Invocation
ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः स्वामी शारदानंद द्वारा रचित श्री श्री राम कृष्ण लीला प्रसंग का प्रारंभ करेंगे और हमारा जो विषय है इस सप्ताह हम लोग शास्त्र की आलोचना करने का प्रारंभ किया है तो साधक भाव लीला प्रसंग का द्वितीय खंड है साधक भाव तो साधक भाव से हम लोग शास्त्र में प्रवेश करेंगे यदि आपने लीला प्रसंग पढ़ा होगा तो आपको पता होगा कि लीला प्रसंग को स्वामी शारदानंद जी महाराज ने पांच खंड में रचित किया है पूरी टेक्स्ट को पांच खंड में बांट दिया है सर्वप्रथम है ठाकुर की बाल्य लीला कामर पुकुर में जिस तरह से ठाकुर का जन्म हुआ उस का पारि पार्श्विक विवरण फिर उसके बाद में ठाकुर का जन्म के बाद में ठाकुर किस तरह से उनका जो माइंड सेट था वो अपनी पाठशाला में भेजती थी मां उनकी चंद्रा देवी तो वहां पर नहीं जाकर के वहां पर जाते तो थे किंतु फिर वहां से भाग कर के अपने मित्रों के साथ में माणिक राजा के आम्र कानन में चले जाते थे वहां पर इतिहासिक नाटक का वो यह करते थे प्ले करते थे चरित्र का अभिनय करते थे और फिर ठाकुर को चित्र दोरना यह भजन गाना अभिनय करना यह आज की लैंग्वेज में कहा जाए कि ठाकुर का जो माइंड सेट था आज कहते हैं एनालिटिकल एंड क्रिएटिव दो तरह के माइंड होते हैं अपना जो ब्रेन है उसमें लेफ्ट ना कि राइट उसमें से एक ब्रेन हेमिस्फीयर को यह लोग एनालिटिकल हेमिस्फीयर कहते हैं दूसरा जो पार्ट ब्रेन का इसको यह लोग क्रिएटिव हेमिस्फीयर कहते हैं तो एनालिटिकल जिसका ब्रेन होता है वे लोग मैथमेटिक्स है फिजिक्स है इस तरह की एनालिटिकल साइंस में बहुत ज्यादा डेवलप करते हैं एक कंप्यूटर प्रोग्रामिंग है वगैरह वगैरह और जिनका यह क्रिएटिव ब्रेन ज्यादा डेवलप होता है यह लोग यह आर्ट्स है म्यूजिक है स्पोर्ट्स है य क्रिएटिव थिंकिंग है राइटिंग है है क्रिएटिव राइटिंग है वगैरह वगैरह में यह लोग बड़े माहिर होते हैं और खास कर के यह जो कटिंग एज साइंस होता है उसमें भी आपको यह क्रिएटिविटी का एक बहुत बड़ा महात्म होता है बड़ा फेमस यह बात है कि आइंस्टाइन हालांकि आइंस्टाइन इज कंसीडर्ड टू बी वन ऑफ द ग्रेटेस्ट साइंटिस्ट इन द वर्ल्ड उसका मैथमेटिक्स इतना पक्का नहीं था और वह मैथमेटिकल इक्वेशन सॉल्व करने के लिए वह अपने कलीग्स के ऊपर में भरोसा किए रखता था यानी कि यदि आप अ दोनों ओर से है एनालिटिक्स के क्षेत्र में यदि आप एकदम एक्सट्रीम में चले जाइए तो वहां पर क्रिएटिविटी स्टार्ट हो जाएगा क्रिएटिविटी के क्षेत्र में आप एकदम एक्सट्रीम चले जाइए तो वह एनालिटिक्स के साथ में मर्ज हो जाएगा ठाकुर के जीवन में देखें कि एक जगह पे ठाकुर ने एक बार मास्टर महाशय को पूछा कि अच्छा यह समुंदर में भरती और ट आती है वह किस तरह से आती है तो मास्टर महाशय अभी वो बड़े फंदे में फंस गए अभी किस तरह से ठाकुर को ग्रेविटी वगैरह समझाएंगे किंतु फिर भी वो मिट्टी में वह चित्र दौर करके यह पृथ्वी है यह चंद्र है चंद्र पृथ्वी की ओर घूरता है घूमता है ऑर्बिट करता है तो उसकी वजह से चंद्र के ग्रेविटी के आकर्षण से यह समुंदर में भर्ती ओट आती है वह सब समझाने लगे किंतु कुछ ही देर के बाद ठाकुर बोलते हैं अच्छा ठहर जाओ उनका सर घुर रहा है उनका सर गोल गोल हो रहा है यह सब देख कर के हमार माथा टनटन करछ ठाकुर कहते हैं तो ये मतलब ठाकुर का ऐसा था कि क्रिएटिव बड़े थे किंतु एनालिटिक्स में वो इतने ज्यादा नहीं थे या तो फिर कहेंगे कि ठाकुर इस तरह से क्रिएटिव थे कि जिसमें एंड में जाकर के एनालिटिक्स और क्रिएटिविटी दोनों मर्ज हो जाती है इसीलिए यह ब्रह्म समाज वाले जब कहते थे कि ठाकुर के पास में सेंस सेंस ऑफ ऑर्गेनाइजेशन नहीं है उनको यह समझ में नहीं आता कि किस तरह से ऑर्गेनाइजेशन बनाया जाए क्योंकि यह ऑर्गेनाइजेशन क्रिएट करना फिर यह ऑर्गेनाइजेशन को किस तरह से आपको भविष्य में चलाना यह फैकल्टी ऑफ ऑर्गेनाइजेशन ने कि ऐसा कुछ बोले थे ब्रह्म समाज वाले तो किंतु यह ऑर्गेनाइजेशन को किस तरह से चलाना यह सब एनालिटिकल स्किल्स है किंतु आज देखिए कि ब्रह्मो समाज का ऑर्गेनाइजेशन कहां पे है और ठाकुर ने काशीपुर में अपना संघ की स्थापना की वह आज कहां पे है आप कह सकते हैं कि स्वामी जी का अपने संघ को आगे चलाने में बहुत बड़ा योगदान था स्वामी जी इज वन ऑफ द मोस्ट पावरफुल एनालिटिकल ब्रेन इन द वर्ल्ड किंतु स्वामी जी क्रिएटिव भी इतने थे स्वामी जी में हमको यह बैलेंस दिखता है कि जितने एनालिटिकल थे उतने ही वह क्रिएटिव भी थे ठाकुर के जीवन में हमको दिखता है एक्सट्रीम क्रिएटिविटी तो यह सब हमने देखा था कि एग्जैक्ट इसी शब्दों में नहीं किंतु शरत महाराज ऐसे बहुत सारे प्रसंग का वर्णन करते हैं तो वो बाल्य लीला थी ठाकुर की उसमें यह सब आ जाता है वह प्रथम खंड इसके बाद का द्वितीय खंड है लीला प्रसंग का यह साधक भाव जिसमें कि यह ठाकुर कलकत्ता आए कलकत्ता में रह कर के किस तरह से दिव्य उन्माद में दिव्य उन्माद में आकर के वो जैसे कि अ मां के नाम के ले मा मां को लेकर के मां का दर्शन प्राप्त करने के लिए किस तरह से पागल से हो गए आखिर में वह काली मंदिर में भवता णी मां काली की मूर्ति है उसके सामने रोते-रोते उन्होंने कहा मां के हाथ में से खड़ग छीन लिया और कहा कि यदि तुम मुझे दर्शन नहीं दोगी तो इसी खड़ग से मैं अपना गला काट दूंगा तो फिर मां ने आकर के उनको दर्शन दिया तो यह एक दिव्य उन्माद में आकर के जो दर्शन प्राप्त हुआ उसके बाद में एक के बाद एक ठाकुर के गुरु आते गए ठाकुर को सिस्टमिकली साधना करवाते गए विभिन्न ब्रांचेस की विभिन्न स्कूल्स की और वह फिर आखिर में यही साधना शोड़ी पूजा में समाप्त हुई तो यह जो पूरा वर्णन है ठाकुर की साधना का यह साधक भाव रूपी द्वितीय खंड में किया गया है तृतीय खंड है लीला प्रसंग का गुरु भाव पूर्वार्ध अर्थात कि यदि हम यह कहते हैं कि हां ठाकुर ने जनरली हमारा ऐसा एनालिसिस है कि मां की सड़सी पूजा करने के बाद में मां की शक्ति से शक्ति शक्तिमान होने होकर के ठाकुर ने यह अपना संदेश का प्रचार कलकाता में शुरू किया किंतु जद ठाकुर के जीवन को देखा जाए तो हमको ऑलरेडी पता है कि ठाकुर ने अपने गुरुओं को अपनी साधना में पूर्णता प्राप्त करने के लिए किस तरह से सहाय की थी ठाकुर कुद खुद कहते हैं कि वह नंटो अर्थात कि यह अपने तोतापुरी तोतापुरी को पता चल गया एक दिन कि यह ठाकुर के भीतर में कौन है तब वह ठाकुर के सामने हाथ जोड़ कर के कहते हैं कि आप मुझे यहां से जाने दीजिए तब ठाकुर कहते हैं कि मैं भाव में आ गया और भाव में आकर के जगन माता का आवेश हुआ उनके ऊपर में और जगन माता ने ठाकुर के मुंह से उनको कि जब तक तुमको पूर्णता प्राप्त नहीं होती है अपनी साधना में तब तक यहां से जाने का तुम्हारे लिए उपाय नहीं है एकांत है के जवार तुमार जोनाई यह जगन माता वो तोतापुरी को कहती है तो यह माने सिर्फ यह बात नहीं है कि सड़सी पूजा के बाद में ठाकुर ने