम प्राप्त कर लेते हैं। ऐसा करके शरद महाराज ने यह चैप्टर प्रारंभ किया है। फिर अब जैसे वह उत्तर पक्ष पूर्व पक्ष होता है जनरली भारत में तो शरद महाराज ने अपने ही विधान का खंडन करते हुए या तो फिर खंडन करने के लिए जो आर्गुममेंट दी जा सकती है इस तरह की एक आर्गुमेंट उठाकर के कहा कि ऑलरेडी रामकृष्ण देव की इस बायोग्राफी को पढ़ने के लिए जो वाचक आने वाले हैं, पाठक आने वाले हैं, उनको साधना के बारे में अवश्य कुछ ना कुछ पता होगा ही होगा। भारत में धर्म ग्रंथ भरे पड़े हैं। वेद, उपनिषद, पुराण यह फिर प्रकरण ग्रंथ और उसमें भी इतनी सारी स्कूल, द्वैत, अद्वैत, विशिष्ट अद्वैत तो ऑलरेडी किसी ने या इसके पाठक लीला प्रसंग के पाठकों ने कुछ ना कुछ उपनिषद, गीता या तो फिर जो लोकल संत महापुरुष है उनके कुछ ना कुछ तो पाठ किया ही होगा। तो फिर से वही साधना के बारे में लिख करके बिना मतलब किताब के पन्ने बढ़ाने की क्या आवश्यकता है? तो उसके उत्तर में शरद महाराज ने ऑलरेडी हमको कहा है कि बहुत बार ऐसा होता है कि किसी हम लोगों को साधना के बारे में बहुत तरह की भ्रांत धारणाएं होती हुई है। हो चुकी होती है हमारे मन में। हम लोग सोचते हैं कि किसी एक जगह पर विशिष्ट जगह पर बैठकर के किसी विशिष्ट क्रिया का अनुष्ठान करने से ही साधना हो गया। हम लोग कभी-कभी यह सोच बैठते हैं कि ईश्वर को जैसे कि हम सांप को मंत्र वशीभूत कर सकते हैं वह बंसूरी बजा के तो वैसे ही ईश्वर को भी हम वशीभूत कर सकते हैं। कुछ ना कुछ क्रिया कुछ ना कुछ विधि करके ये ग्रहों को जैसे हम कंट्रोल में कर सकते हैं। अंगूठी पहनकर ना की माला पहनकर ना कि ताबीज पहन करके तो ऐसा ही जिस तरह से ग्रहों को वशीभूत करने को जाते हैं। यह भूत प्रेत उसको कभी वशीभूत करने को जाते हैं। वैसे ही ईश्वर को भी वशीभूत कर लेंगे। तो यह एक भ्रांत धारणा है। जगह कोई विशेष जगह पर बैठकर के विशेष विधि करना इससे यदि ईश्वर प्रसन्न हो जाएंगे। यह भी एक भ्रांत धारणा है। और साथ में ही कभी-कभी क्या होता है? कोई गुरु होता है। उनका जो शिष्य होता है उसके शिष्य की जो यह एडओसिंक्रेसिस है, उसकी यह जो विचित्र उसका जो कर्म प्रवाह है, उस कर्म प्रवाह को लेकर के गुरु ने उसको कोई विशेष उपदेश कभी-कभी दिया होता है। तो उस उपदेश को पढ़कर के किसी थर्ड सोर्स से थर्ड पर्सन से कोई वाया कोई सोर्स से पढ़कर के या तो सुनकर के हम लोग सोच लेते हैं कि उस पर्टिकुलर शिष्य को जो पर्टिकुलर उपदेश दिया वो मेरे लिए योग्य है। मुझे भी उसका अनुष्ठान करना है। बोल कर के मैं वह करना शुरू कर देता हूं। किंतु आखिर में पता चलता है कि वह मेरे लिए अनुकूल नहीं थी साधना और उस तरह की साधना करने से मुझे हानि ही होगी। लाभ कुछ होगा नहीं। यही कारण है कि ठाकुर जब अपने ये जो त्यागी संतानों को जो कुछ भी उपदेश देते थे वह उस समय देखते थे कि और कोई गृहस्थ भक्त वहां पर उपस्थित ना हो। एक दिन की घटना है कि मास्टर महाशय आए हुए हैं वहां पर दक्षिणेश्वर में और फिर बात ऐसी चल रही है कि कहीं पर वह जाना है उनको गाड़ी में बैठकर के घोड़ा गाड़ी में बैठकर के कोलकाता ना कि ऐसा कुछ तो यह सब उद्योग चल रहा है। एकाएक उस समय नरेंद्र आकर के उपस्थित हुआ। तो ठाकुर नरेंद्र को देखकर के जैसा ठाकुर का था कि उनका हृदय हर्ष से उतफुल्ल हो गया। नरेंद्र के साथ में बड़े ही हंसहस करके हर्षोतफुल्ल वदन से उनके साथ में वार्तालाप करते हैं और फिर मास्टर महाशय को कहते हैं कि देखो अभी नरेंद्र तो आ गया है अभी उसको छोड़कर के थोड़ी ना हम लोग कोलकाता जा सकते हैं तो मास्टर महाशय कहते हैं अच्छा ठीक है कोलकाता नहीं जाते किंतु जब ऐसा कहा साथ में यह भी कहा तो ठाकुर कहते हैं कि अच्छा एक काम करो तुम लोग अभी आओ मैंने तुम लोग अभी यहां से विदाई लो मुझे अभी नरेंद्र के साथ में बात करनी है तो मास्टर महाशय कहते हैं ठीक है मास्टर महाशय भी समझ गए तो उन्होंने प्रणाम करके ठाकुर को वहां से विदाई ली तो देखिए कि इस तरह से ठाकुर को नरेंद्र को जो त्याग की शिक्षा देनी थी नरेंद्र है राखाल है योगेंद्र महाराज है वगैरह वो सब स्पष्ट वो देख लेते थे कि आसपास में कोई गृहस्थ भक्त उस समय ना हो और इसका एक परिणाम यह भी आया था कि जब यह गृहस्थ त्यागी संतानों ने संघ होकर के मठ की स्थापना करने का प्रयास किया तो यही गृहस्थ भक्त थोड़े से यह भी हो गए थे दुविधा में पड़ गए थे कि ठाकुर ने तो ऐसा कभी कुछ कहा नहीं है। यह लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं? किंतु इसके पीछे का यह जो पूरा डायनेमिक्स है उसके पीछे की यह तो कुछ सनातन सिद्धांत है। जो भी श्रेष्ठ गुरु है, वह हमेशा देखता है कि उसका शिष्य किस तरह की वृत्ति का किस तरह की साधना का अधिकारी है और उसी के अनुसार उसको वह साधना करवाता है और यह भी देखते हैं यह श्रेष्ठ गुरु के इस तरह की विशेष साधना का अधिकारी उसको देखादेखी करके दूसरे लोग उसी लाइन पर ना चलने लगे बोल के वह उनसे यह सब चीजों से दूर ही रखते हैं। बुद्धिज्म में ऐसा गड़बड़ हो गया था कि भगवान बुद्ध ने तो सन्यास ले लिया और कुछ-कुछ राजाओं को भी राजकुमारों को भी सन्यास दिलवा दिया। बोल कर के पूरे भारत में एक जु्वार जैसा चला कि क्षत्रिय है तो सन्यास लेना है। अभी सन्यास के अधिकारी होते हैं मुट्ठी भर लोग। जो कोई भी ऐसा वैसा आकर के सन्यास ले लेगा तो आखिर में क्या होगा? सन्यास का जो पूरा इंस्टीट्यूशन है वही करप्ट हो गया। एक चीज दूसरे के जो सर्वश्रेष्ठ क्षत्रिय थे वे लोग जब त्याग का रास्ता अपनाएंगे तो फिर शत्रुओं के आक्रमण के सामने देश की रक्षा करने वाला कोई बचा नहीं। तो यह गुरु जो है अधिकारी को समझ करके उपदेश देते हैं। तो यह शरद महाराज यह सब फैक्टर्स समझा के हमको कहते हैं कि ऐसी पूरी पॉसिबिलिटी है कि आपके मन में कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ भ्रांत धारणा होगी। तो उस भ्रांत धारणाओं को दूर करने के लिए आइए अभी हम अपने वेद और उपनिषद में धर्म के बारे में, अध्यात्म के बारे में, आत्म तत्व के बारे में, ईश्वर दर्शन के बारे में क्या कहा गया है, उसका थोड़ा सा एक आउटलाइन देखते हैं। तो, यह आउटलाइन अभी शरद महाराज प्रारंभ कर रहे हैं। देखते हैं कि वह क्या कह रहे हैं। अभी यह जो पॉइंट है उसका नाम है साधनार चरम फल सर्वभूते ब्रह्म दर्शन। साधना का चरम फल क्या है? चरम परिणति क्या है? तो वो है सर्वभूत में ब्रह्म का दर्शन करना। इस जगत में आस्तंभ पर आस्तंभ ब्रह्म पर्यंत अर्थात कि स्तंभ अर्थात कि यह जो वो दुर्वा का एक ये होता है पत्ता दुर्वा घास का एक पत्ता वहां से लेकर के ब्रह्म तक संपूर्ण जीव जगत में इस ब्राह्मण का दर्शन करना तो वह है साधना की चरम परिणति क्या कहते हैं शरद महाराज ठाकुर बोली ठाकुर ठाकुर कहते थे सर्वभूते