Skip to transcript
ClassesSaradakosh

Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 1 Jul 2025

prayer

ॐ स्थापकाय च धर्मस्य सर्वधर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णाय देवी नमः स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा रचित श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग इसका अवतरणी का हमने ऑलरेडी देख लिया प्रथम चैप्टर चल रहा है साधक और साधना ऑलरेडी शरद महाराज हमको कहते हैं कि ठाकुर की साधनाओं का विवरण प्रारंभ करने से पहले आओ एक बार ठाकुर जिस साधनाओं को किए हैं इसके पीछे में शास्त्रीय मत क्या है वो एक बार देख लेते हैं। ऑलरेडी अह कल हमने देखा कि शरद महाराज कहते हैं कि सर्वभूत में ब्रह्म दर्शन या ईश्वर दर्शन यह है साधना की अंतिम चरम शिखर अंतिम उपलब्धि और इसके बारे में महाराज जी क्या लिखते हैं कि शास्त्र कहते हैं जगत में स्थूल सूक्ष्म चेतन अचेतन जो कुछ हम देख पाते हैं ईंट पत्थर मिट्टी या तो फिर लकड़ी मनुष्य, पशु, पेड़पधे, जीव, जानवर, देव, उपदेव सब ही एक ही अद्वय ब्रह्म वस्तु है। बस इसके ऊपर में अज्ञान है बोलकर के हम नहीं देख पा रहे। तो सबसे पहले यह जो अद्वय ब्रह्म वस्तु है, उसके बारे में जैसे यहां पर महाराज ने कहा कि वेद, उपनिषद वगैरह शास्त्रों में क्या कहा गया है? तो उसका एक छोटा सा कंपाइलेशन मैंने किया था। किया है। उसको हम कल देख रहे थे। देखिए कि कठोपनिषद तक हम पहुंच चुके थे। इसके पहले मुंडकोपनिषद में और फिर यह ईशोपनिषद में और श्रीमद्भगवत गीता में। इसमें किस तरह से यह अद्वय ब्रह्म वस्तु के बारे में कहा गया है। सर्वभूत में ईश्वर है। सर्वभूत में आत्मन है। वो किस तरह से वर्णित किया गया है वो कल हमने ऑलरेडी देखा। आज कठोपनिषद के दो ये तीन श्लोक है। 11 12 13 चैप्टर द्वितीय व्ली द्वितीय अध्याय उसमें से यह श्लोक है। स्वामी जी ने अपने ज्ञान योग का जो प्रवचन है यूनिटी इन डायवर्सिटी उसमें इसको कोट किया है। तो मैंने सीधा उसका ओरिजिनल संस्कृत यहां पर लिखा है। कॉपी पेस्ट किया है। देखिए कि क्या कहते हैं।