यह गुरु भाव ग्रहण किया था इसके पहले भी इवन अपने गुरुओं को भी साधना में सिद्धि प्राप्त करवाते रहे फिर ये गौरी पंडित वगैरह बहुत सारे लोग ठाकुर के पास में आए और ठाकुर से बहुत कुछ सीख कर के गए यहां तक कि अपने बचपन में भी उनके जो मित्र वगैरह थे उन्होंने ठाकुर के भीतर में एक दिव्य सत्ता का दर्शन किया था और ठाकुर के प्रति श्रद्धा रखते थे तो वह जो पुराने दिनों की बातें हैं जितनी भी अप टू सड़सी पूजा और अप टू द अराइवल ऑफ यह अंतरंग भक्त व गुरु भाव पूर्वार्ध में कही गई है गुरु भाव उत्तरार्ध में ऑफकोर्स यह जो ठाकुर का गुरु भाव का जो मुख्य पर्व है जिसको हम आनंद पर्व अपनी भाषा में कहते हैं उस पर्व में किस तरह से ठाकुर ने मां की सड़सी पूजा की फिर मां की शक्ति से शक्तिमान होकर के कलकत्ता में जाकर के घर-घर जाकर के भक्तों के जो विशिष्ट लोग हैं जो विशिष्ट चरित्र के हैं विशिष्ट साधक है जैसे कि देवेंद्रनाथ है जैसे कि यह केशव सेन है जैसे कि यह वि म्या सागर है वहां उनको मिलकर के ठाकुर ने धीरे-धीरे करके अपना प्रचार प्रारंभ किया आखिर में वह जो वह कांटा फेंकते हैं तो मछली कैसे फंस जाती है आखिर में तो वैसे ही यह ब्राह्मण समाज वाले उनकी चाल में फंस गए ठाकुर के पास में आना नियमित रूप से शुरू कर दिया केशव सेन वगैरह ने और फिर वही ब्रह्म समाज की पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से यह जो यंग लड़के हैं उन्होंने ठाकुर के पास में आना शुरू किया यह मास्टर महाशय स्वयं केशव सेन के कोई रिलेटिव होते थे और मास्टर महाशय ने खुद ने अपनी स्कूल के छात्रों को लेकर के आना शुरू किया था एक दो छात्रों को लेकर के आए थे तो फिर ठाकुर का लोभ बढ़ गया तो ठाकुर मास्टर महाशय को कहते हैं अच्छा तुम्हारी स्कूल में इतने अच्छे छात्र है इतने अच्छे स्टूडेंट है एक काम करो तुम मुझे तुम्हारे स्कूल में ले जाओ मैं मैं खुद जा कर के देखता हूं इन लोगों के अलावा और कौन-कौन से हैं तो मास्टर महा से थोड़े से टेंशन में आ गए कि ठाकुर जदी वहां पे आएंगे ऑलरेडी मास्टर महाशय का नाम बदनाम होना शुरू हो गया था कि छेल धरा मास्टर अर्थात कि अपने छात्रों को अपने लड़कों को पटा करके फुसला करके वो दक्षिणेश्वर के पागल परमहंस के पास ले जाते हैं ऑलरेडी मास्टर महाशय का नाम बदनाम होना शुरू हुआ था उसमें यदि ठाकुर स्वयं यदि स्कूल में आएंगे तो और पता नहीं क्या होगा किंतु फिर यह तो मास्टर महाशय थे उन्होंने सोच ही लिया था अभी मरना ही है तो ठाकुर का नाम लेकर ही मरेंगे तो फिर वो ठाकुर को कहा अच्छा ठीक है आप भी आइए ये विद्यासागर की स्कूल में ये डिफरेंट जो वीआईपी होते हैं वो बीच-बीच में विजिट करते हैं तो आप भी ऐसा वीआईपी होकर के एक विजिट कीजिए तो ये मास्टर महाशय है ब्राह्मण समाज है उनके माध्यम से यह सब यंग लड़के ठाकुर के पास में आने लगे तो वो था ठाकुर का गुरु भाव उत्तरार्ध और फिर आखिर में पांचवा खंड है गुरु भाव और नरेंद्रनाथ अर्थात कि नरेंद्रनाथ यानी कि भविष्य के स्वामी विवेकानंद उन्होंने ठाकुर के पास में आगमन किया ठाकुर के पास में उन्होंने अपना चरित्र गठन किया ठाकुर से शिक्षित होकर के अपनी साधना की साधना में पूर्णता प्राप्त की और फिर आखिर में ठाकुर को कैंसर हुआ और फिर श्याम पुकुर काशीपुर पर्व अनफॉर्चूनेटली अ जिस तरह से मास्टर महाशय श्याम पुकुर काशीपुर के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहते हैं डॉक्टर सरकार की काफी बातें हैं किंतु ठाकुर के दिन प्रतिदिन की यह जो सफरिंग है उनका जो पेन है कैंसर से यह उनके भक्तों को इतना उनके हृदय को जैसे कि चीर देता था कि उस दिनों के बारे में लिखना भी सभी के लिए मुश्किल था तो इन दिनों का विषद वर्ण ना ही हमको कथामृत में मिलता है ना ही लीला प्रसंग में है और लीला प्रसंग में फिर दो तरह के शोक अ शारदानंद जी को लगे थे वैसे भी तो ठाकुर के अंतिम दिनों का वर्णन उसको लिपिबद्ध करना कष्टदायक था और फिर दूसरा कि मां शारदा देवी का निधन हो गया उन्होंने महासमाधि ग्रहण की 1920 में तो फिर उस उस समय तक शरद महाराज ये काशीपुर वाले अध्याय तक पहुंचे थे किंतु फिर अभी मां जब चली ही गई है तो जिनके लिए यह सब कुछ करते थे वह प्रेरणा ही जैसे कि चली गई तो उसके बाद में शरद महाराज आगे लिख नहीं पाए यानी कि यह काशीपुर और श्यामपुकुर वो अध्याय ना ही हम को विषद रूप से चर्चित किए हुए लीला प्रसंग में मिलते हैं ना ही हमको कथामृत में मिलते हैं ऑफकोर्स बाद बाद में मास्टर महाशय की डायरी का आधार लेकर के स्वामी प्रभानंद जी महाराज ने श्री रामकृष्ण अंत्य लीला बोलकर के एक पुस्तक की रचना की है दो खंडों में विभक्त है और उसको पढ़ सकते हैं काफी हिस्टोरिकल इंफॉर्मेशन हमको मिलती है किंतु वही बात है कि जो चमत्कार जो एक जीवनी शक्ति जो एक चेतना हमको लीला प्रसंग और शरद महाराज और मास्टर महाशय की लेखनी में मिलती थी वो वहां पर नहीं मिलेगी नहीं हो सकता है क्योंकि उनको तो फैक्ट को ही अनुसरण करके लिखना होगा मास्टर महाशय की जो दिन लिपि थी जो डायरी थी उसमें तो शॉर्ट फॉर्म में सब कुछ लिखा था उसको लॉन्ग फॉर्म में लिखने के लिए मास्टर महाशय मेडिटेशन करते थे ध्यान करते थे और फिर ध्यान में जाकर के वो शॉर्ट फॉर्म जो था उसके ऊपर ध्यान करते करते जो जितना भी डिटेल है वह अपने मानस चक्षु से दर्शन करते थे और तब वह लिखते थे अभी प्रभानंद जी तो ऐसा कर नहीं सकते हैं कि उन्होंने तो जाकर देखा नहीं था कुछ तो फिर वो नेचुरली उसका इतना अट्रैक्टिव नहीं रहेगा किंतु फिर भी वह हिस्टोरिकल इंफॉर्मेशन मिलती है तो जो भी है यह है लीला प्रसंग का एक जनरल फ्रेमवर्क इस जनरल फ्रेमवर्क में सबसे इंपॉर्टेंट पार्ट जो है वह है यह धक भाव क्यों क्योंकि देखिए कि बाल्य लीलाओं का वर्णन तो भगवान श्री कृष्ण के जीवन में भी मिलता है वृंदावन लीलाओं का वर्णन और फिर गुरु भाव में आकर के जितने भी अवतार ने जो कार्यकलाप किया उसका विषद वर्णन जैसे कि शंकराचार्य का दिग्विजय या तो फिर चैतन्य देव का हरिनाम कीर्तन पूरे बंगाल में फैलाना वगैरा वगैरह उसका फिर जीसस है भगवान बुद्ध है उन सबके जीवन के गुरु भाव का विषद वर्णन सब जगह पर मिलता है किंतु साधक भाव का वर्णन हमको बहुत ही रेर दिखता है यहां पर शरत महाराज कहते हैं कि भगवान बुद्ध और चैतन्य महाप्रभु को छोड़े तो और किसी अवतार की साधना उन्होंने किस तरह से की साधना करते-करते उन्होंने सिद्धि किस तरह से प्राप्त की अपूर्णता से पूर्णता की ओर की यात्रा किस तरह से की यह हमको देखने को नहीं मिलता है देखने को नहीं मिलता है उसके दो कारण हो सकते हैं एक तो है कि उस समय में यह इंफॉर्मेशन या तो फिर नॉलेज इसको प्रिजर्व करने के लिए उसको स्प्रेड करने के लिए आज के जगत की तरह जो साधन वगैरह जो अवेलेबल है वह नहीं थे अभी एक गांव दूसरे गांव जद आप जाएंगे एक गांव से दूसरे गांव तो पूरा वो वहां का डायलेक्ट चेंज हो