prayer
ओम स्थापकाय यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः नव वर्ष की सबको शुभकामनाएं और आज का जो टॉपिक है हमारा श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग स्वामी शारदानंद जी महाराज महाराज द्वारा कथित हमारा जो टॉपिक चल रहा है कल पिछला लास्ट क्लास में हमने अभेदानंद जी वाला टॉपिक है उसको समाप्त किया। अभी इसके बाद में जो टॉपिक है अपने शारदानंद जी महाराज इसका टाइटल दिए हैं। नरो लीलाए शमोशो कारजो
नर लीला में सभी क्रियाएं मनुष्यों के समान ही होती हैं। चूँकि भगवान मानव रूप धारण करके अवतार लेते हैं, इसलिए उन्हें मनुष्यों के समान ही दुःख और पीड़ा सहनी पड़ती है।
साधारण नरे न्याय होए। नर लीला में सभी कार्य एक साधारण नर की तरह ही एक आम आदमी की तरह ही होता है। अभी देखिए कि यह डिस्कशन जो है हमने गंभीरानंद जी का मां शारदा देवी का जो लाइफ है उसका स्टडी करने के समय में भी इस प्रश्न को हमने काफी विस्तृत रूप से चिंतन किया था। इसके बारे में कि यदि ईश्वर मनुष्य देह धारण करके पृथ्वी पर अवतरण करते हैं, पृथ्वी पर जन्म धारण करते हैं और फिर जब वह इस तरह की कठिन तपस्या करेंगे जिसके बारे में हमने इनके जीवन में पढ़ा है तो नेचुरली यदि हम आध्यात्मिकता के रास्ते पर चलना प्रारंभ करेंगे तो हमारे मन में यह प्रश्न सहज होगा कि मेरी इंद्रियों पर संयम रखना तो बड़ा कष्ट कर मुझे प्रतीत होता है। सब समय में मेरे मन में काम कांचन के विचार चलते ही रहते हैं। एक मनुष्य के भीतर में एक
अहंकार की कहानी
घमंड तो होता है। यदि थोड़ा सा भी मेरे पास में पावर आ गया तो जैसे वो ठाकुर एक उदाहरण देते हैं कि एक मेंढक मेंढक के पास में एक सिक्का आ गया। माने एक कॉइन। तो अभी यह मेंढक हाथी को कहता है अरे तू थोड़ा साइड पर होकर के चल यानी कहां मेंढक कहां हाथी किंतु फिर भी क्या है उसके हाथ में थोड़ा सा रुपया आ गया तो इसका घमंड इतना बढ़ गया ठाकुर और एक कहानी कहते हैं कि एक आदमी को वह पहचानते थे एक ब्राह्मण ही था तो पहले तो ठाकुर के पास में आता था और अच्छा सा ठाकुर के साथ में सब साधन भजन की बातें करता था फिर कुछ समय हुआ उसने आना बंद कर दिया तो और फिर एक दिन ठाकुर ने देखा कि वह गंगा के किनारे एक घाट के ऊपर में बैठा हुआ है। तो नेचुरली उस वो वो तो ठाकुर के पास आता था तो पुरानी पहचान थी तो उसको उसने किंतु क्या किया? ठाकुर के सामने देखकर के कहता है क्या महाशय कैसे हैं? तो जिस तरह से बात करने का ढंग था उसका इमीडिएटली ठाकुर ने हृदय को कहा कि हृदय उसके पास में पैसा हुआ है। इसीलिए वह इस तरह की बातें करता है। तो मनुष्य के पास में थोड़ा सा पैसा होता है, थोड़ा सा इज्जत शोहरत आता है तो फटाक करके वह घमंड हमारे चेहरे पे हमारी बातों में छलकने लगता है। और थोड़ा सा भी यदि हमको इनसिक्योरिटी महसूस होती है तो इस तरह का भय और स्ट्रेस सर के ऊपर सवार हो जाता है कि जैसे कि हमको पैरालाइज कर दे। तो यह हम मनुष्यों का एक आम डे टू डे लाइफ का एक्सपीरियंस है। हम यदि यह कहते हैं कि जब
श्रीरामकृष्ण ने साधना का द्वार -- आबाल-वृद्ध, स्त्री-पुरुष, सन्यासी-गृहस्थ -- सभी के लिए खोल दिए है
ध्यान साधन भजन करके हम इसके परे जा सकते हैं तो सहज प्रश्न होगा कि यह कैसे संभव है? दिन में 1 लाख जप करो। मां कहती है देखो कैसे शांति नहीं मिलती। किंतु यह संसार की जवाबदारी सर के ऊपर में होने के बाद में क्या 1 लाख जप होता है? म आप लोगों का तो नहीं ही होगा। यहां पे रामकृष्ण मिशन में साधु होने को हम लोग आए हैं। हम लोग भी अब मैं अपनी बात बताता हूं। दूसरे साधुओं का नहीं। मैं खुद दिन में 1 लाख जप नहीं कर सकता। संभव ही नहीं है। कभी ऐसा प्रयास भी मैंने नहीं किया। तो यह सब सहज प्रश्न है कि इन लोगों की जो हम इन लोगों के द्वारा हमको जो उपदेश दिया गया है इन लोगों का जो जीवन है उसमें जो आदर्श उन्होंने रखा है वो आदर्श हम कैसे फॉलो कर पाएंगे यदि यह तो ईश्वर स्वयं है मां तो जगदात्री जगदंबा स्वयं ठाकुर नारायण स्वयं भगवान विष्णु स्वयं वे लोग जो तपस्या करेंगे जो साधन भजन करेंगे और साधन साधन भजन करके मन को जो निवात निष्कंप शिख की तरह संपूर्ण रूप से जो एकाग्र रखेंगे वह हमसे क्या हो पाएगा? यह सहज प्रश्न होता है और फिर हम लोग बहुत बार ऐसा होता है कि भीतर से एक ऐसा आता है कि देखिए साधन भजन करना ठाकुर और मां या तो इवन स्वामी जी की तरह हमसे संभव नहीं है। तो यह सब पूरे मामले को ही छोड़ दो। बस जैसे कि रामचंद्र दत्त ने कहा था कि ठाकुर का आशीर्वाद हमको मिल गया है। अभी उसको ठाकुर का स्वयं स्पर्श प्राप्त हुआ था। हमको यहां अपने परम पूजनीय प्रेसिडेंट महाराज से दीक्षा प्राप्त हुई है। ठाकुर का मंत्र प्राप्त हुआ है। तो बस यही तो हो गया। इसके बाद में और क्या बचा है जीवन में और कुछ करने के लिए। उनकी तरह तो साधन भजन हमसे होगा नहीं। इसलिए करने की चेष्टा ही जरूरत नहीं है। प्रयास भी नहीं करना है। पहले से ही हार मान के शरणागति के रास्ते पर चलना है। किंतु देखिए कि यह जो डिवीजन इसलिए बाद में हुआ था कि यहां पर था नरेंद्र और यहां पर था रामचंद्र दत्त। तो नरेंद्र कहता है कि ठाकुर ने हमको कहा है कि साधन भजन तपस्या करनी है और बात सिर्फ यह नहीं है कि नरेंद्र जो कि प्रचंड बुद्धिमत्ता और प्रचंड मेधाशक्ति और इंद्रियों पर संपूर्ण जिसका नियमन था वो साधन भजन करेगा। ठाकुर ने साधन भजन का रास्ता सभी के लिए खोल दिया है। इसीलिए देखिए कि ठाकुर के जो 16 डायरेक्ट मोनेस्टिक डिसाइपल है, त्यागी संतान है इन सब में कितना वैविध्य है। यहां पर आप जैसे कि एक ओर देखेंगे स्वामी जी जैसे अपनी इंद्रियों पर संपूर्ण नियमन रखने वाले दूसरी ओर देखेंगे कि राजा महाराज जिनको संतान भी हुआ है। और अभी बात यह नहीं है कि सिर्फ युवा लोगों के लिए ही साधन भजन है। ये बूढ़ो गोपाल अपने अद्वैतानंद जी महाराज वो तो ठाकुर से भी उम्र में बड़े थे। पत्नी थे, पत्नी थी। उनकी संतान थे। उनका मृत्यु हो गया था। बाद में तो वो ठाकुर के पास में आए थे। तो वो युवा और वृद्ध यह बैरियर भी नहीं है साधन भजन करने के लिए। दूसरा कि एजुकेटेड होना नहीं होना यह सब चीजों का भी कोई बंधन नहीं है। देखिए कहां पर यह लाटू महाराज और कहां पे बाकी सब ठाकुर के त्यागी संतान सभी लोग तो पढ़े लिखे थे। किंतु यहां पे है लाटू महाराज तो लाटू महाराज का क्या है उनका यूएसपी? तो कहेंगे कि वो ठाकुर जब काशीपुर में थे और आखिरी समय आया तो ठाकुर ने कहा कि देखो अभी शौच जाने के लिए मैं बाथरूम नहीं जा पाऊंगा। मुझे अपने बिछाने में ही शौच वगैरह करना पड़ेगा। तो ठाकुर लाटू ने इमीडिएटली कह दिया अरे महाशय मैं हूं ना आपका मेथर आपको चिंता किस बात की है अभी मेथर अर्थात कि मेहतर यानी कि जो विष्ठा जो क्लीन करता है अभी वह जाति नाती प्रथा उस समय थी तो खैर लाटू महाराज का जो कहना था कि ठाकुर के वह इतने अनुगत इतने संपूर्ण रूप से शरणागत वो हो गए थे कि ठाकुर की विष्ठा वहन करना क्लीन करना उसके लिए भी उनके लिए कोई भी झिझक की बात नहीं थी। तो वह माने ऐसा भी नहीं है कि आपने बहुत सारा किताबें पढ़ी होनी चाहिए ना कि बहुत ज्यादा यह सब कुछ होना चाहिए। यह ठाकुर स्वयं हम लोग ठाकुर को अनलेटर्ड यानी कि निरक्षर कहते हैं। अब यह निरक्षर ठाकुर और भी महानिरक्षर लाटू महाराज को अल्फाबेट सिखा रहे हैं। ठाकुर कहते हैं थोड़ा बहुत तो पढ़ाई लिखाई तुमको आना चाहिए। तो अच्छा यह अल्फाबेट का प्रथम अक्षर है क तो बोलो क तो लाटू महाराज कहते हैं का तो ठाकुर कहते हैं अरे भाई ये का नहीं है ये क है बोलो क तो लाटू महाराज फिर से कहते हैं का तो वे ठाकुर नाराज हो के बोलते हैं कि तुम क को ही का बोलोगे तो का को और क्या कहोगे का डबल का के ऊपर में डबल ये कान्हा लगा के तुम बात करोगे क्या तो फिर ठाकुर कहते हैं अच्छा ठीक है छोड़ दो तुमको अक्षर ज्ञान की जरूरत नहीं है यानी कि अ देखिए कि वो विद्या का भी कोई बैरियर नहीं है। स्त्री पुरुष का भी कोई भेद नहीं है। ठाकुर ने जितनी तपस्या की उतनी मतलब जो डायरेक्ट डिसाइपल ये जो ठाकुर के त्यागी संतान है मोनेस्टिक डिसाइपल उन्होंने जो तपस्या की है तो यह फिर ये गौरी मां है। फिर