कठोपनिषद में : सर्व भूत में ईश्वर दर्शन

सर्वप्रथम श्लोक जो कि हमने कल ऑलरेडी देखा था। थोड़ा रिपीट कर लेते हैं। सूर्यो यथा सर्व लोकस्य चक्षु न लिप्यते चाक्षुशह ही बख दोषही। यह सूर्य है जो सकल जगत का चक्षु है। इस अर्थ में कि सूर्य के प्रकाश से ही यह जगत दृश्यमान है। यदि सूर्य का प्रकाश नहीं पड़ेगा तो इस जगत में हम सब कुछ भी नहीं देख पाएंगे। अंधेरा छा जाएगा। यानी कि हमारी आंखों को जो दृश्य प्रदान करता है, वह एक तरह से सूर्य ही है। किंतु जैसे यह सूर्य प्रकाश पड़ने पर हम देख पाएंगे। किंतु मान लीजिए हमको यह ग्लाउकोमा या तो फिर जिसको मोतियों कहते हैं गुजराती में। ऐसा यदि कुछ हो गया है। आंखों का कोई दृष्टि दोष हो गया है तो हम कुछ भी नहीं देख पाएंगे। हम अंधेरे में ही रहेंगे। तो क्या यह सूर्य का दोष है? नहीं यह दोष है हमारी आंखों का तो यहां पर लिखते हैं न लिप्यते चाक्षुशैही बकी दोष ही हमारी चक्षु यानी कि हमारे नयनों की यह जो दोष है सिर्फ उसकी वजह से सूरज के ऊपर में किसी भी तरह का मलिनता अंधेरा या तो फिर रात्रि रजनी उसके ऊपर में नहीं गिरती। देखिए वह जो हम राम प्रसाद का वह जो गीत सब देख रहे थे उसमें एक कितनी सुंदर कड़ी थी जे देश रजनी नाई मा से देशे एक लोक पेय छ जिस देश में रजनी नहीं है अर्थात कि रात्रि नहीं है उस देश का एक व्यक्ति मुझे मिला है। क्या अर्थ है यहां पे? देखिए कि रजनी तो वैसे दिन और रात यह तो चलते ही रहेंगे। किंतु रजनी हमारे लिए कब होगी? रात कब होगी? जब हमारी आंखों में किसी भी तरह की दोष त्रुटि प्रवेश कर जाएगी। हमारी आंखों में किसी भी तरह की जो है खामी प्रवेश कर जाएगी। किसी भी तरह का कोई इंजरी या डैमेज हो जाएगा। तो हम हो सकता है कि यह सूर्य के प्रकाश से प्रकाशमान जगत को ना देख पाए। तो यह जो जिस देश में रजनी नहीं है वह कौन सा देश कि वहां पर किसी की भी नजर में इस तरह की दोष त्रुटि नहीं है। वहां पर जितने भी लोग हैं उनकी आंखें खुली हुई है। इस अर्थ में कि वह जगत में जो वास्तविक सत्य है वह देख पाते हैं। यह जो अज्ञान का जो आवरण है उसको भेद करके इसके पीछे की जो अल्टीमेट रियलिटी है अंतिम दिव्य सत्ता है उसको देख पाते हैं। इसलिए जे देश रजनी नाई मा से देश एक लोक पेज एक तथा सर्वभूतंतात्मा न लिप्यते लोक दुखे न बाह्य एक सर्वभूतंतरात्मा यह जितने भी भूत है जितने भी प्राणी है पशु है मनुष्य है जो कुछ भी पदार्थ है उसमें वही वह एक लिपमान है वही वही एक वर्तमान और जो कि बाह्य दुख है इस जगत के उसका उसके ऊपर में कोई लेश मात्र नहीं गिरता। यह किस तरह से हमको देखना है कि देखिए कि जैसे कल भी हम डिस्कस कर रहे थे हम जब घर में रहते हैं जब नौकरी पर जाते हैं वर्किंग एनवायरमेंट हो ना कि होम एनवायरमेंट। एकेडेमिक एनवायरमेंट जो भी एनवायरमेंट में हम जैसे ही लोगों के साथ में डीएल करने का प्रारंभ करते हैं, वैसे ही दुनिया भर के प्रॉब्लम हमारे सामने खड़े होते हैं। तो यह जो प्रॉब्लम है उसकी वजह से कभी-कभी हमको लगता है कि हमारा जो ब्लड प्रेशर है वह बढ़ जाता है। हमारा डायबिटीज बढ़ जाता है। ये जो यह जो जिसको आजकल लाइफस्टाइल डिसीज कहते हैं इन सबके पीछे में क्या है? तो इन सबके पीछे में वही एक रीजन है स्ट्रेस। आजकल जिसको कहते हैं यह स्ट्रेस इतना होता है कि स्ट्रेस की वजह से फिर हमारे बॉडी में 10 तरह के लाइफस्टाइल डिसीज स्टार्ट होते हैं। तो यह स्ट्रेस से क्या यह थोड़ी ना है कि माने बाहर में यह स्ट्रेस आ गया। तो भीतर का यह जो अद्वय ब्रह्म तत्व है भीतर में जो सत चित आनंदमय अस्ति भाति प्रिय जिसको कहा गया है वेद में उपनिषद में वो क्या ब्रह्म वस्तु या तो आत्म सा आत्मा जो है हमारी वो क्या थोड़ी ना इससे इससे कोई प्रभावित होता है देखिए आप जैसे कि दूध है दूध के भीतर में आप यह डालेंगे शक्कर डालेंगे चीनी डालेंगे तो क्या होगा। दूध और चीनी दोनों मिक्स हो जाएंगे। इसके बाद में इस चीनी को दूध से सेपरेट करना मुश्किल हो जाता है। आप कोई साइंटिफिक प्रोसेस खोज निकालिए इधर-उधर से तो आप शायद कर सकते हैं महंगे इंस्ट्रूमेंट को ले आ करके। किंतु जनरली हमारा डोमेस्टिक एनवायरमेंट में हमको पता है कि एक बार शक्कर को चीनी को दूध में मिला दिया तो फिर वह सेपरेट नहीं होने वाला है। तो वह एक चीज हो गया। किंतु मान लीजिए कि दूध के ऊपर में वह जो मलाई का एक स्तर बैठ जाता है। जब हम दूध को उबालते हैं, उसको यदि सेपरेट करना है तो आप इजीली उसको चम्मच से सेपरेट कर पाएंगे। क्यों? क्योंकि वह जो मलाई का जो स्तर है वह दूध के साथ में मिक्स नहीं हो गया है। सिर्फ ऊपर ऊपर में तैरता रहता है। उन दोनों को सेपरेट करना सहज है। कोई बच्चा भी कर पाएगा। तो यहां पे भी देखिए कि यदि हम यह मान लें कि यह मेरे जीवन में जो बाहर के जो प्रॉब्लम है उसकी वजह से मैं जो स्ट्रेस महसूस कर रहा हूं वो स्ट्रेस मैं इसलिए महसूस कर रहा हूं कि मेरी आत्मा पे भी इस तरह की कोई असर हो रही है। मेरे देह में मेरे जो मेरा जो बॉडी है उसमें जिस तरह से डायबिटीज या तो फिर यह कोरोनरी हार्ट डिसीज या ना या तो फिर यह ब्लड प्रेशर या तो यह लीवर डैमेज ना कि यह माइग्रेन माइग्रेन बहुत लोगों को होता है और जिसको होता है उनको समझ में आता है। मेरे एक रिलेटिव को माइग्रेन होता था। बाप रे वो मतलब रोना शुरू कर देते थे। इतना वो उनको यह होता था, कष्ट होता था। बैक पेन है। यह सब जो है जिस तरह से मेरे शरीर में प्रवेश कर गए हैं। वैसे ही शायद क्या मेरी आत्मन में भी यह माइग्रेन है प्रवेश कर गया है क्या? मुझे यह जो मेरे जीवन में तकलीफ हो रही है। मेरी आत्मन को यह हार्ट डिसीज हो गया है क्या? नहीं। मेरे शरीर को हार्ट डिसीज होता है। मेरे शरीर को माइग्रेन होता है। शरीर को लीवर डैमेज होता है। आत्मन को ना ही लीवर है, ना ही हेड है, ना ही हार्ट है। वो सिर्फ सत, चित और आनंद ही है। आनंदमय भी नहीं कहेंगे। सतचित आनंद ही आत्मन है। उसको किसी भी तरह का डैमेज नहीं होता। यह जो शुगर और दूध यह दोनों मिक्स हो जाते हैं। वह तो शरीर की उपमा है। आत्मन को यदि यह उपमा देनी है तो यह दूध के ऊपर में मलाई का जो स्तर है वह कैसे तैरता रहता है। वैसे ही यह दुख कष्ट जो है आत्मन के ऊपर में तैरते रहते हैं। एक बार यदि हमको समझ में आ गया आत्मन का सही स्वरूप क्या है। मेरा सही स्वरूप क्या है और किस तरह से मैं यह जो षडरिपु है, पंच कक्लेश है, काम कांचन है, अष्टपाश है इनसे मैं मुक्ति पा सकता हूं। तो वो जो माध्यम है जो साधन है उस साधन पद्धति को फॉलो करके हम अपनी आत्मन के ऊपर में से यह अज्ञान का स्तर हटा सकते हैं। जैसे कि देखिए कि यदि हार्ट में यह जो आर्टरी ब्लॉक हो गई है तो किस तरह से हार्ट सर्जरी करनी पड़ती है। यदि माइग्रेन हो रहा है तो किस तरह से आपको मेडिसिन लेनी पड़ती है। तो यह जो अपनी आत्मन की हार्ट सर्जरी या तो फिर आत्मन का जो माइग्रेशन है उसका सॉल्यूशन माइग्रेशन है नहीं माइग्रेन माइग्रेन उसको है नहीं किंतु यदि फिर भी एक उपमा देनी ही है तो यह जो साधन भजन है साधन चतुष्टय है या तो फिर यह अष्टांग योग है या तो भी यह सम्यक मार्ग है भगवान बुद्ध का या तो फिर रामकृष्ण विवेकानंद भावधारा की यह जप साधना है यह शिव ज्ञान जीव सेवा है वह सब आत्मन की हार्ट सर्जरी है। उसके माध्यम से आत्मन के ऊपर में यह जो अज्ञान का आवरण है आप दूर कर सकते हैं। तो इसलिए यहां पर लिखते हैं कि सर्वभूत सर्वभूत के अंतरात्मा के रूप में यह आत्मन विराजमान है। न लिप्यते लोक दुखेन बाह्य ये जो बाहर का जो दुख कष्ट है इससे इस ये लिप्त नहीं होता है अच्छा इसके बाद का श्लोक क्या है एको वशी सर्वभूतंतरात्मा जो एक है सबको वशीभूत रखता है सबके भूत के अंतर में विराजमान है एकम रूपम बहुधा यह करोति उसका स्वरूप एक है किंतु वो दिखता है बहुत है इस तरह से एकम रूपम बहुधा यह करोति तम आत्मस्थम यह अनुपसती धीरा धीरा तेशाम सुखम शाश्वतम न इतरेशाम जो इस आत्मन को तम आत्मस्तम ये अनुपश्यती इस आत्मन का जो अनुदर्शन करते हैं उसका जो दर्शन करते हैं इस तरह के धीर धीर तेशाम सुखम शाश्वतम इस तरह के धीर क्या प्राप्त करते हैं? तो वह सुख शाश्वत सुख प्राप्त करते हैं। इस तरह का सुख जो कि कभी कम नहीं होगा। इस तरह का सुख जिसका कभी कोई अंत नहीं है। वरना देखिए मैं जब छोटा था तो वो जो हमारे वो जो नानी दादी वगैरह जो होते हैं वो कहते रहते थे। तुम बहुत ज्यादा हंसोगे तो बहुत ज्यादा हंसना मत। ऐसा कहते थे क्यों बहुत ज्यादा हंसोगे तो आखिर में तुमको रोना पड़ेगा यानी कि यह खुशी भी जो है अपने जगत में अभी क्या है उन्होंने बहुत दुख कष्ट देखा है ना वो प्री इंडिपेंडेंस वो उनका जन्म हुआ था तो उन्होंने देखा था सब कि किस तरह से यह फेमिन ये वो सेकंड वर्ल्ड वॉर में हमने डायरेक्ट तो पार्टिसिपेशन नहीं किया था किंतु यह जो चर्चिल था पगला उसने क्या किया इंडिया का जितना भी फूड ग्रेन है सबको हमें वहां पे यूरोप में वह ट्रांसफर करवा करवा दिया था। बोल के भारत में बहुत ही बुरी परिस्थिति थी। तो यह सब उन्होंने देखा है। तो यह लोग कहते थे बहुत ज्यादा हंसोगे तुम तो फिर आखिर में तुमको रोना पड़ेगा। इसलिए ज्यादा हंसो मत। तो अब देखिए कि यह जो शाश्वत ये जो जगत है उसमें यह सब होता ही रहेगा। फर्स्ट वर्ल्ड वॉर, सेकंड वर्ल्ड वॉर, थर्ड वर्ल्ड वॉर आजकल का यह ड्रोन है। यह वो किसी की भी खुशी शाश्वत नहीं है। यदि आप यह कहेंगे कि आज के यह लोग बिलियनियर है तो यह बिलियनियर की खुशी तो बड़ी ही ज्यादा होगी। आप आजकल तो देख ही रहे हैं कि जो टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में है वे लोगों के स्टॉक ऑप्शन कैसे स्काई रॉकेट हो जाते हैं। कोई-कोई तो ये 100 बिलियन 200 बिलियन इतना ले बैठा है। तो हमको लगेगा इन लोगों की खुशी कहां खत्म होने वाली है। किंतु देखिए कि इतिहास गवाह है। इसी तरह के एक के बाद एक कितने ही एंपायर कितने ही यह ट्रेडिंग अह वह जो सब संस्थाएं या कितना यह जो एक समय था ईस्ट इंडिया कंपनी का वो किस तरह का वो शासन था भारत के ऊपर में आखिर में वही ईस्ट इंडिया कंपनी डिसॉल्व हो गई और फिर उसकी जगह यह ब्रिटिश क्राउन ने इंडिया को अपने हाथ में ले लिया। तो अब देखिए कि यह हिस्ट्री का यही है कि कोई भी एक कंपनी है, कोई भी एंपायर है वह राइज होगा और समय के साथ में उसका पतन भी होगा। यह जो इवोल्यूशन और डिसइीग्रेशन यह दोनों इतिहास हमको सिखाता है कि यह चलता ही रहेगा हमेशा। किंतु आत्मन जो एक है वह एक है। यदि एक से ज्यादा होता तो कॉम्बिनेशन करके उसमें वेरियस पॉसिबिलिटीज खड़ी होती। किंतु जो एक ही है उसमें ना ही कोई कॉम्बिनेशन है ना ही कोई ना ही घटन है ना ही विघटन है। ना ही उसका इवोल्यूशन है ना ही उसका डिवोल्यूशन है। सतचित आनंद ही जो है उसके भीतर में आनंद की कमी कैसे आ सकती है? यह तो ऐसा हो गया कि पृथ्वी के ऊपर में दिन रात चलते रहते हैं। ये जो राइज एंड फॉल ऑफ एंपायर्स, राइज एंड फॉल ऑफ सिविलाइजेशन इसकी उपमा यदि पृथ्वी को दें तो पृथ्वी पर दिन रात चलते रहेंगे। पृथ्वी पर एक्लिप्स होता रहेगा। किंतु सूरज में ना ही दिन है ना ही रात। वह हमेशा एक समान ही प्रकाशता रहता है। हालांकि यह उपमा 100% ठीक नहीं है क्योंकि सूरज का भी एक लाइफ टाइम है 4 बिलियन इयर्स समथिंग किंतु वि इज मन है वो फॉर ऑल प्रैक्टिकल पर्पज हमारे लिए तो वह अनंत ही है। तो यह जो देह के जो सुख दुख है यह जो देह की यह जो सब जो कुछ भी है वह सब देह तक ही सीमित है। आत्मन में यह सब नहीं है। यह जो धीर जान लेता है वह सुखम शाश्वतम शाश्वत सुख को वह प्राप्त करता है न एतरेशाम और कोई इसको प्राप्त नहीं करता यही धीर ही इसको प्राप्त करेगा और इसके बाद नित्य नित्यो नित्या नाम चेतन चेतना नाम एक बहु नाम यो विदधा काम तमात्म ये पश्यती धीरा तेशाम शांति शाश्वती नेतशाम नित्य अनित्य नाम जो अनित्य में नित्य को देखता है चेतनः चेतना नाम जो अचेतन में चेतना को देखता है एको बहु नाम जो बहु विविध जो चीजें हैं उसमें वो एक ही अद्वय ब्रह्म तत्व को देखता है वो ब्रह्म तत्व यो विद धाती काम जो हमारी कामनाओं की पूर्ति करता है वो तमात्मस्थ ये अनुपश्यती तम आत्मस्थ जो कि उसका इस आत्म में वो अनुदर्शन करता है वही ब्रह्म तत्व मेरे ही भीतर में विराजमान है। यह जो अनुभव करता है धीराह तेेशाम शांति ही शाश्वती इस तरह के धीर शाश्वत शांति प्राप्त करेंगे न इतरेशाम और कोई नहीं यह जो अनित्य में नित्य चेतन अचेतन में चेतन बहु में एक और जो कामनाओं की पूर्ति करने वाला यहां पर कामनाओं की पूर्ति करने वाला का यह अर्थ नहीं कि हमारी जो सात्विक राजसिक, तामसिक जो कोई भी कामना है सब पूर्ति करें। यह जो हमारी मुक्ति कामना है, मुक्ति कामना को जो पूर्ति करता है वह आत्मन उसका जो दर्शन करता है वही धीर शाश्वत शांति प्राप्त करता है। अच्छा तो यह हो गया हमारे उपनिषदों में से यह जो अद्वय ब्रह्म तत्व है, यह जो आत्मन है जो कि सबके भीतर में विराजमान है, इसके बारे में क्या कहा गया है? उसका एक कहेंगे कि सामान्य आउटलाइन।