जाएगा कल्चर चेंज हो जाएगा वो भक्तों में इतना इजली तो आज जितना इजली कम्युनिकेशन होता है उतना इजली कम्युनिकेशन अवेलेबल नहीं था तो एक भक्त जिसने कि अपने गुरु के पास में अवतार के पास में जो सीखा जाना उनके पूर्व जीवन की कहानी दूसरे भक्त को इजली नहीं बता पाएगा तो वो बहुत सारे वो कंटेक्सचर्स और आज की परिस्थिति आज की परिस्थिति में हमको पता है कि ठाकुर के जाने के बाद में ही सभी भक्त ये अंतरंग भक्त नियमित रूप से या तो बलराम भवन में मिलते थे या तो गिरीश घोष के घर में मिलते थे या तो फिर वराह नगर मठ में इकट्ठा होते थे काकड़ गछ में इकट्ठा होते थे आपस आपस में ठाकुर ने जो कहा जो उपदेश दिए जो पूर्व उनके पूर्व जीवन की जो घटनाएं कही ठाकुर यात्रा में गए थे तो ठाकुर ने ऐसा अनुभव किया था फिर ठाकुर यहां पर गए थे तो उन्होंने ऐसा अनुभव किया था यह सब कुछ आपस में इतना चर्चित सब चर्चा होती थी कि शरद महाराज जब लिखने को बैठे तो उनको ठाकुर के साधक जीवन के बारे में बहुत सारी इंफॉर्मेशन ऑलरेडी शरद महाराज के पास में अवेलेबल थी जबकि पूर्व पूर्व में इस तरह से शायद नहीं होता होगा तो वो एक कारण हो सकता है दूसरा एक कारण शरद महाराज बताते हैं कि कोई भी अपने अवतार को अपने इष्ट को अपूर्ण देखना नहीं चाहता वो भक्त अपने मन में सोचता है कि मैंने इनको अपने इष्ट के रूप में ग्रहण ही इसीलिए किया है क्योंकि वह संपूर्ण रूप से सनातन सनातन रूप से वह संपूर्ण है पवित्र है पूर्ण पुरुष सनातन हमेशा के लिए है उनके जीवन में अपूर्णता या तो कहीं पर किसी तरह की अपवित्र हो ही नहीं सकती जो जिसमें थोड़ा बहुत अपवित्र होगी वही तो साधन भजन करके अपने को पूर्ण पवित्रता प्राप्त करने का प्रयास करेगा अवतार के जीवन में अपवित्र कहां से आएगी अवतार के जीवन में कुकर्म कहां से आएंगे अवतार के जीवन में अपूर्णता कहां से आएगी पूर्ण ब्रह्म सनातन तो हम उन्हीं को कहेंगे कि जिनके जीवन में कभी भी किसी भी तरह की अपूर्णता तीनों काल में नहीं थी ना भूतों ना भविष्यति नहीं भूतकाल में थी ना भविष्य में होगी ना वर्तमान में होगी तभी तो यह पूर्ण ब्रह्म सनातन है किंतु और इसलिए बहुत सारे भक्तों को यह सोचना अच्छा नहीं लगता कि उनके अवतार ने साधना करके पूर्णता प्राप्त की भक्त लोग यही सोचेंगे कि मैं मेरे जो इष्ट है हमेशा के लिए पूर्ण थे पूर्ण होकर के जन्म ग्रहण किया पूरे जीवन में कभी भी एक भी पाप नहीं किया एक भी कु विचार नहीं किया एक भी कु कार्य नहीं किया और पूर्ण होकर के ही उन्होंने इस जगत का त्याग किया था पंचमहाभूत के देह का त्याग किया था यदि हम किसी भी साधक को किसी भी भक्त को कहे कि आपके इष्ट अपूर्ण थे साधना करके पूर्ण हुए हैं तो फिर उसके मन को बड़ा ही एक दुख पहुंचेगा उसकी साधना को उसकी भक्ति को हानि होगी यह सोच कर के कि यदि मेरे इष्ट भी अपूर्ण थे तो मैं भी अपूर्ण हूं तो फिर मुझे पूर्णता प्राप्त करने की क्या जरूरत है उन्होंने साधन भजन करके यदि पूर्णता प्राप्त की है तो उनके भीतर में जो शक्ति है उस शक्ति का उन्होंने इस्तेमाल किया है मेरे पास में कहां वो संपूर्ण ब्रह्मचर्य की शक्ति मेरे जीवन में कहां यह संपूर्ण रूप से साधना अपने इंद्रियों को अपने वासनाओं को संपूर्ण रूप में त्याग करके अपने मन को संपूर्ण रूप से ईश्वर में लगा देने की यह शक्ति मेरे में कहां है जो कि अवतार में थी बोलकर के ही तो अवतार ने पूर्णता प्राप्त की है अवतार के बीच में मेरे बीच में तो यह डिफरेंस है तो यदि अवतार भी अपनी साधना करके पूर्णता प्राप्त किए हैं तो मेरे में तो वह साधना करने की शक्ति नहीं तो भले ही मैं चाहे अपूर्ण ही रहूं मैं कुछ भी करूंगा अपूर्ण ही रहूंगा भक्त यह सोच कर के ना ही साधना करेगा और धीरे-धीरे करके जो उसके जीवन का फाउंडेशन है अवतार के ऊपर में श्रद्धा वह भी कम हो जाएगी यानी कि यह क्या जानबूझ कर के इन सब अवतार के संत महापुरुषों के जीवनी कारों ने जानबूझ कर के यह साधक जीवन का लिपि विवरण नहीं किया है इज दैट पॉसिबल और यह सब दूसरी एक इंटरेस्टिंग बात है शरत महाराज पहले से ही ये डिस्टिंक्शन खड़ा कर देते हैं कि भगवान बुद्ध के जीवन को छोड़ कर के अभी देखिए कि बाकी जितने भी अवतार है और भगवान बुद्ध है इनमें बहुत बड़ा डिफरेंस क्या है बाकी अवतारों में जद हम तीन मुख्य अवतारों को ले ले भगवान राम भगवान कृष्ण और जीसस तो इन तीनों के जीवन में दिव्यता का एक अवतार क्व का एक बहुत बड़ा हाथ है जैसे कि वह ईश्वर के ही संतान है ईश्वर के ही एक प्रकाश का एक किरण है इस तरह से इनको दर्शाते हैं जबकि भगवान बुद्ध को हम एक मनुष्य के रूप में ही गिनते हैं उनकी अपूर्णता का विषद वर्णन है कहा गया है कि वह भोग विलास में डूबे थे क्योंकि उनके जन्म के बाद में ही कुछ ऋषियों ने यह प्रेडिक्शन किया था भविष्यवाणी की थी कि बड़े होकर के साधु होने का पूरा चांस है तो उनके पिताजी ने पहले से ही उनको भोग विलास से घिर करके रखा था जिससे कि वह घर छोड़ के भाग ना जाए तो वह भोग विलास में रहते थे पत्नी थी पुत्र था राजमहल को छोड़ के रेयरली बाहर निकलते थे बस एक्सीडेंटली एक बार बाहर निकलना हुआ तो वह उनको देखने को मिला एक वृद्ध व्यक्ति बीमार व्यक्ति और फिर एक मृत देह तो यह तीन देख कर के उनके मन में फिर वैराग्य का प्रारंभ हुआ कि यदि जीवन की गति यही है तो मैं इतने जो भोग विलास कर रहा हूं उसका नतीजा क्या यही आएगा आखिर में मैं भी वृद्ध होऊंगा मैं भी बीमार होऊंगा मैं भी मर जाऊंगा तो क्या अर्थ है इस भोग विलास का फिर आखिर में उन्होंने एक श्रमण को देखा जिसका जिसके चेहरे पे अद्भुत अनंत प्रशांति थी तो फिर बुद्ध ने सोचा गौतम ने सोचा राजकुमार गौतम कि यदि यह आदमी त्याग करके इतनी शांति में रह सकता है और मैं इतने भोग विलास में रह कर के भी मुझे यह टेंशन हो गया है कि वृद्धावस्था का वगैरह का तो फिर क्या अर्थ है इस भोग विलास का छोड़ो ज वन में जाओ साधना करो साधना करके पूर्णता प्राप्त करो तो भगवान बुद्ध को हम एक मनुष्य के रूप में ही देखते हैं और आखिर आखिर में यह भगवान बुद्ध ने अपने शिष्य को कहा भी था आत्म दीपो भव अर्थात कि अपना अपना प्रकाश अ स्वयं प्रकाशमान हो किसी के ऊपर में आशा मत रखो कोई देवता आ कर के तुमको उद्धार करेगा ना कि कोई भगवान आकर के तुम्हारा तुमको यह भवसागर पार करवा देगा नहीं पुरुषार्थ करके ही हमको अपने जीवन में पूर्णता प्राप्त करनी है तो यह पुरुषार्थ वाला जो एस्पेक्ट है वह भगवान बुद्ध के जीवन में बिल्कुल वो निखर करके आया है जबकि हमारे जो हिंदू अवतार है यह भगवान राम भगवान कृष्ण इनके जीवन में देखिए कि उनकी उनका आशीर्वाद है फिर यह उनकी क्षमा है उनकी दया है उनकी करुणा है उनका प्रेम हमारे ऊपर में है इसका एक बहुत बड़ा महात्म्य है तो हम इस तरह से कह सकते हैं कि ज्ञान के अवतार थे बुद्ध और भक्ति के अवतार थे राम और कृष्ण तो नेचुरली है कि भक्ति के अवतार को आप फॉलो करते