ये योगेन मां है, गोलाप मां है। इनके जीवन में कोई कम तपस्या नहीं थी। तो मां की ये जो सब सेविकाएं थी जिन लोगों ने यह सब तपस्या की वह भी तो कोई कम नहीं थी। यानी कि साधन भजन करने में ना ही आपको मैरिड होना, अनमैरिड होना या तो फिर वृद्ध होना, युवा होना, पढ़ाई लिखाई किया हुआ या तो फिर निरक्षर या तो स्त्री या पुरुष इस तरह के किसी भी तरह के बंधन नहीं है। कोई भी किसी भी अवस्था में कहां पर भी रह के साधन भजन कर सकता है। यह जो फ्रीडम जो है फ्रीडम फॉर साधना फ्रीडम टू डू साधना यह भगवान ने स्वयं नारायण ने सबको अर्पित किया है। इसीलिए अपने मन में यह संदेह कभी ना रह जाए कि हां ठाकुर नारायण स्वयं मां भगवती स्वयं तो उनको तपस्या करने दो। हमको तपस्या करने की जरूरत नहीं है। यह कंफ्यूजन ना हो। इसके लिए यह पैराग्राफ शारदानंद जी महाराज लिखते हैं कि यदि वह नारायण भी है किंतु मनुष्य देह धारण करके पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं तो एक सामान्य मनुष्य की तरह ये जितने भी यह मनुष्य देह के विकार है पंचमहाभूत के बने हुए देह के उस सभी को उसमें से उनको भी गुजरना होगा। जैसे ठाकुर ने खुद ने कहा है पंचमहाभूत फांदे ब्रह्म पड़े कांधे अर्थात कि पंचमहाभूत के चक्कर में यदि यह ब्रह्म स्वयं यदि फंस जाएंगे तो उनको भी रोना पड़ेगा। तो यह पैराग्राफ वैसे तो छोटा है। हम पढ़ लेते हैं एक बार।
मानव शरीर स्वीकार कर भगवान को भी मनुष्य की तरह ही सुख-दुःख का अनुभव करना पड़ता है तथा मनुष्य की तरह ही प्रयत्न, पुरुषार्थ व तप द्वारा सभी विषयों में सिद्धि प्राप्त करनी पड़ती है।
सत्य लाभ अथवा जीवन उहार पूर्ण पूर्ण अभिव्यक्ति जन अवतार पुरुषकृत चेष्टा शकल के मिथ्याभान करिया जारा ग्रहण करेन ओ श्रेणी भक्त दिग के आमाद दिग वक्तव्य जे ठाकुर के तहा दग न्याय अभिप्राय प्रकाश करते आमरा कखनो सुनी नाई सत्य लाभ अथवा तो जीवन में उसकी जो पूर्ण अभिव्यक्ति है वह प्राप्त करने के लिए अवतार पुरुष जो साधन भजन करते हैं चेष्टा शकल जो प्रयास करते हैं उसको झूठमठ का बोलकर के जो लोग कहते हैं जो लोग कहते हैं कि अरे अवतार पुरुष ईश्वर प्राप्ति के लिए आत्म साक्षात्कार के लिए ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करने के लिए जो साधन भजन करते हैं जो उपासना करते हैं वह तो सब एक दिखावा वा है। वह सब एक लीला है। वह सब ऊपर ऊपर से जीव को शिक्षा देने के लिए है। तो शरद महाराज कहते हैं इस तरह की बात जो करते हैं ओई श्रेणी भक्त दिग के आमादिग वक्तव्य इस तरह के जो भक्त हैं उनको मैं कहना चाहता हूं ठाकुर के तहा दग न्याय अभिप्राय प्रकाश करते आमरा कनो सुनी ना ठाकुर को उनके तरह का अभिप्राय प्रकाश करते हुए हमने कभी नहीं सुना है जिस तरह के भक्त इस तरह की बातें करते हैं कि अवतार जो करते हैं साधन भजन उपासना वह सब लीला है दिखाने के लिए है। तो ऐसे भक्तों को मैं कहना चाहता हूं कि ठाकुर को स्वयं हमने कभी इस तरह का अभिप्राय प्रकाश करते हुए नहीं सुना। ठाकुर ने ऐसा कभी नहीं कहा कि अवतार पुरुष जो सब कुछ करते हैं, वह सिर्फ एक दिखावा मात्र है। भीतर में काम कांचन उसको कभी स्पर्श ही नहीं करता। इसके लिए कामकांचन से मुक्त होने की उनकी जो प्रयास है, चेष्टा है, प्रयत्न है, साधना है, वह सब दिखावा है। इस तरह की बात हमने ठाकुर को करते हुए कभी सुना नहीं। ब्रह्म अनेक समय तहां के बोलीते शून्या छ इतना ही नहीं बहुत बार हमने उनको यह कहते हुए सुना है नरो लीलाय समस्त कार्य साधारण नरे न्याय होय नर लीला में समस्त कार्य एक साधारण मनुष्य की तरह ही होता है। नर शरीर स्वीकार कोरिया भगवान के नरे न्याय सुख दुख भोग करते एवं नरे न्याय उद्यम चेष्टा और तपस्या द्वारा सकल विषय पूर्णत्व लाभ करते होय नर लीला में नर शरीर स्वीकार करने के बाद में भगवान को नर की तरह ही सुख दुख भोग करना होगा और नर की तरह ही उद्यम प्रयास और तपस्या के द्वारा सभी विषयों में पूर्णत्व प्राप्ति करनी होगी। जगत आध्यात्मिक इतिहास हो ओ कथा बोले जगत का आध्यात्मिक इतिहास भी यही बात कहता है एवं जुक्ति सहाय ए कथा स्पष्ट बुझा जाए जे ओ रूप ना होलेले जीबेर प्रति कृपाए ईश्वर कृत नरबु धारण कोनो सार्थकता थाके ना जगत का समग्र आध्यात्मिक इतिहास यही बात को पुष्ट करता है और युक्ति के माध्यम से विचार के माध्यम से भी यही बात स्पष्ट समझ में आती है कि यदि ऐसा ना होता तो जीव के प्रति कृपा करके ईश्वर ने जो नरवपू धारण किया है नर देह धारण किया है उसकी कोई सार्थकता नहीं रहेगी। देखिए कितना सुंदर उन्होंने कहा है कि जीव के प्रति कृपा करके ईश्वर ने यह नर देह धारण किया है। उसकी कोई सार्थकता ही नहीं रहेगी। यदि ईश्वर के भीतर में इस नर देह के भीतर में अन्य मनुष्यों की तरह सुख दुख यह जो अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश यह सब का एक तिल मात्र यदि न रहता तो नर शरीर धारण करने का कोई सार कोई उद्देश्य ही नहीं रहता कोई सार्थकता ही नहीं रहती
अवतार के देह में सत्त्व का प्राधान्य होता है, मनुष्य के देह में तमस और रजस का. परन्तु आत्मश्रद्धा और निरंतर साधना से हम भी सत्व-प्रधान की अवस्था तक पहुंच जाएंगे
देखिए एक बात हमको स्पष्ट समझनी होगी कि इन उन लोगों का शरीर मन कोई अपवित्र नहीं था कि उनको अपवित्रता से पवित्रता की यात्रा करनी पड़े। हमको पता है कि देखिए कि मनुष्य के भीतर में सत्व, रजस और तमस तीन तरह के गुण होते हैं। अभी जैसे-जैसे कि हम पूर्व जन्म के कर्म के अनुसार जिस तरह का हमारा कर्म होगा यदि बहुत ज्यादा हमने पाप कर्म किया होगा तो फिर जो नया देह धारण करेंगे नया जन्म जब धारण करेंगे तो हमारे स्वभाव में तमस का प्राधान्य होगा। यदि बहुत ज्यादा कर्म किया होगा पिछले जन्म में तो इस जन्म में रजस का प्राधान्य होगा और पिछले जन्म में हमारे यदि हमारा परिवार है अच्छे परिवार में जन्म ग्रहण किया हो साधन भजन किया हो तो इस जन्म में हमारे देह में सत्व का प्राधान्य होगा। तो सबसे पहले तो यह समझना है कि ईश्वर जब नर देह धारण करते हैं तो यह जो तीन प्रकार के गुण है उसमें से सत्व का ही प्राधान्य होगा। ईश्वर देह धारण करके आते हैं तो तमस और रजस का प्राधान्य उनके भीतर में कभी नहीं रहेगा। तो यह डिस्टिंशन हमको समझनी है। वरना यदि हम सोचेंगे कि अच्छा मेरे जीवन में तो तमस का प्राधान्य बहुत ज्यादा है। रजस का भी प्राधान्य बहुत है। किंतु इस तरह का तो मैं ठाकुर में देखता नहीं हूं। इस तरह का तो मैं मां में देखता नहीं हूं। ठाकुर तो बचपन से ही मैं देखता हूं कि वहां पर जो धर्मशाला थी वहां पर कामारपुर के बाहर में वहां पर साधुओं का दर्शन करने के लिए साधुओं की सेवा करने के लिए यह जो छोटा सा गदाई है ठाकुर का बचपन का नाम गदाधर या तो गदाई तो वह गदाई वहां पर जाया करता था। साधुओं के साथ में वार्तालाप किया करता था। एक बार साधुओं ने उनको कौपीन और यह भस्म वगैरह जो है इस तरह से पहना करके सजा करके घर वापस भेजा तो मां चंद्रामणि देवी बेचारी बड़ी ही डर गई भयभीत हो गई कि गदाधर को यह साधु लोग उठाकर के ले जाएंगे। फिर उन्होंने गदाधर को पाठ वहां पर धर्मशाला में भेजना बंद कर दिया और फिर कुछ दिनों के बाद में जब साधुओं ने देखा कि यह सुंदर बालक है वह नहीं आ रहा है। इतना शुद्ध सात्विक उसका चरित्र है। नहीं आ रहा है तो वो मां चंद्रामणि देवी को मिलने के लिए गए। उनको सांत्वना दी कि हम आपके लड़के को भगा करके कभी नहीं ले जाएंगे। तो फिर चंद्रामणि देवी ने फिर से अनुमति दी। अभी यह जो ठाकुर की बचपन की कहानियां है उसके साथ में यदि मैं अपना बचपन यदि कंपेयर करूं तो मैं तो देखता हूं कि मैं जब छोटा था तो मेरे भीतर में इतना तमस था काम कांचन के प्रति अभी छोटा बच्चा होता है तो पैसों का तो उसको यह लोभ नहीं होता किंतु काम तो जन्मगत है। उसके प्रति मेरी स्प्रूहा इतनी थी और फिर इसके बाद में ईर्ष्या द्वेष यह सब तो लगा ही रहता है। भय यह सब तो लगा ही रहता है। तो यह सब तो मेरे मन में बड़ा ही स्ट्रांग था। तो फिर मैं ठाकुर को अपने साथ में कंपेयर करूं ही कैसे? तो यह जो प्रश्न होगा उसका उत्तर स्पष्ट रूप से दे देना है कि अवतार जब नर देह धारण करते हैं तो सत्व का प्राधान्य होता है। तमस और रजस नहीं होते हैं। ऐसा नहीं होता। जैसे कि कहा जाता है ना कि सोने में थोड़ा सा अशुद्धि मिलाना पड़ता है। तभी उसमें से आप गहने बना पाएंगे। यदि 24 कैरेट प्योर गोल्ड होगा तो उसमें से गहने बनना संभव नहीं है। क्योंकि सोना एक सॉफ्ट धातु है। तो फिर इमीडिएटली उसका जो आकार है गहने का वो बिगड़ सकता है। यदि आप उसको थोड़ा सा स्क्वीज़ करेंगे या प्रेस करेंगे तो। तो इसीलिए जब नर देह धारण होता है तो सत्व का प्राधान्य होता है। किंतु तमस और रजस की एक छांट जैसी होती है। 