ब्रह्म दर्शन बा ईश्वर दर्शन शेष कालर कथा ठाकुर क्या कहते थे सर्वभूत में ब्रह्म दर्शन या ईश्वर दर्शन शेष काल की बात है अर्थात कि साधना की चरम सिद्धि प्राप्त करने से यह दर्शन या तो फिर यह अनुभूति हमको होती है। साधना चरम उन्नति ते उहा मानवे भाग्य उपस्थितो होए। साधना की चरम उन्नति प्राप्त करने के बाद में ही साधक के मन भाग्य में मन मनुष्य के भाग्य में यह उपलब्धि उपस्थित होती है। हिंदूर सर्वोच्च प्रामाण्य शास्त्रों वेदोपनिषद ओई कथाई बोलिया थाके केन हिंदुओं का जो सर्वोच्च प्रामाणिक शास्त्र है जो मोस्ट ऑथेंटिक स्क्रिप्चर्स है हम हिंदुओं के वह सब मिलकर के यही बात करते हैं कि सर्वभूत में ईश्वर दर्शन यही साधना की चरम परिणति है। शास्त्र बोलेन जगत स्थूल सुखो चेतन अचेतन जहां किु तुम्ही देखी ते पते छो ईंट काठ माटी पाुष पशु गाछ पाला जीभ जानवर देव उपदेव शकुलई एक अद्वय ब्रह्म वस्तु शास्त्र कहते हैं जगत में स्थूल सूक्ष्म चेतन अचेतन जो कुछ भी तुम देख पाते हो ईंट काठ आठ मानी की यह लकड़ी मिट्टी पत्थर मनुष्य पशु पेड़पधे जीव जानवर देव उपदेव सब कुछ एक अद्वय ब्रह्म वस्तु ही है ब्रह्म वस्तु के ही तुम नाना रूपे नाना भाबे देखते छो सुनीते छो स्पर्शो घण और आशवाद करते छो ब्रह्म वस्तु को ही तुम विविध रूप से विविध रूप से विभिन्न रूप से देख रहे हो सुन रहे हो स्पर्श कर रहे हो सूंघ रहे हो और आस्वाद कर रहे हो यह जो पंच ज्ञानेंद्रिय है हमारी वह सब पंच ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से आंखों के माध्यम से नाक के माध्यम से जिहवा के माध्यम से स्पर्श के माध्यम से कर्ण के माध्यम से हम उसी ब्रह्म वस्तु को ही ग्रहण कर रहे हैं। ताहा के लया तो शकल प्रकार दनंदिन व्यवहार आज जीवन निष्पन्न होले ओ तुम जहां बुझते ना पारिया भाभीते छो भिन्नभिन्न वस्तु और व्यक्ति सहित तुम ओ रूप करते छो उसको लेकर के ही वही एक अध्वय ब्रह्म को लेकर के ही तुम्हारा दिन प्रतिदिन का सब जीवन व्यवहार निष्पन्न हो रहा है। जीवन व्यवहार चल रहा है। किंतु इसके बावजूद तुम ना उसको समझ पा रहे हो ना उसके बारे में सोच पा रहे हो कि यह भिन्नभिन्न वस्तु और व्यक्ति जो तुम समझ रहे हो वह और कुछ नहीं है वही एक ब्रह्म वस्तु ही है कथागुली शून्या आमादे मने जे संदेह परंपरा उदय होइया थाके एवं ओ शकल निरसने शास्त्र जहां बोलिया थाकेन प्रश्नोत्तर छले तहार मोटा मोटी भापटी पाठक के एकने बोलीले उहा सहजे हृदयंगम हो बार संभावना अभी यह जो बात है यह बात इतनी आश्चर्यजनक है कि उसको सुनकर के हमारे मन में संदेह की परंपरा प्रश्नों की परंपरा उदित होगी और उस प्रश्न संदेह का निराकरण करने के लिए प्रश्नोत्तर के माध्यम से शरद महाराज एक के बाद एक हमारे हमारे संदेह का निराकरण करने का प्रयास करते हैं। किंतु वह संदेह का निराकरण हम देखें। इससे पहले यह जो कांसेप्ट है कि सर्वभूत में ईश्वर दर्शन या ब्रह्म दर्शन इसके बारे में हमारे शास्त्रों में हमारे रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य में क्या कहा गया है? देखिए मैंने यहां पर एक छोटा सा कंपाइलेशन किया है। देखिए कि यह जो कांसेप्ट है इस कांसेप्ट के बारे में सर्व अच्छा ये बात तो हमको एकदम पक्का पता है कि यह जो सर्वभूत में ईश्वर दर्शन करने का अल्टीमेट कंक्लूजन क्या है। जिसने भी रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य का अभ्यास किया होगा इन सबको यह बात बड़ी बखूबी पता है कि यदि हम सर्वभूत में ईश्वर दर्शन करते हैं तो वह सिर्फ साधना की चरम परिणति के बाद में ही यह अनुभूति करना यह नॉट नेसेसरी आप साधना के प्रारंभ से ही इस अनुभूति को जैसे कि सिमुलेट कर सकते हैं। जैसे कि यह अनुभूति मुझे ऑलरेडी प्राप्त हो चुकी है। बौद्धिक रूप से यह समझ करके आप मनुष्य की सेवा को भी एक साधना के रूप में ले सकते हैं। शिव ज्ञाने जीव सेवा तो यह जो ठाकुर का जो यह कांसेप्ट है या तो फिर कहेंगे कि जो वेद उपनिषद का यह जो कांसेप्ट है कि सर्वभूत में सर्व जीव में ब्रह्म दर्शन उसी का जो अल्टीमेट कंक्लूजन है शिव ज्ञाने जीव सेवा किंतु यह जो कंक्लूजन आता है उसके पहले यह जो जिसको सिद्धांत वाक्य कहेंगे उस सिद्धांत वाक्य के बारे में अपने शास्त्र क्या कहते हैं वह देख लेते हैं और फिर इसके बाद में अपने साहित्य में इस सिद्धांत वाक्य को लेकर के आखिरी अल्टीमेटली क्या कंक्लूजन दिया गया है वह थोड़ा सा देखेंगे। तो देखिए कि गीता का

भगवद गीता में : सर्व भूत में ईश्वर दर्शन

सिक्स्थ चैप्टर में श्लोक 29 टू 32 यह जो कुछ श्लोक मैंने यहां पर कंपाइल किए हैं। देखिए क्या कहते हैं भगवान कृष्ण। सर्वभूतस्थम आत्मानम सर्वभूतानी च आत्मनी इक्षते योग युक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन जो सर्वभूत में वह आत्मन का दर्शन करता है और सर्वभूत का अपने आत्मन में दर्शन करता है वह योग युक्त आत्मा जिसको जो सर्वत्र समदर्शन करता है। देखिए यह कांसेप्ट जो है बहुत बार ऐसा होता है कि हम जगत को कैटेगरीज में बांट देते हैं। यह मेरा पड़ोसी है। यह मेरा परिवार है। यह मेरे मित्र है और यह मेरे शत्रु है। तो देखिए कि किस तरह से यह ग्रेडेशन चलता है कि यह मेरे परिवारजन है। वह मेरे सबसे तकरीबी है। उनके प्रति मेरा सबसे ज्यादा स्नेह रहेगा। इसके बाद में मेरे मित्र आते हैं। मित्रों के साथ में कभी हंसी मजाक कभी-कभी मन दुख भी हो जाता है। परिवारजनों के साथ में भी होता है। वैसे पत्नी है, पुत्र है, पति है सबके साथ में होता है। किंतु क्या है? परिवार का जो एक बाइंडिंग है फैमिली का यदि गुस्सा भी आ जाता है तो कैसे भी करके हम लोग एडजस्ट कर लेते हैं क्योंकि साथ में रहना है वही उसी का चेहरा सुबह को उठकर के देखना है सोने से पहले उन्हीं को देखना है यदि मन में बहुत ज्यादा इनके प्रति द्वेष रखेंगे तो कार्य नहीं चलेगा तो जनरली फैमिली लाइफ में हम सभी लोग एडजस्ट होना सीख लेते हैं। दूसरा कि प्रेम तो है ही है। पतिप का प्रेम है। मां-पिताजी का संतान के ऊपर में अपने बच्चों के ऊपर में प्रेम है। वो बच्चों का पिताजी के ऊपर में प्रेम है। भाई-भाई का भाई-बहन का जो प्रेम है वो तो रहता ही है। तो यानी कि हम लोग सोचते हैं कि परिवारजन जो है वह मेरे सबसे तकरीबी है। फिर मित्र आते हैं। मित्रों के साथ में कभी झगड़ा होता है तो कभी हम उस मित्र अभी जैसे कि बचपन में बहुत बार ऐसा होता है कि स्कूल में जो मेरा बेस्ट फ्रेंड था वो जब बड़े हुए तो वह कहां पर चला गया वह तो याद भी नहीं आता है सालों के बाद में कभी एक बार मुलाकात हो भी जाएगी तो जैसे कि दो स्ट्रेंजर है दो बिल्कुल अपरिचित व्यक्ति है इस तरह से बिहेव करते हैं तो क्या है मित्रता आती रहती है जाती रहती है जब मित्रता चलती है तो लगता है यह आदमी कितना तकरीबी है