हमने "आत्मनो मोक्षार्थम्" तो हासिल कर लीया, लेकिन हम "जगत हिताय च" को भूल गए

अभी देखिए कि यह जो एक आत्म तत्व है वह हमने समझ तो लिया थ्योरेटिकली। हो सकता है कि कुछ-कुछ लोगों ने उसका दर्शन या तो अनुभूति भी कर ली हो। किंतु इसका जो सोशल एप्लीकेशन है, वह शायद भारतवर्ष में इतने दिनों से नहीं हुआ था। या तो फिर हम ऐसा कहेंगे कि वैदिक युग में होता होगा। यह जो बाद का जो भारत है पिछले 1000 साल का भारत उसमें यह नहीं हो रहा था। हमारी गुलामी के पीछे में स्वामी जी ने जैसे कहा कि यह जो क्रूरता और गुलामी क्रुल्टी एंड स्लेवरी एक ही सिक्के के दो पहलू है। तो यदि हमारे भीतर में क्रूरता थी। इस अर्थ में इस अर्थ में हमारे हृदय के भीतर में कठोरता थी। हमारे हृदय के भीतर में मानसिक संकुचितता थी। या तो फिर कहेंगे कि नैरो माइंडेडनेस थी। हमारे भीतर में यदि एक तरह की ऑर्थोडॉक्सी थी कि हमने समाज को एक तरह के ग्रुप में बांट दिया है। कास्ट में बांट दिया है। और जो मेरी काष्ट का जो है उसके साथ में मैं अच्छे से संबंध रखूंगा और जो दूसरी काष्ट का है उसके साथ में मेरा कोई रिलेशन नहीं रहेगा। हो सकता है कि मैं उसको विद्वेष भी करूं। तो इस तरह का जो संकुचित मानसिकता भारत में उदय हुआ था। इसका यह परिणाम आया कि हमको गुलामी भुगतनी पड़ी। क्यों गुलामी भुगतनी पड़ी? क्रूरता गुलामी तक कैसे ले जाती है? क्योंकि कोई भी बाहर वाला आएगा वो कुछ ही दिनों में समझ लेगा कि यह कास्ट और यह कास्ट में बड़ा भयानक झगड़ा है। तो यदि एक की पिटाई करनी है तो दूसरे को सहारा लो। तो वह फिर दोनों मिलकर के उसकी पिटाई कर देंगे। फिर जिसका हमने सहारा लिया था उसको भी पीट दो। बोल के ऐसा करके हम पूरे भारत में राज करेंगे। ये जो डिवाइड एंड कंकर यह ब्रिटिश लोग क्यों कर पाए थे? उन्होंने कंकर किया था। वो डिवाइड तो हमने किया था। यह बहुत बड़ा लेसन है हिस्ट्री का। आज हम ब्रिटिश लोगों पे यह आक्षेप लगाते हैं कि डिवाइड एंड ककर की नीति से उन्होंने भारत पे राज किया। यह बात आधी ही सत्य है। उन्होंने हमको कंकर किया था। डिवाइड तो हमने ही अपने आप को किया था। अदरवाइज देखिए कि आज आप अमेरिका चले जाइए। अमेरिका में वैसे पॉलिटिकल डिवीजन 1000 है। किंतु यहां से भारत से गया हुआ कोई एक कंपनी ये टाटा बिरला वगैरह वहां पे जाकर के वहां के वो जो नागरिकों को डिवाइड करके इसके ये राज्य 50 स्टेट्स है वहां पे 50 के आसपास राज्य है। वो कहते हैं कनाडा को 51 स्टेट बनाने का। तो ये इतने जो स्टेट है उनके वो कहेगा कि एक स्टेट को जाकर के मैं तुमको इतना रुपया दूंगा। दूसरे स्टेट पे हमला करो और दूसरे स्टेट पे जाके कहेगा तुम उसके ह पर हमला करो मैं तुमको वेपन सेल करूंगा बोल के क्या हम कभी अमेरिका को कंकर करने वाले हैं कभी नहीं होगा क्योंकि उन लोगों के भीतर में शायद पॉलिटिकल डिवीजन है किंतु इस लेवल के नहीं है जो कि हमारे भारत में प्रवेश कर चुके थे। चाइना में जाकर के आप ऐसा करने का प्रयास कीजिए नहीं कर पाएंगे। कुछ-कुछ देश है वहां पे यह सब होता भी है। यह सुदान है वगैरह। वहां पर देखिए कि बाहर की जो शक्तियां हैं, बाहर के जो देश है, वह जाकर के हमेशा कुछ ना कुछ उत्पात करते रहते हैं। इस तरह के अब जैसे कि अफगानिस्तान एक बहुत बड़ा उदाहरण है। वो सोवियत यूनियन ने जाकर के कुछ गड़बड़ किया। फिर ये अमेरिका ने गए वो माने वो सब पता ही है हमको हिस्ट्री। यहां पे उसको नैरेट करने की आवश्यकता नहीं। तो जो कमजोर देश है उसका सबसे बड़ा साइन क्या है कि वहां पर बड़े भयानक डिवीजन है। ये जो मिडिल ईस्ट का आप हिस्ट्री पढ़ेंगे तो यही उनका हिस्ट्री है। इंस्पाइट ऑफ के इतना उनका ग्रैंड सिविलाइजेशन था। इतनी पुरानी उनकी सभ्यता है और इस्लामिक एक रहनेसा भी एक हुआ था। इस्लामिक गोल्डन एज भी एक हुआ था। वहां पे बहुत सारा यह साइंस उस समय का साइंस है। फिर यह आर्ट है, कल्चर है। उसको डेवलप किया गया था। किंतु फिर इन लोगों के बीच में इस तरह के भयानक डिवीजन पड़ गए कि आखिर में वह बाह्य शक्तियों ने आकर के पूरे मिडिल ईस्ट को जैसे कि तहसनहस कर दिया। आज भी आप देखेंगे यह जो इराक है वगैरह की स्टोरी वहां पे यह एक ग्रुप यह दूसरा ग्रुप ये दोनों ग्रुप में सतत झगड़ा चलता रहता है। वे देश जो है कभी सेटल नहीं होगा। तो यह जो डिवीजन है एक बार सोसाइटी में डिवीजन प्रवेश करता है। फिर पूरे जगत को मौका मिल जाता है उस डिवीजन को एक्सप्लइट करने का। आज भारत में यदि कुछ प्रॉब्लम होता है और हम कहीं जाकर के कनाडा को गाली देंगे कि भाई वह लोग तुम आकर के यहां पे गड़बड़ करते हो तो फिर उसको गाली देने से पहले यह भी सोचा करो कि हम अपने जो भीतर के रिलेशन है उसको कैसे इंप्रूव कर सकते हैं। यदि हम आपस के डिवीजन नहीं ठीक कर पाएंगे। हमारे भीतर में एक दूसरे के प्रति यह सद्भाव या तो फिर एमैथी नहीं होगा तो देश कभी भी प्रगति नहीं करेगा। बाहर वाले को हमेशा आकर के एक मौका मिल जाएगा हमारे भीतर में डिवीजन खड़ा करने का। तो यह जो आत्म तत्व है उसका यह प्रैक्टिकल एप्लीकेशन है। प्रैक्टिकल एप्लीकेशन दो कहेंगे। एक तो है कि मुझे आत्म तत्व को समझ करके यह देखिए बहुत बार यह जो होता है ना यह जो शरीर का ही उदाहरण देकर के फिर से कहता हूं। हम लोग देखते हैं यह जो हमारे प्रैक्टिकल एक्सपीरियंसेस है कि जब बच्चे थे हमारा जन्म हुआ था फिजिकली बड़े ही फिट थे कभी भी किसी भी तरह की थकावट महसूस नहीं करते थे किसी भी तरह का मेंटल स्ट्रेस महसूस नहीं करते थे मैं अपने खुद के बचपन की बात करूं ठाकुर की कृपा से बड़े ही एक लविंग फैमिली में मुझे जन्म लेने का मौका मिला है। मेरे पिताजी की साइड में भी जॉइंट फैमिली था। मां की साइड में भी जॉइंट फैमिली था। तो छुट्टियों में मां के घर चले जाते थे। वो अपने नाना नानी के घर और फिर बाकी तो समय अपने घर में है ही है। तो दोनों घर में मैंने बहुत प्रेम प्राप्त किया है। ऐसा नहीं कि पैसा बहुत ज्यादा था किंतु प्रेम बहुत था। तो यह देखिए कि मैं अपने बचपन के प्रति देखता हूं तो मुझे खुशी और आनंद ही पूरा दिखता है। रेयरली ऐसा कुछ हुआ होगा कि कोई ग्रीफ या ऐसा कुछ हुआ होगा। हमारे फैमिली में वो उस समय किसी का डेथ भी नहीं हुआ था। तो वो एक है वरना डेथ होता है तो किसी का प्रियजन का तो क्या होता है? एक वैराग्य की ओर मन चला जाता है। मेरा ऐसा भी कुछ नहीं हुआ था। तो क्या है कि एक कंटीन्यूअस हैप्पीनेस में बचपन बीता। किंतु जैसे ही मैंने घर छोड़ा और यह जो हायर आइडियाज है उसको मैंने प्रैक्टिकल एप्लीकेशन करने का प्रयास किया तब मुझे इतना सारा स्ट्रगल का मुझे सामना करना पड़ा था। इतना चैलेंजेस मुझे फेस करना पड़ा था। ठाकुर की कृपा से मैं सत रास्ते पर आ तो गया किंतु आज अभी देखिए कि जो शरीर की भी वह परिस्थिति नहीं है मन की भी वह परिस्थिति नहीं है कि कंटीन्यूअस एक फिजिकल फिटनेस और एक मेंटल क्या कहेंगे कि मेंटल हैप्पीनेस या तो फिर मेंटल कहेंगे ब्लिसफुलनेस यह कंटीन्यूअस रहे अभी ऐसा नहीं है। बीच-बीच में शरीर में भी गड़बड़ होती है। मन में भी कभी-कभी गुस्सा भी आ जाता है, स्ट्रेस भी आ जाता है। तब मैं अपने बचपन के दिनों को देखता हूं और सोचता हूं कि देखो कि मैं उस समय कितना खुश था और आज क्या परिस्थिति है। अभी यह जो मुझे यह स्पष्ट दिखता है, हम सबको यह स्पष्ट दिखता है कि शरीर जैसे-जैसे एक के बाद एक जन्म, मृत्यु, जरा व्याधि के चक्र में फरता ही रहता है। वृद्ध हम सब लोग होंगे। देह में जितने भी प्रॉब्लम्स है, फिजिकल जो भी इलनेस है, डिसीज है, रोग है, व्याधि है, सब प्रवेश करेंगे। तो फिर हम लोग सोच लेते हैं कि हमारी यह जो खुशी है वो बचपन के जैसी नहीं है। क्यों? क्योंकि जो हमको खुशी प्रदान करता है। मान लीजिए कि सब लोग कहते हैं वह आत्मन है। मैंने मान लिया कि वह आत्मन है। या तो जब आप यह कहेंगे कि मेरे भीतर में एक दिव्य सत्ता विराजमान है। व्हाटएवर मैंने मान लिया कि वो है। किंतु मानने के बाद में मेरे देह के साथ में जो हो रहा है उसको मैं उसका ऊपर में क्या करूंगा कि यह पैरेलल लेकर के उपमा लेकर के मैं यह भी सोचूंगा कि जैसे कि मेरे आत्मन के भीतर में भी यह व्याधि प्रवेश कर रहे हैं और इसीलिए हो सकता है कि मैं थोड़ी बहुत साधना कर भी लेता हूं। इसके बावजूद जो एक कंटीन्यूअस फ्लो ऑफ हैप्पीनेस जो कंटीन्यूअस फ्लो ऑफ पीस, कंटीन्यूअस फ्लो ऑफ़ सेरिनिटी, ब्लेसफुलनेस यह जो होना चाहिए जिसको कि हम शास्त्र में पढ़ते हैं सतचित आनंद जो स्वयं है उसके भीतर में से आनंद क्यों नहीं प्रकट होता? क्यों नहीं प्रकाशित होता? एक ही रीजन हो सकता है इसको भी मेरे कर्म के जो यह है संस्कार या तो कर्म के फल उसने इसको ग्रस लिया है। इसने इसके ऊपर में भी माइग्रेन खड़ा कर दिया है। इसके ऊपर में भी यह हार्ट फेल वगैरह कुछ डाल दिया है। तो ऐसा हम सोचने लगते हैं। तो कभी-कभी हम हताश हो जाते हैं कि इस प्रोसेस को चलो शरीर पे आप सर्जरी करके थोड़ा बहुत तो आप रिपेयर कर सकते हैं। किंतु आत्मन के बारे में सुना है कि यह 100% इसको रिवर्स कर सकते हैं। एजिंग प्रोसेस को अगेन टू टेक द फिजिकल एग्जांपल यह जो आजकल वो जो होता है ना डीएजिंग ड्रग्स आता है। फिर यह जो किस लोंजेविटी ड्रग्स आता है यानी कि आप लंबे समय तक जी सकते हैं। आपकी ये जो वृद्ध होने की ये जो प्रोसेस है उसको आप रिवर्स कर सकते हैं। तो ये लोंजेट लोंजेविटी ड्रग्स या डीएजिंग ड्रग्स ऐसा कुछ आत्मन के बारे में अवेलेबल है। सुना है और शरीर 100% आप रिवर्स नहीं कर सकते हैं। आत्मन को आप कर सकते हैं। वह भी हमने सुना है। किंतु यह करने को जाते हैं तो होता कहां है? इसके बाद में यह सीरियसली डाउट होना शुरू हो जाता है कि सही में डीएजिंग होगा कि नहीं। ये सही में लोंजेविटी ड्रग्स जो है इसके ऊपर काम करता है कि नहीं। तो देखिए कि गुड न्यूज़ है कि हां वो करता है। बैड न्यूज़ यह है कि उसको करने के लिए हमारे पास में कमिटमेंट चाहिए। वह कमिटमेंट का हमारे पास में अभाव हो जाता है। किंतु मान लीजिए कि यदि मैंने कमिटमेंट करके यह जितनी भी साधना कही गई है उसका सिंसियरली एप्लीकेशन करना शुरू किया तो एक ना एक दिन आएगा ही कि यह शरीर मन की लिमिटेशन को ट्रांसेंड करके मैं वही आनंद स्वरूप या तो आनंद आत्मन में मैं विराजित हो जाऊंगा स्थित हो जाऊंगा। मेरा मन अनंत शांति से भर जाएगा। शांतिम शाश्वतः शाश्वत शांति से शाश्वत सुख से मेरा मन भर जाएगा। यह पॉसिबल है। तो यह हो गया एक प्रैक्टिकल एप्लीकेशन आत्म तत्व का कि बहुत बार हम सोचते हैं कि जैसे ठाकुर ने ही कहा ना कथामृत में कहते हैं कि वो किसी ने वो क्रिश्चियन मत की किताब लाकर के मुझे सुनाना शुरू किया। उसमें सिर्फ पाप और पाप। तो ठाकुर कहते हैं कि जो पापी पापी बोले श्रीशाला पापी ही होए जाए। माने जो जो यह कहता है कि मैं पापी हूं, मैं पापी हूं, वह पापी ही हो जाएगा। तो वो जो मत है कि सही-सही में हमारे ऊपर में जो असर होती है हमारे कुकर्मों की उसको काटना शायद नामुमकिन है। एक बार पाप कर लिया तो नरक भुगतना ही होगा वगैरह-वगैरह। हमारा जो यह कर्म का सिद्धांत या तो फिर यह जो आत्म तत्व जो है वह स्पष्ट रूप से कहता है कि यदि दुष्कर्म भी किए हैं यू कैन रिवर्स द टाइड उसको भी आप ये जो डी एजिंग प्रोसेस से आप रिवर्स कर सकते हैं। पॉसिबल है और अंतिम आखिर में आत्म तत्व में स्थित हो सकते हैं। यह वाल्य लुटारो फेमस घटना है वह हमारे सामने। तो इस तरह की और भी कितनी फेमस घटनाएं हैं कि आपने सही में अपने संस्कारों को अपने कर्मों को काट करके कर्मों के फल को काट करके आपने आत्म तत्व ईश्वर ईश्वर प्रेम या तो ईश्वर दर्शन प्राप्त किए। तो दैट इज वन गुड न्यूज़। यह जो आत्म तत्व का एक एप्लीकेशन है। और आत्म तत्व का दूसरा एप्लीकेशन है सर्वभूतों में आत्मदर्शन या तो सर्वभूतों में इष्ट दर्शन। इस तरह से यदि मैं दर्शन करूंगा तो मेरे हृदय में जो सबके प्रति जो एक कनेक्शन खड़ा होगा एक एंपैथी जो खड़ी होगी एक जो स्नेह का जो सद्भाव खड़ा होगा उसकी वजह से जभी भी मैं दूसरों का कष्ट देखता हूं मैं हमेशा उनको मदद करने के लिए आगे आऊंगा और सिर्फ इतना ही नहीं कि दूसरों का कष्ट देख देखूंगा तो मैं मदद करूंगा। यू विल एक्टिवली डिवोट योर लाइफ टू द बेटरमेंट ऑफ द पीपल एंड फॉर द बेटरमेंट ऑफ सोसाइटी। आपका पूरा जीवन ही परिवर्तित हो जाएगा। मैं अपने बेनिफिट के लिए अपना परिवार का पालन करता हूं। मुझे प्रॉफिट करना है इसलिए मैं नौकरी बिजनेस करता हूं। वो जो पूरा माइंडसेट है जो कि 99.99% सोसाइटी का है। वो पूरा माइंडसेट ही चेंज हो जाएगा। मुझे जगत कल्याण के लिए कुछ करना है। उसके उसके बेस के ऊपर में मुझे अपनी कैरियर बनानी है। यू मेक द करियर। उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। मिडिल एज में, ओल्ड एज में आपको कंफर्ट चाहिए ही चाहिए। उस समय आपको जो कुछ आपने वह बैंक बैलेंस बना करके रखा है वो आपको चाहिए ही चाहिए। वो तो ऐसा कोई नहीं कहता कि यह सन्यासी की तरह त्याग कर दे। देखिए सन्यासी के पास में भी आजकल देखिए रामकृष्ण मिशन में सब तरह की फैसिलिटीज है। कैंसर भी हो जाता है तो हम उसकी बड़े अच्छे से ट्रीटमेंट करवाते हैं। ऐसे बहुत सारे एग्जांपल। तो फिर क्या है कि सबको तो वृद्धावस्था में कुछ ना कुछ एक क्या कहेंगे कि आशरा चाहिए ही चाहिए। तो यह एक्सपेक्ट करना कि भविष्य की चिंता किए बिना आप सिर्फ सेवा कार्य कीजिए। वह भी कोई एक ज्यादा हो जाएगा। ज्यादती हो जाएगा। एक तरह का इस तरह का सिस्टम खड़ा करना चाहिए कि सोशल सर्विस इटसेल्फ कैन बिकम अ वेरी यू कैन से फुलफिलिंग कैरियर कि उसको करके मुझे अच्छा लगा अपने हृदय में और आपके भविष्य का जो वृद्धावस्था का जो ये है उसका भी वो आप कुछ ना कुछ समाधान कर ले। तो दिस इज व्हाट इज कि दो प्रैक्टिकल एप्लीकेशन है इस आत्म तत्व की। तो यहां पर देखिए कि भारत में हुआ ऐसा कि एक प्रैक्टिकल एप्लीकेशन तो हमने की कि एक के बाद एक इतनी सारी साधनाओं का हमने आविष्कार किया सहज से सहजतर। देखिए कि हमको यह पता है कि साधना है। साधना क्या है? तो है ब्रह्मचर्य। एक ही शब्द में यदि हिंदू साधन पद्धति को आपको यदि वर्णित करना है तो वो है ब्रह्मचर्य। ठाकुर कहते हैं 12 साल ब्रह्मचर्य का पालन कीजिए। देखिए ब्रह्म साक्षात्कार कैसे नहीं होता है? तो वह तो एक ही शब्द में खत्म हो गया। प्रश्न यहां से स्टार्ट होता है कि ब्रह्मचर्य का पालन नहीं कर पाएंगे तो क्या करेंगे? अच्छा ठीक है तो फिर आप एक लॉन्ग फॉर्म साधना कीजिए। यह जो आपके यह जो अष्टांग योग है या तो फिर यह यम नियम है धीरे-धीरेधी करके आप सभी चीजों को एक के बाद एक इंप्लीमेंट करते जाइए। यह भाव साधनाओं का धीरे-धीरे करके उसका डेवलपमेंट हुआ लेटर एजेस में। आज के कलयुग में कहते हैं जपात सिद्धि जपात सिद्धि जपात सिद्धि मां ने तीन बार इस तरह से त्रिसत्य करा लिया है करवा दिया है मां ने हमारे लिए तो वो एक है तो सहज से सहजतर साधन पद्धतियां इसीलिए प्रदर्शित हुई है कि वही जो एक आत्म तत्व है उसको हम किस तरह से प्राप्त करें तो यह तो हमने बहुत अच्छे से इवोल्यूशन किया किंतु यह जो उसका जो सेकंड प्रैक्टिकल एप्लीकेशन है सोसाइटल लेवल पे किस तरह से आत्मत्व को ए अप्लाई किया जाए, वह ट्रेन हम मिस कर गए और उसका परिणाम आया 1000 साल की गुलामी। तो देखिए कि यह जो एक