हैं सब समय ये अपेक्षा रख के बैठे हैं है कि मेरे में तो ना ही बुद्ध की तरह ना ही वह ऋषि मुनियों की तरह साधन भजन करने की क्षमता है यह सत्य और ब्रह्मचर्य जो कि हमारे जीवन के सर्वोच्च अंग कहे जाते हैं साधना के ना ही उसको करने की हम में क्षमता है तो फिर बिना दया बिना करुणा के हम अपने जीवन में आगे कैसे बढ़ेंगे यह सोच लिया है एक तो यह सोच कर के इष्ट के ऊपर में भरोसा करके बैठे हैं और कहीं जाकर के ब्रेकिंग न्यूज कल निकल जाए कि यह इष्ट भी अपूर्ण होकर के जन्मे थे साधना करके पूर्णता प्राप्त करनी पड़ी थी तो तो फिर उसका उसके सर पर ऐसा होगा कि आसमान टूट पड़ा जो आदमी अभी जैसे ठाकुर के साथ में हुआ ठाकुर को कैंसर हो गया तो बहुत सारे लोग यही सोच कर के निकल गए कि अपने खुद को ट्रीट नहीं कर पा रहे हमारे भवसागर को हमारे भवर रोगों को किस तरह से निदान करेंगे जो आदमी अपना खुद का कैंसर नहीं ठीक कर सकता दूसरों का भवर रोग किस तरह से ठीक करेगा तो उसी समय यह अंतरंग बहिरंग में बटना शुरू हो गया भक्तों के बीच में बंटवारा शुरू हो गया ठाकुर खुद कहते हैं कि कैंसर क्यों हुआ तो इस इसके लिए कि अंतरंग बहिरंग में डिवाइड करने के लिए तो यह ऑलरेडी आपका इष्ट के ऊपर में भरोसा इष्ट के ऊपर में श्रद्धा ही जदी आपके जीवन का आपके साधक जीवन का मुख्य एक ये है पार्ट तब आप उस अवतार को उस इष्ट को अपूर्ण कभी भी नहीं रख स सकते तो इस बात को लेकर के शरत महाराज आज का जो चैप्टर हम पढ़ेंगे अवतरण का उसमें जो शरत महाराज ने टाइटल दिया है साधक भाव की आलोचना का प्रयोजन साधक भावा भावाच प्रयोजन यह जो साधक भाव की आलोचना का प्रयोजन है उसमें यह सब कुछ शरत महाराज डिस्कस करते हैं पुरुषार्थ और परमार्थ या तो फिर जिस तरह से उस दिन हमने डिस्कस किया था अभु और निश्रा सारिक या तो दैविक यह पुरुषार्थ परमार्थ इन दोनों में एक तरह का कंफ्लेक्स है वह कंफ्लेक्स तरह से रिजॉल्व करें ठाकुर को देखिए कि ठाकुर के जीवन में भगवान बुद्ध की तरह उन्होंने हमको पुरुषार्थ करने के लिए कहा है किंतु साथ-साथ में ही ठाकुर ने कृपा के ऊपर में भी इतना ही जोर दिया है नरेंद्रनाथ और गिरीश घोष स्वामी विवेकानंद और गिरीश घोष इन दोनों को देखिए गिरीश घोष वही भगवान राम भगवान कृष्ण की परंपरा से आता है कि इष्ट के ऊपर में संपूर्ण निष्ठा यही उनके जीवन की सबसे बड़ी साधना है जब ठाकुर ने कहा कि सुबह को प्रतिदिन एक बार भगवान का नाम लो तो वह सोच में पड़ गया कि मैं कब उठूंगा कब सोऊंगा ठीक नहीं अभ यह प्रॉमिस कर दूंगा कि प्रतिदिन उठकर करके भगवान का नाम लेना है नहीं रख पाया यह प्रॉमिस तो क्या होगा तो यह सोच रहा है ठाकुर उसके मन की बात समझ लिए कहा कि अच्छा ठीक है खाने से पहले एक बार ईश्वर का नाम ले लो तो व कहता है 10 तरह के मामले मुकदमे चल रहे हैं क्या खा रहा हूं कब खा रहा हूं सब तो एब्सेंट माइंडेडली तो अभी मैं दूसरा प्रॉमिस किस तरह से कर दूं कि खाने से पहले ईश्वर का नाम लूंगा तब ठाकुर समझ गए कहा कि मुझ मेरे ऊपर में भरोसा करके मुझे बकल मा दे दो पावर ऑफ एटर्नी दे दो तो गिरीश घोष बड़ा खुश हो गया अच्छा ठीक है चलो ठाकुर के ऊपर में भरोसा करके आराम से रहेंगे हालांकि वो बाद में उसकी अकल ठिकाने आ गई कहता है कि इसकी वजह सुबह शाम ईश्वर का नाम लेना सिलेक्ट किया होता तो इजी रहता क्योंकि संपूर्ण रूप से शरणागत होने के बाद में यदि अपने परिवार जनों का मृत्यु भी होता है तो आंखों में आंसू लाने के लिए पहले तो ठाकुर की अनुमति प्राप्त करनी पड़ती है अनुमति प्राप्त करने के बाद में ही आप उनकी जाने का शोक कर सकते हैं तो यहां किंतु यह जो संपूर्ण शरणागति का जो उदाहरण है गिरीश घोष अपने जीवन में बता के गए हैं और संपूर्ण रूप से यह पुरुषार्थ करके ईश्वर प्राप्ति का जो उदाहरण है यह स्वामी जी बता कर के गए हैं इसीलिए मुझे ऐसा लगता है कि स्वामी जी को सबसे पहला दर्शन किसका हुआ था भगवान बुद्ध का ही हुआ था तो ऐसा लगता है कि बुद्धिस्ट ट्रेडिशनल आते हैं कि आत्म दीपों भव अपने अपना प्रकाश अपने स्वयं होईए हम खुद अपने जीवन को प्रकाशमान करें तो यह ट्रेडीशन जो है भगवान बुद्ध की पुरुषार्थ करके ईश्वर प्राप्ति आत्मदर्शन निर्वाण प्राप्त करने की उस ट्रेडीशन को रिप्रेजेंट कर रहे हैं अपने स्वामी विवेकानंद और यह जो अपनी भक्ति संपूर्ण निष्ठा संपूर्ण शरणागति इस ट्रेडिशनल में गिरीश घोष तो अभी यह प्रश्न होगा कि ट्रेडिशनल स्पीकिंग भगवान बुद्ध की जो ट्रेडिशनल क्लियर समझ में आती है कि तपस्या करो तपस्या के द्वारा साधन भजन करो साधन भजन के द्वारा निर्माण प्राप्ति करो ईश्वर है नहीं भगवान है नहीं देवी देवता है नहीं यह सब ब सोच के बैठ के जाओगे कि वो देवता आ कर के मदद कर देंगे यह भगवान आ कर के कर देंगे तो कुछ होगा नहीं आप पूरे गड्ढे में गिरोगे तो वो एक समझ में आता है लॉजिकली और यहां प ये जो राम कृष्ण वाली जो ट्रेडिशनल में आती है कि इष्ट के ऊपर में संपूर्ण रूप से भरोसा करके जैसे कि महापुरुष महाराज स्वामी शिवानंद जी कहते हैं कि गुरु के घर में कुत्ते की माफिक पड़े रहे तो वो वो भी एक समझ में आता है लॉजिकली कि हां ये दोनों डिस्टिंक्ट ट्रेडिशनल समझ में आती है ये एक एक को एक ट्रेडिशनल कह दे और अपनी वेदांत की लैंग्वेज में दूसरी ट्रेडीशन को आप अद्वैत कह दें तो ज्ञान मार्ग और भक्ति मार्ग यह दोनों तो हमको क्लियर समझ में आते हैं किंतु ये ज्ञान और भक्ति का समन्वय यदि आप करने को जाएंगे तो कैसे चलेगा एक और ज्ञान मार्ग का अनुसरण करके आपको यह दिखाना पड़ेगा कि हां हमारे इष्ट ने भी साधना की है और उसके परिणाम से हमको भी साधना करनी है दूसरी ओर भक्ति की दृष्टि से देखें तो इष्ट अपूर्ण हो ही नहीं सकते और इष्ट की कृपा जबी मेरे पर आई है तो वह कृपा इतनी पावरफुल है कि मैं हजार साधन भजन करूं कि हजार साधन भजन ना करूं कोई फर्क नहीं पड़ने वाला इष्ट की कृपा जब हो गई है तो साधन भजन उसके सामने कुछ भी नहीं है तो वो कथामृत में वो जो है ना कि अंतर बहिर जदी हरि ही तपसा ततः किम न अंतर बहिर जदी हरि ही तपसा ततः किम भीतर में और बाहर में से भगवान हरि को ही देखते हैं तो तपस्या किस काम की है क्या प्रयोजन है तपस्या का और यदि भीतर बाहर में हरि को नहीं देखते हैं तो लाख तपस्या कर दो कुछ मिलने वाला नहीं है न अंतर बहिर जदी हरि ही तपस्या तत हकीम तो यह जो है भाव कि इष्ट का दर्शन हो गया खास करके यह जो काशीपुर की ये जो कल्पतरु उत्सव है 1 जनवारी की जो घटना है 18864 जाकर के वह जो रसोया था ये वो 10 लोगों को खींच कर के ले आया कहता है कि ठाकुर कल्पतरु हुए हैं उनसे आशीर्वाद प्राप्त कर लीजिए किंतु यह जो त्यागी संतान थे इन्होंने वहां पर जाकर के ठाकुर का आशीर्वाद प्राप्त करना मुनासिब नहीं समझा उचित नहीं समझा या तो फिर जैसे कि शरद महाराज कहते हैं कि ठाकुर इतने दिनों के बाद घर से निकले हैं तो उनके जो बिस्तर वगैरह है उसको धूप