मित्रता ता बिछड़ जाती है तो लगता है कि उसका मेरे जीवन में वैसे कोई स्थान नहीं। इसी तरह से पड़ोसी है, कलीग्स हैं उनके साथ में कंपटीशन भी चलता है। और फिर आखिर में शत्रु आते हैं हमारे माने जिनको कि हम शत्रु के रूप में मान लेते हैं। देखिए कि इस तरह की कैटेगरीज के साथ में हम इस समाज को बांटते हैं। फिर इससे भी बड़ी कैटेगरीज यदि हम देखेंगे तो पेट्रियोटिज्म एक है कि मेरे मेरा जो देश है उसका अच्छा होना चाहिए। और जो मेरा दुश्मन देश है वहां पर यदि कुछ गड़बड़ भी हो कुछ बुरा भी हो यदि वहां पर अर्थक्वेक भी आ जाए यदि वहां पर कुछ बहुत बड़ी बीमारी पेंडेमिक भी फैल जाए तो हमको कभी-कभी अच्छा लगता है कि देखिए इन लोगों के साथ में तो यही होना चाहिए था। क्यों ऐसा होता है? क्योंकि हम जगत को कैटेगरीज में बांटते हैं। देखिए ऐसा नहीं है कि यदि हम अपने आत्मन को सब में दर्शन करेंगे और सबके भीतर में मेरे भीतर में वही आत्मन है जो कि सबके भीतर में है। सर्वभूतस्थम आत्मनम आत्मानम सर्वभूतानी च आत्मनी सबके भीतर में जैसे कि मेरा आत्मन है मेरे भीतर में सबका आत्मन विराजमान है। इस तरह से यदि हम सोचेंगे तो हम कहीं कमजोर नहीं हो जाएंगे क्या? कोई भी आकर के हमारा बेनिफिट नहीं ले लेगा क्या? कोई भी आकर के यदि मेरी मेरा शोषण करें तो मैं क्या उसका कोई उत्तर नहीं दे पाऊंगा क्या? इस तरह का एक संदेह प्रकट होता है। किंतु देखिए कि इसी गीता में भगवान कृष्ण इसी अर्जुन को युद्ध करने का उपदेश देते हैं। देखिए कितना डिलीशियस यह फिलॉसोफिकल कंट्रास्ट है। युद्ध के मैदान में शत्रुओं का संहार करने के लिए भगवान अपने शिष्य को अर्जुन को कह रहे हैं। एक योद्धा उस समय का सर्वश्रेष्ठ योद्धा एक क्षत्रिय को भगवान यह उपदेश दे रहे हैं। किंतु इस उपदेश में साथ-साथ में क्या कहते हैं? जो कि सर्वभूत में अपने आत्मन का दर्शन करता है। सर्वभूत के आत्मन को सर्वभूत को अपने आत्मन में निहारता है। वही आदमी सर्वश्रेष्ठ है। तो यह कंट्रास्ट कैसे? तो यह बात याद रखनी है। दिस इज द सीक्रेट ऑफ आवर हिंदूइज़्म। यह भगवत गीता का भी सीक्रेट है। यह हिंदू धर्म का भी सीक्रेट है। हम सभी लोग दो एक्सट्रीम में चले जाते हैं। या तो फिर हमारी आत्मन को सर्वभूत में दर्शन करके सर्वभूत को अपनी आत्मन में दर्शन करके हम लोग बिल्कुल कभी-कभी यह कायर बन जाते हैं। हम लोग कभी-कभी निहत्ते बन जाते हैं। हमारे पास में स्वब बचाव करने के लिए सेल्फ डिफेंस करने के लिए जैसे कि किसी भी तरह का मानसिक शस्त्र नहीं रहता। हाथों से तो शायद हम अपना बचाव कर पाए। किंतु एक जो मेंटल एटीट्यूड होना चाहिए एक करेजियस मेंटल एटीट्यूड। एक वीर का भाव वो वीर का भाव कभी-कभी नामगी में बदल जाता है। कि हां यदि सभी भूतों में एक ही आत्मन है तो मैं क्यों किसकी हत्या करने को जाऊंगा? वह एक एक्सट्रीम आ जाता है। तो दूसरा एक्सट्रीम है कि कभी-कभी हमको लगता है धर्म हमको कमजोर बनाता है तो चलो इस धर्म को ही छोड़ दो। तो ऐसा करके दोनों तरह के लोग हमको देखने को मिल जाएंगे। इस तरह के धार्मिक बन जाएंगे जो कि धर्म उनको नामर्द बना देता है और जिसको मर्दानगी चाहिए वह धर्म को ही तज करके अधर्म के रास्ते पर चलने लगता है। इन दोनों एक्सट्रीम से बचना है। गीता में भगवान कृष्ण स्पष्ट रूप से अर्जुन को कहते हैं युद्ध के मैदान में तुमको युद्ध करना ही है। किंतु यह ख्याल में रखो कि वही तुम्हारी आत्मन ही सभी में विराजमान है। एक ही आत्मन है। तुम्हारी उनकी यह सब डिफरेंशिएशन इटसेल्फ कम्स फ्रॉम इग्नोरेंस अविद्या। तो किंतु हत्या क्यों करोगे? तुम यदि यह देखोगे कि तुम आत्मन के माध्यम से आत्मन की हत्या होती है तो तुम्हारे मन में कोई गिल्ट फीलिंग नहीं रहेगी। तुम धर्म को फॉलो कर रहे हो। उन्होंने कुकार्य किया है, कुकर्म किया है तो उनको उनके इस कार्य की सजा मिलनी चाहिए। यह तो एक डिवाइन लॉ है। भगवान ने ही इस नियम की रचना की है। जो जैसा कर्म करेगा उसको उस कर्म का उस अनुसार फल मिलेगा। यदि वह कोई बहुत बड़ा अधर्म करता है तो उसके लिए दंड का विधान है ही है। बस यही समझो कि यह दंड का विधान करने वाले ईश्वर के ही तुम एक इंस्ट्रूमेंट मात्र हो। यानी कि यदि हम किसी की हत्या करना चाहे, यदि किसी के ऊपर में हम वार करना चाहे, अटैक करना चाहे तो हमारा धार्मिक कांसेप्ट बड़ा ही क्लियर रहना चाहिए। शत्रुओं ने हमारे देश पे टेररिज्म का आक्रमण किया है। पीछे से हमारी पीठ में छुरी मारी है तो फिर हमको उसका सामने विधान करना होगा। सामने उनकी पिटाई करनी होगी। यह धर्म है। किंतु यदि मेरे मन में यह लोभ प्रकट हो जाए कि यह जो मेरे पड़ोस वाला जो देश है उसकी यह जमीन में यदि हथिया लेता हूं तो मुझे बड़ा ही जिओपॉलिटिकल बेनिफिट मिलेगा। ये बोलकर के यदि मैं आक्रमण करता हूं तो वो अधार्मिक है। यानी कि देखिए कि भारत में जो धर्म है उसको ठीक-ठीक फॉलो करेंगे तो हम आध्यात्मिकता के रास्ते में भी आगे बढ़ेंगे और साथ-साथ में हम कभी कमजोर भी नहीं होंगे। इसके बाद का श्लोक क्या कहता है? यो माम पश्यति सर्वत्र सर्वम च मई पश्यति तस्याह न प्रणश्यामि सचमेन प्रणश्यति जो मुझ में जो मेरा दर्शन सब में करता है और जो सब में मेरा दर्शन करता है वह ना ही मेरे लिए अदृश्य होता है ना ही मैं उसके लिए अदृश्य होता हूं। देखिए ऊपर में जैसे कहा कि सर्वभूत में आत्मन का दर्शन करना है। सर्वभूत का दर्शन अपनी आत्मन में करना है। वह हो गया जैसे कि प्योर अद्वैत। तो यहां के दूसरे ही श्लोक में जैसे कि भगवान उसको फ्लिप करके साथ-साथ में क्या कहते हैं? जो मेरा दर्शन सब में करता है और सबका दर्शन मुझ में करता है, वही है मेरे लिए एक श्रेष्ठ भक्त। देखिए कि यह जो द्वैत और अद्वैत स्कूल को भगवान कृष्ण कितना सीमलेसली इंटीग्रेट करते हैं। यदि अद्वैत वाले हैं होंगे तो ऐसा सोचेंगे कि हां भगवान ने तो ऐसा कहा है कि सर्वभूत में आत्मन का दर्शन करना है। यानी कि आत्मन ही सर्वश्रेष्ठ है। या तो फिर कहेंगे कि गीता अद्वैत वेदांत सिखाती है। किंतु इसी गीता में आपको भगवान कृष्ण खुद के बारे में भी कहते हैं कि यदि मैं हूं अवतार अवतार यानी कि ईश्वर का एक अंश पंचमहाभूत का देह धारण करके पृथ्वी पर अवतरण हुए हैं। जिनका की जिनकी की आराधना करके मनुष्य सहज रूप से आध्यात्मिक जगत में वो विकास कर सकता है अपना। तो यह माने एक और भगवान कृष्ण कहते हैं कि आत्मन ही सर्वत्र फैला हुआ है। आत्मन ही सब में विराजमान है। आत्मन की ही किरण से सब कुछ चेतनवंत दिख रहा है। साथ-साथ में ही उसके एग्जैक्टली नेक्स्ट श्लोक में ही भगवान कहते हैं कि मैं ही सब में विराजमान हूं। सब कुछ जैसे कि मेरे में ही विराजमान है। यानी कि यदि हम यह कहना चाहे कभी-कभी हम जैसे कहते हैं ना कि यह अद्वैत वेदांत ही सर्वश्रेष्ठ वो