स्वामी विवेकानंद: ह्रदय में ब्रह्म साक्षात्कार करने से भी उच्च सोपान है सर्व भूत में ब्रह्म साक्षात्कार करना

सुंदर कन्वर्सेशन है तुरियनंद जी का अह महाराज जी अपने शिष्य को कहते हैं कि क्या कहते हैं? स्वामी जी एट वन टाइम टोल्ड मी लीव द लाइफ लीव द आइडियल लाइफ। द डिवाइन मदर हैज़ शोन मी दैट बाय डूइंग सो यू विल अकंप्लिश अ 100 टाइम्स मोर गुड देन आई। स्वामी जी ने एक बार मुझे कहा था एक आदर्श जीवन जी करके जाओ। दिव्य मां डिवाइन मदर यानी कि जगदंबा ने मुझे दिखा दिया है कि तुम यदि इतना ही करोगे तो मेरे से भी 100 गुना ज्यादा तुम सक्सेस होगे अपने कार्य में। अच्छा तो यह बड़ा वह फेमस घटना के बारे में यहां पे तुरियनंद जी कह रहे हैं कि स्वामी जब अमेरिका से वापस आए भारत में प्रथम बार तो अपने गुरु भाइयों को खास करके तुरियनंद जी को कहते हैं कि तुम वहां पर जाओ कैलिफोर्निया में कैलिफोर्निया में शांति आश्रम की स्थापना करो या तो फिर स्वामी जी उनको कहते हैं कि तुम मेरे साथ में अमेरिका चलो तो यह अमेरिका अपने साथ में ले जाने की जैसे ही स्वामी जी बात करते हैं तुरियानंद जी एक के बाद एक सब अपोजिशन उठाने लगे। एक के बाद एक ऑब्जेक्शन उठाने लगे। कहते हैं कि मैं तो साधु हूं। इस तरह से वो प्रवरज्या तपस्या करके जीता हूं। मैं अमेरिका में जाकर के वेदांत प्रचार कहां से करने वाला हूं। तो वो फिर स्वामी जी का जो अल्टीमेट वेपन था इमोशनल ब्लैकमेल। स्वामी जी ने हरि महाराज को आलिंगनबद्ध करके रोते-रोते कहा कि भाई मैं ही सब क्या अकेला कार्य करके शरीर पात करूंगा। तुम लोग मुझे थोड़ी सी भी सहाय नहीं करोगे। तो उस समय फिर हरि महाराज का हृदय विगलित हो गया और कहते हैं अच्छा स्वामी जी मैं आने को तो तैयार हूं किंतु आपको तो पता है कि यह प्लेटफार्म वर्क जो है मेरे से होने वाला नहीं है। तो स्वामी जी ने कहा भाई तुम इसकी चिंता मत करो। तुम सिर्फ एक जीवन जी के जाओ। शुद्ध पवित्र जीवन इनको दिखा के जाओ। इतना हमने पढ़ा था। किंतु एक नया यहां पर एक नया रिवुलेशन तुरियनंद जी हमको देते हैं। कहते हैं कि स्वामी जी ने साथ-साथ में यह भी कहा कि यदि तुम एक शुद्ध पवित्र जीवन जी के जाओगे तो मैंने जो कैलिफोर्निया या अमेरिका में सक्सेस मुझे मिली है उससे 100 गुनी ज्यादा सक्सेस तुमको मिलेगी। यह स्वामी जी ने स्पष्ट कहा, स्वयं कहा और स्वामी जी ने जब अपने डिसाइपल को अमेरिकन डिसाइपल को लेटर लिखा था तुरियानंद जी को इंट्रोड्यूस करवाने के लिए तो उनमें उस लेटर में उन्होंने कहा था कि अभी तक आप लोगों ने क्षात्र तेज देखा है। क्षात्रवीर्य देखा है। अभी आप लोग ब्रह्म तेज देखेंगे। यानी कि स्वामी जी जो क्षत्रिय की तरह जितना भी विरोध है, ऑपोजिशन है, प्रजुडाइस है, उनके प्रति यह क्रिश्चियन मिशनरी का उसका संहार तो कर दिया, खात्मा तो कर दिया। अभी यह जो भूमि तैयार हो गई है धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में शत्रुओं का संहार हो चुका है। अभी वहां पर खेती लगाने की बात है। वहां पर खेती करने की बात है। तो फिर स्वामी जी कहते हैं कि जाओ हरि भाई तुम जाकर के एक शुद्ध पवित्र जीवन जी के दिखा दो। तो इस सिलसिले में यह तुरियानंद जी कहते हैं। फिर क्या कहते हैं? आई डिडंट बिलीव इट। पहले तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ। बट देन इन ऑल सीरियसनेस आई प्लंच इनू द लॉर्ड्स वर्क एंड द वर्क सक्सीडेड। किंतु मेरे हृदय में संपूर्ण निष्ठा लेकर के मैं संपूर्ण ऑनेस्टी के साथ में कार्य क्षेत्र में प्रवेश किया और मैं कार्य में सक्सेस भी हुआ, सफल भी हुआ। इफ आई इफ आई हैड नॉट एसोसिएटेड वि ग्रेट सोल्स लाइक स्वामी जी एंड अदर्स व्हाट वुड आई हैव बीन बट परहप्स अ वंडरिंग मक। यदि स्वामी जी जैसे ग्रेट सोल महात्माओं के साथ में यदि मेरा संग मुझे नहीं मिलता तो मैं आज क्या होता ज्यादा से ज्यादा एक वंडरिंग मक होता एक परिवराजक सन्यासी होता आई वुड हैव हैड सम सॉर्ट ऑफ रियलाइजेशन नो डाउट बट नॉट व्हाट आई हैव टुडे मुझे कुछ तो रियलाइजेशन कुछ तो प्राप्त हुआ होता आध्यात्मिक क्षेत्र में किंतु आज मैं जिस स्थिति में हूं आज मैं जिस पोजीशन में हूं। आज मेरा जो आत्म आज मेरा जो आध्यात्मिक उपलब्धि है वह शायद उस समय नहीं होता। तो फिर जो शिष्य है वह प्रश्न करता है बट सर इजंट रियलाइजेशन द सुप्रीम गोल? यह जो आत्मदर्शन है वही क्या अपने जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य नहीं है? इज देयर एनीथिंग बियों्ड इट? इसके परे भी क्या कुछ है? यू सीम टू मेक ए डिफरेंस बिटवीन रियलाइजेशन एंड योर स्टेट ऑफ एटेटनमेंट। आपने यह जो ट्रेडिशनल सेंस में जो आत्म साक्षात्कार कहते हैं वह और आज आपने जो उपलब्धि की है वो इन दोनों में जैसे कि आप किसी भी तरह का एक डिफरेंस खड़ा करते हैं व्हिच इज वेरी एक्चुअली देखिए कि डिसाइपल का कितना सुंदर ऑब्जरवेशन है। ट्रेडिशनल सेंस में यदि आत्म तत्व के बारे में आप पढ़ेंगे तो वही लिखा होगा कि जब ध्यान तपस्या करके आप आत्मन की उपलब्धि कीजिए और फिर वह शांति से आप रहिए। हो सकता है कि यदि अब जैसे ठाकुर कहते हैं कि मधुमक्खी जब वो मधुपान करती है तो वह शांत हो जाती है किंतु मधुपान करने के बाद में थोड़ा बहुत गुनगुन करके गीत गा लेती है। तो यदि आप आत्म साक्षात्कार करके जीवन मुक्त होकर के पृथ्वी पर रहे तो फिर आप कुछ ना कुछ तत्र की रचना कीजिए। भक्तों को कुछ उपदेश दीजिए वगैरह। किंतु आप जो कह रहे हैं यहां पे कि आपने स्वामी जी का कार्य करने के लिए विदेश में गए और एक जीवन ऐसा जिया जिसका सक्सेस आप यह कहते हैं कि भीतर में तो आपको और ज्यादा शांति प्राप्त हुई ही होंगी। किंतु वहां पर कार्य का प्रचार भी बड़े सक्सेसफुली हुआ। तो यह जो अमेरिका में स्वामी जी ठाकुर वेदांत का जो भाव प्रचार है वह सक्सेसफुल हुआ। इस बात को आप यह आत्म साक्षात्कार के साथ में कैसे कंपेयर कर सकते हैं? तो तुरानंद जी क्या उत्तर देते हैं? यस देयर इज अ डिफरेंस। हां, इसमें दोनों में एक डिफरेंस है। देयर आर डिग्रीज ऑफ रियलाइजेशन। जो रियलाइजेशन जो होता है, साक्षात्कार जो होता है, उसके लेवल है, उसकी डिग्रीज है। अ रोज इज अ रोज बट देयर आर फोर पेटल्ड एंड 100 पेटल्ड रोेजज़। एक जो गुलाब है गुलाब ही है। किंतु गुलाब की भी बहुत सारी प्रजातियां होती है। स्पेसिमेन होते हैं, स्पीशीज होती है। एक तो चार पंखुड़ी वाला गुलाब होता है। 10 पंखुड़ी वाला भी मिल जाएगा और 100 पंखुड़ी वाला गुलाब भी सहस्त्रदल पद्म जिसको कहते हैं ना कि वो पद्म यानी कि कमल। किंतु यहां पे महाराज उदाहरण देते हैं रोज का गुलाब का कि 100 पंखुड़ी वाला गुलाब भी मिलता है। तो रियलाइजेशन जो है चार पंखुड़ी वाला गुलाब भी हो सकता है। 