में देने की आवश्यकता थी तो ठाकुर का आशीर्वाद प्राप्त करते-करते उनके उनकी जो सेवा करनी है सेवा में क्षति हो जाएगी उनकी से वा पहले आशीर्वाद बाद में यह माइंड सेट त्यागी संतानों का था तो यह दोनों माइंड सेट अपने संघ में है दो ट्रेडिशनल मार्ग या तो पुरुषार्थ मार्ग और फिर यह भक्ति मार्ग या तो फिर यह शरणागति मार्ग यह दोनों ट्रेडिशनल होगा तब आप इनका जीवन चरित्र किस तरह से आलेख करेंगे साधक भाव का वर्णन यदि करेंगे तो कहेंगे अरे यह तो भक्ति मार्ग का नहीं है यह मामला और यदि नहीं करेंगे तो कहेंगे कि पुरुषार्थ मार्ग किस तरह का यदि आप उनकी स्ट्रगल है उनका संघर्ष है उसका वर्णन यदि नहीं करते हैं तो और हम भी हम भी हम यदि पुरुषार्थ करते हैं तो कहेंगे कि ठाकुर पर भरोसा करने की क्या जरूरत है और यदि ठाकुर पर भरोसा करते हैं तो कहेंगे कि अरे यह पुरुषार्थ करने की क्या जरूरत है यह कंफ्लेक्स कंफ्लेक्स कैसे आता है यह पूरा साधक भाव हमको पहले से आखिर तक यह बात बताता है और इसी साधक भाव की आलोचना करते-करते हमारी यह जो ट्रेडिशनल साधन पद्धति है भक्ति मार्ग है यह कर्म मार्ग है यह एकाग्रता या तो फिर यह योग मार्ग है और यह ज्ञान मार्ग है यह जो चार मुख्य परंपराएं हैं हिंदू धर्म की उसके भीतर में भी हम गहराई से प्रवेश करेंगे यदि आप चार में से किसी एक को फॉलो करते हैं तो आपको लॉजिकली सब कुछ क्लियर हो जाएगा किंतु चारों की हार्मोनी जब करते हैं जब चारों का कॉमिनेशन करते हैं तो चारों के जो इनरेंट कॉन्फ्लेट है इन्हेरेंट कंट्रा इक्स से वो नजर के सामने आ जाते हैं बहुत सारे टीचर क्या करते हैं कोई आपको भक्ति मार्ग ही सिखाएगा और कहेगा कि भक्ति मार्ग के अनुसार ही ठाकुर के जीवन की व्याख्या होनी चाहिए कोई आपको ज्ञान मार्ग ही सिखाएगा और कहेगा कि वेदांत की दृष्टि से ही ठाकुर के जीवन को देखना है किंतु जिन्होंने शरद महाराज द्वारा लिपिबद्ध लीला प्रसंग का पाठ किया है जिन्होंने ठाकुर महा स्वामी जी के समस्त उनके जीवन और वाणी का उन्होंने अध्ययन किया है वे लोग इस बात के साथ में कभी सहमत नहीं होंगे यदि आप सिर्फ वेदांत की दृष्टि से ठाकुर की आलोचना करेंगे वो अपूर्ण होगी सिर्फ भक्ति मार्ग से ठाकुर के जीवन को देखेंगे वोह भी अपूर्ण होगा ये शिव ज्ञान जीव सेवा वाला मंत्र लेकर के सिर्फ उसी दृष्टि से आप पूरे संघ को देखेंगे व भी अपूर्ण होगा पूर्णता तभी आएगी जब सभी मार्गों को अपनी दृष्टि में रख कर के यह रामकृष्ण विवेकानंद मां शारदा देवी के जीवन वाणी और प्रसंग की आलोचना की जाए किंतु इस तरह का कॉमिनेशन करते-करते जो इनरेंट कंट्रा इक्स खड़ी होगी वो कंट्रा इक्स को किस तरह से रिजॉल्व करें और जब रिजॉल्व करने को जाएंगे तो एक दूसरा एक बहुत बड़ा प्रश्न खड़ा होता है जद आप कहते हैं कि भगवान या तो इष्ट पूर्ण ही है तो फिर उनके जीवन में साधक भाव का जरूरत नहीं है यहां पर साथ में ही ज्ञान मार्ग लेकर आते हैं तो फिर आप कोई ना कोई लॉजिक लगाएंगे कि भगवान बुद्ध की जो ट्रेडीशन है या अपनी ज्ञान मार्ग की उपनिषद की अद्वैत वेदांत की ट्रेडीशन है उसमें यह जो एक कहा गया है व्हिच इज इन कंफ्लेक्स उसको थोड़ा सा मॉडिफाई कर दे भक्ति मार्ग में यह जो कहा गया है संपूर्ण शरणागति वो जद पुरुषार्थ के साथ में यदि नहीं है वह मैच होता तो फिर उसको थोड़ा सा मॉडिफाई कर दे दोनों को थोड़ा-थोड़ा मॉडिफाई करके कंबाइन कर दे तो कॉमिनेशन हो जाएगा अपने प्योर फॉर्म में इसका कॉमिनेशन नहीं होगा जिस तरह जिस क्षण आप ट्रेडिशनल भक्ति मार्ग ट्रेडिशनल ज्ञान मार्ग को मॉडिफाई करने का प्रयास करेंगे साथ-साथ में ही इस मार्ग के जो अनुयाई है भक्त है वो खड़े हो जाएंगे कहेंगे कि आपने हमारी ट्रेडीशन में जो चेंजेज किए हैं उसका अर्थ यही है कि आप हमारी ट्रेडीशन को फॉलो नहीं करते हैं आपने नया कुछ खोज निकाला है जो कि हमारे ट्रेडीशन के साथ में कहीं पर भी सहमत नहीं होता तो यह नया भक्ति मार्ग नया ज्ञान मार्ग आप ही को मुबारक हो उसको ट्रेडिशनल में कोई लेना देना नहीं तो यह एक दूसरा प्रॉब्लम खड़ा होगा जिस तरह से हमने वो डिस्कस किया था कि एक ज्ञानी और एक भक्त एक दोनों एक कुट में रात को इकट्ठा हो गए कुटिया में और फिर वोह ज्ञानी ने दीवाल के ऊपर में लिख दिया साधन भजन करने के लिए प्रेरणा प्राप्त करने के लिए कि सोहम यानी कि वही आत्मन ही मैं हूं तो वह जो साथ में भक्ति मार्गी बैठा था वह कहता है अरे पाजी यह सब क्या सोच रहे हो कि तुम क्या ईश्वर हो हो सकते हो क्या तो उसने सो के सामने दा लिख दिया तो क्या हो गया दासो हम तो फिर वो ज्ञान मार्गी नाराज हो गया कि जो अनंत संपूर्ण आत्मा जो मैं हूं मैं किस तरह से किसका दास होने को गया तो फिर उसने आगे फिर से स लिख दिया तो सदा सोहम तो यहां पे सदा सोहम वो फिर वो फिर से दा लिखता है फिर से स लिखता है दास दासो हम सदा सदा सो हम ये दोनों का झगड़ा चलता है यदि आप यह कहेंगे कि जी नहीं आप दोनों के जो रास्ते हैं उनमें यहां पे यह ब्रिज है यहां पे ये लिंकिंग है ये यहां पे इस तरह से सोचने से आप दोनों के रास्ते इकट्ठे हो जाएंगे कि पूर्ण शरणागति और पूर्ण पुरुषार्थ ये दोनों आपको एक ही जगह ले जाएंगे जैसे गिरीश घोष ने खुद यह स्वीकार किया है कि संपूर्ण शरणागत जब हो गए तो वो संपूर्ण शरणागति को मेंटेन करने के लिए आपको कितनी तपस्या करनी पड़ती है तो तपस्या आपको आधर केस करनी है संपूर्ण शरणागत हो कर के भी करनी है या तो सत्य और ब्रह्मचर्य का पालन करने के लिए भी करनी है तपस्या त्याग ये मन का जो विल पावर है मन की जो निष्ठा है डिसिप्लिन है जो जीवन में व्हिच इज कॉमन टू बोथ आप चाहे वो शरणागति के रास्ते प जाए ना कि आप तपस्या के रास्ते में जाए विल पावर तो चाहिए ही चाहिए कामना वासनाओं का त्याग तो करना ही करना है तो तो इस तरह से आप यदि दोनों को एक्सप्लेन करने को जाएंगे तो दोनों कहेंगे कि यह ना ही मेरा रास्ता है ना ही उसका रास्ता है आपने तीसरा ही रास्ता कुछ अपने मन से मन गणतयात का कॉन्फ्लेट आ जाता है सो सी कि हम ट्रेडिशनल शास्त्र की दृष्टि से ठाकुर महा स्वामी जी के जीवन की आलोचना करना इसमें कितने सारे पिट फॉल है कितने सारे ये प्रॉब्लम्स आते हैं सीधा सधी डिक्लेयर कर दे कि ठाकुर का रास्ता वेदांत का रास्ता है तो सब झगड़े ही मिट जाए ंगे आप सीधा सधी डिक्लेयर कर दीजिए कि पौराणिक कहानियों में उप जो भागवत में जो कहा गया है वही ठाकुर के जीवन को अप्लाई होता है तो वह मामला निपट जाएगा किंतु जिस क्षण आप भगवत और उपनिषद दोनों को मिक्स करने को जाएंगे तभी यह सब प्रॉब्लम खड़े होंगे सो और इसीलिए कि आप सिर्फ उपनिषद की दृष्टि से ठाकुर को देखे वो भी संपूर्ण नहीं है सिफ भागवत की दृष्टि से ठाकुर को देखेंगे वह भी संपूर्ण नहीं होगा संपूर्ण समझने के लिए उपनिषद भगवत दोनों चाहिए भगवत गीता का कर्म योग भी चाहिए यह राजयोग योग जो ट्रेडिशनल करना है कि ओरिजनलिटी ना चला