वाद है या तो फिलॉसोफी है। देखिए सब समय हमको ठाकुर की यह बात याद रखनी है। मास्टर महाशय को कहा था उन्हीं निराकार शाकार आभार आरकतों की माने भगवान या तो फिर यह जो अंतिम दिव्य सत्ता है दिव्य तत्व है वह साकार भी है निराकार भी है और साथ-साथ में और कितना कुछ है जो ये जो पंडित जी वाली जो एक संकीर्ण इंटेलेक्चुअल मेंटालिटी लेकर के शास्त्रों का अर्थ घटन करने को जाते हैं। वही दिए दिव्य सत्ता को साकार निराकार द्वैत अद्वैत विशिष्ट अद्वैत जैसे कि सीमाओं में इस तरह की जैसे कि एक चार दीवारी में बांधेंगे जो सही-सही साधक है और जो अवतार स्वयं है ईश्वर के अंश स्वयं है वही नारायण पंचमहाभूत का देह धारण करके जमीन पर पृथ्वी पर अवतरित होते हैं। वे लोग कभी भी इस दिव्य तत्व को किसी भी चार दीवारी में किसी भी तरह की फिलोसोफिकल कंस्ट्रेंट के भीतर में उनको नहीं बांधेंगे। सर्वभूत स्थितम यो माम भजत एकत्वमा स्थित सर्वथा वर्तमानोपी सह योगी म वर्तते मुझ में एक ही भाव से स्थित हुआ जो भक्ति योगी संपूर्ण प्राणियों में स्थित मेरा भजन करता है वह सब कुछ वर्ताव करता हुआ भी मुझ में ही वर्ताव कर रहा है। अर्थात वह नित्य निरंतर मुझ में ही स्थित है। सर्वभूतम स्थितम योमाम भजति एकत्वम आस्थितः सर्वभूत के भीतर में जो मैं वर्तमान हूं ऐसे मुझ की जो आराधना करता है देखिए किस तरह के ईश्वर की आराधना करनी है। मंदिर में बैठे हुए हैं, कहीं पेंडोल में बैठे हुए हैं। कहीं किसी ग्रह के ऊपर में बैठे हुए हैं। कहीं किसी स्वर्ग में बैठे हुए हैं। इस तरह के ईश्वर की आराधना नहीं। सर्वभूत स्थितम योमा जो कि सर्वभूत में स्थित जो ईश्वर है उसकी जो आराधना करता है वह योगी म वर्तते अर्थात सब समय मुझ में ही स्थित है। ईश्वर के बारे में अपना जो कांसेप्ट है उसको भी बड़ा क्लियर रखना है कि हम किस तरह के ईश्वर की आराधना कर रहे हैं। आत्मपम्यन सर्वत्र समम पश्यतियो अर्जुन सुखम वा यदिवा दुखम स योगी परमोमत हे अर्जुन जो भक्त अपने शरीर की उपमा से यह जगत समान देखता है और सुख अथवा दुख को भी समान देखता है वह परम योगी माना गया है। आत्म उपम्यन सर्वत्र जो आत्मन की तरह से सब सर्व कुछ देखता है। समम पश्यति जो सब कुछ समान रूप से देखता है। देखिए कितना सुंदर सुंदर शब्द है। आत्मा उपम्यन सर्वत्र आत्मन की उपमा से जो सर्व कुछ देखता है। समम पश्यति जो कि सब कुछ एक समान रूप में देखता है। सुखम वा यदिवा दुखम सुख आ जाए ना कि दुख आ जाए। वो योगी परम योगी है। यह मेरा मत है। तो देखिए कि ईश्वर का दर्शन ईश्वर को आप चाहे सिर्फ मंदिर में ही देखेंगे चाहे कहीं स्वर्ग में ही देखेंगे कि चाहे सिर्फ अपने आत्मन में ही देखेंगे। यह एक बड़ा ही नैरो माइंडेड कांसेप्ट है। यह देखिए कि कभी-कभी स्वामी जी ने एक बड़ी सुंदर बात कही है। स्वामी जी क्या कहते हैं? क्रुअल्टी इज ऑबवर्स ऑफ स्लेवर स्लेवरी। और या तो फिर स्लेवरी इज ओव्वर्स ऑफ क्रुअल्टी। अर्थात कि यह क्रुअल्टी यानी कि क्रूरता और यह स्लेवरी अर्थात कि दासत्व एक ही सिक्के की दो पहलुएं हैं। यदि हम भारत 1000 साल से गुलाम रहा इसके पीछे का कारण क्या है? कारण है कि हमारा हृदय जो है बड़ा ही निष्ठुर हो चुका था। हम लोगों ने 1000 साल दुनिया भर के वाद इस तरह की फिलॉसोफी इस तरह की साधना सब कुछ हमने यह खोज तो निकाला। यह जो भाव साधनाएं हैं भाव साधना आप देखिए कि एक के बाद एक शांत दास्य सख्य वात्सल्य मधुर यह जो भाव का जो सोपान है एक के बाद एक सोपान सर करके आप ईश्वर के जो एक के बाद एक विभिन्न अनुभूतियां प्राप्त करते हैं। इससे और बेटर आपको साधना के बारे में कोई जो अवधारणा है, कॉन्सेप्ट है, जो आइडियाज और फिलॉसोफी है और कहां पर मिलेगा? अद्वैत वेदांत जैसी फिलॉसोफी जो कि एक के बाद एक पूरे जगत के जितने भी कामना वासनाएं हैं मनुष्य का इस जगत के साथ में जो अटैचमेंट है या तो फिर जो कंफ्यूजन है जगत के बारे में अपने खुद के बारे में यह जगत सत्य है और यह जो मेरा देह है छोटा सा ये जो दो छोटे-छोटे हाथ ये एक छोटा सा शरीर यह पूरा विश्व ब्रह्मांड के भीतर में हमारा स्थान कहां पे है तो कुछ नहीं है तो कभी-कभी यह जो इनफ फीलिंग आ जाता है या जो डिप्रेशन कभी-कभी आ जाता है। डिसएवरमेंट आजकल के जो साइकेट्रिस्ट इसको कहते हैं। कभी-कभी ये जो खास करके ये जो कम्युनिस्ट यूरोप था अह कम्युनिज्म जब यूरोप में फैला फिर सब जगह पे डिक्टेटरशिप आ गया। तो ये डिक्टेटरशिप आने की वजह से क्या होता है कि सिटीजन जो है वह सिर्फ एक मशीन के भीतर में उनका एक दे कोक्स इन द मशीन। ऐसा कहते हैं। यानी कि एक बहुत बड़ा मशीन है। उसमें ये छोटे-छोटे यंत्र मात्र है। आपको कहा जाएगा कि तुमको ये जूते बनाने की फैक्ट्री में काम करना है। तो आपको जूते बनाने की ही फैक्ट्री में काम करना है। आपको कहा जाएगा आपको सैनिक होना है तो आपको सैनिक ही होना है। आपका जीवन फ्रॉम क्रेडल टू ग्रेव अर्थात कि जन्म से लेकर के मृत्यु तक यह जो कम्युनिस्ट स्टेट है उनके हाथ में रहेगा। इसकी वजह से बहुत सारे लोगों के मन में उनकी जो एस्पिरेशंस जो होती है, उनकी यह जो एंबिशन होती है, उसको फुलफिल करने का कोई माध्यम नहीं मिलता और यह लोग जो है बड़े ही डिप्रेस हो जाते थे। तो यह डिप्रेशन इसको यह पूरा एक एक कफका बोलकर के एक था एक नोवेलिस्ट वो डिस्टोपिया इसको कहते हैं। तो ये डिस्ट्रोपिक नोवेल्स ये लोग सब लिखते हैं कि जहां पर मनुष्य का खुद का कोई फ्री विल नहीं है। खुद खुद की कोई होप्स एंड एस्पिरेशंस एंड एंबिशन नहीं है। बस वो एक मशीन की तरह उसको जो कहा जाए वह करना है। मनुष्य पूरा जैसे कि मशीन में परिणत हो गया है। तो इस तरह का एक भाव जो है वह उस समय फैल रहा था। इसके अगेंस्ट में आप यह देखिए कि यह जो आत्मन का स्वाधीन्य स्वातंत्र्य या तो फिर ईश्वर के साथ में यह मान, अभिमान, प्रेम, मधुरभाव, इसका संबंध यह कितना लिबरेटिंग फिलॉसोफी है। किंतु इतना लिबरेटिंग फिलॉसोफी भारत में होने के बाद में भी एक जो बहुत बड़ी कमी हमारे में रह गई थी। पिछले 1000 साल स्वामी जी ने जैसे कहा दासत्व और क्रूरता यह स्लेवरी और क्रुएल्टी यह दोनों एक ही सिक्के की दो पास जो साइड्स है यानी कि यदि हम 1000 साल तक गुलाम थे उसके साथ-साथ में क्यों गुलाम थे? क्योंकि इतना उच्च आत्म तत्व प्राप्त करने के बाद में भी आत्मन का स्वा स्वतंत्र्य आत्मा का आत्मा की स्वाधीनता इसको समझने के बाद में भी यह जो आत्मन सर्वभूत में विराजमान है वही ईश्वर यह सभी लोगों के भीतर में यह विराजमान है। जैसे कि ठाकुर ने मां को कहा कि मां मैं खा नहीं पा रहा हूं। थोड़ा सा इसका कुछ व्यवस्था कर दो। तो मां ने साथ-साथ में ही ठाकुर को क्या कह के दिखा दिया कि इतने मुंह से तो क्या कौन खा रहा है? तो इतने मुंह से तो वही ठाकुर ही तो खा रहे हैं। तो