100 वो जो सहस्त्रदल पद्म की तरह वो 100 पंखुड़ी वाला 1000 पंखुड़ी वाला गुलाब भी हो सकता है। इज देयर नो डिफरेंस? क्या इस ये दोनों में आपको कोई डिफरेंस नहीं दिखता? गुलाब गुलाब है किंतु पंखुड़ियों की संख्या देखिए। उसका जो ब्यूटी देखिए, उसकी खुशबू देखिए। ये आपको डिफरेंस नहीं दिखता है क्या? स्वामी जी गव अस हायर आइडियल देन रियलाइजेशन फॉर वनसेल्फ। स्वामी जी ने हमको हमारी खुद की आत्म साक्षात्कार से भी ज्यादा एक उच्चतर आदेश आदर्श दिया है। इट इज टू एक्सपैंड द कॉन्शियसनेस अंटिल यू सी योरसेल्फ इन ऑल बीइंग्स एंड ऑल बीइंग्स इन योरसेल्फ। एग्जैक्टली वही जो ऊपर वाला जो श्लोक है कि सब मुझ में सब मुझे सब भूतों में अवस्थित देखो। सब भूतों को मुझ में अवस्थित देखो। या तो फिर यह भगवान कृष्ण ने अपने बारे में कहा आत्मन के बारे में भी वही है कि सब भूतों की अंतरात्मा है। उसमें तुम अपनी आत्मा को देखो और अपनी आत्मा के भीतर में सब भूतों की अंतरात्मा को देखो। एग्जैक्टली महाराज उसको कोट कर रहे हैं। इट इज टू एक्सपेंड कॉन्शियसनेस अंटिल यू सी योरसेल्फ इन ऑल बीइंग्स एंड ऑल बीइंग्स इन योरसेल्फ। देखिए यह जो कांसेप्ट है कोई नया नहीं है। स्वामी जी के साथ में यह कांसेप्ट नहीं आया है। हमने एंपल एग्जांपल देख लिए इसके उपनिषद में भी और गीता में भी। वही बात है कि उसका इंटरप्रिटेशन आप किस तरह से करेंगे। पहले तो आप पैसिव होकर के बैठे रहते थे। भारत में कोई भी संत महापुरुष है उसके घर जाएंगे। उसके सानिध्य में जाएंगे। बड़ा ही दया करके बड़ा ही स्नेह पूर्वक जतन पूर्वक प्रेम पूर्वक वो आपके साथ में बात करेगा। यह नरसिंह मेहता जैसे कितने भी है घर में खुद के लिए खाने को नहीं है। मेहमान यदि चले गए तो अपना खाना छोड़ के उनको खाना खिलाएंगे। वो जो जो महाभारत की वो फेमस कहानी है वो नेवला है। नेवला वो आकर के युधिष्ठिर के वो जो यज्ञ में वो राख में वो रेंगता है। वो कहता है कि मेरा आधा शरीर सोने का हो गया। मैं वो गरीब की कुटिया में वो जो उसकी वो जो चूल्हा है उसकी राख में रेंग करके किंतु आपका इतना बड़ा यज्ञ इतने सारे वेद के पंडित वगैरह सब इकट्ठा हुए इसकी राख में रेंग करके मेरा आधा बाकी का जो आधा शरीर है वो सोने का नहीं हुआ क्यों नहीं हुआ कि ब्राह्मण ने जो वो ये किया है त्याग किया है दान करने के लिए अपने खुद के शरीर का त्याग करके इसको खिलाया है तो राजन तुमने तो थोड़ा सा ही धन व्यतीत किया है यह दान करने में अपना जीवन सर्वस्व तो नहीं दे दिया है। यानी कि ब्राह्मण का गरीब ब्राह्मण का त्याग तुमसे कहीं ज्यादा बड़ा है। तो यह जो हमारे ट्रेडिशन है अतिथि देवो भव वगैरह वो तो चली आ रही है। किंतु वो क्या था? एक पैसिव एंपैथी था। आप उनके सानिध्य में आएंगे तो आपको उनका प्रेम प्राप्त होगा। किंतु यहां पे स्वामी जी इसको पैसिव एंपैथी को एक्टिव एंपैथी में यह परिवर्तित कर दे रहे हैं। इफ द मोहम्मद डजंट गो टू माउंटेन माउंटेन गोज़ टू द मोहम्मद। यदि आप सिर्फ बैठे ही रहेंगे आत्म साक्षात्कार प्राप्त करके और कोई आपके पास में आएगा। उसको आप स्नेह करें। सिर्फ ऐसा नहीं घर घरघर गांवगांव शहर शहर जाइए। यह गरीब की कुटिया में जाइए। किसान के खेत में जाइए। स्टूडेंट के क्लासरूम में जाइए। गहिणी के किचन में जाइए। वहां जाकर के इस वेदांत का उपदेश दीजिए। एक बात दूसरा कि आपको आत्म साक्षात्कार होने तक बैठे नहीं रहना है। इस दान को विद्या दान को ज्ञान दान को अन्नदान को यह आरोग्य दान को आप एक एक्टिव साधना के रूप में परिणत कर सकते हैं। कांसेप्ट वही है। उसका एक इंटरप्रिटेशन है। वह बहुत ही वाइडर लेवल पर स्वामी जी ने किया है। हार्ट इज विद ब्रह्मन ह आईज इन ऑल थिंग्स ओनली ब्रह्मन इक्वली प्रेजेंट नोज़ हिम ह ओन आत्मन इन एव्री क्रिएचर एंड ऑल क्रिएशन विद इन दैट आत्मन दैट योगी सीज़ मी इन ऑल थिंग्स एंड ऑल थिंग्स वििन मी ही नेवर लॉज़ स ऑफ मी नोर आई ऑफ हिम ही इज एस्टैब्लिश्ड इन यूनियन वि मी एंड वरशिप्स मी डिवोटली इन ऑल बीइंग्स दैट योगी एबाइट्स इन मी नो मैटर व्हाट इज मोड ऑफ लाइफ हु बं्स वि द ब्लीस एंड सफर्स द सोरो इफ एव्री क्रिएचर विद इन हिज़ ओन हार्ट मेकिंग हिज ओन ईच ब्लीस एंड ईच सोरो हिम आई होल्ड हाईएस्ट ऑफ ऑल योगीस ये गीता का 29 से लेकर के 31 ये श्लोक को हमने प्रारंभ में ही एक बार देख लिया है। इसके बाद महाराज क्या कहते हैं? योर आईडिया ऑफ स्पिरिचुअल लाइफ इज टू मेडिटेट ऑल द टाइम विद क्लोज्ड आईज। तुम्हारा जो ध्यान करने का जो कांसेप्ट है वह क्या है? सब समय आंख बंद करके ध्यान करते रहो। कीप अवे फ्रॉम मी। आई वांट टू मेडिटेट। तुम मेरे से दूर हो जाओ सभी लोग। मैं यहां पे शांति से बैठकर के ध्यान कर रहा हूं। किंतु नो नो नो। दैट इज नॉट द आइडियल। यह आइडियल नहीं है। मेडिटेट विद आईज क्लोज्ड एंड आल्सो मेडिटेट विद आईज ओपन। आंख बंद करके भी ध्यान करो और आंख खोल करके भी ध्यान करो। सी हिम एवरीवेयर। सब जगह पे, सब चीजों में, सब भूतों में उनको देखो। योर आइडिया स्टेम्स फ्रॉम सेल्फिशनेस। ये कितना बड़ा स्टेटमेंट दे दिया है यहां पे रामकृष्ण विवेकानंद भावधारा में कि यह जो हमारी ट्रेडिशनल वे ऑफ़ साधना थी या तो फिर कहेंगे कि यह जो पिछले कुछ समय से मिस इंटरप्रेट की गई थी साधना के बारे में वो पूरा एक सेल्फिशनेस के अलावा और कुछ नहीं है कि मैं हूं और ईश्वर है। यह एक सेल्फिशनेस ही है। लुक द गॉड इन एवरीथिंग आउटसाइड। कल जैसे हमने उदाहरण देखा था ठाकुर का वो जो ट्रेडिशनल उदाहरण सबसे पहले तो कि धक्कामुक पहले तो तुम भिखारी को दान करोगे ना कि धक्कामुक्की करके कैसे भी करके मां काली का दर्शन कर लोगे यदि सिर्फ इतना ही भाव रखेंगे तो वह सेल्फिशनेस हो जाएगी। ऑफ कोर्स ठाकुर और रामकृष्ण साहित्य में इससे भी बाद की बात आती है कि पहले मां का दर्शन कर लिया फिर बाहर आकर के भिखारियों को दान अवश्य करना है। और भी यदि इससे एक स्टेप ऊपर जाए तो बाहर में जो भिखारी बैठे हैं उनके भीतर में ही मां काली का दर्शन करना है। और फिर इसका प्रैक्टिकल हमने कल देखा था वर्क एंड वरशिप अर्थात कि भिखारियों के भीतर में मां काली का दर्शन करके उनकी भी सेवा करनी है और मंदिर में जाकर के मां काली का भी दर्शन करना है। यानी कि रामकृष्ण विवेकानंद आईडियोलॉजी ने अपना ये जो ट्रेडिशनल मिस इंटरप्रिटेड या तो फिर जो ट्रेडिशनली इंटरप्रिटेड जो वेदांत था उसका यह जो व्याप है कितना बढ़ा दिया है। सी हिम एवरीवेयर सब जगह पर ईश्वर को देखो। योर आइडियाज टेम्स फ्रॉम सेल्फिशनेस। तुम्हारे जितने भी आइडियाज है वह स्वार्थ में से प्रकट होते हैं। यू आर रिटायरिंग मोर एंड मोर इनू योर शेल एंड बिकमिंग इंक्रीजिंगली सेल्फ सेंटर्ड। तुम लोग जो है जगत से दूर होते जा रहे हो और ज्यादा से ज्यादा सेल्फ सेंटर्ड होते जा रहे हो। आत्म केंद्री होते जा रहे हो। माने आत्म यानी कि वो माने हायर आत्म नहीं शरीर केंद्री। माने शरीर रूपी जो सेल्फ है उसके ऊपर में आपका सब यह आ जा रहा है। यू आर अफ्रेड ऑफ फेलियर्स एंड क्रिटिसिज्म। कोई आपकी निंदा करेगा, कोई आपकी यह करेगा कि भाई तुम जो कर रहे हो वो गलत है। तो यह सब चीजों से तुम डर जाते हो। दैट इज नॉट राइट। यू हैव टू एक्सपेंड। यू वोंट सैक्रिफाइस योरसेल्फ फॉर एनीथिंग एंड येट यू एक्सपेक्ट टू हैव स्पिरिचुअल रियलाइजेशन। तुमको किसी भी तरह का सैक्रिफाइस नहीं करना। किसी भी तरह की विषयों की यह जो वासना है उसका बलिदान नहीं देना। और फिर तुम क्या यह ख्याल रखते हो कि तुमको आध्यात्मिक ये जो उपलब्धि मिल जाए इज दैट पॉसिबल एंगेज योरसेल्फ नाउ इन द लॉर्ड्स वर्क। ईश्वर का जो ठाकुर का कार्य है उसमें जी जान से तुम लग जाओ। सैक्रिफाइस योरसेल्फ। अपना ही आत्मबलिदान दे दो। देन डिवाइन विज़ंस विल कम टू यू एंड यू विल रीच द अल्टीमेट गोल। फिर यह जो देखो कि डिवाइन विज़ ये जो ठाकुर को जो दर्शन होते थे तुमको कैसे ना हो और देखो कि तुम किस तरह से यह अल्टीमेट जो उद्देश्य है अल्टीमेट गोल है वहां पे कैसे ना पहुंचो। याद रखना है कि यह सब चीजें कोई एक जन्म की नहीं है। मैंने भी सैक्रिफाइस किया है। मैं भी रांची जाकर काम करता था। अभी इसको पढ़कर के मैं यह सोचूं कि अभी मुझे ठाकुर की तरह दर्शन क्यों नहीं हो रहा है? तो वह गलत हो जाएगा। यह जन्म जन्मांतर की यात्रा है। मुझे शांति मिली है। मुझे थोड़ा बहुत उपलब्धि हुआ है। किंतु जो होना चाहिए जो हमारी अपेक्षाएं होती है जो कि हम किताब में पढ़कर के रख के बैठते हैं कि हां यह सब तो होना ही चाहिए। ऐसा कुछ नहीं हुआ। तो साथ में यह कंटेंटमेंट भी है कि चलो अब अभी इस नौका में तो बैठ गए हैं। श्री रामकृष्ण रूपी ट्रेन में तो बैठ गए हैं। अब ये ट्रेन जहांंगी हम भी जाएंगे। तो इतना तो भरोसा हो गया है। सो हृदय में थोड़ा सा संतोष रखना है, कंटेंटमेंट रखना है और ठाकुर का कार्य करना है। दिस इज आवर इंटरप्रिटेशन ऑफ वेदांत। अच्छा इसके बाद में भी है स्वामी जी का एक कोटेशन है जिसको कि अभी हम कल देखेंगे आज तक। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।