1% 2% होता है। किंतु सत्व का प्राधान्य होता है। तो यह बात हमको समझना है। अभी प्रश्न यह है अगेन थोड़ा सा हम रिपीट करें इसी बात को कि मेरे जीवन में यदि तमस और रजस का प्राधान्य है तो मैं ठाकुर की तरह चलो इतना तो स्वीकार कर लिया कि नर देह धारण करके आए हैं तो नर की तरह सब कुछ उनको भुगतना पड़ेगा अब जैसे कि भगवान राम स्वयं सीता के लिए रोए थे वगैरह-वगैरह उनको करना पड़ेगा किंतु फिर भी तो सत्व का प्राधान्या है फिर भी तो वह बचपन से ही इनका जीवन ईश्वर के प्रति समर्पित ईश्वर के प्रति प्रेम से भरा हुआ है। मेरा जीवन तो ऐसा नहीं है। तो फिर मैं क्या करूं? मेरे लिए साधन भजन करने का क्या उद्देश्य है? मेरे लिए साधन भजन करने की क्या आवश्यकता है? तो देखिए कि यह जो इस बात को आप पॉजिटिवली लीजिए। इस तरह से लीजिए कि यदि मेरे इस जन्म में तमस और रजस का प्राधान्य है और इसी जन्म से मैं यदि साधन भजन तपस्या उपासना कठोरता यह सब करना प्रारंभ कर देता हूं। ईश्वर के प्रति शरणागति, सत ग्रंथों का पाठ, सत्संग में नियमित उपस्थित रहना, मंदिर में जाना, दान दक्षिणा करना, तीर्थ यात्रा करना, यह जो भारतीय शास्त्रों में जो विधियां दर्शाई गई है उपासना की, उसका मैं यदि आज से ही प्रारंभ कर दूं, तो फिर मेरा जो नया जन्म है उसमें सत्व की मात्रा बढ़ेगी। रजस और तमस की कम होगी। फिर अगले जन्म में भी फिर इसी तरह वह तपस्या करते जाएंगे तो उसके बाद के जन्म में सत्व की मात्रा और भी बढ़ेगी। इवेंचुअली एक जन्म ऐसा आएगा जब मेरे जीवन में भी सत्व का प्राधान्य होगा और जिस समय मेरे जीवन में सत्व का प्राधान्य हो जाता है। मान लीजिए कि आज से 1000 साल के बाद में या तो फिर 1000 जन्म के बाद में ऐसा हुआ। डज नॉट मैटर। एक समय तो आएगा जबकि सत्व का प्राधान्य होगा। वही
दो ऋषियों की कहानी और साधना में उनका धैर्य: कई जन्मों के बाद मुक्ति
ठाकुर की फेमस घटना कि दो ऋषि मुनि एक पेड़ के नीचे में बैठकर के तपस्या कर रहे हैं। नारद मुनि आ गए। कहते हैं मैं वैुंठ जा रहा हूं। तो दोनों ऋषियों ने कहा कि नारायण को पूछिएगा कि और कितने जन्म और कितना साल लगेंगे हमारी साधना में सिद्धि प्राप्त होने को। ठीक है? नारद मुनि जाकर के वापस आए और कहा कि देखिए नारायण ने कहा है कि इस पेड़ के ऊपर में जितने पत्ते हैं उतने जन्म लगेंगे। तो एक साधु एक ऋषि बड़े ही दुखी हो गए। कहा कि अरे इतने सालों से मैं तपस्या करता आ रहा हूं और फिर इतने जन्म और तपस्या करनी है। हे राम मैं कैसे कर पाऊंगा। दूसरे जो ऋषि थे किंतु वो खड़े होकर के नाचने लगे। यह सोच कर के कि देखिए एक समय तो ऐसा आएगा जब कि मुझे साधना में सिद्धि प्राप्त होगी। यानी कि ऐसा कभी-कभी तो ऐसा भी तो मन में हो जाता है ना कि अरे मैं इतनी तपस्या कर रहा हूं। मुझे कोई रिजल्ट ही नहीं मिल रहा। तो इसलिए फ्रस्ट्रेट होकर के छोड़ दो। ये लड़के लोग स्कूल में ड्रॉप आउट क्यों हो जाते हैं? पढ़ाई लिखाई करने का प्रयास तो करते हैं। किंतु फिर देखते हैं कि जितना स्टडी किया उसके अनुसार रिजल्ट नहीं आ रहा है। उसके अनुसार मार्क्स नहीं आ रहे हैं। तो फिर सोचते हैं कि अरे वैसे भी तो मैं बुद्धू हूं, मूर्ख हूं। पढ़ाई लिखाई करने से कोई लाभ नहीं है। छोड़ दो और कुछ काम करेंगे। तो यह स्टडी करते-करते जब रिजल्ट ना आए तब बच्चे लोग ड्रॉप आउट हो जाते हैं। तो यही कहीं आध्यात्मिक जीवन में ना हो जाए कि मैं तपस्या कर रहा हूं। यथाशक्ति साधन भजन कर रहा हूं। जब ध्यान कर रहा हूं, रिजल्ट नहीं मिल रहा है, ड्रॉप आउट हो जाओ। छोड़ दो इस पूरे मामले को। कोई फर्क नहीं पड़ता। नेक्स्ट जन्म में देखा जाएगा। तो ऐसा नहीं होना चाहिए। एक पॉजिटिव एटीट्यूड लेकर के आप आगे बढ़ते रहिए। यथाशक्ति साधन भजन करते रहिए। एक जन्म तो आएगा ही आएगा। भगवान नारायण का स्वयं आपको यह एक भरोसा है। आपको एक वचन दिया हुआ है कि एक जन्म तो आएगा ही। जबकि सत्व का प्राधान्य होगा और जिस जन्म में सत्व का प्राधान्य होगा उसी समय हम ठाकुर के समकक्ष आ जाएंगे कि हां अभी चलो अभी यह रेस इक्वल हो गया है। वरना तो ऐसा होता है ना कि दो लोग रेस म वो ये कर रहे हैं। रेस कर रहे हैं। उसमें एक जो है बड़ा ही वर्ल्ड क्लास एथलीट है। वह फटाफट करके दौड़ सकता है। और दूसरा है कि वह बेचारा व्हीलचेयर पर बैठा हुआ है। अपने हाथों से वह व्हीलचेयर को उसको घुमाना है। तो इन दोनों के बीच में रेस किस तरह से इक्वल हो सकता है? जैसे ही वह विसल बजेगी वह वर्ल्ड क्लास एथलीट वो फुल जोश में दौड़ेगा और फट करके वह अपने लक्ष्य तक पहुंच जाएगा। वो जो व्हीलचेयर में जो आदमी बैठा है, वह बेचारा थोड़ा बहुत धक्के मारते-मारते हो सकता है तीन-चार फुट आगे जाए। बाय दैट टाइम वो जो एथलीट अपने लक्ष्य तक पहुंच जाता है। तो किस तरह का यह आपको फेयरनेस हुआ इस गेम में? किस तरह की आपको जस्टिस मिला। किंतु देखिए कि एक जन्म तो जब आएगा ही आएगा हमारे भीतर में भी सत्व का प्राधान्य होगा और फिर ठाकुर के साथ में जो रेस होगी साधन भजन की वो इक्वल अमाउंट वो इक्वलिटी के बेस पे होगी। वह भी वर्ल्ड क्लास एथलीट है तो हम भी वर्ल्ड क्लास एथलीट है। आ जाओ। आप कहते हैं मां कहती है कि दिन में 1 लाख जप करना करके दिखा देंगे। चलिए और क्या कहना है अभी आपको? 2 लाख कर देंगे। कौन सी बड़ी बात है? तो देखिए कि एक समय तो आएगा ही आएगा अपने साधन भजन की इस यात्रा में जबकि सत्व का प्राधान्य होगा और जब हमारे जीवन में सत्व का प्राधान्य होगा ठाकुर के जीवन में जो कुछ चल रहा है जो कुछ अनुभूतियां बचपन से ही हमारे जीवन में भी साधन भजन के ऊपर में साधुओं के प्रति एक तरह की ममता एक तरह का प्रेम दिखाई देगा ईश्वर के प्रति शरणागति दिखाई देगी संसार के जितने भी सुख भोग है। इन सबके प्रति विराग दिखाई देगा। वह एक समय आए आएगा ही आएगा। आने ही वाला है। और इसके बाद में फिर यह सेकंड लेवल का यह चालू होगा कि अवतार ने सत्व के प्राधान्य के बाद में इस तरह की साधना की। तो जिस तरह की साधना फिर अवतार ने की उसका 10% तो हमको करके दिखा ही देना है। इतना तो भाई अपने भीतर में वो सामर्थ्य है। इतनी तो हमारे भीतर में वो मददानगी है। इतना तो हम में सेल्फ कॉन्फिडेंस है कि तो 10% तो हम करेंगे ही करेंगे। हम लोग कोई क्या बिल्कुल कीड़े मकोड़े थोड़ी ना है कि बिल्कुल हाथ पर हाथ जोड़कर के पहले से ही हार स्वीकार कर ले। ऐसा कभी नहीं होने वाला है। ठाकुर के संतान है, अमृतत्व के संतान है, ऋषि मुनियों के वारसदार है। हम लोगों के भीतर में तो वह आत्मश्रद्धा झलझल करके वह प्रकाशित होनी चाहिए। कौन हमको रोकता है साधन भजन करने में? कौन हमको रोकता है जप ध्यान करने में? कौन हमको रोकता है तपस्या करने में? मेरे खुद के ये जो भीतर के जो कचरा है उसके अलावा तो और कुछ मुझे रोकने वाला नहीं है। तो उसके ऊपर में यदि मैं विजय प्राप्त नहीं करूंगा तो और कौन करेगा? यह जो भीतर में एक श्रद्धा सामर्थ्य वो धीरे-धीरे करके आता जाएगा। सत्व का प्राधान्य होता जाएगा और फिर ठाकुर के साथ में भी हम रेस लगा देंगे। कौन सी बड़ी बात है? देखिए लाटू महाराज की वो फेमस घटना है कि नर उन लाटू महाराज ने देखा कि नरेंद्र जो है भविष्य के स्वामी विवेकानंद नरेंद्र जो है वो इतना साधन भजन कर रहा है तो अच्छा लाटू महाराज सोचते हैं मैं भी साधन भजन करूंगा मैं भी नरेंद्र से आगे बढ़ जाऊंगा ऐसा बोलकर के लाटू महाराज ने जोरदार जप करना प्रारंभ किया किंतु एक समय ऐसा आया कि जप करने के बाद में वह खड़े होकर के देखते हैं तो नरेंद्र ने और भी ज्यादा जप ध्यान करके और कहीं आगे निकल गया है। तो फिर लाटू महाराज सोचते हैं