देखिए कि यह जो सर्वभूत के भीतर में वही ईश्वर है वो बात जो थी वो बात जैसे कि हम लोग भूल गए थे। तो हमने सिर्फ एक अपना आध्यात्मिक विकास करने के बारे में सोचा। बंगाल में एक थोड़ा सा हुआ था कि चैतन्य देव ने आ चंडाल सबको जो भी निम्न जाति के तथाकथित निम्न जाति के थे उन सबको जैसे कि आलिंगनबद्ध करके वैष्णव धर्म में उनको स्थान दिया बोलकर के आज कहते हैं कि आज सिर्फ आधा बंगाल ही कन्वर्ट हुआ है माने टूटा है भारत से यदि चैतन्य महाप्रभु नहीं आते तो पूरा बंगाल चला जाता तो यह बात बिल्कुल सही है देखिए कि जब हम लोगों का हृदय कठोर हो जाए हमारे भाई बहनों के यह जो दुख शोक कष्ट ष्ट है। उसके प्रति हम लोग जैसे कि अपने को बिल्कुल अंधा कर ले और यह सोचे कि मैं सिर्फ अपना ही विकास करूंगा। वह चाहे इंद्रियों के सुख के चरितार्थ में हो ना कि आत्मन की प्राप्ति के बारे में। आध्यात्मिक या तो फिर यह जागतिक मैं सिर्फ अपना ही विकास करूंगा। यही ईश्वर जो कि लोगों के भीतर में बस रहे हैं। वही आत्म तत्व जो कि सबके भीतर में विराजमान है जो कि सबको एनिमेट करता है जो कि सबको जीवन प्रदान करता है। उसको मैं यदि भूल जाऊंगा तो वह मेरी बहुत बड़ी गलती होगी। तो देखिए कि यह सब उपदेश ऑलरेडी गीता में थे। ऑलरेडी यह जो हमारी भारतीय परंपरा है इसमें ये चले आ रहे हैं। इसके बावजूद इसका यह जो प्रॉपर एप्लीकेशन है शिव ज्ञान जीव सेवा वो हमने नहीं किया। हम लोग यह तो समझ गए कि हां प्रेममय इष्ट है। हम यह लोग यह तो समझ गए कि हां आनंदमय आत्मन है। किंतु वही प्रेममय इष्ट या तो फिर वही आनंदमय आत्मन सभी के भीतर में विराजमान है। और वे लोग निरनंद होकर के रह रहे हैं। तो मुझे उसके लिए कुछ कर्तव्य होना चाहिए मेरा और यह कर्तव्य मेरी साधना के रूप में परिणत हो सकता है। यह बात जैसे कि स्वामी जी ने एक नया ही संदेश पूरे जगत को दिया है।

ईशोपनिषद् में : सर्व भूत में ईश्वर दर्शन

अच्छा इसके बाद में देखिए कि इस उपनिषद में है यही कांसेप्ट कि सर्वभूत में ईश्वर विराजमान है। सर्वभूत में वही आत्म तत्व है। यह हम लोग कभी-कभी सोचते हैं कि यह ठाकुर स्वामी जी का इन्वेंशन है। किंतु जी नहीं यह अपने जैसे शरद महाराज ने कहा वही वेद उपनिषद में यह तत्व समाया हुआ है। तत एजति तन जति तदुरे तदंतिके तदंतस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः तत एजति जो कि पास में है तत न एजति जो कि पास में नहीं है यानी जो गति करता है जो गति नहीं करता है जो पास में है जो दूर में है जो कि सबके भीतर में है और सबके बाहर में भी है वही ईश्वर तत्व के बारे में हमको कहते हैं यस्तु सर्वाण भूतानी आत्मनी एव अनुपश्यति सर्वभूतेशु चात्मानम ततो विजगुप्सते जो सभी भूतों या सत्ताओं को आत्मन में ही देखता है और सभी भूतों या सत्ताओं को सत्ताओं में आत्मा को वह फिर किसी से घृणा नहीं करता यस्तु सर्वाण भूतानी आत्मनी एव अनुपश्यति सब भूतों को वह आत्मन में दर्शन करता है। सर्वभूतेशु च आत्मानम सब आत्मा के भीतर में ही सर्वभूतों को दर्शन करता है। वो विजुगुप्सते अर्थात कि लोगों के प्रति घृणा नहीं करता। देखिए यहां पर थोड़ा सा नेगेटिव करके कहा है न विजुगुप्सते लोगों के प्रति घृणा नहीं करता। किंतु यदि रामकृष्ण साहित्य में आप देखेंगे तो इस घृणा को पॉजिटिव जैसे कि करके कहा है कि इनके प्रति सिर्फ घृणा नहीं करनी है। इतना ही नहीं आपको इनके प्रति एक्टिवली सहानुभूति रखनी है। यदि आप सहानुभूति नहीं रखेंगे तो सिर्फ घृणा करने से नहीं चलेगा। क्योंकि यह जैसे साइकिल जो होती है ना साइकिल को आप आगे चलाए या पीछे चलाए। आप उसको खड़ी रख देंगे तो वो गिर जाएगी क्योंकि दोनों पहियों पे है। उसके तीन पहहिए या चार पहिए नहीं है। साइकिल को आपको सीधा खड़ा रख के रखना है तो या तो आपको आगे चलाना पड़ेगा या तो पीछे चलाना पड़ेगा। वो स्थिर होकर के कभी नहीं रहेगी। वो गिर ही जाएगी। तो वैसे ही यदि ये आप लोगों के प्रति एक्टिवली सहानुभूति नहीं रखेंगे तो धीरे-धीरे करके लोगों के प्रति आपके मन में घृणा होती जाएगी। तो ये घृणा ना हो। इसके लिए ऐसा नहीं है कि हम इनडिफरेंट रहे। मेरा लोगों के साथ में कोई संपर्क नहीं। ना ही इनके प्रति मेरी घृणा है ना ही इनके प्रति मेरी सहानुभूति सह हृदयता है। ऐसा बोलने से नहीं चलेगा। आपको या तो सहानुभूति रखनी पड़ेगी या तो फिर इन द एब्सेंस ऑफ लार्ज हार्टेडनेस इन द एब्सेंस ऑफ एमैथी और कंपैशन लोगों के प्रति घृणा प्रकट होगी। लोगों के प्रति द्वेष और वैमनस्य प्रकट होगा।

मुण्डकोपनिषद् में : सर्व भूत में ईश्वर दर्शन

इसके बाद में देखिए कि मुंडक उपनिषद में है क्या कहते हैं ब्रह्म वेदम अमृतम पुरस्ताद ब्रह्म पश्चात ब्रह्म दक्षिणत दक्षिणत चोत्तरेण अदस चोधम च प्रसुतम ब्रह्म ए वेदम विश्वमदम वरिष्ठम इदम अमृतम ब्रह्म अर्थात कि यह जो अमृत रूपी जो कुछ भी है वह सब ब्रह्मन है पुरस्तात ब्रह्म पश्चात ब्रह्म दक्षिणत ब्रह्म उत्तरेण ब्रह्म अर्थात कि आगे पीछे उत्तर में दक्षिण में सब तरह ब्रह्म है। अदस चोरधम च प्रसुतम ब्रह्म यह जो ऊपर में नीचे में अधः च उर्ध्वः ऊपर में और नीचे सप्त तरह यह ब्रह्म है। यह ब्रह्मन ही सर्वत्र व्याप्य है। यह विश्वम इदम वरिष्ठम अर्थात कि यह जो अद्भुत विश्व भी जो है वह भी ब्रह्मन है। क्या है उसका मीनिंग? यह सब कुछ अमृत रूप ब्रह्म ही है। इसके अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं। ब्रह्म ही हमारे सन्मुख है। ब्रह्म ही पश्चात है। हमारे दक्षिण में भी, हमारे उत्तर में भी, हमारे नीचे, हमारे ऊपर में भी यह सर्वत्र व्याप्य है। यह संपूर्ण अद्भुत विश्व केवल ब्राह्मण ही है। देखिए इसका आप एक नेगेटिव मीनिंग कर सकते हैं। जैसे यहां पर हमने देखा कि न विजुगुप्सते उसकी घृणा नहीं करनी है। यानी कि आपने देख लिया कि सब कुछ ब्राह्मण है तो उसकी घृणा नहीं करनी है। यहां पे आपने यदि देख लिया कि ऊपर नीचे आगे पीछे दाएं बाएं जो कुछ भी है सब कुछ ब्राह्मण है। ये जो वरिष्ठम इदम विश्वम इदम वरिष्ठम यानी कि ये जो ये अद्भुत विश्व जो है वो भी यदि ब्रह्मन है तो फिर यह विश्व का त्याग करके यानी कि कामना वासनाओं का त्याग करके आओ हम ईश्वर के ऊपर में अपने मन को लगाए तो ये कांसेप्ट समझ में आता है ये जो कहते हैं ना तेन त्यक्तेन भंजिथा अर्थात कि इसका त्याग करके इसका आपको उपभोग करना है क्या त्याग करना है। कामना वासनाओं का त्याग करना है। क्या उपभोग करना है? तो ब्रह्मानंद का उपभोग करना है। तो यह जो कांसेप्ट है इसका यह एक इंटरप्रिटेशन ट्रेडिशनली हम सभी लोग समझते आ रहे हैं। किंतु इसके साथ में एक दूसरा भी रेडिकल इंटरप्रिटेशन यह भी हो सकता है कि यदि ब्रह्मण के सब कुछ के सभी चीजों के भीतर में ब्राह्मण ही स्थित है। यदि ब्रह्मण के भीतर में ही यदि सब कुछ स्थित है तो यह जो जनसेवा है जो गरीब दुखी चंडाल यह दरिद्र नारायण, रोगी नारायण, चंडाल नारायण इनकी सेवा करना यह भी एक लेजिटमेट वे ऑफ साधना है। यह एक रेडिकल इंटरप्रिटेशन इसमें से हो सकता है।