प्रश्न: हमने कभी यह अपेक्षा नहीं की थी कि तुरियानन्दजी स्वामीजी के कर्म योग पर इस दृढ़ विश्वास के साथ बोलेंगे।

नतुर आनंद जी का एक्सट्रीम स्टेटमेंट सुनना है। आखिर आखिर में उन्होंने कहा था उनको बहुत सारे वो डिसीज हो गए थे ना सर्जरी करनी पड़ती थी वगैरह तो कैसा एक्सट्रीम स्टेटमेंट दे देते हैं कि देखो मैंने स्वामी जी का काम छोड़कर के मैं वापस आ गया। मैंने स्वामी जी का काम नहीं किया इसलिए मुझे इतना भुगतना पड़ता है। एग्जैक्ट एग्जैक्ट वही कि लोग कहते हैं ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या मैं कहता हूं ब्रह्म भी सत्य जगत भी सत्य। ठाकुर कहते

प्रश्न: हमने सोचा था कि एक बार हमें आत्मसाक्षात्कार प्राप्त हो जाए तो हम खुश हो जाएंगे। लेकिन यहाँ हम सीखते हैं कि आत्मसाक्षात्कार के भी कई सोपान होते हैं।

हैं ना तारेबाड़ा तारेबाड़ा म उसके भी आगे जाओ उससे भी आगे जाओ वह सोने की खान रुपए की खान हीरामणिक ना इसीलिए वो अद्वैत ऐसा भी यदि कहेंगे कि अद्व अद्वैत इस द अल्टीमेट फिलॉसोफी वो भी आपको अल्टीमेट को लिमिट करना हो गया जो कि वो फिलॉसोफी के परे है मन बुद्धि वचन वाणी से परे हैं उनको अब मन बुद्धि वचन वाणी की जो एक फोर कॉर्नर आईडियोलॉजी में कैसे फिट कर पाएंगे म साकार निराकार कॉनसेप्चुअलाइजेशन करने में पसीना निकल जा रहा तो इससे परे सेटल

प्रश्न: जैसे-जैसे हम आध्यात्मिक क्षेत्र में आगे बढ़ेंगे, क्या हमारी साधना भी बदलेगी?