अच्छा मैं और भी ज्यादा जप करूंगा। नरेंद्र को जहां तक पहुंचा है उससे मैं आगे निकल जाऊंगा। जप करना प्रारंभ किया प्रारंभ किया। जहां तक नरेंद्र था पिछले दिन वहां तक पहुंच गए। फिर उस दिन आंख खोल करके देखा तो नरेंद्र भी तो बैठा नहीं रहा था। हाथ पे हाथ जोड़कर के वह भी जब कर रहा था। वह और कितना आगे निकल गया। अभी देखिए कि लाटू महाराज नरेंद्र के सामने जीत ना पाए हो। किंतु हम जो आम आदमी है उससे तो वह कितने कितने आगे निकल गए जब तक रामकृष्ण संघ के मंदिर रहेंगे तब तक उन मंदिरों में लाटू महाराज का फोटो रहेगा फोटोग्राफ रहेगा तब तक उनकी पूजा होती रहेगी तो यह सिद्धि तो उन्होंने हमेशा के लिए प्राप्त कर ली है। इसीलिए यहां पे महाराज जी लिखते हैं। यह लास्ट लाइन में फिर से बड़ा ही सुंदर लाइन है। जगत आध्यात्मिक इतिहासो ओई कोथा बोले अर्थात कि जगत का जो आध्यात्मिक इतिहास है वही बात कहते हैं। क्या कहते हैं? ये जो ठाकुर का यह जो सेंटेंस है स्टेटमेंट नर लीलाएं समस्त कार्य साधारण नरे न्याय होए। नर लीला में समस्त कार्य एक साधारण नर की तरह ही होता है। नर शरीर स्वीकार कोरिया भगवान के नरे न्याय सुख दुख भोग करते एवं नरे न्याय उद्यम चेष्टा और तपस्या द्वारा सकल विषय पूर्णत्व लाभ करते होय नर शरीर स्वीकार करके भगवान को नरक की तरह ही सुख दुख भोग करना होगा और नर की तरह ही उद्यम चेष्टा और तपस्या के द्वारा सभी विषयों में पूर्णत्व प्राप्ति करनी होगी। जगत आध्यात्मिक इतिहास ओई कथा बोले जगत का आध्यात्मिक इतिहास भी यही बात कहता है एवं युक्ति सहाय ए कथा स्पष्ट बुझा जाए और तर्क के माध्यम से युक्ति के माध्यम से यह बात स्पष्ट समझ में आती है ओई रूप ना होले जी प्रति कृपाए ईश्वर कृत नरपू धारण कोनो सार्थकता थाके ना यदि ऐसा ना होता तो जीव के प्रति कृपा कृपा परवश होकर के ईश्वर का नरवपू धारण करने का नर देह धारण करने की कोई सार्थकता ना
दैव और पुरुषार्थ के बारे में ठाकुर का मंतव्य
रहती। अच्छा अभी इसके बाद का जो पॉइंट है महाराज जी क्या लिखते हैं? दव और पुरुषार संबंधे ठाकुर मत। दैव और पुरुषार के बारे में ठाकुर का मत। यानी कि यह जो सनातन एक अह कहेंगे कि डिबेट चली आ रही है। शरणागति बड़ी कि तपस्या बड़ी वही जो फेमस वो है अह कहानी एक गांव में इस तरह से धर्मशाला
दो साधकों की कहानी: अद्वैत और द्वैत का झगड़ा: सोऽहं - दासोऽहं - सदासोऽहं - दासदासोऽहं
थी। वो साधुओं को रहने के लिए साधकों को रहने के लिए और एक रात को दो साधक इकट्ठा हो गए। एक था पक्का अद्वैती दूसरा था पक्का द्वैती। तो अद्वैती साधु रात को साधना करने के लिए बैठा और उसने उद्दीपना प्राप्त करने के लिए दीवाल पर लिख दिया सोहम सह अहम जो ईश्वर है वही मैं हूं। मेरा जो सही स्वरूप है वो दिव्यता से भरा हुआ है। ऐसा बोल करके वह साधन भजन करने के लिए बैठा। किंतु जो द्वैत साधु था अर्थात कि जिसने भक्ति मार्ग का आश्रय लेकर के जो साधना कर रहा था उसने सोचा कि यह ज्ञान मार्गी साधु किस तरह की पागलपन की तरह बात कर रहा है जिसका मन काम कांचन अभिमान घमंड काम क्रोध मद लोभ मोह वगैरह से घिरा हुआ हो अष्टपाश से घिरा हुआ हो वह कैसे अपने को ईश्वर बता सकता है तो उसने नाराज होकर के जो सोहम लिखा था उसके आगे में लिख दिया दा क्या हो गया अर्थ दासो हम मैं हूं ईश्वर का दास तो यह देखकर के वह जो ज्ञान मार्गी अद्वैती साधु था वह नाराज हो गया कहा कि मेरा सही स्वरूप इस पूरे विश्व ब्रह्मांड से परे है यह गोष्पद तुल्य है यह ब्रह्मांड जिसके लिए उसको मैं दास बताऊंगा किसका यह ईश्वर स्वयं क्या है आखिर में ब्रह्मन के ऊपर में समष्टि अज्ञान का आवरण जब होता है तब तो तो यह ईश्वर प्रकट होते हैं। ईश्वर स्वयं माया के भीतर में है। और मैं मायातीत हूं। मैं कैसे जो माया से भरे ईश्वर का दास हो सकता हूं। तो उसने उसके आगे लिख दिया स अर्थात कि क्या हो गया? सदा सोहम हमेशा हमेशा के लिए मैं वही हूं। अर्थात कि मैं ब्राह्मण ही हूं। तो अभी यह भक्ति मार्ग वाला नाराज हो गया। तो उसने स के आगे लिख दिया दा। क्या हो गया? दास दासोहम सिर्फ मैं दास नहीं हूं ईश्वर के दास का दास हूं। यहां पे यह ज्ञान मार्गी साधु स जोड़ रहा है। वह भक्ति मार्गी साधु दा जोड़ रहा है। सदा सदा सोहम दास दास दास सदा दास सोहम सदा सदा सदा सदा सोहम। तो यह जो इटरनल डिबेट है कि शरणागति ना कि यह आत्मश्रद्धा के माध्यम से तपस्या। तो इसके बारे में अभी ठाकुर का क्या मत है? यह शरद महाराज लिखते हैं। क्या कहते हैं? भक्तगण के ठाकुर जे
ठाकुर दो साधनाएँ सिखाते हैं
शकल उपदेश दीतेन ताहार भीतर आमरा दुई भाबेर कथा देखते पाई। भक्तगण को ठाकुर जो उपदेश देते जो सब उपदेश देते उसके भीतर में हमको दो भाव की बातें देखने को मिलती है। दो तरह के अभिप्राय दो तरह के उपदेश देखने को मिलते हैं। ताहार कक्ट उक्ति उल्लेख कोरिले पाठक बुझते पारबेन उनकी कुछ बातों का उल्लेख करके ही पाठक समझ पाएगा। क्या दो तरह की बात आती है उसमें? देखा जाए एक दिक तार भक्त के बोलीते छ देख सकते हैं कि एक और तो वह अपने भक्तों को कहते हैं आमी भात रहची तोरा बाड़ा भाते बोसे जा मैंने भात को रधा है भात बनाया है तुम लोग यह तैयार भात के ऊपर में बैठ जाओ और उसको खा लो छाछ तैयारी होए छे तोरा से छांचे निजेर निजेर मन के फैलो और गड़े तोलो यह छांच अर्थात कि यह एक तरह का क्या कहेंगे कि बीबा मोल्ड यह मोल्ड तैयार हो गया है। उसके भीतर में तुम लोग अपनेप मन को ढाल दो और अपने मन को घर के बना दो। यह जो प्लास्टर ऑफ पेरिस का मैं जब नागपुर में मेरा पोस्टिंग हुआ था मैंने जॉइ करने पीपीटीसी ज्वाइन किया बेलूर मठ में और जॉइ करने के बेलूर मठ से मुझे भेजा गया नागपुर। तो नागपुर में ये जो नया मंदिर बन रहा था उस समय में। तो ऐसा था कि मंदिर के भीतर में यह जो कोतणी काम होता है बड़ा ही इंट्रिकेट वगैरह जो होता है एकदम कोई भी मंदिर में आप पुराने मंदिर में जाएंगे कितनी सुंदर वो जब आकृतियां देवी देवताओं के जो मूर्तियां उसका कोतणी काम होता है किंतु अभी क्या है कि वह सब पत्थर में होता है और यह नागपुर का जो मंदिर है तो बनाया गया है सीमेंट से तो सीमेंट में यदि आपको इस तरह से कोई इंट्रीगेट डिजाइन बनानी है तो आपको ऐसा नहीं है कि सीमेंट का एक ब्लॉक पहले बना दिया। फिर उसमें से हथौड़ी वगैरह लेकर के आप कोई डिज़ाइन बनाएंगे। ऐसा जरूरत नहीं है। सीमेंट में क्या है? वह मोल्ड आते हैं। वो मोल्ड जैसे कि कमल का आकार बनाना है। तो कमल का एक शेप वाला एक मोल्ड बना देंगे। उसके भीतर में यह प्लास्टर ऑफ पेरिस है, सीमेंट है वगैरह डाल देंगे। और फिर डालने के बाद में जैसे ही मोल्ड हटाएंगे, यह जम गया होगा बाय दैट टाइम। तो यह पूरा कमल के आकार का हो गया सीमेंट। फिर उसको उठा के वहां पर चिपका देंगे। तो यह रेडीमेड सब सॉल्यूशन आज के युग में है। तो इस तरह से यहां पर ठाकुर कहते हैं कि देखो यह मोल्ड मैंने बना लिया है ईश्वर के शेप का। ईश्वर के आकार का तुम इसके भीतर में अपने मन को ढाल दो। जैसे ही मन स्थिर हो जाएगा, मोल्ड हट जाएगा, तुम्हारा मन भी ईश्वर के आकार का हो जाएगा। अर्थात क्या है कि ठाकुर ने हमारे लिए यह भात बना के तैयार रख दिया है। मैंने खाना बनाया है। तुम आकर के खा लो। मैंने यह जो मोल्ड बना दिया है इसके भीतर में अपने मन को ढाल दो। किुई यदि ना पारबी तो आमार ऊपर बकल मा दे। यदि तुम कुछ नहीं कर सकते हो तो मुझे पावर ऑफ एटर्नी दे दो। मुझे बकल दे दो। इत्यादि वगैरह तो इस तरह की बात जैसे शरद महाराज ने कहा कि दो तरह की बात करते हुए ठाकुर को हमने सुना है तो एक तरह की बात तो यह हो गई मैंने खाना बनाया है तुम आकर के तैयार खाने पर बैठकर खाना खाकर के रुष्ट पुष्ट हो जाओ मैंने मोल्ड बना दिया है उसके भीतर में अपने मन को डाल दो और यदि साधन भजन तपस्या नहीं कर सकते हो तो मुझे पावर ऑफ एटर्नी दे दो यह तो एक तरह की बात हुई संपूर्ण रूप से शरण शरणागति की और इस शरणागति का सबसे बड़ा उदाहरण है हमारे सामने गिरीश घोष आन्य दिखे बोलते छ किंतु इसी तरह दूसरी ओर और कुछ बातें करते हैं क्या करते हैं एक-एक कोरे सब वासना त्याग कर तबे तो होवे एक-एक करके सभी वासनाओं का त्याग करो तभी तो होगा जड़े आगे एंटो पातार मतन होए थाक जड़ के सामने सामने जो झूठा पत्ता है उसकी तरह हो जाओ। यानी कि अपने अहंकार को संपूर्ण रूप से तुम लोग त्याग कर दो। कामिनी कांचन त्याग करे ईश्वर के डाको। कामिनी और कांचन का त्याग करके ईश्वर को पुकारो। आमी 16लो टांग को करे छी तोरा एक टांग कोर। मैंने 16 आने किया है। तुम एक आना तो करो वगराह। देखिए एक और ठाकुर कहते हैं कि मुझ पर बकलमा दो मुझे पावर ऑफ एटर्नी दे दो। मेरे पर संपूर्ण रूप से शरणागति और विश्वास करो। और दूसरी ओर कहते हैं कामिनी कांचन त्याग करके ईश्वर प्राप्ति करो। तो यह दूसरा दल हो गया। दूसरे दल के लीडर है अपने स्वामी विवेकानंद। अभी यह जो ठाकुर ने यह जो कहा