कठोपनिषद में : सर्व भूत में ईश्वर दर्शन

इसके बाद में देखिए कठोपनिषद में स्वामी जी यह जो कुछ श्लोक है उसको कोट करते हैं। ये जो एक्चुअली ये जो गीता के जो कुछ श्लोक हमने देखे ना उसको हरि महाराज कोट करते हैं। बाद में देखेंगे किस कॉन्टेक्स्ट में कोट करते हैं। और यहां पे यह जो है अह जो उम इस मुंडक उपनिषद के श्लोक उसको फिर यहां पे वह उन्होंने कोट किया है। स्वामी जी ने कोट किया है। कठोपनिषद के कठोपनिषद के यह जो कुछ श्लोक है उसको स्वामी जी ने कोट किया है। ज्ञान योग में यूनिटी इन डायवर्सिटी बोलकर के लेक्चर है। उसमें सूर्य यथा सर्व लोकस्य चक्षु न चक्षु न लिप्यते चक्षु शर बकी दोषह एकस तथा सर्वभूतंतात्मा न लिप्यते लोक दुखेन बाह्य जिस प्रकार सूर्य इस सकल जगत का चक्षु है तथापि बाह्य चक्षुष दोष उसे लिप्त नहीं करते उसी प्रकार समस्त प्राणियों में विद्यमान अंतरात्मा एक ही है परंतु सांसारिक दुख उसे लिप्त नहीं करते इस कारण वह दुख दुख तथा उसके भय से परे है। सूर्यो यथा सर्व लोकस्य यानी कि सर्व लोक में यह सूर्य विराजमान है। या तो फिर कहेंगे कि ये सर्वलोक को सूर्य ही प्रकाशित कर रहा है। चक्षु न लिप्यते चाक्षु चाक्षु शह बाह्य दोषे यह जो आंखों का यह जो बाह्य दोष है अह मान लीजिए कि अभी अभी जैसे कि ये एक्लिप्स है एक उदाहरण के रूप में एक्लिप्स अर्थात कि क्या कि पृथ्वी और सूर्य के बीच में चंद्रमा आ जाता है। उसकी वजह से सूर्य ढक जाता है। पृथ्वी और सूर्य के बीच में चंद्र आने से सूर्य ढक जाता है। अभी हमको ऐसा लगता है कि चंद्र इतना बड़ा है कि उसने इतने बड़े सूरज को भी ढक दिया। किंतु जिन लोगों को एस्ट्रोनॉमी पता है वे लोग कहेंगे कि यह जो सूर्य का एक हजारवा एक लाखवां भाग भी यह चंद्र नहीं होगा। इतना छोटा सा चंद्रमा का साइज है। किंतु क्या है कि चंद्र पृथ्वी के पास है और सूरज पृथ्वी से बहुत ही दूर है। इसलिए ऐसा लगता है कि चंद्र ने सूरज को ढक दिया है। इसकी वजह से हमको सूर्य ग्रहण दिखाई देता है। इसकी वजह से हमको इक्लिप्स दिखाई देती है। अभी देखिए कि सूरज में ना ही उसकी जो गर्मी है, ना ही उसके भीतर में यह जो फ्यूजन रूपी भठी जल रही है। ना ही उसमें कोई कमी होती है। ना ही सूर्य खुद कहीं जैसे कि किसी आवरण से ठंडा पड़ गया हो। किसी वजह से उसके भीतर में यह जो प्रकाश है वह बंद हो गया हो। जैसे कि टॉर्च को ऑन ऑफ करते हैं ना बैटरी डाउन हो गई है तो टॉर्च क्या होगी? वो खत्म हो जाएगी। जैसे अपने मोबाइल की बैटरी डाउन होती है तो मोबाइल बंद हो जाता है। सूरज में ऐसी बैटरी डाउन नहीं होती। सूरज की बैटरी सदा काल के लिए चलती ही रहेगी। अनंत काल के लिए नहीं फ्यूजन प्रोसेस तकरीबन 4 बिलियन ईयर ना कि ऐसा कुछ चलने वाली है सूरज की उसके बाद में वह सुपरनोवा विस्फोट में परिणत होगा किंतु 4 बिलियन इयर्स इज लॉन्ग इनफ कि जिसको कि हम अनंत काल के रूप में कह सकते हैं। यानी कि सूरज की बैटरी डाउन नहीं होती है। प्रॉब्लम क्या है कि हमारी नजर के सामने एक आवरण आ गया है। तो वैसे ही यहां पे जो कि सर्वभूत के अंतर में स्थित जो ईश्वर है वह कोई सुख और दुख से लिप्त नहीं होता। क्यों? क्योंकि यह सुख और दुख है वह सब बाह्य कारण से ही है। सांसारिक दुख किसी भी तरह का काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह इस ब्राह्मण को ढकता नहीं है। वह सिर्फ हमारे मन में ही प्रकट होते हैं। देखिए, यह एक बहुत इंपॉर्टेंट स्टेटमेंट है। यदि हम यह कहते हैं कि सर्वभूत के अंदर में वही ईश्वर विराजमान है तो हमको प्रश्न होगा कि भाइयों भाइयों के बीच में यह कभी देशों के बीच में यह जो विद्वेष है वो कहां से आता है? किंतु विद्वेष आएगा क्योंकि यह जो हमारा मन है वह तो पंचमहाभूत का ही बना हुआ है। वह कोई चेतन तत्व का इस पर प्रकाश होता है। जैसे कि सांख्य में कहते हैं कि पुरुष और प्रकृति दोनों का जब संयोग होता है उस समय यह जो महत तत्व है। फिर यह जो मन बुद्धि चित्त अहंकार है। सत्व रजस तमस है। यह पंच महाभूत है। ये पंच ज्ञानेंद्रिय कर्मेंद्रिय पंच तन्म मात्रा पंच प्राण यह सब प्रकट होते हैं। तो क्या है कि जड़ और चेतन जहां पे साथ में आएंगे वहां पे हमको यह सब विश्व जो है सत्व रजस तमस वहां पर हमको दिखाई देंगे। तो मेरी उसके साथ में दुश्मनी है बोलकर के उसके प्रति विद्वेष नहीं रखना है। उसने कुकर्म किया है तो उसके लिए दंड का विधान है तो दंड करना है किंतु उसके प्रति विद्वेष नहीं रखना है। यह जो एक कासेप्चुअल क्लेरिटी भगवत गीता में है उसको हमको सब समय ख्याल रखना है। यह जो यह सब कांसेप्ट को हम ठीक-ठीक नहीं समझेंगे। तो फिर हम लोग सोचेंगे जगत का त्याग कर दो। कहीं जंगल में कहीं वन में जाकर के रहो। किंतु देखेंगे कि उसी जंगल और उसी वन में यह जगत हमको खोजते हुए दौड़ता हुआ सा आ जाएगा। वही फेमस कहानी कि वह एक ऋषि ने राजा को कहा कि आप आइए और हमारे आश्रम में रहिए। तो राजा ने क्या कहा कि आपके आश्रम में एक दूसरा राज्य खड़ा हो जाएगा। क्यों? क्योंकि मेरे भोग समाप्त नहीं हुए हैं। तो वैसे ही भोग को समाप्त करना है। नहीं कि जगत से दौड़ के भाग जाना है। यह जो आंखों का जो दोष है वो आंखों का दोष तो यह जो बाह्य चाक्षु दोष इसको जहां पे ऐसे कहा गया है वो आंख तो हम साथ में लेकर ही जाने वाले हैं। जिस दृष्टि से हम संसार में रहकर के घर में रहकर के जो ईश्वर तत्व है उसके भीतर में उसके प्रति घृणा प्रकट करते हैं तो वही आंख लेकर के ही तो मैं वन में अरण्य में गुफा में जाऊंगा पहाड़ पर जाऊंगा और वहां पर जो कुछ भी मुझे दिखेगा वही आंखों के दोष से वह सब जैसे कि टिंटेड होता हुआ सा दिखेगा करप्ट होता हुआ सा दिखेगा यानी कि अपनी आंखों के दोष को ठीक करना है नहीं की जगत को छोड़कर के भाग जाना है। यह एस्केपिज्म जो है वह एस्केपिज्म बहुत बार इस तरह की थ्यरी हमको सिखाती है। किंतु यह एस्केपिज्म इज अ मिस इंटरप्रिटेशन ऑफ आवर हिंदू शास्त्रास। हमारे हिंदू शास्त्र में ठीक-ठीक यदि इंटरप्रेट करें तो इसी जगत में रहकर के जगत को अपना करके जगत को जैसे कि यह दिव्यता की लेवल पर एलिवेट करके हमको इस जगत को देखना है नहीं कि जगत से भाग करके कहीं पे और जंगल में जाकर के अपने सेल्वेशन को अपने एनलाइटनमेंट को खोजना है। हां ऐसा होगा कि यह जो कुछ-कुछ साधक होते हैं उच्च कक्षा के साधक वे लोग पहले नेति नेति करके करके जगत का त्याग तो करते हैं। दो सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है हमारे सामने। भगवान बुद्ध और भगवान रामकृष्ण स्वयं उनकी साधनाओं का दोनों की