जाए और कंफ्लेक्स हो जाए वहि इज अ टोल ऑर्डर मने सही सही में एक इंटेलेक्चुअल एक जिम्नास्टिक बहुत सारे करने पड़ेंगे यह सब कुछ करने के लिए किंतु जो अल्प बुद्धि ठाकुर ने हमको दी है स्वामी जी ने दी है तो और यह शरत महाराज जैसे गाइड है अपने पास में तो यह सर शरत महाराज के पदानु सरण करते-करते हम यह सब पहले तो कंफ्लेक्स खड़े करते हैं तभी तो एक आनंद आता है कि हां ये मतलब एक इंटेलेक्चुअल सेटिस्फेक्शन मिलता है देखिए साधना एक चीज है और एक इंटेलेक्चुअल सेटिस्फेक्शन एक जिज्ञासा वृत्ति निवारण वो एक दूसरा चीज है ऐसे लोग होते हैं जैसे मेरे जैसे कि उन लोगों को कंफ्लेक्स फिकल कंफ्लेक्स तो मजा आएगा जब सब कुछ ठीक ठीक चल ही रहा है तो फिर ठीक है आपने पढ़ा नहीं पढ़ा डजन कोई इंटेलेक्चुअल सेटिस्फेक्शन नहीं मिलता है अच्छा पढ़ने का एक आनंद है वो ठीक है किंतु कंफ्लेक्स के सामने आता है एक चैलेंज खड़ी होती है फिर ये इंटेलेक्चुअली स्टेप बाय स्टेप आप चैलेंज को सॉल्व करते हैं फिर जो एक सेटिस्फेक्शन मिलता है एक इंटेलेक्चुअल रिलीज जो मिलता है उसका एक आनंद ही अलग है भले इस सब का साधना पर कोई बड़ा असर ना हो इंटेलेक्चुअल जिम्नास्टिक तक की तरह यह रह जाए बट इवन इसका भी जो आनंद है वह आनंद लेने का प्रयास करेंगे जहां पर जितने कन्फ होते हैं उतने खड़े करेंगे और अपनी सामान्य बुद्धि से उसका निराकरण करने का प्रयास करेंगे रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य का आधार लेकर के तो आज यहीं तक कल से फिर इसका पाठ हम स्टार्ट करते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु ना आप ठीक ही कहते हैं कि यदि यह
प्रश्न: भक्ति मार्ग में ज्ञान के पर्याप्त प्रमाण हैं। साथ ही वशिष्ठ मुनि आश्रम में भगवान राम की साधना का भी पर्याप्त वर्णन है।
कहेंगे कि भगवान राम भगवान कृष्ण भक्ति मार्गी ही थे ज्ञान कर्म योग के साथ में कोई वास्ता नहीं था वो वन डायमेंशन हो जाएगा विच इज ए इन करेक्ट इंटरप्रिटेशन यहां पर जो हम कहना चाहते हैं कि आज के जगत में जद देखे तो भगवान राम और भगवान कृष्ण की जो ट्रेडिशनल कों को बाद में देखिए वह चाहे नरसिंह मेहता हो मीराबाई हो चैतन्य महाप्रभु हो यह तुलसीदास स्वयं हो कितना भक्ति था उनके जीवन में उन्होंने तपस्या नहीं की ऐसा नहीं किंतु भक्ति प्रधान था और भक्ति के प्रधान पर ही बाकी का पूरा लिटरेचर डेवलप हुआ था सो बात यह नहीं है कि वो भक्ति मार्गी थे बात है कि उनके बारे में परसेप्शन क्या है हियर द मैटर इज ऑफ परसेप्शन रदर देन कि वो एक्चुअली क्या थे अभी बुद्धिज्म में देखिए कि बाद में इतने सारे देवी देवता बुद्धिज्म में भी आ गए कि अभी उसका परिणाम यह आया है कि आप हिंदू धर्म और बुद्ध धर्म को आप सेपरेट नहीं कर पाएंगे वो साउथ ईस्ट एशिया है वगैरह वो कंट्रीज में जाइए वो देखेंगे कि इतने तारा है यह देवी है वो देवी है तो कहेंगे कि अरे भगवान बुद्ध ना ही देवी देवता में विश्वास करते थे ना ही वो इस सब में विश्वास कर ये सब देवियां कहां से आ गई ये देवता एं कहां से आ गई किंतु आ जाएगा इ ह्यूमन नेचर किंतु परसेप्शन क्या है माने हम किस तरह से भगवान बुद्ध को प्राइमरी सोचते हैं तो वो पुरुषार्थ के रूप में सोचते हैं तो बात यह नहीं है कि वो एगजैक्टली क्या थे रदर कि हमारा परसेप्शन क्या है हम किस तरह से उनको एनालाइज करते हैं जैसे कि ठाकुर ठाकुर के जीवन में चारों मार्ग का समन्वय भाई है किंतु हम लोग सब समय इस तरह के इंटेलेक्चुअल कंफ्लेक्स की ये मान लीजिए आप यदि काशीपुर में होते और वह रामचंद्र दत्त सबको आह्वान करके पुकार रहा है चलो आओ आओ ठाकुर कल्पतरु हो गए हैं उस समय हम क्या करते हैं मैं दौड़ कर के ठाकुर के पास में जाता उनका आशीर्वाद लेने के लिए कि मैं शरत महाराज के साथ में वह छत पे खड़ा रहता उनके बिस्तर को धूप देने के लिए मुझे तो दो में से एक ही करना है हालांकि ठाकुर ने दोनों चीज कही है मुझे एक ही चीज करनी है क्योंकि वो दोनों करना मेरे से संभव नहीं एक हाथ से मैंने बिस्तर को धूप में डाला दूसरे हाथ से मैं ठाकुर का आशीर्वाद लेने को दौड़ा दोनों मेरे से संभव नहीं तो मेरा एक ही परसेप्शन है ठाकुर के लिए या तो मैं उनका आदेश पालन करके सन्यास लेकर के मैं तपस्या करूंगा या तो फिर मैं यह रामचंद्र दत्त के साथ में कांकड़ काछी में जाकर के नगर कीर्तन करूंगा मेरा बुद्धि मेरी शक्ति लिमिटेड है तो हम भक्तों की दृष्टि से हम इनको किस तरह से देखते हैं यदि आप भगवान बुद्ध के जीवन में भक्ति देखना चाहे देख सकते हैं भगवान राम के जीवन में ज्ञान कर्म देखना चाहे एबंडेंट एग्जांपल है किंतु अल्टीमेटली यह है कि ज्यादातर भारतवासियों ने भगवान राम भगवान कृष्ण को भक्ति मार्ग की दृष्टि से ही देखा है ज्यादातर साधकों ने भगवान बुद्ध को पुरुषार्थ के रूप करते ही देखा है सो दैट इज अवर मैटर इज ऑफ अवर परसेप्शन नोट की उनका खुद का चरित्र क्या है इट्स अ मैटर ऑफ परसेप्शन कि बात यह
प्रश्न: मैंने अपने साधुओं को ठाकुर के साधक भाव पर चर्चा करते नहीं देखा। हम भक्तों को केवल शरणागति की शिक्षा दी जाती है।
नहीं कि उन्होंने क्या किया परसेप्शन क्या है सर्वप्रिया अंद जी को पढ़ेंगे लगेगा सब कुछ वेदांत के ऊपर में है और किसी किसी को सुनेंगे लगेगा सब भक्ति के ऊपर में है बट इट्स नॉट लाइक दैट मने एटलीस्ट इंटेलेक्चुअली जिज्ञासा
प्रश्न: हमें ठाकुर की साधना को गहराई से पढ़ने और उनसे सीखने की आवश्यकता है
वृत्ति निवारण कर लेनी चाहिए अपने साधन जीवन ठाकुर की तरह साधना करने का कोई सामर्थ्य नहीं है गुरु महाराज ने जो मंत्र दीक्षा दी है उसी को हमको फॉलो करना है बट एटलीस्ट इंटेलेक्चुअली वी शुड बी क्लियर
प्रश्न: योगवाशिस्ट में भी तो वेदांत है
बस सही बात है किंतु भारत में योग वाश का अध्ययन करने वाले लोगों की संख्या
प्रश्न: मैंने शंकर दिग्विजय ग्रंथ पढ़ा है। उसमें शंकराचार्य के बारे में सब कुछ दिव्य है।
मिनुकुरा के पास में ये जो ठाकुर एक बार बोलते हैं कि ये कृष्ण के डिवोटा और यह शक्त यह दो झगड़ा करते हैं तो बोलते हैं कि ये कृष्णा है हमारे भवसागर पार करवाते हैं तो शाक्त कहते हैं वो तो मा तो राज राजेश्वरी है वो थोड़ी ना भवसागर पार करवाने को खुद आएगी कृष्णा को ही रख दिया है नौकरी पर वो पार करवा दे तो क्या है कि भक्त लोग यह सब खड़ा करते हैं आप बुद्ध का भी कुछ कुछ जीवन पढ़ेंगे वो विष्णु का ही अवतार बना दिया है हालांकि ना ही विष्णु में मानते थे ना ही भगवान में मानते थे तो किस तरह से विष्णु का अवतार बना दिया सो इट्स एंटायस पशन कि आप बाद में इनको किस तरह से इंटरप्रेट करते हैं ऐसा हो ही नहीं सकता कि बिना साधना किए पूर्ण प्राप्त की होगी माने एटलीस्ट हमको तो लॉजिकली तो ऐसा लगता है वही है कि दे चूज नॉट टू एक्सप्लोर दैट एस्पेक्ट यहां पर एक चीज हमको ख्याल रखनी
प्रश्न: मुझे लगता है कि हिंदू धर्म में कई सुधारों की आवश्यकता है.