श्रीरामकृष्ण और स्वामी विवेकानंद की अतुल्य तपस्या की कहानी
है ना मैंने 16 आना किया है। तुम एक आना तो करो। तो देखो कि शरद महाराज इसी लीला प्रसंग में कहते हैं कि जब काशीपुर में स्वामी विवेकानंद उस समय के नरेंद्र जो भयानक साधन भजन की आंधी से गुजर रहे थे उनके जीवन में जप ध्यान तपस्या उसके प्रति जो प्रचंड अनुराग हमको दिखाई दे रहा था जिस तरह से उन्होंने अपने घर को अपनी करियर को सब कुछ विस्मृत होकर के भूल करके ठाकुर के शरणागत होकर के ठाकुर के गाइडेंस के हेठ रहकर के जिस तरह से उन्होंने तपस्या प्रारंभ की थी उस उसको देखकर के हमारे सभी के हृदय में एक तरह का हर्षोल्लास व्यापित हो गया था कि हां इसको कहते हैं कि सही-सही वह ऋषि मुनि अपने पुरातन इतिहास के वो फिर से अवतरित हुए हैं। तो यह बातें उनको बहुत अभी देखिए कि सभी लोगों के भीतर में उसी समय तो इस तरह का साधन भजन का प्रचंड प्रवाह नहीं बहा था। बहुत सों के जीवन में बाद में धीरे-धीरे करके डेवलप हुआ था। जैसे कि महापुरुष महाराज स्वयं कहते हैं कि कुछ-कुछ जो ठाकुर के भक्त हैं वह ईश्वर कोटि होकर के जन्म लिए हैं। किंतु हमको ठाकुर ने ईश्वर कोटि बना दिया है। तो इवेंचुअली ओवर ए लॉन्ग पीरियड ऑफ टाइम इस तरह की प्रचंड साधन भजन के प्रति जो आशा और जो यह है प्रेम वैसे तो सभी डायरेक्ट डिसाइपल के जीवन में क्रमशः प्रकट हुआ था। किंतु नरन के भीतर में उस समय काशीपुर काशीपुर था जैसे कि नरेंद्र का साधन भूमि जिस तरह से दक्षिणेश्वर था ठाकुर की साधन भूमि सा ठाकुर का धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र इसी तरह काशीपुर था अपने नरेंद्र का धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र तो यह देखकर के बाकी सब गुरु भाई थे इतने आनंदित हो रहे थे हर्षोतफुल्ल हो रहे थे और एक बार उन्होंने ठाकुर को कह ही दिया कि देखिए महाशय कि नरेंद्र कितना इतना सुंदर साधन भजन कर रहा है। हमको बड़ा हर्षोल्लास हो रहा है। तो ठाकुर ने कहा कि हां सही बात है। फिर किंतु ठाकुर जो एक बात करते हैं शरद महाराज स्वयं लिखते हैं कि जिसको सुनकर के हम आश्चर्यचकित हो गए दंग हो गए अवाक हो गए। ठाकुर ने क्या कहा कि देखो नरेंद्र के भीतर में जो साधन भजन का तोड़ आया है जो प्रवाह बह रहा है वो इसके भीतर में यानी ठाकुर अपनी ओर उंगली निर्देश करके कहते हैं इसके इसके भीतर में जो साधन भजन का तोड़ आया था जो प्रवाह बहा था ओटार एक शिकर शिकयो नाई उसका एक आने का एक आना भी नहीं है माने वो01% भी नहीं है इतना प्रचंड साधन भजन के प्रति जो आकर्षण और जो प्रवाह ठाकुर के खुद के जीवन में आया था। तो शरद महाराज कहते हैं यह बात सुनकर के हम सभी लोग जैसे कि आश्चर्यचकित हो गए थे। तो इसीलिए जो ठाकुर यहां पे कहते हैं कि आमी 16 टांग कोरे छ तोरा एक टांग कोर मैंने 16 आना किया है। तुम लोग एक आना तो करो। तो एकदम परफेक्ट यह प्रपोर्शन बिठा करके बात करते हैं कि ठाकुर ने जितना किया उसका 1% भी यदि हम कर पाए तो उसके भी हम धन्य है। किंतु यहां पर बात जो है कि दो तरह के प्रपजीिशन ठाकुर हमारे सामने रखते हैं। या तो मेरे पर शरणागत हो जाओ या तो फिर कामिनी कांचन त्याग करके साधन भजन करो। अभी इसके बारे में आगे क्या महाराज लिखते हैं? आमादे बोध हो ठाकुर ओ दुई भा कथार अर्थ अनेक समय ना बुझते पारियाई आमरा दब ओ पुरस्कार निर्भर ओ साधने कोटा धरिया जीवन अग्रेसर होइबो ताहा स्थिर कोरिया उठीते पारी नाई हमको ऐसा लग रहा है कि ठाकुर की यह जो दो तरह की बातें हैं दो भाव की बातें हैं उसका अर्थ बहुत बार न समझ करके ही हम हम लोग दैव और पुरस्कार यह जो परमार्थ और पुरस्कार यह जो दो है इन दोनों के बीच में कौन सा अच्छा है? निर्भर और साधन। निर्भरता और साधना। इन दोनों में से किसको पकड़ करके जीवन में आगे बढ़े वह स्थिर नहीं कर सकते हैं। उसका निश्चय नहीं कर सकते हैं। तो यह परमार्थ हो गया ना कि यह पुरुषार्थ हो गया। यह निर्भरता हो गई कि साधन भजन हो गया। मेरे लिए कौन सा अच्छा है वह मैं समझ नहीं पा रहा हूं। मैं कंफ्यूज हो जाता हूं। पुरुषार्थ करूं तो पुरुषार्थ करने के लिए शक्ति नहीं है। परमार्थ के ऊपर मैं भरोसा रख के बैठूं। तो घमंड इतना है कि संपूर्ण रूप से मैं शरणागत नहीं हो पाता हूं। क्या करूं? क्या ना करूं? यह लेकर के हम लोग कभी कंफ्यूज हो जाते हैं। तो यहां पर महाराज जी कहते हैं दक्षिणेश्वरे एक दिन आमरा जैक बंधुर सहित मानबेर स्वाधीन इच्छा किछु मात्र आ की ना ए विषय लया अनेक खण बाानुवादे पर उहार यथार्थ मीमांशा पबार निमित्त ठाकुर निकट उपस्थित होई यह एक पूरी बात यह है कहानी है जो शरद महाराज बताते हैं और इसके भीतर में जो ठाकुर का जो सॉल्यूट ्यूशन है वह भी बड़ा सुंदर है। तो महाराज कहते हैं कि दक्षिणेश्वर में हम लोग एक बार हमारे एक मित्र के साथ में मनुष्य की स्वाधीन इच्छा है कि भी नहीं इसको लेकर के बहुत बार तर्क विितर्क किया बहुत समय तक और किंतु फिर जब इसका कोई सॉल्यूशन नहीं मिला तो हम ठाकुर के पास में आकर के उपस्थित हुए कि हमारे पास में स्वाधीन इच्छा है कि नहीं। बहुत बार देखिए कि ईश्वर के बारे में लोग क्या कहते हैं कि ईश्वर कठपुतली की तरह हम सबको नचाते हैं। यानी पपेट मास्टर की तरह यानी कठपुतली चलाने वाले की तरह हम सबको नचाते हैं। हम जैसे कि पपेट ही हैं उनके हाथों में उनके हाथों में जैसे कि हम कठपुतली ही हैं। तो कोई कहता है कि नहीं नहीं ईश्वर के पास में इतना थोड़ी ना टाइम है कि जितने भी जीव जंतु मनुष्य पेड़ पौधे सबको वो बैठे-बैठे कठपुतलियों की तरह नचाते रहे वह अपना काम करेंगे हम अपना काम करते हैं। हम अपना जो कर्म है उसके अनुसार हमको फल मिलता रहेगा जो कि एक ऑटोमेटिक प्रोसेस है। ईश्वर का इसमें कोई हाथ नहीं है। तो यह दो तरह का जो बा जो है आर्गुममेंट थियोलॉजी में हमेशा से जो चलता आ रहा है तो उसको लेकर के यह लोग ठाकुर के पास में उपस्थित हुए। ठाकुर का जो सॉल्यूशन है वो बड़ा ही सुंदर है। इसको हम कल पढ़ेंगे। वैसे आज मैं इतना बता देता हूं कि ठाकुर ने सॉल्यूशन क्या दिया है। ठाकुर कहते हैं कि देखो यह जो गाय है गाय को आपने एक कहीं पर बांध करके रखा। अभी रस्सी जितनी लंबी है उतनी लंबी रस्सी के भीतर में गाय को जितना जो घास खाना है वह गाय घास खा लेगी। अभी उस उसके भीतर का जो घास यदि समाप्त हो गया खा करके तो अभी गाय तो भूखी नहीं रहनी चाहिए तो वह जो किसान है वह क्या करेगा? रस्सी को थोड़ा लंबा कर देगा। अभी और लंबी रस्सी हुई यानी गाय और थोड़ा दूर तक जाएगी और नया घास खा पाएगी। तो अभी ठाकुर कहते हैं कि देखिए हमको ईश्वर ने इतनी रस्सी दी हुई है। मान लीजिए 5 फुट की रस्सी से हमको बांधा है। तो 5 फुट के जो सर्कल जो बनता है उसके भीतर में जितना घास है वो घास यदि हम खा लेंगे तो ईश्वर फिर रस्सी को लंबा करके 10 फुट की करेंगे। तो अभी यह 10 फुट का जो सर्कल है उसमें तो और ज्यादा घास है और ज्यादा घास खा पाएंगे। तो क्या हुआ? हमने पुरुषार्थ किया तो ईश्वर की कृपा हुई। किंतु ठाकुर कहते हैं कि देखिए पहली बार जब हमारी 10 5 फुट की जो रस्सी थी उसके भीतर में जितना घास था वो यदि हमने नहीं खाया तो किसान वो रस्सी को बढ़ाएगा नहीं। किसान सोचता है गाय को यदि भूख लगेगी तो यह 5 फुट के भीतर में इस सर्कल में जितना घास बचा है वह तो है ही है। उसको पहले वह खाने दो ना। वो 10 फुट तक वो जो दूर-दूर तक जो घास पड़ा हुआ है वो खाने की उसको क्या जरूरत है? तो वैसे ही ईश्वर हमको थोड़ी सी स्वाधीन इच्छा देते हैं और हमको बांध करके रखते हैं। फिर इस स्वाधीन इच्छा के भीतर में यदि हम थोड़ा बहुत साधन भजन करें तो फिर ईश्वर कृपा करके और थोड़ी सी स्वाधीन इच्छा देते हैं। अभी यह स्वाधीन इच्छा का हम लाभ उठा करके यदि और थोड़ा सा साधन भजन करें तो और थोड़ी स्वाधीन इच्छा देते हैं। यानी कि यह जो हमको स्वाधीन इच्छा मिली हुई है वह ईश्वर की कृपा से ही मिली हुई है। तो यह जो तपस्या करना या ईश्वर पे शरणागत होके रहना इसका यह सॉल्यूशन है। जितनी तपस्या करेंगे उतना ही ईश्वर हमको आशीर्वाद देते रहेंगे। किंतु यह पैसेज है काफी लंबा तो फिर इसको अभी हम कल पढ़ते हैं। आज यहीं तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।