साधनाओं का विवरण देखिए तो स्पष्ट रूप से पता चलता है कि जैसे कि जब वो साधना कर रहे थे तब उन्होंने इस जगत के साथ में मिनिमम एंगेजमेंट रखने का प्रयास किया था। किंतु जैसे ही साधना में सिद्धि प्राप्त हो गई। साधना में सर्वभूत में ईश्वर दर्शन, ब्रह्म दर्शन या तो फिर निर्वाण प्राप्त हो गया। साथ में ही वह इति इति करके इस जगत में वापस आए और जगत के कल्याण के लिए दोनों लग गए। हम लोगों के लिए जो यह रास्ता थोड़ा सा मुश्किल है कि हम लोग नेति ने जैसे ठाकुर कहते हैं ना मास्टर महाशय के मन में कहां पर कंफ्यूजन आता है। ठाकुर कहते हैं कि काली घाट पर गए तो पहले भिखारियों को दान दक्षिणा देंगे ना कि कैसे भी करके धक्कामुक्की करके आप पहले मां काली का दर्शन कर लेंगे। बाद में फिर दर्शन करके वापस आकर के जितनी दान दक्षिणा देना चाहिए देते रहिए। तो अब जब स्वामी जी ने यह सेवा कार्य का प्रवर्तन किया तो यही बात लेकर के मास्टर महाशय कंफ्यूज है। किंतु देखिए कि स्वामी जी का नोवेल इंटरप्रिटेशन क्या था? स्वामी जी कहते हैं कि हां आपको काली का ही दर्शन करना है। यदि मां काली काली घाट पर आप यदि गए हैं तो वही मां काली का ही दर्शन करना है। उनकी ही सेवा करनी है। बस वही बात है कि जो मां काली मंदिर के भीतर में विराजमान है वही मां काली को यह जो बाहर में भिखारी जो बैठे हुए हैं उनके भीतर में दर्शन करना है और फिर उनकी सेवा करनी है। यानी कि वही ईश्वर तत्व मंदिर में ही सिर्फ नहीं सर्वत्र विराजमान है बोलकर के उनकी सेवा करना। अभी देखिए कि ठाकुर ने जो कहा इनिशियली कि पहले तो कैसे भी करके धक्कामुक्की करके मंदिर में चले जाना है। तो क्या ठाकुर यह बात नहीं कह सकते थे कि ना आप जो काली मंदिर में है वही बार भिखारियों के भी रूप में है और आप उनकी भी सेवा कीजिए। उनकी भी आप आराधना कीजिए। ऐसा ठाकुर ने क्यों नहीं कहा? क्योंकि यह जो एक दूसरा मिसकसेप्शन एक बहुत बड़ी गलती यदि हम कर देते यदि हम ऐसा करते तो वह क्या है कि हम लोग गुरु भाव में आ जाएंगे। मैं कहूंगा कि हां मैं यहां पे इन लोगों का कल्याण करने के लिए आया हूं। मेरा घमंड बढ़ जाएगा और मैं जब लोगों को दक्षिणा देता हूं। देखता है ना हम लोग तो कितनी बार देखते हैं कि यह थोड़ा बहुत दान दक्षिणा दे दी। फिर चारों ओर सोशल मीडिया पर अपने फोटो चलाना शुरू कर दिया। ये यहां पर किसी बाबा जी को आप हार पहना रहे हैं। और फिर दूसरे दिन देखा कि समस्त सोशल मीडिया में आप छा गए हैं। आप हार पहनाते ऐसा अभी मैं कल ही एक बड़ा एक प्रसिद्ध एक आध्यात्मिक तीर्थक्षेत्र है। भारत का नाम नहीं कहूंगा और वहां पे एक काफी प्रसिद्ध एक आचार्य प्रवचन दे रहे हैं। तो प्रवचन ऐसा अच्छे से आप सुन रहे हैं। मुझे तो बड़ा अच्छा लगा। संस्कृत में वो विद्वान है। एकदम बढ़िया सुंदर माने एकदम पानी की तरह बोल रहे हैं। वो आप अपनी लोकल लैंग्वेज में आप बोलिए वो एक चीज है। किंतु आप संस्कृत के श्लोकों को फटाफट करके कोट करें वो तो मतलब किस लेवल का स्कॉलरशिप आपको चाहिए। आप ट्रेडिशनल यदि वो स्कॉलरशिप यदि संस्कृत में नहीं होगा तो इस तरह से आप संस्कृत श्लोक नहीं कोट कर सकते। तो मैं बड़ा ध्यान से सुन रहा हूं। एकाएक क्या होता है? है। बीच-बीच में अभी वहां के जो लोकल डोनर होंगे ना वे लोग आकर खड़े हो जाते हैं। फिर वे लोग इन जो आचार्य है उनको माला पहनाएंगे। क्यों? क्योंकि उनको सबके सामने दिखावा करना है कि मेरा भी एक स्टेटस है। मैं इतने बड़े आचार्य को इतने बड़े तीर्थ क्षेत्र में सबके सामने माला पहना रहा हूं। तो अभी वो उसकी माला पहनाने की वो सब प्रवचन के बीच में आकर खड़े हो जाएंगे। आचार्य जी अपना प्रवचन रोकेंगे। वो उसको माला पहनाएंगे। फिर चले जाएंगे। फिर वो अपना प्रवचन प्रारंभ करेंगे। अभी देखिए कि उनका जो फ्लुएंसी था आचार्य का वो इतना था कि इतना इंटरप्रेशन इंटर इंटरप्शन होने के बावजूद वो लोगों उनका जो बोलने का जो प्रवाह है वैसा ही चलता रहा। मेरे साथ में यदि ऐसा हो कि मैं बोल रहा हूं एकाएक कोई आकर इंटर इंटरप्ट करें या तो फिर कोई भी बाधा डाले तो फिर मैं उस फ्लुएंसी से फिर से नहीं बोल पाऊंगा। मैं थोड़ा सा अपसेट हो जाऊंगा। अरे ये क्या हुआ? किंतु तो देखिए कि यह जो है दिस इज द रीजन कि वह ठाकुर पहले तो ऐसा कहते हैं कि यह जो काली मंदिर में धक्का मार के कैसे भी करके चले जाना है वो भिखारियों को हार पहना करके उनको एक वो जो उनके हाथ में कुछ एक केला दे के फिर उसके इतने सारे फोटो लेना हजार फोटो लेना ऐसा लगेगा कि वह जो आपने उस भिखारी को गिफ्ट दिया उससे ज्यादा खर्चा आपने यह सोशल मीडिया पे उसको स्प्रेड करने में किया है तो ऐसा गुरु भाव ऐसा ऐसा घमंड ना आ जाए बोल के आपको पहले मां काली के पास जाना है। फिर इसी कांसेप्ट का उच्च परिणति क्या है? एक हायर अपग्रेडेशन या हायर इंटरप्रिटेशन क्या है? कि वही मां काली के सामने यदि आप अपने अहंकार को जैसे कि बलि प्रदान करके मां काली के सामने प्रणत होते हैं तो वैसे ही इस भिखारी रूपी मां काली के सामने भी अपने अहंकार घमंड अपने ये जो फेमस होने की जो वासनाएं हैं अपने जितने सोशल मीडिया अकाउंट है उन सबको यह भिखारी के सामने बलि प्रदत्त करके उसकी फिर आपको सेवा करनी है। वि इज अ हायर इंटरप्रिटेशन। तो देखिए कि यह जो हिंदू धर्म है उसके भीतर में यह जो आइडियाज है यह कांसेप्ट है कितनी उच्च कक्षा तक इवॉल्व हुए हैं और यही एक प्रॉब्लम यह भी होता है बहुत बार कि इतने हायर आइडियल्स को ना समझ पाने की वजह से उसका कंटिन्यूअस मिस इंटरप्रिटेशन चलता रहा है। ओके? इसके बाद में और भी बहुत कुछ है जिसको कि अभी हम कल देखते हैं। आ जाए। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: भिखारी में माँ काली को देखने से पहले हमें काली में ब्रह्म को देखना है

ना यहां पे रेधर कहेंगे कि मां काली के प्रति अपनी भक्ति प्रकट करनी है। आप ब्राह्मण अभी देखें तो भी देखिए कि गीता में वो भगवान कृष्ण कैसा सीमलेसली आत्मन और मैं ऐसा वो ट्रांजिशन करते हैं। तो मां काली के प्रति भक्ति हो दैट इटसेल्फ इज अ वेरी डिफिकल्ट थिंग व्हिच एवरीवन एग्रीस। पाप का भी एक भय होता है ना कि भक्ति नहीं करेंगे तो पाप लगेगा। देखिए जो आपका जो

प्रश्न: भिखारी में ब्रह्म को देखना आसान है क्योंकि हमें उनके साथ समय नहीं बिताना पड़ता। लेकिन अपने रिश्तेदारों, दोस्तों, सहकर्मियों के साथ हमें रोजाना रहना पड़ता है और उनमें ब्रह्म को देखना बहुत मुश्किल है।