है देखिए कि ठाकुर ने नरेंद्र ठाकुर को कह रहा है कि ये जो अंध भक्ति है वोह काम की नहीं किसी की तो ठाकुर ने साथ-साथ में ही कहा कि अरे भक्ति को अंध और देखना वह सब क्या है भक्ति भक्ति है ये अंधश्रद्धा शब्द आप यदि यूज करते हैं तो वो उसकी इग्नोर के कारण है उसके आप श्रद्धा के साथ में मत जोड़िए कहिए कि वह अंध भक्त है मत यह कहिए कि अंध श्रद्धा है सो वह हमको अपना एक क्लियर रखना है यह जो ट्रेडीशन है वह दिव्य ट्रेडिशनल लोग क्या करते हैं उसको एक्सप्लोइट करते हैं अपने खुद के पर्सनल बेनिफिट के लिए तब यह सब प्रॉब्लम खड़ा होता है सो ट एक डिस्टिंक्शन हमको रखना है सही
प्रश्न: मुझे लगता है कि हिंदू धर्म अंधविश्वासों से भरा है। लेकिन विश्वास अंध कैसे हो सकता है?
बात है देखिए आप अब जैसे देखिए अभी यह तो क्या है ना कम्युनिस्ट लोग एक समय हमारा सिलेबस बनाते थे तो मैं मुझे एक याद है कहानी मैंने वह अपने पाठ्य पुस्तक में पढ़ी है स्कूल में कि एक ब्राह्मण को बुलाया गया किसी विधि करने के लिए अभ यह ब्राह्मण क्या करता है कि वो विधि करने के लिए गांव में गया गरीब विधवा के घर पे विधि करने के बाद कहता है कि अभी दक्षिणा देनी पड़ेगी तो यह गरीब विधवा कहती है मेरे तो पति नहीं है पैसा नहीं है क्या करूं ने बहुत ही गरीब है तो तो ये पंडित ने क्या किया कि उसका लड़का है उसने एक चड्डी पहनी थी तो बोला ये चड्डी मुझे दे दो वो बोलती है कि इसके बेचारे के पास में और एक भी वस्त्र नहीं है पहनने के लिए तो बोला कि यदि मुझे दक्षिणा नहीं दोगी तो महापाप होगा ये विधि ठीक नहीं होगी तो विधवा बेचारी क्या करेगी बच्चे की वो चड्डी निकाल कर के इसको दे दी अभी वो बच्चा नंगा घूम रहा है अभी कुछ दूर तक ये पंडित गया फिर ये चड्डी फेंक दी तो फिर उसका साथी था उसने कहा कि आपने उसको फेंक ही देना था तो उसको बेचारे के पास से छीना क्यों तो बोला कि नहीं शास्त्र मर्यादा रक्षा करने के लिए व विधि है कि पंडित आएगा तो उसको वह दक्षिणा देनी है वरना विधि फेल हो जाएगी अरे भाई यह किस तरह की शास्त्र मर्यादा है तो क्या है कि यह साम्यवादी हों ने इस तरह का बैठाया है मैं ऐसा नहीं कह रहा हूं कि ऐसा सब होता है बट दिस इज एन एग्जांपल इन पॉइंट केस इन पॉइंट कि आप शास्त्र का नाम लेकर के दूसरों को एक्सप्लोइट करेंगे च इज बेड नहीं कि शास्त्र इज बेड शास्त्र ऐसा कभी नहीं कहता कि विधवा का लड़का नंगा घूमे ऐसा तुमको करना है उन्होंने कहा पंडित को सम्मान देना है उस किंतु साथ में यह कह दो कि पंडित को सम्मान देते देते विधवा के बच्चे को कष्ट देना है ऐसा तो नहीं कहा यह तो आपकी खुद की बुद्धि
प्रश्न: शुरुआत में हमें भक्ति और ज्ञान को साथ में अभ्यास करना चाहिए। बाद में वे अलग हो सकते हैं, जैसे स्वामी विवेकानंद और गिरीश घोष की साधना। भक्ति वाले बुद्धि का इस्तेमाल नहीं करते, ज्ञान वाले ह्रदय का.
है ठाकुर खुद क्या कहते हैं पता है कि कभी किसी का भाव नष्ट नहीं करना है यानी कि अब जैसे इसी चैप्टर में वह कहानी आएगी कि स्वामी जी के पास में तपस्या की थोड़ी सी शक्ति आ गई तो उन्होंने क्या किया अभेदानंद जी को कहा कि मुझे स्पर्श करो तो जैसे ही उ उनको स्पर्श किया उनका पूरा चरित्र दूसरी डायरेक्शन में जाने लगा तो ठाकुर ने स्वामी जी को बुला केर डांटा कि भाई तुमने अभी तो प्राप्त करना शुरू किया अभी से वय करते हो दूसरा कि उसका जो जिस डायरेक्शन में जा रहा था उसने तुमने जोर जबरदस्ती दूसरी डायरेक्शन में ले गए तो किसी का भाव नष्ट नहीं करना है यदि भक्ति मार्गी हो तो तु निष्ठा से भक्ति को पकड़े रहो वही तुमको यदि आपने जो उपमा दी मैं उसका रिवर्स कर दूं तो आप चाहे महाकुंभ में जाने के लिए अहमदाबाद से स्टार्ट करें कि कलकाता से स्टार्ट करें ना कि विशाखा पंडम से स्टार्ट करें अल्टीमेटली महाकुंभ संगम पे तो सही पे एक ही जगह प इकट्ठा होना है तो सिंसियर बिलीव करते हो तो भक्ति पर विश्वास करो गिरीश घोष स्वामी जी अल्टीमेटली तो दोनों को तो मुक्ति प्राप्त होगी पूर्ण शरणागति या पूर्ण पुरुषार्थ सो जो रास्ता पकड़ा है निष्ठा पूर्वक पालन करना है और जैसे आपने कहा वो बिल्कुल ठीक कहा कि कॉमन सेंस होना ही चाहिए शास्त्र में मैं भक्ति मार्ग फॉलो कर रहा हूं बोलकर के भक्ति का आश्रय लेकर के दूसरों पर अत्याचार करूं यह कौन सी बात हो गई सो उसका मिसयूज ना हो वह कॉमन सेंस अपने में होनी चाहिए ऑफ
प्रश्न: जैसा अपने कहा किसी का भाव नष्ट न करे, तो साथ में ही दूसरे अपना भाव नष्ट करने को आए तो उन से तो हमको अपना बचाव करना पड़ेगा।
कोर्स एक्चुअली देखिए कि ये जो कहते हैं ना कि अटैक इज द बेस्ट डिफेंस तो वो बात साधन जगन में साधक जगत में नहीं चलेगी वो बाहर के जगत में ठीक है चलेगा यहां पर यदि हम अटैक को बेस्ट फॉर्म ऑफ डिफेंस के रूप में लाएंगे तो इट विल हार्म एवरीवन जो कि धर्म धर्म जीवन इस घटनाओं से भरा पड़ा है आप क्रुसेड्स है या देख लीजिए कि यह जो इनक्विजिशन क्रुसेड यह क्रिश्चियनिटी का एक इतिहास ले जो कि बड़ा स्पष्ट है बाकी सब धर्मों का उदाहरण देने में खतरा है थोड़ा सा एटलीस्ट क्रिश्चियन लोग इतने तो उदार है तो क्रिश्चियनिटी का जद दो उदाहरण ले कि सबसे डेंजरस जो चर्च का जो 2000 साल का हिस्ट्री है सबसे डेंजरस घटनाए कौन सी थी तो एक तो क्रुसेड्स दूसरा है इनक्विजिशन जिसका कि उदाहरण स्वामी जी ने भी दिया है जो वेस्टर्न सिविलाइजेशन का स्टडी करता है सभी लोग कहते हैं कि जो जोर जबरदस्ती दूसरे धर्म वाले को ऊपर में अपना धर्म थोप देना यह कितना खतरनाक है तो दो उदाहरण है हमारे सामने यह भारत में ही देखिए ना ये जाति प्रथा नात प्रथा कि जद ये अ नीच जाति का है तो गांव का कुआ है उसमें से वह पानी नहीं लेगा गांव का मंदिर है उसमें श करने का अधिकार नहीं है यह फ्रीडम मूवमेंट जब स्टार्ट हुआ तो आंबेडकर और गांधी जी दोनों के दो डिफरेंट विचार थे गांधी जी कहते हैं कि यह जाति प्रथा खत्म करने के लिए सबसे पहले भारत के मंदिरों को खोल दीजिए क्योंकि मंदिर हमारे सिंबल है मंदिरों में हरिजनों को प्रवेश मिलेगा तो हमारे मन के भीतर में जो घर कर गई है