प्रश्न: ईश्वर से रस्सी लम्बी करवाने के लिए कड़ी मेहनत करने के बजाय, हम एक स्थान पर बैठकर शिकायत करते रहते हैं। Q: instead of working hard so that ishvar will lengthen the rope, we sit in one place and complain.
यह जो पहले हमने देखा ना कि अभी इस जन्म में तमस और रजस का प्राधान्य है तो मैं सोचूंगा ठाकुर में तो बचपन से ही सत्व का प्राधान्य था तो उन्होंने जो साधन भजन किया वहां तक मैं कैसे कर पाऊंगा। नॉट नेसेसरी कि आपको ठाकुर तक जाना है। इस जन्म में इतना साधन भजन कर लीजिए कि नेक्स्ट जन्म में सत्व का प्राधान्य हो। फिर वहां से आगे बात बढ़ा लेंगे। तो माने मेरे मन में इतना काम कांचन के प्रति स्प्रूहा है तो साधन भजन करने का कोई तात्पर्य ही अर्थ ही नहीं है। इस तरह से फ्रस्ट्रेट कभी नहीं होना है।
प्रश्न: हमें ठाकुर द्वारा की गई तपस्या का केवल 1/16 भाग ही करना है। क्योंकि उन्हें पूरी दुनिया की चिंता करनी थी, हमें केवल अपनी चिंता करनी है। Q: we have to do only 1/16th of the tapasya that thakur did. because he had to worry about the whole world, we have to worry about only ourselves.
ठाकुर ने बड़ी एक फनी बात कह ठाकुर कहते हैं आ यदि घुरे-घरे मुती तो तू साला दाड़ी दाड़ी मूतवी मैं यदि घूमते घूमते मुतूंगा तुम लोग खड़े-खड़े मुतंगे ठाकुर के उदाहरण थे ना ऐसे कुछ-कुछ स्वामी जी क्या कहते हैं जो अभद्र बातें हैं जो म जो अच्छे लोगों को सुनने के लिए बातें नहीं जो है उस तरह की बातों को तुम कथामृत में मत रखना ये मास्टर महाशय को ठाक स्वामी जी लिखते
प्रश्न: दैव और पुरुषार्थ के बारे में
हैं इस इस डिबेट को थोड़ा सा यदि मॉडर्नाइज करें ना तो देखिए जिसको कहते हैं जेनेटिक बूस्ट अभी अब जिसका जेनेटिक डीएनए अच्छा रहता है जिसका कि यह फिजिकल जो अभी हार्ट है, लीवर है, किडनीज़ है, ब्रेन है, प्रॉपर फंक्शनिंग करता है। तो अभी क्या होगा कि बचपन से ही विल एक्सेल इन एवरीथिंग। स्पोर्ट्स में जाएगा तो स्पोर्ट में एक्सेल करेगा। एकेडेमिक लाइफ में यदि उसका इच्छा है, उसमें जाएगा। अभी आजकल इंडिया में चेस के ग्रैंड मास्टर बन रहे हैं इतने सारे। तो यदि चेस में इच्छा है, क्रिकेट में इच्छा है, म्यूजिक में इच्छा है। बिकॉज़ ही हैज़ गॉट दैट जेनेटिक मेकअप टू एक्सेल इन एनीथिंग दैट ही वांट्स टू। अभी अभी जैसे यहां पर सीपी क्लीनिक है। कल मैं यहां पर गया था तो बच्चों को सर्टिफिकेट बांटने थे। तो अभी क्या था कि उसके उनके पेरेंट्स आए हुए थे। तो सभी पेरेंट्स एक बार आकर के मेरे साथ बात करेंगे थोड़ा बताएंगे कि उनके बच्चे का किस तरह से प्रोग्रेशन हुआ। तो अभी एक फादर आए वो कहते हैं कि देखिए मैंने पिछले 8 साल से बच्चे को लेकर के प्रतिदिन सीपी क्लीनिक आते हैं। पूरा दिन वहां पर रुकते हैं। तो उसके लिए उनको नाइट जॉब करना पड़ता है। तो पूरी रात भर नौकरी करेंगे। दिन भर बच्चे को लेकर सीपी क्लीनिक आएंगे। तो अभी ये जो बच्चे का क्या बेचारे को जो बेड हैंड डी हुआ है उसके नसीब में यह जो जेनेटिकली ही प्रॉब्लम आ गया है। बेचारा क्या करेगा? तो यहां पर जो है कि जो कि फिजिकली फिट है ऑन वन हैंड आप मान लीजिए विराट कोहली है या तो लता मंगेशकर है या तो फिर यह अपने फाइटर पायलट जो होते हैं या इसरो के साइंटिस्ट होते हैं उनको रख लीजिए मतलब दे हैव बीन गिवन अ ग्रेट गुड फॉर्च्यून फिजिकली मेंटली फिट है इस तरह के फैमिली में जन्म लिया है जहां पे उनको नर्चर किया गया है उनको वो अपॉर्चुनिटीज मिली है बेस्ट यूनिवर्सिटीज कॉलेज स्कूल में उनको एडमिशन मिला है। पैसा खर्च हुआ है। ऑन दी अदर हैंड यहां पर यह बच्चा है जो कि बचपन से ही इज सफरिंग फ्रॉम सेरेब्रल पालसी। पिताजी के पास में इतने पैसे नहीं है कि वो नाइट स्कूल नाइट ड्यूटी करते हैं। दिन में यहां पे लेके आते हैं। सो दिस इज अ वेरी स्टार्क कंट्रास्ट। हमको लगता है कि मेरा नसीब ही फूटा हुआ है तो फिर मैं क्या करूंगा? अभी यह बच्चों को मैं कभी भी इस तरह की बातें नहीं करूंगा कि ठाकुर मां स्वामी जी को याद करो। वो सब बातें बड़ी दूर की है। यदि वह अपने से मेहनत करके बाथरूम जा पाए और किसी को बाथरूम ले जाने की जरूरत ना पड़े और किसी को इसको खिलाने की जरूरत ना पड़े। अपने से खा पाए जो फिजिकल फंक्शन बेसिक होते हैं वह यदि अपने से कर पाए दैट इज अ विन फॉर हिम इन दिस लाइफ। सो इन दिस सिचुएशन यह बड़ा एकदम स्टार्कली क्लियर हो जाता है। जो कि बहुत फ़ॉर्चूनेट है। जिनको कि ईश्वर ने जैसे कि सब कुछ दे दिया है और इतने मिसफर्चूनेट है जिनको कि बेचारे के पास में कुछ नहीं है। बेसिक फिजिकल फंक्शन भी अपने हाथों से नहीं कर पाते। इन दैट केस यह होता है प्रश्न कि उन्होंने पिछले जन्म में ऐसा तो कौन सा कर्म किया होगा या तो फिर ईश्वर उनके ऊपर में इतने नाराज क्यों हो गए कि इस तरह से उनको दिया। राइट? सो वैसे क्वेश्चन इज वेरी फंडामेंटल। किंतु ठाकुर कहते हैं देखिए ठाकुर का भी यदि यहां पर टीचिंग ले आए तो यदि वह जितना उसको मिला है सेरेब्रल पालसी है पेरेंट्स की यह परिस्थिति है इसमें भी यदि वह थोड़ा बहुत साधन भजन करके आगे निकल जाए नेक्स्ट बर्थ विल बी बेटर उसमें और थोड़ा सा आगे कर दे साधन भजन नेक्स्ट बर्थ विल बी इवन बेटर इवेंचुअली एक समय आएगा कि वो विराट कोहली की तरह फिजिकली फिट ऐसे फैमिली में जन्म लेगा जहां पे कि उसकी टैलेंट को नर्चर किया जाता है एप्रिशिएट किया जाता है। सो दैट पाथ इज देयर। सब कुछ मतलब अंधेरा नहीं हो गया है कि यह जन्म तो गया मेरे हाथ से तो हाय रे अभी मैं क्या करूं? उसके फादर को देखकर के हमारा जो प्रिंसिपल मैडम है ना वो कहती है कि महाराज ये पेरेंट्स को देखकर के हमको कॉन्फिडेंस मिलता है। ऐसे बच्चे को लेकर के एक मां है पिछले 16 साल से प्रतिदिन अपने बच्चे को लेकर के 30 कि.मी. दूर रहती है। 30 कि.मी. से प्रतिदिन अपने बच्चे को लेकर सीपी क्लीनिक आती है। एक दिन छुट्टी नहीं लेती। और वो जो मदर है उसका डेडिकेशन है ठाकुर मास्वामी जी के प्रति। तो हमारा प्रिंसिपल मैडम कहती है कि महाराज इनको देखकर के हमको कॉन्फिडेंस मिलता है। मैंने कहा ऐसे आपको नहीं मुझे भी मिलता है। देखिए हमको ठाकुर ने सब कुछ दिया है। फिजिकल फिटनेस दी है। ऐसा फैमिली में जन्म लिया है कि जो कि हमको एप्रिशिएट करें हमको प्रेम करें। और इसके बावजूद यदि मैं यह कहूंगा कि अरे मुझे तो ठाकुर की तरह नहीं मिला तो फिर ऐसा सोचो कि आई एम मच बेटर देन देम। सो व्हाटएवर इज गिवन टू मी लेट मी टेक बेनिफिट ऑफ इट। और यह जन्म में जितना हो सो कर लो। फिर नेक्स्ट जन्म में और बेटर करेंगे। एक और और बेटर करेंगे। दिस इज़ हाउ वी नीड टू हैव पॉज़िटिव आउटलुक। किमी प्रतिदिन 16 साल से जस्ट इमेजिन और अकेले भी नहीं आना है। वो बच्चे को बच्चे को लेके आना है। व्हिच इज मेंटली डिसेबल्ड। तो अभी देखिए कि नाउ टेक आवर लाइफ एस अ पॉजिटिव। के ठाकुर ने उनकी कंपेयर में तो हमको बहुत कुछ दिया है। लेट अस टेक बेनिफिट ऑफ दिस। यह कृपा जो मिली है हमको उसको बेचारे को 5 फुट दिया है। हमको 5000 फुट दे दिया है। टेक बेनिफिट ऑफ इट। 5 लाख क्यों नहीं दिया? ये सब भूल जाइए
प्रश्न: हम ठाकुर की कहानियों की ओर आकर्षित होते हैं। यह अपने आप में एक बहुत बड़ा आशीर्वाद है। कभी-कभी हम इसकी सराहना नहीं करते हैं। Q: we are attracted to thakur's stories. this itself is such a huge blessings. sometimes we do not appreciate this.