होता जाएगा। सेटल होता जाएगा। जैसे इवन रामकृष्ण मिशन में ही अभी हम आजकल कहते हैं ना कि अन्नदान की अभी इतनी कोई आवश्यकता नहीं है। आप आरोग्य दान है या विद्यादान है या ज्ञान दान है उसकी ओर ज्यादा जाइए। क्योंकि वो जो डेस्पिरेट पॉवर्टी थी उस समय की वो आज नहीं रही है। सो दैट समय के अनुसार एक्टिविटी भी चेंज होगी। सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होती जाएगी। जहां हमारा वैदिक पीरियड था उस समय ये सब चीजों की कोई जरूरत नहीं थी। लोग 100-100 साल जीते थे। ना ही आपको अन्नदान देने की जरूरत है, ना ही आरोग्य दान देने की जरूरत है। विद्या दान देने के लिए अच्छे से अच्छे ब्राह्मण पंडित उपस्थित थे। उस समय ज्ञान दान देने से ही हो जाता। या तो फिर इवन अल्टीमेटली यदि सोसाइटी इतना हाईली इवॉल्व है तो हरि महाराज की तरह एक जगह पर बैठ के आप जब ध्यान करते रहिए। आपका यह जो पुण्य है भूमि में सिंचित होगा। भूमि भूमि पुण्य से सिंचित होकर के भूमि पवित्र हो जाएगी। धरातल पवित्र हो जाएगा। आपको तो सिर्फ इतना ही करना था। यानी एक्टिविटी समय के अनुसार इट विल गो सटल एंड सटल। वो जेल में से वापस आया तो कि ध कोरे नाचबे केरानी माने वो जो अकाउंटेंट है वो जो वही फेमस वार्ता है ना वो जो एक ब्रह्मचारी था वो जंगल में रेस्ट कर रहा था। वो वो जो दो पंखी है वो चिल्ला रहे हैं। वो तो उसको उसकी नजर के उस नजर से देखा तो वो जल करके भस्म हो गया। फिर वही ब्रह्मचारी गांव में जाता है किसी एक महिला के घर में वह भिक्षा मांगने के लिए तो वह महिला देरी कर रही है तो यह नाराज हो जाता है ब्रह्मचारी तो वह महिला भीतर में से क्या कहते हैं कि यह कोई ककी बकी भषो करा नहीं यानी यह जो दो पंखी है उसको अपनी क्रुद्ध दृष्टि से देखा तो पंखी जल गए ऐसा मैं जलने वाली नहीं हूं मैं सती हूं पति की सेवा कर रही हूं आपकी यह जो क्रोध का मेरे पर कोई असर नहीं होने वाला फिर वो जो व्याग्रह है वो जो कसाई उसके पास में उसको भेजती है तो वो वो कसाई वो पशु काट रहा है। किंतु वो ब्रह्मचारी देखता है ये साधु कि उसके जो मां-बाप की जो सेवा इतने वो मन लगा के करता है कि उसका जीवन जैसे पूरा पवित्र हो गया है। यानी वो पति सेवा करती है यह कसाई है। इससे ज्यादा वर्ल्डली एक्टिविटी और क्या आप देख सकते हैं। किंतु दोनों में जो पवित्रता है अंतर्मन की वो ऐसी है कि वो साधु बेचारा हार जाते हैं इन दोनों के सामने। सो आप जो कुछ भी करें वही करते रहेंगे बट इट विल बी डिफ्यूज्ड विद डििनिटी। मेरे बचपन का मैं उदाहरण वैसे मैंने पहले भी एक दो बार कहा है। हमारी दवाई की दुकान थी वहां पे मेरे जो मेरी मां के पिताजी के पिताजी यानी कि मेरी मां के नाना बड़ी उम्र के थे। मैं तो उस समय छोटा था। तो वो बैठा बैठे रहते थे। तो ऐसा उनकी प्रेजेंस से ना ऐसा लगता था। मुझे आज ऐसा अनुभव हो रहा है। बचपन में ऐसा नहीं लगता था। आज मुझे ऐसा लग रहा है उनकी प्रेजेंस से पूरी दुकान जो है छोटी सी दवाई की दुकान है पूरी वो जलजल कर रही है माने वो पूरा दुकान में प्रकाश फैल गया है उस समय नहीं समझ में आता था उस समय लगता था अरे नाना हमको कितना स्नेह कर रहा है आज किंतु मुझे लग रहा है कि म ही हैड सम सॉर्ट ऑफ रियलाइजेशन सो

प्रश्न: कभी-कभी हम गृहस्थों को ऐसा लगता है कि हमने अपना जीवन अपने परिवार और नौकरी में बर्बाद कर दिया है। हम सब कुछ छोड़कर भाग जाने और हिमालय में भगवान को याद करने का सपना देखते हैं। लेकिन जैसा आपने कहा कि हम संसार में रहते हुए भी साधना कर सकते हैं, हर किसी में भगवान को देख सकते हैं।