क्वेश्चन है एग्जैक्टली गीता उसी प्रीमाइस पर रचा हुआ है कि सिविल वॉर वॉर बिटवीन ब्रदर्स बचपन से ही साथ में पड़े भले हुए हैं। जो भीम था वो कौरवों की पिटाई करता था जब वो छोटे थे तो वो उनको याद था आखिरी तक याद था कि इसको भीम को मारना है हमको तो ये क्या है जो भाई में जो दुश्मनावट होती है ना इट इज ऑफ द वर्स्ट काइंड ये जो आज देखेंगे कि हमारा चीन और पाकिस्तान चीन हमारा सबसे बड़ा दुश्मन है किंतु हमारे माइंड पे जिसने ये जो हमारे माइंड को खा जा रहा है ना वो पाकिस्तान है क्यों हमसे जुदा हुआ है चीन इज अ कंप्लीटली एलियंट टू अस ना ही उनकी लैंग्वेज समझ में ना आती है ना ही कल्चर समझ में आता है ना ही उनकी थिंकिंग प्रोसेस समझ में आती है। अभी इतना हमारा सीज फायर था सडनली वायलेट कर दिया। क्यों किया कुछ पता नहीं और फिर ठीक भी कर दिया उन्होंने। क्या उनका थिंकिंग प्रोसेस कंप्लीटली एलियंट टू अस। उनके प्रति थ्योरिटिकल हमारा एक शत्रुता है। किंतु पाकिस्तान के साथ में एकदम एक इंस्टिंक्टिव है। राइट? ये जो भाइयों के बीच में जो होता है व्हिच इज रियली डिफिकल्ट कि उसको मैनेज करना। देखिए मैं सब कुछ छोड़कर के रांची गया था और मैंने जैसे एक बार डिस्कस किया था कि वही ट्राइबल लोगों के ऊपर में कभी मैं गुस्सा हो जाता था। क्यों? क्योंकि हम लोग डीवीआयन से इतनी मेहनत करके उनको यह प्रोजेक्ट दे रहे हैं। उनको हेल्प कर रहे हैं। वही लोग क्या अपने भाइयों को गांव के दूसरे जो अनफॉर्चूनेट है उनको हेल्प नहीं कर पाएंगे? क्या वे लोगों के भीतर में जब हम सेल्फिशनेस देखते हैं तो हमको लगता है कि इनको खिलाने से क्या लाभ है? एक आदमी एक सेल्फिश आदमी 10 सेल्फिश बच्चों को खड़ा करेगा। वो 10 सेल्फिश बच्चे कल हो जाकर के और 100 सेल्फिश बच्चों को खड़ा करेंगे। हम लोग क्या उनको खिलाते ही रहेंगे क्या? माने इफ देयर इज नो ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ हार्ट सिर्फ उनको हेल्प करना इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। आप जीवन भर उनको देते रहेंगे। वे लोग जीवन भर खाते रहेंगे। और यह जो डिपेंडेंस का साइकिल है जो चलता आ रहा है वह चलता रहेगा। वी हैव टू ब्रेक दिस साइकिल मेक देम इंडिपेंडेंट। सो दैट वी हैव टू एक्चुअली रिमूव आवर रोल। यह हमारा रोल है। व्हाट इज आवर रियल सेवा कि हमारी सेवा की जरूरत ना पड़े ऐसा दिन ला के खड़ा करना है। यदि हम उनको परपेचुअली अपने पे डिपेंड कर दें। एक ऐसा एनजीओ कि जिसका फॉरेन से फंडिंग आता है यह गरीब लोगों के फोटोग्राफ भेजने से तो फिर मेरा यह गोल रहेगा कि ये लोग परपेचुअली गरीब रहे जिनके फोटोग्राफ शेयर करके मैं एक डोनेशन कलेक्ट कर सकूं। सो यह तो हमारा गोल नहीं है रामकृष्ण मिशन का। वी हैव टू मेक देम इंडिपेंडेंट। सो हाउ कैन वी मेक देम इंडिपेंडेंट? और नहीं होगा तो फिर गुस्सा मेरा ये जो रांची में फ्रस्ट्रेशन था वन ऑफ द रीजन कि अल्टीमेटली मेरा मन यह जो आध्यात्मिकता की ओर बढ़ा ये ये भी एक आईडिया था कि मैं जितना ही टाइम वहां पर डालता रहूंगा मेरे जैसे हजार लड़के भी आकर के घर बार छोड़कर के आकर के रहेंगे उनका ये जो डिपेंडेंसी है उनका कभी-कभी ये सेल्फिशनेस या आपस में क्रूल्टी जो दिखता है वो यदि चेंज नहीं होगा ना देयर इज नो माने हजार रामकृष्ण मिशन उनको उनको कोई हेल्प नहीं करने वाला है। व्हिच वाज़ माय लर्निंग। और फिर मेरे मन में प्रश्न आया कि हाउ कैन यू ट्रांसफॉर्म द माइंड? हाउ कैन यू ट्रांसफॉर्म द हार्ट? द सिंपल सॉल्यूशन इज़ स्पिरिचुअलिटी। आप आध्यात्मिक जगत में आगे बढ़िए। देखिए कि धीरे-धीरे करके हार्ट ट्रांसफॉर्म होगा। और यहां पे वो अपना ये जो ट्रेडिशनल स्पिरिचुअलिटी जो है ना कि यह जो महावाक्य विचार है, यह कामिनी कांचन त्याग है, यह सख्य भाव वात्सल्य भाव की साधना है। ये ट्रेडिशनल साधनाएं यहां पे आपको काम लगेगी। यहां पे आपका ट्रिक क्या है? टू अंडरस्टैंड कि व्हाट इज द स्ट्रेंथ ऑफ ट्रेडिशनल साधना? और अंडरस्टैंड व्हाट इज द वीकनेस ऑफ ट्रेडिशनल साधना। जिसको कि हम ये जो स्वामी जी वाला ठाकुर वाला जो एक्स्ट्रा कम इंटरप्रिटेशन है इट्स नॉट कि इन्होंने एक्स्ट्रा कुछ कहा है शास्त्र बड़े स्पष्ट है अपने जो वक्तव्य में वही है कि जो ट्रेडिशनल इंटरप्रिटेशन था और ठाकुर मां स्वामी जी का इंटरप्रिटेशन है वी हैव टू ब्रिंग बोथ इंटरप्रिटेशन टुगेदर यहां पे दास्य भाव सख्य भाव मधुर भाव महावाक्य विचार स्मरण मनन निध्यासन उसकी भी आराधना करनी है यहां पे अपने जितनी हो सके सेवा करनी है इवन इवेंचुअली ऐसा नहीं होगा कि सेवा करते-करते या तो अपने जो जैसा आपने कहा कि जो अपने इंटिमेट रिलेटिव्स होते हैं वैसा फट करके आप उनके प्रति आप हृदय के भीतर से कोई प्रेम जागृत होगा। इट विल टेक टाइम। ट्रेडिशनल साधना करते जाना है। और यह न्यू इंटरप्रिटेटिव साधना है। उसको भी करते जाना है। इवेंचुअली बोथ विल मर्ज टुगेदर। यह जो स्वामी जी राजा महाराज का जो फेमस स्टेटमेंट राजा महाराज क्या कहते हैं? स्वामी जी कहते हैं कि वर्क इज वरशिप। मैं कहता हूं वर्क एंड वरशिप। अदरवाइज वर्क वरशिप में परिणत कभी नहीं होगा। ये जो ठाकुर का जो उदाहरण है ना यह काली मंदिर का काली घाट का उसका उसका इसको किस तरह से हम देखेंगे इस आईडिया ले आएंगे। तो एक इंटरप्रिटेशन है कि धक्कामुक्की करके पहले मंदिर में जाकर मां काली का दर्शन कीजिए। दूसरा इंटरप्रिटेशन है कि आप बाहर में भिखारी के भीतर में काली का दर्शन कीजिए। और आइडियल क्या है? आप बाहर के भिखारियों में भी काली का दर्शन कीजिए। मंदिर में जाकर के भी मां काली का दर्शन कीजिए। दोनों पैरेलल चलाते रहिए। अदरवाइज नहीं होगा।

प्रश्न: हमें प्रतिदिन अपने रिश्तेदारों, मित्रों, सहकर्मियों के साथ रहना पड़ता है। आपके रांची त्याग की तरह कोई विकल्प नहीं है।

इसको जनरली क्या कहते हैं? मूविंग ऑन। ये जो लिटरेचर की जो लैंग्वेज है उसमें कहते हैं मूविंग ऑन। यानी कि अब ये हो गया। अभी मैं और कुछ आगे करना चाहता हूं। देयर इज नो ऑप्शन ऑफ़ मूविंग ऑन। वहां पे आपको धर्म युद्ध ही एकमात्र कंक्लूजन है। कौरव पांडव ये सब क्या है? दिस इज एन इंटेलेक्चुअल जिम। ये जो जिम में जाते हैं बॉडी बिल्डिंग के लिए फिर हम उस बॉडी बना के जो भी जगत का काम है वी कैन डू बेटर। फिटनेस इज़ म कहते हैं ना शरीरम अध्यम खलु धर्म साधनम। वो जो फिट बॉडी है वह धर्म का साधन है। सो इट्स अ फिट माइंड आल्सो सेम थिंग कि आपका इंटेलेक्चुअली एंड मेंटली आप फिट है। आपको क्योंकि क्या है ना धर्म बड़ा सूक्ष्म होता है। कभी-कभी ऐसे डायलेमास आ जाते हैं। अर्जुन का ही सबसे बड़ा एग्जांपल ऐसा डायलेमा में फंस गया था। एक और आपके सबसे तकरीबी जिनको कि प्रेम करते हैं, स्नेह करते हैं, श्रद्धा करते हैं वो है। दूसरी ओर है कि उन्हीं का वध करना है। हाउ विल यू रिजॉल्व दिस? तो फिर भगवान को पूरी गीता सुनानी पड़ी। अदरवाइज ऐसा नहीं है कि वो वरना तो सेकंड चैप्टर का पहला ही श्लोक है क्लेबिस्मगम पार्थ एतत्व उपपद्यते उसी में तो फिर हो जाना चाहिए वो नहीं हुआ बोल के फिर पूरी गीता चली