अभी। ये जो स्वामी जी कहते हैं ना कि मास्टर महाशय को कहते हैं जब वो मास्टर महाशय वहां पे जाते हैं ना वरा नगर मठ में कथामृत के आखिर आखिर में है। आई थिंक वहीं पे है ये। तो स्वामी जी कहते हैं कि देखिए वेदांत में वेदांत शास्त्र में जैसे लिखा गया है मनुष्यत्व मुमुक्षत्व महापुरुष संश्रय यह तीन जिसके पास होता है उसका फिर मतलब पूरा ही इज़ ग्रेटली फॉर्चूनेट उसका साधन भजन आगे चलेगा तो स्वामी जी कहते हैं कि मेरे पास में तीनों आ गया मनुष्यत्व भी आ गया मुमुक्षुत्व भी आ गया महापुरुष संश्रय ठाकुर जैसा महापुरुष भी मिल गया फिर भी मुझे मुक्ति नहीं मिल रही है तो हाय रे मेरा कैसा मैं क्या करूं तो फिर मास्टर महाशय लिखते हैं कि देखिए कि मटके भाइयों के मन की कितनी सुंदर अवस्था है। यह जो व्याकुलता है भीतर से कि मुक्ति मिलनी ही चाहिए। क्यों नहीं मिल रही है? इसके पीछे में वो जो ठाकुर कहते हैं ना कि सर के ऊपर में आग लगी है। वो आदमी कैसा वो मारे-मारे वो पानी खोज के फिरता है। तो वैसे इन लोगों के भीतर में व्याकुलता है। इट विल टेक देम टू द अल्टीमेट गोल ऑफ़ ह्यूमन लाइफ। वो कैसे आया है महाराज? ना वो दैट इज़ कृपा। दैट इज़ कृपा। राइट है। दैट इज कृपा। किंतु अगेन वो तो वही बात हो गया कि इतनी कृपा वही है। उसीलिए हुई है क्योंकि हमने पिछली बार वो कुछ साधन भजन किया [हंसी]
प्रश्न: हम हमेशा साधन-भजन ही करते रहेंगे न की कभी समाधी भी प्राप्त होगी?
होगा। देखिए अभी यहां पे कैसा है पता है? ठाकुर क्या कहते हैं कि ईश्वर जो है वो दुकान में जाकर के जैसे मैंने ₹50 दिए सामने मुझे दो-ती किलो आलू मुझे मिलना चाहिए। तो इस तरह से कोई शॉप कीपिंग नहीं है कि हमने इतना साधन भजन किया तो उसके सामने मुझे यह फल मिलना चाहिए। यह साधन भजन करना अपने हाथ में है। फल है ईश्वर के हाथ में जो गीता का जो स्पष्ट उपदेश है कर्मणवा ही अधिकारस्ते मा फलेशु कदाचनम। यदि फल की इच्छा रखकर के कर्म किया तो वह फिर सकाम कर्म हो जाएगा। इवन यदि मुझे मुक्ति की भी इच्छा रखनी है तो वह भी तो एक तरह का सकाम कर्म है। यानी कि साधन भजन करते हैं ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए। ईश्वर की मुझे मैं ईश्वर को प्रेम करता हूं इसलिए मैं साधन भजन करता हूं। तो फिर अभी जैसे देखिए कि ठाकुर एक उदाहरण देते हैं। एक बड़ा आदमी उसके पास में 10 लोग मदद मांगने के लिए आते हैं। तो वह सबके साथ में तुच्छ के साथ में वह वर्तन करता है। किंतु एक आदमी आया तो यह बड़े आदमी ने पूछा कि अच्छा तुमको क्या चाहिए? तो उस आदमी ने कहा मुझे कुछ चाहिए नहीं। मैं तो सिर्फ आपका आपका दर्शन करना मुझे अच्छा लगता है इसलिए मैं आता हूं। तो वह बड़ा आदमी सोचता है कि अरे यह तो एक नए तरह का कोई देखता है। मुझसे कुछ चाहिए नहीं। कि मेरे दर्शन ही करना है। उसी से खुश हो जाता है। तो अच्छा ठीक है। वह आदमी जब दूसरी बार आया तो उसने क्या किया? बड़े आदमी ने। तुम अच्छा मेरे साथ में बैठो। यहां पे बैठो। सम्मान से उसके साथ में बात करता है। क्यों? क्योंकि वह किसी लोभ, लालच या आकांक्षा ले नहीं आया है। उसके साथ में प्रेम है बोल के आया है। तो जिसके साथ में प्रेम होता है उनके साथ में अलग रिलेशन होता है। जो दुकानदारी करते हैं उनके साथ में अलग रिलेशन होता है। अच्छा ₹50 दिए तो उसमें तुमको दो जो 2 किलो आलू मिलने वाला है वही मिलेगा। उससे ज्यादा और कुछ नहीं मिलेगा। अभी जो प्रेम के लिए आया है अभी वो बड़े आदमी की इच्छा हुई तो पूरी दुकान उसको दे दी। कुछ ठीक नहीं है। वह ठाकुर कहते हैं ना कि छोटा बच्चा उसको उसकी मां ने नए वस्त्र पहना है। तो अभी यह नया वस्त्र पहन के वह घूम रहा है। तो फिर किसी ने कहा अच्छा तुम्हारा धोती मुझे दे दो। बड़ा अच्छा है तो बच्चा बोलेगा क्यों दूं? मेरी मां ने मुझे दिया है। तुमको नहीं दूंगा। फिर और कोई आया जो कुछ मांगता नहीं है। कुछ नहीं है। बच्चे की इच्छा हुई धोती निकाल के उसके हाथ में दे दी। तो यह यह नहीं सोचना है कि मुझे इसके बारे में फल क्या मिलेगा। देखिए साधन भजन हम कर रहे हैं। वही ईश्वर की सबसे बड़ी कृपा है। ईश्वर ने हमको वो मौका दिया है, फिजिकल फिटनेस दी है, मेंटल टेंडेंसी दी है कि मैं साधन भजन करूं। दैट इटसेल्फ इज अ साइन ऑफ हिज ग्रेस। फिर यह नहीं सोचना है कि साधन भजन करके मुझे लाभ क्या हुआ? निर्विकल्प समाधि, सविकल्प समाधि क्यों नहीं हुई? इस तरह का एम मत रखिए जीवन में। ऐ इतना रखिए ठाकुर के पास में इतना मांगिए कि ठाकुर ज्ञान दो, भक्ति दो, वैराग्य दो। देखिए स्वामी जी ने यह जो मांगा है ऐसा नहीं कहा कि तुम मुझे दर्शन दे दो या सिद्धि दे दो या तुम मुक्ति दे दो मुक्ति हम अपने से मांग लेंगे कर लेंगे उसमें आपकी जरूरत नहीं है ज्ञान भक्ति वैराग्य दे दो बाकी हम अपने से निपटा लेंगे सो हमेशा मांगिए कि ईश्वर की तुम्हारे प्रति शरणागति हो साधन भजन करने की शक्ति हो तो गिरीश कहता था दो दत्त का झगड़ा है
प्रश्न: रामचंद्र दत्त और स्वामी विवेकानन्द में कैसा विरोधाभास था!