ये आपने बहुत ही एक रिलेवेंट पॉइंट कहा है देखिए घर छोड़ के जाना बोल के ही सब हो गया ऐसा तो नहीं ठाकुर की वो वो दूसरी एक फेमस कहानी कि दो भाई थे। एक ने घर संसार किया दूसरा कहीं पर तपस्या करने को चला गया। अब तपस्वी और ये गृहस्थ सालों के बाद में मिल रहा है। तो वो गृहस्थ तपस्वी को पूछता है आपने क्या सिद्धि आपने क्या प्राप्त किया? नहीं आपने घर छोड़ के गए सैक्रिफाइस किया तो आपने प्राप्त क्या किया? तो वह कहता है कि देखो मैं यह जो नदी है ना उसके ऊपर में चल के ते दूसरे ओर चला जाऊंगा। तो वह आदमी जो गृहस्थ है कहता है मैं तो 10 पैसे की नौका लेके मैं भी चला जाऊंगा। यह तो मैं भी कर सकता हूं। तुमने इसके बाद में और क्या किया बताओ? तो दैट इज ट्रू। और दूसरा कि सबसेेंट पॉइंट कि देखिए घर में बैठे हैं, नौकरी कर रहे हैं। अपने बॉस है, अपने कलीग्स है उसके साथ में अच्छा नहीं पड़ रहा है। फैमिली में कुछ बहुत थोड़ा बहुत होता रहता है। तो हमेशा ऐसा लगता है कि एक ना एक दिन ऐसा आएगा। हम लोग सभी कल्पना करते हैं ना स्वर्ग की कल्पना करते हैं। तो हम ऐसी भी कल्पना करते हैं। इतना सुंदर संसार होगा सब कुछ मेरे अनुसार चलेगा। मेरी नौकरी पे भी सब कुछ मेरा ही मुझे ही प्रमोशन मिलेगा। मुझे ही प्राधान्य मिलेगा। जीवन संसार में भी मुझे रिस्पेक्ट मिलेगा। यह जो रिस्पेक्ट है ना रिस्पेक्ट बहुत लोगों को नहीं मिलती है। तो उनको भीतर भीतर से बहुत बेचारे ये होते हैं मायूस हो जाते हैं। और फिर इसका बड़ा ही डेंजरस असर उनकी हेल्थ पे उनके बिहेवियर पे पड़ता है। किचकिचा वो जो स्वभाव हो जाता है। छोटी-छोटी बातों में गुस्सा हो जाते हैं। फ्रेजाइल हो जाता है उनका नेचर। छोटी-छोटी बातों में डिप्रेस हो जाते हैं। सुसाइडल थॉट्स भी आने लगते हैं। सुसाइडल इज अ बिट एक्सट्रीम। किंतु यह सब मैंने देखा है। मेरे एक रिलेटिव की बात करूं तो बार-बार कहते थे कि मैं अपनी नौकरी पे जाता हूं। नौकरी करने के लिए मेरा बॉस है। वह मेरे साथ में यह करता है, वह करता है। तो घर आकर के कहां वो भूल जाना चाहिए नौकरी को। कहां वो अपने बीवी बच्चों के साथ में आनंद वो ऐसा कुछ होना चाहिए। घर में भी वह टेंशन कि अभी वह नौकरी से आएंगे वही बातें करेंगे। और नेचुरली है कि फादर या हस्बैंड उसके साथ में इतना अन्याय हो रहा है तो हम बाकी लोग कैसे शांति से जिए। सो एक पूरा टेंशन भरा वातावरण और हमेशा मन में ऐसा लगता है कि नेक्स्ट जन्म यदि होगा तो इससे बेटर परिस्थिति होगी। व्हिच इज़ वेरी ऑब्वियस ए ह्यूमन एस्पिरेशन है। वी ओनली नीड हैप्पीनेस। वी ऑल वांट रिस्पेक्ट इन आवर लाइफ। वी ऑल वांट टू लिव विद डिग्निटी। बहुत बार होता है। वृद्धावस्था हो गई है। अभी बच्चे संभाल नहीं ले रहे हैं। सब समय ये टेंशन कि डिग्निटी के साथ में नहीं जी पाएंगे। सबके साथ में हाथ थोड़ा फैलाना पड़ेगा। वगैरह-वगैरह इट्स अ पार्ट एंड पार्सल ऑफ लाइफ। सो इस समय हम सब लोग सोचते हैं कि यदि ईश्वर के पास में से ऐसा कुछ मिल जाए वरदान कि हमारा संसार पूरा ट्रांसफॉर्म हो जाए। हम वी कैन ट्रांसेंड दिस। बट देखिए कि दिस सॉल्यूशन इज विद इन आवर ओन हार्ट। अपने ही हृदय में आप इस तरह से यह स्नेह प्रेम आत्मन के प्रति यह जो आकर्षण है उसका एक गुलाब इसका एक पद्म फल आप खिला सकते हैं कि भीतर से जो प्रकाश आएगा ना ये कितनी ही डेंजरस परिस्थिति में भी हम रहते हैं ना सब लोग उससे पूरा यह फैल जाएगा पूरा ये जो डिविनाइज करना विदिन दैट कनफाइनमेंट ऑफ आवर फैमिली आवर इमीडिएट सोशल सर्कल इसको डिविनाइज करना है यदि तो सॉल्यूशन शन कैन नॉट कम फ्रॉम आउटसाइड। सॉल्यूशन ऑलवेज हैज़ टू कम फ्रॉम विद इन अस। देखिए हम साधुओं का भी ऐसा है कि इस आश्रम में रहते हैं। जो काम मुझे दिया गया है नहीं पसंद है। मैं जिनके साथ में रहता हूं उन लोगों को मेरा उन मुझे उनका नेचर नहीं अच्छा लग रहा है। जो मेरे सुपर जो सीनियर है उनके साथ में मेरा नहीं पट रहा। तो थोड़े दिनों के बाद में कहेंगे चलो हम ट्रांसफर ले लेते हैं। दूसरे आश्रम में चले जाते हैं। प्रॉब्लम है कि हमारे भीतर में जो एक तरह का क्या कहेंगे? अपूर्णता वह जब तक रहेगा एक आश्रम से दूसरे आश्रम, दूसरे आश्रम से तीसरे आश्रम आप ट्रांसफर लेते ही रहिए। यू आर नेवर गोइंग टू बी हैप्पी। एक जगह पर बैठकर के अपने को ट्रांसफॉर्म करना होगा। फिर हमको द्वेष करने वाले ऑटोमेटिक हमको रिस्पेक्ट करना शुरू कर दे। यानी कि हमारे प्रति दूसरों का द्वेष है। इट इज नॉट इटरनल। वो जो बहुत ही सुंदर एग्जांपल है स्वामी जी का ये हरिपदो वो जो बेलगांव का उनका डिवोटी है उसके घर स्वामी जी जब रह रहे थे प्रवज्जा करते-करते वहां पे पहुंचे तो हरिपदो कहता है वैसे तो सब कुछ बहुत अच्छा है बेंगली जेंटलमैन है फॉरेस्ट डिपार्टमेंट में जॉब है छोटा सा घर है उसकी वाइफ जो है इंदुमती वो भी स्वामी जी की बड़ी डिवोटी है तो स्वामी जी को लगा बड़ा सुंदर संसार है इन लोगों का किंतु कुछ दिनों के बाद में ये हरिपदों ने स्वामी जी को कहा कि देखिए मेरा जो ये ब्रिटिश बोस है वो मेरे प्रति सतत द्वेष रखता रहेगा रहता है। इसकी वजह से मेरा हेल्थ बहुत ही बिगड़ गया है। मुझे यह सब मेडिकेशंस लेना पड़ रहा है। तो इसका क्या सॉल्यूशन है? तो उसने शायद ऐसा सोचा होगा मन कि स्वामी जी कुछ जादू टोना करके उसकी वो उसको ठिकाने लगा देंगे। किंतु स्वामी जी क्या उसको कहते हैं? देखो तुम्हारे खुद के मन में उसके प्रति द्वेष है। अभी वो जो है ना ह्यूमन साइकोलॉजी वो इंस्टिंक्टिवली समझ लेती है कि मैं आपके साथ में बात कर रहा हूं। आप मेरे साथ में बात कर रहे हैं। मान लीजिए कि मेरे मन में आपके प्रति द्वेष है तो आप कुछ ही क्षणों में समझ जाएंगे। इट्स अ ह्यूमन नेचर। हम समझ ही जाएंगे। इतना जो कहते हैं इंसाइट हम सब लोगों में होता है। भले ही चाहे मैं कितना ही छुपाने का प्रयास करूं। मेरे भीतर में आपके प्रति स्नेह है कि द्वेष है। कुछ ही समय में पहचान जाएगा। इट्स जस्ट अ ह्यूमन नेचर। तो स्वामी जी कहते हैं तुम्हारे खुद के हृदय में उसके प्रति द्वेष है ना उसको हटा दो। फिर देखो कि वह भी तो उसको इस तरह से रिसोंड करता है। अभी वह तुमको द्वेष कर रहा है क्योंकि वह तुम्हारे भीतर में काउंटर द्वेष देखता है। तुम अपने हृदय के द्वेष को दूर करो। देखो फिर वो कैसे रिसोंड करता है। तो हरिपौध कहते हैं मुझे रियली इससे बेनिफिट हुआ। जब मैंने उसके प्रति जो मेरा वैमनस्य मेरा जो दुश्मनावट था उसको थोड़ा सा मॉडरेट करने का प्रयास किया। वो 100% तो जाएगा नहीं। वह तो दगदबीज होने से जाएगा। बट एटलीस्ट यू कैन मॉडरेट इट एंड देन द नेक्स्ट पर्सन विल एक्चुअली रिसोंड। हमारे ऑर्डर में है कि देखिए कि सीनियर साधुओं की सेवा करनी है। अब जैसे मैं खुद का एग्जांपल बताता हूं। मैं मेरा खुद का नेचर ऐसा है। मैं बहुत ही ज्यादा इंट्रोवर्ट हूं। बहुत ही रेयरली किसी के साथ में सोशल लेवल पर इंटरेक्ट करता हूं। और मैं सब समय या तो अपने कमरे में अपने ऑफिस में बैठ के पढ़ाई करूंगा या तो कुछ ना कुछ काम करता रहूंगा। बहुत सारे लोगों को लगता है कि इसका नेचर जो है बहुत ज्यादा एोगेंट है। और फिर क्या है छोटी उम्र से ही मैं पब्लिकेशन में आ गया हूं। एडिटर बन गया हूं। तो लोगों को लगता है कि वो अपने को कितना सुपीरियर समझता है। थिंग इज दैट मैं यह सब सोचता ही नहीं। मैं अपने काम में इतना बिजी हूं किंतु दूसरों के मन में यह इंप्रेशन आता है कि मैं बहुत ही एोगेंट हूं और जानबूझकर के उनके साथ में किसी भी तरह की बात नहीं करता। अभी मैं कैसे समझाऊं कि मेरा इंट्रोवर्ट नेचर है। मेरा इस तरह का बिहेवियर है। व्हिच इज नथिंग टू डू विद यू। किंतु लोगों को ऐसा लगता है। व्हाट शुड बी द सॉल्यूशन? आइडियल सॉल्यूशन कि मैं जाकर के उनकी सेवा करूं। व्हिच इज़ व्हाट इन आवर ऑर्डर टीचेस अस कि जो सीनियर है जो अपने कलीग्स हैं किसी ना किसी तरह से उनको हेल्प करो। जैसे ही आप उनको हेल्प करेंगे ना छोटा सा भी हेल्प वो फट करके उनका नेचर आपके प्रति चेंज हो जाएगा। अभी क्या है कि मेरे लिए अगेन आई एम टू मच इंट्रोवर्ट टू डू ऑल दिस थिंग एंड समटाइ्स आई डोंट इवन केयर। बट जो आप जनरल सिचुएशन कहते हैं कि जिसके प्रति द्वेष है जाकर के उनको थोड़ा सा हेल्प करो। देखिए कि फट करके उसका आपके प्रति बिहेवियर कैसे चेंज हो जाता है। सी सी साउंड्स आइडियल माने प्रैक्टिकल लाइफ में सब समय ऐसा होगा नहीं किंतु क्या है ना अल्टीमेटली ये अपनी और ईश्वर की बीच का ये रिलेशन है बीच में जो कोई भी आते हैं ना तो प्रेम से दूर करो द्वेष से नहीं उसके प्रति थोड़ा सा प्रेम रख के थोड़ा सा हेल्प करके यदि वो उसका रास्ते से निकल जाता है वरना आंख बंद करता हूं तो भगवान की वजह में उसी को देखता हूं तो क्या लाभ है उसको कैसे भी करके मुझे रास्ते से हटाना है तभी सुपारी तो दे नहीं सकते किसी को तो तो पान खिला करके उसको हटाओ।

प्रश्न: तुरियानन्दजी कहते हैं, "आँखें बंद करके ध्यान करो और आँखें खोलकर भी ध्यान करो। उन्हें सर्वत्र देखो!"

माने आंख बंद करके भी यदि ईश्वर को देखना है ना तो उसके लिए भी लोगों के प्रति आपकी सहानुभूति होनी चाहिए। वरना वही लोग आकर के ध्यान में ऐसा बाधा खड़ा करेंगे कि हम पूरे एकदम यह हो जाएंगे। फ्रस्ट्रेट हो जाएंगे।

प्रश्न: हम लीला प्रसंग का अध्ययन क्यों करते हैं?

ना यह अभी देखिए लीला प्रसंग इसीलिए हमने सेलेक्ट किया है कि वह जो शास्त्र के बेस पर रामकृष्ण आईडियोलॉजी या तो फिर रामकृष्ण भावधारा के प्रकाश में शास्त्र सो ये परफेक्ट कॉम्बिनेशन है लीला प्रसंग इसका उसमें भी साधक भाव ना इवन इवन हायर लेवल साधना की भी जो बात करेंगे ना इट विल बी इज़ियर फॉर अस टू अंडरस्टैंड अब देखिए हम जैसे कि उज्जवल नीलमाण तो हमने वो कुछ दिन पहले उसकी उसकी बात हो रही थी। मधुर भाव का जो स्टैंडर्ड ग्रंथ है उज्जवल नीलमणि तो रूप गोस्वामी ने लिखा है। अभी मैं थोड़ा सा ट्राई करूंगा पढ़ने का उसको किंतु मुझे नहीं लगता है मैं बहुत ज्यादा उसमें जा पाऊंगा। किंतु ठाकुर की मधुर भाव की साधना को आप देखिए इजीली समझ में आ जाता है कि यह माजरा क्या है। हम शायद ना कर पाए किंतु इंटेलेक्चुअली इट इज़ ईजी टू अंडरस्टैंड। सिमिलरली वेदांत वेदांत आप यदि मांडूक्य उपनिषद है, मुंडक उपनिषद है, ब्रह्मसूत्र है, इट विल वेरी डिफिकल्ट टू गो डीपर इनसाइड। किंतु ठाकुर जिस तरह से उसका प्रैक्टिकल करते हैं, शरद महाराज जिस तरह से उसको एक्सप्लेन करते हैं व्हिच आर वेरी इजी टू अंडरस्टैंड। एक्चुअली राइट नाउ वी आर इन द अद्वैत टेरिटरी इटसेल्फ। माने कोर अद्वैत टेरिटरी है। सर्वभूत में ब्रह्म तत्व वो कोर माने अद्वैत टेरिटरी में प्रवेश कर चुके हैं। किंतु फिर भी ऐसा कोई डिफिकल्ट नहीं लग रहा है। एंड दिस इज प्रैक्टिकल आल्सो। कभी-कभी लगेगा कि अच्छा अभी जैसे आप बच्चों को मेडिकल साइंस ना कि ऐसा कुछ सिखाएंगे तो बड़ा सिंपलीफाई करके देंगे। बच्चे लोग उसका कोई प्रैक्टिकल एप्लीकेशन नहीं करने वाले हैं। सिर्फ एक इंटेलेक्चुअल क्यूरियोसिटी के लिए किया है। बट यह जो हमको पलेटेबल करके भी जो दिया है इट इज अ वेरी प्रैक्टिकल एप्लीकेशन। ऐसा नहीं है कि वो बच्चों को मनाने के लिए पटाने के लिए कुछ छोटा बहुत करके रख दिया है।