जाति प्रथा वो मन में से दूर होगी बाद में फिर इसका जो रिपल इफेक्ट है वो इकोनॉमिकल पॉलिटिकल बाद में होता रहेगा यहां पे आंबेडकर कहते हैं अरे भाई ना ही खाने को रोटी है ना ही पहनने को वस्त्र नाही ही रहने को घर तो रोटी कपड़ा मकान की पहले व्यवस्था कीजिए मंदिर को बाद में रखिए दोनों का एक पोजिंग व्यू था पर्सनली मैं गांधी जी के साथ में इसलिए एग्री करता हूं कि आपने पहले यदि रोटी कपड़ा का जुगाड़ किया होता टेंपररी इमीडिएट रिलीफ मिल जाती किंतु भारतीयों के हृदय में ये जो घर कर गया है कि इस जाति का है वो जाति का है तो फिर लंबा समय तक संघर्ष चलता रहता किंतु गांधी जी के कहते कहते मंदिर जब खोल दिए गए तो यह हुआ कि हृदय में यह खत्म हो गया उसके बाद में कांस्टिट्यूशन में इसको एन श्राइन किया गया अभी इन प्रैक्टिस चलता होगा किंतु कोई सीरियसली इसको यह लेता नहीं है कि ना वो उसका जाति अलग है यह जाति अलग है वो लोकल लेवल पे चलता है नेशनल लेवल पे साइकोलॉजिकल लेवल पे वह खत्म हो गया है तो वी ऑल एग्री कि धर्म का मिसयूज होता है और मिसयूज को दूर करने के लिए जो सिंपल कंपेरिजन है कॉमन से वो चाहिए ये ठाकुर जो बार-बार जो योगन महाराज का उदाहरण यो ठाकुर रात को निकलते हैं घर में से अपने कमरे में से योगन महाराज मां के वो नबत के सामने जाकर खड़े रहते हैं वो मन में डर है कि ठाकुर दिन में तो कामिनी कांचन त्याग की बात करते हैं रात में अपनी पत्नी के साथ में सोने को जाते हैं फिर ठाकुर जब झाऊ तला से वापस आते हैं देखा योगन महाराज का चेहरा देख के ही समझ गए तो उन्होंने क्या कहा वेरी इंपोर्टेंट इन अवर कांटेक्ट कि साधु के दिने देखी रातें देखी तब साधु परर भरोसा करवे साधु को दिन में देखो रात को देखो तब साधू पर भरोसा करो इवन ठाकुर ने यह नहीं कहा कि तुमने मेरे पर अविश्वास क्यों किया ये कॉमन सेंस रामकृष्ण संघ का फाउंडेशन है यही ठाकुर ने
प्रश्न: आजकल के शिक्षक छात्रों को महान विचार सिखाते हैं, लेकिन कभी उनमें से किसी का भी अभ्यास नहीं करते हैं।
गिरीश को कहा बकल मा दे दो यही ठाकुर ने योगेंद्र महाराज को कहा कि मुझे सुबह को देखो रात को देखो तब मेरे पर विश्वास करो नहीं यह जो कल किसी ने कहा था ना कि आप हमारा टेस्ट लीजिए तो यह आपका असाइनमेंट है आप बताइए ये जो में है ना वो पोलिंग का एक आता है यह पोलिंग का क्वेश्चन रखना है कि आप ठाकुर का चैतन्य स्पर्श करते ठाकुर का स्पर्श करवाने के लिए जाते साधना करते या तो फिर अपने मन में क्लियर होता है कहने में शर्म आती है अभी य स्पर्श करवा दो ठाकुर का आशीर्वाद ले लो बात खत्म करो यार क्या कौन सा य व बरा नगर मठ में जाएंगे व कहां वो भूत की तरह रहेंगे स्वामी जी आएंगे सबको डांट फिर ना मब आधर और या तो ठाकुर का आशीर्वाद प्राप्त करना होगा या साधना करनी होगी यदि दोनों ने ही किया तो देन यू आर लॉस आउट वो तो उनका जीवन तो धन्य हो गया ना अपना लीला प्रसंग या तो फिर य अपनी जो भक्त मालिका है वो देखिए ना एक तो त्यागी संतान और यह गृहस्थ संतान जो अंतरंग के ऊपर लिखी गई है तो त्यागी संतान की तो महिमा ही अलग है ना मैं इसको इस तरह से देखता हूं कि जहां
प्रश्न: कल्पतरु के दिन गृहस्थ भक्त ठाकुर का आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद बहुत आगे नहीं बढ़ पाए, लेकिन त्यागी साधु तपस्या करते करते बहुत आगे बढ़ गए। इसलिए अध्यात्म में शॉर्टकट ज्यादा उपयोगी नहीं है।
तक मुक्ति का प्रश्न है दोनों ने प्राप्त की इक्वल जगह पर गए क्योंकि इवन ठाकुर का अंतरंग भक्त होना तो सहज नहीं था बहुत सारे लोग आए और चले गए मास्टर महाशय रामचंद्र दत्त सुरेंद्र मित्र गिरीश घोष बलराम बसु योगिन मां गुलाप मां गौरी मां इनका जीवन देखिए नाग महाशय ब धन्य हो गए मत जीवन उनका है पवित्र है मुक्ति का जहां तक प्रश्न है दोनों इक्वल जगह पर पहुंचे होंगे किंतु ठाकुर जो उदाहरण देते हैं कि ऋषि रा भय तरा तो माने ये जो ऋषि थे वह डरते थे कैसे भी करके भवसागर पार हो जाए जबकि नारद उसे री काट यानी नारद वगैरह ऐसी नौका है खुद तो तैर गए हजार लोगों को साथ में लेकर निकल गए सो दिस इज द डिफरेंस माने भवसागर दोनों ने पार किया ऋषि मुनियों ने और नारद ने किंतु नारद अकेले नहीं गए साथ में हजार को लेकर गए दैट इज द डिफरेंस आई थिंक मेरा कहना है कि देखिए इंटेलेक्चुअल
प्रश्न: इतना कुछ सुनने के बाद भी हमें अभ्यास करने का मन नहीं करता
सेटिस्फेक्शन भी मिले ना जीवन में हम बहुत दूर तक जाएंगे फिर तो यह सब बीज की तरह है आपने वो जैसे ठाकुर ने उदाहरण दिया कि वो दीवाल के ऊपर में बीज रखा है खिड़की के ऊपर में एक दिन खंडहर हो गया मकान मकान गिरा बीच जमीन में गिरा वहां से पेड़ निकल आया तो बीच के रूप में तो हृदय में जाए बाद में तो ठाकुर की इच्छा वो बारिश करवा दे तो फिर वो वो पेड़ भी निकल आएगा कृपा बारिश किंतु देखिए यदि एक सेंटेंस में आप
प्रश्न: स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि god becomes man so man can become god. इसी लिए साधक भाव का अध्ययन करना बड़ा आवश्यक है
ज्ञान और भक्ति का यदि कॉमिनेशन करना चाहे मुझे याद नहीं था कि स्वामी जी का ये कोटेशन किंतु यदि एक कोटेशन में आपको ज्ञान और भक्ति का संगम करें तो यह हो गया गॉड बिकम मैन दिस इज अ क्लासिकल भक्ति ट्रेडिशनल मस गॉड दिस इ अ क्लासिकल ज्ञान ट्रेडिशनल दैट मैन कैन बिकम गॉड क्लासिक मने मने यू कैन हैव यू कैन नॉट हैव अ बेटर डिस्क्रिप्शन देन दिस कॉमिनेशन ऑफ ज्ञान भक्ति और कोनो मने प्रश्न करना है कोई मने टेंशन नहीं लेना है मैं मैं मानता हूं कि एक फ्रीडम होना चाहिए सोचने का मैं खुद ज हेरेटिक जद जिसको कहते हैं ना हेरेटिक कौन है कि बहुत तरह के उल्टे पल्टे प्रश्न करता है वो हेरेटिक है ये जद डेफिनेशन किसी को देना है तो मैं मुझे दे सकते हैं मैंने इतने सारे उल्टे प्रश्न किए राम कृष्ण विवेकानंद साहित्य स्टडी करने के समय में हमेशा कंफ्लेक्स हूं यहां क्या उसका कहां पर वो विरोधाभास है वो पहले बताओ तब आनंद आता है तो सब ठीक-ठीक होता है तो मजा नहीं आता है सो यू कैन आस्क एनी क्वेश्चन विदाउट एनी डाउट