बीच में नहीं आना मुझे वो पता है ना रामचंद्र दत्त उनके घर में रहते थे जब छोटे छोटे थे तब स्वामी जी के घर में उनके कोई डिस्टेंट रिलेटिव थे। वो जो आखिरी घटना पता है ना इन दोनों के जीवन की स्वामी जी अमेरिका से वापस आए विश्व प्रसिद्ध विवेकानंद अभी वो कोलकाता का लड़का नहीं है जिसको कि जो लोग जो कुछ चाहे बोले वेगेमों की तरह घूमता है। अभी तो राजा महाराजा उसका रथ खींचते हैं। तो वह स्वामी जी मिलने को गए रामचंद्र दत्त को। अभी दत्त रामचंद्र का आखिरी समय चल रहा था काकुड़गाछी में। बीमार थे वह बेड पर लेटे हुए थे। तो अभी स्वामी जी आए बैठे रिस्पेक्टफुली बात किया रामचंद्र भी बड़े खुश हो गए कि हां भाई वह सब हमारा जो था वह अभी भूल जाओ अभी वह खुद अपने आखिरी समय चल रहा है तो अभी क्या है ऐसा करके बात की अभी रामचंद्र दत्त को बाथरूम जाना है तो वो बेड में लेटे हुए थे बीमार थे तो बैठे बैठ उठ के बैठे अभी वह चप्पल खोजने के लिए वह ऐसा नीचे देख रहे चप्पल क्या हुआ कि बेड के नीचे में चले गए थे तो वह ऐसा धीर अभी झुक भी नहीं पा बीमार इतने हैं तो फिर वैसा थोड़ा झुके देखा कि चप्पल दिख नहीं रहा है तो बड़े मायूस हो गए कि चप्पल क्या बेड के नीचे में चला गया अभी कौन बाहर निकालेगा यहां पे स्वामी जी कुर्सी पर बैठे थे कुर्सी में से नीचे उतरे बेड के नीचे में जाकर के चप्पल निकाल कर के रामचंद्र के पैर के सामने रख दिए तब उनकी आंखों में आंसू आ गए कहा कि भाई जो स्वामी जी ठाकुर तुम्हारी जो प्रशंसा करते थे ठाकुर ने जो तुम्हारे बारे में जो कहा है बिल्कुल सब कुछ सही है
वराहनगर मठ में स्वामी विवेकानन्द पे गुरुभाईओ का जिम्मा
यह डायलॉग वहां कथामृत में है। वो हुआ ऐसा कि त्रिगुणातीनंद जी वो छोड़ के चले गए थे। एकाएक उन्होंने पत्र लिखा पत्र वहां पर रह गया। पत्र में लिखा कि देखिए मैं तो यहां पे घर छोड़ के आया हूं। फिर अभी मुझे तकलीफ हो रही है। फिर मुझे माया की मूर्ति भी दिखी स्वप्न में तो मैं छोड़ के जा रहा हूं। फिर मैं देखता हूं कि तो ऐसा बोल के छोड़ के चले गए। तो वानगर मठ अभी उस समय स्वामी जी कहीं कोलकाता गए थे तो स्वामी जी आकर के देखा कि राजा महाराज वगैरह है और उन्होंने यह पत्र दिया कि जो शारदा प्रसन्न है वो मठ छोड़ के चला गया है। तो उस समय मास्टर महाशय थे तो मास्टर महाशय के साथ में स्वामी जी का वार्तालाप हो रहा है। स्वामी जी कहते हैं देखिए और एक नई मुसीबत मेरे सर पर आ गई है। फिर अब वहां पे एक संसार था। यह दूसरा संसार है। लड़का भाग गया। अभी मैं कहां उसको खोजने को घूमूंगा। फिर यह ठाकुर ने तो मुझे कहा है सबका जिम्मा तुमको लेना है तो अभी मैं इस लड़के को कहां खोजूंगा फिर वह राजा महाराज को डांट रहे हैं तुम ही तो पाप हां करे तो लेक्चर दाओ माने दो पैर खोल के म आराम से बैठ के इतने लेक्चर फैक्चर देते हो तुम रोक नहीं पाए क्या उसको जाने के समय तो राजा महाराज बोलते हैं मैं तो दक्षिणेश्वर गया था तो मुझे पता नहीं वह चला गया फिर वो राजा महाराज कहते हैं देखो तुम जो अपने कोर्ट कचहरी का चक्कर है उसके लिए बार-बार घर जाते हो तो यह शारदा प्रसन्न कह रहा था कि नरेंद्र अपने घर के साथ में इतना रिलेशन रखता है तो फिर मैं मुझे भी अपने घर के प्रति आकर्षण हो रहा है कि अभी मैं क्या करूं तो अभी स्वामी जी भी एकदम फिर कुछ नहीं बोल पाए अपने पर आ गया ना यह तो अभी पूरा कि अभी वो खुद के घर में जो परिस्थिति थी वो तो कैसी थी हमको पता है तो उस समय यह सब बातें हो रही है कि क्या करें कुछ मिला नहीं तो राजा महाराज कहते हैं कि यहां पर रहते तो कुछ मिला नहीं क्या करें चलो वृंदावन कहीं पर चले जाते हैं उस समय स्वामी जी ये कहते हैं कि राम नहीं मिला तो क्या श्याम के बाद में घर करना है। यदि ईश्वर नहीं मिला तो क्या घोर संसारी होकर के रहना है? वह जो ठाकुर कहते हैं ना जो जन्मजात
प्रश्न: ईश्वर प्राप्ति भले ही न हुई हो, साधना नहीं छोड़नी!
वो जो किसान होता है वो यदि एक दो पाक फसल उसकी बिगड़ गई तो ऐसा नहीं है वो किसानी छोड़ के और कुछ काम करेगा। वो जन्म भर वो किसानी का ही काम करेगा। भले एक दो फसल बिगड़ गई। क्या है ना? यही तो बात हो गई। जैसे ठाकुर ने
प्रश्न: सारदानन्दजी कहते है की अवतार की नरलीला साधना का आदर्श स्थापित करने के लिए है. जबकि वैष्णव कहते है की नरलीला हमें ईश्वर पे प्रेम हो इस लिए है. तो क्या यह दोनों विचार विरोधाभासी है?
कहा ना कि मुझे बकल दो। अभी कृष्ण को बकलमा कब देना है जब हम कृष्ण जैसे नहीं हो पाएंगे तब तो उनके ऊपर में भरोसा रख के जीवन बिताओ तो वह शरणागति का रास्ता हो गया और उनकी तरह तपस्या करके जीवन बिताओ वो अपना ज्ञान मार्ग हो गया तो भक्ति मार्ग ज्ञान मार्ग यह डिबेट हमेशा से चलती आई है कि कौन सा श्रेष्ठ कौन सा करें कौन सा ना करें ठाकुर कहते हैं कि तुम तपस्या करो फिर ईश्वर ही कृपा करके वह तपस्या करने की शक्ति बढ़ाता रहेगा तो एक्चुअली देखिए वे लोग तपस्या की बातें भले चाहे ना करें भक्ति मार्गी किंतु जितने भी श्रेष्ठ भक्ति मार्गी है अभी जैसे चैतन्य देव ठाकुर ने क्या कहा कि सार्वभौम उनकी जीहवा के ऊपर में शुगर रखने को गया तो शुगर भीगी नहीं वो हवा में उड़ गई यानी कि उनकी जीह में तपस्या की शक्ति इतनी थी कि शुगर रखने से भी वह खाएंगे नहीं इतना प्रचंड तपस्या का जोर था जितने भी सर्वश्रेष्ठ साधक देख लीजिए भक्ति मार्ग के कितना उनका जीवन पवित्र रहता है तो जीवन पवित्र तो कोई हंसीज़ाक में तो नहीं बन गया है। ईश्वर की कृपा से बना है। साधना से बना है। सो दिस बोथ अल्टीमेटली इवन चाहे देखिए वे लोग ज्ञान मार्ग को या तपस्या को स्वीकार ना करें। भक्ति मार्ग में जो बताया गया है वो एक्चुअली तपस्या ही है। जैसे आपने कहा कि अभी ये गिरीश घोष कहता है बकलमा दे दिया मैं खुश हो गया। बट अभी वो सतत मन में चिंतन चलते रहना चाहिए। सो दैट इज नथिंग बट तपस्या। सो अभी क्या है ना अभी ये शब्दों की रमत है। वह बोलते हैं मैं शरणागत हूं। बोलते हैं मैं तपस्या करता हूं। अल्टीमेटली शरणागति और तपस्या इज अ सिनोनिम ऑफ ईच अदर। टू साइड टू एस्पेक्ट ऑफ अ कॉइन। देखिए ठाकुर को पढ़ने का फायदा यह है कि यह जो इटरनल डिबेट है ना उनके भीतर में हमको सामंजस्य दिखता है। अदरवाइज अभी शंकराचार्य के डिसाइपल और रामानुजाचार्य के या मधवाचार्य के या तो फिर गौरांग महाप्रभु के दोनों के बीच में अभी ये डिबेट चल रहा है। बीइंग ए डिसाइपल ऑफ श्री रामकृष्ण हमको पता है कि यह डिबेट जो है पूरा सरफेस के ऊपर में है। साइकोलॉजिकल फिनोमिना जो है कि आपको विषय से दूर जाना है वो तो दोनों को करना है। कोई भी भक्ति मार्गी ऐसा नहीं कहेगा कि आप विषय में डूबे रहकर के ईश्वर की प्रार्थना कीजिए। वह कोई नहीं कहेगा। तो विषय का त्याग करना है। दैट मींस तपस्या। अभी आप वो शरणागति के माध्यम से करें कि तपस्या के माध्यम से करें। साइकोलॉजिकली इट इज सेम
प्रश्न: वैसे तो स्वामीजी सोऽहं के घर के थे, किन्तु रामचंद्र के जूते खाट के निचे से निकालते है. यानि की ठाकुर के दास के दास -- दासोऽहं, दासदासोऽहं
थिंग। ये जो एग्जैक्ट कंट्रास्ट यदि करना है तो स्वामी जी और नाग महाशय गिरीश घोष क्या कहते हैं? महामाया अपनी जाल में पकड़ने को आई। सबको दो लोगों को ना पकड़ पाई। स्वामी जी इतने विराट से विराट होते गए कि जाल छोटी पड़ गई और नाग महाशय इतने सूक्ष्म हो गए कि जाल के भीतर में जो गैप है उसमें से निकल गए और नाग महाशय और स्वामी जी इन दोनों के प्रति जो बंधुत्व और प्रेम है गजब है वो शरद चंद्र चक्रवर्ती उसमें वो स्वामी शिष्य संवाद में लिखता है कि नाग महाशय आए हैं वहां पे तो स्वामी जी कितनी श्रद्धा भक्ति के साथ में उनका स्वागत करते हैं और फिर इनको कहते हैं कि शरद चंद्र को कि देखो तुम्हारा जो उस समय का बंगाल यानी कि आज का बांग्लादेश वो धन्य हो गया उनके आने से। सो जो दासोहम है और जो सोहम है इन दोनों के बीच में प्रचंड वो आप कहेंगे कि स्नेह और प्रेम का बंधन। सेम थिंग विद बिटवीन आवर गिरीश घोष एंड स्वामी जी। और और जितना डिबेट करेंगे हमको सुनने को मिलेगा। देखिए दो लोग हैं दोनों के विचार मैच हो रहे हैं तो फिर डिबेट वो बातोंबातों में वो जो स्पार्क है ना वह नहीं निकलेंगे फिर दोनों यदि ऑोजिट विचार वाले हैं दोनों का ठाकुर पे श्रद्धा है जो फिर वो स्पार्क्स निकलेंगे वी ऑल विल बेनिफिट